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Detailed Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, अवधारणाएँ और उनका उपयोग UP Board Solutions for Class 11 Sociology
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Class 11 Sociology Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, अवधारणाएँ और उनका उपयोग UP Board Solutions PDF
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
Question 1. समाजशास्त्र में हमें विशिष्ट शब्दावली और संकल्पनाओं के प्रयोग की आवश्यकता क्यों होती हैं?
Answer: प्रत्येक विषय की एक विशिष्ट शब्दावली होती है। यह शब्दावली कुछ संकल्पनाओं के रूप में होती है। संकल्पनाएँ न केवल विषयगत अर्थ को समझने में सहायक होती हैं, अपितु संबंधित विषय के ज्ञान को सामान्य ज्ञान से भिन्न भी करती हैं। समाजशास्त्र इसमें कोई अपवाद नहीं है। समाजशास्त्रीय अंवेषण एवं व्याख्या में संकल्पनाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समाज, सामाजिक समूह, प्रस्थिति एवं भूमिका, सामाजिक स्तरीकरण, सामाजिक नियंत्रण, परिवार, नातेदारी, संस्कृति, सामाजिक संरचना इत्यादि समाजशास्त्र में प्रयोग की जाने वाली संकल्पनाएँ हैं जो संबंधित सामाजिक यथार्थता के अर्थ को स्पष्ट करती हैं। संकल्पनाएँ समाज में उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार समाज में विभिन्न प्रकार के व्यक्ति और समूह होते हैं, उसी प्रकार कई तरह की संकल्पनाएँ और विचार होते हैं। यदि माक्र्स के लिए वर्ग और संघर्ष समाज को समझने की प्रमुख संकल्पनाएँ थीं तो दुर्णीम के लिए सामाजिक एकता एवं सामूहिक चेतना मुख्य शब्द थे।
संकल्पना का अर्थ एवं परिभाषाएँ
संकल्पनाएँ प्रत्येक विषय में पाई जाती हैं तथा उनका प्रयोग समस्या के निर्माण करने और इसके समाधान के लिए किया जाता है। संकल्पना एक तार्किक रचना है जिसका प्रयोग एक अनुसंधानकर्ता आँकड़ों को व्यवस्थित करने एवं उनमें संबंधों का पता लगाने के लिए कार्य करता है। यह किसी अवलोकित घटना का भाववाचक अथवा व्यावहारिक रूप है। इन अमूर्त, रचनाओं अर्थात् संकल्पनाओं की सहायता से प्रत्येक विषय अपनी विषय-वस्तु समझने का प्रयास करता है। विभिन्न विद्वानों ने संकल्पना की परिभाषाएँ निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत की हैं- मैक-क्लीलैण्ड (Me-Clelland) के अनुसार-"विविध प्रकार के तथ्यों का एक आशुलिपि प्रतिनिधित्व हैं जिसका उद्देश्य अनेक घटनाओं को एक सामान्य शीर्षक के अंतर्गत मानकर, इस पर सोच-विचार कर कार्य सरल करना है।"
नान लिन (Nan Lin) के अनुसार-"संकल्पना वह शब्द है जिसे एक विशिष्ट अर्थ प्रदान किया गया है।"
गुड एवं हैट (Goode. and Hatt) के अनुसार-"अनेक बार यह भुला दिया जाता है कि संकल्पनाएँ इंद्रियों के प्रभाव, मानसिक क्रियाएँ अथवा काफी जटिल अनुभवों से निर्मित तार्किक रचनाएँ हैं।"
बर्नार्ड फिलिप्स (Bernard Philips) के अनुसार-"संकल्पनाएँ भाववाचक हैं जिनका प्रयोग एक वैज्ञानिक द्वारा प्रस्तावनाओं एवं सिद्धांतों के विकास के लिए निर्माण स्तंभों के रूप में किया जाता है। ताकि प्रघटनाओं की व्याख्या की जा सके तथा उनके बारे में भविष्यवाणी की जा सके । उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संकल्पना किसी मूर्त प्रघटना का भाववाचक रूप है। अर्थात् संकल्पना स्वयं प्रघटना न होकर इसे (प्रघटना) समझने में सहायता देती है। एक संकल्पना कुछ प्रघटनाओं को चयन या प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्हें एक श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। यह चयन न ही तो वास्तविक है और न ही कृत्रिम, अपितु इसकी उपयोगिता वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के रूप में ऑकी जा सकती है। संकल्पना वास्तविक प्रघटना के कितनी निकटे हैं यह इस बात पर निर्भर करता है। कि सामान्यीकरण किस स्तर पर किया गया है। उच्च स्तर पर किए गए सामान्यीकरण को ही संकल्पना कहा गया है।
समाजशास्त्र में विशिष्ट शब्दावली और संकल्पनाओं के प्रयोग की आवश्यकता
समाजशास्त्र जैसे विषय में विशिष्ट शब्दावली और संकल्पनाओं के प्रयोग की आवश्यकता और भी अधिक है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस विषय में हम उन सब पहलुओं का अध्ययन करते हैं जो हमारे लिए नवीन या अजनबी नहीं है। हम समझते हैं कि हमें विवाह, परिवार, जाति, धर्म इत्यादि शब्दों को पता है। हो सकता है कि इन शब्दों का जो अर्थ हमें पता हो वह इन शब्दों की समाजशास्त्रीय व्याख्या में मेल न खाता हो। इसलिए समाजशास्त्र की विशिष्ट शब्दावली एवं संकल्पनाएँ। समाजशास्त्रीय ज्ञान को 'सामान्य बौद्धिक ज्ञान' अथवा 'प्रकृतिवादी व्याख्या' से भिन्न भी करती हैं। यदि कोई किसी से पूछे कि परिवार क्या है? इस शब्द से परिचित होने के बावजूद इसका अर्थ सरलता से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। इसे स्पष्ट करने के लिए समाजशास्त्रियों ने इसकी ऐसी परिभाषाएँ दी हैं जो विभिन्न प्रकार के परिवार होते हुए भी इसका अर्थ स्पष्ट करने में सक्षम हैं। ऐसे ही असंख्य शब्द समाजशास्त्र में विशिष्ट संकल्पनाओं के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। इन सबका अर्थ हमारे सामान्य ज्ञान से भिन्न होता है। समाजशास्त्र जैसे विषय को सामान्यतः छात्र-छात्राओं द्वारा अन्य विषयों की तुलना में सरल समझने का कारण भी यही भ्रम है।
In simple words: समाजशास्त्र में विशिष्ट शब्दों और विचारों का उपयोग इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि हम सामाजिक घटनाओं को गहराई से समझ सकें और सामान्य धारणाओं से अलग वैज्ञानिक ज्ञान विकसित कर सकें। ये हमें सामाजिक यथार्थ को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: संकल्पनाओं और शब्दावली का स्पष्टीकरण समाजशास्त्र में मूलभूत समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो विषयों की गहरी व्याख्या में सहायक होता है।
Question 2. समाज के सदस्यों के रूप में आप समूहों में और विभिन्न समूहों के साथ अंतःक्रिया करते होंगे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन समूहों को आप किस प्रकार देखते हैं?
Answer: व्यक्ति समाज में अकेला नहीं रहता, अपितु अतीतकाल से ही विभिन्न प्रकार के समूहों में रहता है। व्यक्ति का जन्म समूह में होता है और समूहों में ही उसकी सामाजिक और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य के जीवन में सामाजिक समूहों का विशेष महत्त्व है। इन्हीं समूहों के साथ अन्तःक्रिया के परिणामस्वरूप उसका व्यक्तित्व विकसित होता है। मानव एक सामाजिक प्राणी है। इसका अर्थ ही यह है कि वह अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर रहताहै। समूह में रहने से व्यक्ति को अनेक लाभ होते हैं; अर्थात् समूह में रहने से उसके अनेक कार्य सरलता से पूरे हो जाते हैं तथा उसकी अनेक मूलप्रवृत्तियाँ संतुष्ट हो जाती हैं। इन समूहों से ही समाज का निर्माण होता है।
समाजशास्त्र मानव के सामाजिक जीवन का अध्ययन करता है। मानवीय जीवन की एक पारिभाषिक विशेषता यह है कि मनुष्य परस्पर अंतःक्रिया एवं संवाद करते हैं तथा सामाजिक सामूहिकता का । निर्माण करते हैं। समाज चाहे प्राचीन हो चाहे आधुनिक, सभी में समूहों एवं सामूहिकताओं के प्रकार अलग-अलग होते हैं। समाजशास्त्री 'सामाजिक समूह' शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थों में करते हैं। इसलिए सामाजिक समूह के समाजशास्त्रीय अर्थ को समझना आवश्यक है।
समाजशास्त्र में व्यक्तियों के संकलन मात्र को सामाजिक समूह नहीं कहा जा सकता है। व्यक्तियों को संकलन मात्र या समुच्चय या केवल ऐसे लोगों का जमावड़ा होता है जो एक ही स्थान पर होते हैं परंतु उनमें निश्चित संबंध नहीं पाए जाते हैं। उदाहरणार्थ-रेलवे स्टेशन या बस अड्डे पर प्रतीक्षा कस्ते । यात्री या सिनेमा देखते दर्शक, समुच्चयों के उदाहरण है। ऐसे समुच्चय अर्द्ध-समूह तो हैं परन्तु इन्हें समाजशास्त्रीय शब्दावली में सामाजिक समूह नहीं कहा जा सकता। अर्द्ध-समूहों में संरचना अथवा संगठन का अभाव पाया जाता है तथा इनके सदस्य समूह के अस्तित्व के प्रति अनभिज्ञ होते हैं। सामाजिक वर्गों, प्रस्थिति, समूहों, आयु एवं लिंग समूहों, भीड़ इत्यादि अर्द्ध-समूह के उदाहरण हैं। जब कुछ व्यक्ति एक स्थान पर रहते हैं और उनमें किसी-न-किसी प्रकार की दीर्घकालीन एवं स्थायी । अंतःक्रिया (Interaction) होती है तो इन अंतःक्रियाओं के स्थिर प्रतिमान समूह का निर्माण करते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से दीर्घकालीन एवं स्थायी अंतःक्रिया के अतिरिक्ति सामाजिक समूह के लिए। चार प्रमुख तत्त्वों का होना आवश्यक है-प्रथम सदस्यों में सामान्य रुचि के कारण पारस्परिक संबंध । या निकटता का होना, द्वितीय, सामान्य मूल्यों एवं प्रतिमानों को अपनाना, तृतीय, एक-दूसरे के प्रति पहचान एवं जागरूकता के कारण अपनत्व की भावना का होना तथा चतुर्थ, एक संरचना की विद्यमानता । एडवर्ड सापियर (Edward Sapir) का कथन है कि समूह का निर्माण इस तथ्य पर आधारित है कि कोई-न-कोई स्वार्थ उस समूह के सदस्यों को एकसूत्र में बाँधे रखता है। ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburm and Nimkoff) के अनुसार, “जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ मिलकर रहें और एक-दूसरे पर प्रभाव डालने लगें तो हम कह सकते हैं कि उन्होंने समूह का निर्माण कर लिया है।"
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हम अनेक समूहों में अपना जीवन व्यतीत करते हैं तथा उनके सदस्यों के साथ अंतःक्रिया करते हैं। इस भाँति, समाजशास्त्र में सामाजिक समूहों को व्यक्तियों का संकलन मात्र या समुच्च या केवल ऐसे लोगों का जमावड़ा नहीं मानते हैं। यदि सदस्यों में स्थायी अंतःक्रिया हैं, अंतःक्रियाओं के स्थिर प्रतिमान हैं तथा सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति चेतना है, तभी इसे सामाजिक समूह कहा जाएगा।
In simple words: समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से समूह केवल व्यक्तियों का जमावड़ा नहीं, बल्कि ऐसे लोग होते हैं जिनके बीच स्थायी अंतःक्रिया, एक-दूसरे के प्रति चेतना और साझा मूल्य होते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास होता है और समाज का निर्माण होता है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक समूहों की पहचान और उनके घटकों को समझना समाजशास्त्रीय विश्लेषण के लिए आधारभूत है, विशेषकर समूह गतिशीलता और अंतःक्रिया के संदर्भ में।
Question 3. अपने समाज में उपस्थित स्तरीकरण की व्यवस्था के बारे में आपका क्या प्रेक्षण हैं? स्तरीकरण से व्यक्तिगत जीवन किस प्रकार प्रभावित होते हैं?
Answer: सामाजिक स्तरीकरण (संस्तरण) एवं सामाजिक गतिशीलता ऐसी सार्वभौमिक प्रक्रियाएँ हैं जो किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में पायी जाती हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी जाति तथा एक निश्चित आय वाले समूह, जिसे वर्ग कहा जाता है, का सदस्य है। विभिन्न जातियों एवं वर्गों का सामाजिक स्तर एक जैसा नहीं होता, इनमें एक निश्चित संस्तरण पाया जाता है। इसी को हम सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। समाजशास्त्र में सामाजिक स्तरीकरण का अध्ययन विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि इसी के आधार पर समाज में तनाव तथा विरोध विकसित होते हैं। इसी के अध्ययन से पता चलता है कि किसी समाज के व्यक्तियों को उपलब्ध जीवन अवसरों (Life chances), सामाजिक प्रस्थिति (Social status) एवं राजनीतिक प्रभाव (Political influence) में कितनी असमानता है।
स्तरीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामाजिक स्तरीकरण समाज का विभिन्न स्तरों में विभाजन है। इन स्तरों में ऊँच-नीच या संस्तरण पाया जाता है। इसके अंतर्गत कुछ विशेष स्थिति वाले व्यक्तियों या समूहों को अधिक अधिकार, प्रतिष्ठा एवं जीवन अवसर उपलब्ध होते हैं, जबकि इससे निम्न स्थिति वाले व्यक्तियों या समूहों को ये सब कम मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार, समाज के विभिन्न समूहों में पाई जाने वाली आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक असमानता को ही स्तरीकरण कहा जाता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्यों और समूहों को प्रस्थिति के पदानुक्रम में न्यूनाधिक स्थायी रूप से श्रेणीबद्ध किया जाता है। यह एक दीर्घकालीन उद्देश्य वाली सचेत प्रक्रिया है। समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक स्तरीकरण को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है। स्तरीकरण की प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-
जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार-"सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ समाज को कुछ ऐसी स्थायी श्रेणियों तथा समूहों में बाँटने की व्यवस्था से है जो कि उच्चता एवं अधीनता के संबंधों से परस्पर संबद्ध होते हैं।' इस परिभाषा में उच्चता एवं अधीनता के आधार पर समूह को विभाजित किया जाना ही स्तरीकरण माना गया है। इसमें दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं- प्रथम, यह है कि जिस आधार से समूह को स्तरीकृत किया जाता है वह स्थिर रहता है तथा द्वितीय, उच्चता एवं निम्नता के आधार पः विभिन्न समूह प्रतिष्ठित होते हैं और वे परस्पर संबंध रखते हुए सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखते हैं।
सदरलैंड एवं वुडवर्ड (Sutherland and Woodward) के अनुसार-"साधारणतः स्तरीकरण अंतःक्रिया अथवा विभेदीकरण की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कुछ व्यक्तियों को दूसरों की तुलना में उच्च स्थिति प्राप्त हो जाती है। इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि स्तरीकरण का आधारे प्रस्थिति है। सामाजिक स्तरीकरण से तात्पर्य भौतिक या प्रतीकात्मक लाभों तक पहुँच के आधार पर समाज में समूहों के बीच की संरचनात्मक असमानताओं के अस्तित्व से हैं। इसकी तुलना धरती की सतह से चट्टानों की परतों से की जाती है। समाज को एक ऐसे अधिक्रम के रूप में देखा जाता है, जिसमें कई परतें शामिल हैं। इस अधिक्रम में अधिक कृपापात्र शीर्ष पर तथा कम सुविधापात्र तल के निकट हैं।
भारतीय समाज में उपस्थित स्तरीकरण की व्यवस्था
ऐतिहासिक रूप से मानव समाजों में स्तरीकरण की चार व्यवस्थाएँ उपस्थित रही हैं दासता, जाति, संप्रदाय तथा वर्ग। भारतीय समाज में जब हम अपने आस-पड़ोस का प्रक्षेपण करते हैं तो हमें जाति के आधार पर ऊँच-नीच दिखाई देती है। जाति पर आधारित स्तरीकरण की व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति पूरी तरह से जन्म पर आधारित होती है। विभिन्न जातियों की सामाजिक प्रतिष्ठा में अंतर होता है तथा उनमें ऊँच-नीच के आधार पर खान-पान, विवाह, सामाजिक सहवास इत्यादि पर भी प्रतिबंध पाए जाते हैं। परंपरागत रूप से प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था। अस्पृश्यता से जाति व्यवस्था में पाई जाने वाली ऊँच-नीच का पता चलता है। अस्पृश्य जातियों को अपवित्र माना जाता था तथा उनसे अन्य जातियाँ दूरी बनाए रखती थीं। समकालीन भारतीय समाज में यद्यपि जाति व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए हैं, तथापि जातिगत भेदभाव आज भी स्पष्ट देखे जा सकते हैं। भारत में सामाजिक स्तरीकरण का दूसरा आधार आर्थिक आधार पर निर्मित होने वाले वर्ग हैं। भू-स्वामी एवं कारखानों के मालिक भूमिहीन एवं श्रमिक वर्ग से कहीं अधिक सुविधा संपन्न होते हैं। तथा विविध रूपों में अधीनस्थ वर्गों का शोषण करते हैं। बहुत-से विद्वान अब यह मानने लगे हैं कि जातिगत भेदभाव के साथ-साथ भारत में आर्थिक आधार पर भी ऊँच-नीच की भावना व्याप्त हो गई है। इसीलिए आस-पड़ोस में रहने वाले अनेक परिवार न केवल अन्य जातियों के अपितु हमसे अधिक अमीर या गरीब भी हो सकते हैं।
In simple words: सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यक्तियों और समूहों के बीच असमानता की एक सार्वभौमिक व्यवस्था है, जो जन्म, धन या स्थिति के आधार पर ऊँच-नीच के क्रम में विभाजित होती है, जिससे जीवन के अवसर और राजनीतिक प्रभाव व्यक्तिगत रूप से प्रभावित होते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण को परिभाषित करते समय इसके विभिन्न आयामों-आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक-को स्पष्ट करना और भारतीय संदर्भ में जाति तथा वर्ग के प्रभाव को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 4. सामाजिक नियंत्रण क्या है? क्या आप सोचते हैं कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक नियंत्रण के साधन अलग-अलग होते हैं? चर्चा कीजिए ।
Answer: सामाजिक नियंत्रण समाजशास्त्र में सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली संकल्पनाओं में से एक है। इसका कारण यह है कि कोई भी समाज बिना नियंत्रण के. अपना अस्तित्व अधिक देर तक नहीं बनाए रख सकता है। मनुष्य को मनचाहा व्यवहार करने से रोकने तथा समाज को व्यवस्थित रखने में सामाजिक नियंत्रण का विशेष योगदान होता है।
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामान्य शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति को समाज द्वारा मान्य आदर्शों व प्रतिमानों के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है तथा उसी के अनुसार वह व्यवहार और आचरण करने के लिए बाध्य होता है। यह बाध्यता ही सामाजिक नियंत्रण कहलाती है। यह वह विधि है, जिसके द्वारा एक समाज अपने सदस्यों एवं समूहों के व्यवहार का नियमन करता है तथा उदंड या-उपद्रवी सदस्यों को पुनः राह पुर् लाने का प्रयास करता। है। सामाजिक नियंत्रण को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है-
गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार-"सामाजिक नियंत्रण सुझाव, अनुनय, प्रतिरोध और प्रत्येक प्रकार के बल प्रयोग; जिसमें शारीरिक बल भी सम्मिलित है; जैसे उपायों की राह व्यवस्था है, जिसके द्वारा समाज अपने अतंर्गत उपसमूहों वे सदस्यों ने स्वीकृत आदर्शों के माने हुए प्रतिमानों के अनुसार ढाल लेता है।"
मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-"सामाजिक नियंत्रण से आशय उस ढंग से हैं जिसमें कि समस्त सामाजिक व्यवस्था समन्वित रहती है और अपने को बनाए रखती है अथवा वह जिसमें संपूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलित के रूप में क्रियाशील रहती है।" प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के अनुसार सामाजिक नियंत्रण का अर्थ व्यक्तियों और समूहों के व्यवहार को नियमित करने के लिए बल प्रयोग करना तथा समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए मूल्यों और प्रतिमानों को लागू करना है। संघर्षवादी दृष्टिकोण के समर्थक सामाजिक नियंत्रण को प्रभावी वर्ग के बाकी समाज पर नियंत्रण के साधन के रूप में देखते हैं। शारीरिक बल प्रयोग को सामाजिक नियंत्रण का अन्तिम एवं प्राचीनतम साधन माना जाता है। इसलिए कोई भी राज्य पुलिस बल या इसके समान किसी अन्य सशस्त्र बल के बिना नहीं रह सकता। दैनिक जीवन में वास्तविक बल प्रयोग कम किया जाता है तथा इसक' भय ही काफी होता है। उदाहरणार्थ-समवयस्क समूहों में एक बच्चा किसी अन्य पर यह कहकर ही नियंत्रण रखने में सफल हो जाता है कि जो तुम कर रहे हो उसे मैं तुम्हारे बड़े भाई या माता-पिता को बता दूंगा। बड़े समूहों में कई बार नियंत्रण हेतु वास्तविक बल प्रयोग भी करना पड़ता है।
समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक नियंत्रण के साधन
सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं, तकनीकों और रणनीतियों से है जिनके द्वारा व्यक्ति या समूह के व्यवहार को नियमित किया जाता है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक नियंत्रण के भिन्न-भिन्न साधन होते हैं। यह साधन अनौपचारिक या औपचारिक हो सकते हैं। जब नियंत्रण के संहिताबद्ध, व्यवस्थित एवं अन्य औपचारिक साधन प्रयोग किए जाते हैं तो यह औपचारिक नियंत्रण कहलाता है। शिक्षा, राज्य तथा कानून सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन माने जाते हैं। आधुनिक समाजों में इन्हीं औपचारिक साधनों पर जोर दिया जाता है। अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण व्यक्तिगत, अशासकीय एवं अंसहिताबद्ध होता है। यह अलिखित होता है तथा उसका विकास समाज में धीरे-धीरे तथा अपने आप हो जाता है। इसमें मुस्कान, चेहरे बनाना, शारीरिक भाषा, आलोचना, उपहास, हँसी आदि सम्मिलित होते हैं। परिवार, धर्म, जनरीतियाँ, रूढ़ियाँ, प्रथाएँ, नैतिक आदर्श, पुरस्कार इत्यादि अनौपचारिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं। प्राथमिक समूह तथा सरल समाजों में सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।
In simple words: सामाजिक नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिससे समाज व्यक्तियों के व्यवहारों को नियमों और मूल्यों के अनुसार ढालकर व्यवस्था बनाए रखता है। इसके साधन औपचारिक (जैसे कानून, शिक्षा) और अनौपचारिक (जैसे प्रथाएँ, परिवार) दोनों हो सकते हैं, जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से काम करते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक और अनौपचारिक साधनों के बीच अंतर को स्पष्ट करना और उनके उदाहरणों को विभिन्न सामाजिक संदर्भों से जोड़ना आपकी समझ को मजबूत करेगा।
Question 5. विभिन्न भूमिकाओं और प्रस्थितियों को पहचानें जिन्हें आप निभाते हैं और जिनमें आप स्थित हैं। क्या आप सोचते हैं कि भूमिकाएँ और प्रस्थितियाँ बदलती हैं? चर्चा करें कि ये कब और किस प्रकार बदलती हैं।
Answer: एक जटिल समाज में विभिन्न व्यक्तियों के मध्य सामाजिक अंतः क्रियाएँ निरंतर होती रहती है। सामाजिक अंतःक्रियाएँ वैयक्तिक नहीं होती वरन् पद के अनुरूप व प्रस्थिति से संबंधित होती है। जिस प्रकार कोशिका-कोशिका मिलकर शरीर का ढाँचा निर्मित करती हैं, उसी प्रकार व्यक्ति-व्यक्ति के बीच अंत:संबंधों के द्वारा सामाजिक संरचना का निर्माण होता है। यह संरचना ही मानवीय अंत:क्रियाओं को सुविधाजनक और संभव बनाती है।। वस्तुतः ये पारस्परिक अंतःक्रियाएँ ही समाज, संस्कृति और व्यक्तित्व की मूलाधार हैं। प्रस्थिति. एवं भूमिका को सामाजिक संरचना की लघुक्म इकाई माना जाता है।
सामाजिक प्रस्थिति का अर्थ
किसी समाज या समूह में कोई व्यक्ति, निर्दिष्ट समय में जो स्थान प्राप्त करता है उसे प्रस्थिति कहा जाता है, परंतु यह सामाजिक पद का अधिकार पक्ष ही है क्योंकि प्रस्थिति से व्यक्ति के अधिकारों को बोध होता है। सामाजिक प्रस्थिति को समूह के संदर्भ में न देखकर व्यक्ति के सन्दर्भ में देखा जाता है। बीरस्टीड (Bierstedt) ने समाज को 'प्रस्थितियों का ताना-बाना' (Network of statuses) कहा है। सैद्धांतिक स्तर पर प्रस्थिति को दो अर्थों में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है--प्रथम अर्थ में इससे । एक निश्चित क्रम का पता चलता है। अर्थात् इससे उच्च यो निम्न भाव प्रकट होते हैं; जैसे किसी ऑफिस में बड़े बाबू को अन्य बाबुओं से अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। दूसरे अर्थ में इससे किसी प्रकार के क्रम का आभास नहीं होता है, जैसे वैवाहिक या आयु प्रस्थिति समाज में व्यक्तियों की प्रस्थिति का निर्धारण सामाजिक नियमों के अनुसार होता है। किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार, “प्रस्थिति किसी भी सामान्य संस्थात्मक व्यवस्था में किसी पद की सूचक हैं, ऐसा पद जो समाज द्वारा स्वीकृत है और जिसका निर्माण स्वतः ही होता है तथा जो जनरीतियों व रूढ़ियों से संबंद्ध है।” इस प्रकार, प्रस्थिति से तात्पर्य सामाजिक स्थिति तथा उससे जुड़े निश्चित अधिकारों एवं कर्तव्यों से है। उदाहरणार्थ-माँ की एक प्रस्थिति होती है, जिसमें आचरण के कई मानक होते हैं। और साथ ही निश्चित जिम्मेदारियाँ और विशेषाधिकार भी होते हैं। किसी भी व्यक्ति की एक से अधिक प्रस्थितियाँ हो सकती है। माता की अन्य प्रस्थितियों में 'पत्नी', 'पुत्रवधु' 'बहन', 'चाची', 'मामी', 'अध्यापिका आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।
सामाजिक भूमिका का अर्थ
भूमिका का तात्पर्य कार्य से होता है। इसका निर्धारण व्यक्ति के पद अथवा प्रस्थिति के अनुसार होता है। भूमिका को प्रस्थिति से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि बिना भूमिका के किसी प्रस्थिति की। कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं। इसलिए भूमिका प्रस्थिति का गत्यात्मक पक्ष है। उदाहरणार्थ - किसी कॉलेज के अमुक प्रोफेसर का होना उसकी प्रस्थिति का द्योतक है, जबकि उसके द्वारा शिक्षार्थियों को पढ़ाना या परीक्षा संबंधित कार्य करना उसकी भूमिका है। यह बात ध्यान देने योग्य हैं कि प्रत्येक कार्य भूमिका नहीं कहा जाता है। उदाहरणार्थ-भोजन करना एक सामान्य कार्य तो है परंतु भूमिका नहीं है। केवल उसी कार्य को भूमिका कहा जाता है जो कोई व्यक्ति सामाजिक नियमों एवं मानदण्डों को ध्यान । में रखकर करता है। माता-पिता द्वारा बच्चों को स्नेह प्रदान करना उनकी सामाजिक भूमिका है, परंतु बच्चों द्वारा माता-पिता का अपमान करना उनकी भूमिका नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भूमिका व्यक्तियों के व्यवहार की एक प्रणाली का नाम है। कोई भी व्यक्ति पिता, पुत्र, शिक्षक, शिक्षार्थी, ग्राहक इत्यादि के रूप में जो व्यवहार करता है वहीं उसकी भूमिका कहीं जाती है। इलियट एवं मैरिट (Elliott and Merrill) के अनुसार, “भूमिका वह कार्य है जिसे वह (व्यक्ति) प्रत्येक प्रस्थिति के अनुरूप निभाता है।” इस प्रकार, भूमिका प्रस्थिति का सक्रिय या व्यावहारिक पक्ष है। प्रस्थितियाँ ग्रहण की जाती हैं, जबकि भूमिकाएँ निभाई जाती हैं। इसीलिए प्रस्थिति को कई बार संस्थागत भूमिका' भी कहा जाता है। प्रस्थिति की भाँति व्यक्ति की अनेक भूमिकाएँ होती हैं। छात्र-छात्रा होना आपकी प्रस्थिति है तथा शिक्षा संस्थान में इस प्रस्थिति के अनुरूप आपसे जिस व्यवहार एवं जिम्मेदारी की आशा की जाती है वह आपकी भूमिका है। छात्र-छात्रा के अतिरिक्त, आपकी प्रस्थिति भाई-बहन के रूप में भी हो सकती है और इस नाते अलग-अलग भूमिकाएँ भी । जब आप पढ़ने के बाद नौकरी करने लगेंगे तो आपको एक नई प्रस्थिति प्राप्त हो जाएगी जिसके अनुसार आपको अपनी भूमिका को निभाना होगा। कई बार व्यक्ति की तिभिन्न भूमिकाओं में सामंजस्य का अभाव पाया जाता है तथा इससे भूमिका संघर्ष विकसित हो जाती है। उदाहरणार्थ-एक कामकाजी महिला के लिए घर-गृहस्थी की भूमिका एवं दफ्तर की भूमिका में असामंजस्य, उसमें भूमिका संघर्ष विकसित कर सकता है।
In simple words: प्रस्थिति समाज में व्यक्ति का स्थान है, जबकि भूमिका उस प्रस्थिति से जुड़े कार्य और अपेक्षाएँ हैं। ये दोनों आपस में जुड़ी हैं और व्यक्ति के जीवन में लगातार बदलती रहती हैं, जैसे छात्र से कर्मचारी या अविवाहित से माता बनना।
🎯 Exam Tip: प्रस्थिति और भूमिका के बीच के अंतर को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें और यह भी बताएं कि सामाजिक परिवर्तन के साथ ये कैसे बदल सकते हैं, क्योंकि यह सामाजिक संरचना की गहरी समझ को दर्शाता है।
क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर
Question 1. क्या विकास के लिए लोकतंत्र एक सहायता अथवा एक रुकावट है?
Answer: समाज में सभी व्यक्ति एक समान सोच नहीं रखते, उनके दृष्टिकोणों एवं धारणाओं में काफी अंतर पाया जाता हैं। एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों एवं धारणाओं के बारे में चर्चा के परिणामस्वरूप बनी सहमति अनिवार्य होती है। विकास के लिए लोकतंत्र की भूमिका एक ऐसी ही धारणा है जिसके बारे में मतभेद पाए जाते हैं। अधिकांश विद्वानों का कहना है कि लोकतंत्र विकास का एक सर्वश्रेष्ठ अभिकरण है क्योंकि इसमें व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध होते हैं तथा किसी भी नागरिक के साथ जाति, प्रजाति, धर्म, लिंग इत्यादि जन्मजात गुणों के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता है। इसी कारण से अमेरिका एवं पश्चिमी देशों में विकास अधिक हुआ है। प्रजातांत्रिक मूल्यों ने इन देशों के विकास में सहायता दी है। दूसरी ओर, ऐसे विद्वान भी हैं जो प्रजातंत्र को विकास में बाधक मानते हैं। उनका तर्क है कि प्रजातांत्रिक देशों में नौकरशाही भ्रष्ट हो जाती है, सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार व्याप्त हो जाता है तथा विकास का लाभ पहले से ही धनी वर्गों को मिलता है। इसलिए अमीर तथा गरीब में अंतराल कम होने की बजाय बढ़ता जाता है। जिन देशों ने लोकतंत्र के स्थान पर शासन की किसी अन्य व्यवस्था को विकास हेतु अपनाया है, वहाँ पर विकास की गति धीमी रही है। इससे लोकतंत्र के विकास में बाधक होने का तर्क कमजोर दिखाई देता है।
In simple words: लोकतंत्र विकास के लिए सहायक हो सकता है क्योंकि यह समान अवसर और गैर-भेदभाव को बढ़ावा देता है, जैसा कि पश्चिमी देशों में देखा गया है; हालांकि, कुछ तर्क देते हैं कि यह भ्रष्टाचार और असमानता को बढ़ा सकता है, जिससे विकास बाधित होता है।
🎯 Exam Tip: लोकतंत्र के विकास पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों को तर्क और उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करना, एक संतुलित दृष्टिकोण दर्शाता है और आपके उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
Question 2. क्या लिंग समानता अधिक सामंजस्यपूर्ण अथवा अधिक विभाजक समाज बनाती है?
Answer: किसी भी अच्छे समाज के लिए असमानता का होना उचित नहीं माना जाता है। लिंग असमानता के परिणामस्वरूप विश्व की आधी जनसंख्या अर्थात् महिलाओं का विकास अवरुद्ध होता है। इससे समाज लिंग के आधार पर विभाजित हो जाता है तथा महिलाओं को आगे बढ़ने के उतने अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं जितने कि पुरुषों को होते हैं। इसलिए सभी देशों में महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, प्रत्याशित आयु इत्यादि विकास के सूचकों में पुरुषों से कहीं पीछे हैं। आधुनिक युग में महिलाओं को घर की चहारदीवारी तक सीमित कर समाज का विकास संभव नहीं है। इसलिए लिंग असमानता कभी भी सामंजस्यपूर्ण नहीं हो सकती। जो इस प्रकार की असमानता का समर्थन करते हैं वे पुरुषप्रधान दृष्टिकोण से प्रभावित हैं। विश्व में पुरुषप्रधान दृष्टिकोण ही पुरुषों के महिलाओं पर प्रभुत्व को बनाए रखने तथा उन्हें पुरुषों के समान न ला पाने के लिए उत्तरदायी है। यह सही है कि पुरुषों एवं महिलाओं में शारीरिक दृष्टि से अंतर होता है। इस अंतर को सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर ऊँच-नीच में बदल देना अर्थात् पुरुषों को महिलाओं से ऊँचा स्थान देना ही लिंग असमानता कहलाता है जो कि समाज के विकास को अवरुद्ध करता है। चूंकि अतीत में लिंग असमानता समाज की व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक रही है, इसलिए कुछ लोग विभाजक नहीं मानते हैं। इस प्रकार, यह भी एक ऐसा मुद्दा है जिस पर समाज के विभिन्न समूहों अथवा व्यक्तियों की राय में मतभेद पाया जाता है। इस मतभेद के बावजूद आज सभी समाज लिंग असमानता को दूर करने अथवा कम-से-कम करने हेतु प्रयासरत हैं।
In simple words: लिंग समानता एक अधिक सामंजस्यपूर्ण समाज बनाती है क्योंकि यह महिलाओं को समान अवसर प्रदान करके समग्र विकास को बढ़ावा देती है, जबकि लिंग असमानता समाज को विभाजित करती है और विकास को बाधित करती है।
🎯 Exam Tip: लिंग समानता के सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक प्रभावों को समझाते हुए अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए ठोस उदाहरणों और आंकड़ों का उपयोग करें।
Question 3. विरोधों को दूर करने के लिए दंड अथवा चर्चा में सर्वश्रेष्ठ तरीका कौन-सा है?
Answer: विरोधों को दूर करने हेतु दो तरीके हो सकते हैं-एक तो विरोधियों को चुप कराने हेतु दंड देने को तथा दूसरा उनके विचार सुनकर एक स्वच्छ चर्चा कर सहमति पर पहुँचने का। पहला तरीका किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है क्योंकि इसमें जिसके पास शक्ति है वह अन्यों को वास्तविक दंड देकर या दंड का भय दिखाकर उनसे अपनी बात मनवा सकता है अथवा उनसे अनुपालन सुनिश्चित कर सकता है। यदि दंड देने की बजाए विरोधियों की राय भी सुन ली जाए अथवा उनसे विवादित मुद्दे पर खुली चर्चा की जाए तो हो सकता है बीच का कोई ऐसी सर्वसम्मत रास्ता निकल आए कि जिसमें बल प्रयोग करने की आवश्यकता ही न रहे। इसलिए यह दूसरा रास्ता अधिक अच्छा माना जाता है। किसी भी समाज में विभिन्न व्यक्तियों के विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है। इस मतभेद पर चर्चा द्वारा मतैक्य पर पहुँचना ही एक अच्छे समाज के निर्माण में सहायक होता है।
In simple words: विरोधों को दूर करने के लिए दंड से बेहतर है खुली चर्चा और सहमति बनाना, क्योंकि यह अधिक न्यायसंगत और प्रभावी तरीका है जो स्थायी समाधान की ओर ले जाता है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में, दोनों तरीकों के गुणों और अवगुणों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है, साथ ही यह स्पष्ट करना कि क्यों चर्चा को दंड से बेहतर माना जाता है।
Question 4. क्या जाति, वर्ग, महिलाएँ, जनजाति अथवा गाँव प्रारंभ में ही सामाजिक समूह थे?
Answer: प्रारंभ में जाति, वर्ग, महिलाएँ, जनजाति या गाँव सामाजिक समूह नहीं थे क्योंकि इनमें सामाजिक समूह के तत्त्वों को अभाव पाया जाता था। उदाहरणार्थ-जाति या वर्ग ऐसे अर्द्ध-समूह हैं। जिनमें संरचना अथवा संगठन की कमी पाई जाती थी तथा जिसके सदस्य समूह के अस्तित्व के प्रति अनभिज्ञ अथवा कम जागरूक होते थे। लिंग के आधार पर जब महिलाओं ने अपनी स्वतंत्रता एवं समानता हेतु संगठन बनाकर आंदोलन प्रारंभ किए तब उनमें सामाजिक समूह के लक्षण विकसित होने लगे। इसी भाँति, जाति के आधार पर यदि किसी राजनीतिक दल का निर्माण होता है अथवा कोई जाति विरोधी आंदोलन प्रारंभ होता है तो जाति के सदस्यों में अपने समूह के प्रति चेतना विकसित होती है। तथा उनमें अपने हितों की रक्षा हेतु अंतःक्रियाओं के स्थिर प्रतिमान भी विकसित होते हैं। अपनत्व की भावना का विकास भी इसी का प्रतिफल माना जाता है। जनजाति सामाजिक समूह न होकर एक विशेष प्रकार का समूह है जिसे समाजशास्त्रीय शब्दावली में 'समुदाय' कहा जाता है। जनजाति के लोगों में वैयक्तिक, घनिष्ठ और चिरस्थायी संबंध पाए जाते हैं। इसी भाँति, गाँव भी एक समुदाय है। यदि ग्रामवासी पर्यावरण संबंधी किसी संगठन का निर्माण कर लेते हैं तो समुदाय के भीतर ही समूहों का विकास होना प्रारंभ हो जाता है।
In simple words: शुरुआत में जाति, वर्ग, महिलाएँ, जनजाति और गाँव सामाजिक समूह नहीं थे, बल्कि 'अर्द्ध-समूह' या 'समुदाय' थे, क्योंकि उनमें सामाजिक समूह के लिए आवश्यक संरचना, संगठन और सदस्यों के बीच चेतना का अभाव था, जो बाद में सामूहिक आंदोलनों से विकसित हुई।
🎯 Exam Tip: सामाजिक समूह के परिभाषित तत्वों (जैसे संरचना, संगठन, अंतःक्रिया और चेतना) पर ध्यान केंद्रित करना और उन्हें दिए गए उदाहरणों पर लागू करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. किशोर आयु समूह से आपका क्या अभिप्राय है? यह किस प्रकार का समूह है?
Answer: आयु के आधार पर निर्मित समूह को सामाजिक समूह नहीं कहा जाता है। यह भी अर्द्ध-समूह का उदाहरण है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी माँग को लेकर किशोर आयु समूह संगठित हो जाए। यदि शिक्षा संस्थाओं में किसी माँग को लेकर अथवा समाज में किसी महत्त्वपूर्ण भूमिका को लेकर इस प्रकार का समूह अपने सदस्यों में आपसी पहचान एवं अपनत्व की भावना का विकास कर लेता है, सदस्यों में दीर्घ एवं स्थायी अंतःक्रिया प्रांरभ हो जाती है तथा उनमें अंतःक्रिया के प्रतिमान स्थिर होने लगते हैं तो आयु के आधार पर बना किशोर समूह एक सामाजिक समूह का रूप धारण करे लेता है।
In simple words: किशोर आयु समूह मूलतः एक अर्द्ध-समूह है, जो आयु के आधार पर बनता है, लेकिन यदि इसके सदस्य किसी साझा उद्देश्य के लिए संगठित होकर स्थायी अंतःक्रिया और अपनत्व विकसित कर लें, तो यह एक सामाजिक समूह बन जाता है।
🎯 Exam Tip: आयु समूह को परिभाषित करते समय यह स्पष्ट करें कि कब एक अर्द्ध-समूह (जैसे किशोर आयु समूह) सामाजिक समूह में परिवर्तित होता है, उसके लिए आवश्यक शर्तों पर जोर दें।
Question 6. एक समिति (संघ) किसी बड़ी पारिवारिक सभा से किस प्रकार भिन्न होती है?
Answer: किसी समिति के ज्ञापन में उस समिति के लक्ष्य, उद्देश्य, सदस्यता के नियम, सदस्यों को नियंत्रित करने वाले नियम स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं। उदाहणार्थ-यदि आपके मुहल्ले में कोई कल्याण समिति, स्पोट्र्स क्लब या महिला संघ है तो निश्चित रूप से इनके संचालन हेतु ज्ञापन होगा जिसमें सभी प्रकार के नियमों का समावेश होगा। ऐसी समिति के सदस्य औपचारिक रूप से समिति की सभाओं एवं सम्मेलनों में ही मिलते हैं तथा उनमें संबंध भी अधिकतर औपचारिक ही होते हैं। इसके विपरीत, यदि हम किसी बड़ी पारिवारिक सभा को देखें तो उसमें सम्मिलित सदस्य एक-दूसरे से । परिचित होते हैं तथा उनमें संबंध परिवार और मित्रों की भाँति होते हैं। सदस्य एक-दूसरे से खुलकर बातचीत करते हैं तथा वे एक-दूसरे के सुख-दुःख में भी भागदीर हो सकते हैं। यदि कल्याण समिति, स्पोट्र्स क्लब या महिला संघ के सदस्य औपचारिक अंतःक्रिया के बावजूद समय बीतने के साथ-साथ अपने संबंध घनिष्ठ एवं अनौपचारिक बना लेते हैं तो इनकी प्रकृति भी बड़ी पारिवारिक सभा की भाँति हो सकती है। इन दोनों उदाहरणों से हमें यह पता चलता है कि समाजशास्त्र में संकल्पनाएँ अडिग और स्थिर नहीं होती हैं। वे केवल समाज और उसके परिवर्तनों को समझने की चाबियाँ अथवा साधन हैं।
In simple words: एक समिति औपचारिक होती है, जिसके निश्चित लक्ष्य, नियम और सदस्यता होती है, जबकि एक पारिवारिक सभा अनौपचारिक होती है, जिसके सदस्यों के बीच घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध होते हैं।
🎯 Exam Tip: समिति और पारिवारिक सभा के बीच अंतर को स्पष्ट करते समय उनकी औपचारिक और अनौपचारिक प्रकृति, संबंधों के प्रकार, और संगठन के उद्देश्यों पर जोर दें।
Question 7. बाह्य समूह के सदस्य किस प्रकार अंतःसमूह के सदस्य बन जाते हैं?
Answer: अंतः समूह वह है जिसे हम अपना मानते हैं, जबकि बाह्य समूह वह होता है जिसे हम अपना न मानकर पराया मानते हैं। उदाहरणार्थ-एक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अंतः समूह का निर्माण करते हैं। तथा दूसरे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से अपने को भिन्न मानते हैं अथवा उन्हें बाह्य समूह के रूप में देखते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अंतः समूह एवं बाह्य समूह में अंतःक्रियाएँ इतनी अधिक बढ़ जाती हैं कि उनमें अपने-पराए की सीमाएँ टूटने लगती हैं तथा संबंधों में घनिष्ठता बढ़ने लगती है। इससे बाह्य समूह के कुछ सदस्य अंत:समूह के सदस्य बन जाते हैं।
In simple words: बाह्य समूह के सदस्य अंतःसमूह के सदस्य तब बन जाते हैं जब उनके बीच अंतःक्रियाएँ इतनी गहरी हो जाती हैं कि 'हम' और 'वे' की भावना कम हो जाती है, जिससे घनिष्ठता और अपनेपन का विकास होता है।
🎯 Exam Tip: अंतःसमूह और बाह्य समूह की अवधारणाओं को परिभाषित करें और फिर सामाजिक अंतःक्रिया और साझा पहचान के माध्यम से बाहरी समूह के सदस्यों के आंतरिक समूह में संक्रमण की प्रक्रिया को समझाएं।
Question 8. क्या आपके मित्र या आपके आयु समूह के लोग आपको प्रभावित करते हैं? चर्चा कीजिए।
Answer: प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से प्रभावित होता है तथा उनको प्रभावित भी करता है। मित्रों एवं आयु समूहों का प्रभाव एक-दूसरे पर अधिक होता है। जो व्यक्ति प्रभुत्वशाली व्यक्तित्व वाले होते हैं। अथवा नेतृत्व के गुण रखते हैं वे अन्य लोगों को अधिक प्रभावित करते हैं। एक कक्षा में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएँ एक-दूसरे को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं तथा उनमें होने वाली अंतःक्रियाओं से । ही उनके व्यक्तित्व का विकास होता है। यह संभव ही नहीं है कि कोई छात्र-छात्रा अपने मित्रों या सहपाठियों से प्रभावित ही न हो। छोटे बच्चों को भी माता-पिता से अपनी कक्षा के अन्य बच्चों के बारे में बातचीत करते हुए अक्सर देखा जा सकता है। कक्षा में प्रत्येक छात्र-छात्रा कुछ अन्य छात्र-छात्राओं से अधिक नजदीक हो जाता है तथा एक ऐसा अनौपचारिक समूह बना लेता है जिसके सदस्य एक-दूसरे से काफी कुछ सीखते हैं। कई बार तो आयु समूह का प्रभाव परिवार के सदस्यों के प्रभाव से भी अधिक होता है। इसलिए यह कहा जाता है कि कोई किशोर यदि गलत संगति में पड़ जाता है तो वह भी अंततः गलत कार्य करने लगता है और उसके परिजन चाहते हुए भी उसे सही रास्ते पर लाने में सफल नहीं हो पाते।
In simple words: हाँ, मित्र और आयु समूह के लोग हमें बहुत प्रभावित करते हैं क्योंकि हम उनसे सीखते हैं, उनके साथ अंतःक्रिया करते हैं, और उनके व्यवहार से प्रेरित होते हैं, जो हमारे व्यक्तित्व और निर्णयों को आकार देता है।
🎯 Exam Tip: मित्रों और आयु समूह के प्रभाव को समझाते समय, सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों पर प्रकाश डालें, साथ ही सामाजिकीकरण और व्यक्तित्व विकास में इनकी भूमिका को भी स्पष्ट करें।
Question 9. स्वर्गीय राष्ट्रपति के० आर० नारायणन के जीवन के विषय में प्रस्थिति, जाति और वर्ग की संकल्पना की विवेचना कीजिए।
Answer: पहले एक समय था जब अस्पृश्य जातियों को अपवित्रता की धारणा के कारण अलग-अलग रखा जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता था जिसके परिणामस्वरूप उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लगभग असंभव था। अस्पृश्य जातियों के लोग न केवल शिक्षा से वंचित थे, अपितु उच्च जातियों को अपनी परंपरागत सेवाएँ प्रदान करने के अतिरिक्त उन्हें किसी प्रकार के रोजगार के अवसर भी उपलब्ध नहीं थे। स्वर्गीय राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने यह सिद्ध कर दिया कि इस प्रकार एक दलित अपनी लगन एवं मेहनत से देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच सकता है। दलित होने के नाते उनका न केवल जातीय संस्करण में निम्न स्थान था अपितु प्रस्थिति की दृष्टि से भी वे काफी निम्न थे । वर्ग की दृष्टि से भी उनकी स्थिति लगभग ऐसी ही थी अर्थात् वे काफी गरीब परिवार से थे। 27 अक्टूबर, 1920 ई० को जन्मे नारायणन ने ट्रावनकोर से एम०ए० अंग्रेजी की उपाधि प्राप्त की तथा इसी विश्वविद्यालय में 1943 ई० में प्रवक्ता भी रहे। 1944 ई० से 1948 ई० तक उन्होंने पत्रकार की भूमिका भी निभाई। 1949 ई० में वे भारतीय विदेश सेवा में चुने गए तथा अनेक देशों में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे। 1978-80 ई० में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। 1984, 1989 तथा 1991 ई० में हुए आम चुनावों में वे लोकसभा के सदस्य चुने गए तथा अनेक मंत्रालयों के कार्यभार का सफल संचालन किया। 1992 ई० से 1997 ई० तक वे भारत के उपराष्ट्रपति होने के नाते राज्यसभा के अध्यक्ष भी रहे। 1997 ई० से 2002 ई०, तक उन्होंने भारत के राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। इस प्रकार, वे दलित होने के बावजूद अपनी लगन से उस पद को प्राप्त करने में सफल रहे जिसकी उन्हें भी आशा नहीं थी।
In simple words: के.आर. नारायणन का जीवन दर्शाता है कि कैसे दृढ़ संकल्प और मेहनत से एक व्यक्ति अपनी निम्न जाति और गरीब वर्ग की प्रस्थिति को पार करके भारत के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद तक पहुँच सकता है, जो सामाजिक बाधाओं को तोड़ने का एक उदाहरण है।
🎯 Exam Tip: के.आर. नारायणन के जीवन प्रसंग को प्रस्थिति, जाति और वर्ग की संकल्पनाओं से जोड़ते हुए, यह दर्शाएं कि कैसे व्यक्तिगत उपलब्धि सामाजिक संरचनात्मक बाधाओं को चुनौती दे सकती है, यह उत्तर की गहराई बढ़ाएगा।
Question 10. आपके समाज में किस प्रकार की नौकरियाँ प्रतिष्ठित मानी जाती हैं?
Answer: आधुनिक युग में नौकरियों में भी श्रेणीबद्धता पाई जाती है। कुछ नौकरियाँ ऐसी हैं जो अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। भारत में पहले कभी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील एवं प्राध्यापक की नौकरी के साथ उच्च प्रस्थिति जुड़ी हुई थी। नौकरियों से जुड़ी प्रतिष्ठा बदलती रहती है। अब सिविल जेवाओं में प्रतियोगात्मक परीक्षाओं में सफल व्यक्ति जिन प्रशासनिक नौकरियों को प्राप्त करते हैं, उन्हें अधिकांशतया अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। कमिश्नर, जिला अधिकारी, जिला जल, नौकरशाह, पुलिस एवं सैनिक अधिकारियों को समाज में इसीलिए अधिक प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है। इन नौकरियों का आधार व्यक्तिगत योग्यता होती है जिसमें प्रदत्त प्रस्थिति की कोई विशेष भूमिका नहीं होती है। इसी भाँति, आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च स्तर के अधिकारियों से संबंधित नौकरियों को भी अधिक प्रतिष्ठा वाला माना जाता है। इन नौकरियों के साथ न केवल अधिक वेतन जुड़ा होता है, अपितु सुविधाएँ भी अत्यधिक होती हैं। निम्न स्तर की नौकरियों को अधिक प्रतिष्ठा वाला नहीं माना जाता है।
In simple words: आधुनिक समाज में प्रशासनिक सेवाएँ (जैसे कमिश्नर, जिला अधिकारी) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पद, साथ ही डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पेशेवर पद, अत्यधिक प्रतिष्ठित माने जाते हैं क्योंकि इनमें व्यक्तिगत योग्यता, उच्च वेतन और सुविधाएँ शामिल होती हैं।
🎯 Exam Tip: प्रतिष्ठित नौकरियों की पहचान करते समय, प्रतिष्ठा के बदलते मानदंडों (जैसे योग्यता, आय, सामाजिक प्रभाव) पर प्रकाश डालें और अतीत एवं वर्तमान के उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करें।
Question 11. पता लगाइए कि घर का नौकर और निर्माण करने वाला मजदूर किस प्रकार भूमिका संघर्ष का सामना करते हैं?
Answer: भूमिका संघर्ष से अभिप्राय एक से अधिक प्रस्थितियों से जुडी भूमिकाओं की असंगती से है। ये तब होता है जब दो या अधिक भूमिकाओं से विरोधी अपेक्षाएँ पैदा होती हैं। घरेलू नौकर अथवा निर्माण कार्य में लगा हुआ मजदूर भी इस प्रकार की भूमिका संघर्ष का शिकार हो सकता है। मालिक तो चाहता है कि उसको घरेलू नौकर सारा दिन जो काम उसे सौंपा गया है उसी की ओर ध्यान दें। वह घरेलू नौकर किसी का पिता एवं पति भी है अर्थात् उसका अपना परिवार भी है। परिवार के सदस्यों की अपेक्षा होती है कि वह कुछ समय उनको भी दे। हो सकता है कि वह इन दोनों प्रस्थितियों से संबंधित भूमिकाओं में संगति न रख पाए। यह भी हो सकता है कि मालिक उसे जो वेतन दे रहा है उससे उसके परिवार का गुजारा ही नहीं हो पा रहा हो। वह सोचता है कि वह मालिक के प्रति वफादार रहे या अपने परिवार के प्रति । यह दुविधा उसे भूमिका संघर्ष की ओर ले जाती है। लगभग यही स्थिति निर्माण करने वाले मजदूर की है जिसमें ठेकेदार या मालिक उससे अधिक घंटे काम की अपेक्षा करता है तथा कम मजदूरी मिलने के कारण उसके पारिवारिक दायित्व पूरे नहीं हो पाते।।
In simple words: घरेलू नौकर और निर्माण मजदूर अक्सर भूमिका संघर्ष का सामना करते हैं क्योंकि उन्हें काम पर मालिक की अपेक्षाओं (लंबा काम, कम वेतन) और अपने परिवार की आवश्यकताओं (समय देना, परिवार का गुजारा) के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है।
🎯 Exam Tip: भूमिका संघर्ष की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए, इन व्यवसायों से जुड़े विभिन्न प्रस्थितियों और उनसे उत्पन्न होने वाली विरोधी अपेक्षाओं को विस्तार से समझाएं।
Question 12. समाज के प्रभावशाली हिस्से द्वारा सामाजिक रूप से निर्धारित भूमिकाओं का उल्लंघन या अतिक्रमण करने वाले लोगों को नियंत्रित व दंडित करने की कोशिश क्यों की जाती है?
Answer: समाचार-पत्रों में प्रतिदिन ऐसी रिपोर्ट छपती है जिनमें समाज के प्रभावशाली हिस्से द्वारा सामाजिक रूप से निर्धारित भूमिकाओं का उल्लंघन करने वालों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। पुलिस द्वारा लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले लड़कों के विरुद्ध की गई दण्डात्मक कार्यवाही से संबंधित समाचार-पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट इसी का उदाहरण है। उन्हें दंड इसलिए दिया जा रहा है। अथवा दंड देने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वे अपनी निर्धारित भूमिका का उल्लंघन या अतिक्रमण न करें। कई बार तो अनेक सामाजिक संगठन ही पुलिस की इस भूमिका को निभाना प्रारंभ कर देते हैं। यदि प्रभावशाली लोग सामाजिक रूप से निर्धारित भूमिकाओं का उल्लंघन या अतिक्रमण करने वाले लोगों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करेंगे तो समाज से अव्यवस्था फैलने का डर रहता है। निर्धारित भूमिकाओं का उल्लंघन या अतिक्रमण करने वाले लोगों को नियंत्रित व दंडित करने संबंधी रिपोर्ट समाचार-पत्रों में इसलिए प्रकाशित होती है ताकि इनके परिणामों से ऐसा करने वाले लोग सचेत हो जाएँ।
In simple words: समाज के प्रभावशाली वर्ग द्वारा सामाजिक भूमिकाओं का उल्लंघन करने वालों को नियंत्रित और दंडित किया जाता है ताकि समाज में व्यवस्था बनी रहे, नियमों का पालन सुनिश्चित हो और ऐसे व्यवहारों को दोहराने से रोका जा सके।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में सामाजिक नियंत्रण के महत्व को रेखांकित करें, यह समझाते हुए कि उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का उद्देश्य समाज में स्थिरता और मानदंडों का रखरखाव है।
Question 13. क्या आप अपने जीवन से ऐसे उदाहरणों के बारे में सोच सकते हैं कि 'अशासकीय सामाजिक नियंत्रण किस प्रकार से कार्य करता है?
Answer: अशासकीय सामाजिक-नियंत्रण के अनगिनत उदाहरण हम अपने जीवन में देख सकते हैं। उदाहरणार्थ-यदि आपने अपनी कक्षा के किसी छात्र-छात्रा को अन्य छात्र-छात्राओं से भिन्न व्यवहार करते हुए तथा अन्य छात्र-छात्राओं द्वारा उसका मजाक उड़ाते देखा है तो आप इस प्रकार के नियंत्रण को सरलता से समझ सकते हैं। हो सकता है कि मजाक ही उसे संबंधित छात्र-छात्रा को अन्य । छात्र-छात्राओं की अपेक्षाओं के अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर दे। मजाक में कई बार दंड से भी ज्यादा शक्ति होती है तथा व्यक्ति इससे बचने के लिए अपनी प्रस्थिति के अनुकूल भूमिका का निष्पादन करने का भरसक प्रयास करता है। इसी भाँति, बच्चों के किसी गलत व्यवहार पर नियंत्रण हेतु माता-पिता द्वारा की गई डाँट-डपट भी अशासकीय नियंत्रण का ही उदाहरण है। हो सकता है यह डाँट-डपट उसे गलत कार्य करने से रोकने में सहायक हो ।
In simple words: अशासकीय सामाजिक नियंत्रण अनौपचारिक तरीकों से काम करता है, जैसे सहपाठियों द्वारा किसी को मज़ाक उड़ाना या माता-पिता द्वारा डाँटना, जो व्यक्तियों को सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है, बिना किसी औपचारिक कानून या संस्था के हस्तक्षेप के।
🎯 Exam Tip: अशासकीय नियंत्रण के उदाहरणों को व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर समझाएं, और यह स्पष्ट करें कि कैसे सामाजिक दबाव या अनौपचारिक प्रतिक्रियाएं व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
Question 1. “जाति एक बंद वर्ग है।” यह किसका कथन है?
(क) हॉबल,
(ख) चार्ल्स कूले
(ग) मजूमदार
(घ) क्यूबर
Answer: (ग) मजूमदार
In simple words: यह कथन मजूमदार का है, जो यह दर्शाता है कि जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है और इसे बदला नहीं जा सकता, जिससे यह एक बंद सामाजिक समूह बन जाता है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रियों द्वारा दिए गए प्रमुख कथनों और परिभाषाओं को याद रखना वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 2. 'सोशल ऑर्गेनाइजेशन पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) जिसबर्ट ।
(ख) यंग
(ग) कुंडबर्नु
(घ) चार्ल्स हार्टन कूले
Answer: (घ) चार्ल्स हार्टन कुले
In simple words: 'सोशल ऑर्गेनाइजेशन' पुस्तक चार्ल्स हार्टन कूले द्वारा लिखी गई है, जिसमें उन्होंने सामाजिक समूहों और विशेष रूप से प्राथमिक समूहों की अवधारणा को समझाया है।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय पुस्तकों और उनके लेखकों के नामों को याद रखना सीधे तथ्यों पर आधारित प्रश्नों के लिए फायदेमंद है।
Question 3. “समूह अंतः क्रिया में संलग्न व्यक्तियों का एक संगठित संग्रह है।” यह कथन किसका है?
(क) बोगार्ड्स
(ख) हॉट एवं रेस
(ग) मैकाइवर एवं पेज
(ख) विलियम
Answer: (ख) हॉट एवं रेस
In simple words: यह कथन हॉट एवं रेस का है, जो समूह को ऐसे व्यक्तियों के संग्रह के रूप में परिभाषित करता है जो एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं और संगठित होते हैं।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्र में अवधारणाओं की परिभाषाओं को उनके संबंधित विद्वानों के साथ जोड़कर याद करें, क्योंकि यह विषय की गहरी समझ को दर्शाता है।
Question 4. अंतः समूह के सदस्य निम्न में से किस प्रकार के भावों से जुड़े होते हैं?
(क) द्वेष
(ख) घृणा
(ग) स्नेह
(घ) पक्षपात
Answer: (ग) स्नेह
In simple words: अंतःसमूह के सदस्य एक-दूसरे के प्रति अपनत्व, प्रेम और स्नेह की भावना से जुड़े होते हैं, क्योंकि वे स्वयं को उस समूह का हिस्सा मानते हैं।
🎯 Exam Tip: अंतःसमूह और बाह्य समूह के बीच भावनाओं के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें; अंतःसमूह में सकारात्मक भावनाएं (स्नेह, अपनत्व) जबकि बाह्य समूह में अक्सर तटस्थ या नकारात्मक भावनाएं होती हैं।
Question 5. सामाजिक नियन्त्रण का उद्देश्य है
(क) व्यापार का विकास करना
(ख) व्यक्ति की राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति
(ग) सामाजिक सुरक्षा की स्थापना
(घ) मनुष्य को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना
Answer: (ग) सामाजिक सुरक्षा की स्थापना
In simple words: सामाजिक नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य समाज में व्यवस्था बनाए रखना और सभी सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा स्थापित करना है ताकि उनका व्यवहार मान्य नियमों के अनुसार हो।
🎯 Exam Tip: सामाजिक नियंत्रण के प्राथमिक उद्देश्य को पहचानना महत्वपूर्ण है, जो कि समाज में व्यवस्था और सामंजस्य बनाए रखना है, न कि व्यक्तिगत या आर्थिक लाभ।
Question 6. दुर्णीम के अनुसार सामाजिक नियन्त्रण का सबसे प्रभावशाली साधन क्या है ?
(क) राज्य
(ख) समुदाय
(ग) सामूहिक प्रतिनिधान
(घ) व्यक्ति
Answer: (ग) सामूहिक प्रतिनिधान
In simple words: दुर्खीम के अनुसार, सामाजिक नियंत्रण का सबसे प्रभावशाली साधन सामूहिक प्रतिनिधान है, जो समाज के साझा आदर्शों और मूल्यों को दर्शाता है जिनके माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: दुर्खीम जैसे प्रमुख समाजशास्त्रियों द्वारा प्रस्तावित विशिष्ट अवधारणाओं (जैसे सामूहिक प्रतिनिधान) को उनके संबंधित सिद्धांतों के संदर्भ में याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 7. सर्वप्रथम किसने 'सामाजिक नियन्त्रण' शब्द का प्रयोग किया?
(क) रॉस
(ख) समनर
(ग) कॉम्टे
(घ) कुले
Answer: (क) रॉस
In simple words: 'सामाजिक नियंत्रण' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रॉस ने किया था, जो यह बताता है कि समाज कैसे अपने सदस्यों के व्यवहार को नियमों और मूल्यों के माध्यम से नियंत्रित करता है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रीय अवधारणाओं के प्रवर्तकों के नाम याद रखना सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
Question 8. निम्नलिखित में से सामाजिक नियन्त्रण का अभिकरण नहीं, बल्कि एक साधन कौन-सा
(क) परिवार
(ख) राज्य
(ग) पुरस्कार एवं दंड
(घ) शिक्षा संस्थाएँ
Answer: (ग) पुरस्कार एवं दंड
In simple words: परिवार, राज्य और शिक्षा संस्थाएँ सामाजिक नियंत्रण के अभिकरण (एजेंसियां) हैं, जबकि पुरस्कार और दंड व्यवहार को नियंत्रित करने के साधन हैं, जो इन अभिकरणों द्वारा उपयोग किए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक नियंत्रण के अभिकरणों (संस्थाएं जो नियंत्रण लागू करती हैं) और साधनों (नियंत्रण के तरीके) के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें।
Question 9. रॉस ने सामाजिक नियन्त्रण में किसकी भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना है ?
(क) संदेह की,
(ख) विश्वास की
(ग) भ्रम की
(घ) शंका की
Answer: (ख) विश्वास की
In simple words: रॉस ने सामाजिक नियंत्रण में विश्वास की भूमिका को महत्वपूर्ण माना है, क्योंकि विश्वास ही व्यक्तियों को सामाजिक मानदंडों के अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।
🎯 Exam Tip: रॉस के 'विश्वास के सिद्धांत' को ध्यान में रखें जो यह बताता है कि समाज में व्यक्तियों के बीच विश्वास सामाजिक नियंत्रण का एक प्रमुख आधार है।
Question 10. निम्नलिखित में से कौन-सा सामाजिक निर्यन्त्रण का साधन नहीं है ?
(क) शिक्षा एवं निर्देशन
(ख) शक्ति एवं पारितोषिक
(ग) सामाजिक अंतःक्रिया
(घ) अनुनय
Answer: (ग) सामाजिक अंतःक्रिया
In simple words: सामाजिक अंतःक्रिया स्वयं एक सामाजिक प्रक्रिया है, न कि सामाजिक नियंत्रण का सीधा साधन; जबकि शिक्षा, शक्ति, पुरस्कार और अनुनय नियंत्रण के तरीके हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक अंतःक्रिया सामाजिक संबंधों का एक मूलभूत पहलू है, जबकि नियंत्रण के साधन वे उपकरण हैं जिनका उपयोग व्यवहार को निर्देशित करने के लिए किया जाता है।
Question 11. सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन कौन-सा है ?
(क) धर्म
(ख) परिवार
(ग) शिक्षा
(घ) प्रथाएँ
Answer: (ग) शिक्षा
In simple words: शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का एक औपचारिक साधन है क्योंकि यह संस्थागत, संरचित और विशिष्ट नियमों के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार को ढालती है।
🎯 Exam Tip: औपचारिक नियंत्रण के साधनों में संरचित और संहिताबद्ध संस्थाएं शामिल होती हैं, जबकि अनौपचारिक साधन व्यक्तिगत और गैर-संहिताबद्ध होते हैं।
Question 12. सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन निम्न में से क्या है ?
(क) जनरीतियाँ
(ख) कानून
(ग) प्रथाएँ
(घ) रूढ़ियाँ
Answer: (ख) कानून
In simple words: कानून सामाजिक नियंत्रण का औपचारिक साधन है क्योंकि यह राज्य द्वारा निर्धारित, संहिताबद्ध और बलपूर्वक लागू किया जाता है।
🎯 Exam Tip: औपचारिक नियंत्रण के साधनों में वे सभी नियम और प्रक्रियाएं शामिल होती हैं जो सरकार या अन्य संस्थागत निकायों द्वारा लागू की जाती हैं।
Question 13. निम्नलिखित में सामाजिक नियन्त्रण का अनौपचारिक साधन है
(क) कानून
(ख) शिक्षा-व्यवस्था
(ग) परिवार
(घ) राज्य
Answer: (ग) परिवार
In simple words: परिवार सामाजिक नियंत्रण का एक अनौपचारिक साधन है, जहाँ व्यक्तिगत संबंध और अलिखित नियमों (जैसे माता-पिता का पालन-पोषण) के माध्यम से व्यवहार नियंत्रित होता है।
🎯 Exam Tip: अनौपचारिक नियंत्रण के साधनों में वे संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ शामिल हैं जो व्यक्तिगत, अलिखित और सहज तरीके से व्यवहार को नियंत्रित करती हैं।
Question 14. सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक साधन कौन-सा है ?
(क) प्रथा
(ख) कानून
(ग) राज्य
(घ) शिक्षा
Answer: (क) प्रथा
In simple words: प्रथा सामाजिक नियंत्रण का एक अनौपचारिक साधन है क्योंकि यह समाज में धीरे-धीरे विकसित होती है और बिना किसी लिखित कानून के लोगों के व्यवहार को निर्देशित करती है।
🎯 Exam Tip: अनौपचारिक नियंत्रण के साधनों को पहचानते समय, उन तरीकों पर ध्यान दें जो संस्थागत या कानूनी नहीं होते, बल्कि सामाजिक रीति-रिवाजों और व्यक्तिगत अंतःक्रियाओं से उत्पन्न होते हैं।
Question 15. समूह के लिए आवश्यक है
(क) दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना।
(ख) दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सामाजिक चेतना का होना
(ग) अधिक व्यक्तियों का एकत्र होना
(घ) व्यक्तियों के बीच संचारविहीनता का होना।
Answer: (क) दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना।
In simple words: किसी भी समूह के निर्माण के लिए कम से कम दो या दो से अधिक व्यक्तियों की उपस्थिति अनिवार्य है ताकि उनके बीच अंतःक्रिया और संबंध स्थापित हो सकें।
🎯 Exam Tip: समूह की मूलभूत आवश्यकताओं को पहचानते समय, संख्यात्मक उपस्थिति को प्राथमिक शर्त के रूप में देखें, जबकि सामाजिक चेतना और अंतःक्रिया उसके गठन के बाद विकसित होती है।
Question 16. अंतःसमूह तथा बाह्य समूह की अवधारणाएँ किस समाजशास्त्री से संबंधित हैं? या बाह्य समूह की अवधारणा को किसने दिया ?
(क) चार्ल्स कूले ने
(ख) समनर ने
(ग) रॉबर्ट मर्टन ने
(घ) कुंडबर्ग ने
Answer: (ख) समनर ने
In simple words: अंतःसमूह और बाह्य समूह की अवधारणाएँ समनर से संबंधित हैं, जिन्होंने इन समूहों को 'हम' की भावना बनाम 'वे' की भावना के आधार पर वर्गीकृत किया।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय अवधारणाओं (जैसे अंतःसमूह और बाह्य समूह) को उनके प्रवर्तक समाजशास्त्रियों के साथ याद रखना तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
Question 17. प्राथमिक समूह में सदस्यों के संबंध होते हैं
(क) भौतिक
(ख) नैतिक
(ग) वैयक्तिक
(घ) आर्थिक
Answer: (ग) वैयक्तिक
In simple words: प्राथमिक समूह में सदस्यों के संबंध वैयक्तिक और घनिष्ठ होते हैं, जहाँ व्यक्ति एक-दूसरे को व्यक्तिगत स्तर पर जानते और समझते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूह के संबंधों की प्रकृति (घनिष्ठ, वैयक्तिक, आमने-सामने) को द्वितीयक समूह के संबंधों से अलग पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 18. निम्नलिखित में से कौन-सी प्राथमिक समूह की विशेषता नहीं है?
(क) अनिवार्य सदस्यता
(ख) बड़ा आकार
(ग) शारीरिक समीपता
(घ) आर्थिक स्थिरता
Answer: (ख) बड़ा आकार
In simple words: प्राथमिक समूह की विशेषता उसका छोटा आकार होता है, बड़ा आकार इसकी विशेषता नहीं है, बल्कि यह द्वितीयक समूह की पहचान है।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूहों की प्रमुख विशेषताओं (जैसे छोटा आकार, घनिष्ठ संबंध, शारीरिक समीपता) को याद रखें और उन्हें द्वितीयक समूहों की विशेषताओं से अलग करें।
Question 19. 'प्राथमिक समूह की अवधारणा किसने दी है ?
(क) एल०एफ० वार्ड
(ख) सी०एच०कूले
(ग) मैकाइवर वे पेज
(घ) आगस्त कॉम्टे
Answer: (ख) सी०एच०कूले
In simple words: 'प्राथमिक समूह' की अवधारणा चार्ल्स हार्टन कूले ने दी थी, जिन्होंने इस प्रकार के समूहों को मानव प्रकृति और सामाजिक आदर्शों के निर्माण में मूलभूत माना।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रीय अवधारणाओं (जैसे प्राथमिक समूह) को उनके संबंधित विद्वानों के साथ जोड़कर याद रखना तथ्यात्मक सटीकता के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 20. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राथमिक समूह है ?
(क) व्यापार संघ
(ख) विद्यालय
(ग) पड़ोस
(घ) भीड़
Answer: (ग) पड़ोस
In simple words: पड़ोस एक प्राथमिक समूह का उदाहरण है क्योंकि इसमें सदस्यों के बीच आमने-सामने के घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध होते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूह के उदाहरणों को याद रखें जो घनिष्ठ, व्यक्तिगत और आमने-सामने के संबंधों को दर्शाते हैं, जैसे परिवार और खेल समूह।
Question 21. प्राथमिक समूह की सही विशेषता बताइए-
(क) बड़ा आकार
(ख) औपचारिक नियंत्रण
(ग) सदस्यों की भिन्नता
(घ) समान उद्देश्य
Answer: (घ) समान उद्देश्य
In simple words: प्राथमिक समूह की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उसके सदस्यों के बीच अक्सर समान उद्देश्य होते हैं, जिससे उनमें अपनत्व और सहयोग की भावना बढ़ती है।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूह की विशेषताओं को पहचानते समय, समान उद्देश्य, घनिष्ठता और अनौपचारिक संबंधों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 22. निम्नलिखित में कौन-सा प्राथमिक समूह है ?
(क) राजनीतिक दल
(ख) श्रमिक संघ
(ग) राष्ट्र
(घ) परिवार
Answer: (घ) परिवार
In simple words: परिवार एक प्राथमिक समूह है क्योंकि इसमें सदस्यों के बीच घनिष्ठ, व्यक्तिगत और आमने-सामने के संबंध होते हैं जो भावनाओं और सहयोग पर आधारित होते हैं।
🎯 Exam Tip: परिवार प्राथमिक समूह का सबसे क्लासिक और अक्सर उद्धृत उदाहरण है, जो घनिष्ठ संबंधों और भावनात्मक जुड़ाव की विशेषता को दर्शाता है।
Question 23. निम्नलिखित में कौन-सी विशेषता प्राथमिक समूह की है ?
(क) शारीरिक समीपता
(ख) सदस्यों की अधिक संख्या
(ग) बाह्य नियंत्रण की भावना
(घ) अल्प अवधि
Answer: (क) शारीरिक समीपता
In simple words: शारीरिक समीपता प्राथमिक समूह की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, क्योंकि यह सदस्यों के बीच आमने-सामने की अंतःक्रिया और घनिष्ठ संबंधों को बढ़ावा देती है।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूह की विशेषताओं में शारीरिक समीपता एक महत्वपूर्ण कारक है जो सदस्यों के बीच घनिष्ठ और प्रत्यक्ष संपर्क को संभव बनाता है।
Question 24. संदर्भ समूह की अवधारणा किसने दी?
(क) पीटर बर्जर
(ख) आर० के० मर्टन
(ग) बोटोमोर
(घ) टायनबी
Answer: (ख) आर० के० मर्टन
In simple words: संदर्भ समूह की अवधारणा रॉबर्ट के. मर्टन ने दी थी, जो उन समूहों को संदर्भित करती है जिनसे व्यक्ति स्वयं की तुलना करता है और जिनके मानदंडों को अपनाने की इच्छा रखता है।
🎯 Exam Tip: संदर्भ समूह की अवधारणा और रॉबर्ट के. मर्टन का नाम समाजशास्त्रीय विचारों में महत्वपूर्ण जुड़ाव हैं, जिसे याद रखना चाहिए।
Question 25. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वितीयक समूह है ?
(क) पड़ोस
(ख) नगर
(ग) क्लब
(घ) पति-पत्नी का समूह
Answer: (ख) नगर
In simple words: नगर एक द्वितीयक समूह का उदाहरण है, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में लोग होते हैं जिनके बीच संबंध अक्सर अवैयक्तिक और औपचारिक होते हैं, और वे विशिष्ट उद्देश्यों के लिए एक साथ आते हैं।
🎯 Exam Tip: द्वितीयक समूह के उदाहरणों को पहचानते समय, उनके बड़े आकार, औपचारिक संबंधों और विशिष्ट उद्देश्यों पर ध्यान दें, जो उन्हें प्राथमिक समूहों से अलग करते हैं।
Question 26. निम्नलिखित में से कौन द्वितीयक समूह की विशेषता नहीं है ?
(क) अल्प अवधि
(ख) छोटा आकार
(ग) सदस्यों का सीमित ज्ञान
(घ) “मैं” की भावना
Answer: (ख) छोटा आकार
In simple words: द्वितीयक समूह की विशेषता छोटा आकार नहीं है, बल्कि बड़ा आकार है, जिसमें सदस्यों के बीच अवैयक्तिक और कार्यात्मक संबंध होते हैं।
🎯 Exam Tip: द्वितीयक समूह की प्रमुख विशेषताओं (बड़े आकार, औपचारिक संबंध, विशिष्ट उद्देश्य) को याद रखें और उन्हें प्राथमिक समूह की विशेषताओं से अलग करें।
निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर
निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. प्राथमिक समूह की संकल्पना के प्रतिपादक कौन हैं?
या
प्राथमिक समूह की संकल्पना के शिल्पी कौन हैं?
या
प्राथमिक समूह की संकल्पना किसने दी है?
Answer: प्राथमिक समूह की संकल्पना के प्रतिपादक अथवा शिल्पी चार्ल्स कूले हैं।
In simple words: प्राथमिक समूह की अवधारणा चार्ल्स कूले ने दी है।
🎯 Exam Tip: नाम याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाजशास्त्र में बुनियादी अवधारणाओं में से एक है।
Question 2. सामाजिक समूह की कोई परिभाषा लिखिए ।
Answer: मैकाइवर एव पेज के शब्दों में, “सामाजिक समूह से हमारा तात्पर्य व्यक्तियों के उन संकलन से है, जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं।”
In simple words: सामाजिक समूह ऐसे व्यक्तियों का संग्रह है जिनके बीच सामाजिक संबंध होते हैं।
🎯 Exam Tip: परिभाषाओं को उद्धृत करते समय विद्वानों के नाम सही लिखना सुनिश्चित करें।
Question 3. अंतःसमूह की संकल्पना किस विद्वान ने दी है?
Answer: अंतः समूह की संकल्पना समनर ने दी है।
In simple words: समनर ने अंतःसमूह की अवधारणा प्रस्तुत की।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्र में अवधारणाओं के प्रतिपादकों के नाम अक्सर पूछे जाते हैं।
Question 4. अंतःसमूह एवं बाह्य समूह की संकल्पनाओं के साथ किस समाजशास्त्री का नाम जुड़ा हुआ है?
Answer: अंत:समूह एवं बाह्य समूह की संकल्पनाओं के साथ समनर का नाम जुड़ा हुआ है।
In simple words: अंतःसमूह और बाह्य समूह की अवधारणा समनर ने दी है।
🎯 Exam Tip: इन अवधारणाओं के अंतर को समझना भी महत्वपूर्ण है।
Question 5. संदर्भ समूह की संकल्पना किस समाजशास्त्री ने दी है?
Answer: संदर्भ समूह की संकल्पना मर्टन ने दी है।
In simple words: संदर्भ समूह की अवधारणा रॉबर्ट के- मर्टन ने विकसित की।
🎯 Exam Tip: संदर्भ समूह का महत्व इसके सामाजिक तुलना के सिद्धांत में है।
Question 6. प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताओं वाले समूह को क्या कहा जाता है?
Answer: प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताओं वाले समूह को द्वितीयक समूह कहा जाता है।
In simple words: प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताओं वाले समूह को द्वितीयक समूह कहते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक और द्वितीयक समूहों के बीच के मुख्य अंतरों को समझें।
Question 7. मुख्य प्रस्थिति किसी संकल्पना है?
Answer: 'मुख्य प्रस्थिति की संकल्पना हिलर की है।
In simple words: हिलर ने 'मुख्य प्रस्थिति' की अवधारणा दी है।
🎯 Exam Tip: इस तरह की विशिष्ट अवधारणाओं और उनके प्रतिपादकों को याद रखें।
Question 8. प्राध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, खिलाड़ी, अभिनेता आदि किस प्रकार की प्रस्थिति के उदाहरण हैं?
Answer: प्राध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, खिलाड़ी, अभिनेता आदि अर्जित प्रस्थिति के उदाहरण हैं।
In simple words: ये सभी पद व्यक्ति की मेहनत और योग्यता से प्राप्त होते हैं, इसलिए इन्हें अर्जित प्रस्थिति कहते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति के अंतर को उदाहरणों के साथ समझना महत्वपूर्ण है।
Question 9. “प्रस्थिति तथा भूमिका एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” यह कथन किसका है?
Answer: यह कथन इलियट तथा मैरिल का है।
In simple words: इलियट और मैरिल ने प्रस्थिति और भूमिका को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया।
🎯 Exam Tip: यह कथन प्रस्थिति और भूमिका के अंतर्संबंध को स्पष्ट करता है।
Question 10. डेविस तथा मूर तथा प्रतिपादित सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धांत को क्या कहा जाता है?
Answer: डेविस तथा मूर द्वारा प्रतिपादित सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धांत को प्रकार्यवादी सिद्धांत कहा जाता है।
In simple words: डेविस और मूर का स्तरीकरण सिद्धांत प्रकार्यवादी दृष्टिकोण पर आधारित है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और उनके संबंधित विचारकों को जानना महत्वपूर्ण है।
Question 11. “इतिहास में कभी ऐसा समय नहीं रहा है जिसमें वर्ग घृणा उपस्थिति नहीं रही हो ।” यह कथन किस विद्वान का है?
Answer: यह कथन समनर का है।
In simple words: समनर का मानना था कि वर्ग घृणा हमेशा से समाज में मौजूद रही है।
🎯 Exam Tip: समनर के विचारों को उनके अन्य सिद्धांतों जैसे अंतःसमूह और बाह्य समूह के साथ जोड़कर याद रखें।
Question 12. किसी समाज का उच्चचता और निम्नता के क्रम में विभाजन क्या कहलाता है?
Answer: किसी समाज का उच्चता और निम्नता के क्रम में विभाजन सामाजिक स्तरीकरण कहलाता है।
In simple words: समाज में लोगों का ऊँचे और निचले स्तरों में बँटना सामाजिक स्तरीकरण है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा को उसकी विशेषताओं और प्रकारों के साथ समझें।
Question 13. सोशल कंट्रोल पुस्तक के लेखक कौन है?
Answer: 'सोशल कंट्रोल' पुस्तक के लेखक ई-डब्ल्यू- रॉस है।
In simple words: ई-डब्ल्यू- रॉस ने 'सोशल कंट्रोल' नामक पुस्तक लिखी है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्र की महत्वपूर्ण पुस्तकों और उनके लेखकों के नाम याद रखना परीक्षा के लिए उपयोगी है।
Question 14. किस समाजशास्त्री के सामाजिक नियंत्रण के सिद्धांत को विश्वास का सिद्धांत' कहा जाता है?
Answer: ई-डब्ल्यू- रॉस के सामाजिक नियंत्रण के सिद्धांत को 'विश्वास का सिद्धांत' कहा जाता है।
In simple words: रॉस के सामाजिक नियंत्रण सिद्धांत को 'विश्वास का सिद्धांत' भी कहते हैं।
🎯 Exam Tip: रॉस के सिद्धांत का मुख्य बिंदु विश्वास की भूमिका को समझना है।
Question 15. आदिम एवं ग्रामीण समाजों में सामाजिक नियंत्रण का सर्वाधिक उपयुक्त साधन कौन-सा है?
Answer: आदिम एवं ग्रामीण समाजों में सामाजिक नियंत्रण का सर्वाधिक उपयुक्त साधन प्रथाएँ हैं।
In simple words: पुराने और ग्रामीण समाजों में नियंत्रण के लिए रीति-रिवाज और प्रथाएँ सबसे प्रभावी थीं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक और अनौपचारिक साधनों को उनके संदर्भ में समझें।
Question 16. नगरीय समाज में सामाजिक नियंत्रण का सर्वाधिक उपयुक्त समधन कौन-सा है?
Answer: नगरीय समाज में सामाजिक नियंत्रण का सर्वाधिक उपयुक्त साधन कानून है।
In simple words: शहरों में सामाजिक नियंत्रण के लिए कानून सबसे प्रभावी तरीका है।
🎯 Exam Tip: आधुनिक समाजों में कानून और राज्य की भूमिका सामाजिक नियंत्रण में महत्वपूर्ण होती है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. समवयस्क समूह किसे कहते हैं?
Answer: समवयस्क समूह एक प्रकार का प्राथमिक समूह है। ऐसे समूह का आधार सामान्यतः समान आयु अथवा सामान्य व्यवसाय होता है। समाने आयु के व्यक्तियों के बीच निर्मित अथवा सामान्य व्यवसाय समूह के लोगों के बीच निर्मित समूह को समवयस्क समूह कहते हैं। ऐसे समूह अपने सदस्यों पर विशेष व्यवहार हेतु दबाव डालते हैं जिसे 'समवयस्क दबाव' कहते हैं। समवयस्क दबाव से तात्पर्य समवयस्क साथी द्वारा डाले गए उस सामाजिक दबाव से है जो व्यक्ति को यह बताता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
In simple words: समवयस्क समूह वे लोग होते हैं जिनकी उम्र या काम समान होता है, और वे एक-दूसरे पर कुछ खास तरह से व्यवहार करने का दबाव डालते हैं।
🎯 Exam Tip: समवयस्क समूह की अवधारणा को प्राथमिक समूह के एक विशेष प्रकार के रूप में समझें।
Question 2. प्राथमिक समूहों के दो प्रमुख कार्य बताइए ।
Answer: प्राथमिक सूमहों के दो प्रमुख कार्य निम्नवत् हैं-
1. व्यक्तित्व के विकास में सहायक प्राथमिक समूह में व्यक्ति का विकास होता है। मानव की अधिकांश सीख प्राथमिक समूहों की ही देन है। यह सदस्यों के लिए व्यक्तित्व के विकास का प्रमुख अभिकरण है। उदाहरणार्थ-परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा समूह तीनों प्राथमिक समूह के रूप में व्यक्तित्व विकास में सहायक हैं।
2. समाजीकरण में सहायक प्राथमिक समूह व्यक्ति को समाज में रहने के योग्य बनाते हैं। इन समूहों में रहकर व्यक्ति समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन करता है और उन सबका ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। एच-ई- बार्ल्स का कथन है कि प्राथमिक समूह स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के समाजीकरण में सहायता प्रदान करते हैं तथा स्थापित संस्थाओं के एकीकरण व सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण होते हैं।
In simple words: प्राथमिक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास और समाज के नियमों को सीखने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूहों के कार्यों को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करना उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
Question 3. अर्जित प्रस्थिति के दो प्रमुख आधार बताइए ।
Answer: अर्जित प्रस्थिति के दो प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं-
1. शिक्षा शिक्षा अर्जित प्रस्थिति का प्रमुख आधार है। औपचारिक शिक्षा कुछ अर्जित पदों की प्राप्ति में अनिवार्य शर्त होती है।। विभिन्न नौकरियों के लिए प्रायः शिक्षा की न्यूनतम योग्यताएँ निर्धारित होती है। अशिक्षित की अपेक्षा शिक्षित व्यक्ति की प्रस्थिति समाज में अधिक आदर व प्रतिष्ठा का पात्र होती है।
2. धन-संपदा-आज के भौतिकवादी युग में धन-संपदा भी प्रस्थिति अर्जन का एक आधार है। धन के आधार पर ही उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग व निम्न वर्ग श्रेणीबद्ध होते हैं। धन वास्तव में शक्ति का स्वरूप है, अतः इसका बहुत मान है। ज्यों-ज्यों धन बढ़ता जाता है त्यों-त्यों व्यक्तिका मान भी बढ़ता जाता है।
In simple words: व्यक्ति की शिक्षा और धन-संपदा दो मुख्य चीजें हैं जिनसे वह समाज में अपनी स्थिति या 'प्रस्थिति' प्राप्त करता है।
🎯 Exam Tip: अर्जित प्रस्थिति के इन आधारों को वर्तमान सामाजिक संदर्भों से जोड़कर समझें।
Question 4. सामाजिक भूमिका के प्रमुख तत्त्व बताइए ।
Answer: सामाजिक भूमिका के प्रमुख तत्त्वे निम्नलिखित हैं-
1. प्रत्याशाएँ-प्रत्येक प्रस्थिति का धारक इस बात को जानता है कि अन्य संबंधित स्थितियों के धारक उससे किस आचरण की आशा कर रहे हैं। विद्यार्थी यह जानता है कि उसके शिक्षक उससे किस आचरण की आशा करते हैं। साथ ही, उसे इसका भी ज्ञान है कि शिक्षक जानता है। कि उसके विद्यार्थी उससे किस प्रकार के आचरण की आशा करते हैं। ये पारस्परिक प्रत्याशाएँ हैं जो सामाजिक भूमिका की मानसिक पृष्ठभूमि तैयार करती हैं।
2. बाह्य व्यवहार केवल मानसिक प्रस्थिति ही भूमिका के लिए पर्याप्त नहीं होती, अपितु ज्ञानात्मक जागरूकता तथा अपने दायित्वों व कर्तव्यों को व्यवहार में अनुमोदित करना पड़ता हैं। इसलिए सामाजिक भूमिका का दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व आचरण की प्रत्याशी को बाह्य व्यवहार में रखा जाना है।
In simple words: सामाजिक भूमिका के मुख्य तत्व हैं दूसरों की अपेक्षाएँ और उन अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार करना।
🎯 Exam Tip: भूमिका के इन तत्वों को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करने से बेहतर समझ आती है।
Question 5. सामाजिक वर्ग की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
Answer: सामाजिक वर्ग की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. विभिन्न आधार-वर्ग के आधार धन, शिक्षा, आयु अथवा लिंग हो सकते हैं। इस आधार पर समाज में पूँजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग, शिक्षित वर्ग आदि पाए जाते हैं। परंतु कार्ल मार्क्स ने वर्ग का आधार केवल आर्थिक अर्थात् उत्पादन के साधन माना है तथा दो वर्गों-पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्गको समाज में महत्त्वपूर्ण बताया है।
2. ऊँच-नीच की भावना-सामाजिक वर्गों के बीच ऊँच-नीच की भावना अथवा संस्तरण पाया जाता है। पूँजीपति वर्ग के व्यक्ति अपने को श्रमिक वर्ग के व्यक्तियों की तुलना में समाज में उच्च स्थिति का समझते हैं।
In simple words: सामाजिक वर्ग अलग-अलग आधारों जैसे धन या शिक्षा पर बनते हैं और उनमें ऊँच-नीच की भावना होती है।
🎯 Exam Tip: कार्ल मार्क्स के वर्ग सिद्धांत को सामाजिक वर्ग की विशेषताओं के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।
Question 6. स्पेंसर के सामाजिक नियंत्रण के सिद्धांत को संक्षेप में बताइए ।
Answer: हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार व्यक्ति को समाज में रहकर समाज के नियमों का पालन करना चाहिए क्योंकि यदि वह सामाजिक नियमों का पालन नहीं करेगा तो समाज में अशांति और अव्यवस्था फैल जाएगी, समाज अस्थिर- प्रकृति का हो जाएगा तथा पारस्परिक संघर्षों को बढ़ावा मिलेगा। हरबर्ट स्पेंसर ने सामाजिक नियंत्रण के चार प्रमुख साधन बताए हैं-1. सरकार अथवा कानून, 2. धर्म, 3. प्रथाएँ तथा 4. नैतिकता ।
In simple words: स्पेंसर के अनुसार, समाज में शांति बनाए रखने के लिए लोगों को नियमों का पालन करना चाहिए, और इसके लिए सरकार, धर्म, प्रथाएं और नैतिकता जैसे साधन उपयोग किए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: स्पेंसर के सामाजिक नियंत्रण के साधनों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 7. भूमिका किसे कहते हैं?
Answer: प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रस्थिति का ध्यान रखकर समाज में कुछ-न-कुछ कार्य अवश्य करता है। इसी को भूमिका कहते हैं। भूमिका के आधार पर व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इस प्रकार, भूमिका प्रस्थिति का गत्यात्मक
In simple words: भूमिका वह कार्य है जो एक व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति (प्रस्थिति) के अनुसार करता है।
🎯 Exam Tip: भूमिका और प्रस्थिति के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से समझें।
Question 8. प्रस्थिति किसे कहते हैं?
या
प्रस्थिति का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
Answer: समाज में व्यक्ति का उसके समूह में जो स्थान होता है उसे व्यक्ति की प्रस्थिति कहते हैं। किसी कार्यालय में अधिकारी का ऊँचा स्थान होता है तो उस कार्यालय में उस अधिकारी की प्रस्थिति ऊँची मानी जाती है क्योंकि वह कार्यालय में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। इसलिए प्रस्थिति का अर्थ उस महत्त्वपूर्ण स्थान से है जो व्यक्ति अपने समूह या कार्यालय में या अन्य सार्वजनिक उत्सवों में अपनी योग्यता व कार्यों के द्वारा अथवा जन्म से प्राप्त कुछ लक्षणों द्वारा प्राप्त करता है। लिंटन के अनुसार, विशेष व्यवस्था में स्थान, जिसे व्यक्ति किसी दिए हुए समय में प्राप्त करता है, उस व्यवस्था के अनुसार उसकी प्रस्थिति की ओर संकेत करता है।”
In simple words: प्रस्थिति समाज में किसी व्यक्ति का वह स्थान या पद है जो उसे जन्म या योग्यता से मिलता है।
🎯 Exam Tip: प्रस्थिति और उसके निर्धारण के कारकों को उदाहरणों के साथ समझें।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. अंतःसमूह एवं बाह्य समूह में अंतर स्पष्ट कीजिए ।
Answer: अंतःसमूह एवं बाह्य समूह में पाए जाने वाले प्रमुख अंतर निम्न प्रकार हैं-
1. अंत:समूह को व्यक्ति अपना समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों में अपनत्व की भावना पाई जाती है, जबकि बाह्य समूह को व्यक्ति पराया समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों के प्रति अपनत्व की भावना का अभावं पाया जाता है।
2. अंत:समूह के सदस्यों में पाए जाने वाले संबंध घनिष्ठ होते हैं, जबकि बाह्य समूह के सदस्यों के प्रति घनिष्ठता नहीं पायी जाती है।
3. अंत:समूह के सदस्य अपने समूह के दुःखों एवं सुखों को अपना दुःख एवं सुख मानते हैं, जबकि बाह्य समूह के प्रति इस प्रकार की भावना का अभाव होता है।
4. अंत:समूह के सदस्य प्रेम, स्नेह, त्याग व सहानुभूति के भावों से जुड़े होते हैं, जबकि बाह्य समूह के प्रति द्वेष, घृणी, प्रतिस्पर्धा एवं पक्षपात के भाव पाए जाते हैं।
In simple words: अंतःसमूह में लोग एक-दूसरे को अपना मानते हैं और घनिष्ठ संबंध रखते हैं, जबकि बाह्य समूह में लोग दूसरों को पराया समझते हैं और दूरियाँ रखते हैं।
🎯 Exam Tip: इन दोनों समूहों के बीच के अंतरों को स्पष्ट रूप से समझना समाजशास्त्रीय विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 2. संदर्भ समूह का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
Answer: संदर्भ समूह से अभिप्राय उस समूह से है जिसको व्यक्ति अपना आदर्श स्वीकार करते हैं। जिसके सदस्यों के अनुरूप बनना चाहते हैं तथा जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम संदर्भ समूहों के सदस्य नहीं होते हैं। हम संदर्भ समूहों से अपने आप को अभिनिर्धारित अवश्य करते हैं। आधुनिक समाजों में संदर्भ समूह संस्कृति, जीवन-शैली, महत्त्वाकांक्षाओं तथा लक्ष्य प्राप्ति के बारे में जानकारी के महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। अंग्रेजी शासनकाल में अनेक मध्यमवर्गीय भारतीय अंग्रेजों को संदर्भ समूह मानते हुए अंग्रेजों की भाँति व्यवहार करने की आकांक्षा करते थे। वे अंग्रेजों की भाँति पोशाक धारण करना चाहते थे तथा उन्हीं की भाँति भोजन करना चाहते थे। समुदाय समूह के साथ सुप्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट के मर्टन का नाम जुड़ा हुआ है।
In simple words: संदर्भ समूह वह समूह है जिसे व्यक्ति अपना आदर्श मानकर उसकी जीवनशैली या व्यवहारों को अपनाना चाहता है, भले ही वह उस समूह का सदस्य न हो।
🎯 Exam Tip: संदर्भ समूह की अवधारणा को सामाजिक गतिशीलता और पहचान निर्माण के संदर्भ में समझें।
Question 3. समुदाय किसे कहते हैं?
Answer: 'समुदाय' शब्द को अंग्रेजी में 'Community' कहते हैं। इस शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिलकर हुआ है-com' और 'munis 'com' का अर्थ है। 'एक साथ' (Together) तथा 'munis का अर्थ है 'सेवा करना'। इस प्रकारे, 'कम्यूनिटी' शब्द का शाब्दिक अर्थ हुआ 'एक साथ सेवा करना'। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि व्यक्तियों का ऐसा समूह, जिसमें एक निश्चित क्षेत्र में परस्पर मिलकर रहने की भावना होती है तथा जो परस्पर सहयोग द्वारा अपने अधिकारों का उपभोग करता है, समुदाय कहलाता है। प्रत्येक समुदाय का एक नाम होता है तथा समूह के सभी सदस्यों में मनोवैज्ञानिक लगाव तथा हम की भावना पाई जाती है बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार, “समुदाय एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें 'हम की भावना का कुछ-न-कुछ अंश पाया जाता है और एक निश्चित क्षेत्र में निवास करता है। इस भाँति, डेविस (Davis) के अनुसार, “समुदाय एक सबसे छोटा क्षेत्रीय समूह है, जिसके अंतर्गत सामाजिक जीवन के समस्त पहलुओं का समावेश हो सकता है।” गाँव समुदाय का प्रमुख उदाहरण है।
In simple words: समुदाय ऐसे लोगों का समूह है जो एक साथ एक निश्चित क्षेत्र में रहते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं, जिससे उनमें 'हम' की भावना विकसित होती है।
🎯 Exam Tip: समुदाय की विशेषताओं जैसे निश्चित क्षेत्र, 'हम' की भावना और सामाजिक संबंधों को याद रखें।
Question 4. समिति अथवा संघ से क्या अभिप्राय है?
Answer: समिति का अर्थ हर तरह से समुदाय के विपरीत है। आधुनिक शहरी जीवन में स्पष्ट रूप से देखे जाने वाले अवैयक्तिक, बाहरी एवं अस्थायी संबंध समिति के द्योतक हैं। वस्तुतः मनुष्य अकेला अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता; अतः परस्पर संगठन और परस्पर सहयोग के लिए 'समिति' या 'संघ' का निर्माण किया जाता है। जब एक से अधिक व्यक्ति आपस में मिलकर किसी विशिष्ट उद्देश्य या उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु संगठित होकर प्रयास करते हैं तो उस संगठन को ही समिति कहा जाता है। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “सामान्य रूप से किसी एक हित या कुछ हितों की प्राप्ति के लिए चेतन रूप से निर्मित संगठन को 'समिति' कहते हैं। इस भाँति, गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “समिति व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी विशिष्ट हित या हितों के लिए संठित होता है तथा मान्यता प्राप्त या स्वीकृत विधियों और व्यवहारों द्वारा कार्य करता है। परिवार, चर्च, मजदूर, संगठन, छात्र-संघ, संगीत-क्लब, बाढ़ सहायता समिति इत्यादि समिति के प्रमुख उदाहरण हैं।
In simple words: समिति एक समूह है जो किसी खास उद्देश्य को पूरा करने के लिए जानबूझकर बनाया जाता है, जिसमें सदस्यों के संबंध औपचारिक होते हैं।
🎯 Exam Tip: समिति और समुदाय के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके गठन के उद्देश्य और संबंधों की प्रकृति के आधार पर।
Question 5. जाति की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए ।
Answer: जाति की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. अनिवार्य सदस्यता-जाति की सदस्यता व्यक्ति की इच्छा या अनिच्छा पर आधारित नहीं है। जन्म से ही व्यक्ति किसी-न-किसी जाति का सदस्य होता है। इस सदस्यता को वह जीवन भर बदल नहीं सकता हैं। इसलिए जाति की सदस्यता अनिवार्य तथा स्थायी होती है।
2. निश्चित परम्पराएँ-प्रत्येक जाति के अपने रीति-रिवाज तथा उसकी अपनी परंपराएँ होती हैं। जाति के सदस्य सरकारी कानूनों से भी अधिक जातीय परंपराओं की ओर झुके हुए होते हैं। वे- सरकारी कानून का उल्लंघन कर सकते हैं तथा सरकार का विरोध कर सकते हैं किंतु जातिगत परपंराओं का उल्लंघन करने का दुस्साहस नहीं कर सकते ।
In simple words: जाति की सदस्यता जन्म से तय होती है और इसे बदला नहीं जा सकता, और हर जाति के अपने खास रीति-रिवाज और परंपराएँ होती हैं।
🎯 Exam Tip: जाति की विशेषताओं को भारतीय समाज के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
Question 6. जाति के दो प्रमुख गुण या कार्य बताइए ।
Answer: जाति के दो प्रमुख गुण या कार्य निम्नलिखित हैं-
1. मानसिक समूह-जाति के कार्य सुनिश्चित होते हैं। जाति के सदस्यों को इस बात को सोचने की आवश्यकता नहीं है कि वे अपनी आजीविका के लिए किस व्यवसाय को करेंगे क्योंकि जाति का व्यवसाय तो पूर्व निश्चित होता है। इस दृष्टि से जाति मानसिक सुरक्षा का काम करती है।
2. अधिकारों की सुरक्षा-एक व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा संगठन के अभाव में नहीं कर सकता है किंतु एक विशिष्ट जाति का सदस्य होने के नाते वह जातीय संगठन के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है। आधुनिक प्रजातंत्र के युग में जिस जाति का संगठन सुदृढ़ होता है उसे जाति के सदस्य अपने अधिकारों की रक्षा आसानी से कर सकते हैं।
In simple words: जाति अपने सदस्यों को मानसिक सुरक्षा देती है क्योंकि व्यवसाय पहले से तय होते हैं, और यह जातीय संगठन के माध्यम से अधिकारों की रक्षा भी करती है।
🎯 Exam Tip: जाति व्यवस्था के कार्यों को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं से देखें।
Question 7. जाति एवं वर्ग में दो अंतर बताइए ।
Answer: जाति एवं वर्ग में दो अंतर निम्नलिखित हैं-
1. स्थायित्व में अंतर वर्ग में सामाजिक बंधन स्थायी व स्थिर नहीं रहते हैं। कोई भी सदस्य अपनी योग्यता से वर्ग की सदस्यता परिवर्तित कर सकता है। जाति में सामाजिक बंधन अपेक्षाकृत स्थायी वे स्थिर रहते हैं। जाति की सदस्यता किसी भी आधार पर बदली नहीं जा सकती।
2. सामाजिक दूरी में अंतर वर्ग में अपेक्षाकृत सामाजिक दूरी कम पाई जाती है। कम दूरी के कारण ही विभिन्न वर्गों में खान-पान इत्यादि पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं पाए जाते हैं। विभिन्न जातियों में; विशेष रूप से उच्च एवं निम्न जातियों में अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक दूरी पाई जाती है। इस सामाजिक दूरी को बनाए रखने हेतु प्रत्येक जाति अपने सदस्यों पर अन्य जातियों के सदस्यों के साथ खान-पान, रहन-सहन इत्यादि के प्रतिबंध लगाती है।
In simple words: जाति और वर्ग में मुख्य अंतर यह है कि जाति स्थायी होती है और जन्म से मिलती है, जबकि वर्ग बदला जा सकता है; और जाति में सामाजिक दूरी व प्रतिबंध अधिक होते हैं, जबकि वर्ग में कम होते हैं।
🎯 Exam Tip: जाति और वर्ग के बीच के अंतरों को स्थायित्व, सदस्यता और सामाजिक दूरी के संदर्भ में याद रखें।
Question 8. सामाजिक नियंत्रण में दंड की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: दंड वह साधन है जिसके द्वारा अवांछनीय कार्य के साथ दुःखद भावना को संबंधित करके उसको दूर करने का प्रयास किया जाता है। सर्भी समाजों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दंड-व्यवस्था का प्रचलन है। सामाजिक नियंत्रण में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। सभ्यता के आदिकाल में प्रतिशोध की अग्नि को शांत करने के लिए ही दंड दिया जाता था या दंड देने का उद्देश्य प्रतिशोध की भावना को समाप्त करना ही था। व्यक्ति सोचता है कि अगर वह गलत कार्य करेगा तो समाज प्रतिशोध की दृष्टि से उसे दंड देगा। आज अपराधी और बाल अपराधों को दंड देने के पीछे उस अपराधी को सुधारने का उद्देश्य होता है। दंड का भय नागरिकों को गलत कार्य करने से रोकता है। अनेक समाज-मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि दंड का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक ढंग से लोगों के मस्तिष्क पर प्रभाव डालना तथा उन्हें समाज की मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार करने हेतु प्रेरित करना है। प्रत्येक समाज कानून के अनुसार दंड का भय देकर नागरिकों में अनुशासन स्थापित करने का प्रयास करता है। सामाजिक नियंत्रण की दृष्टि से नागरिकों में अनुशासन होना जरूरी है।
In simple words: दंड सामाजिक नियंत्रण का एक तरीका है जो लोगों को गलत काम करने से रोकता है, यह भय पैदा करता है और अपराधियों को सुधारने का लक्ष्य रखता है, जिससे समाज में अनुशासन बना रहे।
🎯 Exam Tip: दंड की भूमिका को उसके ऐतिहासिक संदर्भ, उद्देश्य (प्रतिशोध बनाम सुधार) और मनोवैज्ञानिक प्रभाव के साथ समझें।
Question 9. सामाजिक नियंत्रण में राज्य की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Answer: सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों में राज्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। राज्य को सर्वशक्तिमान माना जाता है क्योंकि इसे गंभीर अपराध हेतु व्यक्ति को प्राणदंड देने का अधिकार होता- है। सामाजिक नियंत्रण के सशक्त अभिकरण होने के नाते ही राज्य की व्यक्तियों के व्यवहार को नियमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्ति राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का पालन इसलिए करता है ताकि उसे अपराधी के रूप में सजा न मिल सके। राज्य अपनी सत्ता को सर्वोपरि बताकर, दबाव एवं कानून को राष्ट्रव्यापी बनाकर अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्याख्या करके व्यक्तियों पर ' नियंत्रण रखता है। यही पारिवारिक कार्यों पर नियंत्रण रखता है। दंड व्यवस्था एवं कानून के निर्माण तथा उसमें संशोधन करके राज्य व्यक्तियों के व्यवहार को नियमित एवं नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राज्य द्वारा निर्मित कानून सामाजिक नियंत्रण के सबसे अधिक प्रभावशाली साधन माने जाते हैं। कानून का पालन करना हमारी इच्छा अथवा अनिच्छा पर निर्भर नहीं करता अपितु इसके पीछे राज्य की शक्ति होकी है जो हमें कानून का पालन करने हेतु बाध्य करती है। कानून आधुनिक समाजों में व्यक्तियों के व्यवहार को संगठित करने एवं उनका मार्गदर्शन करने में महत्त्वपूर्ण है।
In simple words: राज्य सामाजिक नियंत्रण का एक शक्तिशाली साधन है जो कानूनों और दंड के माध्यम से लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करता है, जिससे समाज में व्यवस्था बनी रहती है।
🎯 Exam Tip: राज्य की भूमिका को सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन के रूप में समझें और कानून तथा शक्ति के महत्व पर ध्यान दें।
Question 10. सामाजिक नियंत्रण का दुर्णीम का सिद्धांत क्या है?
Answer: प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री दुर्णीम ने अपने सिद्धांत में सामूहिक प्रतिनिधित्वों या प्रतिनिधानों को सामाजिक नियंत्रण के लिए उत्तरदायी बताया है। इसका अर्थ समूह के वे आदर्श हैं, जो अधिकतर जनता द्वारा स्वीकार किए जाते हैं। दुर्णीम के अनुसार सामूहिक प्रतिनिधानों को प्रभावशाली बनाने से समूह कल्याण की भावना को प्रोत्साहन मिलता है। दुर्णीम का कहना है कि एक समाज के लिए विभिन्न समूहों के क्रियाशील बने रहने और कर्तव्यनिष्ठ रहने से ही सामाजिक नियंत्रण का कार्य संभव हो सकता है। सामाजिक नियंत्रण रहने से समाज की सुव्यवस्था और सुख-शान्ति पूर्ण रूप से बनी रहती है। सामूहिक प्रतिनिधानों के पीछे भी समाज की शक्ति होती है जिसके कारण व्यक्ति इनकी सरलता से अवहेलना नहीं करता।
In simple words: दुर्खीम के अनुसार, सामाजिक नियंत्रण सामूहिक प्रतिनिधानों (समूह के साझा आदर्शों) द्वारा होता है, जो समाज में एकजुटता और कर्तव्य की भावना को बढ़ावा देता है।
🎯 Exam Tip: दुर्खीम के सिद्धांत में 'सामूहिक प्रतिनिधान' की अवधारणा को विस्तार से समझें।
Question 11. सामाजिक स्तरीकरण की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
Answer: संसार में कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसमें सभी व्यक्ति एकसमान हों अर्थात् ऊँच-नीच की भावना प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पायी जाती है। धन-दौलत, प्रतिष्ठा तथा सत्ता का वितरण प्रत्येक समाज में असमान रूप में पाया जाता है तथा इसी असमान वितरण के लिए समाजशास्त्र में सामाजिक स्तरीकरण' शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि विभिन्न श्रेणियों में ऊँच-नीच का आभास होता है तो वह स्तरीकरण है।
किंग्स्ले डेविस के अनुसार, “जब हम जातियों, वर्गों और सामाजिक संस्तरण के विषय में सोचते हैं। तब हमारे मन में वे समूह होते हैं जो कि सामाजिक व्यवस्था में भिन्न-भिन्न स्थान रखते हैं और भिन्न-भिन्न मात्रा में आदर का उपयोग करते हैं।' इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सामाजिक स्तरीकरण समाज का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन है। जिनमें ऊँच-नीच की भावनाएँ पायी जाती हैं। सामाजिक स्तरीकरण विभेदीकरण की एक विधि है। समाज के विभिन्न स्तरों या श्रेणियों में पायी जाने वाली असमानता व ऊँच-नीच ही सामाजिक स्तरीकरण कही जाती है।
In simple words: सामाजिक स्तरीकरण समाज में लोगों को धन, प्रतिष्ठा या सत्ता के आधार पर ऊँचे और निचले स्तरों में बाँटने की प्रक्रिया है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और इसके उदाहरणों को समझें।
Question 12. सामाजिक स्तरीकरण की क्या आवश्यकता है?
Answer: सामाजिक स्तरीकरण सार्वभौमिक है अर्थात् ऊँच-नीच की यह व्यवस्था प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पायी जाती है। इसका अर्थ यह है कि स्तरीकरण समाज की किसी-न-किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। समाज में सभी पद एक समान नहीं होते। कुछ पद समाज के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं और कुछ कम । महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुँचने के लिए व्यक्तियों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है और इसलिए समाज इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को अधिक सम्मान की दृष्टि से देखता है। डेविस एवं मूर का विचार है, “सामाजिक असमानता अचेतन रूप से विकसित एक ढंग है जिसके द्वारा समाज अपने सदस्यों को विश्वास दिलाता है कि आधुनिक महत्त्वपूर्ण पद पर अधिक योग्य व्यक्ति ही काम कर रहे हैं।”
यदि समाज में सामाजिक स्तरीकरण न हो तो व्यक्ति में आगे बढ़ने एवं विशेष पद पाने की इच्छा तथा अपने पद के अनुकूल भूमिका निभाने की इच्छा समाप्त हो जाएगी। जब उसे पता होगा कि योग्य और अयोग्य व्यक्ति में समाज कोई भेद नहीं कर रही है तो वह कठिन परिश्रम करना छोड़ देगा और इस प्रकार समाज का विकास रुक जाएगा। अतः समाज की निरंतरती एवं स्थायित्व के लिए व्यक्तियों को उच्च पदो पर आसीन होने के लिए प्रेरणा देना अनिवार्य है और इसके लिए प्रदों में संस्तरण एवं सामाजिक ऊँच-नीच होना अनिवार्य है।
In simple words: सामाजिक स्तरीकरण समाज के लिए जरूरी है क्योंकि यह लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर आने के लिए प्रेरित करता है, जिससे समाज में योग्यता और कार्यक्षमता बनी रहती है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण की आवश्यकता को प्रकार्यवादी दृष्टिकोण से समझाएं, जिसमें प्रेरणा और योग्यता पर जोर दिया गया है।
Question 13. प्राथमिक समूह किसे कहते हैं?
अथवा
प्राथमिक समूह का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं चार विशेषताएँ लिखिए ।
Answer: प्राथमिक समूह वे समूह हैं जिनमें लघु आकार के कारण व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे से भली प्रकार परिचित होते हैं। जिन समूहों में प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं, उन्हें प्राथमिक समूह कहते हैं। इस प्रकार प्राथमिक समूहों के सदस्यों में परस्पर घनिष्ठता होती है और वे परस्पर एक-दूसरे से प्रत्यक्ष संबंध रखते हैं। व्यक्ति के लिए इनको अत्यधिक महत्त्व होता है, इस कारण प्रत्येक व्यक्ति इनके प्रति बहुत निष्ठा रखता है। लुण्डबर्ग के अनुसार, “प्राथमिक समूहों का तात्पर्य दो या दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों से है जो घनिष्ठ, सहभागी और वैयक्तिक ढंग से एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं।” प्राथमिक समूह की चार विशेषताएँ हैं-
1. भौतिक निकटता
2. समूह की लघुता
3. स्थायित्व
4. हम की भावना
In simple words: प्राथमिक समूह छोटे आकार के वे समूह होते हैं जिनमें सदस्य एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, उनके संबंध घनिष्ठ होते हैं, और वे भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूह की विशेषताओं को उसके आकार, संबंधों की प्रकृति और महत्व के आधार पर याद रखें।
Question 14. सामाजिक नियंत्रण किसे कहते हैं?
Answer: सामाजिक नियंत्रण का अर्थ समाज द्वारा विविध प्रकार के साधनों द्वारा व्यक्तियों के व्यवहार में अनुरूपता लाना है। वास्तव में, सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रत्येक समाज यह चाहता है कि उसके सदस्य ठीक प्रकार से आचरण एवं कार्य करें। अतः व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए प्रत्येक समाज के कुछ सामान्य नियम होते हैं। प्रथाएँ, परंपराएँ, रूढ़ियाँ, प्रतिमान, रीति-रिवाज, धर्म इत्यादि कुछ ऐसे प्रमुख साधन हैं जो व्यक्तियों के आचरण पर नियंत्रण रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन करता है तो समाज उसकी निंदा करता है तथा राज्य के संविधान के अनुसार उसे दंड देता है। रॉस के अनुसार, समूह नियंत्रण का अभिप्राय उन सब साधनों से है जिनके द्वारा समाज सदस्यों को अपने आदर्शों के अनुरूप बनाता है।”
In simple words: सामाजिक नियंत्रण समाज के वे तरीके और साधन हैं जिनसे लोगों के व्यवहार को समाज के नियमों और आदर्शों के अनुरूप बनाया जाता है ताकि समाज में व्यवस्था बनी रहे।
🎯 Exam Tip: सामाजिक नियंत्रण की परिभाषा को उसके उद्देश्यों और प्रमुख साधनों के साथ समझें।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के कौन-कौन से तीन उदाहरण दिए हैं? इन समूहों को प्राथमिक समूह क्यों कहा जाता है?
या
प्राथमिक समूह की परिभाषा दीजिए। समाज में द्वितीयक समूह के महत्व को कैसे समझा जा सकता है?
Answer: सामाजिक समूहों के जितने भी वर्गीकरण विद्वानों ने किए हैं, उनमें प्राथमिक और द्वितीयक समूह के वर्गीकरण को विशेष महत्त्व दिया जाता है, जिसका आधार सामाजिक संबंधों की प्रकृति है। इस वर्गीकरण के प्रतिपादक अमेरिकी समाजशास्त्री चार्ल्स हार्टन कूले (Charles Horton Cooley) हैं। उन्होंने 1909 ई- में अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'सोशल ऑर्गनाइजेशन' (Social Organization) में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। प्राथमिक समूह के सदस्यों की संख्या सीमित होती है तथा उनके आपसी संबंध अधिक घनिष्ठ होते हैं। इसके विपरीत, द्वितीयक समूह के सदस्यों की संख्या अधिक होती है, परंतु उनके आपसी संबंध अधिक घनिष्ठ नहीं हो पाते।
प्राथमिक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ
प्राथमिक समूह वे समूह हैं, जिनमें लघु आकार के कारण व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे से भली प्रकार परिचित होते हैं। अन्य शब्दों में, जिसे समूह में प्राथमिक संबंध पाएँ जाते हैं, उसे प्राथमिक समूह कहते हैं। इस प्रकार प्राथमिक समूह के सदस्यों में परस्पर घनिष्ठता होती है और वे परस्पर एक-दूसरे के सम्मुख आकर मिलते-जुलते हैं। व्यक्ति के लिए इनका अत्यधिक महत्त्व होता है, इस कारण प्रत्येक . व्यक्ति इनके प्रति बहुत निष्ठा रखता है। परिवार खेल-समूह और स्थायी पड़ोस प्राथमिक समूह के प्रमुख उदाहरण हैं।
प्रमुख विद्वानों ने प्राथमिक समूह को निम्नवत् परिभाषित किया है- कूले (Cooley) के अनुसार-“प्राथमिक समूहों से तात्पर्य उन समूहों से है, जो आमने-सामने के संबंध एवं सहयोग द्वारा लक्षित हैं। ये अनेक दृष्टियों से प्राथमिक हैं, परंतु मुख्यतया इस कारण हैं कि ये एक व्यक्ति की सामाजिक प्रकृति और आदर्शों के बनाने में मुख्य हैं। घनिष्ठ संबंधों के फलस्वरूप वैयक्तिकताओं का एक सामान्य समग्रता में इस प्रकार घुल-मिल जाना, जिससे कम-से-कम अनेक बातों के लिए एक सदस्य का उद्देश्य सारे समूह का सामान्य जीवन और उद्देश्य हो जाता है। संभवतः इस संपूर्णता का सरलतापूर्वक वर्णन 'हमारा समूह' कहकर किया जा सकता है। इसमें इस प्रकार की सहानुभूति और पारस्परिक अभिज्ञान है, जिसके लिए हम सबसे अधिक स्वाभाविक अभिव्यंजना है।”
यंग (Young) के अनुसार “इसमें घनिष्ठ (आमने-सामने के) संपर्क होते हैं और सभी व्यक्ति समरूप कार्य करते हैं। ये ऐसे केंद्र-बिंदु हैं, जहाँ से व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित होता है।”
कुंडबर्ग (Lundberg) के अनुसार “प्राथमिक समूहों का तात्पर्य दो या दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों से है, जो घनिष्ठ, सहभागी और वयैक्तिक ढंग से एक-दूसरे से व्यहार करते हैं।”
जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार-“प्राथमिक या आमने-सामने के समू, प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित होते हैं, इनमें सदस्य परस्पर तुरंत व्यवहार करते हैं।” इस परिभाषा द्वारा स्पष्ट होता है कि प्राथमिक समूह के विभिन्न सदस्यों के आपसी संबंध प्रत्यक्ष तथा व्यक्तिगत होते हैं, उनमें औपचारिकता नहीं होती।
इंकलिस (Inkeles) के अनुसार - "प्राथमिक समूहों में सदस्यों के संबंध भी प्राथमिक होते हैं, जिनमें व्यक्तियों में आमने-सामने के संबंध होते हैं तथा सहयोग और सहवास की भावनाएँ इतनी प्रबल होती हैं, कि व्यक्ति का 'अहम', 'हम' की भावना में बदल जाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इन समूहों को प्राथमिक समूह इस कारण से कहा जाता है क्योंकि इन समूहों में परस्पर घनिष्ठता, सहयोग, एकता तथा प्रेम का अत्यंत स्वाभाविक रूप से विकास होता है। ये सदस्य अपने लिए 'हम' शब्द का प्रयोग करते हैं तथा इनके परस्पर संबंध प्रत्यक्ष होते हैं। प्राथमिक समूह में ही व्यक्ति अपने भावी जीवन के लिए पाठ पढ़ता है। प्रेम, न्याय, उदारता तथा सहानुभूति जैसे गुणों की जानकारी व्यक्ति को प्राथमिक समूहों में ही मिलती है। कूले ने परिवार, पड़ोस एवं क्रीड़ा समूह को प्रमुख प्राथमिक समूह माना है।
प्राथमिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ
प्राथमिक समूह की विशेषताएँ दो भागों में विभाजित की जा सकती हैं- (अ) बाह्य या भौतिक विशेषताएँ तथा
(ब) आंतरिक विशेषताएँ। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–
(अ) बाह्य या भौतिक विशेषताएँ
1. भौतिक निकटता-प्राथमिक समूह के सदस्य एक-दूसरे के सम्मुख होकर मिलते-जुलते और संपर्क स्थापित करते हैं। आमने-सामने देखने और परस्पर वार्तालाप करने से विचारों का आदान-प्रदान होता है और सदस्य एक-दूसरे के निकट आते हैं। इस प्रकार की भौतिक निकटता प्राथमिक समूहों के विकास में परम सहायक होती हैं। इसी भौतिक निकटता को किंग्सले डेविस जैसे विद्वानों ने शारीरिक समीपता' कहा है।
2. समूह की लघुता-प्राथमिक समूह की दूसरी विशेषता उसका लघु स्वरूप है। समूह की लघुता के कारण ही सदस्यों में घनिष्ठता का निर्माण होता है। प्राथमिक समूह के छोटे होने से सदस्यों में परस्पर मिलने-जुलने और परस्पर निकट आने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। प्राथमिक समुह के सदस्यों की संख्या कम होती है। कुले (Cooley) ने इसके सेर्दस्यों की संख्या 2 से 25 तक जबकि फेयरचाइल्ड ने 3-4 से लेकर 50-60 तक बताई है।
3. स्थायित्व प्राथमिक समूह अन्य समूहों की अपेक्षा अधिक स्थायी होते हैं। समूह के सदस्यों के संबंध की अवधि पर्याप्त दीर्घ होती है और इसी कारण उसमें अधिक घनिष्ठता होती है। घनिष्ठ संबंध अधिक समय तक बने रहते हैं, अतः प्राथमिक समूह अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होते हैं।
(ब) आंतरिक विशेषताएँ।
प्राथमिक समूह की आंतरिक विशेषताओं को संबंध उन प्राथमिक संबंधों से होता है, जो इन समूहों में पाए जाते हैं। इस वर्ग की मुख्य विशेषताएँ निम्नवर्णित है-
1. संबंधों की स्वाभाविकता- इन समूहों में संबंधों की स्थापना स्वेच्छा से होती है, बलपूर्वक | नहीं। ये संबंध स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं; उनमें कृत्रिमता नहीं होती।
2. संबंधों की पूर्णता-प्राथमिक समूहों में व्यक्ति पूर्णतयां भाग लेता है। इसका मूल कारण सदस्यों की परस्पर घनिष्ठता एवं एक-दूसरे के प्रति पूर्ण जानकारी है। संबंधों में पूर्णता के कारण सदस्यों में परस्पर प्रेम-भावना पर्याप्त मात्रा में विकसित हो जाती है।
3. वैयक्तिक संबंध-प्राथमिक समूहों के समस्त सदस्यों के परस्पर संबंध व्यक्तिगत होते हैं। वे एक-दूसरे से पूर्णतया परिचित होते हैं तथा एक-दूसरे के नाम तथा परिवार के बारे में भी पूर्ण ज्ञान रखते हैं।
4. उद्देश्यों में समानता-प्रत्येक प्राथमिक समूह के सदस्य एक ही स्थान पर रहते हैं अतः उनके जीवन के मुख्य उद्देश्यों में भी समानता रहती है।
5. हम की भावना-प्राथमिक समूह छोटे होते हैं, सदस्यों में घनिष्ठता होती है और उनके उद्देश्यों में समानता होती है अतः उनमें 'हम की भावना का विकास हो जाता है। प्रत्येक सदस्य में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति होती है।
6. संबंध स्वयं साध्य होते हैं- प्राथमिक समूहों में कोई भी आदर्श या संबंध साधन के रूप में न होकर स्वयं साध्य होता है। यदि विवाह धन प्राप्ति के उद्देश्य से किया गया है तो वह विवाह न होकर अर्थ-पूर्ति का कार्य माना जाएगा। इन समूहों में संबंध किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए न होकर प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार यदि कोई मित्रता स्वार्थ पूर्ति के लिए करता है तो उसे हम मित्रता न कहकर स्वार्थपरता कहेंगे। इसी प्रकार संबंधों का कोई उद्देश्य न होकर वे स्वयं साध्य होते हैं।
7. सामाजिक नियंत्रण के साधन-प्राथमिक समूहों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि ये सामाजिक नियंत्रण के प्रभावशाली साधन होते हैं। उनके द्वारा अनौपचारिक रूप से सामाजिक नियंत्रण लागू किया जाता है।
उपर्युक्त विवरण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि प्राथमिक समूहों का हमारे जीवन में एक विशेष स्थान है। प्राथमिक समूह प्रत्येक व्यक्ति का समाजीकरण करते हैं तथा उसको मानसिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। व्यक्ति के बचपन में लालन-पालन का कार्य प्राथमिक समूह द्वारा ही होता है। व्यक्ति की अनेक भौतिक, शारीरिक एवं भावात्मक आवश्यकताएँ मुख्य रूप से प्राथमिक समूहों में ही पूरी होती हैं।
प्राथमिक समूहों को प्राथमिक कहे जाने के कारण
चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के प्रमुख रूप से तीन उदाहरण दिए हैं-परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह । इन्हें अनेक कारणों से प्राथमिक कहा जाता है, जिनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
1. समय की दृष्टि से प्राथमिक-प्राथमिक समूह समय की दृष्टि से प्राथमिक हैं, क्योंकि सर्वप्रथम बच्चा इन्हीं समूहों के सपंर्क में आता है।
2. महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक - प्राथमिक समूह महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक है, क्योंकि व्यक्तित्व के निर्माण में इनका विशेष योगदान रहता है।
3. मानव संघों का प्रतिनिधित्व करने में प्राथमिक–प्राथमिक समूह मौलिक मानव संघों का प्रतिनिधित्व करने की दृष्टि से भी प्राथमिक है तथा इसलिए मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के | रूप में इनका इतिहास अति प्राचीन है।
4. समाजीकरण करने की दृष्टि से प्राथमिक-प्राथमिक समूह समाजीकरण की दृष्टि से प्राथमिक हैं, क्योंकि इन्हीं से बच्चे को सामाजिक परंपराओं व मान्यताओं का ज्ञान होता है।
5. संबंधों की प्रकृति की दृष्टि से प्राथमिक-प्राथमिक समूह संबंधों की प्रकृति के आधार पर भी प्राथमिक हैं, क्योंकि इन्हीं से व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है।
6. आत्म-नियंत्रण की दृष्टि से प्राथमिक—प्राथमिक समूह आत्म-नियंत्रण कहा जाना पूर्णतः उचित है। यदि हम परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह के उदाहरण को सामने रखें तो उपर्युक्त आधार इस बात की पुष्टि करते हैं।
प्राथमिक समूहों का महत्त्व
प्राथमिक समूह अपने सदस्यों के व्यवहार को सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल नियंत्रित करने तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके महत्त्व को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है——-
1. व्यक्तित्व के विकास में सहायक प्राथमिक समूह में व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता | है। मानव की अधिकांश सीख प्राथमिक समूहों की ही देन है। यह सदस्यों के लिए व्यक्तित्व विकास का प्रमुख अभिकरण है। उदाहरणार्थ-परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह तीनों प्राथमिक समूह के रूप में व्यक्तित्व के विकास में सहायक हैं।
2. आवश्यकताओं की पूर्ति-ये समूह व्यक्ति की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इनका निर्माण किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता अपितु व्यक्तियों के सामान्य हितों की पूर्ति के लिए इनका निर्माण स्वतः ही होती है। ये व्यक्ति की अनेक | मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं (यथा मानसिक सुरक्षा, स्नेह आदि) की पूर्ति करते हैं।
3. समाजीकरण में सहायक प्राथमिक समूह व्यक्ति को समाज में रहने के योग्य बनाते हैं। इन समूहों में रहकर व्यक्ति समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन करता है और उन सबका ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। एच-ई- बार्ल्स का कथन है कि सामाजिक प्रक्रिया के विकास में प्राथमिक समूह अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं तथा वे स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के समाजीकरण व स्थापित संस्थाओं के एकीकरण व सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण होते हैं।
4. कार्यक्षमता में वृद्धि–प्राथमिक समूह में व्यक्तियों को एक-दूसरे से सहायता, प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिलता है, जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
5. सुरक्षा की भावना-प्राथमिक समूह व्यक्ति में सुरक्षा की भावना उत्पन्न करते हैं और उनमें पारस्परिक प्रेम की भावना उत्पन्न करके उनके व्यवहार को समाज के अनुकूल बना देते हैं।
6. सामाजिक नियंत्रण में सहायक प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं। ये समूह प्रथाओं, कानूनों एवं परंपराओं तथा रूढ़ियों के द्वारा व्यक्तियों के सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
7. नैतिक गुणों का विकास-प्राथमिक समूह व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करते हैं, क्योंकि इन समूहों में रहकर व्यक्ति सदाचार, सहानुभूति एवं सहिष्णुता आदि गुणों को सीख जाता है। लैंडिस (Landis) ने इसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि प्राथमिक समूहों में व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है।
8. संस्कृति के हस्तांतरण में सहायक प्राथमिक समूह संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांरित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनसे सामाजिक विरासत की रक्षा ही नहीं होती अपितु हस्तांतरण द्वारा इसमें निरंतरता भी बनी रहती है।
उपर्युक्त विवेचन से प्राथमिक समूहों का महत्त्व स्पष्ट होता है। वास्तव में प्राथमिक समूह जीवन के प्रत्येक पक्ष से संबंधित है तथा व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करने तथा दिशा निर्देश देने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस संदर्भ में कूले ने ठीक ही कहा है कि “प्राथमिक समूहों द्वारा पाशविक प्रेरणाओं का मानवीकरण किया जाना ही संभवतः इनके द्वारा की जाने वाली प्रमुख सेवा है।”
In simple words: चार्ल्स कूले ने परिवार, पड़ोस और क्रीड़ा समूह को प्राथमिक समूह के तीन मुख्य उदाहरण बताए हैं, जिन्हें प्राथमिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे छोटे होते हैं, सदस्यों के बीच घनिष्ठ संबंध होते हैं, 'हम' की भावना होती है, और ये व्यक्तित्व निर्माण व समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक समूहों के उदाहरणों, विशेषताओं और उनके महत्व को स्पष्ट रूप से लिखें, और कूले के योगदान पर विशेष ध्यान दें।
Question 2. सामाजिक समूह की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा इसके प्रमुख प्रकार बताइए।
या
सामाजिक समूह का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सामाजिक समूहों के प्रमुख वर्गीकरणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
Answer: 'सामाजिक समूह' समाजशास्त्र की एक प्राथमिक संकल्पना है। सामाजिक समूह व्यक्तियों को संकलन मात्र नहीं है। जब किसी समुह एक-दूसरे के प्रति सचेत होते हैं तथा एक-दूसरे के साथ दीर्घकालीन अंतःक्रियाएँ करते हैं तो सामाजिक समूह का निर्माण होता है। सामाजिक समूह का एक अपना ढाँचा भी होता है। इसलिए सामाजिक समूह का समाजशास्त्रीय अर्थ इसके सामान्य अर्थ से भिन्न है।
सामाजिक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ
'समूह' का शाब्दिक अर्थ ऐसे व्यक्तियों का संकलन है, जो परस्पर एक-दूसरे के अत्यधिक निकट हैं। या संबंधित हैं। एक समूह में कुछ वृक्ष, पशु-पक्षी, मनुष्य या कोई निर्जीव पदार्थ भी हो सकते हैं, जबकि सामाजिक समूह सजीव प्राणियों में ही होते हैं। विभिन्न विद्वानों ने सामाजिक समूह की परिभाषा निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत की है- मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार “समूह से हमारा तात्पर्य मनुष्यों के किसी भी ऐसे संग्रह से है, जो सामाजिक संबंधों द्वारा एक-दूसरे से बँधे हों ।”
विलियम के अनुसार–“एक सामाजिक समूह व्यक्तियों के उस निश्चित संग्रह को कहते हैं जो परस्पर संबंधित क्रियाएँ करते हैं और जो इस अंतःक्रिया की इकाई के रूप में ही स्वयं या दूसरों के द्वारा मान्य होते हैं।”
लैंडिस (Landis) के अनुसार “जहाँ दो से अधिक व्यक्ति सामाजिक संबंध स्थापित करते हैं, वहाँ समूह होता है।"
बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार “एक सामाजिक समूह दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों की संख्या को कहते हैं, जिनका ध्यान कुछ सामान्य उद्देश्यों पर हो और जो एक-दूसरे को प्ररेणा दें, जिनमें समान आस्था हो और जो समान क्रियाओं में सम्मिलित हों।”
एलड्रिज एवं मैरिल (Eldridge and Merril) के अनुसार-“सामाजिक समूह की परिभाषा ऐसे दो या अधिक व्यक्तियों के रूप में की जा सकती है, जिनमें पर्याप्त अवधि या समय से संचार है और जो किसी सामान्य कार्य या प्रयोजन के अनुसार कार्य करें। हॉट एवं रेस के अनुसार–“समूह अंतःक्रिया में संलग्न व्यक्तियों का एक संगठित संग्रह है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी लक्ष्य या उद्देश्य हेतु एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं या अंतःक्रिया करते हैं और इससे उनके बीच सामाजिक संबंध स्थापित होते हैं तो ऐसे व्यक्तियों के संकलन को समूह कहा जा सकता है। इस प्रकार, एक सामाजिक समूह मनुष्यों के उस निश्चित संकलन को कहते हैं, जो अंतःसंबंधित भूमिकाओं को अदा करते हैं और जो अपने या दूसरों के द्वारा अंतःक्रिया की इकाई के रूप में स्वीकृत होते हैं। समूह के सदस्य अपने एवं अन्य समूहों के सदस्यों के साथ स्वीकृत साधनों का प्रयोग करते हुए निरंतर एवं स्थायी अंतःक्रिया करते हैं।
सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ
सामाजिक समूह की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है-
1. व्यक्तियों का संग्रह–समूह का निर्माण दो या दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों से होता है जो समूह के प्रति सचेत होते हैं तथा जिनके मध्य किसी-न-किसी प्रकार की अंतःक्रिया पाई जाती है।
2. सदस्यों में परस्पर संबंध–समूह के सदस्यों में परस्पर एक-दूसरे के साथ संबंध पाए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के इन्हीं सामाजिक संबंधों को समूह का नाम दिया जाता है।
3. सदस्यों में एकता की भावना - प्रत्येक समूह में एकता की भावना का होना आवश्यक है। इसमें समूह के लोग एक-दूसरे को अपना समझते हैं और आपस में सहानुभूति रखते हैं।
4. सदस्यों के व्यवहार में संमानता-स्वार्थों, आदर्शों और मूल्यों में समानता होने के कारण समूह | के सदस्यों के व्यवहारों में समानता दिखाई पड़ती हैं। जनेनिकी के अनुसार सामाजिक समूह व्यक्तियों का मात्र समूह नहीं होता बल्कि उनके विशिष्ट व्यवहारों का समन्वय होता है।
5. संगठन-समूह में जितने भी सदस्य होते हैं, उनके सामाजिक मूल्य, स्वार्थ तथा आदर्श एक ही | होते हैं। समूह के सदस्य संगठित ही रहते हैं, भले ही वे एक-दूसरे से दूर ही क्यों न रहें। सामाजिक समूह एक प्रभावशाली संगठन है। सामाजिक समूह की जो भी विशेषताएँ हैं, उन सबका समूह के सदस्यों के जीवन पर प्रभाव पड़ता है।
6. सदस्यों में सहयोग समूह के जितने भी सदस्य होते हैं, वे एक-दूसरे के सहयोग पर निर्भर है। यदि कोई व्यक्ति समूह के हितों को हानि पहुँचाती है तो समूह के सभी सदस्य मिलकर उसका सामना करते हैं।
7. अनुशासन तथा नियंत्रण-समूह के सदस्य नियंत्रित रहते हैं। प्रत्येक समूह 'के कुछ रीति-रिवाज होते हैं और समूह के प्रत्येक सदस्य को उन रीति-रिवाजों का पालन करना पड़ता है। समूह के कानूनों या रीति-रिवाजों का पालन न करने पर समूह अपने सदस्य को दंड भी देता है।
8. मूर्त संगठन-समान उद्देश्यों या लक्ष्यों वाले व्यक्तियों का संकलन होने के नाते यह एक मूर्त संगठन है तथा इसलिए इसे देखा जा सकता है।
सामाजिक समूहों का वर्गीकरण
यद्यपि यह सत्य है कि विद्वानों ने सामाजिक समूहों का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया है, तथापि अभी तक कोई सर्वमान्य वर्गीकरण को प्रस्तुत नहीं कर सकता है। समूह का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया गया है-
(अ) समनर द्वारा वर्गीकरण समनर ने समूहों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया है-
1. अंतः समूह-अंत: समूह (In-group) का तात्पर्य उस समूह से है, जिसके प्रति लोगों में हम की भावना पाई जाती है। इस भावना के साथ-साथ व्यक्तियों में यह विचार उत्पन्न होने लगता है कि यह मेरा समूह है और इसके समस्त सदस्य मेरे आत्मीय और हितैषी हैं। अंतः समूह के किसी एक सदस्य के सुखी या दुःखी होने पर समूह के सभी सदस्य कुछ हद तक सुखी या दुःखी हुआ करते हैं। अंतः समूह के सदस्यों में अपने समूह के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण भी पाया जाता है। अपने समूह को उच्च या महान् माना जाता है तथा अन्य समूहों को निम्न या हीन माना जाता है।
अंत:समूहों के सदस्यों में आमने-सामने का संबंध होता हैं। परिवार, मित्र-मंडली इत्यादि अंतः समूहों के प्रमुख उदाहरण है। एक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे किसी अन्य स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के विरुद्ध एक अंतःसमूह का निर्माण करते हैं। सामान्य रूप से अंत:समूहों के सदस्यों की संख्या बहुत अधिक नहीं होती ।
2. बाह्य समूहबाह्य समूह (Out-group) अंतः समूह के विपरीत विशेषताओं वाले समूह हैं। व्यक्ति जहाँ अंतः समूह के प्रति प्रेम-भावना रखता है, वहीं बाह्य समूह के प्रति द्वेष और घृणा की भावना रखता है। बाह्य समूह के प्रति उदासीन तथा निषेधात्मक दृष्टिकोण होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हम जिस समूह के सदस्य नहीं होते तथा जिस समूह के प्रति हममें 'हम की भावना नहीं पाई जाती, वह समूह हमारे लिए बाह्य समूह होता है। शत्रु सेना, अन्य। गाँव आदि इसके उदाहरण हैं।
(ब) मैकाइवर तथा पेज द्वारा वर्गीकरण मैकाइवर तथा पेज ने सामाजिक समूहों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है-
1. क्षेत्रीय समूह-यह समूह निश्चित भू-भाग में निवास करते हैं; जैसे— गाँव, नगर, राष्ट्र, जनजाति इत्यादि ।
2. हितों के प्रति चेतन समूह जिनका निश्चित संगठन नहीं होता - ऐसे समूहों का कोई निश्चित संगठन तो नहीं होता, परंतु इनके सदस्य अपने समूह के प्रति सचेत होते हैं। शरणार्थी समूह, जाति व वर्ग इसके उदाहरण हैं।
3. हितों के प्रति चेतन समूह जिनका निश्चित संगठन होता है-ऐसे समूहों में समूह के प्रति चेतना के साथ-साथ निश्चित संगठन भी पाया जाता है। राष्ट्र, चर्च, श्रमिक संघ इत्यादि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।
(स) कूले द्वारा वर्गीकरण कूले ने सामाजिक समूहों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभक्त किया है-
1. प्राथमिक समूह-इन समूहों के सदस्यों में आमने-सामने का घनिष्ठ संबंध तथा सहयोग पाया जाता है। आकार सीमित होने के कारण सदस्यों में व्यक्तिगत एवं सहज संबंध पाए जाते हैं। परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा समूह इत्यादि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
2. द्वितीयक समूह–इन समूहों में प्राथमिक समूहों के विपरीत लक्षण पाए जाते हैं; अर्थात् ये आकार में बड़े होते हैं तथा इसके सदस्यों में पारस्परिक सहयोग एवं घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। राष्ट्र, राजनीतिक दल, श्रमिक संघ इत्यादि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।
(द) मिलर द्वारा वर्गीकरण मिलर ने सामाजिक समूहों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया है-
1. लम्बवत् समूह-ये समूह अनेक उपखंडों में विभाजित होते हैं तथा इन उपखंडों में ऊँच-नीच, ” संस्तरण एवं सामाजिक दूरी पाई जाती है। वर्ण तथा जाति इसके उदाहरण हैं।
2. समान्तर समूह-इन समूहों के सदस्यों को प्रस्थापित पर्याप्त सीमा तक एक समान होती है। श्रमिक वर्ग, छात्र वर्ग इत्यादि ऐसे समूहों के प्रमुख उदाहरण हैं। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विद्वानों द्वारा सामाजिक समूहों को उनके उद्देश्यों, सदस्यों में पाए जाने वाले संबंधों की घनिष्ठता व संबंधों की प्रकृति के आधार पर अनेक श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
In simple words: सामाजिक समूह लोगों का ऐसा संग्रह है जो एक-दूसरे के प्रति सचेत होते हैं, लंबे समय तक अंतःक्रिया करते हैं और एक ढाँचा रखते हैं; इनके मुख्य प्रकारों में समनर के अंतःसमूह/बाह्य समूह, मैकाइवर और पेज के क्षेत्रीय/हितों के प्रति चेतन समूह, कूले के प्राथमिक/द्वितीयक समूह, और मिलर के लम्बवत्/समान्तर समूह शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक समूह की परिभाषा के साथ-साथ विभिन्न समाजशास्त्रियों द्वारा दिए गए वर्गीकरणों को उनके मुख्य विशेषताओं और उदाहरणों के साथ याद रखें।
Question 3. प्राथमिक समूह की परिभाषा दीजिए। समाज में द्वितीयक समूह के महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
या
Answer: द्वितीयक समूह को परिभाषित कीजिए। प्राथमिक एवं द्वितीयक समूह में किन आधारों पर अंतर किया जा सकता है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
द्वितीयक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ,
द्वितीयक समूह प्राथमिक समूह से पूर्णतया विपरीत होते हैं। प्राथमिक समूह के सदस्य संख्या में थोड़े होते हैं और एक-दूसरे से शारीरिक निकटता रखते हैं तथा नाम से भी एक-दूसरे से परिचित होते हैं, परंतु द्वितीयक समूह के सदस्यों की संख्या अधिक होती है और उनके संबंध प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष या अप्रत्यक्ष होते हैं। इसके निर्माण के लिए आमने-सामने के संबंधों और घनिष्ठता की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके संबंध न तो व्यक्तिगत, न स्वयं साध्य और न संपूर्ण होते हैं। द्वितीयक समूह की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही होती है कि इसके सदस्यों के संबंधों का घनिष्ठता का अभाव होता है और उनमें 'हम की भावना नहीं होती । अन्य शब्दों में, इन समूहों के सदस्यों के मध्य जो संबंध स्थापित होते हैं, वे अवैयक्तिक (Impersonal), आकस्मिक (Casual) तथा औपचारिक (Formal) होते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ, श्रमिक संघ, माध्यमिक शिक्षक संघ, छात्र संघ तथा मेडिकल एसोसिएशन द्वितीयक समूह के उदाहरण हैं। द्वितीयक समूह की मुख्य परिभाषाएँ निम्नंवर्णित हैं- ऑगर्बन एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार “वे समूह, जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रदान करते हैं, द्वितीयक समूह कहलाते हैं।”
कूले (Cooley) के अनुसार “ये ऐसे समूह हैं जो कि घनिष्ठतारहित होते हैं और इनमें प्रायः अधिकतर अन्य प्राथमिक तथा अर्द्ध-प्राथमिक विशेषताओं का अभाव रहता है।'
लैडिंस (Landis) के अनुसार “द्वितीयक समूह वे समूह होते हैं जो अपने संबंधों में आकस्मिक तथा अवैयक्तिक होते है; क्योंकि द्वितीयक समूह व्यक्ति से विशेष माँग करते हैं, वे उससे उसकी विश्वासपात्रता का थोड़ा-सा ही अंश प्राप्त करते हैं और उन्हें (द्वितीयक समूहों को) उसके (व्यक्ति के) थोड़े-से ही समय तक ध्यान की आवश्यकता होती है।”
डेविस (Davis) के अनुसार-"द्वितीयक समूह का आकार इतना बड़ा होता है कि इसके कोई भी दो सदस्य न तो एक-दूसरे से घनिष्ठ संपर्क में रहते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप में एक-दूसरे को जानते हैं।”
लुडबर्ग (Lundberg) के अनुसार “द्वितीयक समूह वे हैं, जिनमें सदस्यों के संबंध अवैयक्तिक, हितप्रधान तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होते हैं।”
फेयरचाइल्ड (Fairchild) के अनुसार “समूह का वह रूप, जो अपने सामाजिक संपर्क और औपचारिक संगठन की मात्रा में प्राथमिक सूमहों की तरह घनिष्ठता से भिन्न हो, द्वितीयक समूह कहलाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताओं वाले समूहों को हम द्वितीयक समूह कहते हैं। ये आकार में बड़े होते हैं तथा इनमें घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। इन समूहों के सदस्यों के आपसी संबंध औपचारिक होते हैं।
In simple words: द्वितीयक समूह बड़े आकार के वे समूह होते हैं जिनके सदस्यों के बीच औपचारिक, अवैयक्तिक और कम घनिष्ठ संबंध होते हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ या श्रमिक संघ।
🎯 Exam Tip: द्वितीयक समूहों की परिभाषाओं और विशेषताओं को प्राथमिक समूहों से तुलना करके समझें, खासकर उनके आकार और संबंधों की प्रकृति पर ध्यान दें।
द्वितीयक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ
द्वितीयक समूह प्राथमिक समूह से पूर्णतया विपरीत होते हैं। प्राथमिक समूह के सदस्य संख्या में थोड़े होते हैं और एक-दूसरे से शारीरिक निकटता रखते हैं तथा नाम से भी एक-दूसरे से परिचित होते हैं, परंतु द्वितीयक समूह के सदस्यों की संख्या अधिक होती है और उनके संबंध प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष या अप्रत्यक्ष होते हैं। इसके निर्माण के लिए आमने-सामने के संबंधों और घनिष्ठता की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके संबंध न तो व्यक्तिगत, न स्वयं साध्य और न संपूर्ण होते हैं। द्वितीयक समूह की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही होती है कि इसके सदस्यों के संबंधों का घनिष्ठता का अभाव होता है और उनमें 'हम की भावना नहीं होती। अन्य शब्दों में, इन समूहों के सदस्यों के मध्य जो संबंध स्थापित होते हैं, वे अवैयक्तिक (Impersonal), आकस्मिक (Casual) तथा औपचारिक (Formal) होते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ, श्रमिक संघ, माध्यमिक शिक्षक संघ, छात्र संघ तथा मेडिकल एसोसिएशन द्वितीयक समूह के उदाहरण हैं। द्वितीयक समूह की मुख्य परिभाषाएँ निम्नवर्णित हैं- ऑगर्बन एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-"वे समूह, जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रदान करते हैं, द्वितीयक समूह कहलाते हैं।" कूले (Cooley) के अनुसार-"ये ऐसे समूह हैं जो कि घनिष्ठतारहित होते हैं और इनमें प्रायः अधिकतर अन्य प्राथमिक तथा अर्द्ध-प्राथमिक विशेषताओं का अभाव रहता है।" लैडिंस (Landis) के अनुसार-"द्वितीयक समूह वे समूह होते हैं जो अपने संबंधों में आकस्मिक तथा अवैयक्तिक होते है; क्योंकि द्वितीयक समूह व्यक्ति से विशेष माँग करते हैं, वे उससे उसकी विश्वासपात्रता का थोड़ा-सा ही अंश प्राप्त करते हैं और उन्हें (द्वितीयक समूहों को) उसके (व्यक्ति के) थोड़े-से ही समय तक ध्यान की आवश्यकता होती है।" डेविस (Davis) के अनुसार-"द्वितीयक समूह का आकार इतना बड़ा होता है कि इसके कोई भी दो सदस्य न तो एक-दूसरे से घनिष्ठ संपर्क में रहते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप में एक-दूसरे को जानते हैं।" लुडबर्ग (Lundberg) के अनुसार-"द्वितीयक समूह वे हैं, जिनमें सदस्यों के संबंध अवैयक्तिक, हितप्रधान तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होते हैं।" फेयरचाइल्ड (Fairchild) के अनुसार-"समूह का वह रूप, जो अपने सामाजिक संपर्क और औपचारिक संगठन की मात्रा में प्राथमिक सूमहों की तरह घनिष्ठता से भिन्न हो, द्वितीयक समूह कहलाता है।" उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताओं वाले समूहों को हम द्वितीयक समूह कहते हैं। ये आकार में बड़े होते हैं तथा इनमें घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। इन समूहों के सदस्यों के आपसी संबंध औपचारिक होते हैं।In simple words: द्वितीयक समूह बड़े आकार के होते हैं और इनमें व्यक्तिगत या घनिष्ठ संबंध नहीं होते। सदस्यों के बीच संबंध अवैयक्तिक, आकस्मिक और औपचारिक होते हैं। ये समूह विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: द्वितीयक समूहों की मुख्य विशेषताओं और प्राथमिक समूहों के साथ उनके अंतर को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अवधारणा समाजशास्त्रीय विश्लेषण की नींव है।
द्वितीयक समूह की प्रमुख विशेषताएँ
द्वितीयक समूह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-1. कार्यों के अनुसार स्थिति-द्वितीयक समूह में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति उसके कार्यों पर निर्भर होती है। इनमें व्यक्ति जन्म के आधार पर नहीं जाने जाते बल्कि कार्य के आधार पर जाने जाते हैं। उदाहरण के लिए मजिस्ट्रेट होने पर अनुसूचित जाति का व्यक्ति और ब्राह्मण दोनों ही मजिस्ट्रेट कहलाते हैं।
2. सदस्यों में व्यक्तिवाद-द्वितीयक समूहों के सदस्यों में व्यक्तिवाद विकसित हो जाता है, क्योंकि उनके संबंध स्वार्थ पर आधारित होते हैं। स्वार्थ पूरा हो जाने पर उसका समूह से कोई प्रयोजन नहीं रहता।
3. सदस्यों में आत्म-निर्भरता-द्वितीयक समूह के सदस्यों में आत्म-निर्भरता होती है, क्योंकि प्रत्येक सदस्य को स्वयं अपने स्वार्थी की रक्षा करनी पड़ती है। द्वितीयक समूह का आधार अत्यधिक बड़ा होने के कारण उसके सदस्यों में आपसी संबंध अप्रत्यक्ष रहते हैं।
4. जानबूझकर स्थापना-कुछ विशेष हितों की पूर्ति के लिए व्यक्ति द्वितीयक समूहों की स्थापना जानबूझकर करता है अतः द्वितीयक समूहों का विकास स्वतः नहीं होता है।
5. विस्तृत आकार-द्वितीयक समूह आकार में विस्तृत होते हैं तथा इनके सदस्य संपूर्ण विश्व में भी फैले हो सकते हैं। उदाहरणार्थ ट्रेड यूनियन एवं संयुक्त राष्ट्र संघ द्वितीयक समूह के उदाहरण है।
6. अप्रत्यक्ष संबंध-विस्तृत आकार के कारण द्वितीयक समूहों के सदस्यों में शारीरिक निकटता आवश्यक नहीं है अतः इसके सदस्यों में अप्रत्यक्ष संबंध पाए जाते हैं।
7. व्यक्ति पर आंशिक प्रभाव-द्वितीयक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष को प्रभावित करते हैं, उसके संपूर्ण व्यक्तित्व से उनका कोई संबंध नहीं होता।
8. सीमित उत्तरदायित्व-अप्रत्यक्ष संबंध होने के कारण द्वितीयक समूहों के सदस्यों का उत्तरदायित्व भी सीमित होता है। इसलिए. इनमें संपूर्ण जीवन की व्यवस्था का अभाव होता है।
9. घनिष्ठता का अभाव-इन समूहों के सदस्यों के संबंधों में घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। यहाँ व्यक्ति के बीच 'छुओ और जाओ' (Touch and go) के संबंध होते हैं।
द्वितीयक समूहों का महत्त्व
द्वितीयक समूहों का महत्त्व समाज में प्राथमिक समूहों की तुलना में द्वितीयक समूहों की संख्या व महत्त्व में वृद्धि होती जा रही है। द्वितीयक समूहों का महत्त्व निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-1. आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक-आधुनिक जटिल समाजों में व्यक्तियों की आवश्यकताएँ इतनी अधिक हैं कि उनकी पूर्ति के लिए केवल प्राथमिक समूह ही पर्याप्त नहीं है; उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए द्वितीयक समूहों की भी आवश्यकता होती है।
2. सामाजिक प्रगति में सहायक-द्वितीयक समूह समाज में इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि ये समूह सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक प्रगति में भी योगदान देते हैं। ये समूह व्यक्ति को प्रतिस्पर्धा की ओर प्रेरित करते हैं, उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करते हैं।
3. विशेषीकरण में सहायक-द्वितीयक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व का विशेषीकरण करने में भी योगदान देते हैं। ये समूह नवीन प्रेरणाओं को जन्म देते हैं, जिससे नित्य नए आविष्कार होते रहते हैं।
4. व्यवहार को नियंत्रित करने में सहायक-द्वितीयक समूह व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित, करने में भी योगदान देते हैं। इस विषमतापूर्ण समाज में परंपराओं व प्रथाओं द्वारा नियंत्रण नहीं किया जा सकता, इसलिए व्यवहारों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस, न्यायालय जैसे द्वितीयक समूहों की आवश्यकता होती है।
5. उद्देश्यों की पूर्ति द्वारा संतोष प्रदान करने में सहायक-द्वितीयक समूहों में आदान-प्रदान का क्षेत्र विस्तृत होने के कारण अधिक संतोष प्राप्त होता है। ये मनुष्यों के विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं।
6. व्यक्तिगत ज्ञान एवं कुशलता को बढ़ाने में सहायक-द्वितीयक समूह श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण को महत्त्व देते हैं, जिससे व्यक्ति के ज्ञान एवं कुशलता में वृद्धि होती है।
7. तार्किक दृष्टिकोण के विकास में सहायक-द्वितीयक समूह व्यक्ति और समाज में जागरूकता उत्पन्न करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये व्यक्ति में विवेक को जाग्रत करते हैं, तार्किक दृष्टिकोण अपनाने में उसकी सहायता करते हैं।
8. योग्यताओं के विकास में सहायक-द्वितीयक समूह व्यक्ति की योग्यताओं का विकास करने में अपना योगदान देते हैं। लोग समूह में सदस्यता प्राप्त करने के लिए अधिक-से-अधिक योग्य बनने का प्रयत्न करते हैं। अप्रत्यक्ष संबंध होते हुए भी द्वितीयक समूहों का मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण स्थान होने के कारण ही उन्हें ‘शीत जगत के प्रतिनिधि' कहा जाता है।
प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों में अंतर
प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-
| अंतर का आधार | प्राथमिक समूह | द्वितीयक समूह |
|---|---|---|
| 1. आकार | प्राथमिक समूहों का आकार छोटा होता है; जैसे- परिवार, पड़ोस और मित्र-मंडली। | द्वितीयक समूहों का आकार बड़ा होता है; जैसे- श्रमिक संगठन एवं संयुक्त राष्ट्र संघ आदि। |
| 2. उद्देश्य | प्राथमिक समूह के सदस्यों के उद्देश्यों में समानता रहती है। | द्वितीयक समूहों के सदस्यों के उद्देश्यों में भिन्नता होती है। |
| 3. संबंधों की प्रकृति | प्राथमिक समूहों में आमने-सामने के संबंधों का होना परम आवश्यक है। इसलिए प्राथमिक समूह के सदस्यों में व्यक्तिगत एवं अनौपचारिक संबंध पाए जाते हैं। | द्वितीयक समूहों में आमने-सामने के संबंधों की बहुत कम संभावना रहती है। इसलिए इन समूहों के सदस्यों में औपचारिक संबंध होते हैं। |
| 4. संबंधों की अवधि | घनिष्ठता के कारण सदस्यों के संबंध दीर्घकाल या जीवन-पर्यन्त रहते हैं। | द्वितीयक समूहों के सदस्यों के संबंधों में स्थायित्व नहीं होता। |
| 5. परस्पर प्रेम सहानुभूति | और उद्देश्यों की समानता के कारण प्राथमिक समूहों के सदस्यों में परस्पर प्रेम और सहानुभूति होती है। | उद्देश्यों की भिन्नता के कारण द्वितीयक समूहों के सदस्यों में परस्पर प्रेम और सहानुभूति की भावना कम पाई जाती है। |
| 6. उत्पत्ति | प्राथमिक समूह का स्वतः जन्म होता है। | द्वितीयक समूह का निर्माण संबंधित मनुष्यों द्वारा सप्रयास किया जाता है। |
| 7. साधन/साध्य | प्राथमिक समूह साध्य होते हैं। | द्वितीयक समूह साध्य न होकर साधन हैं। |
| 8. समाजीकरण में योगदान | प्राथमिक सूमहों का व्यक्ति के समाजीकरण में विशेष योगदान रहता है। | द्वितीयक समूहों का समाजीकरण में योगदान प्राथमिक समूहों से कम है। |
| 9. हम की भावना | प्राथमिक समूहों के सदस्यों में 'हम की भावना' होती है। | द्वितीयक समूहों के सदस्यों में 'हम की भावना' का प्रायः अभाव होता है। |
| 10. संबंधों की पूर्णता | प्राथमिक समूहों के सदस्यों में पाए जाने वाले संबंध पूर्ण होते हैं। | द्वितीयक समूहों के सदस्यों में पाए जाने वाले संबंध आंशिक होते हैं। |
| 11. संस्कृति | प्राथमिक समूह वहाँ पाए जाते हैं जहाँ सामान्य संस्कृति के व्यक्ति निवास करते हैं। | द्वितीयक समूहों में सामान्य संस्कृति का अभाव्र होता है तथा संस्कृति में भिन्नता भी हो सकती है। |
| 12. संख्या | प्राथमिक समूहों की संख्या सीमित होती है। कूले ने तीन प्राथमिक समूहों का उल्लेख किया है- (क) परिवार, (ख) क्रीड़ा-समूह (ग) पड़ोस। | द्वितीयक समूहों के अंतर्गत अनेक प्राथमिक समूह पाए जाते हैं। इनकी संख्या निश्चित नहीं की जा सकती। |
| 13. प्रादुर्भाव | मनुष्य के जन्म के साथ ही प्राथमिक समूहों का प्रादुर्भाव हो गया। | द्वितीयक समूहों का प्रादुर्भाव बहुत काल के पश्चात हुआ। |
| 14. समूह पर निर्भरता | प्राथमिक समूह के सदस्य समूह पर निर्भर करते हैं। | द्वितीयक समूह के सदस्य समूह पर निर्भर नहीं करते हैं। |
| 15. सदस्यता | प्राथमिक समूहों की सदस्यता स्वाभाविक और अनिवार्य होती है। | द्वितीयक समूहों की सदस्यता का अनिवार्य होना आवश्यक नहीं। |
| 16. विस्तृतता | प्राथमिक समूहों में द्वितीयक समूहों का कोई स्थान नहीं होता क्योंकि ये कम विस्तृत होते हैं। | अधिक विस्तृत होने के कारण द्वितीयक समूहों के अंतर्गत अनेक प्राथमिक समूह पाए जाते हैं। |
| 17. पद का निर्धारण | प्राथमिक समूहों में व्यक्ति का पद उसे महत्त्व एवं जन्म पर निर्भर करता है। | द्वितीयक समूहों में व्यक्ति का पद उसके कार्य पर निर्भर करता है। |
| 18. नियम | प्राथमिक समूहों में सामाजिक नियमों की प्रधानता होती है तथा इन्हीं का पालन होता है। | द्वितीयक समूह सामाजिक नियमों के साथ-साथ अपने समूहगत नियमों का भी निर्माण करते हैं। |
Question 4. भूमिका से आप क्या समझते हैं? प्रस्थिति एवं भूमिका में संबंध स्पष्ट कीजिए ।
या
भूमिका की संकल्पना स्पष्ट कीजिए। समाज में प्रस्थिति एवं भूमिका का महत्त्व बताइए ।
Answer:
भूमिका का अर्थ एवं परिभाषाएँ
समाज में जितने भी व्यक्ति रहते हैं उन सबका समाज में कोई-न-कोई स्थान होता है। इस स्थान को उस व्यक्ति की प्रस्थिति कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रस्थिति का ध्यान रखकर समाज में अपना स्थान बनाने के लिए कुछ-न-कुछ कार्य अवश्य करता है। उसके इन कार्यों से ही उसका समाज में स्थान निर्धारित किया जाता है। कार्यों के आधार पर व्यक्ति को समाज प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इस प्रकार, भूमिका प्रस्थिति का गत्यात्मक पक्ष है तथा प्रस्थिति के अनुसार व्यक्ति से जिस प्रकार के कार्य की आशा की जाती है उसी को उसकी भूमिका कहा जाता है। प्रमुख विद्वानों ने भूमिका की परिभाषा इस प्रकार दी है- सार्जेण्ट (Sargent) के अनुसार-"व्यक्ति की भूमिका सामाजिक व्यवहार का एक प्रतिमान या प्रकार है जो उसे समूह की आवश्यकताओं और आशाओं में परिस्थति के अनुसार योग्य बनाता है।" यंग (Young) के अनुसार-"व्यक्ति जो करता है या करवाता है उसे हम उसकी भूमिका कहते हैं।" लिंटन (Linton) के अनुसार-"भूमिका से तात्पर्य सांस्कृतिक प्रतिमानों के उस योग से है जो किसी प्रस्थिति से संबंधित हो। इस प्रकार इसमें वे सब मनोवृत्तियाँ, मूल्य तथा व्यवहार सम्मिलित हैं जो समाज किसी प्रस्थिति को ग्रहण करने वाले व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को प्रदान करता है।" डेविस (Davis) के अनुसार-"अपनी प्रस्थिति की आवश्यकताओं को पूरा करने के वास्तविक तरीकों को ही भूमिका कहते हैं।" ऑगबर्न तथा निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-"भूमिका एक समूह में एक विशिष्ट पद से संबंधित सामाजिक प्रत्याशाओं एवं व्यवहार प्रतिमानों का एक योग है, जिसमें कर्तव्यों : एवं सुविधाओं दोनों का समावेश होता है।"In simple words: भूमिका व्यक्ति द्वारा अपनी सामाजिक प्रस्थिति के अनुसार किए जाने वाले कार्यों और व्यवहारों का समूह है। यह प्रस्थिति का गतिशील पहलू है, जिसमें अपेक्षाएँ, कर्तव्य और अधिकार शामिल होते हैं।
🎯 Exam Tip: भूमिका और प्रस्थिति के अंतर-संबंध को समझना समाजशास्त्रीय अध्ययन का एक महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि ये सामाजिक संरचना और व्यवहार को निर्धारित करते हैं।
ब्रूम एवं सेल्जनिक (Broom and Selznick) के अनुसार-“एक विशिष्ट सामाजिक पद से संबंधित व्यवहार और प्रतिमान को भूमिका के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।" उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति से उसकी प्रस्थिति के अनुसार जिस कार्य की आशा की जाती है, वही उसकी भूमिका है। अधिकांशतया व्यक्तियों से सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार ही भूमिकाओं के निष्पादन की आशा की जाती है।
प्रस्थिति एवं भूमिका का संबंध
एक व्यक्ति की प्रस्थिति व उसकी भूमिका में घनिष्ठ संबंध होता है। समाज में व्यक्ति अपनी प्रस्थिति के अनुसार ही भूमिका का निष्पादन करता है और उसकी भूमिका के आधार पर ही उसे सामाजिक प्रस्थिति प्राप्त होती है। प्रस्थिति और भूमिका का यह संबंध निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-1. अन्योन्याश्रितता-सामाजिक प्रस्थिति व भूमिका एक-दूसरे से पृथक् नहीं किए जा सकते हैं। प्रस्थिति के अनुसार व्यक्ति को भूमिका निभानी पड़ती है और भूमिका के अनुसार व्यक्ति की प्रस्थिति निर्धारित की जाती है अतः दोनों ही एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
2. प्रस्थिति भूमिका की प्रेरक-एक व्यक्ति की प्रस्थिति उसे अपनी भूमिका निष्पादित करने की प्रेरणा देती है। यदि समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति ऊँची है तो व्यक्ति से ऊँची भूमिका की आशा की जाती है, परंतु यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति की भूमिका उसकी प्रस्थिति के अनुकूल ही हो।
3. प्रस्थिति द्वारा भूमिकाओं का निर्धारण-सामाजिक प्रस्थिति व्यक्तियों की भूमिकाओं को निर्धारित करती है। यही दूसरी बात है कि किसी विशेष प्रस्थिति में नियुक्त व्यक्ति अपनी प्रस्थिति के अनुसार भूमिका निभाता है अथवा नहीं। परंतु जैसा भी वह कार्य करता है, वही उसकी भूमिका कहलाती है।
4. भूमिका द्वारा प्रस्थिति का निर्धारण-कई बार ऐसा भी होता है कि व्यक्ति द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका उसको समाज में निश्चित प्रस्थिति का निर्धारण करती है। यदि कोई व्यक्ति अच्छी भूमिका निभाता है तो उसको समाज अधिक सम्मान देता है और उसकी प्रस्थिति भी ऊँची होती है।
5. भूमिकाओं द्वारा श्रेणी का निर्धारण-यदि भूमिका की श्रेणी निम्न स्तर की हो तो व्यक्ति की प्रस्थिति की श्रेणी भी निम्न स्तर की होगी। उदाहरणार्थ-परंपरागत रूप से व्यक्ति के कार्य को ही वर्ण एवं जाति प्रथा का प्रमुख आधार माना जाता रहा है।
सामाजिक प्रस्थिति एवं भूमिका का महत्त्व
सामाजिक प्रस्थिति व भूमिका का सामाजिक स्तरीकरण में अधिक महत्त्व है। इस संबंध में यह कहा जा सकता है कि किसी व्यक्ति का पद समाज में उसकी वह प्रस्थिति है जिसे वह जन्म, आयु, लिंग, पेशे आदि के कारण प्राप्त करता है और इस प्रस्थिति के अनुसार वह जो कार्य करता है वहीं उसकी भूमिका कहलाती है। इस प्रकार प्रस्थिति तथा भूमिका ही सामाजिक संगठन की आधारशिलाएँ हैं। यदि किसी समाज में प्रस्थिति तथा भूमिका में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता आ जाती है तो समाज में विघटन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तथा ऐसी परिस्थिति को आदर्शविहीनता अथवा प्रतिमानता (Anomie) कहा जाता है। प्रस्थिति व भूमिका के महत्त्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-1. प्रस्थिति एवं भूमिका व्यक्ति को ठीक कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। अतएव स्थिति व कार्य सामाजिक संगठन व व्यवहार को निर्धारित करते हैं।
2. प्रस्थिति एवं भूमिका के कारण सामाजिक श्रम-विभाजन सरल होता है।
3. प्रस्थिति एवं भूमिका के बंधन में पड़कर व्यक्ति समाज विरोधी कार्य नहीं कर पाता अतएव स्थिति व कार्य सामाजिक नियंत्रण में सहायक हैं।
4. प्रस्थिति एवं भूमिका व्यक्ति में उत्तरदायित्व की भावना को जाग्रत करते हैं।
5. सामाजिक प्रगति के कार्यों में व्यक्ति को प्रेरणा देने में प्रस्थिति एवं भूमिका का विशेष महत्त्व है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्थिति एवं भूमिका दो परस्पर संबंधित संकल्पनाएँ हैं। प्रस्थिति का अर्थ समाज द्वारा व्यक्ति को दिया गया स्थान या पद है, जबकि भूमिका को अर्थ प्रस्थिति के अनुरूप उसका कार्य है। भूमिका प्रस्थिति का गत्यात्मक पक्ष है।
Question 5. प्रस्थिति से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख प्रकार कौन-से हैं?
या
प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति किसे कहते हैं? उदाहरण सहित इनकी व्याख्या कीजिए ।
Answer: सामाजिक प्रस्थिति एवं सामाजिक भूमिका समाजशास्त्र की दो ऐसी मूलभूत संकल्पनाएँ हैं जो सामाजिक स्तरीकरण के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। प्रत्येक समाज अपने सदस्यों को एक निश्चित पद प्रदान करता है जो कि उनकी प्रस्थिति कही जाती है। उस प्रस्थिति के अनुरूप उससे जिस कार्य की आशा की जाती है उसे भूमिका कही जाता है। इस प्रकार, प्रस्थिति और भूमिका की संकल्पनाएँ परस्पर जुड़ी हुई हैं। भूमिका को प्रस्थिति का गत्यात्मक पक्ष कहा गया है क्योकि स्थिति परिवर्तित होते ही कार्य भी परिवर्तित हो जाता है। प्रस्थिति को संस्थागत भूमिका भी कहते हैं।
प्रस्थिति का अर्थ एवं परिभाषाएँ
समाज में व्यक्ति का उसके समूह में जो स्थान होता है उसे व्यक्ति की प्रस्थिति कहते हैं। किसी कार्यालय में अधिकारी का ऊँचा स्थान होता है तो उस कार्यालय में उस अधिकारी की प्रस्थिति ऊँची मानी जाती है क्योंकि वह कार्यालय में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। इसलिए प्रस्थिति का अर्थ उस महत्त्वपूर्ण स्थान से जो व्यक्ति अपने समूह या कार्यालय में या अन्य सार्वजनिक उत्सवों में अपनी योग्यता व कार्यों के द्वारा अथवा जन्म से प्राप्त कुछ लक्षणों द्वारा प्राप्त करता है। प्रस्थिति को विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है- बीरस्टीड के अनुसार “सामान्यतः एक प्रस्थिति समाज अथवा एक समूह में एक पद है।” मैकाइवर एवं पेज (MacIver and Page) के अनुसार-(प्रस्थिति वह सामाजिक स्थान है जो इसे ग्रहण करने वाले के लिए उसके व्यक्तिगत गुणों तथा सामाजिक सेवाओं के अलावा उसके सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रभाव की मात्रा निश्चित करता है। इलियट एवं मैरिल (Elliott and Merrill) के अनुसार-“एक व्यक्ति की प्रस्थिति से हमारा आशय उसके स्थान तथा अन्य व्यक्तियों के संदर्भ में उसके क्रम से है, जो उसे समूह से मिला हुआ है।” लेपियर (LaPiere) के अनुसार-“सामाजिक प्रस्थिति साधारणतः व्यक्ति की समाज में स्थिति से समझी जाती है।” लिण्टन (Linton) के अनुसार-“विशेष व्यवस्था में स्थान, जिसे व्यक्ति किसी दिए हुए समय में प्राप्त करता है, उस व्यवस्था के अनुसार उसकी प्रस्थिति की ओर संकेत करता है।” यंग (Yong) के अनुसार-“प्रत्येक समाज और प्रत्येक समूह में प्रत्येक सदस्य के कुछ कार्य क्रियाएँ हैं जिनसे वह संबद्ध है और जो शक्ति या प्रतिष्ठा की कुछ मात्रा अपने साथ ले चलती हैं। इस प्रतिष्ठा या शक्ति से हम उसकी प्रस्थिति का संकेत करते हैं।' उपर्युक्त परिभाषाओं से यह पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है एक व्यक्ति की प्रस्थिति से हमारा अभिप्राय उसके स्थान अथवा पद से है जो समाज द्वारा मिला हुआ है। प्रस्थिति एवं प्रतिष्ठा अंत-संबंधित शब्द है। क्योंकि प्रत्येक प्रस्थिति के अपने कुछ अधिकार एवं मूल्य होते हैं। उदाहरणार्थ-एक दुकानदार की तुलना में एक डॉक्टर की प्रतिष्ठा ज्यादा होती है चाहे उसकी आय कम ही क्यों न हो।
सामाजिक प्रस्थिति के प्रकार या स्वरूप
प्रस्थिति कई प्रकार की होती है। इसे दो वर्गीकरणों के आधार पर समझाने का प्रयास किया गया है। प्रथम वर्गीकरण में प्रस्थिति को निर्धारित करने वाले आधार को सामने रखा जाता है, जबकि दूसरे वर्गीकरण में व्यक्ति की प्रस्थिति को प्रदान करने वाले अन्य व्यक्तियों की संख्या को सामने रखा जाता है। प्रथम वर्गीकरण के अनुसार सामाजिक प्रस्थिति की निम्नलिखित दो श्रेणियाँ हैं-1. प्रदत्त प्रस्थिति-यह प्रस्थिति व्यक्ति को जन्म से ही प्रदान की जाती है। जिस जाति में कोई व्यक्ति जन्म लेता है उसी जाति की समाज में मान्यता के अनुसार उस व्यक्ति का पद निर्धारित होता है। इस प्रकार का पद- समाज द्वारा जन्म से ही प्रदान किया जाता है। इस प्रदत्त या अवलोकित प्रस्थिति का आधार आयु, लिंग अथवा परिवार है। इस प्रकार की प्रस्थिति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को किसी प्रकार का प्रयास नहीं करना पड़ता है। यह प्रस्थिति समाज या समूह द्वारा व्यक्ति को जन्म से ही उसकी जाति, उसकी आयु, उसके लिंग और उसके पद के अनुसार प्रदान की जाती है।
2. अर्जित प्रस्थिति-व्यक्ति अपनी योग्यता, परिश्रम एवं कार्यकुशलता से समाज में अपना स्थान ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार स्थान प्राप्ति में व्यक्ति को अपने कार्य-कौशल पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस स्थिति की प्राप्ति व्यक्ति अपने परिश्रम से करता है, इसलिए इसे उपार्जित प्रस्थिति कहा जाता है। इस प्रकार की प्रस्थिति को प्राप्त करने या बनाए रखने में व्यक्ति को कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उसे समाज के हितों का ध्यान रखना पड़ता है और वह कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे उसकी प्रस्थिति पर या समाज में उसके द्वारा प्राप्त स्थान पर बुरा प्रभाव पड़े। इस प्रकार की प्रस्थिति का आधार व्यक्ति की अपनी योग्यता अथवा व्यक्तिगत गुण है। समाजशास्त्रियों ने प्रस्थिति के स्वरूपों का एक अन्य वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है। इस वर्गीकरण का आधार प्रस्थिति प्रदान करने वाले व्यक्तियों की संख्या है। इस आधार पर प्रस्थितियाँ दो प्रकार की हैं-
1. सामान्य प्रस्थिति-जब किसी व्यक्ति के पद या स्थान या उसकी प्रस्थिति को व्यक्ति सामान्य रूप से स्वीकार करते हैं, तो उसे सामान्य प्रस्थिति कहते हैं। सभा में बैठकर प्रोफेसर, अध्यापक, वकील आदि का पद सामान्य स्थिति के अंतर्गत शामिल किया जाता
2. विशिष्ट प्रस्थिति-जब किसी व्यक्ति के पद या स्थान को स्वीकार करने वाले व्यक्तियों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो तो उसे विशिष्ट प्रस्थिति का नाम दिया जाता है। माता-पिता का पद इस प्रकार की विशिष्ट स्थिति के अंतर्गत गिना जाता है।
In simple words: प्रस्थिति समाज में व्यक्ति के स्थान या पद को दर्शाती है। यह दो मुख्य प्रकार की होती है: प्रदत्त प्रस्थिति, जो जन्म से मिलती है (जैसे जाति), और अर्जित प्रस्थिति, जो योग्यता और परिश्रम से प्राप्त होती है (जैसे डॉक्टर)।
🎯 Exam Tip: प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति की अवधारणाओं को उदाहरणों के साथ समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सामाजिक गतिशीलता और स्तरीकरण के विश्लेषण में सहायक है।
प्रदत्त तथा अर्जित प्रस्थिति में अंतर
प्रदत्त प्रस्थिति व्यक्ति को बिना किसी प्रयास के जन्म से ही मिल जाती है। अर्जित प्रस्थिति व्यक्ति को अपने गुणों व योग्यता के अनुसार मिलती है तथा इसे प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को प्रयास करना पड़ता है। दोनों में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-1. प्रदत्त प्रस्थिति समाज की परंपराओं द्वारा प्राप्त होती है, जबकि अर्जित प्रस्थिति व्यक्ति के प्रयास द्वारा प्राप्त होती है।
2. प्रदत्त प्रस्थिति व्यक्ति को स्वतः प्राप्त हो जाती है, किन्तु अर्जित प्रस्थिति के लिए व्यक्ति को प्रयास करना पड़ता है।
3. प्रदत्त प्रस्थिति के बदलने पर व्यक्ति के सामाजिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जबकि अर्जित प्रस्थिति के गिरने से व्यक्ति का समाज में अपमान हो सकता है।
4. प्रदत्त प्रस्थिति जाति या जन्म के आधार पर मिलती है जिसको बदला नहीं जा सकता है, किंतु अर्जित प्रस्थिति परिवर्तनशील हैं। एक व्यक्ति प्रयास करके कुछ-का-कुछ बन सकता है।
5. प्रदत्त प्रस्थिति परंपराओं पर आधारित होने के कारण अनिश्चित होती हैं, परंतु अर्जित प्रस्थिति पूर्ण रूप से निश्चित होती है।
6. प्रदत्त प्रस्थिति आयु, लिंग या जाति के आधार पर निर्धारित होती है, जबकि अर्जित प्रस्थिति का आधार शिक्षा व संपत्ति है।
Question 6. सामाजिक स्तरीकरण के आधारों एवं स्वरूपों का वर्णन कीजिए ।
Answer:
सामाजिक स्तरीकरण के आधार
समाज का विभाजन विभिन्न वर्गों व जातियों में निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-1. आयु-समाज में आयु को आधार मानकर मान-सम्मान की बात निर्धारित की जाती है। बड़ी आयु के व्यक्तियों को समाज में अनुभवी माना जाता है और उनको आदर दिया जाता है। ग्रामीण समुदायों में वयोवृद्ध व्यक्तियों का विशेष सम्मान होता है।
2. लिंग-लिंग के आधार पर समाज का वर्गीकरण स्त्री और पुरुष के बीच किया जाता है। लिंगीय आधार पर स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कम शक्तिशाली माना जाता है। अतएव उसको पुरुष के समान सभी अधिकार प्रदान नहीं किए जाते हैं। स्त्री को विशेषकर घर की लज्जा माना जाता है और उसका कार्य-क्षेत्र घर पर ही माना जाता है जबकि पुरुष का कार्य घर से बाहर होता है।
3. जन्म-जन्म के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया चलती है। ऊँचे कुल में जन्म लेने वाले व्यक्ति की स्थिति समाज में उच्च और निम्न कुल में जन्म लेने वाले व्यक्ति की स्थिति समाज में निम्न होती है। इस प्रकार उच्च तथा निम्न स्थिति का निर्धारण जन्म के आधार पर भी होता है।
4. धन-सामाजिक स्तरीकरण का आधार धन भी है। जिन लोगों के पास अधिक धन है वे धनिक वर्ग के तथा जिनके पास कुछ धन है वे मध्यम वर्ग के और जिनके पास धनाभाव है व निर्धन वर्ग के कहलाते हैं। समाज में पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग के विभाजन का आधार भी संपत्ति या धन ही है।
5. बौद्धिक योग्यता तथा कार्यक्षमता-समाज में विभिन्न वर्ग योग्यता तथा कार्यक्षमता के आधार पर भी निर्मित होते हैं। कुशाग्र बुद्धि तथा परिश्रमशील व्यक्ति शिक्षित वर्ग में सम्मिलित होते हैं। और उनका समाज में सम्मान होता है। जो व्यक्ति कुशाग्रबुद्धि और परिश्रमशील नहीं हैं वे अशिक्षित वर्ग तथा निर्धन वर्ग या आलसी वर्ग में सम्मिलित किए जाते हैं।
6. जाति तथा वर्ग-जाति तथा वर्ग सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधार हैं। व्यक्ति जन्म से जाति की सदस्यता ग्रहण कर लेता है। वर्ग की सदस्यता यद्यपि योग्यता पर आधारित है फिर भी विभिन्न वर्गों में प्रतिष्ठा धन-दौलत तथा सत्ता की दृष्टि से अंतर पाया जाता है।
7. राजनीतिक सत्ता-सत्ता भी सामाजिक स्तरीकरण का ही एक आधार है क्योंकि सभी व्यक्तियों पास एक समान सत्ता नहीं होती। सत्ता सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाती है तथा सामाजिक-आर्थिक स्तर ऊँचा करने में सहायक है।
सामाजिक स्तरीकरण के स्वरूप
सामाजिक स्तरीकरण का एक रूप नहीं है अपितु यह अनेक रूपों में संसार में विद्यमान है। इसको निम्नलिखित श्रेणियों अथवा स्वरूपों में विभाजित किया जाता है-1. जातीय स्तरीकरण-जाति एक बन्द वर्ग है और इसकी सदस्यता जन्म पर आधारित है। जाति में ऊँच-नीच की भावना पाई जाती है। जो व्यक्ति उच्च जाति का होता है उसकी सामाजिक स्थिति ऊँची होती है। जिन व्यक्तियों की जाति निम्न होती है उसकी स्थिति समाज में नीची होती है। जातिगत स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
Ο योग्यता व धन का महत्त्व-जाति के सदस्यों में जो भी व्यक्ति कुशल, योग्य व धनी होता है, उसकी स्थिति उसी जाति के सदस्यों में सबसे उच्च होती है। उस जाति के सभी व्यक्ति उसका आदर करते हैं।
Ο जन्म का महत्त्व-जातिगत स्तरीकरण में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति जन्म के आधार पर निर्धारित की जाती है अर्थात् जो व्यक्ति जिस जाति के परिवार में जन्म लेता है उसे स्वाभाविक रूप से उसी जाति की सदस्यता प्राप्त हो जाती है। उसमें योग्यता को महत्त्व नहीं दिया जाता है।
• ऊँच-नीच की भावना-जातिगत स्तरीकरण ऊँच-नीच की भावना पर आधारित होता है। यदि व्यक्ति का जन्म ऊँची जाति में हुआ हो तो उच्च वर्ग को और यदि निम्न जाति में हुआ हो तो वह निम्न वर्ग का सदस्य कहलाता है।
Ο स्थायित्व-जातिगत स्तरीकरण स्थायी तथा अपरिवर्तनशील होता है। जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है वह जन्म भर उसी जाति का सदस्य बना रहता है।
2. वर्गगत स्तरीकरण-सामाजिक स्तरीकरण का एक दूसरा रूप वर्गगत स्तरीकरण भी है। वर्ग व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिनकी आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी है तथा जो अपने समूह के प्रति सचेत होते हैं। इस प्रकार के स्तरीकरण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
Ο धन का महत्त्व-वर्गगत सामाजिक स्तरीकरण में समाज का वर्गीकरण धन, योग्यता | एवं व्यक्ति की कार्यक्षमता के आधार पर किया जाता है।
Ο शिक्षा का महत्त्व-जो व्यक्ति अधिक विद्वान होते हैं, वे शिक्षित वर्ग के और धनी व्यक्ति धनिक अथवा पूँजीपति वर्ग के कहलाते हैं, जबकि निर्धन व्यक्ति निर्धन या श्रमिक वर्ग के कहलाते हैं। वर्गगत सामाजिक स्तरीकरण में स्तरीकरण परिवर्तशील होता है। एक व्यक्ति, जो निर्धन वर्ग का है, परिश्रम करके धनिक वर्ग का हो सकता है। और धनिक वर्ग का व्यक्ति धन का दुरुपयोग करने के कारण निर्धन वर्ग का हो सकता है।
• सामाजिक मूल्यों की भिन्नता-वर्गगत सामाजिक स्तरीकरण में सामाजिक वर्ग के एक-दूसरे से सामाजिक मूल्य भिन्न हो सकते हैं, भले ही किसी सीमा तक उनके सांस्कृतिक प्रतिमान समान हों।
3. दास प्रथा पर आधारित स्तरीकरण-दास प्रथा में ऊँच-नीच की सबसे अधिक असमानता पाई जाती है। हॉबहाउस (Hobhouse) के शब्दों में, “दास वह व्यक्ति है जिसे कानून और परंपरा दोनों दूसरे की संपत्ति मानते हैं। इस प्रकार दास एक प्रकार से व्यक्तिगत संपत्ति है। जिसे खरीदा एवं बेचा जा सकता है। दास पर मालिक का आधिपत्य माना जाता है। दास की स्थिति सभी व्यक्तियों में निम्नतम होती है तथा इसका प्रमुख आधार आर्थिक रहा है।
4. संपदाओं पर आधारित स्तरीकरण-संपदा भी सामाजिक स्तरीकरण का एक स्वरूप है। मध्य युग में यूरोप में यह प्रणाली प्रचलित रही है तथा यह प्रथा एवं कानून द्वारा मान्य थी। बॉटोमोर (Bottomore) के अनुसार संपदाओं की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं-
• संपदा में स्पष्ट श्रम विभाजन था,
• प्रत्येक संपदा की एक स्पष्ट एवं परिभाषित प्रस्थिति थी तथा
• संपदा रजनीतिक समूह थे। प्रमुख रूप से तीन प्रकार के वर्गों का प्रचलन अधिक रहा है-
1. पादरी वर्ग,
2. सरदार तथा
3. साधारण जनता । तीनों में ऊँच-नीच का एक निश्चित क्रम पाया जाता है तथा तीनों की अपनी विशिष्ट जीवन-शैली रही है।
In simple words: सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यक्तियों और समूहों का उनकी आयु, लिंग, जन्म, धन, योग्यता और राजनीतिक सत्ता के आधार पर ऊँच-नीच क्रम में विभाजन है। इसके मुख्य स्वरूप जाति, वर्ग, दास प्रथा और संपदाओं पर आधारित स्तरीकरण हैं, जो सामाजिक असमानता को दर्शाते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न आधारों और स्वरूपों को उनके उदाहरणों के साथ समझना, साथ ही भारतीय समाज में जाति और वर्ग के महत्व को जानना परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
Question 7. सामाजिक स्तरीकरण की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा उसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए ।
या
सामाजिक स्तरीकरण से आप क्या समझते हैं? समाज में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
सामाजिक स्तरीकरण से क्या तात्पर्य है? समाज के लिए इसकी क्या आवश्यकता है? स्पष्ट कीजिए ।
Answer: संसार में कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसमें सभी व्यक्ति एक समान हो अर्थात् ऊँच-नीच की भावना प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पाई जाती है। धन-दौलत, प्रतिष्ठा तथा सत्ता का वितरण प्रत्येक समाज में असमान रूप में पाया जाता है तथा इसी असमान वितरण के लिए समाजशास्त्र में सामाजिक स्तरीकरण' शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि विभिन्न श्रेणियों में ऊँच-नीच का आभास होता है तो वह स्तरीकरण है।
सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ तथा परिभाषाएँ
समाज की प्रमुख विशेषता यह है कि उसमें समानता तथा असमानता दोनों पायी जाती हैं। आयु, लिंग, योग्यता, धन आदि के आधार पर यह सामाजिक असमानता देखने को मिलती है। इसी असमानता के कारण समाज में विभिन्न वर्ग देखने को मिलते हैं और ऊँच-नीच की भावना पाई जाती है। इसी ऊँच-नीच की भावना के आधार पर समाज को जो वर्गीकरण किया जाता है उसी को सामाजिक स्तरीकरण के नाम से पुकारा जाता है। यह किसी भी सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों को ऊँचे और नीचे पदानुक्रम में विभाजन है। इस सामाजिक स्तरीकरण या विभाजन में जाति, वर्ग, वर्ण आदि को सम्मिलित किया जाता है। विभिन्न विद्वानों ने सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा भिन्न आधारों पर की है। प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ इस प्रकार हैं- सदरलैंड, एवं वुडवर्ड (Sutherland and Woodward) के अनुसार-"स्तरीकरण केवल अंतःक्रियाओं अथवा विभेदीकरण की एक प्रक्रिया है, जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे व्यक्तियों की तुलना में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।" जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार-"सामाजिक स्तरीकरण का अभिप्राय समाज को कुछ ऐसी स्थायी श्रेणियों एवं समूहों में विभाजित करना है जिसके अंतर्गत सभी समूहों व वर्ग उच्चता व अधीनता के संबंधों द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।" मूरे (Muray) के अनुसार-"स्तरीकरण समाज का वह क्रमबद्ध विभाजन है जिससे सपूंर्ण समाज को उच्च अथवा निम्न सामाजिक इकाइयों में विभाजित कर दिया गया हो।" ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-"स्तरीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिससे व्यक्ति या समूह एक स्थिर स्थिति की क्रमबद्धता में बाँटे जाते हैं।" किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार-"जब हम जातियों, वर्गों और सामाजिक संस्तरण के विषय में सोचते हैं तब हमारे मन में वे समूह होते हैं जो कि सामाजिक व्यवस्था में भिन्न-भिन्न स्थान रखते हैं और भिन्न-भिन्न मात्रा में आदर का उपयोग करते हैं।" उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सामाजिक स्तरीकरण समाज का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन है जिनमें ऊँच-नीच की भावनाएँ पाई जाती हैं। सामाजिक स्तरीकरण विभेदीकरण की एक विधि है। समाज के विभिन्न स्तरों या श्रेणियों में पाई जाने वाली असमानता व ऊँच-नीच ही सामाजिक स्तरीकरण कही जाती है।
सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ
सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-1. पद सोपान क्रम-सामाजिक स्तरीकरण की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें ऊँच-नीच की भावना पायी जाती है। सबसे ऊँचा वह जाति या वर्ग होता है जिसका समाज में अधिक सम्मान हो, अधिक प्रतिष्ठा हो और आर्थिक रूप से संपन्न हो। उसके नीचे उससे कम सम्मान रखने वाली जाति या वर्ग और निम्न स्तर पर सबसे कम सम्मान वाली जाति का नाम रहता है। अर्थात् सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक संपन्नता के आधार पर स्तरीकरण होता है। जिस प्रकार एक सीढ़ी के डंडों में क्रम होता है उसी प्रकार का सोपान (सीढ़ी) क्रम सामाजिक स्तरीकरण में पाया जाता है।
2. निश्चित स्थिति व कार्य-सामाजिक स्तरीकरण में प्रत्येक जाति व वर्ग या वर्ण का कार्य पूर्व निश्चित होता है और उसी के अनुसार समाज में उसकी स्थिति निर्धारित होती है। भारतीय समाज में ब्राह्मण वर्ण का कार्य पवित्र समझा जाता है अतः इसी के अनुरूप उसकी सामाजिक स्थिति भी ऊँची ही है।
3. वर्गीय योग्यता परीक्षण सामाजिक स्तरीकरण में वर्ग व्यवस्था पायी जाती हैं। वर्ग में परिवर्तनशील का गुण होता है। परिश्रम करके एक व्यक्ति निम्न वर्ग से उच्च वर्ग में पहुँच जाता है किंतु उच्च वर्ग के व्यक्ति जब किसी निम्न वर्ग के व्यक्ति को अपने में मिलाते हैं तो उससे पहले उसका परीक्षण करके यह देख लेते हैं कि व्यक्ति उच्च वर्ग के योग्य है या नहीं। इसी प्रकार योग्यता परीक्षण के उपरांत ही वे किसी अन्य वर्ग के व्यक्ति को अपने उच्च वर्ग का सदस्य मानते हैं।
4. कार्य की प्रधानता-सामाजिक स्तरीकरण में कार्य को प्रधानता दी जाती है। कार्य के अनुसार ही व्यक्ति या उसके वर्ग को सामाजिक सम्मान मिलता है। ऊँचे कार्य करने वाले व्यक्ति को ऊँचा पद और नीचा कार्य करने वाले व्यक्ति को नीचा पद मिलता है। भारतीय समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्गों की स्थिति उनके कर्म के अनुसार ही थी।
5. वर्गीय अंतःनिर्भरता-सामाजिक स्तरीकरण की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसके अनुसार समाज वर्गों में विभाजित होता है, उनमें पारस्परिक निर्भरता पायी जाती है। उदाहरणार्थ-पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
6. सामाजिक मूल्यों की पृथक्कता-सामाजिक स्तरीकरण में पाए जाने वाले विभिन्न सामाजिक वर्गों में विभिन्न रीति-रिवाज व विभिन्न सामाजिक मूल्य देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार सामाजिक मूल्यों में पृथक्कता सामाजिक स्तरीकरण की विशेषता है।
7. सार्वभौमिक प्रक्रिया-सामाजिक स्तरीकरण में समाज का विभाजन वर्गों, जातियों, समूहों व वर्गों में होता है। इस प्रकार को सामाजिक वर्गीकरण हर समय पाया जाता रहेगा। यद्यपि कार्ल माक्र्स ने वर्गविहीन समाज (अस्तरीकृत) की कल्पना की है, परंतु यथार्थ रूप से यह संभव नहीं लगता। इस प्रकार सामाजिक स्तरीकरण एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से हर समाज में स्वतः चलती रहती है, इससे कोई इन्कार नहीं करता। उपर्युक्त विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सामाजिक स्तरीकरण ऊँच-नीच की एक प्रक्रिया है जो क्रि प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पाई जाती है। सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख उद्देश्य समाज में कार्यों का विभाजन करके विभिन्न व्यक्तियों को इन कार्यों को करने की प्रेरणा देना है ताकि सामाजिक एकता को बनाए रखा जा सके। सभी को उनकी योग्यतानुसार कार्यों का वितरण समाज में निरंतरता बनाए रखने में सहायता देता है।
समाज में सामाजिक स्तरीकरण की आवश्यकता अथवा महत्त्व
सामाजिक स्तरीकरण सार्वभौमिक है अर्थात् ऊँच-नीच की यह व्यवस्था प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पाई जाती है। इसका अर्थ यह है कि स्तरीकरण समाज की किसी-न-किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। समाज में सभी पद एक समान नहीं होते। कुछ पद समाज के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं और कुछ कम । महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुँचने के लिए व्यक्तियों को कठिन परिश्रम करना पड़ता हैं और इसीलिए समाज इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को अधिक सम्मान की दृष्टि से देखता है। डेविस एवं मूर (Davis and Moore) का विचार है, “सामाजिक असमानता अचेतन रूप से विकसित एक ढंग है जिसके द्वारा समाज अपने सदस्यों को विश्वास दिलाता है कि आधुनिक महत्त्वपूर्ण पद पर अधिक योग्य व्यक्ति ही काम कर रहे हैं।” यदि समाज में सामाजिक स्तरीकरण न हो तो व्यक्ति में आगे बढ़ने एवं विशेष पद पाने की इच्छा तथा अपने पद के अनुकुल भूमिका निभाने की इच्छा समाप्त हो जाएगी। जब उसे पता होगा कि योग्य और अयोग्य व्यक्ति में समाज कोई भेद नहीं कर रहा है तो वह कठिन परिश्रम करना छोड़ देगा और इस प्रकार समाज का विकास रुक जाएगा। अतः समाज की निरंतरता एवं स्थायित्व के लिए व्यक्तियों को उच्च पदों पर आसीन होने के लिए प्रेरणा देना अनिवार्य है और इसके लिए पदों में संस्तरण एवं सामाजिक ऊँच-नीच होना अनिवार्य है। सामाजिक स्तरीकरण के महत्त्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-1. श्रम-विभाजन-सामाजिक स्तरीकरण में समाज का वर्गीकरण चाहे जिस आधार पर किया जाए उसमें श्रम-विभाजन के सिद्धांत को विशेष महत्त्व दिया जाता है। उदाहरण के लिए प्रत्येक जाति के व्यवसाय लगभग निश्चित होते हैं। इससे प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य को, चाहे वह ऊँचा है अथवा नीचा सुचारू रूप से करता रहता है।
2. संगठित समाज-सामाजिक स्तरीकरण सामाजिक संगठन बनाए रखने में सहायक है। सामाजिक वर्गों के कारण समाज में संगठन की समस्या उत्पन्न नहीं होती । जाति तथा वर्ग | अपने-अपने सदस्यों को संगठित बनाए रखते हैं।
3. स्थिति व कार्यों की निश्चितता-सामाजिक स्तरीकरण समाज का एक ऐसा विभाजन है। जिसमें व्यक्ति की स्थिति व कार्य निश्चित होते हैं। इसलिए सामाजिक संगठन पूर्ण रूप से व्यवस्थित रहता है।
4. व्यक्तियों में संतोष-सामाजिक स्तरीकरण समाज के विभिन्न व्यक्तियों में एक संतोष की भावना उत्पन्न करता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर सामाजिक स्थिति अथवा सामाजिक सम्मान प्राप्त हो जाता है।
5. पारस्परिक निर्भरता-सामाजिक स्तरीकरण के कारण समाज के विभिन्न वर्गों में पारस्परिक निर्भरता बनी रहती है। एक वर्ग, दूसरे व्यक्ति या जाति पर किसी-न-किसी रूप में निर्भर होता है।
6. सामाजिक प्रगति-समाज में समानता और असमानता, संघर्ष व सहयोग सभी पाए जाते हैं। समाज की इसे विशेषता को बनाए रखने के लिए सामाजिक स्तरीकरण के आधार पर सामाजिक वर्गों का होना आवश्यक है।
In simple words: सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यक्तियों के बीच ऊँच-नीच के क्रम में असमान वितरण को दर्शाता है, जो आयु, लिंग, धन, योग्यता जैसे विभिन्न आधारों पर आधारित होता है। यह समाज में व्यवस्था बनाए रखने, व्यक्तियों को प्रेरित करने और श्रम-विभाजन में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा, इसकी विशेषताओं और सामाजिक महत्व को विस्तार से समझने से आपको समाज के कार्यप्रणाली और असमानताओं का विश्लेषण करने में मदद मिलेगी।
Question 8. वर्ग किसे कहते हैं? वर्ग की विशेषताओं का वर्णन कीजिए तथा वर्ग व जाति में अंतर बताइए ।
या
वर्ग की परिभाषा दीजिए तथा जाति से इसका अंतर स्पष्ट कीजिए ।
Answer: जाति तथा वर्ग सामाजिक स्तरीकरण के दो प्रमुख स्वरूप माने जाते हैं। जाति से अभिप्राय एक. ऐसे समूह से है जिसकी सदस्यता व्यक्ति को जन्म से मिलती है तथा जीवनपर्यंत वह इस सदस्यता को नहीं बदल सकता। वर्ग एक खुली व्यवस्था है जिसकी सदस्यता व्यक्ति को उसकी योग्यता व गुणों के आधार पर मिलती है तथा वह इसे परिवर्तित कर सकता है। अमेरिका तथा पश्चिमी समाजों में सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख रूप वर्गीय स्तरीकरण ही है। भारत में जैसे-जैसे आर्थिक आधार पर सामाजिक स्तरों का निर्माण हो रहा है तथा चेतना में वृद्धि होती जा रही है, वैसे-वैसे वर्ग व्यवस्था विकसित होने लगी है।
सामाजिक वर्ग का अर्थ एवं परिभाषाएँ
जब एक ही सामाजिक स्थिति के व्यक्ति समान संस्कृति के बीच रहते हैं तो वे एक सामाजिक वर्ग का निमय करते हैं। इस प्रकार, सामाजिक वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिनकी सामाजिक स्थिति लगभग समान हो और जो एक-सी ही सामाजिक दशाओं में रहते हों। एक वर्ग के सदस्य एक जैसी सुविधाओं का उपभोग करते हैं। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सामाजिक वर्ग का निर्धारण व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर होता है। एक-सी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के व्यक्तियों को एक वर्ग विशेष का नाम दे दिया जाता है; जैसे-पूँजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग आदि । प्रमुख विद्वानों ने सामाजिक वर्ग की परिभाषाएँ निम्न प्रकार से दी हैं- मैकाइवर एवं पेज (MacIver and Page) के अनुसार-“एक सामाजिक वर्ग एक समुदाय का कोई भी भाग है जो सामाजिक स्थिति के आधार पर अन्य लोगों से भिन्न हैं।” लेपियर (LaPiere) के अनुसार-“एक सामाजिक वर्ग सुस्पष्ट सांस्कृतिक समूह है जिसको संपूर्ण जनसंख्या में एक विशेष स्थान अथवा पद प्रदान किया जाता है।” ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“सामाजिक वर्ग व्यक्तियों का एक ऐसा योग है जिसका किसी समाज में निश्चित रूप से एक समान स्तर होता है।”In simple words: सामाजिक वर्ग व्यक्तियों का एक समूह है जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति समान होती है, जो समान जीवन-शैली और सुविधाओं का उपभोग करते हैं। यह समूह जन्म के बजाय योग्यता और धन पर आधारित होता है और खुला होता है, जिससे सदस्यता बदली जा सकती है।
🎯 Exam Tip: वर्ग की परिभाषाओं और विशेषताओं को समझना, साथ ही इसका जाति से अंतर जानना, सामाजिक स्तरीकरण के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
क्यूबर (Cuber) के अनुसार-"एक सामाजिक वर्ग अथवा सामाजिक स्तर जनसंख्या का एक बड़ा भाग अथवा श्रेणी है जिसमें सदस्यों का एक ही पद अथवा श्रेणी होती है।" उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सामाजिक वर्ग लगभग समान स्थिति वाले व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसमें सदस्य समूह के प्रति जागरूक हैं। विभिन्न वर्गों की सामाजिक स्थिति भिन्न होती है।
सामाजिक वर्ग की प्रमुख विशेषताएँ
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर एक सामाजिक वर्ग में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-1. विभिन्न आधार-वर्ग के आधार धन, शिक्षा, आयु अथवा लिंग हो सकते हैं। इस आधार पर । समाज में पूँजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग, शिक्षित वर्ग आदि पाए जाते हैं। परंतु कार्ल मार्क्स ने वर्ग * का आधार केवल आर्थिक अर्थात् उत्पादन के साधन माना है तथा दो वर्गों-पूंजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग-को समाज में महत्त्वपूर्ण बताया है।
2. ऊँच-नीच की भावना-सामाजिक वर्गों के बीच ऊँच-नीच की भावना अथवा संस्तरण पाया जाता है। पूंजीपति वर्ग के व्यक्ति अपने को श्रमिक वर्ग के व्यक्तियों की तुलना में समाज में उच्च स्थिति को समझते हैं।
3. वर्ग चेतना-वर्ग के नाम पर व्यक्तियों में वर्ग चेतना पाई जाती है और एक वर्ग के व्यक्ति एक साथ मिलकर सामूहिक उत्सवों में भाग लेते हैं। माक्र्स ने वर्ग चेतना को वर्ग की प्रमुख विशेषता माना है।
4. मुक्त संगठन-वर्ग एक खुला संगठन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता, कार्यक्षमता और परिश्रम के द्वारा आ-जा सकता है। एक निर्धन व्यक्ति, धनवान व धनवान व्यक्ति निर्धन हो। सकता है।
5. परिवर्तनशीलता-वर्ग की प्रकृति परिवर्तनशील है, क्योंकि उसके सदस्य अपनी इच्छा व योगदान के कारण बदलते रहते हैं।
6. अन्तर्वर्गीय विवाह-प्रायः एक वर्ग के व्यक्ति ही आपस में विवाह संबंध स्थापित करते हैं। उदाहरण के लिए-धनिक वर्ग अपने वैवाहिक संबंध धनिक वर्ग में ही स्थापित करना चाहता है। किंतु यह अनिवार्य नियमे या प्रतिबंध नहीं है, आजकल इसमें काफी शिथिलता आ गई है।
7. वर्गीय संगठन की भावना-एक वर्ग के व्यक्तियों में संगठन की भावना होती है। वे विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए विभिन्न समितियों का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरणार्थ-श्रमिक वर्ग में श्रमिकों के हितों की रक्षा हेतु अनेक संगठन पाए जाते हैं।
8. विशिष्ट संस्कृति-प्रत्येक वर्ग की अपनी एक पृथक् संस्कृति होती हैं। उसके बोलने-चालने, उठने-बैठने आदि के ढंग दूसरे वर्ग से भिन्न होते हैं।
9. उपवर्गों का अस्तित्व-एक वर्ग के सभी व्यक्ति समान नहीं होते हैं, उनमें भी उपवर्ग होते हैं। जैसे-धनिक वर्ग में कुछ लखपति व कुछ करोड़पति होते हैं।
10. समाज द्वारा मान्यता-प्रत्येक सामाजिक वर्ग की स्थिति समाज द्वारा मान्य होती है तथा यह अन्य वर्गों से भिन्न होती है। वर्ग के सदस्य भी वह भली-भाँति जानते हैं कि अन्य वर्गों की तुलना में उनकी स्थिति क्या है।
जाति एवं वर्ग में अंतर
जाति एवं वर्ग में निम्नलिखित अंतर पाए जाते हैं-1. स्थायित्व में अंतर-वर्ग में सामाजिक बंधन स्थायी व स्थिर नहीं रहते हैं। कोई भी सदस्य अपनी योग्यता से वर्ग की सदस्यता परिवर्तित कर सकता है। जाति में सामाजिक बंधन अपेक्षाकृत स्थायी व स्थिर हैं। जाति की सदस्यता किसी भी आधार पर बदली नहीं जा सकती।
2. सामाजिक दूरी में अंतर-वर्ग में अपेक्षाकृत सामाजिक दूरी कम पाई जाती है। कम दूरी के कारण ही विभिन्न वर्गों में खान-पान इत्यादि पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं पाए जाते हैं। विभिन्न जातियों में, विशेष रूप से उच्च एवं निम्न जातियों में अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक दूरी पाई जाती है। इस सामाजिक दूरी को बनाए रखने हेतु प्रत्येक जाति अपने सदस्यों पर अन्य जातियों के सदस्यों के साथ खान-पान, रहन-सहन इत्यादि के प्रतिबंध लगाती है।
3. स्वतंत्रता की मात्रा में अंतर-वर्ग में व्यक्ति को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता रहती है। इसलिए वर्ग को 'खुली व्यवस्था' भी कहा जाता है। जाति व्यवस्था में व्यक्ति पर खान-पान, विवाह आदि से संबंधित अपेक्षाकृत कहीं अधिक बंधन होते हैं। जाति इन्हीं बंधनों के कारण बंद व्यवस्था' कही जाती है।
4. प्रकृति में अंतर-वर्ग में मुक्त संस्तरण होता है अर्थात् व्यक्ति वर्ग परिवर्तन कर सकता है। जाति में बाद में संस्तरण होता है अर्थात् जाति का परिवर्तन नहीं किया जाता है।
5. सदस्यता में अंतर-वर्ग की सदस्यता व्यक्तिगत योग्यता, जीवन के स्तर एवं हैसियत आदि पर आधारित होती है। ज्ञाति की सदस्यता जन्म से ही निश्चित हो जाती है।
6. चेतना में अंतर-वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतना रहती है। जाति के सदस्यों में यद्यपि अपनी जाति के प्रति चेतना तो पाई जाती है परंतु किसी प्रतीक के प्रति चेतना की आवश्यकता नहीं होती ।
7. राजनीतिक अंतर-वर्ग की व्यवस्था प्रजातंत्र में अपेक्षाकृत अधिक बाधक नहीं है। जाति व्यवस्था प्रजातंत्र में अपेक्षाकृत बाधक है। जाति असमानता पर आधरित है, जबकि प्रजातंत्र समानता के मूल्यों पर आधरित व्यवस्था है।
8. व्यावसायिक आधार पर अंतर-वर्गों में परंपरागत व्यवसाय पर जोर नहीं दिया जाता और न ही विभिन्न वर्ग परंपरागत व्यवसायों से संबंधित है। इसके विपरीत, जाति में परंपरागत व्यवसाय पर विशेष जोर दिया जाता है। परंपरागत रूप से प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था। यह व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता था और इसे बदलना सरल नहीं था।
9. संस्तरण में अंतर-वर्ग में मुक्त संस्तरण होता है अर्थात् व्यक्ति अपना वर्ग परिवर्तित कर सकता है। इसके विपरीत, जाति एक बंद संस्तरण है जिसमें किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, जीवन भर उसे उसी जाति का सदस्य बनकर रहना पड़ता है।
In simple words: वर्ग व्यक्तियों का एक समूह है जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति समान होती है, जो समान जीवन-शैली और सुविधाओं का उपभोग करते हैं। यह समूह जन्म के बजाय योग्यता और धन पर आधारित होता है और खुला होता है, जिससे सदस्यता बदली जा सकती है।
🎯 Exam Tip: वर्ग की परिभाषाओं और विशेषताओं को समझना, साथ ही इसका जाति से अंतर जानना, सामाजिक स्तरीकरण के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि वर्ग पश्चिमी समाज में पाई जाने वाली ऊँच-नीच की व्यवस्था है जिसमें अपेक्षाकृत खुलापन पाया जाता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि जाति एक बंद व्यवस्था है, जबकि वर्ग एक खुली व्यवस्था है। जाति एक बंद व्यवस्था इसलिए है क्योंकि इसकी सदस्यता बदली नहीं जा सकती । वर्ग इसलिए खुली व्यवस्था है क्योंकि इसी सदस्यता बदली जा सकती है। यदि वर्ग में भी जाति जैसे बंधन लग जाएँ तो यह एक जाति बन जाएगा। इसलिए मजूमदार का यह कहना कि “जाति एक बंद वर्ग है” पूर्णतया सही है।
Question 9. जाति से आप क्या समझते हैं? जाति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
क्या आपकी राय में, भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है? यदि हाँ, तो बताइए कैसे?
अथवा
सामाजिक स्तरीकरण के एक प्रकार के रूप में जाति की विवेचना कीजिए ।
Answer: भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण की एक अनुपम व्यवस्था पाई जाती है जिसे जाति प्रथा कहते हैं। जाति की सदस्यता व्यक्ति को जन्म से ही मिल जाती है तथा वह संपूर्ण जीवन उसी का सदस्य बना रहता है अर्थात् जाति की सदस्यता को किसी भी कार्य से बदला नहीं जा सकता। इसलिए इसे सामाजिक स्तरीकरण की बंद व्यवस्था भी कहा जाता है। जातियों की सामाजिक स्थिति में काफी अंतर पाया जाता है अर्थात् इसमें संस्तरण पाया जाता है। जाति का अर्थ एवं परिभाषाएँ समाज में व्यक्ति की स्थिति उसके जन्म लेने के स्थान व समूह से निर्धारित होती है। जाति भी व्यक्तियों का एक समूह है। जाति कुछ विशिष्ट सांस्कृतिक प्रतिमानों को मानने वाला वह समूह है जिसके सदस्यों में रक्त शुद्धि होने का विश्वास किया जाता है, जिसकी सदस्यता व्यक्ति जन्म से ही प्राप्त कर लेता है। और जन्म भर उस सदस्यता का त्याग नहीं करता है। इस प्रकार का समूह सामान्य संस्कृति का अनुसरण करता है। इस समूह के सदस्य अन्य किसी समूह के सदस्य नहीं होते हैं और न कोई बाहर के समूह के सदस्य इस समूह के सदस्य हो सकते हैं, इस प्रकार जाति एक बंद वर्ग है।
In simple words: जाति एक बंद सामाजिक समूह है जिसकी सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है और जीवनभर अपरिवर्तनीय रहती है। इसमें ऊँच-नीच का एक निश्चित क्रम होता है, और यह सामाजिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक प्रतिबंधों के साथ एक विशिष्ट जीवन-शैली को बनाए रखती है।
🎯 Exam Tip: जाति की प्रमुख विशेषताओं और भारतीय समाज में इसकी भूमिका को समझना सामाजिक स्तरीकरण के अध्ययन का एक मूलभूत पहलू है।
Question 9. जाति से आप क्या समझते हैं? जाति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
क्या आपकी राय में, भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है? यदि हाँ, तो बताइए कैसे?
अथवा
सामाजिक स्तरीकरण के एक प्रकार के रूप में जाति की विवेचना कीजिए ।
Answer: उत्तर भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण की एक अनुपम व्यवस्था पाई जाती है जिसे जाति प्रथा कहते हैं। जाति की सदस्यता व्यक्ति को जन्म से ही मिल जाती है तथा वह संपूर्ण जीवन उसी का सदस्य बना रहता है अर्थात् जाति की सदस्यता को किसी भी कार्य से बदला नहीं जा सकता। इसलिए इसे सामाजिक स्तरीकरण की बंद व्यवस्था भी कहा जाता है। जातियों की सामाजिक स्थिति में काफी अंतर पाया जाता है अर्थात् इसमें संस्तरण पाया जाता है। जाति का अर्थ एवं परिभाषाएँ समाज में व्यक्ति की स्थिति उसके जन्म लेने के स्थान व समूह से निर्धारित होती है। जाति भी व्यक्तियों का एक समूह है। जाति कुछ विशिष्ट सांस्कृतिक प्रतिमानों को मानने वाला वह समूह है जिसके सदस्यों में रक्त शुद्धि होने का विश्वास किया जाता है, जिसकी सदस्यता व्यक्ति जन्म से ही प्राप्त कर लेता है। और जन्म भर उस सदस्यता का त्याग नहीं करता है। इस प्रकार का समूह सामान्य संस्कृति का अनुसरण करता है। इस समूह के सदस्य अन्य किसी समूह के सदस्य नहीं होते हैं और न कोई बाहर के समूह के सदस्य इस समूह के सदस्य हो सकते हैं, इस प्रकार जाति एक बंद वर्ग है। विद्वानों ने जाति की परिभाषा भिन्न-भिन्न आधारों पर की है। प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रस्तुत परिभाषाएँ इस प्रकार हैं- **चार्ल्स कूले (Charles Cooley) के अनुसार-** “जब एक वर्ग आनुवंशिक होता है तो हम उसे जाति कहते हैं।” **मजूमदार (Majumdar) के अनुसार-** “जाति एक बंद वर्ग है।” **हॉबल (Hoebel) के अनुसार-** “अन्तर्विवाह तथा आनुवंशिकता द्वारा थोपे गए पदों को जमा देना ही जाति व्यवस्था है।” **मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-** “जब सामाजिक पद पूर्णतः निश्चित हो, जो जन्म से ही मनुष्य के भाग्य को निश्चित कर दे, जीवनपर्यंत उसके परिवर्तन की कोई आशा न हो, तब वह जन वर्ग, जाति का रूप धारण कर लेते हैं।” **केतकर (Ketkar) के अनुसार-** “जाति की सदस्यता उन्हीं व्यक्तियों तक सीमित होती है जो उसी जाति में जन्म लेते हैं तथा एक कठोर सामाजिक नियम अपनी जाति के बाहर विवाह करने से रोकता है।” **दत्त (Dutta) के अनुसार-** “एक जाति के सदस्य जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकते हैं। अनेक जातियों में कुछ निश्चित व्यवसाय हैं। मनुष्य की जाति का निर्णय जन्म से होता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि जाति व्यक्तियों का एक अंतर्विवाही समूह है जिसका सामान्य नाम है, एक परंपरागत व्यवसाय है, जिसके सदस्य एक ही स्रोत से अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं तथा काफी सीमा तक सजातीयता का प्रदर्शन करते हैं।
जाति की प्रमुख विशेषताएँ
जाति सामाजिक स्तरीकरण की एक अनुपम व्यवस्था है जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- 1. **जन्म पर आधारित सदस्यता-** जाति की सर्वप्रथम प्रमुख विशेषता यह है कि इसकी सदस्यता के लिए व्यक्ति को किसी भी प्रकार का प्रार्थना-पत्र नहीं देना पड़ता है बल्कि व्यक्ति स्वतः ही जन्म से उसका सदस्य बन जाता है अर्थात् व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसी का सदस्य बन जाता है। 2. **पेशों की निश्चितता-** प्रत्येक जाति के पेशे व व्यवसाय पूर्व निश्चित होते हैं। वास्तव में, जाति का शाब्दिक अर्थ ही निश्चित व्यवसाय को धारण करने से लगाया गया है। प्रत्येक जाति का अपना एक निश्चित व्यवसाय होता है तथा इसकी के कारण विभिन्न जातियों में पारस्परिक निर्भरता पाई जाती रही है। 3. **खान-पान पर प्रतिबंध-** जाति व्यवस्था में खान-पान के प्रतिबंध होते हैं। उच्च जाति के सदस्य निम्न जाति के सदस्यों द्वारा पकाया हुआ या छुआ हुआ भोजन नहीं करते हैं। भारत में ब्राह्मण, शूद्रों के साथ खान-पान के संबंध नहीं रखते थे। 4. **ऊँच-नीच की भावना-** जाति व्यवस्था के अंतर्गत एक जाति दूसरी जातियों से ऊँची-नीची होती है। इसे ऊँच-नीच के कारण एक जाति के सदस्य दूसरी जाति के सदस्यों को छूना भी पसंद नहीं करते हैं। भारतीय समाज में अस्पृश्यता की भावना अधिक पाई जाती रही है। 5. **समान संस्कृति की मान्यता-** जाति के सदस्यों में समान संस्कृति पाई जाती है। जाति के सभी सदस्यों में समान प्रथाएँ, परंपराएँ तथा रूढ़ियाँ पाई जाती हैं। एक जाति के सभी रीति-रिवाज एक जैसे होते हैं। इसीलिए जाति के सदस्यों में एकता व समानता पाई जाती है। 6. **अनिवार्य सदस्यता-** जाति की सदस्यता व्यक्ति की इच्छा पर आधारित नहीं है। जन्म से ही व्यक्ति किसी-न-किसी जाति का सदस्य होता है। इस सदस्यता को वह जीवन भर बदल नहीं सकता है। इसलिए जाति की सदस्यता अनिवार्य तथा स्थायी होती है। 7. **निश्चित परंपराएँ-** प्रत्येक जाति के अपने रीति-रिवाज तथा उसकी अपनी परंपराएँ होती हैं। जाति के सदस्य सरकारी कानूनों से भी अधिक जातीय परंपराओं की ओर झुके होते हैं। वे सरकारी कानून का उल्लंघन कर सकते हैं तथा सरकार का विरोध कर सकते हैं, किंतु जातिगत परंपराओं का उल्लंघन करने का दुस्साहस नहीं कर सकते। 8. **अंतर्विवाहों समूह-** जाति के सदस्यों में विवाह संबंधी प्रतिबंध होते हैं। जाति के सदस्यों को अपनी जाति के अंदर विवाह करने पड़ते हैं। जाति के लड़कों और लड़कियों का विवाह जाति में ही होता है और वे जाति से बाहर के सदस्यों से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकते। इसलिए कहा जाता है कि जाति एक अंतर्विवाही समूह है। 9. **सदस्यों की निश्चित स्थिति-** जाति के सदस्यों को समाज में एक निश्चित पद या उसकी स्थिति होती है। समाज में जाति का जो सम्मान होगा, उसी के अनुरूप जाति के सदस्यों की स्थिति होगी। उदाहरण के लिए-परंपरा से ब्राह्मणों की स्थिति उच्च तथा शूद्र की स्थिति निम्न रही है। 10. **सदस्यों के निश्चित कार्य-** समाज में प्रत्येक जाति के सदस्य अपनी स्थिति के अनुसार कार्य भी करते हैं। उच्च वर्ग या जाति के सदस्य कोई ऐसा कार्य नहीं करते हैं जिनसे उनकी सामाजिक स्थिति में गिरावट आ जाए। इसी प्रकार निम्न जाति के सदस्य कोई उच्च कार्य नहीं कर सकते किंतु आधुनिक युग में ऐसा हो रहा है। 11. **सामाजिक संबंधों का अभाव-** एक जाति के सदस्य केवल अपनी जाति में खान-पान, विवाह आदि के संबंध स्थापित करते हैं। फलस्वरूप अंतर्जातीय संबंधों की स्थापना नहीं की जा सकती है। अतएव विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक संबंधों का अभाव पाया जाता है, परंतु अब यह विशेषता समाप्त हो गई है। निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि जाति एक अंतर्विवाही समूह है। जिसकी सदस्यता जन्म से ही प्राप्त होती है और यह किसी भी प्रकार से बदली नहीं जा सकती है। भारतीय समाज जाति के आधार पर ही अनेक खंडों में विभाजित है।In simple words: जाति एक सामाजिक व्यवस्था है जहाँ व्यक्ति की स्थिति जन्म से निर्धारित होती है और वह जीवनभर नहीं बदलती। इसमें खान-पान, विवाह और व्यवसाय जैसे विभिन्न पहलुओं पर प्रतिबंध होते हैं, और सदस्यों में ऊँच-नीच की भावना तथा अपनी जाति के प्रति जागरूकता पाई जाती है।
🎯 Exam Tip: जाति की विशेषताओं और परिभाषाओं को स्पष्ट उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करना, साथ ही भारतीय समाज में इसकी प्रासंगिकता को समझाना, उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होता है।
Question 10. औपचारिक एवं अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण किसे कहते हैं? इनमें अंतर स्पष्ट करते हुए इनके प्रमुख सयमों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: उत्तर औपचारिक एवं अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का अर्थ कुछ विद्वानों ने सामाजिक नियंत्रण के दो प्रकारों औपचारिक (Formal) और अनौपचारिक (Informal) का उल्लेख किया है तथा सामाजिक नियंत्रण के समस्त अभिकरणों को इन्हीं दो वर्गों में विभक्त किया है। औपचारिक नियंत्रण स्पष्ट रूप से परिभाषित होता है। इसमें व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए जानबूझकर प्रयास हेतु कुछ नियम निर्धारित किए जाते हैं तथा उनका कठोरता से पालन करवाया जाता है। इनका उल्लंघन करने पर दंड का विधान होता है। इस प्रकार, जब नियंत्रण के संहिताबद्ध, व्यवस्थित एवं अन्य औपचारिक साधन प्रयोग किए जाते हैं तो यह औपचारिक सामाजिक नियंत्रण कहलाता है। राज्य, सरकार, पुलिस एवं कानून आदि इसके साधन एवं अभिकरण है। आधुनिक समाजों में सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों और माध्यमों पर जोर दिया जाता है। औपचारिक नियंत्रण के विपरीत, अनौपचारिक नियंत्रण व्यक्तिगत, अशासकीय एवं असंहिताबद्ध होता है। यह अलिखित होता है तथा उसका विकास समाज में धीरे-धीरे तथा अपने आप हो जाता है। इसमें मुस्कान, चेहरे बनाना, शारीरिक भाषा, आलोचना, उपहास, हँसी आदि सम्मिलित होते हैं। हमारे विश्वास, धर्म, नैतिक नियम, परंपराएँ तथा प्रथाएँ आदि अनौपचारिक नियंत्रण के ही साधने हैं। इस प्रकार के नियंत्रण का उल्लंघन करने पर प्रत्यक्ष रूप से किसी दंड का विधान नहीं होता ।
औपचारिक एवं अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण में अंतर
औपचारिक एवं अनौपचारिक नियंत्रण में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं- 1. औपचारिक नियंत्रण अत्यधिक स्पष्ट होता है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण अलिखित एवं अस्पष्ट होता है। 2. औपचारिक नियंत्रण सचेत रूप से लागू होता है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण अचेतन रूप से लागू होता है। 3. औपचारिक नियंत्रण संगठित एवं कठोर होता है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण असंगठित एवं नरम होता है। 4. औपचारिक नियंत्रण तथा इसके अभिकरणों का विकास सचेत रूप से किया जाता है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण तथा इसके अभिकरणों का विकास स्वतः धीरे-धीरे होता है। 5. औपचारिक नियंत्रण में न रहने पर बल प्रयोग किया जाता है या दंड दिया जाता है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण में दंड इत्यादि का किसी प्रकार का प्राबधान नहीं होता है। 6. औपचारिक नियंत्रण मुख्यतः आधुनिक समाजों की प्रमुख विशेषता है, जबकि अनौपचारिक "नियंत्रण परंपरागत एवं प्राचीन समाजों में ही पाया जाता है। 7. औपचारिक नियंत्रण में आवश्यकताओं एवं प्रस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता होती है, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण को बदलना सरल कार्य नहीं है। 8. औपचारिक नियंत्रण से संबंधित नियम राज्य या इसके द्वारा अधिकृत किसी प्रशासनिक संगठन द्वारा बनाए जाते हैं, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण संबंधी सभी नियम एवं व्यवहार संहिताएँ समाज द्वारा निर्मित होती हैं।सामाजिक नियंत्रण के साधन अथवा अभिकरण
सामाजिक नियंत्रण के साधनों का तात्पर्य उन नियमों, विधियों, परंपराओं, विचारों तथा शक्तियों आदि से होता है, जिनके द्वारा समाज के सदस्यों के व्यवहारों को नियंत्रित किया जाता है। सामाजिक नियंत्रण के साधन देश, काल और परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। यहाँ हम प्रमुख साधनों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे। (अ) सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन अथवा अभिकरण सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख अनौपचारिक साधन निम्नांकित हैं- 1. **विश्वास-** सामाजिक नियंत्रण में विश्वासों की प्रमुख भूमिका होती है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में प्रचलित विश्वासों के आधार पर समाज-विरोधी कार्य करने से हिचकता है। प्रारंभ से ही मनुष्य प्रकृति में ऐसी सर्वशक्तिमान सत्ता का आभास करता आया है जिसके नियमों का उल्लंघन करना एक अपराध है। मनुष्यों का विश्वास रहा है कि पारलौकिक सत्ता की आज्ञा पालन करने से उन्हें सुख और समृद्धि मिलेगी तथा अवज्ञा करने पर दण्ड प्राप्त होगा। व्यक्ति कोई भी कार्य करते समय सोचता है कि यदि उसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं तो कम-से-कम भगवान तो उसके कार्य को देख रहा है तथा इसी भावना से कई बार वह अनुचित काम करने से रुक जाता है। 2. **धर्म-** धर्म सामाजिक नियंत्रण का एक प्रमुख अनौपचारिक साधन है तथा नियंत्रण करने की शक्ति के रूप में इसका अपना अलग स्थान है। धर्म के कारण ही व्यक्ति अनैतिक और समाज-विरोधी कार्यों को करने से संकोच करते हैं। मनुष्य को उचित कार्य करने के लिए धर्म सदा प्रेरक रहा है। प्रत्येक धर्म के अपने कुछ प्रमुख और सिद्धांत, नियम तथा व्यवहार होते हैं, जिन पर चलना प्रत्येक धर्मावलंबी के लिए आवश्यक होता है। ये नियम और सिद्धांत ही सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में कार्य करते हैं। वास्तव में मानव-आचरण को नियंत्रित करने में धर्म का अपना अलग स्थान रहा है। धर्म ने मनुष्य को सदा यह बताया है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। 3. **सामाजिक आदर्श-** सामाजिक व्यवहारों को नियंत्रित करने में समाज के आदर्शों की भी विशेष भूमिका रहती है। ये व्यक्तियों के कार्यों को परिभाषित करते हैं तथा उन्हें इनका पालन करने हेतु प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए-प्रजातंत्र व्यक्तियों को समानता के आदर्शों को अपनाने पर बल देता है। उसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव को उचित नहीं ठहराया जाता। प्रत्येक व्यक्ति से आशा की जाती है कि वह अपने अधिकारों के साथ-साथ दूसरे के अधिकारों का भी सम्मान करें। 4. **सामाजिक सुझाव-** सन्त, महात्मा तथा धार्मिक नेता आदि सामाजिक सुझावों द्वारा सामाजिक नियंत्रण रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। ये लोग जनसाधारण के सम्मुख मौखिक और लिखित रूप में कुछ सुझाव प्रस्तुत करते हैं। इन सुझावों द्वारा सामाजिक कार्यों को करने के लिए तथा असामाजिक कार्यों को न करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस प्रकार सुझावों द्वारा लागू किया गया नियंत्रण अधिक प्रबल होता है। 5. **सामाजिक उत्सव-** समाज में उत्सवों तथा पर्यो का प्रमुख स्थान होता है। प्रत्येक समाज में विभिन्न उत्सव मनाए जाते हैं। इन उत्सवों के प्रति सर्वसाधारण में विशेष श्रद्धा और भक्ति की भावना होती है। ये उत्सव व्यक्तियों को उनके उत्तरदायित्व का ज्ञान कराते हैं। इसमें भाग लेकर व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों का पालन करना सीखता है और व्यवहारों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए-विवाह उत्सव में भाग लेकर व्यक्ति अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व को निभाना सीखता है। 6. **कला-** कला सामाजिक नियंत्रण का एक प्रमुख शक्तिशाली अनौपचारिक साधन है। कानून और अन्य औपचारिक साधनों द्वारा जो नियंत्रण नहीं हो पाता, वह काव्य, चित्रकला, स्थापत्य कला तथा संगीत आदि द्वारा सरलता तथा सफलता से हो जाता है। विभिन्न कलाएँ मानव हृदय को प्रभावित करती हैं, जिससे उनका व्यवहार नियंत्रित होता है। वर्तमान युग में मनुष्यों के दृष्टिकोण को परिष्कृत करने में विभिन्न कलाओं का विशेष योगदान रहा है। 7. **नेतृत्व-** समाज के प्रतिभाशाली व्यक्तियों का अन्य व्यक्ति अनुसरण करते हैं और उनके बताए गए मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं। ये व्यक्ति नेता होते हैं। नेता अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण जनता को प्रभावित करते हैं तथा उसके व्यवहारों में परिवर्तन करते हैं। नेतृत्व जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में होता है; जैसे-राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र । राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गाँधी आदि ऐसे नेता थे, जिन्होंने तत्कालीन सर्वसाधारण के व्यवहारों को पर्याप्त प्रभावित किया। 8. **जनरीतियाँ-** **समनर (Sumner)** के अनुसार जनरीतियाँ सामाजिक नियंत्रण का प्रमुख साधन है। प्रयास और भूल (Trial and Error) के नियम के अनुसार समाज में स्वतः इनका विकास होता है। नमस्कार करना, तिलक लगाना, सिर पर टोपी पहनना, कॉटे-छुरी से भोजन करना आदि जनरीतियों के उदाहरण हैं। समाज का प्रत्येक सदस्य जनरीतियों के अनुकूल ही आचरण करता है। इनका विरोध करने वाले को समाज में अपमानित होना पड़ता है। 9. **प्रथाएँ-** प्रथाओं की परिभाषा देते हुए मैकाइवर लिखते हैं-“कार्य करने के समाज द्वारा अनुमोदित ढंग ही समाज की प्रथाएँ है।” व्यक्ति जन्म से अनेक प्रथाओं के मध्य पलता है अतः प्रथाओं को भंग करने का साहस वह सरलता से नहीं कर सकता। जो व्यक्ति प्रथाओं को नहीं मानते, समाज में उन्हें अनादर की दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए प्रथाएँ सामाजिक नियंत्रण का महत्त्वपूर्ण अनौपचारिक अभिकरण हैं। जनजातीय समाजों में प्रथाओं को कानून से भी अधिक शक्तिशाली माना जाता है। 10. **रूढ़ियाँ-** जब प्रथाओं को समूह की स्वीकृति प्राप्त होती है तो वे रूढ़ियाँ कहलाती हैं। समनर के शब्दों में, “जब जनरीतियाँ उचित जीवन-निर्वाह, दर्शन और कल्याण की नीति का रूप ले लेती हैं तो वे रूढ़ियाँ कहलाती है।” रूढ़ियों का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य होता है। यदि कोई व्यक्ति रूढ़ियों का पालन नहीं करता तो समाज द्वारा उसका बहिष्कार कर दिया जाता है। 11. **नैतिक आदर्श-** प्रत्येक समाज के कुछ-न-कुछ आदर्श होते हैं, जो समाज के सदस्यों को बताते हैं कि कौन-सा काम उचित है और कौन-सा अनुचित । सत्य बोलना, अहिंसा का पालन करना, परोपकार आदि इसी प्रकार के नैतिक आदर्श है, जिनका पालन करना हम अपना कर्तव्य समझते हैं। 12. **परिवार-** परिवार सामाजिक नियंत्रण का महत्त्वपूर्ण अनौपचारिक साधन है। बच्चों को अच्छे या बुरे कार्यों का ज्ञान प्रारंभ से ही परिवार कराता है तथा समाज की मान्यताओं के अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। यह बच्चे की प्रथम पाठशाला है, जो समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। (ब) **सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन अथवा अभिकरण** यद्यपि सामाजिक नियंत्रण में अनौपचारिक साधन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं, तथापि सामाजिक नियंत्रण की प्रक्रिया में अनौपचारिक साधन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुख्य औपचारिक साधन निम्नलिखित हैं- 1. **शिक्षा-** शिक्षा मनुष्य में विवेक जाग्रत करती है और उचित तथा अनुचित का ज्ञान कराती है। किसी कानून या सामाजिक परंपरा के पालन करने से क्या लाभ या हानि हो सकती है, इसका ज्ञान शिक्षा द्वारा ही होता है। रस्किन (Ruskin) के शब्दों में, “शिक्षा मनुष्यों को नम्र बना देती है जो कि उन्हें होना चाहिए।” एक शिक्षित व्यक्ति कोई भी समाज विरोधी कार्य करने में संकोच करता है, क्योंकि वह उसका परिणाम समझता है। इस कारण ही गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) ने लिखा है कि “अतः शिक्षा का प्रयोग केवल इसी अर्थ में सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में किया जाता है कि व्यक्तियों को सत्य तक पहुँचने की शिक्षा प्राप्त हो जाती है। यह उनकी बुद्धि-प्रयोग का परीक्षण देती है और भावनाओं, प्रथा और परंपराओं की अपेक्षा तर्क द्वारा नियंत्रण का क्षेत्र विस्तृत करती है।” 2. **प्रचार-** वर्तमान युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने विभिन्न प्रचार-साधनों द्वारा जनसाधारण के मस्तिष्क को प्रभावित किया है। रेडियो, टेलीविजन, चलचित्र, प्रेस, समाचार-पत्र आदि चार के मुख्य साधन हैं। इन साधनों द्वारा व्यक्तियों के विचारों, विश्वासों और धारणाओं को सरलता से प्रभावित किया जा सकता है। आधुनिक युग में प्रचार-साधनों के बढ़ जाने के फलस्वरूप यह युग प्रचार-युग कहलाता है। इन साधनों द्वारा जनता के दृष्टिकोण तथा धारणाओं को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। 3. **कानून-** कानून सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करने में सबसे अधिक योगदान प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति कानून का उल्लंघन करने का प्रयास करता है, उसे राज्य द्वारा दंडित किया जाता है। मैकाइवर तथा पेज (Maclver and Page) के शब्दों में, “कानून राज्य द्वारा समर्थित संहिता है और सब पर समान रूप से लागू होने के कारण इस प्रकार स्वयं राज्य का संरक्षक है।” रॉस (Ross) के अनुसार, “कानून समाज द्वारा लगाया गया सामाजिक नियंत्रण का सबसे विशिष्ट और पूर्ण साधन है।” वास्तव में, कानून व्यक्तियों के आचरणों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है। वह उन्हें कुछ कार्य करने की छूट देता है तो कुछ अवांछित कार्य करने पर प्रतिबंध लगाता है। कानून समाज के अपराधियों के आगे उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कानून के विरुद्ध आचरण करने वाले किस प्रकार दंडित होते हैं। इस प्रकार कानून द्वारा अपराधियों के कार्य सीमित हो जाते हैं और असामाजिक व्यवहारों पर नियंत्रण लग जाता है। 4. **राज्य-** सामाजिक नियंत्रण का एक साधन भौतिक शक्ति का प्रयोग है। जो व्यक्ति अत्यधिक स्वार्थी, लालची तथा पदलोलुप होते हैं, उन्हें शक्ति एवं सत्ता द्वारा ठीक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है। न्यायालय द्वारा इस कारण ही अपराधियों को कठोर दंड दिया जाता है। जब भीड़ अराजकता की दशा में पहुँच जाती है तो पुलिस तथा सेना द्वारा उस पर नियन्त्रण स्थापित किया जाता है। न्यायालय में पुलिस के पास नियंत्रण के लिए राज्य द्वारा प्रदत्त औपचारिक शक्ति होती है। राज्य को सर्वोच्च शक्तिशाली संस्था माना जाता है। मृत्यु-दंड तक देने का अधिकार भी राज्य न्यायालयों को दे सकता है।In simple words: औपचारिक नियंत्रण वे नियम हैं जो स्पष्ट, लिखित और कठोर होते हैं, जैसे कानून और शिक्षा, जबकि अनौपचारिक नियंत्रण व्यक्तिगत, अलिखित और समाज में स्वतः विकसित होने वाले मानदंड होते हैं, जैसे विश्वास, धर्म और प्रथाएँ। दोनों समाज में व्यवस्था बनाए रखने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: औपचारिक और अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण के बीच के अंतर को स्पष्ट उदाहरणों के साथ समझाना और प्रत्येक के प्रमुख साधनों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 11. सामाजिक नियंत्रण की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
या
सामाजिक नियंत्रण से आप क्या समझते हैं। सामाजिक नियंत्रण की आवश्यकता एवं कार्यों का उल्लेख कीजिए।
Answer: उत्तर मनुष्य की प्रकृति पूर्णतया निर्मल नहीं होती है। उसमें मुख्यतः सद् या असद् दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पाई जाती है। सद् प्रवृत्तियों को सामाजिक तथा असद् प्रवृत्तियों को असामाजिक प्रवृत्तियाँ कहा जाता है। समाज के कल्याण और अस्तित्व के लिए आवश्यक है कि असद् की अपेक्षा सद् प्रवृत्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि असद् तथा असामाजिक प्रवृत्तियों पर अधिक-से-अधिक नियंत्रण रखा जाए। मानव-सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य असद् प्रवृत्तियों पर किसी-न-किसी प्रकार के नियंत्रण का प्रयास करता रहा है। इस नियंत्रण के परिणामस्वरूप ही सद् प्रवृत्तियों का विकास होता रहा है और मनुष्य समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करता रहता है। सामाजिक नियंत्रण समाजशास्त्र में सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली संकल्पनाओं में से एक है। इसका कारण यह है कि कोई भी समाज बिना नियंत्रण के अपना अस्तित्व अधिक देर तक नहीं बनाए रख सकता है। मनुष्य को मनचाहा व्यवहार करने से रोकने तथा समाज को व्यवस्थित रखने में सामाजिक नियंत्रण का विशेष योगदान होता है।
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामान्य शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति को समाज द्वारा मान्य आदर्शों व प्रतिमानों के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है तथा उसी के अनुसार वह व्यवहार और आचरण करने के लिए बाध्य होता है। यह बाध्यता ही सामाजिक नियंत्रण कहलाती है। यह वह विधि है, जिसके द्वारा एक समाज अपने सदस्यों एवं समूहों के व्यवहार का नियमन करता है तथा उदंड या उपद्रवी सदस्यों को पुनः राह पर लाने का प्रयास करता है। सामाजिक नियंत्रण की परिभाषाओं से इसके अर्थ को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं- **गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार-** “सामाजिक नियंत्रण सुझाव, अनुनय, प्रतिरोध और प्रत्येक प्रकार के बल प्रयोग; जिसमें शारीरिक बल भी सम्मिलित हैं; जैसे उपायों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा समाज अपने अंतर्गत उपसमूहों व सदस्यों को स्वीकृत आदर्शों के माने हुए प्रतिमानों के अनुसार ढाल लेता है।” **मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-** “सामाजिक नियंत्रण से आशय उस ढंग से है, जिसमें कि समस्त सामाजिक व्यवस्था समन्वित रहती है और अपने को बनाए रखती है अथवा वह जिसमें संपूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलित के रूप में क्रियाशील रहती है।” **ब्रियरली (Brearly) के अनुसार-** “सामाजिक नियंत्रण नियोजित या अनियोजित उन प्रक्रियाओं एवं साधनों के लिए सामूहिक शब्द है, जिसके द्वारा व्यक्तियों को सिखाया जाता है, आग्रह किया जाता है। या बाध्य किया जाता है कि वे उन समूहों की रीतियों और जीवन के मूल्यों का पालन करें जिनके कि वे सदस्य हैं।” **स्मिथ (Smith) के अनुसार-** “सामाजिक नियंत्रण उन उद्देश्यों की पूर्ति है जो कि उन उद्देश्यों के प्रति जागरूक सामूहिक अनुकूलन द्वारा होती है।” **ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-** “एक समाज व्यवस्था और स्थापित नियमों के बनाए रखने के लिए जिस दबाव के प्रतिमान को प्रयोग करता है, वह उसकी सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था कहलाती है।” **बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-** “समूह नियंत्रण वह पद्धति है, जिसके द्वारा समूह अपने सदस्यों के व्यवहारों को नियंत्रित करता है। **रॉस (Ross) के अनुसार-** “सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य उन सभी शक्तियों से है, जिनके द्वारा समुदाय व्यक्ति को अपने अनुरूप बनाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक नियंत्रण उन साधनों, प्रक्रियाओं के व्यवस्थाओं की समग्रता को कहते हैं जिससे समाज में संतुलन बना रहता है, व्यक्तियों को सामाजिक मान्यताओं एवं नियमों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए बाध्य होना पड़ता है और सामाजिक जीवन सुचारू रूप से चलता रहता है।सामाजिक नियंत्रण का महत्त्व तथा आवश्यकता
सामाजिक नियंत्रण का अनेक दृष्टिकोणों से महत्त्व है। इसकी आवश्यकता और महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है- 1. **सहयोग का जन्मदाता-** समाज के विकास और कल्याण के लिए सहयोग का विशेष महत्त्व है। समाज में सहयोग की स्थापना में सामाजिक नियंत्रण की विशेष भूमिका है। सामाजिक नियंत्रण के कारण यदि कभी सहयोग इच्छा से प्राप्त होता है तो कभी बलपूर्वक । दोनों प्रकार के सहयोग से समाज को लाभ होता है। 2. **सामाजिक संगठन में स्थायित्व-** सामाजिक नियंत्रण द्वारा समाज में स्थायित्व बना रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इस भय से सामाजिक नियमों की अवहेलना नहीं करता, क्योंकि उसे भय रहता है कि कहीं उसे दंडित न किया जाए। इस प्रकार वह सामाजिक नियमों के अनुसार कार्य भी करता है, जिससे सामाजिक संगठन में स्थिरता बनी रहती है। 3. **प्राचीन सामाजिक व्यवस्था की पुनस्थापना में सहायक-** सामाजिक नियंत्रण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके द्वारा प्राचीनकाल से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता मिलती है। सामाजिक नियंत्रण द्वारा पूर्वजों की अपनाई गई परंपराओं तथा रीति-रिवाजों को उनकी संतानें भी मानने के लिए बाध्य होती है। 4. **समाजीकरण में सहायक-** सामाजिक नियंत्रण व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होता है। सामाजिक नियंत्रण से व्यक्ति को अपने ऊपर एक सत्ता का अनुभव होता है अतः वह समाज के अनुकूल ही अपने आचरण को ढालने तथा समाज द्वारा स्वीकृत मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार करने का प्रयास करता है। इससे व्यक्ति का व्यवहार समाजीकृत हो जाता है। 5. **समाज में एकरूपता लाने में सहायक-** सामाजिक नियंत्रण द्वारा समाज के स्वरूप में एकरूपता उत्पन्न होती है। इसके द्वारा समाज के सदस्यों के व्यवहार नियंत्रित होते हैं और सबको समान रूप से सामाजिक नियमों का पालन केरना पड़ता है। इस कारण समाज में एकता पाई जाती है। 6. **सामाजिक संघर्ष को दूर करने में सहायक-** **टी०बी० बॉटोमोर (T.B. Bottomore)** के शब्दों में, “सामाजिक नियंत्रण के पद का अभिप्राय मूल्यों और आदर्शों के उस समूह से है, जिसके द्वारा व्यक्तियों और समूहों के मध्य तनावों और संघर्षों को दूर अथवा कम किया जाता जिससे कि किसी अधिक समावेश समूह की सुदृढ़ता बनाए रखी जा सके। इस प्रकार । सामाजिक नियंत्रण समाज में उत्पन्न होने वाले संघर्ष को टालने में सहायक होता है। 7. **परंपराओं की सुरक्षा-** परंपराएँ सामाजिक नियंत्रण का एक अंग होती हैं। इस कारण कोई भी व्यक्ति उन्हें भंग करने का साहस नहीं करता। सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन परंपराओं की रक्षा के लिए विशेष रूप से सहायक हैं। 8. **संस्कृति की सुरक्षा-** परंपराएँ, रूढ़ियाँ, संस्थाएँ आदि संस्कृति के अंतर्गत ही आती हैं। इनके द्वारा सामाजिक नियंत्रण होता है। कोई भी व्यक्ति सामाजिक नियंत्रण के भय से उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता। इससे संस्कृति की सुरक्षा होती है। 9. **सामाजिक सुरक्षा-** व्यक्ति की संपत्ति आदि की सुरक्षा सामाजिक नियंत्रण द्वारा ही संभव है। सामाजिक नियंत्रण के साथ राज्य की शक्ति जुड़ी होती है। इसीलिए कोई भी व्यक्ति किसी अन्य की संपत्ति का हरण, दंड के भय से नहीं करता ।सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख कार्य
सामाजिक नियंत्रण के महत्त्व तथा आवश्यकताओं से इसके कार्यों का भी पता चलता है। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करना सामाजिक नियंत्रण का कार्य है। संक्षेप में, सामाजिक नियंत्रण के निम्नांकित प्रमख कार्य हैं- 1. सामाजिक संतुलन एवं सुव्यवस्था को बनाए रखना इसका सर्वप्रमुख कार्य है। इसके अभाव में न तो संतुलन और न ही व्यवस्था बनी रह सकती है। 2. सामाजिक नियंत्रण का दूसरा कार्य व्यक्तियों को आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करने की प्रेरणा देकर उनमें सामाजिक समानता लाना तथा उसे बनाए रखना है। 3. सामाजिक नियंत्रण को तीसरा प्रमुख कार्य व्यक्तियों व सामाजिक समूहों को समाज में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर उद्देश्यों को पूरा करने में सहायता प्रदान करना है। 4. इसका चौथा कार्य समाज द्वारा स्वीकृत आदर्शों व मूल्यों की रक्षा करना है। यदि व्यवहार में सर्वमान्य आदर्श व मूल्य समाप्त हो जाएँगे तो सामाजिक व्यवस्था तृप हो जाएगी। 5. सामाजिक नियंत्रण का पाँचवाँ- प्रमुख कार्य सामाजिक विरासत को बनाए रखना है। इसके द्वारा पुरातन रूढ़ियों, प्रथाओं, परम्पराओं और रीति-रिवाजों की रक्षा होती है। 6. सामाजिक नियंत्रण मानवीय व्यवहार को नियंत्रित व निर्देशित करता है। इसके अभाव में व्यक्तियों का व्यवहार मनमाना हो जाता है। 7. सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य कार्य समाजीकरण की प्रक्रिया में सहायता देना है। समाजीकरण में पुरस्कार व दंड का विशेष महत्त्व है। जो व्यक्ति फिर भी सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार न करें, वे सामाजिक नियंत्रण के कठोर साधनों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य किए जाते हैं। 8. सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य सामाजिक संगठन को निरंतर बनाए रखना उपर्युक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक नियंत्रण समाज में सामाजिक व्यवस्था तथा इसकी निरंतरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। सम्भवतः इसीलिए यह संसार के प्रत्येक देश में किसी-न-किसी रूप में पाया जाता है। यदि समाज सामाजिक नियंत्रण द्वारा व्यक्तियों के मनचाहे व्यवहार पर नियंत्रण में रखे तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी और इसका अस्तित्व व निरंतरता खतरे में पड़ जाएगी ।In simple words: सामाजिक नियंत्रण समाज में व्यवस्था बनाए रखने और व्यक्तियों के व्यवहार को मान्यताओं के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया है। यह सहयोग को बढ़ावा देता है, सामाजिक संगठन को स्थिर रखता है, और समाज के मूल्यों तथा परंपराओं की रक्षा करता है।
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