Get the most accurate UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ here. Updated for the 2026 27 academic session, these solutions are based on the latest UP Board textbooks for Class 11 Psychology. Our expert-created answers for Class 11 Psychology are available for free download in PDF format.
Detailed Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ UP Board Solutions for Class 11 Psychology
For Class 11 students, solving UP Board textbook questions is the most effective way to build a strong conceptual foundation. Our Class 11 Psychology solutions follow a detailed, step-by-step approach to ensure you understand the logic behind every answer. Practicing these Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ solutions will improve your exam performance.
Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ UP Board Solutions PDF
Up Board Solutions For Class 11 Psychology Chapter 2 Methods Of The Study Of Psychology मनोविज्ञान के अध्ययन की पद्धतियाँ
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का भी उल्लेख कीजिए। या अन्तर्दर्शन विधि द्वारा अध्ययन करते समय प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए तथा स्पष्ट कीजिए कि इन कठिनाइयों को किस प्रकार दूर किया जा सकता है। या मनोविज्ञान की अध्ययन विधियों से आप क्या समझते हैं? अन्तर्दर्शन विधि के गुण अथवा दोष बताइए। या अन्तर्दर्शन विधि का विस्तार से वर्णन कीजिए तथा वर्तमान में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए ।
Answer: उत्तर : मनोविज्ञान के अध्ययन की प्रमुख पद्धतियाँ (Main Methods of the Study of Psychology)
मनोविज्ञान एके क्रमबद्ध विज्ञान है जिसके अन्तर्गत मानव-व्यवहार को अध्ययन वैज्ञानिक विधियों के आधार पर किया जाता है। गार्डनर मर्फी ने उचित ही कहा है, “मनोविज्ञान अपने अध्ययन (विकास) के लिए बहुत-सी विधियों का प्रयोग करता है।"
आधुनिक मनोविज्ञान अपनी विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए जिन प्रमुख विधियों को अपनाता है, उनमें से चार प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं
1. अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method)
2. निरीक्षण विधि (Observation Method)
3. प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) तथा
4. नैदानिक विधि (Clinical Method)
अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method)
अन्तर्दर्शन विधि, मनोवैज्ञानिक अध्ययन की सबसे प्राचीन एवं विशिष्ट विधि है, जिसे 'अन्तर्निरीक्षण' या 'आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के नाम से भी जाना जाता है। इस विधि का प्रयोग प्रारम्भ में मनोवैज्ञानिकों द्वारा किसी नयी मनोवैज्ञानिक घटना की खोज के लिए किया जाता था।
अन्तर्दर्शन का अर्थ – अन्तर्दर्शन का अर्थ है-'अपने अन्दर झाँककर देखना' या अपनी मनः-स्थिति को गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करना।' अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से कोई व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं, अनुभवों अथवा व्यवहार का आत्म-निरीक्षण कर सकता है तथा उनका वर्णन प्रस्तुत कर सकता है। उदाहरण के लिए-कोई व्यक्ति चिन्ता या शंकाग्रस्त है या आनन्द का अनुभव कर रहा है, इन तथ्यों का विवरण व्यक्ति स्वयं अन्तर्दर्शन द्वारा ही प्रस्तुत करता है।
अन्तर्दर्शन की परिभाषा – मनोवैज्ञानिकों द्वारा अन्तर्दर्शन को अग्र प्रकार परिभाषित किया गया है – (1) टिचनर के मतानुसार, “अन्तर्दर्शन अन्दर झाँकना है।" (2) मैक्डूगल के शब्दों में, “अन्तर्दर्शन करने का अर्थ है-क्रमबद्ध रूप से अपने मन की कार्य-प्रणाली का सुव्यवस्थित अध्ययन करना।” (3) स्टाउट ने लिखा है, “क्रमबद्ध रीति से अपने मस्तिष्क के कार्य व्यापारों का निरीक्षण करना ही अन्तर्निरीक्षण (अन्तर्दर्शन) है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि अन्तर्दर्शन विधि में व्यक्ति अपने अन्दर की क्रियाओं का स्वयं ही निरीक्षण करता है। निरीक्षण के उपरान्त वह क्रिया-प्रतिक्रिया की अनुभूति का प्रकटीकरण भी स्वयं ही करता है। अन्तर्दर्शन विधि का एक सही अर्थ विस्तारपूर्वक वुडवर्थ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है-“जब कोई व्यक्ति हमें अपने विचारों, भावनाओं तथा उद्देश्यों के विषय में आन्तरिक सूचना प्रदान करती है कि वह क्या देखता है, सुनता है। जानती है तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं का अन्तर्दर्शन कर रहा होता है।” स्पष्ट है कि अन्तर्दर्शन विधि में किसी बाहरी अध्ययनकर्ता या उपकरण आदि की आवश्यकता नहीं होती है।
अन्तर्दर्शन विधि के गुण या लाभ (Merits of Introspection Method)
मनोवैज्ञानिक अध्ययन की पद्धतियों में अन्तर्दर्शन विधि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक विधि है। इस विधि के गुण अथवा लाभों को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है
(1) मानसिक क्रियाओं के ज्ञान में सहायक – मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए पात्र (व्यक्ति) की मानसिक क्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। पात्र की विभिन्न मानसिक क्रियाओं; जैसे– कल्पना, स्मृति, अवधान एवं चिन्तन का सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने में अन्तर्दर्शन विधि ही सर्वाधिक उपयुक्त विधि मानी जाती है।
(2) अनुभवों तथा भावनाओं के ज्ञान में सहायक – किसी व्यक्ति के अनुभवों तथा भावनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्तर्दर्शन विधि का सहारा लिया जाता है। मनुष्य के जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तथा समाधान तक पहुँचने के लिए उसके निजी अनुभवों तथा भावनाओं को जानना आवश्यक है। निजी अनुभव तथा भाव
नितान्त व्यक्तिगत एवं आन्तरिक तथ्य हैं। जिन्हें निरीक्षण अथवा प्रयोग विधि के माध्यम से ज्ञात नहीं किया जा सकता, केवल अन्तर्दर्शन विधि ही इन्हें जानने की एकमात्र उपयुक्त उपाय है।
(3) अतृप्त इच्छाओं तथा कुण्ठाओं के ज्ञान में सहायक – मनुष्य की इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है और इच्छाओं की सन्तुष्टि के साधन सीमित हैं। इस प्रकारे मनुष्य की कुछ इच्छाएँ सन्तुष्ट हो जाती हैं तो बहुत-सी इच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं। इन अतृप्त इच्छाओं या दमित इच्छाओं का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि के द्वारा ही सम्भव है। ठीक उसी प्रकार अन्तर्दर्शन की सहायता से विषयपात्र में पायी जाने वाली कुण्ठाओं को भी ज्ञान हो जाता है।
(4) मितव्ययी, सरल तथा परीक्षणहीन विधि – अन्तर्दर्शन विधि मितव्ययी समझी जाती है, क्योकि इस विधि में निरीक्षक, अध्ययन-सामग्री या किसी बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अतिरिक्त इस विधि के द्वारा अध्ययन हेतु किसी विशेष परीक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती। इसका प्रयोग भी सरलता से किया जा सकता है।
(5) तुलनात्मक अध्ययन एवं सामान्यीकरण के लिए उपयोगी – अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से किसी विशिष्ट समस्या का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव है। साथ-ही-साथ, यदि दो प्रणालियों को अध्ययन करके उनसे प्राप्त परिणामों की तुलना की जाए तो प्रयोगकर्ता एक विश्वसनीय सामान्यीकरण पर पहुँच सकता है। सामान्यीकरण की प्रक्रिया हमें मनोविज्ञान के सर्वमान्य नियम यो सिद्धान्त प्रदान करती है।
(6) मौलिक एवं अपरिहार्य विधि – अन्तर्दर्शन विधि मनोविज्ञान की एक मौलिक विधि है। इसमें निहित विशिष्टताएँ अन्य पद्धतियों में दृष्टिगोचर नहीं होतीं। आलोचकों द्वारा अन्तर्दर्शन विधि की भले ही कितनी भी आलोचनाएँ प्रस्तुत की गयी हों, किन्तु अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपरिहार्य है और इसे नकारा नहीं जा सकता।
अन्तर्दर्शन विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ तथा उनके निवारण के उपाय (Demerits of Introspection Method and their Remedies)
निःसन्देह अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक एवं विशिष्ट विधि है, परन्तु व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए इस विधि को अपनाते समय कुछ कठिनाइयों का सामना अवश्य करना पड़ता है। अन्तर्दर्शन विधि की इन कठिनाइयों को इस विधि के दोष भी कहा जाता है। विभिन्न विद्वानों ने अन्तर्दर्शन विधि की कठिनाइयों के निवारण के उपायों का भी उल्लेख किया है। अन्तर्दर्शन विधि की मुख्य कठिनाइयों तथा उनके निवारण के उपायों का विवरण निम्नलिखित है-
(1) मानसिक क्रियाओं पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं किया जा सकता – मानव-मन को किसी एक बिन्दु या लक्ष्य पर केन्द्रित करना अत्यन्त कठिन कार्य है। परिवर्तनशील एवं गतिमान मन की क्रियाएँ भी अपनी प्रकृति के कारण नितान्त परिवर्तनशील, अमूर्त तथा अप्रत्यक्ष होती हैं। मन की क्रियाओं को स्वरूप जड़ वस्तुओं या प्रघटनाओं से सर्वथा भिन्न होता है। अतः मानसिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह अपना ध्यान पूर्ण रूप से केन्द्रित रख सके। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन विधि द्वारा मानसिक क्रियाओं का अध्ययन एक बहुत ही कठिन कार्य समझा जाता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – निरन्तर अभ्यास के माध्यम से उपर्युक्त कठिनाई को दूर किया जा सकता है। अन्तर्दर्शन विधि की सफलता पर्याप्त प्रशिक्षण पर निर्भर करती है। निरन्तर अभ्यास एवं प्रशिक्षण से अमूर्तकरण की क्षमता में वृद्धि होगी और इस भाँति मन की एकाग्रता उत्तरोत्तर बढ़ती जायेगी। मन की अधिकाधिक एकाग्रता मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में सहायक होगी ।
(2) मानसिक प्रक्रियाओं की प्रकृति गत्यात्मक एवं चंचल होती है – मानव की अनुभूतियाँ, मनोवृत्तियाँ, भावनाएँ, विचार एवं इच्छाएँ हर समय एकसमान नहीं रहतीं। इन प्रक्रियाओं की तीव्रता में लगातार उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। निरीक्षण के लिए निरीक्षण के विषय का स्थिर होना पहली और आवश्यक शर्त है। हम अपने चारों ओर विभिन्न स्थिर वस्तुएँ पाते हैं जिनका
निरीक्षण सहज रूप से सम्भव है। किन्तु मानसिक प्रक्रियाएँ तो निरन्तर बदलती रहती हैं, जिनका निरीक्षण एक दुष्कर कार्य है। और इनका अन्तर्दर्शन के माध्यम से ज्ञान भी पर्याप्त रूप से कठिन है। उदाहरण के लिए माना एक व्यक्ति किसी कारणवश भयभीत हो उठा । मनोवैज्ञानिक उस व्यक्ति के भय की दशा का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि से करना चाहेंगे, परन्तु यह एक कठिन कार्य है। क्योंकि व्यक्ति का भय के कारण पर नियन्त्रण नहीं था; अतः एक तो वह चाहकर भी पुनः उसी कारण से भयभीत नहीं हो सकता और दूसरे भय की यह दशा हमेशा बनी नहीं रह सकती। इसलिए सम्भव है कि निरीक्षण करते-करते भय की अवस्था ही समाप्त हो जाए अथवा उसकी तीव्रता में ह्रास आ जाए। भय की ऐसी परिवर्तनशील अवस्था में कोई उचित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस भाँति चंचल एवं परिवर्तनशील मानसिक प्रक्रियाओं का अन्तर्दर्शन-एक कठिन समस्या है।
कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन विधि में मानसिक प्रक्रियाओं की चंचल प्रकृति सम्बन्धी कठिनाई पर स्मृति के माध्यम से अंकुश लगाया जा सकता है। स्मृति की मदद से किसी समय-विशेष की मानसिक दशा का विश्लेषण करना सम्भव होता है। इसके अतिरिक्त; अभ्यास, प्रशिक्षण, मानसिक सावधानी तथा विविध अभिलेखों की तुलना द्वारा अन्तर्दर्शन के अन्तर्गत मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जा सकता है।
(3) अन्तर्दर्शन में मन विभाजित हो जाता है – मनुष्य एक 'मनप्रधान प्राणी है और मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक मन की क्रियाओं का अध्ययन करते हैं। किन्तु यदि मन ही विभाजित हो गया हो तो क्या ऐसे विभाजित मन द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है-यह आरोप अन्तर्दर्शन विधि के विरुद्ध लगाया जाता है। सच तो यह है कि अन्तर्दर्शन' विधि में मन अपनी क्रियाओं का निरीक्षण स्वयं ही करता है। इस प्रकार कार्य करने के कारण वह दो भागों में बँट जाता है – एक मन जो निरीक्षण कार्य करता है तथा दूसरो मन जिसका निरीक्षण किया जाता है। किसी विशिष्ट समर्थ में एक ही मन ज्ञाता और ज्ञेय' दोनों नहीं हो सकता। इस स्थिति में अन्तर्दर्शन विधि द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन कैसे सम्भव हो सकता है?
कठिनाई निवारण के उपाय – व्यावहारिक दृष्टि से उपर्युक्त कठिनाई का निराकरण भी सम्भव है। अवधान को इस प्रकार अभ्यस्त एवं प्रशिक्षित बनाया जा सकता है कि मनुष्य बाह्य वस्तुओं के अनुरूप अपनी आन्तरिक प्रवृत्तियों का भी सही-सही निरीक्षण कर सके । मन एक साक्षी सत्ता है। और यह साक्षी सत्ता विभक्त होते हुए भी सुख-दुःख, प्रेम-घृणा, काम और क्रोध आदि भावनाओं का अनुभव कर सकती है। प्रत्येक मनुष्य का मन अपने ही अन्दर इस प्रकार की भावनाओं का अनुभव करता है। फलतः वह ज्ञाता भी बनता है और ज्ञेय भी ।
(4) कई मनोवैज्ञानिक एक ही मानसिक प्रक्रिया का अध्ययन नहीं कर सकते – वैज्ञानिक अध्ययन की एक आधारभूत मान्यता यह है कि सम्बन्धित विषय अथवा घटना का एक से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा एक ही समय में अवलोकन किया जाए। मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शने विधि इस शर्त को पूरा नहीं करती, क्योंकि किसी व्यक्ति की आन्तरिक दशाओं का अध्ययन अन्य व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अन्तर्दर्शन विधि पर अवैज्ञानिकता का आरोप लगाया जाता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन, विधि के विरुद्ध यह आरोप निराधार है। उक्त कठिनाई के निराकरण के लिए मनोवैज्ञानिकों को चाहिए कि वे परस्पर सहयोग से कार्य करें। सर्वप्रथम, प्रत्येक मनोवैज्ञानिक किसी मानसिक प्रक्रिया का अलग से अध्ययन करेगा और फिर इस सन्दर्भ में अपने अनुभवों को एक-दूसरे से कहेगा। जब कई मनोवैज्ञानिक अपने-अपने अनुभवों की परस्पर तुलना करेंगे तो वे इस भाँति प्राप्त निष्कर्षों से एक सामान्य नियम तक पहुँच सकते हैं। सामान्यीकरण की पद्धति पर आधारित ऐसे नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।
(5) मनोदशा और वस्तु का एक साथ निरीक्षण नहीं किया जा सकता – यदि अन्तर्दर्शन में किसी ऐसी मानसिक अवस्था या वृत्ति पर ध्यान केन्द्रित करना पड़े जो किसी बाह्य वस्तु के कारण उत्पन्न हुई हो तो उस परिस्थिति में अन्तर्दर्शन सम्भव नहीं होता। इसका कारण यह है कि व्यक्ति द्वारा मनोदशा पर ध्यान लगने से उसका ध्यान वस्तु से हट जाता है। यदि वह वस्तु पर ध्यान लगाता है तो उसका ध्यान मनोदशा से हट जाता है। फलतः दोनों पर एक साथ ध्यान नहीं लग पाता। व्यक्ति का ध्यान एक समय में एक ही स्थान पर केन्द्रित हो सकता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – इस कठिनाई पर अभ्यास के माध्यम से विजय प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए ध्यान के अभ्यास एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। कुछ देर तक वस्तु पर तथा कुछ देर तक मानसिक क्रिया पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। अभ्यास का यह कार्य बारी-बारी से लगातार करने पर वस्तु और उससे उत्पन्न मनोदशा का एक साथ निरीक्षण करना सम्भव हो सकता है।
(6) अन्तर्दर्शन द्वारा प्राप्त ज्ञान आत्मगत एवं व्यक्तिगत होता है – अन्तर्दर्शन में एक कठिनाई यह है कि इस विधि के द्वारा जो भी अध्ययन किये जाते हैं वे नितान्त व्यक्तिगत तथा आत्मगत (Subjective) होते हैं, वस्तुनिष्ठ (Objective) नहीं। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन से प्राप्त परिणामों में वैज्ञानिकता तथा विश्वसनीयता का प्रायः अभाव रहता है; अतः इस विधि के माध्यम से सामान्य निष्कर्ष निकालना कठिन है।
कठिनाई निवारण के उपाय – इसके लिए परामर्श दिया जाता है कि अन्तर्दर्शन को अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकाधिक वस्तुनिष्ठ बनाया जाये ताकि इसके ज्ञान पर आधारित कुछ सामान्य नियम प्रतिपादित हो सकें । इसके अतिरिक्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुभवों की तुलना करके सामान्यीकरण की विधि से सर्वमान्य सिद्धान्त भी बनाये जा सकें ।
(7) अन्तर्दर्शन में तथ्यों को छिपाने की सम्भावना है – अन्तर्दर्शन विधि में एक मुख्य कठिनाई यह आती है कि विषय-पात्र उन तथ्यों को सरलता से छिपा सकता है जो सच्चाई के अधिक निकट होते हैं, क्योंकि प्रयोगकर्ता के पास विषय-पात्र के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसा स्रोत नहीं होता जिससे तथ्यों की प्रामाणिकता सिद्ध हो सके; अतः इस पद्धति के माध्यम से सत्यान्वेषण का कार्य नहीं हो सकता।
कठिनाई निवारण के उपाय – विषय-पात्र को यह विश्वास दिलाकर कि उससे प्राप्त सूचनाओं को गुप्त रखा जाएगा, यथार्थ स्थिति का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के अन्तर्दर्शन विवरण से मिलान करके ही तथ्यों की प्रामाणिकता पुष्ट की जानी चाहिए।
In simple words: अन्तर्दर्शन विधि में व्यक्ति स्वयं अपनी मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों और व्यवहारों का आत्म-निरीक्षण करता है। इसके गुण हैं कि यह मानसिक क्रियाओं, अनुभवों और अतृप्त इच्छाओं के ज्ञान में सहायक है, साथ ही यह एक मितव्ययी और मौलिक विधि है। दोषों में मानसिक क्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, मन का विभाजित होना, और प्राप्त ज्ञान का आत्मगत होना शामिल हैं, जिनके निवारण हेतु अभ्यास और प्रशिक्षण आवश्यक है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में अन्तर्दर्शन विधि की परिभाषा, गुण और दोषों का विस्तृत वर्णन अपेक्षित है। प्रत्येक बिन्दु को स्पष्ट उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करने पर उच्च अंक प्राप्त होते हैं।
Question 2. निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? निरीक्षण विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए। या निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख करते हुए तटस्थ मूल्यांकन कीजिए। या आधुनिक मनोविज्ञान के विकास में निरीक्षण विधि की भूमिका का विवेचन इसके गुण-दोषों के आलोक में कीजिए ।
Answer: उत्तर : निरीक्षण विधि (Observation Method)
निरीक्षण का अर्थ – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि निरीक्षण विधि (Observation Method) भी है। यह विधि मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण विधि है। निरीक्षण का अर्थ है-“घटनाओं का बारीकी और क्रमबद्ध तरीके से अवलोकन करना।” अन्य शब्दों में; देखकर तथा सुनकर काम करने अथवा किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की विधि को निरीक्षण कहते हैं। निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा किसी अन्य प्राणी के व्यवहार का ज्ञान केवल उसके बाहरी क्रियाकलापों को देखकर ही प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि रमेश की आँखें लाल हैं, भौंहें तनी हैं, चेहरा तमतमा रहा है, शरीर काँप रहा है तथा वह चीख-चीखकर हाथों को इधर-उधर फेंक रहा है तो यह देखकर हम समझ जाते हैं कि रमेश क्रोधित है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि जब प्राणी (जैसे शिशु, असामान्य व्यक्ति या पशु) न तो अपने अनुभवों को प्रकट कर सके और उस पर प्रयोग करना भी कठिन हो तो उसके विषय में तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरीक्षण विधि ही सर्वोत्तम है।
निरीक्षण की परिभाषा – निरीक्षण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है -
1. ऑक्सफोर्ड कन्साइज डिक्शनरी (Oxford Concise Dictionary) के अनुसार, निरीक्षण से अभिप्राय प्रघटनाओं के, जिस प्रकार कि वे प्रकृति में पाई जाती हैं, कार्य एवं कारण या आपसी सम्बन्ध की दृष्टि से अवलोकन तथा लिख लेने से है।”
2. गुडे तथा हाट के अनुसार, “विज्ञान निरीक्षण से प्रारम्भ होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में निरीक्षण का ही सहारा लेता है।'
3. पी० बी० यंग का मत है, “निरीक्षण स्वाभाविक घटनाओं का, उनके घटित होने के समय, नेत्र के माध्यम से क्रमबद्ध तथा विचारपूर्ण अध्ययन है।”
उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं द्वारा निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा प्राणी के व्यवहार का अध्ययन मुख्य रूप से देखकर ही किया जाता है। वैसे तो इस विधि को - हर प्रकार के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जा सकता है परन्तु बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशु के व्यवहार के अध्ययन के लिए निरीक्षण विधि को अधिक उपयोगी माना जाता है। निरीक्षण विधि अपने आप में एक व्यवस्थित विधि है जिसके कुछ निश्चित एवं निर्धारित चरण हैं। सर्वप्रथम अध्ययन की निश्चित योजना तैयार की जाती है। इसके उपरान्त योजनानुसार व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है। अवलोकित व्यवहार को साथ-साथ नोट कर लिया जाता है। इसके उपरान्त नोट किये गये व्यवहार का विश्लेषण करके उसकी समुचित व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। इस समस्त अध्ययन के आधार पर ही अभीष्ट सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं।
निरीक्षण विधि के गुण या लाभ (महत्त्व) (Merits of Observation Method)
निरीक्षण विधि एक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी विधि है। इस विधि के गुणों अथवा लाभ का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –
(1) विषय के व्यवहार का दूर से अध्ययन – निरीक्षण विधि में विषय (अर्थात् या श्रेणी जिसका अध्ययन किया जाना है) के व्यवहार का पृथक् एवं दूर से अध्ययन किया जाता है। इस विधि के माध्यम से कोई भी प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों और मानसिक क्रियाओं का सरलता से अध्ययन कर सकता है।
(2) नवजात शिशुओं, पशुओं, मूक तथा पागल लोगों का अध्ययन – नवजात शिशु, पशु, मूक तथा पागल अपने विचारों या अनुभवों को व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। इनकी क्रियाओं एवं व्यवहार का अध्ययन केवल निरीक्षण विधि के माध्यम से ही सम्भव है।
(3) विविध आन्तरिक दशाओं का ज्ञान – विभिन्न प्रकार की अच्छी या बुरी आन्तरिक दशाओं तथा गुण-दोषों का ज्ञान निरीक्षण विधि के माध्यम से किया जा सकता है। सुख-दुःख, राग-द्वेष, प्रसन्नता-क्रोध, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे तथा अपने-पराए का ज्ञान सूक्ष्म एवं प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से ही किया जा सकता है।
(4) मानव स्वभाव एवं व्यवहार पर प्रभाव का ज्ञान – मनुष्य के मनोविज्ञान पर पर्यावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। जलवायु, पर्यावरण, भौतिक तथा प्राकृतिक घटनाएँ मानव स्वभाव एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इनके ज्ञान हेतु अध्ययन की निरीक्षण विधि अत्यन्त उपयोगी समझी जाती है।
(5) लोक जीवन के लिए उपयोगी – निरीक्षण विधि की सहायता से लोक जीवन का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। लोक गीत, लोक नृत्य, लोक कथाओं, चित्रकला, ललित कलाओं तथा संगीत से सम्बन्धित अध्ययन में मात्र निरीक्षण विधि ही सहायक सिद्ध होती है।
(6) सामूहिक घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का ज्ञान – समाज के अन्तर्गत घटित होने वाली घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का अध्ययन निरीक्षण विधि के बिना सम्भव नहीं है। सामूहिक एवं साम्प्रदायिक तनाव, भीड़ का व्यवहार, समूह का स्वभाव; कक्षागत परिस्थितियों में छात्रों का स्वभाव, परीक्षा के दौरान छात्रों का व्यवहार तथा आन्दोलनकारियों की प्रतिक्रियाएँ निरीक्षण विधि द्वारा ज्ञात की जाती हैं।
(7) वस्तुनिष्ठ निरीक्षण – मनोविज्ञान एक विज्ञान है; अतः समस्त मनोवैज्ञानिक अध्ययन वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। वस्तुनिष्ठ निरीक्षण से प्राप्त सूचनाएँ विश्वसनीय होती हैं जिनकी जाँच किसी भी विशेषज्ञ के द्वारा कराई जा सकती है। इस भाँति प्राप्त सूचनाओं को वैज्ञानिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रयोग किया जा सकता है।
निरीक्षण विधि के दोष एवं कठिनाइयाँ (Demerits of Observation Method)
अनेक गुणों से ओत-प्रोत होते हुए भी निरीक्षण विधि दोष या कठिनाइयों से अछूती नहीं है। इसके प्रमुख दोष इस प्रकार हैं
(1) क्रमबद्धता का अभाव – निरीक्षण विधि में घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव पाया जाता है। अध्ययनकर्ता को घटनाओं के घटित होने के क्रम में निरन्तर रूप से अवलोकन करना पड़ता है। यदि एक बार घटनाओं का प्राकृतिक क्रम टूट जाए तो पुनः घटना का शुद्ध निरीक्षण नहीं हो सकता, न ही वह घटना दोबारा उसी प्रकार घटित हो सकती है ।
(2) घटनाओं पर नियन्त्रण नहीं – जिन घटनाओं का अवलोकन किया जाना है, उन पर निरीक्षणकर्ता का कोई नियन्त्रण नहीं होता । वस्तुतः, घटनाएँ तो अपने स्वाभाविक ढंग में घटित होती हैं। जिनके अज्ञात कारणों का पता लगाना कठिन हो जाता है।
(3) पक्षपात की सम्भावना – प्रत्येक निरीक्षणकर्ता किन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है जिनके कारण वह किसी विशेष घटना के प्रति आत्मगत (Subjective) हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पक्षपात की सम्भावना अधिक होती है।
(4) निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि – निरीक्षणकर्ता की कुछ विशेष रुचियाँ हो सकती हैं। जिनसे सम्बन्धित बातों पर वह अवलोकन के समय अधिक ध्यान दे सकता है। फलस्वरूप कुछ आवश्यक एवं वांछित तथ्यों की अवलोकन के दौरान उपेक्षा कर दी जाती है। इससे अध्ययन की वस्तुनिष्ठता तथा विश्वसनीयता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः किसी भी वैज्ञानिक प्रयोग में तटस्थता (निष्पक्षता) संर्वोपरि मानी जाती है जिस पर निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि का गहरा प्रभाव पड़ता है।
(5) प्रशिक्षण एवं अभ्यास का अभाव – साधारणतया निरीक्षण विधि के अन्तर्गत प्रयोगकर्ता न तो पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित होते हैं और न ही उन्हें निरीक्षण के विभिन्न पदों का समुचित अभ्यास ही होता है। सही निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए निरीक्षणकर्ता को अनिवार्य रूप से प्रशिक्षित, अभ्यासी एवं कुशल निरीक्षक होना चाहिए।
(6) अप्राकृतिक व्यवहार – जब निरीक्षण के लिए चुने गए प्राणियों को यह जानकारी हो जाती है कि उनका अवलोकन या निरीक्षण किया जा रहा है तो उनका व्यवहार प्राकृतिक नहीं रह जाता है। इस प्रकार के अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा निरीक्षण विधि के अर्थ एवं गुण-दोषों का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि निरीक्षण विधि मनोविज्ञान की एक उपयोगी विधि है। यदि इस विधि को सावधानीपूर्वक कुशल एवं प्रशिक्षित अध्ययनकर्ताओं द्वारा अपनाया जाए तो निश्चित रूप से पर्याप्त प्रामाणिक निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।
In simple words: निरीक्षण विधि में व्यवहारों और घटनाओं का बारीकी से अवलोकन करके ज्ञान प्राप्त किया जाता है, खासकर उन स्थितियों में जहाँ विषय अपने अनुभव व्यक्त नहीं कर सकता (जैसे शिशु या पशु)। इसके लाभों में व्यवहार का दूर से अध्ययन, आंतरिक दशाओं का ज्ञान, और वस्तुनिष्ठता शामिल हैं, जबकि दोषों में क्रमबद्धता का अभाव, घटनाओं पर नियंत्रण की कमी, और पक्षपात की संभावना हैं।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण विधि के अर्थ, परिभाषा और इसके गुण-दोषों का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है। छात्रों को प्रत्येक पहलू को वास्तविक जीवन के उदाहरणों से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए।
Question 3. प्रयोगात्मक विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए। या प्रयोग विधि के प्रमुख चरण क्या हैं? उदाहरण देकर लिखिए। या प्रयोगात्मक विधि के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए। या मनोविज्ञान में प्रयोग विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए। या स्वतंत्र चर और आश्रित चर का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
Answer: उत्तर : प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method)
आधुनिक मनोविज्ञान की मुख्य अध्ययन विधि प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) है। अब प्रयोगात्मक विधि को मनोविज्ञान की सर्वाधिक उपयोगी, महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोत्तम अध्ययन विधि माना जाता है। प्रयोगात्मक विधि प्रयोगशाला में आयोजित प्रयोग के माध्यम से कार्य करती है।
प्रयोगात्मक विधि अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि से अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक है। प्रयोग के समय प्रयोगकर्ता का दशाओं या घटनाओं पर नियन्त्रण रहता है, जबकि निरीक्षण के अन्तर्गत ऐसा नहीं होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में वुण्ट नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना के साथ प्रयोग विधि का श्रीगणेश हुआ था।
प्रयोग का अर्थ-वुडवर्थ के अनुसार प्रयोग का पहला अर्थ है- प्रकृति से प्रश्न करना। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के सामने एक स्पष्ट प्रश्न या समस्या होती है, जिसका उचित उत्तर पाने के लिए वह प्रकृति के सामने प्रयोग का आयोजन करता है। यह प्रश्न या समस्या किसी युक्ति से निकली उपकल्पना (सम्भावित उत्तर) पर आधारित होती है। इस उपकल्पना को प्रयोग के माध्यम से सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। प्रयोग करते समय वस्तुओं को एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे प्राप्त परिणाम उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसे प्रकृति से पूछा गया था।
अपने दूसरे अर्थ में प्रयोग नियन्त्रित वातावरण में किया गया निरीक्षण है। प्रयोग की आवश्यक शर्त के अनुसार नियन्त्रित एवं उपयुक्त परिस्थितियों में प्राणी की मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है तथा परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर भी प्रयोग के परिणाम पहले के समान ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार नियन्त्रित निरीक्षण ही प्रयोग कहलाता है।
प्रयोग की परिभाषा – प्रयोग को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
1. गैरेट के मतानुसार, “प्रकृति से पूछा गया प्रश्न प्रयोग है।”
2. जहोदा के अनुसार, “प्रयोग परिकल्पना के परीक्षण की एक विधि है।”
3. जे० सी० टाउनशैण्ड के अनुसार, “नियन्त्रित दशाओं में किये गये निरीक्षण को प्रयोग कहा जाता है।”
4. फेस्टिगर के मतानुसार, “प्रयोग का मूल आधार स्वतन्त्र चर में परिवर्तन करने से परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है।”
प्रयोगात्मक विधि के चरण (Steps of Experimental Method)
प्रयोगात्मक विधि अपने आप में एक व्यवस्थित अध्ययन विधि है। इस विधि के कुछ निश्चित चरण हैं जो निम्नलिखित हैं
(1) समस्या का निर्धारण – प्रयोगात्मक विधि का प्रथम चरण अध्ययन की समस्या का निर्धारण है। प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता समस्या का निर्धारण करता है। इसके लिए वह किसी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक समस्या का चुनाव करता है। उदाहरण के लिए, समाज में नशे का व्यसन । बुरा समझा जाता है। प्रायः देखने में आता है कि अधिकांश ट्रक-ड्राइवर नशाखोरी करते हैं। माना जाता है कि नशा न करने वाले ड्राइवर, नशा करने वाले ड्राइवरों से सन्तुलित, विश्वसनीय एवं अच्छी गाड़ी चलाते हैं अथवा नशा करने से चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि नशा करने से ध्यान एकाग्र होता है और इससे गाड़ी चलाने में मदद मिलती है। जो लोग न तो नशाखोरी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में, उनके अनुसार असन्तुलित एवं अविश्वसनीय गाड़ी चलाने का कारण नशे की आदत न होकर ड्राइवर का व्यक्तित्व है। उच्च जीवन-स्तर यापन करने वाले बहुत-से लोग नशा करते हैं। ये सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हैं, चरित्रवान समझे जाते हैं और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न हैं। इस तर्क-वितर्क से इस समस्या का जन्म होता है कि शारीरिक या मानसिक क्षमता पर नशाखोरी का क्या प्रभाव पड़ता है।
(2) परिकल्पनाका निर्माण – समस्या का निर्धारण करने के उपरान्त प्रयोगकर्ता परिकल्पना (Hypothesis) का निर्माण करता है। परिकल्पना चुनी गयी समस्या का सम्भावित समाधान होता है, जिसकी रचना से प्रयोग को कार्य निश्चित और
नियन्त्रित दशाओं में होता है। उपर्युक्त प्रस्तुत किये गये उदाहरण में, शारीरिक तथा मानसिक क्षमता पर नशाखोरी के प्रभाव की समस्या को परिकल्पना के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-“नशा (अफीम का सेवन) करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है।” इस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर सिद्ध या असिद्ध किया जाएगा।
(3) स्वतन्त्र तथा आश्रित चरों को पृथक करना – किसी प्रयोग में दो या उससे अधिक 'चर' या परिवर्त्य (Variables) हो सकते हैं। ये चर दो प्रकार से वर्णित हैं—स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर। स्वतन्त्र चर (Independent Variable) को सामान्यतः 'उद्दीपन कहा जाता है और आश्रित चर (Dependent Variable) को प्रतिक्रियाएँ कहा जाता है। स्वतन्त्र चर को प्रयोगकर्ता नियन्त्रित करके प्रस्तुत करता है। इन्हें बिना किसी अन्य चर पर प्रभाव डाले घटाया-बढ़ाया जा सकता है। आश्रित चर स्वतन्त्र ज्वरों के बदले जाने पर बदल जाते हैं और प्रयोगात्मक परिस्थितियों पर आश्रित होते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में, नशाखोरी स्वतन्त्र चर है, क्योंकि प्रयाग में नशा करने और न करने के प्रभाव की परीक्षा की जाती है। शारीरिक और मानसिक क्षमता आश्रित चर है क्योंकि यह नशाखोरी की उपस्थिति या अनुपस्थिति के अनुसार परिवर्तित होगा।
(4) परिस्थितियों पर नियन्त्रण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग में परिस्थितियों (दशाओं) पर नियन्त्रण एक आवश्यक तत्त्व है। इसके लिए प्रयोगकर्ता को सभी सम्भावित चरों का ज्ञान होना चाहिए। उसे उन अवांछित चरों या उद्दीपनों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है जो वातावरण में उत्पन्न हो जाते हैं। और जिनकी प्रयोगकर्ता को आवश्यकता नहीं होती है। प्रस्तुत उदाहरण में सम्भव है कि प्रयोग का पात्र व्यक्ति यह सिद्ध करने की चेष्टा करे कि नशा करने से उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। यह एक अवांछित सम्भावना है जिसे निर्मूल करने के लिए प्रयोग में परिस्थिति पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है।
(5) प्रयोगफल का विश्लेषण – प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों का विश्लेषण प्रयोगात्मक विधि का पाँचवाँ एवं महत्त्वपूर्ण चरण है। विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग के दौरान अधिक पात्र होने पर उन्हें दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है (i) प्रायोगिक समूह (Experimental Group) तथा (ii) नियन्त्रित समूह (Controlled Group)। अक्सर स्वतन्त्र चर, प्रायोगिक समूह कहलाता है और आश्रित चर, नियन्त्रित समूह । इस प्रयोग में नशे की वस्तु (माना अफीम) स्वतन्त्र चर है जिसके प्रयोग से प्राप्त परिणामों की तुलना अफीमरहित परिणामों के साथ की जाएगी।
(6) परिकल्पना की जाँच – प्रयोग के परिणाम यदि निर्माण की गयी परिकल्पना के पक्ष में होते हैं तो परिकल्पना सिद्ध मान ली जाती है, किन्तु विपरीत परिणामों की स्थिति में परिकल्पना को रद्द या अस्वीकृत घोषित कर दिया जाता है तब नयी परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम यदि परिकल्पना अर्थात् “नशा (अफीम का सेवन करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है”- के पक्ष में जाते हैं तो हमारी परिकल्पना सिद्ध मानी जाएगी। स्पष्टतः इस दशा में अफीम का सेवन ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता में ह्रास लाएगा। यदि परिणामों से यह ज्ञात हो कि अफीम के सेवन से ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर धनात्मक (अच्छा) प्रभाव पड़ा तो हमारी परिकल्पना रद्द समझी जाएगी ।
(7) सामान्यीकरण – एकसमान परिस्थितियों में तथा निरन्तर प्रयोगों के माध्यम से स्वतन्त्र चर का आश्रित चर पर प्रभाव देखकर जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनके विश्लेषण एवं व्याख्या के आधार पर सामान्य नियम निकाले जाते हैं। यही सामान्यीकरण है जो प्रयोगात्मक विधि का अन्तिम चरण है।
प्रयोगात्मक विधि के गुण या लाभ (महत्त्व) (Merits of Experimental Method)
प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा सुचारु रूप से अध्ययन किये जा सकते हैं। और निश्चित पेरिणामों तक पहुँचा जा सकता है। ये परिणाम अधिक शुद्ध और विश्वसनीय होते हैं। इसके अन्य गुणों (विशेषताएँ) या लाभ
निम्नलिखित हैं –
(1) परिस्थिति सम्बन्धी आत्म-निर्भरता – प्रयोगात्मक विधि में, निरीक्षण विधि की तरह, प्रयोगकर्ता प्राकृतिक परिस्थितियों पर आश्रित नहीं रहता। वह आवश्यकतानुसार कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण कर प्रयोग कर लेता है जिससे समय और शक्ति की बचत होती है।
(2) पूर्ण वैज्ञानिक विधि – यह एक पूर्ण वैज्ञानिक विधि है जिसके अन्तर्गत नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रयोग के माध्यम से वांछित परिणाम एवं निष्कर्ष निकाले जाते हैं। अन्य विधियों की तुलना में इस विधि के निष्कर्ष अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं।
(3) नियन्त्रित परिस्थितियाँ – इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें प्रयोग की परिस्थितियाँ (दशाएँ) पूरी तरह प्रयोगकर्ता के नियन्त्रण में रहती हैं। प्रयोगशाला में परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखकर ही सही निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।
(4) दोहराना – प्रयाग की एक विशेषता यह है कि इसको सुविधानुसार दोहराया जा सकता है। प्रयोगकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार पूरी घटना को दोहरा सकता है या घटना के किसी एक पक्ष की पुनरावृत्ति भी कर सकता है।
(5) उद्देश्यानुसार एवं समुचित प्रयोग योजना – प्रयोगात्मक विधि में प्रयोगकर्ता निर्धारित उद्देश्य के अनुसार आसान प्रयोग योजना तैयार कर सकता है। वह उसमें वांछित परिवर्तन भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, समुचित प्रयोग योजना के माध्यम से मानव स्वभाव के विविध पक्षों का अध्ययन सम्भव है।
(6) पशुओं पर प्रयोग सम्भव – सभी प्रकार के प्रयोगों को मानव-स्वभाव पर लागू करके निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। पशुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने में प्रयोग विधि हमारी अत्यधिक सहायता करती है। इससे प्राप्त परिणामों को लागू करने से पूर्व इनकी मानव-स्वभाव से तुलना करके देखा जाता है।
(7) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रयोग विधि के माध्यम से कार्य और कारण सम्बन्धों का शुद्धतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत समस्या से सम्बन्धित विभिन्न कारकों के प्रभाव को पृथक् से भी जाना जा सकता है। प्रयोग में हम जिस कारक के प्रभाव की जाँच करना चाहते हैं, उसके अतिरिक्त अन्य कारकों को नियन्त्रित रखकर प्रभाव का स्पष्ट एवं शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
(8) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि – प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय, वैध तथा सार्वभौमिक होते हैं। एक ओर जहाँ अन्तर्दर्शन विधि केवल आन्तरिक दशाओं का अध्ययन करती है और निरीक्षण विधि व्यवहार की बाह्य दशाओं का, वहीं दूसरी ओर प्रयोग विधि प्राणी के आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का अध्ययन करती है। इस प्रकार यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक सम्पूर्ण विधि है।
प्रयोगात्मक विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ (कमियाँ) (Demerits of Experimental Method)
भले ही प्रयोगात्मक विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए सर्वोत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष या कमियाँ हैं, जिनका सामान्य विवरण निम्नवत् है –
(1) प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थिति – प्रयोग किसी विशेष अध्ययन के लिए प्रयोगशाला की विशिष्ट परिस्थितियों में आयोजित किये जाते हैं। ये विशिष्ट परिस्थितियाँ प्राकृतिक परिस्थितियों के समान न होकर कृत्रिम होती हैं और कृत्रिम व्यवहार से शुद्ध परिणाम प्राप्त करना कठिन है। नियन्त्रित एवं बनावटी परिस्थितियों में कोई भी प्रयोज्य (Subject) या व्यक्ति स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकता। इससे प्रयोग के मध्य त्रुटियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।
(2) विषय-पात्र की रुचियों पर नियन्त्रण कठिन – मानव की मनःस्थिति तथा उसकी रुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं जिन पर नियन्त्रण यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। प्रयोग के दौरान ज्यादातर विषय-पात्र अपनी-अपनी मन:स्थिति या रुचियों से प्रेरित होकर ही व्यवहार करते हैं। इससे प्रयोग के परिणाम पक्षपातपूर्ण एवं भ्रामक होते हैं।
(3) विषय-पात्र के सहयोग की समस्या – प्रयोगात्मक पद्धति में विषय-पात्र जब तक प्रयोगकर्ता को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान नहीं करता, तब तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। असहयोग की अवस्था में न केवल अवरोध उत्पन्न होता है, वरन् प्रयोग ही व्यर्थ हो जाता है। यदि किसी प्रयोग में व्यक्ति के व्यक्तित्व का अध्ययन किया जा रहा है तो वह व्यक्ति कभी-कभी ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करने लगता है कि उसके व्यक्तित्व का नितान्त त्रुटिपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कभी-कभी प्रयोगकर्ता पात्र की प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा ही करता रह जाता है। इससे समय और शक्ति की हानि होती है।
(4) संदिग्ध परिणाम – यदि प्रयोगकर्ता प्रशिक्षित नहीं है तो वह प्रयोग सम्बन्धी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता नहीं ला सकता जिससे परिणाम की शुद्धता संदिग्ध हो जाती है।
(5) सामाजिक घटनाओं सम्बन्धी समस्या – समाज का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है; अतः सामाजिक घटनाओं को अध्ययन हेतु किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः सामाजिक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन करने के लिए प्रयोगकर्ता को समाज की वास्तविक परिस्थितियों में रहकर काम करना होगा। इन परिस्थितियों में प्रयोगशाला एवं उसके उपकरण व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं।
(6) सीमित क्षेत्र की कठिनाई - प्रयोगात्मक विधि का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त सीमित है। इस विधि का प्रयोग हम उन सभी दशाओं में नहीं कर सकते जिनमें हम करना चाहते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रयोग द्वारा नहीं किये जा सकते। उदाहरण के लिए-स्मृति पर शराब के प्रभाव को समझने के लिए बालकों, स्त्रियों या दूसरे पात्रों को शराब नहीं पिलायी जा सकती है। इसी प्रकार प्रेम, घृणा तथा यौन क्रियाओं सम्बन्धी क्रियाकलापों पर न तो नियन्त्रण रखा जा सकता है और न ही इन्हें प्रयोगशाला में समुचित रूप में आयोजित किया जा सकता है।
मूल्यांकन – वस्तुतः प्रयोगात्मक विधि की उपर्युक्त सीमाओं के ज्ञान से उसके महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता। टी० जी० एण्डयू ज का कथन है, “प्रयोग ही मनोविज्ञान का केन्द्रीय आधार है। इस पद्धति की वैज्ञानिकता के परिणामस्वरूप ही मनोविज्ञान एक शुद्ध विज्ञान बन सका है। प्रयोगों की सफलता एवं उपयोगिता ने आधुनिक मनोविज्ञान को 'परीक्षणशाला मनोविज्ञान का नाम प्रदान कर दिया।
In simple words: प्रयोगात्मक विधि मनोविज्ञान की एक वैज्ञानिक और उन्नत अध्ययन विधि है, जिसमें नियंत्रित वातावरण में चर (independent and dependent variables) को नियंत्रित करके अध्ययन किया जाता है। इसके चरणों में समस्या का निर्धारण, परिकल्पना निर्माण, चरों को अलग करना, परिस्थितियों पर नियंत्रण, परिणामों का विश्लेषण और परिकल्पना की जाँच शामिल हैं। यह विधि कार्य-कारण संबंध स्थापित करने में मदद करती है, लेकिन इसकी कृत्रिम परिस्थितियाँ और सीमित अनुप्रयोग क्षेत्र इसकी कुछ प्रमुख कमियां हैं।
🎯 Exam Tip: प्रयोगात्मक विधि के चरणों को क्रमबद्ध रूप से याद रखना और प्रत्येक चरण को उदाहरण के साथ समझाना महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र और आश्रित चर का स्पष्टीकरण विशेष रूप से स्कोरिंग है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अन्तर्दर्शन विधि को तटस्थ मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
Answer: उत्तर : अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक विधि है। भले ही इस विधि की कुछ सीमाएँ एवं कमियाँ हैं, परन्तु इन कमियों को अभ्यास, स्मृति एवं प्रशिक्षण के माध्यम से कम किया जा सकता है तथा इस विधि को अधिक विश्वसनीय, वैज्ञानिक एवं लाभप्रद बनाया जा सकता है। इस विधि के माध्यम से पशुओं, बालकों और असामान्य तथा मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इस विधि के माध्यम से प्राप्त होने वाले निष्कर्ष आत्मगत होते हैं; अतः इस विधि द्वारा किये गये अध्ययन को कम वस्तुनिष्ठ तथा कम तथ्यात्मक माना जाता है। यही कारण है। कि मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में अन्तर्दर्शन विधि की तुलना में निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक विधियों को अधिक विश्वसनीय माना जाता है। वैसे यह सत्य है कि मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में अन्तर्दर्शन विधि का सैद्धान्तिक महत्त्व है तथा व्यवहार में इसे एक पूरक विधि के रूप में अपनाया जाता है।
In simple words: अन्तर्दर्शन विधि, एक पुरानी और मौलिक विधि होने के बावजूद, अपनी आत्मगत प्रकृति के कारण कम वस्तुनिष्ठ मानी जाती है। हालांकि, उचित प्रशिक्षण से इसकी कमियों को दूर कर इसे अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है, फिर भी यह बच्चों या मानसिक रोगियों के अध्ययन के लिए उपयुक्त नहीं है।
🎯 Exam Tip: अन्तर्दर्शन विधि के मूल्यांकन में इसकी सीमाओं और उन्हें दूर करने के उपायों पर ध्यान दें। इसकी मौलिकता के साथ-साथ इसकी वैज्ञानिकता की कमियों को भी स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 2. निरीक्षण विधि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: उत्तर : मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली निरीक्षण विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. निरीक्षण विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित विषय, व्यवहार या घटना का अध्ययन पूर्ण सावधानीपूर्वक किया जाता है।
2. इस विधि में अध्ययनकर्ता नेत्रों का पूर्णरूपेण उपयोग करता है और अध्ययन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेता है।
3. निरीक्षण विधि की सहायता से प्रायः मनोविज्ञान की अनेक समस्याओं को प्राथमिक निरीक्षण के आधार पर चुन लिया जाता है।
4. व्यक्तिगत व्यवहार के अतिरिक्त सामाजिक विकास तथा सामूहिक व्यवहार का भी अध्ययन किया जा सकता है।
5. यह विधि अकेली स्वतन्त्र विधि के रूप में प्रयुक्त होती है और सहायक विधि के रूप में भी ।
6. इस विधि के माध्यम से अध्ययन की प्राथमिक सामग्री तथा महत्त्वपूर्ण आँकड़े एकत्र किये जा सकते हैं।
In simple words: निरीक्षण विधि में व्यवहार या घटना का सावधानीपूर्वक प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है, जिससे प्राथमिक जानकारी और महत्वपूर्ण डेटा एकत्र होते हैं। यह विधि व्यक्तिगत और सामूहिक व्यवहार दोनों के अध्ययन के लिए उपयोगी है और स्वतंत्र व सहायक विधि दोनों के रूप में कार्य करती है।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण विधि की विशेषताओं को संक्षेप में और बिन्दुवार प्रस्तुत करना चाहिए। प्रत्येक विशेषता को स्पष्टता से समझाने पर बेहतर अंक मिलते हैं।
Question 3. निरीक्षण विधि के मुख्य चरणों अथवा पदों का उल्लेख कीजिए। या निरीक्षण विधि के चरणों को सोदाहरण समझाइए ।
Answer: उत्तर : निरीक्षण विधि के प्रमुख चरण अथवा पद निम्नलिखित हैं
(1) उपयुक्त योजना को निर्माण – अध्ययन को उद्देश्यपूर्ण बनाने की दृष्टि से अध्ययनकर्ता को सबसे पहले समस्या के सम्बन्ध में उपयुक्त योजना बना लेनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि किन व्यक्तियों के किस प्रकार के व्यवहार का निरीक्षण किया जाना है। अध्ययन का समय, आवश्यक यन्त्र तथा क्षेत्र आदि का निश्चय भी पहले से ही कर लेना चाहिए ।
(2) व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन – निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यवहार का प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन किया जाना चाहिए। अध्ययनकर्ता समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक पक्ष का सूक्ष्म एवं प्रत्यक्ष अध्ययन करता है। यह अध्ययन उसी स्थान पर किया जाता है जहाँ व्यवहार स्वाभाविक रूप में विद्यमान है।
(3) व्यवहार का लेखन – व्यवहार का अवलोकन करते समय उसे नोट करते जाना चाहिए; अन्यथा अध्ययनकर्ता तत्सम्बन्धी तथ्यों को या तो बाद में भूल जायेगा या उन्हें यथार्थ से भिन्न करके याद रख पायेगा। व्यवहार को संचित करने के लिए टेपरिकॉर्डर या मूवी कैमरा जैसे उपकरणों का भी प्रयोग किया जा सकता है। व्यवहार को नोट करते समय उन पक्षों पर अधिकाधिक ध्यान रखा जाना चाहिए जिनका सम्बन्ध उस समस्या से होता है।
(4) व्यवहार का विश्लेषण एवं व्याख्या – व्यवहार को नोट करने के पश्चात् उसका विश्लेषण किया जाता है। सुविधा की दृष्टि से लिखित व्यवहार को अंकों (Scores) में बदल लेना चाहिए तथा उनका सारणीयन (Tabulation) करके सांख्यिकीय विधियों की सहायता से विश्लेषण करना चाहिए। विश्लेषण कार्य से प्राप्त परिणामों की व्याख्या के उपरान्त जो सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं, उन्हें वर्ग विशेष या जाति विशेष की समस्त जनसंख्या के लिए सामान्यीकृत कर दिया जाता है। इसका अर्थ यह है कि इन्हें ऐसे सामान्य सिद्धान्तों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो सामान्य रूप से सही स्वीकार कर लिये गये हों। मनोविज्ञान के नियम सामान्यीकृत होते हैं।
In simple words: निरीक्षण विधि के चरणों में उपयुक्त योजना बनाना, व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन करना, अवलोकन को दर्ज करना, और फिर डेटा का विश्लेषण व व्याख्या करना शामिल है। इन चरणों का उद्देश्य व्यवहार के पैटर्न को समझना और सामान्य निष्कर्ष निकालना है।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण विधि के चरणों का क्रमबद्ध ज्ञान और प्रत्येक चरण का संक्षिप्त उदाहरण सहित वर्णन करने पर अधिक अंक प्राप्त होते हैं। व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर भी ध्यान दें।
Question 4. निरीक्षण विधि के दोषों का निवारण किस प्रकार किया जा सकता है?
Answer: उत्तर : भले ही निरीक्षण विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक उत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष हैं; जैसे-कि घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव, घटनाओं का नियन्त्रित न होना, पक्षपात की आशंका, निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचियों का प्रभाव, निरीक्षणकर्ता का प्रशिक्षित न होना तथा सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का अस्वाभाविक होना। निरीक्षण विधि के इन मुख्य दोषों के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –
1. निरीक्षण कार्य करते समय प्रयोगकर्ता को चाहिए कि वह अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर नियन्त्रण रखे ताकि तथ्य आत्मगत अवलोकन से दूषित न हों तथा अध्ययन की वस्तुनिष्ठता बनी रहे।
2. निरीक्षण प्रक्रिया का पर्याप्त प्रशिक्षण तथा अनुभव प्रदान करने के उपरान्त ही निरीक्षणकर्ता को क्षेत्रीय निरीक्षण के लिए भेजना चाहिए ।
3. निरीक्षणकर्ता अपनी कल्पना अथवा अनुभव का समावेश कर तथ्यों को अविश्वसनीय ने बना दे; अतः वह जैसा अवलोकन करे वैसा ही लिखे भी- इससे निरीक्षण वैज्ञानिकप्रकृति का बन सकेगा।
4. प्रयोग से पहले अपनी पूर्वधारणाओं, राग-द्वेष, पक्षपातों तथा अन्य व्यक्तिगत प्रवृत्तियों को प्रभाव न्यूनतम करने की दृष्टि से निरीक्षक को अपनी मनोवृत्तियों का विश्लेषण कर लेना चाहिए ।
5. निरीक्षण विधि से प्राप्त परिणामों की तुलना अन्तर्दर्शन एवं प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त परिणामों से करना अपेक्षाकृत लाभकारी सिद्ध होगा ।
In simple words: निरीक्षण विधि के दोषों को दूर करने के लिए, निरीक्षणकर्ता को व्यक्तिगत भावनाओं पर नियंत्रण रखना, पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त करना, तथ्यों को यथावत रिकॉर्ड करना, पूर्वधारणाओं से बचना, और अन्य विधियों के साथ परिणामों की तुलना करना आवश्यक है ताकि अध्ययन वस्तुनिष्ठ और विश्वसनीय बन सके।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण विधि के दोषों का उल्लेख करने के साथ-साथ, उनके निवारण के उपायों को स्पष्ट और व्यावहारिक बिन्दुओं में प्रस्तुत करने पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक तटस्थता पर जोर दें।
Question 5. नैदानिक विधि अथवा नैदानिक निरीक्षण (Clincial Observation) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्तर : हम जानते हैं कि मनोविज्ञान द्वारा सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि को नैदानिक विधि अथवा नैदानिक निरीक्षण कहा जाता है। इस विधि को सामान्य रूप से सम्बन्धित व्यक्ति के असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए अपनाया जाता है। इस विधि को मुख्य रूप से मनोविकारों की चिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है। इस विधि को अपनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के मनोविकारों के निहित कारणों को ज्ञात करना होता है। नैदानिक निरीक्षण के अर्थ को जी० मर्फी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “नैदानिक विधि व्यक्ति के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन करती है जिसमें उसके जीवन की प्रसन्नता एवं उसके प्रभावपूर्ण सामंजस्य का कार्य निर्भर करता है; यह विधि उसकी क्षमताओं तथा परिसीमाओं, सफलता और असफलता के कारण तथा जीवन की समस्याओं का अध्ययन करती है। इस विधि में उन कारणों का अध्ययन सम्मिलित है जो व्यक्ति के जीवन का निर्माण करते हैं या उसे बिगाड़ देते हैं।”
In simple words: नैदानिक विधि या नैदानिक निरीक्षण, मनोविज्ञान की एक विधि है जिसका उपयोग असामान्य व्यवहार या मानसिक रोगों के निदान और उनके अंतर्निहित कारणों को समझने के लिए किया जाता है। यह मुख्य रूप से मनोविकारों के उपचार के क्षेत्र में सहायक है।
🎯 Exam Tip: नैदानिक विधि की परिभाषा और उसके मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है। यह समझाना कि यह असामान्य व्यवहार के अध्ययन पर केंद्रित है, उच्च अंक दिलाता है।
Question 6. नैदानिक विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: उत्तर : मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली नैदानिक विधि के मुख्य गुण-दोषों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –
गुण – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में नैदानिक विधि का विशेष महत्त्व है। इस विधि को मुख्य रूप से व्यक्ति के असामान्य व्यवहार अथवा मनोविकारों के अध्ययन के लिए अपनाया जाता है। सामान्य रूप से व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के कारणों के निदान के लिए इस विधि को अपनाया जाता है। एक बार असामान्य व्यवहार के कारण ज्ञात हो जाने पर उसका उपचार सरल हो जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नैदानिक विधि मनोचिकित्सा के क्षेत्र में विशेष उपयोगी है। हम कह सकते हैं कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से नैदानिक विधि का अधिक महत्त्व है।
दोष – नैदानिक विधि का मुख्य दोष यह है कि यह विधि एक अत्यधिक जटिल विधि है तथा इस विधि के माध्यम से अध्ययन करने के लिए पर्याप्त अनुभवी, धैर्यवान तथा विशेषज्ञ अध्ययनकर्ता की आवश्यकता होती है। यदि नैदानिक विधि के प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाती है तो इसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
In simple words: नैदानिक विधि का मुख्य गुण यह है कि यह असामान्य व्यवहार और मनोविकारों के कारणों का निदान कर उपचार में मदद करती है, जिससे यह मनोचिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है। हालांकि, इसका मुख्य दोष इसकी जटिलता है, जिसके लिए अनुभवी और विशेषज्ञ अध्ययनकर्ता की आवश्यकता होती है, अन्यथा गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: नैदानिक विधि के गुणों और दोषों को संतुलित तरीके से प्रस्तुत करें। इसके महत्व के साथ-साथ इसकी सीमाओं को भी स्पष्ट रूप से उजागर करना चाहिए।
Question 7. मनोविज्ञान द्वारा अपनायी जाने वाली निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्तर : मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली दो मुख्य विधियाँ हैं-निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि । ये दोनों दो भिन्न विधियाँ हैं तथा इनमें स्पष्ट अन्तर है। किसी व्यक्ति के किसी सामान्य व्यवहार के अध्ययन के लिए सामान्य निरीक्षण विधि को अपनाया जाता है। इस प्रकार से निरीक्षण विधि मनोविज्ञान की एक सामान्य अध्ययन विधि है। इससे भिन्न नैदानिक निरीक्षण विधि को मुख्य रूप से मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है। इस विधि के माध्यम से व्यक्ति के असामान्य व्यवृहार के कारणों को जानने का प्रयास किया जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि नैदानिक निरीक्षण विधि को अध्ययन-क्षेत्र सामान्य निरीक्षण विधि की तुलना में सीमित है। निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि में एक अन्य अन्तर भी है। निरीक्षण विधि को केवल सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जाता है। इससे भिन्न नैदानिक निरीक्षण विधि द्वारा सम्बन्धित व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के कारणों को ज्ञात किया जाता है तथा साथ ही उस असामान्य व्यवहार के उपचार के उपाय भी सुझाये जाते हैं। इस प्रकार निरीक्षण विधि सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है, जबकि नैदानिक निरीक्षण विधि सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोणों से महत्त्वपूर्ण है।
In simple words: निरीक्षण विधि सामान्य व्यवहार के अध्ययन के लिए है और सैद्धांतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जबकि नैदानिक निरीक्षण विधि असामान्य व्यवहार के कारणों को समझने और उपचार के लिए मनोचिकित्सा के क्षेत्र में उपयोग की जाती है, जो सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण और नैदानिक निरीक्षण विधि के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उनकी परिभाषा, उद्देश्य और अनुप्रयोग के क्षेत्रों की तुलना करें। यह तुलनात्मक विश्लेषण उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होगा।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अन्तर्दर्शन विधि एक वैज्ञानिक विधि क्यों नहीं है?
Answer: उत्तर : यह सत्य है कि अन्तर्दर्शन विधि मनोविज्ञान की एक पुरानी तथा मौलिक अध्ययन विधि है, परन्तु आधुनिक मान्यताओं के अनुसार, अन्तर्दर्शन विधि को अवैज्ञानिक विधि माना
जाता है। इनका मुख्य कारण यह है कि इस विधि के माध्यम से एक समय में एक से अधिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ ढंग से अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अन्तर्दर्शन विधि एक व्यक्तिगत अध्ययन विधि है। इससे प्राप्त होने वाला ज्ञान आत्मगत तथा व्यक्तिनिष्ठ होता है। वैज्ञानिक ज्ञान का वस्तुनिष्ठ होना आवश्यक है। अतः अन्तर्दर्शन विधि को वैज्ञानिक विधि मानना सम्भव नहीं है।
In simple words: अन्तर्दर्शन विधि को अवैज्ञानिक माना जाता है क्योंकि यह आत्मगत और व्यक्तिनिष्ठ है, जिससे एक ही समय में कई मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ अध्ययन संभव नहीं है। वैज्ञानिकता के लिए वस्तुनिष्ठता आवश्यक है, जो इस विधि में अनुपस्थित है।
🎯 Exam Tip: अन्तर्दर्शन विधि की अवैज्ञानिक प्रकृति को इसकी व्यक्तिपरकता और वस्तुनिष्ठता की कमी से जोड़कर समझाएं। एक से अधिक शोधकर्ताओं द्वारा सत्यापन की अनुपस्थिति एक प्रमुख कारण है।
Question 2. निरीक्षण विधि के कोई दो गुण स्पष्ट कीजिए ।
Answer: उत्तर :
(i) निरीक्षण विधि में पर्याप्त वस्तुनिष्ठता पायी जाती है तथा इसके माध्यम से व्यापक क्षेत्र में अध्ययन किया जा सकता है। इसके साथ इस विधि के माध्यम से स्वाभाविक परिस्थितियों में अध्ययन किया जाता है।
(ii) मनोविज्ञान सामान्य व्यक्तियों के साथ-ही-साथ असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार का भी अध्ययन करता है। यह अध्ययन निरीक्षण विधि द्वारा ही किया जा सकता है। इसी प्रकार पशु व्यवहार का अध्ययन भी निरीक्षण विधि द्वारा ही किया जाता है।
In simple words: निरीक्षण विधि में पर्याप्त वस्तुनिष्ठता होती है और यह स्वाभाविक परिस्थितियों में व्यापक अध्ययन के लिए उपयुक्त है। यह सामान्य, असामान्य व्यक्तियों और पशुओं के व्यवहार का अध्ययन करने में सक्षम है।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण विधि के गुणों को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से बताएं। विशेषकर इसकी वस्तुनिष्ठता और स्वाभाविक परिस्थितियों में अध्ययन करने की क्षमता पर जोर दें।
Question 3. नैदानिक विधि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: उत्तर : मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनायी जाने वाली मुख्य अध्ययन विधि नैदानिक विधि है। इसे नैदानिक निरीक्षण विधि भी कहते हैं। इस विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. नैदानिक विधि मानसिक रोगियों तथा असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली विधि है।
2. इस विधि के माध्यम से एक समय में केवल एक व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
3. नैदानिक विधि द्वारा होने वाले अध्ययन का उद्देश्य मनोविकार के कारणों को जानना तथा उसके उपचार के उपाय सुझाना होता है।
In simple words: नैदानिक विधि मुख्य रूप से मानसिक रोगियों और असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन करती है, जिसमें एक समय में केवल एक व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित होता है। इसका उद्देश्य मनोविकारों के कारणों को समझकर उनके उपचार के उपाय सुझाना है।
🎯 Exam Tip: नैदानिक विधि की विशेषताओं में इसके लक्षित समूह (मानसिक रोगी), एक व्यक्ति पर फोकस और उपचार-उन्मुखी उद्देश्य को रेखांकित करें।
Question 4. अन्तर्दर्शन विधि तथा निरीक्षण विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्तर : अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि में अन्तर
| क्र० सं० | अन्तर्दर्शन विधि | निरीक्षण विधि |
|---|---|---|
| 1. | अन्तर्दर्शन विधि के अन्तर्गत व्यक्ति स्वयं अपना आन्तरिक अध्ययन करता है। | निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यक्ति बाह्य दशाओं एवं परिवर्तनों का अध्ययन करता है। |
| 2. | इस विधि द्वारा बालकों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता। | निरीक्षण विधि द्वारा ये अध्ययन सरलता से किया जा सकता है। |
| 3. | अन्तर्दर्शन विधि द्वारा किये गये अध्ययन को वैज्ञानिक अध्ययन नहीं माना जा सकता। | निरीक्षण विधि द्वारा किया गया अध्ययन वैज्ञानिक अध्ययन माना जाता है। |
| 4. | अन्तर्दर्शन विधि एक व्यक्तिनिष्ठ विधि है। | निरीक्षण विधि मूलरूप से एक वस्तुनिष्ठ विधि है। |
| 5. | इस विधि को केवल सीमित क्षेत्र में ही अपनाया जा सकता है। | इस विधि को व्यापक क्षेत्र में अपनाया जा सकता है। |
In simple words: अन्तर्दर्शन विधि आत्म-निरीक्षण पर आधारित एक व्यक्तिनिष्ठ विधि है जो वैज्ञानिक नहीं मानी जाती और सीमित विषयों पर लागू होती है, जबकि निरीक्षण विधि बाहरी व्यवहारों का अवलोकन करती है, वस्तुनिष्ठ है, वैज्ञानिक मानी जाती है, और इसका क्षेत्र व्यापक है।
🎯 Exam Tip: अन्तर्दर्शन और निरीक्षण विधि के अंतर को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत करना अत्यधिक प्रभावी होता है। प्रत्येक अंतर को स्पष्ट और संक्षिप्त रखें।
Question 5. निरीक्षण विधि तथा प्रयोग विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्तर : निरीक्षण विधि तथा प्रयोग विधि में अन्तर
| क्र० सं० | निरीक्षण विधि | प्रयोग विधि |
|---|---|---|
| 1. | निरीक्षण विधि के अन्तर्गत किसी उपकल्पना का निर्माण नहीं किया जाता। | प्रयोग विधि के अन्तर्गत अनिवार्य रूप से किसी उपकल्पना का निर्माण किया जाता है। |
| 2. | इस विधि द्वारा स्वाभाविक अथवा प्राकृतिक दशाओं में व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। | इस विधि द्वारा प्रयोगशाला की कृत्रिम दशाओं में व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। |
| 3. | इस विधि द्वारा अध्ययन करते समय अनेक चर सक्रिय होते हैं। | इस विधि द्वारा अध्ययन करते समय केवल स्वतन्त्र चर सक्रिय होता है, अन्य चर नियन्त्रित रहते हैं। |
| 4. | निरीक्षण विधि का क्षेत्र व्यापक है। | प्रयोग विधि का क्षेत्र सीमित है। |
In simple words: निरीक्षण विधि में उपकल्पना का निर्माण नहीं होता, यह स्वाभाविक परिस्थितियों में व्यवहार का अध्ययन करती है जिसमें कई चर सक्रिय होते हैं और इसका क्षेत्र व्यापक है। वहीं, प्रयोग विधि में उपकल्पना अनिवार्य है, यह नियंत्रित कृत्रिम परिस्थितियों में होती है जिसमें केवल स्वतंत्र चर सक्रिय होते हैं, और इसका क्षेत्र सीमित है।
🎯 Exam Tip: निरीक्षण और प्रयोग विधि के अंतर को तुलनात्मक तालिका के माध्यम से प्रस्तुत करना अधिक प्रभावी होता है। प्रत्येक अंतर बिन्दु को उनके मूल सिद्धांतों से जोड़कर समझाएं।
निश्चित उतरीय प्रश्न
Question I.1. मनोविज्ञान के विकास के प्रथम चरण में अध्ययन की मुख्य विधि __________ ही थी।
Answer: अन्तर्दर्शन विधि
In simple words: The first main method in the development of psychology was introspection. This method focuses on self-observation of one's own thoughts and feelings.
🎯 Exam Tip: Knowing the historical progression of psychological methods can help understand the evolution of the field.
Question I.2. जब व्यक्ति अपनी मानसिक क्रियाओं को स्वयं अनुभव एवं विश्लेषण करता है, तो अध्ययन की यह विधि __________ कहलाती है।
Answer: अन्तर्दर्शन विधि
In simple words: When a person experiences and analyzes their own mental processes, this method of study is called introspection. It involves looking inward at one's own conscious experience.
🎯 Exam Tip: Introspection is about self-reflection and direct observation of one's own mind.
Question I.3. मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि को __________ भी कहा जाता है।
Answer: आन्तरिक निरीक्षण
In simple words: The introspection method of psychology is also known as internal observation. It signifies the process of observing one's inner mental states.
🎯 Exam Tip: Understanding synonyms for key psychological terms can aid in comprehensive understanding.
Question I.4. __________ अध्ययन विधि का प्रमुख दोष आत्मगत परिणाम का होना है।
Answer: अन्तर्दर्शन
In simple words: A major drawback of the introspection method is that its results are subjective. This means the findings depend heavily on individual perception and are not easily verifiable by others.
🎯 Exam Tip: Subjectivity is a critical limitation of introspection, making it less scientific in some contexts.
Question I.5. अन्तर्दर्शन विधि को __________ नहीं माना जा सकता।
Answer: वैज्ञानिक विधि
In simple words: Introspection cannot be considered a scientific method in its purest form. Its subjective nature and lack of external verification make it difficult to meet scientific criteria.
🎯 Exam Tip: The scientific status of a method depends on its objectivity, replicability, and verifiability.
Question I.6. अन्तर्दर्शन विधि द्वारा प्राप्त होने वाली जानकारी सदैव __________ ही होती है।
Answer: व्यक्तिनिष्ठ
In simple words: The information obtained through the introspection method is always subjective or personal. It reflects an individual's unique experience and perspective.
🎯 Exam Tip: Emphasize the individual and personal nature of data gathered via introspection for a deeper understanding.
Question I.7. एक अबोध बालक के व्यवहार के अध्ययन के लिए __________ को नहीं अपनाया जा सकता।
Answer: अन्तर्दर्शन विधि
In simple words: The introspection method cannot be used to study the behavior of a young child. This is because young children lack the verbal and cognitive ability for self-reflection.
🎯 Exam Tip: Introspection requires verbal communication and cognitive maturity, limiting its applicability to certain populations.
Question I.8. सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का प्रत्यक्ष अध्ययन करने वाली विधि को __________ कहते हैं।
Answer: निरीक्षण विधि
In simple words: The method that involves directly observing the behavior of a person is called the observation method. It relies on external, verifiable actions rather than internal reports.
🎯 Exam Tip: Direct observation of behavior is a hallmark of the observation method, contrasting with introspection's internal focus.
Question I.9. छोटे बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए __________ ही सर्वोत्तम घिधि मानी जाती है।
Answer: निरीक्षण विधि
In simple words: For studying the behavior of small children, abnormal individuals, and animals, the observation method is considered the best. These groups often cannot articulate their internal states, making external observation crucial.
🎯 Exam Tip: The observation method is particularly useful for subjects who cannot self-report due to age, cognitive limitations, or species.
Question I.10. सामान्य रूप से __________ परिस्थितियों में निरीक्षण विधि द्वारा अध्ययन किया जाता है।
Answer: स्वाभाविक
In simple words: Generally, the observation method is used to study in natural settings. This allows for the observation of behavior as it naturally occurs, without artificial influences.
🎯 Exam Tip: Naturalistic observation is a key strength of the observation method, providing ecological validity.
Question I.11. निरीक्षणकर्ता की __________ से निरीक्षण विधि द्वारा प्राप्त निष्कर्षों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
Answer: रुचियों
In simple words: The observer's personal interests can negatively impact the conclusions drawn from the observation method. Bias can occur if the observer focuses only on what aligns with their interests.
🎯 Exam Tip: Observer bias, stemming from personal interests, is a significant challenge to the objectivity of the observation method.
Question I.12. निरीक्षणकर्ता के पूर्वाग्रह निरीक्षण विधि द्वारा किये गये अध्ययन के निष्कर्षों पर __________ प्रभाव डालते हैं।
Answer: प्रतिकूल
In simple words: The observer's preconceptions or biases have an adverse effect on the findings of a study conducted using the observation method. These biases can distort perception and interpretation of data.
🎯 Exam Tip: Prior biases of the observer can compromise the validity and reliability of observational studies.
Question I.13. मनोविज्ञान के आधुनिक विद्वानों के अनुसार मनोविज्ञान की सर्वोत्तम अध्ययन विधि __________ है।
Answer: प्रयोगात्मक विधि
In simple words: According to modern scholars of psychology, the experimental method is the best study method. It allows for controlled manipulation of variables to establish cause-and-effect relationships.
🎯 Exam Tip: The experimental method is often regarded as the most scientific due to its control and ability to determine causality.
Question I.14. मनोविज्ञान की अध्ययन विधियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक __________ विधि है।
Answer: प्रयोग
In simple words: Among the study methods in psychology, the experimental method is the most scientific. Its systematic and controlled approach allows for objective data collection and analysis.
🎯 Exam Tip: The rigor and control inherent in experimental research make it highly valued in scientific inquiry.
Question I.15. मनोविज्ञान को विज्ञान का दर्जा दिलाने का श्रेय इसकी __________ अध्ययन विधि का है।
Answer: प्रयोगात्मक
In simple words: The credit for psychology achieving the status of a science goes to its experimental study method. This method brought objectivity and empirical testing to the field.
🎯 Exam Tip: The development of experimental psychology marked a significant shift towards a scientific approach in the field.
Question I.16. सामान्यतः चर __________ और __________ प्रकार के होते हैं।
Answer: स्वतन्त्र, अग्रित
In simple words: Generally, variables are of two types: independent and dependent. The independent variable is manipulated, while the dependent variable is measured.
🎯 Exam Tip: Understanding independent and dependent variables is fundamental to comprehending experimental design.
Question I.17. प्रहस्तन द्वारा जिस चर को घटा-बढ़ाकर व्यवहार पर उसका प्रभाव ज्ञात किया जाता है, उसे __________ चर कहते हैं।
Answer: स्वतन्त्र
In simple words: The variable that is manipulated or changed to see its effect on behavior is called the independent variable. This is the variable controlled by the experimenter.
🎯 Exam Tip: The independent variable is the "cause" in a cause-and-effect relationship in experiments.
Question I.18. मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला __________ विश्वविद्यालय में __________ द्वारा स्थापित की गई।
Answer: लिपजिंग, विलियम वुण्ट,
In simple words: The first psychology laboratory was established by Wilhelm Wundt at Leipzig University. This event is considered the beginning of modern experimental psychology.
🎯 Exam Tip: Wilhelm Wundt and the Leipzig laboratory are foundational figures in the history of psychology.
Question I.19. 1879 में लिपजिंग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना __________ ने की थी।
Answer: वुण्ट
In simple words: The first psychology laboratory was established by Wundt in Leipzig in 1879. This marked the formal beginning of experimental psychology.
🎯 Exam Tip: Remembering key dates and figures like Wundt and 1879 is essential for historical context.
Question I.20. प्रयोग विधि के माध्यम से अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम एक __________ का निर्माण किया जाता है।
Answer: उपकल्पना
In simple words: To study through the experimental method, first a hypothesis is formed. A hypothesis is a testable prediction about the relationship between two or more variables.
🎯 Exam Tip: The formation of a clear, testable hypothesis is the critical first step in any experimental research.
Question I.21. असामान्य व्यवहार तथा मनोविकारों के कारणों को जानने के लिए __________ विधि को अपनाया जाता है।
Answer: नैदानिक विधि
In simple words: The clinical method is adopted to understand the causes of abnormal behavior and mental disorders. This method focuses on in-depth individual assessment and diagnosis.
🎯 Exam Tip: The clinical method is crucial in applied psychology, especially for understanding and treating mental health issues.
Question I.22. निरीक्षण विधि की तुलना में नैदानिक विधि का क्षेत्र __________ है।
Answer: सीमित
In simple words: Compared to the observation method, the scope of the clinical method is limited. It typically focuses on individual cases of abnormality rather than broad populations.
🎯 Exam Tip: The clinical method's strength lies in depth of individual understanding, not breadth of application.
Question I.23. प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है तथा अन्तर्दर्शन विधि __________ है।
Answer: अवैज्ञानिक
In simple words: The experimental method is a scientific method, while introspection is considered unscientific. This distinction arises from the objectivity and control present in experiments versus the subjectivity of introspection.
🎯 Exam Tip: Distinguishing between scientific and unscientific methods based on criteria like objectivity and replicability is important.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए
Question II.1. मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए मुख्य रूप से कौन-कौन सी विधियाँ अपनायी जाती हैं? उत्तर :
1. अन्तर्दर्शन विधि
2. निरीक्षण विधि तथा
3. प्रयोगात्मक विधि ।
Answer: अन्तर्दर्शन विधि, निरीक्षण विधि तथा प्रयोगात्मक विधि।
In simple words: The main methods used for psychological study are introspection, observation, and experimental methods. Each method offers a different approach to understanding behavior and mental processes.
🎯 Exam Tip: Be able to list and briefly describe the primary methods of psychological study for foundational knowledge.
Question II.2. अन्तर्दर्शन विधि द्वारा किस प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है? उत्तर : अन्तर्दर्शन विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति के आत्म-निरीक्षण के माध्यम से ही उसकी मानसिक क्रियाओं तथा अनुभवों आदि की जानकारी प्राप्त की जाती है।
Answer: आत्म-निरीक्षण के माध्यम से मानसिक क्रियाओं तथा अनुभवों की जानकारी।
In simple words: Introspection provides information about an individual's mental processes and experiences through self-observation. It gives insight into internal thoughts and feelings.
🎯 Exam Tip: Focus on the 'self-observation' aspect when defining the type of information obtained through introspection.
Question II.3. किन-किन विषय पात्रों का अध्ययन अन्तर्दर्शन विधि द्वारा नहीं किया जा सकता? उत्तर : अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं के व्यवहार का अध्ययन अन्तर्दर्शन विधि द्वारा नहीं किया जा सकता।
Answer: अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं का।
In simple words: Introspection cannot be used to study young children, abnormal individuals, mental patients, or animals. These subjects cannot accurately articulate their internal experiences.
🎯 Exam Tip: Remember the groups for whom introspection is unsuitable due to their inability to provide reliable self-reports.
Question II.4. निरीक्षण विधि द्वारा किन-किन विषय-पात्रों के व्यवहार का अध्ययन सफलतापूर्वक किया जा सकता है? उत्तर : अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं के व्यवहार का अध्ययन निरीक्षण विधि द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
Answer: अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं का।
In simple words: The observation method can successfully study the behavior of young children, abnormal individuals, mental patients, and animals. This is because it relies on observable actions, not self-reports.
🎯 Exam Tip: The observation method is effective for populations where verbal communication is limited or unreliable.
Question II.5. निरीक्षण विधि के मुख्य चरण अथवा पद कौन-कौन से हैं? उत्तर :
1. उपयुक्त योजना का निर्माण
2. व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन
3. व्यवहार का लेखन
4. व्यवहार का विश्लेषण एवं व्याख्या तथा
5. सामान्यीकरण ।
Answer: उपयुक्त योजना का निर्माण, व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन, व्यवहार का लेखन, व्यवहार का विश्लेषण एवं व्याख्या तथा सामान्यीकरण।
In simple words: The main steps of the observation method include planning, direct observation, recording data, analyzing and interpreting behavior, and generalizing the findings. These steps ensure a structured and systematic study.
🎯 Exam Tip: Listing the systematic steps of the observation method demonstrates an understanding of its methodology.
Question II.6. मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग विधि को सर्वप्रथम किसने और कब अपनाया था? उत्तर : मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग विधि को 1879 ई० में वुण्ट ने अपनाया था।
Answer: वुण्ट ने 1879 ई० में।
In simple words: Wilhelm Wundt first adopted the experimental method in psychological studies in 1879. This event is widely recognized as the birth of experimental psychology.
🎯 Exam Tip: Associate Wundt and the year 1879 with the pioneering use of the experimental method in psychology.
Question II.7. निरीक्षण विधि तथा अन्तर्दर्शन विधि में मुख्य अन्तर क्या है? उत्तर : निरीक्षण विधि एक वस्तुनिष्ठ विधि है, जबकि अन्तर्दर्शन विधि एक व्यक्तिनिष्ठ विधि है।
Answer: निरीक्षण विधि वस्तुनिष्ठ है, जबकि अन्तर्दर्शन विधि व्यक्तिनिष्ठ।
In simple words: The main difference is that the observation method is objective, focusing on observable behavior, while the introspection method is subjective, relying on an individual's self-reports. This distinction highlights their different approaches to data collection.
🎯 Exam Tip: Clearly differentiating between objectivity and subjectivity is key when comparing observation and introspection methods.
Question II.8. प्रयोग विधि तथा निरीक्षण विधि में विद्यमान एक मुख्य अन्तर बताइए । उत्तर : प्रयोग विधि में एक उपकल्पना का निर्माण किया जाता है, जबकि निरीक्षण विधि में उपकल्पना का निर्माण नहीं किया जाता।
Answer: प्रयोग विधि में उपकल्पना का निर्माण होता है, निरीक्षण विधि में नहीं।
In simple words: A key difference is that the experimental method involves forming a hypothesis, whereas the observation method does not necessarily require one. Experiments test specific predictions, while observations can be more exploratory.
🎯 Exam Tip: The presence or absence of a formal hypothesis is a significant distinguishing factor between experimental and observational methods.
Question II.9. नैदानिक विधि को अपनाने का मुख्य उद्देश्य क्या होता है? उत्तर : नैदानिक विधि को अपनाने को मुख्य उद्देश्य किसी असामान्य व्यवहार के कारणों को जानना होता है।
Answer: असामान्य व्यवहार के कारणों को जानना।
In simple words: The primary objective of adopting the clinical method is to identify the causes of abnormal behavior. This understanding is crucial for diagnosis and treatment planning.
🎯 Exam Tip: Remember that the clinical method is fundamentally focused on diagnosing and understanding the roots of psychological disorders.
Question II.10. नैदानिक विधि को मुख्य रूप से किस क्षेत्र में अपनाया जाता है? उत्तर : नैदानिक विधि को मुख्य रूप से मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है।
Answer: मनोचिकित्सा के क्षेत्र में।
In simple words: The clinical method is mainly applied in the field of psychotherapy. It is used by mental health professionals to assess, diagnose, and treat mental illnesses.
🎯 Exam Tip: Connect the clinical method directly with its practical application in therapeutic and psychiatric contexts.
बहुविकल्पीय प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
Question 1. मनोवैज्ञानिक अध्ययन की किस विधि के अन्तर्गत विषय-पात्र स्वयं अपनी मनोदशा आदि का विवरण प्रस्तुत करता है?
(क) निरीक्षण विधि
(ख) अन्तर्दर्शन विधि
(ग) प्रयोग विधि
(घ) ये सभी विधियाँ
Answer: (ख) अन्तर्दर्शन विधि
In simple words: Introspection is the method where individuals describe their own mental states and feelings. It involves self-observation and reporting of conscious experiences.
🎯 Exam Tip: Understand that self-reporting of internal experiences is the defining characteristic of introspection.
Question 2. निम्नलिखित में से किस मनोवैज्ञानिक पद्धति में सबसे कम वस्तुनिष्ठता पायी जाती है?
(क) निरीक्षण
(ख) नैदानिक निरीक्षण
(ग) प्रयोग
(घ) अन्तर्दर्शन
Answer: (घ) अन्तर्दर्शन
In simple words: Introspection has the least objectivity among psychological methods because it relies on individual, subjective self-reports. This makes it difficult for others to verify the observations.
🎯 Exam Tip: Recognize that a method's objectivity is reduced when it depends heavily on personal and unverifiable experiences.
Question 3. किस विधि से व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं और अनुभवों का अध्ययन कर सकता है?
(क) अन्तर्दर्शन
(ख) निरीक्षण
(ग) नैदानिक निरीक्षण,
(घ) प्रयोगात्मक
Answer: (क) अन्तर्दर्शन
In simple words: Introspection is the method where an individual studies their own mental processes and experiences. It is a direct examination of one's own consciousness.
🎯 Exam Tip: The core concept of introspection is self-study of internal mental states.
Question 4. अन्तर्दर्शन विधि को इस्तेमाल नहीं किया जा सकता
(क) किसी भी व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए
(ख) महिलाओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए।
(ग) बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए
(घ) बौद्धिक व्यक्तियों के व्यवहार के अध्ययन के लिए
Answer: (ग) बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए
In simple words: Introspection cannot be used for children, abnormal individuals, or animals because they cannot effectively communicate their internal experiences. This method requires conscious self-reporting.
🎯 Exam Tip: The inability to articulate internal states is the primary reason why introspection is not suitable for certain populations.
Question 5. किस अध्ययन विधि में बालक व पशु के व्यवहार का अध्ययन सम्भव नहीं होता?
(क) अन्तर्दर्शन विधि में
(ख) नैदानिक निरीक्षण विधि में
(ग) सामान्य निरीक्षण में
(घ) प्रयोग विधि में
Answer: (क) अन्तर्दर्शन विधि में,
In simple words: Studying the behavior of children and animals is not possible with the introspection method. This is due to their limited or absent capacity for verbal self-report.
🎯 Exam Tip: Introspection's requirement for verbal self-awareness makes it impractical for subjects lacking this ability.
Question 6. “अन्तर्दर्शन करने का अर्थ है-क्रमबद्ध रूप से अपने मन की कार्यप्रणाली का सुव्यवस्थित अध्ययन करना।”-यह परिभाषा किस मनोवैज्ञानिक ने दी है?
(क) टिचनर
(ख) मैक्डूगल
(ग) स्टाउट
(घ) गार्डनर मर्फी
Answer: (ख) मैक्डूगल
In simple words: McDougall defined introspection as the systematic study of one's own mental processes. This definition emphasizes an organized approach to self-observation.
🎯 Exam Tip: Attributing definitions to the correct psychologists is crucial for accuracy in psychology exams.
Question 7. निरीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है
(क) स्वाभाविक परिस्थितियों में
(ख) कृत्रिम परिस्थितियों में
(ग) नियन्त्रित परिस्थितियों में
(घ) हर प्रकार की परिस्थितियों में
Answer: (क) स्वाभाविक परिस्थितियों में
In simple words: The observation method is used to study an individual's behavior in natural environments. This allows for genuine, uninfluenced behavior to be observed.
🎯 Exam Tip: Naturalistic observation is a key feature of the observation method, providing ecological validity.
Question 8. निरीक्षण विधि के गुण हैं
(क) अध्ययन में पर्याप्त वस्तुनिष्ठता
(ख) व्यवहार का स्वाभाविक परिस्थितियों में अध्ययन
(ग) बच्चों तथा असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी गुण
Answer: (घ) उपर्युक्त सभी गुण
In simple words: The observation method offers several advantages, including sufficient objectivity, studying behavior in natural settings, and applicability to children and abnormal individuals. These combined strengths make it a versatile tool.
🎯 Exam Tip: When listing merits, aim for comprehensive coverage of the method's advantages.
Question 9. निरीक्षण विधि को नहीं अपनाया जा सकता
(क) व्यक्ति के व्यवहार सम्बन्धी किसी तथ्य को जानने के लिए
(ख) सम्बन्धित व्यक्ति की सामाजिक गतिविधियों को जानने के लिए
(ग) किसी व्यक्ति के मन में निहित प्रेम, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि आन्तरिक भावों को जानने के लिए
(घ) व्यक्ति के क्रियाकलापों को जानने के लिए
Answer: (ग) किसी व्यक्ति के मन में निहित प्रेम, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि आन्तरिक भावों को जानने के लिए
In simple words: The observation method cannot be used to understand internal feelings like love, jealousy, or hatred. It is limited to observing outward, visible behaviors.
🎯 Exam Tip: Remember that observation is restricted to external, overt behaviors and cannot directly access internal mental states.
Question 10. निरीक्षण विधि का दोष है
(क) घटनाओं का अनियन्त्रित होना
(ख) पक्षपात एवं निरीक्षणकर्ता की रुचियों का प्रभाव
(ग) प्रशिक्षण एवं अभ्यास का अभाव
(घ) उपर्युक्त सभी दोष
Answer: (घ) उपर्युक्त सभी दोष
In simple words: Drawbacks of the observation method include uncontrolled events, observer bias due to personal interests, and a lack of proper training or practice. These factors can compromise the reliability and validity of the findings.
🎯 Exam Tip: Acknowledge all potential limitations, such as lack of control and observer bias, when evaluating observational research.
Question 11. नियन्त्रित परिस्थिति में किये गये निरीक्षण को कहते हैं
(क) नैदानिक निरीक्षण
(ख) प्रयोग
(ग) आत्म-निरीक्षण
(घ) मूल्यांकन
Answer: (ख) प्रयोग
In simple words: Observation conducted under controlled conditions is called an experiment. Control over variables is a defining feature of experimental research.
🎯 Exam Tip: Understand that control is the key element that transforms mere observation into an experiment.
Question 12. किस विधि के द्वारा स्वाभाविक परिस्थिति में व्यवहार का अध्ययन सम्भव है?
(क) अन्तर्दर्शन
(ख) निरीक्षण
(ग) नैदानिक निरीक्षण
(घ) प्रयोगात्मक
Answer: (ख) निरीक्षण
In simple words: The observation method allows for the study of behavior in natural settings. This contrasts with experiments that often involve artificial environments.
🎯 Exam Tip: Naturalistic observation is a primary strength of the observation method for studying authentic behavior.
Question 13. प्रयोग विधि द्वारा अध्ययन करने के लिए आवश्यक है
(क) वातावरण तैयार करना
(ख) उपकल्पना का निर्माण
(ग) अनुमान लगाना
(घ) ये सभी
Answer: (ख) उपकल्पना का निर्माण
In simple words: Forming a hypothesis is essential for studying through the experimental method. A clear hypothesis guides the experiment and provides a testable prediction.
🎯 Exam Tip: A well-defined hypothesis is the foundation of any rigorous experimental study.
Question 14. मनोवैज्ञानिक अध्ययन की प्रयोग विधि की विशेषता है
(क) शुद्ध वैज्ञानिक विधि है
(ख) अध्ययन को दोहराना सम्भव है।
(ग) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि है ।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।
Answer: (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
In simple words: The experimental method in psychological study is characterized by being a purely scientific method, allowing for replication, and being objective, reliable, and comprehensive. These qualities contribute to its scientific rigor.
🎯 Exam Tip: When asked about characteristics, aim to include multiple aspects like scientific nature, replicability, and objectivity.
Question 15. नैदानिक निरीक्षण सम्बन्धित है -
(क) स्वयं को समझने से
(ख) समस्यात्मक लोगों के अध्ययन से
(ग) नियन्त्रित दशा में किये गये निरीक्षण से
(घ) व्यक्ति को शिक्षित करने से
Answer: (ख) समस्यात्मक लोगों के अध्ययन से
In simple words: Clinical observation is related to the study of individuals with problems, typically mental health issues. It focuses on understanding and addressing psychological difficulties.
🎯 Exam Tip: Associate clinical observation with the assessment and understanding of abnormal behavior and mental health concerns.
Question 16. विद्यार्थी की व्यक्तिगत समस्या समाधान के लिए उनका अध्ययन करेंगे
(क) अन्तर्दर्शन विधि से
(ख) निरीक्षण विधि से
(ग) प्रयोगात्मक विधि से
(घ) नैदानिक विधि से
Answer: (घ) नैदानिक विधि से
In simple words: To solve a student's personal problems, one would study them using the clinical method. This approach involves in-depth assessment and intervention tailored to individual needs.
🎯 Exam Tip: The clinical method is specifically designed for addressing individual problems and providing solutions.
Question 17. मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में नैदानिक विधि द्वारा अध्ययन किया जाता है
(क) व्यक्ति के दैनिक क्रियाकलापों का
(ख) परिवार के सदस्यों के आपसी व्यवहार का
(ग) असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए व्यवहार को
(घ) हर प्रकार के व्यवहार का
Answer: (ग) असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए व्यवहार को
In simple words: In psychological studies, the clinical method is used to study abnormal behavior or behavior related to the diagnosis of mental illness. Its focus is on pathology and intervention.
🎯 Exam Tip: Remember that the clinical method's primary application is in the assessment and diagnosis of psychological disorders.
Question 18. निम्नलिखित में से किस स्थिति में नैदानिक विधि को अपनाया जाएगा?
(क) सामान्य रूप से झूठ बोलने अथवा चोरी करने वाले छात्र के अध्ययन के लिए
(ख) क्रीड़ा-स्थल पर बच्चों के व्यवहार को जानने के लिए।
(ग) परीक्षा में उत्तम अंक प्राप्त करने वाले छात्र के व्यवहार को जानने के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी प्रकार के अध्ययनों के लिए
Answer: (क) सामान्य रूप से झूठ बोलने अथवा चोरी करने वाले छात्र के अध्ययन के लिए
In simple words: The clinical method would be adopted for studying a student who commonly lies or steals. These behaviors are considered problematic and require a diagnostic approach.
🎯 Exam Tip: Apply the clinical method when a problem behavior or psychological issue needs to be understood and addressed.
Question 19. मनोविज्ञान को विज्ञान का दर्जा दिये जाने का श्रेय किस विधि को दिया जाता है?
(क) अन्तर्दर्शन विधि
(ख) निरीक्षण विधि
(ग) नैदानिक निरीक्षण विधि
(घ) प्रयोग विधि
Answer: (घ) प्रयोग विधि
In simple words: The experimental method is credited with elevating psychology to the status of a science. Its controlled, objective approach allowed for empirical testing and quantifiable results.
🎯 Exam Tip: The experimental method introduced scientific rigor, which was essential for psychology to be recognized as a science.
Question 20. कौन मनोवैज्ञानिक मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला से सम्बन्धित है?
(क) फ्रायड
(ख) वाटसन
(ग) वुण्ट
(घ) टिचनर
Answer: (ग) वुण्ट
In simple words: Wilhelm Wundt is the psychologist associated with the first psychology laboratory. He is often considered the father of experimental psychology.
🎯 Exam Tip: Wundt's name is synonymous with the establishment of the first psychology laboratory and the birth of scientific psychology.
Question 21. 1879 में लिपजिंग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला किसने स्थापित की?
(क) मन
(ख) टिचनर
(ग) विलियम वुण्ट
(घ) ऐबिंगहास
Answer: (ग) विलियम वुण्ट
In simple words: Wilhelm Wundt established the first psychology laboratory in Leipzig in 1879. This foundational event marked the formal beginning of psychological research.
🎯 Exam Tip: Ensure you remember both the person (Wundt) and the specific year (1879) for this significant historical event.
Question 22. मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला स्थापित की गई थी
(क) इंग्लैण्ड में
(ख) वियना में
(ग) जर्मनी में
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ग) जर्मनी में ।
In simple words: The first psychology laboratory was established in Germany, specifically in Leipzig. This location became the birthplace of modern experimental psychology.
🎯 Exam Tip: Knowing the country (Germany) where the first psychology laboratory was founded is important for historical context.
Free study material for Psychology
UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ
Students can now access the UP Board Solutions for Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ prepared by teachers on our website. These solutions cover all questions in exercise in your Class 11 Psychology textbook. Each answer is updated based on the current academic session as per the latest UP Board syllabus.
Detailed Explanations for Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ
Our expert teachers have provided step-by-step explanations for all the difficult questions in the Class 11 Psychology chapter. Along with the final answers, we have also explained the concept behind it to help you build stronger understanding of each topic. This will be really helpful for Class 11 students who want to understand both theoretical and practical questions. By studying these UP Board Questions and Answers your basic concepts will improve a lot.
Benefits of using Psychology Class 11 Solved Papers
Using our Psychology solutions regularly students will be able to improve their logical thinking and problem-solving speed. These Class 11 solutions are a guide for self-study and homework assistance. Along with the chapter-wise solutions, you should also refer to our Revision Notes and Sample Papers for Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ to get a complete preparation experience.
FAQs
The complete and updated UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 11 Psychology are as per latest UP Board curriculum.
Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Psychology concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.
Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ will help students to get full marks in the theory paper.
Yes, we provide bilingual support for Class 11 Psychology. You can access UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ in both English and Hindi medium.
Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 11 Psychology Chapter 2 मनोविज्ञान के अध्ययन की विधियाँ in printable PDF format for offline study on any device.