UP Board Solutions Class 11 Pedagogy Chapter 23 Social Development

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Class 11 Pedagogy Chapter 23 सामाजिक विकास UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Pedagogy Chapter 23 Social Development (सामाजिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

Question 1. सामाजिक विकास से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का भी उल्लेख कीजिए। या
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। बालक के सामाजिक विकास में पारिवारिक कारक और विद्यालयी कारक की भूमिका का वर्णन कीजिए। या सामाजिक विकास क्या है?

Answer: सामाजिक विकास का अर्थ
(Meaning of Social Development)
बालक जन्म से सामाजिक नहीं होता। समाज में रहकर ही उसके अन्दर सामाजिकता का विकास होता है। शारीरिक विकास और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ उसके समाजीकरण में योग प्रदान करती हैं। सामाजिक विकास की प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है। सामाजिक विकास के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए हम यहाँ विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
1. सोरेन्सन (Sorenson) के अनुसार, “सामाजिक विकास का तात्पर्य है अपने तथा दूसरे व्यक्तियों के साथ समायोजन की शक्ति में वृद्धि ।”
2. ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति एक सामाजिक मनुष्य में परिवर्तित हो जाता है।” उपर्युक्त विवरण द्वारा सामाजिक विकास का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के द्वारा सामाजिक मान्यताओं के अनुसार अपने व्यवहार को निर्धारित करने की प्रक्रिया को सामाजिक विकास कहते हैं।
सामाजिक विकास की क्रमिक प्रक्रिया से बालक में समाज के अन्य मनुष्यों से सम्पर्क करने की योग्यता में वृद्धि होती है। सामाजिक विकास के साथ-साथ व्यक्ति की रुचियों, मनोवृत्तियों तथा आदतों में प्रौढ़ता आती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक का पारिवारिक एवं सामाजिक पर्यावरण ही उसके सामाजिक विकास को परिचालित एवं नियन्त्रित करता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति का व्यवहार एवं दृष्टिकोण समाज-सम्मत बनता है।
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Social Development)
बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. शारीरिक कारक- जिन बालकों का स्वास्थ्य ठीक नहीं होता, उनका सामाजिक विकास भी सामान्य गति से नहीं होता। शारीरिक दुर्बलता बालक में हीनता लाती है और वह अपने साथियों से अलग रहना पसन्द करता है। हीनता की यह भावना बालक के सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न करती है। बीमार और कमजोर बालक प्रायः जिद्दी और उद्दण्ड बन जाते हैं। इसके विपरीत स्वस्थ बालकों का सामाजिक विकास सामान्य ढंग से होता है। वे अपने साथियों के सम्पर्क में आकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
2. परिवार का वातावरण- परिवार वह स्थान है, जहाँ बालक का सर्वप्रथम समाजीकरण होता है। बालक परिवार के विभिन्न सदस्यों के सम्पर्क में आता है और उनके सम्पर्क में आकर अनेक बातें सीखता है। यह सीखना ही एक प्रकार का समाजीकरण एवं सामाजिक विकास है। परिवार का जैसा वातावरण होता है, वैसा ही बालक सामाजिक आचरण सीखता है। परिचितों को देखकर अभिवादन करना, बड़ों को देखकर खड़े हो जाना तथा शिष्ट एवं संयत स्वर में बोलना, परस्पर सहयोग के लिए तैयार रहना आदि सामाजिक आचरण का शिक्षण-स्थल परिवार है। बालक के सामाजिक विकास में परिवार की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, परिवार में ही रहकर बालक विभिन्न सामाजिक सद्गुणों को सीखता एवं आत्मसात् करता है। परिवार के बड़े सदस्य ही बालक की व्यक्तिगत एवं स्वार्थ सम्बन्धी मनोवृत्तियों को दूर करते हैं तथा सामाजिकता की प्रवृत्ति को पुष्ट करते हैं।
3. पालन-पोषण का स्वरूप-जिस परिवार में समस्त बालकों के साथ सामान्य व्यवहार नहीं होता और पक्षपात का बोलबाला रहता है, उस परिवार के बालकों का सामाजिक विकास ठीक प्रकार से नहीं होता। एक उपेक्षित बालक अपने अन्दर हीनता की भावना अनुभव करता है। इसके विपरीत अधिक लाड़-प्यार में पला बालक अहम् की भावना से ग्रसित हो जाता है और वह अपने को ऊँचा समझने के कारण साथियों से अलग रहने का प्रयास करता है, परन्तु जिन बालकों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता है, उनका सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से होता है।
4. पास-पड़ोस- बालक जब बड़ा होता है तो वह अपने पास-पड़ोस के सम्पर्क में आता है। इस प्रकार सामाजिक क्षेत्र बढ़ जाता है। वह पड़ोसियों से मिल-जुलकर अनेक बातें सीखता है। इस प्रकार पास-पड़ोस भी उसके सामाजिक विकास में अपना योगदान प्रदान करता है।
5. आर्थिक स्थिति- परिवार की आर्थिक स्थिति का भी प्रभाव बालक के सामाजिक विकास पर पड़ता है। जिन परिवारों में बालकों को पढ़ने-लिखने व खेलने-कूदने की अनेक सुविधाएँ होती हैं, उन परिवारों में बालक का सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप में होता है। दूसरे, सम्पन्न परिवारों के निवास की दशा तथा पड़ोस उत्तम होते हैं। परिवार के सदस्यों का सम्पर्क भी अच्छे व सुसंस्कृत व्यक्तियों से होता है। निर्धन परिवार इन सुविधाओं से वंचित रहते हैं। आर्थिक संकट परिवार में कलह और तनाव का कारण होता है। इस प्रकार के तनाव का बालक के सामाजिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
6. क्लब और दल- जो बालक किसी क्लब या दल के सदस्य होते हैं, उनमें अन्य बालकों की अपेक्षा सामाजिकता की भावना अधिक पायी जाती है। क्लब और दल के सदस्यों में परस्पर सहयोग की भावना होती है। बालक क्लब या दल के सदस्य के रूप में शिष्टाचार और सद्व्यवहार आदान-प्रदान करते हैं तथा विभिन्न समारोहों का आयोजन करते हैं। ये समस्त क्रियाएँ बालक के सामाजिक विकास में परम सहायक होती हैं।
7. संवेगात्मक विकास- क्रो व क्रो के अनुसार, “संवेगात्मक और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं।” जो बालक क्रोधी तथा ईष्यालु स्वभाव के होते हैं, उन्हें समाज में आदर नहीं मिलता और न ही वे अन्य व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो पाते हैं। इसके विपरीत एक हँसमुख और उत्साही स्वभाव का बालक शीघ्र ही लोकप्रिय हो जाता है और उसके सम्पर्क में प्रत्येक व्यक्ति आना चाहता है।
8. बालक-बालिका का सम्बन्ध - बालक-बालिकाओं के पारस्परिक सम्बन्ध भी सामाजिक विकास पर प्रभाव डालते हैं। किशोरावस्था में बालक-बालिकाएँ परस्पर मिलने-जुलने में विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं। यदि उन्हें मिलने-जुलने की स्वतन्त्रता रहती है, तो उनका सामाजिक विकास स्वाभाविक गति से होता रहता है, अन्यथा अवरोध उत्पन्न हो जाता है। हमारे देश में किशोर-किशोरियों को परस्पर मिलने-जुलने की स्वतन्त्रता नहीं है। इस कारण बालकों का सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से नहीं हो पाता और उनमें अनुशासनहीनता की भावना पायी जाती है।
9. सामाजिक व्यवस्था- समाज का स्वरूप या व्यवस्था का प्रभाव बालक के सामाजिक विकास पर पड़ता है। प्रत्येक बालक अपने समाज के स्वरूप, आदर्श और प्रतिमानों से प्रभावित होता है और उसी के अनुसार उसके जीवन के दृष्टिकोण का निर्धारण होता है। इस कारण ही लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था तथा अधिनायकतन्त्रात्मक व्यवस्था में पलने वाले बालकों के आचरण में पर्याप्त अन्तर होता है।
10. विद्यालय का योगदान- परिवार के बाद बालक के सामाजिक विकास में योगदान देने वाला दूसरा - तत्त्व विद्यालय है।-घर के पश्चात् बालक का अधिकांश समय विद्यालय में ही व्यतीत होता है। जिन विद्यालयों में अध्यापकों का व्यवहार लोकतांत्रिक होता है तथा बालकों को पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलती है और खेलकूद तथा समारोहों में भाग लेने के अवसर मिलते हैं, वहाँ बालकों का समाजीकरण स्वाभाविक ढंग से चलता रहता है। यदि विद्यालय में दमन और कठोर अनुशासन को ही महत्त्व दिया जाता है तथा विभिन्न सामूहिक खेलकूद और अन्य क्रियाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है तो वहाँ बालकों का सामाजिक विकास समुचित ढंग से नहीं हो पाता।
विद्यालय में शिक्षक द्वारा किया गया दैनिक व्यवहार बालक के सामाजिक विकास को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यदि शिक्षक बालकों की भावनाओं का आदर करता है तथा समय-समय पर उनका सहयोग लेता है। और कक्षा में उन्हें वाद-विवाद के अवसर प्रदान करता है, तो छात्रों में समाजीकरण की प्रक्रिया तीव्रता से होगी। इसके विपरीत यदि शिक्षक शुष्क और निरंकुश प्रवृत्ति का है और बालकों के साथ उसका व्यवहार ताड़नायुक्त तथा उपेक्षा का है तो ऐसे वातावरण में बालकों का सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाएगा।
In simple words: सामाजिक विकास वह प्रक्रिया है जिससे बच्चा समाज में रहकर सामाजिक व्यवहार और गुणों को सीखता है। इसे शारीरिक स्वास्थ्य, परिवार, पड़ोस, आर्थिक स्थिति, समूह, भावनात्मक विकास, लड़के-लड़कियों के सम्बन्ध, सामाजिक व्यवस्था और विद्यालय जैसे कई कारक प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में सामाजिक विकास की परिभाषा और उसे प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत वर्णन आवश्यक है। विभिन्न विद्वानों के विचारों और हर कारक की स्पष्ट व्याख्या महत्वपूर्ण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शैशवावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: शैशवावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Infancy)
नवजात शिशु में किसी प्रकार का सामाजिक विकास देखने को नहीं मिलता। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “जन्म के समय शिशु न तो सामाजिक प्राणी होता है और न असामाजिक, परन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं बनी रहती। धीरे-धीरे शिशु अपनी माता या परिचारिका के सम्पर्क में आकर अनेक प्रतिक्रियाएँ प्रकट करता है। उसकी यह प्रतिक्रिया विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। उसका हर्ष एवं रुदन इसी के अनेक रूपों में से एक है। प्रथम मास तक शिशु साधारण आवाजें तथा मनुष्य की आवाज में कोई अन्तर नहीं कर पाता। परन्तु दूसरे मास में वह यह अन्तर जान जाता है। माता जब बच्चे को पुचकारती है तो वह मुस्कराने लगता है।
म्यूलर के अनुसार, दो मास के पश्चात् ही शिशु सामाजिक प्रतिक्रियाओं को प्रारम्भ करता है। उसके अनुसार दो मास के 60 प्रतिशत बालक माँ या परिचारिका के हट जाने पर रोने लगते हैं तथा माँ या पिता को देखकर मुस्कराने लगते हैं। चौथे मास तक शिशु उन बालकों तथा व्यक्तियों में रुचि दिखाने लगता है, जो उसके प्रति विशेष प्रेम प्रकट करते हैं। पाँचवें तथा छठे मास तक वह स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा ताड़ना में अन्तर करने लगता है। जब उसे देखकर कोई मुस्कराता है तो वह मुस्कराने लग जाता है और यदि कोई डाँटता है तो वह रोने लग जाता है। सात या आठ मास का शिशु परिचित तथा अपरिचित में कुछ-कुछ भेद करने लग जाता है। नौ मास का शिशु प्रौढ़ों की विभिन्न क्रियाओं और शब्दों का अनुकरण करने का प्रयास करता है।
एक वर्ष का शिशु उन कार्यों को नहीं करता, जिनके लिए उसे मना किया जाता है। दो वर्ष की आयु के बालक अन्य व्यक्तियों के साथ किसी कार्य में सहयोग देने में विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं। तीसरे वर्ष में बालक अपने साथियों के साथ खेलने में विशेष आनन्द लेता है। चार से छः वर्ष का बालक अभिभावक के संरक्षण में रहकर कार्य करना चाहता है। अब वह नवीन मित्रों की तलाश में रहता है तथा सामूहिक खेल-कूद में उसे विशेष आनन्द आता है। इस अवस्था के शिशु में सामाजिकता का पर्याप्त विकास हो जाता है।
In simple words: शैशवावस्था में शिशु धीरे-धीरे सामाजिक होता है। वह पहले माँ-बाप को पहचानता है, फिर दूसरों के प्रति प्रतिक्रियाएँ देने लगता है और खेलने-कूदने में रुचि लेता है, जिससे उसकी सामाजिकता बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: शैशवावस्था में सामाजिक विकास के चरणों और प्रमुख व्यवहारगत परिवर्तनों पर ध्यान दें, साथ ही विभिन्न विद्वानों के मतों का उल्लेख करें।

 

Question 2. बाल्यावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: बाल्यावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Childhood)
बाल्यावस्था में सामाजिक विकास तीव्रता से होता है। प्रायः इस अवस्था के बालक ही विद्यालय में प्रवेश लेते हैं। विद्यालय में बालक अपने जैसे अनेक बालकों के सम्पर्क में आता है। यह सम्पर्क ही उसे सामाजिक प्राणी बनाता है। वह शीघ्रता से नवीन वातावरण के अनुकूल अपने को ढालने का प्रयास करता है। अनुकूलन के पश्चात् ही उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है तथा उसमें उत्तरदायित्व और स्वतन्त्रता की भावना का विकास होता है। इस अवस्था के बालकों का किसी-न-किसी टोली या समूह से सम्बन्ध होता है।
अपनी टोली के प्रति प्रत्येक बालक की अटूट श्रद्धा होती है। टोली की सदस्यता से ही बालक का सामाजिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक के सामाजिक विकास पर सहपाठियों एवं मित्रों के अतिरिक्त कक्षा के अध्यापकों का भी गम्भीर प्रभाव पड़ता है। अध्यापकों द्वारा बालकों को अनेक सामाजिक सद्गुणों की जानकारी प्रदान की जाती है। विद्यालय आने-जाने के समय भी बालकों का सम्पर्क रिक्शा अथवा बस के साथियों आदि से होता है। इस सम्पर्क से भी उनके सामाजिक विकास में उल्लेखनीय योगदान प्राप्त होता है।
In simple words: बाल्यावस्था में बच्चे स्कूल जाते हैं, जहाँ वे अपने साथियों और शिक्षकों के साथ बातचीत करके सामाजिक गुण सीखते हैं, टोली बनाते हैं और नए वातावरण के अनुकूल खुद को ढालते हैं।

🎯 Exam Tip: बाल्यावस्था में विद्यालय और समवयस्क समूहों (टोली) की भूमिका पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण कारक हैं।

 

Question 3. किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का उल्लेख कीजिए। या बालकों अथवा बालिकाओं में किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का वर्णन कीजिए।
Answer: किशोरावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Adolescence)
किशोरावस्था में बालक अपने वातावरण के प्रति जागरूक हो जाता है और उसके सामाजिक विकास पर परिवार, साथियों तथा विद्यालय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। इस अवस्था में किशोर अपने को सम्मानित देखना चाहता है। वह चाहता है कि घर के अन्दर और घर के बाहर सब स्थानों पर उसे सम्मान मिले और इस सम्मान की प्राप्ति में वह प्रौढ़ों के समान व्यवहार करने लग जाता है। इस अवस्था में किशोर के सामाजिक व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। अब बाल्यकाल की चंचलता गम्भीरता में परिवर्तित हो जाती है। वह अपने आचरणों में दिखावट का प्रदर्शन करने लगता है। प्रत्येक किशोर अपनी आर्थिक स्थिति को अपने अन्य मित्रों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का प्रयास करता है।
वह मित्रता के महत्त्व को भी समझने लगता है और अपनी रुचि के अनुकूल ही किसी किशोर को ही अपना घनिष्ठ मित्र बनाता है। किशोरावस्था में बालक बालिकाओं के प्रति तथा बालिकाएँ बालकों के प्रति आकर्षित होती हैं। इस आकर्षण के लिए वे अपने वस्त्र, वेशभूषा तथा प्रसाधनों के प्रति विशेष जागरूक रहते हैं। किशोर तथा किशोरियाँ किसी-न-किसी समुदाय के सदस्य बन जाते हैं। इन समुदायों का मूल उद्देश्य पिकनिक, भ्रमण, नाटक खेलना, नृत्य व संगीत द्वारा मनोरंजन करना होता है।
प्रत्येक किशोर अपने समूह या समुदाय के प्रति अटूट श्रद्धा रखता है तथा उसे परिवार और विद्यालय से भी अधिक महत्त्व देता है। इसके साथ-ही-साथ किशोर समुदाय का सदस्य बनकर उसके द्वारा स्वीकृत वेशभूषा, आचरण आदि को भी व्यवहार में लाता है। डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “किशोर में अपने समुदाय की वेशभूषा, व्यवहार शैली और अनुकरण की प्रबल प्रवृत्ति होती है। समुदाय के प्रति सदस्यों की निष्ठा इतनी पक्की होती है कि वे पढ़ाई और परिवार के आवश्यक कार्य भी छोड़कर समुदाय के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। सदस्यों के व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन के मूल्यों पर समुदायों की गहरी छाप । रहती है।' समुदाय का सदस्य बनकर ही किशोर नेतृत्व की शिक्षा प्राप्त करता है तथा उसमें उत्साह, सहयोग, सहानुभूति आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है।
In simple words: किशोरावस्था में किशोर सम्मान चाहते हैं, गम्भीर हो जाते हैं और अपनी पहचान व सामाजिक समूहों को महत्व देते हैं। वे मित्रता बनाते हैं, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होते हैं और अपने समुदाय के मूल्यों व व्यवहारों को अपनाकर नेतृत्व के गुण विकसित करते हैं।

🎯 Exam Tip: किशोरावस्था में सामाजिक व्यवहार में आने वाले क्रान्तिकारी परिवर्तनों, मित्रता और समूह के प्रभाव पर फोकस करें। परिभाषाओं और विद्वानों के उद्धरणों का समावेश उत्तर को सशक्त बनाता है।

 

Question 4. बालक के उचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षक द्वारा क्या भूमिका निभायी जा सकती है ? या
बच्चों में सामाजिक विकास करने के लिए स्कूल को क्या करना चाहिए? या बच्चों में सामाजिक विकास को उन्नत करने के लिए स्कूल में क्या करना चाहिए?

Answer: सामाजिक विकास के लिए शिक्षक की भूमिका
(Role of Teacher for Social Development)
बालक के सामाजिक विकास में शिक्षा किस प्रकार सहायक हो सकती है, इसके लिए शिक्षक को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-
1. शिक्षक को स्वयं सामाजिक व्यवहार में प्रवीण होना चाहिए। उसे छात्रों के साथ सदा विनम्रता और शिष्टता का व्यवहार करना चाहिए ।
2. विद्यालय में अनुशासन की स्थापना में छात्रों से सहयोग लेना चाहिए तथा उन्हें अनुशासन की स्थापना का उत्तरदायित्व सौंपना चाहिए।
3. विद्यालय में समय-समय पर विभिन्न प्रकार के उत्सवों, समारोहों तथा संगीत सम्मेलनों का आयोजन किया जाना चाहिए तथा उनकी व्यवस्था में छात्रों का सहयोग लेना चाहिए। आमन्त्रित अतिथियों का स्वागत भी छात्रों द्वारा ही करवाया जाना चाहिए ।
4. छात्रों को श्रमदान द्वारा समाज-सेवा करने को प्रोत्साहित किया जाए तथा साक्षरता प्रसार में भी उनका सहयोग प्राप्त किया जाए ।
5. विद्यालय को समाज का लघु रूप बनाया जाए तथा समाज के सदस्यों को विद्यालय के कार्यक्रमों में आमन्त्रित किया जाए ।
6. बालकों में सामाजिक गुणों का विकास करने के लिए पाठ्यक्रम में सामाजिक शिक्षा को भी स्थान दिया जाए।
7. स्काउटिंग सामाजिक विकास में विशेष सहायक होती है। अतः विद्यालय में इसका आयोजन प्रभावशाली ढंग से किया जाए ।
8. विद्यालय में विभिन्न सामूहिक खेलकूदों का आयोजन हो तथा छात्रों को उसमें भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए।
9. बालकों में सामूहिक प्रवृत्ति होती है। वे इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करना चाहते हैं। शिक्षक का कर्तव्य है। कि वे इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिए विद्यालय में उन कार्यक्रमों का आयोजन करें, जिनसे बालकों की सामूहिक प्रवृत्ति सन्तुष्ट हो सके ।
10. बालकों में समुचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षक को उनकी अनुकरण, संकेत और सहानुभूति की प्रवृत्ति का उचित ढंग से प्रयोग करना चाहिए।
In simple words: शिक्षक को बच्चों के सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। उसे स्वयं एक अच्छा सामाजिक व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए, छात्रों को अनुशासन, सहयोग, सामाजिक सेवा और सामूहिक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, जिससे वे सामाजिक गुणों को सीख सकें।

🎯 Exam Tip: शिक्षक की भूमिका को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक बिन्दु को स्पष्ट और संक्षिप्त रखें, और यह दर्शाएं कि कैसे विद्यालय का वातावरण सामाजिक विकास को बढ़ावा दे सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. बालक के सामाजिक विकास में मित्रों एवं खेल-समूह की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बालक के सामाजिक विकास में उसके मित्रों एवं खेल-समूह द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। सभी बालक अपने मित्रों से अनेक सामाजिक गुणों को सीखते हैं। खेल के दौरान बच्चों में सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तथा एक-दूसरे की सहायता करने के गुणों का विकास होता है। इन सामाजिक गुणों का बालक के सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक के मित्र एवं खेल-समूह सदैव अच्छा होना चाहिए। किसी विकृत बालक की मित्रता प्रायः हानिकारक होती
In simple words: मित्रों और खेल-समूह से बच्चे सहयोग, प्रतिस्पर्धा और सहायता जैसे सामाजिक गुण सीखते हैं, जो उनके सामाजिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह आवश्यक है कि मित्र समूह सकारात्मक हो।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में मित्रों और खेल-समूह से प्राप्त होने वाले सामाजिक गुणों पर विशेष जोर दें, जैसे सहयोग और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा।

 

Question 2. सामाजिक विकास के मुख्य स्तरों का उल्लेख कीजिए।
Answer: व्यक्ति अथवा बालक का सामाजिक विकास क्रमिक रूप में होता है। इसके मुख्य रूप से तीन स्तर माने गये हैं। प्रथम स्तर है-दूसरों के प्रति चेतना का स्तर। इस स्तर पर बालक अन्य व्यक्तियों के प्रति सचेत हो जाता है। वह अन्य व्यक्तियों को पहचानने लगता है। द्वितीय स्तर है-मेल-जोल का स्तर । इस स्तर पर बालक में सामूहिकता के गुण का विकास होता है। वह अन्य व्यक्तियों के साथ अन्तःक्रिया करना प्रारम्भ कर देता है। यह बाल्यावस्था का स्तर है। इस स्तर पर खेल-समूह का विशेष महत्त्व होता है। सामाजिक-विकास का तीसरा स्तर है-सम्बन्धों में परिवर्तन का स्तर। इस स्तर पर बालक में लिंग-भेद की जागरूकता आ जाती है तथा उसका प्रभाव उसके व्यवहार पर भी पड़ने लगता है।
In simple words: सामाजिक विकास के तीन मुख्य स्तर हैं: दूसरों के प्रति चेतना (पहचानना), मेल-जोल (सामूहिकता और अन्तःक्रिया), और सम्बन्धों में परिवर्तन (लिंग-भेद की समझ)।

🎯 Exam Tip: सामाजिक विकास के तीनों स्तरों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और प्रत्येक स्तर की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में बताएं।

 

Question 3. सामाजिक विकास का शैक्षिक महत्त्व क्या हो सकता है?
Answer: सामाजिक विकास का समुचित शैक्षिक महत्त्व है। सामाजिक विकास के लिए व्यापक सामाजिक सम्पर्क आवश्यक होता है। इस प्रकार से सामाजिक सम्पर्क की स्थापना से व्यक्ति अनेक प्रकार की जानकारी एवं ज्ञान भी अर्जित करता है अर्थात् उसका शैक्षिक विकास भी होता है। सामाजिक विकास के माध्यम से व्यक्ति विभिन्न सामाजिक सद्गुणों, मान्यताओं, नियमों आदि को आत्मसात् करता है। इस प्रक्रिया का पर्याप्त शैक्षिक महत्त्व है। सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप बालक अनुशासन सीखता है। अनुशासन का शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक महत्त्व है। इस दृष्टिकोण से भी सामाजिक विकास का उल्लेखनीय शैक्षिक महत्त्व है।
In simple words: सामाजिक विकास शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को सामाजिक सम्पर्क, ज्ञान, सद्गुण, मान्यताएं, नियम और अनुशासन सीखने में मदद करता है, जिससे उनका समग्र शैक्षिक विकास होता है।

🎯 Exam Tip: शैक्षिक महत्व बताते समय सामाजिक सम्पर्क, ज्ञानार्जन, सद्गुणों और अनुशासन के विकास जैसे प्रमुख बिन्दुओं को उजागर करें।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. मानव-शिशु का एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होना किस प्रकार का विकास कहलाता है ?
Answer: मानव-शिशु का एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होना बालक का सामाजिक विकास कहलाता है।
In simple words: मानव-शिशु का सामाजिक प्राणी बनना ही सामाजिक विकास कहलाता है।

🎯 Exam Tip: यह एक सीधा परिभाषा-आधारित प्रश्न है; सटीक और संक्षिप्त उत्तर दें।

 

Question 2. मानव-शिशु के सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक क्या है?
Answer: मानव-शिशु के सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक है-सामाजिक सम्पर्क ।
In simple words: सामाजिक सम्पर्क मानव-शिशु के सामाजिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

🎯 Exam Tip: ‘सामाजिक सम्पर्क’ को सटीक उत्तर के रूप में पहचानें और लिखें।

 

Question 3. “समाजीकरण की प्रक्रिया अन्य व्यक्तियों के साथ शिशु के सम्पर्क से प्रारम्भ होती है और जीवन-पर्यन्त चलती रहती हैं।” यह कथन किसका है ?
Answer: प्रस्तुत कथन गिलफोर्ड का है
In simple words: यह कथन प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक गिलफोर्ड का है।

🎯 Exam Tip: उद्धरणों और उनके लेखकों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. शिशु के सामाजिक विकास की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका किस सामाजिक संस्था की होती
Answer: शिशु के सामाजिक विकास की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका 'परिवार' नामक सामाजिक संस्था की होती है।
In simple words: शिशु के सामाजिक विकास में परिवार की भूमिका सबसे मुख्य होती है।

🎯 Exam Tip: परिवार को शिशु के प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था के रूप में पहचानें।

 

Question 5. बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer:
1. शारीरिक कारक
2. परिवार का वातावरण
3. पास-पड़ोस तथा
4. परिवार की आर्थिक स्थिति
In simple words: बालक के सामाजिक विकास को शारीरिक स्वास्थ्य, पारिवारिक वातावरण, पड़ोस और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे कारक मुख्य रूप से प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: केवल चार प्रमुख कारकों को सटीक रूप से सूचीबद्ध करें।

 

Question 6. कोई ऐसा उदाहरण दीजिए, जिससे स्पष्ट हो जाए कि सामाजिक सम्पर्क के अभाव में मानव-शिशु का सामाजिक विकास सम्भव नहीं है ?
Answer: एक उदाहरण है-भेड़ियों द्वारा मानव-शिशु के पालन-पोषण करने का। यह मानव-शिशु सामाजिक सम्पर्क के अभाव में रहा तथा उसका सामाजिक विकास बिल्कुल नहीं हो पाया।
In simple words: भेड़ियों द्वारा पाले गए मानव-शिशु का उदाहरण दर्शाता है कि सामाजिक सम्पर्क के बिना बालक का सामाजिक विकास नहीं हो पाता।

🎯 Exam Tip: इस उदाहरण को याद रखें और स्पष्ट करें कि यह सामाजिक सम्पर्क के महत्व को कैसे दर्शाता है।

 

Question 7. निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य
1. सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप ही मानव-शिशु सामाजिक प्राणी बनती है
2. सामाजिक विकास के लिए सामाजिक सम्पर्क कोई अनिवार्य शर्त नहीं है
3. बालक के सामाजिक विकास में उसके मित्रों एवं खेल-समूह का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है
4. बालक के सामाजिक विकास में शिक्षा का कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं होता
5. बालक की विकलांगता उसके सामाजिक विकास में बाधक होती है
6. संवेगात्मक रूप से विकृत बालक का सामाजिक विकासे भी सुचारु नहीं हो पाता
Answer:
1. सत्य
2. असत्य
3. सत्य
4. असत्य
5. सत्य
6. सत्य
In simple words: यह कथन सामाजिक विकास के विभिन्न पहलुओं, जैसे मानव के सामाजिक प्राणी बनने, सामाजिक सम्पर्क की आवश्यकता, मित्र-समूह का महत्व, शिक्षा की भूमिका, विकलांगता के प्रभाव और संवेगात्मक स्थिरता के प्रभाव पर आधारित हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक कथन को ध्यान से पढ़ें और सामाजिक विकास के सिद्धांतों के आधार पर सत्य या असत्य निर्धारित करें।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

 

Question 1. सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति का व्यवहार बनता है
(क) उदार एवं परोपकारी
(ख) सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप
(ग) समाज विरोधी
(घ) स्वच्छन्द एवं मुक्त

Answer: (ख) सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप
In simple words: सामाजिक विकास से व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों और अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार करना सीखता है।

🎯 Exam Tip: सामाजिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामाजिक मान्यताओं और मानदंडों के अनुकूल व्यवहार करना सीखना है।

 

Question 2. सामाजिक विकास की प्रक्रिया चलती है
(क) शैशवावस्था में
(ख) विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने तक
(ग) जीवन-पर्यन्त
(घ) युवावस्था तक

Answer: (ग) जीवन-पर्यन्त
In simple words: सामाजिक विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक चलती रहती है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि सामाजिक विकास एक सतत और आजीवन प्रक्रिया है।

 

Question 3. बालक के सामाजिक विकास में बाधक कारक है
(क) बुरा स्वास्थ्य
(ख) विकलांगता
(ग) निम्न आर्थिक स्थिति
(घ) ये सभी

Answer: (घ) ये सभी
In simple words: बुरा स्वास्थ्य, विकलांगता और निम्न आर्थिक स्थिति - ये सभी बालक के सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न नकारात्मक कारकों को समझें।

 

Question 4. व्यक्ति के सामाजिक विकास में सर्वाधिक योगदान होता है
(क) परिवार का
(ख) व्यवसाय का
(ग) क्लब एवं मनोरंजन संस्थानों का
(घ) कार्यालय का

Answer: (क) परिवार का
In simple words: व्यक्ति के सामाजिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान परिवार का होता है, क्योंकि यहीं से समाजीकरण की शुरुआत होती है।

🎯 Exam Tip: परिवार समाजीकरण की प्राथमिक संस्था है और इसका योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है।

 

Question 5. बालक का समाजीकरण किस अवस्था में सबसे अधिक होता है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

Answer: (ग) किशोरावस्था
In simple words: किशोरावस्था में बालक का समाजीकरण सबसे अधिक तीव्रता से होता है, क्योंकि इस दौरान वे अपनी पहचान और सामाजिक भूमिकाओं को विकसित करते हैं।

🎯 Exam Tip: किशोरावस्था सामाजिक विकास और पहचान निर्माण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चरण है।

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