UP Board Solutions Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method

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Detailed Chapter 13 परियोजना विधि UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy

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Class 11 Pedagogy Chapter 13 परियोजना विधि UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method (योजना अथवा प्रोजेक्ट पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शिक्षा की योजना पद्धति (Project Method) से आप क्या समझते हैं? इस पद्धति के मुख्य सिद्धान्तों का भी उल्लेख कीजिए ।
या
प्रोजेक्ट विधि के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं?
Answer: आधुनिक शिक्षा पद्धतियों में प्रोजेक्ट या योजना पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस पद्धति के प्रवर्तक जॉन डीवी के शिष्य अमरीकन शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक थे। ये कोलम्बिया विश्वविद्यालय के अध्यापकों के कॉलेज में शिक्षाशास्त्र के प्रोफेसर थे। डीवी (Dewey) के प्रयोजनवाद के सिद्धान्तों के आधार पर ही इन्होंने योजना शिक्षा-पद्धति का निर्माण किया। प्रारम्भ में इस पद्धति का प्रयोग कृषि के कार्यों में किया जाता था, परन्तु कालान्तर में इस पद्धति का प्रयोग अन्य क्षेत्रों में भी होने लगा। इस पद्धति में पाठय-विषय का अध्ययन कराने के स्थान पर उसे प्रत्यक्ष रूप से समझाया जाता है।

योजना पद्धति का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Project Method)

योजना पद्धति के जनक किलपैट्रिक का कथन है कि कार्य दो प्रकार से किया जाता है-योजना बनाकर और बिना योजना के। योजना वाले कार्यों में भी कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जो जीवन की समस्या से सम्बन्धित होते हैं और कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिनका जीवन की समस्याओं से कोई सम्बन्ध नहीं होता। योजना शिक्षा पद्धति के अनुसार बालक जो कार्य करते हैं, वे पूर्व निर्धारित होते हैं और जीवन की समस्याओं से सम्बन्धित होते हैं; जैसे-विद्यालय में सूत कातती हुई लड़कियों से यदि कह दिया जाए कि उस सूत से उनके लिए साड़ियाँ बनवाई जाएँगी तो वे और मन लगाकर तीव्र गति से कार्य करेंगी। इस प्रकार कार्यों को उद्देश्यपूर्ण, सार्थक, रोचक और स्वाभाविक बनाया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि योजना सोद्देश्य, स्वाभाविक, सार्थक एवं रुचिपूर्ण कार्य का आयोजन है। योजना शब्द की प्रमुख परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है-
1. किलपैट्रिक के अनुसार, “योजना वह सहृदय उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो पूर्ण संलग्नता से सामाजिक वातावरण में किया जाए।”
2. रायबर्न के अनुसार, “योजना वह उद्देश्यपूर्ण कार्य है जिसे सहयोग तथा सद्भावना से बालक स्वेच्छापूर्वक पूरा करने का प्रयास करते हैं।”
3. थॉमस और लैंग के अनुसार, “योजना इच्छानुसार ऐसा कार्य है, जिसमें रचनात्मक प्रयास आपका विचार हो और जिसका कुछ साकार परिणाम हो ।”
4. बेलार्ड के अनुसार, “योजना वास्तविक जीवन का एक भाग है जो कि विद्यालय में प्रयोग किया जाता
5. स्टीवेन्सन के अनुसार, “योजना एक समस्यामूलक कार्य है जो अपनी स्वाभाविक परिस्थितियों के । अन्तर्गत पूर्णता को प्राप्त करता है।”
6. किलपैट्रिक की संशोधित परिभाषा, “योजना सोद्देश्य अनुभव की कोई इकाई, सोद्देश्य क्रिया का कोई उदाहरण है जहाँ पर प्रभावशाली प्रयोजन एक आन्तरिक प्रवृत्ति के रूप में कार्य के उद्देश्य को निर्धारित करता है, क्रिया का पथ-प्रदर्शन करता है और उसे प्रेरणा देता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि “योजना एक जीवन अनुभव है जो एक प्रबल इच्छा से प्रेरित होता है और इस इच्छा का प्रयोग ही योजना पद्धति का आधार है।”

योजना पद्धति के सिद्धान्त (Principles of Project Method)

योजना पद्धति एक नई शिक्षा-पद्धति है, जिसका निर्माण अमेरिका में शिक्षा के क्षेत्र में प्रचलित प्राचीन परम्पराओं की प्रतिक्रियास्वरूप हुआ है। यह पद्धति 'करके सीखने' (Learning by doing) के साथ-साथ रहकर सीखने' (Learning by living) परे भी बल देती है। इस पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-
1. उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त- इस पद्धति के अनुसार बालकों के सम्मुख कोई भी कार्य समस्या के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है और उसे पूरा करने में कोई उद्देश्य निहित रहता है। उद्देश्य के अभाव में योजना निरर्थक हो जाती है, क्योंकि कोई भी कार्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जब बालक के सामने कोई उद्देश्य स्पष्ट होता है तो वह उत्तेजित होकर मन लगाकर काम करता है उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त है। इसका परिणाम यह होता है कि बालक कम समय में अधिक ज्ञान क्रियाशीलता का सिद्धान्त प्राप्त कर लेते हैं।
2. क्रियाशीलता का सिद्धान्त- बालक स्वभावतः क्रियाशील होते हैं, इसलिए यह पद्धति बालक की क्रियाशीलता का सदुपयोग । करने में विश्वास करती है। इस पद्धति में बालकों को क्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है, क्योंकि जो भी ज्ञान स्वयं कार्य करके प्राप्त किया जाता है, वह अधिक स्थायी होता है, इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके बालक को व्यावहारिक क्रिया के आधार पर शिक्षा देनी चाहिए, जिससे बालक उत्साहपूर्वक सीख सके ।
3. अनुभव का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालक अनुभवों को अर्जित करके शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस पद्धति के द्वारा बालक को ऐसे अनुभव प्रदान किए जाते हैं, जो उसके जीवन में काम आ सकें । यह अनुभव वे कार्य के द्वारा प्राप्त करते हैं। इससे बालक कार्य का अनुभव, सहयोग का अनुभव, सामाजिक सम्बन्धों का अनुभव और अन्य विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है।
4. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालक को कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। बालकों को कार्य चुनने की पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए। उन्हें इतना उत्साहित करना चाहिए कि वे कार्य का प्रस्ताव स्वयं रखें। विद्यालय का समस्त कार्यक्रम उनके प्रस्ताव के अनुकूल होना चाहिए। शिक्षकों को उन्हें किसी भी कार्य को करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए ।
5. वास्तविकता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालकों से शैक्षिक कार्य वास्तविक और स्वाभाविक परिस्थितियों में कराए जाते हैं। बालकों के सामने काल्पनिक समस्याएँ न रखकर वास्तविक समस्याएँ प्रस्तुत की जानी चाहिए। वास्तविक परिस्थितियों में काम करने से जीवन और कार्य में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
6. उपयोगिता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालकों से वही कार्य कराए जाते हैं, जिनमें उनका स्वार्थ हो और जो उनके भावी जीवन में सहायक बन सकें। उपयोगी कार्यों में बालक की रुचि होती है और वह उत्साहपूर्वक कार्य को पूरा करता है। बालक ऐसी समस्याओं का समाधान करने में कोई रुचि नहीं रखता, जो उसकी तात्कालिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित नहीं होते ।
7. सामाजिकता का सिद्धान्त- यह पद्धति इस तथ्य पर विशेष बल देती है कि बालकों में शिक्षा द्वारा सामाजिक भावना का विकास करना चाहिए। इसलिए इस पद्धति में सामूहिक कार्यों, सामाजिक उत्तरदायित्वों तथा सामाजिक सम्बन्धों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
8. सानुबन्यता का सिद्धान्त- यह पद्धति ज्ञान की एकता में विश्वास करती है। इसलिए इस पद्धति के अन्तर्गत इस सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है कि विभिन्न विषयों को एक-दूसरे से सम्बन्धित करते हुए पढ़ाना चाहिए। प्रायः एक ही योजना के द्वारा विभिन्न विषयों की शिक्षा बालकों को दे दी जाती है।
In simple words: योजना पद्धति, जिसे प्रोजेक्ट मेथड भी कहते हैं, जॉन डीवी के शिष्य किलपैट्रिक ने विकसित की थी। यह बच्चों को वास्तविक जीवन की समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से हल करके सीखने पर जोर देती है, जहाँ वे उद्देश्यपूर्ण, सक्रिय, स्वतंत्र और व्यावहारिक तरीके से अनुभव प्राप्त करते हैं।

🎯 Exam Tip: योजना पद्धति की परिभाषा और इसके आठ सिद्धान्तों को स्पष्ट रूप से याद करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस अध्याय का एक मुख्य बिन्दु है और अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।

 

Question 2. शिक्षा की योजना पद्धति के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
Answer:

योजना पद्धति के गुण (Merits of Project Method)


1. व्यावहारिकता- इस पद्धति के अनुसार बालक पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त नहीं करते, बल्कि वे स्वयं विभिन्न प्रकार की योजनाओं व समस्याओं को जीवन में कार्यान्वित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार जो ज्ञान बालकों को प्राप्त होता है, वह व्यावहारिक होता है और उसकी योजना पद्धति के गुण जीवन में उपयोगिता होती है।
2. रुचिपूर्ण पद्धति- इस पद्धति के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने में बालक प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, क्योंकि शिक्षा देते समय मनोवैज्ञानिक पद्धति उनकी रुचि का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसमें बालक प्रोजेक्ट के प्रति आकर्षित, जिज्ञासु एवं उत्सुक बने रहते हैं।
3. मनोवैज्ञानिक पद्धति- यह पद्धति मनोवैज्ञानिक है, क्योंकि विकास के समान अवसर इसमें बालकों की रुचि, प्रवृत्ति, इच्छा और क्षमता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। इसमें रटने तथा स्मरण करने की क्रिया की अपेक्षा सोचने स्वतन्त्रता की रक्षा तथा कार्य करने की प्रवृत्ति पर बल दिया गया है।
4. श्रम का महत्त्व - बालकों की समस्याओं का समाधान करने * पाठय-विषयों का समन्वय के लिए शारीरिक तथा मानसिक कार्य करने पड़ते हैं। शारीरिक कार्य गृह, पाठशाला एवं समाज के करने के कारण उनके हृदय में श्रम के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हो बीच सम्बन्ध जाता है और वे हाथ से काम करने में कोई हीनता नहीं समझते। इस सामाजिक भावना का विकास प्रकार यह पद्धति श्रम को विशेष महत्त्व प्रदान करती है।
5. मानसिक विकास- यह पद्धति निष्क्रिय रहकर ज्ञान प्राप्त करने का विरोध करती है। इस पद्धति में बालकों को स्वतन्त्र रूप से सोचने-विचारने तथा कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं। इसमें बालक दूसरों से वाद-विवाद करके और परामर्श करके स्वयं निर्णय करता है। इस प्रकार इस पद्धति के द्वारा बालक की विभिन्न मानसिक शक्तियों का विकास बहुत अच्छी तरह से होता है।
6. विकास के समान अवसर- इस पद्धति में सभी बालकों को समान रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, चाहे उनकी बुद्धि तीव्र, मन्द अथवा साधारण हो। परिणामस्वरूप बालकों का समान रूप से विकास होता है।
7. आत्म-विकास का अवसर- यह पद्धति बालकों को अपने अनुभव से सीखने का अवसर देती है। कोई भी ज्ञान बालक के ऊपर थोपा नहीं जाता है, बल्कि वे कार्य करके अपने अनुभव से सीखते हैं।
8. स्वतन्त्रता की रक्षा- इस पद्धति में बालकों को अधिक-से-अधिक स्वतन्त्र रखकर शिक्षा दी जाती है। उन्हें अपनी रुचि के अनुसार काम करने, प्रोजेक्ट चुनने तथा प्रोजेक्ट का कार्यक्रम बनाने का पूरा अधिकार होता है और उन्हें कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता होती है। इस प्रकार उनके विकास में कोई बाधा नहीं आती है।
9. पाठ्य- विषयों की स्वाभाविकता-इस पद्धति में बालक को पाठ्य-विषयों का ज्ञान स्वाभाविक परिस्थितियों में कराया जाता है, जिससे जीवन और कार्य में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इससे ज्ञान की स्वाभाविकता बनी रहती है। जीवन से सम्बन्धित हो जाने पर बालक रुचिपूर्वक कार्य को पूरा करता है और बालक में विधिपूर्वक कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है।
10. पाठ्य-विषयों का समन्वयं- इस पद्धति में बालकों को सभी पाठ्य-विषय अलग-अलग करके नहीं पढ़ाए जाते । पाठयक्रम के समस्त विषय समन्वित रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं। किसी विशेष समस्या को हल करने में बालक अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इससे बालकों को ज्ञान की एकता का अनुभव होता है और ज्ञान संगठित होकर उनके द्वारा आत्मसात किया जाता है।
11. गृह, पाठशाला एवं समाज के बीच सम्बन्ध - इस पद्धति की शिक्षाविधि ऐसी है कि गृह, पाठशाला एवं समाज तीनों में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। तीनों सम्बद्ध रूप से बालक की शिक्षा में भाग लेते हैं। विद्यालय में जो शिक्षा बालक ग्रहण करते हैं, उसे गृह एवं समाज में कार्यान्वित करते हैं। इसके साथ-साथ गृह और समाज में प्राप्त अनुभवों के आधार पर बालक विद्यालय में प्रोजेक्ट का निर्माण करते हैं।
12. चरित्र का विकास- इस पद्धति के द्वारा बालकों का चारित्रिक विकास होता है। यह सत्यम् शिवम सुन्दरम्' की भावना का अनुभव करते हुए विश्व का कल्याण करने में समर्थ होते हैं।
13. सामाजिक भावना का विकास- इस पद्धति में बालकों को दूसरों के सहयोग से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है। इससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है। इसके साथ ही उनमें नागरिकता की भावना का भी विकास होता है। वह अपने उत्तरदायित्व को समझते हैं और एक-दूसरे के सहयोग से कार्य करते हैं।
In simple words: योजना पद्धति के कई फायदे हैं जैसे कि यह व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती है, छात्रों को सीखने में रुचि बनाए रखती है, मनोवैज्ञानिक रूप से काम करती है, श्रम का सम्मान सिखाती है, मानसिक विकास को बढ़ावा देती है, सभी को समान अवसर देती है, आत्म-विकास को प्रोत्साहित करती है, स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है, विषयों को वास्तविक जीवन से जोड़ती है, और सामाजिक तथा नैतिक विकास में सहायता करती है।

🎯 Exam Tip: योजना पद्धति के गुणों को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक गुण के लिए एक संक्षिप्त विवरण अवश्य दें। व्यावहारिकता, मनोवैज्ञानिकता और सामाजिकता जैसे मुख्य बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 3. योजना पद्धति के मुख्य दोषों अथवा कमियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer:

योजना पद्धति के दोष (Defects of Project Method)

भले ही शिक्षा की योजना पद्धति के विभिन्न गुणों का उल्लेख किया जाता है, परन्तु अन्य शिक्षा-पद्धतियों के ही समान इस पद्धति में भी कुछ दोष हैं। इस पद्धति में मुख्य दोषों अथवा कमियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
1. खर्चीली पद्धति- इस पद्धति को कार्यान्वित करने के लिए अनेक पुस्तकों तथा यन्त्रों की आवश्यकता होती है, जिनके प्रबन्ध में काफी धन व्यय करना पड़ता है। इसलिए सामान्य विद्यालयों में इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
2. उचित परीक्षा प्रणाली का अभाव- इस पद्धति में एक योजना पद्धति के दोष निश्चित पाठयक्रम का अभाव रहता है, इसलिए परीक्षा के निर्धारण में काफी कठिनाई होती है। वर्तमान परीक्षा प्रणाली में योजना पद्धति को खर्चीली पद्धति कोई स्थान प्राप्त नहीं है। इस पद्धति में कार्य का सही-सही मूल्यांकन भी नहीं हो पाता है।
3. पाठ्य-पुस्तकों का अभाव- इस पद्धति से सम्बन्धित हिन्दी विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव भाषा में लिखी हुई पाठ्य-पुस्तकों का भी अभाव है। इससे विषयों की । प्रोजेक्ट के चुनाव में कठिनाई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं हो पाती, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षण विधि कार्य सुचारु रूप से नहीं चल पाता है।
4. विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव-इस पद्धति में कठिनाई विषयों का क्रमबद्ध अध्ययन नहीं किया जाता, इसलिए बालकों को किसी भी विषय का क्रमिक ज्ञान नहीं हो पाता। इससे सभी विषयों का ज्ञान अपूर्ण रहता है। गोड के टॉमसन ने इस पद्धति की आलोचना * व्यक्तिगत रुचियों की उपेक्षा करते हुए कहा है, “प्रासंगिक शिक्षा पद्धति बड़ी महत्त्वपूर्ण है, किन्तु प्रौढ़ों की समस्याएँ पर्याप्त नहीं होती ।”
5. प्रोजेक्ट के चुनाव में कठिनाई- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत योग्य शिक्षकों का अभाव है कि इस प्रकार के प्रोजेक्ट का चुनाव करना, जिनका सामाजिक * शिक्षक के प्रभाव का अभाव जीवन में कुछ मूल्य तथा महत्त्व हो और जो कक्षा के विद्यार्थियों की रुचि, बुद्धि तथा क्षमता के अनुकूल हो, अत्यन्त कठिन है। इसके अतिरिक्त विद्यालय के बहुसंख्यक विद्यार्थियों के लिए प्रोजेक्ट का चुनाव करना भी कठिन कार्य है। इस कार्य के लिए समय, सहनशीलता तथा समझदारी की आवश्यकता है। साधारणतया शिक्षक के पास इन बातों के लिए समय का अभाव रहता है, जिसके परिणामस्वरूप बालक ऐसे प्रोजेक्ट चुन लेता है जिनका कोई शैक्षिक मूल्य नहीं होता।
6. अव्यवस्थित शिक्षण विधि- इस पद्धति में शिक्षण विधि अव्यवस्थित तंथा क्रमहीन होती है, जिसके कारण बालकों को पाठ्यक्रम का पूरा ज्ञान नहीं हो पाता। इससे बालक उचित और मनोवैज्ञानिक क्रम से ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है; जैसे-गुणा की आवश्यकता पहले पड़ने पर बिना जोड़-घटाने का ज्ञान प्राप्त किए बालक गुणा सीखने का प्रयत्न करेगा। यहीं पर यह पद्धति अमोवैज्ञानिक हो जाती है।
7. वातावरण से अनुकूलन में कठिनाई- जब विद्यार्थी इस शिक्षा विधि से पढ़ाए जाने वाले विद्यालय से किसी अन्य साधारण विद्यालय में प्रवेश लेता है, तो उसे अपने वातावरण से अनुकूलन करने में अत्यन्त कठिनाई होती है।
8. हस्त कार्यों का बाहुल्य- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का कहना है कि इस पद्धति में हस्त कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जाता है, जोकि अनुचित है। इसके परिणामस्वरूप बालक दिन भर विभिन्न वस्तुओं के मॉडल बनाता रहता है और उसे किसी विषय का ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार इस पद्धति से बालकों का मानसिक विकास नहीं हो पाता।
9. समय का अपव्यय- यह शिक्षा विधि काफी लम्बी है और इसमें समय का अपव्यय करने के बाद भी बालक को उतना ज्ञान नहीं हो पाता, जितना अपेक्षित होता है।
10. व्यक्तिगत रुचियों की उपेक्षा- सामाजिक प्रोजेक्ट का चुनाव करते समय बालकों की व्यक्तिगत रुचियों और प्रवृत्तियों का ध्यान नहीं रखा जाता। यह मान लिया जाता है कि सभी बालकों के अन्दर वांछित रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं, लेकिन सभी बालकों के लिए एक ही प्रोजेक्ट की व्यवस्था करना अनुचित
11. प्रौढों की समस्याएँ- इस पद्धति में बालकों के सम्मुख अधिकतर प्रौढ़ जीवन की समस्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इससे बालकों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। रेमॉण्ट (Raymont) के अनुसार, बालकों की पाठशाला में प्रौढ़ जीवन की समस्याओं को हल करने से पाठशाला की बुराइयाँ नहीं हो सकतीं। बालकों के सम्मुख क्रिया से परे कोई समस्या उपस्थित कर देना अमनोवैज्ञानिक है।”
12. समस्त विषयों के ज्ञान का अभाव - इस पद्धति के द्वारा एक ही प्रोजेक्ट से बालक सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है। इससे उनमें आपस में सम्बन्ध नहीं जुड़ पाता है।
13. योग्य शिक्षकों का अभाव - हमारे देश में ऐसे शिक्षकों की कमी है, जोकि इस पद्धति के द्वारा बालकों को शिक्षा दे सकें । इनके प्रशिक्षण के साधन भी इतने सीमित हैं कि कुशल शिक्षक सरलता से उपलब्ध नहीं हो पाते हैं।
14. शिक्षक के प्रभाव का अभाव - इस पद्धति में शिक्षक को कोई प्रमुख स्थान नहीं है। शिक्षक को केवल पथ-प्रदर्शक के रूप में स्वीकार किया गया है, इसलिए शिक्षक के व्यक्तित्व और ज्ञान का प्रभाव बालकों पर नहीं पड़ पाता है। लेकिन यह आलोचना असंगत लगती है, क्योकि इस पद्धति में तो शिक्षक का उत्तरदायित्व और भी अधिक बढ़ जाता है। प्रोजेक्ट का सफलतापूर्वक सम्पन्न होना शिक्षक की योग्यता तथा कार्य-कुशलता पर निर्भर है।
In simple words: योजना पद्धति के कुछ प्रमुख दोष हैं जैसे कि यह बहुत खर्चीली है, उचित परीक्षा प्रणाली का अभाव है, पाठ्य-पुस्तकों और विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन की कमी है। इसके अलावा, प्रोजेक्ट का चुनाव कठिन हो सकता है, शिक्षण विधि अव्यवस्थित हो सकती है, और यह व्यक्तिगत रुचियों तथा प्रौढ़ों की समस्याओं की उपेक्षा कर सकती है।

🎯 Exam Tip: योजना पद्धति की कमियों को स्पष्ट और बिन्दुवार तरीके से प्रस्तुत करें। खर्चीला होना, क्रमबद्धता का अभाव, और योग्य शिक्षकों की कमी जैसे दोषों पर विशेष बल दें, क्योंकि ये अक्सर आलोचना के मुख्य बिन्दु होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. योजना पद्धति की कार्य-प्रणाली को स्पष्ट करने के लिए उसके विभिन्न सोपानों का उल्लेख कीजिए। योजना शिक्षण पद्धति के कौन-से सोपान हैं ?
Answer:

योजना शिक्षण पद्धति के सोपान (Factors of Project Educational Method)

योजना शिक्षण पद्धति के मुख्य सोपान निम्नलिखित हैं-
1. समस्या मूलक परिस्थिति उत्पन्न करना-जहाँ तक सम्भव हो सके बालकों को ही योजना या प्रोजेक्ट चुनने के अवसर देने चाहिए। शिक्षक इस कार्य में बालकों की सहायता कर सकता है। शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों के सम्मुख कोई समस्यामूलक परिस्थिति उत्पन्न कर दे, जिसमें कोई समस्या निहित हो और जो बालकों की रुचि और बौद्धिक विकास के अनुरूप हो । रुचि उत्पन्न होने पर बालकों का ध्यान उस . परिस्थिति में निहित समस्या की ओर आकर्षित हो जाएगा। उस समस्या का समाधान करने के लिए बालक स्वयं ही योजनाएँ बनाएँगे ।
2. योजना का चुनाव- शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कोई भी योजना बालकों पर बलपूर्वक न लादे, क्योंकि ऐसा करने से योजना महत्त्वहीन हो जाती है। शिक्षक को चाहिए कि वह योजना का चुनाव करने के लिए बालकों को प्रोत्साहित करे । बालक योजनाओं को प्रस्तावित करेंगे, लेकिन प्रत्येक बालक के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसी योजना के प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए, जोकि बालकों के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित हो । शिक्षक को योजना चुनने के सम्बन्ध में बालकों का पथ-प्रदर्शन करना चाहिए और उसी योजना को स्वीकार करना चाहिए जिसका शैक्षिक मूल्य सबसे अधिक
3. कार्यक्रम का निर्माण योजना का चुनाव होने के बाद उसका कार्यक्रम बनाया जाता है, जिसकी सहायता से बालक उस समस्या अथवा योजना को हल करते हैं। कार्यक्रम-निर्माण के सम्बन्ध में भी सब बालकों को इस प्रकार के अवसर मिलने चाहिए कि वे अपने सुझाव रख सकें। किसी भी कार्यक्रम को पूर्ण वाद-विवाद के बाद ही स्वीकार करना चाहिए। कार्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए जोकि स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्ण किया जा सके। कार्यक्रम को कई भागों में विभाजित कर देना चाहिए और प्रत्येक बालक को योग्यतानुसार कुछ-न-कुछ कार्य अवश्य देना चाहिए। इस प्रकार सभी बालक मिलकर किसी योजना को पूरा करते हैं।
4. कार्यक्रम का क्रियान्वयन- कार्यक्रम के निर्धारण के पश्चात् प्रत्येक बालक उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्य को ग्रहण करता है और उसे पूरा करने में जुट जाता है। प्रत्येक बालक अपना कार्य स्वयं करता है। इस प्रकार बालक क्रिया द्वारा सीखते हैं। शिक्षकों को योजना का कोई भी कार्य स्वयं नहीं करना चाहिए, बल्कि योजना को पूरा करने में बालकों की सहायता करनी चाहिए । शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों को अपनी गति से कार्य करने दें। इससे समय तो अधिक लगता है, लेकिन इस प्रकार प्राप्त किया गया ज्ञान अधिक स्थायी रहता है। शिक्षक का कार्य बालकों के कार्य का निरीक्षण करना, प्रोत्साहन देना और आवश्यकता पड़ने पर आदेश देना है। आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक योजना में परिवर्तन भी कर सकता है। और उस परिवर्तन की ओर बालकों का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
5. कार्य का निर्माण करना-योजना या प्रोजेक्ट पूर्ण होने के पश्चात् शिक्षक तथा बालकों द्वारा यह देखा जाता है कि योजना ने कहाँ तक सफलता प्राप्त की है। जिस उद्देश्य को लेकर योजना प्रारम्भ की गई थी, वह पूर्ण हुआ या नहीं। प्रत्येक बालक पूर्णतया स्वतन्त्र होकर अपने विचार प्रकट करता है। इन विचारों पर सामूहिक रूप से विचार करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। इस प्रकार से बालकों को अपनी गलतियों का ज्ञान हो जाता है और वे अपनी आलोचना स्वयं करते हैं।'
6. कार्य का लेखा- प्रत्येक बालक के पास एक विवरण-पुस्तिका रहती है, जिसमें बालक के कार्यों को लेखबद्ध कर दिया जाता है। बालक प्रारम्भ से अन्त तक जो कुछ भी करते हैं, वह अपनी विवरण-पुस्तिका में लिख देते हैं। शिक्षक को चाहिए कि वह जो कार्य बालकों को दे, उसे लिखा दे, ताकि वह लेखानुसार अपने कार्य में व्यस्त रहें। इस लेखे के द्वारा शिक्षक यह निरीक्षण करता है कि छात्रों ने कितना कार्य समाप्त कर दिया है और कितना शेष है। वे अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह निभा रहे हैं या नहीं, छात्रों ने कितनी प्रगति की है आदि ।
In simple words: योजना पद्धति की कार्यप्रणाली में छह मुख्य सोपान हैं: समस्या उत्पन्न करना, योजना का चुनाव करना, कार्यक्रम बनाना, कार्यक्रम को क्रियान्वित करना, किए गए कार्य का मूल्यांकन करना और कार्य का लेखा-जोखा रखना। ये चरण छात्रों को स्वतंत्र रूप से सीखने और समस्या-समाधान करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: योजना पद्धति के सोपानों को क्रमबद्ध तरीके से याद रखना और प्रत्येक सोपान का संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है। यह आपको प्रक्रिया को समझने और सटीक रूप से समझाने में मदद करेगा।

 

Question 2. प्रोजेक्ट प्रणाली की क्या उपयोगिता है ?
Answer: आधुनिक शिक्षा- पद्धतियों में प्रोजेक्ट या योजना प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रणाली का मुख्यतम गुण है-व्यावहारिकता। इस प्रणाली से प्राप्त होने वाला ज्ञान व्यावहारिक होता है तथा वह जीवन के लिए उपयोगी होता है। यह एक रोचक शिक्षा-प्रणाली है, जो मनोवैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित है। यह बच्चों के मानसिक विकास में सहायक है। इस शिक्षा-पद्धति में सभी बालकों को समान रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, चाहे उनकी बुद्धि तीव्र, मन्द अथवा साधारण हो। यह शिक्षा-प्रणाली बालकों को आत्म-विकास के अवसर प्रदान करती है। इस प्रणाली में विभिन्न विषयों को समन्वित रूप से पढ़ाया जाता है। इस शिक्षा-प्रणाली में गृह, पाठशाला तथा समाज में एक प्रकार का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। प्रोजेक्ट प्रणाली बालकों के चरित्र के विकास में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त प्रोजेक्ट प्रणाली की एक अन्य उपयोगिता है-सामाजिक भावना के विकास में सहायक होना। इस पद्धति में बालकों को दूसरे के सहयोग से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है। इससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है।
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली बहुत उपयोगी है क्योंकि यह व्यावहारिक ज्ञान देती है, छात्रों में सीखने की रुचि बनाए रखती है, मानसिक और आत्म-विकास में सहायता करती है, सभी को समान अवसर देती है, विषयों को आपस में जोड़ती है, और छात्रों में सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट प्रणाली की उपयोगिता को बताते समय, इसके व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक लाभों पर विशेष ध्यान दें, साथ ही यह कैसे छात्रों के समग्र विकास (मानसिक, सामाजिक, नैतिक) में मदद करती है, इसे भी रेखांकित करें।

 

Question 3. योजना पद्धति का कोई एक उदाहरण प्रस्तुत कीजिए ।
Answer:

योजना पद्धति एक उदाहरण (An Example of Project Method)

प्रोजेक्ट या योजना दो प्रकार के होते हैं- सरल और बहुपक्षीय । जिसमें एक ही काम होता है, उसे सरल प्रोजेक्ट कहते हैं; जैसे-रोटी पकाना, बाजार से कुछ सामान लाना आदि । बहुपक्षीय प्रोजेक्ट उसे कहते हैं, जिनके द्वारा बालकों को एक साथ कई विषयों का ज्ञान मिल जाता है; जैसे-सीमेण्ट की दीवार बनाना, विद्यालयों में पानी का प्रबन्ध करना, नाटक करना आदि । सी० डब्ल्यू० स्टोन (C. W. Stone) ने पार्सल भेजने के एक बहुपक्षीय प्रोजेक्ट का उल्लेख किया है, जिसके माध्यम से पाठ्यक्रम के कई विषयों की शिक्षा दी जाती है। इस प्रोजेक्ट के अनुसार चौथी कक्षा के विद्यार्थी अपने दूरवर्ती मित्रों तथा सम्बन्धियों को पार्सल भेजने का निश्चय करते हैं और उससे सम्बन्धित योजना तैयार करते हैं। इस पार्सल को डाक द्वारा भेजने के कार्य में बालक पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों का ज्ञान निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त करते हैं।
1. वार्तालाप- सर्वप्रथम बालक पार्सल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के सम्बन्ध में वार्तालाप प्रारम्भ करते हैं। इससे उन्हें डाक सम्बन्धी अनेक स्थानों एवं नियमों का ज्ञान हो जाता है। इसके साथ-ही-साथ उनकी बोलने, सोचने तथा तर्क करने की शक्ति का विकास होता है।
2. इतिहास - इतिहास के घण्टे में बालक भिन्न-भिन्न काल में डाक भेजने के साधनों से परिचय प्राप्त करता है। इससे उन्हें टिकटों के बारे में, विभिन्न देशों व प्रान्तों के निवासियों के बारे में पता चल जाता है।
3. हस्त-कार्य- हस्त-कार्य के घण्टे में बालक स्वयं पार्सल बनाकर उस पर कागज लपेटते हैं। इससे उन्हें कागज के मोड़ने, काटने तथा प्रयोग करने की विधियों का ज्ञान हो जाता है। इसके साथ-ही-साथ उन्हें कागज बनाने का तरीका भी पता चल जाता है। वे जान जाते हैं कि पार्सल को लपेटने के लिए किस प्रकार के कागज को प्रयोग करना चाहिए
4. भाषा-भाषा के घण्टे में बालक पार्सलों पर अपने मित्रों का पता लिखते हैं। इसके पश्चात् वे अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को पत्र लिखते हैं। इस प्रकार वे लिखने तथा पत्र-व्यवहार करने की योग्यता का विकास करते हैं। इसके बाद वे यह जानने का प्रयास करते हैं कि पत्र किस प्रकार पोस्ट किए जाते हैं। पत्र भेजने तथा पार्सल भेजने के क्या-क्या नियम हैं और निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने में कितना समय लगता है। आदि।
5. भूगोल- भूगोल के घण्टे में बालक मानचित्र की सहायता से उन स्थानों की स्थिति के विषय में ज्ञान प्राप्त करते हैं, जहाँ वे पार्सल भेजना चाहते हैं। इससे उन्हें पता चल जाता है कि वह स्थान कितनी दूर है, वहाँ पहुँचने के कौन-से साधन हैं, कौन-कौन सी रेलवे लाइनें जाती हैं और वे किस-किस प्रदेश में से निकलकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचती हैं ? उन्हें यह भी ज्ञात हो जाता है कि जिन स्थानों पर रेलवे लाइन का अभाव है, वहाँ पार्सल किस प्रकार से भेजा जाएगा ।
6. भ्रमण-इसके बाद बालक शिक्षक के साथ डाकखाने जाते हैं और डाकखाने के विभिन्न कार्यों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। उन्हें यह मालूम हो जाता है कि उन्हें अपने पार्सलों को तोलना है, वजन के हिसाब से टिकट लगाना है और पोस्ट ऑफिस से रजिस्ट्री करानी है।
7. अंकगणित- इसके लिए बालक अपने-अपने पार्सलों को तोलते हैं और उन पर वजन के हिसाब से टिकट लगाते हैं। इससे उन्हें जोड़ना, घटाना, गुणा आदि आ जाता है। इससे उन्हें पता चल जाता है कि पार्सल भेजने में कुल कितना धन व्यय हुआ है। इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि प्रोजेक्ट के माध्यम से बालक भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार योजना फ्द्धति बालकों को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा प्रदान करती है।
In simple words: योजना पद्धति का एक उदाहरण पार्सल भेजने का प्रोजेक्ट है, जिसमें छात्र पार्सल भेजने की पूरी प्रक्रिया को सीखते हैं। इस दौरान वे बातचीत, इतिहास, हस्तकला, भाषा, भूगोल, भ्रमण और अंकगणित जैसे कई विषयों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, जिससे उन्हें जीवन के लिए उपयोगी कौशल मिलते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के उदाहरण को विस्तार से समझाना आवश्यक है, जिसमें विभिन्न विषयों को कैसे एकीकृत किया जाता है, इसका स्पष्टीकरण शामिल हो। एक ऐसा उदाहरण चुनें जो बहुआयामी सीखने को प्रदर्शित करता हो।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शिक्षा के क्षेत्र में योजना पद्धति की आवश्यकता क्यों अनुभव की गई?
Answer: किलपैट्रिक ने स्वयं योजना पद्धति की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, आधुनिक समय में शिक्षालय और समाज तीव्र एवं विस्तृत रूप में एक-दूसरे से पृथक् हो गए हैं। विचार एवं कार्य-दो क्षेत्रों में स्थान, समय और भेद में असम्बन्धित हो गए हैं। शिक्षालय में जो कुछ भी अध्ययन किया जाता है एवं संसार में जो कुछ हो रहा है, इन दोनों में बहुत ही कम सम्बन्ध पाया जाता है। शिक्षालय के विषयों में बालकों को प्रौढ़ों के साथ सामाजिक क्रियाओं में भाग लेने की कोई अवसर प्राप्त नहीं होता है, इसलिए हम चाहते हैं कि शिक्षा वास्तविक जीवन की गहराई में प्रवेश करे। केवल सामाजिक जीवन में ही नहीं, वरन् उस समस्त जीवन में जिसकी आकांक्षा करते हैं।'
In simple words: योजना पद्धति की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि पारंपरिक शिक्षा प्रणाली स्कूलों को वास्तविक जीवन और समाज से अलग कर रही थी। इसका उद्देश्य शिक्षा को व्यावहारिक बनाना और छात्रों को सामाजिक गतिविधियों में शामिल करके जीवन से जोड़ना था।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय, किलपैट्रिक के विचारों को उद्धृत करना और शिक्षा तथा वास्तविक जीवन के बीच के अलगाव को मुख्य बिन्दु के रूप में प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. किलपैट्रिक के अनुसार प्रोजेक्ट के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
Answer: किलपैट्रिक ने चार प्रकार के प्रोजेक्टों का उल्लेख किया है-
1. रचनात्मक प्रोजेक्ट- ऐसे प्रोजेक्ट को रचनात्मक प्रोजेक्ट कहते हैं, जिनमें विचार अथवा योजना को बाह्य रूप से स्पष्ट किया जाए; जैसे-नाव बनाना, पत्र लिखना आदि ।
2. समस्यात्मक प्रोजेक्ट- उन प्रोजेक्टों को समस्यात्मक प्रोजेक्ट कहते हैं, जिनमें किसी बौद्धिक कठिनाई या समस्या का समाधान करना हो; जैसे-ताप पाकर द्रव क्यों फैलते हैं ?
3. रसास्वादन प्रोजेक्ट- ऐसे प्रोजेक्ट, जिनका उद्देश्य सौन्दर्यानुभूति हो, को रसास्वादन प्रोजेक्ट कहते हैं; जैसे-कहानी सुनना, गाना सुनना आदि ।
4. कौशल प्रोजेक्ट - इन प्रोजेक्टों का उद्देश्य किसी कार्य में दक्षता अथवा उसका विशेष ज्ञान प्राप्त करना होता है; जैसे-किसी चक्र को चलाना अथवा उसके चलाने का ज्ञान प्राप्त करना आदि ।
In simple words: किलपैट्रिक ने प्रोजेक्ट के चार प्रकार बताए हैं: रचनात्मक (कुछ बनाना), समस्यात्मक (किसी समस्या का हल खोजना), रसास्वादन (सौंदर्य का अनुभव करना), और कौशल (किसी कार्य में दक्षता प्राप्त करना)।

🎯 Exam Tip: किलपैट्रिक द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट के चारों प्रकारों को उनके उदाहरणों सहित स्पष्ट रूप से याद करें। यह वर्गीकरण प्रोजेक्ट विधि की विविधता को दर्शाता है।

 

Question 3. मकमेरी के अनुसार प्रोजेक्ट के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
Answer: चार्ल्स ए० मकमेरी ने प्रोजेक्ट के निम्नलिखित विशेष प्रकार बताए हैं।
1. साहित्य सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसमें साहित्यिक रचनाओं के आधार पर प्रोजेक्ट का निर्माण किया जाता है; जैसे-नाटक, कहानी, कविता आदि ।
2. विज्ञान सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इस प्रकार के प्रोजेक्ट में बालकों के सामने विभिन्न प्रकार की अन्वेषण सम्बन्धी योजनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं; जैसे-बेतार का तार, वायुयान, टेलीविजन आदि ।
3. ऐतिहासिक तथा जीवनी सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसके द्वारा ऐतिहासिक कथाओं तथा महापुरुषों की रचनाओं को प्रोजेक्ट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है; जैसेसिकन्दर का आक्रमण, चन्द्रगुप्त का शासन-प्रबन्ध, अशोक का धर्म प्रचार आदि ।
4. हस्तकौशल सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसमें पुस्तक कला, कृषि, बागवानी, बढ़ईगिरी, दुकानदारी, मुर्गीपालन आदि कुटीर उद्योगों को कार्यान्वित किया जाता है। सिलाई-वस्त्रों की धुलाई, पाक विद्या आदि की भी योजना बनाई जाती है।
5. औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रोजेक्ट-भौगोलिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ये प्रोजेक्ट बहुत लाभदायक सिद्ध होते हैं। इसमें रेल, पुल-निर्माण, सड़क, नहर आदि की योजना प्रस्तुत की जाती है। प्रकृति सम्बन्धी योजना; जैसे- समुद्र की लहरें, घाटियाँ तथा पहाड़ियाँ आदि भी इसी में आती हैं।
In simple words: मकमेरी ने प्रोजेक्ट के पांच प्रकार बताए हैं: साहित्य, विज्ञान, ऐतिहासिक तथा जीवनी, हस्तकौशल और औद्योगिक एवं व्यापारिक। ये प्रकार विभिन्न विषयों और कौशलों को कवर करते हैं, जिससे छात्र विविध क्षेत्रों में ज्ञान प्राप्त कर सकें।

🎯 Exam Tip: मकमेरी के वर्गीकरण में दिए गए प्रत्येक प्रोजेक्ट प्रकार को उसके उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है ताकि आप विभिन्न प्रकार के सीखने के अनुभवों को समझा सकें।

 

Question 4. शिक्षा की प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ? सटीक उत्तर लिखिए।
Answer: शिक्षा की प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं- व्यावहारिकता पर विशेष बल दिया जाना, रोचक पद्धति होना, मनोवैज्ञानिक पद्धति होना, श्रम को समुचित महत्त्व देना, मानसिक विकास पर बल देना, विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना, आत्म-विकास के अवसर प्रदान करना, पाठय-विषयों की स्वाभाविकता तथा आपसी समन्वय, गृह, पाठशाला एवं समाज के बीच सम्बन्ध होना तथा चरित्र एवं सामाजिक भावना के विकास पर बल देना।
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताओं में व्यावहारिकता, रोचकता, मनोवैज्ञानिक आधार, श्रम का महत्व, मानसिक और आत्म-विकास, समान अवसर, विषयों का समन्वय, समाज से जुड़ाव और नैतिक-सामाजिक भावना का विकास शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताओं को याद करते समय, उन बिन्दुओं पर ध्यान दें जो छात्रों के सर्वांगीण विकास और वास्तविक जीवन से जुड़ाव पर जोर देते हैं, जैसे व्यावहारिकता और सामाजिक भावना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शिक्षा की योजना अथवा प्रोजेक्ट प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे ?
या
प्रोजेक्ट शिक्षण-विधि किसकी देन है ?
Answer: शिक्षा की योजना अथवा प्रोजेक्ट प्रणाली के प्रवर्तक जॉन डीवी के शिष्य अमरीका के शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक थे।
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली के जनक जॉन डीवी के शिष्य किलपैट्रिक थे।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट प्रणाली के प्रवर्तक का नाम, डब्ल्यू.एच. किलपैट्रिक, को हमेशा याद रखें, क्योंकि यह एक सीधा और महत्वपूर्ण तथ्य है।

 

Question 2. किलपैट्रिक द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की योजना प्रणाली किस सिद्धान्त पर आधारित है?
Answer: किलपैट्रिक, द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की योजना प्रणाली जॉन डीवी द्वारा प्रतिपादित प्रयोजनवाद नामक सिद्धान्त पर आधारित है।
In simple words: किलपैट्रिक की प्रोजेक्ट प्रणाली जॉन डीवी के प्रयोजनवाद के सिद्धांत पर आधारित है।

🎯 Exam Tip: प्रयोजनवाद के सिद्धांत और जॉन डीवी के साथ किलपैट्रिक के संबंध को याद रखना इस अवधारणा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. शिक्षा की योजना प्रणाली को प्रारम्भ करने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
Answer: शिक्षा की योजना प्रणाली को प्रारम्भ करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को यथार्थ जीवन से जोड़ना था।
In simple words: योजना प्रणाली का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को छात्रों के वास्तविक जीवन से जोड़ना था।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के मूल उद्देश्य-शिक्षा को जीवन से जोड़ना-को हमेशा याद रखें।

 

Question 4. “योजना वास्तविक जीवन का एक भाग है जो विद्यालय में प्रयोग किया जाता है। यह कथन किसका है ?
Answer: प्रस्तुत कथन बेलार्ड का है।
In simple words: यह कथन कि योजना वास्तविक जीवन का हिस्सा है जिसे स्कूल में उपयोग किया जाता है, बेलार्ड ने दिया था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख शिक्षाशास्त्रियों के कथनों को उनके नाम के साथ याद रखना सहायक होता है।

 

Question 5. “योजना वह सहृदय उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो पूर्ण संलग्नता से सामाजिक वातावरण में किया जाए।” यह कथन किसका है ?
Answer: प्रस्तुत कथन किलपैट्रिक का है।
In simple words: यह परिभाषा कि योजना एक हृदयस्पर्शी उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो सामाजिक वातावरण में पूर्ण संलग्नता से किया जाता है, किलपैट्रिक ने दी है।

🎯 Exam Tip: किलपैट्रिक की परिभाषा को सीधे याद करें, क्योंकि यह प्रोजेक्ट विधि का एक मौलिक विवरण है।

 

Question 6. शिक्षा की योजना पद्धति में सीखने की प्रक्रिया के आधार क्या हैं?
या
प्रोजेक्ट पद्धति का सम्बन्ध किस प्रकार के जीवन से है ?
Answer: शिक्षा की योजना पद्धति में सीखने की प्रक्रिया 'करके सीखने' (Learning by doing) तथा 'जीने से सीखने (Learning by living) पर आधारित है।
In simple words: योजना पद्धति में सीखने का आधार 'करके सीखना' और 'जीने से सीखना' है, जिसका अर्थ है वास्तविक अनुभव और गतिविधियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करना।

🎯 Exam Tip: 'करके सीखना' (Learning by doing) और 'जीने से सीखना' (Learning by living) इन दो मुख्य सिद्धान्तों को प्रोजेक्ट विधि के सीखने के आधार के रूप में याद रखें।

 

Question 7. शिक्षा की योजना प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
Answer: शिक्षा की योजना प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:
• उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त,
• क्रियाशीलता का सिद्धान्त,
• स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
• उपयोगिता का सिद्धान्त।
In simple words: योजना प्रणाली के चार मुख्य सिद्धांत हैं: उद्देश्य का सिद्धांत (कार्य का लक्ष्य), क्रियाशीलता का सिद्धांत (करके सीखना), स्वतंत्रता का सिद्धांत (स्वयं निर्णय लेना), और उपयोगिता का सिद्धांत (सीखा हुआ ज्ञान उपयोगी हो)।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के मुख्य सिद्धांतों को सूचीबद्ध करना और प्रत्येक का संक्षिप्त अर्थ जानना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:
• व्यावहारिकता,
• रोचक एवं मनोवैज्ञानिक पद्धति,
• पाठय-विषयों की स्वाभाविकता तथा
• गृह, पाठशाला तथा समाज से सम्बन्धित ।
In simple words: योजना पद्धति के चार मुख्य गुण हैं: यह व्यावहारिक ज्ञान देती है, सीखने में रुचि पैदा करती है, मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है और विषयों को वास्तविक जीवन और समाज से जोड़ती है।

🎯 Exam Tip: योजना पद्धति के गुणों को याद करते समय, उन बिन्दुओं पर ध्यान दें जो इसे एक प्रभावी और छात्र-केंद्रित शिक्षण विधि बनाते हैं।

 

Question 9. शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
Answer: शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य दोष निम्नलिखित हैं:
• खर्चीली पद्धति,
• प्रोजेक्ट के चुनाव की कठिनाई,
• उचित परीक्षा प्रणाली का अभाव तथा
• विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव ।
In simple words: योजना पद्धति के चार मुख्य दोष हैं: यह महंगी है, प्रोजेक्ट चुनना मुश्किल होता है, मूल्यांकन की कोई खास प्रणाली नहीं है और विषयों का क्रमबद्ध अध्ययन संभव नहीं हो पाता।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के प्रमुख दोषों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर वे जो इसके कार्यान्वयन और शैक्षिक प्रभाव से संबंधित हैं।

 

Question 10. शिक्षा की योजना पद्धति के महत्त्व को दर्शाने वाला कोई कथन लिखिए।
Answer: “योजना पद्धति शिक्षा का प्रजातान्त्रिक मार्ग है। यह बच्चों को सहयोग के लिए प्रोत्साहित करती है तथा सामान्य उद्देश्य के लिए विचार करने की प्रेरणा देती है।” -प्रो० भाटिया
In simple words: प्रोफेसर भाटिया के अनुसार, योजना पद्धति एक लोकतांत्रिक तरीका है जो बच्चों को सहयोग और सामान्य उद्देश्यों के लिए सोचने के लिए प्रेरित करता है।

🎯 Exam Tip: किसी शिक्षाविद् का कथन उद्धृत करना आपके उत्तर को अधिक प्रामाणिक बनाता है। इस संदर्भ में प्रोफेसर भाटिया का कथन याद रखें।

 

Question 11. शिक्षा की योजना पद्धति के अन्तर्गत मुख्य रूप से कितने प्रकार के प्रोजेक्ट होते हैं ?
Answer: शिक्षा की योजना पद्धति के अन्तर्गत मुख्य रूप से दो प्रकार के प्रोजेक्ट होते हैं-
(i) व्यक्तिगत प्रोजेक्ट तथा
(i) सामाजिक प्रोजेक्ट ।।
In simple words: योजना पद्धति में मुख्य रूप से दो प्रकार के प्रोजेक्ट होते हैं: व्यक्तिगत प्रोजेक्ट (जो एक छात्र स्वयं करता है) और सामाजिक प्रोजेक्ट (जो समूह में किया जाता है)।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट के दो मुख्य प्रकार- व्यक्तिगत और सामाजिक- को याद रखना और उनके बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 12. व्यक्तिगत प्रोजेक्ट से क्या आशय है ?
Answer: व्यक्तिगत प्रोजेक्ट उन्हें कहते हैं, जिनमें विद्यार्थी स्वतन्त्र रहकर कार्य करता है। कभी-कभी विद्यार्थी को अलग-अलग योजनाएँ दी जाती हैं जिन्हें वे पूर्ण करते हैं।
In simple words: व्यक्तिगत प्रोजेक्ट वह होता है जिसमें छात्र स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, अक्सर अपनी गति से और अपनी पसंद की योजनाओं पर काम करते हैं।

🎯 Exam Tip: व्यक्तिगत प्रोजेक्ट की परिभाषा को याद रखें जिसमें छात्र की स्वतंत्रता और स्वयं कार्य करने पर जोर दिया जाता है।

 

Question 13. सामाजिक प्रोजेक्ट से क्या आशय है ?
Answer: सामाजिक प्रोजेक्ट उस प्रोजेक्ट को कहते हैं जिनमें सब विद्यार्थी एक ही प्रोजेक्ट पर कार्य करते हैं और एक-दूसरे के सहयोग से उसे पूरा करते हैं।
In simple words: सामाजिक प्रोजेक्ट वह होता है जिसमें सभी छात्र एक ही प्रोजेक्ट पर मिलकर काम करते हैं और एक-दूसरे के सहयोग से उसे पूरा करते हैं।

🎯 Exam Tip: सामाजिक प्रोजेक्ट की परिभाषा को याद रखें जिसमें समूह कार्य और सहयोग के महत्व पर जोर दिया जाता है।

 

Question 14. निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य
1. प्रोजेक्ट प्रणाली को मिस हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ किया था।
2. प्रोजेक्ट से आशय है निश्चित उद्देश्यपूर्ण कार्य ।
3. किलपैट्रिक कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अध्यापकों के कॉलेज में शिक्षाशास्त्र के प्रोफेसर थे ।
4. योजना प्रणाली के अन्तर्गत बालकों को क्रिया के माध्यम से शिक्षा दी जाती है।
5. योजना प्रणाली में बच्चों में सामाजिक भावना की पूर्ण अवहेलना की गई है।
6. योजना प्रणाली के अन्तर्गत बच्चों के व्यक्तित्व पर शिक्षक का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता ।
Answer:
1. असत्य,
2. सत्य,
3. सत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य ।
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली किलपैट्रिक ने शुरू की, इसका अर्थ उद्देश्यपूर्ण कार्य है, यह क्रिया आधारित शिक्षा है, और शिक्षक का प्रभाव पड़ता है। इसमें सामाजिक भावना की उपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि उसे प्रोत्साहित किया जाता है।

🎯 Exam Tip: सत्य/असत्य प्रश्नों के लिए, प्रोजेक्ट विधि के मूल सिद्धांतों और विशेषताओं की स्पष्ट समझ महत्वपूर्ण है ताकि आप सही कथन पहचान सकें।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

 

Question 1. प्रोजेक्ट प्रणाली के जन्मदाता हैं
(क) फ्रॉबेल
(ख) जॉन डीवी
(ग) किलपैट्रिक
(घ) पेस्टालॉजी
Answer: (ग) किलपैट्रिक
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली की शुरुआत किलपैट्रिक ने की थी।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट प्रणाली के जनक के रूप में किलपैट्रिक का नाम याद रखना एक सीधा तथ्य है जिसे अक्सर पूछा जाता है।

 

Question 2. प्रोजेक्ट एक समस्याप्रधान कार्यवाही है जिसके अन्तर्गत स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्णता को प्राप्त किया जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) किलपैट्रिक का
(ख) जॉन डीवी का
(ग) कमेनियस का ।
(घ) स्टीवेन्सन का ।
Answer: (घ) स्टीवेन्सन का
In simple words: यह परिभाषा कि प्रोजेक्ट एक समस्या-आधारित गतिविधि है जो प्राकृतिक परिस्थितियों में पूरी होती है, स्टीवेन्सन ने दी है।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण परिभाषाओं को उनके संबंधित शिक्षाविदों के साथ जोड़कर याद रखें।

 

Question 3. प्रोजेक्ट प्रणाली का आधार है
(क) आदर्शवाद
(ख) प्रयोजनवाद
(ग) उदारवाद
(घ) प्रयोगवाद
Answer: (ख) प्रयोजनवाद
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली का मूल आधार प्रयोजनवाद का सिद्धांत है।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के दार्शनिक आधार, प्रयोजनवाद को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. प्रोजेक्ट प्रणाली का प्रमुख सिद्धान्त है
(क) अनुभव का सिद्धान्त
(ख) प्रयोजन का सिद्धान्त
(ग) उपयोगिता का सिद्धान्त
(घ) प्रयोगशाला का सिद्धान्त
Answer: (ख) प्रयोजन का सिद्धान्त
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली का एक प्रमुख सिद्धांत प्रयोजन का सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि हर कार्य का एक स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के प्रमुख सिद्धांतों में से एक 'प्रयोजन का सिद्धान्त' है, जिसे याद रखना चाहिए।

 

Question 5. प्रोजेक्ट प्रणाली की शिक्षण विधि का अन्तिम चरण है
(क) प्रोजेक्ट का चुनाव
(ख) योजना का निर्माण
(ग) मूल्यांकन
(घ) कार्य का लेखा ।
Answer: (घ) कार्य का लेखा
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली की शिक्षण विधि का अंतिम चरण 'कार्य का लेखा' होता है, जिसमें किए गए कार्य का रिकॉर्ड रखा जाता है।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट विधि के चरणों का सही क्रम याद रखें, जिसमें 'कार्य का लेखा' अंतिम चरण है।

 

Question 6. प्रोजेक्ट प्रणाली का प्रमुख दोष है
(क) प्राजक्ट चयन में कठिनाई
(ख) समय का अधिक व्यय
(ग) व्यावहारिकता
(घ) शारीरिक विकास के लिए उपयुक्त
Answer: (क) प्रोजेक्ट चयन में कठिनाई
In simple words: प्रोजेक्ट प्रणाली का एक बड़ा दोष यह है कि सही प्रोजेक्ट का चुनाव करना मुश्किल होता है।

🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट प्रणाली के दोषों में से एक 'प्रोजेक्ट चयन में कठिनाई' को याद रखें, क्योंकि यह अक्सर छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए एक चुनौती होती है।

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