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UP Board Solutions For Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 शिक्षा का उद्देश्य (डॉ० सम्पूर्णानन्द)
लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली
Question 1. प्रश्नः डॉ० सम्पूर्णानन्द का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियाँ भी लिखिए तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। या डॉ० सम्पूर्णानन्द का साहित्यिक परिचय दीजिए।
Answer: जीवन-परिचयः डॉ० सम्पूर्णानन्द राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम पंक्ति के सेनानी, प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, कुशल राजनीतिज्ञ, भारतीय दर्शन और संस्कृति के उद्भट विद्वान् एवं हिन्दी-साहित्य के महान् साहित्यकार थे। ये गम्भीर विचारक और प्रौढ़ लेखक थे।
डॉ० सम्पूर्णानन्द का जन्म सन् 1890 ई० में काशी के एक सम्भ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम विजयानन्द थी। इन्होंने वाराणसी से बी० एस-सी० तथा इलाहाबाद से एल० टी० की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। इन्होंने सर्वप्रथम प्रेम विद्यालय, वृन्दावन में अध्यापक तथा बाद में डूंगर कॉलेज, डूंगर में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। सन् 1921 ई० में ये राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रेरित होकर काशी में 'ज्ञानमण्डल' में कार्य करने लगे। इन्होंने हिन्दी की 'मर्यादा' मासिक पत्रिका तथा 'टुडे' अंग्रेजी दैनिक का सम्पादन किया और काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष तथा संरक्षक भी रहे। वाराणसी में स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय इनकी ही देन है।
डॉ० सम्पूर्णानन्द सन् 1937 ई० में कांग्रेस मन्त्रिमण्डल में शिक्षामन्त्री, सन् 1955 ई० में उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा सन् 1962 ई० में राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त हुए। राज्यपाल के पद से सेवामुक्त होकर आप काशी विद्यापीठ के कुलपति बने और अन्तिम समय तक इसी पद पर कार्यरत रहे। 10 जनवरी, 1969 ई० को काशी में इनका स्वर्गवास हो गया।
साहित्यिक सेवाएँ:
डॉ० सम्पूर्णानन्द भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान् एवं हिन्दी व संस्कृत के महान् ज्ञाता थे। इनका हिन्दी से विशेष प्रेम था। इन्होंने भारतीय दर्शन एवं धर्म के गूढ तत्त्वों को समझकर सुबोध शैली में उच्चकोटि के लेख लिखे। ये समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। इन्होंने भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, ज्योतिष आदि विविध विषयों पर उच्चकोटि के निबन्ध लिखे और उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया। इनकी रचनाओं में इनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के दर्शन होते हैं। इन्होंने दर्शन की गूढ गुत्थियों को सुलझाते हुए 'चिद्विलास' नामक ग्रन्थ की रचना की। इनकी कृतियों में शिक्षा सम्बन्धी मौलिक चिन्तन तथा शिक्षा-जगत् की गम्भीर समस्याओं का समाधान पाया जाता है।
रचनाएँ: डॉ० सम्पूर्णानन्द ने साहित्य, दर्शन, राजनीति, इतिहास तथा अन्य विषयों पर उच्चकोटि के ग्रन्थों की। रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
(1) निबन्ध-संग्रह-भाषा की शक्ति तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अनेक फुटकर निबन्ध।
(2) दर्शन - चिद्विलास, जीवन और देर्शन।
(3) जीवनी - देशबन्धु चित्तरंजनदास, महात्मा गांधी आदि।
(4) राजनीति और इतिहास - चीन की राज्यक्रान्ति, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, मिस्र की राज्यक्रान्ति, समाजवाद, आर्यों का आदिदेश, सम्राट हर्षवर्धन, भारत के देशी राज्य आदि।
(5) धर्म - गणेश, नासदीय-सूक्त की टीका, पुरुष-सूक्त, ब्राह्मण सावधान।
(6) ज्योतिष - पृथ्वी से सप्तर्षि मण्डल।
(7) सम्पादन - मर्यादा' मासिक, टुडे' अंग्रेजी दैनिक।
(8) अन्य प्रमुख रचनाएँ - इन रचनाओं के अतिरिक्त व्रात्यकाण्ड, भारतीय सृष्टि-क्रेम विचार, हिन्दू देव परिवार का विकास, वेदार्थ प्रवेशिका, अन्तरिक्ष यात्रा, स्फुट विचार, ज्योतिर्विनोद, अधूरी क्रान्ति आदि इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं। इन्होंने विविध विषयों पर लगभग 25 ग्रन्थों की तथा अनेक स्वतन्त्र लेखों की रचना की। इनकी 'समाजवाद नामक कृति पर इन्हें हिन्दी-साहित्य सम्मेलन द्वारा मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया।
भाषा और शैली
(अ) भाषागत विशेषताएँ डॉ० सम्पूर्णानन्द हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनकी रचनाओं में गम्भीर चिन्तन पाया जाता है। इनकी भाषा भी गम्भीर और प्रौढ़ है। भाषा में संस्कृत के शुद्ध तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। सामान्य रूप से उर्दू-फारसी के शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता होने पर भी भाषा में प्रवाह, प्रांजलता, स्पष्टता और बोधगम्यता के गुण पाये जाते हैं। मुहावरों का प्रायः अभाव पाया जाता है, परन्तु कहीं-कहीं सामान्य मुहावरों; जैसे-'गम गलत करना', 'धर्मसंकट में पड़ना आदि का प्रयोग किया गया है।
(ब) शैलीगत विशेषताएँ डॉ० सम्पूर्णानन्द गम्भीर विचारक और प्रौढ़ लेखक थे। इनके गम्भीर स्वभाव, व्यक्तित्व और प्रकाण्ड पाण्डित्य की स्पष्ट छाप इनकी शैली पर है। इन्होंने हिन्दी भाषा और शैली को नयी दिशा प्रदान की है। विषयानुरूप परिवर्तित होती रहने वाली इनकी शैली की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
(1) विचारात्मक शैली - डॉ० सम्पूर्णानन्द का व्यक्तित्व गम्भीर और चिन्तनशील है। इनके दार्शनिक ग्रन्थों और निबन्धों में गम्भीर विचारात्मक शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली में मौलिक चिन्तन, प्रवाह और ओज विद्यमान है।
(2) गवेषणात्मक शैली - सम्पूर्णानन्द जी ने नवीन विषयों की खोज और मौलिक चिन्तन सम्बन्धी निबन्धों तथा धर्म, दर्शन और समीक्षात्मक विषयों में गवेषणात्मक शैली अपनायी है। इस शैली की भाषा में दुरूहता के साथ-साथ लेखक के गम्भीर और चिन्तनशील व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इस शैली में ओज की प्रधानता है।
(3) व्याख्यात्मक शैली - सम्पूर्णानन्द जी ने दार्शनिक विषयों को स्पष्ट करने के लिए व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसमें भाषा सरल, संयत और वाक्य छोटे हैं। इसमें उदाहरण देकर विषय को सरलता से समझाने का प्रयत्न किया गया है।
(4) ओजपूर्ण शैली - यह शैली सामान्य विषयों पर लिखे गये निबन्धों में अपनायी गयी है। इस शैली में ओज गुण पाया जाता है। वाक्यों का गठन सुन्दर और भाषा व्यावहारिक है।
उपर्युक्त शैली के अतिरिक्त इनकी रचनाओं में सूक्ति-कथन, उद्धरण शैली और आलंकारिक शैली के भी दर्शन होते हैं।
साहित्य में स्थान - डॉ० सम्पूर्णानन्द ने हिन्दी में गम्भीर विषयों पर निबन्धों और ग्रन्थों की रचना की। उनकी रचनाओं में मौलिक चिन्तन, गम्भीरता और उच्च स्तर का पाण्डित्य पाया जाता है। सम्पादन के क्षेत्र में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। एक मनीषी साहित्यकार के रूप में हिन्दी-साहित्य में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान सदा बना रहेगा।
In simple words: डॉ० सम्पूर्णानन्द एक बहुमुखी व्यक्तित्व थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, राजनीति, भारतीय दर्शन और हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी लेखन शैली में गहन विचार, स्पष्टता और ओज का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
🎯 Exam Tip: जीवनी और साहित्यिक परिचय लिखते समय, जन्म-मृत्यु की तिथियाँ, प्रमुख कृतियाँ और साहित्यिक विशेषताएँ क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें ताकि अधिक अंक प्राप्त किए जा सकें।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न - दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए
Question 1. प्रश्न 1: पुरुषार्थ दार्शनिक विषय है, पर दर्शन का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह थोड़े-से विद्यार्थियों का पाठ्य विषय मात्र नहीं है। प्रत्येक समाज को एक दार्शनिक मत स्वीकार करना होगा। उसी के आधार पर उसकी राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा। जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। एक विभाग के आदर्श दूसरे विभाग के आदर्श से टकरायेंगे। जो बात एक क्षेत्र में ठीक हुँचेगी वही दूसरे क्षेत्र में अनुचित कहलायेगी और मनुष्य के लिए अपना कर्तव्य स्थिर करना कठिन हो जायेगा। इसका तमाशा आज दीख पड़ रहा है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसके आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा?
(iv) किस समाज को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या प्रेरणा दी है?
Answer: (i) प्रस्तुत गद्यावतरण भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान्, प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री एवं महान् साहित्यकार डॉ० सम्पूर्णानन्द द्वारा लिखित हमारी पाठ्य-पुस्तक 'गद्य-गरिमा’ में संकलित ‘शिक्षा का उद्देश्य' शीर्षक पाठ से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए-
पाठ का नाम - शिक्षा का उद्देश्य।
लेखक का नाम-डॉ० सम्पूर्णानन्द।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक का विचार है कि मानव-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य पुरुषार्थ की प्राप्ति है। पुरुषार्थ चार माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सबसे बड़ा पुरुषार्थ मोक्ष है; अतः मानव-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति करना है। पुरुषार्थ का सम्बन्ध दर्शन से है और दर्शन का जीवन से गहरा सम्बन्ध है। जीवन से सम्बन्ध रखने वाला दर्शन थोड़े-से विद्यार्थियों द्वारा पढ़ने योग्य विषय नहीं है, अपितु वह जीवन की प्रत्येक विचारधारा का नाम है।
(iii) दार्शनिक मत के आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा।
(iv) जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने मानव-जीवन के पुरुषार्थ को जानने से पहले, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक व्यापक दार्शनिक मत स्वीकार करने की प्रेरणा दी है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि दर्शन केवल एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पहलू से जुड़ा है। एक समाज को अपने राजनीतिक, सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था के लिए एक दार्शनिक नींव की आवश्यकता होती है ताकि विभिन्न आदर्शों के टकराव से बचा जा सके और कर्तव्यों का निर्धारण हो सके।
🎯 Exam Tip: गद्यांश आधारित प्रश्नों में, पहले गद्यांश को ध्यान से पढ़ें, फिर प्रश्नों के उत्तर सीधे गद्यांश से ही खोजने का प्रयास करें। रेखांकित अंश की व्याख्या में मूल भाव को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 2. प्रश्न 2: आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास है। योगाभ्यास सिखाने का प्रबन्ध राज्य नहीं कर सकता, न. पाठशाला का अध्यापक ही इसका दायित्व ले सकता है। जो इस विद्या का खीजी होगा वह अपने लिए गुरु ढूंढ लेगा। परन्तु इतना किया जा सकता है-और यही समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाय, अनुकूल वातावरण उत्पन्न किया जाय।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन किसे बताया गया है?
(iv) समाज और अध्यापक का क्या कर्तव्य है?
(v) योगाभ्यास का खोजी किसे हूँढ़ लेगा?
Answer: (ii) रेखांकित अंश की व्याख्या - इन पंक्तियों में लेखक ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को आत्म-साक्षात्कार के योग्य बनाना होता है। यहाँ पर आत्म-साक्षात्कार से तात्पर्य है कि छात्रों को अपने ज्ञानमयस्वरूप का सही ज्ञान हो जाए। उसे अपने स्वरूप की पहचान आवश्यक है और इसके लिए योगाभ्यास मुख्य साधन है। योगाभ्यास व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है; अर्थात् इसके लिए उसे स्वयं परिश्रम करना पड़ता है। इसे सिखाने का प्रबन्ध कोई विद्यालय, शिक्षक, समाज अथवा राज्य सरकार नहीं कर सकती; क्योंकि यह बाजार में बिकने वाला भौतिक साधन नहीं है। योगाभ्यास सीखने के लिए तो व्यक्ति के मन में लगन होनी चाहिए। यदि व्यक्ति के मन में सीखने की लगन है तो योग की बारीकियों को बताने वाले गुरु की कमी कभी भी बाधा नहीं बनेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि जब व्यक्ति में लगन होती है तो वह अपने लिए आवश्यक साधनों को स्वयं ढूंढ निकालता है।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास को बताया गया है।
(iv) समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाए तथा अनुकूल वातावरण भी तैयार किया जाए।
(v) योगाभ्यास का खोजी अपने लिए गुरु ढूंढ लेगा।
In simple words: आत्मसाक्षात्कार का मुख्य मार्ग योगाभ्यास है, जो व्यक्ति को स्वयं खोजना होता है। राज्य या विद्यालय इसे सिखा नहीं सकते, पर समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि सही वातावरण बनाएं जिससे जिज्ञासु व्यक्ति स्वयं ही गुरु और साधन ढूंढ सके।
🎯 Exam Tip: आत्मसाक्षात्कार जैसे गूढ़ विषयों की व्याख्या करते समय, लेखक के मूल विचार को स्पष्टता से प्रस्तुत करें और उसे सरल भाषा में समझाएं। प्रश्न के सभी उप-भागों का सटीक उत्तर दें।
Question 3. प्रश्न 3: यह आदर्श बहुत ऊँचा है, पर अध्यापक का पद भी कम ऊँचा नहीं है। जो वेतन का लोलुप है और वेतन की मात्रा के अनुसार ही काम करना चाहता है, उसके लिए इसमें जगह नहीं है। अध्यापक की जो कर्तव्य है उसका मूल्य रुपयों में नहीं आँका जा सकता। किसी समय जो शिक्षक होता-था, वही धर्म-गुरु और पुरोहित भी होता था और जो बड़ा विद्वान् और तपस्वी होता था, वही इस भार को उठाया करता था। शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र और यजमान को दिव्यलोकों का अधिकारी बनाना सबका काम नहीं है। आज न वह धर्म-गुरु रहे न पुरोहित। पर क्या हम शिक्षक भी इसीलिए कर्तव्यच्युत हो जायें? हमको अपने सामने वही आदर्श रखना चाहिए और अपने को उस दायित्व का बोझ उठाने योग्य बनाने का निरन्तर अथक प्रयत्न करना चाहिए।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है?
(iv) पहले के समय में शिक्षक का पदभार कौन धारण करता था?
(v) शिंष्य को किसका पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है?
Answer: (ii) रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक वर्तमान व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि आज वैसे तपस्वी नहीं रहे, जो निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें, किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि आज के शिक्षक अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लें। हम शिक्षकों को आज भी शिक्षक के प्राचीन आदर्श को अपने सामने रखकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है जो वेतन का लोलुप है और वेतन के अनुसार ही काम करना चाहता है।
(iv) पहले के समय में जो शिक्षक होता था वही धर्मगुरु और पुरोहित भी होता था और जो विद्वान तथा तपस्वी होता था वही इस पदभार को धारण करता था।
(v) शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है।
In simple words: लेखक के अनुसार, अध्यापक का पद अत्यंत गरिमापूर्ण है और यह केवल वेतन के लिए नहीं होना चाहिए। प्राचीन काल में शिक्षक ही धर्मगुरु और पुरोहित होते थे, और हमें भी उन्हीं आदर्शों को अपनाते हुए अपने शिक्षण दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: किसी भी पद के महत्व को समझाते हुए नैतिक मूल्यों पर आधारित प्रश्नों का उत्तर देते समय, ऐतिहासिक संदर्भों और वर्तमान स्थिति के बीच तुलना करके अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करें।
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