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Detailed Sahityika साहित्यिका निबंध UP Board Solutions for Class 11 Hindi
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Class 11 Hindi Sahityika साहित्यिका निबंध UP Board Solutions PDF
साहित्यिक निबन्ध
1. साहित्य और समाज
सम्बद्ध शीर्षक
• साहित्य समाज का दर्पण है
• साहित्य और मानव-जीवन
• साहित्य समाज की अभिव्यक्ति
प्रमुख विचार-बिन्दुः
1. साहित्य क्या है?
2. साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ,
3. समाज क्या है?
4. साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध - साहित्य समाज का दर्पण,
5. साहित्य की रचनाप्रक्रिया,
6. साहित्य का समाज पर प्रभाव,
7. उपसंहार ।
साहित्य क्या है? – साहित्य' शब्द 'सहित' से बना है। ‘सहित' का भाव ही साहित्य कहलाता है ( सहितस्य भावः साहित्यः) । 'सहित' के दो अर्थ हैं – साथ एवं हितकारी (स + हित = हितसहित) या कल्याणकारी। यहाँ 'साथ' से आशय है— शब्द और अर्थ का साथ अर्थात् सार्थक शब्दों का प्रयोग। सार्थक शब्दों का प्रयोग तो ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाएँ करती हैं। तब फिर साहित्य की अपनी क्या विशेषता है? वस्तुतः साहित्य का ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं से स्पष्ट अन्तर है
1. ज्ञान-विज्ञान की शाखाएँ बुद्धिप्रधान या तर्कप्रधान होती हैं जब कि साहित्य हृदयप्रधान।
2. ये शाखाएँ तथ्यात्मक हैं जब कि साहित्य कल्पनात्मक।
3. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का मुख्य लक्ष्य मानव की भौतिक सुख-समृद्धि एवं सुविधाओं का विधान करना है, पर साहित्य का लक्ष्य तो मानव के अन्तःकरण का परिष्कार करते हुए, उसमें सद्वृत्तियों का संचार करना है। आनन्द प्रदान कराना यदि साहित्य की सफलता है, तो मानव-मन का उन्नयन उसकी सार्थकता।
4. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं में कथ्य (विचार-तत्त्व) ही प्रधान होता है, कथन-शैली गौण। वस्तुतः भाषा-शैली वहाँ विचाराभिव्यक्ति की साधनमात्र है। दूसरी ओर साहित्य में कथ्य से अधिक शैली का महत्त्व है।
उदाहरणार्थ
जल उठा स्नेह दीपक-सा
नवनीत हृदये था मेरा,
अब शेष धूमरेखा से
चित्रित कर रहा अँधेरा ।
कवि का कहना केवल यह है कि प्रिय के संयोगकाल में जो हृदय हर्षोल्लास से भरा रहता था, वही अब उसके वियोग में गहरे विषाद में डूब गया है। यह एक साधारण व्यापार है, जिसका अनुभव प्रत्येक प्रेमी-हृदय करता है, किन्तु कवि ने दीपक के रूपक द्वारा इसी साधारण-सी बात को अत्यधिक चमत्कारपूर्ण ढंग से कहा है, जो पाठक के हृदय को कहीं गहरी छू लेता है।
स्पष्ट है कि साहित्य में भाव और भाषा, कथ्य और कथन-शैली (अभिव्यक्ति) दोनों का समान महत्त्व है। यह अकेली विशेषता ही साहित्य को ज्ञान-विज्ञान की शेष शाखाओं से अलग करने के लिए पर्याप्त है।
साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ – प्रेमचन्द जी साहित्य की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं, “सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है-एक जिज्ञासा का, दूसरा प्रयोजन का और तीसरा आनन्द का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और आनन्द का सम्बन्ध केवल साहित्य का विषय है। सत्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।” इस बात को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर इन शब्दों में कहते हैं, “जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रूप को व्यक्त करना नहीं, अपितु विशुद्ध आनन्द रूप को व्यक्त करना है, उसी को मैं साहित्य कहता हूँ।' प्रसिद्ध अंग्रेज समालोचक द क्विन्सी (De Quincey) के अनुसार साहित्य का दृष्टिकोण उपयोगितावादी न होकर मानवतावादी है। “ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का लक्ष्य मानव का ज्ञानवर्द्धन करना है, उसे शिक्षा देना है। इसके विपरीत साहित्य मानव का अन्तःविकास करता है, उसे जीवन जीने की कला सिखाता है, चित्तप्रसादन द्वारा उसमें नूतन प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करता है।”
समाज क्या है? – एक ऐसा मानव-समुदाय, जो किसी निश्चित भू-भाग पर रहता हो, समान परम्पराओं, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति से आपस में जुड़ा हो तथा एक भाषा बोलता हो, समाज कहलाता है।
साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज का दर्पण – समाज और साहित्य परस्पर घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। साहित्य का जन्म वस्तुतः समाज से ही होता है। साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही घटक होता है। वह अपने समाज की परम्पराओं, इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि से ही अनुप्राणित होकर साहित्य-रचना करता है और अपनी कृति में इनका चित्रण करता है। इस प्रकार साहित्यकार अपनी रचना की सामग्री किसी समाज विशेष से ही चुनता है तथा अपने समाज की आशाओं-आकांक्षाओं, सुखों-दुःखों, संघर्षों, अभावों और उपलब्धियों को वाणी देता है तथा उसका प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। उसकी समर्थ वाणी का सहारा पाकरे समाज अपने स्वरूप को पहचानती है और अपने रोग का सही निदान पाकर उसके उपचारे को तत्पर होता है। इसी कारण किसी साहित्य विशेष को पढ़कर उस काल के समाज का एक समग्र-चित्र मानसपटल पर अंकित हो सकता है। इसी अर्थ में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।
साहित्य की रचना-प्रक्रिया – समर्थ साहित्यकार अपनी अतलस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा सबसे पहले अपने समकालीन सामाजिक जीवन को बारीकी से पर्यवेक्षण करता है, उसकी सफलताओं-असफलताओं, उपलब्धियों-अभावों, क्षमताओं-दुर्बलताओं तथा संगतियों-विसंगतियों की गहराई तक थाह लेता है। इसके पश्चात् विकृतियों और समस्याओं के मूल कारणों का निदान कर अपनी रचना के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन करता है और फिर इस समस्त बिखरी हुई, परस्पर असम्बद्ध एवं अति साधारण-सी दीख पड़ने वाली सामग्री को सुसंयोजित कर उसे अपनी 'नवनवोन्मेषशालिनी कल्पना के साँचे में ढालकर ऐसा कलात्मक रूप एवं सौष्ठव प्रदान करता है कि सहृदय अध्येता रस-विभोर हो नूतन प्रेरणा से अनुप्राणित हो उठता है। कलाकार का वैशिष्ट्य इसी में है कि उसकी रचना की अनुभूति एकाकी होते हुए भी सार्वदेशिक-सार्वकालिक बन जाये तथा अपने युगे की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए चिरन्तन मानव-मूल्यों से मण्डित भी हो। उसकी रचना न केवल अपने युग, अपितु आने वाले युगों के लिए भी नवस्फूर्ति का अजस्र स्रोत बन जाये और अपने देश-काल की उपेक्षा न करते हुए देश-कालातीत होकर मानवमात्र की अक्षय निधि बन जाये। यही कारण है। कि महान् साहित्यकार किसी विशेष देश, जाति, धर्म एवं भाषा-शैली के समुदाय में जन्म लेकर भी सारे विश्व का अपना बन जाता है; उदाहरणार्थ- वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसीदास, होमर, शेक्सपियर आदि किसी देश विशेष के नहीं मानवमात्र के अपने हैं, जो युगों से मानव को नवचेतना प्रदान करते आ रहे हैं।
साहित्य का समाज पर प्रभाव – साहित्यकार अपने समकालीन समाज से ही अपनी रचना के लिए आवश्यक सामग्री का चयन करता है; अतः समाज पर साहित्य का प्रभाव भी स्वाभाविक है। जैसा कि ऊपरे संकेतित किया गया है कि महान् साहित्यकार में एक ऐसी नैसर्गिक या ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है, एक ऐसी अतलस्पर्शिनी अन्तर्दृष्टि होती है कि वह विभिन्न दृश्यों, घटनाओं, व्यापारों या समस्याओं के मूल तक तत्क्षण पहुँच जाता है, जब कि राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री उसका कारण बाहर टटोलते रह जाते हैं। इतना ही नहीं, साहित्यकार रोग का जो निदान करता और उपचार सुझाता है, वही वास्तविक समाधान होता है। इसी कारण प्रेमचन्द जी ने कहा है कि “साहित्य राजनीति के आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं।” अंग्रेज कवि शेली ने कवियों को विश्व के अघोषित विधायक' (unacknowledged legislators of the world) कहा है।
प्राचीन ऋषियों ने कवि को विधाता और. द्रष्टा कहा है – 'कविर्मनीषी धाता स्वयम्भूः ।' साहित्यकार कितना बड़ा द्रष्टा होता है, इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। आज से लगभग 70-75 वर्ष पूर्व श्री देवकीनन्दन खत्री ने अपने तिलिस्मी उपन्यास 'रोहतासमठ' में यन्त्रमानव (robot) के कार्यों का विस्मयकारी चित्रण किया था। उस समय यह सर्वथा कपोल-कल्पित लगा; क्योंकि उस काल में यन्त्रमानव की बात किसी ने सोची तक न थी, किन्तु आज विज्ञान ने उस दिशा में बहुत प्रगति कर ली है, यह देख श्री खत्री की नवनवोन्मेष- शालिनी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पुष्पक विमान के विषय में पढ़ना कल्पनामात्र लगता होगा, परन्तु आज उससे कहीं अधिक प्रगति वैमानिकी ने की है।
साहित्य द्वारा सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियों के उल्लेखों से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है। सम्पूर्ण यूरोप को गम्भीर रूप से आलोड़ित कर डालने वाली फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789 ई०), रूसो की 'ला कोंत्री सोसियल' (La Contract Social-सामाजिक-अनुबन्ध) नामक पुस्तक के प्रकाशने का ही परिणाम थी। आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों ने इंग्लैण्ड से कितनी ही घातक सामाजिक एवं शैक्षिक रूढ़ियों का उन्मूलन कराकर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया।
आधुनिक युग में प्रेमचन्द के उपन्यासों में कृषकों पर जमींदारों के बर्बर अत्याचारों एवं महाजनों द्वारा उनके क्रूर शोषण के चित्रों ने समाज को जमींदारी-उन्मूलन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की स्थापना को प्रेरित किया। उधर बंगाल में शरत्चन्द्र ने अपने उपन्यासों में कन्याओं के बाल-विवाह की अमानवीयता एवं विधवाविवाह-निषेध की नृशंसता को ऐसी सशक्तता से उजागर किया कि अन्ततः बाल-विवाह को कानून द्वारा निषिद्ध घोषित किया गया एवं विधवा-विवाह का प्रचलन हुआ।
उपसंहार – निष्कर्ष यह है कि समाज और साहित्य का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। साहित्य समाज से ही उद्भूत होता है; क्योंकि साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही अंग होता है। वह इसी से प्रेरणा ग्रहणकर साहित्य-रचना करता है एवं अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हुआ समकालीन समाज का मार्गदर्शन करता है, किन्तु साहित्यकार की महत्ता इसमें है कि वह अपने युग की उपज होने पर भी उसी से बँधकर नहीं रह जाये, अपितु अपनी रचनाओं से चिरन्तन मानवीय आदर्शों एवं मूल्यों की स्थापना द्वारा देशकालातीत बनकर सम्पूर्ण मानवता को नयी ऊर्जा एवं प्रेरणा से स्पन्दित करे । इसी कारण साहित्य को विश्व-मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है, जिसकी समकक्षता संसार की मूल्यवान्-से-मूल्यवान् वस्तु भी नहीं कर सकती; क्योंकि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान मानवता के शरीर का ही पोषण करता है, जब कि एकमात्र साहित्य ही उसकी आत्मा का पोषक है। एक अंग्रेज विद्वान् ने कहा है कि “यदि कभी सम्पूर्ण अंग्रेज जाति नष्ट भी हो जाये, किन्तु केवल शेक्सपियर बचा रहे तो अंग्रेज जाति नष्ट नहीं हुई मानी जाएगी। ऐसे युगस्रष्टा और युगद्रष्टा कलाकारों के सम्मुख सम्पूर्ण मानवता कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होकर उन्हें अपने हृदय-सिंहासन पर प्रतिष्ठित करती है एवं उनके यश को दिग्दिगन्तव्यापी बना देती है। अपने पार्थिव शरीर से तिरोहित हो जाने पर भी वे अपने यशरूपी शरीर से इस धराधाम पर सदा अजर-अमर बने रहते हैं
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः ।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजे भयम् ॥
2. मेरा प्रिय ग्रन्थ (श्रीरामचरितमानस)
सम्बद्ध शीर्षक
• मेरी प्रिय पुस्तक
• तुलसी और उनका काव्य
• हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय, अमर साहित्यिक कृति
प्रमुख विचार-बिन्दु
1. प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व,
2. श्रीरामचरितमानस की महत्ता,
3. कथा संगठन,
4. चरित्र-चित्रण,
5. भक्ति-भावना,
6. भाव-व्यंजना,
7. भाषा-शैली,
8. आदर्श की स्थापना,
9. भारत पर तुलसी का ऋण,
10. उपसंहार ।
प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व – किसी विद्वान् ने लिखा है कि व्यक्ति को अपने यौवन में ही किसी लेखक या पुस्तक को अपना प्रिय अवश्य बना लेना चाहिए, जिससे वह उससे आजीवन सोत्साह जीने का सम्बल प्राप्त कर सके । पुस्तकों से अच्छा साथी दूसरा नहीं। वे व्यक्ति को सहारा देती हैं, उससे सहारा नहीं माँगती। हर समय व्यक्ति के पास उपस्थित रहती हैं, किन्तु अपनी उपस्थिति से उसका ध्यान नहीं बँटातीं। एक सन्मित्र की भाँति सदा परामर्श को तत्पर रहती हैं, फिर भी अपनी राय उस पर नहीं थोपतीं।
पुस्तकों की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर मैंने उनमें विशेष रुचि ली और ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिसके फलस्वरूप मैंने अनुभव किया कि गोस्वामी तुलसीदास कृत 'श्रीरामचरितमानस' एक सर्वांगपूर्ण रचना है, जो हर दृष्टि से असाधारण है एवं महत्तम मानवीय मूल्यों तथा आदर्शों से स्पन्दित है।
श्रीरामचरितमानस की महत्ता – वाल्मीकि रामायण के काल से लेकर आज तक समस्त रामकाव्यों की यदि तुलसीकृत 'श्रीरामचरितमानस से तुलना की जाए तो यह स्पष्टतः दीख पड़ेगा कि आदिकाव्य से उद्भूत रामकाव्य-परम्परा 'मानस में आकर पूर्ण परिणति को प्राप्त हुई है। चाहे वस्तु संघटन कौशल की दृष्टि से देखें, चाहे पात्रों के चरित्र-चित्रण के चरमोत्कर्ष की दृष्टि से और चाहे महाकाव्य एवं नाटकीयता के अद्भुत सामंजस्य द्वारा प्राप्त शैली की विमुग्धकारिणी प्रौढ़ता की दृष्टि से; यह निष्कर्ष तर्कसंगत और साधार प्रतीत होगा, न कि मात्र भावुकताप्रेरित । फलतः क्या आश्चर्य, यदि 'मानस' संसार के कला-पारखियों का हृदयहार रहा है, जिसका ज्वलन्त प्रमाण यह है कि किसी भी रामचरित-विषयक काव्य के विश्व की विभिन्न भाषाओं में इतने अनुवाद उपलब्ध नहीं होते, जितने 'श्रीरामचरितमानस' के । एक ओर यदि अमरीकी पादरी ऐटकिन्स ने अपनी आयु के श्रेष्ठ आठ वर्ष लगाकर 'मानस' का अंग्रेजी में पद्यानुवाद किया (जब कि इससे पूर्व उस भाषा में इसके कई अनुवाद विद्यमान थे), तो दूसरी ओर अनीश्वरवादी रूस के मूर्धन्य विद्वान् प्रोफेसर वरान्नीकोव ने अपने अमूल्य जीवन का एक बड़ा भाग लगाकर तथा द्वितीय विश्वयुद्ध की भीषण परिस्थिति में कजाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में रहकर भी रूसी भाषा में इसका पद्यानुवाद किया। उपर्युक्त मनीषियों के अतिरिक्त गार्साद तासी (फ्रेंच); ग्राउज़, ग्रियर्सन, ग्रीव्ज, कारपेण्टर, हिल (आंग्लभाषी विद्वान) आदि न जाने कितने काव्यमर्मज्ञ तुलसी की प्रतिभा पर मुग्ध हैं।
कथा-संगठन – यदि मानस पर कथावस्तु की दृष्टि से विचार करें तो हम पाएँगे कि इसमें गोस्वामी जी ने पुराने प्रसंगों को नया रूप देकर, कई को अधिक उपयुक्त स्थल पर रखकर, कुछ को संक्षिप्त और कुछ को विस्तृत कर तथा कुछ नये प्रसंगों की उद्भावना कर कथावस्तु को सर्वथा मौलिक बना दिया है। उनके बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का अधिकांश तो मौलिक है ही, पर अयोध्याकाण्ड में तो उनकी कुशलता देखते ही बनती है। इसके पूर्वार्द्ध के संघर्षमय वातावरण की उन्होंने जिस कलानिपुणता से सृष्टि की है, उस पर उनकी मौलिकता की छाप है और उत्तरार्द्ध को भरत-चरित्र तो उनकी सर्वथा अनूठी रचना है। भरत के माध्यम से उन्होंने अपनी भक्ति-भावना को साकार रूप प्रदान किया है। आरम्भ से अन्त तक 'मानस' की कथावस्तु में असाधारण प्रवाह है।
चरित्र-चित्रण – श्रीरामचरितमानस में प्रस्तुत चरित्र-चित्रण अपनी मौलिकता में वाल्मीकीय 'रामायण' और अध्यात्म' को बहुत पीछे छोड़ जाता है। सामान्यतः इसके सभी चरित्र नये साँचे में ढलकर नयी गरिमा से मण्डित हुए हैं, पर राम के चरित्र को इस ग्रन्थ में जिन मौलिक उपादानों से गढ़ा गया है, वे सर्वथा अभूतपूर्व हैं। इस ग्रन्थ में पहली बार राम में नरत्व के साथ परब्रह्म का सामंजस्य स्थापित किया गया है। राम में शक्ति, शील तथा सौन्दर्य की पराकाष्ठा दिखाकर राम के शील का जैसा दिव्य-चित्रण किया गया है, वह सर्वथा अभूतपूर्व और अतुलनीय है।
भक्ति-भावना – 'श्रीरामचरितमानस में तुलसी की भक्ति सेवक-सेव्य भाव की होते हुए भी परम्परागत भक्ति से भिन्न है। गोस्वामी जी की भक्ति साधन नहीं, स्वयं साध्य है और ज्ञानादि उसके चाकरमात्र हैं। इस ग्रन्थ में गोस्वामी जी ने भरत के रूप में अपनी भक्ति का आदर्श खड़ा किया है और भरत अपनी तन्मयता में राधाभाव के समीप पहुँच जाते हैं; अतः उनके विषय में यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि “माधुर्य भाव की उपासना में जो स्थान राधा का है, दास्य भाव की उपासना में वही स्थान भरत का है। इस प्रकार तुलसी की उपासना में जो स्थान राधा का है। स्वीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। भक्ति का स्वरूप सर्वथा मौलिक बन पड़ा है जिसमें छुटपन-बड़प्पन या ऊँच-नीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। इस भक्तिरूपी रसायन द्वारा श्रीरामचरितमानस के माध्यम से गोस्वामी जी ने मृतप्रायः हिन्दू जाति को नवजीवन प्रदान किया।
भाव-व्यंजना – गोस्वामी जी रससिद्ध कवीश्वर थे, भाव और भाषा के अप्रतिम सम्राट् थे। उन्होंने 'मानस' में शास्त्रोक्त नव रसों को तो साकार किया ही, अपनी अलौकिक प्रतिभा से भक्ति-रस नामक एक नूतन रस की भी सृष्टि कर डाली। गोस्वामी जी ने रस-परिपाक के अतिरिक्त संचारी भावों एवं अनुभावों की अलग से भी ऐसी कुशल योजना की है कि उनकी काव्य-प्रतिभा पर दंग रह जाना पड़ता है। श्रीरामचरितमानस' से संचारियों एवं अनुभावों का लिखित, योजनाबद्ध समग्र चित्र खड़ा करने का कौशल द्रष्टव्य है
उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा ॥
भरत के आगमन पर प्रेमजन्य अधीरता एवं हर्षजन्य आवेग के कारण राम जो अति वेगपूर्वक ऊठते हैं, उससे जहाँ एक ओर उनका भरत के प्रति अनुराग साकार हो उठा है, वहीं उनकी मानव सुलभ अधीरता भी चित्रित से जाती है। 'श्रीरामचरितमानस' में उपमाओं की सादगी एवं मार्मिकता पर सारा सहृदय समाज मुग्ध है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा- सम्पूर्ण लंका में एकमात्र विभीषण ही सन्त-स्वभाव के थे। शेष सारा समाज दुर्जन और परपीड़क था। ऐसों के बीच में रहकर जीने के लिए विवश विभीषण अपनी दशा का वर्णन करते हुए हनुमान जी से कहते हैं
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्ह महँ जीभ बिचारी ॥
अर्थात् हे पवनपुत्र! लंका में मैं वैसा ही विवश जीवन जी रहा हूँ, जैसा बत्तीस दाँतों के बीच में रहकर जीने को विवश बेचारी जीभ न दाँतों का संग छोड़ सकती है, न उनसे निश्चिन्त हो सकती है। इसी प्रकार काव्य के समस्त अंगों-उपांगों कर 'श्रीरामचरितमानस में चित्रण इसे एक नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है।
भाषा-शैली – मानस में महाकवि तुलसी ने संस्कृत की महत्ता एवं एकछत्र साम्राज्य के उस युग में अनगढ़ लोकभाषा को अपनाकर उसे बड़े मनोयोग से सजाया-सँवारा। इस ग्रन्थ में इन्होंने अपनी असामान्य प्रतिभा के बल पर रस को रसात्मकता, अलंकार को अलंकरण तथा छन्द को नयी गति-भंगिमा और संगीतात्मकता प्रदान की तथा हमारे आस-पास के सुपरिचित जीवन से उपमानों का चयनकर उनमें नयी अर्थवत्ता और व्यंजकता भर दी। काव्य में नाटकीयता के मणिकांचन योग द्वारा नयी शैली को जन्म दिया, जिसने एक ही ग्रन्थ को श्रव्य-काव्य और दृश्य-काव्य दोनों बना दिया।
आदर्श की स्थापना – 'मानस' की रामकथा – एक आदर्श मानव की, एक आदर्श परिवार की, एक आदर्श एवं पूर्ण जीवन की कथा है। तुलसी ने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक प्रत्येक क्षेत्र में जिन आदर्शों की स्थापना की, वे व्यक्ति के इहलौकिक और पारलौकिक-दोनों ही जीवनों को सँवारने वाले हैं। इसी कारण 'मानस' पारिवारिक जीवन का महाकाव्य कहलाता है; क्योंकि परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और पारिवारिक जीवन की सुदृढ़ता शेष समस्त क्षेत्रों को भी सुदृढ़ बनाती है। आदर्श राज्य के रूप में तुलसी के रामराज्य की कल्पना आरम्भ से ही भारतीय जन-मानस को प्रेरणा देती रही है और देती रहेगी।
भारत पर तुलसी का ऋण – इस सम्बन्ध में डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी लिखते हैं कि “अपनी भक्ति के साथ-साथ समाज की रक्षा के लिए उनका अपरिसीम आग्रह था और इसी भक्ति और समाज-रक्षा की चेष्टा के फलस्वरूप ‘श्रीरामचरितमानस' नामक महाग्रन्थ रचित हुआ, जिसकी पूतधारी ने आज तक उत्तर भारत की हिन्दू जनता के चित्त को सरस और शक्तिमान बनाये रखा है और उसके चरित्र को सामाजिक सद्गुणों के आदर्श की ज्योति से सदा आलोकित कर रखा है।”
उपसंहार – अस्तु, मौलिकता का श्रेष्ठतम सम्बल पाकर ही तुलसी का 'श्रीरामचरितमानस' लोक-मानस बन सका है, यह तुलसी की कवि-प्रतिभा और उनकी जागरूक कलाकारिता का प्रमाण है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-“तुलसीदास कवि थे, भक्त थे, समाज-सुधारक थे, लोकनायक थे और भविष्य के स्रष्टा थे। इन रूपों में उनका कोई भी रूप किसी से घटकर नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने सब ओर से समता (balance) की रक्षा करते हुए एक अद्वितीय काव्य की सृष्टि की, जो अब तक उत्तर भारत का मार्गदर्शक रहा है और उस दिन भी रहेगा, जिस दिन नवीन भारत का जन्म हो गया होगा।'
तुलसी कृत 'श्रीरामचरितमानस' का मूल्यांकन करते हुए डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल लिखते हैं कि, श्रीरामचरितमानस विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी का सबसे अधिक प्रभावशाली ग्रन्थ है।” भारतीय वाङ्मय के समुद्र से अनेक विचार-मेघ उठे और बरसे। उनके अमृत-तुल्य जल की जिस मात्रा में जनता को आवश्यकता थी, उसे समेटकर मानो गोसाईं जी ने श्रीरामचरितमानस में भर दिया है। जो अन्यत्र था, वह साररूप से यहाँ आ गया है। तुलसी का 'श्रीरामचरितमानस' विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी के साहित्याकाशे का खुला नेत्र है, उसे ही तत्कालीन लोक की दर्शनक्षमता या आँख कह सकते हैं।
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