NCERT Solutions for Class 11 Hindi: Rājanīti राजनीति संबंधि निबन्ध
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Practice Class 11 Hindi Solutions: Rājanīti राजनीति संबंधि निबन्ध
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राजनीति सम्बन्धी निबन्ध
भारत में लोकतन्त्र की सफलता
सम्बद्ध शीर्षक
- भारतीय लोकतन्त्र और राजनीतिक दल
- राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकतन्त्र
- स्वतन्त्र भारत में जन-प्रतिनिधियों की भूमिका
- भारतीय लोकतन्त्र और नैतिकता।
प्रमुख विचार-बिन्दु
- प्रस्तावना,
- दलों को संवैधानिक मान्यता,
- भारत में प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रणाली,
- दलों की अनिवार्यता,
- दल द्वारा सरकार की रचना
- विरोधी दल का महत्त्व,
- राजनीतिक दलों की उपयोगिता,
- भारत में लोकतन्त्र की सफलता,
- उपसंहार ।
प्रस्तावना. भारतीय संविधान की प्रस्तावना ने भारत को लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया है। लोकतन्त्र और प्रजातन्त्र समान अर्थ वाले शब्द हैं। आधुनिक युग में लोकतन्त्र को शासन की सर्वोत्तम प्रणाली माना गया है। अनेक विद्वानों ने लोकतन्त्र की व्याख्या की है। यूनान के दार्शनिक क्लीयॉन (Cleon) ने प्रजातन्त्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि, “वह व्यवस्था प्रजातान्त्रिक होगी, जो जनता की होगी, जनता के द्वारा और जनता के लिए होगी।” बाद में यही परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन द्वारा भी दोहरायी गयी। भारत का एक सामान्य शिक्षित व्यक्ति प्रजातन्त्र का अर्थ एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया से लगाता है जो वयस्क मताधिकार चुनाव, कम-से-कम दो राजनीतिक दल, स्वतन्त्र न्यायपालिका, प्रतिनिध्यात्मक एवं उत्तरदायी सरकार, स्वस्थ जनमत, स्वतन्त्र प्रेस तथा मौलिक अधिकारों की विशिष्टताओं से युक्त हो । विस्तृत अर्थों में प्रजातन्त्र एक आदर्श है, स्वयं में एक ध्येय है न कि साधन। एक प्रजातान्त्रिक देश में प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास का समुचित अवसर प्राप्त होता है, आर्थिक शोषण की अनुपस्थिति होती हैं, एकता तथा नैतिकता का वास होता है।
In simple words: लोकतन्त्र और प्रजातन्त्र एक ही हैं, जिसमें जनता स्वयं शासन करती है या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से। यह लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर देता है, आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाता है और एकता व नैतिकता को बढ़ावा देता है।
🎯 Exam Tip: लोकतन्त्र की विभिन्न परिभाषाओं को याद करें, विशेषकर अब्राहम लिंकन की। लोकतान्त्रिक प्रणाली की मुख्य विशेषताओं और आदर्शों पर ध्यान दें, क्योंकि यह विषय की आधारशिला है।
दलों को संवैधानिक मान्यता. भारत में प्राचीनकाल से ही लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति विद्यमान है तथा विश्व में सबसे बड़ा लोकतन्त्रात्मक राष्ट्र भारत है। यहाँ प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद चुनाव होते हैं। चुनाव में जो दल विजयी होता है, वह सरकार बनाता है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त संविधान प्रत्येक व्यक्ति को संस्था या संगठन बनाने का अधिकार भी देता है। इस कारण देश में कई दल या पार्टियाँ हैं, जो अपने सिद्धान्तों एवं आदर्शों को लेकर चुनाव के अखाड़े में उतरती हैं। भारतीय लोकतन्त्र का आधार इंग्लैण्ड का लोकतान्त्रिक स्वरूप रहा है। इंग्लैण्ड में केवल दो ही दल हैं। भारत का यह दुर्भाग्य है कि यहाँ अनेकानेक दल हैं, लेकिन कोई भी सशक्त दल नहीं है। लगभग चालीस वर्षों तक कांग्रेस सशक्त दल के रूप में सत्ता में थी, लेकिन आपसी फूट के कारण अब उसका भी अपना प्रभाव समाप्त होता जा रहा है।
In simple words: भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है जहाँ हर पाँच साल में चुनाव होते हैं। संविधान भाषण और संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है, जिससे कई राजनीतिक दल बनते हैं। हालाँकि, कई दल होने से कोई भी दल सशक्त नहीं बन पाता, जो भारत के लोकतन्त्र की एक चुनौती है।
🎯 Exam Tip: भारत में दलीय प्रणाली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान चुनौतियों पर गौर करें। विभिन्न दलों के होने के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों को समझें।
भारत में प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रणाली. भारत में प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र प्रचलन में है। इस पद्धति में जनता अपने प्रतिनिधि वोट द्वारा चुनती है। जे० एस० मिल के अनुसार, “प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र वह है, जिसमें सम्पूर्ण जनता अथवा उसका बहुसंख्यक भाग शासन की शक्ति का प्रयोग उन प्रतिनिधियों द्वारा करते हैं, जिन्हें वह समय-समय पर चुनते हैं।” प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है। ये दल संख्या में दो या दो से अधिक भी हो सकते हैं। निर्दलीय व्यवस्था के अन्तर्गत प्रजातन्त्र चल नहीं सकता। इसलिए प्रजातन्त्र में दलीय व्यवस्था अपरिहार्य है। राजनीतिक दल व्यक्तियों का एक संगठित समूह होता है जिसका राजनीतिक विषयों के सम्बन्ध में एक मत होना आवश्यक है। गिलक्रिस्ट के अनुसार, “राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का संगठित समूह है, जो एक-से राजनीतिक विचार रखता है और एक इकाई के रूप में कार्य करके सरकार पर नियन्त्रण रखता है।'
In simple words: भारत में लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं जो उनकी ओर से शासन करते हैं। प्रजातन्त्र के सफल संचालन के लिए राजनीतिक दलों का होना अनिवार्य है, क्योंकि ये नागरिकों के संगठित समूह होते हैं जो समान विचारों के साथ सरकार पर नियंत्रण रखते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र की अवधारणा और राजनीतिक दलों की भूमिका को स्पष्ट करें। जे.एस. मिल और गिलक्रिस्ट जैसे विचारकों के विचारों को उद्धृत करना महत्वपूर्ण है।
दलों की अनिवार्यता. राजनीतिक दलों के मुख्य कार्य राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैदेशिक समस्याओं के सम्बन्ध में अपने विचार निश्चित करके जनता के सामने रखना है। दल तदनुसार विचार व मान्यता रखने वाले प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा करते हैं। इस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दल अपने आदर्श और उद्देश्यों के प्रति जनता को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार आधुनिक युग की प्रजातन्त्रीय पद्धति में राजनीतिक दलों का महत्त्व स्थापित हो जाता है। जो व्यक्ति चुनाव में चुन लिया जाता है, वह दल के नियन्त्रण में रहने के कारण मनमानी नहीं कर पाता। यदि दल का नेतृत्व योग्य और ईमानदार व्यक्ति के हाथों में होता है तो वह इस बात का ध्यान रखता है कि दुराचरण के कारण उसकी प्रतिष्ठा और जनप्रियता कम न हो। यह सत्य है कि निष्पक्ष, निःस्वार्थ व योग्य व्यक्ति आजकल चुनाव लड़ना पसन्द नहीं करते। यह हमारे प्रजातन्त्र की बहुत बड़ी कमजोरी है। फिर भी इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीतिक दल प्रजातन्त्र के लिए अनिवार्य हैं।
In simple words: राजनीतिक दल देश की समस्याओं पर अपने विचार रखते हैं और अपने प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा करते हैं। वे जनता को आकर्षित कर मनमानी करने से रोकते हैं, जिससे प्रजातन्त्र मजबूत होता है। हालांकि, योग्य व्यक्तियों का चुनाव न लड़ना एक चुनौती है, फिर भी दल प्रजातन्त्र के लिए आवश्यक हैं।
🎯 Exam Tip: राजनीतिक दलों के कार्यों, महत्त्व और आधुनिक प्रजातन्त्र में उनकी अनिवार्य भूमिका का विश्लेषण करें। चुनौतियों के बावजूद दलों की आवश्यकता पर जोर दें।
दल द्वारा सरकार की रचना. चुनाव के पश्चात् जिस दल के प्रत्याशी अधिक संख्या में निर्वाचित होकर संसद या विधानमण्डलों में पहुँचते हैं, वही दल मन्त्रिमण्डल बनाता है और शासन की बागडोर सँभालता है। यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो दो या अधिक दल स्वीकृत न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर मिलकर मन्त्रिमण्डल बनाते हैं। शेष विरोधी पक्ष में रहकरे सरकार की नीति और कार्यक्रम की समीक्षा करते हैं। यदि मन्त्रिमण्डल के सभी मन्त्री एक राजनीतिक दल के नहीं हों तो सरकार के विभिन्न विभागों के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकेगा और कोई दीर्घकालीन कार्यक्रम नहीं चल सकेगा। इसके विपरीत यदि किसी सुसंगठित दल के पास शासन-सत्ता हो तो वह आगामी चुनाव तक निश्चिन्त होकर शासन चला सकता है। शासक दल के सदस्य संसद के बाहर भी सरकार की नीतियों का स्पष्टीकरण करके निरन्तर जन-समर्थन प्राप्त करते रहते हैं।
In simple words: चुनाव जीतने वाला दल सरकार बनाता है; अगर किसी दल को बहुमत न मिले तो कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं। विरोधी दल सरकार के कार्यों की समीक्षा करते हैं। एक संगठित दल स्थिर सरकार दे सकता है और जन-समर्थन बनाए रख सकता है।
🎯 Exam Tip: सरकार गठन की प्रक्रिया, गठबंधन सरकारों की भूमिका और विरोधी पक्ष के महत्व को समझें। बहुमत और स्थिर सरकार के फायदे व नुकसान पर ध्यान दें।
विरोधी दल का महत्त्व. शासक दल के दूसरी ओर विरोधी पक्ष रहता है। जहाँ विरोधी पक्ष में एक से अधिक दल होते हैं, वहाँ अधिक सदस्यों वाले दल का नेता या अन्य कोई व्यक्ति जिसके विषय में सभी दलों की सहमति हो जाए विरोधी पक्ष का नेता चुन लिया जाता है। वास्तव में संसदीय प्रजातन्त्र में विरोधी पक्ष का बड़ा महत्त्व होता है। विरोधी पक्ष सरकार की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखता है। कोई भी प्रस्ताव या विधेयक बिना वाद-विवाद के पारित नहीं हो सकता। स्थगन-प्रस्तावों, निन्दा-प्रस्तावों और अविश्वास-प्रस्तावों के भय से शासक दल मनमानी नहीं कर सकता और सदा सतर्क रहता है। यदि विरोधी पक्ष बिल्कुल ही न रहे या अति दुर्बल व अशक्त हो तो सरकार निरंकुश हो सकती है तथा सत्तारूढ़ दल जनमत की अवहेलना कर सकता है।
In simple words: विरोधी दल सरकार पर निगरानी रखता है और उसे मनमानी करने से रोकता है। यह सुनिश्चित करता है कि विधेयक उचित वाद-विवाद के बाद पारित हों और सरकार जनमत की अनदेखी न कर पाए। एक मजबूत विरोधी दल प्रजातन्त्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: विरोधी दल के विभिन्न कार्यों (जैसे स्थगन-प्रस्ताव, निन्दा-प्रस्ताव) और प्रजातन्त्र में उनकी भूमिका को विस्तार से समझें। कमजोर विरोधी दल के परिणामों पर भी ध्यान दें।
राजनीतिक दलों की उपयोगिता. राजनीतिक दल जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करने का कार्य करते हैं। वे सरकार द्वारा किये गये कार्यों का औचित्य व त्रुटियाँ जनता को बतलाते हैं। जनता एक प्रकार से विरोधी दलों के लिए अदालत का कार्य करती है। उसके सामने शासक दल और विरोधी दल अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं और फिर उससे आगामी चुनाव में निर्णय माँगते हैं। विभिन्न दलों के तर्क-वितर्क सुनकर जनता भी राजनीतिक परिपक्वता प्राप्त करती है। इस प्रकार जन-शिक्षा और जन-जागृति के लिए राजनीतिक दलों का बड़ा महत्त्व है।
In simple words: राजनीतिक दल जनता को सरकार के कार्यों की जानकारी देते हैं और उनकी अच्छाई-बुराई समझाते हैं। वे जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक और परिपक्व बनाते हैं, जिससे आने वाले चुनावों में सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।
🎯 Exam Tip: राजनीतिक दलों द्वारा प्रदान की जाने वाली जन-शिक्षा और जन-जागृति के महत्व पर जोर दें। यह स्पष्ट करें कि वे कैसे मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने में मदद करते हैं।
भारत में लोकतन्त्र की सफलता. अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनेडी के अनुसार, “लोकतन्त्र में एक मतदाता को अज्ञान सबकी सुरक्षा को संकट में डाल देता है।” हम जानते हैं कि भारत के लगभग आधे मतदाता अशिक्षित हैं और 'वोट' के महत्त्व से अपरिचित हैं। ऐसी स्थिति भारत की लोकतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली पर निश्चित रूप से प्रश्न-चिह्न लगाती है।
आज भारतीय लोकतन्त्र उठा-पटक की स्थिति से गुजर रहा है। वह देश जिसने लोकतन्त्र के चिराग को प्रज्वलित कर तृतीय विश्व के देशों को आलोकित करने का प्रयास किया था, आज उसके चिराग की रोशनी स्वयं मद्धिम होती जा रही है। राष्ट्र की छवि दिनानुदिन धूमिल पड़ती जा रही है तथा राजनीतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। कह सकते हैं कि भारतीय लोकतन्त्र संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है।
लोकतन्त्र के चार आधार-स्तम्भ होते हैं-विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और समाचार-पत्र । वर्तमान में संसद और विधानसभाओं में हाथा-पायी, गाली-गलौज, एक-दूसरे पर अश्लील आरोप आदि होते हैं तथा जनता के प्रतिनिधि जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। सन् 1967 के चुनावों के बाद त्यागी, योग्य, ईमानदार एवं चरित्रवान् व्यक्तियों को कम ही चुना जा सका है। निर्वाचित सदस्य जन-कल्याण की भावना से दूर रहे हैं। तथा भारतीय राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। फलतः लोकतान्त्रिक मूल्यों को आघात पहुंचा है।
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र में अनिवार्य है। आज भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनके स्थानान्तरण, पदोन्नति आदि में जिस प्रकार की नीति का परिचय दिया जाता है उससे न्यायपालिका के चरित्र को आघात पहुँचा है। दूसरी ओर लाखों मुकदमे न्यायालयों में न्याय की आशा में लम्बित पड़े हुए हैं। ग्लैडस्टन के मतानुसार, ‘Justice delayed is justice denied" अर्थात् विलम्बित न्याय न्याय से वंचित करना है। ऐसी स्थिति में भारत में लोकतन्त्र की सफलता कैसे मानी जा सकती है?
भारत में लोकतन्त्र की जड़े खोदने का कार्य करती है - कार्यपालिका प्रशासन की सुस्ती, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, शीघ्र निर्णय न लेना, अधिकारियों का आमोद-प्रमोद में डूबे रहना, स्वच्छन्द प्रवृत्ति के लोगों का प्रशासन में घुस आना, देश में आतंकवाद और अराजकता को रोकने के लिए ठोस कदम न उठाना, गरीबी और बेरोजगारी पर नियन्त्रण न कर पाना प्रशासन की असफलता के द्योतक हैं। ऐसे प्रशासन से तो लोकतन्त्र की सफलता की क्या कल्पना की जा सकती है?
लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है-समाचार-पत्र; अर्थात् लोकतन्त्र की रीढ़ है-विचारों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति । आज इस पर भी अनेक नाजायज विधानों द्वारा इनके मनोबल को तोड़ा जाता है। ऐसे में भारत में लोकतन्त्र की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
In simple words: भारत में लोकतन्त्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे अशिक्षित मतदाता, राजनीतिक मूल्यों का पतन, अपराधीकरण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता में कमी, प्रशासनिक अक्षमता, भ्रष्टाचार और प्रेस पर प्रतिबंध। इन समस्याओं के कारण भारत के लोकतन्त्र की सफलता पर सवाल उठते हैं।
🎯 Exam Tip: लोकतन्त्र की सफलता में बाधक विभिन्न कारकों जैसे अशिक्षा, भ्रष्टाचार, न्यायपालिका की चुनौतियों और प्रशासन की अक्षमता को विस्तार से समझाएं। जॉन कैनेडी और ग्लैडस्टन के उद्धरणों का प्रयोग करें।
उपसंहार. आवश्यकता है कि भारत में सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाया जाए तथा दिनानुदिन गिरते हुए राष्ट्रीय चरित्र को बचाया जाए। राष्ट्रीय भावना का दिनोदिन ह्रास होता जा रहा है, इसे उन्नत किया जाना चाहिए। मन्त्रिमण्डलीय अधिनायक तन्त्र, दल-बदले की संक्रामकता, केन्द्र-राज्य में बिगड़ते सम्बन्ध, सांसदों का गिरता हुआ नैतिक स्तर तथा प्रान्तीय पृथकतावाद को समाप्त करना होगा। समस्त नागरिकों को आर्थिक व सामाजिक न्याय उपलब्ध कराना होगा। लोकतन्त्र में शासन-सत्ता वस्तुतः सेवा का साधन समझी जानी चाहिए। लोकतन्त्र की सफलता के लिए नेताओं एवं शासकों में लोक-कल्याण की भावना का होना आवश्यक है। यद्यपि लोकतन्त्र में पक्ष-विपक्ष की भावना “मैं और मेरा, तू और तेरा' की भाव-धारा को जन्म देती है तथापि पक्षों का होना भी एक अपरिहार्य आवश्यकता है। यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि मतभेद व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और वैमनस्य का रूप न ग्रहण कर लें। यदि उपर्युक्त बातें पूरी होती रहें तो कोई भी झोंका भारतीय लोकतन्त्र को हिला नहीं सकता; क्योंकि कोई भी व्यवस्था यदि जन-आकांक्षाओं की पूर्ति करती है तो उस व्यवस्था के प्रति लोगों की आशाएँ खण्डित नहीं होती। प्रजातन्त्र में दलों का होना अति आवश्यक है। राजनीतिक दल चाहे शासक के रूप में हों या विरोधी पक्ष के रूप में, उनसे जनता का हित-साधन ही होता है, किन्तु बरसाती मेंढकों की तरह राजनीतिक दलों का बढ़ना देश के लिए अहितकर और विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। इससे फूट, द्वेष, हिंसा, कलह आदि बढ़ते हैं और देश में कोई रचनात्मक व अभ्युदय कार्यक्रम नहीं हो पाते। अतः हमारे देश में भी इंग्लैण्ड की तरह द्विदल प्रणाली विकसित हो सके तो वह दिन सौभाग्य व खुशहाली का दिन होगा।
In simple words: भारत को सामाजिक-आर्थिक सुधारों, राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान, और राजनीतिक स्थिरता की आवश्यकता है। नेताओं को जन-कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है, लेकिन उनकी संख्या सीमित होनी चाहिए ताकि फूट और संघर्ष से बचा जा सके और देश में रचनात्मक विकास हो सके, जैसा कि इंग्लैण्ड में है।
🎯 Exam Tip: उपसंहार में लोकतन्त्र की चुनौतियों के समाधान और भविष्य की दिशा पर प्रकाश डालें। दल-बदल, नैतिक पतन और जन-कल्याण की आवश्यकता जैसे प्रमुख बिन्दुओं को संक्षेप में स्पष्ट करें।
विद्यार्थी और राजनीति
सम्बद्ध शीर्षक
- राजनीति में विद्यार्थियों की सहभागिता
- छात्रसंघ चुनाव : दशा एवं दिशा
- राजनीति में युवकों की भूमिका
प्रमुख विचार-बिन्दु
- प्रस्तावना,
- स्वतन्त्र भारत में विद्यार्थी का दायित्व,
- विद्यार्थी से अपेक्षाएँ,
- लोकतन्त्र में राजनीति का महत्त्व,
- ( सक्रिय राजनीति में भाग लेने से हानियाँ,
- उपसंहार ।
प्रस्तावना. 'विद्यार्थी का अर्थ है 'विद्या का अर्थी'; अर्थात् विद्या की चाह रखने वाला। इस प्रकार विद्यार्जन को ही मुख्य लक्ष्य बनाकर चलने वाला अध्येता विद्यार्थी कहलाता है। जिस प्रकार चर्मचक्षुओं के बिना मनुष्य अपने चारों ओर के स्थूल जगत् को नहीं देख पाता, उसी प्रकार विद्यारूपी ज्ञानमय नेत्र के बिना वह अपने वास्तविक स्वरूप को भी नहीं पहचान सकता और अपने जीवन को सफल नहीं बना सकता। इसी कारण विद्याध्ययन का समय अत्यधिक पवित्र समय माना गया है; क्योंकि मानव अपने शारीरिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला इसी समय रखता है। विद्याध्ययन एक तपस्या है और तपस्या बिना समाधि के, बिना चित्त की एकाग्रता के सम्भव नहीं। इसलिए विद्यार्थी अन्तर्मुखी होकर ही विद्यार्जन कर सकता है। दूसरी ओर, राजनीति पूर्णतः बहिर्मुखी विषय है। तब विद्यार्थी और राजनीति का परस्पर क्या सम्बन्ध हो सकता है? इस पर विचार अपेक्षित है। यह इसलिए भी आवश्यक है कि आज राजनीति का राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना बोलबाला है कि कोई समझदार व्यक्ति चाहकर भी उससे सर्वथा असम्पृक्त नहीं रह सकता।
In simple words: विद्यार्थी वह है जो विद्या प्राप्त करना चाहता है और विद्यार्जन उसका मुख्य लक्ष्य होता है। विद्याध्ययन एक पवित्र तपस्या है जो शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास की नींव रखता है। राजनीति एक बाहरी विषय है, जबकि विद्यार्थी को एकाग्रचित्त होकर पढ़ाई करनी चाहिए, फिर भी राजनीति का जीवन के हर क्षेत्र में प्रभाव है, जिससे विद्यार्थी उससे पूरी तरह अलग नहीं रह सकता।
🎯 Exam Tip: विद्यार्थी शब्द का अर्थ और विद्याध्ययन के महत्व को स्पष्ट करें। विद्यार्थी जीवन को तपस्या के रूप में प्रस्तुत करते हुए राजनीति से उसके सम्बन्ध की आवश्यकता पर प्रकाश डालें।
स्वतन्त्र भारत में विद्यार्थी का दायित्व. स्वतन्त्रता से पहले प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक ही अभिलाषा थी कि किसी भी प्रकार देश को विदेशी शासन से मुक्त कराया जाए। इसके लिए प्रौढ़ नेताओं तक ने विद्यार्थियों से सहयोंग की माँग की और सन् 1942 ई० के आन्दोलन में न जाने कितने होनहार युवक-युवतियों ने विद्यालयों का बहिष्कार कर और क्रान्तिकारी बनकर देश के लिए असह्य यातनाएँ झेलीं और हँसते-हँसते अपना जीवन भारतमाता की बलिवेदी पर अर्पण कर दिया। वह एक असामान्य समय था, आपात् काल था, जिसमें उचित-अनुचित, करणीय-अकरणीय का विचार नहीं था। पर देश के स्वतन्त्र होने के बाद विद्यार्थियों पर राष्ट्र-निर्माण का गुरुतर दायित्व आ पड़ा है; क्योंकि युवक ही किसी देश के भावी भाग्य-विधाता होते हैं। वृद्धजन तो केवल दिशा-निर्देश दे सकते हैं, किन्तु उन निर्देशों को क्रियान्वित करने की क्षमता पौरुषसम्पन्न युवाओं में ही निहित होती है।
In simple words: स्वतन्त्रता से पहले विद्यार्थियों ने देश को आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतन्त्रता के बाद उनका दायित्व राष्ट्र निर्माण का है, क्योंकि युवा ही देश का भविष्य तय करते हैं। वरिष्ठजन केवल मार्गदर्शन कर सकते हैं, लेकिन उन्हें साकार करने की शक्ति युवाओं में ही होती है।
🎯 Exam Tip: स्वतन्त्रता संग्राम में विद्यार्थियों की भूमिका को रेखांकित करें। स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में युवाओं के दायित्व को उदाहरण के साथ स्पष्ट करें।
विद्यार्थी से अपेक्षाएँ. मनुष्य का प्रारम्भिक जीवन ज्ञानार्जन के लिए होता है, जब कि वह अपनी शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियों को अधिक-से-अधिक विकसित और परिपुष्ट करे अपने परिवार और समाज की सेवा के लिए स्वयं को तैयार करता है। इस समय विद्यार्थी विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है। आज का विद्यार्थी निश्चित ही कल का नागरिक और नेता होगा, परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह समय राजनीति तथा अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त करने का है, उन्हें प्रयोग में लाने का नहीं।
सुयोग्य विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने देश की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उनकी पूर्ति के लिए स्वयं को ढाले । इसके लिए सबसे पहले उसे अपने देश के भूगोल, इतिहास और संस्कृति से भली-भाँति परिचित होना आवश्यक है; क्योंकि बिना अपने देश की मिट्टी से जुड़े, उसकी उपलब्धियों और अभावों, क्षमताओं और दुर्बलताओं को गहराई से समझे कोई व्यक्ति देश का सच्चा हित-साधन नहीं कर सकता। आज हमारा देश अनेक बातों में विदेशी तकनीक पर निर्भर है। किसी स्वतन्त्र देश के लिए यह स्थिति कदापि वांछनीय नहीं कही जा सकती । विद्यार्थी वैज्ञानिक, औद्योगिक एवं हस्तशिल्प आदि का उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर इस स्थिति को सुधार सकते हैं। इसी प्रकार समाज के सामने मुंह खोले खड़ी अनेक समस्याओं; जैसे - अन्धविश्वास, रूढ़िग्रस्तता, अशिक्षा, महँगाई, भ्रष्टाचार, दहेज-प्रथा आदि के उन्मूलन में भी वे अपना मूल्यवान योगदान कर सकते हैं।
In simple words: विद्यार्थी जीवन का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त कर शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित होना है, ताकि वे भविष्य में समाज और देश की सेवा कर सकें। उन्हें अपने देश के इतिहास, भूगोल और संस्कृति को समझना चाहिए, विदेशी निर्भरता को कम करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और सामाजिक बुराइयों को दूर करने में योगदान देना चाहिए।
🎯 Exam Tip: विद्यार्थी जीवन के उद्देश्यों और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों पर जोर दें। देश की आवश्यकताओं को पूरा करने और सामाजिक समस्याओं को हल करने में उनकी भूमिका को विस्तृत करें।
लोकतन्त्र में राजनीति का महत्त्व. अन्यान्य विषयों के साथ विद्यार्थी को राजनीति का भी ज्ञान प्राप्त करना उचित है; क्योंकि वर्तमान युग में राजनीति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर छा गयी है। यद्यपि यह स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती, परन्तु वास्तविकता से मुंह मोड़ना भी समझदारी नहीं है। सबसे पहले तो विद्यार्थी को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिए। साथ ही उसे संसार में प्रचलित विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को गम्भीर तुलनात्मक अध्ययन करके उनके अपेक्षित गुणावगुण की परीक्षा करना तथा अपने देश की दृष्टि में उनमें से कौन-से विचार कल्याणकारी सिद्ध हो सकते हैं; इस पर गम्भीर चिन्तन-मनन करना वांछनीय है। लोकतन्त्र में निर्वाचन-प्रणाली द्वारा शासन-तन्त्र का गठन होता है। लोकतन्त्र में शासक दल का चुनाव जनता करती है, इसलिए जनता का सुशिक्षित होना, अपने मत की शक्ति को पहचानना और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ, भय आदि को मन में स्थान न दे देश के भावी कर्णधारों का चुनाव करना लोकतन्त्र की सफलता का बीजमन्त्र है। विद्यार्थियों को इस दिशा में शिक्षित करना चाहिए। आज कोई देश अपने में सिमटकर संसार से अलग-थलग होकर नहीं रह सकता। वर्तमान युग में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की लपेट में छोटे-बड़े सभी देश आते हैं, इसलिए विद्यार्थी को भी चाहिए कि वह विश्व में घटने वाली घटनाओं पर बारीकी से नजर रख अपने देश पर पड़ने वाले उसके सम्भावित प्रभावों का भी आकलन करे। ऐसा विद्यार्थी ही आगे चलकर अपने देश की सच्ची पथ-प्रदर्शक बन सकती है। इससे सिद्ध होता है कि विद्यार्जन का काल ज्ञान-संचय का काल है, अर्जित ज्ञान को क्रियात्मक रूप देने का नहीं।
In simple words: विद्यार्थी को राजनीति का ज्ञान होना चाहिए क्योंकि यह जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद है। उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जानना चाहिए, विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का अध्ययन करना चाहिए और लोकतन्त्र की सफलता के लिए सही नेताओं का चुनाव करना सीखना चाहिए। वैश्विक घटनाओं को समझना भी आवश्यक है, क्योंकि यह समय ज्ञान प्राप्त करने का है, न कि उसे तुरंत लागू करने का।
🎯 Exam Tip: लोकतन्त्र में राजनीति के महत्व को स्पष्ट करें और विद्यार्थी के लिए राजनीतिक ज्ञान की आवश्यकता को समझाएं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की समझ के महत्व पर प्रकाश डालें।
सक्रिय राजनीति में भाग लेने से हानियाँ. सक्रिय राजनीति में भाग लेने से विद्यार्थी को सबसे पहली हानि तो यही होती है कि उसका शैक्षणिक ज्ञान अधूरी रह जाता है। अधकचरे ज्ञान को लेकर कोई व्यक्ति जनता को योग्य दिशा नहीं दे सकता। छात्रावस्था भोलेपन, आदर्शवाद और भावुकता की होती है। उस समय व्यक्ति में जोश तो होता है, पर होश नहीं होता। अनेक विद्यार्थी ऐसे हैं, जो कि राजनीतिक क्षेत्र में तो उतरे किन्तु राजनीति में न पड़कर अपराधी प्रवृत्ति में पड़ गये। राजनीति वस्तुतः अधिकार, पद एवं सत्ता की अन्धी दौड़ है। निःसन्देह ये कलुषित प्रवृत्तियाँ हैं जिनका दुष्परिणाम कॉलेजों में होने वाली दादागिरी, हिंसा व अन्य छात्र-उत्पीड़ने के रूप में कई बार हमारे सम्मुख आ चुका है। दूसरों के नेतृत्व का गुण अत्यन्त विरल होता है, किन्तु आधुनिक राजनीति में बलपूर्वक दूसरों को अपना अनुगामी बनाया जाता है। यह अस्वस्थ दूषित मनोवृत्ति सम्पूर्ण परिवेश को विषाक्त कर देती है। विद्यालय व महाविद्यालय का पवित्र परिवेश राजनीति की पदचाप से मलिन हो उठता है। इस प्रकार न केवल विद्यार्थी का जीवन नष्ट हो जाता है, अपितु राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुँचती है; क्योंकि वह अपने एक अत्यधिक उपयोगी घटक की क्षमताओं का अपने विकास के लिए उपयोग होने की बजाय, अपने हित के विरुद्ध प्रयोग होते देखता है। कश्मीर का ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ युवक सक्रिय राजनीति की कुटिलता में फंसकर राष्ट्रहित के स्थान परे राष्ट्रध्वंस करने एवं राष्ट्र के घोर शत्रुओं का मनोरथ पूरा करने में लगे हैं। अतः विद्यार्थी और राष्ट्र दोनों का हित इसी में है कि विद्यार्थी सच्चे अर्थों में विद्या का अर्थी ही बना रहकर अपने सर्वांगीण विकास द्वारा अपनी और राष्ट्र की सेवाओं के लिए स्वयं को तैयार करे।
In simple words: सक्रिय राजनीति में भाग लेने से विद्यार्थियों की पढ़ाई अधूरी रह जाती है और वे गलत दिशा में जा सकते हैं। छात्र जीवन की भावुकता उन्हें अपराधी प्रवृत्तियों की ओर धकेल सकती है, क्योंकि राजनीति अक्सर सत्ता और अधिकारों की दौड़ होती है। इससे कॉलेजों का माहौल खराब होता है, विद्यार्थियों का जीवन और राष्ट्र का विकास बाधित होता है। इसलिए, विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और स्वयं को राष्ट्र सेवा के लिए तैयार करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: सक्रिय राजनीति में विद्यार्थियों की भागीदारी के नकारात्मक परिणामों पर विशेष ध्यान दें। शैक्षणिक हानि, अपराधीकरण और शैक्षणिक माहौल पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों को स्पष्ट करें।
उपसंहार. निष्कर्ष यह है कि विद्यार्थी का मुख्य कार्य विद्यार्जन द्वारा अपने भावी जीवन-व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय-को बनाने की तैयारी करना है। वर्तमान युग में राजनीति के व्यापक प्रभाव को देखते हुए विद्यार्थी को उसका भी विभिन्न कोणों से गहरा सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त करना उचित है, पर क्रियात्मक राजनीति से दूर रहने में ही उसका और राष्ट्र को कल्याण है। उसे अपने कर्तव्य को समझना चाहिए और लक्ष्य पर दृष्टि जमानी चाहिए। राजनीति के कण्टकाकीर्ण पथ पर पैर रखना अभी उसके लिए उचित नहीं है।
In simple words: संक्षेप में, विद्यार्थी का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करके अपने भविष्य और देश की सेवा के लिए खुद को तैयार करना है। उन्हें राजनीति का सैद्धांतिक ज्ञान होना चाहिए, लेकिन व्यावहारिक राजनीति से दूर रहना ही उनके और राष्ट्र के लिए बेहतर है, क्योंकि यह मार्ग अभी उनके लिए उपयुक्त नहीं है।
🎯 Exam Tip: उपसंहार में विद्यार्थी के मुख्य उद्देश्य और राजनीति में उनकी सैद्धांतिक बनाम व्यावहारिक भागीदारी के बीच संतुलन पर जोर दें। कर्तव्य बोध और लक्ष्य निर्धारण को महत्वपूर्ण बताएं।
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