UP Board Solutions Class 11 Hindi Chapter Pratyay prakaran

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प्रत्यय-प्रकरण

संस्कृत में धातु या शब्दों के बाद प्रत्यय जोड़कर नये शब्दों का निर्माण होता है। प्रत्यय मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं (अ) कृत् प्रत्यय तथा (ब) तद्धित प्रत्यय ।

(अ) कृत् प्रत्यय

जिस प्रत्यय को धातु से जोड़कर संज्ञा, विशेषण अथवा अव्यय बनाया जाता है, उसको कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्यय के योग से बनने वाले शब्दों को कृदन्त (अर्थात् जिनके अन्त में कृत् प्रत्यय है) कहते हैं; जैसे - 'कृ' धातु में तृच् प्रत्यय जोड़ने से 'कर्तृ' शब्द बनता है, यह कृदन्त है। यह संज्ञा शब्द है और इसके रूप अन्य संज्ञाओं की तरह विभिन्न विभक्तियों में चलेंगे (जैसे - प्रथमा विभक्ति में कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः आदि) । यहाँ यह द्रष्टव्य है कि जो कृदन्त शब्द संज्ञा या विशेषण होते हैं, उनके रूप तो चलते हैं, पर अव्यय सदा एक रूप रहते हैं (उनके रूप नहीं चलते)।

(क) क्त (तु) - भूतकालिक क्रिया और विशेषण शब्द बनाने के लिए 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में किया जाता है। इसका प्रयोग करते समय कर्ता में तृतीया विभक्ति तथा कर्म में प्रथमा विभक्ति रखी जाती है। 'क्त' प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग कर्म के लिङ्ग, विभक्ति और वचनों के अनुसार होता है। कर्ता के लिङ्ग और वचन का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; जैसे
1. रामेण पुस्तकं पठितम् ।
2. सीतया ग्रन्थः पठितः ।
3. मया पुस्तिका पठिता।

“क्त' प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण ।

धातुपुंल्लिङ्गस्त्रीलिङ्गनपुंसकलिङ्ग
भू + क्तभूतःभूताभूतम्
कृ + क्तकृतःकृताकृतम्
पा + क्तपीतःपीतापीतम्
दा + क्तदत्तःदत्तादत्तम्
गम् + क्तगतःगतागतम्
हन् + क्तहतःहताहतम्
पठ् + क्तपठितःपठितापठितम्
नी + क्तनीतःनीतानीतम्
हस् + क्तहसितःहसिताहसितम्
दृश् + क्तदृष्टःदृष्टादृष्टम्
स्नै + क्तस्नातःस्नातास्नातम्
द्यू + क्तद्यूतःद्यूताद्यूतम्
प्रेष् + क्तप्रेषितःप्रेषिताप्रेषितम्
कथ् + क्तकथितःकथिताकथितम्
श्रु + क्तश्रुतःश्रुताश्रुतम्
लिख् + क्तलिखितःलिखितालिखितम्
हृ + क्तहृतःहृताहृतम्

(ख) क्त्वा (त्वा) - जब किसी क्रिया के हो जाने पर दूसरी क्रिया आरम्भ होती है, तब सम्पन्न हुई क्रिया को, 'पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। हिन्दी में इसका बोध करके' लगाकर होता है। पूर्वकालिक क्रिया का बोध कराने के . लिए संस्कृत में धातु के आगे क्त्वा (त्वा) प्रत्यय जोड़ा जाता है। क्त्वा (त्वा) प्रत्ययान्त धातुओं के रूप नहीं चलते ।

'क्त्त्वा' (त्वा) प्रत्यय लगाकर धातुओं के रूप

धातुकृदन्तधातुकृदन्त
कृ + क्त्वाकृत्वाग्रह् + क्त्वागृहीत्वा
आप् + क्त्वाआप्त्वालभ् + क्त्वालब्ध्वा
क्री + क्त्वाक्रीत्वापा + क्त्वापीत्वा
दा + क्त्वादत्वाहन् + क्त्वाहत्वा
दृश् + क्त्वादृष्ट्वाजि + क्त्वाजित्वा
धृ + क्त्वाधृत्वाभू + क्त्वाभूत्वा
नम् + क्त्वानत्वास्था + क्त्वास्थित्वा
पच् + क्त्वापक्त्वाशी + क्त्वाशयित्वा
गम् + क्त्वागत्वावच् + क्त्वाउक्त्वा
श्रु + क्त्वाश्रुत्वापठ् + क्त्वापठित्वा
धा + क्त्वाधात्वापूज् + क्त्वापूजयित्वा
नी + क्त्वानीत्वाजग् + क्त्वाजगत्वा
खाद + क्त्वाखादित्वालिख् + क्त्वालिखित्वा

(ग) तव्यत् (तव्य), अनीयर् (अनीय) - सामान्यतः क्रिया में विधिलिङ् लकार चाहिए' के अर्थ में तव्यत् और अनीयर् प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन शब्दों का प्रयोग सकर्मक धातुओं के कर्मवाच्य में तथा अकर्मक धातुओं के भाववाच्य में होता है।

कर्तृवाच्य में इनका प्रयोग नहीं होता। ये शब्द योग्य के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे
पठ् + तव्यत् (तव्य) = पठितव्य (पढ़नी चाहिए) । पठ् + अनीयर् (अनीय) = पठनीय (पढ़नी चाहिए या पढ़ने योग्य)। मया पुस्तकं पठितव्यम् (पठनीयम्) = मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए (या, मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए)। इन प्रत्ययों से बने शब्दों का प्रयोग लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार किया जाता है। इनके रूप पुंल्लिङ्ग में 'बालक', नपुंसकलिङ्ग में 'फल और स्त्रीलिङ्ग में 'बाला' के समान बनेंगे। तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय से निर्मित उदाहरण

धातुतव्यत्अनीयर्
कृकर्त्तव्यः
कर्त्तव्यम्
करणीयः
करणीयम्
भूभवितव्यभवनीयः
पापातव्यःपानीयः, पानीयम्
दादातव्यः, दातव्यम्दानीयः
नीनेतव्यःनयनीयः
हस्हसितव्यःहसनीयः
पठ्पठितव्यः
पठितव्यम्
पठनीयः
पठनीया
पठनीयम्
गम्गन्तव्यः
गन्तव्यम्
गमनीयः,
गमनीयम्
पच्पक्तव्यःपचनीयः, पचनीयम्
मन्मन्तव्यःमननीयः
दृश्द्रष्टव्यःदर्शनीयः, दर्शनीयम्
लिख्लिखितव्यलेखनीयः
कथ्कथितव्यःकथनीयः
वन्द्वन्दितव्यःवन्दनीयः
स्थास्थातव्यःस्थानीयः
भज्भोक्तव्यःभजनीयः
पूज्पूजितव्यःपूजनीयः
श्रूश्रोतव्यम्श्रवणीय

(घ) क्तवतु (तवत्) - 'क्त' प्रत्ययान्त शब्दों के परिवर्तनों के अनुसार ही 'क्तवतु' प्रत्ययान्त शब्दों के रूपों में भी परिवर्तन होते हैं। केवल उनके अन्त में 'वत्' और जोड़ दिया जाता है, क्योंकि इस प्रत्यय का प्रारम्भिक अक्षर भी 'क्त ही है। 'क्तवतु' प्रत्यय का भी उन्हीं धातुओं के साथ प्रयोग होता है, जिनके साथ 'क्त का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों का प्रयोग भूतकालिक क्रिया की भाँति 'कर्तृवाच्य में होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों के रूप पुंल्लिग में 'श्रीमत् के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के समान होते हैं।

“क्तवतु' प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण

धातु+प्रत्ययपुंल्लिङ्गस्त्रीलिङ्गनपुंसकलिङ्ग
भू + क्तवतुभूतवान्भूतवतीभूतवत्
पठ् + क्तवतुपठितवान्पठितवतीपठितवत्
गम् + क्तवतुगतवान्गतवतीगतवत्
नी + क्तवतुनीतवान्नीतवतीनीतवत्
पा + क्तवतुपीतवान्पीतवतीपीतवत्
दा + क्तवतुदत्तवान्दत्तवतीदत्तवत्

(ब) तद्धित प्रत्यय

तद्धित प्रत्यय सदा किसी सिद्ध (अर्थात् बनाये हुए) संज्ञा, विशेषण, अव्यय या क्रिया के अनन्तर जोड़कर उससे अन्य संज्ञा, विशेषण, अव्यय, क्रिया आदि बनाने में प्रयुक्त होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि कृत् प्रत्यय सदा धातु में ही जोड़े जाते हैं, किसी सिद्ध शब्द में नहीं।

(क) मतुप्, वतुप् - संज्ञा से 'वाला', 'वाली' (गाड़ी वाला, बुद्धि वाली आदि) अर्थ प्रकट करने के लिए 'मतुप्' (मत्) तथा वतुप् (वत्) प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। जिन शब्दों के अन्त में 'अ' या 'आ' होता है, उनमें 'वत्' तथा जिन शब्दों के अन्त में ह्रस्व अथवा दीर्घ 'ई', 'उ', 'ऋ' होता है, उनमें 'मत्' जुड़ता है। किन्तु यदि अन्त में आने वाले 'इ', उ' व्यंजन 'म' में लगे हों तो 'वत्' ही जुड़ता है। 'मतुप्' या 'वतुप्' प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुंल्लिङ्ग में 'भवत्' के समान, स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान और नपुंसकलिङ्ग में 'जगत् के समान होते हैं; जैसे

पुंल्लिङ्गस्त्रीलिङ्गनपुंसकलिङ्ग
श्री + मतुप् (मत्) श्रीमत्=श्रीमान्श्रीमतीश्रीमत्
बल + वतुप्बलवत्=बलवान्बलवतीबलवत्
रूप + वतुप्रूपवत्=रूपवान्रूपवतीरूपवत्
दया + वतुप्दयावत्=दयावान्दयावतीदयावत्
धन + वतुप्धनवत्=धनवान्धनवतीधनवत्
गुण + वतुप्गुणवत्=गुणवान्गुणवतीगुणवत्
विद्या + वतुप्विद्यावत्=विद्यावान्विद्यावतीविद्यावत्
मति + मतुप्मतिमत्=मतिमान्मतिमतीमतिमत्
धी + मतुप्धीमत्=धीमान्धीमतीधीमत्
बुद्धि + मतुप्बुद्धिमत्=बुद्धिमान्बुद्धिमतीबुद्धिमत्
भग + वतुप्भगवत्=भगवान्भगवतीभगवत्
पुत्र + वतुष्पुत्रवत्=पुत्रवान्पुत्रवतीपुत्रवत्
गति + मतुप्गतिमत्=गतिमान्गतिमतीगतिमत्
रस + वतुप्रसवत्=रसवान्रसवतीरसवत्
शुचि + मतुप्शुचिमत्=शुचिमान्शुचिमतीशुचिमत्
महिमा + वतुप्महिमावत्=महिमावान्महिमावतीमहिमावत्
अर्थ + वतुप्अर्थवत्=अर्थवान्अर्थवतीअर्थवत्
शील + वतुप्शीलवत्=शीलवान्शीलवतीशीलवत्
ज्ञान + वतुप्ज्ञानवत्=ज्ञानवान्ज्ञानवतीज्ञानवत्

ये शब्द विशेषण होते हैं, इसलिए ये अपने विशेष्य के अनुसार ही लिङ्ङ्ग, वचन और विभक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ, 'श्रीमत् के पुंल्लिङ्ग में प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों के रूप इस प्रकार होंगे
श्रीमान् श्रीमन्तौ श्रीमन्तः ।

(ख) त्व, तल् प्रत्यय - संज्ञा और विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए त्व' और 'तलु' प्रत्ययों का प्रयोग होता है। 'त्व' प्रत्ययान्त शब्द नपुंसकलिङ्ग तथा 'तल्' प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं। इनके रूप भी क्रमशः 'फलम्' और 'बाला' के समान चलते हैं।

संज्ञा या विशेषणत्व प्रत्यय से बने रूपतल् प्रत्यय से बने रूप
महत्महत्त्वम्महत्ता
प्रभुप्रभुत्वम्प्रभुता
गुरुगुरुत्वम्गुरुता
लघुलघुत्वम्लघुता
पशुपशुत्वम्पशुता
पुरुषपुरुषत्वम्पुरुषता
ब्राह्मणब्राह्मणत्वम्-
मानवमानवत्वम्मानवता
मूर्खमूर्खत्वम्मूर्खता
विद्वान्विद्वत्त्वम्विद्वत्ता
अमरअमरत्वम्अमरता
दीन-दीनता
कुटु-कटुता
कविकवित्वम्-

 

Question 1. प्रथम - दिये गये पदों में से किन्हीं दो के सम्बन्ध में स्पष्ट कीजिए कि वे किस धातु अथवा शब्द में किस प्रत्यय के योग से बने हैं - गतः, पठनीयम्, बुद्धिमान् ।
Answer:

पदधातु/शब्दप्रत्यय
गतःगम् धातुक्त
पठनीयम्पठ् धातुअनीयर्
बुद्धिमान्बुद्धि शब्दमतुप्
In simple words: 'गतः' comes from the 'गम्' root with 'क्त' suffix, 'पठनीयम्' from 'पठ्' with 'अनीयर्', and 'बुद्धिमान्' from 'बुद्धि' with 'मतुप्' suffix. These examples show how different suffixes create new words from roots or existing words.

🎯 Exam Tip: When analyzing words formed with suffixes, clearly identify the base धातु (root verb) or शब्द (noun/adjective) and the specific प्रत्यय (suffix) used. Understanding the function of each प्रत्यय (e.g., past participle, gerund, etc.) is crucial for accurate analysis.

 

Question 2. द्वितीय - दिये गये पदों में से किन्हीं दो धातु में 'क्त' या 'क्तवतु' प्रत्यय लगाकर उसके प्रथमा पुंल्लिङ्ग एकवचन और द्विवचन के रूप लिखिए-पठ्, गम्, दा, प्रेष् ।
Answer:

पुंल्लिङ्ग रूपएकवचनद्विवचनबहुवचन
पठ् + क्त = पठितःपठितःपठितौपठिताः
गम् + क्त = गतःगतःगतौगताः
दा + क्त = दत्तःदत्तःदत्तौदत्ताः
प्रेष् + क्त = प्रेषितःप्रेषितःप्रेषितौप्रेषिताः
In simple words: This table shows how 'क्त' प्रत्यय transforms verb roots like 'पठ्' (to read), 'गम्' (to go), 'दा' (to give), and 'प्रेष्' (to send) into past passive participles in masculine singular, dual, and plural forms.

🎯 Exam Tip: Pay close attention to the gender and number requirements when forming words with suffixes. For 'क्त' and 'क्तवतु' प्रत्यय, mastering the changes in endings for singular, dual, and plural in masculine gender is key.

 

Question 3. तृतीय - दिये गये शब्दों में से किसी एक शब्द में उसके सामने लिखा प्रत्यय जोड़कर शब्द का यथानिर्दिष्ट रूप लिखिए-धन + मतुप् (पुंल्लिङ्ग रूप), पठ् + अनीयर् (नपुंसकलिङ्ग रूप)
Answer:

एकवचनद्विवचनबहुवचन
धन + वतुप् = धनवान् (पुंल्लिङ्ग)धनवान्धनवन्तौधनवन्तः
पठ् + अनीयर् = पठनीय (नपुंसकलिङ्ग)पठनीयम्पठनीयेपठनीयानि
In simple words: Applying 'वतुप्' to 'धन' gives 'धनवान्' in masculine, indicating possession (wealthy). Applying 'अनीयर्' to 'पठ्' results in 'पठनीयम्' in neuter, meaning 'to be read' or 'readable'. These demonstrate how suffixes create words with specific meanings and grammatical genders.

🎯 Exam Tip: Always remember the final gender and number specified for the derived word, as suffixes like 'मतुप्'/'वतुप्' and 'अनीयर्' change form based on these grammatical properties. Practice different combinations to solidify understanding.

पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत दिग्दर्शिका' में आये प्रत्यययुक्त शब्द

पाठ 2:

धातु/शब्दप्रत्यय
स्नात्वास्नाक्त्वा
उषित्वाउष् (वस्)क्त्वा
आनीयआ + नील्यप्

पाठ 3:

धातु/शब्दप्रत्यय
श्रुत्वाश्रुक्त्वा
गत्वागम्क्त्वा
पठितुम्पठ्तुमुन्
आदायआ + दाल्यप्

पाठ 4:

धातु/शब्दप्रत्यय
आगत्यआ + गम्ल्यप्
दत्वादाक्त्वा
गच्छन्गम्शतृ
प्रष्टुम्प्रच्छतुमुन्

पाठ 6:

धातु/शब्दप्रत्यय
मन्त्रयित्वामन्त्रक्त्वा
गृहीत्वाग्रहक्त्वा

पाठ 7:

बद्ध्वाबध्क्त्वा
कर्तुम्कृतुमुन्
ज्ञातव्याज्ञातव्यत्
दाहयित्वादाहक्त्वा
आदिष्टवान्आ + दिश्क्तवतु
मारणीयम्मृअनीयर्

पाठ 9:

पाठ 10:

धातु/शब्दप्रत्यय
समुत्थायसम् + स्थाल्यप्
प्राप्यप्र + आप्ल्यप्
उत्तीर्यउत् + तृल्यप्
भीताःभीक्त
उक्त्वावद् क्त्वा

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