UP Board Solutions Class 11 Geography Chapter 15 Life on the Earth

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Class 11 Geography Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन UP Board Solutions PDF

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न

Question 1. निम्नलिखित में से कौन जैवमण्डल में सम्मिलित हैं?
(क) केवल पौधे ।
(ख) केवल प्राणी
(ग) सभी जैव व अजैव जीव
(घ) सभी जीवित जीव
Answer: (घ) सभी जीवित जीव ।
In simple words: जैवमण्डल में सभी प्रकार के जीवित जीव शामिल होते हैं, चाहे वे पौधे हों या प्राणी, क्योंकि यह जीवन के लिए अनुकूल पृथ्वी का वह हिस्सा है।

🎯 Exam Tip: जैवमण्डल की परिभाषा और उसके घटकों को याद रखना महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर जीवित जीवों के समावेशन को।

 

Question (i) उष्णकटिबन्धीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं?
(क) प्रेयरी ।
(ख) स्टेपी
(ग) सवाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ग) सवाना ।
In simple words: उष्णकटिबन्धीय घास के मैदानों को आमतौर पर सवाना के नाम से जाना जाता है, जो गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के घास के मैदानों और उनके भौगोलिक स्थानों को याद रखें।

 

Question (iii) चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है?
(क) आयरन कार्बोनेट
(ख) आयरन ऑक्साइड
(ग) आयरन नाइट्राइट
(घ) आयरन सल्फेट
Answer: (ख) आयरन ऑक्साइड ।
In simple words: जब चट्टानों में मौजूद लोहे के कण ऑक्सीजन के संपर्क में आते हैं, तो वे रासायनिक रूप से मिलकर आयरन ऑक्साइड बनाते हैं, जिसे अक्सर जंग लगने की प्रक्रिया कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: रासायनिक प्रक्रियाओं में शामिल तत्त्वों और उनके उत्पादों को समझना भू-रसायन विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question (iv) प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है? |
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) एमिनो एसिड
(घ) विटामिन
Answer: (ख) कार्बोहाइड्रेट्स।
In simple words: प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया में, पौधे सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और जल को कार्बोहाइड्रेट्स (जैसे ग्लूकोज) में परिवर्तित करते हैं, जो उनके भोजन का मुख्य स्रोत होता है।

🎯 Exam Tip: प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया और उसके प्रमुख उत्पादों को अच्छी तरह समझें, क्योंकि यह जीवमंडल के लिए आधारभूत है।

 

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

Question (i) पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-'पारिस्थितिकी' शब्द का अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द 'इकोलॉजी' (Ecology) है। 'इकोलॉजी' ग्रीक भाषा, के दो पदों 'Oikos' तथा 'Logos' से मिलकर बना है। Oikos का अर्थ 'निवासस्थान' तथा Logos का अर्थ 'अध्ययन करना है। इस प्रकार 'इकोलॉजी' का शाब्दिक अर्थ 'निवास-स्थान के अध्ययन से है। दूसरे शब्दों में, जीवों को उनके निवास स्थान के सन्दर्भ में अध्ययन करना ही पारिस्थितिकी (Ecology) कहलाता है। विद्वानों द्वारा पारिस्थितिकी की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी गई हैं 1. 1971 में प्रकाशित ओडम की पुस्तक ‘Fundamentals of Ecology' में पारिस्थितिकी की एक नवीन परिभाषा निम्न प्रकार प्रस्तुत की गई है “पारिस्थितिकी, पारिस्थितिक-तन्त्र की संरचना और क्रिया का अध्ययन है।”
अतः यह कहा जा सकता है कि पारिस्थितिकी जैविक एवं पर्यावरण के आपसी सम्बन्धों तथा अन्तःप्रभावों का अध्ययन है।
In simple words: पारिस्थितिकी जीवों और उनके पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन है, यह दर्शाता है कि कैसे जीव अपने निवास स्थान में एक-दूसरे और अपने परिवेश के साथ बातचीत करते हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिकी की मूल परिभाषा और उसके शाब्दिक अर्थ को याद रखना परीक्षा में सहायक होगा।

 

Question (ii) पारितन्त्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितन्त्र के प्रकारों को बताइए।
उत्तर-किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु से अन्तर्सम्बन्ध जिसमें ऊर्जा प्रवाह व पोषण श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितन्त्र कहा जाता है। पारितन्त्र मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-1. स्थलीय पारितन्त्र (Terrestrial) तथा जलीय पारितन्त्र (Aquatic)। स्थलीय पारितन्त्र को पुनः विभिन्न प्रकार के बायोम में विभक्त किया जाता है; जैसे-घास बायोम, वन बायोम आदि । जबकि जलीय पारितन्त्र को समुद्री पारितन्त्र व ताजे जल के पारितन्त्र में विभक्त किया जाता है।
In simple words: पारितन्त्र एक विशिष्ट क्षेत्र में जीवों और उनके पर्यावरण के बीच ऊर्जा प्रवाह और पोषण श्रृंखलाओं के साथ के संबंधों का एक समुदाय है, जिसके मुख्य प्रकार स्थलीय (जैसे वन, घास) और जलीय (जैसे समुद्री, ताजे जल) पारितन्त्र हैं।

🎯 Exam Tip: पारितन्त्र की परिभाषा और उसके दो मुख्य प्रकारों, स्थलीय और जलीय, को याद रखें।

 

Question (iii) खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते हुए इसके अनेक स्तर बताएँ।
उत्तर-खाद्य श्रृंखला में एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा प्रवाह ही खादा श्रृंखला (Food Chain) कहलाती है। चराई खाद्य श्रृंखला (Grazing Food-chain) पौधों से आरम्भ होकर मांसाहारी तृतीयक उपभोक्ता तक जाती है। इसमें शाकाहारी मध्यम स्तर पर होता है। उदाहरण के लिए-पौधा/पादप -> गाय/खरगोश -> शेर या घास -> टिड्डे -> मेंढक -> सर्प -> बाज । चराई खाद्य श्रृंखला लघु आकारीय तथा वृहत् आकारीय दोनों होती है। जिस श्रृंखला में तीन स्तर होते हैं, उसे लघु चराई खाद्य शृंखला तथा जिसमें पाँच या इससे अधिक स्तर होते हैं उसे वृहत् चराई श्रृंखला कहा जाता है।
In simple words: खाद्य श्रृंखला वह प्रक्रिया है जिसमें ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक प्रवाहित होती है; चराई खाद्य श्रृंखला पौधों से शुरू होती है और विभिन्न स्तरों के उपभोक्ताओं से गुजरती है।

🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला की अवधारणा, चराई खाद्य श्रृंखला के उदाहरण और उसके विभिन्न पोषण स्तरों को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question (iv) खाद्य जाल (Food web) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएँ।।
उत्तर-सामान्यतः आहार श्रृंखला एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक संचालित होती है, परन्तु यह एक सरल रैखिक तन्त्र नहीं है बल्कि अन्तः ग्रन्थित श्रृंखलाओं के रूप में ऊर्जा का प्रवाह जैविक एवं अजैविक संघटकों के बीच होता है। इस प्रकार एक जटिल तन्त्र की व्यवस्था विकसित होती है, जिसे आहार जाल कहा जाता है। उदाहरण के लिए-एक चूहा जो अन्न पर निर्भर है वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीय मांसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक मांसाहारी जीव एक से अधिक प्रकार के शिकार पर निर्भर है, परिणामस्वरूप खादा श्रृंखला आपस में जुड़ी हुई है। अतः प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने को ही खादा जाल कहा जाता है।
In simple words: खाद्य जाल विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं का एक जटिल नेटवर्क है जहाँ जीव ऊर्जा और पोषण के लिए एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, जिससे पारिस्थितिक तंत्र में अनेक अंतःसंबंधित संबंध बनते हैं।

🎯 Exam Tip: खाद्य जाल और खाद्य श्रृंखला के बीच का अंतर तथा खाद्य जाल के जटिल स्वरूप को उदाहरण के साथ स्पष्ट करें।

 

Question (v) बायोम क्या है?
उत्तर-बायोम पौधों व प्राणियों का एक समुदाय है जो एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। संसार के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं- वन बायोम, घास बायोम, जलीय बायोम, मरुस्थलीय बायोम तथा उच्च प्रदेशीय बायोम आदि ।।
In simple words: बायोम एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र में पौधों और प्राणियों का एक विशिष्ट समुदाय है जो समान जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होता है, जैसे वन, घास या मरुस्थल।

🎯 Exam Tip: बायोम की परिभाषा और विश्व के प्रमुख बायोमों के उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

Question (i) संसार के विभिन्न वन बायोम (Forestbiomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-संसार के प्रमुख वन बायोम तथा उनकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. उष्णकटिबन्धीय वन-ये वन दो प्रकार के होते हैं- (i) उष्णकटिबन्धीय आर्द्र वर्षा वन तथा (ii) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन ।। उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन भूमध्य रेखा के समीप मिलते हैं। इन वनों में तापमान 25° से० के लगभग रहता है। यहाँ वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है तथा तापान्तर कम रहता है। इन वृक्षों की लम्बाई 25 से 30 मीटर होती है। इन वनों में सघनता अधिक पाई जाती है।
2. शीतोष्ण कटिबन्धीय वन-ये वन मध्य अक्षांशों में उत्तरी अमेरिका, उत्तरी-पूर्वी एशिया तथा पश्चिमी और मध्य यूरोप में पाए जाते हैं। इन वनों के क्षेत्र में तापमान 30° से० तथा वर्षा 75 से 150 सेमी तक रहती है। शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों में ओक, बीच, मैपल, हेमलोक आदि वृक्ष मिलते हैं।
3. टैगा वन-टैगा-वनों का विस्तार 50° से 60° उत्तरी अक्षांशों में मिलता है। ये वन उत्तरी यूरेशिया, उत्तरी अमेरिका तथा साइबेरिया में विस्तृत हैं। इन वनों को कोणधारी वन भी कहते हैं। वृक्षों की पत्तियाँ नुकीली होती हैं। इनमें पाईने, फर तथा स्थूस प्रमुख वृक्ष हैं। इस क्षेत्र में तापमान बहुत कम रहता है तथा वर्षा बर्फ के रूप में होती है।
In simple words: विश्व के प्रमुख वन बायोम उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण और टैगा वन हैं, जिनकी विशेषताएँ उनके तापमान, वर्षा की मात्रा और प्रमुख वृक्षों के प्रकारों के आधार पर भिन्न होती हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक वन बायोम की विशिष्ट विशेषताओं जैसे स्थान, तापमान, वर्षा और प्रमुख वृक्ष प्रजातियों पर ध्यान दें।

 

Question (ii) जैव भू-रासायनिक चक्र क्या है? वायुमण्डल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कैसे होता है? वर्णन करें।
उत्तर-जैव भू-रासायनिक चक्र जैवमण्डल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच में रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह को जैव भू-रासायनिक चक्र कहते हैं। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरम्भ होता है। जिसमें वायु, जल व मिट्टी में विघटन से इसकी पुनरावृत्ति होती रहती है, जिसमें रासायनिक तत्त्वों का सन्तुलन पौधों व प्राणी ऊतकों के चक्रीय प्रवाह द्वारा बना रहता है।
वायुमण्डल में नाइट्रोजन (79%) एक प्रमुख गैस है। कुछ जीव इसका उपयोग स्वतन्त्र रूप से वायु द्वारा करते हैं, जबकि कुछ जीव प्रत्यक्ष रूप से इसे ग्रहण करने में असमर्थ रहते हैं। वायु में स्वतन्त्र रूप में पाई जाने वाली नाइट्रोजन को मृदा जीवाणु व नील-हरित शैवाल प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण कर लेते हैं। किन्तु सामान्यतया नाइट्रोजन यौगिकीकरण द्वारा ही प्रयोग में लाई जाती है। स्वतन्त्र नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया से सम्बन्धित पौधों की जड़ों व रंध्रों वाली मृदा है जहाँ से यह वायुमण्डल में पहुँचती है। वायुमण्डल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण बिजली चमकने व कोसमिक रेडिएशन द्वारा होता है, किन्तु महासागरों में इस यौगिकीकरण में जलीय जीवों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
In simple words: जैव भू-रासायनिक चक्र वह प्रक्रिया है जिसमें रासायनिक तत्त्व जीवमंडल में जीवों और पर्यावरण के बीच चक्रीय रूप से प्रवाहित होते हैं; नाइट्रोजन यौगिकीकरण मुख्य रूप से सूक्ष्मजीवों और बिजली द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोग योग्य रूपों में परिवर्तित करता है।

🎯 Exam Tip: जैव भू-रासायनिक चक्र की परिभाषा और नाइट्रोजन यौगिकीकरण की प्रक्रिया में शामिल प्रमुख चरणों और एजेंटों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question (iii) पारिस्थितिक सन्तुलन क्या है? इसके असन्तुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर-किसी पारितन्त्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक सन्तुलन कहलाती है। यह तभी सम्भव है, जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे। इसे पारितन्त्र में हर प्रजाति की संख्या के एक स्थायी सन्तुलन के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है। यह सन्तुलन निश्चित प्रजातियों में प्रतिस्पर्धा व आपसी सहयोग से होता है। कुछ प्रजातियों के जीवित रहने के संघर्ष से भी पर्यावरण सन्तुलन प्राप्त किया जा सकता है। पारिस्थितिक सन्तुलने इस बात पर भी निर्भर करता है कि कुछ प्रजातियाँ अपने भोजन व जीवित रहने के लिए दूसरी प्रजातियों पर निर्भर रहती हैं, जिससे प्रजातियों की संख्या निश्चित रहती है और सन्तुलन बना रहता है; जैसे-विशाल घास के मैदानों में शाकाहारी जीव अधिक संख्या में होते हैं और मांसाहारी जीव अधिक नहीं होते हैं, अतः इनकी संख्या नियन्त्रित रहती है।

पारिस्थितिक असन्तुलन को रोकने के उपाय-पारिस्थितिक असन्तुलन को रोकने के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं


1. वृक्षारोपण में वृद्धि करना।
2. वन्य पशुओं का संरक्षण एवं इनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगाना।
3. झूमिंग कृषि पद्धति पर प्रतिबन्ध लगाना।
4. निर्वनीकरण को नियन्त्रित करना।
5. मनुष्य की जीवन शैली में ऐसा परिवर्तन लाना जिससे पर्यावरण हस्तक्षेप में वह कमी आए तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति सतर्क हो सके ।
6. जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण।।
In simple words: पारिस्थितिक संतुलन एक पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों की संख्या और उनकी विविधता का स्थिर सह-अस्तित्व है; इसे रोकने के लिए वृक्षारोपण, वन्यजीव संरक्षण, वनों की कटाई पर नियंत्रण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक संतुलन की परिभाषा और उसके असंतुलन को रोकने के लिए दिए गए उपायों को बिंदुवार याद करें।

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

Question 1. पारिस्थितिक तन्त्र के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
(क) यह एक संवृत तन्त्र है।
(ख) सम्पूर्ण जैवमण्डल एक पारिस्थितिक तन्त्र है।
(ग) मानव द्वारा निर्मित कार्यात्मक तन्त्र है।
(घ) प्रदूषण वृद्धि तन्त्र है।
Answer: (ख) सम्पूर्ण जैवमण्डल एक पारिस्थितिक तन्त्र है।
In simple words: सम्पूर्ण जैवमण्डल, जिसमें सभी जीवित और निर्जीव घटक शामिल हैं, अपने आप में एक बड़ा पारिस्थितिक तंत्र है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र की व्यापकता और जैवमंडल के साथ उसके संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. निम्नलिखित में से सर्वोच्च या अन्तिम उपभोक्ता है
(क) चीता
(ख) शेर
(ग) बाज
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी ।
In simple words: चीता, शेर और बाज जैसे शिकारी जानवर खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर होते हैं, क्योंकि वे अन्य मांसाहारियों का भी शिकार कर सकते हैं, जिससे वे सर्वोच्च उपभोक्ता बनते हैं।

🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला में विभिन्न पोषण स्तरों और सर्वोच्च उपभोक्ताओं के उदाहरणों को जानें।

 

Question 3. निम्नलिखित में अपघटक जीव है ।
(क) कवक
(ख) जीवाणु
(ग) मृतोपजीवी
(ध) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी ।
In simple words: कवक, जीवाणु और मृतोपजीवी जीव सभी अपघटक हैं क्योंकि वे मृत कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर पोषक तत्वों को पर्यावरण में वापस छोड़ते हैं।

🎯 Exam Tip: अपघटकों की भूमिका और उनके विभिन्न प्रकारों को समझना आवश्यक है।

 

Question 4. पारिस्थितिक तन्त्र की कार्यप्रणाली निर्भर करती है
(क) उपभोक्ता पर ।
(ख) स्वपोषित पर ।
(ग) वियोंजक पर
(घ) ऊर्जा प्रवाह पर ।
Answer: (क) उपभोक्ता पर।।
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र की कार्यप्रणाली में उपभोक्ता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे ऊर्जा और पोषक तत्वों के प्रवाह में भाग लेते हुए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न घटकों और उनके कार्यों को समझने पर ध्यान दें।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. पारिस्थितिक तन्त्र की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. पारिस्थितिक तन्त्र एक क्रियाशील इकाई है, जिसमें जैव तथा अजैव तत्त्व परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इस तन्त्र की सक्रियता से ही जैव तत्त्व उत्पादित होते हैं। 2. पारिस्थितिक तन्त्र ऊर्जा (सूर्य ऊर्जा) द्वारा संचालित होता है तथा अपनी कार्यप्रणाली द्वारा अन्य | तत्त्वों में ऊर्जा का प्रवाह करता है।
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र एक क्रियाशील इकाई है जो जैविक और अजैविक घटकों को एक-दूसरे के साथ बातचीत करने की अनुमति देता है, और यह सूर्य की ऊर्जा पर निर्भर करता है जो पूरे तंत्र में प्रवाहित होती है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र की गतिशील प्रकृति और ऊर्जा प्रवाह के महत्त्व को हाइलाइट करें।

 

Question 2. पारिस्थितिकी तन्त्रों के दो प्रमुख घटकों के नाम लिखिए ।
उत्तर-पारिस्थितिकी तन्त्र के दो प्रमुख घटकों के नाम हैं- (i) अजैविक घटक, (ii) जैविक घटक ।
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य घटक अजैविक घटक (निर्जीव तत्व) और जैविक घटक (जीवित तत्व) हैं जो एक साथ कार्य करते हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र के जैविक और अजैविक घटकों को अलग-अलग पहचानें।

 

Question 3. स्थलीय पारितन्त्र के घटकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर-स्थलीय. पारितन्त्र में वन, घास के मैदान, मरुस्थल आदि आते हैं।
In simple words: स्थलीय पारितंत्र में प्रमुख रूप से वन, घास के मैदान और मरुस्थल जैसे भूमि आधारित पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: स्थलीय पारितंत्र के विभिन्न प्रकारों को याद रखना उनके विशिष्ट गुणों को समझने में मदद करेगा।

 

Question 4. स्वच्छ जलीय एवं सागरीय पारितन्त्र में क्या अन्तर है।
उत्तर-स्वच्छ जलीय पारितन्त्र नदी, झील, तालाब आदि से मिलकर बनता है, जो प्रायः मीठे जल को धारण करते हैं। इसके विपरीत सागरीय पारितन्त्र खारे पानी से युक्त सागरों एवं महासागरों से मिलकर बना होता है।
In simple words: स्वच्छ जलीय पारितंत्र में नदियाँ और झीलें शामिल हैं जिनमें मीठा पानी होता है, जबकि सागरीय पारितंत्र में खारे पानी वाले महासागर और समुद्र शामिल होते हैं।

🎯 Exam Tip: इन दोनों जलीय पारितंत्रों के बीच पानी के खारेपन में मुख्य अंतर पर ध्यान दें।

 

Question 5. पारिस्थितिक असन्तुलन को परिभाषित कीजिए ।
या पारिस्थितिकीय असन्तुलन क्या है ?

उत्तर-पारिस्थितिक-तन्त्र के किसी भी घटक का वांछित एवं आवश्यक मात्रा से कम हो जाना अथवा अधिक हो जाना पारिस्थितिक असन्तुलन कहलाता है। प्रत्येक घटक का उस अनुपात में रहना जिससे इस तन्त्र के अन्य घटकों पर कोई हानिकारक प्रभाव न हो, पारिस्थितिक सन्तुलन कहलाता है।
In simple words: पारिस्थितिक असंतुलन तब होता है जब एक पारिस्थितिक तंत्र में कोई घटक आवश्यक मात्रा से कम या अधिक हो जाता है, जिससे पूरे तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक संतुलन और असंतुलन की सटीक परिभाषाओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. जैवमण्डल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-स्थल, जल और वायुमण्डल की सम्मिलित संकीर्ण पेटी जैवमण्डल कहलाती है। इस पेटी के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़-मकोड़े, सूक्ष्म जीवाणु, मछली आदि सम्मिलित हैं। इन जीवों का आकार सूक्ष्म जीवाणु से लेकर विशालकाय सील व ह्वेल मछली तथा कल्लक से लेकर बरगद के विशाल वृक्ष तक होता है।
In simple words: जैवमण्डल पृथ्वी का वह क्षेत्र है जहाँ जीवन मौजूद है, जिसमें भूमि, जल और वायुमंडल के सभी जीवित जीव और उनके पर्यावरण शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: जैवमण्डल की परिभाषा और उसमें शामिल विभिन्न प्रकार के जीवों के उदाहरणों को याद रखें।

 

Question 7. प्रकाश-संश्लेषण क्या है?
उत्तर-प्रकाश-संश्लेषण वह प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत पेड़-पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड और मिट्टी से खनिज एवं जल लेकर सौर ऊर्जा द्वारा जैव पदार्थों का संश्लेषण करते हैं। पेड़-पौधों की पत्तियों में व्याप्त पर्णहरित (Chlorophyll) नामक हरे वर्णक द्वारा प्रकाश-संश्लेषण सम्भव होता है।
In simple words: प्रकाश-संश्लेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड और जल का उपयोग करके अपना भोजन (जैव पदार्थ) बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक सामग्री (कार्बन डाइऑक्साइड, जल, सूर्य का प्रकाश) और इसके उत्पाद (भोजन) को जानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. प्राथमिक उपभोक्ता किन्हें कहते हैं?
उत्तर-जे जीव जो अपने भोजन के लिए पेड़-पौधों, घास, तृणमूल आदि पर आश्रित रहते हैं, प्राथमिक या शाकाहारी उपभोक्ता कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-हिरन एवं खरगोश ।
In simple words: प्राथमिक उपभोक्ता वे जीव हैं जो सीधे पौधों, घास या अन्य वनस्पति को खाकर अपना पोषण प्राप्त करते हैं, जैसे हिरण और खरगोश।

🎯 Exam Tip: प्राथमिक उपभोक्ताओं की भूमिका को खाद्य श्रृंखला में उनके स्थान के संदर्भ में समझें।

 

Question 9. सर्वाहारी या सर्वभक्षी उपभेक्ता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-वे जीव जो जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों दोनों से ही अपना भोजन प्राप्त करते हैं, सर्वाहारी या सर्वभक्षी उपभोक्ता कहलाते हैं। मनुष्य इसका उत्तम उदाहरण है, क्योंकि वह शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों की प्रकार का भोजन ग्रहण करर्ता है।
In simple words: सर्वाहारी वे जीव होते हैं जो पौधों और जानवरों दोनों को भोजन के रूप में खाते हैं, जैसे मनुष्य।

🎯 Exam Tip: सर्वाहारी की परिभाषा और उसके उदाहरणों को जानना खाद्य श्रृंखला को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. अपघटक या विघटक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-कुछ ऐसे जीव, जो सड़े-गले पौधों तथा मृत जीव-जन्तुओं के ऊतकों का विघटने या अपचयन कर अपना भोजन बना लेते हैं, अपघटक या अपरदभोजी उपभोक्ता कहलाते हैं। जीवाणु, कवक, दीमक, केंचुए और मैगट ऐसे ही विघटक जीव हैं।
In simple words: अपघटक वे जीव होते हैं जो मृत पौधों और जानवरों के कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर पोषक तत्वों को पर्यावरण में वापस छोड़ते हैं, जैसे बैक्टीरिया और कवक।

🎯 Exam Tip: अपघटकों की पारिस्थितिक भूमिका और उनके विभिन्न प्रकारों को याद रखें।

 

Question 11. खाद्य-श्रृंखला किसे कहते हैं?
उत्तर-मानव सहित सभी जीव-जन्तु अपनी भोजन सम्बन्धी आवश्यकता-पूर्ति के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए-हिरन, खरगोश, भेड़, बकरी आदि जीव पेड़-पौधों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, परन्तु लोमड़ी खरगोश को और शेर हिरन को खा जाता है। इस प्रकार घास (पौधों) से खरगोश में, खरगोश से लोमड़ी में तथा लोमड़ी से शेर में ऊर्जा का प्रवाह होता है। इस प्रकार ऊर्जा का प्रवाह या स्थानान्तरण खाद्य श्रृंखला कहलाता है।
In simple words: खाद्य श्रृंखला वह प्रक्रिया है जिसमें एक जीव से दूसरे जीव में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, जो यह दर्शाता है कि कैसे जीव भोजन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला की परिभाषा और उसके उदाहरणों को समझें, विशेषकर ऊर्जा प्रवाह के संदर्भ में।

 

Question 12. पारिस्थितिक क्षमता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में स्थानान्तरित ऊर्जा की मात्रा को पारिस्थितिक क्षमता कहते हैं, परन्तु एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में ऊर्जा के स्थानान्तरण में भिन्नता पाई जाती है। यह क्षमता 5 से 20 प्रतिशत के मध्य पाई जाती है।
In simple words: पारिस्थितिक क्षमता वह दक्षता है जिसके साथ ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर तक स्थानांतरित होती है, और यह आमतौर पर 5% से 20% के बीच होती है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक क्षमता की अवधारणा और एक पोषण स्तर से दूसरे में ऊर्जा के प्रतिशत स्थानांतरण को याद रखें।

 

Question 13. ज्वारनदमुख पारितन्त्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-नदी एवं सागर का वह मिलन स्थल, जहाँ खारे एवं मृदुल जल का मिश्रण होता है, ज्वारनदमुख पारितन्त्र कहलाता है। इस क्षेत्र में पौधों का विकास तेजी से होता है जिसमें जीवों को भोजन की प्राप्ति होती रहती है।
In simple words: ज्वारनदमुख वह क्षेत्र है जहाँ नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है, जिससे पौधों और जीवों के लिए एक समृद्ध और उत्पादक वातावरण बनता है।

🎯 Exam Tip: ज्वारनदमुख की परिभाषा और उसकी पारिस्थितिकीय महत्व को समझें।

 

Question 14. तृतीयक उपभोक्ता किन्हें कहते हैं?
उत्तर-वे मांसाहारी प्राणी जो अन्य मांसाहारी प्राणियों को खाते हैं, तृतीयक उपभोक्ता कहलाते हैं; जैसे-साँप मेंढक को तथा बाज या गिद्ध साँप को खा जाता है।
In simple words: तृतीयक उपभोक्ता वे मांसाहारी जीव होते हैं जो अन्य मांसाहारी जीवों को खाते हैं, जैसे बाज या गिद्ध जो साँप को खाते हैं।

🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला में तृतीयक उपभोक्ताओं के स्थान और उनके उदाहरणों को पहचानें।

 

Question 15. अपघटक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-अपघटक वे मृतोपजीवी जीवाणु या कवक आदि होते हैं जो पेड़-थौधों एवं जीव-जन्तुओं तथा कार्बनिक पदार्थों को सड़ा-गलाकर एवं विघटित करके सूक्ष्म एवं सरल कार्बनिक एवं अकार्बनिक यौगिकों में बदल देते हैं।
In simple words: अपघटक सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु और कवक होते हैं जो मृत कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक यौगिकों में तोड़ते हैं, जिससे पोषक तत्व पुनर्चक्रित होते हैं।

🎯 Exam Tip: अपघटकों की परिभाषा और पारिस्थितिक तंत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझें।

 

Question 16. शीतलन प्रणाली में कौन-सी गैस का उपयोग किया जाता है?
उत्तर-शीतलन प्रणाली में फ्रेओन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस का उफ्यौगं किया जाता है।
In simple words: शीतलन प्रणालियों में, फ्रेओन और क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसी गैसों का उपयोग शीतलक के रूप में किया जाता है, हालाँकि CFCs अब उनके पर्यावरणीय प्रभाव के कारण प्रतिबंधित हैं।

🎯 Exam Tip: शीतलन प्रणालियों में उपयोग की जाने वाली गैसों और उनके पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में जानें।

 

Question 17. पारिस्थितिकी (Ecology) का क्या अर्थ है?
उत्तर-पारिस्थितिकी; पारिस्थितिक विज्ञान की वह शाखा है जो विभिन्न प्रकार के जीवों तथा उनके औतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करती है।
In simple words: पारिस्थितिकी विज्ञान की वह शाखा है जो जीवों और उनके भौतिक वातावरण के बीच के जटिल संबंधों का अध्ययन करती है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिकी की परिभाषा और यह पर्यावरण के अध्ययन में कैसे योगदान करती है, इस पर ध्यान दें।

 

Question 18. पारिस्थितिक सन्तुलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत जैवमंण्डल में विभिन्न जीवों के बीच पूर्ण रूप से निर्मित सन्तुलन को 'पारिस्थितिक सन्तुलन' कहा जाता है।
In simple words: पारिस्थितिक संतुलन जीवमंडल में विभिन्न जीवों के बीच एक स्थिर सामंजस्यपूर्ण संबंध को संदर्भित करता है, जो प्राकृतिक पर्यावरण की स्वस्थ कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक संतुलन की सटीक परिभाषा को समझना पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 19. लियानास किसे कहते हैं?
उत्तर-वृक्षों से आवृत्त जंगल का वह क्षेत्र जहाँ एक छाता जैसा स्वरूप बन जाता है और नीचे के पौधे. बेल आदि सूर्य के प्रकाश को रोकते हैं, ऐसे क्षेत्र को लियानास कहा जाता है।
In simple words: लियानास घने जंगलों में ऊँची लताएं या बेलें होती हैं जो पेड़ों पर उगकर एक छत्र बनाती हैं और नीचे के पौधों तक सूर्य के प्रकाश को पहुंचने से रोकती हैं।

🎯 Exam Tip: लियानास की परिभाषा और वे घने जंगलों में कैसे कार्य करते हैं, इसे याद रखें।

 

Question 20. जूप्लैंकटन क्या है?
उत्तर-वह सूक्ष्म जीव जो महासागरीय जल में पाए जाते हैं, जूप्लैंकटने कॅहलाते हैं।
In simple words: जूप्लैंकटन महासागरीय जल में पाए जाने वाले छोटे समुद्री जीव हैं, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

🎯 Exam Tip: जूप्लैंकटन की परिभाषा और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में उनकी भूमिका को समझें।

 

Question 21. जीवोम या बायोम का क्या अर्थ है?
उत्तर-भूपृष्ठ पर जलवायु-दशाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती हैं। एकसमन जलवायु-दशाओं वाले भागों में पेड़-पौधों के समुदायों के पृथक् पृथकै समूह तथा विशेष प्रकार के जीव-जन्तु पाए जाते हैं, जिन्हें जीवोम (Biome) कहते हैं।
In simple words: जीवोम एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों के कारण एक विशेष प्रकार की वनस्पति और जीव-जंतु समुदाय पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: जीवोम की परिभाषा और विभिन्न जलवायु-दशाओं के साथ इसके संबंध को याद रखें।

 

Question 22. सर्वाहारी (सर्वभक्षी) जीव भोजन के लिए किस पार निर्भर करते हैं?
उत्तर-सर्वाहारी (सर्वभक्षी) जीव भोजन के लिए पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं दोनों पर निर्भर करते हैं।
In simple words: सर्वाहारी जीव वे होते हैं जो अपना भोजन पौधों और अन्य जीवों दोनों से प्राप्त करते हैं।

🎯 Exam Tip: सर्वाहारी के पोषण प्रकार और वे कैसे खाद्य श्रृंखला में फिट होते हैं, इसे समझें।

 

Question 23. उत्पादक या स्वपौषी जीव से क्या अभिप्राय है?
उतर-वे जीव जो भौतिक पर्यावरण से अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं, उत्पादक या स्वपोषी जीव कहलाते हैं। हरे पेड़-पौधे एवं सभी प्रकार की वनस्पति प्राथमिक उत्पादकं हैं।
In simple words: उत्पादक वे जीव हैं जो प्रकाश-संश्लेषण या रसायन-संश्लेषण के माध्यम से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जैसे हरे पौधे।

🎯 Exam Tip: उत्पादकों की परिभाषा और पारिस्थितिक तंत्र में उनकी भूमिका को याद रखें।

 

Question 24. जीवोम को प्रभावित करने वाले कारकों के नाम बताइए।।
उत्तर-जीवोम को प्रभावित वाले कारकों के नाम हैं - आर्द्रता, तापमान, मिट्टीं, उच्चावच, सूर्य-प्रकाश, एवं सागरीय जल तथा उसका उच्चावच ।
In simple words: जीवोम को आर्द्रता, तापमान, मिट्टी, उच्चावच और सूर्य के प्रकाश जैसे कारक प्रभावित करते हैं, जो उस क्षेत्र में पाए जाने वाले पौधों और जानवरों के प्रकार को निर्धारित करते हैं।

🎯 Exam Tip: जीवोम को प्रभावित करने वाले विभिन्न पर्यावरणीय कारकों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 25. जैविक घटक किस पर निर्भर करते हैं।
उत्तर-जैविक घटक सर्वाधिक जलवायु पर निर्भर होते हैं। जलवायु प्रणियों और पौधों की क्रियाओं कों नियन्त्रित करती है। अतः स्थल, जल और वायुमण्डल जैविक घटकों के निर्धारक तत्त्व हैं।
In simple words: जैविक घटक मुख्य रूप से जलवायु पर निर्भर करते हैं, क्योंकि जलवायु पौधों और प्राणियों की गतिविधियों को नियंत्रित करती है, और भूमि, जल और वायुमंडल इनके महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व हैं।

🎯 Exam Tip: जैविक घटकों पर जलवायु के प्रभाव और अन्य अजैविक कारकों को समझें।

 

Question 26. जैवमण्डल में असन्तुलन की स्थिति क्यों उत्पन्न लेती है।
उत्तर-जैवमण्डल की रचना जैविक (पादप, मानव, जन्तु एवं सूक्ष्म जीवं) तथा अजैविक घटक (स्थल, जल एवं वायु) तथा ऊर्जा से होती है। इन सभी तत्त्वों के घट-बढ़ जाने से जैक्मण्डल में असन्तुलने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
In simple words: जैवमंडल में असंतुलन तब होता है जब जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटकों के अनुपात में बदलाव आता है, जिससे पूरे पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता प्रभावित होती है।

🎯 Exam Tip: जैवमंडल के घटकों और उनमें असंतुलन पैदा करने वाले कारकों को समझें।

 

Question 27. डीटटस पोषक क्या हैं?
उत्तर-उपभोक्ताओं का वह समूह जो महासागरीय जल अथवा मृत प्राणियों पर निर्भर हो, ड्रीट्टस पोषक कहलाता है।
In simple words: डीट्रिटस पोषक ऐसे उपभोक्ता होते हैं जो अपने पोषण के लिए मृत कार्बनिक पदार्थों या महासागरीय जल में मौजूद कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर करते हैं।

🎯 Exam Tip: डीट्रिटस पोषक की परिभाषा और उनकी भूमिका को अपघटन प्रक्रियाओं में जानें।

 

Question 28. जीरोफाइट्स क्या हैं?
उत्तर-जो पौधे शुष्क जलवायु में भी रह सकते हैं, उन्हें जीरोफाइट्स कहते हैं।
In simple words: जीरोफाइट्स वे पौधे होते हैं जो शुष्क या मरुस्थलीय वातावरण में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं।

🎯 Exam Tip: जीरोफाइट्स की परिभाषा और शुष्क जलवायु में उनके अनुकूलन को याद रखें।

 

Question 29. जैविक तत्त्वों के तीन वर्ग कौन-से हैं?
उत्तर-जैविक तत्त्वों के तीन वर्ग निम्नलिखित हैं
• उत्पादक,
• उपभोक्ती तथा
• अपघटक ।
In simple words: जैविक तत्वों के तीन मुख्य वर्ग उत्पादक (जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं), उपभोक्ता (जो दूसरों पर निर्भर रहते हैं), और अपघटक (जो मृत कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हैं) हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र में जैविक घटकों के तीनों वर्गों को उनकी भूमिकाओं के साथ याद करें।

 

Question 30. कार्बन चक्र क्या हैं?
उत्तर-कार्बन चक्र कार्बन डाइऑक्साइड का परिवर्तित रूप है।।
In simple words: कार्बन चक्र एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें कार्बन विभिन्न रूपों में पृथ्वी के वायुमंडल, महासागरों, भूमि और जीवों के बीच घूमता रहता है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख रूप है।

🎯 Exam Tip: कार्बन चक्र की परिभाषा और यह पर्यावरण में कार्बन के पुनर्चक्रण में कैसे मदद करता है, इस पर ध्यान दें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. जैवमण्डल का अर्थ एवं उसके मुख्य तत्त्व बताइए।
या जैवमण्डल पर टिप्पणी लिखिए ।

उत्तर-जैवमण्डल में पृथ्वी के निकट का वह कटिबन्ध सम्मिलित है जो किसी-न-किसी रूप में जैव विकास के लिए अनुकूल पड़ता है। इसका निर्माण स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल तीनों के सम्पर्क क्षेत्र में होता है। इन तीनों के संयोग से ऐसा पर्यावरण बन जाता है जो वनस्पति जगत, जीव-जन्तु और मानव-शरीर के विकास के लिए अनुकूल दशाएँ प्रदान करता है। पृथ्वी तल के निकट स्थित यह क्षेत्र हो । जैवमण्डल (Biosphere) कहलाता है। विद्वानों ने जैवमण्डल को तीन पर्यावरणीय उपविभागों में बाँटा है- (i) महासागरीय, (ii) ताजे जल एवं (iii) स्थलीय जैवमण्डल । इनमें स्थलीय जैवमण्डल अधिक महत्त्वपूर्ण है।
जैवमण्डल के तत्त्व-जैवमण्डल के तीन प्रमुख तत्त्व हैं-1. वनस्पति के विविध प्रकार, 2. जन्तुओं के विविध प्रकार तथा 3. मानव समूह ।। वनस्पति-जगत में समुद्री पेड़-पौधों से लेकर पर्वतों की उच्च श्रेणियों तक पाए जाने वाले वनस्पति के विविध प्रकार सम्मिलित हैं। जन्तु-जगत में समुद्रों में पाए जाने वाले विविध जीव, मिट्टियों को बनाने वाले बैक्टीरिया और स्थल पर पाए जाने वाले विविध जीव-जन्तु सम्मिलित हैं। जैवमण्डल के तत्त्व वायु, जल, सूर्य-प्रकाश और मिट्टियों पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं। जैवमण्डल के तत्त्वों में परस्पर गहरा सम्बध होता है। किसी तत्त्व में कमी या अवरोध उत्पन्न होने पर जैवमण्डल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
In simple words: जैवमंडल पृथ्वी का वह हिस्सा है जहाँ जीवन मौजूद है, जिसमें भूमि, जल और वायुमंडल के संपर्क क्षेत्र शामिल हैं, और इसके मुख्य तत्वों में विभिन्न प्रकार के पौधे, जानवर और मानव समूह शामिल हैं जो एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

🎯 Exam Tip: जैवमंडल की व्यापक परिभाषा, उसके निर्माण (स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल से) और उसके तीन मुख्य तत्वों को याद रखें।

 

Question 2. प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं में अन्तर बताइए ।
उत्तर-प्राथमिक एवं द्वितीयंक श्रेणी के उपभोक्ताओं में निम्नलिखित अन्तर हैं

क्र०सं०प्राथमिक उपभोक्ताद्वितीयक उपभोक्ता
1.प्राथमिक उपभोक्ता शाकाहारी होते हैं।द्वितीयक उपभोक्ता मांसाहारी होते हैं।
2.ये भोजन-प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वनस्पतियों पर निर्भर होते हैं।ये शाकाहारी जीव-जन्तुओं को अपने भोजन के लिए प्रयुक्त करते हैं।
3.इनमें विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकोड़े, छोटी मछलियाँ, तितलियाँ, मधुमक्खियाँ, भेड़, बकरी, गाय, बैल, भैंस, खरगोश, हाथी सम्मिलित हैं।इनमें भृंग, छिपकलियाँ, झींगुर, मेंढक, बड़ी, मछलियाँ आदि सम्मिलित हैं।

In simple words: प्राथमिक उपभोक्ता शाकाहारी होते हैं जो पौधों पर निर्भर करते हैं, जबकि द्वितीयक उपभोक्ता मांसाहारी होते हैं जो प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्राथमिक और द्वितीयक उपभोक्ताओं के बीच मुख्य अंतर, उनके आहार और उदाहरणों पर ध्यान दें।

 

Question 3. पारिस्थितिक सन्तुलन की महत्ता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-पारिस्थितिक तन्त्र जीवन का आधार है। इसका मूल उद्देश्य मानव एवं प्रकृति के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित करना है, परन्तु जनसंख्या में द्रुतगति से वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र गति से विदोहन हुआ है तथा पारिस्थितिक असन्तुलन के कारण जीवन के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न होने का खतरा बढ़ा है। समग्र रूप से पारिस्थितिक सन्तुलन की महत्ता को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है ।
1. पारिस्थितिक सन्तुलन के कारण ही वायुमण्डल एवं जलमण्डल के परिसंचरण से जलवायु सन्तुलित रहती है तथा जल एवं वन संसाधनों का भण्डार सतत बना रहता है।
2. पारिस्थितिक सन्तुलन के कारण प्राकृतिक जैव एवं अजैव घटकों की स्वनिर्मित प्रक्रिया में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होता, जिसके कारण प्राकृतिक आपदाओं की सम्भावनाएँ न्यूनतम रहती हैं।
3. पर्यावरण सन्तुलन पृथ्वी पर जीव-जन्तु और पेड़-पौधों में एक निश्चितै अनुपात कायम रखता है,
अतः जीवन की सतत साम्यावस्था बनी रहती है। इस प्रकार पारिस्थितिक सन्तुलन को जीवन में व्यापक महत्त्व है। इसकी साम्यावस्था मानव-जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और समस्त अजैव संसाधनों की दीर्घ अवधि तक उपभोग क्षमता में वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
In simple words: पारिस्थितिक संतुलन जीवन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्राकृतिक संसाधनों को बनाए रखता है, प्राकृतिक आपदाओं को कम करता है, और पृथ्वी पर जैव विविधता को स्थिर बनाए रखता है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक संतुलन के महत्व के प्रमुख बिंदुओं और इसके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को याद रखें।

 

Question 4. पर्यावरण किस प्रकार सन्तुलित रह सकता है?
उत्तर-जैव समुदाय में वृद्धि, विकास एवं अस्तित्व के लिए पर्यावरण का सन्तुलित होना आवश्यक है। मानव के सभी क्रियाकलाप पर्यावरण से सम्बन्धित होते हैं तथा उसी से ही निर्धारित होते हैं। मानव का आवास इसी पृथ्वी तल पर है। वह पृथ्वी तल पर उत्पन्न होने वाली वनस्पति तथा जीव-जन्तुओं से अलग नहीं रह सकता है, क्योंकि अपने भोजन और अन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वह वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं पर ही आश्रित है; अतः मानव के लिए इनकी सुरक्षा करना अति आवश्यक हो जाता है। पर्यावरण सन्तुलन के लिए आज पर्यावरण के प्रति जागरूक होना अथवा पर्यावरण का बोध होना अति आवश्यक है।
पारिस्थितिक सन्तुलन तभी बना रह सकता है जब प्रत्येक घटक सम्मिलित रूप से सभी क्रियाएँ करता रहे, जो वह पहले से करता आ रहा है; जैसे—यदि वन पर्याप्त मात्रा में बने रहते हैं तो इससे वातावरण एवं वायु में नमी बनी रहती है, जिससे वर्षा होती रहेगी, कृषि फसलों के लिए जल मिलता रहेगा, फलस्वरूप खाद्य-पदार्थों का उत्पादन होगा और भोजन की कमी नहीं रहेगी। वास्तव में पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए इसके प्रत्येक घटक का सन्तुलित अवस्था में रहना आवश्यक है।
In simple words: पर्यावरण संतुलित तभी रह सकता है जब सभी घटक अपनी भूमिकाएँ सही ढंग से निभाएँ, जैसे पर्याप्त वन वर्षा और कृषि के लिए जल सुनिश्चित करते हैं, और मानव को पर्यावरण के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

🎯 Exam Tip: पर्यावरण संतुलन के सिद्धांतों और मानव की भूमिका को याद रखें।

 

Question 5. पारिस्थितिक तन्त्र को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर-भौतिक पर्यावरण में पेड़-पौधे, जीव-जन्तु तथा अन्य सूक्ष्म जीवाणु सब एक साथ मिलकर पारितन्त्र की रचना करते हैं। “पारिस्थितिकी जीवविज्ञान का वह भाग है जिसके द्वारा हमें जीव तथा पर्यावरण की पारस्परिक प्रतिक्रियाओं का बोध होता है। इस प्रकार विभिन्न जीवों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा उनका भौतिक पर्यावरण से सम्बन्धों का अध्ययन पारिस्थितिक विज्ञान (Ecology) के अन्तर्गत किया जाता है। हमारी पृथ्वी स्वयं में एक बहुत बड़ा पारिस्थितिक तन्त्र है, जिसमें समस्त जैव समुदाय सूर्य द्वारा प्राप्त ऊर्जा पर निर्भर है तथा वे स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल से जीवनोपयोगी सभी तत्त्वों को प्राप्त करते हैं। जलवायु प्राणियों और पौधों की क्रियाओं को नियन्त्रित करती है। ये दोनों ही एक-दूसरे को तथा साथ ही अपने पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार पर्यावरण और उसमें निवास करने वाले जीवधारी परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए एक तन्त्र की रचना कर लेते हैं, जिसे ‘पारितन्त्र' अथवा 'पारिस्थितिक तन्त्र' कहा जाता है।
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र एक क्रियात्मक इकाई है जिसमें जीवित जीव (पेड़-पौधे, जानवर) और उनके भौतिक वातावरण (मिट्टी, जल, वायु) एक साथ मिलकर ऊर्जा और पोषक तत्वों के निरंतर प्रवाह के साथ एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र की परिभाषा और उसके घटकों के बीच के अंतर्संबंधों को समझना आवश्यक है।

 

Question 6. पारितन्त्र के प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर-पारितन्त्र के निम्नलिखित दो प्रमुख घटक होते हैं
1. अजैव घटक-मृदा, जल और वायुमण्डल में विद्यमान अनेक रासायनिक पदार्थ अजैव घटक कहलाते हैं। इन रासायनिक पदार्थों में जल, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइ-ऑक्साइड, कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा अन्य अनेक रासायनिक पदार्थ सम्मिलित किए जाते हैं। भौतिक पर्यावरण के अजैव घटक किसी क्षेत्र में निवास करने वाले जीव-जन्तुओं तथा वनस्पति की विभिन्न प्रजातियों को प्रभावित करते हैं। अजैव घटकों में जलवायु का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जो सम्पूर्ण पारितन्त्र को प्रभावित करती है तथा उसमें अनेक परिवर्तन लाती है।
2. जैव घटक-स्थल, जल और वायुमण्डल में निवास करने वाले सभी प्रकार के जीव-जन्तु, जीवाणु, कीटाणु आदि तथा सभी प्रजातियों के पेड़-पौधे (वनस्पति) जैव घटक के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं।
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य घटक अजैविक घटक (जैसे मिट्टी, जल, वायु) और जैविक घटक (जैसे सभी प्रकार के जीव-जंतु और पौधे) हैं, जो एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते हैं।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र के अजैविक और जैविक घटकों और प्रत्येक के तहत आने वाले उदाहरणों को जानें।

 

Question 7. जैव घटक के दो प्रमुख वर्ग कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर-जैव घटक के दो प्रमुख वर्ग निम्नलिखित हैं
1. उत्पादक-उत्पादक वे जीव हैं जो भौतिक पर्यावरण से अपना भोजन स्वयं लेते हैं। इन्हें स्वपोषित जीव भी कहते हैं। हरे पेड़-पौधे तथा सभी प्रकार की वनस्पति प्राथमिक उत्पादक हैं। महासागरीय जल में पादप प्लवक प्राामिक उत्पादक हैं, क्योंकि वे सौर ऊर्जा का उपयोग कर अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं।
2. उपभोक्ता-उपभोक्ता अपने भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। इन्हें परपोषी भी कहा जाता है। इनकी चार श्रेणियाँ हैं (क) शाकाहारी या प्राथमिक उपभोक्ता हिरण एवं खरगोश । (ख) मांसाहारी या गौण उपभोक्ता-शेर एवं चीता। (ग) सर्वाहारी या सर्वभक्षी उपभोक्ता-मनुष्य । (घ) अपघटक या अपरदभोजी उपभोक्ता-जीवाणु, कवक, दीमक, केंचुए एवं मैगट आदि ।।
इस प्रकार अपघटक जीव, जैव पदार्थों को अजैव पदार्थों में परिणत कर देते हैं। पुनः इन अजैव पदार्थों को सौर ऊर्जा की सहायता से पेड़-पौधे अपना भोजन बना लेते हैं। हिरण एवं खरगोश पेड़-पौधों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, जबकि शेर एवं चीता, हिरण एवं खरगोश को खा जाते हैं। मनुष्य अपना भोजन पेड़-पौधों एवं गौण उपभोक्ताओं से प्राप्त करता है। इस प्रकार यह क्रम अबाध गति से चलता रहता है तथा चक्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।
In simple words: जैविक घटक मुख्य रूप से उत्पादकों (जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं) और उपभोक्ताओं (जो भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जिनमें शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी और अपघटक शामिल हैं) में विभाजित होते हैं।

🎯 Exam Tip: जैविक घटकों के वर्गों - उत्पादक और उपभोक्ता - तथा उपभोक्ताओं के उपप्रकारों को उनके उदाहरणों के साथ अच्छी तरह समझें।

 

Question 8. खाद्य-श्रृंखला या आहार-जाल किसे कहते हैं?
उत्तर-मानव सहित सभी जीव अपनी भोजन सम्बन्धी आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं तथा उनमें भोजन के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है। इस प्रकार पारिस्थितिक तन्त्र में एक जीव से दूसरे जीव में ऊर्जा का स्थानान्तरण'खाद्य-श्रृंखला' कहलाता है। उदाहरण के लिए-खरगोश, हिरण, भेड़, बकरी आदि जीव घास (पौधों) से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, परन्तु लोमड़ी खरगोश को खा जाती है। और शेर लोमड़ी को खा जाता है। परन्तु विघटक पौधों और जीवों के सड़े-गले अंश से ऊर्जा और पोषक तत्त्व प्राप्त करते हैं। ये जैव पदार्थों को अजैव पदार्थों में बदल देते हैं जिन्हें हरे पौधे ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार खाद्य-श्रृंखला का चक्र पूर्ण हो जाता है। परन्तु अपघटक पौधों एवं मृत शरीरों के ऊतकों से ऊर्जा और पोषक तत्त्वों को ग्रहण करते हैं। अपने भोजन की प्रक्रिया में अपघटक जीव, जैव पदार्थों को अजैव पदार्थों में परिणत कर देते हैं। इस प्रकार प्रकृति में खाद्य-श्रृंखलाएँ जटिल बन जाती हैं तथा इनका एक जाल-सा बन जाता है। जीवों द्वारा पारस्परिक रूप से सम्बन्धित खाद्य-श्रृंखलाओं के जटिल समूह को आहार-जाल कहते हैं।
In simple words: खाद्य श्रृंखला वह प्रक्रिया है जहाँ ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक प्रवाहित होती है, जबकि खाद्य जाल कई खाद्य श्रृंखलाओं का एक जटिल नेटवर्क है जो एक पारिस्थितिक तंत्र में जीवों के बीच भोजन संबंधों को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल की परिभाषाओं, उनके बीच के अंतर और उनके उदाहरणों को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 9. पृथ्वी के पारितन्त्र को कितने भागों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर-पृथ्वी के पारितन्त्र को. निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जाता है
1. जलीय पारितन्त्र-जल में घुले विभिन्न लवणों के कारण जलीय जीवों की संख्या सीमित होती है। जलीय पारितन्त्र का उपविभाजन मीठे जल, ज्वारनदमुख तथा समुद्री पारितन्त्रों के रूप में किया जाता है। जल में घुली हुई ऑक्सीजन का संकेन्द्रण और जल में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश तथा पोषण की उपलब्धि, जलीय जीवों को सीमित करने वाले प्रमुख कारक हैं।
2. स्थलीय पारितन्त्र-हम स्थलखण्ड पर निवास करते हैं; अतः स्थलीय पारितन्त्र से हमारा गहन सम्बन्ध है, क्योंकि हमारी भोजन तथा अन्य सभी आवश्यकताएँ इन्हीं से ही पूर्ण होती हैं। भू-पृष्ठ पर जलवायु की दशाओं के अनुसार विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। एकसमान जलवायु-दशाओं वाले भागों में पौधों के समुदायों के पृथक् पृथक् समूह मिलते हैं, जिन्हें 'जीवोम' कहते हैं। इस प्रकार स्थलीय पारितन्त्र का वर्गीकरण जलवायु-दशाओं के आधार पर किया जाता है। इनमें आर्द्रता, तापमान तथा मृदा महत्त्वपूर्ण कारक हैं।
In simple words: पृथ्वी के पारितंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है: जलीय पारितंत्र (जल-आधारित) और स्थलीय पारितंत्र (भूमि-आधारित), जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ और जीव समुदाय होते हैं।

🎯 Exam Tip: पृथ्वी के पारितंत्र के दो मुख्य विभाजन, जलीय और स्थलीय, तथा उनके उप-प्रकारों को प्रभावित करने वाले कारकों को समझें।

 

Question 10. प्रकाश-संश्लेषण के महत्त्व की विवेचना कीजिए ।
उत्तर-प्रकाश-संश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा की सहायता से अजैव पदार्थों को जैव पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया में पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड और मृदा से खनिज व जल लेकर, सूर्य की ऊर्जा द्वारा जैव पदार्थों को संश्लेषण करते हैं। पेड़-पौधों की पत्तियों में व्याप्त पर्णहरित (Chlorophyll) नामक हरे वर्णक द्वारा प्रकाश-संश्लेषण सम्भव होता है। महासागरीय जल में पादप प्लवक प्राथमिक उत्पादक हैं क्योंक वे सौर ऊर्जा का उपयोग कर अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं।
In simple words: प्रकाश-संश्लेषण एक मौलिक प्रक्रिया है जिसमें हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और जल को भोजन में परिवर्तित करते हैं, यह जीवमंडल में ऊर्जा और पोषक तत्वों के प्रवाह का आधार है।

🎯 Exam Tip: प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया, इसमें शामिल तत्वों और जीवन के लिए इसके महत्व को अच्छी तरह समझें।

 

Question 11. पारिस्थितिक पिरामिड को समझाइए ।
उत्तर-जीव-जन्तुओं के प्रत्येक समूह का एक पोषण स्तर होता है। हरी घासें एवं अन्य वनस्पति प्रथम स्तर के पोषण के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती हैं, जिन्हें प्राथमिक उत्पादक भी कहा जाता है। शाकाहारी जीव-जन्तु, जो इनका भक्षण करते हैं, द्वितीय स्तर के पोषण में सम्मिलित किए जाते हैं। वे मांसाहारी जीव-जन्तु, जो शाकाहारी जीव-जन्तुओं का शिकार करते हैं, तृतीय स्तर के पोषण में सम्मिलित होते हैं, जिन्हें द्वितीयक उपभोक्ता भी कहते हैं। चतुर्थ स्तर के पोषण में ऐसे मांसाहारी जीव सम्मिलित किए जाते हैं जो अपने से छोटे मांसाहारी जीवों का भक्षण करते हैं, इन्हें तृतीयक उपभोक्ता कहते हैं। मनुष्य तृतीयक उपभोक्ता है जो तीनों ही पोषण स्तरों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में उपभोग करता है, क्योंकि मनुष्य सर्वाहारी उपभोक्ता है। ऊर्जा की उपलब्धता के अनुसार सभी पोषण स्तर समान नहीं होते हैं, क्योंकि निम्न स्तर से उच्च स्तर पर ऊर्जा का एक अंश ही स्थानान्तरित होता है। इन पोषण स्तरों का प्रदर्शन एक पिरामिड की सहायता से किया जाता है, जिसे पारिस्थितिक पिरामिड कहा जाता है।
In simple words: पारिस्थितिक पिरामिड एक ग्राफिकल प्रतिनिधित्व है जो पारिस्थितिक तंत्र में विभिन्न पोषण स्तरों पर जीवों की संख्या, बायोमास या ऊर्जा की मात्रा को दर्शाता है, जिसमें प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा कम होती जाती है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक पिरामिड के विभिन्न पोषण स्तरों (उत्पादक, प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक उपभोक्ता) और ऊर्जा स्थानांतरण के सिद्धांत को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 12. पारिस्थितिक क्षमता का वर्णन कीजिए ।
उत्तर-एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में स्थानान्तरित ऊर्जा के प्रतिशत को पारिस्थितिक क्षमता कहा जाता है। जीवों के एक समूह का एक पोषी स्तर होता है।
एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में ऊर्जा स्थानान्तरण की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। जीवों की जाति और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार यह क्षमता 5% से लेकर 20% के मध्य हो सकती है। स्थलीय पारिस्थितिक तन्त्र में शाकाहारी जीवों द्वारा पादप पदार्थ के केवल 10% भाग का ही उपभोग किया जाता है। औसत रूप से केवल 10% ऊर्जा का स्थानान्तरण एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में होता है। इसका तात्पर्य यह है कि जीवों को 10 किग्रा मांस के उत्पादन के लिए 100 किग्रा खाद्यान्नों की आवश्यकता होती है। इस कम क्षमता का कारण यह है कि उच्च स्तर के उपभोक्ताओं को एक स्तर पर विद्यमान सभी जीव सुगमता से उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। परभक्षी जीव उपलब्ध प्रत्येक शिकार को पकड़ नहीं पाते हैं। परभक्षियों के आक्रमण से जो जीव बच जाते हैं वे अन्ततोगत्वा काल-कवलित हो जाते हैं। तथा इन्हें विघटक खा जाते हैं। इस प्रकार उच्च पोषी स्तर के जीवों की निर्वाह करने की क्षमता भी सीमित होती है।
In simple words: पारिस्थितिक क्षमता वह दक्षता है जिसके साथ ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर तक स्थानांतरित होती है, आमतौर पर 5% से 20% के बीच, यह दर्शाती है कि उच्च पोषण स्तरों पर ऊर्जा की उपलब्धता सीमित क्यों होती है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक क्षमता की परिभाषा, उसके प्रतिशत मान और ऊर्जा स्थानांतरण को प्रभावित करने वाले कारकों को समझें।

 

Question 13. पारितन्त्र में ऊर्जा और खनिज पदार्थों के प्रवाह पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर-सम्पूर्ण पारितन्त्र ऊर्जा के लिए सूर्यातप पर निर्भर करता है; अतः सभी प्रकार के पोषकों में ऊर्जा का प्रवाह सतत रूप में प्रतिपल होता रहता है। उत्पादकों को अपना भोजन बनाने के लिए सौर-विकिरण से ऊर्जा प्राप्त होती है। ऊर्जा का स्थानान्तरण उत्पांदकों से शाकाहारियों में और शाकाहारियों से मांसाहारियों में होता रहता है। इस प्रकार उत्पादकों शाकाहारियों तथा मांसाहारियों के निर्जीव या विघटित अवशेष, अपघटकों को ऊर्जा प्रदान करते हैं। अतः सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा में होता रहता है तथा यह प्रवाहं तब तक जारी रहता है जब तक कि ऊर्जा विलीन नहीं हो जाती है। जीव-जन्तु भोजन से प्राप्त ऊर्जा का कुछ भाग तो पचा लेते हैं तथा शेष भाग श्वसन द्वारा ऊष्मा के रूप में बाहर निकल जाता है। मृदा से खनिज पदार्थों का पेड़-पौधों में प्रवाह उनकी वृद्धि एवं विकास में सहायक होता है। उपभोक्ता अपनी वृद्धि एवं विकास के लिए इन पोषकों का भरपूर उपयाग करते हैं। जब पेड़-पौधे और जीव-जन्तु । नष्ट अर्थात् काल-कवलित हो जाते हैं, तब जीवाणु और कवक जैसे अपघटक उन्हें अपना भोजन बना लेते हैं तथा उन्हें विघटित कर अजैव पोषकों में परिणत कर दते हैं। ये अजैव पोषक मृदा में विलीन होते रहते हैं तथा पेड़-पौधे पुनः उनका उपभोग करते हैं। इस प्रकार पारितन्त्र में खनिज पदार्थों की यह चक्रीय प्रक्रिया अबाध गति से चलती रहती है।
In simple words: पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से उत्पादकों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक होता है और यह एक दिशा में प्रवाहित होता है, जबकि खनिज पदार्थ उत्पादकों, उपभोक्ताओं और अपघटकों के बीच चक्रीय रूप से प्रवाहित होते हैं।

🎯 Exam Tip: पारितंत्र में ऊर्जा के एकतरफा प्रवाह और खनिज पदार्थों के चक्रीय प्रवाह के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 14. ज्वारनदमुख पारितन्त्र का विवरण दीजिए ।
उत्तर-नदी जब अपने मुहाने का निर्माण करती है तो उसका जल भू-सतह पर फैल जाता है। ज्वार-भाटा के समय सागरीय जलं नदी के जल को पीछे की ओर धकेल देता है। इस क्षेत्र को ज्वारनदमुख कहते हैं। इस प्रकार की नदियाँ डेल्टाओं का निर्माण नहीं करती हैं; अतः इस क्षेत्र में नदी के मृदुल जल तथा सागर के खारे जल का सम्मिश्रण होता रहता है। ज्वारनदमुख के उथला होने के कारण सूर्य भी अधःस्थल तक पहुँचता है। ज्वार-भाटा के समय इस क्षेत्र में जल का उतार-चढ़ाव होता रहता है, फलस्वरूप यहाँ पोषक तत्त्वों का मिश्रण हो जाता है। अतः इस क्षेत्र में पौधों का विकास तीव्रता से होता है, जिनसे जीवों को भोजन की प्राप्ति होती रहती है तथा यहाँ केकड़े, सीपियाँ, झींगे, मछलियाँ, जलचर एवं जलीय वनस्पति पर्याप्त मात्रा में विकसित होती हैं। कुछ विशिष्ट प्रकार की मछलियों के लिए ज्वारनदमुख सबसे सुरक्षित प्रजनन क्षेत्र होते हैं, क्योंकि जल की कम लवणता महासागरीय परभक्षियों के लिए बाधा उपस्थित करती है।
In simple words: ज्वारनदमुख वह क्षेत्र है जहाँ नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है, जो ज्वार-भाटा और सूर्य के प्रकाश के कारण पोषक तत्वों से समृद्ध होता है, जिससे पौधों और समुद्री जीवों के लिए एक उत्पादक और सुरक्षित वातावरण बनता है।

🎯 Exam Tip: ज्वारनदमुख की विशेषताओं, इसकी पारिस्थितिकीय महत्व और समुद्री जीवन के लिए इसके लाभों पर ध्यान दें।

 

Question 15. स्थलीय पारितन्त्र को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर-स्थलीय पारितन्त्र को निम्नलिखित कारकै प्रभावित करते हैं
1. आर्द्रता-पौधों की वृद्धि के लिए जल अति आवश्यक है क्योंकि पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व घुली हुई अवस्था में जड़ों के माध्यम से पत्तियों तक पहुँचते हैं। अतएव जल पौधों में पोषकों के प्रवाह का माध्यम है।
2. तापमान-प्रत्येक पौधे को अपने अंकुरण, वृद्धि, विकास, पुनरुत्पादन के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती है।
3. मृदा-स्थलीय पारितन्त्र में मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, क्योंकि वह पौधों की वृद्धि का माध्यम है। मृदा की निर्माण प्रक्रिया बहुत मन्द गति से होती है तथा इस प्रक्रिया में भौतिक, रासायनिक और जैविक परिवर्तन होते हैं। मृदा की रचना में जलवायु सर्वप्रथम कारक है। जलवायु प्रदेश ही मृदा के प्रकारों का निर्धारण करते हैं।
In simple words: स्थलीय पारितंत्र आर्द्रता (जल की उपलब्धता), तापमान (पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक), और मृदा (पोषक तत्वों और संरचना का माध्यम) जैसे कारकों से प्रभावित होता है।

🎯 Exam Tip: स्थलीय पारितंत्र को प्रभावित करने वाले प्रमुख पर्यावरणीय कारकों (आर्द्रता, तापमान, मृदा) और उनके विशिष्ट प्रभावों पर ध्यान दें।

 

Question 16. उत्पादक तथा उपभोक्ता में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर-उत्पादक तथा उपभोक्ता में अन्तर

क्र०सं०उत्पादकउपभोक्ता
1.उत्पादक वे जीव है जो भौतिक पर्यावरण से अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं।उपभोक्ता ऐसे जीव हैं जो अपने भोजन के लिए दूसरे जीवों पर आश्रित रहते हैं।
2.इन्हें स्वपोषित जीव कहते हैं।इन्हें परपोषित जीव कहा जाता है।
3.इसके अन्तर्गत हरे पौधे तथा जीवाणु आदि महत्त्वपूर्ण होते हैं।इसके अन्तर्गत प्राणी, पशु-पक्षी और अपघटक आदि सम्मिलित होते हैं।
4.उत्पादक सौर ऊर्जा की सहायता से अजैव पदार्थों को जैव पदार्थों में परिणत कर देते हैं।उपभोक्ता शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही प्रकार के होते हैं।
5.सौर ऊर्जा की सहायता से जैव पदार्थों का संश्लेषण किया जाता है।उपभोक्ता पौधों और जीवों दोनों से ही अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं।

In simple words: उत्पादक वह जीव होते हैं जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जबकि उपभोक्ता भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।

🎯 Exam Tip: उत्पादक और उपभोक्ता के बीच के मुख्य अंतर, उनके भोजन प्राप्त करने के तरीके और उदाहरणों को याद रखें।

 

Question 17. कार्बन चक्र से आप क्या समझते हैं? सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-कार्बन चक्र कार्बन डाइऑक्साइड का परिवर्तित रूप है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया पौधों में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड के यौगिकीकरण से आरम्भ होती है। इस प्रक्रिया से । कार्बोहाइड्रेट्स व ग्लूकोज बनता है जो कार्बनिक यौगिक; जैसे-स्टार्च, सेल्यूलोज, सुक्रोज आदि के रूप में पौधों में संचित हो जाता है। कार्बोहाइड्रेट्स का कुछ भाग सीधे पौधों की जैविक क्रिया में प्रयुक्त होता है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत पौधों के पत्तों व जड़ों के विघटन से कार्बन डाइऑक्साइड गैस मुक्त होती है तथा शेष कार्बोहाइड्रेट्स जो पौधों की जैविक क्रियाओं में प्रयुक्त नहीं होती वह पौधों के ऊतकों में एकत्र हो जाती है। ये पौधे या तो शाकाहारियों का भोजन बनते हैं या सूक्ष्म जीवों द्वारा विघटित हो जाते हैं। यही शाकाहारी जीव उपभोग किए गए कार्बोहाइड्रेट्स को कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित करते हैं और श्वसन क्रिया द्वारा वायुमण्डल में छोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा भी कार्बोहाइड्रेट्स ऑक्सीजन प्रक्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित होकर पुनः वायुमण्डल में आ जाती है (चित्र 15.1)।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख कार्बन चक्र को दर्शाता है, जिसमें वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड, जीव (जंतु), मृत अवशेष, अपघटक और मूल श्वसन के बीच कार्बन के प्रवाह को दिखाया गया है। यह चक्र दर्शाता है कि कार्बन कैसे विभिन्न जैविक और अजैविक घटकों के बीच घूमता है।
In simple words: कार्बन चक्र एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें कार्बन वायुमंडल, जीवों, मिट्टी और जल के बीच चक्रीय रूप से घूमता है, जिसमें पौधे प्रकाश-संश्लेषण के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और श्वसन व अपघटन के माध्यम से इसे वापस छोड़ते हैं।

🎯 Exam Tip: कार्बन चक्र की पूरी प्रक्रिया, इसमें शामिल मुख्य चरणों (प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन, अपघटन) और कार्बन के विभिन्न रूपों को समझना महत्वपूर्ण है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Question 1. ऑक्सीजन चक्र अथवा नाइट्रोजन चक्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-ऑक्सीजन चक्र ऑक्सीजन प्रकाश-संश्लेषण क्रिया का प्रमुख सहपरिणाम है। यह कार्बोहाइड्रेट्स के ऑक्सीकरण में सम्मिलित है जिससे ऊर्जा, कार्बन डाइऑक्साइड व जल विमुक्त होते हैं।
ऑक्सीजन चक्र बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। ऑक्सीजन बहुत-से रासायनिक तत्त्वों के सम्मिश्रण में पाई जाती है। ऑक्सीजन नाइट्रोजन के साथ मिलकर नाइट्रेट बनाती है तथा बहुत से अन्य खनिज तत्त्वों से मिलकर कई तरह के ऑक्साइड बनाती है; जैसे-आयरन ऑक्साइड, ऐलुमिनियम ऑक्साइड आदि । ऑक्सीजन की उत्पत्ति सूर्य प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान जल अणुओं के विघटन से होती है और पौधों की वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के द्वारा वायुमण्डल में पहुँचती है।।

नाइट्रोजन चक्र

नाइयेजन वायुमण्डल की संरचना का प्रमुख घटक है। वायमुण्डलीय गैसों में नाइट्रोजन का योगदान सर्वाधिक (79%) है। वायु में स्वतन्त्र रूप से पाई जाने वाली नाइट्रोजन को अधिकांश जीव प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं। इसे प्रत्यक्ष रूप से केवल कुछ विशिष्ट प्रकार के जीव ही गैसीय रूप में ग्रहण करते हैं जिसमें मृदा जीवाणु एवं ब्लू-ग्रीन एल्गी मुख्य हैं।
सामान्यतः नाइट्रोजन यौगिकीकरण द्वारा ही प्रयोग में लाई जाती है। वायुमण्डल में यह गैस मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया तथा सम्बन्धित पौधों की जड़ों व रन्ध्र वाली मृदा से वायु द्वारा पहुँचती है। वायुमण्डलीय नाइट्रोजन के इस तरह यौगिक रूप में उपलब्ध होने पर हरे पौधों में इसका स्वांगीकरण (Nitrogen assimilation) होता है (चित्र 15.2)। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा इन पौधों के खाने पर नाइट्रोजन का कुछ भाग उनमें चला जाता है। फिर मृत पौधों व जानवरों के नाइट्रोजनी अपशिष्ट (Excretion of Nitrogenous Wastes), मिट्टी में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा नाइट्राइट में परिवर्तित हो जाते हैं।
In simple words: ऑक्सीजन चक्र प्रकाश-संश्लेषण द्वारा बनता है और कार्बोहाइड्रेट्स के ऑक्सीकरण में शामिल होता है, जबकि नाइट्रोजन चक्र में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण सूक्ष्मजीवों और बिजली द्वारा होता है, जिसे पौधे अवशोषित करते हैं और फिर जीवों और अपघटकों के माध्यम से चक्रित होता है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन और नाइट्रोजन दोनों चक्रों में शामिल प्रमुख प्रक्रियाओं, उनके महत्व और प्रत्येक चक्र में शामिल मुख्य घटकों को समझें।

 

Question 2. पारिस्थितिक-तन्त्र (Ecosystem) से आप क्या समझते हैं। ये कितने प्रकार के होते हैं?
या टिप्पणी लिखिए-पारिस्थितिकी-तन्त्र ।
या पारिस्थितिक-तन्त्र की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर-पारिस्थितिकी 'पारिस्थितिकी' शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द 'OIKOS' से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-'घर' अथवा 'आवास । अतः इस आधार पर पारिस्थितिकी का अर्थ हुआ— जीव को घर या आवास । इस प्रकार जीव विज्ञान का वह भाग जिसके अन्तर्गत जीवों तथा उनके पर्यावरण की पारस्परिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, पारिस्थितिकी विज्ञान कहलाता है। जीव और पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को वातावरणीय जीव विज्ञान (Environmental Biology) भी कहा जाता है। एच० रेटर (H. Reiter) ने 'इकोलॉजी' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1868 ई० में किया था। जीव और उसका पर्यावरण प्रकृति के जटिल एवं गतिशील घटक हैं। पर्यावरण अनेक घटकों का समूह है। ये घटक जीवों को पारस्परिक क्रियाओं द्वारा प्रभावित करते रहते हैं। पारिस्थितिकी को अनेक विद्वानों ने परिभाषित किया है, जिनमें से कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-
ओडम (Odum) के अनुसार, “इकोसिस्टम पारिस्थितिकी की वह आधारभूत इकाई है जिसमें जैविक और अजैविक वातावरण एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हुए पारस्परिक अनुक्रिया से ऊर्जा और रासायनिक पदार्थों के निरन्तर प्रवाह से तन्त्र की कार्यात्मक गतिशीलता बनाये रखते हैं।”
“पारिस्थितिकी प्रकृति की अर्थव्यवस्था तथा प्राणियों के अपने अजैविक तथा जैविक पर्यावरण के साथ समस्त सम्बन्धों का अध्ययन है।” - हैकल
“पारिस्थितिकी पर्यावरण के सन्दर्भ में जीवों के अध्ययन का विज्ञान है।” -वार्मिंग
इस प्रकार उपर्युक्त परिभाषाओं से निष्कर्ष निकलता है कि पारिस्थितिकी जैविक तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन है। वास्तव में पृथ्वीतल पर पाये जाने वाले प्राणियों तथा जैविक एवं अजैविक पर्यावरण की सम्मिलित क्रिया-प्रतिक्रिया पारिस्थितिक-तन्त्र कहलाती है।

पारिस्थितिक-तन्त्र.

'इकोसिस्टम' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1935 में ए०जी० तांसले द्वारा किया गया था। उनके अनुसार, “पारिस्थितिक-तन्त्र पर्यावरण के सभी जीवित एवं निर्जीव कारकों के सम्पूर्ण सन्तुलन के परिणामस्वरूप बनी हुई प्रणाली है।”
विभिन्न विद्वानों द्वारा पारिस्थितिकी एवं पारिस्थितिक-तन्त्र (Ecosystem) के पर्याय शब्दों का प्रयोग

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख नाइट्रोजन चक्र को दर्शाता है, जिसमें वायुमंडलीय नाइट्रोजन, जैव यौगिकीकरण, औद्योगिक यौगिकीकरण, नाइट्रेट यौगिक और डीनाइट्रीकरण के बीच नाइट्रोजन के प्रवाह को दिखाया गया है। यह चक्र दर्शाता है कि नाइट्रोजन कैसे विभिन्न जैविक और अजैविक घटकों के बीच घूमती है।
कोई भी जैविक तत्त्व पर्यावरण के बिना जीवित नहीं रह सकता। उसका एक निश्चित पारिस्थितिक-तन्त्र होता है। स्वयं में हमारी पृथ्वी एक बहुत बड़ा पारिस्थितिक-तन्त्र है, जिसमें समस्त जीव समुदाय सूर्य से ऊर्जा प्राप्ति पर निर्भर करता है तथा भौतिक पर्यावरण जो भूतल पर पाया जाता है; अर्थात् स्थलमण्डल, वायुमण्डल एवं जलमण्डल में जीवनोपयोगी- समस्त तत्त्वों की प्राप्ति करता है। जलवायु जैविक तत्त्वों-प्राणी एवं पौधों के विचरण तथा उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करती है। प्राणी एवं पौधे स्वयं पारस्परिक रूप से पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार पर्यावरण और उसमें निवास करने वाले जीवधारी आपस में एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए एक तन्त्र बना लेते हैं। यही तन्त्र 'पारिस्थितिक-तन्त्र' (Ecosystem) कहलाता है।
प्रकृति में कोई भी जीवधारी एवं उसका समुदाय अकेले रहकर अपनी क्रियाओं का सम्पादन नहीं कर सकता, बल्कि प्रकृति में पाये जाने वाले एवं विचरण करने वाले सम्पूर्ण जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तथा एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार किसी क्षेत्र में कार्य करने वाले जैविक एवं अजैविक अंशों का सम्पूर्ण योग ही 'पारिस्थितिक-तन्त्र' कहलाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि “पारिस्थितिक-तन्त्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है।” इस प्रकार किसी क्षेत्र या प्रदेश विशेष में कार्यरत जैविक एवं अजैविक अंशों का पूर्ण योग ही पारिस्थितिक-तन्त्र कहलाता है। पारिस्थितिक-तन्त्र को वैज्ञानिकों ने निम्नलिखित प्रकार परिभाषित किया है
“पारिस्थितिक-तन्त्र पर्यावरण तथा समुदाय की क्रियात्मक समक्रिया है।” -क्लार्क
In simple words: पारिस्थितिक तंत्र एक क्रियात्मक इकाई है जिसमें सभी जीवित और निर्जीव घटक एक साथ मिलकर कार्य करते हैं, ऊर्जा और रासायनिक पदार्थों का निरंतर प्रवाह होता है, और यह पृथ्वी पर जीवों के विकास के लिए आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: पारिस्थितिक तंत्र की विभिन्न परिभाषाओं, उसके घटकों (जैविक और अजैविक) और उनकी अंतःक्रियाओं पर ध्यान दें।

 

Question 3. पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की समस्याओं का वर्णन कीजिए। या पारिस्थितिक-तन्त्र के असन्तुलन की समस्या की विवेचना कीजिए तथा उसके निराकरण के उपायों को प्रस्तावित कीजिए ।। या टिप्पणी लिखिए-पारिस्थितिक असन्तुलन ।
Answer: पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या मानव द्वारा पारिस्थितिक-तन्त्र का शोषण किया जाता है। इनमें प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीव-जन्तु, मत्स्य आदि प्रमुख हैं। अधिकतम खाद्यान्नों की प्राप्ति के लिए पारिस्थितिक-तन्त्र में अनेक परिवर्तन हुए। हैं जिससे सामान्य पारिस्थितिक-तन्त्र का विकास हुआ है। पारिस्थितिकीय असन्तुलन को पर्यावरण-प्रदूषण भी कहा जा सकता है। मानव प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करता है; जैसे-खानों से खनिजों का शोषण, भूगर्भ से खनिज तेल, वनों से लकड़ी की कटाई कर तथा अपने मनोरंजन के लिए। वन्य जीवों का आखेट कर पारिस्थितिकीय सन्तुलन को बिगाड़ता रहता है। पालतू पशुओं से दूध, मांस, ऊन तथा अन्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिससे उसकी भोजन-श्रृंखला छोटी हो गयी है। इससे इन पालतू पशुओं की संख्या में भी कमी होने लगी है तथा पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या ने जन्म ले लिया है। “पारिस्थितिक-तन्त्र के किसी भी घटक को वांछित एवं आवश्यक मात्रा से कम हो जाना अथवा अधिक हो जाना ही 'पारिस्थितिकीय असन्तुलन' कहलाता है तथा प्रत्येक घटक का उस अनुपात में रहना जिससे इस तन्त्र के अन्य घटकों पर कोई हानिकारक प्रभाव न पड़े 'पारिस्थितिक सन्तुलन कहलाता है।” पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब किसी सम्पूर्ण पोषण-स्तर का विनाश हो जाता है। यह स्थिति जीवों की कमी के कारण अथवा वैकल्पिक साधनों की कमी के कारण अथवा प्रदूषण के कारण हो सकती है।
1. प्रदूषण की समस्या-कृषि उत्पादन की सफलता फसलों द्वारा अपने पारिस्थितिक-तन्त्र के अनुकूलन पर निर्भर करती है। स्थानीय जलवायु दशाएँ फसलों का निर्धारण करती हैं। रासायनिक उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों में वृद्धि कर उत्पादन में भी वृद्धि के प्रयास किये गये हैं तथा अधिक उत्पादन देने वाली फसलें खोज ली गयी हैं। 'हरित क्रान्ति' ने खाद्यान्न उत्पादन में तो वृद्धि की है... परन्तु उर्वरकों के उत्पादन से प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है। मानव ने फसलों के क्षेत्रफल में वृद्धि की है जिसके कारण प्रेयरी, टैगा एवं स्टेप्स घास के मैदानों में प्राकृतिक वनस्पति में कमी हो गयी है। पादपों को कीटनाशकों से बचाव के लिए कीटनाशक दवाओं का अधिकाधिक उपयोग : किया जाने लगा है, परन्तु इनका अधिक उपयोग मानव के लिए हानिकारक है। इनसे मानव को। दूषित खाद्य सामग्री प्राप्त होती है। इन कीटनाशकों के उत्पादन काल में प्रदूषण की अनेक समस्याएँ जन्म लेती हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसका एक मुख्य उदाहरण है जिससे मानवता में। अपंगता ने जन्म लिया है।
2. जैव-प्रदूषण की समस्या-आदि काल से लेकर आज तक वनों का बड़ी निर्ममता से शोषण किया जाता रहा है। इससे वन-क्षेत्रों का ह्रास हुआ है। प्रारम्भ से ही विश्व के अनेक भागों में स्थानान्तरित अथवा शूमिंग कृषि पद्धति प्रचलित है। इस पद्धति के अन्तर्गत उर्वर भूमि को प्राप्त करने के लिए मानव वन-क्षेत्रों का शोषण कर उस पर कृषि करता है। जब इस भूमि की उर्वरता समाप्त हो जाती है तो इसे परती छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार वनों के निर्दयतापूर्वक शोषण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है तथा पारिस्थितिक-तन्त्र भी असन्तुलित हुआ है। वनों की कमी के कारण भू-अपरदने, अनावृष्टि, बाढ़ आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। अतः आज मानव के समक्ष अनेक प्रदूषण सम्बन्धी समस्याएँ विकराल रूप धारण कर गयी हैं। इसी कारण विश्व में वन-संरक्षण के प्रयास किये जा रहे हैं।
जलीय जीवों के प्राणों की रक्षा करना भी अति आवश्यक है। मत्स्य व्यवसाय पर ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है। मछली से मानव को प्रोटीन की प्राप्ति होती है। यदि मत्स्य व्यवसाय का विकास सुचारु रूप से नहीं हुआ तो खाद्यान्न में प्रोटीन की कमी हो जाएगी। विश्व में 3% मानव का भोजन पूर्ण रूप से मछली पर निर्भर करता है, जबकि नॉर्वे, न्यूफाउण्डलैण्ड एवं जापान सदृश देशों में 10% मानव मछली के ऊपर ही निर्भर करते हैं। इनकी कमी से खाद्य समस्या उत्पन्न हो सकती है। अतः इस ओर ध्यान दिये जाने की नितान्त आवश्यकता है।
3. जनाधिक्य की समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार-सन् 2010 में विश्व की जनसंख्या 6.9 अरब हो गयी है। सन् 2050 तक इसके 9.10 अरब हो जाने का अनुमान है। जनसंख्या की इस अतिशय वृद्धि के कारण वन क्षेत्रों एवं चरागाहों की कमी होती जा रही है। भोजन की समस्या के समाधान के लिए कृषि-क्षेत्रों का विस्तार किया जा रहा है जिस कारण वन एवं घास क्षेत्रों का विनाश किया जा रहा है जिससे पारिस्थितिक-तन्त्र में अन्तर उपस्थित हुआ है। इसके साथ ही आवास समस्या उत्पन्न हो गयी है। बस्तियों के विकास के लिए उत्पादक भूमि का अधिग्रहण होता जा रहा है।
इस प्रकार जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण अनेक समस्याएँ विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव होता जा रहा है। इससे प्रदूषण की अनेक समस्याओं ने जन्म लिया है। वायु, जल व मृदा प्रदूषण वर्तमान युग की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं। यह पारिस्थितिकीय असन्तुलन की स्थिति है। इससे आज मानव समुदाय को अनेक विषमताओं का सामना करना पड़ता है।
पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या का निवारण
पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की समस्या के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए
1. जनाधिक्य पर नियन्त्रण-आधुनिक युग में विश्व की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होती जा। रही है जिस पर नियन्त्रण किया जाना अति आवश्यक है। यदि जनसंख्या-वृद्धि उपलब्ध संसाधनों के अनुसार हो तो अधिक उपयुक्त रहेगा।
2. वन क्षेत्रफल में वृद्धि तथा उनका संरक्षण-प्रदूषण से बचाव के लिए वन क्षेत्रफल में वृद्धि किया जाना अति आवश्यक है। भारत में सामाजिक वानिकी तथा वन महोत्सव आदि कार्यक्रमों द्वारा वन क्षेत्रफल में वृद्धि के प्रयास किये जा रहे हैं। उत्तराखण्ड में श्री सुन्दर लाल बहुगुणा का 'चिपको आन्दोलन' भी इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
वन एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत है। यह वन्य जीवन के लिए अति आवश्यक है। पर्यावरणीय सन्तुलन को बनाये रखने के लिए वनों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। पौधे पर्यावरण से कार्बन डाइ-ऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन निःसृत करते हैं जिसका उपयोग जन्तुओं द्वारा श्वसन क्रिया में किया जाता है।
3. जल संसाधनों में वृद्धि एवं उनका संरक्षण-जल संसाधनों में वृद्धि किया जाना अति आवश्यक है। जब जल में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ, कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों तथा गैसों के एक निश्चित अनुपात में अधिक अथवा कम अनावश्यक एवं हानिकारक पदार्थ घुले होते हैं, तब जल का प्रदूषण हो जाता है। प्रदूषित जल का उपयोग करने से प्राणी समुदाय में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं; अतः ऐसे प्रयास किये जाने चाहिए कि जल का प्रदूषण न होने पाये।
जल संसाधनों में वृद्धि के लिए मत्स्य उत्पादक क्षेत्रों में जल प्रदूषणरहित होना चाहिए। जल-क्षेत्रों में जिन मछलियों की प्रजाति की कमी है, उनके पकड़ने पर रोक लगा देनी चाहिए; जैसे-सील, ह्वेल आदि। ऐसे प्रयास किये जाने चाहिए कि मछलियों की भोज्य-सामग्री वनस्पति एवं प्लैंकटन पर्याप्त मात्रा में पनपती रहे। इसके लिए इन क्षेत्रों में शुद्ध जल की प्राप्ति होना अति आवश्यक है। यह जल प्रदूषणरहित होना चाहिए। ऐसे क्षेत्र मछलियों के अक्षय भण्डार हो सकते हैं। मछली पकड़ने की विकसित तकनीक होनी चाहिए तथा उन्हें नियमित रूप से ही पकड़ा जाना चाहिए।
4. वन्य-प्राणियों का संरक्षण-वन्य जीवों में लगभग 350 जातियाँ स्तनधारियों की तथा 2,100 पक्षियों की होने के साथ-साथ लगभग 20,000 प्रजातियों कीटों की वन्य अवस्था में पायी जाती हैं। अतः पारिस्थितिक-तन्त्र में सन्तुलन बनाये रखने के लिए वन्य प्राणियों का संरक्षण अति आवश्यक है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपायों को कार्यरूप में परिणत किया जाना चाहिए
(i) वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए अभयारण्यों की स्थापना की जानी चाहिए।
(ii) वन्य जीवों के आवासीय स्थलों को संरक्षण दिया जाना चाहिए।
(iii) वन्य जीवों की विभिन्न जातियों को संरक्षण दिया जाना चाहिए।
(iv) नवीन वन्य जातियों को वन-क्षेत्रों में पालन-पोषण के प्रयास किये जाने चाहिए।
(v) सभी देशों में वन्य जीवों के आखेट पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाएँ तथा इनके अनुपालन के। लिए कठोर नियम एवं कानून होने चाहिए। इनका कठोरता से अनुपालन किया जाना चाहिए।
इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से निष्कर्ष निकलता है कि प्राणी-समुदाय के कल्याण एवं उसके पर्यावरण को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए पारिस्थितिक-तन्त्र को सन्तुलित बनाये रखना अति आवश्यक है।In simple words: Ecological imbalance arises from human activities like over-exploitation of natural resources and pollution. To restore balance, it's crucial to control population, increase forest cover, conserve water resources, and protect wildlife through various measures.

🎯 Exam Tip: Focus on understanding the causes of ecological imbalance (pollution, overpopulation, deforestation) and the corresponding solutions, detailing each point with relevant examples for higher scores.

 

Question 4. पारितन्त्र की कार्यप्रणाली एवं संरचना पर प्रकाश डालिए ।
Answer: पारितन्त्र की कार्यप्रणाली एवं संरचना पारिस्थितिकी की क्रियाशील इकाई पारिस्थितिक-तन्त्र होती है जिसमें जैव तथा अजैव पर्यावरण एक-दूसरे के गुणों से प्रभावित होते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। यह दोनों ही धरातल पर जीवन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। कोई भी जैव, अजैव पर्यावरण के बिना जीवित नहीं है। उसके जीवन का निश्चित तन्त्र पारिस्थितिक-तन्त्र द्वारा ही निर्धारित होता है।
संरचना की दृष्टि से पारितन्त्र में जैविक एवं अजैविक कारकों की सक्रिय भूमिका होती है। जैविक कारकों में उत्पादक-प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक, उपभोक्ता तथा अपघटक सम्मिलित हैं। अजैविक कारकों में तापमान, वर्षा, सूर्य का प्रकाश, आर्द्रता, मृदा की स्थिति एवं अकार्बनिक तत्त्व (कार्बन डाइ-ऑक्साइड, जल, नाइट्रोजन, कैल्सियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम आदि) सम्मिलित हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पारितन्त्र की संरचना और कार्यप्रणाली को दर्शाता है। इसमें सूर्य ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है, जिससे हरे पौधे (उत्पादक) अपना भोजन बनाते हैं। ऊर्जा फिर विभिन्न उपभोक्ता स्तरों - शाकाहारी (प्राथमिक), मांसाहारी (द्वितीयक) और शीर्ष मांसाहारी (तृतीयक) - से होकर गुजरती है। मृत अवशेष और अपघटक पोषक तत्वों को मृदा पोषक तत्वों में वापस लाते हैं, जिन्हें पौधे पुनः उपयोग करते हैं, जिससे एक चक्रीय ऊर्जा प्रवाह और पोषण श्रृंखला बनी रहती है।
ओडम के अनुसार, “पारिस्थितिक-तन्त्र, पारिस्थितिकी की वह आधारभूत इकाई है जिसमें जैविक और अजैविक वातावरण एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हुए पारस्परिक अनुक्रिया एवं ऊर्जा व रासायनिक पदार्थों के निरन्तर प्रवाह से तन्त्र की कार्यात्मक गतिशीलता बनाए रखते हैं।” (चित्र 15.3)। समुदाय के जैविक सदस्यों तथा उनके अजैविक वातावरण में ऊर्जा प्रवाह और खनिज पदार्थों के चक्र को पूरा करने के लिए निरन्तर रचनात्मक और कार्यात्मक पारस्परिक अनुक्रियाएँ होती रहती हैं, इन्हीं अनुक्रियाओं एवं कार्य-प्रणाली से पारितन्त्र संचालित होकर जीवों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।In simple words: An ecosystem functions as an interactive unit between living organisms (biotic) and their non-living environment (abiotic). Its structure involves producers, consumers (primary, secondary, tertiary), and decomposers, all of which are influenced by abiotic factors like sunlight, temperature, and nutrients, ensuring continuous energy flow and material cycling.

🎯 Exam Tip: When describing ecosystem structure and function, clearly differentiate between biotic (producers, consumers, decomposers) and abiotic components, and explain how energy flows and nutrients cycle through these components.

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