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Detailed Chapter 11 वायुमंडल में जल UP Board Solutions for Class 11 Geography
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Class 11 Geography Chapter 11 वायुमंडल में जल UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 11 Geography: Fundamentals Of Physical Geography Chapter 11 Water In The Atmosphere (वायुमंडल में जल)
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
Question (i). मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) जलवाष्प
(ख) धूलकण
(ग) नाइट्रोजन
(घ) ऑक्सीजन
Answer: (घ) ऑक्सीजन
In simple words: वायुमंडल में ऑक्सीजन गैस जीवन के लिए सबसे आवश्यक है क्योंकि यह श्वसन में उपयोग होती है।
🎯 Exam Tip: मानव जीवन के लिए वायुमंडल के विभिन्न घटकों के महत्व को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर ऑक्सीजन की भूमिका।
Question (ii). निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन-सी है जिसके द्वारा जल, द्रव से वाष्प में बदल जाता है?
(क) संघनन ।
(ख) वाष्पीकरणे
(ग) वाष्पोत्सर्जन
(घ) अवक्षेपण
Answer: (ख) वाष्पीकरण
In simple words: वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें तरल पानी गर्मी पाकर गैस यानी वाष्प में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: जल चक्र की प्रक्रियाओं, जैसे वाष्पीकरण और संघनन, को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
Question (ii). निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?
(क) सापेक्ष आर्द्रता
(ख) निरपेक्ष आर्द्रता
(ग) विशिष्ट आर्द्रता
(घ) संतृप्त हवा
Answer: (ख) निरपेक्ष आर्द्रता
In simple words: जब हवा अपनी पूरी क्षमता तक नमी धारण कर लेती है, तो उसे निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
🎯 Exam Tip: सापेक्ष और निरपेक्ष आर्द्रता के बीच के अंतर को समझना भूमंडलीय जलवायु को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question (iv). निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?
(क) पक्षाभ
(ख) वर्षा मेघ
(ग) स्तरी
(घ) कपासी
Answer: (क) पक्षाभ
In simple words: पक्षाभ बादल सबसे ऊँचाई पर बनने वाले, पतले और सफेद बादल होते हैं जो आमतौर पर अच्छे मौसम का संकेत देते हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के बादलों और उनकी ऊँचाई को पहचानना मौसम विज्ञान के अध्ययन में सहायक होता है।
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
Question (i). वर्षण के तीन प्रकारों के नाम लिखें ।
Answer: वर्षण के तीन प्रकारों के नाम निम्नलिखित हैं- 1. जलवर्षा, 2. हिमवर्षा, 3. ओलावृष्टि ।।
In simple words: वर्षण पानी के विभिन्न रूपों में पृथ्वी पर गिरने की प्रक्रिया है, जैसे बारिश, बर्फ या ओले।
🎯 Exam Tip: वर्षण के विभिन्न रूपों को याद रखना और उनके बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।
Question (ii). सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
Answer: वायु में निरपेक्ष या वास्तविक आर्द्रता एवं वायु के जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता का अनुपात । सापेक्ष आर्द्रता कहलाती है। यह सदैव प्रतिशत में मापी जाती है। अर्थात् दिए गए तापमान पर एक स्थान की वायु में जलवाष्प की मात्रा तथा उस वायु की जलवाष्प धारण करने की अधिकतम क्षमता के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं जिसे उक्त सूत्र से ज्ञात किया जाता है। इसे मापने हेतु आई बल्ब एवं शुष्क बल्ब तापमापी यन्त्र का प्रयोग किया जाता है।
In simple words: सापेक्ष आर्द्रता हवा में मौजूद नमी की मात्रा और उस तापमान पर हवा की अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता के बीच का प्रतिशत अनुपात है।
🎯 Exam Tip: सापेक्ष आर्द्रता की गणना और उसके दैनिक जीवन में प्रभावों को समझना महत्वपूर्ण है।
Question (iii). ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों घटती है?
Answer: ऊँचाई के साथ आर्द्र हवा जब ठण्डी होती है तब उसमें जलवाष्प को धारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। अतः ऊँचाई पर जाने पर हवा ठण्डी होने के कारण उसमें जलवाष्प की मात्रा तेजी से घटने लगती है, क्योंकि उपयुक्त तापमान के अभाव में हवा में जल धारण क्षमता नहीं रहती। इसीलिए ऊँचाई के साथ तापमान घटने के कारण जलवाष्प की मात्रा तेजी से घटती जाती है।
In simple words: ऊँचाई बढ़ने पर हवा ठंडी हो जाती है, जिससे उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता कम हो जाती है और वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा तेजी से घटती है।
🎯 Exam Tip: ऊँचाई के साथ तापमान और जलवाष्प की मात्रा के संबंध को समझना वायुमंडलीय प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
Question (iv). बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
Answer: बादल पानी की छोटी बूंदों या बर्फ के छोटे कणों की संहति है । बादलों की उत्पत्ति पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतन्त्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण होती है। बादलों को ऊँचाई, विस्तार, घनत्व तथा पारदर्शिता या अपारदर्शिता के आधार पर निम्नलिखित चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है1. पेक्षाभ मेघ, 2. कपासी मेघ, 3. स्तरी मेघ, 4. वर्षा मेघ ।
In simple words: बादल जलवाष्प के संघनित होने से हवा में छोटे पानी की बूंदों या बर्फ के कणों का समूह हैं, जिन्हें उनकी ऊँचाई और आकार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
🎯 Exam Tip: बादलों के निर्माण की प्रक्रिया (संघनन) और उनके मुख्य प्रकारों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
Question (i). विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
Answer: विश्व में वर्षा का वितरण सभी स्थानों पर समान नहीं है। धरातल की बनावट, जलवायु एवं पवनों की दिशा पर वर्षा की मात्रा परिवर्तित होती रहती है। विश्व में वर्षा के वितरण की मुख्य विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित हैं
1. विषुवत् वृत्ते से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा धीरे-धीरे घटती जाती है।
2. विश्व के तटीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के आन्तरिक भाग की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
3. विश्व के स्थलीय भागों की अपेक्षा सागरीय भागों में वर्षा अधिक होती है क्योंकि वहाँ जलस्रोतों की उपलब्धता के कारण वाष्पीकरण की क्रिया लगातार होती रहती है।
4. विषुवत् वृत्त से 35 से 40° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य पूर्वी तटों पर बहुत अधिक वर्षा होती है तथा पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है।
5. विषुवत् रेखा से 45° तथा 65° उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के मध्य पछुवा पवनों के कारण सबसे पहले महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर तथा फिर पूर्व की ओर घटती हुई दर से वर्षा होती है।
6. विश्व में जहाँ पर्वत तट के समानान्तर हैं, वहाँ वर्षा की मात्रा पवनाभिमुख तटीय मैदानों में अधिक | होती है जबकि प्रतिपवने दिशा की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है।
7. वार्षिक वर्षण के आधार पर वर्षा की कुल मात्रा के आधार पर विश्व में अधिक वर्षा के क्षेत्र | भूमध्य रेखा के निकट, मध्यम वर्षा के क्षेत्र 30° से 60° अक्षांश दोनों गोलार्द्ध में तथा कम वर्षा के क्षेत्र ध्रुवीय पेटी में स्थित हैं।
In simple words: विश्व में वर्षा का वितरण असमान है, जो भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर घटती है और तटीय व पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक होती है, जबकि मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम।
🎯 Exam Tip: विश्व में वर्षा के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों (जैसे अक्षांश, पर्वत, तटरेखा) को मानचित्र पर पहचानना और समझाना महत्वपूर्ण है।
Question (i). संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
Answer: जलवाष्प का जल के रूप में बदलना संघनन कहलाता है। वास्तव में ऊष्मा का ह्रास ही संघनन का कारण होता है। संघनन के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
(i) ओस, (ii) तुषार, (ii) कुहासा, (iv) बादल।
ओस-जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केन्द्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु; जैसेपत्थर, घास तथा पौधों की पत्तियों की ठण्डी सतह पर पानी के सूक्ष्म कणों के रूप में एकत्र हो जाती है। तो उसे ओस कहते हैं। ओस के बनने के लिए यह आवश्यक है कि ओसांक जमाव बिन्दु से ऊपर हो । ओस के बनने में साफ आकाश, शान्त हवा, उच्च सापेक्ष आर्द्रता तथा ठण्डी एवं लम्बी रातें उपयुक्त दशाएँ मानी जाती हैं।
तुषार-तुषार या पाला अथवा हिमकण भी संघनने प्रक्रिया का ही परिणाम है। जब संघनन क्रिया के समय भूमि के निकट की वायु का तापमान हिमांक बिन्दु (0°C) तक नीचे गिर जाता है तो पौधों एवं भूमि की सतह पर उपस्थित जल जमने लगता है, यही तुषार या पाला कहलाता है। सफेद तुषार के बनने की सबसे उपयुक्त दशाएँ ओस के बनने की दशाओं के समान हैं, किन्तु इसमें केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना आवश्यक है।
In simple words: संघनन जलवाष्प का पानी में बदलना है, जिसके प्रकार ओस, तुषार, कुहासा और बादल हैं। ओस तब बनती है जब पानी की बूंदें ठंडी सतहों पर जमती हैं, जबकि तुषार तब बनता है जब तापमान 0°C से नीचे गिर जाता है और पानी बर्फ में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: संघनन के विभिन्न रूपों और उनके बनने के लिए आवश्यक विशिष्ट परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन परीक्षा में अच्छे अंक दिला सकता है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. वायुमण्डल से जल हमें किस रूप में प्राप्त होता है? |
(क) जल
(ख) जल एवं हिम
(ग) जल, हिम, पाला।
(घ) जल, हिम, पाला, ओस
Answer: (ख) जल एवं हिम
In simple words: हमें वायुमंडल से पानी मुख्य रूप से तरल (जल) और ठोस (हिम) रूपों में प्राप्त होता है।
🎯 Exam Tip: वर्षण के मूलभूत रूपों को जानना और उनके प्राकृतिक उदाहरणों को पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 2. निम्नलिखित में से किस प्रदेश में प्रमुख रूप से संवाहनिक वर्षा होती है?
(क) भूमध्यसागरीय प्रदेश ।
(ख) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(ग) टैगा प्रदेश
(घ) टुण्ड्रा प्रदेश
Answer: (ख) भूमध्यरेखीय प्रदेश
In simple words: संवाहनिक वर्षा मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय प्रदेशों में होती है जहाँ तीव्र सूर्यताप के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वर्षा के प्रकारों और उनके कारणों को समझना जलवायु विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3. निम्नलिखित वर्षा-प्रकारों में से कौन विषुवतरेखीय प्रदेशों में पायी जाती है?
(क) प्रतिचक्रवातीय वर्षा
(ख) चक्रवातीय वर्षा
(ग) पर्वतीय वर्षा ।
(घ) संवहनीय वर्षा
Answer: (घ) संवहनीय वर्षा
In simple words: विषुवतरेखीय प्रदेशों में अत्यधिक गर्मी के कारण हवा ऊपर उठकर संवहनीय वर्षा करती है।
🎯 Exam Tip: विषुवतरेखीय क्षेत्रों की जलवायु विशेषताओं को याद रखें, विशेषकर संवहनीय वर्षा के संदर्भ में।
Question 4. संवहनीय वर्षा विशिष्ट विशेषता है
(क) चीन तुल्य जलवायु की ।
(ख) भूमध्यरेखीय जलवायु की
(ग) भूमध्यसागरीय जलवायु की
(घ) पश्चिम यूरोपीय जलवायु की
Answer: (ख) भूमध्यरेखीय जलवायु की
In simple words: संवहनीय वर्षा भूमध्यरेखीय जलवायु की एक प्रमुख विशेषता है, जो दैनिक और तीव्र होती है।
🎯 Exam Tip: भूमध्यरेखीय जलवायु की मुख्य विशेषताओं और वहां होने वाली वर्षा के प्रकार को पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 5. वृष्टिछाया प्रदेश किससे सम्बन्धित है?
(क) संवाहनिक वर्षा ।
(ख) चक्रवातीय वर्षा
(ग) पर्वतीय वर्षा
(घ) प्रतिचक्रवतीय वर्षा
Answer: (ग) पर्वतीय वर्षा
In simple words: वृष्टिछाया प्रदेश उन क्षेत्रों को कहते हैं जो पहाड़ों की हवा के विपरीत दिशा में होते हैं, जहाँ नमी वाली हवा नहीं पहुँच पाती और वर्षा कम होती है।
🎯 Exam Tip: पर्वतीय वर्षा की प्रक्रिया और वृष्टिछाया प्रदेशों के निर्माण को समझना भू-आकृति विज्ञान और जलवायु विज्ञान दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. संघनन से क्या तात्पर्य है?
Answer: वायु में उपस्थित जलवाष्प का ताप गिरने पर जब उसका घनीभवन होता है तब उसे संघनन कहते हैं।
In simple words: संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडल में मौजूद पानी की वाष्प ठंडी होकर तरल पानी की बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल में बदल जाती है।
🎯 Exam Tip: संघनन की सरल परिभाषा और जल चक्र में इसकी भूमिका को याद रखें।
Question 2. संघनन के कौन-कौन से रूप होते हैं?
Answer: ओस, पाला, कोहरा, ओले, मेघ, वर्षा, हिम आदि संघनन के विविध रूप हैं।
In simple words: संघनन के विभिन्न रूप वे प्राकृतिक घटनाएँ हैं जिनमें जलवाष्प के ठंडा होने पर पानी या बर्फ के अलग-अलग रूप बनते हैं, जैसे ओस या बादल।
🎯 Exam Tip: संघनन के विभिन्न उत्पादों को सूचीबद्ध करना और उनके बनने की स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है।
Question 3. संवाहनिक वर्षा क्या है ?
Answer: धरातल पर ऊष्मा की अधिकता के कारण वायुमण्डल में उत्पन्न संवहनीय धाराओं द्वारा होने वाली वर्षा संवाहनिक वर्षा कहलाती है।
In simple words: संवाहनिक वर्षा तब होती है जब सूरज की गर्मी से जमीन गर्म होती है, जिससे हवा ऊपर उठती है, ठंडी होती है, बादल बनाती है और फिर बारिश करती है।
🎯 Exam Tip: संवाहनिक वर्षा की प्रक्रिया और उन क्षेत्रों को समझें जहाँ यह आमतौर पर होती है।
Question 4. चक्रवातीय वर्षा का क्षेत्र बेताइए ।
Answer: आयन रेखाओं तथा मध्य अक्षांशों में अधिकांश वर्षा चक्रवातों द्वारा ही होती है। उत्तरी भारत भी चक्रवातीय वर्षा का क्षेत्र है।
In simple words: चक्रवातीय वर्षा मुख्य रूप से मध्य अक्षांशों में होती है जहाँ ठंडी और गर्म हवाएँ मिलती हैं, जिससे चक्रवात बनते हैं और बारिश होती है, जैसे उत्तरी भारत में सर्दियों में।
🎯 Exam Tip: चक्रवातीय वर्षा के भौगोलिक वितरण और संबंधित वायुमंडलीय स्थितियों को पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 5. संवहनीय वर्षा का क्षेत्र बतलाइए ।
Answer: संवहनीय वर्षा अधिकतर अपराह्न में होती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र में शान्त पेटी (डोलड्रम) में अधिकांशतः संवहनीय वर्षा ही होती है।
In simple words: संवहनीय वर्षा मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में और दोपहर के समय होती है, जहाँ तीव्र गर्मी के कारण हवा ऊपर उठती है।
🎯 Exam Tip: संवहनीय वर्षा के विशिष्ट समय और स्थान को याद रखना और इसे अन्य प्रकार की वर्षा से अलग करना महत्वपूर्ण है।
Question 6. विश्व में औसत वार्षिक वर्षा के वितरण सम्बन्धी दो महत्त्वपूर्ण तथ्य बतलाइए।
Answer: 1. भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा न्यून होती जाती है। 2. भूमध्यरेखीय कटिबन्ध तथा शीत-शीतोष्ण कटिबन्धों के पश्चिमी भागों में वर्षा का वितरण वर्षभर समान रहता है।
In simple words: विश्व में वर्षा का वितरण भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर घटता जाता है, और भूमध्यरेखीय तथा शीत-शीतोष्ण कटिबंधों के पश्चिमी भागों में पूरे साल लगभग समान वर्षा होती है।
🎯 Exam Tip: वर्षा के वैश्विक वितरण के पैटर्न को समझना और इन दो प्रमुख तथ्यों को याद रखना भूगोल में उच्च स्कोर के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 7. वाष्पीकरण को परिभाषित कीजिए।
Answer: जल के तरल रूप से गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।
In simple words: वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें पानी गर्मी के कारण तरल से गैस (वाष्प) में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: वाष्पीकरण की सटीक परिभाषा और जल चक्र में उसकी भूमिका को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 8. कोहरे के कौन-कौन से तीन प्रकार हैं?
Answer: कोहरे के तीन प्रकार हैं-1. विकिरण कोहरा, 2. अभिवहन कोहरा, 3. वाताग्री कोहरा ।
In simple words: कोहरा जलवाष्प के संघनन से बनता है और इसके मुख्य प्रकार विकिरण कोहरा, अभिवहन कोहरा और वाताग्री कोहरा हैं, जो बनने की विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
🎯 Exam Tip: कोहरे के विभिन्न प्रकारों और उनके बनने के कारणों को समझना मौसम संबंधी घटनाओं को समझने में मदद करता है।
Question 9. धूम्र कोहरा क्या है?
Answer: ऐसी स्थिति जिसमें कोहरा तथा धुआँ सम्मिलित रूप से बनते हैं धूम्र कोहरा कहलाती है। यह स्थिति नगरों एवं औद्योगिक केन्द्रों में धुएँ की अधिकता के कारण केन्द्रकों की मात्रा की अधिकता के कारण उत्पन्न होती है।
In simple words: धूम्र कोहरा (स्मॉग) वह स्थिति है जहाँ कोहरा और धुआँ मिलकर वायु प्रदूषण का एक घना रूप बनाते हैं, खासकर शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में।
🎯 Exam Tip: धूम्र कोहरे की परिभाषा और इसके शहरी/औद्योगिक संदर्भ को याद रखना पर्यावरणीय भूगोल के लिए प्रासंगिक है।
Question 10. कुहासे एवं कोहरे में क्या अन्तर है?
Answer: कुहासे एवं कोहरे में अत्यन्त सूक्ष्म अन्तर होता है। कुहासे में कोहरे की अपेक्षा नमी अधिक होती है। कुहासा पहाड़ों पर अधिक पाया जाता है, जबकि कोहरा मैदानों में अधिक पाया जाता है।
In simple words: कुहासा और कोहरा दोनों ही धुंध के रूप हैं, लेकिन कुहासे में नमी अधिक होती है और यह अक्सर पहाड़ों पर दिखता है, जबकि कोहरा मैदानों में अधिक सामान्य है।
🎯 Exam Tip: कुहासे और कोहरे के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना और उनके विशिष्ट भौगोलिक स्थानों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. आर्द्रता किसे कहते हैं?
Answer: वायुमण्डल में निहित जलवाष्प विशाल महासागरों, झीलों, नदियों अथवा पेड़-पौधों से प्राप्त होती है। प्रतिदिन धरातल का जल सूर्य की गर्मी से वाष्प के रूप में परिवर्तित होता रहता है। वायु में विद्यमाने वाष्प ही उसकी आर्द्रता कहलाती है। वायु में वाष्प ग्रहण करने की शक्ति बहुत अंशों में उसके तापमान पर निर्भर करती है। वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसमें वाष्प धारण करने की शक्ति उतनी ही बढ़ जाएगी। उदाहरणार्थ-यदि एक घन फुट वायु के तापमान को 0° से 5° सेग्रे अर्थात् 5° सेग्रे बढ़ा दिया जाए तो उस वायु में केवल 1 ग्रेन वाष्प धारण करने की शक्ति बढ़ती है। परन्तु यदि 32° सेग्रे तापमान वाली वायु को 5.5° सेग्रे से बढ़ाकर 37.5° सेग्रे कर दिया जाए तो वह 5 ग्रेन वाष्प धारण करने योग्य हो जाती है। यही कारण है कि शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में वायु अधिक वाष्प ग्रहण कर सकती है जिससे गर्मियों में अधिक वर्षा होती है। वायु में वाष्प की मात्रा उसके तापमान के अतिरिक्त जल और स्थल के विस्तार तथा पवनों की किसी स्थान तक पहुँच पर निर्भर करती है। इसे सदैव प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
In simple words: आर्द्रता वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की मात्रा को संदर्भित करती है, जो मुख्य रूप से महासागरों और पौधों से आती है। वायु की जलवाष्प धारण करने की क्षमता उसके तापमान पर निर्भर करती है - जितना गर्म, उतनी अधिक वाष्प।
🎯 Exam Tip: आर्द्रता की परिभाषा, उसके स्रोत और तापमान के साथ उसके संबंध को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 2. आर्द्रता एवं सापेक्ष आर्द्रता से क्या तात्पर्य है?
Answer: आर्द्रता-आर्द्रता से तात्पर्य वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा से है। आर्द्रता को कई प्रकार से व्यक्त किया जाता है; जैसे-सापेक्ष आर्द्रता, निरपेक्ष आर्द्रता एवं अधिकतम आर्द्रता । आर्द्रता में क्षैतिज एवं लम्बवत् अन्तर पाया जाता है। किसी स्थान-विशेष पर किसी विशिष्ट समय में वायु में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे वास्तविक आर्द्रता भी कहा जाता है। इसे ग्रेन प्रति घन फुट या ग्राम प्रति घन सेमी द्वारा व्यक्त किया जाता है। सोपक्ष आर्द्रता-वायु में निरपेक्ष या वास्तविक आर्द्रता एवं वायु के जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता का अनुपात सापेक्ष आर्द्रता कहलाती है। यह सदैव प्रतिशत में मापी जाती है।
In simple words: आर्द्रता वायुमंडल में जलवाष्प की कुल मात्रा है। निरपेक्ष आर्द्रता किसी निश्चित स्थान पर वास्तविक जलवाष्प को मापती है, जबकि सापेक्ष आर्द्रता बताती है कि हवा अपनी अधिकतम क्षमता की तुलना में कितनी नमी धारण कर रही है, जिसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
🎯 Exam Tip: आर्द्रता के विभिन्न रूपों, विशेषकर निरपेक्ष और सापेक्ष आर्द्रता के बीच के अंतर को समझना और उनकी माप की इकाइयों को याद रखना आवश्यक है।
Question 3. बादल या मेघ का क्या अर्थ है? ये कैसे बनते हैं?
Answer: मेघ वास्तव में वायुमण्डल में धूलकणों पर रुके हुए जल-बिन्दुओं का समूह मात्र है। तापमान के अत्यन्त कम होने पर वायु की अतिरिक्त जलवाष्प सूक्ष्म जल की बूंदों में बदल जाती है, जिसे संघनन (Condensation) कहते हैं। जिस ताप पर संघनन आरम्भ होता है, उसे ओसांक (Dew point) कहते । हैं। यदि ओसांक 0° सेल्सियस से ऊपर आ जाता है तो जलवाष्प सूक्ष्म जल की बूंदों में बदल जाती है और यदि 0° सेल्सियस (हिमांक) पर ओसांक आता है तो जलवाष्प सूक्ष्म हिमकणों में अर्थात् पाले के रूप में बदल जाती है। यही हिमकण तथा जल-सीकर कुहरे के रूप में वायुमण्डल में दिखलाई पड़ते हैं। जब ये एक विस्तृत क्षेत्रफल में विशाल रूप धारण कर ऊँचाई पर सघन रूप में एकत्रित हो जाते हैं, तो इन्हें मेघ या बादल कहा जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र संवहनीय वर्षा की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें धरातल से गर्म वायु ऊपर उठती है, ठंडी होकर मेघों का निर्माण करती है, जो अंततः वर्षा के रूप में नीचे गिरते हैं। इस प्रक्रिया में नदी और समुद्र से वाष्पीकरण होता है, जिससे आर्द्रता वायुमंडल में पहुंचती है।
सामान्यतया मेघ धूलकणों पर स्थित जलकण अथवा हिमकणों के विशाल आकार हैं, जो वायुमण्डल में अक्षांशों के अनुसार भिन्न-भिन्न ऊँचाइयों पर स्थापित हो जाते हैं। इन मेघों की ऊँचाई कटिबन्धों के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है।
In simple words: बादल धूलकणों के चारों ओर जमा हुए पानी की बूंदों या बर्फ के कणों के विशाल समूह हैं। ये तब बनते हैं जब जलवाष्प पर्याप्त रूप से ठंडी होकर संघनित होती है, और तापमान के आधार पर पानी की बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल में बदल जाती है।
🎯 Exam Tip: बादलों के निर्माण की प्रक्रिया (संघनन और ओसांक) और उनकी परिभाषा को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है, साथ ही उनके प्रकारों को भी।
Question 4. संघनन क्या है? इसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बतलाइए।
Answer: जलवाष्प के घनीभूत होकर जल में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। संघनन आई वायु के ठण्डा होने पर होता है। संघनन प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं
1. जब वायु का तापमान ओसांक तक पहुँच जाता है।
2. जब वायु का आयतन ऊष्मा की मात्रा बढ़ाए बिना बढ़ जाए ।
3. जब वायु की आर्द्रता धारण क्षमता घटकर वायु में उपस्थित आर्द्रता की मात्रा से कम हो जाए।
4. जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा मिला दी जाए।
In simple words: संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडलीय जलवाष्प ठंडी होकर तरल पानी या बर्फ में बदल जाती है। इसके लिए हवा का ओसांक तक ठंडा होना, हवा में नमी की संतृप्ति और वाष्पीकरण से अतिरिक्त जलवाष्प का होना अनुकूल परिस्थितियाँ हैं।
🎯 Exam Tip: संघनन की परिभाषा के साथ-साथ उसकी अनुकूल परिस्थितियों को बिंदुवार समझाना परीक्षा में अच्छे अंक दिला सकता है।
Question 5. वर्षा और वर्षण में अन्तर लिखिए ।
Answer: वर्षा-यह वर्षण का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें बादलों के जल-वाष्प कण संघनित होकर जल की बूंदों या हिमकणों के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरते हैं। जलवर्षा तथा हिमवर्षा इसके दो रूप हैं।
वर्षण-यह एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वायुमण्डल की आर्द्रता संघनित होकर वर्षा, हिम, ओला, पाला आदि रूपों में धरातल पर गिरती है। जल-वर्षा, वर्षण का एक साधारण रूप है। हिमवृष्टि, ओलावृष्टि, हिमपात आदि इसके अनेक रूप हैं।
In simple words: वर्षण पानी के किसी भी रूप में पृथ्वी पर गिरने की व्यापक प्रक्रिया है (जैसे वर्षा, हिम, ओले), जबकि वर्षा वर्षण का एक विशिष्ट रूप है जिसमें पानी तरल बूंदों के रूप में गिरता है।
🎯 Exam Tip: वर्षा और वर्षण के बीच के मूल अंतर को उनकी व्यापकता और विशिष्टता के संदर्भ में स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 6. निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता में अन्तर बताइए ।
Answer: निरपेक्ष आर्द्रता एवं सापेक्ष आर्द्रता में अन्तर
| क्र०सं० | निरपेक्ष आर्द्रता | सापेक्ष आर्द्रता |
|---|---|---|
| 1. | हवा के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। | किसी स्थान की वायु में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा तथा उसी स्थान की वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा का अनुपात सापेक्ष आर्द्रता कहलाता है। |
| 2. | निरपेक्ष आर्द्रता को ग्राम प्रति घन सेमी में व्यक्त किया जाता है। | सापेक्ष आर्द्रता प्रतिशत में व्यक्त की जाती है। |
| 3. | निरपेक्ष आर्द्रता पर तापमान के घटने व बढ़ने का प्रभाव नहीं पड़ता है। | सापेक्ष आर्द्रता पर तापमान घटने व बढ़ने का प्रभाव पड़ता है अर्थात् तापमान के बढ़ने पर वायु में वाष्प ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा ताप घटने पर क्षमता कम हो जाती है। |
In simple words: निरपेक्ष आर्द्रता हवा में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा है जिसे प्रति घन सेमी में मापा जाता है और यह तापमान से प्रभावित नहीं होती। सापेक्ष आर्द्रता हवा की कुल जलवाष्प क्षमता के सापेक्ष मौजूद जलवाष्प की मात्रा है, जिसे प्रतिशत में मापा जाता है और यह तापमान बढ़ने पर घटती है।
🎯 Exam Tip: निरपेक्ष और सापेक्ष आर्द्रता के बीच के अंतर को एक स्पष्ट तालिका के माध्यम से प्रस्तुत करना और उनके माप व तापमान पर निर्भरता को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 7. वर्षण या वृष्टि से क्या अभिप्राय है? इसके दो रूपों का विवरण दीजिए ।
Answer: वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसों के साथ-साथ जलवाष्प भी विद्यमान रहती है। वायुमण्डल में व्याप्त इस जलवाष्प को ही वायुमण्डल की आर्द्रता कहते हैं। भूमण्डल पर ओस, बादल, हिमपात, कुहरा, तुषार तथा वर्षा आदि इसी आर्द्रता की देन हैं, जिन्हें वर्षण तथा वृष्टि कहा जाता है।
वर्षण के रूप
वर्षण के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन निम्नलिखित है 1. हिमपात-जब कभी वायुमण्डल का तापमान ओसांक बिन्दु से भी कम हो जाता है, तो उसमें उपस्थित जलवाष्प जल में परिणत न होकर सीधे हिम के रवों के रूप में संघनित हो जाती है। भूतल पर ये रवे हिमकणों के रूप में गिर जाते हैं। वर्षण का यह स्वरूप 'हिमपात' कहलाता है।
2. हिमवर्षा-जब जल की बूंदें भूप्रष्ठ के समीप की वायु की बहुत शीतल परतों से होकर गुजरती हैं, तब जलवाष्प हिम (बर्फ) बनकर नीचे गिरती है। वर्षण का यह रूप हिमवृष्टि या हिमवर्षा कहलाता है। उच्च अक्षांशों तथा उच्च पर्वतीय प्रदेशों में हिमवर्षा ही होती है।
In simple words: वर्षण या वृष्टि वायुमंडल में जलवाष्प के संघनित होकर विभिन्न रूपों (जैसे ओस, बादल, वर्षा, हिमपात) में पृथ्वी पर लौटने की प्रक्रिया है। इसके दो मुख्य रूप हिमपात हैं, जहाँ जलवाष्प सीधे बर्फ के कणों में बदल जाती है, और हिमवर्षा है, जहाँ पानी की बूंदें ठंडी परतों से गुजरकर बर्फ बन जाती हैं।
🎯 Exam Tip: वर्षण की परिभाषा के साथ-साथ हिमपात और हिमवर्षा के बनने की प्रक्रिया और उनके बीच के अंतर को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 8. उन नियन्त्रक कारकों का वर्णन कीजिए जो वाष्पीकरण एवं वाष्पोत्सर्जन की क्रिया की दर को नियन्त्रित करते हैं।
Answer: वाष्पीकरण वह क्रिया है जिसके द्वारा जल द्रव अवस्था से वाष्पीय अवस्था में परिवर्तित होता है। वाष्पीकरण निम्नलिखित कारकों पर निर्भर है
1. तापमान तापमान बढ़ने पर वाष्पीकरण की गति अधिक हो जाती है। यही कारण है कि उष्ण कटिबन्ध में अन्य ताप-क्षेत्रों की अपेक्षा वाष्पीकरण अधिक होता है।
2. पवन वेग-पवन का वेग जितना अधिक होता है, वाष्पीकरण भी उतना ही अधिक होता है।
3. वायु की शुष्कता-वायु जितनी अधिक शुष्क होती है, वाष्पीकरण उतना ही तीव्र गति से होता है। वर्षा के दिनों में वायु आर्द्र होती है, इसलिए वर्षा ऋतु में वाष्पीकरण कम होता है।
वाष्पोत्सर्जन-इस प्रक्रिया के अन्तर्गत आर्द्रता की मात्रा तरल पदार्थों के साथ-साथ जीवित प्राणियों; जैसे-पेड़-पौधे आदि से भी प्राप्त होती है। वाष्पोत्सर्जन उन क्षेत्रों में अधिक होता है जहाँ वर्षा तथा वनस्पति अधिक पाई जाती है। भूमध्यरेखा के 10° उत्तर एवं 10° दक्षिण में ऐसे क्षेत्र स्थित हैं।
In simple words: वाष्पीकरण जल का तरल से वाष्प में बदलना है, जो तापमान, पवन वेग और वायु की शुष्कता से नियंत्रित होता है। वाष्पोत्सर्जन पौधों द्वारा जलवाष्प का उत्सर्जन है, जो अधिक वर्षा और वनस्पति वाले क्षेत्रों में अधिक होता है।
🎯 Exam Tip: वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन को नियंत्रित करने वाले कारकों को बिंदुवार समझाना और उनके प्रभाव को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. वर्षा के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं? प्रत्येक की उत्पत्ति के कारण समझाइए ।
या वर्षा के प्रमुख प्रकारों के नाम बताइए। संवहनीय वर्षा की उत्पत्ति समझाइए तथा उसका विश्व वितरण बताइए ।
या विश्व में वर्षा के असमान वितरण की व्याख्या कीजिए तथा उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए ।
Answer: वर्षा अथवा वृष्टि वायुमण्डल से जल हमें दो रूपों में प्राप्त होता है- तरल एवं ठोस । जल की प्राप्ति को ही वर्षा या वृष्टि कहते हैं। वर्षा धरातल पर जल, हिम, फुहार तथा ओलों के रूप में प्राप्त होती है। कोहरा, ओस तथा तुषार आदि भी वर्षा के ही रूप हैं, परन्तु इनमें वर्षा को अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। वर्षा की मात्रा वायुमण्डलीय आर्द्रता पर निर्भर करती है। वाष्प की यह मात्रा संघनित होकर जल-कणों में परिवर्तित हो जाती है। वायुमण्डल में जब इन जल-कणों की अधिकता हो जाती है तो यह कण घनीभूत होकर वर्षा के रूप में धरातल पर टपकना आरम्भ कर देते हैं। वर्षा निम्नलिखित तथ्यों पर निर्भर करती है
1. वायुमण्डल में पर्याप्त मात्रा में जलवाष्प की उपस्थिति ।
2. जल-सीकरों के आकार में वृद्धि होना ।
3. जलवाष्प की संघनन प्रक्रिया का तीव्रता से होना, जो निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है
• अधिक तापमान के कारण वायु का हल्की होकर ऊपर फैलना,
• ध्रुवीय प्रदेशों से उष्ण प्रदेशों की ओर वायु का प्रवाहित होना एवं
• निम्न वायुदाब का उच्च वायुदाब से मिलन तथा उसका ठण्डी जलधाराओं के सम्पर्क में आना।
वर्षा के प्रकार
जलवाष्पयुक्त वायुराशियों की संघनन प्रक्रिया के फलस्वरूप धरातल की वर्षा भिन्न-भिन्न रूपों में प्राप्त होती है। वर्षा के निम्नलिखित तीन स्वरूप पाये जाते हैं
1. संवहनीय वर्षा-धरातल पर ऊष्मा की अधिकता के कारण वायुमण्डल में उत्पन्न संवहनीय धाराओं द्वारा होने वाली वर्षा को संवहनीय वर्षा कहते हैं। इस प्रकार की वर्षा उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में अत्यधिक गर्मी के कारण होती है। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में प्रतिदिन वायु गर्म होकर ऊपर उठती है तथा वायुमण्डल में फैल जाती है एवं समीपवर्ती वायु आकर इसका स्थान ले लेती है। कुछ समय बाद जलद मेघों का निर्माण होता है। वायुमण्डल में ऊपर उठी वायु ठण्डी होकर सीकरों में बदल जाती है। इस प्रकार स्थानीय ताप के प्रभाव के कारण वायुमण्डल में संवहन क्रिया आरम्भ हो जाती है। इन प्रदेशों में तीव्र गर्जन-तर्जन एवं बिजली की गड़गड़ाहट के साथ घनघोर वर्षा होती है । विषुवत्रेखीय प्रदेशों में इसी प्रक्रिया द्वारा वर्षा होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र संवहनीय वर्षा की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें गर्म और आर्द्र वायु ऊपर उठती है, ठंडी होकर संघनित होती है और मेघों का निर्माण करती है, जिससे वर्षा होती है।
2. पर्वतीय वर्षा-निम्न वायुभार उच्च वायुभार को अपनी ओर आकर्षित करता है। यदि उच्च वायुभार किसी जलाप्लावित क्षेत्र से होकर गुजरता है तो यह आर्द्रता ग्रहण कर लेता है। जब इनके मार्ग में कोई पर्वत शिखर | या पठार अवरोध के रूप में उपस्थित हो जाता है तो वायु । घनीभूत होकर वर्षा करती है। पर्वतीय वर्षा उस समय होती है जब वायुमण्डल में आर्द्रता की मात्रा अधिकतम होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पर्वतीय वर्षा की प्रक्रिया को दिखाता है, जिसमें उष्णार्द्र वायु पहाड़ से टकराकर ऊपर उठती है और मेघों का निर्माण करती है, जिससे वर्षा होती है। पहाड़ के विपरीत ढाल पर 'वृष्टि छाया प्रदेश' बनता है जहाँ वर्षा कम होती है।
मध्यवर्ती अक्षांशों में शरद् एवं शीत ऋतु के प्रारम्भ में तथा मानसूनी प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में इसी प्रकार की वर्षा होती है। इसे पर्वतकृत वर्ष भी कहते हैं। वायु अवरोध के सामने वाले भागों में अत्यधिक वर्षा होती है, जब कि विमुख भाग में वर्षा कम होती जाती है, क्योंकि यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वायु में आर्द्रता बहुत ही कम हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों को वृष्टिछाया प्रदेश (Rain-Shadow Region) के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार की वर्षा में कुछ अन्य प्रत्यक्ष कारक भी अपना प्रभाव डालते हैं। दिन में पर्वतों के ढाल तथा घाटियाँ गर्म हो जाती हैं जिससे वायुमण्डल में संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कभी-कभी इनके शीतलन से भी वर्षा हो जाती है। इस प्रकार पर्वतीय वर्षा पर धरातलीय बनावट का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
3. चक्रवातीय वर्षा-जब विपरीत दिशाओं की शीतल एवं उष्ण वायुराशियाँ किसी स्थान पर एकत्रित होने लगती हैं तो वायु में अभिसरण की दशा उत्पन्न । इससे वायुराशियाँ ऊपर की ओर उठती हैं तथा इनमें अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है। इनसे कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा बौछारों के रूप में वर्षा होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र चक्रवातीय वर्षा की प्रक्रिया को दर्शाता है, जहाँ ठंडी और गर्म वायुराशियाँ एक सीमाग्र रेखा पर मिलती हैं, जिससे गर्म वायु ऊपर उठती है, मेघों का निर्माण होता है और वर्षा होती है।
शीत एवं शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में चक्रवातीय वर्षा होती है। उष्ण कटिबन्ध में ग्रीष्म ऋतु में चक्रवातों से वर्षा होती है। विषुवत्रेखीय प्रदेशों में विभिन्न वायुराशियों में तापमान, आर्द्रता एवं घनत्व में भिन्नता होने के कारण वाताग्रों का निर्माण नहीं हो पाता । अधिकांश चक्रवातीय वर्षा शरद् ऋतु में होती है। समशीतोष्ण प्रदेशों में पछुवा हवाओं के साथ-साथ अनेक चक्रवात पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं। उत्तरी भारत में शीतकालीन वर्षा भी चक्रवातीय वर्षा का एक प्रमुख उदाहरण है।
संसार में वर्षा का वितरण
संसार के वर्षा के वितरण मानचित्र पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि भूतल पर सभी जगह एकसमान मात्रा में वर्षा नहीं होती। धरातल की बनावट, जलवायु एवं पवनों की दिशा पर वर्षा की मात्रा निर्भर करती है। संसार में वर्षा का वितरण निम्नवत् पाया जाता है-
1. विषुवतरेखीय अधिक वर्षा की पेटी-वर्षा-वितरण का यह क्षेत्र विषुवत रेखा के 10° उत्तर तथा 10° दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस पेटी में प्रतिदिन संवहनीय मूसलाधार वर्षा होती है। वर्षा बादलों की गर्जन तथा बिजली की चमक के साथ होती है। इस पेटी में वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमी तक रहता है। अत्यधिक वर्षा के कारण यहाँ घने वन पाये जाते हैं तथा कृषि का विकास कम हुआ है। यहाँ विरल आबादी मिलती है।
2. व्यापारिक पवनों की वर्षा की पेटी-व्यापारिक पवन प्रवाह क्षेत्र में इन पवनों से व्यापक वर्षा होती है; अतः इसे व्यापारिक पवनों की वर्षा की पेटी कहते हैं। इस पेटी का विस्तार 10° से 20° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्थों में पाया जाता है। इसी पेटी में मानसूनी पवनों से भी भारी वर्षा हुआ करती है। वार्षिक वर्षा का औसत 100 से 150 सेमी तक रहता है। प्रचुर वर्षा के कारण मानसूनी प्रदेशों में चावल की सघन खेती होती है तथा घनी आबादी पायी जाती है।
3. उपोष्ण कम वर्षा की पेटी-उच्च वायुदाब की यह पेटी 20° से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में विस्तृत है। इस पेटी में वर्षा बहुत कम होती है, क्योंकि नीचे उतरती हुई हवाएँ वर्षा नहीं करती हैं। अतः विश्व के अधिकांश उष्ण मरुस्थल इसी पेटी में पाये जाते हैं। इस पेटी में वर्षा का वार्षिक औसत 50 सेमी तक ही रहता है।
4. भूमध्यसागरीय मध्यम वर्षा की पेटी-यह पेटी 30° से 40° अक्षांशों के मध्य फैली हुई है। इस क्षेत्र में वायुदाब की पेटियों के खिसक जाने के कारण शीत ऋतु में ही वर्षा होती है। पछुवा पवनें तथा चक्रवात शीत ऋतु में खूब वर्षा करते हैं। इस क्षेत्र में वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 100 सेमी तक रहता है। यहाँ मध्यम सघन आबादी पायी जाती है।
5. शीतोष्ण वर्षा की पेटी-40° से 60° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्थों में यह पेटी पायी जाती है। पछुवा पवनों का व्यापक प्रभाव रहने के कारण इस क्षेत्र में भारी वर्षा होती है। दक्षिणी अक्षांशों में यहाँ चक्रवातों से भारी वर्षा होती है। इस पेटी में प्रतिवर्ष 100 से 125 सेमी तक वर्षा होती है। यहाँ पश्चिमी यूरोपीय देशों में सघन आबादी मिलती है।
6. ध्रुवीय कम वर्षा की पेटी-60° अक्षांशों से 90° अक्षांशों के मध्य सबसे कम वर्षा होती है। 60° अक्षांशों के निकट मात्र 25 सेमी वर्षा ही होती है, शेष भागों में वर्षा हिम-कणों के रूप में होती है। इस क्षेत्र में वर्ष-भर उच्च दाब बना रहने के कारण वर्षा कम होती है। हिमाच्छादन के कारण यहाँ विरल आबादी पायी जाती है।
In simple words: वर्षा वायुमंडल से जल का तरल या ठोस रूप में पृथ्वी पर गिरना है, जो जलवाष्प की पर्याप्त मात्रा, बूंदों के आकार और तीव्र संघनन पर निर्भर करता है। इसके मुख्य प्रकार संवहनीय (गर्मी से), पर्वतीय (पहाड़ों से टकराकर) और चक्रवातीय (ठंडी-गर्म हवा के मिलने से) वर्षा हैं, जिनका वितरण विश्वभर में असमान है, जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में अधिक और ध्रुवों पर कम।
🎯 Exam Tip: वर्षा के तीनों मुख्य प्रकारों- संवहनीय, पर्वतीय और चक्रवातीय- की उत्पत्ति, प्रक्रिया और उनके विशिष्ट वितरण क्षेत्रों का विस्तृत विवरण देना उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 2. वायुमण्डल से ओलावृष्टि एवं वर्षा किस प्रकार होती है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
Answer: ओलावृष्टि-जब वायुमण्डल में प्रबल वायु की धाराएँ ऊर्ध्वाधर रूप में चलती हैं, तव संघनन की प्रक्रिया वायुमण्डल के उच्च स्तरों में निम्न तापमान पर सम्पन्न होती है तथा जलवाष्प हिमकणों में बदल जाती है। हिमकणों का आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, परन्तु ऊपर उठती हुई प्रचण्ड वायु इन्हें नीचे नहीं गिरने देती है। इस प्रकार इन रवों की मोटाई कुछ सेमी तक बढ़ जाती है तथा ठोस हिम के गोले के रूप में ये रवे भूपृष्ठ पर गिरते हैं, जिसे 'ओलावृष्टि' या 'उपलवृष्टि' कहते हैं। कभी-कभी ओले वर्षा के साथ भी भूपृष्ठ पर गिरते हैं। ओलावृष्टि से फसलों को भारी हानि पहुँचती है।
वर्षा-वर्षा, वृष्टि का सबसे सामान्य प्रतिरूप है। वायुमण्डल में जलवाष्प के संघनन से मेघों का निर्माण होता है। मेघों में अनेक छोटे-छोटे जलकण होते हैं, जो यत्र-तत्र बिखरे रहते हैं। जब मेघ वायुमण्डल के शीतल क्षेत्रों में पहुँचते हैं तब ये जलकण संचित होकर पहले की अपेक्षा और बड़े हो जाते हैं। भार के कारण ये वायुमण्डल में अधिक देर तक टिक नहीं पाते और नीचे बरसने लगते हैं। वृष्टि के इस रूप को 'वर्षा' कहते हैं। वर्षा की बूंदों का व्यास 6 मिमी तक होता है। 'फुहार' हल्की वर्षा का स्वरूप है। इसमें जल की बूंदें बहुत ही सूक्ष्म होती हैं, जिनका व्यास 0.5 मिमी से भी कम होता है।
In simple words: ओलावृष्टि तब होती है जब मजबूत ऊर्ध्वाधर हवाएँ जलवाष्प को ऊँचाई पर ठंडा करके बर्फ के गोलों में बदल देती हैं, जो बड़े होकर जमीन पर गिरते हैं। वर्षा जलवाष्प के मेघों में संघनित होकर छोटी बूंदों के रूप में नीचे गिरने की सामान्य प्रक्रिया है, जो फुहार या तेज बारिश के रूप में हो सकती है।
🎯 Exam Tip: ओलावृष्टि और वर्षा के निर्माण की प्रक्रियाओं, उनके कारणों और उनके बीच के मूलभूत अंतरों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. ऊँचाई के आधार पर मेघों या बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
Answer: बादलों का वर्गीकरण उनकी धरातल से ऊँचाई तथा आकार के आधार पर किया जाता है। 1932 ई० में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बादलों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया गया है
1. उच्च बादल-इन बादलों की ऊँचाई समुद्रतल से 6 से 12 किमी तक होती है। इनमें पक्षाभ (Cirrus), पक्षाभ कपासी (Cirro-cumulus) और पक्षाभ स्तरी (Cirro-stratus) मेघ सम्मिलित किए जाते हैं। पक्षाभ सबसे ऊँचे मेघ होते हैं जिनका निर्माण सूक्ष्म हिमकणों से होने के कारण इनका रंग श्वेत होता है। ये चक्रवातों के आगमन से पहले आकाश में दिखलाई पड़ते हैं। पक्षाभ स्तरी मेघ आकाश में एक पतली चादर की भाँति फैले होते हैं और चन्द्रमा तथा सूर्य के चारों ओर प्रभामण्डल बना देते हैं। पक्षाभ-कपासी मेघ छोटे-छोटे, गोलाकार या लहरनुमा होते हैं।
2. मध्यम ऊँचाई के बादल-इन बादलों की ऊँचाई धरातल से 3 से 6 किमी तक होती है। इन बादलों में स्तरी मध्य रेखा (Altostratus) और कपासी मध्य मेघ (Altocumulus) प्रमुख हैं। स्तरी मध्य मेघों में सूर्य व चन्द्रमा स्पष्ट दिखाई नहीं देते और इनसे विस्तृत क्षेत्रों में लगातार वर्षा होती है।
3. निम्न बादल-ये धरातल से 3 किमी ऊँचाई तक पाए जाने वाले बादल हैं जिनके प्रमुख प्रकार स्तरी (Stratus), वर्षा स्तरी (Nimbo Stratus) और स्तरी कपासी (Strato-cumulus) मेघ हैं। स्तरी बादल कुहरे के समान कई परतों में शीतोष्ण कटिबन्ध में जाड़ों में अधिक दिखलाई पड़ते हैं। वर्षा स्तरी बादल काले तथा धरातल के निकट अत्यन्त घने होते हैं जिनसे भारी वर्षा होती है। स्तरी कपासी मेघ हल्के भूरे रंग के बड़े-बड़े गोलाकार चकतों में पाए जाते हैं।
4. अधिक ऊध्वाधर विकास वाले बादल-इन बादलों में पवनें तेजी से धरातल से ऊपर की ओर ऊर्ध्वाधर प्रवाहित होती हैं। अतः इनका ऊध्वाधर विस्तार अधिक होता है। ये कपासी (Cumulus) और कपासी वर्षी (Cumulonimbus) मेघ होते हैं। ये गहरे काले रंग वाले भारी बादल होते हैं। इन्हें गर्जन मेघ भी कहते हैं। कपासी वर्षी मेघ ऊँचाई में अधिक विस्तार वाले पर्वत के समान होते हैं। प्रबल ऊर्ध्वाधर पवनों के कारण इनसे मूसलाधार वर्षा ओले, विद्युत की चमक व गर्जन-तर्जन के साथ होती है।
In simple words: बादलों को उनकी ऊँचाई के आधार पर चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: उच्च बादल (6-12 किमी, जैसे पक्षाभ), मध्यम ऊँचाई के बादल (3-6 किमी, जैसे स्तरी मध्य), निम्न बादल (3 किमी तक, जैसे स्तरी), और अधिक ऊर्ध्वाधर विकास वाले बादल (जो कपासी और कपासी वर्षी मेघ जैसे गहरे काले होते हैं और तीव्र वर्षा लाते हैं)।
🎯 Exam Tip: बादलों के वर्गीकरण को उनकी ऊँचाई और प्रत्येक श्रेणी में आने वाले बादलों के प्रकारों को उदाहरणों सहित याद रखना महत्वपूर्ण है।
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