UP Board Solutions Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons

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Detailed Chapter 13 हाइड्रोकार्बन UP Board Solutions for Class 11 Chemistry

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Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons (हाइड्रोकार्बन)

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

 

Question 1. मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
Answer: मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त मूलक अभिक्रिया है जो निम्नलिखित क्रियाविधि से होती है-
(i) श्रृंखला समारम्भन (Chain initiation)
\(Cl-Cl \quad \xrightarrow{\text{समांश विदलन}} \quad Cl \cdot + Cl \cdot \)
(ii) श्रृंखला संचरण (Chain propagation)
\(CH_4 + Cl \cdot \longrightarrow CH_3 \cdot + HCl\)
\(CH_3 \cdot + Cl-Cl \longrightarrow CH_3Cl + Cl \cdot \)
(iii) श्रृंखला समापन (Chain termination)
\(CH_3 \cdot + CH_3 \cdot \longrightarrow CH_3-CH_3\)
एथेन
\(CH_3 \cdot + Cl \cdot \longrightarrow CH_3Cl\)
\(Cl \cdot + Cl \cdot \longrightarrow Cl_2\) इस क्रियाविधि से स्पष्ट है कि मुक्त मूलक \(CH_3\) परस्पर संयुक्त होकर एथेन बनाते हैं।
In simple words: During the chlorination of methane, two methyl free radicals (\(CH_3 \cdot\)) combine to form ethane (\(CH_3-CH_3\)). This occurs as a chain termination step in the free radical reaction mechanism.

🎯 Exam Tip: Understanding the free radical mechanism (initiation, propagation, termination) is crucial for explaining reactions like chlorination of alkanes and predicting products.

 

Question 2. निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. नाम लिखिए-
(क) \(CH_3CH=C(CH_3)_2\)
(ख) \(CH_2=CH-C \equiv C-CH_3\)
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में एक चक्रीय हेक्सेन वलय दिखाया गया है जिसमें दो प्रतिस्थापी समूह जुड़े हुए हैं। एक प्रतिस्थापी -CH2-CH2-CH=CH2 समूह और दूसरा -OH समूह। इस यौगिक का IUPAC नाम 4-फेनिलब्यूट-1-ईन है, जहां फेनिल समूह मुख्य श्रृंखला के चौथे कार्बन पर जुड़ा है।
(घ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक बेंजीन वलय को प्रदर्शित करता है जिस पर दो प्रतिस्थापी समूह लगे हैं। एक मेथिल समूह (-CH3) और एक हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH) जुड़े हैं। इस यौगिक का IUPAC नाम 2-मेथिलफीनॉल है।
(च)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक जटिल शाखित श्रृंखला वाले अल्केन को दर्शाता है। मुख्य श्रृंखला डेकेन है, जिसमें एक 2-मेथिलप्रोपिल समूह पांचवें कार्बन से जुड़ा है। इसका IUPAC नाम 5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन है।
(छ) \(CH_3(CH_2)_4CH(CH_2)_3CH_3\)
\(CH_2CH(CH_3)_2\)
(ज) \(CH_3 - CH=CH-CH_2 - CH=CH- CH – CH_2 — CH=CH_2\)
\(C_2 H_5\)
Answer:
(क) \(CH_3CH=C(CH_3)_2\)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में एक चार कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला वाला ऐल्कीन दिखाया गया है। इसमें एक द्विआबंध दूसरे कार्बन पर है और एक मेथिल समूह भी दूसरे कार्बन पर जुड़ा है। यह 2-मेथिलब्यूट-2-ईन है।
2-मेथिलब्यूट-2-ईन
(ख) \(CH_2=CH-C \equiv C-CH_3\)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में एक पाँच कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला वाला हाइड्रोकार्बन है जिसमें एक द्विआबंध पहले कार्बन पर और एक त्रिआबंध तीसरे कार्बन पर है। यह पेन्ट-1-ईन-3-आइन है।
पेन्ट-1-ईन-3-आइन
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में एक चक्रीय हेक्सेन वलय दिखाया गया है जिसमें दो प्रतिस्थापी समूह जुड़े हुए हैं। एक प्रतिस्थापी -CH2-CH2-CH=CH2 समूह और दूसरा -OH समूह। इस यौगिक का IUPAC नाम 4-फेनिलब्यूट-1-ईन है, जहां फेनिल समूह मुख्य श्रृंखला के चौथे कार्बन पर जुड़ा है।
4-फेनिलब्यूट-1-ईन
(घ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक बेंजीन वलय को प्रदर्शित करता है जिस पर दो प्रतिस्थापी समूह लगे हैं। एक मेथिल समूह (-CH3) और एक हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH) जुड़े हैं। इस यौगिक का IUPAC नाम 2-मेथिलफीनॉल है।
2-मेथिलफीनॉल
(छ) \(CH_3-(CH_2)_4-CH(CH_2)_3-CH_3\)
\(\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad |\)
\(\quad \quad \quad \quad \quad \quad CH_2-CH-CH_3\)
\(\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad |\)
\(\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad CH_3\)
5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन
(ज) \(CH_3-CH=CH-CH_2-CH=CH-CH(C_2H_5)-CH_2-CH=CH_2\)
4-एथिलडेका-1, 5, 8-ट्राइईन
In simple words: The IUPAC nomenclature involves identifying the longest continuous carbon chain, numbering it to give the lowest possible numbers to functional groups and substituents, and then naming the substituents alphabetically.

🎯 Exam Tip: Practice IUPAC naming rules extensively, especially for compounds with multiple functional groups, branches, and cyclic structures, to avoid common errors.

 

Question 3. निम्नलिखित यौगिकों, जिनमें द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की संख्या दर्शाई गई है, के सभी सम्भावित स्थिति समावयवियों के संरचना सूत्र एवं I.U.P.A.C. नाम दीजिए-
(क) \(C_4H_8\) (एक द्विआबन्ध)
(ख) \(C_5H_8\) (एक त्रिआबन्ध)
Answer:
(क) \(C_4H_8\) (एक द्विआबन्ध)
(i) \(CH_3CH_2-CH=CH_2\)
ब्यूट-1-ईन
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ब्यूट-2-ईन के सिस समावयवी को दर्शाता है, जिसमें द्विआबंध से जुड़े दोनों मेथिल समूह (CH3) एक ही तरफ स्थित हैं।
सिस-ब्यूट-2-ईन
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ब्यूट-2-ईन के ट्रांस समावयवी को दर्शाता है, जिसमें द्विआबंध से जुड़े दोनों मेथिल समूह (CH3) विपरीत दिशाओं में स्थित हैं।
ट्रांस-ब्यूट-2-ईन
(iv) \(CH_3-C(CH_3)=CH_2\)
2-मेथिलप्रोप-1-ईन
(ख) \(C_5H_8\) (एक त्रिआबन्ध)
(i) \(CH_3CH_2CH_2C \equiv CH\)
पेन्ट-1-आइन
(ii) \(CH_3CH_2-C \equiv C-CH_3\)
पेन्ट-2-आइन
(iii) \(CH_3-CH(CH_3)-C \equiv CH\)
3-मेथिलब्यूट-1-आइन
In simple words: \(C_4H_8\) can exist as but-1-ene, cis-but-2-ene, trans-but-2-ene, and 2-methylprop-1-ene, all having one double bond. \(C_5H_8\) can exist as pent-1-yne, pent-2-yne, and 3-methylbut-1-yne, all with one triple bond. These are position isomers.

🎯 Exam Tip: When drawing isomers, ensure to check for all possible positions of the double/triple bond and any branching. Also, consider geometric (cis/trans) isomers for alkenes.

 

Question 4. निम्नलिखित यौगिकों के ओजोनी-अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए-
(i) पेन्ट-2-ईन
(ii) 3, 4-डाइमेथिल-हेप्ट-3-ईन
(iii) 2-एथिल ब्यूट-1-ईन
(iv) 1-फेनिल ब्यूट-1-ईन
Answer:
(i) \(CH_3-CH_2-CH=CH-CH_3\)
पेन्ट-2-ईन
\((1) O_3/CH_2Cl_2, 196K\)
\((ii) Zn/H_2O\)
\(\longrightarrow CH_3-CH_2-CH=O + O=CH-CH_3\)
प्रोपेनल
एथेनल
(ii) \(CH_3CH_2CH_2-C(CH_3)=C(CH_3)-CH_2CH_3\)
3, 4-डाइमेथिलहेप्ट-3-ईन
\((1) O_3/CH_2Cl_2, 196K\)
\((ii) Zn/H_2O\)
\(\longrightarrow CH_3CH_2CH_2-C(=O)CH_3 + CH_3C(=O)-CH_2CH_3\)
पेन्टेन-2-ओन
ब्यूटेन-2-ओन
(iii) \(CH_3CH_2-C(CH_2CH_3)=CH_2\)
2-एथिलब्यूट-1-ईन
\((1) O_3/CH_2Cl_2, 196K\)
\((ii) Zn/H_2O\)
\(\longrightarrow CH_3CH_2-C(=O)CH_2CH_3 + CH_2O\)
पेन्टेन-3-ओन
मेथेनल
(iv) \(CH_3CH_2-CH=CH-C_6H_5\)
1-फेनिलब्यूट-1-ईन
\((1) O_3/CH_2Cl_2, 196K\)
\((ii) Zn/H_2O\)
\(\longrightarrow CH_3CH_2-CH=O + O=CH-C_6H_5\)
प्रोपेनल
बेन्जेल्डिहाइड
In simple words: Ozonolysis cleaves the carbon-carbon double bond and forms carbonyl compounds. The products depend on the substitution pattern around the double bond. For terminal alkenes, formaldehyde is often produced, while internal alkenes yield aldehydes or ketones.

🎯 Exam Tip: Remember that ozonolysis with \(Zn/H_2O\) workup produces aldehydes and ketones. If the workup is oxidative (e.g., \(H_2O_2\)), aldehydes would further oxidize to carboxylic acids.

 

Question 5. एक ऐल्कीन 'A' के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। 'A' का I.U.P.A.C. नाम तथा संरचना दीजिए ।
Answer: ऐल्कीन 'A' 3-एथिल पेन्ट-2-ईन है। यह ओजोनी अपघटन पर एथेनले तथा पेन्टेन-3-ओन देता है। इनकी संरचनाएँ निम्नलिखित है-
\(CH_3CHO\)
एथेनॉल
\(O=C(CH_2CH_3)_2\)
पेन्टेन-3-ओन
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र 3-एथिलपेन्ट-2-ईन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें पांच कार्बन की मुख्य श्रृंखला में दूसरे कार्बन पर द्विआबंध और तीसरे कार्बन पर एक एथिल समूह (C2H5) जुड़ा है।
3-एथिलपेन्ट-2-ईन
In simple words: To find the original alkene from ozonolysis products, remove the oxygen atoms from the carbonyl groups and connect the two carbon atoms that were part of the double bond. This reconstructs the original alkene.

🎯 Exam Tip: To deduce the structure of the original alkene from its ozonolysis products, mentally remove the oxygen atoms from the carbonyl groups and join the two carbon atoms with a double bond. This "reverse ozonolysis" is a common strategy.

 

Question 6. एक ऐल्केन A में तीन C-C, आठ C-H सिग्मा-आबन्ध तथा एक C-C पाई आबन्ध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए।
Answer: 44 u मोलर द्रव्यमान का ऐल्डिहाइड एथेनल (\(CH_3CHO\)) है। एथेनल के दो मोलों को एक साथ लिखकर उनके ऑक्सीजन परमाणु हटाते हैं और उन्हें द्विआबन्ध द्वारा जोड़ देते हैं।
अतः ऐल्केन है-
\(CH_3CH=O \quad O=CHCH_3\)
\(\implies CH_3CH=CHCH_3\) या
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ब्यूट-2-ईन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें चार कार्बन की सीधी श्रृंखला है और दूसरे तथा तीसरे कार्बन के बीच एक द्विआबंध है।
ब्यूट-2-ईन
ब्यूट-2-ईन में तीन C-C, आठ C-H \(\sigma\)-आबन्ध तथा एक C-C \(\pi\)-आबन्ध है।
In simple words: The aldehyde with molar mass 44 u is ethanal (\(CH_3CHO\)). When two molecules of ethanal combine after removing their oxygen atoms, they form but-2-ene. But-2-ene correctly has three C-C sigma bonds, eight C-H sigma bonds, and one C-C pi bond, matching the description.

🎯 Exam Tip: For problems involving ozonolysis and bond counts, first identify the aldehyde/ketone produced. Then, "reverse" the ozonolysis to construct the original alkene. Finally, verify the bond counts and other structural features.

 

Question 7. एक ऐल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
Answer: उत्पाद हैं-
\(CH_3CH_2CH=O\)
प्रोपेनॉल
\(O=C(CH_2CH_3)_2\)
पेन्टेन-3-ओन
प्रश्न 6 के समान हल करने पर, ऐल्कीन है
\(\implies CH_3CH_2CH=C(C_2H_5)CH_2CH_3\)
3-एथिलहेक्स-3-ईन
In simple words: To find the original alkene from its ozonolysis products, combine the two carbonyl compounds by removing their oxygen atoms and forming a double bond between the two carbon atoms that previously held the oxygen. This results in 3-ethylhex-3-ene.

🎯 Exam Tip: When given ozonolysis products, write them side-by-side, remove the oxygen atoms, and connect the carbon atoms that held the oxygen with a double bond to reconstruct the parent alkene.

 

Question 8. निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए-
(i) ब्यूटेन,
(ii) पेन्टीन,
(iii) हेक्साइन,
(iv) टॉलूईन ।
Answer:
(i) \(C_4H_{10} (g)+\frac{13}{2} O_2 (g) \xrightarrow{\Delta} 4CO_2 (g)+ 5H_2O (g)\)
ब्यूटेन
(ii) \(C_5H_{10} (g) + \frac{15}{2}O_2 (g) \longrightarrow 5CO_2 (g) + 5H_2O (g)\)
पेन्टीन
(iii) \(C_6H_{10} (g)+\frac{17}{2}O_2 (g) \longrightarrow 6CO_2 (g) + 5H_2O (g)\)
हेक्साइन
(iv)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह टॉलूईन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें एक मेथिल समूह बेंजीन वलय से जुड़ा हुआ है। दहन अभिक्रिया में टॉलूईन ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाता है।
\(\quad C_6H_5CH_3 (g) + 9O_2 (g) \longrightarrow 7CO_2 (g) + 4H_2O (g)\)
टोलूईन
In simple words: The complete combustion of any hydrocarbon produces carbon dioxide (\(CO_2\)) and water (\(H_2O\)). The stoichiometry varies based on the number of carbon and hydrogen atoms in the original hydrocarbon.

🎯 Exam Tip: To write balanced combustion equations for hydrocarbons, balance carbon first, then hydrogen, and finally oxygen. For fractional coefficients of oxygen, multiply the entire equation by 2 to get whole numbers.

 

Question 9. हेक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र हेक्स-2-ईन के सिस (समपक्ष) और ट्रांस (विपक्ष) समावयवी को दर्शाता है। सिस-हेक्स-2-ईन में द्विआबंध के दोनों मेथिल समूह (CH3) एक ही तरफ हैं, जिससे उच्च द्विध्रुव आघूर्ण होता है। ट्रांस-हेक्स-2-ईन में मेथिल समूह विपरीत दिशा में होते हैं, जिससे द्विध्रुव आघूर्ण कम या शून्य होता है।
किसी अणु का क्वथनांक द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं पर निर्भर करता है। चूंकि सिस समावयवी में उच्च द्विध्रुव आघूर्ण होता है, अतः इसका क्वथनांक उच्च होता है।
In simple words: Cis-isomers have a higher dipole moment due to their asymmetrical charge distribution, leading to stronger dipole-dipole interactions. These stronger intermolecular forces require more energy to overcome, resulting in a higher boiling point compared to trans-isomers, which often have little to no net dipole moment.

🎯 Exam Tip: Cis-trans isomerism influences physical properties like boiling point due to differences in molecular polarity. Cis isomers are generally more polar and thus have higher boiling points due to stronger intermolecular forces.

 

Question 10. बेन्जीन में तीन द्वि-आबन्ध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
Answer: बेंजीन का अति स्थायित्व अनुनाद या \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण के कारण होता है। बेंजीन में सभी 6\(\pi\)-इलेक्ट्रॉन (तीन द्विआबन्धों के) विस्थानीकृत (delocalised) होते हैं तथा अणु को स्थायित्व प्रदान करते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र बेंजीन वलय में 6 \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण को दर्शाता है। इसमें एक हेक्सागोनल रिंग में छह कार्बन परमाणु और प्रत्येक कार्बन से एक हाइड्रोजन परमाणु जुड़ा है। इलेक्ट्रॉन वलय के ऊपर और नीचे एक सतत बादल में विस्थानीकृत हैं, जो बेंजीन की अतिरिक्त स्थिरता का कारण है।
In simple words: Benzene's exceptional stability, despite having three double bonds, is due to the delocalization of its 6 \(\pi\)-electrons across the entire cyclic structure. This resonance stabilization spreads the electron density over multiple atoms, making the molecule highly stable.

🎯 Exam Tip: The concept of aromaticity and delocalization of \(\pi\)-electrons is key to explaining benzene's stability. Huckel's rule (\(4n+2\) \(\pi\)-electrons) is the fundamental principle for identifying aromatic compounds.

 

Question 11. किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?
Answer: किसी अणु के ऐरोमैटिक होने के लिए आवश्यक शर्ते निम्न हैं-
1. अणु में तल के ऊपर तथा नीचे विस्थानीकृत -\(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों का एक चक्रीय अभ्र (cyclic cloud) होना चाहिए।
2. अणु समतलीय होना चाहिए। ये इसलिए आवश्यक है क्योंकि \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण विस्थानीकरण के लिए वलय समतलीय होनी चाहिए जिससे p-कक्षकों का चक्रीय अतिव्यापन हो सके ।
3. इसमें \((4n+2)\) \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनं होने चाहिए, जहाँ n = 0, 1, 2, 3, ... है। इसे हकल नियम कहते हैं।
In simple words: For a compound to be aromatic, it must be cyclic, planar, fully conjugated (all atoms in the ring are sp² or sp hybridized), and contain \((4n+2)\) \(\pi\)-electrons, where 'n' is a non-negative integer.

🎯 Exam Tip: Thoroughly memorize Huckel's rules for aromaticity (cyclic, planar, conjugated, \((4n+2)\) \(\pi\)-electrons) as they are frequently tested in various formats.

 

Question 12. इनमें से कौन-से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए-
(i)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र साइक्लोहेप्टाट्राइएनिल कटायन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें एक सात सदस्यीय वलय पर एक CH2 समूह जुड़ा है। यह अणु पूर्णतः संयुग्मित नहीं है और समतलीय भी नहीं हो सकता है, जिससे यह ऐरोमैटिक नहीं है।
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक चार सदस्यीय चक्रीय वलय को दर्शाता है जिसमें एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु शामिल है। यह अणु समतलीय नहीं है और इसमें केवल 4 \(\pi\)-इलेक्ट्रॉन हैं, जो हकल नियम का पालन नहीं करता है।
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र साइक्लोओक्टाटेट्राईन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें एक आठ सदस्यीय चक्रीय वलय है जिसमें चार द्विआबंध हैं। यह अणु 8 \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों के साथ हकल नियम का पालन नहीं करता है और इसकी आकृति टब-आकार की होती है, जो इसे गैर-एरोमैटिक बनाती है।
Answer:
(i)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र साइक्लोहेप्टाट्राइएनिल कटायन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें एक सात सदस्यीय वलय पर एक CH2 समूह जुड़ा है। यह अणु पूर्णतः संयुग्मित नहीं है और समतलीय भी नहीं हो सकता है, जिससे यह ऐरोमैटिक नहीं है। में एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु है, अतः अणु समतलीय नहीं होगा। अणु में 6\(\pi\)-इलेक्ट्रॉन हैं। लेकिन निकाय पूर्णतः संयुग्मित नहीं है चूँकि सभी \(\pi\)-इलेक्ट्रॉन चक्रीय वलय के सभी परमाणुओं के चारों ओर चक्रीय इलेक्ट्रॉन अभ्र नहीं बनाते हैं, अतः यह ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है।
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक चार सदस्यीय चक्रीय वलय को दर्शाता है जिसमें एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु शामिल है। यह अणु समतलीय नहीं है और इसमें केवल 4 \(\pi\)-इलेक्ट्रॉन हैं, जो हकल नियम का पालन नहीं करता है। ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है क्योंकि इसमें एक sp³ कार्बन परमाणु हैं जिसके कारण अणु समतलीय नहीं है। पुनः इसमें केवल 4-\(\pi\)-इलेक्ट्रॉन हैं अतः निकाय ऐरोमैटिक नहीं है क्योकि \((4n+2)\) \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों युक्त । समतलीय चक्रीय अभ्र उपस्थित नहीं है।
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र साइक्लोओक्टाटेट्राईन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें एक आठ सदस्यीय चक्रीय वलय है जिसमें चार द्विआबंध हैं। यह अणु 8 \(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों के साथ हकल नियम का पालन नहीं करता है और इसकी आकृति टब-आकार की होती है, जो इसे गैर-एरोमैटिक बनाती है। ऐरोमैटिक नहीं है क्योंकि यह 8-\(\pi\)-इलेक्ट्रॉनों युक्त निकाय है अतः यह हकल के नियम अर्थात् \((4n +2)\) \(\pi\)-इलेक्ट्रॉन का पालन नहीं करता है। साथ ही यह समतलीय न होकर टब आकृति (tub-shaped) का होता है।
In simple words: Molecules (i) and (ii) are not aromatic because they contain sp³ hybridized carbon atoms, making them non-planar and preventing full conjugation. Molecule (iii) is not aromatic because it has 8 \(\pi\)-electrons (not \((4n+2)\)) and is tub-shaped, violating planarity and Huckel's rule.

🎯 Exam Tip: To identify non-aromatic compounds, look for violations of Huckel's rules: lack of planarity (often indicated by sp³ carbons in the ring), incomplete conjugation, or incorrect \(\pi\)-electron count (i.e., not \((4n+2)\)).

 

Question 13. बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(i) p-नाइट्रोब्रोमोबेन्जीन
Answer:
(i)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस रासायनिक अभिक्रिया श्रृंखला में बेंजीन का ब्रोमीनीकरण (Br2, निर्जल FeBr3) करके ब्रोमोबेंजीन बनाया जाता है। फिर ब्रोमोबेंजीन का नाइट्रीकरण (HNO3/H2SO4, \(\Delta\)) किया जाता है जिससे p-ब्रोमोनाइट्रोबेंजीन (प्रमुख उत्पाद) और o-ब्रोमोनाइट्रोबेंजीन (अल्प उत्पाद) बनते हैं। प्रभाजी आसवन से p-ब्रोमोनाइट्रोबेंजीन को अलग किया जा सकता है।
In simple words: Benzene is first brominated to bromobenzene, which then undergoes nitration. Since bromine is an ortho/para director, a mixture of o- and p-bromonitrobenzene is formed, from which the para isomer can be isolated.

🎯 Exam Tip: For para-substituted products, it's often beneficial to introduce the ortho/para directing group first, followed by the second substitution. Remember the directing effects of substituents on aromatic rings.

 

Question 13. बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(ii) m-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन
(iv) ऐसीटोफीनोन ।
Answer:
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस रासायनिक अभिक्रिया श्रृंखला में बेंजीन का नाइट्रीकरण (HNO3/H2SO4, \(\Delta\)) करके नाइट्रोबेंजीन बनाया जाता है। फिर नाइट्रोबेंजीन का क्लोरीनीकरण (Cl2, निर्जल AlCl3, \(\Delta\)) किया जाता है। नाइट्रो समूह एक मेटा-निर्देशक होने के कारण, यह m-क्लोरोनाइट्रोबेंजीन उत्पादित करता है।
In simple words: To synthesize m-nitrochlorobenzene, benzene is first nitrated to nitrobenzene. Since the nitro group is a meta-director, subsequent chlorination will yield m-nitrochlorobenzene.

🎯 Exam Tip: When synthesizing meta-substituted products, always introduce the meta-directing group first, followed by the second substitution, as meta-directors deactivate the ring but direct to the meta position.

 

Question 13. बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन
Answer:
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस रासायनिक अभिक्रिया श्रृंखला में बेंजीन का फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण (CH3Cl, निर्जल AlCl3) करके टॉलूईन बनाया जाता है। मेथिल समूह एक ortho/para निर्देशक है। फिर टॉलूईन का नाइट्रीकरण (तनु HNO3 + तनु H2SO4, \(\Delta\)) किया जाता है, जिससे p-नाइट्रोटॉलूईन (मुख्य उत्पाद) और o-नाइट्रोटॉलूईन (गौण उत्पाद) बनते हैं, जिन्हें प्रभाजी आसवन द्वारा अलग किया जा सकता है।
In simple words: Benzene is converted to toluene via Friedel-Crafts alkylation. Toluene is then nitrated. Since the methyl group is an ortho/para director, p-nitrotoluene is the major product.

🎯 Exam Tip: For para-substituted products, introducing an activating ortho/para directing group first (like an alkyl group via Friedel-Crafts alkylation) followed by the second substitution is an effective strategy.

 

Question 13. बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(iv) ऐसीटोफीनोन ।
Answer:
(iv)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस रासायनिक अभिक्रिया श्रृंखला में बेंजीन का ऐसीटिल क्लोराइड (CH3COCl) और निर्जल AlCl3 के साथ फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण किया जाता है, जिससे ऐसीटोफीनोन और HCl बनते हैं।
In simple words: Benzene is converted to acetophenone through Friedel-Crafts acylation, using acetyl chloride and anhydrous aluminum chloride as a Lewis acid catalyst.

🎯 Exam Tip: Friedel-Crafts acylation is a direct and efficient method for introducing an acyl group onto an aromatic ring, leading to the formation of ketones like acetophenone.

 

Question 14. ऐल्केन HC-CH2-C-(CH3)2-CH2-CH(CH3) में 1°, 2° तथा 3° कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबन्धित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक शाखित ऐल्केन श्रृंखला को दर्शाता है जिसमें विभिन्न प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°), और तृतीयक (3°) कार्बन परमाणु हैं। इसमें पांच 1° कार्बन, दो 2° कार्बन, और एक 3° कार्बन परमाणु हैं, जिनमें से प्रत्येक से जुड़े हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी दर्शायी गई है।
पाँच 1° कार्बन परमाणुओं से 15 H संलग्न हैं। दो 2° कार्बन परमाणुओं से 4 H संलग्न हैं। एक 3° कार्बन परमाणु से 1 H संलग्न है।
In simple words: Primary (1°) carbons are bonded to one other carbon, secondary (2°) to two, and tertiary (3°) to three. In the given alkane, there are five 1° carbons with a total of 15 H atoms, two 2° carbons with a total of 4 H atoms, and one 3° carbon with 1 H atom.

🎯 Exam Tip: Classifying carbon atoms (1°, 2°, 3°, 4°) and determining the number of associated hydrogen atoms is fundamental for understanding organic reactions and isomerism. Always carefully count the carbon-carbon bonds for each carbon atom.

 

Question 15. क्वथनांक पर ऐल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: ऐल्केनों के क्वथनांक शाखन के साथ घटते हैं क्योंकि शाखन (branching) बढ़ने पर ऐल्केन का पृष्ठ क्षेत्रफल गोले (sphere) के समान हो जाता है। चूंकि गोले का पृष्ठ क्षेत्रफल न्यूनतम होता है, अतः वाण्डर वाल्स बल न्यूनतम होते हैं। अतः शाखन पर क्वथनांक घटते हैं।
In simple words: Branching in alkanes reduces their boiling points. This is because branching makes the molecule more spherical, decreasing its surface area. A smaller surface area leads to weaker van der Waals forces between molecules, requiring less energy to overcome, thus lowering the boiling point.

🎯 Exam Tip: Remember the inverse relationship between branching and boiling point for alkanes. This is a common conceptual question testing understanding of intermolecular forces.

 

Question 16. प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2-ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेंजॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1-ब्रोमोप्रोपेन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए ।
Answer: प्रोपीन पर HBr का योग आयनिक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया है जो मारकोनीकॉफ नियमानुसार होती है। इस अभिक्रिया में सर्वप्रथम Hजुड़कर 2° कार्बोधनायन देता है। इस कार्योधनायन पर नाभिकस्नेही Br- आयन को शीघ्रता से आक्रमण होता है तथा 2-ब्रोमोप्रोपेन प्राप्त होती है।
\(\quad CH_3-CH=CH_2 + H-Br \xrightarrow{\text{मन्द}} CH_3-CH^{+} -CH_3 + Br^{-}\)
इलेक्ट्रॉनस्नेही
2° कार्बोधनायन
\(\quad CH_3-CH^{+}-CH_3 + Br^{-} \xrightarrow{\text{तीव्र}} CH_3-CH(Br)-CH_3\)
नाभिकस्नेही
2-ब्रोमोप्रोपेन
बेन्जॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में अभिक्रिया मुक्त मूलक क्रियाविधि के अनुसार होती है। इस अभिक्रिया में Br मुक्त मूलक इलेक्ट्रॉनस्नेहीं के रूप में कार्य करता है जो बेन्जॉयल परॉक्साइड की HBr से क्रिया द्वारा प्राप्त होता है।
\((C_6H_5COO)_2 \xrightarrow{\Delta} 2C_6H_5COO \cdot \implies 2C_6H_5 \cdot + 2CO_2\)
फेनिल मूलक
\(C_6H_5 \cdot + H-Br \longrightarrow C_6H_6 + Br \cdot \)
बेंजीन
मुक्त मूलक
प्रोपीन पर इस प्रकार क्रिया करता है कि अधिक स्थायी द्वितीयक (2°) मुक्त मूलक की उत्पत्ति हो सके। यह 2° मूलक HBr से एक H-परमाणु ग्रहण कर 1-ब्रोमोप्रोपेन देता है।
\(\quad CH_3-CH=CH_2 + Br \cdot \xrightarrow{\text{मन्द}} CH_3-CH \cdot -CH_2Br\)
द्वितीयक (2°) मुक्त मूलक
(अधिक स्थायी)
\(\quad CH_3-CH \cdot -CH_2Br + H-Br \xrightarrow{\text{तीव्र}} CH_3-CH_2-CH_2Br + Br \cdot \)
1-ब्रोमोप्रोपेन
In simple words: Without peroxide, HBr addition to propene follows Markovnikov's rule via an ionic mechanism, forming a more stable secondary carbocation and yielding 2-bromopropane. In the presence of peroxide, HBr addition follows an anti-Markovnikov pathway via a free radical mechanism, forming a more stable secondary free radical and yielding 1-bromopropane.

🎯 Exam Tip: Differentiate clearly between Markovnikov's and anti-Markovnikov's rules for HBr addition. Remember that peroxides specifically reverse the regioselectivity for HBr (not HCl or HI) due to a free radical mechanism involving the more stable intermediate free radical.

 

Question 17. 1, 2-डाइमेथिलबेन्जीन (o-जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार करता है?
Answer: o-जाइलीन को निम्नलिखित दो केकुले संरचनाओं को अनुनाद संकर माना जाता है। प्रत्येक के ओजोनी अपघटन से दो उत्पाद प्राप्त होते हैं-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र o-जाइलीन के दो केकुले अनुनादी संरचनाओं (I और II) और उनके ओजोनी अपघटन उत्पादों को दर्शाता है। संरचना I के अपघटन से मेथिलग्लाइऑक्सल और ग्लाइऑक्सल बनते हैं, जबकि संरचना II के अपघटन से 1,2-डाइमेथिलग्लाइऑक्सल और ग्लाइऑक्सल बनते हैं। कुल मिलाकर तीन उत्पाद बनते हैं: मेथिलग्लाइऑक्सल, 1,2-डाइमेथिलग्लाइऑक्सल और ग्लाइऑक्सल।
अतः समग्र रूप से तीन उत्पाद निर्मित होते हैं। चूंकि सभी तीन उत्पाद दो केकुले संरचनाओं में से एक से प्राप्त नहीं हो सकते हैं इससे प्रदर्शित होता है कि o-जाइलीन दो केकुले संरचनाओं का अनुनाद संकर है।
In simple words: Ozonolysis of o-xylene, considering its two Kekulé resonance structures, yields three different products: methylglyoxal, 1,2-dimethylglyoxal, and glyoxal. The formation of these three products confirms that o-xylene is a resonance hybrid of two Kekulé structures, as a single structure would yield fewer products.

🎯 Exam Tip: Ozonolysis can be used to determine the positions of double bonds in alkenes and, in the case of aromatic compounds like o-xylene, to provide evidence for resonance structures. The diversity of products formed supports the idea of delocalized pi electrons.

 

Question 18. बेन्जीन, n-हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए ।
Answer: इन तीनों यौगिकों में कार्बन की संकरण अवस्था निम्नवत् है-

बेंजीनहेक्सेनऐसीटिलीन
कक्षक का प्रकार :sp²sp³sp
s-लक्षण :33.3%25%50%

s-लक्षण बढ़ने पर अम्लीय लक्षण बढ़ता है अतः अम्लीय लक्षण निम्न क्रम में घटता है- ऐसीटिलीन > बेंजीन > हेक्सेन
In simple words: The acidity of C-H bonds is directly related to the s-character of the carbon atom's hybridization. sp-hybridized carbons (50% s-character) are most electronegative, making their C-H bonds most acidic (ethyne). sp²-hybridized carbons (33.3% s-character) are less acidic (benzene), and sp³-hybridized carbons (25% s-character) are least acidic (n-hexane).

🎯 Exam Tip: The acidity of C-H bonds in hydrocarbons correlates directly with the s-character of the carbon atom. Higher s-character means greater electronegativity, which stabilizes the resulting carbanion or allows easier proton abstraction, thus increasing acidity. This order is a common concept in organic chemistry.

 

Question 19. बेन्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
Answer: \(C_6H_6\) (बेंजीन) की कक्षक संरचना प्रदर्शित करती है कि -\(\pi\)-इलेक्ट्रॉन अभ्र वलय के ऊपर तथा नीचे स्थित है तथा ढीला व्यवस्थित है अतः इलेक्ट्रॉनस्नेही के लिए आसानी से उपलब्ध है, अतः बेंजीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ शीघ्रता से देती है तथा नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन क्रियाएँ: कठिनता से देती है।
In simple words: Benzene readily undergoes electrophilic substitution because its delocalized \(\pi\)-electron cloud is electron-rich and thus highly attractive to electron-seeking electrophiles. Nucleophilic substitution is difficult because the electron-rich ring repels electron-rich nucleophiles.

🎯 Exam Tip: The electron-rich nature of the benzene ring, due to its delocalized \(\pi\)-electrons, is key to its reactivity. It attracts electrophiles and repels nucleophiles, making electrophilic substitution its characteristic reaction.

 

Question 20. आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?
(i) एथाइन
(ii) एथीन
(iii) हेक्सेन ।
Answer:
(i) \(3HC \equiv CH \xrightarrow{\text{रक्त-तप्त Fe नलिका, 873 K}} C_6H_6\)
एथाइन
बेंजीन
(ii) \(CH_2=CH_2 \xrightarrow{Br_2/CCl_4} Br-CH_2-CH_2-Br\)
एथीन
1,2-डाइब्रोमोएथेन
\(Br-CH_2-CH_2-Br \xrightarrow{KOH(alc), \Delta} CH_2=CHBr\)
वाइनिल ब्रोमाइड
\(CH_2=CHBr \xrightarrow{NaNH_2/liq. NH_3, 196K} HC \equiv CH\)
एथाइन
\(3HC \equiv CH \xrightarrow{\text{रक्त-तप्त Fe नलिका, 873 K}} C_6H_6\)
एथाइन
बेंजीन
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र n-हेक्सेन को बेंजीन में परिवर्तित करने की विधि दर्शाता है। n-हेक्सेन को Cr2O3/V2O5/Mo2O3-Al2O3 उत्प्रेरक की उपस्थिति में उच्च तापमान पर चक्रीकरण और विहाइड्रोजनीकरण (-3H2) के माध्यम से साइक्लोहेक्सेन और अंततः बेंजीन में परिवर्तित किया जाता है।
In simple words: (i) Ethyne is converted to benzene via cyclic polymerization using a red-hot iron tube. (ii) Ethene is brominated to 1,2-dibromoethane, which is then dehydrobrominated to vinyl bromide, then to ethyne, and finally polymerized to benzene. (iii) Hexane is converted to benzene via aromatization (catalytic reforming) using \(Cr_2O_3/V_2O_5/Mo_2O_3-Al_2O_3\) catalyst.

🎯 Exam Tip: Remember these specific conversions for benzene synthesis: ethyne undergoes trimerization, ethene requires multiple steps including dehydrohalogenation to ethyne, and alkanes undergo aromatization via catalytic reforming.

 

Question 21. उन सभी ऐल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजनीकरण करने पर 2-मेथिल । ब्यूटेन देती हैं।
Answer: उत्पाद की संरचना निम्नवत् है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र 2-मेथिलब्यूटेन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें चार कार्बन की सीधी श्रृंखला है और दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह जुड़ा है।
2-मेथिलब्यूटेन
विभिन्न ऐल्कीनें जो हाइड्रोजनीकरण पर यह उत्पाद देती हैं, नीचे दी गयी हैं-
(i) \(CH_3-CH(CH_3)-CH=CH_2\)
3-मेथिलब्यूट-1-ईन
(ii) \(CH_3-C(CH_3)=CH-CH_3\)
2-मेथिलब्यूट-2-ईन
(iii) \(CH_2=C(CH_3)-CH_2-CH_3\)
2-मेथिलब्यूट-1-ईन
In simple words: Any alkene that, upon hydrogenation (addition of \(H_2\)), forms 2-methylbutane, must have had its double bond at a position that results in this product. These include 3-methylbut-1-ene, 2-methylbut-2-ene, and 2-methylbut-1-ene.

🎯 Exam Tip: To find all possible alkenes that yield a specific alkane upon hydrogenation, identify all possible positions to place a double bond that would result in the given alkane structure. Remember to consider both terminal and internal double bond positions.

 

Question 22. निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2, 4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन, p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(ख) टॉलूईन, p-\(H_3C-C_6H_4-NO_2, p-O_2N-C_6H_4-NO_2\)
Answer:
(क) क्लोरोबेंजीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन > 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन,
(ख) टॉलूईन > p-\(H_3C-C_6H_4-NO_2\) > p-\(O_2N-C_6H_4-NO_2\)
In simple words: The reactivity of aromatic compounds towards electrophilic substitution depends on the electron-donating or electron-withdrawing nature of substituents. Electron-donating groups increase reactivity, while electron-withdrawing groups decrease it. The more electron-withdrawing groups, the lower the reactivity.

🎯 Exam Tip: Understand the activating and deactivating effects of substituents on electrophilic aromatic substitution. Activating groups (e.g., -CH3) increase reactivity, while deactivating groups (e.g., -NO2, -Cl) decrease it. Stronger deactivating groups lead to lower reactivity.

 

Question 23. बेन्जीन, m-डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रीकरण आसानी से होता है और क्यों?
Answer: \(CH_3\) समूह इलेक्ट्रॉनदाता समूह होता है जबकि \(-NO_2\) समूह इलेक्ट्रॉन निष्कासक होता है। अतः अधिकतम इलेक्ट्रॉन घनत्व टॉलूईन में होगा उससे कम बेंजीन में तथा सबसे कम m-डाइनाइट्रोबेंजीन में। अतः नाइट्रीकरण का घटता हुआ क्रम निम्न होगा- टॉलूईन > बेंजीन > m-डाइनाइट्रोबेंजीन
In simple words: Nitration is an electrophilic substitution reaction. Toluene has an electron-donating methyl group, which activates the ring and makes nitration easiest. Benzene is moderately reactive. m-Dinitrobenzene has two electron-withdrawing nitro groups, which strongly deactivate the ring, making nitration most difficult.

🎯 Exam Tip: For electrophilic aromatic substitution, electron-donating groups activate the ring (increase reactivity), and electron-withdrawing groups deactivate it (decrease reactivity). The more electron-donating groups, the faster the reaction, and vice versa.

 

Question 24. बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड के स्थान पर कोई दूसरा लूइस अम्ल सुझाइए।
Answer: निर्जल \(FeCl_3, SnCl_4, BF_3\) आदि ।
In simple words: Other Lewis acids like anhydrous ferric chloride, tin tetrachloride, or boron trifluoride can also be used in place of anhydrous aluminum chloride to catalyze the ethylation of benzene.

🎯 Exam Tip: Any strong Lewis acid can act as a catalyst in Friedel-Crafts alkylation and acylation reactions, as their role is to generate the electrophile (carbocation or acylium ion).

 

Question 25. क्या कारण है कि वुज अभिक्रिया विषम संख्याकार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Answer: विषम संख्या कार्बन परमाणु युक्त ऐल्केनों के बनाने में दो ऐल्किल हैलाइडों का प्रयोग किया जाता है। ये दो ऐल्किल हैलाइड तीन भिन्न प्रकारों से अभिकृत होकर वांछित ऐल्केन के स्थान पर तीन ऐल्केनों का मिश्रण बनाते हैं। 1-ब्रोमोप्रोपेन तथा 1-ब्रोमोब्यूटेन की वुटुंज अभिक्रिया से हेक्सेन, हेप्टेन तथा ऑक्टेन का मिश्रण प्राप्त होता है जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
\(CH_3CH_2CH_2-Br + 2Na + Br-CH_2CH_2CH_3 \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} CH_3CH_2CH_2CH_2CH_2CH_3 + 2NaBr\)
1-ब्रोमोप्रोपेन
1-ब्रोमोप्रोपेन
हेक्सेन
\(CH_3CH_2CH_2-Br + 2Na + Br-CH_2CH_2CH_2CH_3 \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} CH_3CH_2CH_2CH_2CH_2CH_2CH_3 + 2NaBr\)
1-ब्रोमोप्रोपेन
1-ब्रोमोब्यूटेन
हेप्टेन
\(CH_3CH_2CH_2CH_2-Br + 2Na + Br-CH_2CH_2CH_2CH_3 \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} CH_3CH_2CH_2CH_2CH_2CH_2CH_2CH_3 + 2NaBr\)
ऑक्टेन
In simple words: Wurtz reaction is not preferred for synthesizing odd-numbered carbon alkanes from two different alkyl halides because it produces a mixture of three alkanes, making purification of the desired odd-numbered alkane difficult and inefficient. For example, reacting 1-bromopropane with 1-bromobutane yields hexane, heptane, and octane.

🎯 Exam Tip: The Wurtz reaction is best for synthesizing symmetrical alkanes (even number of carbons) using a single alkyl halide. For unsymmetrical alkanes, a mixture of products is formed, which reduces the yield of the desired product and complicates purification.

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित में कौन-सा ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है?
(i) बेंजीन
(ii) ऐनिलीन
(iii) साइक्लोहेक्सेन
(iv) पिरीडीन
Answer: (iii) साइक्लोहेक्सेन
In simple words: Cyclohexane is not an aromatic compound because it is an alkane, lacking the conjugated \(\pi\)-electron system and planarity required for aromaticity. Benzene, aniline, and pyridine all meet the criteria for aromaticity.

🎯 Exam Tip: Aromatic compounds must satisfy Huckel's rule (\(4n+2\) \(\pi\)-electrons), be cyclic, planar, and fully conjugated. Cyclohexane is saturated and not planar, thus it's non-aromatic.

 

Question 2. निम्नलिखित ब्यूटेनॉल के सम्भव समावयवियों में प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करने वाला यौगिक है।
(i) \(CH_3CHOHCH_2-CH_3\)
(ii) \(CH_3-CH_2 CH_2-CH_2-OH\)
(iii) \((CH_3)_2CHCH_2-OH\)
(iv) \((CH_3)_3COH\)
Answer: (i) \(CH_3CHOHCH_2-CH_3\)
In simple words: A compound exhibits optical isomerism if it has a chiral center, which is a carbon atom bonded to four different groups. In 2-butanol (\(CH_3CHOHCH_2-CH_3\)), the second carbon atom is bonded to H, OH, CH3, and CH2CH3, making it a chiral center and thus optically active.

🎯 Exam Tip: To identify optical isomerism, look for a chiral carbon (asymmetric carbon). A chiral carbon is sp³ hybridized and bonded to four distinct substituents. This is a key concept in stereochemistry.

 

Question 3. प्रयोगशाला में बॉयर अभिकर्मक का प्रयोग किया जाता है।
(i) द्विबन्ध की जाँच के लिए
(ii) ग्लूकोस की जाँच के लिए
(iii) अपचयन के लिए
(iv) ऑक्सीकरण के लिए
Answer: (i) द्विबन्ध की जाँच के लिए
In simple words: Baeyer's reagent (cold, dilute, alkaline KMnO4) is used to test for the presence of unsaturation (double or triple bonds) in organic compounds. The purple color of the reagent disappears as it reacts with the unsaturated bond, forming a diol.

🎯 Exam Tip: Baeyer's test is a classic qualitative test for unsaturation. A positive result (decolorization of purple \(KMnO_4\)) indicates the presence of C=C or C≡C bonds, as these can be oxidized by the reagent.

 

Question 4. ऐसीटिलीन अणु में हैं।
(i) 5 8 बन्ध
(ii) 4 0 तथा 1 त बन्ध
(iii) 3 0 तथा 2 त बन्ध
(iv) 2 0 तथा 3 त बन्ध
Answer: (iii) 3 σ तथा 2 π बन्ध
In simple words: ऐसीटिलीन (C₂H₂) में दो कार्बन परमाणु एक त्रिआबन्ध से जुड़े होते हैं, जिसमें एक सिग्मा (σ) बन्ध और दो पाई (π) बन्ध होते हैं, साथ ही प्रत्येक कार्बन से एक हाइड्रोजन सिग्मा बन्ध बनाता है, कुल मिलाकर 3 सिग्मा बन्ध और 2 पाई बन्ध होते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐसीटिलीन की आबंध प्रकृति को समझना, विशेषकर सिग्मा और पाई बन्धों की संख्या, संरचनात्मक विश्लेषण में महत्वपूर्ण है और अक्सर पूछा जाता है।

 

Question 5. C₅H₁₀ आणविक सूत्र वाले निम्न में से किस यौगिक के ओजोनी अपघटन से ऐसीटोन प्राप्त होती है?
(i) 3-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(ii) साइक्लोपेन्टेन
(iii) 2-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन
Answer: (iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन
In simple words: 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन का ओजोनी अपघटन करने पर ऐसीटोन और एथेनल बनता है, क्योंकि द्विआबन्ध के टूटने पर कीटोन और ऐल्डिहाइड बनते हैं।

🎯 Exam Tip: ओजोनी अपघटन अभिक्रिया का उपयोग अज्ञात ऐल्कीन की संरचना ज्ञात करने के लिए किया जाता है, उत्पादों के आधार पर मूल ऐल्कीन की संरचना का अनुमान लगाया जा सकता है।

 

Question 6. प्रोपाइन तथा प्रोपीन पहचाने जा सकते हैं।
(i) सांद्र H₂SO₄ द्वारा ।
(ii) CCl₄ में Br₂ के द्वारा।
(iii) तनु KMnO₄ द्वारा
(iv) अमोनियाकृत AgNO₃ द्वारा
Answer: (iv) अमोनियाकृत AgNO₃ द्वारा
In simple words: प्रोपाइन एक टर्मिनल ऐल्काइन है जिसमें अम्लीय हाइड्रोजन होता है जो अमोनियाकृत सिल्वर नाइट्रेट से क्रिया करके सफेद अवक्षेप बनाता है, जबकि प्रोपीन एक ऐल्कीन है और इस प्रकार की अभिक्रिया नहीं करती।

🎯 Exam Tip: टर्मिनल ऐल्काइन (जिसमें C≡C-H होता है) की पहचान करने के लिए अमोनियाकृत सिल्वर नाइट्रेट या क्यूप्रस क्लोराइड विलयन का उपयोग किया जाता है, जो विशिष्ट अवक्षेप देते हैं।

 

Question 7. निम्न में से कौन-सा यौगिक द्विध्रुव आघूर्ण प्रदर्शित करता है?
(i) 1,4- डाइक्लोरोबेंजीन
(ii) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन
(iii) ट्रान्स-1,2-डाइक्लोरोएथेन
(iv) ट्रान्स-ब्यूट-2-ईन
Answer: (ii) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन
In simple words: 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन में क्लोरीन परमाणु एक दूसरे के समीप होते हैं, जिससे बन्ध आघूर्ण रद्द नहीं होते और परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण उत्पन्न होता है, जबकि अन्य विकल्पों में सममिति के कारण द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।

🎯 Exam Tip: द्विध्रुव आघूर्ण की अवधारणा ज्यामितीय सममिति पर आधारित होती है; यदि किसी अणु में बन्ध आघूर्ण एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं, तो उसका कुल द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।

 

Question 8. रक्त-तप्त नलियों में C₂H₂ को गर्म करने पर कौन-सा यौगिक बनता है।
(i) एथिलीन
(ii) बेंजीन
(iii) एथेन
(iv) मेथेन
Answer: (ii) बेंजीन
In simple words: ऐसीटिलीन (C₂H₂) के तीन अणु रक्त-तप्त नलियों में चक्रीय बहुलकीकरण से जुड़कर बेंजीन (C₆H₆) बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐसीटिलीन का चक्रीय बहुलकीकरण बेंजीन के संश्लेषण की एक महत्वपूर्ण औद्योगिक विधि है, जिसे रेड हॉट आयरन ट्यूब अभिक्रिया के रूप में भी जाना जाता है।

 

Question 9. निम्न में से बेंजीन के सल्फोनीकरण में कौन भाग लेता है?
(i) SO₂
(ii) SO₃H⁺
(iii) SO₃
(iv) SO₃H⁻
Answer: (iii) SO₃
In simple words: बेंजीन के सल्फोनीकरण की अभिक्रिया में, सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO₃) एक इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप में कार्य करता है जो बेंजीन वलय पर आक्रमण करता है।

🎯 Exam Tip: बेंजीन के इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में सक्रिय इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रजाति को पहचानना क्रियाविधि को समझने और परीक्षा में सही उत्तर देने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. बेंजीन पर सूर्य के प्रकाश में क्लोरीन की अभिक्रिया से बनता है।
(i) पिक्रिक अम्ल
(ii) क्लोरोपिक्रिन
(iii) नाइट्रोमेथेन
(iv) गैमेक्सीन
Answer: (iv) गैमेक्सीन
In simple words: सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में बेंजीन पर क्लोरीन की अभिक्रिया से योगात्मक अभिक्रिया होती है, जिससे बेंजीन हेक्साक्लोराइड (गैमेक्सीन) बनता है, जो एक कीटनाशक है।

🎯 Exam Tip: बेंजीन की हैलोजनीकरण अभिक्रिया की शर्तों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है- अंधेरे में लुईस अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में प्रतिस्थापन होता है, जबकि सूर्य के प्रकाश में योगात्मक अभिक्रिया होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन या ऐल्केन से आप क्या समझते हैं?
या
ऐल्केनों को पैराफिन क्यों कहते हैं?
Answer: ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन वे यौगिक होते हैं जिनमें उपस्थित परमाणुओं की सभी श्रृंखलाएँ खुली हुई होती हैं, प्रत्येक कार्बन परमाणु की चारों संयोजकताएँ एकल आबन्धों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं तथा केवल कार्बन और हाइड्रोजन उपस्थित होते हैं। इने यौगिकों को ऐल्केन भी कहते हैं। चूंकि ये यौगिक (ऐल्केन) अन्य कार्बनिक यौगिकों की तुलना में कम क्रियाशील होते हैं; इसलिए इन्हें पैराफिन कहते हैं।
In simple words: ऐल्केन ऐसे हाइड्रोकार्बन होते हैं जिनमें केवल कार्बन और हाइड्रोजन परमाणु होते हैं, सभी बन्ध एकल होते हैं, और इनकी क्रियाशीलता कम होने के कारण इन्हें पैराफिन भी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: "पैराफिन" नाम ऐल्केनों की कम रासायनिक क्रियाशीलता को दर्शाता है, जो उनके संतृप्त स्वभाव और मजबूत C-C तथा C-H बन्धों के कारण होता है।

 

Question 2. ऐल्केनों की संरचना को स्पष्ट कीजिए।
Answer: ऐल्केनों में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp³ संकरित होता है अतः प्रत्येक कार्बन परमाणु की संरचना समचतुष्फलकीय होती है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक कार्बन परमाणु एक समचतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित होता है तथा उसकी संयोजकताएँ समचतुष्फलक के शीर्षों की ओर दिष्ट होती हैं। किन्हीं भी दो संयोजकताओं के मध्य 109°28' का कोण होता है। ऐल्केनों में C-C आबन्ध लम्बाई 1.54 तथा C-H आबन्ध लम्बाई 1.09Å होती है।
In simple words: ऐल्केनों में कार्बन परमाणु sp³ संकरित होते हैं, जिससे प्रत्येक कार्बन समचतुष्फलकीय ज्यामिति में होता है, बन्ध कोण 109°28' होता है, और C-C तथा C-H बन्धों की विशिष्ट लम्बाई होती है।

🎯 Exam Tip: ऐल्केनों की sp³ संकरण और समचतुष्फलकीय ज्यामिति उनकी स्थिरता और रासायनिक गुणों को निर्धारित करती है, जो संरचनात्मक प्रश्नों में महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. निम्नलिखित यौगिकों का संरचनात्मक सूत्र लिखिए
(i) 3, 4, 4, 5-टेट्रामेथिलहेप्टेन
(ii) 2, 5-डाइमेथिलहेक्सेन
Answer:
(i) CH₃-CH₂-CH(CH₃)=C(CH₃)₂-CH(CH₃)-CH₂-CH₃
(ii) CH₂-CH(CH₃)-CH₂-CH₂-CH(CH₃)₂CH₃
In simple words: दिए गए IUPAC नामों के लिए रासायनिक संरचनाएँ बनाई गई हैं।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण नियमों का पालन करते हुए सही संरचनात्मक सूत्र लिखना कार्बनिक रसायन विज्ञान में एक मूलभूत कौशल है, जिसके लिए मूल श्रृंखला की पहचान, प्रतिस्थापकों की स्थिति और उनकी सही संयोजकता का ज्ञान आवश्यक है।

 

Question 4. वुर्ट्ज अभिक्रिया द्वारा आप प्रोपेन किस प्रकार बनाएँगे?
Answer: एथिल आयोडाइड और मेथिल आयोडाइड की सोडियम से अभिक्रिया ईथर की उपस्थिति में कराने पर प्रोपेन एवं अन्य हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
In simple words: प्रोपेन बनाने के लिए, एथिल आयोडाइड और मेथिल आयोडाइड को सोडियम धातु के साथ ईथर में अभिक्रिया कराई जाती है, जिससे प्रोपेन के साथ अन्य हाइड्रोकार्बन भी बनते हैं।

🎯 Exam Tip: वुर्ट्ज अभिक्रिया सम-संख्या वाले कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केन बनाने के लिए आदर्श है, लेकिन विषम-संख्या वाले ऐल्केन बनाने पर उत्पादों का मिश्रण प्राप्त होता है, जिससे शुद्ध उत्पाद प्राप्त करना कठिन हो जाता है।

 

Question 5. प्रोपेन के विरचन के लिए किस अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होगी? अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए ।
Answer: प्रोपेन के विरचन के लिए ब्यूटेनोइक अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होती है।
In simple words: प्रोपेन बनाने के लिए, सोडियम ब्यूटेनोएट की आवश्यकता होती है, क्योंकि डीकार्बोक्सिलीकरण के माध्यम से एक कार्बन परमाणु कम हो जाता है।

🎯 Exam Tip: डीकार्बोक्सिलीकरण अभिक्रिया में, ऐल्केन में बनने वाले कार्बन परमाणुओं की संख्या सोडियम लवण वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल के कार्बन परमाणुओं की संख्या से एक कम होती है।

 

Question 6. ऐल्केन के शाखित होने से उसकी गलनांक किस प्रकार प्रभावित होगा?
Answer: ऐल्केन के शाखित होने से उसके अणु क्रिस्टल जालक में दूर-दूर हो जाते हैं। इससे गलनांक घट जाता है। यदि शाखित होने पर अणु सममित हो जाता है तो अणु क्रिस्टल जालक में निविड संकुलित हो जाते हैं जिससे गलनांक में वृद्धि हो जाती है।
In simple words: ऐल्केनों में शाखाकरण आमतौर पर गलनांक को कम करता है क्योंकि अणु कम पास-पास फिट होते हैं, लेकिन अत्यधिक सममित शाखाकरण अणुओं को बेहतर ढंग से पैक करने में मदद कर सकता है और गलनांक बढ़ा सकता है।

🎯 Exam Tip: गलनांक पर शाखाकरण का प्रभाव दो कारकों पर निर्भर करता है: पैकिंग दक्षता (सममिति) और वान्डरवाल्स बलों का सतह क्षेत्र, जो कभी-कभी विरोधाभासी परिणाम दे सकते हैं।

 

Question 7. ऐल्केनों की दहन अभिक्रिया को समझाइए ।
Answer: ऐल्केनें ऑक्सीजन या वायु की अधिकता में ज्योतिहीन ज्वाला के साथ जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाती हैं। अभिक्रिया में ऊष्मा (heat) और प्रकाश (light) निकलते हैं।
CH₄ + 2O₂ \( \longrightarrow \) CO₂ + 2H₂O + 212.8Kcal
C₂H₆ + 3O₂ \( \longrightarrow \) 2CO₂ + 3H₂O + 373.0 Kcal
मेथेन और वायु (आधिक्य) के मिश्रण को प्रज्वलित करने पर विस्फोट होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं। कोयले की खानों में विस्फोट होने का यही कारण है।
In simple words: ऐल्केनें ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलती हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, जल और बड़ी मात्रा में ऊष्मा तथा प्रकाश ऊर्जा निकलती है, जो एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है।

🎯 Exam Tip: ऐल्केनों का दहन एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है और ऊर्जा उत्पादन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो समीकरणों को संतुलित करते समय उत्पादों (CO₂, H₂O) और ऊर्जा परिवर्तन को सटीक रूप से दर्शाना आवश्यक बनाता है।

 

Question 8. ऐल्केनों के ताप अपघटन को समझाइए ।
Answer: वायु की अनुपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करने से कार्बनिक यौगिक का तापीय अपघटन (thermal decomposition) उनका ताप अपघटन (pyrolysis) कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख मेथेन से कार्बन ब्लैक और हाइड्रोजन के बनने को दर्शाता है, साथ ही एथेन से एथिलीन और हाइड्रोजन के उत्पादन को भी। यह बताता है कि कैसे उच्च ताप पर ऐल्केन छोटे अणुओं में टूटते हैं, जिसे भंजन कहते हैं।
CH₄ \[ \xrightarrow{1000^\circ C} \] C + 2H₂
मेथेन कार्बन ब्लैक
CH₃CH₃ \[ \xrightarrow{500^\circ C \\ (Cr_2O_3 + Al_2O_3)} \] CH₂=CH₂ + H₂
एथेन एथिलीन
उच्च ऐल्केनें वायु की अनुपस्थिति में, उच्च ताप (500-600°C) पर गर्म करने पर छोटे अणुओं में अपघटित हो जाती है। उच्च अणु भार को ऐल्केनों का लघु अणु भार के हाइड्रोकार्बनों में ताप अपघटन भंजन (cracking) कहलाता है। किसी ऐल्केन के भंजन से प्राप्त उत्पाद ऐल्केन की संरचना दाब, ताप, उत्प्रेरक की उपस्थिति आदि कारकों पर निर्भर करते हैं।
In simple words: ताप अपघटन या पायरोलिसिस वह प्रक्रिया है जिसमें ऐल्केन को वायु की अनुपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करके छोटे हाइड्रोकार्बन अणुओं में तोड़ा जाता है, जिसे भंजन (cracking) भी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: भंजन (cracking) एक महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रक्रिया है जिसका उपयोग बड़े हाइड्रोकार्बन से छोटे, अधिक उपयोगी हाइड्रोकार्बन जैसे गैसोलीन और ऐल्कीन बनाने के लिए किया जाता है।

 

Question 9. ऐल्केनों के भंजन में C-H आबंधों के स्थान पर C-C आबंध क्यों टूटते हैं।
Answer: C-C आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा C-H आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा की तुलना में कम होती है। इसलिए ऐल्केनों के भंजन के दौरान C-Cआबंध C-H आबंधों की तुलना में आसानी से टूटते हैं।
In simple words: ऐल्केन के भंजन के दौरान C-C बन्ध C-H बन्धों की तुलना में पहले टूटते हैं क्योंकि C-C बन्धों को तोड़ने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: बन्ध वियोजन ऊर्जा का ज्ञान यह समझने में मदद करता है कि रासायनिक अभिक्रियाओं के दौरान कौन से बन्ध टूटने की अधिक संभावना रखते हैं, जिससे अभिक्रिया की दिशा और उत्पादों का निर्धारण होता है।

 

Question 10. सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध संरूपणों को पृथक करना संभव क्यों नहीं है?
Answer: एथेन के दो चरम रूपों (ग्रसित तथा सांतरित संरूपणों) के मध्य ऊर्जा का अंतर 12.5 kJ mol⁻¹ होता है जो कि बहुत कम है। सामान्य ताप पर अंतराण्विक संघट्टों के द्वारा एथेन अणु में तापीय तथा गतिज ऊर्जा होती है जो 12.5kJ mol⁻¹ के ऊर्जा अवरोध को पार करने में सक्षम होती है। इसलिए सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध ग्रसित तथा शुद्ध सांतरित संरूपणों को पृथक् करना संभव नहीं है।
In simple words: एथेन के विभिन्न संरूपणों (जैसे ग्रसित और सांतरित) के बीच ऊर्जा का अंतर इतना कम होता है कि सामान्य तापमान पर अणु आसानी से एक से दूसरे में बदल जाते हैं, इसलिए उन्हें अलग करना संभव नहीं होता।

🎯 Exam Tip: संरूपणीय समावयवों को सामान्यतः उनके निम्न ऊर्जा अवरोधों के कारण पृथक नहीं किया जा सकता है, जो उनके बीच तेजी से अंतर-रूपांतरण की अनुमति देता है।

 

Question 11. ऐल्कीन क्या हैं तथा इन्हें ओलीफिन क्यों कहते हैं?
Answer: वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्कीन कहलाते हैं। ऐल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य एथिलीन है जो क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके तेल जैसा पदार्थ एथिलीन डाइक्लोराइड बनाता है। इसीलिए इस श्रेणी के सदस्यों को ओलीफिन (तेल बनाने वाला) कहते हैं।
In simple words: ऐल्कीन ऐसे असंतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं जिनमें कम से कम एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध होता है, और उन्हें "ओलीफिन" भी कहते हैं क्योंकि कुछ ऐल्कीन तेल जैसे पदार्थ बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: "ओलीफिन" नाम ऐल्कीनों की एक विशिष्ट रासायनिक गुणधर्म को दर्शाता है - हैलोजनों के साथ अभिक्रिया करके तैलीय पदार्थ बनाना, जो उनके द्विआबन्ध की पहचान करने में मदद करता है।

 

Question 12. निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
(i) (CH₃)₂CH-CH=CH-CH₂-CH=CH-CH(C₂H₅)-CH₃
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक चक्रीय संरचना को दर्शाता है जिसमें चार कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध एक वलय में व्यवस्थित हैं, जो ऑक्टा-1,3,5,7-टेट्राईन का प्रतिनिधित्व करता है।
(iii) CH₂=C(CH₂CH₂CH₃)₂
CH₃CH₂CH₂CH₂
(iv)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक शाखित ऐल्कीन की संरचना को दर्शाता है जिसमें मुख्य श्रृंखला में एक द्विआबन्ध है और प्रतिस्थापी जुड़े हुए हैं। संरचना CH₃-CH-CH=C-CH₂-CH-CH₃ है जिसमें एक C₂H₅ समूह भी CH₃ के नीचे दिया गया है, जो संभवतः C₂H₅ प्रतिस्थापी को दर्शाता है। यह 4-एथिल-2,6-डाइमेथिलडेके-4-ईन का प्रतिनिधित्व करता है।
Answer:
1. 2,8-डाइमेथिल डेका-3,6-डाइईन
2. ऑक्टा -1,3,5,7-टेट्राईन
3. 2-प्रोपिलपेन्ट-1-ईन
4. 4-एथिल-2,6-डाइमेथिलडेके-4-ईन
In simple words: दिए गए रासायनिक सूत्रों को IUPAC नामकरण नियमों के अनुसार व्यवस्थित करके उनके सही नाम ज्ञात किए गए हैं।

🎯 Exam Tip: जटिल हाइड्रोकार्बनों का IUPAC नामकरण करते समय, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन करना, प्रतिस्थापकों को सबसे कम संख्या देना, और द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध की स्थिति को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. ऐल्कीनों में संरचनात्मक समावयवता को उदाहरण देकर समझाइए ।
Answer: ऐल्कीन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य (एथीन तथा प्रोपीन) समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सदस्य स्थिति समावयवता तथा श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणुसूत्र C₄H₈ तीन समावयवी ऐल्कीनों को प्रदर्शित करता है।
I. CH₂ = CH-CH₂-CH₃
ब्यूट-1-ईन
II. CH₃-CH=CH-CH₃
ब्यूट-2-ईन
III. CH₂ = C-CH₃
CH₃
2-मेथिलप्रोप-1-ईन
यहाँ संरचनाएँ। और ।। स्थिति समावयवियों को और संरचनाएँ। और || तथा ।। और || श्रृंखला समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं।
In simple words: ऐल्कीनों में कार्बन श्रृंखला या द्विआबन्ध की स्थिति में भिन्नता के कारण संरचनात्मक समावयवता पाई जाती है, जैसे ब्यूट-1-ईन, ब्यूट-2-ईन (स्थिति समावयवी) और 2-मेथिलप्रोप-1-ईन (श्रृंखला समावयवी) में C₄H₈ अणुसूत्र होता है।

🎯 Exam Tip: ऐल्कीनों में समावयवता का प्रदर्शन द्विआबन्ध की स्थिति और कार्बन श्रृंखला की शाखाकरण दोनों से प्रभावित होता है; सुनिश्चित करें कि आप सभी संभावित संरचनाओं को आकर्षित करें और उन्हें सही ढंग से नाम दें।

 

Question 14. निम्नलिखित यौगिकों के समपक्ष (cis) तथा विपक्ष (trans) समावयवी बनाइए और उनके IUPAC नाम लिखिए
(i) CHCl = CHCl
(ii) C₂H₅C(CH₃)=C(CH₃)C₂H₅
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख 1,2-डाइक्लोरोएथीन के समपक्ष (cis) और विपक्ष (trans) समावयवों को दर्शाता है। समपक्ष रूप में, क्लोरीन परमाणु द्विआबन्ध के एक ही तरफ होते हैं, जबकि विपक्ष रूप में वे विपरीत दिशाओं में होते हैं। इसी तरह, 3,4-डाइमेथिलहेक्स-3-ईन के समपक्ष और विपक्ष रूप भी दिखाए गए हैं, जहाँ मेथिल और एथिल समूह द्विआबन्ध के सापेक्ष उनकी स्थिति के अनुसार व्यवस्थित हैं।
(i)
H
C=C
Cl
Cl
cis-1,2-डाइक्लोरोएथीन

H
C=C
Cl
H
trans-1,2-डाइक्लोरोएथीन
(ii)
CH₃
C=C
CH₃
CH₃CH₂
CH₂CH₃
cis-3,4-डाइमेथिलहेक्स-3-ईन

H₃C
C=C
CH₂CH₃
CH₃
CH₂CH₃
trans-3,4-डाइमेथिलहेक्स-3-ईन
In simple words: समपक्ष (cis) समावयव में, समान समूह द्विआबन्ध के एक ही तरफ होते हैं, जबकि विपक्ष (trans) समावयव में वे विपरीत तरफ होते हैं, और दोनों की संरचनाएँ भिन्न होती हैं।

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय समावयवता (cis-trans) केवल उन ऐल्कीनों में पाई जाती है जहाँ द्विआबन्ध से जुड़े प्रत्येक कार्बन पर भिन्न समूह होते हैं; cis और trans रूपों के भौतिक गुणों में अंतर होता है।

 

Question 15. किस धातु का कार्बाइड जल से क्रिया करके ऐसीटिलीन गैस उत्पन्न करता है? रासायनिक समीकरण दीजिए ।
Answer:
In simple words: कैल्शियम कार्बाइड जल के साथ अभिक्रिया करके ऐसीटिलीन गैस उत्पन्न करता है।

🎯 Exam Tip: कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂) से ऐसीटिलीन का उत्पादन प्रयोगशाला में ऐसीटिलीन बनाने की एक सामान्य विधि है और इसमें जल के साथ एक विशिष्ट अभिक्रिया होती है।

 

Question 16. ऐल्कीनों के सामान्य भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
Answer: ऐल्कीनों के प्रमुख सामान्य भौतिक गुण निम्नवत् हैं
1. इस श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य एथीन, प्रोपीन तथा ब्यूटीन रंगहीन गैसें हैं। इसके बाद के | C₁₆H₃₂ तक के सदस्य द्रव तथा इससे ऊँचे सदस्य ठोस होते हैं।
2. ये जल में अविलेय होते हैं परन्तु ऐल्कोहॉल, बेंजीन तथा ईथर जैसे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
In simple words: ऐल्कीन रंगहीन होते हैं; C₂ से C₄ गैसें, C₅ से C₁₆ द्रव, और उससे ऊपर ठोस होते हैं; ये जल में अविलेय लेकिन कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐल्कीनों के भौतिक गुण उनके अणुभार पर निर्भर करते हैं, जिससे श्रृंखला की लंबाई बढ़ने के साथ भौतिक अवस्था, घनत्व, गलनांक और क्वथनांक में क्रमिक परिवर्तन होता है।

 

Question 17. एथेन की तुलना में एथिलीन अधिक क्रियाशील है। क्यों?
Answer: एथिलीन में 1 π बन्धं उपस्थित है इसलिए एथिलीन, एथेन की तुलना में अधिक क्रियाशील है।
In simple words: एथिलीन में कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध में एक कमजोर पाई (π) बन्ध होता है, जो एथेन के केवल एकल बन्धों की तुलना में इसे अधिक क्रियाशील बनाता है, क्योंकि पाई बन्ध आसानी से टूट सकता है।

🎯 Exam Tip: पाई (π) बन्ध की उपस्थिति ऐल्कीनों और ऐल्काइनों की विशेषता है, जिससे वे ऐल्केनों की तुलना में योगात्मक अभिक्रियाओं के प्रति अधिक प्रतिक्रियाशील होते हैं।

 

Question 18. HCl, HBr, HI तथा HF को उनकीं ऐल्कीनों से क्रियाशीलता के घटते क्रम में व्यवस्थित कीजिए ।
Answer: HI > HBr > HCl > HF
In simple words: ऐल्कीनों के साथ हाइड्रोजन हैलाइडों की क्रियाशीलता का क्रम HI से HF तक घटता जाता है, क्योंकि हाइड्रोजन-हैलोजन बन्ध की शक्ति इसी क्रम में बढ़ती है (HI सबसे कमजोर, HF सबसे मजबूत) और H⁺ आयन की सुलभता घटती है।

🎯 Exam Tip: हाइड्रोजन हैलाइडों की क्रियाशीलता हैलोजन के आकार और बन्ध सामर्थ्य पर निर्भर करती है; बड़े और कमजोर बन्ध वाले हैलाइड (जैसे HI) अधिक क्रियाशील होते हैं।

 

Question 19. एथेन और एथीन में कैसे विभेद करेंगे?
Answer:
एथेन और एथीन में विभेद परीक्षण

परीक्षणएथेनएथीन
यौगिक + Cu₂Cl₂ + NH₄OHलाल अवक्षेप नहीं बनता है।CuC = CCu का लाल अवक्षेप बनता है।
यौगिक + AgNO₃ + NH₄OHसफेद अवक्षेप नहीं बनता है।AgC = CAg का सफेद अवक्षेप बनता है।

In simple words: एथेन और एथीन को अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट या अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन का उपयोग करके पहचाना जा सकता है, क्योंकि एथीन (एक ऐल्कीन) इन अभिकर्मकों के साथ अभिक्रिया नहीं करती, जबकि एथाइन (एक टर्मिनल ऐल्काइन, यदि यह भ्रमित हो तो एथीन के बजाय एथाइन को लक्षित करेगा) अवक्षेप बनाती है। (यहाँ दिए गए उत्तर में एथीन के लिए CuC=CCu और AgC=CAg दिया है, जो वास्तव में एथाइन (acetylenes) के लिए होता है, एथीन (ethylene) नहीं.)
Self-correction: The table provided in the OCR for "एथीन" actually describes the reactions of "एथाइन" (Ethyne or Acetylene) with Tollens' reagent (ammoniacal AgNO3) and Fehling's solution (ammoniacal Cu2Cl2). Ethyne (an alkyne) gives a precipitate, whereas Ethane (alkane) and Ethene (alkene) do not. Given the question is about "एथेन" and "एथीन", the table's "एथीन" column is chemically incorrect for ethene. However, my rule is to extract verbatim. I will add a note in the simple words or Exam Tip if possible, but the answer itself should be as provided. In simple words, I noted the discrepancy.

🎯 Exam Tip: ऐल्कीन और ऐल्काइन के बीच विभेद करने के लिए ब्रोमीन जल परीक्षण या बेयर अभिकर्मक (तनु, क्षारीय KMnO₄) जैसे परीक्षणों का उपयोग किया जाता है, जहाँ ऐल्काइन और ऐल्कीन दोनों रंगहीन हो जाते हैं, जबकि ऐल्केन नहीं। टर्मिनल ऐल्काइन को ऐल्कीन से अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट या क्यूप्रस क्लोराइड से विभेदित किया जा सकता है।

 

Question 20. ऐल्काइन क्या हैं?
Answer: वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्काइन कहलाते हैं। इनमें उपस्थित त्रि-आबन्धों को ऐसीटिलीनिक आबन्ध भी कहते हैं।
In simple words: ऐल्काइन ऐसे असंतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं जिनमें कार्बन-कार्बन त्रिआबन्ध होता है, और इन त्रिआबन्धों को ऐसीटिलीनिक बन्ध भी कहते हैं। (नोट: दिए गए उत्तर में "द्वि-आबन्ध" लिखा है, जो एक टाइपो है, इसे "त्रि-आबन्ध" होना चाहिए।)

🎯 Exam Tip: ऐल्काइन की पहचान उनके कार्बन-कार्बन त्रिआबन्ध से होती है, जो उन्हें ऐल्केन और ऐल्कीन से अलग करता है और विशिष्ट रासायनिक क्रियाशीलता प्रदान करता है।

 

Question 21. ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म लिखिए ।
Answer: ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म निम्नवत् हैं-
1. ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य (C₂ से C₄) गैसें, अगले आठ सदस्य (C₅ से C₁₂) द्रव तथा शेष उच्च सदस्य ठोस हैं।
2. ऐल्काइनें रंगहीन तथा स्वादहीन होती हैं।
3. ऐल्काइनें जल में लगभग अविलेय और कार्बनिक विलायकों में विलेय होती हैं।
4. ऐल्काइनों के गलनांक, क्वथनांक और आपेक्षिक घनत्व उनके अणुभार बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते हैं।
In simple words: ऐल्काइनें रंगहीन और स्वादहीन होती हैं, कम अणुभार वाले गैसें, मध्यम वाले द्रव और उच्च अणुभार वाले ठोस होते हैं; ये जल में कम विलेय लेकिन कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होते हैं, और अणुभार बढ़ने पर इनके गलनांक, क्वथनांक तथा घनत्व बढ़ते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐल्काइनों के भौतिक गुण (अवस्था, रंग, विलेयता, गलनांक, क्वथनांक) उनके अणुभार और अंतर-आणविक बलों पर निर्भर करते हैं, जो हाइड्रोकार्बन की अन्य श्रेणियों के समान प्रवृत्ति दर्शाते हैं।

 

Question 22. एथीन और एथाइन में विभेद करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले दो अभिकर्मकों के नाम लिखिए।
Answer: अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन और अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन ।
In simple words: एथीन (ऐल्कीन) और एथाइन (टर्मिनल ऐल्काइन) के बीच अंतर करने के लिए अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट या क्यूप्रस क्लोराइड विलयन का उपयोग किया जाता है; एथाइन इन अभिकर्मकों के साथ अवक्षेप बनाती है, जबकि एथीन नहीं।

🎯 Exam Tip: टर्मिनल ऐल्काइन की अम्लीय प्रकृति के कारण, यह सिल्वर या कॉपर के धातु व्युत्पन्न बनाती है, जो रंगीन अवक्षेप के रूप में दिखाई देते हैं और इसे गैर-टर्मिनल ऐल्काइन और ऐल्कीन से अलग करते हैं।

 

Question 23. ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: वे हाइड्रोकार्बन तथा उनके ऐल्किल, ऐल्किनिल एवं एल्काइनिल व्युत्पन्न जिनमें एक अथवा अधिक बेंजीन वलय होती हैं, ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-बेंजीन, टॉलूईन, नैफ्थेलीन, बाइफेनिल आदि ।
In simple words: ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, जिन्हें ऐरीन भी कहते हैं, ऐसे कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनमें एक या एक से अधिक बेंजीन वलय होती हैं और वे विशेष ऐरोमैटिकता गुणों का पालन करते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐरोमैटिकता हकल नियम (4n+2 π इलेक्ट्रॉन) द्वारा परिभाषित एक विशिष्ट स्थिरता है, जो ऐरोमैटिक यौगिकों के अद्वितीय रासायनिक व्यवहार के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 24. निम्न के IUPAC नाम लिखिए
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख दो कार्बनिक यौगिकों को दर्शाता है। पहला है CH₃-CH(OH)-CH(C₆H₅)-CHO, जिसमें एक ऐल्डिहाइड, एक हाइड्रॉक्सिल समूह और एक फेनिल समूह है। दूसरा है CH₃-C(=O)-O-CH₂-CH₃, जो एक एस्टर है।
(i) CH₃-CH-CH-CHO
OH
(ii) CH₃-C-O-CH₂-CH₃
O
Answer:
1. 2-हाइड्रॉक्सी 3-फेनिल ब्यूटेनल,
2. एथिल एथेनोएटप्रश्न
In simple words: दिए गए संरचनात्मक सूत्रों के IUPAC नाम क्रमशः 2-हाइड्रॉक्सी-3-फेनिलब्यूटेनल और एथिल एथेनोएट हैं।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में कार्यात्मक समूहों की प्राथमिकता, लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन और प्रतिस्थापकों की सही स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर जटिल अणुओं के लिए।

 

Question 25. प्रोपाइन, ब्यूट डाइईन, बेंजीन में से किसमें सर्वाधिक आबंध हैं?
Answer: बेंजीन में (3)।
In simple words: दिए गए यौगिकों में, बेंजीन में कुल 3 पाई बन्ध होते हैं (हालांकि वे विस्थानीकृत होते हैं), जो प्रोपाइन (2 पाई बन्ध) और ब्यूट-डाईईन (2 पाई बन्ध) से अधिक हैं।

🎯 Exam Tip: एक अणु में पाई बन्धों की संख्या उसके असंतृप्तता की डिग्री को दर्शाती है और विभिन्न कार्बनिक यौगिकों की तुलना करते समय यह एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक विशेषता है।

 

Question 26. बेंजीन अति असंतृप्त होती है परन्तु फिर भी यह योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती है। क्यों?
Answer: ऐसा इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalization) के कारण अतिरिक्त स्थायित्व के कारण होता है।
In simple words: बेंजीन में पाई इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है, जिससे उसे अतिरिक्त स्थिरता मिलती है, और यह स्थिरता योगात्मक अभिक्रियाओं के बजाय प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं को प्राथमिकता देती है ताकि उसका ऐरोमैटिक चरित्र बना रहे।

🎯 Exam Tip: बेंजीन की अद्वितीय स्थिरता और प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति उसकी वरीयता ऐरोमैटिकता की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन है, जो हकल नियम द्वारा शासित होती है।

 

Question 27. मेसीटिलीन के ओजोनी अपघटन के उद क्या होंगे?
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख मेसीटिलीन (1,3,5-ट्राइमेथिलबेंजीन) के ओजोनी अपघटन को दर्शाता है। मेसीटिलीन की बेंजीन वलय पर तीन मेथिल समूह लगे होते हैं। जब इसका ओजोनी अपघटन होता है, तो बेंजीन वलय के द्विआबन्ध टूट जाते हैं और परिणामस्वरूप मेथिलग्लाइऑक्सल (3CH₃-C(=O)-CH=O) के तीन अणु प्राप्त होते हैं।
CH₃
\[ \qquad \quad \qquad \xrightarrow{O_3/CH_2Cl_2, 196 K \\ Zn/H_2O} \] 3CH₃-C-CH=O
H₃C CH₃ मेथिलग्लाइऑक्सल
In simple words: मेसीटिलीन के ओजोनी अपघटन से मेथिलग्लाइऑक्सल के तीन अणु प्राप्त होते हैं, क्योंकि बेंजीन वलय के तीनों द्विआबन्ध टूटते हैं और कार्बन परमाणु ऑक्सीजन से जुड़कर ऐल्डिहाइड और कीटोन समूह बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: ओजोनी अपघटन बेंजीन वलय पर प्रतिस्थापकों की स्थिति निर्धारित करने के लिए एक मूल्यवान विधि है; उत्पाद वलय के विखण्डन के तरीके को दर्शाते हैं।

 

Question 28. फ्रीडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
Answer:
C₆H₆ + CH₃Cl \[ \xrightarrow{AlCl_3} \] C₆H₅CH₃ + HCl
बेन्जीन टॉलूईन
In simple words: फ्रीडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया एक इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है जिसमें बेंजीन ऐलुमिनियम क्लोराइड जैसे लुईस अम्ल की उपस्थिति में मेथिल क्लोराइड के साथ क्रिया करके टॉलूईन बनाती है।

🎯 Exam Tip: फ्रीडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया (ऐल्किलीकरण या ऐसिलीकरण) बेंजीन वलय में कार्बनिक समूहों को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, जिसमें लुईस अम्ल उत्प्रेरक (जैसे AlCl₃) की आवश्यकता होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. ऐल्केनों में पायी जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए ।
Answer: ऐल्केन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य अर्थात् मेथेन, एथेन तथा प्रोपेन समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सभी सदस्य श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणु सूत्र C₄H₁₀, C₅H₁₂, तथा C₆H₁₄ द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की संरचनाएँ तथा उनके नाम निम्नवत् हैं।
अणु सूत्र संरचना सूत्र नाम
1. C₄H₁₀
(i) CH₃-CH₂-CH₂-CH₃
ब्यूटेन (n-ब्यूटेन)
(ii) CH₃-CH-CH₃
CH₃
2-मेथिलप्रोपेन (आइसोब्यूटेन)
2. C₅H₁₂
(i) CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃
पेन्टेन (n-पेन्टेन)
(ii) CH₃-CH₂-CH-CH₃
CH₃
2-मेथिलब्यूटेन (आइसोपेन्टेन)
(iii) CH₃-C-CH₃
CH₃
2, 2-डाइमेथिलप्रोपेन (निओपेन्टेन)
3. C₆H₁₄
(i) CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃
हेक्सेन (n-हेक्सेन)
(ii) CH₃-CH₂-CH₂-CH-CH₃
CH₃
2-मेथिलपेन्टेन (आइसोहेक्सेन)
(iii) CH₃-CH₂-CH-CH₂-CH₃
CH₃
3-मेथिलपेन्टेन
स्पष्ट है कि अणु सूत्र C₄H₁₀, C₅H₁₂ तथा C₂H₁₄ द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की कुल संख्या क्रमशः दो, तीन व पाँच हैं। ऐल्केनों में किसी अन्य प्रकार की संरचनात्मक समावयवता नहीं पायी जाती है।
In simple words: ऐल्केनों में मुख्य रूप से श्रृंखला समावयवता पाई जाती है, जहाँ एक ही आण्विक सूत्र वाले यौगिकों में कार्बन श्रृंखला की व्यवस्था भिन्न होती है, जिससे विभिन्न शाखाएँ बनती हैं।

🎯 Exam Tip: ऐल्केनों की श्रृंखला समावयवता उनकी रासायनिक और भौतिक गुणों को प्रभावित करती है, इसलिए विभिन्न आइसोमर्स की पहचान और नामकरण करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. एक ऐल्केन (अणुभार = 72) मोनोक्लोरीनीकरण करने पर केवल एक क्रियाफल देती है। ऐल्केन का नाम बताइए।
Answer: ऐल्केन का सामान्य सूत्र CnH₂n+₂ होता है।
ऐल्केन का अणुभार = nC + (2n + 2)H
72 = n x 12 + 2n + 2
n=5
अतः अणुसूत्र C₅H₁₂ होगा। इसके तीन समावयवी सम्भव हैं।
(i) CH₃CH₂CH₂CH₂-CH₃ पेन्टेन
(ii) CH₃-CH-CH₂-CH₃ 2-मेथिल ब्यूटेन
CH₃
(iii) CH₃-C-CH₃ 2, 2-डाइमेथिल प्रोपेन
CH₃
प्रश्नानुसार, ऐल्केन का मोनो क्लोरीनीकरण कराने पर केवल एक उत्पाद बनता है; अतः सभी हाइड्रोजन एक जैसे होने चाहिए। इसलिए वह ऐल्केन 2, 2-डाइमेथिल प्रोपेन होगी ।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख 2,2-डाइमेथिलप्रोपेन की संरचना को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय कार्बन से चार मेथिल समूह जुड़े हुए हैं। यह अणु अत्यधिक सममित है, जिससे इसके सभी हाइड्रोजन परमाणु रासायनिक रूप से समतुल्य हो जाते हैं।
CH₃
CH₃-C-CH₃
CH₃
2, 2-डाइमेथिल प्रोपेन
In simple words: यदि किसी ऐल्केन का मोनोक्लोरीनीकरण करने पर केवल एक उत्पाद बनता है, तो इसका अर्थ है कि उस ऐल्केन में सभी हाइड्रोजन परमाणु समान होते हैं; C₅H₁₂ अणुसूत्र के लिए यह यौगिक 2,2-डाइमेथिलप्रोपेन (नियोपेन्टेन) है।

🎯 Exam Tip: मोनोक्लोरीनीकरण उत्पाद की संख्या ऐल्केन में रासायनिक रूप से समतुल्य हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या दर्शाती है; केवल एक उत्पाद का अर्थ है कि सभी हाइड्रोजन परमाणु एक समान हैं।

 

Question 3. ऐल्केनों के भौतिक गुणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer: ऐल्केनों के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-
1. अवस्था-ऋजु श्रृंखला ऐल्केनों के प्रथम चार सदस्य (C₁ से C₄) रंगहीन, गंधहीन गैसें हैं। अगले उच्च सदस्य (C₅ से C₁₇) रंगहीन वाष्पशील द्रव हैं तथा और उच्च सदस्य रंगहीन ठोस हैं।
2. विलेयता-ऐल्केन अध्रुवीय प्रकृति की होने के कारण ध्रुवीय विलायकों में अविलेय लेकिन अध्रुवीय कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं (समान समान को घोलता है)।
3. घनत्व –ऐल्केनों के घनत्व ऐल्केनों के अणुभार बढ़ने के साथ बढ़ते हैं। किसी भी ऐल्केन का घनत्व 0.8 gcm⁻³ से अधिक नहीं है अर्थात् सभी ऐल्केनें जल से हल्की होती हैं।
4. क्वथनांक-सीधी श्रृंखला या n-ऐल्केनों के क्वथनांक कार्बन परमाणुओं की संख्या बढ़ने पर नियमित रूप से बढ़ते हैं। सामान्यतः श्रेणी के दो उत्तरोत्तर सदस्यों (प्रथम कुछ सदस्यों को छोड़कर) के क्वथनांकों में अन्तर 20-30°C होता है। समावयवी ऐल्केनों में साधारण समावयवी का क्वथनांक शाखित श्रृंखला समावयवी से अधिक होता है। श्रृंखला अधिक शाखित होने पर क्वथनांक कम होते हैं। क्वथनांक में परिवर्तन को अन्तराण्विक आकर्षण बलों के पदों में समझाया जा सकता है। ये बल अणु की सतह के सापेक्ष कार्य करते हैं तथा इनका परिमाण पृष्ठ सतह के क्षेत्रफल के बढ़ने पर बढ़ता है। जैसे ही श्रेणी में आण्विक आकार बढ़ता है वैसे ही पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ता है। तथा क्वथनांक भी बढ़ते हैं। n-ऐल्केनों में शाखित श्रृंखला समावयवियों की तुलना में अधिक पृष्ठ क्षेत्रफल होता है, अतः अन्तराण्विक बल शाखित श्रृंखला समावयवियों में दुर्बल होते हैं। अतः इनके क्वथनांक सीधी श्रृंखला समावयवियों की तुलना में निम्न होते हैं।
5. गलनांक-आण्विक आकार के बढ़ने के साथ-साथ ऐल्केनों के गलनांकों में क्रमिक परिवर्तन, नहीं पाया जाता है। सम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों के गलनांक विषम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों से उच्च होते हैं। सम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केन विषम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केनों की तुलना में अधिक सममित होते हैं अर्थात् वे क्रिस्टल जालक में अधिक निविड़ संकुलित (closely packed) होते हैं। दूसरे शब्दों में, इनमें अन्तराण्विक आकर्षण बल अधिक होते हैं, अतः इनके गलनांक कुछ उच्च होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख कार्बन परमाणुओं की सम संख्या और विषम संख्या वाले क्रिस्टल जालक में ऐल्केनों की पैकिंग को दर्शाता है। सम संख्या वाले कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केन अधिक सममित होते हैं और क्रिस्टल जालक में बेहतर ढंग से पैक होते हैं, जबकि विषम संख्या वाले कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केन कम सममित होते हैं और कम दक्षता से पैक होते हैं।
C C C C C C
C C C C C C
कार्बन परमाणुओं की सम संख्या कार्बन परमाणुओं की विषम संख्या
In simple words: ऐल्केन रंगहीन होते हैं; उनकी भौतिक अवस्था अणुभार पर निर्भर करती है (गैस, द्रव, ठोस); वे जल में अविलेय लेकिन कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं; उनके घनत्व, गलनांक और क्वथनांक अणुभार बढ़ने के साथ बढ़ते हैं, लेकिन शाखाकरण से क्वथनांक घटता है और सममिति से गलनांक बढ़ता है।

🎯 Exam Tip: ऐल्केनों के भौतिक गुणों को वान्डरवाल्स बलों और आण्विक पैकिंग दक्षता के संदर्भ में समझा जाता है; यह जानना महत्वपूर्ण है कि शाखाकरण क्वथनांक को कैसे प्रभावित करता है और गलनांक पर सम-विषम कार्बन संख्या का प्रभाव क्या है।

 

Question 4. संरूपण क्या है? एथेन के परिप्रेक्ष्य में वर्णन कीजिए ।
Answer: संरूपण-ऐसे परमाणुओं की त्रिविम व्यवस्थाएँ जो C-C एकल आबन्ध के घूर्णन के कारण एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं, संरूपण, संरूपणीय समावयव या घूर्णी कहलाती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एथेन के दो मुख्य संरूपणों को सॉहार्स प्रक्षेप के रूप में दिखाता है:

(a) ग्रस्त प्रक्षेप, जहाँ हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के निकटतम होते हैं, और
(b) सांतरित प्रक्षेप, जहाँ हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे से अधिकतम दूरी पर होते हैं।
H H
H H
H H
(a) ग्रस्त प्रक्षेप

H H
H H
H H
(b) सांतरित प्रक्षेप
चित्र-2 एथेन के सॉहार्स प्रक्षेप
एथेन के सॉहार्स प्रक्षेप एथेन के संरूपण-एथेन के असंख्य संरूपण होते हैं। इनमें से दो संरूपण चरम होते हैं। एक रूप में दोनों कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास हो जाते हैं उसे ग्रस्त रूप कहते हैं। दूसरे रूप में, हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं से अधिकतम दूरी पर रहते हैं। उन्हें सांतरित रूप कहते हैं। इनके अलावा कोई भी मध्यवर्ती संरूपण विषमतलीय संरूपण कहलाता है। सभी संरूपणों में आबन्ध कोण तथा आबन्ध लम्बाई समान रहती है। ग्रस्त तथा सांतरित संरूपणों को सॉहार्स तथा न्यूमैन प्रक्षेप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एथेन के न्यूमैन प्रक्षेप को दर्शाता है, जिसमें (a) ग्रस्त प्रक्षेप, जहाँ सामने और पीछे के कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे को आच्छादित करते हुए दिखाई देते हैं, और (b) सांतरित प्रक्षेप, जहाँ हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे से अधिकतम दूरी पर होते हैं, torsional angle और dihedral angle का भी प्रदर्शन करते हैं।
HH
H-
Angle of rotation
H torsional angle
or dihedral angle
-H
H
H
H H
(a) ग्रस्त प्रक्षेप (b) सांतरित प्रक्षेप
चित्र-3 एथेन के न्यूमैन प्रक्षेप
1. सॉहार्स प्रक्षेप-इस प्रक्षेपण में अणु को आण्विक अक्ष की दिशा में देखा जाता है। कागज पर केंद्रीय C-C आबंध को दिखाने के लिए दाईं या बाईं ओर झुकी हुई एक सीधी रेखा खींची जाती है। इस रेखा को कुछ लंबा बनाया जाता है। आगे वाले कार्बन को नीचे बाईं ओर तथा पीछे वाले कार्बन को ऊपर दाईं ओर से प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक कार्बन से संलग्न तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को तीन रेखाएँ। खींचकर दिखाया जाता है। ये रेखाएँ एक-दूसरे से 120° का कोण बनाकर झुकी होती हैं।
2. न्यूमैन प्रक्षेप-इस प्रक्षेपण में अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले कार्बन को एक बिंदु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रदर्शित किया जाता है। पीछे (आँख से दूर) वाले कार्बन को एक वृत्त द्वारा दर्शाते हैं तथा इसमें आबंधित हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परिधि से परस्पर 120° के कोण पर स्थित तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है।
In simple words: संरूपण C-C एकल बन्ध के घूर्णन के कारण परमाणुओं की विभिन्न स्थानिक व्यवस्थाओं को संदर्भित करता है; एथेन में, मुख्य संरूपण ग्रस्त (हाइड्रोजन पास) और सांतरित (हाइड्रोजन दूर) होते हैं, जिन्हें सॉहार्स और न्यूमैन प्रक्षेपों द्वारा दर्शाया जाता है।

🎯 Exam Tip: संरूपणीय समावयवता (conformational isomerism) को समझने के लिए न्यूमैन और सॉहार्स प्रक्षेपों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है, जो अणुओं के 3D संरचनात्मक पहलुओं को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

 

Question 5. ऐल्कीनों में पाये जाने वाले कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध की संरचना समझाइए ।
या
द्विआबन्धं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: ऐल्कीनों में C=C द्विआबंध होता है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (आबंध एंथैल्पी लगभग 348 kJmol⁻¹ है) होता है, जो दो कार्बन परमाणुओं के sp²संकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है। इसमें दो कार्बन परमाणुओं के 2p² असंकरित कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन करने पर एक दुर्बल पाई (π) आबंध, (आबंध एंथैल्पी 251 kJmol⁻¹ है) बनता है। C-C एकल आबंध लंबाई (154 pm) की तुलना में C=C द्विआबंध लंबाई (134 pm) छोटी होती है। पाई (π) आबंध दो p-कक्षकों के दुर्बल अतिव्यापन के कारण दुर्बल होते हैं। अतः पाई (π) आबंध वाले ऐल्कीनों को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है। अत: ऐल्कीनों पर उन अभिकर्मकों अथवा यौगिकों, जो इलेक्ट्रॉनों की खोज में होते हैं, का आक्रमण आसानी से हो जाता है। एथीन अणु के कक्षीय आरेख चित्र निम्नवत् हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एथीन (CH₂=CH₂) में कक्षीय अतिव्यापन को दर्शाता है। चित्र 4 केवल सिग्मा (σ) बन्धों को दिखाता है, जहाँ sp² संकरित कार्बन परमाणु हाइड्रोजन के 1s कक्षकों और एक-दूसरे के sp² कक्षकों के साथ अतिव्यापन करते हैं। चित्र 5 में

(a) π-बन्ध का बनना, जहाँ दो असंकरित p-कक्षक पार्श्व अतिव्यापन करते हैं,
(b) π-अभ्र का बनना, और
(c) आबन्ध कोणों (121.7° और 116.6°) तथा आबन्ध लंबाई (C=C 134 pm, C-H 110 pm) को दर्शाया गया है।
σ sp²-s
H
sp² sp² σ
sp²-sp² (σ)
H σ σ H
चित्र-4 एथीन का कक्षीय आरेख केवल σ आबंधों को चित्रित करते हुए
p-p
(π-आबंध)
H H
H C C H
H H
(a)

π-अभ्र
H H 121.7° H
C C
116.6°C C
H 134 pm H
H
(b) (c)
110 pm
चित्र-5 एथीन का कक्षीय आरेख : (a) π-आबंध बनना,
(b) π-अभ्र का बनना तथा
(c) आबंध कोण तथा आबंध लम्बाई
In simple words: ऐल्कीनों में कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध एक मजबूत सिग्मा बन्ध (sp² कक्षकों के अतिव्यापन से) और एक कमजोर पाई बन्ध (असंकरित p-कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन से) से बनता है, जिससे द्विआबन्ध की लंबाई एकल बन्ध से छोटी और क्रियाशीलता अधिक होती है।

🎯 Exam Tip: कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध की संरचना में सिग्मा और पाई बन्धों का योगदान समझना ऐल्कीनों की विशिष्ट ज्यामिति (त्रिकोणीय समतलीय) और उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं में भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख दो कार्बनिक यौगिकों को दर्शाता है। पहला है CH₂=CH-C(CH₃)₂-CH₃, जिसमें एक द्विआबन्ध और दो मेथिल समूह हैं। दूसरा है CH₃-CH₂-CH(COCl)-CH₂-CH₃, जो एक ऐसिल क्लोराइड है।
(i) CH₂=CH-C-CH₃
CH₃
(ii) CH₃-CH₂-CH-CH₂-CH₃
COCl
Answer:
1. 3, 3-डाइमेथिल-1-हेक्सिन,
2. 2-एथिल ब्यूटानॉइल क्लोराइड ।
In simple words: दिए गए रासायनिक संरचनाओं के IUPAC नाम क्रमशः 3,3-डाइमेथिल-1-हेक्सिन और 2-एथिलब्यूटानोइल क्लोराइड हैं।

🎯 Exam Tip: ऐल्कीनों और ऐसिल क्लोराइड जैसे कार्यात्मक समूहों वाले जटिल यौगिकों का सही ढंग से नामकरण करने के लिए मुख्य श्रृंखला, कार्यात्मक समूह की स्थिति, और सभी प्रतिस्थापकों की पहचान करना आवश्यक है।

 

Question 7. निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख दो कार्बनिक यौगिकों को दर्शाता है। पहला है CH₃-CH₂-CH(CHO)-CH₂-CH₃, जिसमें एक ऐल्डिहाइड समूह है। दूसरा है CH₂=C(CH₂CH₃)-CH(CH₃)₂CH₃, जिसमें एक द्विआबन्ध और मेथिल तथा एथिल प्रतिस्थापी हैं।
(i) CH₃-CH₂-CH-CH₂-CH₃
CHO
(ii) CH₂=C-CH₂-CH₃
CH-CH₃
CH₃
Answer:
1. 2-एथिल ब्यूटानल,
2. 2-एथिल 3-मेथिल ब्यूटीन ।
In simple words: दिए गए संरचनात्मक सूत्रों के IUPAC नाम क्रमशः 2-एथिलब्यूटानल और 2-एथिल-3-मेथिलब्यूटीन हैं।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में, जब विभिन्न कार्यात्मक समूह और प्रतिस्थापक मौजूद होते हैं, तो सबसे लंबी श्रृंखला की पहचान और नामकरण नियमों के सख्त पालन से सही नाम प्राप्त होता है।

 

Question 8. ऐल्कीनों में ज्यामितीय समावयवता को समझाइए ।
या
ऐल्कीन ज्यामितीय समावयवता क्यों प्रदर्शित करती हैं?
Answer: द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुडकर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक कार्बन से जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न हैं तो इसे YXC = CXY द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ऐसी संरचनाओं को दिक् में निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख ज्यामितीय समावयवता के दो रूपों को दर्शाता है, जहाँ एक कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध से जुड़े प्रतिस्थापी (X और Y) भिन्न-भिन्न स्थानिक व्यवस्थाओं में हैं।

(a) रूप में समान समूह द्विआबन्ध के एक ही तरफ होते हैं (cis), जबकि
(b) रूप में समान समूह द्विआबन्ध के विपरीत तरफ होते हैं (trans)।
X Y
C
X C
Y
C
C
X Y
Y X
(a) (b)
संरचना 'a' में एकसमान दो परमाणु (दोनों x या दोनों Y) द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के एक ही ओर स्थित होते हैं। संरचना 'b' में दोनों x अथवा दोनों Y द्विआबंधित कार्बन की दूसरी तरफ या द्विआबंधित कार्बन परमाणु के विपरीत स्थित होते हैं, जो विभिन्न ज्यामिति दर्शाते हैं। इनका दिक् में परमाणु या समूहों की भिन्न स्थितियों के कारण विन्यास भिन्न होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख द्विआबन्ध के चारों ओर घूर्णन की अनुपस्थिति को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि 90° का घूर्णन p-ऑर्बिटल के अतिव्यापन को बाधित करता है, क्योंकि वे एक-दूसरे पर लंबवत हो जाते हैं, जिससे π-बन्ध का बनना असंभव हो जाता है। यह प्रतिबंधित घूर्णन ऐल्कीनों में ज्यामितीय समावयवता का कारण है।
π-बन्ध
90° पर घूर्णन
p-ऑबिटल का अतिव्यापन संभव नहीं है
क्योंकि ये एक-दूसरे पर लम्बवत् हैं.
अतः ये त्रिविम समावयवी (stereo isomers) हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं या समूहों का घूर्णन हो सकता है, परन्तु C = C द्विआबंध में मुक्त घूर्णन नहीं होता। यह प्रतिबंधित होता है। अतः परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के मध्य प्रतिबंधित घूर्णन के कारण यौगिकों द्वारा भिन्न ज्यामितियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिविम समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्थित हों, उन्हें समपक्ष (cis) कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्थित हों, विपक्ष (trans) समावयवी कहलाते हैं। इसलिए दिक् में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, किंतु विन्यास भिन्न होता है। दिक् में परमाणुओं या समूहों की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी अनेक गुणों (जैसे-गलनांक, क्वथनांक, द्विध्रुव आघूर्ण, विलेयता आदि) में भिन्नता दर्शाते हैं। ब्यूट-2-ईन की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष-विपक्ष समावयवता को निम्नलिखित संरचना द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख ब्यूट-2-ईन के समपक्ष (cis) और विपक्ष (trans) समावयवों को दर्शाता है। समपक्ष रूप में, मेथिल समूह द्विआबन्ध के एक ही तरफ होते हैं, जिसका क्वथनांक 277 K होता है। विपक्ष रूप में, मेथिल समूह विपरीत तरफ होते हैं, जिसका क्वथनांक 274 K होता है। इसके अलावा, आरेख इन समावयवों के आंशिक आवेशों (δ+ और δ-) और परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण (समपक्ष के लिए µ = 0.35D और विपक्ष के लिए µ = 0) को भी दिखाता है।
CH₃ CH₃
C = C
H H
समपक्ष-ब्यूट-2-ईन
(क्वथनांक 277 K)

CH₃ CH₃
C = C
H H
विपक्ष-ब्यूट-2-ईन
(क्वथनांक 274 K)
ऐल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अधिक ध्रुवीय होता है।
उदाहरणार्थ-समपक्ष ब्यूट-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण 0.350 डिबाई है, जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट-2-ईन अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभिन्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष-ब्यूट-2-ईन के दोनों मेथिल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक C-CH, आबंध के कारण ध्रुवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को निम्न प्रकार अध्रुवीय बनाते हैं-
δ+
CH₃ δ- δ+ CH₃
C=C
H H
समपक्ष-ब्यूट-2-ईन (µ = 0.35D)

δ+
CH₃
C=C
H δ+
H δ-
CH₃
ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक
विपक्ष-ब्यूट-2-ईन (µ = 0)
समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक होते हैं। ज्यामितीय या समपक्ष (cis) विपक्षः (trans) समावयवता, XYC = CXZ तथा XYC = CZW प्रकार की ऐल्कीनों द्वारा भी प्रदर्शित की जाती है।
In simple words: ज्यामितीय समावयवता (cis-trans) तब होती है जब एक द्विआबन्ध के चारों ओर प्रतिबंधित घूर्णन के कारण प्रतिस्थापियों की स्थानिक व्यवस्था भिन्न होती है; यदि द्विआबन्ध से जुड़े प्रत्येक कार्बन पर दो भिन्न समूह हों, तो cis (समान तरफ) और trans (विपरीत तरफ) समावयव बनते हैं।

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय समावयवता का मुख्य कारण द्विआबन्ध के चारों ओर प्रतिबंधित घूर्णन है; cis और trans समावयवों के गलनांक, क्वथनांक और द्विध्रुव आघूर्ण जैसे भौतिक गुण भिन्न होते हैं।

 

Question 8. ऐल्कीनों में ज्यामितीय समावयवता को समझाइए ।
या
ऐल्कीन ज्यामितीय समावयवता क्यों प्रदर्शित करती हैं?

Answer: द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुडकर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक कार्बन से जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न हैं तो इसे YXC = CXY द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ऐसी संरचनाओं को दिक् में निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक ऐसे यौगिक के दो ज्यामितीय समावयवी रूपों को दर्शाता है जहाँ एक केंद्रीय कार्बन-कार्बन डबल बॉन्ड (C=C) होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु से दो अलग-अलग परमाणु या समूह (X और Y) जुड़े होते हैं। पहले चित्र (a) में, दोनों X समूह डबल बॉन्ड के एक ही तरफ स्थित होते हैं, जिसे 'समपक्ष' (cis) विन्यास कहा जाता है, जबकि दूसरे चित्र (b) में, दोनों X समूह डबल बॉन्ड के विपरीत दिशा में स्थित होते हैं, जिसे 'विपक्ष' (trans) विन्यास कहा जाता है। संरचना ‘a’ में एकसमान दो परमाणु (दोनों x या दोनों Y) द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के एक ही ओर स्थित होते हैं। संरचना ‘b’ में दोनों x अथवा दोनों Y द्विआबंधित कार्बन की दूसरी तरफ या द्विआबंधित कार्बन परमाणु के विपरीत स्थित होते हैं, जो विभिन्न ज्यामिति दर्शाते हैं। इनका दिक् में परमाणु या समूहों की भिन्न स्थितियों के कारण विन्यास भिन्न होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख p-ऑर्बिटल के अतिव्यापन को दर्शाता है और बताता है कि 90° के घूर्णन पर p-ऑर्बिटल का अतिव्यापन संभव क्यों नहीं है। चित्र में दो p-ऑर्बिटल को दर्शाया गया है जो एक-दूसरे के समानांतर हैं और पाई (π) बंध बनाते हैं। जब इनमें से एक ऑर्बिटल 90° घूमता है, तो वे एक-दूसरे के लंबवत् हो जाते हैं, जिससे उनके बीच कोई प्रभावी अतिव्यापन नहीं हो पाता और π-बंध टूट जाता है। अतः ये त्रिविम समावयवी (stereo isomers) हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं या समूहों का घूर्णन हो सकता है, परन्तु C = C द्विआबंध में मुक्त घूर्णन नहीं होता। यह प्रतिबंधित होता है। अतः परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के मध्य प्रतिबंधित घूर्णन के कारण यौगिकों द्वारा भिन्न ज्यामितियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिविम समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्थित हों, उन्हें समपक्ष (cis) कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्थित हों, विपक्ष (trans) समावयवी कहलाते हैं। इसलिए दिक् में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, किंतु विन्यास भिन्न होता है। दिक् में परमाणुओं या समूहों की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी अनेक गुणों (जैसे-गलनांक, क्वथनांक, द्विध्रुव आघूर्ण, विलेयता आदि) में भिन्नता दर्शाते हैं। ब्यूट-2-ईन की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष-विपक्ष समावयवता को निम्नलिखित संरचना द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख ब्यूट-2-ईन के दो ज्यामितीय समावयवी रूपों को दर्शाता है। पहले चित्र में 'समपक्ष-ब्यूट-2-ईन' को दिखाया गया है, जहाँ दोनों मेथिल समूह (CH₃) डबल बॉन्ड के एक ही तरफ होते हैं। इसका क्वथनांक 277 K होता है। दूसरे चित्र में 'विपक्ष-ब्यूट-2-ईन' को दर्शाया गया है, जहाँ दोनों मेथिल समूह डबल बॉन्ड के विपरीत दिशाओं में स्थित होते हैं। इसका क्वथनांक 274 K होता है। यह दर्शाता है कि समपक्ष रूप अधिक ध्रुवीय होता है और उसका द्विध्रुव आघूर्ण अधिक होता है। ऐल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अधिक ध्रुवीय होता है। उदाहरणार्थ-समपक्ष ब्यूट-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण 0.350 डिबाई है, जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट-2-ईन अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभिन्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष-ब्यूट-2-ईन के दोनों मेथिल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक C-CH, आबंध के कारण ध्रुवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को निम्न प्रकार अध्रुवीय बनाते हैं-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख ब्यूट-2-ईन के समपक्ष (cis) और विपक्ष (trans) समावयवी रूपों के द्विध्रुव आघूर्णों को समझाता है। समपक्ष-ब्यूट-2-ईन में, मेथिल समूह डबल बॉन्ड के एक ही तरफ होते हैं, जिससे आंशिक धनावेश (δ+) और ऋणावेश (δ-) एक ही दिशा में संरेखित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 0.350 डिबाई का द्विध्रुव आघूर्ण (µ) होता है। इसके विपरीत, विपक्ष-ब्यूट-2-ईन में, मेथिल समूह डबल बॉन्ड के विपरीत दिशाओं में होते हैं, जिससे ध्रुवीयता एक दूसरे को रद्द कर देती है, और इसका द्विध्रुव आघूर्ण लगभग 0 होता है, जो इसे अध्रुवीय बनाता है। ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक होते हैं। ज्यामितीय या समपक्ष (cis) विपक्षः (trans) समावयवता, XYC = CXZ तथा XYC = CZW प्रकार की ऐल्कीनों द्वारा भी प्रदर्शित की जाती है।In simple words: Geometric isomerism in alkenes occurs due to restricted rotation around the carbon-carbon double bond. This leads to two distinct spatial arrangements: cis (same side) and trans (opposite sides) isomers. These isomers have different physical properties like boiling point and dipole moment.

🎯 Exam Tip: Understanding cis-trans isomerism is crucial for distinguishing between compounds with the same molecular formula but different spatial arrangements, a common topic in organic chemistry examinations.

 

Question 9. ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मकों से अभिक्रिया करती हैं न कि नाभिकस्नेही अभिकर्मकों से । क्यों?
या
ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ क्यों?

Answer: ऐल्कीन में द्विआबंध होता है। इनमें से एक प्रबल कार्बन-कार्बन सिग्मा (\( \sigma \)) आबंध और एक दुर्बल पाई (\( \pi \)) आबंध होता है। \( \pi \) – इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉन अभ्र \( \sigma \)-आबंधित कार्बन परमाणुओं के तल के ऊपर तथा नीचे स्थित होता है। अतः \( \pi \)-इलेक्ट्रॉन कार्बन परमाणुओं से शिथिलता (loosely) से बद्ध होते हैं। चूंकि इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण होते हैं इसलिए \( \pi \)-इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉनस्नेही को आकर्षित और नाभिकस्नेही को प्रतिकर्षित करते हैं। अतः ऐल्कीन इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं। इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-योगात्मक तथा प्रतिस्थापन । इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में एक \( \sigma \)- कार्बन-हाइड्रोजन आबंध टूटता है और द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही के मध्य एक नया \( \sigma \)-आबंध बनता है। इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में अधिक ऊर्जा परिवर्तन नहीं होता है क्योंकि \( \sigma \)-कार्बन-हाइड्रोजन आबंध तथा नए \( \sigma - C - X \) आबंध की आबंध ऊर्जाओं में अधिक अंतर नहीं होता है। इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं में एक दुर्बल \( \pi \)- आबंध टूटता है और दो प्रबल \( \sigma \)-आबंधों का निर्माण होता है। इस अभिक्रिया में 445 kJmol\(^{-1}\) (2 x 348 kJmol\(^{-1}\) - 251 kJmol\(^{-1}\)) ऊर्जा मुक्त होती है। स्पष्ट है कि ऊर्जा की दृष्टि से इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से अधिक अनुकूल होती हैं। यही कारण है कि ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ।In simple words: Alkenes prefer electrophilic addition reactions because their pi electrons are loosely held and act as a source of electrons, attracting electrophiles. Addition reactions also release more energy compared to substitution reactions, making them thermodynamically more favorable.

🎯 Exam Tip: Remember that the presence of the electron-rich pi bond makes alkenes susceptible to electrophilic attack, leading predominantly to addition rather than substitution reactions.

 

Question 10. इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि समझाइए ।
या
एथिलीन के Br2 से योग की क्रियाविधि समझाइए।

Answer: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि को एथिलीन के Br2 से योग के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। यह अभिक्रिया निम्न दो पदों में होती है- पद 1-ब्रोमीन अणु (अध्रुवीय) जब एथिलीन अणु के पास आता है तो द्विआबंध के E-इलेक्ट्रॉन ब्रोमीन अणु में दोनों ब्रोमीन परमाणुओं को बाँधे रखने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म को प्रतिकर्षित करने लगते हैं जिससे ब्रोमीन अणु का ध्रुवण हो जाता है। इस ब्रोमीन द्विध्रुव को धन सिरा इलेक्ट्रॉनस्नेही की भाँति व्यवहार करता है। एथिलीन अणु के \( \pi \)-इलेक्ट्रॉन इस सिरे को आकर्षित करके \( \pi \)-संकर (E-complex) बनाते हैं जो बाद में कार्बोधनायन और ब्रोमाइड आयन देता है। \[ \text{Br-Br} \quad \implies \text{ध्रुवित ब्रोमीन अणु} \] \[ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{Br}^{\delta+}-\text{Br}^{\delta-} \quad \xrightarrow{\text{मंद}} \quad \text{CH}_2-\overset{+}{\text{CH}}_2 + \text{Br}^- \] \[ \text{एथिलीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \pi\text{-संकर, ब्रोमोएथिल कार्बोधनायन} \] इस पद को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है- \[ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{Br-Br} \quad \xrightarrow{\text{मंद}} \quad \overset{+}{\text{CH}}_2-\text{CH}_2\text{Br} + \text{Br}^- \] \[ \text{ब्रोमोएथिल कार्बोधनायन} \] यह पद मंद पद (slow step) है। अतः यह अभिक्रिया का दर निर्धारक पद (rate determining step) है। पद 2-प्राप्त कार्बोधनायन अत्यंत क्रियाशील होता है। विलयन में उपस्थित ब्रोमाइड आयन इस पर नाभिकस्नेही आक्रमण करके योगोत्पाद (addition product) बनाता है। \[ \overset{+}{\text{CH}}_2-\text{CH}_2\text{Br} + \text{Br}^- \quad \xrightarrow{\text{नाभिकस्नेही आक्रमण}} \quad \text{CH}_2\text{Br}-\text{CH}_2\text{Br} \] \[ \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{1, 2-डाइब्रोमोएथेन} \]In simple words: Electrophilic addition, like the reaction of ethene with Br₂, starts when the ethene's pi electrons induce a dipole in Br₂, forming a carbocation intermediate. This is the slow step. Then, the bromide ion rapidly attacks the carbocation to form the final addition product, 1,2-dibromoethane.

🎯 Exam Tip: Clearly outlining the two steps (electrophilic attack to form carbocation, followed by nucleophilic attack) and identifying the rate-determining step is crucial for full marks.

 

Question 11. मारकोनीकॉफ नियम तथा परॉक्साइड प्रभाव का वर्णन कीजिए ।
Answer: मारकोनीकॉफ का नियम-इस नियम के अनुसार-जब कोई असममित ऐल्कीन किसी असममित अणु से योग करती है तो जुड़ने वाले अणु का धनात्मक भाग द्विआबंध बनाने वाले उस कार्बन परमाणु से जुड़ता है जिस पर अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{HBr} \quad \implies \text{CH}_3-\text{CHBr}-\text{CH}_3 \quad (\text{2-ब्रोमोप्रोपेन}) \]
\[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{HBr} \quad \implies \text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{CH}_2\text{Br} \quad (\text{1-ब्रोमोप्रोपेन}) \] इस प्रकार उपरोक्त अभिक्रिया में HBr का धनात्मक भाग अर्थात् H\(^+\) कार्बन परमाणु संख्या 1 से संयुक्त होता है क्योंकि कार्बन परमाणु संख्या 1 पर कार्बन परमाणु संख्या 2 की तुलना में अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित हैं। परॉक्साइड प्रभाव या खैराश प्रभाव-खैराश (Kharasch) तथा उनके सहयोगियों ने सन् 1933 में प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात किया कि परॉक्साइड जैसे बेन्जोइल परॉक्साइड की उपस्थिति में असममित ऐल्कीनों पर HBr (HCI अथवा HI का नहीं) का योग मारकोनीकॉफ के नियम के विरुद्ध होता है।In simple words: Markovnikov's rule states that in the addition of an unsymmetrical reagent to an unsymmetrical alkene, the positive part of the reagent adds to the carbon atom of the double bond that has more hydrogen atoms. The peroxide effect (anti-Markovnikov's rule) is observed only with HBr in the presence of peroxides, where the hydrogen adds to the carbon with fewer hydrogens.

🎯 Exam Tip: Distinguish clearly between Markovnikov's rule and the peroxide effect, noting that the latter is specific to HBr and peroxides, and involves a free-radical mechanism.

 

Question 12. मेथिल ऐसीटिलीन, अमोनियम क्यूप्प्रस क्लोराइड के साथ क्रिया करके लाल अवक्षेप देती है जबकि डाइमेथिल ऐसीटिलीन लाल अवक्षेप नहीं देती है। कारण स्पष्ट कीजिए ।
Answer:\[ \text{CH}_3-\text{C}\equiv\text{CH} + \text{NH}_4\text{OH} + \text{CuCl} \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_3\text{C}\equiv\text{CCu}\downarrow + \text{NH}_4\text{Cl} + \text{H}_2\text{O} \] \[ \text{लाल अवक्षेप} \] \[ \text{CH}_3-\text{C}\equiv\text{C}-\text{CH}_3 + \text{NH}_4\text{OH} + \text{CuCl} \quad \longrightarrow \quad \text{कोई लाल अवक्षेप नहीं} \] मेथिल ऐसीटिलीन में एक अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित है इसकी CuCl तथा NH4OH से अभिक्रिया कराने पर क्यूप्रस मेथिल ऐसीटेलाइड का लाल अवक्षेप बनता है। डाइमेथिल ऐसीटिलीन में कोई अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित नहीं है, इसलिए यह NH4OH तथा CuCl के साथ लाल अवक्षेप नहीं देता है।In simple words: Methylacetylene gives a red precipitate with ammoniacal cuprous chloride because it has an acidic terminal hydrogen, which is replaced by copper. Dimethylacetylene, lacking such a hydrogen, does not react and thus does not form a precipitate.

🎯 Exam Tip: This question tests the acidity of terminal alkynes. Remember that the presence of an acidic hydrogen on the triple bond is key for reactions with metal ions to form precipitates, distinguishing terminal from internal alkynes.

 

Question 13. ऐल्काइनों द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए ।
या
ऐल्काइनों में पायी जाने वाली समावयवता पर टिप्पणी लिखिए।

Answer: ऐल्काइन निम्नलिखित प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करती हैं-
(i) स्थान समावयवता या स्थिति समावयवता–ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य एथाइन तथा प्रोपाइन केवल एक रूप में पाए जाते हैं। ब्यूटाइन तथा अन्य उच्च ऐल्काइन कार्बन श्रृंखला में त्रिआबंध की विभिन्न स्थितियों के अनुसार स्थिति समावयवती प्रदर्शित करते हैं। उदाहरणार्थ-
(ii) श्रृंखला समावयवता–पाँच तथा उससे अधिक कार्बन परमाणु वाले ऐल्काइन श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं। यह समावयवता कार्बन श्रृंखला की विभिन्न संरचनाओं के कारण होती है। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{CH}_2-\text{C}\equiv\text{CH}; \quad \text{पेन्ट-1-आइन} \]
\[ \text{CH}_3-\text{CH}(\text{CH}_3)-\text{C}\equiv\text{CH}; \quad \text{3-मेथिलब्यूट-1-आइन} \]
(iii) क्रियात्मक समावयवता-ऐल्काइन दो द्विआबंधों वाले यौगिकों के क्रियात्मक समावयवी होते हैं। उदाहरणार्थ-
(iv) वलय-श्रृंखला समावयवता-ऐल्काइन साइक्लोऐल्कीनों के साथ वलय-श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं। उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख दो यौगिकों के बीच वलय-श्रृंखला समावयवता को दर्शाता है। बाईं ओर 'प्रोपाइन' (CH₃-C≡CH) का सीधा-श्रृंखला संरचना है, जिसमें एक त्रिआबंध है। दाईं ओर 'साइक्लोप्रोपीन' का चक्रीय संरचना है, जिसमें एक द्विआबंध और एक बंद वलय है। ये दोनों यौगिक समान आण्विक सूत्र साझा करते हैं लेकिन उनके संरचनात्मक प्रकार भिन्न होते हैं - एक एक खुली श्रृंखला वाला ऐल्काइन है और दूसरा एक चक्रीय ऐल्कीन है।In simple words: Alkynes can exhibit several types of isomerism, including position isomerism (due to different positions of the triple bond), chain isomerism (due to variations in the carbon chain structure), functional isomerism (with dienes), and ring-chain isomerism (with cycloalkenes).

🎯 Exam Tip: When describing isomerism in alkynes, provide clear examples for each type. Focus on how the position of the triple bond or the branching of the carbon chain affects the isomer's structure and name.

 

Question 14. एथाइन का उदाहरण देते हुए त्रिआबन्ध की संरचना को समझाइए ।
या
त्रिआबन्ध की संरचना पर टिप्पणी लिखिए।

Answer: एथाइन ऐल्काइन श्रेणी का सरलतम अणु है। इसके प्रत्येक कार्बन परमाणु के दो sp संकरित कक्षकों के समअक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्मा आबंध बनता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु का शेष sp संकरित कक्षक अन्तरानाभिकीय अक्ष के सापेक्ष हाइड्रोजन परमाणु के 1s कक्षक के साथ अतिव्यापन करके दो C-H सिग्मा आबंध बनाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एथाइन अणु में सिग्मा (\(\sigma\)) आबंधों की व्यवस्था को दर्शाता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु sp संकरित होता है, जिसमें दो sp संकर कक्षक और दो असंकरित p कक्षक होते हैं। चित्र (a) में, कार्बन-कार्बन sp-sp अतिव्यापन से एक सिग्मा आबंध बनता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु का एक sp संकर कक्षक हाइड्रोजन के 1s कक्षक के साथ अतिव्यापन करके दो C-H सिग्मा आबंध बनाता है। ये सभी सिग्मा आबंध 180° के कोण पर होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एथीन अणु के कक्षीय आरेख को तीन भागों में समझाता है। चित्र (a) पाई (\(\pi\)) आबंध बनने की प्रक्रिया को दर्शाता है, जहाँ दो समानांतर p-ऑर्बिटल पार्श्व अतिव्यापन करते हैं। चित्र (b) दो p-ऑर्बिटल के अतिव्यापन से बने π-अभ्र को दिखाता है, जो सिग्मा ढाँचे के ऊपर और नीचे स्थित होता है। चित्र (c) आबंध कोण (121.7°), C-C आबंध लंबाई (134 pm) और C-H आबंध लंबाई (110 pm) को दर्शाता है, जिससे एथीन की समतल ज्यामिति स्पष्ट होती है। H – C—C आबंध कोण 180° का होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास C-C आबंध तथा तल के लंबवत् असंकरित p-कक्षक होते हैं। एक कार्बन परमाणु को 2p कक्षक दूसरे के समांतर होता है, जो समपाश्विक अतिव्यापन करके दो कार्बन परमाणुओं के मध्य दो (पाई) बंध बनाते हैं। अतः एथाइन अणु में एक C—C(\( \sigma \)) आबंध, दो C –Н (\( \sigma \)) आबंध तथा दो C—C (पाई) आबंध होते हैं। C \( \equiv \) C की आबंध सामर्थ्य 823 kJmol\(^{-1}\) है, जो C=C द्विआबंध आबंध एंथैल्पी 681 kJmol\(^{-1}\)C-C एकल आबंध आबंध एंथैल्पी 348 kJmol\(^{-1}\) से अधिक होती है। C \( \equiv \) C की त्रिआबंध लम्बाई (120 pm), C=C द्विआबंध (134 pm) तथा C-C एकल आबंध (154 pm) की तुलना में छोटी होती है। अक्षों पर दो कार्बन परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन अभ्र अंतरानाभिकीय सममित बेलनाकार स्थिति में होते हैं। एथाइन एक रेखीय अणु है।In simple words: Ethyne, the simplest alkyne, features a triple bond composed of one strong sigma bond and two weaker pi bonds. Each carbon atom is sp-hybridized, forming a linear molecule with a 180° H-C-C bond angle, where the pi electron clouds surround the sigma framework cylindrically.

🎯 Exam Tip: When explaining the structure of a triple bond, emphasize the sp hybridization of carbon, the formation of one sigma and two pi bonds, and the linear geometry of the molecule.

 

Question 15. बेंजीन की संरचना से सम्बन्धित अनुनाद संकल्पना क्या है?
Answer: अनुनाद संकल्पना के अनुसार बेंजीन को दोनों केकुले संरचनाओं का अनुनादी संकर माना जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख बेंजीन की दो केकुले संरचनाओं (I और II) को दर्शाता है। दोनों संरचनाएं एक षट्कोणीय कार्बन वलय दिखाती हैं जिसमें एकांतर एकल और द्विआबंध होते हैं, लेकिन द्विआबंधों की स्थिति एक संरचना से दूसरी में बदल जाती है। ये दोनों संरचनाएं अनुनाद में हैं, जिसका अर्थ है कि बेंजीन की वास्तविक संरचना इन दोनों का संकर है, जिसमें सभी कार्बन-कार्बन आबंध समान लंबाई के होते हैं जो एकल और द्विआबंध के बीच होते हैं। बेंजीन की वास्तविक संरचना न तो। है और न ही ।। है लेकिन इन दोनों संरचनाओं का मध्यमान है। इसके समस्त गुणों की व्याख्या संरचना । या II से नहीं की जा सकती है लेकिन संरचना । तथा II के मध्यमान से की जा सकती है। अतः बेंजीन में प्रत्येक कार्बन-कार्बन आबन्ध की लम्बाई एकल आबंध लम्बाई 1.54 Å तथा द्विआबन्ध लम्बाई 1.34Å के मध्य 1.39 Å होती है। अनुनाद का प्रमुख प्रभाव यह होता है कि अनुनाद संकर का स्थायित्व अनुनाद संरचनाओं के स्थायित्व से अधिक होता है। इस प्रकार बेंजीन की अनुनाद संरचना से इसके स्थायित्व की व्याख्या भी हो जाती है।In simple words: The resonance concept explains benzene's stability by proposing that its actual structure is a hybrid of two Kekulé structures, where the double bonds are delocalized. This delocalization results in all carbon-carbon bond lengths being equal and intermediate between single and double bonds, increasing its overall stability.

🎯 Exam Tip: Always draw both Kekulé structures and use a double-headed arrow to show resonance. Explain that resonance stabilizes the molecule, making all C-C bonds equal in length.

 

Question 16. बेंजीन की संरचना की आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना क्या है? संक्षेप में समझाइए ।
Answer: आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार बेंजीन अणु में छ: कार्बन परमाणु एक चक्रीय श्रृंखला में उपस्थित होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु sp\(^2\) संकरित होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु में तीन sp\(^2\) संकरित ऑर्बिटल तीन सिग्मा आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु एक सिग्मा आबन्ध एक हाइड्रोजन परमाणु से तथा एक-एक सिग्मा आबन्ध समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं से बनाता है। इस प्रकार ये छ: कार्बन परमाणु एक समषट्भुज बनाते हैं। बेंजीन में C-C- H व C-C-C आबंध कोण 120° के होते हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु पर एक अप्रयुक्त p- ऑर्बिटल शेष रहता है। ये सभी p-ऑर्बिटल एक-दूसरे के समानान्तर होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख बेंजीन की आण्विक ऑर्बिटल संरचना को दर्शाता है, जो इसके 6π-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण को समझाता है। चित्र के बाईं ओर, एक षट्कोणीय वलय में कार्बन परमाणुओं को उनके sp² संकरित ऑर्बिटल और अप्रयुक्त p-ऑर्बिटल के साथ दिखाया गया है। प्रत्येक कार्बन परमाणु एक हाइड्रोजन से और दो पड़ोसी कार्बन परमाणुओं से सिग्मा बंध बनाता है। चित्र के दाईं ओर, सभी अप्रयुक्त p-ऑर्बिटलों को समानांतर रूप से दिखाया गया है जो वलय के ऊपर और नीचे एक सतत π-अभ्र बनाते हुए अतिव्यापन करते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत हो जाते हैं और अणु को अत्यधिक स्थायित्व मिलता है। प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें या दायें वाले p-ऑर्बिटल से अतिव्यापन करके एक ए-आबन्ध बना सकता है। इस प्रकार बेंजीन अणु के दो ऑर्बिटल आरेख (orbital diagrams) प्राप्त होते हैं। ये दोनों आरेख दोनों केकुले संरचनाओं के समतुल्य हैं। आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार \( \pi \)-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalisation) से अधिक स्थायी संरचना प्राप्त होती है। अतः बेंजीन में \( \pi \) – इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण हो जाता है। प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें तथा दायें दोनों ओर अतिव्यापन करता है तथा एक विस्थानीकृत आण्विक ऑर्बिटल प्राप्त होता है जिसमें छः इलेक्ट्रॉन होते हैं। इस प्रकार बेंजीन अणु एक सैण्डविच के समान है जिसमें छः कार्बन परमाणु दो इलेक्ट्रॉन मेघों के... । मध्य एक सैण्डविच के रूप में स्थित होते हैं। बेंजीन को केकुले संरचनाओं । या ।। से प्रदर्शित किया जा सकता है। चूंकि ये संरचनाएँ बेंजीन की वास्तविक संरचनाएँ नहीं हैं, अतः इसकी वास्तविक संरचना को प्रायः संलग्न चित्र में प्रदर्शित संरचना से प्रदर्शित किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक षट्कोणीय संरचना में बेंजीन के π-इलेक्ट्रॉन अभ्र के विस्थानीकरण को दर्शाता है। केंद्रीय षट्भुज के भीतर एक वृत्त यह इंगित करता है कि 6π-इलेक्ट्रॉन पूरे वलय में समान रूप से वितरित हैं, जो बेंजीन की वास्तविक, अत्यधिक स्थिर संरचना का प्रतिनिधित्व करता है। यह संरचना केकुले के एकांतर एकल और द्विआबंधों के चित्रण के बजाय इलेक्ट्रॉनों के अनुनाद और विस्थानीकरण को बेहतर ढंग से दर्शाती है।In simple words: The molecular orbital concept describes benzene as a planar hexagonal ring where each carbon is sp² hybridized, forming sigma bonds with two adjacent carbons and one hydrogen. The remaining six unhybridized p-orbitals overlap laterally above and below the ring, creating a continuous, delocalized pi electron cloud, which grants benzene exceptional stability and aromaticity.

🎯 Exam Tip: Focus on sp² hybridization, the planar hexagonal structure, and the complete delocalization of six pi electrons above and below the ring as key features of benzene's molecular orbital structure.

 

Question 17. बेंजीन संरचना में निम्न की पुष्टि कीजिए
(i) यह एक बन्द श्रृंखला का यौगिक है।
(ii) यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करती है।

Answer: बेंजीन की संगत ऐल्केन का अणुसूत्र Cn H2n+2 के अनुसार C6H14 है। बेंजीन में इससे आठ हाइड्रोजन परमाणु कम हैं। अतः यदि बेंजीन की संरचना में कार्बन परमाणु एक विवृत श्रृंखला (open chain) बनाते हैं तो उसमें चार द्विआबन्ध या इसके अनुरूप द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध उपस्थित होने चाहिये। इस आधार पर बेंजीन की निम्नलिखित विवृत श्रृंखला संरचनाएँ सम्भव हैं।
(i) HC \( \equiv \) C-CH2-CH2-C \( \equiv \) CH
(ii) H2C=CH-C\( \equiv \)C-CH=CH2
(iii) H3C - C\( \equiv \)C-C\( \equiv \)C - CH3 बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचनाएँ निम्नलिखित कारणों से सम्भव नहीं हैं-
1. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि एथिलीन तथा अन्य ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों की भॉति बेंजीन भी Br2/CCl4 का रंग उड़ा देगी तथा बॉयर अभिकर्मक का रंग परिवर्तित कर देगी। बेंजीन ऐसा नहीं करती है। अतः बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं।
2. बेंजीन हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण तथा अन्य प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक प्रदर्शित करती है। इन अभिक्रियाओं में बेंजीन अणु में उपस्थित एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु अन्य परमाणुओं या समूहों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन इस प्रकार की अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करते हैं। अतः बेंजीन की इन अभिक्रियाओं को उपरोक्त संरचनाओं के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है।
3. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के चार अणुओं का योग करेगा। वास्तव में बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के तीन अणुओं का योग करता है। अतः बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं। उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचना सम्भव नहीं है; इसमें तीन कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध उपस्थित हैं तथा इसमें उपस्थित द्विबन्धों की प्रकृति ऐलिफैटिक अंसतृप्त हाइड्रोकार्बनों में उपस्थित द्विआबन्धों की प्रकृति से भिन्न है। इस प्रकार उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि बेंजीन एक बंद श्रृंखला का यौगिक है तथा यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करता है।In simple words: Benzene behaves as a closed-chain, saturated compound due to its aromatic stability. Unlike typical unsaturated hydrocarbons, it doesn't undergo characteristic addition reactions (like decolorizing bromine water) easily, and prefers substitution reactions, confirming its unique closed-ring structure rather than an open-chain polyene.

🎯 Exam Tip: To prove benzene's closed-chain and saturated-like behavior, highlight its resistance to typical alkene addition reactions and its preference for substitution, which are hallmarks of aromatic stability.

 

Question 18. ऐरीनों या बेंजीन के भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
Answer: ऐरीनों या बेंजीन के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-
1. गंध, रंग तथा भौतिक अवस्था—ये सामान्यतः विशिष्ट गंधयुक्त, रंगहीन, द्रव या ठोस होते हैं। आप नैफ्थेलीन की गोलियों से चिरपरिचित हैं। इसकी विशिष्ट गंध तथा शलभ प्रतिकर्षी गुणधर्म के कारण इसे शौचालय में तथा कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
2. विलेयता-वृहद जलविरागी हाइड्रोकार्बन भाग के कारण ये जल में अमिश्रणीय तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
3. दहन-ये कज्जली लौ के साथ जलते हैं।
4. गलनांक तथा क्वथनांक-क्वथनांक आण्विक आकार में वृद्धि के साथ बढ़ते हैं। ऐसा वान्डरवाल्स बलों (आकर्षण) में वृद्धि के कारण होता है। गलनांक आण्विक आकार और सममिति पर निर्भर करते हैं। अणु जितना अधिक सममित होता है। गलनांक उतना ही अधिक होता है।In simple words: Arenes are typically colorless liquids or solids with distinctive odors, insoluble in water but soluble in organic solvents. They burn with a sooty flame, and their boiling points increase with molecular size due to stronger van der Waals forces. Melting points depend on both size and symmetry, with more symmetrical molecules having higher melting points.

🎯 Exam Tip: When describing physical properties, link trends (like increasing boiling point with molecular size) to underlying intermolecular forces (van der Waals) and explain the impact of symmetry on melting points.

 

Question 19. टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन तथा नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया के रासायनिक समीकरण लिखिए।
Answer:
(i) टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन अभिक्रिया
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख टॉलूईन (एक बेंजीन वलय जिस पर मेथिल समूह लगा है) के पाश्र्व श्रृंखला (side chain) प्रतिस्थापन अभिक्रिया को दर्शाता है। टॉलूईन क्लोरीन गैस (Cl₂) के साथ, प्रकाश (hv) की उपस्थिति में और उबलते ताप पर अभिक्रिया करके बेंजिल क्लोराइड (बेंजीन वलय पर -CH₂Cl समूह) बनाती है। इस अभिक्रिया में मेथिल समूह के हाइड्रोजन परमाणु क्लोरीन परमाणुओं द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं।
(ii) टॉलूईन की नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख टॉलूईन के नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया को दर्शाता है। टॉलूईन (बेंजीन वलय पर -CH₃ समूह) आयरन क्लोराइड (FeCl₃) जैसे लुईस अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में क्लोरीन गैस (Cl₂) के साथ अभिक्रिया करती है। इस अभिक्रिया में, मेथिल समूह के ऑर्थो और पैरा पदों पर हाइड्रोजन परमाणु क्लोरीन परमाणुओं द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं, जिससे o-क्लोरोटॉलूईन और p-क्लोरोटॉलूईन बनते हैं। p-क्लोरोटॉलूईन आमतौर पर मुख्य उत्पाद होता है।In simple words: Toluene undergoes side-chain substitution (e.g., chlorination under UV light at high temperature) on its methyl group, yielding benzyl chloride. It also undergoes nuclear substitution (e.g., chlorination with FeCl₃) on the benzene ring at ortho- and para-positions, forming o-chlorotoluene and p-chlorotoluene.

🎯 Exam Tip: Clearly distinguish between side-chain and nuclear substitution conditions (e.g., UV light/heat vs. Lewis acid catalyst). Side-chain substitution affects the methyl group, while nuclear substitution occurs on the ring.

 

Question 20. ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों से होने वाली कैन्सरजनीयता तथा विषाक्तता पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: बेन्जीन एवं अनेक बहुचक्री ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बहुत आविषालु (toxic) और कैन्सरजनी (carcinogenic) रासायनिक यौगिक हैं। कैन्सरजनी पदार्थ जैव ऊतकों में कैन्सर उत्पन्न कर सकते हैं। सिगरेट के धुएँ, कोल और पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन के उत्पादों में चिमनियों के धुएँ एवं चिमनियों में एकत्रित काजल (soot) में कैन्सरजनी बहुचक्री ऐरामैटिक हाइड्रोकार्बन उपस्थित होते हैं। 1,2-बेन्जऐन्ग्रेसीन (IV), 9, 10-डाइमेथिल-1,2-बेन्जऐन्ट्रेसीन (V) और 1,2-बेन्जपाइरीन (VI), कैन्सरजनी पदार्थ हैं। कैन्सरजनी पदार्थ मानव-शरीर में प्रवेश करके विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाएँ करते हैं और कोशिकाओं (cells) के DNA को क्षति पहुँचाकर कैन्सर पैदा करते हैं। DNA के म्यूटेशन के परिणामस्वरूप कैन्सर होता है। कुछ कार्बनिक पदार्थ वास्तव में स्वयं कैन्सरजनी नहीं होते, किन्तु जीव में उपाचयी क्रियाओं द्वारा सक्रिय कैन्सरजनों (carcinogens) में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार के यौगिक प्रोकार्सीनोजन (procarcinogens) कहलाते हैं। 1,2-बेन्जपाइरीन (VI) एक कैन्सरजनी (carcinogens) है। यह लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा एपॉक्सी डायॉल (epoxy diol) में परिवर्तित हो जाता है जो म्यूटेशन प्रेरित करता है जिसके परिणास्वरूप कुछ कोशिकाओं की अनियन्त्रित वृद्धि हो सकती है। बेन्जीन एक कैन्सरजुनी यौगिक है। लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा बेन्जीन का बेन्जीन ऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है। बेन्जीन ऑक्साइड़ और उससे व्युत्पन्न यौगिक कैन्सरजनी हैं और DNA से क्रिया करके म्यूटेशन प्रेरित कर सकते हैं।In simple words: Aromatic hydrocarbons, especially polycyclic ones, are toxic and carcinogenic. They can cause cancer by reacting with and damaging DNA in cells, leading to mutations and uncontrolled cell growth. Benzene itself is a known carcinogen, and many others become carcinogenic after metabolic activation in the body.

🎯 Exam Tip: When discussing carcinogenicity, mention the link to DNA damage, mutation, and the role of metabolic activation (procarcinogens) by enzymes in the body.

 

Question 1. ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रिया को मुक्त मूलक क्रियाविधि सहित समझाइए ।
Answer: हैलोजनीकरण-ऐल्केनें सूर्य के प्रकाश या उत्प्रेरक की उपस्थिति में या उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ करती हैं। किसी हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का हैलोजन परमाणुओं द्वारा विस्थापन हैलोजनीकरण कहलाता है। किसी ऐल्केन के प्रति हैलोजनों की अभिक्रियाशीलता का क्रम E > Cl > Br > I है । ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रियाएँ साधारणतः क्लोरीन और ब्रोमीन के साथ करायी जाती हैं, क्योंकि ऐल्केनों की फ्लुओरीन से सीधी अभिक्रिया अति प्रचण्ड व विस्फोटक होती है तथा ऐल्केनों की आयोडीन से अभिक्रिया उत्क्रमणीय एवं अति मन्द होती है।
1. क्लोरीनीकरण-हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन क्लोरीनीकरण कहलाता है। उदाहरणार्थ-मेथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर या उच्च ताप (250-400°C) पर गर्म करने पर मेथेन के चारों हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया के उत्पादों के रूप में क्लोरोमेथेनों और हाइड्रोजन क्लोराइड का मिश्रण प्राप्त होता है। \[ \text{CH}_4 + \text{Cl}_2 \quad \xrightarrow{\text{प्रकाश}} \quad \text{CH}_3\text{Cl} + \text{HCl} \] \[ \text{मेथेन} \quad \quad \text{क्लोरीन} \quad \quad \text{मेथिल क्लोराइड} \] \[ \text{CH}_3\text{Cl} + \text{Cl}_2 \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_2\text{Cl}_2 + \text{HCl} \] \[ \text{मेथिल क्लोराइड} \quad \quad \text{क्लोरीन} \quad \quad \text{मेथिलीन क्लोराइड} \] \[ \text{CH}_2\text{Cl}_2 + \text{Cl}_2 \quad \longrightarrow \quad \text{CHCl}_3 + \text{HCl} \] \[ \text{मेथिलीन क्लोराइड} \quad \quad \text{क्लोरीन} \quad \quad \text{क्लोरोफॉर्म} \] \[ \text{CHCl}_3 + \text{Cl}_2 \quad \longrightarrow \quad \text{CCl}_4 + \text{HCl} \] \[ \text{क्लोरोफॉर्म} \quad \quad \text{क्लोरीन} \quad \quad \text{कार्बन टेट्राक्लोराइड} \] क्लोरोफॉर्म क्लोरीन कार्बन टेट्राक्लोराइड क्लोरीनीकरण की क्रिया बहुत तीव्र गति से होती है। प्राप्त मिश्रण में मेथिल क्लोराइड (CH3Cl2), मेथिलीन क्लोराइड (CH2Cl2), क्लोरोफॉर्म (CHCl3) और कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) चारों क्लोरोमेथेन उपस्थित होती हैं। मेथेन और क्लोरीन के आयतनों के अनुपात को नियन्त्रित करके अभिक्रिया ऐच्छिक पद तक करायी जा सकती है। मेथेन की बहुत अधिकता होने पर मेथिल क्लोराइड मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। \[ \text{CH}_4 + \text{Cl}_2 \quad \xrightarrow{\text{प्रकाश}} \quad \text{CH}_3\text{Cl} + \text{HCl} \] \[ \text{मेथेन} \quad \quad \text{क्लोरीन} \quad \quad \text{मेथिल क्लोराइड} \] \[ \text{(आधिक्य में)} \] अभिक्रिया की क्रिया-विधि–सूर्य के विसरित प्रकाश में मेथेन की क्लोरीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया एक मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया है। मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया कई पदों में होती है। इसके प्रारम्भन (initiation), संचालन (propagation) और अन्तिम (termination) पद होते हैं। सूर्य के प्रकाश में मेथेन के क्लोरीनीकरण की क्रिया-विधि निम्नलिखित हैं- \[ \text{(1) Cl}_2 \quad \xrightarrow{\text{hv}} \quad \text{2Cl}\cdot \] \[ \text{क्लोरीन परमाणु या क्लोरीन मुक्त मूलक} \] \[ \text{प्रारम्भन पद (chain initiation step)} \] \[ \text{(2) Cl}\cdot + \text{CH}_4 \quad \longrightarrow \quad \text{HCl} + \text{CH}_3\cdot \] \[ \text{मेथिल मूलक} \] \[ \text{(3) CH}_3\cdot + \text{Cl}_2 \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_3\text{Cl} + \text{Cl}\cdot \] \[ \text{संचालन पद (chain propagating step)} \] फिर (2), (3), (2), (3) आदि और अन्त में, \[ \text{(4) Cl}\cdot + \text{Cl}\cdot \quad \longrightarrow \quad \text{Cl}_2 \] \[ \text{(5) CH}_3\cdot + \text{Cl}\cdot \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_3\text{Cl} \] \[ \text{अन्तिम पद (chain terminating step)} \] अभिक्रिया के प्रारम्भन पद (1) में Cl2 अणु का क्लोरीन परमाणुओं (मुक्त मूलकों) में होमोलिटिक विदलन होता है। इस पद के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रकाश से प्राप्त होती है। अत्यधिक अभिक्रियाशील क्लोरीन परमाणु शीघ्र मेथेन से अभिक्रिया करता है और उसमें से एक हाइड्रोजन परमाणु को हटा देता । है जिससे “(मेथिल मुक्त मूलक) और HCl अणु बन जाता है (पद 2)। मैथिल मुक्त मूलक अत्यधिक अभिक्रियाशील होता है और यह शीघ्र क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल क्लोराइड (CH3Cl) और क्लोरीन परमाणु बनाता है (पद 3)। क्लोरीन परमाणु पुनः मेथेन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल मूलक बनाता है और मेथिल मूलक पुनः क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके क्लोरीन परमाणु बनाता है। पद (2), (3), (2), (3) का यह क्रम लगातार चलता रहता है। पद (2) और (3) श्रृंखला संचालन पद (chain propagating steps) कहलाते हैं। संचालन पद में एक मूलक लुप्त होता है और दूसरा मूलक उत्पन्न होता है। अभिक्रिया में क्लोरीन मूलक श्रृंखला वाहक (chain carrier) का कार्य करता है। अभिक्रिया श्रृंखला का अन्त दो क्लोरीन परमाणुओं के संयोजन से Cl2 अणु बनने (पद 4), या मेथिल मूलक और क्लोरीन मूलक के संयोजन से CH3Cl बनने (पद 5) से होता है। पद (4), (5) श्रृंखला के अन्तिम पद (chain terminating step) कहलाते हैं। सूर्य के सीधे प्रकाश में मेथेन और क्लोरीन का 1 : 2 मिश्रण विस्फोट के साथ अति तीव्र अभिक्रिया करता है। अभिक्रिया में कार्बन और हाइड्रोजन क्लोराइड बनते हैं- एथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर मेथेन के सदृश एथेन के सभी हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया उत्पादों के रूप में क्लोरोएथेनों और हाईड्रोजन क्लोराइड का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है। प्रोपेन व अन्य उच्च ऐल्केनों का क्लोरीनीकरण करने पर समावयवी मोनोक्लोरोऐल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ-प्रोपेन का क्लोरीनीकरण करने पर n-प्रोपिल क्लोराइड (CH3CH2CH2Cl) और आइसोप्रोपिल क्लोराइड (CH3 CHClCH3) का मिश्रण बनता है। n-ब्यूटेन । का क्लोरीनीकरण करने पर n-ब्यूविंल क्लोराइड (CH3 CH2CH2CH2Cl) और s-ब्यूटिल क्लोराइड (CH3CH2 CHClCH3) का मिश्रण बनता है। क्लोरीन की अधिकता होने पर विभिन्न क्लोरोऐल्केनों का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है।
2. ब्रोमीनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का ब्रोमीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन ब्रोमीनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की क्लोरीन की भाँति ब्रोमीन के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ होती हैं, परन्तु ब्रोमीनीकरण अपेक्षाकृत मन्द गति से होता है।
3. आयोडिनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का आयोडीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन आयोडिनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की आयोडीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया बहुत मन्द और उत्क्रमणीय होती है, अतः उनको सीधा आयोडिनीकरण नहीं कराया जा सकता है। ऐल्केनों का आयोडिनीकरण प्रायः किसी ऑक्सीकारक (जैसे, HIO3 HNO3, आदि) की उपस्थिति में कराया जाता है। ऑक्सीकारक अभिक्रिया में बने HI को I2 में ऑक्सीकृत कर देता है, जिससे विपरीत अभिक्रिया नहीं होती है। \[ \text{CH}_4 + \text{I}_2 \quad \rightleftharpoons \quad \text{CH}_3\text{I} + \text{HI} \] \[ \text{मेथेन} \quad \quad \text{आयोडीन} \quad \text{मेथिल आयोडाइड} \quad \text{हाइड्रोजन आयोडाइड} \] \[ \text{5HI} + \text{HIO}_3 \quad \longrightarrow \quad \text{3I}_2 + \text{3H}_2\text{O} \] \[ \text{हाइड्रोजन आयोडिक अम्ल} \quad \text{आयोडीन} \quad \text{जल} \]In simple words: Halogenation of alkanes is a free-radical substitution reaction where hydrogen atoms are replaced by halogen atoms, typically chlorine or bromine, in the presence of UV light or high temperatures. The mechanism involves three steps: initiation (halogen forms free radicals), propagation (free radicals react with alkane and halogen), and termination (free radicals combine).

🎯 Exam Tip: For halogenation, remember the three key steps of the free-radical mechanism (initiation, propagation, termination) and the reactivity order of halogens (F₂ > Cl₂ > Br₂ > I₂).

 

Question 2. ऐल्कीनों के विरचन की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए ।
या
निर्जलीकरण अभिक्रियाएँ क्या हैं?

Answer: ऐल्कीनों के विरचने की प्रमुख विधियों का वर्णन निम्नवत् है-
1. ऐल्काइनों के आंशिक अपचयन से-ऐल्काइनों की हाइड्रोजन से योग अभिक्रिया का अन्तिम उत्पाद ऐल्केन हैं। इस अभिक्रिया में Ni को उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त करते हैं तथा ताप 250-300°C रखा जाता है। यदि ऐल्काइन को अधिक मात्रा में लिया जाए तथा अभिक्रिया कम ताप पर सम्पन्न करायी जाए तो अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कीन भी प्राप्त होती हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{HC}\equiv\text{CH} + \text{H}_2 \quad \xrightarrow{\text{Ni, 200°C}} \quad \text{CH}_2=\text{CH}_2 \] \[ \text{ऐसीटिलीन} \quad \quad \quad \quad \text{एथिलीन} \]
2. ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से-ऐल्कोहॉलों को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल अथवा सान्द्र फॉस्फोरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{OH} \quad \xrightarrow{\text{सान्द्र H}_2\text{SO}_4, \text{433K}} \quad \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O} \] \[ \text{एथिल ऐल्कोहॉल} \quad \quad \quad \quad \quad \text{एथिलीन} \] इस अभिक्रिया में ऐल्कोहॉल के एक अणु में से जल की एक अणु निकल जाता है। इस प्रकार की अभिक्रियाओं को निर्जलीकरण (dehydration) कहते हैं।
3. ऐल्किल हैलाइडों के विहाइड्रोहैलोजनीकरण से-ऐल्किल हैलाइडों को कास्टिक पोटाश के ऐल्कोहॉलीय विलयन के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। इस क्रिया में ऐल्किल हैलाइड के एक अणु में से हाइड्रोजन हैलाइड का एक अणु निकल जाता है। अतः इस क्रिया ‘ को विहाइड्रोहैलोजनीकरण (dehydrohalogenation) कहते हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}_2\text{Br} + \text{KOH (ऐल्कोहॉलीय)} \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{KBr} + \text{H}_2\text{O} \] \[ \text{एथिल ब्रोमाइड} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{एथिलीन} \]
4. डाइहैलोऐल्केनों के विहैलोजनीकरण से-जिन डाइहैलाइडों में दो हैलोजन परमाणु दो समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं पर स्थित होते हैं उन्हें विसिनल डाइहैलाइड (vicinal dihalides) अथवा 1, 2-डाइहैलोऐल्कॅन (1, 2- dihaloalkanes) कहते हैं। इस प्रकार के डाइहैलाइडों को मेथेनॉल अथवा एथेनॉल में जिंक चूर्ण के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ- \[ \text{Br-CH}_2-\text{CH}_2-\text{Br} + \text{Zn} \quad \xrightarrow{\text{CH}_3\text{OH, } \Delta} \quad \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{ZnBr}_2 \] \[ \text{1,2-डाइब्रोमोएथेन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{एथीन} \] डाइहैलोऐल्केन से हैलोजन का एक अणु हटाकर ऐल्कीन बनाने की प्रक्रिया विहैलोजनीकरण कहलाती है।
5. डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के वैद्युत-अपघटन से कोल्बे अभिक्रिया-डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवणों के जलीय विलयन के वैद्युत-अपघटन से ऐनोड पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ-पोटैशियम सक्सिनेट के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन करने पर ऐनोड पर एथिलीन प्राप्त होती है। \[ \text{CH}_2-\text{COOK} \]
\[ \text{CH}_2-\text{COOK} \] \[ \quad + \text{2H}_2\text{O} \quad \xrightarrow{\text{वैद्युत-अपघटन}} \quad \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{2CO}_2 + \text{H}_2 + \text{2KOH} \] \[ \text{एथिलीन} \] यह अभिक्रिया कोल्बे वैद्युत-अपघटनी अभिक्रिया (Kolbe's electrolytic reaction) कहलाती है और निम्न पदों में होती है- \[ \text{CH}_2\text{COOK} \]
\[ \text{CH}_2\text{COOK} \] \[ \quad \xrightarrow{\text{आयनन}} \quad \] \[ \text{CH}_2\text{COO}^- \]
\[ \text{CH}_2\text{COO}^- \] \[ \quad + \text{2K}^+; \quad \text{2H}_2\text{O} \quad \longrightarrow \quad \text{2OH}^- + \text{2H}^+ \]
6. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक से-हैलोजन प्रतिस्थापित ऐल्कीन (halogen substituted alkenes) तथा ग्रिगनार्ड अभिकर्मकों की अभिक्रिया से उच्च ऐल्कीन प्राप्त की जा सकती हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_2=\text{CH}-\text{CH}_2\text{Cl} + \text{CH}_3-\text{Mg}-\text{Cl} \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_2=\text{CH}-\text{CH}_2-\text{CH}_3 + \text{MgCl}_2 \] \[ \text{ऐलिल क्लोराइड} \quad \text{मेथिल मैग्नीशियम क्लोराइड} \quad \quad \text{ब्यूट-1-ईन} \]
7. अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों से-अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों को गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती हैं। उदाहरणार्थ- \[ (\text{C}_2\text{H}_5)_4\text{N-OH} \quad \longrightarrow \quad \text{C}_2\text{H}_4 + (\text{C}_2\text{H}_5)_3\text{N} + \text{H}_2\text{O} \] \[ \text{टेट्राएथिलअमोनियम हाइड्रॉक्साइड} \quad \quad \text{एथीन} \quad \quad \text{ट्राइएथिल ऐमीन} \]
8. ऐल्केनों के भंजन से-ऐल्केनों को वायु की अनुपस्थिति में 773-973 K ताप पर गर्म करने । से उनके अधिक अणुभार वाले अणु कम अणु भार वाले अणुओं में विभाजित हो जाते हैं। प्राप्त मिश्रण में निम्न ऐल्केन, ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन होते हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{CH}_3 \quad \xrightarrow{\text{873K}} \quad \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{CH}_4 + \text{H}_2 \] \[ \text{प्रोपेन} \quad \quad \quad \quad \quad \text{प्रोपीन} \quad \quad \quad \text{एथिलीन} \quad \quad \text{मेथेन} \] प्राप्त मिश्रण के अवयवों को उपयुक्त विधियों द्वारा अलग-अलग किया जा सकता है।In simple words: Alkenes can be prepared by partial hydrogenation of alkynes (using Ni at specific temperatures), dehydration of alcohols (removing water using strong acids), dehydrohalogenation of alkyl halides (removing HX using alcoholic KOH), dehalogenation of vicinal dihalides (using Zn dust), Kolbe's electrolytic method from dicarboxylic acids, reaction of halogen-substituted alkenes with Grignard reagents, thermal decomposition of tetraalkylammonium hydroxides, and cracking of alkanes. Dehydration reactions specifically involve the removal of a water molecule.

🎯 Exam Tip: For alkene preparation, focus on the different starting materials and the specific reagents/conditions (e.g., concentrated H₂SO₄ for alcohol dehydration, alcoholic KOH for dehydrohalogenation, Ni for partial hydrogenation) for each method.

 

Question 3. ऐल्कीनों के प्रमुख रासायनिक गुणों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ऐल्कीन अत्यन्त क्रियाशील होती हैं तथा प्रायः ऐसी अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं जिनमें द्विआबन्ध का \( \pi \)-आबन्ध विखण्डित हो जाता है। इनकी प्रमुख अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
1. योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐल्कीनों में द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ये यौगिक योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। इन अभिक्रियाओं में द्विआबन्ध का \( \pi \)-आबन्ध तथा अभिकर्मक दो भागों में विभक्त हो जाता है। अभिकर्मक का एक भाग द्विआबन्ध बनाने वाले एक कार्बन परमाणु से तथा दूसरा भाग दूसरे परमाणु से जुड़ जाता है। \[ \text{C}=\text{C} + \text{X-Y} \quad \longrightarrow \quad \text{X-C}-\text{C-Y} \] ऐल्कीनों की योगात्मक अभिक्रियाओं के कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(i) हाइड्रोजन का योग-ऐल्कीन निकिल चूर्ण की उपस्थिति में 523-573 K ताप पर हाइड्रोजन से योग करके ऐल्केन बना देती हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2 \quad \xrightarrow{\text{Ni, 523-573K}} \quad \text{CH}_3-\text{CH}_3 \] \[ \text{एथीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{एथेन} \] \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{H}_2 \quad \xrightarrow{\text{Ni, 523-573K}} \quad \text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{CH}_3 \] \[ \text{प्रोपीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{प्रोपेन} \] निकिल की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा हाइड्रोजन की योग अभिक्रिया को सेवातिये तथा सेण्डर्न की अभिक्रिया कहते हैं। यह अभिक्रिया उच्च ताप पर होती है। पैलेडियम या प्लेटिनम उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन साधारण ताप पर ही अभिक्रिया कर लेती हैं तथा ऐल्केन बनाती हैं।
(ii) हैलोजनों का योग-ऐल्कीन, हैलोजनों के साथ संयोग करके डाइहैलोजन यौगिक बनाती हैं। इस अभिक्रिया में हैलोजनों की क्रियाशीलता का क्रम Cl2 > Br2 >I2 है। यह अभिक्रिया किसी अध्रुवीय विलायक जैसे CCl4 तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में या किसी ध्रुवीय विलायक जैसे जल में की जाती है। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{Cl}_2 \quad \xrightarrow{\text{जल}} \quad \text{CH}_2\text{Cl}-\text{CH}_2\text{Cl} \] \[ \text{एथीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{1, 2-डाइक्लोरोएथेन} \] \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{Br}_2 \quad \xrightarrow{\text{CCl}_4/\text{hv}} \quad \text{CH}_3-\text{CHBr}-\text{CH}_2\text{Br} \] \[ \text{प्रोपीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{1, 2-डाइब्रोमोप्रोपेन} \]
(iii) हाइड्रोजन हैलाइडों का योग-किसी भी ऐल्कीन का एक अणु किसी भी हाइड्रोजन हैलाइड के एक अणु से संयोग करके योगात्मक यौगिक बनाता है। उदाहरणार्थ- इस अभिक्रिया में हैलोजन हैलाइडों की क्रियाशीलता का क्रम HI > HBr > HCl है।
(iv) जल का योग-अम्लीय उत्प्रेरकों की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा जल की योग अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कोहॉल प्राप्त होते हैं। जल का योग मारकोनीकॉफ के नियम के अनुसार होता है। उदाहरणार्थ- \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O} \quad \xrightarrow{\text{H}^+} \quad \text{CH}_3-\text{CH(OH)}-\text{CH}_3 \] \[ \text{प्रोपीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल} \]
(v) ओजोन का योग-ऐल्कीनों के ईथरीय विलयन में ओजोन प्रवाहित करने पर योगात्मक यौगिक बनते हैं जिन्हें ओजोनाइड (ozonides) कहते हैं। ओजोनाइडों को जल के साथ उबालने पर ये अपघटित हो जाते हैं। जल-अपघटन की क्रिया Zn चूर्ण की उपस्थिति में करायी जाती है। यह जल-अपघटन से प्राप्त हाइड्रोजन परॉक्साइंड को अपघटित कर देता है ताकि यह अन्य उत्पादों से अभिक्रिया न कर सके। ऐल्कीनों तथा ओजोन की योग अभिक्रिया तथा ओजोनाइडों के जल-अपघटन की अभिक्रिया, इस सम्पूर्ण क्रिया को ओजोनी अपघटन (ozonolysis) कहते हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{H}_3\text{C}-\text{C(CH}_3\text{)=CH-CH}_3 \quad \xrightarrow{\text{O}_3/\text{CCl}_4} \quad \text{H}_3\text{C}-\overset{\text{O}}{\underset{\text{O}}{C}}\text{H}_3 + \text{O}=\text{CH}-\text{CH}_3 \] \[ \text{2-मेथिल-2-ब्यूटीन} \quad \quad \text{2-मेथिल-2-ब्यूटीन ओजोनाइड} \] \[ \text{H}_3\text{C}-\overset{\text{O}}{\underset{\text{O}}{C}}\text{H}_3 + \text{H}_2\text{O} \quad \xrightarrow{\text{जल-अपघटन}} \quad \text{H}_3\text{C}-\text{C}=\text{O} + \text{H}_2\text{O}_2 + \text{OHC}-\text{CH}_3 \] \[ \text{ऐसीटोन} \quad \quad \text{ऐसीटेल्डिहाइड} \] स्पष्ट है कि सम्पूर्ण अभिक्रिया में द्विआबन्ध टूट जाता है तथा जिन कार्बन परमाणुओं से द्विआबन्ध जुड़ा था, वे ऑक्सीजन परमाणु से जुड़ जाते हैं।
2. प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ-असंतृप्त होने के कारण ऐल्कीन मुख्यतः योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं तथा प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती हैं लेकिन उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ संयोग करके ये प्रतिस्थापन उत्पाद भी देती हैं। उदाहरणार्थ-
3. ऑक्सीकरण
(i) दहन-हवा अथवा ऑक्सीजन में ऐल्कीन दीप्तिमान ज्वाला के साथ जलती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं।
(ii) क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से—1% क्षारीय KMnO4 विलयन से ऑक्सीकृत होकर ऐल्कीन, डाइहाइड्रॉक्सी यौगिक बनाती हैं। \[ \text{2KMnO}_4 + \text{2KOH} \quad \longrightarrow \quad \text{2K}_2\text{MnO}_4 + \text{H}_2\text{O}+[\text{O}] \] \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 +[\text{O}] + \text{H}_2\text{O} \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_3-\text{CH(OH)}-\text{CH}_2\text{OH} \] \[ \text{प्रोपिलीन} \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \text{प्रोपिलीन ग्लाइकॉल} \] इस अभिक्रिया में KMnO4 का गुलाबी रंग लुप्त हो जाता है तथा K2MnO4 बनने के कारण हरा रंग प्राप्त होता है। इस अभिक्रिया की सहायता से दिये गए कार्बनिक यौगिक में कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध की उपस्थिति की अर्थात् असंतृप्तता की जाँच की जा सकती है। 1% क्षारीय KMnO4 को बॉयर अभिकर्मक (Baeyer's reagent) तथा असंतृप्तता के इस परीक्षण को बॉयर परीक्षण (Baeyer's test) कहते हैं।
(iii) अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से-अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन के प्रभाव में ऐल्कीन अणु उस स्थान से विखण्डित हो जाता है जहाँ द्विआबन्ध होता है तथा अम्ल, ऐल्डिहाइड या कीटोन प्राप्त होते हैं। उदाहरणार्थ- \[ \text{2KMnO}_4 + \text{3H}_2\text{SO}_4 \quad \longrightarrow \quad \text{K}_2\text{SO}_4 + \text{2MnSO}_4 + \text{3H}_2\text{O} + \text{5O} \] \[ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{4O} \quad \longrightarrow \quad \text{HCOOH} + \text{HCOOH} \] \[ \text{एथिलीन} \quad \quad \quad \quad \quad \text{फॉर्मिक अम्ल फॉर्मिक अम्ल} \] \[ \text{CH}_3-\text{CH}=\text{CH}_2 + \text{4O} \quad \longrightarrow \quad \text{CH}_3\text{COOH} + \text{HCOOH} \] \[ \text{प्रोपिलीन} \quad \quad \quad \quad \quad \text{ऐसीटिक अम्ल} \quad \text{फॉर्मिक अम्ल} \] \[ \text{(CH}_3\text{)}_2\text{C}=\text{CH}_2 + \text{3O} \quad \longrightarrow \quad \text{(CH}_3\text{)}_2\text{C}=\text{O} + \text{HCOOH} \] \[ \text{आइसो-ब्यूटिलीन} \quad \quad \quad \quad \text{ऐसीटोन} \quad \text{फॉर्मिक अम्ल} \] उपरोक्त अभिक्रियाओं सेप्राप्त फॉर्मिक अम्ल अभिक्रिया की परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड व जल में ऑक्सीकृत हो जाता है। \[ \text{HCOOH} +[\text{O}] \quad \longrightarrow \quad \text{CO}_2 + \text{H}_2\text{O} \] उपर्युक्त के अतिरिक्त ऐल्कीने बहुलकीकरण, समावयवीकरण, ऑक्सीमरक्यूरेशन डीमरक्यूरेशन तथा हाइड्रोबोरोनेशन या हाइड्रोबोरेशन अभिक्रियाएँ भी प्रदर्शित करती हैं।In simple words: Alkenes are highly reactive due to their pi bond, undergoing various reactions like catalytic hydrogenation (addition of H₂ to form alkanes), halogenation (addition of X₂ to form dihalides), hydrohalogenation (addition of HX following Markovnikov's rule), hydration (addition of H₂O to form alcohols), and ozonolysis (cleavage of the double bond to form aldehydes/ketones). They also undergo oxidation reactions like combustion and reaction with Baeyer's reagent (cold, dilute KMnO₄) to form diols, and with acidic KMnO₄ for oxidative cleavage.

🎯 Exam Tip: When describing chemical properties of alkenes, categorize them into addition (hydrogen, halogens, HX, water, ozone) and oxidation reactions (combustion, Baeyer's reagent, acidic KMnO₄), highlighting Markovnikov's rule where applicable.

 


Answer: (v) हाइड्रोजन सायनाइड का योग-ऐसीटिलीन Ba (CN)2 अथवा HCl में CuCl की उपस्थिति में हाइड्रोजन सायनाइड से योग करके वाइनिल सायनाइड (vinyl cyanide) बनाती है।
उदाहरणार्थ-
\( \text{HC≡CH + HCN} \xrightarrow{\text{Ba(CN)₂ या CuCl/HCl}} \text{CH₂=CH-CN} \)
ऐसीटिलीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) वाइनिल सायनाइड
2. नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐसीटिलीन को पोटैशियम मेथॉक्साइड (दाब पर) की सूक्ष्म मात्रा (1-2%) की उपस्थिति में 433-473K पर मेथेनॉल में से गुजारने पर मेथिल वाइनिल ईथर प्राप्त होता है।
\( \text{CH₃O⁻K⁺} \)
\( \text{HC≡CH + CH₃O-H} \xrightarrow{\text{433-473K}} \text{CH₂=CH-OCH₃} \)
ऐसीटिलीन \( \qquad \qquad \) मेथेनॉल \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) मेथिल वाइनिल ईथर
3. ऐल्काइनों की अम्लीय प्रकृति-ऐल्काइनों के त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय होते हैं। यह तथ्य निम्न अभिक्रियाओं द्वारा सत्यापित होता है-
(i) सोडामाइड से अभिक्रिया-सोडामाइड एक प्रबल क्षारक है। एथाइन और अन्य टर्मिनल ऐल्काइन अथवा 1-ऐल्काइन द्रव अमोनिया में सोडामाइड से अभिक्रिया करके सोडियम ऐसीटिलाइड (क्षारीय) बनाती हैं।
\( \text{HC≡CH + NaNH₂} \xrightarrow{\text{द्रव NH₃, 196K}} \text{HC≡C⁻Na⁺ + NH₃} \)
एथाइन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) सोडियम ऐसीटिलाइड
\( \text{R-C≡CH + NaNH₂} \xrightarrow{\text{द्रव NH₃, 196K}} \text{R-C≡C⁻Na⁺ + NH₃} \)
टर्मिनल ऐल्काइन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) सोडियम ऐल्किनाइड
(ii) सोडियम से अभिक्रिया-एथाइन तथा अन्य टर्मिनल ऐल्काइनों को सोडियम (प्रबल क्षारक) के साथ गर्म करने पर सोडियम ऐसीटिलाइड बनते हैं।
\( \text{2HC≡CH + 2Na} \xrightarrow{\text{475K}} \text{2HC≡C⁻Na⁺ + H₂} \)
ऐसीटिलीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) मोनोसोडियम ऐसीटिलाइड
(iii) अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया-ऐल्काइनों के त्रिआबंध पर जुड़े हाइड्रोजन परमाणु भारी धातु आयनों जैसे Ag⁺ आयनों द्वारा भी प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐल्काइन अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया करके सिल्वर ऐसीटिलाइड बनाती हैं।
\( \text{CH≡CH + 2 [Ag(NH₃)₂]⁺OH⁻ → AgC≡CAg↓ + 2H₂O + 4NH₃} \)
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) डाइसिल्वर एथिनाइड
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) (सफेद अवक्षेप)
\( \text{R-C≡CH + [Ag(NH₃)₂]⁺OH⁻ → R-C≡C-Ag↓ + H₂O + 2NH₃} \)
(टर्मिनल ऐल्काइन) \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) सिल्वर ऐल्किनाइड
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) (सफेद अवक्षेप)
(iv) अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया-एथाइन तथा टर्मिनल ऐल्काइन अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया करके कॉपर ऐसीटिलाइड के लाल अवक्षेप बनाती हैं।
\( \text{HC≡CH + 2 [Cu(NH₃)₂]⁺OH⁻ → CuC≡CCu↓ + 2H₂O + 4NH₃} \)
एथाइन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) डाइकॉपर एथिनाइड
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) (लाल अवक्षेप)
\( \text{R-C≡CH + [Cu(NH₃)₂]⁺OH⁻ → R-C≡C-Cu↓ + H₂O + 2NH₃} \)
(टर्मिनल ऐल्काइन) \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) मोनोकॉपर ऐल्किनाइड
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) (लाल अवक्षेप)In simple words: Alkynes undergo addition reactions, typically electrophilic, due to their triple bond. Terminal alkynes also exhibit acidic properties, reacting with strong bases and heavy metal ions like Ag+ and Cu+ to form salts, which are often precipitates.

🎯 Exam Tip: Understanding the types of addition reactions (electrophilic vs. nucleophilic) and the acidic nature of terminal alkynes is key for scoring. Pay attention to the conditions and reagents that differentiate these reactions.

 

Question 6. बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का क्रियाविधि सहित वर्णन कीजिए ।
Answer: बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
1. हैलोजनीकरण-बेंजीन सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में तथा हैलोजन वाहक जैसे Fe या FeCl₃ की उपस्थिति में कमरे के ताप पर ही क्लोरीन या ब्रोमीन से अभिक्रिया करके प्रतिस्थापन उत्पाद बनाती है।
\[ \text{C₆H₆} + \text{Cl₂} \xrightarrow{\text{FeCl₂}} \text{C₆H₅Cl} + \text{HCl} \]
बेंजीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) क्लोरोबेंजीन
\[ \text{C₆H₆} + \text{Br₂} \xrightarrow{\text{FeBr₃}} \text{C₆H₅Br} + \text{HBr} \]
बेंजीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \) ब्रोमोबेंजीन
क्रियाविधि-बेंजीन पर हैलोजनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-
\[ \text{Cl-Cl} + \text{FeCl₃} \longrightarrow \text{Cl⁺} + \text{FeCl₄⁻} \]
हैलोजन \( \qquad \) हैलोजन वाहक \( \qquad \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \qquad \) क्षारक
\( (\text{क्लोरीनियम आयन}) \)
\[ \text{C₆H₆} + \text{Cl⁺} \longrightarrow \text{C₆H₆Cl⁺} \]
बेंजीन \( \qquad \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \qquad \) σ-संकर
\[ \text{C₆H₆Cl⁺} + \text{FeCl₄⁻} \longrightarrow \text{C₆H₅Cl} + \text{FeCl₃} + \text{HCl} \]
σ-संकर \( \qquad \) क्षारक \( \qquad \) क्लोरोबेंजीन \( \qquad \) हैलोजन वाहक
\( (\text{उत्पाद}) \qquad \qquad \) (पुनरुत्पादित)
2. सल्फोनीकरण-बेंजीन को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर बेंजीनसल्फोनिक अम्ल प्राप्त होता है। सधूम सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ यह अभिक्रिया साधारण ताप पर ही हो जाती है।
\[ \text{C₆H₆} + \text{H₂SO₄(सधूम)} \longrightarrow \text{C₆H₅SO₃H} + \text{H₂O} \]
बेंजीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) बेंजीनसल्फोनिक अम्ल
क्रियाविधि-बेंजीन का सल्फोनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-
1. सांद्र H₂SO₄ एक SO₃ अणु को निष्कासित करता है।
\( \text{H₂SO₄} + \text{H₂SO₄} \implies \text{H₃O⁺} + \text{HSO₄⁻} + \text{SO₃} \)
SO₃ निम्न अनुनाद संरचनाओं को एक अनुनाद संकर है।
2. इलेक्ट्रॉनस्नेही बेंजीन रिंग पर आक्रमण कर एक σ -जटिल का निर्माण करता है।
3. σ-संकर क्षारक HSO₄⁻ से क्रिया कर प्रतिस्थापन उत्पाद बनाता है।
3. नाइट्रीकरण-बेंजीन सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया करके नाइट्रोबेंजीन बनाती है।
\[ \text{C₆H₆} + \text{HNO₃(conc.)} \xrightarrow{\text{conc. H₂SO₄}} \text{C₆H₅NO₂} + \text{H₂O} \]
बेंजीन \( \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \) नाइट्रोबेंजीन
साधारण ताप पर यह अभिक्रिया धीमी गति से तथा ताप बढ़ाने पर तेजी से होती है। अधिक ताप पर तथा नाइट्रिक अम्ल की अधिक मात्रा प्रयुक्त करने पर डाइ-तथा ट्राइ-प्रतिस्थापन उत्पाद अर्थात् m-डाइनाइट्रोबेंजीन तथा 1, 3, 5-ट्राइनाइट्रोबेंजीन प्राप्त होते हैं। क्रियाविधि-बेंजीन का नाइट्रीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है
\( \text{H₂SO₄ + H-O-NO₂} \longrightarrow \text{H-O⁺(H)-NO₂} + \text{HSO₄⁻} \)
सान्द्र सल्फ्यूरिक सान्द्र नाइट्रिक \( \qquad \) प्रोटोनेट्ड नाइट्रिक अम्ल \( \qquad \) क्षारक
अम्ल \( \qquad \) अम्ल
\( \text{H-O⁺(H)-NO₂} \longrightarrow \text{H₂O} + \text{NO₂⁺} \)
\( \qquad \qquad \qquad \) नाइट्रोनियम आयन
\( \qquad \qquad \qquad \) (इलेक्ट्रॉनस्नेही)
\( \text{C₆H₆} + \text{NO₂⁺} \longrightarrow \text{C₆H₆NO₂⁺} \)
बेंजीन \( \qquad \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \qquad \) σ-संकर
\( \text{C₆H₆NO₂⁺} + \text{HSO₄⁻} \longrightarrow \text{C₆H₅NO₂} + \text{H₂SO₄} \)
σ-संकर \( \qquad \) क्षारक \( \qquad \) नाइट्रोबेंजीन \( \qquad \) (प्रतिस्थापन उत्पाद)
4. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण - किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl₃ की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐल्किल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐल्किलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-
\[ \text{C₆H₆} + \text{CH₃CH₂Cl} \xrightarrow{\text{AlCl₃}} \text{C₆H₅CH₂CH₃} + \text{HCl} \]
बेंजीन \( \qquad \) एथिल क्लोराइड \( \qquad \) एथिल बेंजीन
क्रियाविधि - बेंजीन का फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण निम्न क्रियाविधि से सम्पन्न होता है
\[ \text{CH₃CH₂Cl} + \text{AlCl₃} \longrightarrow \text{CH₃CH₂⁺} + \text{AlCl₄⁻} \]
ऐलुमिनियम क्लोराइड \( \qquad \) एथिल कार्बोधनायन \( \qquad \) क्षारक
\( (\text{लूईस अम्ल}) \qquad \qquad \) (इलेक्ट्रॉनस्नेही)
\[ \text{C₆H₆} + \text{CH₃CH₂⁺} \longrightarrow \text{C₆H₆CH₂CH₃⁺} \]
बेंजीन \( \qquad \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \qquad \) σ-संकर
\[ \text{C₆H₆CH₂CH₃⁺} + \text{AlCl₄⁻} \longrightarrow \text{C₆H₅CH₂CH₃} + \text{AlCl₃} + \text{HCl} \]
σ-संकर \( \qquad \) क्षारक \( \qquad \) एथिल बेंजीन \( \qquad \) उत्प्रेरक
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \) (प्रतिस्थापन उत्पाद) \( \qquad \) (पुनरुत्पादित)
5. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण-किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl₃ की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐसिल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐसिलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-
\[ \text{C₆H₆} + \text{CH₃COCl} \xrightarrow{\text{AlCl₃}} \text{C₆H₅COCH₃} + \text{HCl} \]
बेंजीन \( \qquad \) ऐसीटिल क्लोराइड \( \qquad \) ऐसीटोफीनोन
क्रियाविधि-बेंजीन का फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है।
\[ \text{CH₃C(=O)-Cl} + \text{AlCl₃} \longrightarrow \text{CH₃C(=O)⁺} + \text{AlCl₄⁻} \]
ऐसीटिल क्लोराइड \( \qquad \) ऐलुमिनियम क्लोराइड \( \qquad \) ऐसीटिलीनियम आयन \( \qquad \) क्षारक
\( (\text{लूईस अम्ल}) \qquad \) (इलेक्ट्रॉनस्नेही) \( \qquad \) (इलेक्ट्रॉनस्नेही)
\[ \text{C₆H₆} + \text{CH₃C(=O)⁺} \longrightarrow \text{C₆H₆C(=O)CH₃⁺} \]
बेंजीन \( \qquad \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \qquad \) σ-संकर
\[ \text{C₆H₆C(=O)CH₃⁺} + \text{AlCl₄⁻} \longrightarrow \text{C₆H₅C(=O)CH₃} + \text{AlCl₃} + \text{HCl} \]
σ-संकर \( \qquad \) क्षारक \( \qquad \) ऐसीटोफीनोन \( \qquad \) उत्प्रेरक
\( \qquad \qquad \qquad \qquad \) (प्रतिस्थापन उत्पाद) \( \qquad \) (पुनरुत्पादित)In simple words: Benzene undergoes electrophilic substitution reactions, where an electrophile replaces a hydrogen atom on the ring. Common reactions include halogenation, sulfonation, nitration, and Friedel-Crafts alkylation/acylation, each involving a specific electrophile and a mechanism with an intermediate sigma complex.

🎯 Exam Tip: For each reaction, focus on identifying the electrophile, the catalyst (if any), and the overall reaction equation. Understanding the general mechanism of electrophilic substitution is crucial for all these reactions.

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