UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants

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Detailed Chapter 11 पौधों में परिवहन UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 11 पौधों में परिवहन UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Biology Chapter 11 Transport In Plants (पौधों में परिवहन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

 

Question 1. विसरण की दर को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?
Answer: विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं
1. तापमान : तापमान के बढ़ने से विसरण की दर बढ़ती है।
2. विसरण कर रहे पदार्थों का घनत्व : विसरण की दर विसरण कर रहे पदार्थों के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसको ग्राह्म के विसरण का नियम (Graham' law of diffusion) कहते हैं।
3. विसरण का माध्यम : अधिक सान्द्र माध्यमे में विसरण की दर कम हो जाती है।
4. विसरण दाब प्रवणता : विसरण दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है अणुओं का विसरण उतना ही तीव्र होता है।
In simple words: विसरण की दर तापमान, पदार्थों के घनत्व, माध्यम की सान्द्रता और विसरण दाब प्रवणता पर निर्भर करती है। तापमान बढ़ने पर दर बढ़ती है, जबकि सान्द्र माध्यम में घटती है।

🎯 Exam Tip: विसरण दर को प्रभावित करने वाले कारकों को सूचीबद्ध करना और प्रत्येक का संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. पोरीन्स क्या हैं? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते हैं?
Answer: पोरीन्स प्रोटीन के वृहत अणु हैं जो माइटोकॉण्डूया, क्लोरोप्लास्ट तथा कुछ जीवाणुओं की बाह्य कला में धंसे रहते हैं। ये बड़े छिद्र बनाते हैं जिससे बड़े अणु उसमें से निकल सकें । अतः ये सहज विसरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: पोरीन्स बड़े प्रोटीन अणु होते हैं जो कुछ कोशिकांगों और जीवाणुओं की बाहरी झिल्लियों में पाए जाते हैं, जो बड़े अणुओं को सहज विसरण द्वारा पार करने के लिए मार्ग बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: पोरीन्स की परिभाषा, उनका स्थान और सहज विसरण में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है।

 

Question 3. पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पम्प के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
Answer: पादप कला के लिपिड स्तर में वाहक प्रोटीन के अणु मिलते हैं। ये ऊर्जा का उपयोग कर सान्द्रता विभव के विरुद्ध अणुओं को भेजते हैं। अतः उन्हें प्रोटीन पम्प कहते हैं। ये आयन का परिवहन कला के आर-पार इन प्रोटीन पम्पों की सहायता से करते हैं।
In simple words: पादपों में, प्रोटीन पम्प वाहक प्रोटीन होते हैं जो ऊर्जा का उपयोग करके अणुओं को उनकी सान्द्रता प्रवणता के विरुद्ध कोशिका झिल्ली के आर-पार ले जाते हैं, जिससे आयनों का सक्रिय परिवहन होता है।

🎯 Exam Tip: सक्रिय परिवहन में प्रोटीन पम्प की भूमिका को ऊर्जा के उपयोग और सान्द्रता प्रवणता के विरुद्ध परिवहन के साथ जोड़कर समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन कीजिए।
Answer: शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योकि
1. जल अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।
2. किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा । शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।
3. जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।
4. जल विभव को ग्रीक चिह्न \( \Psi \) (Psi) से चिह्नित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्त किया जाता है।
5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का विभव (water potential) शून्य होता है।
6. किसी विलयन तन्त्र का जल विभव उस विलयन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।
7. शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अतः सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential \( \Psi_s \)) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं। जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाती है। इसे दाब विभव (Pressure potential) कहते हैं। दाब विभव प्रायः सकारात्मक होता है, लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसारोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (\( \Psi \)) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (\( \Psi_p \)) परासरणीय विभव या विलेय विभव (\( \Psi_s \)) तथा मैट्रिक्स विभव (\( \Psi_n \)) । मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है। अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं \( \Psi = \Psi_p + \Psi_s \)
9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।
10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता हैं।
In simple words: शुद्ध जल में कोई विलेय घुला नहीं होता, इसलिए उसके जल अणु मुक्त अवस्था में होते हैं और उनकी गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है। यह अधिकतम गतिज ऊर्जा शुद्ध जल को उच्चतम जल विभव प्रदान करती है, जिसे मानक परिस्थितियों में शून्य माना जाता है।

🎯 Exam Tip: जल विभव की अवधारणा और इसे प्रभावित करने वाले कारकों को अच्छी तरह से समझें, विशेषकर \( \Psi = \Psi_p + \Psi_s \) सूत्र और शुद्ध जल के शून्य जल विभव को।

 

Question 5. निम्नलिखित के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए
(क) विसरण एवं परासरण
(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण
(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव
(घ) विसरण तथा अन्तः शोषण
(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
(छ) बिन्दुस्राव एवं परिवहन (अभिगमन)।

Answer:
(क) विसरण एवं परासरण में अन्तर

क्र० सं०विसरण (Diffusion)परासरण (Osmosis)
1.विसरण क्रिया सभी पदार्थों-ठोस, द्रव व गैसों में हो सकती है।परासरण केवल द्रव तथा उसमें विलेय पदार्थों में ही होता है।
2.विसरण के लिए किसी झिल्ली की आवश्यकता नहीं होती है।परासरण के लिए अर्द्धपारगम्य (semipermeable) या वरणात्मक पारगम्य झिल्ली की आवश्यकता होती है।
3.विसरण सभी दिशाओं (directions) में होने वाली क्रिया है।परासरण निश्चित दिशा या दिशाओं में होने वाली क्रिया है।
4.इस क्रिया में कोई विशेष दाब नहीं पैदा होता है।परासरण दाब होता है, जो विलयन की सान्द्रता पर निर्भर करता है।
5.विसरण क्रिया अधिक विसरण दाब से कम विसरण दाब की ओर होती है।परासरण क्रिया कम परासरण दाब वाले विलयन से अधिक परासरण दाब वाले विलयन की ओर होती है।

(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अन्तर
क्र० सं०वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)वाष्पीकरण (Evaporation)
1.पादप शरीर के वायवीय भागों से होने वाली इस क्रिया में वाष्पन के साथ-साथ जलवाष्प का विसरण होता है।जल की किसी भी सतह से जल का वाष्प रूप में परिणत होते रहना वाष्पन क्रिया है। यह एक सामान्य क्रिया है।
2.यह एक जैव-भौतिक क्रिया है, जो वाष्पन के कारकों के अतिरिक्त पादप शरीर की बाह्य तथा आन्तरिक रूप, रंग तथा संरचना के द्वारा नियन्त्रित की जाती है।यह एक भौतिक क्रिया है तथा अनेक भौतिक कारकों पर निर्भर करती है, जो ताप तथा दाब सम्बन्धी होते हैं।

(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव में अन्तर
क्र० सं०परासारी दाब (Osmotic Pressure)परासारी विभव (Osmotic Potential)
1.इसे OP से प्रदर्शित करते हैं।इसे \( \Psi_s \) से प्रदर्शित करते हैं।
2.इसे मापा (measure) जा सकता है। इसे बार (Bar) में मापा जाता है। [एक मेगा पास्कल (mPa) = 10 बार (Bar)]इसे मापा नहीं जा सकता।
3.यह धनात्मक (+Ve) होता है।यह ऋणात्मक (-Ve) होता है।
4.यह परासारी विभव के बराबर और विपरीत होता है।संख्यात्मक आधार पर परासरण दाब परासारी विभव के बराबर होता है, लेकिन इसका संकेत विपरीत होता है।
5.अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा जब घोल को शुद्ध जल से पृथक् करते हैं तो घोल द्वारा उत्पन्न दाब को परासारी दाब कहते हैं।सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव निम्न होता है। निम्नता का कारण विलेय के द्रवीकरण के कारण होता है। इसे विलेय विभव कहते हैं।

(घ) विसरण एवं अन्तः शोषण में अन्तर
क्र० सं०विसरण (Diffusion)अन्तःशोषण (Imbibition)
1.यह ठोस, तरल एवं गैस के अणुओं में होने वाली क्रिया है।यह जीवित तथा मृत कोशिकाओं में होने वाली क्रिया है।
2.इस क्रिया में गैस, तरल और ठोस (तरल माध्यम में) के अणु या आयन्स अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थान की ओर गति करते हैं।इसमें सामान्य सतह से जलवाष्प या जल का अवशोषण जल विभव प्रवणता के कारण होता है।
3.इसमें अणुओं या आयन्स के मध्य आकर्षण आवश्यक नहीं होता।इसमें अवशोषक (imbibant) तथा माध्यम के अणुओं के मध्य आकर्षण होना आवश्यक है।

(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
क्र० सं०एपोप्लास्ट पथ (Apoplast Pathway)सिमप्लास्ट पथ (Symplast Pathway)
1.यह निकटवर्ती कोशिका भित्ति का तन्त्र है। यह अन्तस्त्वचा की कैस्पेरियन पट्टियों को छोड़कर पूरे पौधों में पाया जाता है।यह सम्बन्धित जीवद्रव्य का तन्त्र है। समीपवर्ती कोशिकाएँ कोशिकाद्रव्यी तन्तुओं से जुड़ी रहती हैं।
2.जल का एपोप्लास्ट परिवहन केवल अन्तर कोशिकीय अवकाशों और कोशिकाओं की भित्ति में होता है।जल का सिमप्लास्ट परिवहन कोशिकाओं के जीवद्रव्य और कोशिकाद्रव्यी तुन्तुओं के माध्यम से होता है।
3.एपोप्लास्ट जल परिवहन गति प्रवणता पर निर्भर रहता है। यह मूलतः सामान्य विसरण एवं केशिका क्रिया (capillary action) के कारण होता है।जल को जाइलम ऊतक में पहुँचाने के लिए मूलतः परासरण क्रिया होती है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र जड़ों में जल और पोषक तत्वों के एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट मार्गों को दर्शाता है। एपोप्लास्ट मार्ग में जल कोशिका भित्तियों और अंतरकोशिकीय स्थानों से होकर गुजरता है, जबकि सिमप्लास्ट मार्ग में जल प्लास्मोडेस्मेटा के माध्यम से कोशिका द्रव्य से कोशिका द्रव्य में गति करता है, अंततः जाइलम तक पहुंचता है।
(छ) बिन्दुस्राव एवं परिवहन (अभिगमन) में अन्तर
क्र० सं०बिन्दुस्राव (Guttation)परिवहन (Transportation)
1.पौधों की पत्तियों से तरल कोशिकारस के स्रवित होने को बिन्दुस्राव कहते हैं।संवहन ऊतक द्वारा पदार्थों के आवागमन को परिवहन कहते हैं।
2.यह पत्तियों के किनारों पर स्थित जलरन्ध्रों (hydathodes) से होता है। सामान्यतया मूलदाब के कारण यह घास आदि शाकीय पौधों में रात्रि के समय होता है।जाइलम जल एवं पोषक पदार्थों तथा फ्लोएम कार्बनिक पदार्थों के परिवहन के लिए उत्तरदायी होते हैं। जाइलम में परिवहन जड़ से पत्तियों की ओर तथा फ्लोएम में परिवहन पत्तियों से जड़ की ओर होता है।

In simple words: यह प्रश्न विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं जैसे विसरण बनाम परासरण, वाष्पोत्सर्जन बनाम वाष्पीकरण, परासारी दाब बनाम विभव, विसरण बनाम अंतःशोषण, एपोप्लास्ट बनाम सिमप्लास्ट पथ, और बिन्दुस्राव बनाम परिवहन के बीच के अंतरों को स्पष्ट करता है, जो पौधों में जल और पोषक तत्वों के आवागमन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

🎯 Exam Tip: सभी अंतरों को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत करना और प्रत्येक प्रक्रिया की मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में समझाना परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. जल विभव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। कौन-से कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए ।
Answer: “अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर” में शीर्षक के प्रश्न 4 का उत्तर देखिए ।
In simple words: जल विभव जल की गतिज ऊर्जा का माप है, जो विलेय और दाब विभव से प्रभावित होता है। शुद्ध जल का विभव शून्य होता है, जबकि विलेय जोड़ने पर यह घटता है, और दाब बढ़ने पर बढ़ता है।

🎯 Exam Tip: प्रश्न 4 का उत्तर विस्तार से तैयार करें, जिसमें जल विभव की परिभाषा, प्रभावित करने वाले कारक और उसके घटकों (\( \Psi_p \), \( \Psi_s \)) के बीच संबंध शामिल हों।

 

Question 7. लब क्या होता है जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है?
Answer: जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है। तो इसका जल विभव बढ़ जाता है। जब पौधों या कोशिका में जल विसरण द्वारा प्रवेश करता है तो कोशिका आशून (turgid) हो जाती है। इसके फलस्वरूप दाब विभव (pressure potential) बढ़ जाता है। दाब विभव अधिकतर सकारात्मक होता है। इसे 9 से प्रदर्शित करते हैं। जल विभव घुलित तथा दाब विभव से प्रभावित होता है।
In simple words: जब शुद्ध जल या विलयन पर बाहरी दाब बढ़ाया जाता है, तो उसका जल विभव बढ़ जाता है, जिससे कोशिकाएं जल अवशोषित कर आशून हो जाती हैं और उनमें धनात्मक दाब विभव उत्पन्न होता है।

🎯 Exam Tip: बाहरी दाब के प्रभाव को जल विभव और कोशिका की स्फीति (turgidity) से जोड़कर समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. (क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों में जीवद्रव्यकुंचने की विधि का वर्णन उदाहरण देकर कीजिए।
(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन में रखा जाए तो क्या होगा?

Answer:
(क) रिक्तिकामय पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन (hypertonic solution) में रख देने पर कोशिकारस कोशिका से बाहर आने लगता है। यह क्रिया बहिःपरासरण (exosmosis) के कारण होती है। इसके फलस्वरूप जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका में एक ओर एकत्र हो जाता है। इस अवस्था में कोशिका पूर्ण श्लथ (fully flaccid) हो जाती है। इस क्रिया को जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) कहते हैं। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका की कोशिका भित्ति और जीवद्रव्य के मध्य अतिपरासारी विलयन एकत्र हो जाता है, लेकिन यह विलयन कोशिकारिक्तिका में नहीं पहुँचता । इससे यह स्पष्ट होता है कि कोशिका भित्ति पारगम्य होती है और रिक्तिका कला अर्द्धपारगम्य होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र जीवद्रव्यकुंचन की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाता है। (A) एक सामान्य आशून कोशिका है। (B) और (C) कोशिका के अतिपरासारी विलयन में रखे जाने पर जीवद्रव्यकुंचन की क्रमिक अवस्थाएं हैं, जहां कोशिका रस बाहर निकल जाता है। (D) कोशिका की श्लथ दशा को दर्शाता है, जिसमें जीवद्रव्य पूरी तरह सिकुड़ चुका होता है। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका को आसुत जल या अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution) में रखा जाए तो कोशिका पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। इस प्रक्रिया को जीवद्रव्यविकुंचन (deplasmolysis) कहते हैं। कोशिका को समपरासारी विलयन (isotonic solution) में रखने पर कोशिका में कोई परिवर्तन नहीं होता, जितने जल अणु कोशिका से बाहर निकलते हैं उतने जल अणु कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कोशिका को समपरासारी, अतिपरासारी और अल्पपरासारी विलयनों में रखने पर होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है। समपरासारी विलयन में जल का शुद्ध प्रवाह शून्य होता है। अतिपरासारी विलयन में जल कोशिका से बाहर निकलता है, जिससे जीवद्रव्यकुंचन होता है। अल्पपरासारी विलयन में जल कोशिका में प्रवेश करता है, जिससे कोशिका स्फीत होती है।
(ख) अल्पसारी विलयन (hypotonic solution) कोशिकारस या कोशिकाद्रव्य की अपेक्षा तनु (dilute) होता है। इसका जल विभव (water potential) अधिक होता है। अतः पादप कोशिका को अल्पपरासारी विलयन में रखने पर अन्तःपरासरण की क्रिया होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप अतिरिक्त जल कोशिका में पहुँचकर स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करता है। स्फीति दाब भित्ति दाब (wall pressure) के बराबर होता है। स्फीति दाब को दाब विभव (pressure potential) भी कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता एवं स्फीति दाब के कारण कोशिका भित्ति क्षतिग्रस्त नहीं होती। स्फीति या आशूनता के कारण कोशिका में वृद्धि होती है। स्फीति दाब एवं परासरण दाब के बराबर हो जाने पर कोशिका में जल का आना रुक जाता है।
In simple words: (क) जीवद्रव्यकुंचन तब होता है जब एक पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन में रखा जाता है, जिससे कोशिका से पानी बाहर निकल जाता है और जीवद्रव्य सिकुड़ जाता है। (ख) यदि कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन (अल्पपरासारी) में रखा जाए, तो पानी कोशिका में प्रवेश करेगा, जिससे वह स्फीत (turgid) हो जाएगी।

🎯 Exam Tip: जीवद्रव्यकुंचन और जीवद्रव्यविकुंचन की प्रक्रियाओं को चित्र सहित स्पष्ट करना और उनके कारणों (परासरण) को समझाना महत्वपूर्ण है। हाइपरटोनिक, आइसोटोनिक और हाइपोटोनिक समाधानों के प्रभाव को समझें।

 

Question 9. पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइकोराइजल (कवकमूले सहजीवन) सम्बन्ध कितने सहायक हैं?
Answer: माइकोराइजल या कवकमूलीय सहजीवन अनेक उच्च पादपों की जड़े कवक मूल द्वारा संक्रमित हो जाती हैं; जैसे-चीड़, देवदार, ओक आदि । कवक तन्तु की जड़ों की सतह पर बाह्यपादपी कवकमूल (ectophytic mycorrhiza) बनाता है। कभी-कभी कवक तन्तु जड़ के अन्दर पहुँच जाते हैं और अन्तःपादपी कवकमूल बनाते हैं। कवक मूल संगठन में कवक तन्तु अपना भोजन पोषक (host) की जड़ों से प्राप्त करते हैं तथा वातावरण की नमी व भूमि की ऊपरी सतह से लवणों का अवशोषण कर पोषक पौधे को प्रदान करने का कार्य करते हैं। कुछ आवृतबीजी पौधे; जैसे-निओशिया (Neottii), मोनोटोपा (Monotropd) भी कवकमूल सहजीवन प्रदर्शित करते हैं। इन पौधों को अगर कवक सेहजीविता समय पर उपलब्ध नहीं होती तो ये मर जाते हैं। चीड़ के बीज कवक सहजीविता स्थापित न होने की स्थिति में अंकुरित होकर नवोदुभिद् (seedings) नहीं बना पाते ।
In simple words: माइकोराइजा कवकों और पौधों की जड़ों के बीच एक सहजीवी संबंध है, जिसमें कवक जड़ों की जल और खनिज अवशोषण क्षमता को बढ़ाते हैं, जबकि पौधे कवकों को पोषक तत्व प्रदान करते हैं। यह संबंध पौधों के अस्तित्व और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: माइकोराइजा की परिभाषा, उसके प्रकार (एक्टोमाइकोराइजा और एंडोमाइकोराइजा) और पौधों के लिए उसके महत्व को समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. पादप में जल परिवहन हेतु मूलदाब क्या भूमिका निभाता है?
Answer:

मूलदाब

मूल वल्कुट (root cortex) कोशिकाओं की स्फीति (आशून) स्थिति में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाले दाब को मूलदाब (root pressure) कहते हैं। मूलदाब के फलस्वरूप जल (कोशिकारस) जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूलदाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephan Hales, 1927) ने किया। स्टॉकिंग (Stocking, 1956) के अनुसार जड़ के जाइलम में उत्पन्न दाब, जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होता है, मूलदाब कहलाता है। मूलदाब सामान्यतया + 1 से + 2 बार तक होता है। इससे जल कुछ ऊँचाई तक चढ़ सकता है। शुष्क मृदा में मूलदाब उत्पन्न नहीं होता । बहुत-से पौधों; जैसे-अनावृतबीजी (gymnosperms) में मूलदाब उत्पन्न हीं नहीं होता। अतः आधुनिक मतानुसार रसारोहण में मूलदाब का विशेष कार्य नहीं है।
In simple words: मूलदाब जड़ की वल्कुट कोशिकाओं में उत्पन्न होने वाला दाब है जो पानी को जाइलम वाहिकाओं में धकेलता है। यह पानी को कुछ ऊंचाई तक ऊपर चढ़ाने में मदद करता है, खासकर कम वाष्पोत्सर्जन की स्थिति में।

🎯 Exam Tip: मूलदाब की परिभाषा और जल परिवहन में उसकी सीमित भूमिका को स्पष्ट करें, खासकर वाष्पोत्सर्जन के सापेक्ष।

 

Question 11. पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या कीजिए। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है? पादपों के लिए कौन उपयोगी है?
Answer:

रेसारोहण या जल परिवहन

पौधे जड़ों द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक (पत्तियों तक) पहुँचता है। यह ऊँचाई सिकोया (Sequoid) में 370 फुट तक होती है। गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण कहते हैं। सर्वमान्य वाष्पोत्सर्जनाकर्षण जलीय संसंजक मत (Transpiration Pull Cohesive Force of Water Theory) के अनुसार रसारोहण निम्नलिखित कारणों से होता है
1. वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल) : पत्तियों की कोशिकाओं से जल के वाष्पन के फलस्वरूप कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाबे न्यूनता (Diffusion pressure deficit) अधिक हो जाती है। इसके फलस्वरूप जल जाइलम से परासरण द्वारा पर्ण कोशिकाओं में पहुँचता रहता है। जलवाष्प रन्ध्रों से वातावरण में विसरित होती रहती है। इसके फलस्वरूप जाइलम में उपस्थित जल स्तम्भ पर एक तनाव उत्पन्न हो जाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होने वाले इस तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) कहते हैं।
2. जल अणुओं का संसंजन बल (Cohesive Force of water Molecules) : जल अणुओं के मध्य संसंजन बल (cohesive force) होता है। इसी संसंजन बल के कारण जल स्तम्भ 400 वायुमण्डलीय दाब पर भी खण्डित नहीं होता और इसकी निरन्तरता बनी रहती है। संसंजन बल के कारण जल 1500 मीटर ऊँचाई तक चढ़ सकता है।
3. जल तथा जाइलम भित्ति के मध्य आसंजन (Adhesion between Water and Cell wall of Xylem Tissue) : जाइलम ऊतक की कोशिकाओं और जल अणुओं के मध्य आसंजन (adhesion) का आकर्षण होता है। यह आसंजन जल स्तम्भ को सहारा प्रदान करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न तनाव जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र दर्शाता है कि वाष्पोत्सर्जनाकर्षण के कारण जल जड़ों से पत्तियों तक कैसे पहुंचता है। इसमें जाइलम वाहिकाओं में जल अणुओं के बीच संसंजन (cohesion) और जाइलम भित्ति से आसंजन (adhesion) दिखाया गया है, जो एक निरंतर जल स्तंभ बनाता है। पत्ती के रंध्रों से जल वाष्प के रूप में बाहर निकलता है, जिससे एक खिंचाव उत्पन्न होता है जो जल को ऊपर खींचता है।

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

पौधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो समूहों में बाँट सकते हैं (अ) बाह्य कारक (External Factors)
(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors)

(अ) बाह्य कारक

1. वायुमण्डल की अपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity of Atmosphere) : वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता कम होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
2. प्रकाश (Light) : प्रकाश के कारणरन्ध्र खुलते हैं, तापमान में वृद्धि होती है; अतः वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। रात्रि में रन्ध्र बन्द हो जाने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
3. वायु (Wind) : वायु की गति अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक हो जाती है।
4. तापक्रम (Temperature) : ताप के बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। ताप कम होने पर आपेक्षिक आर्द्रता अधिक हो जाती हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
5. उपलब्ध जल (Available Water) : वाष्poत्सर्जन की दर जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। मृदा में जल की कमी होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

(ब)

आन्तरिक कारक पत्तियों की संरचना, रन्ध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।

वाष्पोत्सर्जन की उपयोगिता

1. पौधों में अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है।
2. मृदा से प्राप्त खनिजों के पौधों के सभी अंगों (भागों) तक परिवहन में सहायता करता है।
3. पत्ती की सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15°C तक ठण्डा रखता है।
4. कोशिकाओं को स्फीति रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियन्त्रित रखने में सहायता करता है।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल के अनुसार, पत्तियों से पानी के वाष्पीकरण से एक नकारात्मक दबाव (खिंचाव) बनता है जो जाइलम में पानी के अणुओं को ऊपर खींचता है, जिसे संसंजन और आसंजन बल बनाए रखते हैं। इसे बाहरी कारकों जैसे आर्द्रता, प्रकाश, वायु, तापमान और उपलब्ध जल, साथ ही आंतरिक कारकों जैसे पत्ती की संरचना द्वारा प्रभावित किया जाता है। वाष्पोत्सर्जन पौधों के लिए जल और खनिज परिवहन, शीतलन और आकार विनियमन के लिए उपयोगी है।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल के तीनों सिद्धांतों (सं cohesion, आसंजन adhesion, और खिंचाव pull) को स्पष्ट रूप से समझाएं। वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले बाहरी और आंतरिक कारकों की सूची बनाना और प्रत्येक की उपयोगिता का वर्णन करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 12. पादपों में जाइलम रसारोहण के लिए जिम्मेदार कारकों की व्याख्या कीजिए।
Answer: रसारोहण गुरुत्वाकर्षण के विपरीत मूलरोम से पत्तियों तक कोशिकारस (cell sap) के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (Ascent of sap) कहते हैं। रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) के कारण होता है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है
(1) संसंजन (Cohesion) : जल के अणुओं के मध्य आकर्षण ।
(2) आसंजन (Adhesion) : जल अणुओं का ध्रुवीय सतह (जैसे-जाइलम ऊतक) से आकर्षण ।
(3) पृष्ठ तनाव (Surface Tension) : जल अणुओं की द्रव अवस्था में गैसीय अवस्था। जल की उपर्युक्त विशिष्टताएँ जल को उच्च तन्य सामर्थ्य (high tensile strength) प्रदान करती हैं। वाहिकाएँ एवं वाहिनिकाएँ (tracheids & vessels) केशिका (capillary) के समान लघु व्यास वाली कोशिकाएँ होती हैं।
In simple words: जाइलम में रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जन खिंचाव से उत्पन्न होता है। यह संसंजन (पानी के अणुओं का आपस में आकर्षण), आसंजन (पानी और जाइलम भित्ति के बीच आकर्षण), और पानी के उच्च पृष्ठ तनाव द्वारा समर्थित होता है, जिससे एक निरंतर और अखंड जल स्तंभ बनता है।

🎯 Exam Tip: रसारोहण की परिभाषा, और वाष्पोत्सर्जनाकर्षण-सं cohesion theory के तीन प्रमुख घटकों (सं cohesion, आसंजन adhesion, पृष्ठ तनाव surface tension) को उदाहरण सहित समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अन्तःत्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है?
Answer: जड़ों की अन्तस्त्वचा कोशिकाओं की कोशिकाकला पर अनेक वाहक प्रोटीन्स पाई जाती हैं। ये प्रोटीन्स जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाने वाले घुलितों की मात्रा और प्रकार को नियन्त्रित करने वाले बिन्दुओं की भाँति कार्य करती हैं। अन्तस्त्वचा की सुबेरिनमय (suberinised) कैस्पेरी पट्टियों (casparian strips) द्वारा खनिज या घुलित पदार्थों के आयन्स या अणुओं का परिवहन एक ही दिशा (unidirection) में होता है। अतः अन्तस्त्वचा (endodermis) खनिजों की मात्रा और प्रकार को जाइलम तक पहुँचने को नियन्त्रित करती है। जल तथा खनिजों की गति मूलत्वचा (epiblema) से अन्तस्त्वचा तक सिमप्लास्टिक (symplastic) होती है।
In simple words: जड़ों में अन्तःत्वचा खनिजों के अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि इसमें वाहक प्रोटीन होते हैं जो खनिजों की मात्रा और प्रकार को नियंत्रित करते हैं। कैस्पेरी पट्टियां पानी और घुलित पदार्थों को केवल सिमप्लास्टिक पथ से जाइलम तक पहुंचने देती हैं, जिससे एकदिशीय परिवहन सुनिश्चित होता है।

🎯 Exam Tip: अन्तःत्वचा की दो मुख्य भूमिकाओं को उजागर करें - वाहक प्रोटीन द्वारा खनिज चयन और कैस्पेरी पट्टियों द्वारा सिमप्लास्टिक पथ को मजबूर करना, जो खनिज परिवहन की दिशा को नियंत्रित करता है।

 

Question 14. जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोएम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या कीजिए।
Answer:
1. जाइलम परिवहन (Xylem Transport) : पौधे अपने लिए आवश्यक जल एवं खनिज पोषक मृदा से प्राप्त करते हैं। ये सक्रिय या निष्क्रिय अवशोषण या सम्मिश्रित प्रक्रिया द्वारा अवशोषित । होकर जाइलम तक पहुँचते हैं। जाइलम द्वारा जल एवं पोषक तत्त्वों का परिवहन एकदिशीय (unidirection) होता है। ये पौधों के वृद्धि क्षेत्र की ओर विसरण द्वारा पहुँचते हैं।
2. फ्लोएम परिवहन (Phloem Transport) : फ्लोएम द्वारा सामान्यतया कार्बनिक भोज्य पदार्थों का परिवहन होता है। कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों का पौधे के संचय अंगों (कुण्ड-सिक) तक परिवहन होता है। लेकिन यह स्रोत (पत्तियाँ) और कुण्ड (संचय अंग) अपनी भूमिकाएँ मौसम और आवश्यकतानुसार बदलते रहते हैं; जैसे-जड़ों में संचित अघुलनशील भोज्य पदार्थ बसन्त ऋतु के प्रारम्भ में घुलनशील शर्करा में बदलकर वर्दी और पुष्प कलिकाओं तक पहुँचने लगता है। इससे स्पष्ट है कि संश्लेषण स्रोत और संचय स्थल (कुण्ड-सिंक) का सम्बन्ध बदलता रहता है। अतः फ्लोएम में घुलनशील शर्करा का परिवहन द्विदिशीय या बहुदिशीय (bidirectional or multidirectional) होता है।
In simple words: जाइलम हमेशा जड़ों से पत्तियों तक पानी और खनिजों का एकदिशीय परिवहन करता है। फ्लोएम पत्तियों (स्रोत) से पौधों के विभिन्न विकासशील भागों या भंडारण अंगों (सिंक) तक भोजन का द्विदिशीय या बहुदिशीय परिवहन करता है, क्योंकि स्रोत और सिंक की भूमिका बदल सकती है।

🎯 Exam Tip: जाइलम और फ्लोएम परिवहन की दिशात्मकता में अंतर को स्पष्ट रूप से बताएं, जल और खनिजों के एकदिशीय जाइलम परिवहन को समझाएं, और स्रोत-सिंक संबंध के आधार पर फ्लोएम में द्विदिशीय परिवहन का वर्णन करें।

 

Question 15. पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए।
Answer: शर्करा के स्थानान्तरण की दाब प्रवाह परिकल्पना खाद्य पदार्थों (शर्करा) के वितरण की सर्वमान्य क्रियाविधि दाब प्रवाह परिकल्पना है। पत्तियों में संश्लेषित ग्लूकोस, सुक्रोस (sucrose) में बदलकर फ्लोएम की चालनी नलिकाओं और सहचर कोशिकाओं द्वारा पौधों के संचय अंगों में स्थानान्तरित होता है। पत्तियों में निरन्तर भोजन निर्माण होता रहता है। फ्लोएम ऊतक की चालनी नलिकाओं में जीवद्रव्य के प्रवाहित होते रहने के कारण उसमें घुलित भोज्य पदार्थों के अणु भी प्रवाहित होते रहते हैं। यह स्थानान्तरण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होता है। पत्तियों की कोशिकाओं में निरन्तर भोज्य पदार्थों का निर्माण होता रहता है, इसलिए पत्ती की कोशिकाओं में परासरण दाब अधिक रहता है। जड़ों तथा अन्य संचय भागों में भोज्य पदार्थों के अघुलनशील पदार्थों में बदल जाने या प्रयोग कर लिए जाने के कारण इन कोशिकाओं का परासरण दाब कम बना रहता है। भोज्य पदार्थों के परिवहन हेतु जल जाइलम ऊतक से प्राप्त होता है। संचय अंगों में मुक्त जल जाइलम ऊतक में वापस पहुँच जाता है। इस प्रकार फ्लोएम द्वारा सुगमतापूर्वक कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन होता रहता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पौधों में भोजन पदार्थों के स्थानांतरण की दाब प्रवाह परिकल्पना को दर्शाता है। पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा शर्करा बनती है, जिससे वहां उच्च परासरण दाब होता है। यह शर्करा फ्लोएम में लोड की जाती है, और जाइलम से पानी फ्लोएम में आता है। इससे फ्लोएम में दाब बढ़ता है, और शर्करा को कम दाब वाले क्षेत्रों (जड़ों या भंडारण अंगों) की ओर धकेला जाता है, जहां शर्करा का उपयोग या भंडारण किया जाता है और पानी वापस जाइलम में चला जाता है।
In simple words: दाब प्रवाह परिकल्पना बताती है कि पत्तियों में संश्लेषित शर्करा फ्लोएम में उच्च सांद्रता बनाती है, जिससे पानी जाइलम से फ्लोएम में प्रवेश करता है और एक उच्च दाब उत्पन्न होता है। यह दाब शर्करा को फ्लोएम के माध्यम से पौधों के उन भागों में धकेलता है जहां सांद्रता कम होती है, जैसे जड़ें या बढ़ते हुए हिस्से।

🎯 Exam Tip: दाब प्रवाह परिकल्पना के मुख्य सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझाएं, जिसमें स्रोत (पत्तियां) और सिंक (जड़ें/विकासशील भाग) के बीच सांद्रता प्रवणता, जल की भूमिका और परासरण दाब शामिल हैं।

 

Question 16. वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षके द्वार कोशिका खुलने एवं बन्द होने के क्या कारण हैं?
Answer:

वाष्पोत्सर्जन

पौधों के वायवीय भागों से होने वाली जल हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं। यह सामान्यतया रन्ध्र (stomata) द्वारा होता है। उपचर्म (cuticle) तथा वातारन्ध्र (lenticel) इसमें सहायक होते हैं। रन्ध्र रक्षक द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरा सूक्ष्म छिद्र होता है। रक्षक द्वार कोशिकाएँ सेम के बीज या वृक्क के आकार की होती हैं। ये चारों ओर से बाह्य त्वचीय कोशिकाओं अथवा सहायक कोशिकाओं से घिरी रहती हैं। रक्षक द्वार कोशिका में केन्द्रक तथा हरितलवक (chloroplast) पाए जाते हैं। रक्षक द्वार कोशिका की भीतरी सतह मोटी भित्ति वाली तथा बाह्य सतह पतली भित्ति वाली होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पर्णरंध्र की संरचना और खुलने-बंद होने की अवस्थाओं को दर्शाता है। (A) एक पत्ती के रंध्र की बंद अवस्था है, जिसमें द्वार कोशिकाएं शिथिल होती हैं। (B) रंध्र की खुली अवस्था है, जब द्वार कोशिकाएं स्फीत होती हैं और रंध्र खुल जाता है। (C) एक अन्य बंद अवस्था है, जो रंध्र के पूरी तरह से बंद होने को दिखाती है। रन्ध्र को खुलना या बन्द होना रक्षक द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है। जब रक्षक कोशिकाएँ स्फीति होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब ये श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। रन्ध्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित माइक्रोफाइब्रिल सहायता करते हैं। ये अरीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। सामान्यतया रन्ध्र दिन के समय खुले रहते हैं। औ रात्रि के समय बन्द हो जाते हैं।
In simple words: रक्षक द्वार कोशिकाओं का खुलना और बंद होना उनकी स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है, जो मुख्य रूप से उनमें पानी के प्रवेश और निकास से नियंत्रित होती है। जब वे स्फीत होती हैं, तो रंध्र खुलते हैं, और जब वे शिथिल होती हैं, तो रंध्र बंद हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: द्वार कोशिकाओं की संरचना और उनकी स्फीति में परिवर्तन के कारण रंध्रों के खुलने और बंद होने की क्रियाविधि को स्पष्ट करें। दिन और रात के समय रंध्रों की सामान्य स्थिति को भी उल्लेख करें।

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. बिन्दुस्राव प्रायः पाया जाता है
(क) जलीय पौधों में
(ख) समोभिद् पौधों में
(ग) मरुद्भिद् पौधों में
(घ) शाकीय पौधों में

Answer: (घ) शाकीय पौधों में
In simple words: बिन्दुस्राव, पत्तियों के किनारों से जल के बूंदों के रूप में निकलने की प्रक्रिया है, जो सामान्यतः शाकीय पौधों में होती है।

🎯 Exam Tip: बिन्दुस्राव की परिभाषा और यह किन प्रकार के पौधों में पाया जाता है, यह याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. वाष्पोत्सर्जन की क्रिया हो सकती है
(क) उपचर्मीय
(ख) वातरन्ध्रीय
(ग) रन्ध्रीय
(घ) सभी प्रकार की

Answer: (घ) सभी प्रकार की
In simple words: वाष्पोत्सर्जन पौधों के विभिन्न वायवीय भागों से पानी के वाष्पीकरण की प्रक्रिया है, जो उपचर्म (cuticular), वातरंध्र (lenticular) और रंध्र (stomatal) तीनों प्रकार से हो सकती है।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन के तीनों प्रकारों और उनके स्थानों को जानें।

 

Question 3. अधिक वाष्पोत्सर्जन होता है
(क) वातरन्ध्र में
(ख) रन्ध्र में
(ग) उपत्वचा में
(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer: (ख) रन्ध्र में
In simple words: पौधों में अधिकांश वाष्पोत्सर्जन रंध्रों (stomata) के माध्यम से होता है क्योंकि वे वाष्पीकरण के लिए सबसे बड़े खुले क्षेत्र प्रदान करते हैं।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन के प्रमुख माध्यम (रंध्र) को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. निम्नलिखित में से किन पौधों में रन्ध्र रात में खुले तथा दिन में बन्द रहते हैं? (क) मरुद्भिद्
(ख) समोद्भिद्
(ग) मांसलोभिद्
(घ) जलोभिद्

Answer: (ग) मांसलोभिद्
In simple words: मांसलोभिद् पौधों में, पानी के संरक्षण के लिए रंध्र रात में खुलते हैं ताकि CO2 अवशोषित हो सके और दिन में बंद रहते हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन कम हो सके।

🎯 Exam Tip: CAM पौधों (मांसलोभिद्) में रंध्र खुलने और बंद होने के पैटर्न को समझना महत्वपूर्ण है, जो पानी के संरक्षण के लिए एक अनुकूलन है।

 

Question 5. पौधों में खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण होता है
(क) मूलरोमों द्वारा
(ख) रन्ध्रों द्वारा
(ग) दारु कोशिकाओं द्वारा
(घ) फ्लोएम कोशिकाओं द्वारा

Answer: (घ) फ्लोएम कोशिकाओं द्वारा
In simple words: पौधों में खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से शर्कराओं का स्थानान्तरण फ्लोएम ऊतक में स्थित चालनी नलिकाओं (जो फ्लोएम कोशिकाओं का हिस्सा हैं) द्वारा होता है।

🎯 Exam Tip: फ्लोएम को पौधों में खाद्य पदार्थों के परिवहन के लिए प्राथमिक ऊतक के रूप में पहचानना आवश्यक है।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. उस पादप शारीरिक क्रिया का नाम लिखिए जो जलरन्ध्रों द्वारा होती है।
Answer: जलरन्ध्रों (hydathodes) के द्वारा होने वाली शारीरिक क्रिया (physiological activity) बिन्दुस्रवण (guttation) कहलाती है।
In simple words: जलरंध्रों द्वारा होने वाली पादप शारीरिक क्रिया को बिन्दुस्राव कहते हैं, जिसमें पत्तियों के किनारों से पानी बूंदों के रूप में बाहर निकलता है।

🎯 Exam Tip: जलरंध्रों से संबंधित विशिष्ट प्रक्रिया (बिन्दुस्राव) का नाम याद रखें।

 

Question 2. वाष्पोत्सर्जन की दर नापने वाले उपकरण का नाम लिखिए ।
Answer: पोटोमीटर।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन की दर को मापने के लिए पोटोमीटर नामक उपकरण का उपयोग किया जाता है।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन दर मापन उपकरण का नाम याद रखें।

 

Question 3. उस तत्त्व का नाम बताइए जो रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने में सक्रिय भूमिका निभाता (भाग लेता) है।
Answer: पोटैशियम तत्त्व (K+) के एकत्र होने से लेविट (Levit) के अनुसार रन्ध्र खुल जाता है।
In simple words: पोटैशियम आयन (K+) रंध्रों के खुलने और बंद होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उनके प्रवाह से द्वार कोशिकाओं की स्फीति बदलती है।

🎯 Exam Tip: पोटैशियम आयन (K+) की रंध्र गति में भूमिका को याद रखें।

 

Question 4. निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए
(क) स्फीति दाब व भित्ति दाब ।
(ख) अन्तः शोषण व परासरण।

Answer:
(क) स्फीति दाब व भित्ति दाब जल अवशोषण के कारण कोशिका के अन्दर जीवद्रव्य की मात्रा बढ़ जाती है तथा कोशिका स्फीति दशा में आ जाती है। इस समय जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर लगाया जाने वाला दाब स्फीति दाब कहलाता है। इस दाब के विरुद्ध दृढ़ कोशिका भित्ति द्वारा जो दाब आरोपित होता है उसे भित्ति दाब कहते हैं।
(ख) अन्तःशोषण व परासरण ठोस एवं कोलॉइडी पदार्थों द्वारा जल अवशोषण अन्तःशोषण कहलाता है जैसे काष्ठ द्वारा जल का अवशोषण । इसके विपरीत परासरण वह क्रिया है जिसमें जल एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली से होकर कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर जाता है।
In simple words: (क) स्फीति दाब कोशिका के जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर लगाया गया दाब है, जबकि भित्ति दाब कोशिका भित्ति द्वारा स्फीति दाब के जवाब में लगाया गया विपरीत दाब है। (ख) अंतःशोषण ठोस पदार्थों द्वारा पानी का अवशोषण है, जबकि परासरण पानी का अर्धपारगम्य झिल्ली से उच्च सांद्रता से कम सांद्रता की ओर जाना है।

🎯 Exam Tip: स्फीति दाब और भित्ति दाब के बीच के संबंध (वे एक-दूसरे के विपरीत और बराबर होते हैं) तथा अंतःशोषण और परासरण के बीच के प्रमुख अंतरों को स्पष्ट रूप से समझें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. परासरण किसे कहते हैं? परासरण क्रिया की चित्र द्वारा व्याख्या कीजिए। या चित्र की सहायता से अण्डे की झिल्ली द्वारा परासरण की परिघटना का प्रदर्शन कीजिए और परासरण की परिभाषा भी लिखिए ।
Answer: परासरण पौधे जन्तुओं से कोशिका भित्ति (cell wall) के आधार पर भिन्न होते हैं। कोशिका भित्ति पौधों में सबसे बाहरी तरफ पायी जाती है। यह एक पारगम्य परत होती है। अतः यह विभिन्न पदार्थों के परिवहन या गति के लिए बाधक नहीं होती है। एक पौधे की कोशिकाओं में प्रायः एक केन्द्रीय रसधानी (central vacuole) होती है, जिसका रसधानीयुक्त रस कोशिका के विलेय विभव में भागीदारी करता है। पादप कोशिका में कोशिका झिल्ली तथा रसधानी की झिल्ली, टोनोप्लास्ट, दोनों एक साथ कोशिका के भीतर एवं बाहर अणुओं की गति निर्धारित करने के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। परासरण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता हैवह क्रिया जिसमें विलायक के अणु अपनी अधिक सान्द्रता से कम सान्द्रता की ओर एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा तब तक गति करते रहते हैं जब तक कि सान्द्रता एकसमान न हो जाये, परासरण (osmosis) कहलाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र परासरण की प्रक्रिया को दर्शाता है। (A) में एक अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से जल के अणु (WATER) उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र में गति करते हैं, जबकि विलेय के अणु (SOLUBLE MOLECULES) झिल्ली को पार नहीं कर पाते हैं। (B) जल के शुद्ध प्रवाह को दिखाता है। इसे हम निम्न प्रयोग द्वारा समझ सकते हैंशर्करा के विलयन को एक कीप में लिया गया है, जो एक बीकर में रखे गए जल से अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा अलग है। आप इस प्रकार की झिल्ली एक अंडे से प्राप्त कर सकते हैं। आप अंडे के एक सिरे पर छोटा सा छेद करके सारा पीला एवं श्वेत पदार्थ (योल्क एवं एल्यूमिन) निकाल लें और फिर अंडे के कवच को कुछ घण्टों के लिए तनु नमक के अम्ल (HCI) में छोड़ दें। अंडे का कवच घुल जायेगा और उसकी झिल्ली साबुत प्राप्त हो जाएगी। जल कीप की ओर गति करेगा और कीप में घोल का स्तर बढ़ जाएगा। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक कि साम्यावस्था की स्थिति नहीं आ जाती । कीप के ऊपरी भाग पर बाहरी दाब डाला जा सकता है ताकि झिल्ली के माध्यम से कीप में जल विसरित न हो। यह दाब जल को विसरित होने से रोकता है। विलेय सान्द्रता अधिक होने पर जल को विसरित होने से रोकने के लिए अधिक दाब की भी आवश्यकता होगी । संख्यात्मक आधार पर परासरण दाब परासरण विभव के बराबर होता है लेकिन इसका संकेत विपरीत होता है। परासरण दाब में प्रयुक्त दाब सकारात्मक होता है जबकि परासरण विभव नकारात्मक होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अंडे की झिल्ली का उपयोग करके परासरण का प्रदर्शन करता है। (A) में, एक कीप में शर्करा विलयन भरकर उसे जल से भरे बीकर में उल्टा रखा गया है, जिसमें अंडा झिल्ली अर्धपारगम्य अवरोधक का काम करती है। जल झिल्ली को पार करके कीप में विलयन का स्तर बढ़ाता है (तीर जल के प्रवाह को दर्शाता है)। (B) में, एक बाहरी दाब लगाकर कीप में जल के प्रवाह को रोका जा सकता है, जो परासरण दाब के बराबर होता है।
In simple words: परासरण वह प्रक्रिया है जिसमें विलायक के अणु एक अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से अपनी उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर तब तक गति करते हैं जब तक कि सांद्रता एकसमान न हो जाए। इसे अंडे की झिल्ली जैसे मॉडल का उपयोग करके प्रदर्शित किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: परासरण की परिभाषा को स्पष्ट करें और उदाहरण या चित्र के माध्यम से उसकी क्रियाविधि का वर्णन करें। अर्धपारगम्य झिल्ली की भूमिका और विलायक के अणुओं की गति को समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. जीवद्रव्यकुंचन तथा विसरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या जीवद्रव्यकुंचन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer:

जीवद्रव्यकुंचन तथा विसरण में अन्तर ज

जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis)विसरण (Diffusion)
  • यह क्रिया जीवित पादप कोशिका तथा बाह्य अतिपरासारी (hypertonic) विलयन के बीच होती है।
  • यह क्रिया किसी भी माध्यम, ठोस, द्रव अथवा गैस में हो सकती है।
  • इस क्रिया में जीवद्रव्य कला तथा टोनोप्लास्ट ही अर्द्धपारगम्य झिल्ली या विभेदी पारगम्य झिल्ली का कार्य करते हैं।
  • इस क्रिया के लिए किसी झिल्ली की आवश्यकता नहीं होती।
  • जीवद्रव्यकुंचन एक बहिः परासरण क्रिया है जिसमें जल, रिक्तिका-रस से निकलकर बाहर अतिपरासारी विलयन में आता है।
  • विसरण क्रिया अधिक विसरण दाब से कम विसरण दाब की ओर होती है।
  • जीवद्रव्यकुंचन के कारण कोशिकाएँ सदैव श्लथ (flaccid) दशा में आती हैं। जीवद्रव्यकुंचन के कारण कभौं-कभी जीवाणु एवं कवकों आदि की मृत्यु भी हो जाती है।
  • इसमें ऐसा कुछ नहीं है।

In simple words: जीवद्रव्यकुंचन एक जीवित कोशिका से पानी के बाहर निकलने और जीवद्रव्य के सिकुड़ने की प्रक्रिया है जब इसे अतिपरासारी विलयन में रखा जाता है, जिसके लिए अर्धपारगम्य झिल्ली आवश्यक है। विसरण गैसों, द्रवों और ठोसों में पदार्थों की उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर गति है, जिसके लिए किसी झिल्ली की आवश्यकता नहीं होती।

🎯 Exam Tip: जीवद्रव्यकुंचन और विसरण के बीच मुख्य अंतरों को एक सारणी में प्रस्तुत करना प्रभावी होता है, जिसमें झिल्ली की आवश्यकता, प्रक्रिया की दिशा और शामिल पदार्थों की स्थिति जैसे बिंदुओं को शामिल किया गया हो।

 

Question 3. जड़ों द्वारा जल-अवशोषण क्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। या जल-अवशोषण क्रिया में ऑक्सीजन का क्या प्रभाव होता है?
Answer: जल-अवशोषण को प्रभावित करने वाले कारक जल-अवशोषण को निम्न कारक प्रभावित करते हैं

1. प्राप्य भूमि-जल (Available Soil Water) : यद्यपि मृदा में विभिन्न प्रकार के जल की मात्रा पायी जाती है परन्तु केवल केशिका जल (capillary water) ही पौधों के लिए उपयोगी होता है। यह जल उस भूमि की क्षेत्रीय जल-धारिता (water at field capacity) तथा स्थाई म्लानि-प्रतिशत (permanent wilting percentage) के बीच की मात्रा होती है। यदि मृदा में जल की मात्रा स्थाई म्लानि-प्रतिर्शत या उससे कम हो जाती है तो पौधा मुरझा जाता है। यदि स्थाई म्लानि-प्रतिशत से क्षेत्रीय जल-धारिता तक जल की मात्रा बढ़ाई जाए तो जल-अवशोषण बढ़ता जाएगा, परन्तु इससे अधिक जल की मात्रा होने से मृदा के अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) से वायु निकल जाने से जल-अवशोषण कम हो जाता है। इस अवस्था को जलाक्रान्ति (water-logging) कहते हैं।

2. मृदा का तापमान (Temperature of Soil) : जब मृदा का तापमान कम होता है तो जड़ों द्वारा जल-अवशोषण की क्रिया की दर कम हो जाती है। अधिकतर पौधों को पर्याप्त जल-अवशोषण के लिए 20° से 35°C तापमान की आवश्यकता होती है। कम तापमान के कारण जल-अवशोषण में निम्न कारणों से कमी हो जाती है
1. मूल-वृद्धि कम हो जाती है।
2. मृदा से मूल की ओर जल की गति धीमी (slow) हो जाती है।
3. कोशिका कला की पारगम्यता (permeability of cell membrane) कम हो जाती है।
4. कोशिकाद्रव्य का आलगत्व (viscosity) बढ़ जाता है।

3. मृदा विलयन की सान्द्रता (Concentration of Soil Solution) : यदि मृदा विलयन की सान्द्रता (परासरण दाब भी) मूलरोम के रिक्तिका-रस की सान्द्रता (परासरण दाब भी) की तुलना में कम होगी तो उन जड़ों द्वारा जल का अवशोषण सुगम होगा, यदि मृदा विलयन की सान्द्रता अधिक होगी तो जड़ों द्वारा जल-अवशोषण कठिन होगा। दूसरी अवस्था में मृदा दैहिक रूप से शुष्क (physiologically dry) हो जाती है। कभी-कभी खेती में उर्वरकों (fertilizers) का प्रयोग करने पर यदि शीघ्र ही काफी जल से खेतों की सिंचाई नहीं होती तो मृदा में लवणों की सान्द्रता अधिक हो जाने के कारण पौधे मुरझा जाते हैं। यह म्लानि के कारण होता है।

4. मृदा की वायु (Soil Air) : अच्छे वातन वाली (well aerated) मृदा से जल का अवशोषण अधिक होता है तथा जलाक्रान्ति मृदा (water logged soil) से जल का अवशोषण कम होता है। इसका कारण यह है कि जल-अवशोषण क्रिया एक भौतिक प्रक्रम (physical process) नहीं है वरन यह एक जैविक क्रिया (vital activity) है जिसके लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जड़ों की कोशिकाओं को जीवित रखने के लिए श्वसन की आवश्यकता होती है जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में नहीं होगा। साथ ही ऑक्सीजन की कमी में अनॉक्सीय जीवाणु (anaerobic bacteria) उत्पन्न हो जाते हैं। ये जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड एवं कार्बनिक अम्ल अधिक मात्रा में उत्पन्न करते हैं जो जड़ों के लिए घातक होते हैं।
In simple words: जल के अवशोषण को कई कारक जैसे मृदा में जल की उपलब्धता, मिट्टी का तापमान, मिट्टी के विलयन की सांद्रता और मिट्टी में हवा की मात्रा प्रभावित करते हैं। इन कारकों का संतुलन पौधों द्वारा जल अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: जल अवशोषण को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत वर्णन करते समय, प्रत्येक कारक का प्रभाव स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए, विशेष रूप से तापक्रम और मृदा विलयन की सांद्रता का।

 

Question 4. मूल-दाब से आप क्या समझेंतेहै? एक प्रयोग की सहायता से मूल दाब को स्पष्ट कीजिए ।
Answer:

मूल-दाब

मूल-दाब मूल वल्कुट (root cortex) कोशिकाओं की स्फीति दशा में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाली वह दाब है जिसके फलस्वरूप उसमें उपस्थित द्रव, जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूल-दाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephan Hales) ने सन् 1727 में किया। स्टॉकिंग (Stocking 1956) के अनुसार, “मूल की वाहिकाओं में उत्पन्न दाब जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होता है, मूल-दाब कहलाता है।" मूलरोमों द्वारा मृदा से अवशोषित जल वल्कुट (cortex) की ऊतियों में इकट्ठा होता रहता है जिसके फलस्वरूप वल्कुट (cortex) की कोशिकाएँ पूर्ण स्फीति दशा (turgidity condition) में हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की भित्ति लचीली होने के कारण यह कोशिकाओं में भरे द्रव पर दबाव डालती हैं। जिसके फलस्वरूप द्रव का कुछ भाग जाइलम वाहिकाओं में चला जाता है तथा यह तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चला जाता है। इस प्रकार मूल-दाब रसारोहण में सहायता करता है।

प्रयोग किसी पर्याप्त जलवातीय भूमि में उगे पौधे के तने को भूमि से कुछ इंच ऊपर से काट दिया जाता है। तने के कटे सिरे पर रबर की नली की सहायता से काँच की एक नली बाँधकर उसमें थोड़ा जल भर दिया जाता है। अब काँच की नली के दूसरे सिरे पर रबर की सहायता से एक U के आकार की (U-shaped) ट्यूब में कुछ पारा भरकर मेनोमीटर लगाकर बाँध दिया जाता है। कुछ समय पश्चात् देखने से ज्ञात होता है कि मेनोमीटर की नली में पारा ऊपर चढ़ गया है और काँच की नली में भी जल पहले से अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि काँच की नली में तने के कटे सिरे से जल निकाय इकट्ठा हो गया है जिससे पारे पर दबाव पड़ने के कारण यह मेनोमीटर में ऊपर चढ़ जाता है। इससे यह स्पष्ट है कि मूल-दाब के कारण जल तने में ऊपर चढ़ता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मूल-दाब को प्रदर्शित करने वाले उपकरण को दर्शाता है। इसमें एक गमले में लगे पौधे के तने को काटकर, उसके ऊपर एक रबर की नली के सहारे एक काँच की नली और फिर एक U-आकार के मैनोमीटर को जोड़ा गया है। मैनोमीटर में पारा भरा है, और पौधे के कटे तने से निकलने वाला जल, मैनोमीटर में पारे को ऊपर धकेलता है, जिससे मूल-दाब की उपस्थिति सिद्ध होती है।
In simple words: मूल-दाब वह दबाव है जो जड़ों की कोशिकाओं द्वारा जल अवशोषित करने पर उत्पन्न होता है, जिससे जल जाइलम में ऊपर की ओर चढ़ता है। एक प्रयोग में, तने को काटकर मैनोमीटर लगाने पर पारे का ऊपर चढ़ना इस दाब को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: मूल-दाब की परिभाषा और इसके प्रदर्शन के प्रयोग का वर्णन करते समय, प्रत्येक चरण को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए। प्रयोग का चित्र बनाना और उसके भागों को नामांकित करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. बिन्दुस्रवण पर टिप्पणी लिखिए। या बिन्दुस्रवण क्या है? टमाटर अथवा प्रीमूला पत्ती के सिरे पर स्थित जल स्रावण ग्रन्थि की अनुदैर्ध्य काट का चित्र बनाकर इसे समझाइए ।
Answer: जब मृदा में अवशोषण योग्य जल की पर्याप्त मात्रा हो, परन्तु वाष्पोत्सर्जन न हो सकता हो तब धनात्मक मूलदाब के कारण जल (वास्तव में घोल) का बिन्दुओं के रूप में पत्तियों के किनारों पर जलरन्ध्र के मार्ग में स्रावण, बिन्दुस्रवण कहलौता है। यह क्रिया साधारणतया रात्रि में होती है। यदि पौधे नम व गर्म वातावरण, अर्थात् आर्द्र दशाओं में उगे हों तो यह क्रिया दिन के समय में भी होती है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पत्ती के शीर्ष की लम्बवत काट को दर्शाता है, जिसमें बिन्दुस्रवण की प्रक्रिया होती है। इसमें क्यूटिकल, पैलिसेड पैरेंकाइमा, एपिथेम, जल कैविटी, ट्रैकीड्स, बंडल शीथ, स्टोमा और स्पंजी पैरेंकाइमा जैसी संरचनाएँ दिखाई गई हैं। यह संरचनाएं जल के बूंदों के रूप में पत्तियों से निकलने की क्रिया, यानी बिन्दुस्रवण को समझने में मदद करती हैं।
In simple words: बिन्दुस्रवण वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे पत्तियों के किनारों पर स्थित जलरन्ध्रों (हाइडैथोड्स) से जल को बूंदों के रूप में उत्सर्जित करते हैं, खासकर तब जब वाष्पोत्सर्जन कम होता है और मूलदाब अधिक होता है। यह अक्सर रात में होता है।

🎯 Exam Tip: बिन्दुस्रवण की परिभाषा और इसकी प्रक्रिया को स्पष्ट करते समय, जलरंध्रों (हाइडैथोड्स) की भूमिका पर विशेष ध्यान दें और यह भी बताएं कि यह क्रिया किन परिस्थितियों में होती है।

 

Question 6. वाष्पोत्सर्जन की परिभाषा लिखिए। यह पौधों के लिए क्यों आवश्यक है? समझाइए ।
Answer:

वाष्पोत्सर्जन

वाष्पोत्सर्जन (transpiration) वह क्रिया है जिसमें जीवित पौधे, अपने वायवीय भागों; जैसे-पत्तियों, हरे प्ररोह आदि के द्वारा आन्तरिक ऊतकों से, अतिरिक्त पानी को वाष्प के रूप में बाहर निकालते हैं। पौधे अपनी जड़ों द्वारा जितना पानी पृथ्वी से अवशोषित करते हैं, उसकी सम्पूर्ण मात्रा उपापचयी। क्रियाओं (metabolic activities) में काम नहीं आती । इसका अत्यधिक अंश पौधे के लिए बेकार होता है। कभी-कभी तो अवशोषित जल का 5% से भी कम भाग ही पौधे के लिए उपयोगी होता है। और शेष जल (95% से भी अधिक भाग) पौधे से विभिन्न रूपों में वातावरण में उत्सर्जित किया जाता है। अन्य क्रियाओं की अपेक्षा यह पानी सदैव ही (रात-दिन) किसी-न-किसी दर से वाष्पोत्सर्जन की क्रिया द्वारा पौधों की वायवीय सतहों से वाष्प बनकर उड़ता रहता है। वाष्पोत्सर्जन (transpiration) की यह क्रिया एक भौतिक क्रिया (physical process) होने के साथ-साथ किसी सीमा तक एक जैविक क्रिया (vital activity) तथा जीवद्रव्य के द्वारा नियन्त्रित रहती है।

वाष्पोत्सर्जन पौधों के लिए आवश्यक है। वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक बुराई (necessary evil) कहा गया है, क्योंकि यह एक ओर पौधे के जल को कम करने की बुराई है तो दूसरी ओर इसके द्वारा उत्पन्न अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं के चलते ही पौधे में अधिक जल, खनिज लवण इत्यादि ग्रहण करने की क्षमता आती है। विशेष शुष्क स्थानों (xeric conditions) में तो इसे रोकने के लिए अनेक प्रकार के उपाय पौधे द्वारा किये जाते हैं फिर भी वाष्पोत्सर्जन पौधे के लिए अत्यन्त उपयोगी है। निम्नलिखित प्रक्रियायें महत्त्वपूर्ण हैं

1. अतिरिक्त जल का निस्तारण : पौधे भूमि से लगातार अपने मूलरोमों द्वारा परासरण व अन्तःशोषण (osmosis and imbibition) के द्वारा पानी का अवशोषण करते हैं। शरीर में आवश्यकता की अपेक्षा यह पानी कई गुना अधिक होता है अतः वाष्पोत्सर्जन द्वारा अनावश्यक तथा अतिरिक्त जल (excess water) पौधों के शरीर से बाहर निकलता रहता है।

2. खनिज लवणों की प्राप्ति : वाष्पोत्सर्जन तथा जल के अवशोषण (absorption) में एक घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। पौधे द्वारा जितना अधिक वाष्पोत्सर्जन होता है उतना ही अधिक भूमि से जल का अवशोषण होता है। मृदा जल में खनिज लवणों की मात्रा बहुत ही कम होती है अतः पौधों के द्वारा जितना अधिक जल का अवशोषण होता है उतने ही अधिक खनिज लवण (mineral salts) इसमें घुलकर पौधे के शरीर में पहुँचते रहते हैं। अधिक वाष्पोत्सर्जन से रिक्तिका रस में परासरण दाब बढ़ जाता है, इस प्रकार और अधिक लवण पादप शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

3. वाष्पोत्सर्जन, कर्षण तथा रसारोहण : वाष्पोत्सर्जन के द्वारा चूषण बल (suction pressure) उत्पन्न होता है जो रसारोहण (ascent of sap) के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे जल बड़े-बड़े वृक्षों में भी उनकी अत्यधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता है।

4. ताप का नियमन : वाष्पोत्सर्जन के कारण ही पौधे झुलसने से बच जाते हैं, क्योंकि जल की वाष्प बनने के कारण ठण्डक पैदा होती है, इस प्रकार गुप्त ऊष्मा के वाष्प में चले जाने के कारण उसका उपयोग पौधा ताप से बचने में करता है।

5. जल का समान वितरण : वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधों के सभी भागों में पानी का वितरण (distribution) समान रूप से हो जाता है।

6. फलों में शर्करा की सान्द्रता : अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण फलों में शर्करा की सान्द्रता बढ़ जाती है जिससे फल अधिक मीठे हो जाते हैं।

7. यान्त्रिक ऊतकों व आवरण का निर्माण : अधिक वाष्पोत्सर्जन से पौधों में अधिक यान्त्रिक ऊतकों की वृद्धि होती है जिसके कारण पौधे मजबूत होते हैं। ये ऊतक पौधे की जीवाप्नुओं, कवकों आदि से रक्षा भी करते हैं, विशेषकर बाहरी भागों पर बने उपचर्म (cuticle) आदि के आवरण से ।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे अपने वायवीय भागों से अतिरिक्त जल को वाष्प के रूप में बाहर निकालते हैं। यह पौधों के लिए आवश्यक है क्योंकि यह अतिरिक्त जल को निकालता है, खनिज लवणों के अवशोषण में मदद करता है, रसारोहण के लिए चूषण बल बनाता है, तापमान नियंत्रित करता है, और जल का समान वितरण सुनिश्चित करता है।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन की परिभाषा लिखते समय, यह स्पष्ट करें कि यह जल को वाष्प के रूप में मुक्त करने की प्रक्रिया है। इसकी उपयोगिताओं को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक बिंदु को संक्षिप्त और सटीक रूप से समझाएँ ताकि महत्व स्पष्ट हो।

 

Question 7. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं? इसका क्या महत्व है।
Answer:

रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration) : पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनको रन्ध्र (स्टोमेटा) कहते हैं। इन्हीं रन्ध्रों से वाष्प विसरित (diffuse) होकर वातावरण में चली जाती है। इस प्रकार के वाष्पोत्सर्जन को रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (stomatal transpiration) कहते हैं। कभी-कभी रन्ध्र (stomata) पत्ती की ऊपरी सतह पर भी पाए जाते हैं। लगभग 80-90% वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रों (stomata) के द्वारा होता है। रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन के फलस्वरूप पौधों में निम्न कार्य सम्पन्न होते हैं, जिसके कारण इसका बहुत महत्त्व है

1. जल का परिसंचरण (Circulation of Water) : पौधे के मूल से चोटी तक लगातार जल की धारा वाष्पोत्सर्जन के द्वारा ही प्रवाहित होती है, परन्तु यह धारणा ठीक प्रतीत नहीं होती, क्योंकि यदि वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल की हानि नहीं होती तो जल के अधिक मात्रा में ऊपर चढ़ने की भी आवश्यकता नहीं होती ।

2. खनिज तत्वों का अवशोषण तथा परिवहन (Absorption and Transportation of Mineral Elements) : कुछ लोगों का मत है कि वाष्पोत्सर्जन खनिज अवशोषण एवं परिवहन में सहायता करता है, परन्तु यह सिद्ध किया जा चुका है कि जल अवशोषण एवं खनिज अवशोषण एक-दूसरे से भिन्न क्रियाएँ हैं। खनिज परिवहन में वाष्पोत्सर्जन अवश्य सहायता करता है।

3. तापक्रम-सन्तुलन (Regulation to Temperature) : पत्तियों पर पड़ने वाले प्रकाश का केवल 12% भाग परावर्तित होकर वातावरण में जाता है। 83% प्रकाश पत्ती द्वारा शोषित किया जाता है तथा 5% प्रकाश पत्ती में से होता हुआ पार निकल जाता है। वाष्पोत्सर्जन में यह ऊर्जा काम में आ जाती है। इस प्रकार वाष्पोत्सर्जन तापक्रम-सन्तुलन बनाए रखने में पौधों की सहायता करता है, परन्तु वाष्पोत्सर्जन का पत्तियों का तापक्रम कम करने में अधिक महत्त्व नहीं है, क्योंकि पत्ती का वाष्पोत्सर्जन रोकने पर अधिक-से-अधिक 5°C तक तापमान बढ़ता है जो विशेष हानिकारक नहीं है।
In simple words: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन पत्तियों पर स्थित छोटे छिद्रों, जिन्हें रन्ध्र कहते हैं, से जलवाष्प का बाहर निकलना है। यह पौधों में जल के परिसंचरण, खनिज तत्वों के अवशोषण और परिवहन, तथा तापमान संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🎯 Exam Tip: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन की परिभाषा देते समय, रन्ध्रों की भूमिका पर जोर दें। इसके महत्व का वर्णन करते समय, प्रत्येक कार्य को स्पष्ट रूप से समझाएँ, जैसे जल परिसंचरण और खनिज परिवहन।

 

Question 8. टिप्पणी लिखिए-जलरंध्र
Answer: ये विशेष संरचनाएँ प्रमुख रूप से जल में उगने वाले पौधों या नमीदार स्थानों में उगने वाले शाकों (herbs) में होती हैं। ये पत्तियों के सिरों पर होती हैं। इनमें अनेक जीवित कोशिकाएँ समूह के रूप में होती हैं जिनमें बीच-बीच में जल से भरे बहुत से अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) होते हैं। इन जीवित कोशिकाओं को एपीथेम कोशिकाएँ (epithem cells) कहते हैं। ये कोशिकाएँ एक या दो गुहिकाओं (chambers) में खुलती हैं और ये गुहिकाएँ बाहर की ओर छोटे छिद्रों द्वारा खुलती हैं। इन छिद्रों को जलरन्ध्र (hydathode or water pores) कहते हैं। जलरन्ध्र (hydathode) द्वारा जल बूंद के रूप में बाहर निकलता है। जल के साथ कुछ उत्सर्जी पदार्थ भी निकलते है।
In simple words: जलरंध्र विशेष संरचनाएँ होती हैं जो पत्तियों के किनारों पर पाई जाती हैं, खासकर जलीय या नमीदार पौधों में। इनमें एपीथेम कोशिकाएँ और अन्तराकोशिकीय स्थान होते हैं, जिनके माध्यम से जल बूंदों के रूप में उत्सर्जित होता है, साथ ही कुछ उत्सर्जी पदार्थ भी निकलते हैं।

🎯 Exam Tip: जलरंध्रों पर टिप्पणी करते समय, इनकी स्थिति (पत्तियों के सिरों पर), संरचना (एपीथेम कोशिकाएँ और अन्तराकोशिकीय स्थान), और कार्य (जल बूंदों के रूप में उत्सर्जन) का उल्लेख करना सुनिश्चित करें।

 

Question 9. वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रवण में अन्तर बताइए ।
Answer:

वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रवण में अन्तर

वाष्पोत्सर्जनबिन्दुस्रवण
• इस क्रिया में जल, वाष्प (vapour) के रूप में उत्सर्जित होता है।• इस क्रिया में जल, द्रव (जल की बूँद) के रूप में उत्सर्जित होता है।
• यह पौधे के वायवीय सतह से होने वाली विशिष्ट क्रिया है, जो हरे तथा शाकीय भागों की बाह्यत्वचा से होने वाली उपचर्मीय (cuticular) या पर्णरन्ध्रीय (stomatal) प्रकार की होती है किन्तु कंठोर तथा काष्ठीय भागों पर उपस्थित वातरन्ध्रों (lenticels) से वातरन्ध्रीय (lenticular) प्रकार की भी होती है।• यह जलरन्ध्रों (hydathodes) से होने वाली एक ही प्रकार की विशिष्ट क्रिया है।
• अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) या वायुकोषों में संचित होने वाली जलवाष्प ही रन्ध्रों द्वारा विसरित होती है अथवा बाह्यत्वचा की कोशिकायें अपने बाहरी तल पर वाष्प उत्सर्जित करती हैं।• दारु वाहिकाओं (vessels) के खुले सिरों से जलरन्ध्रों के अन्दर उपस्थित एपिथेम (epithem) ऊतक में होकर जल की बूँद के रूप में, पत्तियों के शीर्ष, पर्णतट आदि स्थानों पर निकलता है।
• इस क्रिया के कारण जल संवहन करने वाली, वाहिकाओं में कर्षण (pull) उत्पन्न होता है जो तनों में रसारोहण में सहायता प्रदान करता है।• इसका कारण जड़ों में उत्पन्न होता है, अधिक मूलदाब में यह तीव्र होता है। मूलदाब सक्रिय अवशोषण की दशा में पैदा होता है। इसके अतिरिक्त यह कम वाष्पोत्सर्जन की अवस्था में अधिक होता है।
• इसके कारण जलं का, निष्क्रिय अवशोषण अर्थात् मूल से होकर जल का अवशोषण होता है।• इसके कारण पौधे के अन्दर किसी प्रकार का दाब, बल इत्यादि उत्पन्न नहीं होता है।

In simple words: वाष्पोत्सर्जन में जल वाष्प के रूप में पत्तियों से निकलता है, जबकि बिन्दुस्रवण में जल बूंदों के रूप में जलरन्ध्रों से उत्सर्जित होता है। वाष्पोत्सर्जन मुख्य रूप से रन्ध्रों द्वारा होता है और यह रसारोहण में मदद करता है, जबकि बिन्दुस्रवण मूलदाब के कारण होता है और इसमें जलरंध्रों की विशेष भूमिका होती है।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन और बिन्दुस्रवण के बीच अंतर स्पष्ट करते समय, जल के निकलने के रूप (वाष्प या द्रव), संबंधित संरचनाएँ (रन्ध्र या जलरंध्र), और अंतर्निहित प्रक्रियाएँ (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव या मूलदाब) पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 10. सक्रिय जल अवशोषण तथा निष्क्रिय जल अवशोषण में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
Answer:

सक्रिय तथा निष्क्रिय जल अवशोषण में अन्तर

सक्रिय जल अवशोषणनिष्क्रिय जल अवशोषण
• इसमें मूलरोम द्वारा जल अवशोषण होता है। मूलरोम से वल्कुट कोशिकाओं में एवं वल्कुट कोशिकाओं से जाइलम वाहिकाओं (vessels) में जल का प्रवेश विसरण दाब न्यूनता के कारण होता है। इस क्रिया में ऊर्जा का उपयोग होता है। ऊर्जा श्वसन क्रिया के फलस्वरूप प्राप्त होती है।• इसमें मृदा घोल से मूलरोम कोशिका में, मूलरोम कोशिका से वल्कुट कोशिकाओं में, वल्कुट कोशिकाओं से जाइलम वाहिकाओं में जल का अवशोषण वाष्पोत्सर्जन द्वारा उत्पन्न चूषण दाब के फलस्वरूप होता है। इस क्रिया में ऊर्जा का उपयोग नहीं होता।
• इसके फलस्वरूप मूलदाब उत्पन्न होता है।• इसके फलस्वरूप मूलदाब उत्पन्न नहीं होता।
• इसका वाष्पोत्सर्जन से कोई सम्बन्ध नहीं है।• इसमें वाष्पोत्सर्जन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

In simple words: सक्रिय जल अवशोषण में ऊर्जा का उपयोग करके जल जड़ों द्वारा अवशोषित होता है, जिससे मूलदाब उत्पन्न होता है और इसका वाष्पोत्सर्जन से सीधा संबंध नहीं होता। निष्क्रिय जल अवशोषण में ऊर्जा का उपयोग नहीं होता, बल्कि यह वाष्पोत्सर्जन खिंचाव के कारण होता है, और इसमें मूलदाब उत्पन्न नहीं होता।

🎯 Exam Tip: सक्रिय और निष्क्रिय जल अवशोषण के बीच अंतर को स्पष्ट करते समय, ऊर्जा की आवश्यकता, मूलदाब का निर्माण, और वाष्पोत्सर्जन के संबंध जैसे मुख्य बिंदुओं को तालिकाबद्ध रूप में प्रस्तुत करना प्रभावी होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. पौधों की जड़ों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या पौधों में परासरण द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या जड़ों द्वारा जल के अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या सक्रिय अवशोषण का वर्णन कीजिए। या मूलरोमों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए।
Answer: जड़ों द्वारा भूमि से जल का अवशोषण जल तथा खनिज लवणों को भूमि से अवशोषित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य जड़े करती हैं। मूलरोम तथा बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकायें जल का अवशोषण करके वल्कुट (cortex) की कोशिकाओं को दे देती हैं। जल के अवशोषण का प्रमुख कार्य सर्वाधिक तथा काफी बड़े पैमाने पर जड़ के मूलरोम प्रदेश (root hair region) में होता है, क्योंकि मूलरोम बाह्य त्वचा का सम्पर्क तल भूमि के जल के साथ हजारों गुना बढ़ा देते हैं। यह जल अन्तिम रूप से जड़ में स्थित जाइलम वाहिनियों में पहुँचता है।

अवशोषण की क्रिया विधि मूलरोम बाह्यत्वचा की किसी भी कोशिका की कोशिका भित्ति जोकि सेलुलोस की बनी होती है, जल के लिए पूर्णतः पारगम्य होती है। कोशिका का जीवद्रव्य (protoplasm) तथा कोशिका कला (plasmalemma) मिलकर एक वरणात्मक पारगम्य कला (selectively permeable membrane) की तरह कार्य करते हैं। मूलरोम तथा बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकाएँ भी भूमि में मृदा कणों के मध्य उपस्थित जल विशेषकर केशिकीय जल (capillary water) के साथ सम्पर्क बनाती हैं। मूलरोम के अन्दर उपस्थित केन्द्रीय रिक्तिका (central vacuole) में अनेक पदार्थों का विलयन अर्थात् कोशिका का रिक्तिका रस या कोशिका रस (cell sap) होता है। जल अवशोषण की निम्नलिखित दो प्रकार की विधियाँ होती हैं

1. जल अवशोषण की परासरणी विधि कोशिका रस का परासरण दाब (osrmotic pressure) मृदा जल से अधिक लगभग 2 atm रहता है। इस प्रकार, केशिका जल अपने अन्दर अल्प मात्रा में घुले खनिज लवणों के साथ रिक्तिका रस और केशिका जल के मध्य उपस्थित जीवद्रव्यरूपी वरणात्मक पारगम्य कला में होकर रिक्तिका रस में परासरित हो जाता है। यद्यपि, प्रारम्भिक अवस्थाओं में तो पेक्टिन तथा सेलुलोस जैसे पदार्थों से बनी कोशिका भित्ति में यह जल अन्तःचूषित (imbibe) ही होता है। अतः स्पष्ट है कि जब तक बाह्य त्वचा की कोशिका अथवा मूलरोमों में विसरण दाब की कमी (DPD) बनी रहेगी, मृदा जल परासरण के द्वारा कोशिकाओं में प्रवेश करता रहेगा।

2. जल अवशोषण की परासरण विहीन विधि परासरण की सामान्य क्रिया द्वारा जल के अवशोषण के अतिरिक्त जल के अवशोषण की अन्य अवस्थाओं में अन्य क्रिया-विधियाँ भी होती हैं; जैसे


(i) ऊर्जा की उपस्थिति में सक्रिय अवशोषण (active absorption) की क्रिया तथा
(ii) लगभग यान्त्रिक विधि द्वारा निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption)।

(i) जल का सक्रिय अवशोषण (Active Absorption of Water) एक जीवित कोशिका में ऊर्जा की उपस्थिति में जल के सक्रिय अवशोषण की क्रिया अनेक प्रमाण देकर स्पष्ट रूप से समझायी गयी है। जड़ों में इस प्रकार का अवशोषण परासरण दाब के विपरीत भी होता है। इस कार्य के लिए ऊर्जा जड़ की जीवित कोशिकाओं में हो रही श्वसन क्रिया से प्राप्त होती है। इसी कारण श्वसन को कम करने वाले सभी कारक, ऑक्सीजन की कमी, कम ताप आदि अवशोषण को भी कम कर देते हैं। इसी प्रकार, विभिन्न पदार्थ, ऊर्जाएँ अथवा परिस्थितियाँ आदि जो उपापचयी क्रियाओं को बढ़ाते हैं, अवशोषण को भी बढ़ाने का कार्य करते हैं जबकि इन क्रियाओं को कम करने वाली परिस्थितियाँ, पदार्थ, ऊर्जा आदि; जैसे विष, कम ताप आदि अवशोषण को कम कर देती हैं।

(ii) जल का निष्क्रिय अवशोषण (Passive Absorption of Water) जब मृदा में प्राप्य जल की मात्रा की कोई कमी न हो तथा अधिक वाष्पोत्सर्जन हो रहा हो तो एक प्रकार का यान्त्रिक अवशोषण होता है, इसे निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption) कहते हैं। अधिक वाष्पोत्सर्जन होने पर तथा जाइलम वाहिकाओं में, जल की कमी होने पर उनके आस-पास उपस्थित मृदूतकीय कोशिकाओं से जल की आपूर्ति हो जाती है। इस प्रकार, यह जल क्रमशः परिरम्भ, अन्तस्त्वचा तथा कॉर्टेक्स की कोशिकाओं से अवशोषित किया जाता है और अन्त में इस जल की कमी को मूलरोम या बाह्यत्वचा की कोशिकायें पूरा कर देती हैं। स्पष्ट है, जल के इस प्रकार के अवशोषण के लिए ऊर्जा अथवा परासरण दाब की भी आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में, यह पौधे में उत्पन्न वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) के द्वारा ही होता रहता है। अतः यह अवशोषण कोशिकाओं के द्वारा किसी क्रिया विशेष के द्वारा नहीं बल्कि कोशिकाओं में होकर होता है।

जड़ में जल को पाश्र्व चालन भूमि से मूलरोम को सतत् जल मिलता रहता है क्योंकि केशिका जल (capillary water) दूर-दूर से भी यहाँ पहुँचता रहता है। मूलरोम या बाह्य त्वचा के तुरन्त सम्पर्क में अन्दर कॉर्टेक्स (cortex) की मृदूतकीय कोशिकायें (parenchymatous cells) होती हैं। चित्र में A तथा B कोशिकाओं के कोशिका रस की जल की माँग में अन्तर है। B कोशिका की जल की माँग (DPD) निश्चित रूप से अधिक होगी। अतः जल का परासरण A से B में हो जाता है। अब अगली कोशिका C में पहले अगर B तथा C की DPD एक जैसी थी तो भी अब C की अपेक्षाकृत अधिक होगी। अतः जल B से C में, इसी प्रकार C से D में इत्यादि जाता रहेगा। परासरण के द्वारा जल, इस प्रकार, मृदा विलयन से मूलरोम में तथा यहाँ से कॉर्टेक्स की कोशिकाओं में, क्रमशः होता हुआ अन्तस्त्वचा (endodermis), परिरम्भ (pericycle) की कोशिका के द्वारा जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) में पहुँचता है। स्पष्ट है जल के अनुप्रस्थ चालन की इस विधि में जल रिक्तिकाओं से होकर जाता है। विसरण दाब की कमी इस प्रकार बाहरी कोशिकाओं से भीतरी कोशिकाओं में अधिक होना और क्रमानुसार बदलते रहना विसरण दाब की प्रवणता (gradient of diffusion pressure deficit) कहलाता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मूलरोम से जड़ के अन्दर जाइलम वाहिकाओं तक जल के मार्ग को तीरों द्वारा प्रदर्शित करता है। इसमें एपिब्लेमा, कॉर्टेक्स, एंडोडर्मिस, पेरिसाइकिल, फ्लोएम, जाइलम, मिट्टी के कण और मिट्टी में जल दिखाया गया है। यह जल के अवशोषण और उसके जाइलम तक पहुँचने के विभिन्न रास्तों को समझाता है, जो विसरण दाब प्रवणता के कारण होता है।

इस आधार पर जल का मूल में पार्श्व चालन (lateral movement) रिक्तिकीय पथ द्वारा चालन (movement through vacuolar pathway) कहलाता है तथा सर्वमान्य है फिर भी वर्तमान में यह भी माना जाने लगा है क्रि

1. जल का विसरण मूलरोम से कॉर्टेक्स की कोशिकाओं में होकर जाइलम वाहिकाओं तक आपस में सम्बन्धित जीवद्रव्यी तन्तुओं (plasmodesmata) के द्वारा ही हो जाता है। इस प्रकार जल का निरन्तर पार्श्व प्रवाह जीवद्रव्यी पथ (symplast pathway) से होकर होता रहता है और रिक्तिकाओं या उनके सेल सैप की आवश्यकता ही नहीं पड़ती ।

2. जल के पार्श्व चालन के लिए विभिन्न कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (cell wall) को एक स्वतन्त्र तन्त्र के रूप में माना जाने लगा है अर्थात् कोशिका भित्तीय पथ (apoplast pathway) से होकर जल के इस प्रकार निरन्तर प्रवाह में कोशिका के जीवद्रव्य अथवा उसमें उपस्थित रिक्तिकी की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है।
In simple words: पौधों की जड़ें जल का अवशोषण मुख्य रूप से मूलरोमों द्वारा करती हैं, जिसमें परासरणी और परासरण-विहीन विधियाँ शामिल हैं। परासरणी विधि में जल परासरण दाब के अंतर के कारण कोशिकाओं में प्रवेश करता है, जबकि परासरण-विहीन विधि सक्रिय (ऊर्जा-उपयोग) या निष्क्रिय (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव) रूप से होती है। जल का पार्श्व चालन सिम्प्लास्ट या एपोप्लास्ट पथ से जाइलम तक होता है।

🎯 Exam Tip: जड़ों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का वर्णन करते समय, परासरणी और परासरण-विहीन विधियों (सक्रिय और निष्क्रिय) को अलग-अलग समझाएँ। सिम्प्लास्ट और एपोप्लास्ट पथों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और आरेख की सहायता से समझाना अतिरिक्त अंक दिलाएगा।

 

Question 2. स्टोमेटा के खुलने तथा बन्द होने की कार्य-विधि का संक्षेप में सचित्र वर्णन कीजिए। या रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने में पौटेशियम आयन का कार्य लिखिए ।
Answer:

पर्णरन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया-विधि

पर्णरन्ध्र का निर्माण दो विशेष आकार-प्रकार की द्वार कोशिकाओं (guard cells) के द्वारा होता है। इन्हीं कोशिकाओं की स्फीति के कारण आकार में परिवर्तन पर रन्ध्र का छोटा या बड़ा होना निर्भर करता है। जब ये कोशिकायें स्फीत (turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) में परिवर्तन उनके परासरण दाब (osmotic pressure) में परिवर्तन पर निर्भर करता है। परासरण दाब बढ़ने पर आस-पास की सहायक कोशिकाओं (subsidiary cells) से परासरण की क्रिया के द्वारा पानी आ जाता है और द्वार कोशिकायें स्फीत हो जाती हैं। अतः भीतरी मोटी भित्ति, बाहरी भित्ति के बाहर की ओर फूलने के कारण, द्वार कोशिका के अन्दर ही घुस जाती है, फलतः रन्ध्र खुल जाता है। परासरण दाब घटने पर द्वार कोशिकाओं से जल पड़ोसी कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये श्लथ हो जाती हैं और रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। परासरण दाब में परिवर्तन का प्रश्न कार्यिकीविदों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाया है


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पर्णरंध्र की संरचना को दर्शाता है, जिसमें सहायक कोशिकाएं, द्वार कोशिकाएं, क्लोरोप्लास्ट, नाभिक, आंतरिक मोटी दीवार और बाहरी पतली दीवार शामिल हैं। चित्र (A) बंद अवस्था और (B) खुली अवस्था को दिखाता है, जो द्वार कोशिकाओं की स्फीति (टर्जिडिटी) में परिवर्तन के कारण होता है।

1. मण्ड-शर्करा परिवर्तन मत

दिन के समय जब सम्पूर्ण CO2 कोशिका में प्रकाश संश्लेषण में समाप्त हो जाती है तो माध्यम क्षारीय हो जाता है अर्थात् pH बढ़ जाता है और संचित मण्ड (starch) ग्लूकोज (glucose) में बदल जाता है। इस प्रकार, इन कोशिकाओं का रिक्तिका रस (cell sap) अधिक गाढ़ा हो जाता है अर्थात् कोशिकाओं का परासरण दाब बढ़ जाता है। अब पास की सहायक कोशिकाओं (subsidiary cells) द्वारा जल कोशिकाओं में आता है जिससे द्वार कोशिकाएँ स्फीत (turgid) हो जाती हैं और रन्ध्र खुले (open) जाते हैं। रात्रि के समय जब कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण बन्द हो जाता है और CO2 की मात्रा बढ़ने के कारण माध्यम अम्लीय (कम pH) हो जाता है तब कोशिकाओं में उपस्थित शर्कराएँ मण्ड में बदल जाती हैं। इन कोशिकाओं से पानी वापस पास वाली कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये कोशिकायें शिथिल हो जाती हैं। उपर्युक्त विवरण सैयरे (Sayre J. D., 1926) के मतानुसार है, जबकि यिन तथा तुंग (Yin and Tung, 1948) ने द्वार कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट्स में फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) एन्जाइम की उपस्थिति को स्पष्ट किया जो कि अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करता है।

\[ \text{starch} + \text{iP} \xrightarrow{\substack{\text{pH 7.0} \\ \text{phosphorylase}}} \text{glucose, 1-phosphate} \] \[ \text{pH 5.0} \] उपर्युक्त समीकरण में एन्जाइम की उपस्थिति में मण्ड का अकार्बनिक फॉस्फेट (iP) के साथ ग्लूकोज फॉस्फेट बनना प्रदर्शित किया गया है। इसमें pH की दशा विशेष परिस्थिति है, जिसके कम होने से मण्ड का निर्माण हो जाता है।

\[ \text{STARCH} \xrightarrow{\substack{\text{pH 5.0} \\ \text{pH 7.0}}} \text{GLUCOSE, 1-PHOSPHATE} \] \[ \text{hexokinase AND ATP} \xrightarrow{\text{phosphoglucomutase}} \text{GLUCOSE, 6-PHOSPHATE} \] \[ \text{GLUCOSE + iP} \]
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने के लिए घटित होने वाली उपापचयी अभिक्रियाएँ (स्टेवार्ड, 1964 के अनुसार) को दर्शाता है। इसमें स्टार्च का ग्लूकोज-1-फॉस्फेट में परिवर्तन और फिर ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में रूपांतरण दिखाया गया है, जो pH स्तर (5.0 से 7.0) और एन्जाइमों (फॉस्फोराइलेज, हेक्सोकिनेज, फॉस्फोग्लूकोम्यूटेज़) की उपस्थिति में होता है। यह रन्ध्रों के खुलने और बंद होने के लिए आवश्यक ऊर्जा और ग्लूकोज निर्माण की प्रक्रिया को समझाता है।

यद्यपि कुछ वैज्ञानिक स्टार्च-शर्करा परिवर्तन की विचारधारा को सही नहीं मानते, फिर भी यह मत तो लगभग सर्वमान्य है कि pH के परिवर्तन के अनुसार तथा परासरण दाब के आधार पर ही पर्णरन्ध्र (stomata) खुलते या बन्द होते हैं। स्टेवार्ड (Steward, 1964) के मतानुसार जब तक ग्लूकोज 6-फॉस्फेट, ग्लूकोज तथा अकार्बनिक फॉस्फेट में परिवर्तित नहीं हो जाता तब तक द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। रन्ध्र के बन्द होने के लिए ऊर्जा ATP से ली जाती है। अतः इस क्रिया के लिए श्वसन भी आवश्यक है, जिसमें कि ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

2. लेविट का सक्रिय K+ स्थानान्तरण मत

लेविट के अनुसार प्रकाश में द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल (malic acid) बनता है जो मैलेट व H+ में वियोजित हो जाता है। H+ बाहर जाते हैं और K+ अन्दर आकर पोटैशियम मैलेट का निर्माण करता है। इसकी उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब में वृद्धि होने से रन्ध्र (stomata) खुल जाता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र लेविट के सक्रिय K+ स्थानान्तरण मत का चित्रीय निरूपण करता है, जो रन्ध्रों के खुलने और बंद होने की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें प्रकाश की उपस्थिति में मैलिक एसिड का बनना और मैलेट तथा H+ आयनों में इसका वियोजन दिखाया गया है। H+ आयन बाहर निकलते हैं जबकि K+ आयन द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं, जिससे परासरण दाब बढ़ता है और रन्ध्र खुल जाते हैं। अंधेरे में यह प्रक्रिया उलट जाती है और रन्ध्र बंद हो जाते हैं।
In simple words: स्टोमेटा का खुलना और बंद होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति पर निर्भर करता है, जो परासरण दाब में परिवर्तन के कारण होता है। मण्ड-शर्करा परिवर्तन मत के अनुसार, दिन में प्रकाश संश्लेषण के कारण ग्लूकोज बनता है जिससे परासरण दाब बढ़ता है और रन्ध्र खुलते हैं, जबकि रात में यह प्रक्रिया उलट जाती है। लेविट के K+ स्थानान्तरण मत में, K+ आयनों का द्वार कोशिकाओं में प्रवेश परासरण दाब बढ़ाकर रन्ध्रों को खोलता है।

🎯 Exam Tip: स्टोमेटा के खुलने और बंद होने की कार्य-विधि का वर्णन करते समय, मण्ड-शर्करा परिवर्तन मत और लेविट के K+ स्थानान्तरण मत दोनों को समझाएँ। प्रत्येक मत में शामिल रासायनिक अभिक्रियाओं और शारीरिक परिवर्तनों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. डिक्सन तथा जौली वाद के अनुसार पौधों में रसारोहण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। या रसारोहण क्या है ? इसकी क्रिया-विधि को वर्णन कीजिए ।
Answer: रसारोहण पौधों में गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल (तथा उसमें घुले खनिज लवणों) के ऊपर की ओर चढ़ने की। क्रिया को रसारोहण (ascent of sap) कहते हैं। जल तथा उसमें घुले खनिज लवण जड़ों द्वारा अवशोषित होकर पौधों के विभिन्न भागों (विशेषकर) पत्तियों तक पहुँचते हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि जल तथा उसमें घुले हुए खनिज पदार्थ जाइलम वाहिकाओं या वाहिनिकाओं (xylem vessels or tracheids) की गुहा (lumen) में होकर ऊपर चढ़ते हैं। छोटे-छोटे पौधों में तो इन पदार्थों को 0.5-1.0 मीटर ऊँचा ही चढ़ना पड़ता है, बड़े-बड़े वृक्षों में जो 80-85 मीटर से भी ऊँचे हो सकते हैं, इनको गुरुत्वाकर्षण के विपरीत चढ़ना पड़ता है। इस क्रिया के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा अलग-अलग तरह के मत व्यक्त किये गये हैं। इन मतों में, अनेक प्रकार के बलों, दाबों आदि का विचार रखा गया और अलग-अलग मतों में केशिकाव (capillarity), अन्तःशोषण (imbibition), मूलदाब (root pressure), वायुमण्डलीय दाबे (atmospheric pressure) आदि को अलग-अलग करके रसारोहण का कारण समझा गया अथवा कुछ जीवित कोशिकाओं की स्पन्दन गति (pulpitation movement) को इसके लिए उपयुक्त मान लिया गया। सामान्यतः बड़े-बड़े तथा ऊँचे पौधों के लिए अनेक प्रयोगों आदि के आधार पर इन धारणाओं को अमान्य कर दिया गया।

जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को पूर्ण रूप से समझाने के लिए कई बलों को एक साथ क्रियात्मक रूप में संयोजित करके डिक्सन तथा जौली (Dixon and Jolly) ने वर्ष 1894 में वाष्पोत्सर्जन-संसंजन-तनाव वादे (transpiration-cohesion-tension theory) प्रस्तुत किया। वाष्पोत्सर्जन-संसंजन-तनाव वाद यह वाद निम्नलिखित तीन प्रमुख सिद्धान्तों पर आधारित है

1. जाइलम वाहिकाओं में जल एक लगातार स्तम्भ के रूप में रहता है।
2. जल के अणुओं के मध्य शक्तिशाली संसंजन (cohesion), अर्थात् आकर्षण रहता है।
3. वाष्पोत्सर्जन-कर्षण (transpiration pull) का जल स्तम्भ पर तनाव ।

जाइलम वाहिकाएँ एक-दूसरे से सिरे से सिरे पर सम्बन्धित होती हैं, साथ ही इनके अन्दर उपस्थित जल एक अविरत जल स्तंम्भ के रूप में होता है। यह जल स्तम्भ विभिन्न शाखाओं, पत्तियों तथा पर्णकों में उपस्थित शिराओं (veins) और उनकी शाखाओं इत्यादि में होकर जल के एक द्रवस्थैतिक तन्त्र (hydrostatic system) का निर्माण करता है, जिसके एक सिरे पर लगा हुआ तनाव पूरे तन्त्र को प्रभावित करता है। दूसरी ओर जल अणुओं में अत्यधिक संसंजन (cohesion) होने के कारण इतना अधिक आकर्षण बल होता है कि यह जल स्तम्भ अत्यधिक तनाव इत्यादि को भी सहन कर लेता है। समझा जाता है कि संसंजन बल (cohesive force) के कारण 400 वायुमण्डलीय दाब (atmospheric pressure) पर भी जल स्तम्भ खण्डित नहीं होता है। दूसरी ओर जाइलम वाहिकाएँ जो केवल मृत आशय की तरह काम करती हैं, जल स्तम्भ इनकी भीतरी भित्तियों के साथ आसंजित रहता है। यह आसंजन बल (adhesive force) भी जल स्तम्भ को खण्डित नहीं होने देता । वाष्पोत्सर्जन इस अविरत जल स्तम्भ के ऊपरी सिरों पर खिंचाव उत्पन्न किये रखता है। अतः सम्पूर्ण जल स्तम्भ ऊपर की ओर खिंचा चला जाता है। यहाँ अविरत जल स्तम्भ उस रस्से की तरह है जिसे कोई व्यक्ति कई मंजिल ऊपर खड़े होकर तथा बहुत कम बल लगाकर ही ऊपर खींच सकता है; क्योंकि रस्सी के सारे रेशे आपस में चिपक कर एक सामान्य स्तम्भ का निर्माण कर रहे होते हैं जैसा कि यहाँ जेल के अणु एक-दूसरे से संसंजित हैं।

किसी पौधे के सम्पूर्ण वायवीय मुलायम भागों से जल का अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन होता है। पर्णरन्ध्र इस कार्य को मुख्य रूप से करते हैं। पर्णरन्ध्र पत्तियों की पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं के बीच-बीच में पाये जाने वाले अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) में भरी हुई जल वाष्प (water vapours) को वायुमण्डल में विसरित करते रहते हैं। इस प्रकार इन अन्तराकोशिकीय स्थानों में जल वाष्प की माँग निरन्तर पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं (mesophyll cells) के द्वारा पूरी की जाती है। और पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं से उत्पन्न हुई जल की माँग (DPD) को जाइलम वाहिकाओं में उपस्थित जल भण्डार (जल स्तम्भ) से पूरा किया जाता है। इन अवस्थाओं में एक प्रकार का खिंचाव, वाष्पोत्सर्जन-कर्षण (transpiration pull) उत्पन्न हो जाता है, जो जाइलम वाहिकाओं में उपस्थित जल स्तम्भ को ऊपर खींचता रहता है। यह वाष्पोत्सर्जन-कर्षण अधिक वाष्पोत्सर्जन काल में अधिक होता है जिससे जड़ों में निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption) भी उत्पन्न होता है।

अधिक वाष्पोत्सर्जन की दशा में यह सिद्धान्त पूर्णतः उपयुक्त लगता है और डिक्सन तथा जौली के इसी मत को मान्यता मिली हुई है, किन्तु अब सामान्यतः यह माना जाता है कि रसारोहण संसंजन-वाष्पोत्सर्जन यदि जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है तो धनात्मक मूलदाब भी काफी दूरी तक जाइलम वाहिनियों में जल को ऊपर धकेलने में सहायक होता है। इस प्रकार, अन्य अवस्थाओं में अथवा उपर्युक्त दशाओं में भी अन्य प्रकार के दाब इस कार्य में अपनी-अपनी सीमा में सहायता अवश्य करते हैं।
In simple words: रसारोहण गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध पौधों में जल के ऊपर चढ़ने की प्रक्रिया है। डिक्सन तथा जौली का वाष्पोत्सर्जन-संसंजन-तनाव वाद इसे तीन सिद्धांतों- जल का सतत स्तम्भ, अणुओं के बीच संसंजन बल और वाष्पोत्सर्जन-कर्षण- के माध्यम से समझाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों में उत्पन्न खिंचाव पूरे जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।

🎯 Exam Tip: रसारोहण की परिभाषा और डिक्सन तथा जौली वाद के तीन प्रमुख सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें। संसंजन, आसंजन और वाष्पोत्सर्जन-कर्षण की अवधारणाओं को अच्छी तरह समझाना आवश्यक है।

 

Question 4. वर्तमान संकल्पनाओं के आधार पर पौधों में खाद्य पदार्थों के स्थानान्तरण की प्रक्रिया समझाइए । या भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण से सम्बन्धित मुंच की परिकल्पना की व्याख्या कीजिए। या खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण किसे कहते हैं? इसके पथ तथा स्थानान्तरण की दिशा का चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए। या पौधों में कार्बनिक पदार्थों के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं? इसकी क्रियाविधि एवं महत्त्व को लिखिए ।
Answer:

पादपों में खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण

फ्लोएम के द्वारा भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की क्रिय-विधि को समझाने का समय-समय पर प्रयास किया गया है; जैसे- विसरण परिकल्पना तथा जीवद्रव्य धारा प्रवाह परिकल्पना । किन्तु ये सिद्धान्त मान्यता प्राप्त नहीं कर सके क्योंकि ये तथ्यों पर खरे नहीं उतरते। सामान्यतः मान्य तथा अधिक स्पष्ट मत निम्नलिखित है

मात्रा प्रवाह या दाब प्रवाह परिकल्पना

मुंच (Munch, 1927-30) के अनुसार, इस परिकल्पना में बताया गया है कि फ्लोएम में भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की यह क्रिया विलेय स्वरूप में इन खाद्य पदार्थों के अधिक सान्द्रण वाले स्थानों से कम सान्द्रण वाले स्थानों में परासरण (osmosis) द्वारा होती है। पर्णमध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में इन पदार्थों के निरन्तर बनते रहने के कारण परासरण दाब (osmotic pressure) अधिक ही रहती है। दूसरी ओर जड़ों या अन्य स्थानों में इन पदार्थों के उपयोग में आते रहने अथवा अविलेय (insoluble) रूप में संचित हो जाने से सान्द्रण कम हो जाता है। अतः पर्णमध्योतक कोशिकाओं से फ्लोएम में होकर सामूहिक रूप में (in mass form) अथवा परासरण दाब के कारण आवश्यकता के स्थानों पर स्थानान्तरण होता रहता है। इस सिद्धान्त को समझाने के लिए निम्नलिखित प्रयोग किया जाता है

SUGAR SOLUTION (conc) --- SUGAR SOLUTION (dil)


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मुंच की मात्रा प्रवाह परिकल्पना के सत्यापन के प्रयोग के लिए उपकरण को दर्शाता है। इसमें दो परासरणदर्शी (A और B) हैं, जिनमें क्रमशः शक्कर का सांद्र और तनु विलयन भरा है। ये एक नली 'T' द्वारा जुड़े हैं और जल से भरे पात्रों में रखे हैं। यह दर्शाता है कि परासरण और दाब प्रवाह के कारण जल और शर्करा कैसे स्थानांतरित होते हैं।

सत्यापन प्रयोग के लिए दो परासरणदर्शी (osmometers) लिए जाते हैं। परासरणदर्शी में एक नली के सिरे पर अण्डे की झिल्ली या अन्य कोई अर्द्धपारगम्य झिल्ली बॉधी जाती है (चित्र A)। दोनों परासरणदर्शियों को एक नली 'T' द्वारा सम्बन्धित किया जाता है। परासरणदर्शी A में शक्कर का सान्द्र विलयन भरा जाता है तथा 'B' में शक्कर का तनु विलयन अथवा सादा जल । दोनों परासरणदर्शियों को जल से भरे पात्रों में रखा जाता है तथा दोनों पात्रों को भी एक नली 't' के द्वारा सम्बन्धित किया जाती है। स्पष्ट है परासरणदर्शी ‘A’ में पात्र से काफी मात्रा में जल परासरित होगा और यहाँ अत्यधिक परासरण दाब के कारण अत्यधिक स्फीति दाब (turgor pressure) पैदा होगा। अतः ‘A' का विलयन अविरल धार के रूप में (mass flow) 'B' की ओर प्रवाहित होगा, क्योंकि दोनों ओर झिल्लियों के फैलने के लिए बराबर बल चाहिए। यह प्रवाह क्रम तब तक चलता रह सकता है जब तक कि दोनों ओर शक्कर का सान्द्रण बराबर नहीं हो जाता है। उधर ‘B' में आकर विलयन से जल पात्र में और पात्र से ‘A’ में जल आता रहता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मुंच की परिकल्पना का रेखाचित्रीय निरूपण करता है, जो पौधों में शर्करा के स्थानांतरण की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें मेसोफिल कोशिकाएं (उच्च परासरण दाब पर), फ्लोएम, जाइलम, कैम्बियम, जड़ कोशिकाएं और जल का प्रवाह दिखाया गया है। यह बताता है कि कैसे प्रकाश संश्लेषण से बनी शर्कराएं मेसोफिल कोशिकाओं से फ्लोएम में प्रवेश करती हैं और फिर जड़ों या भंडारण अंगों तक नीचे की ओर प्रवाहित होती हैं, जबकि जल जाइलम से ऊपर की ओर बढ़ता है।

यहाँ यह स्पष्ट है कि यदि परासरणदर्शी 'A' में शक्कर की मात्रा को अर्थात् विलयन के सान्द्रण को कम न होने दिया जाये, साथ ही परासरणदर्शी ‘B' में आयी हुई शक्कर को निरन्तर हटाया जाता रहे तो निश्चय ही यह धारा प्रवाह लगातार तथा तीव्र गति से होता रह सकता है। उपर्युक्त रेखाचित्र (B) में 'A' पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की तरह है, जहाँ प्रकाश संश्लेषण के द्वारा शर्करा का निर्माण होता रहता है। अतः परासरण दाब कम नहीं होने पाता जबकि 'B' जड़ों या अन्य स्थानों की तरह है जहाँ शर्कराओं को या तो उपयोग में ले लिया जाता है अथवा अविलेय अवस्था में परिवर्तित करके संचित किया जाता रहता है। इसके अतिरिक्त चित्रे (A) के उपकरण की नली T' चालनी नलिकाओं के समान तथा पात्र जाइलम के समान है।

उपर्युक्त प्रयोग मुंच के सिद्धान्त को सत्यापित करता है कि जल में घुले भोज्य पदार्थों की एक अविरल धार मात्रा प्रवाह या दाब प्रवाह (mass flow or pressure flow) के रूप में सतत् फ्लोएम में प्रवाहित होती रहती है। मुंच की इस परिकल्पना की आपत्ति यह है कि इस परिकल्पना में खाद्य पदार्थों के विभिन्न दिशाओं में एक साथ स्थानान्तरण के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया गया है।
In simple words: मुंच की मात्रा प्रवाह परिकल्पना के अनुसार, पौधे में खाद्य पदार्थों (शर्करा) का स्थानांतरण फ्लोएम द्वारा उच्च सांद्रता वाले क्षेत्रों (जैसे पत्तियों) से कम सांद्रता वाले क्षेत्रों (जैसे जड़ों) की ओर परासरण दाब के अंतर के कारण होता है। इस प्रक्रिया में, जल भी फ्लोएम में शर्करा के साथ प्रवाहित होता है, और यह एक निरंतर धारा प्रवाह के रूप में होता है।

🎯 Exam Tip: मुंच की परिकल्पना को समझाते समय, फ्लोएम की भूमिका, परासरण दाब की भूमिका, और स्थानांतरण की दिशा पर विशेष ध्यान दें। प्रयोग और आरेख की सहायता से व्याख्या करने से बेहतर अंक प्राप्त होते हैं, और परिकल्पना की आपत्तियों का उल्लेख भी करें।

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