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परिचय
महाकवि कालिदास संस्कृत-साहित्य में 'कविकुलगुरु' की उपाधि से सम्मानित हैं और विश्व के कवि-समाज में प्रतिष्ठित हैं। उनकी जन्मभूमि भारतवर्ष थी। उन्होंने बिना किसी पक्षपात के भारतभूमि और उसके प्रदेशों की खासियतों का वर्णन किया है। उनके काव्यों और नाटकों में हिमालय से लेकर समुद्र के किनारे तक भारत का चित्रण मिलता है। यह पाठ महाकवि कालिदास के 'कुमारसम्भवम्' नामक महाकाव्य से लिया गया है। इस महाकाव्य में सत्रह सर्ग हैं और इसकी शुरुआत हिमालय के वर्णन से होती है। प्रस्तुत पाठ के आठ श्लोक उसी हिमालय वर्णन से लिए गए हैं।
पाठ-सारांश
भारतवर्ष के उत्तर में पर्वतों के राजा हिमालय हैं। वे पूर्व और पश्चिम दोनों समुद्रों में गहराई तक जाकर पृथ्वी के मानदण्ड की तरह स्थित हैं। सभी पर्वतों ने इसे बछड़ा और सुमेरु पर्वत को ग्वाला मानकर पृथ्वी रूपी गाय से रत्न और बड़ी-बड़ी औषधियाँ प्राप्त कीं। अनगिनत रत्नों को पैदा करने वाले हिमालय की सुन्दरता को बर्फ कम नहीं कर सकी। ऐसा इसलिए है क्योंकि गुणों के समूह में एक छोटा सा दोष चंद्रमा की किरणों में उसके दाग की तरह छिप जाता है। सिद्ध लोग हिमालय के बीच के हिस्से में घूमते हुए बादलों की छाया में बैठकर बारिश से बचने के बाद उसके धूप वाले शिखरों पर पहुँच जाते हैं। हाथियों को मारने से उनके पंजों में लगा खून जब बर्फ के पिघलने से धुल जाता है, तो वहाँ रहने वाले भील लोग सिंहों के नाखूनों से गिरे गज-मोतियों से सिंहों के जाने का रास्ता पहचान लेते हैं। हाथियों द्वारा अपने गालों की खुजली मिटाने के लिए चीड़ के पेड़ों से रगड़ने पर उनसे बहते दूध से हिमालय के शिखर खुशबूदार हो जाते हैं। हिमालय दिन में डरे हुए अंधेरे को अपनी गुफाओं में शरण देकर सूर्य से उसकी रक्षा करता है। चमरी गायें अपनी पूँछ को इधर-उधर हिलाने से पूँछ के बालों के चँवर बनाकर हिमालय के 'गिरिराज' नाम को सार्थक करती हैं।
पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या
(1) स्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः । पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ॥ [2007, 11, 14, 15]
शब्दार्थ: अस्ति = है। उत्तरस्यां दिशि = उत्तर दिशा में। देवतात्मा = देवगण हैं आत्मा जिसकी। हिमालयः नाम = हिमालय नामका नगाधिराजः = पर्वतों का राजा। पूर्वापरौ = पूर्व और पश्चिम तोयनिधी = समुद्रों को। वगा= अवगाहन करके; प्रविष्ट होकर। स्थितः = स्थित है। पृथिव्याः = पृथ्वी के मानदण्डः इवे = मापने के दण्ड के समान
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय की स्थिति और उसके भौगोलिक महत्त्व का वर्णन किया गया है।
अन्वय: उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयः नाम नगाधिराजः अस्ति, (यः) पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य पृथिव्याः मानदण्डः इव स्थितः (अस्ति)।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि भारतवर्ष की उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मा वाला पर्वतों का राजा हिमालय स्थित है। वह पूर्व और पश्चिम दोनों समुद्रों में डुबकी लगाकर पृथ्वी के मापने के दण्ड जैसा दिखता है। इसका मतलब है कि हिमालय इतना फैला हुआ है कि यह पूर्व और पश्चिम दोनों किनारों पर समुद्रों को छूता है। यह भारत की प्राकृतिक ढाल की तरह खड़ा है।
(2) यं सर्वशैलाः परिकल्प्य वत्सं मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे भास्वन्ति रत्नानि महौषधींश्च पृथूपदिष्टां दुदुहुर्धरित्रीम् ॥ [2006]
शब्दार्थ: यं = जिस हिमालय को। सर्वशैलाः = सभी पर्वतों ने परिकल्प्य = बनाकर। वत्सम् = बछड़ा। मेरौ = सुमेरु पर्वत के स्थिते = स्थित होने पर दोग्धरि = दुहने वाला। दोहदक्षे = दुहने में निपुण। भास्वन्ति = देदीप्यमाना रत्नानि = रत्नों को। महौषधी (महा + ओषधी) = उत्तम जड़ी-बूटियों को। पृथूपदिष्टाम् = राजा पृथु के द्वारा आदेश दी गयी। दुदुहुः = दुहा। धरित्रीम् = पृथ्वी को।।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय को बछड़ा, सुमेरु को दुहने वाला तथा पृथ्वी को गाय का प्रतीक मानकर उसके दोहन की कल्पना की गयी है।
अन्वय: सर्वशैलाः यं वत्सं परिकल्प्य दोहदक्षे मेरौ दोग्धरि स्थिते पृथूपदिष्टां धरित्रीं भास्वन्ति रत्नानि महौषधीन् च दुदुहुः।।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि सभी पर्वतों ने जिस हिमालय को एक बछड़ा मान लिया। सुमेरु पर्वत एक कुशल दुहने वाले के रूप में खड़ा था। राजा पृथु के आदेश से पृथ्वी को गाय जैसा माना गया, जिससे सभी पर्वतों ने मिलकर चमकदार रत्न और संजीवनी जैसी बड़ी-बड़ी औषधियाँ दुही। यह बताता है कि हिमालय प्रकृति के धन से कितना भरा हुआ है।
(3) अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम् एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ॥ [2007, 11]
शब्दार्थ: अनन्तरत्नप्रभवस्य = अनन्त रत्नों को उत्पन्न करने वाले। यस्य = जिस (हिमालय) के। हिमम् = बर्फ। न = नहीं। सौभाग्यविलोपि = सौन्दर्य का विनाश करने वाली। जातम् = हुई। एकः = एक हि = निश्चित ही, क्योंकि दोषः = दोष। गुणसन्निपाते = गुणों के समूह में। निमज्जति = डूब जाता है, विलीन हो जाता है। इन्दोः = चन्द्रमा की। किरणेषु = किरणों में। इव = समान। अङ्कः = कलंक।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय के महान् यश का वर्णन किया गया है।
अन्वय: हिमम् अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य सौभाग्यविलोपि न जातम्। हि एकः दोषः गुणसन्निपाते इन्दोः किरणेषु अङ्कः इव निमज्जति।
व्याख्या: जिस हिमालय पर्वत में अनन्त रत्न पैदा होते हैं, उसकी सुंदरता को उस पर हमेशा जमी रहने वाली बर्फ भी कम नहीं कर पाई है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गुणों के समूह में एक दोष उसी तरह छिप जाता है, जैसे चंद्रमा की किरणों में उसका दाग छिप जाता है। इसका अर्थ है कि हिमालय भले ही हमेशा बर्फ से ढका रहता है, लेकिन यह उसका एकमात्र दोष है। फिर भी, इस दोष से उसका महत्व कम नहीं होता, क्योंकि चंद्रमा का कलंक उसकी सुंदरता को कम नहीं करता। हिमालय अपने अंदर अनेक बहुमूल्य चीज़ें छिपाए हुए है।
(4) आमेखलं सञ्चरतां घनानां छायामधः सानुगतां निषेव्य । उद्वेजिता वृष्टिभिराश्रयन्ते शृङ्गाणि यस्यातपवन्ति सिद्धाः ॥ [2007]
शब्दार्थ: आमेखलम् = पर्वत के मध्य भाग तक। सञ्चरताम् = घूमने वाले। घनानां = बादलों के छायां = छाया का। अधः = नीचे। सानुगताम् = नीचे के शिखरों पर पड़ती हुई। निषेव्य = सेवन करके। उद्वेजिताः = पीड़ित किये गये। वृष्टिभिः = वर्षा द्वारा आश्रयन्ते = आश्रय करते हैं। शृङ्गाणि = शिखरों का। आतपवन्ति = धूप से युक्त। सिद्धाः = सिद्ध नामक देवता अथवा तपस्वी साधक।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय पर तपस्या करने वाले सिद्धगणों के क्रिया-कलापों का वर्णन किया गया है।
अन्वय: सिद्धाः आमेखलं सञ्चरतां घनानाम् अधः सानुगतां छायां निषेव्य वृष्टिभिः उद्वेजिताः (सन्तः) यस्य आतपवन्ति शृङ्गाणि आश्रयन्ते।
व्याख्या: महाकवि कालिदास बताते हैं कि सिद्ध लोग (जो तपस्वी या साधक होते हैं) हिमालय पर्वत के मध्य भाग में घूमते हुए बादलों की छाया में नीचे के शिखरों पर आराम करते हैं। जब बारिश से परेशान हो जाते हैं, तो वे हिमालय के उन शिखरों पर चले जाते हैं जहाँ धूप होती है। इसका मतलब यह है कि बादल सिर्फ हिमालय के मध्य भाग तक ही पहुँचते हैं। जब बारिश होती है, तो सिद्धगण धूप वाले ऊँचे शिखरों पर चले जाते हैं, यानी उनकी पहुँच बादलों से भी ऊपर है।
(5) पदं तुषारसुतिधौतरक्तं यस्मिन्नदृष्ट्वाऽपि हतद्विपानाम् । विदन्ति मार्गे नखरन्ध्रमुक्तैर्मुक्ताफलैः केसरिणां किराताः ॥
शब्दार्थ: पदम् = पैर (के निशान) को। तुषारसुतिधौतरक्तम् = बर्फ के पिघलकर बहने से धुले हुए रक्त वाले। यस्मिन्नदृष्ट्वाऽपि (यस्मिन् + अदृष्ट्वा + अपि) = जिस (हिमालय) पर बिना देखे भी। हतद्विपानां = हाथियों को मारने वाले। विदन्ति = जान जाते हैं। मार्ग = मार्ग को। नखरन्ध्रमुक्तैः = नखों के छिद्रों से गिरे हुए। मुक्ताफलैः = मोतियों के दानों जैसे। केसरिणाम् = सिंहों के। किराताः = (पहाड़ों पर रहने वाली) भील जाति के लोग।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में किरातों द्वारा हिमालय के बर्फीले भाग में भी मार्ग ढूँढने के संकेतों का वर्णन किया गया है।
अन्वय: किराताः यस्मिन् तुषारसुतिधौतरक्तं हतद्विपानां (सिंहानां) पदम् अदृष्ट्वा अपि नखरन्ध्रमुक्तैः मुक्ताफलैः केसरिणां मार्ग विदन्ति।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि भील लोग उस हिमालय में, जहाँ पिघली हुई बर्फ से हाथियों का खून धुल जाता है, हाथियों को मारने वाले सिंहों के पदचिह्न बिना देखे भी, उनके नाखूनों के छेदों से गिरे मोतियों से सिंहों के जाने का रास्ता पहचान लेते हैं। इसका मतलब है कि हाथियों के मस्तक में मोती होते हैं। जब सिंह अपने पैरों से हाथी के सिर को फाड़ते हैं, तो मोती उनके पंजों में फंस जाते हैं और चलते समय रास्ते में गिर जाते हैं। ऐसे में, सिंहों का शिकार करने वाले किरात उन मोतियों को देखकर ही उनके जाने का रास्ता पता कर लेते हैं, भले ही खून के निशान बर्फ से धुल गए हों।
(6) कपोलकण्डूः करिभिर्विनेतुं विघट्टितानां सरलद्माणाम् । यत्र खुतक्षीरतया प्रसूतः सानूनि गन्धः सुरभीकरोति ॥
शब्दार्थ: कपोलकण्डूः = गालों की खुजली को। करिभिः = हाथियों के द्वारा। विनेतुम् = मिटाने के लिए। विघट्टितानाम् = रगड़े गये। सरलद्माणाम् = सरल (चीड़) के वृक्षों का 'तुतक्षीरतया = दूध के बहने के कारण। प्रसूतः = उत्पन्न। सानूनि = शिखरों को। गन्धः = गन्धा सुरभीकरोति = सुगन्धित करती है।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हाथियों की रगड़ से छिले चीड़ के वृक्षों की गन्ध से पर्वत शिखरों के सुवासित होने का वर्णन है।
अन्वय: यत्र कपोलकंण्डूः विनेतुं करिभिः विघट्टितानां सरलद्माणां सुतक्षीरतया प्रसूतः गन्धः सानूनि सुरभीकरोति।।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि जहाँ हाथी अपने गालों की खुजली मिटाने के लिए चीड़ के पेड़ों से रगड़ते हैं, वहाँ से दूध जैसा गोंद निकलता है। इस गोंद की खुशबू से हिमालय के शिखर महक उठते हैं। यह प्राकृतिक क्रिया हिमालय की सुंदरता को और बढ़ा देती है।
(7) दिवाकराद्रक्षति सो गुहासु लीनं दिवा भीतमिवान्धकारम् । क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव ॥ [2006, 09]
शब्दार्थ: दिवाकरात् = सूर्य से। रक्षति = बचाता है। सः = वह। गुहासु = गुफाओं में लीनं = छिपे हुए। दिवा भीतम् इव = दिन में डरे हुए के समान। अन्धकारम् = अँधेरे को। क्षुद्रेऽपि = नीच मनुष्य के भी। नूनं = निश्चय ही। शरणं प्रपन्ने = शरण में पहुँचने पर। ममत्वम् = आत्मीयता, अपनापन। उच्चैः शिरसाम् = ऊँचे मस्तक वालों का, महापुरुषों का। सतीव = श्रेष्ठ पुरुष की तरह।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय को शरणागतवत्सल के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
अन्वये: यः दिवा दिवाकरात् भीतम् इव गुहासु लीनम् अन्धकारम् रक्षति। नूनं क्षुद्रे अपि शरणं प्रपन्ने सतीव उच्चैः शिरसां ममत्वं (भवति एव)।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि हिमालय दिन में सूर्य से डरे हुए अंधेरे को अपनी गुफाओं में छिपाकर उसकी रक्षा करता है। यह निश्चय ही सच है कि जब कोई छोटा या कमज़ोर व्यक्ति भी किसी बड़े व्यक्ति की शरण में आता है, तो बड़े लोग उस पर दया और अपनापन दिखाते हैं। हिमालय का यह कार्य महापुरुषों के स्वभाव को दर्शाता है, जो सभी शरणागतों पर समान स्नेह रखते हैं।
(8) लाङगूलविक्षेपविसर्पिशोभैरितस्ततश्चन्द्रमरीचिगौरैः ।। यस्यार्थयुक्तं गिरिराजशब्दं कुर्वन्ति बालव्यजनैश्चमर्यः ॥
शब्दार्थ: लागूलविक्षेपविसर्पिशोभैः = पूँछ को हिलाने से फैलने वाली शोभा वाली। इतस्ततः = इधर-उधर। चन्द्रमरीचिगौरैः = चन्द्रमा की किरणों के समान उजले। यस्य = जिसके अर्थात् हिमालय के अर्थयुक्तं = अर्थ से युक्त सार्थका गिरिराजशब्दम् = गिरिराज शब्द को। कुर्वन्ति = कर रही हैं। बाल-व्यजनैः = बालों के पंखों अर्थात् चॅवरों से। चमर्यः = चमरी गायें, सुरा गायें (इनके पूँछ के बालों की चॅवर बनती है)।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में हिमालय के पर्वतों का राजा होने की कल्पना को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है।
अन्वय: चमर्यः इतस्ततः लागूलविक्षेपविसर्पिशोभैः चन्द्रमरीचिगौरैः बालव्यजनैः यस्य गिरिराजशब्दम् अर्थयुक्तं कुर्वन्ति।
व्याख्या: महाकवि कालिदास कहते हैं कि चमरी गायें अपनी पूँछों को इधर-उधर हिलाती रहती हैं, जिससे उनकी शोभा फैलती है। उनकी पूँछों के बाल चंद्रमा की किरणों जैसे सफेद होते हैं, जो चँवर जैसे दिखते हैं। इन चँवरों से वे हिमालय के 'गिरिराज' (पर्वतों का राजा) शब्द को सार्थक करती हैं। इसका मतलब है कि जैसे सिंहासन पर बैठे राजा को चँवर डुलाया जाता है, वैसे ही चमरी गायें हिमालय पर चँवर डुलाकर उसके राजा होने का सम्मान करती हैं।
सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या
Question 1. अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयों नाम नगाधिराजः ।
Answer: भारत की उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मास्वरूप पर्वतों का राजा हिमालय स्थित है। हिमालय को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है और सभी देवताओं का आराध्य होने के कारण उसे देवताओं की आत्मा कहा गया है। यह हिमालय भारत की एक पवित्र और महत्वपूर्ण पहचान है।
In simple words: भारत के उत्तर में हिमालय है, जिसे देवताओं की आत्मा कहा जाता है और यह पर्वतों का राजा है। यह भगवान शिव का घर भी माना जाता है।
🎯 Exam Tip: सूक्तियों की व्याख्या करते समय, उनके शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उनके गहरे अर्थ और महत्व को स्पष्ट करें।
Question 2. स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ।। [2010, 12, 13, 15]
Answer: भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित हिमालय पर्वत बहुत विशाल और फैला हुआ है। इसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे यह पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैला हुआ है। कवि कल्पना करते हैं कि यह धरती की विशालता को मापने के लिए एक मानदण्ड (पैमाना) की तरह पृथ्वी पर स्थित है। यह विशाल मानदण्ड हमें पृथ्वी की विशालता और महानता का सही अनुमान लगाने में मदद करता है।
In simple words: हिमालय पृथ्वी पर एक मापने वाले डंडे की तरह खड़ा है। यह पृथ्वी की चौड़ाई और विशालता को दिखाता है।
🎯 Exam Tip: किसी भी उपमा की व्याख्या करते समय, पहले उसका शाब्दिक अर्थ बताएं और फिर उसके पीछे छिपे हुए दार्शनिक या प्रतीकात्मक महत्व को समझाएं।
Question 3. एको हि दोषो गुणसन्निपाते, निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः । [2007, 11, 12, 14]
Answer: इस सूक्ति में बताया गया है कि यदि किसी व्यक्ति में बहुत सारे अच्छे गुण हों, तो उसका एक छोटा-सा दोष लोगों का ध्यान नहीं खींच पाता। लोग उसके गुणों पर अधिक ध्यान देते हैं। जैसे, चंद्रमा की किरणों के समूह में उसका काला दाग छिप जाता है, क्योंकि लोग चंद्रमा की चमक से मोहित हो जाते हैं। हिमालय में अनगिनत रत्न और औषधियाँ हैं, इसलिए उस पर जमी बर्फ का दोष भी उसकी महानता को कम नहीं कर पाता।
In simple words: बहुत सारे गुणों के बीच एक छोटी सी बुराई छिप जाती है, जैसे चाँदनी में चाँद का दाग दिखता नहीं है। लोग अच्छी चीज़ों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं।
🎯 Exam Tip: ऐसे मुहावरों की व्याख्या करते समय, एक सरल उदाहरण के साथ इसे समझाना प्रभावी होता है ताकि अर्थ स्पष्ट हो सके।
Question 4. क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने, ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव । [2010]
Answer: यह सूक्ति कहती है कि यदि कोई छोटा या कमज़ोर व्यक्ति किसी महान व्यक्ति की शरण में आता है, तो वह महान व्यक्ति उस पर श्रेष्ठ पुरुषों की तरह ही अपनापन और स्नेह दिखाता है। महापुरुष सभी पर समान ममता दिखाते हैं, चाहे वह कोई भी हो। हिमालय इसका एक अच्छा उदाहरण है, जो दिन में सूर्य से डरे हुए अंधेरे को अपनी गुफाओं में शरण देकर उसकी रक्षा करता है। यह सिखाता है कि शरण में आए हुए की रक्षा करना और उस पर स्नेह दिखाना बहुत महत्वपूर्ण है।
In simple words: अगर कोई छोटा व्यक्ति किसी बड़े आदमी की शरण में आता है, तो बड़ा आदमी उस पर दया और प्यार दिखाता है। यह हिमालय की तरह है जो अंधेरे को सूरज से बचाता है।
🎯 Exam Tip: नैतिक शिक्षा वाली सूक्तियों में, उसके मूल संदेश को स्पष्ट करना और उसे किसी वास्तविक या प्रतीकात्मक उदाहरण से जोड़ना उत्तम है।
श्लोक का संस्कृत-अर्थ
(1) अस्त्युत्तरस्यां...इव मानदण्डः ॥ (श्लोक 1) (2010]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः कथयति यत् भारतस्य उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयः नाम पर्वतानां नृपः अस्ति, यः पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य पृथिव्याः मानदण्डः इव स्थितः अस्ति अर्थात् तस्य विस्तारं इदृशं अस्ति यत् पूर्वस्य पश्चिमस्य च तोयनिधीः स्पर्शयति।
(2) अनन्तरत्नप्रभवस्य...किरणेष्विवाङ्कः ॥ (श्लोक 3)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः हिमालयस्य सौन्दर्यं वर्णयन् कथयति यत् हिमालये बहूनि रत्नानि उत्पन्नं भवन्ति, तस्य शिखरेषु हिमम् अपि भवति, परम् तत् हिमं तस्य सौन्दर्यं क्षीणं न अकरोत्। तस्य हिमस्य अयं दोषः रत्नानां गुणेषु प्रभावरहितः अभवत्। गुणेषु एकः दोषः तथैव प्रभावहीनं भवति यथा चन्द्रस्य किरणेषु तस्य कलङ्क अदृश्यः भवति।।
(3) दिवाकराद्रक्षति...शिरसां सतीव ॥ (श्लोक 7)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः कथयति यत् हिमालयस्य गुहासु अन्धकारं वर्तते। अत्र कविः उत्प्रेक्षां करोति यत्र दिवाकरात् भीतः अन्धकारः हिमालये शरणं प्राप्तवान्, अतएव हिमालयः अन्धकारस्य रक्षां करोति। इदं सत्यमेव यदि क्षुद्रः अपि महात्मनां शरणं प्राप्नोति तदा महात्मनां ममत्वं नूनम् एव उत्पन्नं भवति।
(4) लाङ्गुलविक्षेपविसर्पिशोभैः...बालव्यजनैश्चमर्यः ॥ (श्लोक 8)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकवि कालिदासः कथयति--हिमालयः पर्वतानां राजा अस्ति, अतएव सः गिरिराजः इति कथ्यते। तत्र स्थिताः चमर्यः धेनवः स्वपुच्छविक्षेपविसर्पिशोमैः चन्द्रधवलगौरेः बालव्यजनैः तस्योपरि व्यजनं कृत्वा 'गिरिराज' शब्दं अर्थयुक्तं कुर्वन्ति।
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