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Chapter Solutions: Class 10 Sanskrit (UP Board) - Chapter 4 सुक्ति सुध
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परिचय
प्रस्तुत पाठ में कुछ सुन्दर कथन इकट्ठा किए गए हैं। 'सूक्ति' का मतलब 'सुन्दर बात' होता है। सूक्तियाँ हर देश और हर समय में सभी मनुष्यों के लिए बहुत काम की होती हैं। जैसे, जब कोई मीठी बातें बोलता है तो बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को फायदा होता है, वैसे ही कविताओं में लिखी गई सूक्तियाँ खुशियाँ देने के साथ-साथ जीवन में अच्छे व्यवहार और सामाजिकता भी सिखाती हैं। ये बातें इंसान को अमरता की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।
पाठ-सारांश
प्रस्तुत पाठ में नौ सूक्तियाँ शामिल हैं। उनका छोटा सार इस प्रकार है:
1. संसार की सभी भाषाओं में संस्कृत भाषा को देवताओं की भाषा कहा जाता है, और यह सबसे श्रेष्ठ है। इसका काव्य बहुत सुन्दर है, और इसकी सुन्दर तथा मधुर बातें (सूक्तियाँ) तो सबसे अलग हैं।
2. मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न समझते हैं, जबकि इस धरती पर असली रत्न तो अन्न, जल और मीठी बातें हैं।
3. समझदार लोग अपना समय ज्ञान पाने में बिताते हैं, जबकि मूर्ख लोग अपना समय सोने या बुरे कामों में बर्बाद करते हैं।
4. जहाँ सज्जन लोग रहते हैं, वहाँ संस्कृत के मधुर श्लोक सब जगह खुशियाँ फैलाते हैं। इसके विपरीत जहाँ बुरे लोग रहते हैं, वहाँ 'श्लोक' का 'ल' हटकर केवल 'शोक' ही रह जाता है, यानी वहाँ खुशी नहीं होती।
5. व्यक्ति को हमेशा समय के अनुसार ही बात करनी चाहिए। गलत समय पर बात करने से तो बृहस्पति भी मजाक का पात्र बन गए थे।
6. श्रद्धा से कही गई और पूछी गई बात हर जगह आदर पाती है, और बिना श्रद्धा के वह जंगल में रोने जैसी बेकार होती है।
7. विद्या सबसे अच्छा धन है; क्योंकि इसे राजा छीन नहीं सकता, भाई बांट नहीं सकते। इसीलिए देवता और विद्वान इसकी पूजा करते हैं।
8. जो लक्ष्मी मांगने वालों के दुःख दूर नहीं करती, जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में मन नहीं लगाती, जो पुत्र विद्वानों में इज्जत नहीं पाता, ये तीनों न होने के बराबर ही हैं।
9. इंसान की सुन्दरता नहाने, इत्र लगाने और गहनों से नहीं होती, बल्कि उसकी सुन्दरता तो उसकी मीठी वाणी से ही होती है।
पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या
Question 1. भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती । तस्माद्धि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम् ॥ [2009, 10, 12, 13]
Answer:
शब्दार्थ: भाषासु = भाषाओं में; मुख्या = प्रमुख; मधुरा = मधुर गुणों से युक्त; दिव्या = अलौकिक; गीर्वाणभारती = देवताओं की वाणी, संस्कृत; तस्मात् = उससे; हि = निश्चयपूर्वक; अपि = भी; सुभाषितम् = सुन्दर या उपदेशपरक वचन.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में संस्कृत भाषा और सुभाषित की विशेषता बताई गई है.
अन्वय: भाषासु गीर्वाणभारती मुख्या, मधुरा दिव्या (च अस्ति) । तस्मात् हि काव्यं मधुरम् (अस्ति), तस्मात् अपि सुभाषितम् (मधुरम् अस्ति) ।।
व्याख्या: विश्व की सभी भाषाओं में संस्कृत भाषा को देवताओं की वाणी कहा जाता है, जो प्रमुख, मधुर गुणों से युक्त और अलौकिक है। इसी कारण इसका काव्य भी बहुत मधुर है। इस काव्य से भी अधिक मधुर इसके सुन्दर उपदेशपरक वचन हैं, जिन्हें सूक्ति कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि संस्कृत भाषा सभी प्रकार के गुणों से भरी हुई है, जो ज्ञान और संस्कृति को बढ़ावा देती है.
In simple words: संस्कृत सभी भाषाओं में सबसे खास, मीठी और दैवीय भाषा है। इसलिए, संस्कृत के काव्य बहुत मीठे होते हैं, और उससे भी मीठे इसके अच्छे वचन (सूक्तियाँ) हैं।
🎯 Exam Tip: श्लोक की व्याख्या करते समय, उसके शब्दार्थ, प्रसंग, अन्वय और व्याख्या को स्पष्ट रूप से लिखें ताकि पूरा अर्थ समझ आ सके।
Question 2. पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ॥ [2006,07,08,09, 10,12]
Answer:
शब्दार्थ: पृथिव्यां = भूतल पर, पृथ्वी पर; त्रीणि रत्नानि = तीन रत्न; सुभाषितम् = अच्छी वाणी; मूढः = मूर्ख लोगों के द्वारा; पाषाणखण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में; रत्नसंज्ञा = रत्न का नाम; विधीयते = किया जाता है.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में जल, अन्न और सुन्दर वचन को ही वास्तविक रत्न बताया गया है.
अन्वय: पृथिव्यां जलम्, अन्नं, सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति) । मूढः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।
व्याख्या: पृथ्वी पर जल, अन्न और सुन्दर (उपदेशपरक) वचन – ये तीनों सबसे अच्छे पदार्थ हैं। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं। इसका मतलब यह है कि जल, अन्न और मीठे वचनों से पूरे संसार का भला होता है, जबकि जिन लोगों के पास रत्न होते हैं, उनका भला केवल उन्हीं को होता है। इसलिए, जल, अन्न और मीठी बातें ही असली रत्न हैं। ये चीजें सभी जीवधारियों के जीवन के लिए आवश्यक हैं और जीवन को सुगम बनाती हैं.
In simple words: धरती पर असली तीन रत्न जल, अन्न और मीठी बातें हैं। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न मानते हैं, जो सही नहीं है।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक में दिए गए वास्तविक रत्नों और मूर्खों द्वारा माने गए रत्नों के बीच का अंतर साफ-साफ बताएं।
Question 3. काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यँसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥ [2007,08, 10]
Answer:
शब्दार्थ: काव्यशास्त्रविनोदेन = काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन से; कालः = समय; गच्छति = बीतता है; धीमताम् = बुद्धिमानों का; व्यसनेन = निन्दनीय कर्मों के करने से; निद्रया = निद्रा द्वारा; कलहेन = झगड़ा करने से; वा = अथवा.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में मूर्ख और बुद्धिमानों के समय बिताने के तरीके में अंतर बताया गया है.
अन्वय: धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति, मूर्खाणां (कालः) च व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा (गच्छति)।
व्याख्या: बुद्धिमान लोग अपना समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन पाने और पढ़ने-पढ़ाने में बिताते हैं। वहीं मूर्ख लोग अपना समय बुरे कामों, सोने या झगड़ा करने में बर्बाद करते हैं। बुद्धिमान लोग ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को बेहतर बनाते हैं, जबकि मूर्ख लोग अपना समय व्यर्थ गंवाकर नुकसान उठाते हैं.
In simple words: समझदार लोग अपना समय किताबें पढ़कर और ज्ञान प्राप्त करके बिताते हैं। मूर्ख लोग अपना समय बुरे काम करके, सोकर या लड़ाई-झगड़े में बर्बाद करते हैं।
🎯 Exam Tip: बुद्धिमानों और मूर्खों के समय बिताने के तरीकों में स्पष्ट अंतर बताएं, और इसके महत्व को समझाएं।
Question 4. श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः । लकारो लुप्यते यत्र तत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥ [2006,08,09, 10]
Answer:
शब्दार्थ: श्लोकस्तु = यश तो; लोकताम् याति = कीर्ति की प्राप्ति करता है; यत्र = जहाँ; तिष्ठन्ति = रहते हैं; साधवः = सज्जन पुरुष; लकारो लुप्यते = श्लोक का 'ल' वर्ण लुप्त हो जाता है, अर्थात् श्लोक 'शोक' बन जाता है; तत्र = वहाँ; असाधवः = दुर्जन पुरुष.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों और दुर्जनों की संगति के प्रभाव को दर्शाया गया है.
अन्वय: यत्र साधवः तिष्ठन्ति, श्लोकः तु श्लोकताम् याति । यत्र असाधवः तिष्ठन्ति, तत्र लकारो लुप्यते (अर्थात् श्लोकः शोकतां याति)।
व्याख्या: जहाँ सज्जन लोग रहते हैं, वहाँ श्लोक (संस्कृत का छन्द) को यश मिलता है। जहाँ दुर्जन लोग रहते हैं, वहाँ श्लोक का 'ल' अक्षर हट जाता है, और वह 'शोक' बन जाता है। इसका मतलब यह है कि अच्छी बातें और उपदेश सज्जनों पर तो अच्छा प्रभाव डालते हैं, लेकिन दुष्टों पर उनका उल्टा असर होता है। सज्जनों की उपस्थिति वातावरण को सुखद बना देती है, जबकि दुर्जनों की उपस्थिति दुःख पैदा करती है। एक अच्छे वातावरण में ज्ञान बढ़ता है और बुरे वातावरण में उसका नाश होता है.
In simple words: जहाँ अच्छे लोग रहते हैं, श्लोक को मान मिलता है। जहाँ बुरे लोग रहते हैं, वहाँ श्लोक 'शोक' बन जाता है, यानी दुख आता है।
🎯 Exam Tip: श्लोक के 'ल' और 'शोक' के 'ल' का अंतर समझाकर सज्जन और दुर्जन की संगति का महत्व स्पष्ट करें।
Question 5. अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् । प्राप्नुयाद् बुद्धयवज्ञानमपमानञ्च-शाश्वतम् ॥ [2011]
Answer:
शब्दार्थ: अप्राप्तकालम् = समय के प्रतिकूल वचन = बात; बृहस्पतिः = देवताओं के गुरु बृहस्पति, अत्यधिक ज्ञानवान व्यक्ति; अपि = भी; ब्रुवन् = बोलता हुआ; प्राप्नुयात् = प्राप्त करता है; बुद्धयवज्ञानम् = बुद्धि की उपेक्षा, बुद्धि की अवमानना; शाश्वतम् = निरन्तर.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में समय के विरुद्ध बात न कहने की शिक्षा दी गई है.
अन्वय: अप्राप्तकालं वचनं ब्रुवन् बृहस्पतिः अपि बुद्धयवज्ञानं शाश्वतम् अपमानं च प्राप्नुयात्।
व्याख्या: गलत समय पर बात कहने से देवताओं के गुरु बृहस्पति को भी बुद्धि की उपेक्षा और हमेशा रहने वाला अपमान मिलता है। इसका मतलब यह है कि हर इंसान को समय के अनुसार ही बात करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बिना सोचे-समझे या गलत समय पर अपनी बात कहता है, तो उसे अपमान और बुद्धिमत्ता की कमी का सामना करना पड़ सकता है.
In simple words: गलत समय पर बोलने से सबसे ज्ञानी व्यक्ति बृहस्पति को भी बेइज्जती और बुद्धि की कमी का सामना करना पड़ा। हमेशा सही समय पर बात करनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: श्लोक में बृहस्पति के उदाहरण का प्रयोग करके 'समय के अनुसार बोलने' के महत्व को बताएं।
Question 6. वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्याप्यरण्यरुदितोपमम् ॥
Answer:
शब्दार्थ: वाच्यम् = कहने योग्य; श्रद्धासमेतस्य = श्रद्धा से युक्त का; पृच्छतः = पूछने वाले का; प्रोक्तं = कहा हुआ; श्रद्धाविहीनस्य = श्रद्धारहित के लिए; अरण्य-रुदितोपमम् = अरण्यरोदन के समान निरर्थक.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में श्रद्धा के महत्व को समझाया गया है.
अन्वय: श्रद्धासमेतस्य विशेषतः पृच्छतः च वाच्यम् । श्रद्धाविहीनस्य प्रोक्तम् अपि अरण्यरुदितोपमम् (अस्ति ) ।
व्याख्या: श्रद्धा से भरे हुए यानी श्रद्धालु व्यक्ति को, और खासकर पूछने वाले व्यक्ति को कोई बात कहना सही होता है। श्रद्धा के बिना यानी अश्रद्धालु व्यक्ति को कही गई बात भी जंगल में रोने जैसी बेकार होती है। इसका मतलब यह है कि ऐसे ही व्यक्ति या शिष्य को ज्ञान देना चाहिए जो श्रद्धालु होने के साथ-साथ जिज्ञासु भी हो। ज्ञान केवल उन्हीं को देना चाहिए जो उसे महत्व दें और समझने की इच्छा रखते हों.
In simple words: श्रद्धावान और जिज्ञासु व्यक्ति से कही गई बात महत्वपूर्ण होती है। श्रद्धाहीन व्यक्ति को कही गई बात जंगल में रोने जैसी बेकार है।
🎯 Exam Tip: श्रद्धा के साथ कही गई बात के महत्व और श्रद्धाहीन को ज्ञान देने के निरर्थक होने के बीच का अंतर स्पष्ट करें।
Question 7. वसुमतीपतिना नु सरस्वती, बलवता रिपुणा न च नीयते समविभागहरैर्न विभज्यते, विबुधबोधबुधैरपि सेव्यते ॥ [2006, 10]
Answer:
शब्दार्थ: वसुमतीपतिना = राजा के द्वारा; सरस्वती = विद्या; बलवता रिपुणा = बलवान शत्रु के द्वारा; न नीयते = नहीं ले जाई जाती है; समविभागहरैः = समान हिस्सा लेने वाले भाई-बहनों के द्वारा; न विभज्यते = नहीं बांटी जाती है; विबुधबोधबुधैः = ऊँचे से ऊँचे विद्वानों के द्वारा; सेव्यते = सेवित होती है.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में विद्या को अमूल्य धन बताया गया है.
अन्वय: सरस्वती वसुमतीपतिना बलवता रिपुणा च न नीयते । समविभागहरैः न विभज्यते, विबुधबोधबुधैः अपि सेव्यते ।।
व्याख्या: विद्या को राजा या बलवान शत्रु द्वारा छीना नहीं जा सकता। इसे समान हिस्सा बांटने वाले भाइयों द्वारा भी बांटा नहीं जा सकता। बल्कि देवताओं के ज्ञान के समान ज्ञान वाले विद्वानों द्वारा इसकी सेवा की जाती है। इसका मतलब यह है कि विद्या को न तो राजा ले सकता है और न ही बलवान शत्रु। इसे भाई-बंधु भी नहीं बांटते, बल्कि यह तो ज्ञानी-विद्वानों द्वारा ही सेवित है और जितना बांटा जाए उतना बढ़ती है। विद्या एक ऐसा धन है जो कभी खत्म नहीं होता और हमेशा बढ़ता रहता है.
In simple words: विद्या को राजा या बलवान दुश्मन छीन नहीं सकते, भाई बांट नहीं सकते, बल्कि ज्ञानी लोग इसकी सेवा करते हैं।
🎯 Exam Tip: विद्या को सभी धनों में श्रेष्ठ क्यों माना गया है, इसके कारणों को श्लोक के आधार पर समझाएं।
Question 8. लक्ष्मीनं या याचकदुःखहारिणी, विद्या नयाऽप्यच्युतभक्तिकारिणी । पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः, सा नैव सा नैव स नैव नैव ॥ [2012]
Answer:
शब्दार्थ: या = जो लक्ष्मी; याचकदुःखहारिणी = याचकों के दुःख को दूर करने वाली; अच्युतभक्तिकारिणी = विष्णु की भक्ति उत्पन्न करने वाली; पण्डितमण्डलाग्रणीः = पंडितों के समूह में आगे रहने वाला, श्रेष्ठ; सानैव = वह नहीं है.
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में वास्तविक लक्ष्मी, विद्या तथा पुत्र के विषय में बताया गया है.
अन्वय: या लक्ष्मीः याचकदुःखहारिणी न (अस्ति) सा (लक्ष्मीः) नैव (अस्ति)। या विद्या अपि अच्युतभक्तिकारिणी न (अस्ति) सा (विद्या) नैव (अस्ति) । यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणीः न (अस्ति) सः (पुत्र) एव न (अस्ति), नैव (अस्ति)।
व्याख्या: जो लक्ष्मी मांगने वालों के दुःखों को दूर नहीं करती, वह असली लक्ष्मी नहीं है। जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति नहीं कराती, वह असली विद्या नहीं है। जो पुत्र पंडितों के समूह में श्रेष्ठ नहीं है, वह असली पुत्र नहीं है। इसका मतलब यह है कि सच्चा धन वही है जो दूसरों की मदद के लिए इस्तेमाल होता है; सच्ची विद्या वही है जिससे आध्यात्मिक ज्ञान मिलता है; और सच्चा पुत्र वही है जो विद्वान होता है, जो परिवार का नाम रोशन करे। सच्चे मायने में ये तीनों ही चीजें महत्वपूर्ण हैं.
In simple words: जो लक्ष्मी दूसरों का दुख दूर नहीं करती, जो विद्या भगवान की भक्ति नहीं सिखाती, और जो पुत्र विद्वानों में श्रेष्ठ नहीं है, वे तीनों बेकार हैं।
🎯 Exam Tip: लक्ष्मी, विद्या और पुत्र की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए बताएं कि प्रत्येक की वास्तविक पहचान क्या है।
Question 9. केयूराः न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः । न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्द्धजाः ॥ [2012]
Answer:
शब्दार्थ: केयूराः = बाजूबन्द (भुजाओं में पहना जाने वाला सोने का आभूषण); हाराः = हार; विभूषयन्ति = सजाते हैं; चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्रमा के समान उज्ज्वल; विलेपनम् = शरीर में किया जाने वाला चन्दन आदि का लेप; कुसुमं = फूल; अलङ्कृताः = सजे हुए; मूर्द्धजाः = बाल; वाण्येका (वाणि + एका) = एकमात्र वाणी; समलङ्करोति = सजाती है; संस्कृता = संस्कार की गई, भली-भाँति अध्ययन आदि के द्वारा शुद्ध की गई; धार्यते = धारण की जाती है; क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं; खलु = निश्चित ही; भूषणानि = समस्त आभूषण; सततं = सदा; वाग्भूषणम् = वाणीरूपी आभूषण; भूषणं = आभूषण.
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में संस्कारयुक्त वाणी के महत्व को बताया गया है.
अन्वय: केयूराः पुरुषं न विभूषयन्ति, चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः न (विभूषयन्ति) । न स्नानं, न विलेपनं, न कुसुमं, न अलङ्कृताः मूर्द्धजाः पुरुषं (विभूषयन्ति) । एकावाणी, या संस्कृता धार्यते, पुरुषं समलङ्करोति । भूषणानि खलु क्षीयन्ते । वाग्भूषणं (वास्तविकं) सततं भूषणम् (अस्ति) ।
व्याख्या: पुरुष को सोने के बाजूबंद, चाँद जैसे चमकीले हार, स्नान, चन्दन का लेप, फूल या सजे हुए बाल सुशोभित नहीं करते हैं। बल्कि एक ही वाणी, जो पढ़ाई और संस्कारों से धारण की जाती है, पुरुष को सुन्दर बनाती है। दूसरे गहने तो निश्चित रूप से समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, लेकिन वाणी रूपी गहना हमेशा बना रहता है। इस प्रकार, वाणी ही सच्चा गहना है जो कभी खत्म नहीं होता, यह व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है.
In simple words: बाजूबंद, हार, स्नान, लेप, फूल या सजे हुए बाल इंसान को सुन्दर नहीं बनाते। केवल संस्कारित वाणी ही असली गहना है जो कभी नष्ट नहीं होता।
🎯 Exam Tip: श्लोक में भौतिक अलंकरणों की तुलना वाणी रूपी आभूषण से करते हुए, वाणी के महत्व को स्पष्ट करें।
सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या
Question 1. भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती । [2011]
Answer:
सन्दर्भ: प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के पद्म-खण्ड 'पद्म-पीयूषम्' के 'सूक्ति-सुधा' नामक पाठ से ली गई है.
प्रसंग: इस सूक्ति में संस्कृत भाषा के महत्व को बताया गया है.
अर्थ: सभी भाषाओं में संस्कृत सबसे प्रमुख, मधुर और अलौकिक है.
व्याख्या: संस्कृत भाषा सभी भाषाओं में सबसे दिव्य, मुख्य और मधुर मानी गई है। इसे देवताओं की भाषा भी कहते हैं। यह भाषा शब्द बनाने की दृष्टि से बहुत दिव्य है, भाषाओं में मधुर है, और संसार की सभी भाषाओं में प्रमुख है। इसमें बहुत अच्छे काव्य, नाटक और चंपू (गद्य-पद्य मिश्रित रचना) मिलते हैं। इस भाषा में धर्म, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा आदि सभी विषयों पर बहुत सारी जानकारी उपलब्ध है। इतनी संपूर्ण भाषा दुनिया में कोई और नहीं है। संस्कृत भाषा सिर्फ एक माध्यम नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक धरोहर भी है.
In simple words: संस्कृत भाषा सभी भाषाओं में सबसे खास, मीठी और दैवीय है।
🎯 Exam Tip: संस्कृत भाषा की विशेषताओं को संक्षेप में बताएं, जैसे कि इसकी दिव्यता, मधुरता और प्रमुखता।
Question 2. भाषासु काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम् । [2005]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में सुभाषित के महत्व को बताया गया है.
अर्थ: संस्कृत भाषा में काव्य मधुर है तथा उससे भी अधिक सुभाषित (सुन्दर वचन) है.
व्याख्या: भाषाओं में संस्कृत भाषा सबसे दिव्य, मुख्य और मधुर है। इससे भी अधिक मधुर इस भाषा के काव्य हैं और काव्यों से भी अधिक मधुर हैं इस भाषा के सुभाषित। सुभाषित का मतलब ऐसी अच्छी बात या कथन है जो बहुत ही अच्छा हो। इसे सूक्ति भी कहते हैं। सूक्तियाँ हर देश और हर समय में सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जैसे सुन्दर वचन बोलने से वक्ता और श्रोता दोनों का ही फायदा होता है, वैसे ही काव्यों में मिली सूक्तियाँ खुशियाँ देने के साथ-साथ जीवन में अच्छे व्यवहार और सामाजिकता भी लाती हैं तथा अमरता की प्राप्ति के लिए प्रेरणा देती हैं। यही कारण है कि (संस्कृत) भाषा में सूक्ति को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है, क्योंकि यह जीवन को सही दिशा देती है.
In simple words: संस्कृत का काव्य मीठा है, पर उसके सुन्दर वचन (सूक्तियाँ) और भी मीठे और प्रभावशाली होते हैं।
🎯 Exam Tip: सुभाषित को काव्य से भी अधिक मधुर क्यों माना गया है, इसके पीछे के कारणों को स्पष्ट करें।
Question 3. पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् । [2006,07, 08, 11, 12, 14] मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञाविधीयते ॥ [2007,08, 11, 15]
Answer:
प्रसंग: इन सूक्तियों में जल, अन्न और अच्छे वचनों को ही सबसे अच्छा रत्न बताया गया है.
अर्थ: पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित ये तीन रत्न हैं। मूर्ख व्यक्ति ही पत्थरों को रत्न मानते हैं.
व्याख्या: इंसान ही नहीं पशु-पक्षी भी अन्न-जल और सुन्दरवाणी के महत्व को अच्छी तरह पहचानते हैं। अन्न से भूख शांत होती है, जल से प्यास बुझती है और सुन्दर वचनों से मन को संतोष मिलता है। अन्न और जल के बिना जीवधारियों का जीवित रहना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव ही है। इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है। संसार के लोग अपनी कम जानकारी के कारण सभी प्रकार से धन इकट्ठा करने में लगे रहते हैं। वे हीरे, रत्न, जवाहरात, मणियों का संग्रह करके धनी और वैभवशाली बनना चाहते हैं। वे इन्हें ही अमूल्य और महत्वपूर्ण मानते हैं, परन्तु असलियत कुछ और ही है। ये तो पत्थर के टुकड़े मात्र हैं। वास्तव में जल, अन्न और सुवाणी (अच्छे वचन) ही सच्चे रत्न हैं, क्योंकि ये सभी के जीवन के लिए मूलभूत आवश्यकताएं हैं और कल्याणकारी हैं.
In simple words: जल, अन्न और अच्छे वचन धरती के तीन असली रत्न हैं। मूर्ख लोग पत्थरों को रत्न मानते हैं।
🎯 Exam Tip: श्लोक के अनुसार पृथ्वी पर वास्तविक रत्नों का उल्लेख करें और बताएं कि मूर्ख लोग किसे रत्न मानते हैं।
Question 4. काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । [2006,07,08, 09, 10, 11, 14, 15]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है.
अर्थ: बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र के पठन-पाठन में ही बीत जाता है.
व्याख्या: विद्वान और सज्जन अपना समय शास्त्रों और काव्यों का अध्ययन करने में लगाते हैं। वे यदि अपना मनोरंजन भी करते हैं तो इसी तरह के अच्छे कामों से करते हैं और हमेशा दूसरों की भलाई सोचते हैं, क्योंकि वे समय के महत्व को जानते हैं। वे समझते हैं कि "जीवन का एक भी पल सोने की करोड़ों मुद्राओं से नहीं खरीदा जा सकता। यदि इसे व्यर्थ बिता दिया गया तो इससे बड़ी हानि और क्या हो सकती है?" इसीलिए वे अपना समय काव्य-शास्त्रों के अध्ययन में बिताते हैं क्योंकि आत्म-उद्धार के लिए भी ज्ञान बहुत आवश्यक है। ज्ञानार्जन से व्यक्ति का मानसिक विकास होता है और उसे संतोष भी मिलता है.
In simple words: समझदार लोग अपना समय काव्य और शास्त्रों का अध्ययन करके मनोरंजन में बिताते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं।
🎯 Exam Tip: बुद्धिमान व्यक्ति समय का उपयोग कैसे करते हैं, और इससे उन्हें क्या लाभ होता है, यह समझाएं।
Question 5. व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रयाकलहेन वा। [2010]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में मूर्ख लोगों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है.
अर्थ: मूर्ख का समय बुरी आदतों, नींद व झगड़ने में बीतता है.
व्याख्या: मूर्ख लोग अपना समय हमेशा बेकार के कामों में बिताते हैं। समय बिताने के लिए वे जुआ, शराब आदि के व्यसन करते हैं और खुद को नर्क में धकेलते हैं। कुछ लोग अपना समय सोकर बिता देते हैं। और कुछ लड़ाई-झगड़े में अपना समय लगाकर दूसरों को पीड़ा पहुंचाते हैं। इनके किसी भी काम से किसी को कोई लाभ या सुख नहीं मिलता है; क्योंकि परोपकार करना इनको आता ही नहीं है। इन्हें तो दूसरों को पीड़ा पहुंचाने में ही सुख मिलता है, जिससे समाज में नकारात्मकता बढ़ती है.
In simple words: मूर्ख लोग अपना समय बुरी आदतों, सोने या लड़ाई-झगड़े में बर्बाद करते हैं, जिससे उन्हें कोई फायदा नहीं होता।
🎯 Exam Tip: मूर्खों द्वारा समय बर्बाद करने के तरीकों को बताएं और उनके नकारात्मक परिणामों पर प्रकाश डालें।
Question 6. श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः । [2012]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों की उपस्थिति का महत्व समझाया गया है.
अर्थ: जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ श्लोक तो यश को प्राप्त करता है.
व्याख्या: सज्जन अच्छी और सुन्दर बातों को बढ़ावा देकर उनके विकास में अपना योगदान देते हैं। इसीलिए सज्जनों के बीच विकसित श्लोक; यानी संस्कृत कविता का छन्द; कवि की कीर्ति या यश को सब जगह फैलाता है। इसका मतलब यह है कि कविता सज्जनों के बीच ही आनंददायक होती है तथा कवि को यश व कीर्ति प्रदान करती है। दुर्जनों के बीच तो यह विवाद पैदा करती है तथा शोक (दुःख) का कारण बनती है। सज्जनों की सकारात्मक ऊर्जा से वातावरण शुद्ध होता है.
In simple words: जहाँ अच्छे लोग रहते हैं, वहाँ श्लोक (अच्छी बात) को सम्मान मिलता है और वह यश फैलाता है।
🎯 Exam Tip: सज्जनों की उपस्थिति कैसे श्लोक को 'श्लोकता' प्रदान करती है, इसे उदाहरण देकर स्पष्ट करें।
Question 2. वसुमतीपतिना नु सरस्वती ।। [2011]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में विद्या के विषय में वर्णन किया गया है.
अर्थ: राजा के द्वारा भी विद्या (नहीं छीनी जा सकती है).
व्याख्या: विद्या को न तो राजा छीन सकता है और न ही कोई बलवान शत्रु उसे जबरदस्ती छीन सकता है। यह विद्या रूपी धन किसी के द्वारा बांटा भी नहीं जा सकता, बल्कि यह तो जितना भी बांटा जाए, उतना ही बढ़ता है। यह धन तो बांटने पर बढ़ता ही रहता है। प्रस्तुत सूक्ति विद्या की महत्ता को बताती है, जो सभी धनों से श्रेष्ठ है क्योंकि यह कभी नष्ट नहीं होती.
In simple words: विद्या एक ऐसा धन है जिसे राजा या शक्तिशाली दुश्मन छीन नहीं सकते।
🎯 Exam Tip: विद्या को अनमोल धन क्यों कहा गया है, इसके गुणों को संक्षेप में बताएं।
Question 8. लक्ष्मीनं या याचकदुःखहारिणी । [2012]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में लक्ष्मी की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है.
अर्थ: जो लक्ष्मी याचक (मांगने वालों) के दुःखों को दूर करने वाली नहीं है, (वह) लक्ष्मी (नहीं है).
व्याख्या: किसी भी व्यक्ति के पास धन है तो उस धन की सार्थकता इसी में है कि वह उससे याचकों यानी मांगने वालों के दुःखों को दूर करे। इसका मतलब यह है कि धनवान होने पर भी कोई व्यक्ति यदि किसी की सहायता करके उसके कष्टों को दूर नहीं करता है तो उसका धन बेकार है। व्यक्ति का धनी होना तभी सार्थक है जब वह याचक बनकर अपने पास आए लोगों को निराश न करके अपनी शक्ति के अनुसार उनकी सहायता करे। धन का उपयोग परोपकार में होना चाहिए, तभी उसका सही मूल्य है.
In simple words: जो धन मांगने वालों के दुख दूर नहीं करता, वह असली लक्ष्मी नहीं है।
🎯 Exam Tip: लक्ष्मी की वास्तविक सार्थकता क्या है, इसे श्लोक के आधार पर समझाएं।
Question 9. विद्या न याऽप्यच्युतभक्तिकारिणी ।। [2008, 1]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में विद्या की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है.
अर्थ: जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में प्रवृत्त करने वाली नहीं है, (वह विद्या नहीं है).
व्याख्या: वही विद्या सार्थक है, जो व्यक्ति को भगवान विष्णु यानी ईश्वर की भक्ति में लगाती है। जो विद्या व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति से दूर रखती है, वह किसी भी तरह से विद्या कहलाने के योग्य नहीं है। विद्या वही है, जो व्यक्ति को जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त करके मोक्ष-पद प्रदान करे। मोक्ष-पद को भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति को भक्ति में विद्या ही लगा सकती है। इसीलिए विद्या देने वाले गुरु को कबीरदास जी ने ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है। विद्या का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को आध्यात्मिक शांति और मुक्ति दिलाना है.
In simple words: जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में नहीं लगाती, वह सच्ची विद्या नहीं है।
🎯 Exam Tip: विद्या की सार्थकता को भक्ति से जोड़कर बताएं और श्लोक के केंद्रीय विचार को स्पष्ट करें।
Question 10. पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः । [2006,09]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में सच्चे पुत्र की विशेषता बताई गई है.
अर्थ: जो पुत्र विद्वानों की मंडली में अग्रणी नहीं, वह पुत्र ही नहीं है.
व्याख्या: सूक्तिकार का मतलब यह है कि हर व्यक्ति पुत्र की इच्छा इसलिए करता है कि वह उसके कुल के नाम को आगे बढ़ाए; यानी अपने अच्छे कामों से अपने कुल के यश में वृद्धि करे और यह काम महान पुत्र ही कर सकता है। मूर्ख पुत्र के होने का कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि उससे कुल के यश में वृद्धि नहीं होती। ऐसा पुत्र होने से तो संतानहीन रहना ही बेहतर है। दरअसल, पुत्र कहलाने का हकदार वही है, जो विद्वानों की सभा में अपनी बुद्धिमत्ता का लोहा मनवाकर अपने माता-पिता तथा कुल के सम्मान को बढ़ाता है। एक अच्छा पुत्र परिवार का गौरव होता है.
In simple words: जो पुत्र विद्वानों में सबसे आगे नहीं है, वह सच्चा पुत्र नहीं है। पुत्र को ज्ञानी और सम्मानजनक होना चाहिए।
🎯 Exam Tip: एक सच्चे पुत्र के गुणों को श्लोक के अनुसार स्पष्ट करें और बताएं कि उसका महत्व क्या है।
Question 11. वाण्येको समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते [2006, 11]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में वाणी को ही वास्तविक आभूषण कहा गया है.
अर्थ: केवल वाणी ही, जो शुद्ध रूप से धारण की जाती है, मनुष्य को सुन्दर बनाती है.
व्याख्या: संसार का हर प्राणी भौतिक चीजों में उलझा रहता है और उन्हीं भौतिक सुखों का अनुभव करता है। इसीलिए वह अपने आपको सजाकर रखना चाहता है और दूसरों के सामने खुद को आकर्षक दिखाना चाहता है, यानी आत्मा की बजाय शरीर को ज्यादा महत्व देता है। वह कई तरह के गहने पहनता है, परन्तु ऐसे गहने तो समय बीतने के साथ-साथ नष्ट हो जाते हैं। सच्चा गहना तो मीठी वाणी है, जो कभी नष्ट नहीं होती। मीठी वाणी इंसान का ऐसा गुण है, जिसके कारण उसकी सुन्दरता तो बढ़ती ही है, साथ ही वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा भी पाता है तथा इससे उसे आत्मिक आनंद भी मिलता है। वाणी का प्रभाव हमेशा बना रहता है.
In simple words: केवल संस्कारित और शुद्ध वाणी ही इंसान को सचमुच सुन्दर बनाती है, अन्य गहने समय के साथ नष्ट हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: वाणी को वास्तविक आभूषण क्यों कहा गया है, इसके कारणों को स्पष्ट करें।
Question 12. क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009, 12, 13] वाग्भूषणं भूषणम् ।। [2007,08,09, 10, 12]
Answer:
प्रसंग: प्रस्तुत सूक्ति में सुसंस्कारित वाणी को ही मनुष्य का एकमात्र आभूषण बताया गया है.
अर्थ: सभी आभूषण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, सच्चा आभूषण वाणी ही है.
व्याख्या: मनुष्य अपनी सुन्दरता को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के गहनों और सुगंधित द्रव्यों का उपयोग करता है। ये गहने और सुगंधित द्रव्य तो नष्ट हो जाने वाले हैं; इसलिए बहुत समय तक मनुष्य की सुन्दरता को बढ़ाने में असमर्थ होते हैं। मनुष्य की संस्कारित मधुर वाणी हमेशा उसे सुन्दर बनाए रखती है; क्योंकि वह हमेशा मनुष्य के साथ रहती है, वह कभी नष्ट नहीं होती। उसका प्रभाव तो मनुष्य के मरने के बाद भी बना रहता है। मनुष्य अपनी प्रभावशाली वाणी से ही दुष्टों और अपराधियों को भी बुराई से अच्छाई के मार्ग पर ले जाता है; इसलिए वाणी ही सच्चा आभूषण है। वाणी एक ऐसा धन है जिसे कोई छीन नहीं सकता और जो समय के साथ और भी बढ़ती है.
In simple words: सभी भौतिक गहने समय के साथ खत्म हो जाते हैं, लेकिन वाणी रूपी आभूषण ही सच्चा और स्थायी गहना है।
🎯 Exam Tip: वाणी रूपी आभूषण को अन्य आभूषणों से श्रेष्ठ क्यों माना गया है, इसके तर्कों को प्रस्तुत करें।
श्लोक का संस्कृत-अर्थ
Question 1. भाषासु मुख्या ................................. तस्मादपि सुभाषितम् ॥ (श्लोक 1) [2009, 10, 14, 15]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु श्रेष्ठतमा अस्ति । इयं भाषा अलौकिकी मधुरा गुणयुक्ता च अस्ति। तस्मात् हि तस्याः काव्यं मधुरम् अस्ति । तस्मात् अपि रम्यं मधुरं च तस्याः सुभाषितम् अस्ति । अस्मात् कारणात् इयं गीर्वाणभारती कथ्यते । संस्कृतभाषा सर्वोत्तमा भाषा अस्ति, यस्याः अध्ययनं सर्वदा महत्त्वपूर्णम् अस्ति.
In simple words: कविः वदति यत् संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु उत्तमा अस्ति, यतः तस्याः काव्यं मधुरं सुभाषिते च अति मधुरं भवति।
🎯 Exam Tip: श्लोकस्य संस्कृतार्थं स्पष्टतया लिखत, संस्कृतभाषायाः मुख्यगुणान् च वर्णयत।
Question 2. पृथिव्यां त्रीणि ................................. रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ (श्लोक 2) [2006, 09, 14]
Answer:
संस्कृतार्थ: कविः कथयति-भूतले जलम् अन्नं सुभाषितं च इति त्रीणि रत्नानि सन्ति । मूर्खाः पाषाणखण्डेषु रत्नस्य संज्ञां विधीयते । वस्तुतः जलम् अन्नं सुभाषितञ्च अखिलस्य विश्वस्य कल्याणार्थं भवन्ति । एतानि रत्नानि मानवानां जीवनस्य आधारभूतानि सन्ति.
In simple words: कविः वदति यत् भूमौ जलम्, अन्नम्, सुभाषितं च त्रीणि रत्नानि सन्ति, मूढाः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञां यच्छन्ति।
🎯 Exam Tip: पृथिव्यां वास्तविकरत्नानि कानि सन्ति, मूर्खाः किं रत्नानि मन्यन्ते इति स्पष्टं कुर्वन्तु।
Question 3. काव्यशास्त्रविनोदेन ................................. निद्रया कलहेन वा ॥ (श्लोक 3) [2008, 10, 12, 13, 14, 15]
Answer:
संस्कृतार्थ: कविः मूर्खाणां बुद्धिमतां च समययापनस्य अन्तरं वर्णयति यत् बुद्धिमन्तः जनाः स्वसमयं काव्यशास्त्राणां पठनेन यापयन्ति, एतद् विपरीतं मूर्खाः जनाः स्वसमयं दुराचारेण, शयनेन, विवादेन वा यापयन्ति । बुद्धिमन्तः जनाः ज्ञानार्जनेन स्वजीवनं सार्थकं कुर्वन्ति, मूर्खाः तु व्यर्थं समयं क्षयन्ति.
In simple words: कविः वदति यत् बुद्धिमन्तः काव्यशास्त्रेण समयं यापयन्ति, मूर्खाः व्यसनेन, निद्रया, कलहेन च।
🎯 Exam Tip: बुद्धिमतां मूर्खाणां च समययापनस्य भेदं श्लोकानुसारेण विशदयत।
Question 4. श्लोकस्तु श्लोंकता ................................. “यत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥ (श्लोक 4) [2006, 08, 15]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-यत्र सज्जनाः निवसन्ति, तत्र श्लोकः तु कीर्तिं याति । यत्र दुर्जनाः निवसन्ति, तत्र श्लोकस्य लकारः लुप्यते । एवं श्लोकः शोकं भवति । सदुपदेशैः सज्जनाः प्रभाविताः भवन्ति, दुर्जनाः न भवन्ति इति भावः । सज्जनेषु श्लोकः शोभां वर्धयति, दुर्जनेषु तु शोकं जनयति.
In simple words: कविः वदति यत् यत्र सज्जनाः सन्ति, तत्र श्लोकः श्लोकतां प्राप्नोति, यत्र दुर्जनाः सन्ति, तत्र 'ल' वर्णस्य लोपेन शोकः भवति।
🎯 Exam Tip: सज्जनानां दुर्जनानां च संगतिप्रभावं श्लोकस्य सन्दर्भेण वर्णयत।
Question 5. अप्राप्तकालं वचनं ................................. अपमानञ्च शाश्वतम् ॥ (श्लोक 5) [2009]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके कविः कथयति यत् बृहस्पतिः अपि असामयिकं वचनं ब्रुवन् बुद्धेः अधोगतिं शाश्वतम् अपमानञ्च प्राप्नोति । अतएव असामयिकं वचनं कदापि न ब्रूयात् ।। समये उचितं वचनमेव वक्तव्यम्, अन्यथा प्रतिष्ठा हानिश्च जायते.
In simple words: कविः वदति यत् समये विपरीतं वचनं वदन् बृहस्पतिः अपि अपमानं बुद्धेः तिरस्कारं च प्राप्नोति।
🎯 Exam Tip: असामयिकवचनस्य दुष्परिणामान् बृहस्पतिदृष्टान्तेन स्पष्टं कुर्वन्तु।
Question 6. वाच्यं श्रद्धासमेतस्य ................................. रुदितोपमम् ॥ (श्लोक 6) [2011]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-श्रद्धायुक्तस्य पुरुषस्य पृच्छतः सन् विशेषरूपेण वक्तव्यम्। श्रद्धाहीनस्य पुरुषस्य प्रोक्तं वचनम् अरण्ये रुदितम् इव भवति । यः श्रद्धालुः जिज्ञासुः च भवति, तस्मै एव ज्ञानं दातव्यम् इति आशयः। ज्ञानं श्रद्धावद्भ्यः एव सार्थकं भवति.
In simple words: कविः वदति यत् श्रद्धायुक्तस्य पृच्छतः पुरुषस्य वचनं सार्थकं भवति, श्रद्धाहीनस्य तु अरण्यरुदिततुल्यं व्यर्थं भवति।
🎯 Exam Tip: श्रद्धायाः महत्वं ज्ञानग्रहणे कथं भवति इति श्लोकानुसारेण स्पष्टं कुर्वन्तु।
Question 7. वसुमतिपतिना नु ................................. बुधैरपि सेव्यते ॥ (श्लोक 7) [2010]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके सरस्वत्याः विशेषता वर्णिता अस्ति। सरस्वती राज्ञा तथा बलवता रिपुणा न नेतुं शक्यते न च भ्रातृबन्धुभिः विभक्तुं शक्यते अपितु विद्वद्भिः सेव्यते । विद्या धनं सर्वोत्कृष्टं धनमस्ति, यतो हि तत् नश्यति न वा ह्रियते.
In simple words: कविः वदति यत् विद्या राजा वा शत्रुणा न ह्रियते, भ्रातृभिः न विभज्यते, किन्तु विद्वद्भिः सेव्यते।
🎯 Exam Tip: विद्याधनस्य श्रेष्ठतां अन्यधनानां तुलनया प्रदर्श्यत।
Question 8. लक्ष्मीनं या ................................. स नैव नैव ॥ (श्लोक 8) [2007]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-या लक्ष्मी याचकदुःखहारिणी न भवति, सा लक्ष्मीति कथितुं न शक्यते । या विद्या विष्णुभक्तिकारिणी न भवति सापि विद्या कथितुं न शक्यते । यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणीः न भवति सः पुत्रः कथितुं न शक्यते।। वास्तविकं धनं परोपकाराय भवति, विद्या आध्यात्मिकज्ञानाय भवति, पुत्रश्च विद्वान् भवति.
In simple words: कविः वदति यत् या लक्ष्मी याचकानां दुःखं न हरति, या विद्या विष्णुभक्तिं न जनयति, यः पुत्रः पण्डितेषु अग्रणीः न भवति, ते त्रयः अपि व्यर्थाः सन्ति।
🎯 Exam Tip: लक्ष्मी, विद्या, पुत्र एतेषां सार्थकतायाः वास्तविकं स्वरूपं श्लोकानुसारेण विवेचयत।
Question 9. केयूराः न विभूषयन्ति ................................. वाग्भूषण भूषणं ॥ (श्लोक 9) [2002]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिनु श्लोके वाणीम् एव सर्वश्रेष्ठं भूषणं कथितम् अस्ति । कर्णाभूषणानि चन्द्रोपमः रमणीयः हारः स्नान-विलेपनादि पुष्पाणि विभूषिता मूर्द्धजाः पुरुषं न भूषयन्ति परन्तु संस्कृता वाणी एव (या अमृतोपमा मधुरावाणी) सा एव वास्तविकम् आभूषणम् । अन्यानि आभूषणानि कालक्रमेण क्षीयन्ते परन्तु वाग्भूषणं कदापि न क्षीयते । वाणी एव पुरुषस्य शोभां वर्धयति, यतः सा शाश्वती भवति.
In simple words: कविः वदति यत् भुजाभूषणानि, हाराः, स्नानम्, विलेपनम्, पुष्पाणि वा मूर्धजाः पुरुषं न भूषयन्ति, परन्तु संस्कृता वाणी एव वास्तविकं भूषणम् अस्ति यत् कदापि न विनश्यति।
🎯 Exam Tip: पुरुषस्य वास्तविकं भूषणं किम् अस्ति, अन्यभूषणानि च कथं नश्वराणि इति श्लोकानुसारेण स्पष्टं कुर्वन्तु।
Question 9. केयूराः न विभूषयन्ति ................................. नालङ्कृता मूर्द्धजाः ॥ [2005]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिनु श्लोके वाणीम् एव सर्वश्रेष्ठं भूषणं कथितम् अस्ति । कर्णाभूषणानि चन्द्रोपमः रमणीयः हारः स्नान-विलेपनादि पुष्पाणि विभूषिता मूर्द्धजाः पुरुषं न भूषयन्ति परन्तु संस्कृता वाणी एव (या अमृतोपमा मधुरावाणी) सा एव वास्तविकम् आभूषणम् । अन्यानि आभूषणानि कालक्रमेण क्षीयन्ते परन्तु वाग्भूषणं कदापि न क्षीयते । वाणी एव पुरुषस्य शोभां वर्धयति, यतः सा शाश्वती भवति.
In simple words: कविः वदति यत् केयूराः, हाराः, स्नानम्, विलेपनम्, पुष्पाणि वा अलङ्कृताः मूर्धजाः पुरुषं न भूषयन्ति, किन्तु संस्कृता वाणी एव सर्वोत्तमं भूषणम् अस्ति।
🎯 Exam Tip: श्लोकस्य अर्थं स्पष्टं कुर्वन्तु यत् भौतिकानि आभूषणानि कथं नश्वराणि सन्ति, वाणी च कथं शाश्वती अस्ति।
Question 10. वाण्येका समलङ्करोति ................................. वाग्भूषण भूषणम् ॥ (श्लोक 9) [2007]
Answer:
संस्कृतार्थ: अस्मिन् श्लोकाद्धे कविः कथयति–अस्मिन् संसारे एकावाणी, या अध्ययनेन विनयेन च संस्कृता धार्यते, सर्वोत्तमं भूषणं अस्ति । सा पुरुषं विभूषयति । अन्यानि भूषणानि खलु नश्वराणि भवन्ति । वाग्भूषणं वास्तविकं भूषणम् अस्ति, यत् कदापि न विनश्यति ।। सा वाणी पुरुषस्य सम्मानं प्रतिष्ठां च वर्धयति.
In simple words: कविः वदति यत् लोके संस्कृता वाणी एव सर्वोत्तमं भूषणं अस्ति, यतो हि सा पुरुषं विभूषयति अन्यभूषणानि तु नश्वराणि।
🎯 Exam Tip: वाणी कथं पुरुषस्य शोभां वर्धयति, अन्यभूषणेभ्यः च कथं भिद्यते इति स्पष्टं कुर्वन्तु।
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