UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 11 Jivanam Nihitam Vane

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Class 10 Sanskrit Chapter 11 जीवनं निहितं वने UP Board Solutions PDF

परिचय

भारत के लोग वनों का हमेशा से आदर करते रहे हैं। पुराने समय में ऋषि-मुनि वनों में ही अपने आश्रम बनाकर रहते थे। वैदिक धर्म में चार आश्रमों में से तीसरा आश्रम, वानप्रस्थाश्रम, वनों से जुड़ा हुआ है। वैदिक साहित्य का एक हिस्सा 'आरण्यक्' ग्रंथ हैं। इन्हें अरण्य (जंगल) में लिखे जाने के कारण यह नाम मिला। वनों का ऐतिहासिक, आध्यात्मिक महत्व होने के साथ-साथ भौतिक महत्व भी है। वनों से हमें लकड़ी, दवाइयाँ और कई अन्य ज़रूरी चीजें मिलती हैं। वनों की बहुत ज्यादा कटाई से आज हवा खराब हो गई है, बारिश कम हो रही है, गर्मी बढ़ रही है और ज़मीन के नीचे पानी का स्तर घटता जा रहा है। इसलिए जीवन को ठीक से चलाने, पर्यावरण को बचाने और जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए यह ज़रूरी है कि वनों की अंधाधुंध कटाई रोकी जाए। जो पेड़ काटे गए हैं, उनकी जगह नए पौधे लगाए जाने चाहिए। इस पाठ में इन सभी बातों पर ध्यान देकर जीवन में वनों की अहमियत समझाई गई है।

पाठ-सारांश

वनों का महत्व 'वन' शब्द सुनते ही मन में कुछ डर और आदर पैदा होता है। डर इसलिए लगता है क्योंकि वन में शेर, बाघ जैसे खूंखार जानवर और अजगर जैसे साँप रहते हैं। वन इतने सुनसान होते हैं कि मुसीबत में पड़ा इंसान का रोना भी वहीं खो जाता है। आदर इसलिए होता है क्योंकि हमारे भौतिक और सांस्कृतिक विकास में वनों का बहुत बड़ा योगदान है। ब्रह्म विद्या की बात करने वाले उपनिषद जैसे ग्रंथ वनों में ही बने। तपोवनों में दस लक्षणों वाला मानव धर्म और जीवन के चार पुरुषार्थ यहीं पर प्रकट हुए। इसलिए प्राचीन काल में लोगों ने वनों के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की। वन मनुष्य को सीधे तौर पर जितना देते हैं, उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष रूप से देते हैं। यही कारण है कि पुराने समय के लोग पेड़ों को अपने बच्चों की तरह पालते थे और जंगली जीवों की रक्षा करते थे। वे जानते थे कि प्रकृति का संतुलन बनाए रखना बहुत ज़रूरी है।

वनों की रक्षा के प्रयास

लालची इंसान अपने थोड़े से फायदे के लिए वनों को लगातार काट रहा है, जिससे उसके अपने जीवन के लिए भी खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि जीवन भोजन पर निर्भर करता है। भोजन खेती से मिलता है और खेती के लिए अच्छा माहौल बनाने के लिए वनों की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है। यही कारण है कि आजकल दुनिया के सभी देश वनों की रक्षा करने में लगे हैं। भारत में भी सरकार लोगों को वन-संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चला रही है और वन-महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। इनके ज़रिए लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाने के लिए बढ़ावा दिया जाता है। इस तरह, हर व्यक्ति का योगदान पर्यावरण की सुरक्षा में बहुत महत्वपूर्ण है।

वनों के प्रकार

वनों की रचना पेड़-पौधों और जानवरों से होती है, जिनमें पक्षी भी शामिल हैं। मनुष्य को इन दोनों से ही बहुत फायदे मिलते हैं। पेड़ों से हमें फल, फूल, ईंधन और घर बनाने के लिए लकड़ी मिलती है। जैतून का तेल और अन्य तरल पदार्थ जैसे उपयोगी उत्पाद भी पौधों से ही मिलते हैं। आजकल कपड़े बनाने वाले धागे भी खास तरह के पेड़ों की लकड़ी से बनते हैं। पेड़ों की शाखाओं से संदूक और घरेलू चीजें बनती हैं। रस्सी और चटाइयाँ भी पौधों से ही बनाई जाती हैं। इस तरह, पेड़-पौधों को बिना सोचे-समझे काटना बहुत बड़ा पाप है। अगर किसी खास हालत में पेड़ काटने भी पड़ें, तो उनकी कमी पूरी करने के लिए और पेड़ लगाने चाहिए। हरे पेड़ों को काटने से रोकना चाहिए। वन हवा को साफ करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और बारिश लाने में मदद करके इंसानों की भलाई करते हैं। ये प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

पशु-पक्षियों की रक्षा

पेड़ों को काटने की तरह ही इंसानों ने जंगली जानवरों का भी बहुत नुकसान किया है। खाल, दाँत, पंख के लालच में इंसानों ने इतने सारे पशु-पक्षियों को मार दिया कि उनकी कई जातियाँ या तो खत्म हो चुकी हैं या खत्म होने वाली हैं। वे शेर, बाघ जैसे हिंसक जानवरों को ही नहीं, बल्कि हिरण जैसे सीधे-सादे, सुंदर पशुओं को भी मारने लगे हैं। हिंसक जानवर भी प्रकृति का संतुलन बनाए रखकर इंसान की बहुत मदद करते हैं। पक्षी खेती को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को खाते हैं, जैसे तीतर दीमकों को खाते हैं। शेर जैसे जानवर अन्य पशुओं को मारकर उनकी संख्या बढ़ने से रोकते हैं। इसलिए इंसानों को जंगली जानवरों और पशु-पक्षियों की रक्षा करनी चाहिए। यह हमारी धरती के लिए बहुत ज़रूरी है।

भारत में पक्षियों की लगभग साढ़े बारह सौ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। वे मौसम बदलने, प्रजनन और भोजन की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और फिर वापस आ जाते हैं। ठंड के मौसम में साइबेरिया से हज़ारों पक्षी भरतपुर के पास घाना पक्षी विहार में आते हैं। पक्षियों की दोस्ती, उनका आपसी प्यार, काम करने का तरीका, भोजन ढूँढने के तरीके, घोंसले बनाना और मुसीबत में अपनी रक्षा करना—ये सब इंसानों के लिए सीखने लायक बातें हैं। इनके व्यवहार से हमें जीवन के कई मूल्य सीखने को मिलते हैं।

विश्नोई जाति द्वारा वृक्षों का संरक्षण

हमारे देश में सलीम अली नाम के एक महान पक्षी-वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने पक्षी विज्ञान पर कई किताबें लिखी हैं। हरियाणा और राजस्थान में विश्नोई समुदाय के लोग अपनी जान देकर भी पशु-पक्षियों और हरे पेड़ों की रक्षा करते हैं। वृक्षों को न काटने देने और उनका संरक्षण करने में इस जाति के लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। जोधपुर नरेश की आज्ञा से पेड़ काटे जाने पर 300 विश्नोई स्त्री-पुरुषों ने अपनी जान दे दी थी। उन्होंने पेड़ों को गले लगाकर कहा था कि पहले हमें काटो, फिर पेड़ों को। हमें भी वृक्षों के संरक्षण के लिए ऐसा ही उदाहरण पेश करना चाहिए।

वनों से ग्राह्य लाभ

वनों से जो लाभ मिल सकते हैं, उन्हें ज़रूर लेना चाहिए। योजना बनाकर ही पुराने पेड़ों को काटना चाहिए और उनसे दुगुने नए पेड़ पहले ही लगा देने चाहिए। घरों के आँगनों में, खेतों की सीमाओं पर, पहाड़ों की तलहटियों में, खेल के मैदान के चारों ओर और रास्तों के दोनों ओर जहाँ भी जगह मिले, पेड़ लगाने चाहिए। यह काम योजनाबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए। जन्म, मृत्यु और शादी जैसे अवसरों पर भी पेड़ लगाए जाने चाहिए। अगर योजना बनाकर उत्साह से पेड़ लगाए जाएँ और उनकी देखभाल की जाए, तो अभी भी नुकसान की भरपाई हो सकती है। वन-संरक्षण के लिए हमें 'वन से जीवन की रक्षा करो, जीवन से वन की रक्षा करो' के आदर्श का पालन करना चाहिए। यह प्रकृति के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

वनमिति शब्दः श्रुतमात्र एव कमपि दरमादरं वा मनसि कुरुते । तत्र सिंहव्याघ्रादयो भयानका हिंस्रकाः पशवोऽजगरादयो विशालाश्च सरीसृपाः वसन्ति, निर्जनता तु तादृशी यत्तच्छायायामापदि निपतितस्य जनस्य आर्तः स्वरो मानवकणें प्रविशेदिति घुणाक्षरीयैव सम्भावना, प्रायशस्तु स वनगहन एव विलीयेतेति नियतिः । एतां स्थितिमेव विबोध्य संस्कृते मनीषिभिररण्यरोदनन्याय उद्भावितः । सत्यमेव स्थितिमेतामनुस्मृत्यापि भिया वपुष्येकपदे एव रोमाञ्चो जायते। परन्त्वस्माकं न केवलं भौतिके प्रत्युत सांस्कृतिकेऽपि विकासे वनानां सुमहान् दायो यत आरण्यकोपनिषदादयः पराविद्द्याविवेचका ग्रन्थाः वनेष्वेवाविर्भूताः । वनस्थेषु तपोवनेष्वेव दशलक्षणात्मको मानवधर्मश्चतुष्टयात्मकं जीवनोद्देश्यं च उत्क्रान्तमितीतिहासः सुतरां प्रमाणयति तस्मात् वनेष्वस्माकमादरोऽपि भवति । प्राक्तनैस्तु वनं विना जीवनमेव न परिकल्पितम्। संस्कृतकवीनां वनदेवताकल्पना वानप्रस्थाश्रमे च वननिवासविधानं तदेव सङ्केतयति । एतदपि बोध्यं यत् प्रत्यक्षतो वनानि मनुजजात्यै यावद् ददति परोक्षतस्तु ततोऽप्यधिकम्, तस्मादेव कारणात् प्राञ्चः स्वपुत्रकानिव पादपान् पालयन्ति स्म जन्तूञ्च रक्षन्ति स्म, अजर्यं तेषां तैः सङ्गतमासीत् ।

शब्दार्थ श्रुतमात्र एव = सुनते ही, दरम् = भय, आदरम् = आदर, हिंस्रकाः = हिंसा करने वाले, सरीसृपाः = सर्प आदि रेंगने वाले जन्तु, तादृशी = उसी प्रकार की, यत्तच्छायायामापदि (यत् + तत् + छायायाम् + आपदि) = कि उसकी छाया में आपत्ति में, घुणाक्षरीयः = घुणाक्षर न्याय से, संयोग से, अकस्मात्, विलीयेत = नष्ट हो जाये, नियतिः = भाग्य, विबोध्य = जानकर, अरण्यरोदनन्यायः = वन में रुदन करने की कहावत, उद्भावितः = कल्पना की है, वपुष्येकपदे (वपुषि + एकपदे) = शरीर में एक साथ, दायः = योगदान आरण्यकोपनिषदादयः = आरण्यक उपनिषद् आदि, पराविद्या = आध्यात्मिक विद्या, वनेष्वेवाविर्भूताः (वनेषु + एव + आविर्भूताः) = वन में ही प्रकट हुए हैं, वनस्थेषु = वनों में स्थिता, तपोवनेष्वेव = तपोवनों में ही, उत्क्रान्तम् = प्रकट हुआ, प्राक्तनैः = प्राचीन विद्वानों के द्वारा, वननिवासविधानम् = वन में निवास करने का नियम्, बोध्यम् = जानना चाहिए, मनुजजात्यै = मनुष्य जाति के लिए यावद् ददति = जितना देते हैं, परोक्षतस्तु = अप्रत्यक्ष रूप से तो, प्राञ्चः = प्राचीन पुरुष, अजय॑म् = अटूट, कम न होने वाला, सङ्गतमासीत् = सम्बन्ध था ।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के गद्य-खण्ड 'गदा-भारती' में संगृहीत 'जीवनं निहितं वने' शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा । ]

प्रसंग इस गद्यावतरण में वनों की भयंकरता तथा आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया गया है।

अनुवाद 'वन' शब्द सिर्फ सुनने भर से ही मन में कुछ डर और आदर पैदा करता है। वहाँ शेर, बाघ जैसे भयानक हिंसक जानवर और अजगर जैसे विशाल साँप (रेंगने वाले विषैले जीव) रहते हैं। वहाँ इतनी शांति होती है कि अगर कोई इंसान मुसीबत में पड़कर रोए, तो उसकी आवाज़ शायद ही किसी मानव के कान तक पहुँचे, यह तो बस इत्तफाक से ही मुमकिन है; अक्सर तो वह (दर्द भरी आवाज़) वन की गहराई में खुद ही समा जाती है। इस हालत को समझकर संस्कृत के विद्वानों ने 'अरण्यरोदन' न्याय (जंगल में रोना) की कल्पना की है। सचमुच, इस हालत को याद करके भी डर से शरीर में तुरंत रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन हमारे सिर्फ भौतिक विकास में ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विकास में भी वनों का बहुत बड़ा योगदान है; क्योंकि आरण्यक और उपनिषद जैसे आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित ग्रंथ वनों में ही रचे गए। वनों में स्थित तपोवन में ही दस लक्षणों वाला मानव धर्म और चार पुरुषार्थों से भरा जीवन का उद्देश्य प्रकट हुआ, यह इतिहास अच्छी तरह साबित करता है। इसी कारण से हम वनों का आदर भी करते हैं। पुराने विद्वानों ने वन के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की थी। संस्कृत कवियों की वन-देवता की कल्पना और वानप्रस्थ आश्रम में वन में रहने का नियम इसी बात की ओर इशारा करते हैं। यह भी समझना चाहिए कि वन मनुष्य जाति को जितना सीधे तौर पर देते हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रत्यक्ष रूप से देते हैं। इसी वजह से पुराने लोग पेड़ों को अपने बच्चों की तरह पालते थे और वन के जीवों की रक्षा करते थे। उनके साथ उनका अटूट रिश्ता था, जो प्रकृति के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है।

(2)

किन्तु हन्त ! निरन्तरविवर्धितसङ्ख्यो विवृद्धलोभो मानवस्तात्कालिकाल्पलाभहेतोर्विचारमूढतया वनानि तथा अचीकृन्तत् चङकृन्तति च यत्तस्य निजजीवनस्यैव नैकधा भीरुपस्थिता, जानात्येव लोको यज्जीवनमन्नमयम्, अन्नं च कृष्योत्पाद्यम्, कृषिविकासार्थ समुचितं वातावरणं घटयितुं प्राकृतिकं सामञ्जस्यं च रक्षितुं वनानामद्यत्वे यादृश्यावश्यकता न तादृशी क्वापि पुराऽन्वभूयत् । यतोऽहर्निशं विद्यमानानां वनानां तावानेवांशोऽवशिष्टः यावान् भारतभूभागस्य प्रतिशतं केवलमेकादशमंशमावृणोति, तत्राप्युत्कृष्टवनानि तु प्रतिशतं चतुरंशात्मकान्येव । भद्रमिदं यदधुना विश्वस्य सर्वेष्वपि राष्ट्रेषु वनानां रक्षार्थ प्रयासाः क्रियन्ते । भारतेऽपि सर्वकारेण तदर्थं जनं प्रबोधयितुमेकमान्दोलनमेव चालितं यदधीनं समये-समये नैकत्र वनमहोत्सवा आयोज्यन्ते, व्यक्तयः सार्वजनीनाः संस्थाश्चापि वृक्षान् रोपयितुं प्रोत्साह्यन्ते ।

शब्दार्थ निरन्तरविवर्धितसङ्ख्यः = लगातार बढ़ती हुई संख्या वाला, मानवस्तात्कालिकालाभहेतोर्विचारमूढतया = मनुष्य ने तुरंत होने वाले थोड़े लाभ के कारण विचारहीनता से, अचीकृन्तत् = काट डाला, कृन्तति = काट रहा है, नैकधा (न + एकधा) = अनेक प्रकार से, भीः = भय, कृष्योत्पाद्यम् = खेती (कृषि) के कारण उत्पन्न होने वाला, घटयितुम् = जुटाने (बनाने के लिए), सामञ्जस्यम् = संतुलन, तालमेल, पुरा = पहले, अन्वभूयत् = अनुभव की गयी, अहर्निशम् = रात-दिन, तावानेवांशोऽवशिष्टः (तावान् + एव + अंशः + अवशिष्टः) = उतना ही भाग बचा है, आवृणोति = ढकता है, तत्रापि = उनमें भी, चतुरंशात्मकान्येव = चार भाग ही है, सर्वकारेण = सरकार ने, प्रबोधयितुम् = जाग्रत करने के लिए, नैकत्र = अनेक स्थानों पर, आयोज्यन्ते = आयोजित किये जाते हैं, प्रोत्साह्यन्ते = प्रोत्साहित किये जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में अल्प लाभ के लिए स्वार्थी मनुष्य के द्वारा वनों के काटे जाने और सरकार द्वारा वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किये जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद लेकिन दुख की बात है कि लगातार बढ़ती हुई आबादी और बढ़े हुए लालच वाले इंसान ने थोड़े से फायदे के लिए बिना सोचे समझे वनों को इतना काट डाला है और अब भी काट रहा है कि उसके खुद के जीवन पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। दुनिया जानती है कि जीवन भोजन पर निर्भर है और भोजन खेती से मिलता है। खेती के विकास के लिए सही माहौल बनाने और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए आज वनों की जैसी ज़रूरत है, वैसी पहले कभी महसूस नहीं की गई; क्योंकि दिन-रात मौजूद वनों का उतना ही हिस्सा बचा है, जितना भारत की ज़मीन का केवल 11 प्रतिशत भाग ढक पाता है। उनमें भी अच्छे वन तो केवल चौथाई प्रतिशत ही हैं। यह अच्छी बात है कि अब दुनिया के सभी देश वनों की रक्षा के लिए कोशिश कर रहे हैं। भारत में भी सरकार ने लोगों को जागरूक करने के लिए एक आंदोलन चला रखा है, जिसके तहत समय-समय पर कई जगहों पर वन-महोत्सव आयोजित किए जाते हैं। व्यक्तियों और सरकारी संस्थाओं को भी पेड़ लगाने के लिए बढ़ावा दिया जाता है। इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।

(3)

वनसङ्घटकास्तावद् द्विविधा वनस्पतयः सविहगा जन्तवश्च । उभयस्मादपि मानवस्य लाभस्तद् द्वयमपि च यथायोग्यं रक्षणीयम् । वृक्षेभ्यो न केवलं फलानि, पुष्पाणि, इन्धनार्माणि भवनयोग्यानि च काष्ठानि, अपितु भैषज्यसमुचितानि नानाप्रकाराणि वल्कलमूलपत्रादीनि वस्तून्यपि लभ्यन्ते, नानाविधौद्योगिकोत्पादनसमुचितानि जतूनि, तैलानि तदितरद्रवपदार्थाश्चापि प्राप्यन्ते । स्वास्थ्यकरं मधुरं सुस्वादु औषधभोजनं मधु अपि वनपतिभ्यः एवोपलभ्यते। कर्गदस्येव नाइलोन इति प्रसिद्धस्य उत्तमपटनिर्मितिप्रयुक्तस्य सूत्रस्योत्पादनेऽपि वृक्षविशेषाणां काष्ठमुपादानं जायते । तेषां शाखानामुपयोगो मञ्जूषापेटिकादिनिर्माण क्रियते । रज्जवः कटाश्चापि वानस्पतिकमुत्पादनमिति कस्याविदितम्? एवंविधस्य वनस्पतिसमूहस्य अविचारितकर्तनं न केवलं कृतघ्नता, अपितु ब्रह्महत्येव महापातकमपि । सम्प्रति यावद् वनानां या हानिः कृता तत्पूर्त्यर्थं हरितवृक्षाणां कर्तनावरोधो नूतनानां प्रतिदिनमधिकाधिकारोपश्च सर्वेषामपि राष्ट्रियं कर्तव्यम् । वायुशुद्धिः, भूक्षरणनिरोधः पर्जन्यसाहाय्यं च वनानां मानवस्य जीवनप्रदः परोक्ष उपकारः ।

शब्दार्थ वनसङ्कटकास्तावत् = वनों का संघटन करने वाली, सविहगाः = पक्षियों सहित, इन्धनार्माणि = ईंधन के योग्य, भैषज्यसमुचितानि = दवाई के योग्य, जतूनि = लाख, औषधभोजनम् = औषध और भोजन, कर्गदस्येव = कागज़ के समान ही, उत्तमपटनिर्मितिप्रयुक्तस्य = उत्तम कपड़ों के बनाने में प्रयुक्त होने वाले को, उपादानम् = प्रमुख कारण, मञ्जूषा = सन्दूका, रज्जवः = रस्सियाँ, कटाः = चटाइयाँ, वानस्पतिक-मुत्पादनमिति = वनस्पतियों से होने वाला उत्पादन है, ऐसा, अविचारितकर्तनम् = बिना विचारे काटना, महापातकमपि = महापाप भी, कर्त्तनावरोधः = काटने पर रोका आरोपः = लगाना, पर्जन्यसाहाय्यम् = मेघों की सहायता ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में वनों में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभों को बताया गया है।

अनुवाद वनों के संघटक (यानी उन्हें बनाने वाले तत्व) दो प्रकार के होते हैं- पेड़-पौधे और जीव-जंतु जिनमें पक्षी शामिल हैं। मनुष्य को इन दोनों से ही फायदा होता है। इसलिए दोनों की ठीक से रक्षा करनी चाहिए। पेड़ों से हमें सिर्फ फल, फूल, ईंधन और घर बनाने की लकड़ी ही नहीं मिलती, बल्कि दवाइयों के लिए कई तरह की छालें, जड़ें, पत्ते आदि चीज़ें भी मिलती हैं। कई तरह के औद्योगिक उत्पादन के लिए लाख, तेल और तरल पदार्थ भी मिलते हैं। स्वस्थ, मीठा, स्वादिष्ट और दवा के रूप में काम आने वाला शहद भी पेड़ों से ही मिलता है। कागज़ और नायलॉन जैसे मशहूर, अच्छे कपड़े बनाने के लिए धागे के उत्पादन में भी खास पेड़ों की लकड़ी (कच्चा माल) का इस्तेमाल होता है। उनकी शाखाओं का उपयोग संदूक, पेटी आदि बनाने में किया जाता है। रस्सियाँ और चटाइयाँ भी पेड़ों से ही बनती हैं, यह बात किसे नहीं पता? इस तरह के पेड़-पौधों को बिना सोचे-समझे काटना सिर्फ कृतघ्नता ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-हत्या जैसा बड़ा पाप है। अब तक वनों का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए हरे पेड़ों को काटने पर रोक लगाना और हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा नए पेड़ लगाना सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य है। हवा की सफाई, ज़मीन के कटाव को रोकना और बादलों को बारिश लाने में मदद करना, ये सभी वनों के इंसानों को जीवन देने वाले अप्रत्यक्ष फायदे हैं। ये सभी लाभ मिलकर एक स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण करते हैं।

(4)

यथा वृक्षाणामुच्छेदस्तथैव मानवेन वन्यजन्तूनामप्यमानवीयो विनाश आचरितः ।। चर्मदन्त-पक्षादिलोभेन मांसलौल्येन च पशुपक्षिणां तावान् वधः कृतो यदनेकास्तेषां प्रजातयो भूतलाद् विलुप्ताः, नैकाश्च लुप्तप्रायाः । सिंहव्याघ्रादीनां तु दूर एवास्तां कथा, हरिणादिमुग्धपशूनु तित्तिरादिकान् उपयोगिनः पक्षिणोऽपि निघ्नन्नासौ विरमति । हिंस्रकाः जन्तवोऽपि प्राकृतिक सन्तुलनं रक्षन्ति मनुष्यस्य चोपकारका एव भवन्ति । पक्षिणः कृषिहानिकरान् कीटान् भक्षयन्ति यथा तित्तिरः सितपिपीलिकाः तथैव सिंहादयाः पशून हत्वा परिसीमयन्ति । एवं स्वत एवं प्रकृतिः स्वयं सन्तुलनं साधयति । एवमद्यानुभूयते यत् मनुष्यस्य तदितरेषां प्राणिनां च मध्ये सौहार्दै स्थापनीयम् । तत्र मनुष्य एव प्रथमं प्रबोधनीयः शिक्षणीयश्च यतः स निरर्थकं मनोरञ्जनायापि मृगयां क्रीडन् हिंसा करोति ।

शब्दार्थ वृक्षाणां = वृक्षों को, उच्छेदः = काटना, पक्ष = पंख, लौल्येन = लालच से, दूर एव आस्तां कथा = दूर ही रहे कहानी, तित्तिरादिकान् = तीतर आदि को, निघ्नन् = मारते हुए, विरमति = रुकता है, सितपिपीलिकाः = दीमक, परिसीमयन्ति = सीमित कर देते हैं, एवमद्यानुभूयते = इस प्रकार आज अनुभव किया जा रहा है, सौहार्दम् = मित्रता, मृगयां क्रीडन् = शिकार खेलता हुआ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मानव द्वारा वन्य पशु-पक्षियों के विनाश करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इंसान ने जिस तरह पेड़ों को काटा, उसी तरह जंगली जानवरों को भी बेरहमी से खत्म किया है। खाल, दाँत, पंख और माँस के लालच में इतने पशु-पक्षियों को मार डाला है कि उनकी कई प्रजातियाँ धरती से मिट चुकी हैं और कई खत्म होने वाली हैं। शेर और बाघ जैसे बड़े जानवरों की बात तो छोड़िए, वह हिरण जैसे सीधे-सादे पशुओं और तीतर जैसे उपयोगी पक्षियों को भी मारने से नहीं रुकता। हिंसक जानवर भी प्रकृति का संतुलन बनाए रखते हैं और इंसान की मदद करते हैं। पक्षी खेती को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को खाते हैं, जैसे तीतर सफेद चींटियों (दीमकों) को खाते हैं, वैसे ही शेर जैसे जानवर अन्य पशुओं को मारकर उनकी संख्या बढ़ने से रोकते हैं। इस तरह प्रकृति खुद ही अपना संतुलन बनाए रखती है। आज ऐसा महसूस किया जा रहा है कि इंसान और अन्य जीवों के बीच दोस्ती स्थापित होनी चाहिए। उनमें सबसे पहले इंसान को समझाना चाहिए और शिक्षा देनी चाहिए, क्योंकि वह सिर्फ मनोरंजन के लिए भी शिकार करके हिंसा करता है, जो गलत है।

(5)

अस्माकं विशाले भारतवर्षे सार्धद्वादशशतजातीयाः पक्षिणः प्राप्यन्ते । तेषु बहवः ऋतुपरिवर्तनकारणात् प्रजननहेतोभोजनस्य दुष्प्राप्यत्वात् काले-काले पत्र व्रजन्ति । एवमेव देशान्तरादपि बहवः पक्षिणोऽत्रागत्य प्रवासं कुर्वन्ति । रूसप्रदेशस्य साइबेरियाप्रान्तात् सहस्रशो विहगाः शीतकाले भारतस्य भरतपुरनिकटस्थे घानापक्षिविहारम् आगच्छन्ति । पक्षिणां मैत्रीभावः, दाम्पत्यं, मिथो व्यापाराः, भोजनविधयः, नीइनिर्माणं विपदि आचरणं सर्वमपि प्रेक्षं प्रेक्षमध्येयं भवति । तन्न केवलं मनोरञ्जकमपितु शिक्षाप्रदमात्मानन्दजनकं चापि भवति ।

शब्दार्थ सार्धद्वादशशतजातीयाः = साढ़े बारह सौ जातियों वाले, प्राप्यन्ते = प्राप्त होते हैं, परत्र = दूसरे स्थान पर, व्रजन्ति = चले जाते हैं, देशान्तरादपि = दूसरे देश से भी, प्रवासं = निवास, मिथो व्यापाराः = काम-व्यापार, नीडनिर्माणम् = घोंसला बनाना, विपदि आचरणम् = विपत्ति में आचरण, प्रेक्षं-प्रेक्षं = देख-देखकर ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में भारत में विद्यमान पक्षी-प्रजातियों और दूसरे देशों से आने वाले पक्षियों के बारे में बताया गया है।

अनुवाद हमारे विशाल भारत देश में साढ़े बारह सौ प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। उनमें से बहुत से पक्षी मौसम बदलने, अंडे देने और भोजन की कमी के कारण समय-समय पर दूसरी जगहों पर चले जाते हैं। इसी तरह, दूसरे देशों से भी कई पक्षी यहाँ आकर रहते हैं। रूस के 'साइबेरिया' प्रांत से हज़ारों पक्षी ठंड के मौसम में भारत के 'भरतपुर' के पास घाना पक्षी विहार में आते हैं। पक्षियों की दोस्ती, उनका आपसी प्यार, आपसी व्यवहार (काम-काज), खाने के तरीके, घोंसले बनाना और मुसीबत के समय उनका व्यवहार — ये सभी बातें बार-बार देखने और सीखने लायक होती हैं। यह सिर्फ मनोरंजन करने वाला ही नहीं, बल्कि शिक्षा देने वाला और मन को आनंद देने वाला भी होता है। पक्षियों का जीवन हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाता है।

(6)

अस्माकं देशे सलीमअलीनामा महान् विहगानुवीक्षको जातो येन पक्षिविज्ञानविषये बहूनि पुस्तकानि लिखितानि सन्ति । हरियाणाप्रदेशे राजस्थाने च निवसन्तो विश्नोईसम्प्रदायस्य पुरुषा वनानां पक्षिणां च रक्षणे स्वप्राणानपि तृणाय मन्यन्ते । न ते हरितवृक्षान् छिन्दन्ति नापि चान्यान् छेत्तुं सहन्ते । वन्यपशूनामाखेटोऽपि तेषां वसतिषु नितरां प्रतिषिद्धः । जोधपुरनरेशस्य प्रासादनिर्माणार्थं काष्ठहेतोः केजरीवृक्षाणां कर्तनाज्ञाविरुद्धम् एकैकशः शतत्रयसङ्ख्यकैर्विश्नोईस्त्रीपुरुषैः विच्छेदिष्यमाणवृक्षानालिङ्गदिभः, प्रथममस्माकं वपुश्छेदां पश्चाद् वृक्षाः इत्येवं जल्पभिः स्वप्राणा दत्ता इति तु जगति विश्रुतं नामाङ्कनपुरस्सरं तत्राङ्कितं च ।

शब्दार्थ तृणाय मन्यन्ते = तिनके के समान मानते हैं, आखेटः = शिकार, वसतिषु = बस्तियों में, नितरां = पूर्ण रूप से, प्रतिषिद्धः = निषिद्ध है, प्रासादनिर्माणार्थं = महल बनाने के लिए, कर्तनाज्ञाविरुद्धम् = काटने की आज्ञा के विरोध में, एकैकशः = एक-एक करके, शतत्रय = तीन सौ, विच्छेदिष्यमाणवृक्षानालिङ्गभिः = काटे जाते हुए वृक्षों का आलिंगन करते हुए, वपुः = शरीर, छेद्यम् = काटना चाहिए, जल्पभिः = कहते हुए, विश्रुतं = प्रसिद्ध है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में विश्नोई जाति के स्त्री-पुरुषों का वृक्षों की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग किये जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद हमारे देश में 'सलीम अली' नाम के एक महान पक्षी-निरीक्षक हुए हैं, जिन्होंने पक्षी विज्ञान के बारे में कई किताबें लिखी हैं। हरियाणा और राजस्थान में रहने वाले 'विश्नोई समुदाय' के लोग वनों और पक्षियों की रक्षा करने में अपनी जान को तिनके के बराबर (तुच्छ) मानते हैं। वे हरे पेड़ों को नहीं काटते, और न ही दूसरों को काटने देते हैं। जंगली पशुओं का शिकार भी उनकी बस्तियों में पूरी तरह से मना है। जोधपुर के राजा की, महल बनाने के लिए खेजड़ी के पेड़ काटने की आज्ञा के खिलाफ, एक-एक करके तीन सौ 'विश्नोई' स्त्री-पुरुषों ने काटे जाने वाले पेड़ों को गले लगाकर कहा, 'पहले हमारा शरीर काटो, बाद में पेड़ काटना', और इस तरह अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। यह घटना दुनिया में प्रसिद्ध है और उस जगह पर अंकित है। यह घटना पर्यावरण संरक्षण के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

(7)

नास्त्येषोऽस्माकमभिप्रायो यद्वनेभ्यः प्राप्यो लाभो ग्राह्य एव न । स तु अवश्यं ग्राह्यः यथा मधुमक्षिका पुष्पाणां हानि विनैव मधु नयति तथैव भवननिर्माणाय अन्यकारणाद् वा काष्ठं काम्यत एव, किन्तु पुरातना एव वृक्षा योजना निर्माय कर्तनीया, न नूतनाः । यावन्तः कर्त्तनीयास्तद्विगुणाश्च पूर्वत एव आरोपणीयाः। गृहाणां प्राङ्गणेषु, केदाराणां सीमसु, पर्वतानामुपत्यकासु, मार्गानुभयतः क्रीडाक्षेत्राणि परितश्च यत्रापि यावदपि स्थलं विन्दते तत्र यथानुकूल्यं विविधा वृक्षा रोपणीयाः । प्रत्येकं देशवासिनैवमेव विधेयं, प्रत्येक जन्म मृत्युर्विवाहश्च वृक्षारोपणेनानुसृतः स्यात् । यद्येवं सोत्साहं योजनाबद्धं च कार्यं भवेत् आरोपितानां वृक्षाणां च निरन्तरपोषणमुपचर्येत तर्हि वर्षदशकेनैव निकामं क्षतिपूर्तिर्भवेत् । किं बहुना, वृक्षाणां पशुपक्षिणां चं रक्षणे विश्नोई सम्प्रदायस्यादर्शः सर्वैरपि पालनीयः । एवं च ब्रूमः वनेन जीवनं रक्षेत् जीवनेन वनं पुनः । मा वनानि नरश्छिन्देत् जीवनं निहितं वने ॥

शब्दार्थ मधुमक्षिका = शहद की मक्खी, काम्यत = चाहा जाता है, तद्विगुणाः = उससे दोगुने, आरोपणीयाः = लगाए जाने चाहिए, केदाराणां सीमसु = खेतों की सीमाओं पर, उपत्यकासु = निचली घाटियों में, मार्गानुभयतः = मार्गों के दोनों ओर, परितः = चारों ओर, देशवासिनैवमेव (देशवासिना + एवं + एव) = देशवासियों के द्वारा इसी प्रकार, विधेयम् = करना चाहिए, अनुसृतः = अनुसरण किया हुआ, पोषणमुपचर्येत = पोषण किया जाए, निकामम् = पर्याप्त, सम्प्रदायस्यादर्शः = सम्प्रदाय का आदर्श, ब्रूमः = कहते हैं, जीवनेन = जीवन के द्वारा, मा = नहीं, नरश्छिन्देत् = मनुष्य को काटना चाहिए, निहितं = सुरक्षित है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में वनों से प्राप्त होने वाले लाभों को प्राप्त करने व पुराने वृक्षों के काटने से पूर्व नये वृक्ष लगाने के लिए उपदेश दिया गया है।

अनुवाद हमारा यह मतलब नहीं है कि वनों से मिलने वाले लाभों को सिर्फ लेना ही नहीं चाहिए। उन्हें तो ज़रूर लेना चाहिए। जैसे मधुमक्खी फूलों को नुकसान पहुँचाए बिना ही पराग ले जाती है, वैसे ही घर बनाने या दूसरे कामों के लिए लकड़ी तो चाहिए ही, लेकिन योजना बनाकर पुराने पेड़ों को ही काटना चाहिए, नए पेड़ों को नहीं। जितने पेड़ काटने हों, उनसे दोगुने पेड़ पहले ही लगा देने चाहिए। घरों के आँगनों में, खेतों की सीमाओं पर, पहाड़ों की तलहटियों में, रास्तों के दोनों ओर और खेल के मैदानों के चारों ओर, जहाँ भी जितनी जगह मिले, वहाँ सुविधा के अनुसार कई तरह के पेड़ लगाने चाहिए। हर देशवासी को ऐसा ही करना चाहिए। हर जन्म, मृत्यु और विवाह पेड़ लगाने के साथ ही होने चाहिए। अगर इस तरह उत्साहपूर्वक और योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए और लगाए गए पेड़ों का लगातार पोषण किया जाए, तो दस साल में ही बहुत बड़े नुकसान की भरपाई हो सकती है। ज़्यादा क्या कहें, पेड़ों और पशु-पक्षियों की रक्षा करने में विश्नोई समुदाय का आदर्श सभी को मानना चाहिए। हम इस तरह कहते हैं: 'वन से जीवन की रक्षा करो, और जीवन से वन की रक्षा करो।' मनुष्य को वनों को नहीं काटना चाहिए, क्योंकि जीवन वनों में ही छिपा है। यह संतुलन हमारे भविष्य के लिए आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. वन और मनुष्य में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध के विषय में लिखिए। या वनों का महत्त्व समझाइए। 2006,07,08, 10, 11, 12, 14 या वृक्षों के महत्त्व पर आलेख लिखिए। 2012
Answer: हमारे भौतिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विकास में भी वनों का बहुत बड़ा योगदान है। आरण्यक और उपनिषद जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ वनों में ही बने थे। वनों में स्थित तपोवनों में ही मनुष्य धर्म के दस लक्षण और जीवन के चार मुख्य लक्ष्य स्पष्ट हुए थे। यह बात इतिहास से साबित होती है। पुराने समय के विद्वानों ने वनों के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की थी। संस्कृत कवियों ने वनों को देवता माना और वानप्रस्थ आश्रम में वन में रहने का नियम बनाया। इसका मतलब है कि वन हमें सीधे तौर पर जितना देते हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रत्यक्ष रूप से देते हैं। इसलिए पुराने लोग पेड़ों को अपने बच्चों जैसा मानते थे और वन्यजीवों की रक्षा करते थे। उनका पेड़ों और जानवरों के साथ गहरा और अटूट संबंध था, जो प्रकृति के साथ सद्भाव का प्रतीक है।
In simple words: वन हमारे जीवन के लिए बहुत ज़रूरी हैं। वे हमें खाने से लेकर आध्यात्मिक शांति तक सब कुछ देते हैं। पुराने लोग पेड़ों को बच्चों की तरह पालते थे।

🎯 Exam Tip: वनों के महत्व को बताते समय उनके पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आर्थिक लाभों को ज़रूर शामिल करें। 'अन्योन्याश्रय सम्बन्ध' का अर्थ है एक-दूसरे पर निर्भरता।

 

प्रश्न 2. वनों से हमें किस प्रकार लाभ ग्रहण करना चाहिए?
Answer: हमें वनों से इस तरह लाभ लेना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूलों को नुकसान पहुँचाए बिना उनसे पराग ले लेती है। घर बनाने या अन्य ज़रूरतों के लिए लकड़ी की ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ़ पुराने पेड़ों को ही योजना बनाकर काटना चाहिए, नए पेड़ों को नहीं। जितने पेड़ काटने हों, उनसे दोगुने नए पेड़ पहले ही लगा देने चाहिए। इस तरह हम प्रकृति को बिना नुकसान पहुँचाए उसकी चीज़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
In simple words: हमें पेड़ों को बिना नुकसान पहुँचाए उनसे लकड़ी और अन्य चीज़ें लेनी चाहिए। जितने पेड़ काटें, उससे दोगुने नए पेड़ ज़रूर लगाएँ।

🎯 Exam Tip: हमेशा यह ध्यान रखें कि वनों का उपयोग इस तरह से हो कि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी बने रहें। यह सतत विकास का सिद्धांत है।

 

प्रश्न 3. 'वन में जीवन निहित है', अतः इस जीवन को बचाये रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
Answer: 'वन में जीवन निहित है', इसलिए इस जीवन को बचाने के लिए हमें नए पेड़ों को नहीं काटना चाहिए और पुराने पेड़ों को भी योजनाबद्ध तरीके से ही काटना चाहिए। जितने पेड़ काटने हों, उनसे पहले उनसे दोगुने पेड़ लगा देने चाहिए। घरों के आँगनों में, खेतों की सीमाओं पर, पहाड़ों की तलहटियों में, रास्तों के दोनों ओर, खेल के मैदानों के चारों ओर, और जहाँ कहीं भी जगह मिले, वहाँ सुविधा के अनुसार कई तरह के पेड़ लगाने चाहिए। हर देशवासी को अपने जन्म, मृत्यु, विवाह आदि जैसे हर खास मौके पर पेड़ ज़रूर लगाने चाहिए। इस तरह हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।
In simple words: जीवन वनों में है, इसलिए हमें पेड़ नहीं काटने चाहिए। पुराने पेड़ भी योजना से काटें और हमेशा दोगुने नए पेड़ लगाएँ। हर व्यक्ति को पेड़ लगाने चाहिए।

🎯 Exam Tip: इस सवाल का जवाब देते समय 'योजनाबद्ध वृक्षारोपण' और 'निरंतर देखभाल' जैसे शब्दों पर ज़ोर देना चाहिए।

 

प्रश्न 4. वन में पाये जाने वाले पशु-पक्षियों से हमें क्या लाभ हैं?' जीवनं निहितं वने' पाठ के आधार पर बताइए।
Answer: वनों में रहने वाले जंगली जीव और पशु-पक्षी भी हमें कई तरह के फायदे पहुँचाते हैं। ये प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। पक्षी खेती को नुकसान पहुँचाने वाले दीमक जैसे कीड़ों को खा जाते हैं। शेर जैसे खूंखार जानवर अन्य पशुओं को मारकर उनकी आबादी को ज़्यादा बढ़ने से रोकते हैं। पशु-पक्षी हमारे मनोरंजन में भी मददगार होते हैं और उनके जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है। इसलिए हमें उनके माँस, खाल, दाँत, पंख आदि के लालच में उनका शिकार नहीं करना चाहिए। हमें वन्यजीवों के महत्व को समझना चाहिए।
In simple words: वन्यजीव प्रकृति का संतुलन बनाते हैं। पक्षी कीड़े खाते हैं और बड़े जानवर अन्य पशुओं की संख्या नियंत्रित करते हैं। वे हमें कुछ सिखाते भी हैं, इसलिए हमें उनका शिकार नहीं करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: वन्यजीवों के पारिस्थितिकीय महत्व (संतुलन बनाए रखना) और उनके शैक्षिक मूल्य (सीखने लायक बातें) दोनों को अपने उत्तर में ज़रूर शामिल करें।

 

प्रश्न 5. आज हमारे देश में वनों का प्रतिशत क्या है? 2006, 11, 14
Answer: आज हमारे देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 11% हिस्सा वनों से ढका हुआ है। यह पर्यावरण संतुलन के लिए पर्याप्त नहीं है, और इसे बढ़ाने की ज़रूरत है।
In simple words: आज भारत में लगभग 11 प्रतिशत ज़मीन पर वन हैं।

🎯 Exam Tip: सटीक संख्या याद रखना महत्वपूर्ण है। अगर आप आंकड़े भूल जाएं, तो "बहुत कम" या "पर्याप्त नहीं" जैसे शब्दों का उपयोग करें।

 

प्रश्न 6. पर्यावरण की सुरक्षा पर पाँच/तीन वाक्य लिखिए। 2011, 12, 13
Answer: पर्यावरण की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए:

  • योजना बनाकर ही पुराने पेड़ों को काटना चाहिए। नए पेड़ों को बिल्कुल नहीं काटना चाहिए।

  • जितने भी पेड़ काटने हों, उनसे दोगुने नए पेड़ पहले ही लगा लेने चाहिए।

  • घर के आँगन में, खेतों की सीमाओं पर, पहाड़ों की तलहटियों में, रास्तों के दोनों ओर, यानी जहाँ भी जगह मिले, वहाँ पेड़ लगाने चाहिए।

  • हर व्यक्ति को अपने घर में होने वाले हर कार्यक्रम, जैसे जन्म, मृत्यु, विवाह आदि की शुरुआत पेड़ लगाने से करनी चाहिए।

  • पेड़ों को लगाने के साथ-साथ उनकी लगातार देखभाल और पोषण भी करना चाहिए ताकि वे बड़े हो सकें।

In simple words: हमें पुराने पेड़ों को योजना से काटना चाहिए और नए पेड़ ज़्यादा लगाने चाहिए। हर व्यक्ति को पेड़ लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: पर्यावरण सुरक्षा के उपायों को हमेशा व्यावहारिक और चरणबद्ध तरीके से बताएँ। मुख्य बिंदुओं पर ज़ोर दें जैसे 'वृक्षारोपण' और 'देखभाल'।

 

प्रश्न 7. वन-संरक्षण और वृक्षारोपण से क्या-क्या लाभ हैं?
Answer: पेड़ों से हमें सिर्फ फल, फूल, ईंधन और घर बनाने की लकड़ी ही नहीं मिलती, बल्कि दवाइयों के लिए कई तरह की छालें, जड़ें, पत्ते आदि चीज़ें भी मिलती हैं। कई तरह के औद्योगिक उत्पादन के लिए लाख, तेल और तरल पदार्थ भी पेड़ों से मिलते हैं। शहद भी पेड़ों और वनस्पतियों से ही मिलता है। कागज़ और धागे बनाने में भी पेड़ों की लकड़ी कच्चे माल का काम करती है। संदूक, रस्सी, चटाइयाँ जैसे कई सामान पेड़ों और वनस्पतियों से ही बनते हैं। हवा को साफ करना, मिट्टी के कटाव को रोकना और बादलों को बारिश लाने में मदद करना भी पेड़ों से ही संभव है। इसलिए हमें वनों की रक्षा और ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए ताकि ये सभी फायदे हमें मिलते रहें।
In simple words: वन हमें लकड़ी, फल, दवा और शहद देते हैं। वे हवा साफ करते हैं, मिट्टी रोकते हैं और बारिश लाते हैं। इसलिए हमें पेड़ों को बचाना और लगाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: वनों के लाभों को बताते समय प्रत्यक्ष (सीधे) और अप्रत्यक्ष (छिपे हुए) दोनों तरह के फायदों को शामिल करें। जैसे, लकड़ी सीधे लाभ है, जबकि हवा की सफाई अप्रत्यक्ष लाभ है।

 

प्रश्न 8. 'अरण्य-रोदन न्याय' का आशय स्पष्ट कीजिए। 2005
Answer: वन सुनसान जगहें होती हैं। अगर कोई व्यक्ति मुसीबत में वहाँ बैठकर रोने लगे और सोचे कि कोई उसकी मदद के लिए आएगा, तो उसका रोना व्यर्थ होता है, क्योंकि वहाँ उसके रोने को सुनने वाला कोई नहीं होता। इसी तरह, जब रोज़मर्रा के जीवन में किसी की बात को सुनने वाला कोई न हो, तब उसके व्यर्थ प्रयासों को 'अरण्य-रोदन न्याय' कहा जाता है। इसका मतलब है कि जहाँ कोई सुनने वाला न हो, वहाँ अपनी बात कहना बेकार है।
In simple words: 'अरण्य-रोदन न्याय' का मतलब है ऐसी जगह पर मदद माँगना जहाँ कोई सुनने वाला न हो, यानी व्यर्थ की कोशिश करना।

🎯 Exam Tip: इस न्याय को उदाहरण के साथ समझाना प्रभावी होता है ताकि इसका अर्थ स्पष्ट हो सके।

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