UP Board Solutions Class 10 Commerce Chapter 21 व्याय इवान बचत

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Detailed Chapter 21 व्याय इवान बचत UP Board Solutions for Class 10 Commerce

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Class 10 Commerce Chapter 21 व्याय इवान बचत UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles And Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें)

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1.निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए-
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विभिन्न कार्बनिक यौगिकों में प्रत्येक कार्बन परमाणु की संकरण अवस्था को दर्शाता है। इसमें \(CH_2=C=O\) में \(sp^2\), \(sp\); \(CH_3-CH=CH_2\) में \(sp^3\), \(sp^2\), \(sp^2\); \(CH_3-C(||O)-CH_3\) में \(sp^3\), \(sp^2\), \(sp^3\); \(CH_2=CH-C\equiv N\) में \(sp^2\), \(sp^2\), \(sp\); और बेंजीन रिंग में प्रत्येक कार्बन के लिए \(sp^2\) संकरण दिखाया गया है।In simple words: संकरण अवस्था किसी परमाणु के ऑर्बिटलों के मिश्रण का प्रकार बताती है, जो रासायनिक बंधन बनाने के लिए नए हाइब्रिड ऑर्बिटल बनाते हैं। यह अणु की ज्यामिति और बंध कोणों को निर्धारित करता है।

🎯 Exam Tip: संकरण अवस्था की पहचान करने के लिए सिग्मा और पाई बंधों की संख्या गिनना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2.निम्नलिखित अणुओं में o तथा π आबन्ध दर्शाइए-
\(C_6H_6\), \(C_6H_{12}\), \(CH_2Cl_2\), \(CH_2=C=CH\), \(CH_3NO_2\), \(HCONHCH_3\)
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में विभिन्न कार्बनिक अणुओं के सिग्मा (σ) और पाई (π) आबंधों को उनकी संरचनात्मक व्यवस्था के साथ दर्शाया गया है। उदाहरण के लिए, बेंजीन (\(C_6H_6\)) में चक्रीय संरचना में सिग्मा और पाई आबंधों का एक संयोजन होता है, जबकि अन्य अणुओं जैसे \(C_6H_{12}\), \(CH_2Cl_2\), \(CH_2=C=CH\), \(CH_3NO_2\) और \(HCONHCH_3\) में कार्बन-कार्बन, कार्बन-हाइड्रोजन, कार्बन-ऑक्सीजन और कार्बन-नाइट्रोजन के बीच सिग्मा और पाई आबंधों की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शायी गई है।In simple words: सिग्मा आबंध एकल आबंध होते हैं, जबकि पाई आबंध दोहरा या तिहरा आबंध के अतिरिक्त भाग होते हैं। एक अणु में कुल आबंधों की संख्या गिनने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि कितने सिग्मा और कितने पाई आबंध मौजूद हैं।

🎯 Exam Tip: सिग्मा आबंध हमेशा एकल होते हैं, जबकि प्रत्येक अतिरिक्त बंध (दोहरे या तिहरे बंध में) एक पाई आबंध होता है। आबंधों की सही पहचान करने के लिए संरचनात्मक सूत्रों का अभ्यास करें।

 

Question 3.निम्नलिखित यौगिकों के आबन्ध-रेखा सूत्र लिखिए-
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3-डाइमेथिल ब्यूटेनल, हेप्टेन-4-ओन
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तीन कार्बनिक यौगिकों- आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2,3-डाइमेथिल ब्यूटेनल और हेप्टेन-4-ओन- के आबन्ध-रेखा सूत्रों को दर्शाता है। आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल में एक -OH समूह होता है, 2,3-डाइमेथिल ब्यूटेनल में एक ऐल्डिहाइड समूह और दो मेथिल समूह होते हैं, जबकि हेप्टेन-4-ओन में एक कीटोन समूह होता है, जिसमें कार्बन परमाणुओं को 1 से 7 तक संख्यांकित किया गया है।In simple words: आबन्ध-रेखा सूत्र कार्बनिक अणुओं को सरल तरीके से दर्शाते हैं, जहाँ कार्बन परमाणु कोने और रेखाओं के अंत में होते हैं, और हाइड्रोजन परमाणु अक्सर नहीं दिखाए जाते हैं जब तक कि वे हेटरोपरमाणुओं से जुड़े न हों।

🎯 Exam Tip: आबन्ध-रेखा सूत्रों को लिखते समय, कार्बन श्रृंखला की मुख्य श्रृंखला को स्पष्ट रूप से दर्शाएं और सभी प्रतिस्थापियों तथा क्रियात्मक समूहों को सही स्थिति में रखें।

 

Question 4.निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र छह अलग-अलग कार्बनिक यौगिकों की आबन्ध-रेखा संरचनाओं को प्रदर्शित करता है, जिनके IUPAC नाम नीचे दिए गए हैं। ये संरचनाएं विभिन्न क्रियात्मक समूहों जैसे ऐल्केन, साइनाइड, ऐल्किल हैलाइड और ऐल्डिहाइड को दर्शाती हैं, जो एक सीधी या शाखित कार्बन श्रृंखला में व्यवस्थित हैं।
(क) प्रोपिलबेन्जीन,
(ख) 3-मेथिलपेन्टेननाइट्राइल,
(ग) 2, 5-डाइमेथिलहेप्टेन,
(घ) 3-ब्रोमो-3-क्लोरोहेप्टेन,
(ङ) 3-क्लोरोप्रोपेनल,
(च) 2, 2-डाइक्लोरोएथेनॉलIn simple words: IUPAC नामकरण रासायनिक यौगिकों को व्यवस्थित तरीके से नाम देने का एक मानक तरीका है, जो उनकी संरचना के आधार पर होता है ताकि हर यौगिक का एक अद्वितीय नाम हो।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के लिए, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला चुनें, क्रियात्मक समूहों को प्राथमिकता दें, और प्रतिस्थापियों को वर्णानुक्रम में व्यवस्थित करें।

 

Question 5.निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2, 2-डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2-डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2, 5, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन अथवा 4-क्लोरो-2-मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल अथवा ब्यूट-4-ऑल-1-आइन
Answer:
(क) 2, 2-डाइमेथिलषन्टेन,
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन,
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑलIn simple words: IUPAC नामकरण नियमों का पालन करके, किसी भी यौगिक के लिए सही नाम निर्धारित किया जाता है ताकि कोई अस्पष्टता न हो और संरचना को नाम से आसानी से समझा जा सके।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन, प्रतिस्थापियों की सही स्थिति और क्रियात्मक समूह की प्राथमिकता महत्वपूर्ण है। सामान्य और IUPAC नामों के अंतर को समझें।

 

Question 6.निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए-
(क) HCOOH
(ख) CH3COCH3
(ग) H-CH=CH2
Answer:
(क)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह अनुभाग कार्बोक्सिलिक अम्ल श्रृंखला के पहले पांच सदस्यों के संरचनात्मक सूत्रों को दर्शाता है। इसमें मेथेनोइक अम्ल (\(H-C(=O)-OH\)), एथेनोइक अम्ल (\(CH_3-C(=O)-OH\)), प्रोपेनोइक अम्ल (\(CH_3-CH_2-C(=O)-OH\)), ब्यूटेनोइक अम्ल (\(CH_3CH_2CH_2-C(=O)-OH\)), और पेन्टेनोइक अम्ल (\(CH_3CH_2CH_2CH_2-C(=O)-OH\)) शामिल हैं, जो एक सजातीय श्रेणी के रूप में कार्बन श्रृंखला की बढ़ती हुई लंबाई को प्रदर्शित करते हैं।
(ख)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह अनुभाग कीटोन श्रृंखला के पहले पांच सदस्यों के संरचनात्मक सूत्रों को दर्शाता है। इसमें प्रोपेन-2-ऑन (\(CH_3COCH_3\)), ब्यूटेन-2-ऑन (\(CH_3-C(=O)-CH_2-CH_3\)), पेन्टेन-2-ऑन (\(CH_3-C(=O)-CH_2-CH_2-CH_3\)), हेक्सेन-2-ऑन (\(CH_3-C(=O)-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3\)), और हेप्टेन-2-ऑन (\(CH_3-C(=O)-CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3\)) शामिल हैं, जो एक सजातीय श्रेणी के रूप में कार्बन श्रृंखला की बढ़ती हुई लंबाई को प्रदर्शित करते हैं।
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह अनुभाग ऐल्कीन श्रृंखला के पहले पांच सदस्यों के संरचनात्मक सूत्रों को दर्शाता है। इसमें एथीन (\(H-CH=CH_2\)), प्रोपीन (\(CH_3-CH=CH_2\)), ब्यूटेन-1-ईन (\(CH_2=CH-CH_2-CH_3\)), पेन्ट-1-ईन (\(CH_2=CH-CH_2-CH_2-CH_3\)), और हेक्स-1-ईन (\(CH_2=CH-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3\)) शामिल हैं, जो एक सजातीय श्रेणी के रूप में कार्बन श्रृंखला की बढ़ती हुई लंबाई को प्रदर्शित करते हैं।In simple words: सजातीय श्रेणी में समान क्रियात्मक समूह वाले यौगिकों का एक समूह होता है, जहाँ प्रत्येक सदस्य अपने पिछले सदस्य से एक \(CH_2\) इकाई से भिन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप भौतिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन होते हैं।

🎯 Exam Tip: सजातीय श्रेणी के सदस्यों के संरचनात्मक सूत्रों को लिखते समय, क्रियात्मक समूह को अपरिवर्तित रखते हुए कार्बन श्रृंखला की लंबाई में क्रमिक वृद्धि पर ध्यान दें।

 

Question 7.निम्नलिखित के संघनितं और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा यदि कोई क्रियात्मक समूह हो तो उसे पहचानिए-:
(क) 2, 2, 4-टाइमेथिल पेन्टेन
(ख) 2-हाइड्रॉक्सी-1, 2, 3-प्रोषेनट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल
(ग) हेक्सेनडाइएल
Answer:
(क) \((CH_3)_3 CCH_2CH(CH_3)_2\)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह संरचना 2,2,4-ट्राइमेथिल पेन्टेन को उसके संघनित सूत्र और आबन्ध-रेखा सूत्र दोनों में दिखाती है। आबन्ध-रेखा सूत्र में, कार्बन श्रृंखला और मेथिल समूह स्पष्ट रूप से दर्शाए गए हैं, जो एक शाखित ऐल्केन संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं।
(ख) \(HOOCCH_2 C(OH) (COOH)CH_2COOH\)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह संरचना 2-हाइड्रॉक्सी-1,2,3-प्रोपेनट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल (जिसे साइट्रिक अम्ल के नाम से भी जाना जाता है) के लिए संघनित सूत्र और आबन्ध-रेखा सूत्र को दर्शाती है। आबन्ध-रेखा सूत्र में, तीन कार्बोक्सिल (-COOH) समूह और एक हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह एक केंद्रीय कार्बन श्रृंखला से जुड़े हुए स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। इसमें क्रियात्मक समूहों के रूप में कार्बोक्सिल और हाइड्रॉक्सिल समूह हैं।
(ग) \(OHC(CH_2)_4 CHO\)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह संरचना हेक्सेनडाइएल के लिए संघनित सूत्र और आबन्ध-रेखा सूत्र को दर्शाती है। आबन्ध-रेखा सूत्र में, एक छह-कार्बन श्रृंखला के दोनों सिरों पर ऐल्डिहाइड (-CHO) समूह स्पष्ट रूप से दर्शाए गए हैं, जो एक डाइऐल्डिहाइड संरचना को प्रदर्शित करते हैं। इसमें क्रियात्मक समूह के रूप में ऐल्डिहाइड समूह है।In simple words: संघनित सूत्र एक अणु की संरचना को अधिक संक्षिप्त रूप में दिखाता है, अक्सर हाइड्रोजन परमाणुओं को कार्बन परमाणुओं के साथ समूहित करके, जबकि आबन्ध-रेखा सूत्र कार्बन-कार्बन आबंधों को रेखाओं के रूप में और क्रियात्मक समूहों को स्पष्ट रूप से दिखाता है।

🎯 Exam Tip: संघनित सूत्र और आबन्ध-रेखा सूत्र दोनों को लिखना सीखें, और प्रत्येक सूत्र में क्रियात्मक समूहों की पहचान करना सुनिश्चित करें, क्योंकि यह कार्बनिक यौगिकों के गुणों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 8.निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए-
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तीन अलग-अलग कार्बनिक यौगिकों में क्रियात्मक समूहों की पहचान को दर्शाता है।
(क) पहले यौगिक में एक बेंजीन रिंग से जुड़े ऐल्डिहाइड (-CHO), मेथॉक्सी (-OMe), और हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह हैं। इन्हें क्रमशः ऐल्डिहाइड, फीनॉलिक ईथर और फीनॉलिक हाइड्रॉक्सिल के रूप में पहचाना जाता है।
(ख) दूसरे यौगिक में एक बेंजीन रिंग से जुड़े ऐमीनो (-NH2) और एक एस्टर समूह (\(-OCH_2CH_2N(C_2H_5)_2\)) हैं। इन्हें 1° ऐमीनो (एरोमैटिक) और एस्टर (3° ऐमीनो) के रूप में पहचाना जाता है।
(ग) तीसरे यौगिक में एक बेंजीन रिंग से जुड़ा नाइट्रो (-NO2) समूह और एथिलीनिक द्विबंध (-CH=CH-) समूह है। इन्हें नाइट्रो और एथिलीनिक द्विबंध के रूप में पहचाना जाता है।In simple words: क्रियात्मक समूह परमाणुओं के विशिष्ट समूह होते हैं जो अणु के रासायनिक गुणों को निर्धारित करते हैं। उनकी पहचान से अणु की प्रतिक्रियाशीलता और वर्ग को समझने में मदद मिलती है।

🎯 Exam Tip: क्रियात्मक समूहों की सही पहचान करना कार्बनिक रसायन विज्ञान में एक मूलभूत कौशल है। विभिन्न क्रियात्मक समूहों की संरचनाओं और उनसे जुड़े सामान्य गुणों को याद रखें।

 

Question 9.निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों?
\(O_2NCH_2CH_2O^-\) \(CH_3CH_2O^-\)
Answer: \(O_2NCH_2CH_2O^-\) से अधिक स्थायी है क्योंकि \(NO_2\) का -I प्रभाव होता है। अतः यह \(O^-\) परमाणु पर ऋणावेश का परिक्षेपण करता है। इसके विपरीत, \(CH_3CH_2\) का +I प्रभाव होता है, अतः यह ऋणावेश की तीव्रता बढ़ाकर इसे अस्थायी करता है।In simple words: जब एक अणु में ऋण आवेश को अधिक परमाणुओं या समूहों में फैलाया जाता है, तो वह अधिक स्थिर हो जाता है। \(NO_2\) समूह इलेक्ट्रॉन खींचकर ऋण आवेश को फैलाता है, जबकि \(CH_3CH_2\) समूह इलेक्ट्रॉन देकर ऋण आवेश को केंद्रित करता है, जिससे स्थिरता घट जाती है।

🎯 Exam Tip: किसी भी आयन या मध्यवर्ती की स्थिरता पर प्रेरणिक प्रभाव (-I या +I) और अनुनाद प्रभाव के प्रभाव पर ध्यान दें। इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने वाले समूह ऋण आवेश को स्थिर करते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन देने वाले समूह इसे अस्थिर करते हैं।

 

Question 10.निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉनदाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए ।
Answer: अतिसंयुग्मन के कारण - निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह कार्य करते हैं जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अतिसंयुग्मन (hyperconjugation) के माध्यम से एक ऐल्किल समूह द्वारा इलेक्ट्रॉन दान करने की क्रियाविधि को दर्शाता है। इसमें एक ऐल्किल समूह (\(-CH_3\)) एक असंतृप्त प्रणाली (\(-CH=CH_2\)) से जुड़ा होता है। हाइड्रोजन परमाणुओं के C-H सिग्मा आबंध के इलेक्ट्रॉन पाई आबंध प्रणाली में विस्थानीकृत हो जाते हैं, जिससे "नो-बांड रेजोनेंस" जैसी संरचनाएं बनती हैं। यह प्रभाव ऐल्किल समूह को इलेक्ट्रॉन दाता के रूप में कार्य करने में मदद करता है।
\[H-C-CH=CH_2 \leftrightarrow H^+-C=CH-CH_2 \leftrightarrow H-C=CH-CH_2\]In simple words: ऐल्किल समूह अपने सिग्मा इलेक्ट्रॉनों को पास के पाई सिस्टम या खाली ऑर्बिटल में दान कर सकते हैं, जिसे अतिसंयुग्मन कहते हैं। यह इलेक्ट्रॉन दान करने वाला प्रभाव ऐल्किल समूह को इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार करने पर मजबूर करता है।

🎯 Exam Tip: अतिसंयुग्मन की अवधारणा को समझने के लिए ऐल्किल समूह के सिग्मा इलेक्ट्रॉनों और असंतृप्त प्रणाली के पाई इलेक्ट्रॉनों के बीच विस्थानीकरण को याद रखें। यह कार्बोकैटायन और ऐल्कीन की स्थिरता की व्याख्या करने में महत्वपूर्ण है।

 

Question 11.निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दर्शाइए-
(क) \(C_6H_5OH\)
(ख) \(C_6H_5NO_2\)
(ग) \(CH_3CH=CHCHO\)
(घ) \(C_6H_5-CHO\)
(ङ) \(C_6H_5-CH^+_2\)
(च) \(CH_3CH=CHCH_2\)
Answer:
(क)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह फीनॉल (\(C_6H_5OH\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। हाइड्रॉक्सिल समूह पर मौजूद एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल बेंजीन रिंग में विस्थापित होकर इलेक्ट्रॉन घनत्व को ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर बढ़ाता है, जिससे विभिन्न अनुनाद संकर बनते हैं, जहाँ ऑक्सीजन पर धनात्मक आवेश और रिंग पर ऋणात्मक आवेश आता है।
(ख)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह नाइट्रोबेंजीन (\(C_6H_5NO_2\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। नाइट्रो समूह बेंजीन रिंग से इलेक्ट्रॉन घनत्व को खींचता है, जिससे रिंग में ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है, और नाइट्रोजन परमाणु पर धनात्मक आवेश और ऑक्सीजन परमाणुओं पर ऋणात्मक आवेश के साथ अनुनाद संकर बनते हैं।
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ब्यूट-2-ईन-1-अल (\(CH_3-CH=CH-CHO\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। ऐल्डिहाइड समूह में कार्बोनिल ऑक्सीजन और पाई आबंध के बीच इलेक्ट्रॉन विस्थापन होता है, जिससे कार्बन और ऑक्सीजन पर आवेश पृथक्करण होता है, और conjugated प्रणाली के भीतर आवेश के साथ विभिन्न अनुनाद संरचनाएं बनती हैं।
(घ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह बेंजाल्डिहाइड (\(C_6H_5-CHO\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। कार्बोनिल समूह का ऑक्सीजन परमाणु रिंग से इलेक्ट्रॉन घनत्व खींचता है, जिससे ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है, और ऑक्सीजन पर ऋणात्मक आवेश तथा रिंग पर धनात्मक आवेश के साथ अनुनाद संकर बनते हैं।
(ङ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह बेंजिल कार्बोधनायन (\(C_6H_5-CH^+_2\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। धनात्मक आवेश मेथिलीन कार्बन से बेंजीन रिंग में विस्थापित होकर ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर धन आवेश के साथ अनुनाद संकर बनाता है, जिससे कार्बोधनायन को स्थिर करता है।
(च)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ब्यूट-2-ईन-1-आयल कार्बोधनायन (\(CH_3-CH=CH-CH_2^+\)) की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाता है। धनात्मक आवेश conjugated प्रणाली के साथ विस्थापित होता है, जिससे दो अनुनाद संरचनाएं बनती हैं जहाँ धन आवेश प्रणाली के विभिन्न कार्बन परमाणुओं पर होता है, जिससे इसकी स्थिरता बढ़ती है।In simple words: अनुनाद संरचनाएं एक अणु के इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण को दर्शाने के विभिन्न तरीके हैं, जहाँ इलेक्ट्रॉन एक परमाणु से दूसरे परमाणु में मुड़े हुए तीरों से चलते हुए दिखाए जाते हैं, जिससे अणु की स्थिरता बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद संरचनाएं बनाते समय, केवल पाई इलेक्ट्रॉनों और एकाकी युग्म इलेक्ट्रॉनों को स्थानांतरित करें, सिग्मा आबंधों को नहीं। आवेशों के संरक्षण और अष्टक नियम के अनुपालन का ध्यान रखें।

 

Question 12.इलेक्ट्रॉनस्नेहीं तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही (Nucleophiles and Electrophiles) इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करने वाला अभिकर्मक 'नाभिकस्नेही' (nucleophile, Nu :) अर्थात् 'नाभिक खोजने वाला' कहलाता है तथा अभिक्रिया 'नाभिकस्नेही अभिक्रिया' (nucleophilic reaction) कहलाती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक को इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile E+), अर्थात् 'इलेक्ट्रॉन चाहने वाला कहते हैं और अभिक्रिया 'इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रिया' । (electrophilic reaction) कहलाती है।
ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधारक के इलेक्ट्रॉनस्नेही केन्द्र पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है। यह क्रियाधारक का विशिष्ट परमाणु अथवा इलेक्ट्रॉन न्यून भाग होता है। इसी प्रकार क्रियाधारकों के इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकस्नेही केन्द्र पर इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण करता है। अतः आबन्धन अन्योन्यक्रिया के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म प्राप्त करता है। नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर इलेक्ट्रॉनों का संचलन वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नाभिकस्नेही के उदाहरणों में हाइड्रॉक्साइड (\(OH^-\)), सायनाइड आयन (\(CN^-\) ) तथा कार्बऋणायन कुछ आयन सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उदासीन अणु, (जैसे- आदि) भी एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म की उपस्थिति के कारण नाभिकस्नेही की भाँति कार्य करते हैं। इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरणों में कार्बधनायन और कार्बोनिल समूह अथवा ऐल्किल हैलाइड (\(R_3C-X\), \(X=\) हैलोजेन परमाणु) वाले । उदासीन अणु सम्मिलित हैं। कार्बधनायन का कार्बन केवल षष्टक होने के कारण इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है तथा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण कर सकता है। ऐल्किल हैलाइड का कार्बन आबन्ध ध्रुवता के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही-केन्द्र बन जाता है जिस पर नाभिकस्नेही आक्रमण कर सकता है।In simple words: नाभिकस्नेही वे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करते हैं (इलेक्ट्रॉन-धनी), जबकि इलेक्ट्रॉनस्नेही वे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन-युग्m स्वीकार करते हैं (इलेक्ट्रॉन-न्यून)। नाभिकस्नेही "नाभिक को पसंद करते हैं" और इलेक्ट्रॉनस्नेही "इलेक्ट्रॉन को पसंद करते हैं"।

🎯 Exam Tip: नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही की परिभाषाओं, उनके उदाहरणों और वे इलेक्ट्रॉन-युग्म कैसे स्थानांतरित करते हैं, पर विशेष ध्यान दें। यह कार्बनिक अभिक्रियाओं के तंत्र को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 13.निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही में वर्गीकृत कीजिए-
(क) \(CH_3COOH + HO^- \longrightarrow CH_3COO^- + H_2O\)
(ख) \(CH_3COCH_3 + CN^- \longrightarrow (CH_3)_2C(CN)(OH)\)
(ग) \(C_6H_6 + CH_3CO^+ \longrightarrow C_6H_5COCH_3\)
Answer:
(क) नाभिकस्नेही,
(ख) नाभिकस्नेही
(ग) इलेक्ट्रॉनस्नेही ।In simple words: अभिकर्मकों को वर्गीकृत करने के लिए देखें कि वे इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करते हैं (नाभिकस्नेही) या इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करते हैं (इलेक्ट्रॉनस्नेही)। ऋण आवेश वाले या एकाकी युग्म वाले अणु अक्सर नाभिकस्नेही होते हैं, जबकि धन आवेश वाले या इलेक्ट्रॉन-न्यून अणु इलेक्ट्रॉनस्नेही होते हैं।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करने वाले और स्वीकार करने वाले अभिकर्मकों की पहचान करने के लिए प्रत्येक अभिकर्मक की इलेक्ट्रॉन घनत्व और आवेश पर ध्यान दें।

 

Question 14.निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए-
(क) \(CH_3CH_2Br+HS^- CH_3CH_2SH+Br^-\)
(ख) \((CH_3)_2C=CH_2+HCl \longrightarrow (CH_3)_2ClC-CH_3\)
(ग) \(CH_2CH_2Br+HO^- \longrightarrow CH_2=CH_2+H_2O+Br^-\)
(घ) \((CH_3)_3C-CH_2OH+HBr \longrightarrow (CH_3)_2CBrCH_2CH_3 + H_2O\)
Answer:
(क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution)
(ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (Electrophilic addition)
(ग) विलोपन (Elimination)
(घ) पुनर्विन्यास युक्त नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution with rearrangement)In simple words: अभिक्रियाओं को वर्गीकृत करने का मतलब है कि वे कैसे होती हैं- क्या एक समूह दूसरे की जगह लेता है (प्रतिस्थापन), क्या कुछ जुड़ता है (योगात्मक), क्या कुछ निकलता है (विलोपन), या क्या अणु अपनी संरचना बदलता है (पुनर्विन्यास)।

🎯 Exam Tip: कार्बनिक अभिक्रियाओं के वर्गीकरण में, अभिक्रियाशील स्पीशीज़ (नाभिकस्नेही, इलेक्ट्रॉनस्नेही, मुक्त मूलक) और उत्पादों के प्रकार पर ध्यान दें। प्रतिस्थापन, योगात्मक और विलोपन अभिक्रियाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 15.निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरके मध्य कैसा सम्बन्ध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीसमवयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं।
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation):
(क) यह संरचनात्मक समावयवों के एक युग्म को दर्शाती है, विशेष रूप से एक कीटोन और एक इनोल ईथर। ये दोनों यौगिक समान आणविक सूत्र साझा करते हैं लेकिन उनके परमाणुओं की कनेक्टिविटी भिन्न होती है, जिससे विभिन्न क्रियात्मक समूह बनते हैं।
(ख) यह ज्यामितीय समावयवों के एक युग्म को दर्शाती है, जहाँ कार्बन-कार्बन दोहरा आबंध मौजूद होता है। इन समावयवों में परमाणुओं की कनेक्टिविटी समान होती है, लेकिन दोहरे आबंध के चारों ओर परमाणुओं की स्थानिक व्यवस्था भिन्न होती है (सिस-ट्रांस समावयवता)।
(ग) यह अनुनाद संरचनाओं के एक युग्म को दर्शाती है। इन संरचनाओं में परमाणुओं की कनेक्टिविटी समान होती है, लेकिन पाई इलेक्ट्रॉनों और/या एकाकी युग्म इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण भिन्न होता है, जो अणु के वास्तविक संकर का प्रतिनिधित्व करते हैं।
(क) स्थिति समावयवी और मध्यावयवी
(ख) ज्यामितीय समावयवी,
(ग) अनुनाद संरचनाएँ।In simple words: समावयवता का मतलब है कि दो या दो से अधिक यौगिकों का आणविक सूत्र समान होता है लेकिन उनकी संरचना या स्थानिक व्यवस्था भिन्न होती है। संरचनात्मक समावयवों की कनेक्टिविटी अलग होती है, ज्यामितीय समावयवों में स्थानिक व्यवस्था अलग होती है, और अनुनाद संरचनाएं केवल इलेक्ट्रॉनों के वितरण में भिन्न होती हैं।

🎯 Exam Tip: समावयवता के विभिन्न प्रकारों की पहचान करने के लिए, पहले कनेक्टिविटी (संरचनात्मक), फिर स्थानिक व्यवस्था (त्रिविम या ज्यामितीय) और अंत में इलेक्ट्रॉन वितरण (अनुनाद) की जांच करें।

 

Question 16.निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, कार्बधनायन तथा कार्बऋणायन पहचानिए-
(क) \(CH_3O-OCH_3 \longrightarrow CH_3O^\cdot+^\cdot OCH_3\)
(ख) \(\rangle =O + OH^- \longrightarrow \langle O^- + H_2O\)
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बनिक ब्रोमाइड के विदलन को दर्शाता है, जहाँ ब्रोमीन परमाणु एक इलेक्ट्रॉन युग्म को लेकर एक कार्बधनायन और ब्रोमाइड आयन बनाता है।
(घ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक चक्रीय अणु के साथ एक इलेक्ट्रॉनस्नेही (\(E^+\)) की अभिक्रिया को दर्शाता है, जहाँ एक पाई आबंध इलेक्ट्रॉनस्नेही पर आक्रमण करता है, जिससे एक नए आबंध का निर्माण होता है और एक कार्बधनायन मध्यवर्ती बनता है।
Answer:
(क)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह डाईमेथिल परॉक्साइड (\(CH_3O-OCH_3\)) के समांश विदलन को दर्शाता है, जहाँ ऑक्सीजन-ऑक्सीजन आबंध टूटता है और प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु एक इलेक्ट्रॉन लेकर मेथॉक्सी मुक्त मूलक बनाता है।
\[CH_3O-OCH_3 \xrightarrow{\text{समांश विदलन}} CH_3O^\cdot+^\cdot OCH_3\] (मुक्त मूलक)
(ख)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोनिल समूह और हाइड्रॉक्सिल आयन के बीच विषमांश विदलन को दर्शाता है। हाइड्रॉक्सिल आयन कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है, जिससे पाई आबंध टूट जाता है और ऑक्सीजन पर ऋणात्मक आवेश आता है, और फिर प्रोटॉन स्थानांतरण के साथ एक अल्कोहल बनता है।
\[\rangle =O + OH^- \xrightarrow{\text{विषमांश विदलन}} \langle O^- + H_2O\]
(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक विषमांश विदलन को दर्शाता है जहाँ एक एल्किल ब्रोमाइड से ब्रोमाइड आयन निकल जाता है, जिससे एक कार्बधनायन बनता है। इसमें ब्रोमीन इलेक्ट्रॉन युग्म को लेकर निकल जाता है।
\[Br^- \xrightarrow{\text{विषमांश विदलन}} + Br^-\] (कार्बधनायन)
(घ)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक एल्कीन पर इलेक्ट्रॉनस्नेही (\(E^+\)) के विषमांश योगात्मक विदलन को दर्शाता है। एल्कीन के पाई इलेक्ट्रॉन \(E^+\) पर आक्रमण करते हैं, जिससे एक कार्बधनायन बनता है।
\[E^+ \xrightarrow{\text{विषमांश विदलन}} +\] (कार्बधनायन)In simple words: आबंध विदलन या तो समांश (होमोलिटिक) हो सकता है, जहाँ प्रत्येक परमाणु एक इलेक्ट्रॉन लेता है और मुक्त मूलक बनाता है, या विषमांश (हेटेरोलिटिक) हो सकता है, जहाँ एक परमाणु दोनों इलेक्ट्रॉन लेता है और आयन (कार्बधनायन या कार्बऋणायन) बनाता है।

🎯 Exam Tip: विदलन के प्रकार (समांश या विषमांश) और परिणामस्वरूप बनने वाले मध्यवर्ती (मुक्त मूलक, कार्बधनायन, कार्बऋणायन) को स्पष्ट रूप से पहचानना सीखें। मुड़े हुए तीरों का उपयोग इलेक्ट्रॉन विस्थापन को सही ढंग से दर्शाने के लिए करें।

 

Question 17.प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों की व्याख्या कीजिए । निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन-सा इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है?
(क) \(Cl_3CCOOH > Cl_2CHCOOH > ClCH_2COOH\)
(ख) \(CH_3CH_2COOH > (CH_3)_2CHCOOH > (CH_3)_3C.COOH\)
Answer: प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect, I-effect)-भिन्न विद्युत-ऋणात्मकता के दो परमाणुओं के मध्य निर्मित सहसंयोजक आबन्ध में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से सहभाजित होते हैं। इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च विद्युत ऋणात्मकता के परमाणु के ओर अधिक होता है। इस कारण सहसंयोजक आबन्ध ध्रुवीय हो जाता है। आबन्ध ध्रुवता के कारण कार्बनिक अणुओं में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
उदाहरणार्थ-क्लोरोएथेन (\(CH_3CH_2Cl\)) में C-Cl बन्ध ध्रुवीय है। इसकी ध्रुवता के कारण कार्बन क्रमांक-1 पर आंशिक धनावेश (\(\delta^+\)) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (\(\delta^-\)) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के लिए \(\delta\) (डेल्टा) चिह्न प्रयुक्त करते है। आबन्ध में इलेक्ट्रॉन-विस्थापन दर्शाने के लिए तीर (\(\rightarrow\)) का उपयोग किया जाता है, जो \(\delta^-\) से \(\delta^+\) की ओर आमुख होता है।
कार्बन-1 अपने आंशिक धनावेश के कारण पास के C-C आबन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। फलस्वरूप कार्बन-2 पर भी कुछ धनावेश (\(\Delta\delta^+\)) उत्पन्न हो जाता है। C-1 पर स्थित धनावेश की तुलना में \(\Delta\delta^+\) अपेक्षाकृत कम धनावेश दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, C-Cl की ध्रुवता के कारण पास के आबन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। समीप के \(\delta\)-आबन्ध के कारण अगले \(\delta\)-आबन्ध के ध्रुवीय होने की प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव (inductive effect) कहलाती है। यह प्रभाव आगे के आबन्धों तक भी जाता है, लेकिन आबन्धों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है और तीन आबन्धों के बाद लगभग लुप्त हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव का सम्बन्ध प्रतिस्थापी से बन्धित कार्बन परमाणु को इलेक्ट्रॉन प्रदान करने अथवा अपनी ओर आकर्षित कर लेने की योग्यता से है। इस योग्यता के आधार पर प्रतिस्थापियों को हाइड्रोजन के सापेक्ष इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (electron-withdrawing) या इलेक्ट्रॉनदाता समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हैलोजन तथा कुछ अन्य समूह; जैसे-नाइट्रो (\(-NO_2\)), सायनो (\(-CN\)), कार्बोक्सी (\(-COOH\)), एस्टर (\(-COOR\)), ऐरिलॉक्सी (\(-OAr\)) इलेक्ट्रॉन आकर्षी समूह हैं; जबकि ऐल्किल समूह; जैसे-मेथिल (\(-CH_3\)), एथिल (\(-CH_2-CH_3\)) आदि इलेक्ट्रॉनदाता समूह हैं।
इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (E प्रभाव) [Electromeric Effect, E-effect]-यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबन्ध (द्विआबन्ध अथवा त्रिआबन्ध) वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है। इस प्रभाव में आक्रमण करने वाले अभिकारके की माँग के कारण बहु-आबन्ध से बन्धित परमाणुओं में एक सहभाजित -इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है। अभिक्रिया की परिधि से आक्रमणकारी अभिकारक को हटाते ही यह प्रभाव शून्य हो। जाता है। इसे E द्वारा दर्शाया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन के संचलन को वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित । किया जाता है। स्पष्टतः दो प्रकार के इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव होते हैं-
(i) धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+E प्रभाव)-इस प्रभाव में बहुआबन्ध के ए-इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित होता है। उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+E प्रभाव) का एक उदाहरण है। इसमें एक एल्कीन के पाई इलेक्ट्रॉन एक आक्रमणकारी इलेक्ट्रॉनस्नेही (\(H^+\)) की ओर विस्थापित होते हैं, जिससे \(H^+\) उस कार्बन परमाणु से बंधता है जिस पर इलेक्ट्रॉन विस्थापित हुए थे। यह इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण स्थानांतरण को दर्शाता है जब एक बाहरी अभिकर्मक मौजूद होता है।
(ii) ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव(-E प्रभाव)-इस प्रभाव में बहु-आबन्ध के -इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित नहीं होता है। इसका उदाहरण निम्नलिखित है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (-E प्रभाव) का एक उदाहरण है। इसमें एक कार्बोनिल समूह में पाई इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन परमाणु पर विस्थापित होते हैं, जिससे ऑक्सीजन पर ऋणात्मक आवेश आता है और कार्बन पर धनात्मक आवेश आता है। इस स्थिति में, आक्रमणकारी अभिकर्मक (\(CN^-\)) कार्बन पर आक्रमण करता है, न कि उस परमाणु पर जहाँ इलेक्ट्रॉन विस्थापित हुए थे।
जब प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव एक-दूसरे की विपरीत दिशा में कार्य करते हैं, तब इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव प्रबल होता है। (क) \(Cl_3CCOOH > Cl_2CHCOOH > ClCH_2COOH\) यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रेरणिक प्रभाव (-I) दर्शाता है।
(ख) \(CH_3CH_2COOH > (CH_3)_2CHCOOH > (CH_3)_3C.COOH\) यह इलेक्ट्रॉन दाता प्रेरणिक प्रभाव (+I) दर्शाता है।In simple words: प्रेरणिक प्रभाव एक आबंध में इलेक्ट्रॉनों के आंशिक खींचने या धकेलने का स्थायी प्रभाव है, जबकि इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव बहु-आबंध में इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण स्थानांतरण का एक अस्थायी प्रभाव है जो केवल अभिकर्मक की उपस्थिति में होता है।

🎯 Exam Tip: प्रेरणिक और इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों के बीच के मुख्य अंतरों (स्थायित्व, इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन, और आक्रमणकारी अभिकर्मक की आवश्यकता) पर ध्यान केंद्रित करें। अम्लता पर उनके प्रभाव को समझने के लिए इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने वाले और इलेक्ट्रॉन देने वाले समूहों के प्रभावों का विश्लेषण करें।

 

Question 18.प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए
(क) क्रिस्टलन,
(ख) आसवन,
(ग) क्रोमैटोग्रैफी ।
Answer:
(क) क्रिस्टलन (Crystallisation)-यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की प्रायः प्रयुक्त विधि है। यह विधि कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्धि की किसी उपयुक्त विलायक में इनकी विलेयताओं में निहित अन्तर पर आधारित होती है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय (sparingly soluble) होता है, परन्तु उच्चतर ताप परे यथेष्ट मात्रा में वह घुल जाता है। तत्पश्चात् विलयन को इतना सान्द्रित करते हैं कि वह लगभग संतृप्त (saturate) हो जाए। विलयन को ठण्डा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलित हो जाता है जिसे निस्यन्दन द्वारा पृथक् कर लेते हैं। निस्यन्द (मातृ द्रव) में मुख्य रूप से अशुद्धियाँ तथा यौगिक की अल्प मात्रा रह जाती है। यदि यौगिक किसी एक विलायक में अत्यधिक विलेय तथा किसी अन्य विलायक में अल्प विलेय होता है, तब क्रिस्टलन उचित मात्रा में इन विलायकों को मिश्रित करके किया जाता है। सक्रियिंत काष्ठ कोयले'(activated charcoal) की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धियों की विलेयताओं में कम अन्तर होने की दशा में बार-बार क्रिस्टलन द्वारा शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।
(ख) आसवन (Distillation)-इस महत्त्वपूर्ण विधि की सहायता से (i) वाष्पशील (volatile) द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से एवं (ii) ऐसे द्रवों को, जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर हो, पृथक् कर सकते हैं। भिन्न क्वथनांकों वाले द्रव भिन्न ताप पर वाष्पित होते हैं। वाष्पों को ठण्डा करने से प्राप्त द्रवों को अलग-अलग एकत्र कर लेते हैं। क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334K) और ऐनिलीन (क्वथनांक 457 K) को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक् कर सकते हैं। द्रव-मिश्रण को गोल पेंदे वाले फ्लास्क में लेकर हम सावधानीपूर्वक गर्म करते हैं। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। वाष्प को संघनित्र की सहायता से संघनित करके प्राप्त द्रव को ग्राही में एकत्र कर लेते हैं। उच्च क्वथनांक वाले घटक के वाष्प बाद में बनते हैं। इनमें संघनन से प्राप्त द्रव को दूसरे ग्राही में एकत्र कर लेते हैं।
(ग) वर्णलेखन (Chromatography)-‘वर्णलेखन (क्रोमैटोग्रफी) शोधन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है जिसका उपयोग यौगिकों का शोधन करने में, किसी मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने तथा यौगिकों की शुद्धता की जाँच करने के लिए विस्तृत रूप से किया जाता है। क्रोमैटोग्रफी विधि का उपयोग सर्वप्रथम पादपों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था। 'क्रोमैटोग्रैफी' शब्द ग्रीक शब्द क्रोमा' (chroma) से बना है जिसका अर्थ है 'रंग' । इस तकनीक में सर्वप्रथम यौगिकों के मिश्रण को स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर अधिशोषित कर दिया जाता है। स्थिर प्रावस्था ठोस अथवा द्रव हो सकती है। इसके पश्चात् स्थिर प्रावस्था में से उपयुक्त विलायक, विलायकों के मिश्रणं अथवा गैस को धीरे-धीरे प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार मिश्रण के अवयव क्रमशः एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। गति करने वाली प्रावस्था को 'गतिशील प्रावस्था (mobile phase) कहते हैं। अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्तों के आधार पर वर्णलेखन को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से दो हैं-
1. अधिशोषण-(वर्णलेखन) (Adsorption chromatography) - यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि किसी विशिष्ट अधिशोषक' (adsorbent) पर विभिन्न यौगिक भिन्न अंशों में अधिशोषित होते हैं। साधारणतः ऐलुमिना तथा सिलिका जेल अधिशोषक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। स्थिर प्रावस्था (अधिशोषक) पर गतिशील प्रावस्था प्रवाहित करने के उपरान्त मिश्रण के अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग दूरी तय करते हैं। निम्नलिखित दो प्रकार की वर्णलेखन-तकनीकें हैं, जो विभेदी-अधिशोषण सिद्धान्त पर आधारित हैं-
• कॉलम-वर्णलेखन अर्थात् स्तम्भ-वर्णलेखन (Column Chromatography)
• पतली पर्त वर्णलेखन (Thin Layer Chromatography)
2. वितरण क्रोमैटोग्रैफी (Partition chromatography)-वितरण क्रोमैटोग्रॅफी स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के मध्य मिश्रण के अवयवों के सतत् विभेदी वितरण पर आधारित है। कागज वर्णलेखन (paper chromatography) इसका एक उदाहरण है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार के क्रोमैटोग्रॅफी कागज का इस्तेमाल किया जाता है। इस कागज के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।In simple words: क्रिस्टलन विलेयता में अंतर का उपयोग करके ठोसों को शुद्ध करता है; आसवन क्वथनांक में अंतर का उपयोग करके द्रवों को अलग करता है; और क्रोमैटोग्रैफी स्थिर और गतिशील प्रावस्थाओं के बीच यौगिकों के विभिन्न वितरण के आधार पर मिश्रणों को पृथक करती है।

🎯 Exam Tip: शुद्धिकरण की प्रत्येक विधि के मूल सिद्धांत और एक-एक उदाहरण पर ध्यान दें। क्रिस्टलन में विलेयता, आसवन में क्वथनांक, और क्रोमैटोग्रैफी में अधिशोषण/वितरण के सिद्धांत को याद रखें।

 

Question 19.ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक S, में भिन्न हैं, को पृथक करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
Answer: ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक् करने के लिए। क्रिस्टलन विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं। जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय तथा उच्च ताप पर विलेय होता है। इसके पश्चात् विलयन को सान्द्रित करते हैं जिससे वह लगभग संतृप्त हो जाए। अब अल्प-विलेय घटक पहले क्रिस्टलीकृत हो जाएगा तथा अधिक विलेय घटक पुनः गर्म करके ठण्डा करने पर क्रिस्टलीकृत होगा। इसके अतिरिक्त सक्रियित काष्ठ कोयले की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाल दी जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में कम अन्तर होने पर बार-बार क्रिस्टलन करने पर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।In simple words: क्रिस्टलन विधि का उपयोग उन यौगिकों को अलग करने के लिए किया जाता है जिनकी विलेयता एक ही विलायक में अलग-अलग होती है; गर्म करने पर अधिक विलेयता और ठंडा करने पर क्रिस्टलीकरण के माध्यम से शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

🎯 Exam Tip: क्रिस्टलन विधि की प्रक्रिया को याद रखें, जिसमें घोलना, गर्म करना, सांद्रण, ठंडा करना और फिल्टर करना शामिल है। विलेयता के अंतर को समझना इस विधि का महत्वपूर्ण बिंदु है।

 

Question 20.आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है? विवेचना कीजिए ।
Answer: आसवन का तात्पर्य द्रव का वाष्प में परिवर्तन तथा वाष्प का संघनित होकर शुद्ध द्रव देना है। इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जो बिना अपघटित हुए उबलते हैं तथा जिनमें अवाष्पशील अशुद्धियाँ होती हैं।
निम्न दाब पर आसवन में भी गर्म करने पर द्रव वाष्प में परिवर्तित होता है तथा संघनित होकर शुद्ध द्रव देता है परन्तु यहाँ निकाये पर कार्यरत् दाब वायुमण्डलीय दाब नहीं होता है; उसे निर्वात् पम्प की सहायता से घटा दिया जाता है। दाब घटाने पर द्रव का क्वथनांक घट जाता है। अतः इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जिनके क्वथनांक उच्च होते हैं या वे अपने क्वथनांक से नीचे अपघटित हो जाते हैं।
भाप आसवन कम दाब पर आसवन के समान होता है लेकिन इसमें कुल दाब में कोई कमी नहीं आती है। इसमें कार्बनिक द्रव तथा जल उस ताप पर उबलते हैं जब कार्बनिक द्रव का वाष्प दाब (\(p_1\)) तथा जल का वाष्प दाब (\(p_2\)) वायुमण्डलीय दाब (\(p\)) के बराबर हो जाते हैं।
\(p= p_1 + p\)-कक्षकों
इस स्थिति में कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर उबलता है जिससे उसका अपघटन नहीं होता है।In simple words: आसवन द्रवों को उनके क्वथनांक के अंतर के आधार पर अलग करता है। निम्न दाब पर आसवन उच्च क्वथनांक वाले पदार्थों के लिए किया जाता है ताकि वे कम तापमान पर उबालें और अपघटित न हों, जबकि भाप आसवन पानी और अघुलनशील कार्बनिक यौगिकों के मिश्रण के लिए होता है, जहाँ कुल वाष्प दाब वायुमंडलीय दाब तक पहुँचने पर वे कम तापमान पर उबलते हैं।

🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के आसवन (साधारण, निम्न दाब, भाप) के मूलभूत सिद्धांतों, उनकी उपयोगिताओं और उनके बीच के महत्वपूर्ण अंतरों पर ध्यान दें, खासकर क्वथनांक, दाब और अपघटन के संदर्भ में।

 

Question 21.लैंसे-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए ।
Answer: किसी कार्बनिक यौगिक में शुपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजेन तथा फॉस्फोरस की पहचान 'लैंसे-परीक्षण' (Lassaigne's Test) द्वारा की जाती है। यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर ये तत्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इनमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं-
\(Na+C+N \xrightarrow{\Delta} NaCN\)
\(2Na + S \xrightarrow{\Delta} Na_2S\)
\(Na+C+N+S \longrightarrow NaSCN\)
\(Na + X \xrightarrow{\Delta} NaX\) (\(X = Cl, Br\) अथवा I)
C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं। सोडियम संगलन से प्राप्त अवशेष को आसुत जल के साथ उबालने पर सोडियम सायनाइड, सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं। इस निष्कर्ष को ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष' (Sodium Fusion Extract) कहते हैं।In simple words: लैंसे-परीक्षण कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजन जैसे तत्वों का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसमें यौगिक को सोडियम धातु के साथ गर्म करके सहसंयोजी तत्वों को आयनिक यौगिकों में बदल दिया जाता है, जिन्हें पानी में घोलकर विभिन्न परीक्षणों के लिए उपयोग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: लैंसे-परीक्षण के पीछे के रसायन विज्ञान को समझें- कि कैसे सहसंयोजी तत्व आयनिक रूप में परिवर्तित होते हैं, और बनने वाले आयनिक यौगिकों की पहचान कैसे की जाती है। प्रत्येक तत्व के लिए विशिष्ट प्रतिक्रियाओं को याद रखें।

 

Question 22.किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की (i) डयूमा विधि तथा (ii) कैल्डाल विधि के सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए ।
Answer: नाइट्रोजन के परिमाणात्मक निर्धारण की निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं-
(i) डयूमा विधि (Duma's Method)-नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर इसमें उपस्थित कार्बन, हाइड्रोजन, गन्धक तथा नाइट्रोजन क्रमशः \(CO_2\), \(H_2O\), \(SO_2\) और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (\(NO_2\), \(NO\), \(N_2O\)) के रूप में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। इस गैसीय मिश्रण को रक्त तप्त कॉपर की जाली के ऊपर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का नाइट्रोजन में अपचयन हो जाता है।
\(4Cu + 2NO_2 \longrightarrow 4CuO + N_2 \uparrow\)
\(2Cu +2NO \longrightarrow 2CuO +N_2 \uparrow\)
\(Cu +N_2O \longrightarrow CuO + N_2 \uparrow\)
इस प्रकार \(N_2\), \(CO_2\), \(H_2O\) तथा \(SO_2\) युक्त गैसीय मिश्रण को KOH से भरी नाइट्रोमीटर नामक अंशांकित नली में प्रवाहित करने पर \(CO_2\), \(H_2O\) तथा \(SO_2\) का KOH द्वारा अवशोषण हो जाता है। और बची हुई \(N_2\) गैस को नाइट्रोमीटर में जल के ऊपर एकत्र कर लिया जाता है। इस नाइट्रोजन का आयतन वायुमण्डल के दाब तथा ताप पर नोट कर लेते हैं। फिर इस आयतन को गैस समीकरण की सहायता से सामान्य ताप व दाब (N.T.P) पर परिवर्तित कर लेते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 'ड्यूमा विधि' नामक एक उपकरण सेटअप का आरेख है, जिसका उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन की मात्रा निर्धारित करने के लिए किया जाता है। सेटअप में एक भट्टी में कार्बनिक यौगिक, क्यूप्रिक ऑक्साइड, और अपचयित कॉपर जाली युक्त एक दहन नली दिखाई देती है। दहन के बाद उत्पन्न गैसों को एक नाइट्रोमीटर से गुजारा जाता है, जिसमें मर्करी सील होती है, जिससे नाइट्रोजन गैस को एकत्रित और मापा जा सके।
मान लिया, m ग्राम कार्बनिक यौगिक से N.T.P. पर x मिली नाइट्रोजन प्राप्त होती है।
\(N.T.P.\) पर 22,400 मिली नाइट्रोजन (\(N_2\)) की मात्रा = 28 ग्राम (\(N_2\) का ग्राम अणुभार)
\(N.T.P.\) पर x मिली नाइट्रोजन (\(N_2\)) की मात्रा = \( \frac{28x}{22,400} \) ग्राम
\(m\) ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (\(N_2\)) की मात्रा = \( \frac{28x}{22,400} \) ग्राम
100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (\(N_2\)) की मात्रा = \( \frac{28x \times 100}{22,400 \times m} \) ग्राम
नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा (%) = \( \frac{28}{22,400} \times \frac{\text{N}_2 \text{ का N. T. P. पर आयतन}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \)
नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा (%) = \( \frac{1}{8} \times \frac{\text{N}_2 \text{ का N. T. P. पर आयतन}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \)
(ii) कैल्डाल विधि (Kjeldahl's Method)-यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि जब किसी नाइट्रोजनयुक्त कार्बन यौगिक को पोटैशियम सल्फेट की उपस्थिति में सान्द्र \(H_2SO_4\) के साथ गर्म करते हैं तो उसमें उपस्थित नाइट्रोजन पूर्णरूप से अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार प्राप्त अमोनियम सल्फेट को साद्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर अमोनिया गैस निकलती है जिसको ज्ञात सान्द्रण वाले \(H_2SO_4\) के निश्चित आयतन में अवशोषित कर लेते हैं। इस अम्ल का मानक \(NaOH\) के साथ अनुमापन करके गणना द्वारा अवशोषित हुई अमोनिया की मात्रा ज्ञात की जाती है। फिर नाइट्रोजन के आयतन की गणना कर ली जाती है।
\((NH_4)_2SO_4 + 2NaOH \longrightarrow Na_2SO_4 + 2H_2O + 2NH_3\uparrow\)
\(2NH_3 + H_2SO_4 \longrightarrow (NH_4)_2SO_4\)
मान लिया, कार्बनिक यौगिक का भार = m प्रयुक्त अम्ल का आयतन =y मिली प्रयुक्त अम्ल की नॉर्मलता = N
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 'कैल्डाल विधि' नामक उपकरण सेटअप का आरेख है, जिसका उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन की मात्रा निर्धारित करने के लिए किया जाता है। इसमें एक कैल्डाल फ्लास्क में यौगिक को \(H_2SO_4\) और \(CuSO_4\) के साथ गर्म करके अमोनियम सल्फेट में बदला जाता है। फिर अमोनियम सल्फेट को \(NaOH\) के साथ गर्म किया जाता है ताकि अमोनिया गैस मुक्त हो, जिसे एक मानक \(H_2SO_4\) अम्ल में अवशोषित किया जाता है। यह सेटअप अमोनिया के उत्पादन, संग्रह और मापन की पूरी प्रक्रिया को दर्शाता है।
V मिली N नॉर्मलता का अम्ल = V मिली N नॉर्मलता की अमोनिया
1000 मिली N नॉर्मलता वाली अमोनिया में 17 ग्राम अमोनिया या 14 ग्राम नाइट्रोजन होती है।
V मिली \(N-NH_3\) में नाइट्रोजन की मात्रा = \( \frac{14}{1000} \times V \times N = 0-014 NV \) ग्राम
m ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की मात्रा = \(0-014 NV\) ग्राम
100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की मात्रा = \( \frac{0-014NV \times 100}{m} = \frac{1-4NV}{m} \) ग्राम
कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा
(%) = \( \frac{1.4 \times \text{प्राप्त } NH_3 \text{ की नॉर्मलता } \times \text{प्राप्त } NH_3 \text{ का आयतन (मिली में)}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार (ग्राम में)}} \)In simple words: ड्यूमा विधि में, कार्बनिक यौगिक को जलाकर नाइट्रोजन गैस में बदला जाता है, जिसे मापा जाता है। कैल्डाल विधि में, नाइट्रोजन को पहले अमोनियम सल्फेट में और फिर अमोनिया में बदला जाता है, जिसे एक मानक अम्ल में अवशोषित करके मात्रा निर्धारित की जाती है।

🎯 Exam Tip: ड्यूमा और कैल्डाल विधियों के बीच के मुख्य अंतरों को याद रखें, विशेष रूप से उनकी प्रक्रिया, गणना सूत्र और अनुप्रयोगों को। ड्यूमा विधि सभी नाइट्रोजनयुक्त यौगिकों के लिए उपयुक्त है, जबकि कैल्डाल विधि नाइट्रो, एज़ो और रिंग में नाइट्रोजन वाले यौगिकों के लिए नहीं है।

 

**Question 23. किसी यौगिक में हैलोजेन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए ।** **Answer:** **

(i) हैलोजेन का आकलन (Estimation of Halogens)

** कार्बनिक यौगिक के ज्ञात भार को सधूम HNO3 तथा AgNO3 के कुछ क्रिस्टलों के साथ केरियस नली में लेते हैं। नली का ऊपरी सिरा बन्द कर दिया जाता है। केरियस नली को विद्युत भट्टी में रखकर 180°-200°C पर लगभग 3-4 घण्टे गर्म करते हैं। यौगिक में उपस्थित हैलोजेन (Cl, Br, I), सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप में बदल जाते हैं। सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप को धोकर तथा सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सिल्वर हैलाइड के भार से हैलोजेन की प्रतिशत मात्रा निम्नलिखित गणना की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): केरियस विधि का उपयोग हैलोजेनयुक्त कार्बनिक यौगिकों में हैलोजेन के आकलन के लिए किया जाता है। एक सीलबन्द केशिका (Carius tube) में कार्बनिक यौगिक, सधूम नाइट्रिक अम्ल (fuming HNO3) और सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) को डालकर गर्म किया जाता है। अभिक्रिया से सिल्वर हैलाइड (AgX) अवक्षेपित होता है जिसे बाद में मात्रात्मक रूप से निर्धारित किया जाता है। अभिक्रियाएँ - हैलोजेनयुक्त कार्बनिक यौगिक + HNO3 \( \implies \) HX (हैलोजेन अम्ल) HX + AgNO3 \( \implies \) AgX\( \downarrow \) + HNO3 सिल्वर हैलाइड मान लिया कि m ग्राम पदार्थ से x ग्राम AgCl प्राप्त होता है। (AgCl का अणुभार = 108+35.5=143.5) 143.5 ग्राम AgCl में क्लोरीन की मात्रा = 35.5 ग्राम \( \therefore \) x ग्राम AgCl में क्लोरीन की मात्रा = \( \frac{35.5}{143.5} \) x x ग्राम \( \therefore \) m ग्राम कार्बनिक यौगिक में क्लोरीन की मात्रा = \( \frac{35.5}{143.5} \) x x ग्राम \( \therefore \) 100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में क्लोरीन की मात्रा = \( \frac{35.5 \times x \times 100}{143.5 \times m} \) ग्राम Cl की प्रतिशत मात्रा (%)= \( \frac{35.5}{143.5} \times \frac{\text{AgBr का भार}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \) इसी प्रकार, Br की प्रतिशत मात्रा (%)= \( \frac{80}{188} \times \frac{\text{AgBr का भार}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \) I की प्रतिशत मात्रा (%)= \( \frac{127}{235} \times \frac{\text{AgI का भार}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \) **

(ii) सल्फर का आकलन (Estimation of Sulphur)

** इस सिद्धान्त के अनुसार, सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित समस्त गन्धक, सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती है। इसमें BaCl2 विलयन मिलाकर इससे BaSO4 अवक्षेपित कर लिया जाता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर और सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार BaSO4 के भार की सहायता से गन्धक की प्रतिशत मात्रा की गणना कर लेते हैं। अभिक्रियाएँ- सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक + सान्द्र HNO3 \( \implies \) CO2\( \uparrow \) + H2O+NO2\( \uparrow \) + H2SO4 H2SO4 + BaCl2\( \implies \) BaSO4\( \downarrow \) + 2HCl माना, m ग्राम कार्बनिक यौगिक से x ग्राम BaSO4 बनता है। 233 ग्राम BaSO4 में S की मात्रा = 32 ग्राम \( \therefore \) x ग्राम BaSO4 में S की मात्रा = \( \frac{32}{233} \) x x ग्राम \( \therefore \) m ग्राम कार्बनिक यौगिक में S की मात्रा = \( \frac{32}{233} \) x x ग्राम \( \therefore \) 100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में S की मात्रा = \( \frac{32}{233} \times \frac{x}{m} \times 100 \) S की प्रतिशत मात्रा (%)= \( \frac{32}{233} \times \frac{\text{BaSO4 का भार}}{\text{कार्बनिक यौगिक का भार}} \times 100 \) **

(iii) फॉस्फोरस का आकंलन (Estimation of Phosphorus)

** कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञातं मात्रा को सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उसमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है। इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोटोमॉलिब्डेट, (NH4)3 PO4.12MoO3 के रूप में हम अवक्षेपित कर लेते हैं, अन्यथा फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशिया मिश्रण मिलाकर MgN4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है। माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = m ग्राम और अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट = m1 ग्राम (NH4)3 PO4.12 MoO3 का मोलर द्रव्यमान = 1877 ग्राम है। फॉस्फोरस की प्रतिशतता = \( \frac{31 \times m_1 \times 100}{1877 \times m} \) % यदि फॉस्फोरस का Mg2P2O7 के रूप में आकलन किया जाए तो फॉस्फोरस की प्रतिशतता = \( \frac{62 \times m_1 \times 100}{222 \times m} \) % जहाँ Mg2P2O7 का मोलर द्रव्यमान 222 u, लिए गए कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान का बने हुए Mg2P2O7 का द्रव्यमान m1 तथा Mg2P2O7) यौगिक में उपस्थित दो फॉस्फोरस परमाणुओं का द्रव्यमान 62 है।In simple words: This question describes methods to quantify halogens, sulfur, and phosphorus in organic compounds. Halogens are estimated by converting them to silver halides and weighing them. Sulfur is converted to sulfuric acid, then precipitated as barium sulfate for weighing. Phosphorus is oxidized to phosphoric acid and then precipitated as ammonium phosphomolybdate or magnesium pyrophosphate for quantification.

🎯 Exam Tip: Understanding the underlying chemical reactions and the stoichiometry involved in each estimation method is crucial for accurate calculations and scoring.

 

**Question 24. पेपर क्रोमैटोग्रैफी के सिद्धान्त को समझाइए ।** **Answer:** पेपर क्रोमैटोग्रैफी वितरण क्रोमैटोग्रैफी का एक प्रकार है। कागज अथवा पेपर क्रोमैटोग्रफी में एक विशिष्ट प्रकार का क्रोमैटोग्रफी पेपर प्रयोग किया जाता है। इस पेपर के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं। **

क्रोमैटोग्रैफी कागज की एक पट्टी (strip)

** क्रोमैटोग्रैफी कागज की एक पट्टी (strip) के आधार पर मिश्रण का बिन्दु लगाकर उसे जार में लटका देते हैं (चित्र-4)। जार में कुछ ऊँचाई तक उपयुक्त विलायक अथवा विलायकों का मिश्रण भरा होता है, जो गतिशील प्रावस्था का कार्य करता है। केशिका क्रिया के कारण पेपर की पट्टी पर विलायक ऊपर की ओर बढ़ता है तथा बिन्दु पर प्रवाहित होता है। विभिन्न यौगिकों का दो प्रावस्थाओं में वितरण भिन्न-भिन्न होने के कारण वे अलग-अलग दूरियों तक आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार विकसित पट्टी को 'क्रोमैटोग्राम' (chromatogram) कहते हैं। पतली पर्त की भाँति पेपर की पट्टी पर विभिन्न बिन्दुओं की स्थितियों को या तो पराबैंगनी प्रकाश के नीचे रखकर या उपयुक्त अभिकर्मक के विलयन को छिड़ककर हम देख लेते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पेपर क्रोमैटोग्रैफी के दो भिन्न विन्यासों को दर्शाता है। एक कागज की पट्टी (क्रोमैटोग्रैफी) को एक जार में लटकाया जाता है, जिसके निचले हिस्से में विलायक होता है। विलायक केशिका क्रिया द्वारा ऊपर चढ़ता है और मिश्रण के घटकों को अलग करता है। यह विधि विभिन्न यौगिकों के पृथक्करण और पहचान में सहायक है।In simple words: Paper chromatography separates components of a mixture based on their differential distribution between a stationary phase (water trapped in paper) and a mobile phase (solvent). Components travel different distances up the paper depending on their affinities for each phase.

🎯 Exam Tip: Focus on explaining the role of stationary and mobile phases and the concept of differential partitioning. A clear description of the process with key terms will earn full marks.

 

**Question 25. सोडियम संगलने निष्कर्ष में हैलोजेन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?** **Answer:** NaCN तथा Na2S को विघटित करने के लिए सोडियम निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल के साथ उबाला जाता है। NaCN+ HNO3 \( \implies \) NaNO3 + HCN\( \uparrow \) Na2S + 2HNO3 \( \implies \) 2NaNO3 + H2S \( \uparrow \) यदि वे विघटित नहीं होते हैं तब वे AgNO3 से अभिक्रिया करके परीक्षण में निम्न प्रकार बाधा पहुँचाते हैं- Na2S + 2AgNO3 \( \implies \) Ag2S\( \downarrow \)+ 2NaNO3 काला अवक्षेप NaCN + AgNO3 \( \implies \) AgCN\( \downarrow \) + NaNO3 सफेद अवक्षेपIn simple words: Nitric acid is added before silver nitrate to decompose any sodium cyanide (NaCN) or sodium sulfide (Na2S) formed during the fusion, preventing them from interfering with the silver halide precipitation by forming unwanted precipitates like AgCN or Ag2S.

🎯 Exam Tip: Highlight the reason for interference (formation of AgCN or Ag2S) and how nitric acid prevents this by converting NaCN and Na2S to gaseous products (HCN, H2S).

 

**Question 26. नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?** **Answer:** कार्बनिक यौगिक का सोडियम के साथ संगलन सह-संयोजी रूप में उपस्थित इन तत्त्वों को आयनिक रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।In simple words: Organic compounds contain nitrogen, sulfur, and phosphorus in covalent forms. Fusing them with sodium converts these elements into their ionic salts (e.g., NaCN, Na2S, Na3PO4), which are soluble in water and can then be easily detected by specific tests.

🎯 Exam Tip: The core idea is to convert covalently bonded elements into ionically bonded salts to make them detectable in aqueous solution. Mentioning the change from covalent to ionic form is key.

 

**Question 27. कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।** **Answer:** कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण को निम्न विधियों द्वारा पृथक् किया जा सकता है- 1. कपूर ऊर्ध्वपातनीय है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अतः मिश्रण को ऊर्ध्वपातित करने पर कपूर फनल के किनारों पर प्राप्त हो जाता है जबकि CaSO4 चाइना डिश में शेष रह जाता है। 2. कपूर कार्बनिक विलायकों, जैसे- CCl4, CHCl3 आदि में विलेय होता है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अतः मिश्रण को कार्बनिक विलायक के साथ हिलाने पर कपूर विलयन में चला जाता है जबकि CaSO4 अपशिष्ट रूप में रहता है। विलयन को छानकर, वाष्पित करके कपूर को प्राप्त कर लेते हैं।In simple words: Camphor can be separated from calcium sulfate using sublimation (camphor sublimes, calcium sulfate doesn't) or by dissolving camphor in an organic solvent (like CCl4 or CHCl3) where calcium sulfate is insoluble, then filtering and evaporating the solvent.

🎯 Exam Tip: Identify the unique physical properties (sublimation, solubility) of camphor that allow for its separation from calcium sulfate. Providing two distinct methods demonstrates comprehensive understanding.

 

**Question 28. भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत। क्यों हो जाता है?** **Answer:** भाप आसवन में, कार्बनिक द्रव और जल का मिश्रण उस ताप पर उबलता है जिस पर द्रव तथा जल के दाबों का योग वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है। मिश्रण के क्वथनांक पर जल का वाष्प दाब उच्च तथा द्रव का वाष्प दाब अत्यधिक कम (10-15mm) होता है अतः कार्बनिक द्रव वायुमंडलीय दाब से कम दाब पर आसवित हो जाता है अर्थात् कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर ही आसवित हो जाता है।In simple words: In steam distillation, an immiscible organic liquid boils at a temperature below its normal boiling point because its vapor pressure combines with that of steam to reach atmospheric pressure. This allows the organic compound to distill at a lower temperature, preventing decomposition.

🎯 Exam Tip: The core concept is that the sum of the partial vapor pressures of the organic liquid and water equals atmospheric pressure at a temperature lower than the boiling point of either component individually. This prevents thermal decomposition.

 

**Question 29. क्या CCl4 सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए ।** **Answer:** AgCl का अवक्षेप नहीं बनेगा क्योंकि CCl4 सहसंयोजी यौगिक है तथा आयनित होकर Cl आयन नहीं देता है।In simple words: CCl4 is a covalent compound, meaning it does not readily dissociate into Cl- ions in solution. Silver nitrate tests for free halide ions, so since CCl4 doesn't produce these, no AgCl precipitate will form.

🎯 Exam Tip: Emphasize the covalent nature of CCl4 and its inability to ionize into Cl- ions, which are required to react with Ag+ to form AgCl precipitate. Contrast with ionic halides that would precipitate AgCl.

 

**Question 30. किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?** **Answer:** CO2 अम्लीय प्रकृति की होती है तथा प्रबल क्षार KOH से क्रिया करके K2CO3 बनाती है। 2KOH+ CO2 \( \implies \) K2CO3 + H2O इससे KOH का द्रव्यमान बढ़ जाता है। निर्मित CO2 के कारण द्रव्यमान में वृद्धि से कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन की मात्रा की गणना निम्न सम्बन्ध का प्रयोग करके की जाती है %C= \( \frac{12}{44} \times \frac{\text{निर्मित CO2 का द्रव्यमान}}{\text{लिए गए पदार्थ का द्रव्यमान}} \times 100 \)In simple words: Potassium hydroxide (KOH) is a strong base that reacts with acidic carbon dioxide (CO2) to form potassium carbonate. This reaction efficiently absorbs CO2, allowing for the quantitative measurement of carbon content in organic compounds based on the increase in KOH solution mass.

🎯 Exam Tip: Explain that CO2 is acidic and KOH is a strong base, leading to a neutralization reaction. The mass increase of the KOH absorber is directly proportional to the CO2 absorbed, which helps in calculating carbon percentage.

 

**Question 31. सल्फर के लेड ऐसीटेटू द्वारा परीक्षण में सोडियम संगलन निष्कर्ष को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा । क्यों?** **Answer:** सल्फर के परीक्षण में सोडियम निष्कर्ष को CH3COOH से अम्लीकृत करते हैं क्योकि लेड ऐसीटेट विलेय होता है तथा परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करता है। यदि H2SO4 का प्रयोग किया जाए तब लेड ऐसीटेट H2SO4 से क्रिया करके लेड सल्फेट का सफेद अवक्षेप बनाता है जो परीक्षण में बाधा उत्पन्न करता है।In simple words: Acetic acid is used because it acidifies the sodium fusion extract without interfering with the subsequent lead acetate test for sulfur. If sulfuric acid were used, it would react with lead acetate to form a white precipitate of lead sulfate, leading to a false positive result for sulfur.

🎯 Exam Tip: The key is to avoid false positives. Sulfuric acid (H2SO4) forms an insoluble lead sulfate (PbSO4) with lead acetate, which mimics the positive test for sulfur (lead sulfide precipitate), hence acetic acid (CH3COOH) is preferred as it doesn't interfere.

 

**Question 32. एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20 g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की मात्राओं की गणना कीजिए ।** **Answer:** % कार्बन = 69% 0.20 g यौगिक में कार्बन की मात्रा = \( 0.2 \times \frac{69}{100} = 0.138 \) g % हाइड्रोजन = 4.8% 0.20 g यौgिक में हाइड्रोजन की मात्रा = \( \frac{0.2 \times 4.8}{100} = 0.0096 \) g अब C=CO2 12 g कार्बन दहन पर देता है = 44 g CO2 0.138 g कार्बन दहन पर देगा = \( \frac{44}{12} \times 0.138 \) g CO2 = 0.506 g CO2 2H = H2O 2 g हाइड्रोजन दहन पर देता है = 18 g जल 0.0096 g हाइड्रोजन दहन पर देगा = \( \frac{18}{2} \times 0.0096 \) g जल = 0.0864g जलIn simple words: To calculate the amounts of CO2 and H2O produced from the combustion of a 0.20g organic compound, first determine the mass of carbon and hydrogen present in that 0.20g based on their given percentages. Then, use the stoichiometric ratios from the combustion reactions (C to CO2, 2H to H2O) to find the corresponding masses of CO2 and H2O.

🎯 Exam Tip: Remember to calculate the actual mass of carbon and hydrogen in the given sample first. Then use molar mass ratios (C:CO2 = 12:44, 2H:H2O = 2:18) for stoichiometric conversion. Precision in calculation is key.

 

**Question 33. 0.50 g कार्बनिक यौगिक को कैल्डाल विधि के अनुसार उपचार करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5 M H2SO4 के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई । यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।** **Answer:** कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = 0.50g लिए गए 0.5 M H2SO4 का आयतन = 50mL अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M NaOH विलयन की आवश्यकता होती है। 60 mL 0.5 NaOH = \( \frac{60}{2} \) mL 0.5 M H2SO4 = 30 mL 0.5 M H2SO4 विलयन 0.5 M H2SO4 का प्रयुक्त आयतन = 50 - 30 = 20 mL 20 mL 0.5 M H2SO4 = \( 2 \times 20 \) mL 0.5 M NH3 विलयन = 40 mL 0.5 M NH3 विलयन 1000 mL 1M NH3 में नाइट्रोजन = 14 g \( \therefore \) 40 mL 0.5 M NH3 में नाइट्रोजन = \( \frac{14 \times 40 \times 0.5}{1000} \) = 0.28 g %N = \( \frac{0.28}{0.5} \times 100 \) = 56%In simple words: Kjeldahl's method is used to determine the nitrogen content in an organic compound. The nitrogen is converted to ammonia, which is absorbed by a known excess of sulfuric acid. By titrating the unreacted acid with NaOH, the amount of reacted acid, and thus the amount of ammonia (and nitrogen), can be determined.

🎯 Exam Tip: Pay close attention to the stoichiometry for neutralization and the absorption of ammonia. Ensure calculations for the volume of acid consumed by ammonia are correct, and use the appropriate formula for nitrogen percentage.

 

**Question 34. केरियस आकलन में 0.3780 g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ । यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए ।** **Answer:** लिए गए पदार्थ का द्रव्यमान = 0.3780 g निर्मित AgCl का द्रव्यमान = 0.5740 g 143.5 g AgCl = 35.5 g Cl 0.5740 g AgCl = \( \frac{35.5}{143.5} \times 0.5740 \) g Cl = 0.142 Cl %Cl = \( \frac{0.142 \times 100}{0.3780} \) = 37.57%In simple words: In Carius method for chlorine estimation, the organic compound is converted to silver chloride. By knowing the mass of silver chloride formed and its molar mass (AgCl = 143.5 g/mol, Cl = 35.5 g/mol), the mass of chlorine can be calculated. This mass is then used to find the percentage of chlorine in the original organic compound.

🎯 Exam Tip: Remember the molar masses of Ag (108), Cl (35.5), AgCl (143.5). Use the ratio of chlorine's molar mass to AgCl's molar mass to find the mass of chlorine from the precipitated AgCl, then divide by the original sample mass and multiply by 100 for the percentage.

 

**Question 35. केरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ । दिए गए कार्बन यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता की गणना कीजिए ।** **Answer:** कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान = 0.468 g निर्मित BaSO4 का द्रव्यमान = 0.668 g 1 मोल BaSO4 = 1g परमाणु 233 g BaSO4 = 32 g S 0.668g BaSO4 = \( \frac{32}{233} \times 0.668 \) g S = 0.0917 g S %S = \( \frac{0.0917}{0.468} \times 100 \) = 19.60%In simple words: The Carius method for sulfur estimation converts sulfur in an organic compound into barium sulfate. Knowing the mass of barium sulfate formed and its molar mass (BaSO4 = 233 g/mol, S = 32 g/mol), the mass of sulfur can be calculated. This mass is then used to determine the percentage of sulfur in the original organic compound.

🎯 Exam Tip: Remember the molar masses of S (32) and BaSO4 (233). Calculate the mass of sulfur from the obtained BaSO4 precipitate using the mass ratio, then divide by the original sample mass and multiply by 100 for the percentage.

 

**Question 36. CH2=CH-CH2-CH2-C = CH, कार्बनिक यौगिक में C2-C3 आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?**
(क) sp-sp2
(ख) sp-sp3
(ग) sp2 -sp3
(घ) sp2 -sp3 **Answer:** (ग) sp2 -sp3In simple words: To determine the hybridization of carbons in an organic molecule, count the number of sigma bonds and lone pairs around each carbon. Carbon 2 (in CH2=CH-) is sp2 hybridized due to a double bond, and Carbon 3 (-CH2-) is sp3 hybridized due to only single bonds. The C2-C3 bond therefore forms from the overlap of an sp2 orbital from C2 and an sp3 orbital from C3.

🎯 Exam Tip: For hybridization, remember that a carbon with four single bonds is sp3, with one double bond and two single bonds is sp2, and with one triple bond and one single bond (or two double bonds) is sp. Apply this rule to each carbon in the specified bond.

 

**Question 37. किसी कार्बनिक यौगिक में लैंसे-परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?**
(क) Na4 [Fe(CN)6]
(ख) Fe4[Fe(CN)6]3
(ग) Fe2 [Fe(CN)6]
(घ) Fe3[Fe(CN)6]4 **Answer:** (ख) Fe4[Fe(CN)6]3In simple words: In the Lassaigne's test for nitrogen, the fusion product (sodium cyanide) reacts with ferrous sulfate and ferric chloride to form a complex iron compound, Fe4[Fe(CN)6]3, which is responsible for the characteristic Prussian blue coloration, confirming the presence of nitrogen.

🎯 Exam Tip: Remember the chemical formula of Prussian blue, Fe4[Fe(CN)6]3. This specific complex compound is the indicator for nitrogen detection in Lassaigne's test.

 

**Question 38. निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?**
(क) \( \text{(CH}_3)_3\text{C. CH}_2^{+} \)
(ख) \( \text{(CH}_3)_3\text{C}^{+} \)
(ग) \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2^{+} \)
(घ) \( \text{CH}_3\text{CHCH}_2\text{CH}_3^{+} \) **Answer:** (ख) \( \text{(CH}_3)_3\text{C}^{+} \)In simple words: The stability of carbocations increases with the number of alkyl groups attached to the positively charged carbon. This is due to the electron-donating inductive effect and hyperconjugation from the alkyl groups, which disperse the positive charge. A tertiary carbocation like \(\text{(CH}_3)_3\text{C}^{+}\) has three alkyl groups, making it the most stable among the given options.

🎯 Exam Tip: Carbocation stability order is Tertiary > Secondary > Primary > Methyl. This is explained by the inductive effect and hyperconjugation of alkyl groups stabilizing the positive charge. Identify the tertiary carbocation for maximum stability.

 

**Question 39. कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?**
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्रैफी **Answer:** (घ) क्रोमैटोग्रैफीIn simple words: Chromatography is considered the best and most modern technique for separating and purifying organic compounds because it is highly efficient, capable of separating complex mixtures, and can be used for both analytical and preparative purposes, even with small amounts of sample.

🎯 Exam Tip: Chromatography (HPLC, GC, TLC, etc.) offers superior separation power, sensitivity, and versatility compared to traditional methods like crystallization, distillation, or sublimation, especially for complex mixtures and trace analysis. Highlight its broad applicability.

 

**Question 40. CH3CH2I+ ROH(aq) \( \implies \) CH2CH2OH+ KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए**
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन **Answer:** (ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापनIn simple words: In this reaction, the iodide ion (I-) in CH3CH2I is replaced by the hydroxide ion (OH-) from the aqueous ROH. Since a nucleophile (OH-) replaces another group, it is classified as a nucleophilic substitution reaction.

🎯 Exam Tip: Identify the incoming and outgoing groups. If a nucleophile (electron-rich species) replaces another group, it's nucleophilic substitution. If an electrophile replaces a group, it's electrophilic substitution. This reaction clearly shows OH- replacing I-.

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

**Question 1. CH3-CH (CH3)-CO-CH2-CH2OH का IUPAC नाम है।**
(i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉन
(ii) 2 मेथिल-5 हाइड्रॉक्सी -3 पेन्टेनॉन
(iii) 4 मेथिल-3 ऑक्सी-1 पेन्टेनॉल
(iv) 1-हेक्सेनॉल-3 ऑन **Answer:** (i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉनIn simple words: To name this compound, identify the longest carbon chain containing both the ketone and alcohol functional groups. Number the chain to give the functional groups the lowest possible numbers. The ketone group gets precedence for the 'on' suffix, and the alcohol group is named as a prefix 'hydroxy'. The methyl group is an additional substituent.

🎯 Exam Tip: Prioritize functional groups for IUPAC naming. Ketones (‑CO‑) have higher priority than alcohols (‑OH). Number the chain so that the highest priority group gets the lowest possible number, followed by other substituents.

 

**Question 2. निम्न में CH3OC2H5 का कौन-सा IUPAC नाम सही है ?**
(i) एथिल मेथिल ईथर
(ii) मेथिल एथिल ईथर
(iii) मेथॉक्सी एथेन
(iv) एथॉक्सी मेथेन **Answer:** (iii) मेथॉक्सी एथेनIn simple words: Ethers are named as alkoxyalkanes. The smaller alkyl group attached to oxygen forms the 'alkoxy' part, and the larger alkyl group forms the 'alkane' part. In CH3OC2H5, -OCH3 is methoxy and -C2H5 is ethane, so it's methoxyethane.

🎯 Exam Tip: For naming ethers using IUPAC, identify the smaller alkyl group and combine it with 'oxy' (e.g., methoxy, ethoxy). The larger alkyl group forms the parent alkane name. Apply this rule consistently.

 

**Question 3. IUPAC पंद्धति में \( \text{CH}_3\text{--CH(CH}_3)\text{--C(CH}_3)_2\text{--CH(CH}_3)\text{--CH}_2\text{--CH}_3 \) का नाम है**
(i) 2, 3, 3, 4, 5 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(ii) 2,3, 3, 4 ट्रेटामेथिल हेक्सेन
(iii) 1,2,3, 3, 4 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(iv) 4 एथिल, 2, 3, 4 ट्राइमेथिल ब्यूटेन **Answer:** (ii) 2, 3,3,4 ट्रेटामेथिल हेक्सेनIn simple words: To name this complex alkane, find the longest continuous carbon chain, which is a hexane (6 carbons). Then, identify the methyl substituents and number the main chain from the end that gives the substituents the lowest possible set of numbers. This results in methyl groups at positions 2, 3, 3, and 4.

🎯 Exam Tip: For IUPAC naming of alkanes, always identify the longest continuous carbon chain first (parent alkane). Then, number the chain such that the sum of locants for all substituents is the lowest. List substituents alphabetically with their positions.

 

**Question 4. CH2 = CH-CH(CH3)2 यौगिक का आई० पू० पी० ए० सी० पद्धति में नाम है।**
(i) 1, 1 डाइमेथिल-2 प्रोपीन
(ii) 3,3 डाइमेथिल-1-प्रोपीन
(iii) 3-मेथिल-1-ब्यूटीन
(iv) 1 आइसोप्रोपिल एथिलीन **Answer:** (iii) 3-मेथिल-1-ब्यूटीनIn simple words: For CH2=CH-CH(CH3)2, the longest carbon chain containing the double bond is four carbons long (butene). The double bond is at position 1. The methyl group is at position 3. So, the name is 3-methylbut-1-ene.

🎯 Exam Tip: When naming alkenes, the parent chain must include the double bond, and numbering should start from the end closest to the double bond to give it the lowest possible locant (position). Substituents are then named and positioned accordingly.

 

**Question 5. लैक्टिक अम्ल का आई० पू० पी० ए० सी० नाम है।**
(i) 2 हाइड्रॉक्सी-3 प्रोपेनॉइक अम्ल
(ii) 1 कार्बोक्सी-2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेन
(iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्ल
(iv) 1 कार्बोक्सी एथेनॉल **Answer:** (iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्लIn simple words: Lactic acid has a three-carbon chain with a carboxylic acid group (propanoic acid) and a hydroxyl group on the second carbon. Therefore, its IUPAC name is 2-hydroxypropanoic acid.

🎯 Exam Tip: For compounds with multiple functional groups, identify the highest priority functional group (carboxylic acid > alcohol). Number the carbon chain from the end that gives the highest priority group the lowest possible number. Other functional groups are named as prefixes.

 

**Question 6. निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी कार्बोधनायन है।**
(i) एथिल कार्बोधनायन
(ii) प्राथमिक कार्योधनायन
(iii) द्वितीयक कार्बाधिनायन
(iv) तृतीयक कार्बोधनायन **Answer:** (iv) तृतीयक कार्बोधनायनIn simple words: Tertiary carbocations are the most stable because they have three alkyl groups attached to the positively charged carbon. These alkyl groups stabilize the positive charge through both inductive effects (donating electron density) and hyperconjugation (delocalization of sigma electrons into the empty p-orbital).

🎯 Exam Tip: The general stability order for carbocations is tertiary > secondary > primary > methyl. This trend is a fundamental concept in organic chemistry, primarily due to hyperconjugation and the positive inductive effect of alkyl groups.

 

**Question 7. ऋण आवेशित कार्बन वाले कार्बनिक समूह को कहते हैं।**
(i) मुक्त मूलक
(ii) कार्बन आयन
(iii) लूइस अम्ल
(iv) कार्बोनियम आयन **Answer:** (ii) कार्बन आयनIn simple words: A carbocation is an organic species where a carbon atom carries a positive charge, while a carbanion is an organic species where a carbon atom carries a negative charge and possesses an unshared pair of electrons.

🎯 Exam Tip: Differentiate between carbocations (positive charge on carbon), carbanions (negative charge on carbon), and free radicals (unpaired electron on carbon). Each has distinct stability and reactivity patterns.

 

**Question 8. निम्न में से कौन-सा कार्ब-एनायन सबसे अधिक स्थायी है ?**
(i) \( \text{CH}_3\text{CH}_2^{-} \)
(ii) \( \text{CH}_3\text{CH}^{-}\text{CH}_3 \)
(iii) \( \text{(CH}_3)_3\text{C}^{-} \)
(iv) \( \text{H}\text{-C\textsuperscript{-}H}_2 \) **Answer:** (iv) \( \text{H}\text{-C\textsuperscript{-}H}_2 \)In simple words: The stability of carbanions is inversely proportional to the number of electron-donating alkyl groups attached to the negatively charged carbon. Alkyl groups destabilize the negative charge by pushing more electron density onto it. Thus, a methyl carbanion, with no alkyl groups, is the most stable among primary, secondary, and tertiary carbanions.

🎯 Exam Tip: Carbanion stability order is Methyl > Primary > Secondary > Tertiary. This is opposite to carbocation stability because alkyl groups are electron-donating, which stabilizes positive charges but destabilizes negative charges.

 

**Question 9. मुक्त मूलक का लक्षण नहीं होता है।**
(i) विद्युत उदासीनता ।
(ii) अनुचुम्बकीय गुण
(iii) अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति
(iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है। **Answer:** (iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है।In simple words: Free radicals are formed by homolytic cleavage of a covalent bond, where each atom receives one electron. They are electrically neutral, paramagnetic due to an unpaired electron, and highly reactive. Heterolytic cleavage, on the other hand, forms ions (carbocations or carbanions).

🎯 Exam Tip: Remember the defining characteristics of free radicals: they are neutral, possess an unpaired electron (making them paramagnetic), and are formed via homolytic cleavage. Heterolytic cleavage leads to ions, not free radicals.

 

**Question 10. मेथेन का सूर्य के प्रकाश में क्लोरीनीकरण है।**
(i) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापन
(iv) इनमें से कोई नहीं **Answer:** (iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापनIn simple words: The chlorination of methane in the presence of sunlight is a classic example of a free radical substitution reaction. It proceeds through a mechanism involving initiation, propagation, and termination steps, all characterized by the formation and reaction of free radicals.

🎯 Exam Tip: Recognize that reactions involving alkanes and halogens under UV light or heat typically follow a free radical mechanism. This is a common example of free radical substitution.

 

**Question 11. निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।**
(i) लूइस अम्ल
(ii) लूइस क्षार
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं **Answer:** (ii) लूइस क्षारIn simple words: A nucleophile is an electron-rich species that donates an electron pair to form a new covalent bond, acting as a Lewis base. Lewis acids, conversely, are electron-deficient species that accept electron pairs.

🎯 Exam Tip: Nucleophiles are essentially Lewis bases – they have a lone pair of electrons or a pi bond that they can donate. Electrophiles are Lewis acids – they are electron-deficient and accept electron pairs.

 

**Question 12. निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।**
(i) R3N
(ii) SO3
(iii) BF2
(iv) NO\( _{2}^{+} \) **Answer:** (i) R3NIn simple words: R3N (amines) are nucleophiles because the nitrogen atom has a lone pair of electrons that it can donate to form a new bond. In contrast, SO3, BF2, and NO2+ are electrophiles because they are electron-deficient species that seek electron pairs.

🎯 Exam Tip: Identify species with lone pairs or pi bonds as potential nucleophiles. Electron-deficient species, especially those with positive charges or incomplete octets, are typically electrophiles.

 

**Question 13. निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक नहीं है।**
(i) NH3
(ii) AlCl3
(iii) H2O
(iv) Cl- **Answer:** (ii) AlCl3In simple words: AlCl3 is an electron-deficient compound with an incomplete octet on aluminum, making it a Lewis acid and thus an electrophile, not a nucleophile. NH3, H2O, and Cl- all possess lone pairs of electrons or negative charges, allowing them to donate electrons and act as nucleophiles.

🎯 Exam Tip: Recognize common Lewis acids (electron acceptors/electrophiles) like AlCl3, BF3, FeCl3, which have incomplete octets. Common nucleophiles (electron donors/Lewis bases) include species with lone pairs (NH3, H2O) or negative charges (Cl-, Br-, OH-).

 

**Question 14. यह अभिक्रिया है।** \( \text{R}\text{--C=O + HCN}\implies\text{R}\text{-C(OH)(CN)--R} \)
(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक
(iii) नाभिकस्नेहीं योगात्मक
(iv) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन **Answer:** (iii) नाभिकस्नेहीं योगात्मकIn simple words: The reaction of a carbonyl compound (aldehyde or ketone) with hydrogen cyanide (HCN) to form a cyanohydrin is a nucleophilic addition reaction. The cyanide ion (CN-), acting as a nucleophile, attacks the electrophilic carbon of the carbonyl group, followed by protonation of the oxygen.

🎯 Exam Tip: Carbonyl compounds (aldehydes and ketones) are highly susceptible to nucleophilic addition reactions due to the electrophilic nature of the carbonyl carbon. The reaction with HCN is a classic example where the nucleophile (CN-) adds across the C=O double bond.

 

**Question 15. निम्नलिखित में इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक है।**
(i) BF3
(ii) NH3
(iii) H2O
(iv) R - OH **Answer:** (i) BF3In simple words: BF3 is an electron-deficient molecule with an incomplete octet on boron, making it a powerful Lewis acid and thus an electrophile (electron-pair acceptor). NH3, H2O, and R-OH (alcohols) all possess lone pairs of electrons and can donate them, acting as nucleophiles.

🎯 Exam Tip: Recognize BF3 as a classic Lewis acid due to boron's empty p-orbital, which can accept an electron pair. Electron-deficient species (incomplete octet, positive charge) are generally electrophiles.

 

**Question 16. ऐल्कीन में हैलोजन अम्ल का योग है।**
(i) न्यूक्लियोफिलिक योग
(ii) इलेक्ट्रोफिलिक योग
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं **Answer:** (ii) इलेक्ट्रोफिलिक योगIn simple words: The addition of a halogen acid (like HBr) to an alkene is an electrophilic addition reaction. The electron-rich double bond of the alkene acts as a nucleophile, attacking the electrophilic proton (H+) from the halogen acid to form a carbocation intermediate, which then reacts with the halide ion.

🎯 Exam Tip: Alkenes, with their electron-rich pi bonds, are typically susceptible to electrophilic attack. In electrophilic addition, the electrophile (e.g., H+ from HX) adds first, followed by the nucleophile (e.g., X- from HX).

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

**Question 1. खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक अथवा ऐलिफैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए ।** **Answer:** जिन कार्बनिक यौगिकों में कार्बन परमाणुओं की खुली श्रृंखला होती है, खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। इन यौगिकों को ऐलिफैटिक यौगिक भी कहते हैं। उदाहरणार्थ- \( \text{CH}_3\text{--CH}_3 \); एथेन \( \text{CH}_3\text{--CH}_2\text{--CH}_3 \); प्रोपेन \( \text{CH}_3\text{--CH(CH}_3)\text{--CH}_3 \); 2-मेथिल प्रोपेनIn simple words: Open-chain or acyclic compounds are organic molecules where carbon atoms are linked in a continuous, unbranched or branched chain, without forming any rings. These are also known as aliphatic compounds.

🎯 Exam Tip: Define open-chain compounds clearly as those without rings. Provide simple examples of alkanes, alkenes, or alkynes that demonstrate a linear or branched, non-cyclic structure.

 

**Question 2. बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिए।** **Answer:** जिन कार्बनिक यौगिकों में परमाणुओं की एक या उससे अधिक बन्द श्रृंखलाएँ अथवा वलय होते हैं, बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तीन चक्रीय यौगिकों-साइक्लोप्रोपेन और बेंजीन की संरचनाओं को दर्शाता है। साइक्लोप्रोपेन एक तीन-सदस्यीय कार्बन वलय है, जबकि बेंजीन एक छह-सदस्यीय सुगंधित कार्बन वलय है जिसमें वैकल्पिक एकल और दोहरे बंधन होते हैं।In simple words: Closed-chain or cyclic compounds are organic molecules in which carbon atoms, and sometimes other atoms, are arranged in one or more closed rings. These can include alicyclic or aromatic structures.

🎯 Exam Tip: Clearly state that cyclic compounds contain rings. Provide both an alicyclic (e.g., cyclopropane) and an aromatic (e.g., benzene) example to showcase the variety of cyclic structures.

 

**Question 3. समचक्रीय तथा विषमचक्रीय यौगिक क्या होते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण भी दीजिए ।** **Answer:** **

समचक्रीय यौगिक-

** वे यौगिक जिनमें वलय केवल कार्बन परमाणुओं का बना होता है, समचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-साइक्लोप्रोपेन, डाइफेनिल, बेंजीन, टॉलूईन आदि । **

विषमचक्रीय यौगिक-

** वे बन्द श्रृंखला यौगिक जिनकी वलय में विषम परमाणु (कार्बन तथा हाइड्रोजन के अतिरिक्त अन्य परमाणु, जैसे-N, O, S आदि) होते हैं, विषमचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-फ्यूरेन, थायोफीन, पिरीडीन आदि ।In simple words: Homocyclic compounds have rings composed solely of carbon atoms, such as benzene or cyclopropane. Heterocyclic compounds, on the other hand, contain at least one heteroatom (like nitrogen, oxygen, or sulfur) within their ring structure, as seen in furan or pyridine.

🎯 Exam Tip: The key distinction is the composition of the ring: only carbon atoms for homocyclic, and at least one heteroatom (N, O, S) for heterocyclic. Provide specific examples for each category.

 

**Question 4. ऐलिसाइक्लिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।** **Answer:** वे समचक्रीय यौगिक जिनके गुण ऐलिफैटिक यौगिकों के गुणों से मिलते-जुलते होते हैं, ऐलिसाइक्लिक यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विभिन्न ऐलिसाइक्लिक यौगिकों की संरचनाओं को दर्शाता है: साइक्लोप्रोपेन (तीन-सदस्यीय), साइक्लोब्यूटेन (चार-सदस्यीय), साइक्लोपेन्टेन (पांच-सदस्यीय) और साइक्लोहेक्सेन (छह-सदस्यीय)। ये सभी संतृप्त कार्बन वलय संरचनाएँ हैं जो ऐलिफैटिक यौगिकों के गुणों को प्रदर्शित करती हैं।In simple words: Alicyclic compounds are cyclic organic compounds that behave similarly to aliphatic (open-chain) compounds rather than aromatic ones. Their rings consist only of carbon atoms, and they can be saturated or unsaturated, but they lack the special stability of aromatic systems.

🎯 Exam Tip: Define alicyclic compounds as cyclic but non-aromatic, sharing properties with aliphatic compounds. Provide examples of common cycloalkanes like cyclopropane, cyclobutane, cyclopentane, or cyclohexane.

 

**Question 5. ऐरोमैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए ।** **Answer:** ये विशेष प्रकार के चक्रीय असंतृप्त यौगिक हैं। इन यौगिकों के लिए ऐरोमैटिक शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में खोजे गये कुछ यौगिकों की मीठी गन्धं होने के कारण किया गया था परन्तु अब दुर्गन्धयुक्त ऐरोमैटिक भी ज्ञात हैं।In simple words: Aromatic compounds are special cyclic, unsaturated organic compounds that exhibit enhanced stability due to electron delocalization (aromaticity), often following Hückel's rule (4n+2 pi electrons). Benzene is the most common example.

🎯 Exam Tip: Emphasize the unique stability of aromatic compounds and their characteristic cyclic, unsaturated structure. Mention Hückel's rule (though not explicitly asked, it underlies the concept) and provide common examples like benzene or naphthalene.

 

Question 6. क्रियात्मक समूह से क्या तात्पर्य है?
Answer: किसी अणु में उपस्थित परमाणु अथवा परमाणुओं का समूह, जो मुख्य रूप से उसके रासायनिक गुण निर्धारित करता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।
In simple words: क्रियात्मक समूह परमाणुओं का वह समूह है जो किसी अणु के रासायनिक गुणों को तय करता है।

🎯 Exam Tip: क्रियात्मक समूहों की पहचान और उनके प्रभाव को समझना कार्बनिक रसायन में मूलभूत है और उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. ऐल्डिहाइड यौगिक में कौन-सा क्रियात्मक समूह होता है?
Answer: ऐल्डिहाइड यौगिक में -CHO क्रियात्मक समूह होता है।
In simple words: ऐल्डिहाइड्स में -CHO समूह होता है, जहाँ कार्बन ऑक्सीजन से डबल बॉन्ड और हाइड्रोजन से सिंगल बॉन्ड से जुड़ा होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न क्रियात्मक समूहों के विशिष्ट संरचनात्मक सूत्रों को याद रखना और पहचानना IUPAC नामकरण और अभिक्रियाओं को समझने के लिए आवश्यक है।

 

Question 8. IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न क्या दर्शाता है।
Answer: IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न दर्शाता है कि कार्बन श्रृंखला संतृप्त है अथवा असंतृप्त ।
In simple words: IUPAC नामकरण में प्राथमिक अनुलग्न (जैसे -ane, -ene, -yne) यह बताता है कि कार्बन श्रृंखला में सिंगल, डबल या ट्रिपल बॉन्ड हैं या नहीं।

🎯 Exam Tip: प्राथमिक और द्वितीयक अनुलग्न का सही उपयोग IUPAC नामकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो संरचनात्मक जानकारी को सटीक रूप से दर्शाता है।

 

Question 9. निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
(i) (CH3)3.C.N. (CH3)2
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक तृतीयक अमीन संरचना है। केंद्रीय नाइट्रोजन परमाणु एक तृतीयक-ब्यूटिल समूह और दो मेथिल समूहों से जुड़ा है। इसे N,N-डाइमेथिल-2-मेथिल प्रोपेनामीन के रूप में पहचाना जाता है।
(ii) CH3-CH2-C-O-CH(CH3)
                        O
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक एस्टर संरचना है। प्रोपेनोइक एसिड का आइसोप्रोपिल एस्टर है, जहां कार्बोक्सिलिक कार्बन के साथ एक एथिल समूह और ऑक्सीजन के साथ एक आइसोप्रोपिल समूह जुड़ा है। इसे आइसोप्रोपिल प्रोपोनेट के रूप में नामित किया गया है।
(iii) CH3-CH-CH2-COOH
            |
          CH2
            |
          CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोक्सिलिक एसिड है जिसमें एक मेथिल शाखा है। पेंटेनोइक एसिड की एक श्रृंखला है जिसमें तीसरे कार्बन परमाणु पर एक मेथिल समूह जुड़ा हुआ है। इसका नाम 3-मेथिल पेन्टानोइक एसिड है।
(iv) CH3-CH-CH2-CH-CH3
            |                        |
          CH3                  CH2-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक शाखित हेक्सेन संरचना है। हेक्सेन श्रृंखला में दूसरे और चौथे कार्बन परमाणु पर मेथिल समूह जुड़े हैं। इसका नाम 2,4-डाइमेथिल हेक्सेन है।
(v) CH3-CH=CH-C(=O)-C(=O)-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक असंतृप्त कीटोन है जिसमें दो कीटोन समूह और एक डबल बॉन्ड है। इसमें हेप्ट-5-ईन-3-आइन-2-ओन की संरचना है।
(vi) CH3-CH2-CH(Br)-CH(Cl)-CH(I)-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक हैलोजेन-युक्त हेक्सेन श्रृंखला है। हेक्सेन के तीसरे, चौथे और पांचवें कार्बन पर क्रमशः ब्रोमीन, क्लोरीन और आयोडीन समूह जुड़े हैं। इसका नाम 3-ब्रोमो, 2-क्लोरो, 4-आयोडो हेक्सेन है।
(vii) C6H5-C(OH)(CH3)-COOH
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोक्सिलिक एसिड है जिसमें एक हाइड्रॉक्सिल समूह और एक फेनिल समूह है। प्रोपेनोइक एसिड की संरचना है जिसमें दूसरे कार्बन पर फेनिल और हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़े हैं। इसका नाम हाइड्रॉक्सी-2-फेनिल प्रोपेनोइक एसिड है।
(viii) CH3-CH(Br)-COOC2H5
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक एस्टर संरचना है जिसमें एक ब्रोमीन परमाणु है। प्रोपेनोइक एसिड का एथिल एस्टर है जिसमें दूसरे कार्बन पर ब्रोमीन परमाणु जुड़ा है। इसका नाम 2-ब्रोमो एथिल प्रोपानोएट है।
(ix) (CH3)2-CH-NH-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक द्वितीयक अमीन है। इसमें एक आइसोप्रोपिल समूह और एक मेथिल समूह नाइट्रोजन से जुड़ा है। इसका नाम N-मेथिल 2-प्रोपेनामीन है।
(x) NC-CH2-CH(CN)-CH2-CN
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक प्रोपेन श्रृंखला है जिसमें तीन नाइट्राइल समूह जुड़े हैं। प्रोपेन के पहले, दूसरे और तीसरे कार्बन पर नाइट्राइल समूह हैं। इसका नाम प्रोपेन-1,2,3-ट्राइकार्बोनाइट्राइल है।
(xi) CH3-C(Br)(CH3)-CH(Cl)-COOH
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोक्सिलिक एसिड है जिसमें ब्रोमीन, क्लोरीन और मेथिल समूह हैं। ब्यूटेनोइक एसिड की संरचना है जिसमें तीसरे कार्बन पर ब्रोमीन और मेथिल तथा दूसरे कार्बन पर क्लोरीन जुड़ा है। इसका नाम 3-ब्रोमो, 3-क्लोरो, 2-मेथिल ब्यूटेनोइक एसिड है।
(xii) CH3-C(OH)(CH3)-CH2-C(=O)-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कीटोन है जिसमें एक हाइड्रॉक्सिल समूह और एक मेथिल समूह है। पेंटेनोन की संरचना है जिसमें चौथे कार्बन पर हाइड्रॉक्सिल और मेथिल समूह जुड़े हैं। इसका नाम 4-हाइड्रॉक्सी-4-मेथिल पेन्टेनोन-2 है।
Answer:
(i) N, N-डाइमेथिल-2-मेथिल प्रोपेनाइन
(ii) आइसोप्रोप्रिल प्रोपोनेट
(iii) 3-मेथिल पेन्टानोइक ऐसिड
(iv) 2, 4-डाइमेथिल हेक्सेन
(v) हेप्ट-5-ईन-3-आइन, 2-ओन
(vi) 3-ब्रोमो, 2-क्लोरो, 4-आयोडो हेक्सेन
(vii) हाइड्रॉक्सी 2-फेनिल प्रोपेनोइक ऐसिड
(viii) 2-ब्रोमो, एथिल प्रोपानोएट
(ix) N मेथिल 2-प्रोपेनामीन
(x) प्रोपेन 1, 2, 3-ट्राइकार्बोनाइट्राइल
(xi) 3-ब्रोमो, 3-क्लोरो, 2-मेथिल ब्यूटेनोइक ऐसिड
(xii) 4-हाइड्रॉक्सी 4-मेथिल, पेन्टेनोन-2
In simple words: IUPAC नामकरण में, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला की पहचान की जाती है और प्रतिस्थापियों तथा क्रियात्मक समूहों की स्थिति के अनुसार नाम दिया जाता है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के नियमों को क्रमबद्ध तरीके से लागू करें: सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला ढूंढना, क्रियात्मक समूहों और प्रतिस्थापियों को प्राथमिकता देना, और सही अनुलग्न व पूर्वलग्न का उपयोग करना।

 

Question 10. IUPAC पद्धति में निम्नलिखित संरचना सूत्र वाले यौगिकों का नाम बताइए
(i) HC≡C-CH=CH2
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन है जिसमें एक ट्रिपल बॉन्ड और एक डबल बॉन्ड दोनों हैं। यह ब्यूटा-1-ईन-3-आइन है।
(ii) CH3-CH=CH-C(Cl)=CH(Cl)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक हैलोजेन-युक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन है जिसमें दो डबल बॉन्ड और दो क्लोरीन परमाणु हैं। यह पेंटा-1,3-डाईईन-1,2-डाइक्लोरो है।
(iii) CH3-CH(Cl)-C(Cl)-CH2OH
                      |
                      Cl
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक अल्कोहल संरचना है जिसमें तीन क्लोरीन परमाणु जुड़े हैं। ब्यूटेन-1-ऑल की संरचना है जिसमें दूसरे, दूसरे और तीसरे कार्बन पर क्लोरीन परमाणु जुड़े हैं। इसका नाम 2,2,3-ट्राइक्लोरो ब्यूटेन-1-ऑल है।
(iv) CH3-CH2-CH(OH)-CH2-CH(CH2OH)-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक डाइ-अल्कोहल संरचना है जिसमें एक शाखित श्रृंखला है। हेक्सेन श्रृंखला में तीसरे और पांचवें कार्बन पर हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़े हैं, साथ ही पांचवें कार्बन पर एक मेथिल समूह भी है। इसका नाम 2-मेथिल-1,4-हेक्सेन-डाइ-ऑल है।
(v) CH3-CH2-CH2-CH(OH)-CHO
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक ऐल्डिहाइड संरचना है जिसमें एक हाइड्रॉक्सिल समूह है। पेंटेनल की श्रृंखला में दूसरे कार्बन पर एक हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़ा है। इसका नाम 2-हाइड्रॉक्सी ब्यूटेन-1-ऑल है।
(vi) C2H5-CH(CHO)-CH2-CH(CH3)-CH2CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक ऐल्डिहाइड संरचना है जिसमें एथिल और मेथिल शाखाएँ हैं। हेक्सेन श्रृंखला में दूसरे कार्बन पर एक एथिल समूह और चौथे कार्बन पर एक मेथिल समूह है, साथ ही एक ऐल्डिहाइड समूह भी है। इसका नाम 2-एथिल-4-मेथिल हेक्सेन है।
(vii) CH3-CH=CH-CHO
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक असंतृप्त ऐल्डिहाइड है। यह ब्यूट-2-ईनल की संरचना है, जिसमें दूसरे कार्बन पर डबल बॉन्ड और ऐल्डिहाइड समूह है। इसका नाम 2-ब्यूटेनल है।
(viii) CH2=CH-CH2OH
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक असंतृप्त अल्कोहल है। यह प्रोप-2-ईनल की संरचना है, जिसमें पहले कार्बन पर डबल बॉन्ड और तीसरे कार्बन पर हाइड्रॉक्सिल समूह है। इसका नाम 2-प्रोपेनल है।
(ix) CH3-C(=O)-CH(CH3)-CH2-CH3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कीटोन संरचना है जिसमें एक मेथिल शाखा है। पेंटेनोन की संरचना है जिसमें तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह जुड़ा है। इसका नाम 3-मेथिल-पेन्टेन-2-ऑन है।
(x) CH3-CH(OH)-CH2-COOH
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोक्सिलिक एसिड है जिसमें एक हाइड्रॉक्सिल समूह है। ब्यूटेनोइक एसिड की संरचना है जिसमें तीसरे कार्बन पर एक हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़ा है। इसका नाम हाइड्रॉक्सी ब्यूटेनोइक अम्ल है।
(xi) CH3-CH2-C(=O)-Cl
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक एसिड क्लोराइड संरचना है। प्रोपेनोइक एसिड का एसिड क्लोराइड है। इसका नाम प्रोपेनॉइल क्लोराइड है।
(xii) CH3-CH(CH3)-CH2-C(=O)-Cl
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक एसिड क्लोराइड संरचना है जिसमें एक मेथिल शाखा है। ब्यूटेनॉयल क्लोराइड की संरचना है जिसमें तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह जुड़ा है। इसका नाम 3-मेथिल ब्यूटेनॉइल क्लोराइड है।
Answer:
(i) ब्यूट-3-ईन-1-आइन
(ii) पेन्ट-3-ईन-1-आइन
(iii) 2, 2, 3-ट्राइक्लोरो ब्यूटेन-1 ऑल
(iv) 2-मेथिल 1, 4-हेक्सेन-डाई-ऑल ।
(v) 2-हाइड्रॉक्सी ब्यूटेन-1 ऑल
(vi) 2-एथिल-4-मेथिल हेक्सेन
(vii) 2-ब्यूटेनल
(viii) 2-प्रोपेनल
(ix) 3-मेथिल-पेन्टेन-2 ऑन
(x) हाइड्रॉक्सी ब्यूटेनोइक अम्ल
(xi) प्रोपेनॉइल क्लोराइड
(xii) 3-मेथिल ब्यूटेनॉइल क्लोराइड
In simple words: IUPAC नामकरण रासायनिक संरचनाओं को मानकीकृत तरीके से नाम देने की एक प्रणाली है, जो कार्बन श्रृंखला की लंबाई, क्रियात्मक समूहों और प्रतिस्थापियों की स्थिति को ध्यान में रखती है।

🎯 Exam Tip: लंबी कार्बन श्रृंखला की पहचान करना, प्रतिस्थापियों को वर्णमाला क्रम में व्यवस्थित करना, और क्रियात्मक समूहों के लिए सही अनुलग्न का उपयोग करना IUPAC नामकरण में सामान्य गलतियों से बचने में मदद करता है।

 

Question 11. समतल ध्रुवित प्रकाश किसे कहते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
Answer: वह प्रकाश जिसमें कम्पन केवल एक ही तल में होते हैं, समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है। साधारण प्रकाश की किरण को निकोल प्रिज्म में से प्रवाहित करने पर वह समतल ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।
In simple words: समतल ध्रुवित प्रकाश वह प्रकाश होता है जिसमें सभी विद्युतचुम्बकीय तरंगों के कम्पन केवल एक ही तल में होते हैं, और इसे निकोल प्रिज्म जैसे ध्रुवक का उपयोग करके प्राप्त किया जाता है।

🎯 Exam Tip: प्रकाशिक सक्रियता को समझने के लिए समतल ध्रुवित प्रकाश की अवधारणा और उसे प्राप्त करने की विधि को जानना आवश्यक है।

 

Question 12. ध्रुवण घूर्णकता क्या है?
Answer: कुछ पदार्थों में क्रिस्टलीय अवस्था या विलयन अवस्था में समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर या बायीं ओर घुमाने का गुण होता है। पदार्थों के इस गुण की ध्रुवण घूर्णकता कहते हैं। उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल, टार्टरिक अम्ल, ग्लूकोस आदि ।
In simple words: ध्रुवण घूर्णकता किसी पदार्थ की वह क्षमता है जिसके कारण वह समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दक्षिणावर्त (दाएं) या वामावर्त (बाएं) दिशा में घुमा देता है।

🎯 Exam Tip: ध्रुवण घूर्णकता सीधे तौर पर किसी अणु की चिरलता (chirality) से संबंधित है, जो प्रायोगिक रूप से प्रकाशिक समावयवियों को पहचानने में मदद करता है।

 

Question 13. किरेल एवं अकिरेल अणु क्या होते हैं?
Answer: जो अणु दायें ओर बायें हाथों की भाँति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते हैं वे किरेल अणु कहलाते है। उदाहरणार्थ-2-ब्यूटेनॉल अणु। जबकि जो अणु दायें और बायें हाथों की भाँति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित होते हैं, वे अकिरेल अणु कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-1-ब्यूटेनॉल अणु ।।
In simple words: किरेल अणु वे होते हैं जो अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपित नहीं हो सकते, जैसे कि हमारे हाथ, जबकि अकिरेल अणु अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपित हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: किरेल और अकिरेल अणुओं की पहचान करना त्रिविम रसायन और प्रकाशिक समावयवता की समझ के लिए महत्वपूर्ण है। असममित कार्बन की उपस्थिति अक्सर किरेलता का संकेत देती है।

 

Question 14. असममित कार्बन परमाणु क्या है?
Answer: किसी अणु में जो चतुष्फलकीय कार्बन परमाणु चार भिन्न परमाणुओं या समूहों से जुड़ा होता है, असममित कार्बन परमाणु कहलाता है।
In simple words: असममित कार्बन परमाणु वह होता है जिसके चारों वैलेंसी बॉन्ड चार अलग-अलग परमाणुओं या समूहों से जुड़े होते हैं।

🎯 Exam Tip: एक अणु में असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या की पहचान करना उसकी चिरलता और संभव त्रिविम समावयवियों की संख्या निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है।

 

Question 15. कार्बोनियम आयन को उदाहरण सहित समझाइए । इसके दो गुण लिखिए।
Answer: वह धनावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तथा धनावेशित कार्बन परमाणु के संयोजी कोश में केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, कार्बोधनायन या कार्बोनियम आयन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह मेथिल कार्बोनियम आयन को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय कार्बन परमाणु तीन हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा है और उस पर धनात्मक आवेश है। कार्बन के संयोजी कोश में छह इलेक्ट्रॉन हैं। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}^{+} \\ \mathrm{H} \end{array} \] मेथिल कार्बोनियम आयन

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एथिल कार्बोनियम आयन को दर्शाता है, जिसमें धनावेशित कार्बन परमाणु एक मेथिल समूह और दो हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा है। इसमें धनात्मक आवेश केंद्रीय कार्बन पर है। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}-\mathrm{C}^{+} \\ \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \end{array} \] एथिल कार्बोनियम आयन
कार्बोनियन आयन के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-
1. इनका अष्टक अपूर्ण होता है।
2. ये धनावेशित होते हैं। अतः इनकी प्रकृति इलेक्ट्रॉनस्नेही होती है।
In simple words: कार्बोनियम आयन वे होते हैं जहाँ कार्बन पर धनात्मक आवेश होता है और उसके बाहरी कोश में छह इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे वे इलेक्ट्रॉनस्नेही होते हैं।

🎯 Exam Tip: कार्बोधनायन की स्थिरता को समझने के लिए प्रेरणिक प्रभाव और अतिसंयुग्मन जैसे इलेक्ट्रॉनिक प्रभावों का ज्ञान महत्वपूर्ण है।

 

Question 16. कार्बनायन किसे कहते हैं? कार्बनायन की दो विशेषताएँ लिखिए। किसी एक कार्बनायन का सूत्र भी लिखिए ।
Answer: वह ऋणावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तथा ऋणावेशित कार्बन के पास एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, कार्बनायन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह मेथेनाइड आयन को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय कार्बन परमाणु तीन हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा है और उस पर ऋणात्मक आवेश तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म है। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\ddot{\mathrm{C}}:^{-} \\ \mathrm{H} \end{array} \] मेथेनाइड आयन

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एथेनाइड आयन को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय कार्बन परमाणु एक मेथिल समूह और दो हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा है, और उस पर ऋणात्मक आवेश तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म है। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}=\ddot{\mathrm{C}}:^{-} \\ \mathrm{H} \end{array} \] एथेनाइड आयन
कार्बनायनों की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-
1. ऋणावेशित कार्बन के पास एक-एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है।
2. इनका निर्माण विषमांगी (हेटरोलिटिक) विदलन से होता है।
In simple words: कार्बनायन वे होते हैं जहाँ कार्बन पर ऋणात्मक आवेश और एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, और इनका निर्माण विषमांगी विदलन से होता है।

🎯 Exam Tip: कार्बनायन की स्थिरता पर प्रतिस्थापियों के प्रेरणिक प्रभावों को समझना अभिक्रिया क्रियाविधि में इनकी भूमिका को स्पष्ट करता है।

 

Question 17. मुक्त मूलक क्या होते हैं? ये किस प्रकार बनते हैं?
Answer: उदासीन परमाणु या परमाणुओं का समूह जिसके पास विषम या अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, मुक्त मूलक (free radical) कहलाता है। मुक्त मूलक के प्रतीक अथवा सूत्र में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को एक बिन्दु द्वारा प्रदर्शित करते हैं।' जैसे- क्लोरीन मुक्त मूलक को प्रदर्शित करता है। मुक्त मूलक बहुत अस्थायी और बहुत क्रियाशील होते हैं। मुक्त मूलक सह-संयोजी बन्ध में होमोलिटिक विदलन से उत्पन्न होता है। जैसे- क्लोरीन अणु को मुक्त मूलकों में विखण्डन सूर्य के प्रकाश या ऊष्मा द्वारा होता है।
In simple words: मुक्त मूलक उदासीन प्रजातियाँ होती हैं जिनके पास एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, और ये सह-संयोजी बंध के समांग विदलन (होमोलिटिक क्लीवेज) से बनते हैं।

🎯 Exam Tip: मुक्त मूलक अत्यधिक क्रियाशील होते हैं और मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण मध्यवर्ती के रूप में कार्य करते हैं।

 

Question 18. आयन तथा मुक्त मूलक में क्या अन्तर है?
Answer: आयन तथा मुक्त मूलक में प्रमुख अन्तर इस प्रकार हैं-

क्र० सं०आयनमुक्त मूलक
1.ये जल अथवा अन्य आयनीकारक विलायक में विलेय करने पर बनते हैं।ये साधारण तथा होमोलिटिक विखण्डन ऊर्जा (ऊष्मा या प्रकाश) द्वारा प्रेरित होते हैं।
2.ये प्रायः विलयन अवस्था में बनते हैं।ये प्रायः गैसीय अवस्था में बनते हैं।
3.ये विद्युत आवेशित होते हैं, क्योंकि ये इलेक्ट्रॉन के आदान-प्रदान के फलस्वरूप बनते हैं।ये साधारणतया विद्युत उदासीन होते हैं, क्योकि विषम इलेक्ट्रॉन उदासीन परमाणु का वह इलेक्ट्रॉन होता है जो सह-संयोजी बन्ध बनाने में काम आता है।

In simple words: आयन आवेशित कण होते हैं जो इलेक्ट्रॉन के आदान-प्रदान से बनते हैं, जबकि मुक्त मूलक उदासीन प्रजातियाँ होती हैं जिनके पास एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है और वे समांग विदलन से बनते हैं।

🎯 Exam Tip: आयन और मुक्त मूलक दोनों ही रासायनिक अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति और उत्पादन के तरीके अलग-अलग होते हैं।

 

Question 19. प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में अन्तर लिखिए ।
Answer: प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में निम्नलिखित अन्तर हैं-

क्र० सं०प्रेरणिक प्रभावइलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव
1.यह स्थायी प्रभाव है।यह अस्थायी प्रभाव है।
2.इसमें \( \sigma \) इलेक्ट्रॉनों का आंशिक विस्थापन होता है।इसमें \( \pi \)-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थापन होता है।
3.इसमें कोई आयन नहीं बनते हैं।इसमें आयन बनते हैं।
4.इसके लिए बहु आबन्ध की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है।इसके लिए बहु आबन्ध की उपस्थिति अनिवार्य है।
5.इसमें बाह्य आक्रमणकारी अभिकर्मक की आवश्यकता नहीं होती है।इसमें बाह्य आक्रमणकारी अभिकर्मक की आवश्यकता होती है।

In simple words: प्रेरणिक प्रभाव सिग्मा-इलेक्ट्रॉनों का आंशिक, स्थायी विस्थापन है, जबकि इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव पाई-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण, अस्थायी विस्थापन है जो बाहरी अभिकर्मक की उपस्थिति में होता है।

🎯 Exam Tip: इन दोनों इलेक्ट्रॉनिक प्रभावों को समझना कार्बनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि और अणुओं की स्थिरता को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 20. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही । प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SN द्वारा प्रकट करते हैं। ऐल्किल हैलाइंडों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ नाभिकस्नेही अभिक्रियाएँ होती हैं। उदाहरणार्थ-ऐल्किल हैलाइड का जलीय क्षारक द्वारा जल-अपघटन
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह मेथिल ब्रोमाइड (CH3-Br) के जलीय हाइड्रॉक्साइड (OH-) द्वारा मेथिल अल्कोहल (CH3-OH) में प्रतिस्थापन की अभिक्रिया को दर्शाता है। हाइड्रॉक्साइड आयन नाभिकस्नेही के रूप में कार्य करता है, जो ब्रोमाइड आयन को विस्थापित करता है। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}-\mathrm{Br} \\ \mathrm{H} \end{array} +\mathrm{OH}^{-} \longrightarrow \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}-\mathrm{OH} \\ \mathrm{H} \end{array} +\mathrm{Br}^{-} \] मेथिल ब्रोमाइड हाइड्रॉक्साइड आयन मेथिल ऐल्कोहॉल ब्रोमाइड आयन
(नाभिक स्नेही)
In simple words: नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया में, एक नाभिकस्नेही किसी अन्य समूह को अणु से विस्थापित करता है, जैसे मेथिल ब्रोमाइड का हाइड्रॉक्साइड द्वारा मेथिल अल्कोहल में बदलना।

🎯 Exam Tip: SN1 और SN2 क्रियाविधियों में अंतर करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अभिकर्मकों की प्रकृति और अणु की संरचना के आधार पर अलग-अलग अभिक्रिया दरों और त्रिविम रसायन को दर्शाती हैं।

 

Question 21. SN1 अभिक्रिया से क्या अभिप्राय है? उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक नाभिकस्नेही जैसे-OH-,CN- आदि होते हैं। इन अभिक्रियाओं की दर केवल एक स्पीशीज के सान्द्रण पर निर्भर करती है अतः इन अभिक्रियाओं को SM1 से प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण--ब्यूटिल क्लोराइड की जल तथा ऐसीटोन के मिश्रण में सोडियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया द्वारा 1-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल बनता है।
In simple words: SN1 अभिक्रिया एक दो-चरणीय नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है जिसकी दर केवल क्रियाधार की सांद्रता पर निर्भर करती है, इसमें एक मध्यवर्ती कार्बोधनायन बनता है।

🎯 Exam Tip: SN1 अभिक्रियाएं तृतीयक हैलाइडों के साथ अधिक अनुकूल होती हैं क्योंकि कार्बोधनायन की स्थिरता अभिक्रिया की दर को निर्धारित करती है।

 

Question 22. मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। उदाहरणार्थ-विसरित प्रकाश में मेथेन तथा क्लोरीन की अभिक्रिया
इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक एक मुक्त मूलक (CI) होता है।
In simple words: मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया में, एक मुक्त मूलक किसी परमाणु को अणु से विस्थापित करता है, जैसे मेथेन का क्लोरीन द्वारा क्लोरोमेथेन में प्रतिस्थापन।

🎯 Exam Tip: मुक्त मूलक अभिक्रियाएं आमतौर पर उच्च ऊर्जा (प्रकाश या गर्मी) और मुक्त मूलक आरंभ करने वालों की उपस्थिति में होती हैं, और इनमें तीन चरण होते हैं- आरंभ, प्रसार और समापन।

 

Question 23. योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ क्या हैं?
Answer: वे अभिक्रियाएँ जिनमें दो अणु संयोग करके एक अणु बनाते हैं योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। ये अभिक्रियाएँ सामान्यतः बहुआबन्ध युक्त कार्बनिक यौगिकों में होती हैं। इन अभिक्रियाओं में एक \( \pi \)-आबन्धका विदलन हो जाता है तथा दो \( \sigma \)-आबन्ध बनते हैं।
उदाहरणार्थ-
In simple words: योगात्मक अभिक्रियाएं वे होती हैं जिनमें दो या अधिक अणु जुड़कर एक बड़ा अणु बनाते हैं, आमतौर पर असंतृप्त यौगिकों के डबल या ट्रिपल बॉन्ड पर होती हैं।

🎯 Exam Tip: योगात्मक अभिक्रियाएं कार्बन-कार्बन डबल और ट्रिपल बॉन्ड वाले यौगिकों की विशिष्ट अभिक्रियाएं हैं, और ये इलेक्ट्रॉनस्नेही, नाभिकस्नेही या मुक्त मूलक तंत्रों द्वारा हो सकती हैं।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. समावयवता किसे कहते हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए ।
Answer: जिन यौगिकों के अणुसूत्र समान होते हैं परन्तु गुण भिन्न-भिन्न होते हैं समावयवी कहलाते हैं। तथा यह परिघटना समावयवता कहलाती है। उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल और डाइमेथिल ईथर दोनों समावयवी हैं।
In simple words: समावयवता वह घटना है जहाँ यौगिकों का अणुसूत्र समान होता है लेकिन उनकी संरचना या परमाणुओं की व्यवस्था अलग होने के कारण उनके गुण भिन्न होते हैं।

🎯 Exam Tip: समावयवता कार्बनिक रसायन की एक मूलभूत अवधारणा है, और इसके विभिन्न प्रकारों को समझना अणुओं के गुणों और अभिक्रियाओं की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।

 

Question 2. संरचनात्मक समावयवता को परिभाषित कीजिए इसके प्रकार भी लिखिए ।
Answer: संरचनात्मक समावयवता अणुओं के संरचना सूत्रों में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। संरचनात्मक समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके संरचना सूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं। संरचनात्मक समावयवता के प्रमुख प्रकार निम्नवत् हैं-
1. श्रृंखला समावयवता,
2. स्थान समावयवता,
3. क्रियात्मक समूह समावयवता,
4. मध्यावयवता तथा
5. चलावयवता
In simple words: संरचनात्मक समावयवता तब होती है जब यौगिकों के अणुसूत्र समान होते हैं लेकिन उनके परमाणुओं के जुड़ने का क्रम अलग होता है, जिससे उनके संरचना सूत्र भिन्न होते हैं।

🎯 Exam Tip: संरचनात्मक समावयवता के प्रत्येक प्रकार के विशिष्ट गुणों और उदाहरणों पर ध्यान दें, क्योंकि यह अवधारणा विभिन्न कार्बनिक यौगिकों के वर्गीकरण और गुणों को समझने में महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. श्रृंखला समावयवता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
Answer: श्रृंखला समावयवता अणुओं के कार्बन श्रृंखला की रचना में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। श्रृंखला समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं, परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखलाओं की रचना में भिन्नता होती है। श्रृंखला समावयवी समान सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं। उदाहरणार्थ-ब्यूटेन के दो श्रृंखला समावयवी हैं जिनके संरचना सूत्र निम्नवत् हैं-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह n-ब्यूटेन और आइसोब्यूटेन (2-मेथिलप्रोपेन) की संरचनाओं को दर्शाता है। दोनों का अणुसूत्र C4H10 है, लेकिन n-ब्यूटेन एक सीधी श्रृंखला वाला यौगिक है जबकि आइसोब्यूटेन में एक शाखित कार्बन श्रृंखला है। \[ \mathrm{CH}_{3}-\mathrm{CH}_{2}-\mathrm{CH}_{2}-\mathrm{CH}_{3} \text { एवं } \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ \mathrm{CH}_{3}-\mathrm{C}-\mathrm{CH}_{3} \\ \mathrm{CH}_{3} \end{array} \] n-ब्यूटेन आइसोब्यूटेन
In simple words: श्रृंखला समावयवता में समान अणुसूत्र वाले यौगिकों की कार्बन श्रृंखला की संरचना भिन्न होती है, जैसे n-ब्यूटेन (सीधी श्रृंखला) और आइसोब्यूटेन (शाखित श्रृंखला)।

🎯 Exam Tip: विभिन्न श्रृंखला समावयवियों के गुणों में अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि शाखाएं बढ़ने से गलनांक, क्वथनांक और सतह क्षेत्र जैसे भौतिक गुण प्रभावित होते हैं।

 

Question 4. स्थान समावयवता को परिभाषित कीजिए।
Answer: स्थान समावयवता कार्बन श्रृंखला में किसी प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध के स्थान में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। स्थान समावयवियों के अणुसूत्र एवं कार्बन श्रृंखला की रचना तो समान होती है परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखला में प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध का स्थान भिन्न होता है। स्थान समावयवी भी सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं। उदाहरणार्थ- 1- ब्यूटीन और 2-ब्यूटीन, ब्यूटीन के दो स्थान समावयवी हैं।
\[ \mathrm{CH}_{3}-\mathrm{CH}_{2}-\mathrm{CH}=\mathrm{CH}_{2} \text { एवं } \mathrm{CH}_{3}-\mathrm{CH}=\mathrm{CH}-\mathrm{CH}_{3} \] 1-ब्यूटीन 2-ब्यूटीन
In simple words: स्थान समावयवता तब होती है जब एक ही अणुसूत्र वाले यौगिकों में क्रियात्मक समूह या प्रतिस्थापी की स्थिति मुख्य कार्बन श्रृंखला पर भिन्न होती है।

🎯 Exam Tip: स्थान समावयवियों के नामकरण में क्रियात्मक समूह या प्रतिस्थापी की स्थिति को संख्या से दर्शाना महत्वपूर्ण है ताकि उन्हें सही ढंग से अलग किया जा सके।

 

Question 5. क्रियात्मक समूह समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: क्रियात्मक समूह समावयवता अणुओं में भिन्न क्रियात्मक समूहों की उपस्थिति के कारण होती है। क्रियात्मक समूह समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें क्रियात्मक समूह भिन्न-भिन्न होते हैं। क्रियात्मक समूह समावयवी भिन्न-भिन्न सजातीय श्रेणियों के यौगिक होते हैं। उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल तथा डाइमेथिल ईथर क्रियात्मक समूह समावयवी हैं।
In simple words: क्रियात्मक समूह समावयवता में यौगिकों का अणुसूत्र समान होता है, लेकिन उनमें अलग-अलग क्रियात्मक समूह होते हैं, जैसे एथिल अल्कोहल (अल्कोहल) और डाइमेथिल ईथर (ईथर)।

🎯 Exam Tip: क्रियात्मक समूह समावयवियों के रासायनिक और भौतिक गुणों में महत्वपूर्ण अंतर होता है, क्योंकि उनके क्रियात्मक समूह उनकी अभिक्रियाशीलता को सीधे प्रभावित करते हैं।

 

Question 6. मध्यावयवता को परिभाषित कीजिए ।
Answer: मध्यावयवता किसी द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह से जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। मध्यावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह में जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। मध्यावयवी एक ही सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं। ईथर, ऐल्किल सल्फाइड, द्वितीयक ऐमीन, एस्टर आदि मध्यावयवता प्रदर्शित करते हैं। उदाहरणार्थ-डाइएथिले सल्फाइड एवं मेथिल-n-प्रोपिल सल्फाइड मध्यावयवी हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह डाइएथिल सल्फाइड और मेथिल-n-प्रोपिल सल्फाइड की संरचनाओं को दर्शाता है। दोनों का अणुसूत्र समान है, लेकिन केंद्रीय सल्फर परमाणु से जुड़े ऐल्किल समूह अलग-अलग हैं (एथिल-एथिल बनाम मेथिल-प्रोपिल)। \[ \begin{array}{l} \mathrm{CH}_{3} \mathrm{CH}_{2} \\ \mathrm{CH}_{3} \mathrm{CH}_{2} \end{array} \rangle \mathrm{S} \text { एवं } \begin{array}{l} \mathrm{CH}_{3} \\ \mathrm{CH}_{3} \mathrm{CH}_{2} \mathrm{CH}_{2} \end{array} \rangle \mathrm{S} \] डाइएथिल सल्फाइड मेथिल-n-प्रोपिल सल्फाइड
In simple words: मध्यावयवता तब होती है जब समान अणुसूत्र वाले यौगिकों में एक बहुसंयोजी क्रियात्मक समूह के दोनों ओर जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति भिन्न होती है।

🎯 Exam Tip: मध्यावयवता को समझने के लिए केंद्रीय बहुसंयोजी क्रियात्मक समूह की पहचान करना और उससे जुड़े विभिन्न ऐल्किल समूहों की तुलना करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. चयावयवता का वर्णन कीजिए ।
Answer: यह एक विशेष प्रकार की संरचनात्मक समावयवता है जिनमें दो संरचनात्मक समावयवी सरलता से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं तथा समावयवियों के मध्य साम्यावस्था विद्यमान होती है। वह परिघटना जिसमें दो संरचना समावयवी सरलता में एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं और परस्पर साम्यवस्था में रहते हैं चलावयव या चलावयवी रूप कहलाते हैं। यौगिक विभिन्न प्रकार की चलावयवता प्रदर्शित करते हैं जिनमें कीटो-ईनोल चलावयवता प्रमुख है। ऐल्डिहाइड और कीटोन जिनमें कार्बोनिल समूह के निकटवर्ती कार्बन परमाणु पर एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता प्रदर्शित करते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता -हाइड्रोजन परमाणु का निकटवर्ती कार्बोनिल समूह के ऑक्सीजन परमाणु पर अभिगमन होने में उत्पन्न होती है।
In simple words: चलावयवता एक प्रकार की समावयवता है जिसमें दो संरचनात्मक समावयवी (जैसे कीटो और इनोल रूप) एक-दूसरे में आसानी से परिवर्तित हो सकते हैं और संतुलन में रहते हैं।

🎯 Exam Tip: कीटो-ईनोल चलावयवता कीटोन्स और ऐल्डिहाइड्स में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो उनकी अभिक्रियाशीलता और संरचनात्मक पहचान को प्रभावित करती है।

 

Question 8. त्रिविम समावयवती को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: जब अणुओं में अनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था (विन्यास) में भिन्नता होती है तो यह परिघटना त्रिविम समावयवता कहलाती है। त्रिविम समावयवियों के अणुसूत्र एवं संरचना सूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था भिन्न-भिन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ऐसीटोन के कीटो और ईनोल चलावयवी रूपों को दर्शाता है। कीटो रूप में केंद्रीय कार्बन पर डबल बॉन्ड ऑक्सीजन है, जबकि ईनोल रूप में डबल बॉन्ड कार्बन-कार्बन के बीच है और हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़ा है। कीटो रूप अधिक स्थिर (99% से अधिक) होता है। \[ \begin{array}{l} \mathrm{H} \\ -\mathrm{C}-\mathrm{C}- \\ \mathrm{H} \end{array} \begin{array}{c} \mathrm{H} \\ -\mathrm{C}=\mathrm{C}- \\ \mathrm{H} \end{array} \] (कीटो संरचना) (ईनोल संरचना)
उदाहरणार्थ - ऐसीटोन के दो चलावयवी निम्नवत् हैं-
\[ \mathrm{CH}_{3}-\stackrel{\mathrm{O}}{\|}-\mathrm{CH}_{3} \quad \rightleftharpoons \quad \mathrm{CH}_{2}=\stackrel{\mathrm{OH}}{\mid}-\mathrm{CH}_{3} \] (कीटो रूप) (> 99%) (ईनोल रूप) (1.5\( \times \) 10-4%)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 2-ब्यूटीन के सिस और ट्रांस त्रिविम समावयवियों को दर्शाता है। सिस-2-ब्यूटीन में दोनों मेथिल समूह डबल बॉन्ड के एक ही तरफ होते हैं, जबकि ट्रांस-2-ब्यूटीन में वे डबल बॉन्ड के विपरीत तरफ होते हैं। \[ \begin{array}{l} \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{H} \\ \mathrm{C}=\mathrm{C} \\ \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{H} \end{array} \text { एवं } \begin{array}{l} \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{CH}_{3} \\ \mathrm{C}=\mathrm{C} \\ \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \end{array} \] cis-2 ब्यूटीन trans-2 ब्यूटीन
In simple words: त्रिविम समावयवता में यौगिकों का अणुसूत्र और संरचना सूत्र समान होता है, लेकिन परमाणुओं की त्रिविम (स्थानिक) व्यवस्था भिन्न होती है, जिससे सिस-ट्रांस समावयवी जैसे रूप बनते हैं।

🎯 Exam Tip: त्रिविम समावयवियों के उदाहरणों में सिस-ट्रांस समावयवता, प्रकाशिक समावयवता और संरूपीय समावयवता शामिल हैं, जो जैविक प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

Question 9. त्रिविम समावयवियों के प्रकार बताइए ।
Answer: त्रिविम समावयवी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-
1. प्रतिबिम्ब रूप तथा
2. अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयव
जो त्रिविम समावयवी बायें एवं दायें हाथों के सदृश एक-दूसरे के अन-अध्यारोपणीय दर्पण प्रतिबिम्ब रूप कहलाते हैं जबकि जो त्रिविम समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं होते हैं, वे अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयवी कहलाते हैं।
In simple words: त्रिविम समावयवी दो मुख्य प्रकार के होते हैं: प्रतिबिम्ब रूप (जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं लेकिन अध्यारोपित नहीं होते) और अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयव (जो दर्पण प्रतिबिंब नहीं होते)।

🎯 Exam Tip: प्रतिबिम्ब रूपों और अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयवों के बीच के अंतर को समझना प्रकाशिक सक्रियता और चिरलता से संबंधित अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. ज्यामितीय समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए।
Answer: प्रायः कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध युक्त वे यौगिक जिनमें युग्म-बन्धित कार्बन परमाणु में जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न प्रकार के होते हैं, ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित करते हैं, यह समावयवता युग्म बन्ध के चारों ओर सीमित घूर्णन के कारण उत्पन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की। निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 2-ब्यूटीन के सिस (I) और ट्रांस (II) ज्यामितीय समावयवियों को दर्शाता है। सिस-रूप में मेथिल समूह डबल बॉन्ड के एक ही तरफ हैं, जबकि ट्रांस-रूप में वे विपरीत तरफ हैं, जो डबल बॉन्ड के सीमित घूर्णन के कारण भिन्न स्थानिक व्यवस्था दर्शाते हैं। \[ \begin{array}{l} \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{H} \\ \mathrm{C}=\mathrm{C} \\ \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{H} \end{array} \text { एवं } \begin{array}{l} \mathrm{H}_{3} \mathrm{C} \quad \mathrm{CH}_{3} \\ \mathrm{C}=\mathrm{C} \\ \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \end{array} \] cis-2 ब्यूटीन trans-2 ब्यूटीन
(I) (II)
ये दो त्रिविम संरचनाएँ (I एवं II) 2-ब्यूटीन के दो ज्यामितीय समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं जो सिस-ट्रान्स समावयवी कहलाते हैं। जिन ज्यामितीय समावयवी में समान समूह एक ही पथ में होते हैं। उसे cis-समावयवी या समकक्ष रूप और जिनमें समान विपरीत पक्षों में होते हैं उसे trans-समावयवी या विपक्ष रूप कहते हैं।
In simple words: ज्यामितीय समावयवता तब होती है जब डबल बॉन्ड के चारों ओर सीमित घूर्णन के कारण समान समूहों की स्थानिक स्थिति भिन्न होती है, जिससे सिस (एक ही तरफ) और ट्रांस (विपरीत तरफ) रूप बनते हैं।

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय समावयवता को समझने के लिए डबल बॉन्ड के दोनों कार्बन परमाणुओं से जुड़े समूहों की पहचान करना और उनकी स्थानिक व्यवस्था का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. प्रकाशिक समावयवता को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रकाशिक समावयवता एक प्रकार की त्रिविम समावयवता है तो उन कार्बनिक यौगिकों द्वारा दर्शायी जाती है जिनके अणु विसममित अर्थात् किरेल होते हैं। प्रकाशिक समावयवी समतल ध्रुवित प्रकाश के प्रति भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करते हैं जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को दक्षिणावर्त घुमाता है उसे दक्षिण ध्रुवण-घूर्णक ओर जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को वामावर्त घुमाता है उसे वाम ध्रुवण-घूर्णक कहते हैं। ध्रुवण अघूर्णक प्रकाशिक समावयवी मेसो समावयवी कहलाते हैं। मेसो समावयवियों के अणु सममित होते हैं। प्रकाशिक समावयवियों के रासायनिक गुण में तो समानता होती है परन्तु उनके भौतिक गुण समान या भिन्न हो सकते हैं। उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल की प्रकाशिक समावयवता
In simple words: प्रकाशिक समावयवता एक प्रकार की त्रिविम समावयवता है जो किरेल अणुओं द्वारा प्रदर्शित की जाती है, जो समतल ध्रुवित प्रकाश को घुमाते हैं - दक्षिणावर्त या वामावर्त।

🎯 Exam Tip: प्रकाशिक समावयवता की पहचान किरेल केंद्र (असममित कार्बन) की उपस्थिति से की जाती है, और इसके कारण प्रतिबिम्ब रूप और अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयव बनते हैं।

 

Question 12. एक यौगिक का सूत्र CH2OH-CHCI-CНОН-СНОН-CHCI-CH2OH है। यौगिक के प्रकाशिक संमावयवियों की गणना कीजिए।
Answer: यौगिक CH2OH-CHCI-CНОН-СНОН-CHCI-CH2OH के अणु में असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या (n) चार है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह CH2OH-CHCI-CHOH-CHOH-CHCI-CH2OH की विस्तृत संरचना को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय कार्बन श्रृंखला पर हाइड्रॉक्सिल और क्लोरीन समूह जुड़े हुए हैं। इस अणु में चार असममित कार्बन परमाणु स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। \[ \begin{array}{c} \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \quad \mathrm{H} \\ \mathrm{H}-\mathrm{C}-\mathrm{C}-\mathrm{C}-\mathrm{C}-\mathrm{C}-\mathrm{C}-\mathrm{H} \\ \mathrm{OH} \quad \mathrm{Cl} \quad \mathrm{OH} \quad \mathrm{OH} \quad \mathrm{Cl} \quad \mathrm{OH} \end{array} \] यौगिक के अणु को एक जैसे दो बराबर भागों में विभाजित किया जा सकता है तथा अणु में असममित परमाणुओं की संख्या सम (even) है। अतः ऐसी स्थिति में यौगिक के, ध्रुवण-घूर्णक समावयवियों की संख्या, \( a = 2^{(n-1)} = 2^{(4-1)} = 8 \) मेसो-समावयवियों की संख्या, \( m=2^{(n/2-1)} = 2^{(2-1)} =2 \) और प्रकाशिक समावयवियों की संख्या \( = a+m= 8+2= 10 \)
In simple words: दिए गए यौगिक में चार असममित कार्बन परमाणु हैं, और क्योंकि यह एक सममित अणु है, इसमें 8 ध्रुवण-घूर्णक समावयवी और 2 मेसो-समावयवी सहित कुल 10 प्रकाशिक समावयवी होंगे।

🎯 Exam Tip: प्रकाशिक समावयवियों की कुल संख्या की गणना करने के लिए \( 2^n \) सूत्र का उपयोग करें, जहाँ n असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या है। हालाँकि, मेसो-यौगिकों की उपस्थिति में यह संख्या कम हो सकती है, जिन्हें \( 2^{(n/2-1)} \) सूत्र से ज्ञात किया जाता है।

 

Question 13. होमोलिटिक तथा हेटरोलिटिक विदलन को एक उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: एक सह-संयोजी बन्ध दो परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी द्वारा बनता है। इस प्रकार संयुक्त दो परमाणुओं को एक-दूसरे से अलग होना बन्ध का विदलन या विखण्डन कहलाता है।
(i) होमोलिटिक विदलन या समांग विखण्डन – यह वह प्रक्रम है जिसमें पृथक् होने वाली प्रत्येक परमाणु सह-संयोजी बन्ध के इलेक्ट्रॉन युग्म से एक इलेक्ट्रॉन लेकर पृथक् होता है। इस विदलन द्वारा उत्पन्न खण्डों के पास सह-संयोजक बन्ध का एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है। इन खण्डों को मुक्त मूलक कहते हैं।
उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह क्लोरीन अणु (Cl:Cl) के होमोलिटिक विदलन को दर्शाता है, जिसमें सह-संयोजी बंध के इलेक्ट्रॉन युग्म का विभाजन समान रूप से होता है, जिससे दो क्लोरीन मुक्त मूलक (Cl•) बनते हैं। यह अभिक्रिया प्रकाश या ऊष्मा की उपस्थिति में होती है। \[ \mathrm{Cl}: \mathrm{Cl} \quad \stackrel{\text { प्रकाश }}{\text { ऊष्मा }} \quad \mathrm{Cl}^{\bullet}+\mathrm{Cl}^{\bullet} \] क्लोरीन (मुक्त मूलक)
(ii) हेटरोलिटिक विदलन या विषमांग विखण्डन-इस विदलन में बन्ध के साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म । किसी भी परमाणु या खण्ड के साथ चला जाता है और दो आयन बनते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह R-X के हेटरोलिटिक विदलन को दर्शाता है, जहाँ बंधन के इलेक्ट्रॉन युग्म असमान रूप से विभाजित होते हैं, जिससे एक धनावेशित कार्बोधनायन (R+) और एक ऋणावेशित हैलाइड आयन (X-) बनता है। \[ \mathrm{R}: \mathrm{X} \quad \xrightarrow{\text { हेटरोलिटिक }} \quad \mathrm{R}^{+}+\quad \quad \quad : \mathrm{X}^{-} \] कार्बोनियम आयन कार्बनायन
(धनावेशित) (ऋणावेशित)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह R-X के एक अन्य हेटरोलिटिक विदलन को दर्शाता है, जहाँ बंधन के इलेक्ट्रॉन युग्म दूसरे परमाणु पर चले जाते हैं, जिससे एक ऋणावेशित कार्बनायन (R:-) और एक धनावेशित आयन (X+) बनता है। \[ \mathrm{R}: \mathrm{X} \quad \xrightarrow{\text { हेटरोलिटिक }} \quad \mathrm{R}:^{-} \quad +\quad \mathrm{X}^{+} \] कार्बेनायन
(ऋणावेशित)
जब \( \mathrm{R}^{+} \) एक ऐसा समूह होता है जिसके कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तो इसे कार्बोनियम आयनं कहते हैं तथा जब \( \mathrm{R}^{-} \) के कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तो इसे कार्बनायन कहते हैं।
In simple words: होमोलिटिक विदलन में सह-संयोजी बंध के इलेक्ट्रॉन समान रूप से विभाजित होकर मुक्त मूलक बनाते हैं, जबकि हेटरोलिटिक विदलन में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से विभाजित होकर आयन (कार्बोधनायन या कार्बनायन) बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: बंध विदलन के ये प्रकार अभिक्रिया क्रियाविधियों को समझने में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे विभिन्न प्रकार के अभिक्रिया मध्यवर्ती (मुक्त मूलक, आयन) उत्पन्न करते हैं जो अभिक्रिया के पथ को निर्धारित करते हैं।

 

Question 14. अनुनाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: ऐसे अनेक कार्बनिक यौगिक ज्ञात हैं जिनके सभी गुणों को केवल एक लूईस संरचना (Lewis structure) द्वारा पूर्णतः प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यौगिक के अणु को अनेक ऐसी संरचनाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिनमें से प्रत्येक अणु के अधिकांश गुणों की व्याख्या करती है, परन्तु कोई भी अणु के सभी गुणों की व्याख्या नहीं करती है। ऐसे में अणु की वास्तविक संरचना इन सभी योगदान करने वाली संरचनाओं (जिन्हें अनुनाद संरचनाएँ या विहित संरचनाएँ कहते हैं) की मध्यवर्ती होती है तथा इसे सभी लूईस संरचनाओं का अनुनाद संकर (resonance hybrid) कहते हैं। इस परिघटना को अनुनाद या मीसोमेरिकता कहते हैं। वास्तव में अनुनाद संरचनाओं या विहित संरचनाओं (canonical structures) का कोई अस्तित्व नहीं है। वास्तव में अणु की केवल एक ही संरचना होती है जो कि विभिन्न विहित संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है तथा इसे एक लूईस संरचना द्वारा प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। किसी अणु की विभिन्न संरचनाओं को चिह्न \( \leftrightarrow \) द्वारा पृथक् करके लिखा जाता है। बेंजीन भी एक ऐसा ही यौगिक है जिसके व्यवहार को केवल एक लूईस संरचना द्वारा समझाया नहीं जा सकता है। बेंजीन को निम्न दो अनुनादी संरचनाओं का अनुनाद संकर माना जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह दो बेंजीन वलय संरचनाओं को दर्शाता है। पहली संरचना (I) में दोहरे बंधों की स्थिति दूसरी संरचना (II) से भिन्न है, जो बेंजीन की अनुनाद संरचनाओं को दर्शाती हैं जहाँ दोहरे बंध पूरे वलय में विस्थापित होते हैं। जब \( R^+ \) एक ऐसा समूह होता है जिसके कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तो इसे कार्बोनियम आयनं कहते हैं तथा जब \( R^- \) के कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तो इसे कार्बनायन कहते हैं।
In simple words: अनुनाद वह घटना है जहाँ एक ही अणु को एक से अधिक संरचनाओं द्वारा दर्शाया जा सकता है, जो वास्तविक संरचना का औसत होती हैं। यह इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद संरचनाओं को सही ढंग से दर्शाना और वास्तविक संरचना को अनुनाद संकर के रूप में समझाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अणु के स्थायित्व को प्रभावित करता है।

 

Question 15. अनुनाद प्रभाव या मीसोमेरिक प्रभाव को समझाइए ।
Answer: संयुग्मित निकायों (जिनमें एकान्तर से एकल और द्विआबन्ध होते हैं) में अनुनाद के कारण निकाय के एक भाग से दूसरे भाग में इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन होता है जिसके कारण उच्च तथा निम्न इलेक्ट्रॉन घनत्व के केन्द्र बन जाते हैं। यह प्रभाव अनुनाद प्रभाव अथवा मीसोमेरिक प्रभाव कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है।
(i) धनात्मक अनुनाद प्रभाव-यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध अथवा एक संयुग्मित निकाय को इलेक्ट्रॉन दान देते हैं । -CI,-Br,I,-NH2,-NR2,-OH,-OR,-SH-SR आदि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।
(ii) ऋणात्मकं अनुनाद प्रभाव-यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध या संयुग्मित निकाय से इलेक्ट्रॉन अपनी ओर विस्थापित करते हैं।
\( \text{-NO}_2, \text{-C} \equiv \text{N}, \text{CHO}, \text{-COOR} \) आदि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक रासायनिक अनुनाद संरचना को दर्शाता है, जहाँ इलेक्ट्रॉन युग्म और पाई-बॉन्ड का विस्थापन होता है। पहले भाग में CH2=CH-CH=O है, जबकि दूसरे भाग में CH2-CH=CH-O है, और एक धनात्मक आवेश पहले कार्बन पर तथा ऋणात्मक आवेश ऑक्सीजन पर दर्शाया गया है, जिससे इलेक्ट्रॉन घनत्व में परिवर्तन स्पष्ट होता है।
In simple words: अनुनाद प्रभाव, जिसे मीसोमेरिक प्रभाव भी कहते हैं, तब होता है जब इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन एक संयुग्मित प्रणाली में होता है, जिससे अणु के भीतर उच्च और निम्न इलेक्ट्रॉन घनत्व वाले क्षेत्र बन जाते हैं। यह या तो इलेक्ट्रॉन देने वाले समूहों (धनात्मक) या इलेक्ट्रॉन खींचने वाले समूहों (ऋणात्मक) के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद प्रभाव को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करना और धनात्मक व ऋणात्मक प्रभावों को पहचानना, कार्बनिक अणुओं की क्रियाशीलता और स्थायित्व को समझने के लिए आवश्यक है।

 

Question 16. अतिसंयुग्मन प्रभाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
Answer: संतृप्त निकाय पर ऐल्किल समूहों के प्रेरणिक प्रभाव का क्रम निम्न होता है \( \text{(CH}_3\text{)}_3 \text{C- > (CH}_3\text{)}_2\text{CH- > CH}_3\text{CH}_2\text{- > CH}_3\text{-} \) परन्तु जब ऐल्किल समूह किसी असंतृप्त निकाय से जुड़ा होता है तो प्रेरणिक प्रभाव का क्रम उल्टा हो । जाता है। यह प्रभावं अतिसंयुग्मन प्रभाव कहलाता है। चूंकि इस प्रभाव को सर्वप्रथम बेकर तथा नाथन ने देखा इसलिए इस प्रभाव को बेकर-नाथन प्रभाव भी कहते हैं। अतिसंयुग्मन में द्विआबन्ध के p-कक्षकों तथा समीपवर्ती एकल आबन्ध के \( \sigma \)-कक्षक के अतिव्यापन के द्वारा \( \pi \)-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है। अतः इसमें \( \sigma-\pi \) संयुग्मन (G-I conjugation) होता है। वास्तव में अतिसंयुग्मन प्रभाव अनुनाद प्रभाव का ही विस्तार है। चूंकि अतिसंयुग्मन – H परमाणुओं के द्वारा होता है, इसलिए 0- H परमाणुओं की संख्या जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक अतिसंयुग्मी संरचनाएँ होती हैं और प्रभाव भी उतना ही अधिक होता है। मेथिल समूह, एथिल समूह, आइसोप्रोपिल समूह तथा तृतीयक-ब्यूटिल समूह के साथ हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या क्रमशः 3, 2, 1 तथा 0 होती है अतः इन विभिन्न समूहों के लिए अतिसंयुग्मन प्रभाव का क्रम निम्न होता है-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह संरचनात्मक आरेख अतिसंयुग्मन प्रभाव को दर्शाता है। इसमें एक कार्बन-हाइड्रोजन (C-H) सिग्मा बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन निकटवर्ती कार्बन-कार्बन डबल बॉन्ड के पाई-ऑर्बिटल में विस्थापित होते हैं। इससे हाइड्रोजन परमाणु पर आंशिक धनात्मक आवेश और दूसरे छोर पर ऋणात्मक आवेश उत्पन्न होता है, जो अतिसंयुग्मन को 'नो-बॉन्ड रेजोनेंस' के रूप में समझाता है।
In simple words: अतिसंयुग्मन, जिसे बेकर-नाथन प्रभाव भी कहते हैं, एक विशेष प्रकार का इलेक्ट्रॉन विस्थापन है जहाँ \( \sigma \)-बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन पास के \( \pi \)-सिस्टम या खाली \( p \)-ऑर्बिटल में विस्थापित होते हैं। यह अणु के स्थायित्व को बढ़ाता है और इसमें जितने अधिक \( \alpha \)-हाइड्रोजन परमाणु होते हैं, उतना ही अधिक प्रभाव होता है।

🎯 Exam Tip: अतिसंयुग्मन प्रभाव को \( \alpha \)-हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या के साथ जोड़कर समझाना और विभिन्न ऐल्किल समूहों में इसकी तीव्रता का क्रम याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 17. इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SE (S = substitution तथा E= electrophilic) से प्रकट करते हैं तथा SE1 और SE2 में 1 तथा 2 कोटि को प्रकट करते हैं। ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन; जैसे-हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण तथा सल्फोनीकरण SE 2 प्रकार के इलेक्ट्रोफिलिक (इलेक्ट्रॉनस्नेही) प्रतिस्थापन हैं। उदाहरणार्थ-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह नाइट्रीकरण अभिक्रिया के माध्यम से इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन को दर्शाता है। एक बेंजीन वलय पर नाइट्रोनियम आयन (\( \text{NO}_2^+ \)) का आक्रमण दिखाया गया है, जो पहले मंद गति से सिग्मा कॉम्प्लेक्स बनाता है और फिर तीव्र गति से प्रोटॉन (\( \text{H}^+ \)) का निष्कासन करके नाइट्रोबेन्जीन बनाता है।
In simple words: इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया में, एक इलेक्ट्रॉन-चाहने वाला अभिकर्मक (इलेक्ट्रॉनस्नेही) अणु से एक परमाणु या समूह को हटाकर उसकी जगह ले लेता है। यह आमतौर पर ऐरोमैटिक यौगिकों में होता है, जैसे बेंजीन का नाइट्रीकरण, जहाँ \( \text{NO}_2^+ \) आयन हाइड्रोजन को प्रतिस्थापित करता है।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के उदाहरणों को उनके क्रियाविधि के साथ याद रखें, विशेषकर ऐरोमैटिक यौगिकों के नाइट्रीकरण, हैलोजनीकरण और सल्फोनीकरण को।

 

Question 18. ऐल्काइनों की हाइड्रोजन हैलाइडों से योग क्रिया किस प्रकार की अभिक्रिया है ? इसकी क्रियाविधि समझाइए ।
या
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण देते हुए समझाइए ।

Answer: यदि योगात्मक अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं। प्रश्न में उल्लिखित अभिक्रिया भी एक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (संकलन) अभिक्रिया है। ऐल्कीनों में हाइड्रोजन हैलाइड का योग कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध पर दो पदों में होता है। पहले पद में ऐल्किल हाइड्रोजन हैलाइड से प्रोटॉन \( \text{H}^+ \) (इलेक्ट्रॉनस्नेही) ग्रहण करती है और कार्बोधनायन (मध्यवर्ती) तथा हैलाइड आयन बनाती है। दूसरे पद में कार्बोधनायन हैलाइड आयन से संयोग करता है और ऐल्किल हैलाइड बनाता है। उदाहरणार्थ-एथिलीन में HBr का योग
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एथिलीन (\( \text{CH}_2=\text{CH}_2 \)) पर हाइड्रोजन ब्रोमाइड (\( \text{H-Br} \)) के इलेक्ट्रॉनस्नेही योग की क्रियाविधि को दर्शाता है। पहले मंद पद में, एथिलीन \( \text{H}^+ \) आयन को ग्रहण करके एथिल कार्बोधनायन (\( \text{CH}_2^+-\text{CH}_3 \)) बनाती है। फिर तीव्र पद में, ब्रोमाइड आयन (\( \text{:Br}^- \)) कार्बोधनायन पर आक्रमण करके ब्रोमोएथेन (\( \text{Br-CH}_2-\text{CH}_3 \)) बनाती है।
In simple words: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया वह है जिसमें एक इलेक्ट्रॉनस्नेही (जैसे \( \text{H}^+ \)) एक बहु-बंध वाले अणु पर पहले आक्रमण करता है, जिससे एक मध्यवर्ती बनता है, और फिर दूसरा समूह जुड़ता है। एथिलीन पर \( \text{HBr} \) का योग इसका एक उदाहरण है जहाँ \( \text{H}^+ \) पहले जुड़ता है, फिर \( \text{Br}^- \)।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं के लिए मार्कोनीकॉफ के नियम को समझना और मध्यवर्ती कार्बोधनायन के स्थायित्व को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 19. नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
Answer: यदि योगात्मक अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं। उदाहरणार्थ- मेथेनल (फॉर्मेल्डिहाइड) पर HCN का योग
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह फॉर्मेल्डिहाइड (\( \text{H}_2\text{C=O} \)) पर हाइड्रोजन सायनाइड (\( \text{H-CN} \)) के नाभिकस्नेही योग की क्रियाविधि को दर्शाता है। पहले पद में, सायनाइड आयन (\( \text{CN}^- \)) कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है, जिससे एक मध्यवर्ती एल्कोऑक्साइड आयन (\( \text{H}_2\text{C(CN)O}^- \)) बनता है। फिर यह प्रोटॉन (\( \text{H}^+ \)) को ग्रहण करके सायनाहाइड्रिन (\( \text{H}_2\text{C(CN)OH} \)) बनाता है। ऐल्डिहाइड और कीटोन मुख्यतः इसी प्रकार की अभिक्रियाएँ करते हैं।
In simple words: नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया में, एक इलेक्ट्रॉन-धनी अभिकर्मक (नाभिकस्नेही) एक अणु के इलेक्ट्रॉन-न्यून केंद्र पर हमला करता है, आमतौर पर कार्बोनिल समूह में। फॉर्मेल्डिहाइड पर \( \text{HCN} \) का योग एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ सायनाइड आयन कार्बोनिल कार्बन पर हमला करता है।

🎯 Exam Tip: नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं में कार्बोनिल समूह की ध्रुवीयता और नाभिकस्नेही की प्रकृति को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 20. मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए ।
Answer: यदि योगात्मक अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं। उदाहरणार्थ-परॉक्साइड की उपस्थिति में ऐल्कीनों पर HBr का योग।
In simple words: मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया एक प्रकार की योगात्मक अभिक्रिया है जो मुक्त मूलकों के माध्यम से होती है। यह अभिक्रिया परॉक्साइड की उपस्थिति में होती है, जो मुक्त मूलक बनाता है, और इसका एक सामान्य उदाहरण ऐल्कीनों पर \( \text{HBr} \) का योग है, जो एंटी-मार्कोनीकॉफ नियम का पालन करता है।

🎯 Exam Tip: मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रियाओं को उनकी मुक्त मूलक क्रियाविधि और मार्कोनीकॉफ के विपरीत उत्पाद (जैसे एंटी-मार्कोनीकॉफ योग) के लिए याद रखें।

 

Question 21. किसी ऐल्किल हैलाइड के विहाइड्रोहैलोजनीकरण की अभिक्रिया की क्रिया-विधि समझाइए ।
या
\( \alpha \)-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या हैं? उदाहरण दीजिए ।

Answer: जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं अथवा समूहों को विलोपन क्रियाधार अणु के एक ही परमाणु में होता है, वे \( \alpha \)-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। विहाइड्रोहैलोजनीकरण \( \alpha \)-विलोपन अभिक्रिया का उदाहरण है। ऐल्किल हैलाइडों को ऐल्कोहॉलीय KOH के साथ उबालने पर ऐल्कीन प्राप्त होते हैं; जैसे- आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड प्रोपीन देता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड (\( \text{CH}_3\text{CHBrCH}_3 \)) के विहाइड्रोहैलोजनीकरण की अभिक्रिया को दर्शाता है। ऐल्कोहॉलीय KOH की उपस्थिति में गर्म करने पर ब्रोमीन और हाइड्रोजन परमाणु का विलोपन होता है, जिससे प्रोपीन (\( \text{CH}_3\text{CH=CH}_2 \)), पोटैशियम ब्रोमाइड (\( \text{KBr} \)) और जल (\( \text{H}_2\text{O} \)) बनते हैं। यह अभिक्रिया विहाइड्रोहैलोजनीकरण कहलाती है। इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन एक कार्बन परमाणु से तथा हैलोजन निकटवर्ती दूसरे कार्बन परमाणु से HBr के रूप में विलोपित होता है। इस अभिक्रिया की क्रिया-विधि (SN 2) एक ही पद में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त की जाती है।
In simple words: विहाइड्रोहैलोजनीकरण एक विलोपन अभिक्रिया है जहाँ एक ऐल्किल हैलाइड से हाइड्रोजन और हैलोजन परमाणु हट जाते हैं, जिससे एक ऐल्कीन बनती है। यह आमतौर पर ऐल्कोहॉलीय KOH की उपस्थिति में होता है।

🎯 Exam Tip: विहाइड्रोहैलोजनीकरण अभिक्रिया में ऐल्कोहॉलीय KOH की भूमिका और सेत्ज़ेफ (Saytzeff) नियम का ध्यान रखें, जो प्रमुख ऐल्कीन उत्पाद को निर्धारित करता है।

 

Question 22. \( \beta \)-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण सहित समझाइए ।
या
निर्जलीकरण अभिक्रिया की क्रिया-विधि को उदाहरण सहित समझाइए ।

Answer: जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं या समूहों का विलोपन क्रियाधार अणु के समीपवर्ती परमाणुओं में होता है, वे \( \beta \)-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। उदाहरणार्थ-सान्द्र H2SO4, H3PO4 निर्जल ZnCl2 आदि निर्जलीकारक पदार्थ ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण करके ऐल्कीन बनाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ऐल्कोहॉल (\( \text{RCH}_2\text{CH}_2\text{OH} \)) के निर्जलीकरण को दर्शाता है। सांद्र \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) और 170°C ताप पर गर्म करने पर, ऐल्कोहॉल से जल (\( \text{H}_2\text{O} \)) का अणु निकल जाता है और एक ऐल्कीन (\( \text{RCH=CH}_2 \)) बनती है। ऐल्कीन ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण की क्रिया-विधि को निम्नलिखित पदों में प्रकट कर सकते हैं।
(i) ऐल्कोहॉलों के –OH समूह में इलेक्ट्रॉन के दो एकाकी युग्म होते हैं। इनमें से एक युग्म प्रयुक्त अम्ल से एक प्रोटॉन ग्रहण करके प्रोटॉनयुक्त ऐल्कोहॉल या ऑक्सोनियम आयन बना लेता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक ऐल्कोहॉल (\( \text{R-CH}_2\text{-CH}_2\text{-OH} \)) के प्रोटॉनिकरण की क्रियाविधि को दर्शाता है, जहाँ ऐल्कोहॉल का ऑक्सीजन परमाणु एक प्रोटॉन (\( \text{H}^+ \)) को ग्रहण करके प्रोटॉन युक्त ऐल्कोहॉल या ऑक्सोनियम आयन (\( \text{R-CH}_2\text{-CH}_2\text{-OH}_2^+ \)) बनाता है।
(ii) ऑक्सोनियम आयन जल तथा कार्बोनियम आयन में विघटित हो जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक प्रोटॉन युक्त ऐल्कोहॉल (\( \text{R-CH}_2\text{CH}_2\text{-OH}_2^+ \)) के विघटन को दर्शाता है। इसमें ऑक्सीजन पर धनात्मक आवेश वाला समूह एक जल अणु (\( \text{H}_2\text{O} \)) के रूप में निकल जाता है, जिससे एक कार्बोधनायन (\( \text{R-CH}_2\text{CH}_2^+ \)) बनता है।
(iii) कार्बोनियम आयन के कार्बन परमाणु पर केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसलिए यह एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखती है। इस स्थिति में पास का कार्बन परमाणु हाइड्रोजन आयन पृथक् करता है और ऐल्कीन अणु उत्पन्न होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक कार्बोधनायन (\( \text{R-CH}_2^+ \text{-CH}_2 \)) से \( \text{H}^+ \) आयन के निष्कासन को दर्शाता है, जिससे एक ऐल्कीन (\( \text{RCH=CH}_2 \)) का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में, कार्बोधनायन का पास का कार्बन परमाणु अपना हाइड्रोजन निष्कासित करता है और एक नया पाई-बॉन्ड बनाता है।
In simple words: \( \beta \)-विलोपन अभिक्रियाएँ वे होती हैं जहाँ एक अणु से दो परमाणु या समूह समीपवर्ती \( \beta \)-कार्बन परमाणुओं से हट जाते हैं, जिससे एक बहु-बंध बनता है। ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण इसका एक सामान्य उदाहरण है, जहाँ जल का अणु निकल जाता है और ऐल्कीन बनता है।

🎯 Exam Tip: निर्जलीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधि के तीनों पदों को याद रखें- प्रोटॉनिकरण, जल अणु का निष्कासन और प्रोटॉन का निष्कासन। मध्यवर्ती कार्बोधनायन के स्थायित्व पर ध्यान दें।

 

Question 23. नाइट्रीकरण पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: जब किसी ऐल्केन के हाइड्रोजन परमाणु को नाइट्रो (-NO2) मूलक द्वारा प्रतिस्थापित करते हैं, तो नाइट्रोऐल्केन उत्पाद प्राप्त होता है। इस प्रकार के प्रतिस्थापन को नाइट्रीकरण कहते हैं। सामान्यतया ऐल्केन नाइट्रिक अम्ल के साथ साधारण परिस्थितियों में कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाते हैं। लेकिन उच्च ताप पर जब ऐल्केन व नाइट्रिक अम्ल के वाष्पों को अधिक ताप (300-450°C) पर गर्म किया जाता है, तो नाइट्रोऐल्केन प्राप्त होते हैं। इस अभिक्रिया को वाष्प नाइट्रीकरण कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह नाइट्रीकरण अभिक्रिया को दर्शाता है, जहाँ एक हाइड्रोकार्बन (\( \text{R-H} \)) नाइट्रिक अम्ल (\( \text{HO-NO}_2 \)) के साथ 450°C पर क्रिया करके नाइट्रोऐल्केन (\( \text{R-NO}_2 \)) और जल (\( \text{H}_2\text{O} \)) बनाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह नाइट्रीकरण अभिक्रिया का एक विशिष्ट उदाहरण दर्शाता है जहाँ मेथेन (\( \text{CH}_4 \)) नाइट्रस अम्ल (\( \text{HONO}_2 \)) के साथ क्रिया करके नाइट्रोमेथेन (\( \text{CH}_3\text{NO}_2 \)) और जल (\( \text{H}_2\text{O} \)) बनाता है।
In simple words: नाइट्रीकरण वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें एक नाइट्रो समूह (\( \text{-NO}_2 \)) एक अणु में जुड़ता है, आमतौर पर हाइड्रोजन परमाणु को प्रतिस्थापित करके। ऐल्केनों का नाइट्रीकरण उच्च तापमान पर नाइट्रिक अम्ल के साथ करके नाइट्रोऐल्केन बनाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: नाइट्रीकरण अभिक्रिया के लिए आवश्यक शर्तें (जैसे उच्च ताप) और उत्पाद का नाम (नाइट्रोऐल्केन) याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 24. आप कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
Answer: किसी यौगिक में कार्बन तथा हाइड्रोजन की उपस्थिति की जाँच एक ही परीक्षण द्वारा हो जाती है। इस परीक्षण में यौगिक को कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। ऐसा करने पर यौगिक में उपस्थित कार्बन तथा हाइड्रोजन क्रमशः डाइऑक्साइड तथा जल में परिवर्तित हो जाते हैं। \[ \text{C} + 2\text{CuO} \xrightarrow{\Delta} \text{CO}_2 + 2\text{Cu} \] \[ 2\text{H} + \text{CuO} \xrightarrow{\Delta} \text{H}_2\text{O} + \text{Cu} \] कार्बन डाइऑक्साइड चूने के पानी (lime water) को दूधिया (milky) कर देती है और जल निर्जल कॉपर सल्फेट को नीला कर देता है। \[ \text{CO}_2 + \text{Ca(OH)}_2 \longrightarrow \text{CaCO}_3 + \text{H}_2\text{O} \] (दूधियापन) \[ 5\text{H}_2\text{O} + \text{CuSO}_4 \longrightarrow \text{CuSO}_4 \cdot 5\text{H}_2\text{O} \] (श्वेत) (नीला)
In simple words: कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन की पहचान करने के लिए, यौगिक को कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म किया जाता है। उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को चूने के पानी से गुजारकर (जो दूधिया हो जाता है) और जल को निर्जल कॉपर सल्फेट से (जो नीला हो जाता है) पहचानते हैं।

🎯 Exam Tip: कार्बन डाइऑक्साइड और जल के लिए विशिष्ट रासायनिक परीक्षणों और उनके अवलोकनों को याद रखें, क्योंकि यह पहचान परीक्षण का मुख्य आधार है।

 

Question 25. आप कार्बनिक यौगिक में सल्फर की पहचान कैसे करेंगे?
Answer: किसी कार्बनिक यौगिक में सल्फर की उपस्थिति की जाँच निम्न परीक्षणों के द्वारा की जाती है।
(i) ऑक्सीकरण परीक्षण कार्बनिक यौगिक को पोटैशियम नाइट्रेट और सोडियम कार्बोनेट के मिश्रण के साथ संगलित करते हैं। इससे उसमें उपस्थित सल्फर सल्फेट में ऑक्सीकृत हो जाता। है। \[ 3\text{KNO}_3 \longrightarrow 3\text{KNO}_2 + 3[\text{O}] \] \[ \text{Na}_2\text{CO}_3 + \text{S} + 3[\text{O}] \longrightarrow \text{Na}_2\text{SO}_4 + \text{CO}_2 \] संगलित पदार्थ को जल के साथ निष्कर्षित करके इसे उबालते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। निस्वंद में सोडियम सल्फेट होता है। निस्वंद में तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीकृत करते हैं और फिर उसमें बेरियम सल्फेट विलयन डालते हैं। सफेद अवक्षेप की प्राप्ति यौगिक में सल्फर की उपस्थिति दर्शाती है।
(ii) लैंसे परीक्षण-सर्वप्रथम लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। यदि यौगिक में सल्फर उपस्थित होता है। तो वह सोडियम से अभिक्रिया करके सोडियम सल्फाइड बनाता है। अतः लैंसे निष्कर्ष में सोडियम सल्फाइडे उपस्थित होता है। अब इस निष्कर्ष को दो भागों में बाँट देते हैं। पहले भाग को तनु ऐसीटिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें लेड ऐसीटेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। यदि काला अवक्षेप प्राप्त होता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है। लैंसे निष्कर्ष के दूसरे भाग में सोडियम नाइट्रोभुसाइड की कुछ बूंदें डालते हैं। यदि विलयन बैंगनी हो जाता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है।
In simple words: कार्बनिक यौगिक में सल्फर की पहचान के लिए ऑक्सीकरण परीक्षण (जहाँ \( \text{BaSO}_4 \) का सफेद अवक्षेप मिलता है) या लैंसे परीक्षण (जहाँ लेड ऐसीटेट के साथ काला अवक्षेप या सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड के साथ बैंगनी रंग मिलता है) का उपयोग किया जाता है।

🎯 Exam Tip: सल्फर की पहचान के लिए दोनों परीक्षणों (ऑक्सीकरण और लैंसे) के रासायनिक आधार और उनके विशिष्ट अवलोकनों (जैसे \( \text{BaSO}_4 \) का अवक्षेप, लेड सल्फाइड का काला अवक्षेप, या बैंगनी रंग) को याद रखें।

 

Question 26. आप कार्बनिक यौगिकों में हैलोजनों की पहचान कैसे करेंगे?
Answer: किसी कार्बनिक यौगिक में हैलोजनों की जाँच निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है-
(i) बेलस्टीन परीक्षण-एक साफ कॉपर के तार को बुन्सन बर्नर की ऑक्सीकारी ज्वाला में तब तक गर्म करते हैं जब तक कि वह ज्वाला को हरा या नीला रंग देना बंद नहीं कर देता। अब इस गर्म तार को यौगिक में डुबाकर दोबारा से बुन्सन बर्नर की ज्वाला में गर्म करते हैं। ज्वाला का रंग दोबारा से हरा या नीला हो जाना यौगिक में हैलोजनों की उपस्थिति दर्शाता है। इस परीक्षण की कुछ सीमाएँ भी हैं। इस परीक्षण द्वारा यह पता नहीं चलता है कि यौगिक में कौन-सा हैलोजन है। दूसरे, कुछ ऐसे पदार्थ जिनमें हैलोजन नहीं होते हैं, वे भी यह परीक्षण देते हैं। यूरिया, थायोयूरिया आदि ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।
(ii) लैंसे परीक्षण-इस परीक्षण के लिए पहले लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। लैंसे निष्कर्ष तैयार करने में जब कार्बनिक यौगिक को सोडियम के साथ संगलित करते हैं तब कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन सोडियम के साथ संयोग करके सोडियम हैलाइड बनाते हैं। ये सोडियम हैलाइड लैंसे निष्कर्ष में उपस्थित होते हैं। लैंसे निष्कर्ष के एक भाग को तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर तथा फिर उसे ठण्डा करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। अवक्षेप का बनना हैलोजन की उपस्थिति दर्शाता है। अवक्षेप अवक्षेप के रंग और उसकी अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में विलेयता के आधार पर कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन की पहचान की जाती है।
(a) सफेद अवक्षेप बनता है जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में घुल जाता है- क्लोरीन उपस्थित
(b) हल्का पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में कम घुलता है- ब्रोमीन उपस्थित
(c) गहरा पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में बिल्कुल भी नहीं घुलता हैआयोडीन उपस्थित
(iii) कार्बन डाइसल्फाइड परीक्षण-इस परीक्षण का प्रयोग ब्रोमीन और आयोडीन की जाँच के लिए किया जाता है। इसमें लैंसे निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें क्लोरीन जल की कुछ बूंदें डाल देते हैं। फिर इस विलयन में कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड मिलाकर इसे हिलाते हैं। कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड पर्त का नारंगी रंग यौगिक में ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है जबकि इसका बैंगनी रंग यौगिक में आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है। अम्लीकृत लैंसे निष्कर्ष (सोडियम हैलाइड) में क्लोरीन जल डालने पर मुक्त \( \text{Br}_2 \) और \( \text{I}_2 \) उत्सर्जित होती हैं जो कार्बन डाइसल्फाइड यो कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुलकर उन्हें क्रमशः नारंगी (orange) तथा बैंगनी (violet) रंग प्रदान करती हैं। \[ 2\text{NaBr}+\text{Cl}_2 \longrightarrow 2\text{NaCl}+ \text{Br}_2 \text{ (CS}_2 \text{ या CCl}_4 \text{ में नारंगी रंग)} \] \[ 2\text{Nal}+\text{Cl}_2 \longrightarrow 2\text{NaCl} + \text{I}_2 \text{ (CS}_2, \text{ या CCl}_4 \text{ में बैंगनी रंग)} \]
In simple words: कार्बनिक यौगिकों में हैलोजन की पहचान के लिए बेलस्टीन परीक्षण (जो कॉपर तार को गर्म करने पर रंगीन ज्वाला देता है) और लैंसे परीक्षण (जहाँ \( \text{AgNO}_3 \) के साथ अवक्षेप बनता है) का उपयोग किया जाता है। अवक्षेप के रंग और अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में घुलनशीलता से विशिष्ट हैलोजन की पहचान होती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न हैलोजनों के लिए लैंसे परीक्षण के अवक्षेप के रंग और उनकी घुलनशीलता को याद रखें, क्योंकि यह सटीक पहचान के लिए महत्वपूर्ण है। बेलस्टीन परीक्षण की सीमाओं का भी उल्लेख करें।

 

Question 27. आप कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन व फॉस्फोरस की पहचान कैसे करेंगे?
Answer: ऑक्सीजन की पहचान-किसी कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति की जाँच के लिए कोई प्रत्यक्ष विधि उपलब्ध नहीं है। इसकी जाँच सामान्यतः निम्नांकित अप्रत्यक्ष विधियों द्वारा की जाती है।
(i) कार्बनिक यौगिकों की ऑक्सीजन युक्त क्रियात्मक समूहों –OH, COOH, CHO,-NO2 के लिए जाँच करते हैं। यदि किसी यौगिक में इनमें से कोई क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है।
(ii) कार्बनिक यौगिक में उपस्थित अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताएँ ज्ञात करते हैं। यदि इन प्रतिशतताओं का योग 100 से कम होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है। इनका अंतर यौगिक में ऑक्सीजन का प्रतिशत बताता है। फॉस्फोरस की पहचान-कार्बनिक यौगिक को सोडियम परॉक्साइड (ऑक्सीकारक) के साथ संगलित करते हैं जिससे सोडियम फॉस्फेट बनता है। संगलित पदार्थ का जल के साथ निष्कर्षण करके उसे छान लेते हैं। निस्वंद (filtrate) जिसमें सोडियम फॉस्फेट उपस्थित होता है, को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर उसमें अमोनियम मॉलिब्डेट विलयन मिलाते हैं। | पीले अवक्षेप अथवा पीले रंग की प्राप्ति कार्बनिक यौगिक में फॉस्फोरस की उपस्थिति दर्शाती है। \[ 2\text{P}+5\text{Na}_2\text{O}_2 \xrightarrow{\Delta} 2\text{Na}_3\text{PO}_4 + 2\text{Na}_2\text{O} \] (कार्बनिक यौगिक से) सोडियम फॉस्फेट \[ \text{Na}_3\text{PO}_4 + 3\text{HNO}_3 \longrightarrow \text{H}_3\text{PO}_4 + 3\text{NaNO}_3 \] \[ 12\text{(NH}_4\text{)}_2\text{MoO}_4 + \text{H}_3\text{PO}_4 + 21\text{HNO}_3 \xrightarrow{\Delta} \text{NH}_4\text{PO}_4 \cdot 12\text{MoO}_3 \downarrow + 21\text{NH}_4\text{NO}_3 + 12\text{H}_2\text{O} \] अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट (पीला अवक्षेप)
In simple words: ऑक्सीजन की पहचान अप्रत्यक्ष रूप से क्रियात्मक समूहों या तत्वों की प्रतिशतता से की जाती है। फॉस्फोरस की पहचान के लिए यौगिक को सोडियम परॉक्साइड के साथ संगलित किया जाता है, फिर अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाने पर पीले अवक्षेप की उपस्थिति से इसकी पुष्टि होती है।

🎯 Exam Tip: फॉस्फोरस पहचान के लिए रासायनिक समीकरणों और अंतिम पीले अवक्षेप के गठन को याद रखें। ऑक्सीजन के लिए, यह आमतौर पर अन्य तत्वों के प्रतिशत से अंतर के रूप में निर्धारित किया जाता है।

 

Question 28. कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण कैसे किया जाता है? समझाइए ।
Answer: कार्बनिक यौगिकों में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण लीबिग की दहन विधि (Liebig's combustion method) द्वारा किया जाता है। कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण एक ही प्रयोग द्वारा हो जाता है। इसमें कार्बनिक यौगिक की ज्ञात मात्रा को शुद्ध शुष्क ऑक्सीजन (आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड रहित) के वातावरण में कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। इससे कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड में तथा हाइड्रोजन, जल में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। \[ \text{C} + 2\text{CuO} \xrightarrow{\Delta} \text{CO}_2 + 2\text{Cu} \] \[ 2\text{H} + \text{CuO} \xrightarrow{\Delta} \text{H}_2\text{O} + \text{Cu} \] उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड U-नली में लिए गए सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है जबकि उत्पन्न जल एक अन्य U-नली में लिए गए निर्जल कैल्सियम क्लोराइड द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इससे सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन तथा कैल्सियम क्लोराइड के द्रव्यमानों में वृद्धि से क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड और जल की मात्राएँ ज्ञात कर लेते हैं। इनसे कार्बन तथा हाइड्रोजन की, प्रतिशतता की गणना कर लेते हैं।
In simple words: कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण लीबिग की दहन विधि द्वारा किया जाता है, जहाँ कार्बनिक यौगिक को कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ जलाया जाता है। उत्पन्न \( \text{CO}_2 \) को \( \text{KOH} \) द्वारा और \( \text{H}_2\text{O} \) को \( \text{CaCl}_2 \) द्वारा अवशोषित करके उनकी मात्राएँ ज्ञात की जाती हैं।

🎯 Exam Tip: लीबिग दहन विधि के सिद्धांतों को समझें, विशेष रूप से \( \text{CO}_2 \) और \( \text{H}_2\text{O} \) को अवशोषित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले अभिकर्मकों को।

 

Question 29. कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन का निर्धारण करने की विधि लिखिए ।
Answer: कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की प्रतिशतता की गणना कुल प्रतिशतता (100) में से अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताओं के योग को घटाकर की जाती है। ऑक्सीजन का प्रत्यक्ष निर्धारण निम्नविधि से भी किया जा सकता है। कार्बनिक यौगिक की एक निश्चित मात्रा नाइट्रोजन गैस की धारा में गर्म करके अपघटित की जाती है। प्राप्त ऑक्सीजनयुक्त गैसीय मिश्रण को रक्त-तप्त कोक पर प्रवाहित करते हैं जिससे सारी ऑक्सीजन कार्बन मोनो-ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। तत्पश्चात् गैसीय मिश्रण को हल्के गर्म आयोडीन पेन्टाऑक्साइड (\( \text{I}_2\text{O}_5 \)) में प्रवाहित करते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाती है और आयोडीन मुक्त होती है। अथवा \[ \text{यौगिक} \xrightarrow{\Delta} \text{O}_2 + \text{अन्य गैसीय उत्पाद} \] \[ [2\text{C}+\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{CO}] \times 5 \] \[ [\text{I}_2\text{O}_5 + 5\text{CO} \longrightarrow \text{I}_2 + 5\text{CO}_2] \times 2 \] \[ 10\text{C}+5\text{O}_2 + 2\text{I}_2\text{O}_5 \longrightarrow 10\text{CO}_2 + 2\text{I}_2 \] ऑक्सीजन की प्रतिशतता का आकलन मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड अथवा आयोडीन की मात्रा से किया जा सकता है।
In simple words: ऑक्सीजन का निर्धारण आमतौर पर अन्य तत्वों की प्रतिशतता को कुल 100% से घटाकर अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। प्रत्यक्ष विधि में, यौगिक को गर्म करके ऑक्सीजन को \( \text{CO} \) में परिवर्तित करते हैं, फिर इसे \( \text{I}_2\text{O}_5 \) से गुजारकर \( \text{CO}_2 \) और \( \text{I}_2 \) में बदलते हैं, जिनकी मात्रा से ऑक्सीजन की गणना की जाती है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन निर्धारण की प्रत्यक्ष विधि में प्रयुक्त रासायनिक अभिक्रियाओं और stoichiometic संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है, विशेषकर \( \text{CO} \) और \( \text{I}_2\text{O}_5 \) के बीच की प्रतिक्रिया को।

 

Question 30. 1.05 ग्राम एक कार्बनिक यौगिक की केल्डाल विधि से क्रिया की गयी तथा उत्पन्न NH3 को 100 मिली N/10 H2SO4 में अवशोषित किया गया। बचे हुए अम्ल को उदासीन करने हेतु 10 मिली N/5 NaOH घोल की आवश्यकता हुई । यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए ।
Answer: मान लीजिए, V मिली शेष अम्ल N/10 \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) को उदासीन करने में 10 मिली N/5 \( \text{NaOH} \) लगे, तो \[ \text{V} \times \text{N}/10 \, \text{H}_2\text{SO}_4 = 10 \, \text{मिली N}/5 \, \text{NaOH} \] \[ \text{V} = 10 \times 10 \times \frac{1}{5} = 20 \, \text{मिली H}_2\text{SO}_4 \] शेष अम्ल = 20 मिली प्रयुक्त अम्ल का आयतन = 100 मिली - 20 मिली = 80 मिली
नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा = \( \frac{1.4 \times \text{अम्ल की नॉर्मलता} \times \text{प्रयुक्त अम्ल का आयतन}}{\text{यौगिक का भार}} \) \[ \% \text{N} = \frac{1.4 \times \frac{1}{6} \times 48}{1.05} = 10.67 \]
नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा = 10.67%
In simple words: केल्डाल विधि का उपयोग करके नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा की गणना की गई है। दिए गए \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) के आयतन और \( \text{NaOH} \) के अनुमापन से \( \text{NH}_3 \) द्वारा अवशोषित अम्ल की मात्रा निकाली गई, जिससे नाइट्रोजन का प्रतिशत 10.67% आया।

🎯 Exam Tip: केल्डाल विधि के गणना सूत्र और अनुमापन के समीकरणों को याद रखें। अम्ल की नॉर्मलता और आयतन को सही ढंग से प्रयोग करना सुनिश्चित करें।

 

Question 31. एक कार्बनिक यौगिक के 1.195 ग्राम का दहन करने पर 0.44 ग्राम CO2 तथा 0.9 ग्राम जल प्राप्त हुआ । 0.2046 ग्राम यौगिक के दहन पर 15°C ताप तथा 732.7 मिमी दाब पर 30.4 मिली नम नाइट्रोजन प्राप्त हुई । यौगिक में कार्बन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए। (15°C ताप पर जलवाष्प दाब 12.7 मिमी) (C= 12, H =1, O= 16, N=14)
Answer: सूत्रानुसार, कार्बन की प्रतिशतता = \( \frac{12}{44} \times \frac{\text{CO}_2 \text{ का भार}}{\text{यौगिक का भार}} \times 100 = \frac{12}{44} \times \frac{0.44}{1.195} \times 100 = 10.04\% \) हाइड्रोजन की प्रतिशतता = \( \frac{2}{18} \times \frac{\text{H}_2\text{O} \text{ का भार}}{\text{यौगिक का भार}} \times 100 = \frac{2}{18} \times \frac{0.9}{1.195} \times 100 = 8.37\% \) नाइट्रोजन की प्रतिशतता के लिए \( \text{T}_1 = 15+273= 288 \, \text{K}, \text{P}_1 = 732.7 – 12.7 = 720 \, \text{मिमी}, \text{V}_1 = 30.4 \, \text{मिली} \) N.T.P. पर, \( \text{T}_2 = 273 \, \text{K}, \text{P}_2 = 760 \, \text{मिमी}, \text{V}_2 = ? \) \[ \frac{\text{P}_1\text{V}_1}{\text{T}_1} = \frac{\text{P}_2\text{V}_2}{\text{T}_2} \]
\( \text{N}_2 \) का N.T.P. पर आयतन \( (\text{V}_2) = \frac{720 \times 30.4 \times 273}{288 \times 760.} = 27.3 \, \text{मिली} \)
\( \text{N}_2 \) की प्रतिशतता = \( \frac{28}{22400} \times \frac{\text{N}_2 \text{ का N. T. P. पर आयतन (मिली)}}{\text{यौगिक का भार (ग्राम में)}} \times 100 \) \[ = \frac{28}{22400} \times \frac{27.3}{0.2046} \times 100 = 16.68\% \]
In simple words: कार्बनिक यौगिक में कार्बन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा की गणना दहन और डयूमा विधि का उपयोग करके की गई है। कार्बन \( (10.04\%) \), हाइड्रोजन \( (8.37\%) \) और नाइट्रोजन \( (16.68\%) \) की प्रतिशतताएँ क्रमशः \( \text{CO}_2 \), \( \text{H}_2\text{O} \) और \( \text{N}_2 \) के उत्पन्न मात्राओं से निर्धारित की गईं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न तत्वों (कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन) की प्रतिशत मात्रा की गणना के लिए उपयुक्त सूत्रों को याद रखें। गैसों के लिए संयुक्त गैस समीकरण (P1V1/T1 = P2V2/T2) का उपयोग करना सुनिश्चित करें।

 

Question 32. C, H, N तथा O युक्त एक कार्बनिक यौगिक ने विश्लेषण करने पर निम्नलिखित परिणाम दिये।
(i) यौगिक के 0.25 ग्राम को दहन करने पर 0.368 ग्राम CO2 तथा 0.205 ग्राम जल प्राप्त हुए।
(ii) 0.6 ग्राम यौगिकसे केल्डाल क्रिया द्वारा निकली अमोनिया गैस को 60 मिली H2SO4 में अवशोषित किया गया। अम्ल के आधिक्य को उदासीन करने के लिए 20.0 मिली A कास्टिक पोटाश विलयन की आवश्यकता पड़ी। यौगिक में उपस्थित सभी तत्त्वों की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। (C=12, H = 1, N = 14,O= 16)

Answer:
(i) हाइड्रोजन की प्रतिशतता = \( \frac{2}{18} \times \frac{\text{H}_2\text{O} \text{ का भार}}{\text{पदार्थ का भार}} \times 100 = \frac{2}{18} \times \frac{0.205}{0.25} \times 100 = 9.1\% \) कार्बन की प्रतिशतता = \( \frac{12}{44} \times \frac{\text{CO}_2 \text{ का भार}}{\text{पदार्थ का भार}} \times 100 = \frac{12}{44} \times \frac{0.368}{0.25} \times 100 = 40.15\% \)
(ii) माना अप्रयुक्त अम्ल का आयतन x मिली है। तब नॉर्मलता समीकरण \( \text{N}_1\text{V}_1 = \text{N}_2\text{V}_2 \) से, \[ \frac{\text{N}}{6} \times \text{x} = 20 \times \frac{\text{N}}{10} \] \( \text{x} = 12 \, \text{मिली} \)
अमोनिया के साथ प्रयुक्त अम्ल का आयतन = 60 - 12 = 48 मिली नाइट्रोजन की प्रतिशतता = \( \frac{1.4 \times \text{अम्ल की नॉर्मलता} \times \text{प्रयुक्त अम्ल का आयतन}}{\text{कार्बनिक यौगिक की मात्रा}} \) \[ = \frac{1.4 \times \frac{1}{6} \times 48}{0.6} = 18.67\% \] ऑक्सीजन की प्रतिशतता = 100 - (9.1 + 40.15 + 18.67) = 32.08%
In simple words: कार्बनिक यौगिक में कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन की प्रतिशतता ज्ञात करने के लिए दहन और केल्डाल विधि का उपयोग किया गया है। \( \text{CO}_2 \) और \( \text{H}_2\text{O} \) की मात्रा से कार्बन \( (40.15\%) \) और हाइड्रोजन \( (9.1\%) \) की गणना की गई, जबकि \( \text{NH}_3 \) के अनुमापन से नाइट्रोजन \( (18.67\%) \) ज्ञात हुआ। शेष प्रतिशतता ऑक्सीजन \( (32.08\%) \) की है।

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में सभी तत्वों की प्रतिशतता की गणना के लिए संबंधित सूत्रों और प्रयोगात्मक डेटा को सही ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है। ऑक्सीजन की प्रतिशतता को हमेशा 100 में से अन्य तत्वों के कुल प्रतिशत को घटाकर ज्ञात करें।

 

Question 33. केरियस विधि द्वारा हैलोजन के आकलन में 0.40 ग्राम कार्बनिक यौगिक से 0.47 ग्राम AgBr प्राप्त हुआ । यौगिक में ब्रोमीन की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। [Ag= 108, Br = 80]
Answer:

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न


In simple words: ब्रोमीन की प्रतिशतता की गणना के लिए केरियस विधि का उपयोग किया गया है, जहाँ दिए गए कार्बनिक यौगिक से प्राप्त \( \text{AgBr} \) की मात्रा से ब्रोमीन की मात्रा निकाली जाती है और फिर उसे यौगिक के कुल भार के सापेक्ष प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

🎯 Exam Tip: केरियस विधि के लिए सूत्र में \( \text{AgBr} \) के अणुभार और ब्रोमीन के परमाणु भार का सही उपयोग सुनिश्चित करें।

 

Question 1. आप कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
या
लैंसे परीक्षण के रसायन का वर्णन कीजिए ।

Answer: नाइट्रोजन की पहचान-किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है ।
(i) सोडा-लाइम परीक्षण-यौगिक की थोड़ी मात्रा को सोडा-लाइम (NaOH+CaO) के साथ तेज गर्म करते हैं। मिश्रण में से अमोनिया की गंध यौगिक में नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाती है। इस परीक्षण की सीमा यह है कि अनेक कार्बनिक यौगिक (जैसे नाइट्रो और डाइएजो यौगिक) इन परिस्थितियों में अमोनिया उत्पन्न नहीं करते हैं।
(ii) लैंसे परीक्षण-इस परीक्षण का उपयोग न केवल नाइट्रोजन बल्कि अन्य तत्त्वों; जैसे सल्फर और हैलोजनों की उपस्थिति की जाँच के लिए भी किया जाता है। नाइट्रोजन की उपस्थिति की जाँच के लिए यह परीक्षण निम्न दो पदों में किया जाता है।
(a) लैंसे निष्कर्ष तैयार करना-सोडियम धातु के एक छोटे से टुकड़े को फिल्टर पेपर द्वारा सुखाकर एक साफ और शुष्क ज्वलन नली (ignition tube) में लेते हैं। इस ज्वलन नली को बुन्सन बर्नर की ज्वाला में धीरे-धीरे गर्म करते हैं। जब सोडियम धातु पिघलकर पारे की तरह चमकने लगता है तब ज्वलन नली में कार्बनिक यौगिक की थोड़ी मात्रा डाल देते हैं। अब ज्वलन नली को पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से गर्म करते हैं। जब ज्वलन नली का नीचे का भाग लाल हो जाता है तब इस रक्त-तप्त नली को चाइना डिश में लिए गए 10-15 mL आसुत जल में डाल देते हैं। चाइना डिश में उपस्थित विलयन को थोड़ी देर उबालकर ठंडा, कर लेते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। छानने से प्राप्त हुए निस्वंद (filtrate) को लैंसे निष्कर्ष (Lassaigne's extract) या सोडियम निष्कर्ष कहते हैं। सोडियम धातु के यौगिक के साथ संगलित होने पर यौगिक में उपस्थित तत्त्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
(b) नाइट्रोजन के लिए परीक्षण-एक परखनली में 1 mL लैंसे निष्कर्ष लेकर उसमें तनु सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन की कुछ बूंदें डालते हैं। इससे लैंसे निष्कर्ष क्षारकीय हो जाता है। सामान्यतः लैंसे निष्कर्ष की प्रकृति क्षारकीय ही होती है। परखनली में 2 mL ताजा बना हुआ फेरस सल्फेट का सान्द्र विलयन डालकर परखमली को गर्म करते हैं। विलयन को ठंडा करके उसमें कुछ बूंद फेरिक क्लोराइड विलयन डालते हैं और फिर उसमें तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीय करते हैं। यदि विलयन का रंग प्रशियन नीला (prusssian blue) हो जाता है तो यह यौगिक में । नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाता है। परीक्षण में निम्न अभिक्रियाएँ होती हैं। \[ \text{Na} + \text{C} + \text{N} \xrightarrow{\text{संगलन}} \text{NaCN} \] कार्बनिक यौगिक में उपस्थित सोडियम सल्फोसायनाइड \[ \text{FeSO}_4 + 2\text{NaCN} \longrightarrow \text{Fe(CN)}_2 + \text{Na}_2\text{SO}_4 \] \[ \text{Fe(CN)}_2 + 4\text{NaCN} \longrightarrow \text{Na}_4[\text{Fe(CN)}_6] \] सोडियम फेरोसायनाइड \[ 3\text{Na}_4 [\text{Fe (CN)}_6] + 4\text{FeCl}_3 \longrightarrow \text{Fe}_4 [\text{Fe(CN)}_6]_3 + 12\text{NaCl} \] फेरिक फेरोसायनाइड (नीला) जब यौगिक में नाइट्रोजन और सल्फर दोनों उपस्थित होते हैं तो संगलन के परिणामस्वरूप'. सोडियम सल्फोसायनाइड बनता है। यह फेरिक आयनों से अभिक्रिया करके रक्त लाल (blood red) रंग का फेरिक सल्फोसायनाइड बनाता है। \[ \text{Na} + \text{C} + \text{N} + \text{S} \longrightarrow \text{NaCNS} \] कार्बनिक यौगिक में उपस्थित सोडियम सल्फोसायनाइड \[ 3\text{NaCNS} + \text{Fe}^{3+} \longrightarrow \text{Fe(CNS)}_3 + 3\text{Na}^+ \] फेरिक सल्फोसायनाइड (रक्त लाल) उपरोक्त अभिक्रिया में सोडियम सल्फोसायनाइड अपर्याप्त सोडियम के कारण बनता है। जब सोडियम आधिक्य में उपस्थित होता है तो सोडियम सल्फोसायनाइड अपघटित होकर सोडियम सायनाइड और सोडियम सल्फाइड बनाता है। इस स्थिति में यौगिक में सल्फर के उपस्थित होने पर भी रक्त लाल रंग प्राप्त नहीं होता है। अतः रक्त लाल रंग की अनुपस्थिति से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि यौगिक में सल्फर अनुपस्थित है।
In simple words: कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान के लिए लैंसे परीक्षण का उपयोग किया जाता है, जहाँ यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करके सोडियम सायनाइड बनाया जाता है। इस सायनाइड को फेरस सल्फेट और फेरिक क्लोराइड के साथ क्रिया कराने पर प्रशियन ब्लू रंग (फेरिक फेरोसायनाइड) नाइट्रोजन की उपस्थिति को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: लैंसे परीक्षण के प्रत्येक चरण को, सोडियम निष्कर्ष बनाने से लेकर प्रशियन ब्लू रंग के अंतिम गठन तक, विस्तार से समझें। नाइट्रोजन और सल्फर दोनों की उपस्थिति में होने वाली अभिक्रिया को भी याद रखें।

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