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Detailed Chapter 7 जैव विविधता RBSE Solutions for Class 9 Science
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Class 9 Science Chapter 7 जैव विविधता RBSE Solutions PDF
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. सबसे अधिक विकसित पादपों का प्रभाग है-
(अ) ब्रायोफाइटा
(ब) आवृतबीजी
(स) अनावृतबीजी
(द) थैलोफाइटा
Answer: (ब) आवृतबीजी
In simple words: सबसे ज़्यादा विकसित पौधे आवृतबीजी होते हैं।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि आवृतबीजी पौधों में फूल लगते हैं और उनके बीज फलों के अंदर सुरक्षित रहते हैं, जो उन्हें सबसे विकसित बनाता है।
Question 2. निम्न में से बीजों का जरायुज अंकुरण किन पादपों में पाया जाता है ?
(अ) जलोभिद
(ब) समोभिद
(स) शुष्कोभिद
(द) लवणमृदोभिद
Answer: (द) लवणमृदोभिद
In simple words: लवणमृदोभिद पौधों में बीज पेड़ पर ही उगना शुरू हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जरायुज अंकुरण एक विशेष अनुकूलन है जहाँ बीज पौधे पर ही अंकुरित होने लगते हैं, खासकर दलदली और खारे पानी वाले इलाकों में।
Question 3. पत्तियों में गर्तीरन्ध्र पाया जाना अनुकूलन है
(अ) मरुभिद
(ब) लवणमृदौभिद
(स) जरलोभिद
(द) समोभिद
Answer: (अ) मरुभिद
In simple words: मरुस्थलीय पौधों में पत्तियों के रंध्र अंदर की ओर धंसे होते हैं ताकि पानी कम उड़े।
🎯 Exam Tip: गर्तीरन्ध्र (सनकन स्टोमेटा) एक ऐसा अनुकूलन है जो पौधों को शुष्क वातावरण में पानी की कमी से बचाता है, क्योंकि ये रंध्र पत्ती की सतह के अंदर छिपे होते हैं।
Question 4. किस पादप वर्ग के पादप संवहनी क्रिप्टोगैम्स कहलाते
(अ) टेरिडोफाइटा
Question 5. आर्थोपोडा संघ का जन्तु है
(अ) जोंक
(च) फीताकृमि
(स) घरेलू मक्खी
(द) तारा मछली
Answer: (स) घरेलू मक्खी
In simple words: घरेलू मक्खी आर्थोपोडा संघ का जीव है, जिसके पैर जुड़े होते हैं।
🎯 Exam Tip: आर्थोपोडा जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है, जिसमें कीट, मकड़ी और केकड़े जैसे जीव शामिल हैं, जिनके शरीर खंडों में बंटे होते हैं और पैर जुड़े हुए होते हैं।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 6. दिनाम पद्धति के जनक का नाम लिखिए।
Answer: **कैरोलस लीनियस**। उन्होंने जीवों को वैज्ञानिक नाम देने की यह विधि विकसित की थी।
In simple words: द्विनाम पद्धति कैरोलस लीनियस ने बनाई थी।
🎯 Exam Tip: द्विनाम पद्धति में जीव का नाम दो शब्दों से बनता है - पहला वंश और दूसरा प्रजाति का नाम, जिससे दुनिया भर में जीवों की पहचान आसान हो जाती है।
Question 7. मेंढक किस जन्तु वर्ग का जन्तु है ?
Answer: **एम्फीबिया वर्ग का**। मेंढक पानी और ज़मीन दोनों पर रह सकता है, इसलिए इसे उभयचर कहते हैं।
In simple words: मेंढक एम्फीबिया वर्ग में आता है।
🎯 Exam Tip: उभयचर ऐसे जीव होते हैं जो अपने जीवन का कुछ हिस्सा पानी में और कुछ हिस्सा ज़मीन पर बिताते हैं, जैसे मेंढक और सैलामैंडर।
Question 8. अनुकूलन किसे कहते हैं ?
Answer: **अनुकूलन वे खास बदलाव होते हैं जो किसी जीव के शरीर या व्यवहार में आते हैं, ताकि वह किसी ख़ास जगह पर आराम से रह सके और बच्चे पैदा कर सके**। यह बदलाव जीव को अपने आसपास की परिस्थितियों के साथ बेहतर तालमेल बिठाने में मदद करता है। जैसे, पक्षियों के आगे के पैर पंखों में बदल जाते हैं ताकि वे उड़ सकें।
In simple words: अनुकूलन का मतलब है कि जीव अपने वातावरण के हिसाब से खुद को बदल लेता है ताकि वह आसानी से रह सके।
🎯 Exam Tip: अनुकूलन जीवों को पर्यावरण में बेहतर ढंग से जीवित रहने और अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाने में मदद करता है, जिससे वे बदलते हालात में भी बने रहते हैं।
Question 9. पंच जगत अवधारणा का प्रतिपादन किसने किया था ?
Answer: **राबर्ट व्हिटेकर ने**। उन्होंने सभी जीवों को पाँच बड़े समूहों में बांटा था ताकि उन्हें समझना आसान हो जाए।
In simple words: जीवों को पाँच बड़े समूहों में राबर्ट व्हिटेकर ने बांटा था।
🎯 Exam Tip: पंच जगत वर्गीकरण में मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंगी, प्लांटी और एनीमेलिया शामिल हैं, जो जीवों को उनकी कोशिका संरचना और पोषण के तरीकों के आधार पर बांटते हैं।
Question 10. नील हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया) किस प्रभाग का सदस्य है ?
Answer: **नील हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया) मोनेरा जगत के सदस्य हैं**। ये ऐसे जीव होते हैं जिनमें कोशिका संरचना बहुत सरल होती है।
In simple words: साइनोबैक्टीरिया मोनेरा जगत में आते हैं।
🎯 Exam Tip: नील हरित शैवाल प्रकाश संश्लेषण करने में सक्षम होते हैं, इसलिए ये पृथ्वी पर ऑक्सीजन के प्रमुख उत्पादकों में से एक हैं।
Question 12. अनावृतबीजी पादपों के दो उदाहरण दीजिए।
Answer: **अनावृतबीजी पादपों के दो उदाहरण हैं:**
• चीड़ या पाइनस (Pinus spp.)
• साइकस (Cycas spp)
इन पौधों के बीज किसी फल के अंदर बंद नहीं होते, बल्कि खुले रहते हैं।
In simple words: चीड़ और साइकस अनावृतबीजी पौधे हैं।
🎯 Exam Tip: अनावृतबीजी पौधों की पहचान उनके नग्न बीजों से होती है, जो किसी फल या अंडाशय की दीवार से ढके नहीं होते हैं।
Question 13. ऐसे जन्तु का नाम लिखिए जिसमें श्वसन, क्लोम, फेफडों व त्वचा तीनों द्वारा होता है।
Answer: **मेंढक**। मेंढक की लारवा अवस्था में श्वसन क्लोम (गिल्स) द्वारा होता है, जबकि वयस्क अवस्था में यह त्वचा और फेफड़ों द्वारा सांस लेता है। इस तरह मेंढक के जीवनचक्र में तीनों श्वसन अंग काम करते हैं।
In simple words: मेंढक एक ऐसा जीव है जो अपने जीवन में गिल्स, त्वचा और फेफड़ों तीनों से सांस लेता है।
🎯 Exam Tip: मेंढक एक उभयचर है, और यह अपनी विभिन्न जीवन अवस्थाओं में अलग-अलग श्वसन अंगों का उपयोग करके पानी और ज़मीन दोनों पर जीने के लिए अनुकूलित होता है।
Question 14. ऐसे स्तनधारी का नाम लिखिए जो अण्डे देता है।
Answer: **दो स्तनधारी जो अंडे देते हैं, वे हैं:**
• इकबिल्ड प्लेटोपस या एकिडना (Echidna)
• स्पाइन एंटईटर (Spiny ant eater)
ये स्तनधारी प्रोटोथेरिया वर्ग में आते हैं, जो अन्य स्तनधारियों से भिन्न होते हैं।
In simple words: प्लेटिपस और एकिडना अंडे देने वाले स्तनधारी हैं।
🎯 Exam Tip: मोनोट्रीम स्तनधारी (जैसे प्लेटिपस और एकिडना) अंडे देते हैं, जबकि अधिकांश स्तनधारी (जैसे मार्सुपियल और प्लेसेंटल) जीवित बच्चों को जन्म देते हैं।
Question 15. मैंग्रोव वनस्पति किस आवास में पाई जाती है ?
Answer: मैंग्रोव वनस्पति **दलदली लवणमृदोभिद आवास** में पाई जाती है। ये पौधे खारे पानी और ऑक्सीजन-कम मिट्टी वाले तटीय क्षेत्रों में उगते हैं।
In simple words: मैंग्रोव पौधे दलदली और खारी मिट्टी वाली जगहों पर उगते हैं।
🎯 Exam Tip: मैंग्रोव वनों में विशेष श्वसन जड़ें (न्यूमेटोफोर) और जरायुज अंकुरण होता है, जो उन्हें कठोर समुद्री तटीय वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. लवणमूदोभिद पादपों में पायी जाने वाली दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Answer: लवणमृदोभिद पादपों (Halophytes) में पाई जाने वाली दो मुख्य विशेषताएँ हैं:
1. **श्वसन मूल (Pneumatophores):** इन पौधों में विशेष प्रकार की जड़ें होती हैं जो ज़मीन से बाहर निकलकर हवा से ऑक्सीजन लेती हैं, क्योंकि दलदली मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी होती है।
2. **जरायुज अंकुरण (Viviparous Germination):** इनके बीज पौधे पर लगे हुए फल के अंदर ही अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं। इससे अंकुरित बीज दलदल में आसानी से स्थापित हो पाते हैं।
ये अनुकूलन उन्हें खारे और दलदली वातावरण में जीवित रहने में मदद करते हैं।
In simple words: लवणमृदोभिद पौधों में हवा लेने वाली जड़ें और बीज पेड़ पर ही उगना शुरू हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जब आप लवणमृदोभिद पौधों की विशेषताओं का वर्णन करें, तो न्यूमेटोफोर और जरायुज अंकुरण दोनों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये उनके खारे वातावरण में जीवित रहने के लिए प्रमुख अनुकूलन हैं।
Question 2. जलीय जन्तुओं में पाये जाने वाले अनुकूलन लिखिए।
Answer: जलीय जन्तुओं के अनुकूलन उन्हें पानी में रहने और तैरने में मदद करते हैं। इनमें शामिल हैं:
1. **धारारेखीय शरीर:** जलीय जन्तुओं का शरीर आमतौर पर नाव की तरह पतला और चिकना होता है। यह उन्हें पानी में आसानी से तैरने में मदद करता है और पानी के प्रतिरोध को कम करता है। पूंछ उन्हें दिशा बदलने में मदद करती है।
2. **तैरने के अंग:** मछलियों में फिन (पंख) और व्हेल में फ्लिपर (चप्पू जैसे पंख) होते हैं। मेंढक और बत्तख के पैरों में जालियाँ (जालीदार पैर) होती हैं जो तैरने में मदद करती हैं।
3. **श्वसन के लिए गिल्स:** अधिकांश जलीय जन्तुओं में पानी में घुली ऑक्सीजन लेने के लिए गिल्स (गलफड़े) पाए जाते हैं।
4. **गर्दन की अनुपस्थिति:** कई जलीय जन्तुओं में गर्दन नहीं होती या बहुत छोटी होती है, जिससे वे पानी में आसानी से आगे बढ़ पाते हैं। कुछ में शरीर के अंदर स्विम ब्लैडर (वायु-कोष्ठ) होते हैं जो तैरने में मदद करते हैं।
5. **जल-सुरक्षा:** शरीर पर शल्क (पपड़ी) या मोम जैसी परतें होती हैं जो शरीर को पानी से बचाती हैं।
6. **कार्यिकीय अनुकूलन:** स्वच्छ जल के जीवों में अतिरिक्त पानी को पतला मूत्र निकालकर बाहर निकाला जाता है। समुद्री जल के जीवों में शरीर से अतिरिक्त नमक निकालने के लिए विशेष नमक उत्सर्जक ग्रंथियाँ होती हैं।
ये सभी अनुकूलन जलीय जीवों को पानी में सफल जीवन जीने में सक्षम बनाते हैं।
In simple words: जलीय जन्तुओं में पानी में आसानी से तैरने, सांस लेने और शरीर को बचाने के लिए विशेष बनावट होती है, जैसे चिकना शरीर, पंख, गिल्स और नमक निकालने वाली ग्रंथियाँ।
🎯 Exam Tip: जलीय अनुकूलन बताते समय, शरीर के आकार (धारा रेखीय), गति के लिए अंगों (पंख/फ्लिपर), श्वसन अंग (गिल्स) और पानी/नमक संतुलन (मूत्र/नमक ग्रंथियाँ) पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 3. शीत आवास की विशेषताएँ बताइए।
Answer: शीत प्रदेशों जैसे ध्रुवों और बर्फीली भूमि में निम्नलिखित पारिस्थितिक विशेषताएँ पाई जाती हैं:
(a) **अत्यधिक कम तापमान:** इन क्षेत्रों में तापमान बहुत कम होता है, अक्सर शून्य से नीचे।
(b) **पानी और हवा की स्थिति:** यहाँ तरल पानी की कमी होती है और बर्फीली, तेज़ हवाएँ चलती हैं।
(c) **पौधों का अनुकूलन:** यहाँ उगने वाले पौधों को **शीतोद्भिद (क्रायोफाइट्स)** कहा जाता है। ये बर्फ पिघलने पर उगते हैं और अपना जीवन चक्र कम समय में पूरा कर लेते हैं।
(d) **जन्तुओं का अनुकूलन:** यहाँ के जन्तु आमतौर पर बड़े आकार के, हल्के या सफेद रंग के होते हैं। उनकी त्वचा पर घने बाल या फर होते हैं जो उन्हें ठंड से बचाते हैं।
ये विशेषताएँ जीवों को अत्यधिक ठंडे और कठोर वातावरण में जीवित रहने में मदद करती हैं।
In simple words: ठंडे इलाकों में बहुत कम तापमान, कम पानी और तेज़ हवाएँ होती हैं। यहाँ के पौधे और जन्तु ठंड से बचने के लिए खास तरीकों से ढले होते हैं, जैसे मोटे फर और छोटे जीवन चक्र।
🎯 Exam Tip: शीत आवासों की विशेषताओं में कम तापमान, पानी की उपलब्धता और हवा की स्थिति शामिल है। पौधों और जन्तुओं के अनुकूलन में उनके शारीरिक रंग, बाल और जीवन चक्र के बदलावों पर ज़ोर दें।
Question 4. स्तनधारी वर्ग के जन्तुओं के लक्षण लिखिए।
Question 5. आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के लक्षण लिखिए।
Answer: आर्थोपोडा संघ (Phylum Arthropoda) के जन्तुओं के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
• **जुड़े हुए पैर:** इनके शरीर पर जुड़े हुए पैर (jointed legs) होते हैं, और इनके अन्य उपांग (appendages) भी जुड़े होते हैं।
• **काइटिन का बाह्य कंकाल:** इनके शरीर पर काइटिन से बना एक कठोर बाहरी कंकाल (exoskeleton) पाया जाता है, जो शरीर को सुरक्षा और सहारा देता है।
• **रुधिर से भरी देहगुहा:** इनके शरीर में एक रुधिर से भरी गुहा (बॉडी कैविटी) होती है जिसे हीमोसील (haemocoel) कहते हैं। इनमें खुला परिसंचरण तंत्र (open circulatory system) होता है।
• **द्विपाश्र्व सममित और त्रिकोरकी:** ये जीव द्विपाश्र्व सममित होते हैं (शरीर को दो समान हिस्सों में बांटा जा सकता है) और त्रिकोरकी होते हैं (तीन जनन परतें होती हैं)।
• **जगत का सबसे बड़ा संघ:** आर्थोपोडा जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है, जिसमें जीवों की संख्या सबसे अधिक है।
• **उदाहरण:** मक्खी, मच्छर, झींगा, कॉकरोच, टिड्डा और बिच्छू इसके कुछ सामान्य उदाहरण हैं।
In simple words: आर्थोपोडा संघ के जीवों के पैर जुड़े होते हैं, उनके शरीर पर कठोर बाहरी कवच होता है, और वे जन्तु जगत का सबसे बड़ा समूह हैं।
🎯 Exam Tip: आर्थोपोडा के मुख्य लक्षणों में जुड़े हुए पैर, काइटिन से बना बाह्य कंकाल और खुला परिसंचरण तंत्र शामिल हैं। इन बिंदुओं को याद रखने से पूरे अंक मिल सकते हैं।
Question 6. अनावृतबीजी पादपों में कवक मूल व प्रवाल मूल का कार्य बताइए।
Answer: अनावृतबीजी पादपों में कवक मूल और प्रवाल मूल दोनों ही विशेष प्रकार के सहजीवी संबंध हैं जो पौधों को लाभ पहुंचाते हैं:
**कवक मूल (Mycorrhiza):**
• कुछ अनावृतबीजी पौधों, जैसे पाइनस की जड़ें, कुछ विशेष कवक तंतुओं के साथ मिलकर कवक मूल बनाती हैं।
• कवक तंतु पानी और खनिज लवण (जैसे फॉस्फोरस) को कम तापमान पर भी अवशोषित कर सकते हैं और उन्हें पाइनस की जड़ों तक पहुंचाते हैं, जो स्वयं ऐसा करने में अक्षम होती हैं।
• कवक तंतु जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण भी बनाते हैं, जो उन्हें बीमारियों से बचाता है। बदले में, कवक को जड़ों से कार्बनिक भोजन मिलता है।
**प्रवाल मूल (Coralloid Roots):**
• साइकस की जड़ों और नील-हरित शैवाल (जैसे एनाबीना) के बीच प्रवाल मूल नामक सहजीवी संबंध होता है।
• एनाबीना वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करती है और इसे साइकस को देती है, जिससे पौधे की वृद्धि होती है।
• बदले में, साइकस एनाबीना को सुरक्षित स्थान, पानी और कुछ खनिज प्रदान करता है।
• ये जड़ें प्रवाल जैसी दिखती हैं और नकारात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती हैं (यानी ज़मीन से ऊपर की ओर बढ़ती हैं)।
ये दोनों मूल पौधों को पोषक तत्व प्राप्त करने और प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने में मदद करते हैं।
In simple words: कवक मूल पौधों को पानी और खनिज सोखने में मदद करती है, जबकि प्रवाल मूल नाइट्रोजन को मिट्टी में मिलाती है। दोनों ही पौधों के लिए बहुत उपयोगी हैं।
🎯 Exam Tip: कवक मूल और प्रवाल मूल दोनों ही सहजीवी संबंध हैं, लेकिन कवक मूल मुख्य रूप से पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करती है, जबकि प्रवाल मूल नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है।
Question 7. लाइकेन में सहजीविता को समझाइए।
Answer: **लाइकेन (Lichen) एक विशेष प्रकार का जीव है जो एक शैवाल (एल्गा) और एक कवक (फंगस) के बीच सहजीवी संबंध (mutualistic relation) से बनता है**। इसमें दोनों जीव एक-दूसरे को लाभ पहुंचाते हैं:
• **शैवाल का योगदान:** शैवाल प्रकाश संश्लेषण करके कार्बनिक भोजन बनाता है क्योंकि उसमें क्लोरोफिल होता है। यह भोजन कवक के साथ साझा किया जाता है।
• **कवक का योगदान:** कवक जल और खनिज लवणों को अवशोषित करता है और उन्हें शैवाल को उपलब्ध कराता है। कवक शैवाल को बाहरी खतरों से सुरक्षा भी देता है।
• **परस्पर निर्भरता:** यदि इन दोनों साझीदारों को अलग कर दिया जाए तो वे अकेले जीवित नहीं रह पाते।
यह संबंध दोनों जीवों के लिए फायदेमंद होता है, जिससे वे ऐसे स्थानों पर भी जीवित रह पाते हैं जहाँ कोई एक जीव अकेला नहीं रह सकता।
In simple words: लाइकेन में एक शैवाल और एक कवक साथ रहते हैं। शैवाल खाना बनाता है और कवक पानी और सुरक्षा देता है, जिससे वे दोनों एक-दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते।
🎯 Exam Tip: लाइकेन में सहजीविता का मतलब है कि शैवाल (भोजन निर्माण) और कवक (पानी और सुरक्षा) एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर होते हैं। यह संबंध उनकी विशिष्ट पहचान है।
Question 9. मरुभिद पादपों में पाये जाने वाले अनुकूलनों का वर्णन कीजिए।
Answer: मरुद्भिद (Xerophyte) पादप वे होते हैं जो शुष्क वातावरण में, यानी पानी की कमी वाले स्थानों पर उगते हैं। इनमें निम्नलिखित अनुकूलन पाए जाते हैं जो उन्हें पानी बचाने और जीवित रहने में मदद करते हैं:
(a) **आकारिकीय अनुकूलन (Morphological Adaptations):**
• **विकसित जड़ प्रणाली:** जड़ तंत्र बहुत विकसित और गहरा होता है ताकि पौधे गहराई से पानी सोख सकें। नागफनी जैसे कुछ मरुस्थलीय पौधों में जड़ें ज़मीन की सतह के ठीक नीचे फैली होती हैं ताकि थोड़ी सी बारिश का पानी भी सोखा जा सके।
• **पत्तियों का रूपांतरण:** वाष्पोत्सर्जन (पानी का वाष्पीकरण) कम करने के लिए पत्तियां या तो बहुत छोटी होती हैं, काँटों (Spines) में बदल जाती हैं, या पूरी तरह अनुपस्थित होती हैं।
• **मांसल तना:** तना अक्सर चपटा, हरा और मांसल (Succulent) होता है, जो प्रकाश संश्लेषण का काम करता है और पानी जमा करके रखता है।
(b) **शारीरिकीय अनुकूलन (Anatomical Adaptations):**
• **मोटी क्यूटिकल:** पत्तियों की सतह पर एक मोटी क्यूटिकल की परत पाई जाती है जो वाष्पोत्सर्जन को कम करती है।
• **धंसे हुए रंध्र:** वाष्पोत्सर्जन कम करने के लिए रंध्र (स्टोमेटा) पत्ती की सतह के अंदर गहरे धंसे (sunken stomata) होते हैं।
• **रोम:** पत्तियों और तनों पर बाल (रोम) पाए जाते हैं जो पानी के नुकसान को कम करते हैं।
• **विकसित यांत्रिक ऊतक:** पौधों में यांत्रिक ऊतक अधिक विकसित होते हैं जो उन्हें सहारा प्रदान करते हैं।
(c) **कार्यिकीय अनुकूलन (Physiological Adaptations):**
• **उच्च परासरणी सांद्रता:** मरुस्थलीय पौधों की कोशिकाओं में परासरणी सांद्रता (osmotic concentration) अधिक होती है, जिससे वे मिट्टी से पानी आसानी से सोख पाते हैं।
• **रात्रि में खिलने वाले फूल:** कुछ पौधों के फूल रात में खिलते हैं ताकि दिन के समय होने वाले पानी के नुकसान से बचा जा सके।
ये सभी बदलाव मरुद्भिद पौधों को कठिन शुष्क वातावरण में सफलतापूर्वक जीवन जीने में मदद करते हैं।
In simple words: मरुस्थलीय पौधे पानी बचाने के लिए अपनी जड़ों को गहरा करते हैं, पत्तियों को कांटों में बदल देते हैं, तने में पानी जमा करते हैं, और पत्तियों पर मोटी परत रखते हैं।
🎯 Exam Tip: मरुद्भिद पौधों के अनुकूलन बताते समय, जड़ों की गहराई, पत्तियों का रूपांतरण (काँटे/छोटे), मांसल तना, मोटी क्यूटिकल और धंसे हुए रंध्र जैसे बिंदुओं को स्पष्ट करें।
Question 10. मृतजीवी किसे कहते हैं ?
Answer: **मृतजीवी (Saprotrophs) वे जीव होते हैं जो सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों, जैसे कि कृषि अपशिष्ट या गोबर से अपना पोषण प्राप्त करते हैं**। फंगी (कवक) इसके अच्छे उदाहरण हैं। ये विषमपोषी (heterotrophic) और अवशोषी (absorptive) पोषण का तरीका अपनाते हैं। मृतजीवी जीव अपने शरीर से एंजाइम बाहर निकालते हैं। ये एंजाइम जटिल कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर सरल, पानी में घुलनशील अणुओं में बदल देते हैं, जिन्हें बाद में कवक द्वारा सोख लिया जाता है। इसीलिए इन्हें विषमपोषी और अवशोषी कहा जाता है। मशरूम और यीस्ट भी मृतजीवी जीव हैं।
In simple words: मृतजीवी वे जीव हैं जो सड़े-गले पदार्थों से अपना भोजन लेते हैं, जैसे कवक और मशरूम।
🎯 Exam Tip: मृतजीवी पोषण का तरीका जीवों को पर्यावरण में कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने और पोषक तत्वों को रीसायकल करने में मदद करता है। उदाहरण के रूप में फंगी का उल्लेख करें।
Question 12. एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री पादप किसे कहते हैं ?
Answer: एकबीजपत्री (Monocotyledonous) और द्विबीजपत्री (Dicotyledonous) पादप पुष्पीय पादपों या आवृतबीजी (Angiosperms) पौधों के दो मुख्य समूह हैं:
**एकबीजपत्री पादप:**
• इनके बीजों में **एक ही बीजपत्र (cotyledon)** होता है।
• भोजन सामग्री मुख्य रूप से **भ्रूणपोष (endosperm)** में जमा होती है।
• इनकी जड़ें रेशेदार होती हैं और पत्तियां समानांतर शिरा-विन्यास दिखाती हैं।
**द्विबीजपत्री पादप:**
• इनके बीजों में **दो बीजपत्र (cotyledons)** पाए जाते हैं।
• बीजपत्र अक्सर भोजन संचय का काम करते हैं।
• इनकी जड़ें आमतौर पर मूसला जड़ें होती हैं और पत्तियां जालिकावत शिरा-विन्यास दिखाती हैं।
ये अंतर पौधों को पहचानने और वर्गीकृत करने में मदद करते हैं।
In simple words: एकबीजपत्री पौधों के बीज में एक ही पत्ती होती है, जबकि द्विबीजपत्री पौधों के बीज में दो पत्तियाँ होती हैं।
🎯 Exam Tip: एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों को पहचानने के लिए बीजपत्रों की संख्या, शिरा-विन्यास और जड़ प्रणाली को मुख्य लक्षणों के रूप में याद रखें।
Question 13. पृष्ठवंशी व अपृष्ठवंशी जन्तुओं में दो अन्तर बताइए।
Answer: पृष्ठवंशी (Chordate) और अपृष्ठवंशी (Non-chordate) जन्तुओं में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| विशेषता | पृष्ठवंशी (Chordate) | अपृष्ठवंशी (Non-chordate) |
|---|---|---|
| **नोटोकोर्ड** | जीवन के किसी न किसी चरण में शरीर की पृष्ठ सतह पर छड़ जैसी नोटोकोर्ड पाई जाती है। यह रीढ़ की हड्डी में बदल जाती है। | नोटोकोर्ड पूरी तरह अनुपस्थित होती है। अतः, रीढ़ की हड्डी भी नहीं होती। |
| **तंत्रिका रज्जु (Nerve Cord)** | तंत्रिका रज्जु खोखली होती है और शरीर की पृष्ठ सतह (dorsal side) पर पाई जाती है। | तंत्रिका रज्जु ठोस होती है और शरीर की अधर सतह (ventral side) पर पाई जाती है। |
| **क्लोम दरारें (Gill Slits)** | जीवन के किसी न किसी चरण में ग्रसनी के दोनों ओर क्लोम दरारें पाई जाती हैं। | जोड़ीदार क्लोम दरारें अनुपस्थित होती हैं। |
In simple words: पृष्ठवंशी जीवों में रीढ़ की हड्डी और रीढ़ रज्जु होती है, जबकि अपृष्ठवंशी जीवों में ये नहीं होते।
🎯 Exam Tip: पृष्ठवंशी और अपृष्ठवंशी में अंतर करते समय नोटोकोर्ड, तंत्रिका रज्जु की स्थिति और क्लोम दरारों की उपस्थिति पर ध्यान केंद्रित करें। ये मुख्य भेदक विशेषताएँ हैं।
Question 15. सिंघाड़ा में स्वांगीकारी जड़ का क्या कार्य है ?
Answer: सिंघाड़ा (Trapa) एक जलीय पौधा है। इसकी जड़ें हरे रंग की हो जाती हैं क्योंकि उनमें क्लोरोफिल बन जाता है। इन जड़ों का मुख्य कार्य **प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाना** या **स्वांगीकरण** करना है। ये जड़ें जड़ों का एक बदला हुआ रूप हैं, जिन्हें स्वांगीकारी जड़ें (Assimilatory roots) कहा जाता है। सामान्य जड़ें पानी और खनिज सोखती हैं, लेकिन सिंघाड़े की ये जड़ें भोजन बनाने का काम करती हैं।
In simple words: सिंघाड़े की हरी जड़ें सूरज की रोशनी से खाना बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि सामान्य जड़ें पानी और पोषक तत्व सोखती हैं, लेकिन कुछ पौधों में जड़ें विशेष कार्य (जैसे भोजन बनाना या सहारा देना) के लिए बदल जाती हैं।
Question 16. नभचर जन्तुओं के अनुकूलन बताइए।
Answer: नभचर जन्तु, जो हवा में उड़ते हैं, उनके शरीर में कई अनुकूलन होते हैं जो उन्हें उड़ने और पानी की कमी से निपटने में मदद करते हैं:
• **पंखों में रूपांतरित अग्रपाद:** पक्षियों में आगे के पैर पंखों (wings) में बदल जाते हैं, जिससे वे उड़ पाते हैं।
• **धारारेखीय शरीर:** इनका शरीर नाव जैसा या धारारेखीय (streamlined) होता है। यह हवा के प्रतिरोध को कम करता है, जिससे उड़ना आसान हो जाता है।
• **हल्का शरीर:** इनके शरीर पर पंख (feathers) होते हैं, जिनके बीच में हवा भर जाती है। यह शरीर को हल्का बनाता है, जो उड़ने के लिए ज़रूरी है।
ये अनुकूलन नभचर जन्तुओं को सफलतापूर्वक हवाई जीवन जीने में सक्षम बनाते हैं।
In simple words: उड़ने वाले जीवों के पंख होते हैं, उनका शरीर हल्का और चिकना होता है ताकि हवा में आसानी से उड़ सकें।
🎯 Exam Tip: नभचर जन्तुओं के अनुकूलन में पंखों का विकास, शरीर का हल्कापन और धारारेखीय आकार मुख्य बिंदु हैं जो उनकी उड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं।
निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. आवास के आधार पर पादपों का वर्गीकरण कर प्रत्येक आवास के पादपों में पाये जाने वाले अनुकूलन का वर्णन कीजिए।
Answer: पौधों को उनके आवास (जहाँ वे रहते हैं) के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है, जो मुख्य रूप से वहाँ पानी की मात्रा और तापमान पर निर्भर करता है। इसके आधार पर, पौधों को निम्नलिखित प्रकारों में बांटा जा सकता है, और प्रत्येक में विशेष अनुकूलन होते हैं:
1. **जलौभिद् या जलीय पौधे (Hydrophytes):**
• **जड़ तंत्र:** ये अल्पविकसित होते हैं या कुछ में अनुपस्थित होते हैं। पानी का अवशोषण पौधे की सतह से होता है।
• **वायु प्रकोष्ठ (Aerenchyma):** इनमें एरेनकाइमा नामक विशेष ऊतक होता है जिसमें हवा से भरे चैम्बर होते हैं, जो पौधे को पानी में तैरने में मदद करते हैं (उत्प्लावकता)।
• **यांत्रिक ऊतक:** ये अल्प-विकसित होते हैं, और मूलरोम (root hairs) अनुपस्थित होते हैं।
• **पत्तियाँ:** पानी में डूबे हुए पौधों की पत्तियाँ कटी-फटी होती हैं, जबकि तैरने वाले पौधों की पत्तियाँ चौड़ी होती हैं। पत्तियों पर मोम जैसी सुरक्षात्मक परत भी हो सकती है।
• **विशेष जड़ें:** कुछ पौधों जैसे सिंघाड़ा में भोजन बनाने वाली जड़ें (assimilatory roots) और जूलिया में तैरने वाली जड़ें (floating roots) पाई जाती हैं।
• **परागण/बीज फैलाव:** जल परागण और पानी द्वारा बीज का फैलाव इनकी अन्य विशेषताएँ हैं।
2. **मरुभिद् (Xerophytes):**
• **जड़ तंत्र:** ये सुविकसित और गहरे होते हैं, ताकि पौधे गहराई से पानी सोख सकें। नागफनी जैसे पौधों में जड़ें बारिश के पानी को सोखने के लिए ज़मीन की सतह के ठीक नीचे फैली होती हैं।
• **पत्तियों का रूपांतरण:** वाष्पोत्सर्जन कम करने के लिए पत्तियाँ बहुत छोटी, काँटों (spines) में रूपांतरित या अनुपस्थित होती हैं। कई बार पत्तियाँ जल्दी गिर जाती हैं।
• **तने का रूपांतरण:** कुछ मरुद्भिद पौधों में तना हरा, चपटा और मांसल (succulent) होता है, जो पानी जमा करता है और प्रकाश संश्लेषण भी करता है।
• **क्यूटिकल और रंध्र:** पत्तियों पर मोटी क्यूटिकल और धंसे हुए रंध्र (sunken stomata) होते हैं, जो पानी के नुकसान को कम करते हैं।
3. **लवणमृदोभिद् (Halophytes):**
• ये पौधे खारे पानी और दलदली मिट्टी में उगते हैं, जैसे मैंग्रोव वनस्पति।
• **श्वसन मूल (Pneumatophores):** इनमें विशेष श्वसन जड़ें होती हैं जो ज़मीन से बाहर निकलकर ऑक्सीजन की कमी को पूरा करती हैं।
• **जरायुज अंकुरण (Viviparous Germination):** बीज फल के अंदर ही अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं, जबकि वे पेड़ से जुड़े होते हैं।
• **स्तम्भ मूल (Stilt roots):** दलदली मिट्टी में तने को गिरने से बचाने के लिए सहारा देने वाली स्तम्भ मूल पाई जाती हैं।
4. **शीतोद्भिद् (Cryophytes):**
• ये पौधे छोटे आकार के होते हैं, जैसे लाइकेन, मॉस और कुछ शाक।
• ये बर्फ पिघलने पर उगते हैं और अपना जीवन चक्र बहुत कम समय में पूरा कर लेते हैं।
• इनके फूल अक्सर बर्फ से बाहर निकले रहते हैं।
ये सभी अनुकूलन पौधों को अपने विशिष्ट वातावरण में सफलतापूर्वक जीवित रहने में मदद करते हैं।
In simple words: पौधे पानी और तापमान के हिसाब से अलग-अलग आवासों में रहते हैं। जलीय पौधे तैरने और पानी सोखने के लिए अनुकूलित होते हैं, मरुस्थलीय पौधे पानी बचाने के लिए, लवणमृदोभिद खारे पानी में सांस लेने और बीज अंकुरण के लिए, और शीतोद्भिद ठंडे में कम समय में बढ़ते हैं।
🎯 Exam Tip: आवास आधारित वर्गीकरण में प्रत्येक प्रकार (हाइड्रोफाइट्स, ज़ेरोफाइट्स, हैलोफाइट्स, क्रायोफाइट्स) के पौधों के अनुकूलन को विशिष्ट उदाहरणों और शारीरिक/कार्यात्मक विशेषताओं के साथ समझाएँ।
Question 2. द्विनाम पद्धति के अनुसार जीवों के नामकरण के नियम लिखिए।
Answer: द्विनाम पद्धति (Binomial System of Nomenclature) जीवों को वैज्ञानिक नाम देने की एक विधि है। इसके मुख्य नियम निम्नलिखित हैं:
1. **दो भागों वाला नाम:** प्रत्येक जीव (जंतु, पौधा, या जीवाणु) का वैज्ञानिक नाम दो हिस्सों से बना होता है। पहला हिस्सा जीव के वंश (Generic name) को दर्शाता है, और दूसरा हिस्सा प्रजाति (Specific name) को बताता है। उदाहरण के लिए, बाघ का वैज्ञानिक नाम *Panthera tigris* है, जहाँ *Panthera* वंश और *tigris* प्रजाति है। शेर का नाम *Panthera leo* है, जिससे स्पष्ट होता है कि बाघ और शेर का वंश एक ही है।
2. **अक्षर का प्रयोग:** वंश का नाम हमेशा अंग्रेजी के बड़े अक्षर (Capital letter) से शुरू होता है, जबकि प्रजाति का नाम छोटे अक्षर (small letter) से शुरू होता है। जैसे, आम का वैज्ञानिक नाम *Mangifera indica* है।
3. **इटैलिक्स और रेखांकन:** वैज्ञानिक नाम अंग्रेजी में तिरछे अक्षरों (italics) में लिखे जाते हैं। यदि हाथ से लिखा जाए तो उनके नीचे अलग-अलग लहरदार रेखा खींची जाती है।
4. **वैज्ञानिक का नाम:** जिस वैज्ञानिक ने जीव का नामकरण किया है, उनके नाम का पहला अक्षर नाम के बाद बड़े अक्षरों में लिखा जाता है। जैसे, मनुष्य का वैज्ञानिक नाम लीनियस ने दिया है, तो इसे *Homo sapiens L.* लिखा जाता है।
यह पद्धति दुनिया भर में जीवों की सटीक पहचान और वर्गीकरण में मदद करती है।
In simple words: जीवों के वैज्ञानिक नाम में दो हिस्से होते हैं: वंश (पहला अक्षर बड़ा) और प्रजाति (पहला अक्षर छोटा)। इन्हें तिरछा या रेखांकित करके लिखते हैं, और जिसने नाम दिया उसका नाम भी साथ में आता है।
🎯 Exam Tip: द्विनाम पद्धति के नियमों को बताते समय, वंश और प्रजाति के अक्षरों का ध्यान रखें (बड़ा/छोटा), इटैलिक्स या रेखांकन का महत्व समझाएँ, और वैज्ञानिक के नाम को जोड़ने के नियम को भी शामिल करें।
Question 3. जलीय आवास व मरुस्थलीय आवास में पाये जाने वाले जन्तुओं की विशेषताएँ व उदाहरण दीजिए।
Answer: जलीय और मरुस्थलीय आवास में पाए जाने वाले जन्तुओं में अलग-अलग विशेषताएँ और अनुकूलन होते हैं:
**(A) जलीय आवास (Aquatic Habitat) वाले जन्तुओं की विशेषताएँ:**
जलीय आवास ताजे पानी या खारे पानी दोनों प्रकार के हो सकते हैं। इन जन्तुओं में पानी में रहने के लिए कई समानताएँ होती हैं:
• **धारारेखीय शरीर:** इनका शरीर चिकना और धारारेखीय होता है, जिससे पानी में प्रतिरोध कम होता है और तैरना आसान होता है।
• **जल-सुरक्षा:** शरीर पर शल्क या मोम जैसी परत होती है, जो शरीर के अंदर या बाहर पानी की गति को रोकती है।
• **तैरने के लिए अंग:** इनमें पंख (fins), फ्लिपर (flippers), जालीदार पैर (webbed feet) और पूँछ होती है जो तैरने में मदद करते हैं।
• **श्वसन के लिए गिल्स:** पानी में घुली ऑक्सीजन का उपयोग करने के लिए गलफड़े (gills) होते हैं।
• **गर्दन का न होना:** तैरते समय बाधा न आए, इसलिए गर्दन अनुपस्थित होती है।
• **नमक उत्सर्जन ग्रंथियाँ:** समुद्री जीवों में शरीर से अतिरिक्त नमक निकालने के लिए विशेष ग्रंथियाँ होती हैं। ताजे पानी की मछलियों में शरीर का उत्प्लावन (buoyancy) बनाए रखने के लिए वायु प्रकोष्ठ (air chambers) होते हैं।
**(B) मरुस्थलीय आवास (Xeric Habitat) वाले जन्तुओं की विशेषताएँ:**
मरुस्थलीय जीव शुष्क वातावरण में पानी बचाने के लिए अनुकूलित होते हैं। यहाँ तापमान बहुत ज़्यादा या बहुत कम हो सकता है। इनमें निम्न अनुकूलन पाए जाते हैं:
• **पानी का संरक्षण:** ये अत्यधिक गाढ़ा मूत्र और सूखा मल त्यागते हैं ताकि पानी का नुकसान कम हो।
• **पसीने की ग्रंथियों का अभाव:** शरीर पर पसीने की ग्रंथियाँ या तो अनुपस्थित या अल्पविकसित होती हैं।
• **पानी का स्रोत:** कंगारू चूहा केवल भोजन से पानी प्राप्त करता है और शरीर की उपापचय क्रियाओं से भी जलवाष्प बनाता है।
• **ऊँट का अनुकूलन:** ऊँट अपने कूबड़ में जमा वसा के ऑक्सीकरण से पानी प्राप्त करता है जब पानी उपलब्ध नहीं होता। ऊँट एक बार में बहुत सारा पानी पी लेता है। इसकी टांगें लंबी और तलवे गद्देदार होते हैं, और नाक के छिद्र छोटे होते हैं ताकि रेत से बच सकें।
• **आर्द्रताग्राही ग्रंथियाँ:** कुछ जन्तुओं, जैसे मोलाक (मोलॉक छिपकली) की त्वचा में आर्द्रताग्राही ग्रंथियाँ होती हैं जो पानी सोखने में मदद करती हैं।
**उदाहरण:** ऊँट, कंगारू चूहा, मोलाक (मोलॉक छिपकली) मरुस्थलीय जन्तुओं के उदाहरण हैं।
In simple words: जलीय जन्तुओं का शरीर पानी में तैरने के लिए चिकना होता है और वे गिल्स से सांस लेते हैं। मरुस्थलीय जन्तु पानी बचाने के लिए कम पानी पीते हैं, कम पसीना बहाते हैं, और उनका शरीर रेत में चलने के लिए अनुकूलित होता है।
🎯 Exam Tip: जलीय और मरुस्थलीय जन्तुओं के अनुकूलन बताते समय, प्रत्येक आवास की चुनौतियों (पानी की उपलब्धता, तापमान) को ध्यान में रखें और जन्तुओं के शारीरिक (शरीर का आकार, पैर, पंख) और कार्यात्मक (श्वसन, पानी का संरक्षण) अनुकूलन को स्पष्ट करें।
Question 4. आवृतबीजी व अनावृतबीजी पादपों में पाये जाने वाली विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Answer: आवृतबीजी (Angiosperms) और अनावृतबीजी (Gymnosperms) पादपों में कई मुख्य अंतर और विशेषताएँ होती हैं:
**(A) आवृतबीजी पादपों की विशेषताएँ:**
• **पुष्पीय पादप:** इन्हें पुष्पीय पादप (flowering plants) भी कहते हैं क्योंकि इनमें फूल लगते हैं।
• **बीज का आवरण:** इनके बीज फलों के अंदर (परिपक्व अंडाशय में) बंद रहते हैं। अंडाशय ही बाद में फल बन जाता है।
• **भोजन संचय:** भोजन बीजपत्र (cotyledon) या भ्रूणपोष में जमा होता है।
• **प्रकार:** ये एकबीजपत्री या द्विबीजपत्री दो प्रमुख प्रकार के होते हैं।
• **द्विनिषेचन:** इनमें द्विनिषेचन (double fertilization) की प्रक्रिया होती है, जो इनकी एक खास विशेषता है।
• **जीवन रूप:** इनमें शाक (herbs), लताएँ (climbers), झाड़ियाँ (shrubs) और वृक्ष (trees) जैसे सभी जीवन रूप पाए जाते हैं।
• **संवहन ऊतक:** जाइलम में विकसित वाहिकाएँ (trachea) पाई जाती हैं, और फ्लोएम में फ्लोएम पैरेनकाइमा भी मौजूद होता है।
• **परागण:** फूल रंगीन और सुगंधित हो सकते हैं, इसलिए कीट परागण (insect pollination) आम है।
**(B) अनावृतबीजी पादपों की विशेषताएँ:**
• **नग्न बीज:** इनके बीज किसी फल या अंडाशय के अंदर बंद नहीं होते, बल्कि खुले (नग्न) होते हैं।
• **फूलों का अभाव:** इनमें फूल नहीं लगते।
• **पुंकेसर और स्त्रीकेसर शंकु:** फूल के बजाय, इनमें नर और मादा शंकु (cones) पाए जाते हैं।
• **जाइलम में वाहिकाओं का अभाव:** जाइलम में वाहिकाएँ अनुपस्थित होती हैं।
• **कवक मूल:** कई अनावृतबीजी पौधे कवक मूल (mycorrhiza) बनाते हैं, जो पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करता है।
• **वायु परागण:** परागण मुख्य रूप से हवा (wind pollination) द्वारा होता है।
• **जीवन रूप:** इनमें मुख्य रूप से झाड़ियाँ और वृक्ष पाए जाते हैं।
ये अंतर पौधों के वर्गीकरण और उनके विकासवादी संबंधों को समझने में मदद करते हैं।
In simple words: आवृतबीजी पौधों में फूल और फल होते हैं और बीज फल के अंदर बंद होते हैं, जबकि अनावृतबीजी पौधों में फूल और फल नहीं होते, और उनके बीज खुले होते हैं।
🎯 Exam Tip: आवृतबीजी और अनावृतबीजी पौधों की विशेषताओं की तुलना करते समय, बीजों का आवरण (फल के अंदर या बाहर), फूलों की उपस्थिति/अनुपस्थिति, संवहन ऊतकों की संरचना, और परागण के तरीके पर ध्यान दें।
Question 5. टिप्पणी लिखिए
(a) मैंग्रोव वनस्पति
(b) जल स्थल चर
(c) लवण उत्सर्जक ग्रन्थियाँ
(d) लाइकेन
(e) सजीव प्रजक अंकुरण
(f) स्तम्भ मूल।
Answer:
(a) **मैंग्रोव वनस्पति (Mangrove Vegetation):** मैंग्रोव पौधे समुद्र के किनारे दलदली और खारे पानी वाली जगहों पर उगते हैं। ये पौधे ऐसी मुश्किल परिस्थितियों के लिए खास तरह से ढले होते हैं, जैसे ज़मीन में ऑक्सीजन की कमी, मिट्टी में ज़्यादा नमक (सोडियम क्लोराइड, मैग्नीशियम क्लोराइड) और ज्वार के पानी से यांत्रिक सुरक्षा। इनके बीज अक्सर पौधे पर ही अंकुरित होने लगते हैं, जिससे वे नई मिट्टी में आसानी से जम जाते हैं।
(b) **जल स्थल चर (Amphibious Organisms):** वे जीव जो पानी वाले इलाकों में रहते हैं, जल स्थल चर कहलाते हैं। मेंढक जैसे उभयचर जीव ज़मीन पर रहने के लिए अनुकूलित होते हैं, लेकिन उन्हें प्रजनन के लिए बाहरी पानी की ज़रूरत होती है। इनमें श्वसन त्वचा, मुख गुहा, फेफड़ों और लार्वा अवस्था में गिल्स (गलफड़े) से होता है।
(c) **लवण उत्सर्जक ग्रन्थियाँ (Salt Excretory glands):** जलीय जन्तुओं, जैसे मछलियों में, शरीर से अतिरिक्त नमक निकालने के लिए ये ग्रंथियाँ पाई जाती हैं। ये शरीर के उपापचय को सही ढंग से चलाने के लिए शरीर के परासरण दाब (osmotic pressure) को नियंत्रित रखने में बहुत ज़रूरी होती हैं।
(d) **लाइकेन (Lichen):** लाइकेन एक विशेष जीव है जो एक फंगस और एक शैवाल के सहजीवी संबंध से बनता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाता है, जिसे कवक साझा करता है, और कवक शैवाल को पानी, खनिज और सुरक्षा प्रदान करता है। लाइकेन कई प्रकार के होते हैं, जैसे क्रस्टोज (चट्टानों पर चिपके हुए), फ्रुटिकोस (झाड़ीदार) और फोलियोस (पत्ती जैसे)। यदि दोनों साथी अलग हो जाएँ, तो वे जीवित नहीं रह पाते।
(e) **सजीव प्रजक अंकुरण (Viviparous Germination):** यह एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ बीज फल के अंदर ही (जब फल अभी भी पौधे पर लगा हो) अंकुरित होना शुरू कर देते हैं। यह आमतौर पर मैंग्रोव जैसे लवणमृदोभिद पौधों में पाया जाता है, जहाँ दलदली मिट्टी में सीधे अंकुरण मुश्किल होता है। यह अंकुरण पौधों को दलदल में आसानी से स्थापित होने में मदद करता है।
(f) **स्तम्भ मूल (Stilt Root):** ये वे जड़ें होती हैं जो तने से निकलकर ज़मीन में घुस जाती हैं और तने को यांत्रिक सहारा देती हैं। ये मैंग्रोव पौधों में पाई जाती हैं, जहाँ ये दलदली या सीधी खड़ी न होने वाली मिट्टी में पौधे को गिरने से बचाती हैं। जैसे एविसेनिया में, ये जड़ें पौधे को मजबूत सहारा देती हैं।
In simple words: मैंग्रोव खारे पानी में उगने वाले पौधे हैं। जल स्थल चर ज़मीन और पानी दोनों पर रहते हैं। लवण उत्सर्जक ग्रंथियाँ शरीर से नमक निकालती हैं। लाइकेन शैवाल और कवक का साथ है। सजीव प्रजक अंकुरण में बीज पेड़ पर ही उगते हैं। स्तम्भ मूल पौधे को सहारा देती हैं।
🎯 Exam Tip: टिप्पणी लिखते समय, प्रत्येक विषय की मुख्य परिभाषा, उसके महत्वपूर्ण लक्षण और एक प्रासंगिक उदाहरण को शामिल करें। सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करें।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. वर्गीकरण की कुल या फैमिली से छोटी श्रेणी (Category)
(अ) गण (Order)
(ब) वर्ग (Class)
(स) फाइलम (Phylum)
(द) वंश (Genus)
Answer: (द) वंश (Genus)
In simple words: वंश, वर्गीकरण की श्रेणी में कुल या फैमिली से छोटी इकाई है।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण की श्रेणियों का क्रम याद रखना महत्वपूर्ण है: जगत, संघ, वर्ग, गण, कुल, वंश, प्रजाति (Kingdom, Phylum, Class, Order, Family, Genus, Species)।
Question 2. माइकोप्लाज्मी को पाँच जगत वर्गीकरण पद्धति में किस जगत में वर्गीकृत किया गया है
(अ) मोनेरा
(ब) प्रौटिस्टा
(स) फजाई
(द) एनीमेलिया
Answer: (अ) मोनेरा (Monera)
In simple words: माइकोप्लाज्मा को मोनेरा जगत में रखा गया है।
🎯 Exam Tip: मोनेरा जगत में सभी प्रोकैरियोटिक जीव शामिल हैं, जैसे बैक्टीरिया और माइकोप्लाज्मा, जिनकी कोशिका संरचना सरल होती है और कोई स्पष्ट नाभिक नहीं होता।
Question 3. डायटम जैसे एककोशिकीय जीव किस जगत में वर्गीकृत किए गए हैं –
(अ) प्रोटिस्टा
(ब) मोनेरा
(स) प्लांटी
(द) फंजाई
Answer: (अ) प्रोटिस्टा (Protista)
In simple words: डायटम जैसे एककोशिकीय जीव प्रोटिस्टा जगत में आते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रोटिस्टा जगत में यूकेरियोटिक एककोशिकीय जीव शामिल होते हैं जो न तो पौधे होते हैं, न ही जन्तु, और न ही फंगी।
Question 5. लैंगिक जनन हेतु बाह्य जल पर निर्भर रहने वाले पौधे
(अ) एकबीजपत्री
(ब) द्विबीजपत्री
(स) अनावृतबीजी
(द) ब्रायोफाइटा।
Answer: (द) ब्रायोफाइटा
In simple words: ब्रायोफाइटा जैसे पौधों को प्रजनन के लिए पानी की ज़रूरत होती है, क्योंकि उनके शुक्राणु पानी में तैरकर अंडे तक पहुँचते हैं।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि ब्रायोफाइटा को "पादप जगत का उभयचर" भी कहा जाता है क्योंकि वे जमीन पर रहते हैं लेकिन प्रजनन के लिए पानी पर निर्भर करते हैं।
Question 6. गैमा द्वारा अलैंगिक जनन होता है
(अ) शैवालों में
(ब) अनावृतबीजियों में
(स) ब्रायोफाइटा में.
(द) आवृतबीजियों में।
Answer: (स) ब्रायोफाइटा में
In simple words: गैमा ब्रायोफाइटा पौधों में पाए जाने वाले छोटे कप के आकार के संरचनाएँ हैं जो अलैंगिक प्रजनन में मदद करते हैं, जिससे नए पौधे बनते हैं।
🎯 Exam Tip: गैमा कप ब्रायोफाइटा के थैलस की सतह पर विकसित होते हैं और इनमें गैमी होते हैं, जो मातृ पौधे से अलग होकर नए पौधे बनाते हैं।
Question 7. किस संघ के जन्तुओं में कूटगुहा (Pseudocoel) पायी जाती है
(अ) निडेरिया
(ब) प्लेटीहेल्मिथीज
(स) एस्केल्मिथीज
(द) एनीलिङा।
Answer: (स) एस्केल्मिथीज
In simple words: कूटगुहा एक प्रकार की शारीरिक गुहा है जो एस्केल्मिथीज जैसे गोल कृमियों में पायी जाती है, जहाँ यह पूरी तरह से मेसोडर्म द्वारा ढकी नहीं होती।
🎯 Exam Tip: कूटगुहा वाले जीव कूटदेहगुही कहलाते हैं। यह एक सच्ची देहगुहा से भिन्न होती है, जो पूरी तरह से मेसोडर्म से घिरी होती है।
Question 8. तारा मछली किस संघ का जन्तु है -
(अ) मोलस्का
(ब) इकाइनोडर्मेटा
(स) आर्थोपोडा
(द) कॉईंटा।
Answer: (ब) इकाइनोडर्मेटा
In simple words: तारा मछली, जिसे स्टारफिश भी कहते हैं, इकाइनोडर्मेटा संघ से संबंधित है, जिसमें समुद्री खीरा और समुद्री अर्चिन जैसे अन्य समुद्री जीव भी शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: इकाइनोडर्मेटा की पहचान उनके रेडियल समरूपता, कैल्केरियस एंडोस्केलेटन (अन्तःकंकाल) और वॉटर वैस्कुलर सिस्टम (जल संवहन तंत्र) से की जाती है।
Question 9. किस वर्ग के जन्तुओं में हृदय द्विकोष्ठकी (two chanhered) होता है
(अ) मत्स्य
(च) एम्फीबिया
(स) रैप्टीलिया
(द) एम्फीबिया।
Answer: (अ) मत्स्य
In simple words: मछलियों में दो कक्षों वाला हृदय होता है - एक आलिंद और एक निलय - जहाँ रक्त एक ही चक्र में शरीर से गुजरता है।
🎯 Exam Tip: मत्स्य वर्ग के जीवों में हृदय में केवल एक बार रक्त का प्रवाह होता है (सिंगल सर्कुलेशन), जो ऑक्सीजन रहित रक्त को गलफड़ों तक पहुँचाता है, जहाँ वह ऑक्सीकृत होकर शरीर में चला जाता है।
Question 11. स्वांगीकारी जड़ें पायी जाती हैं
(अ) नागफनी व थोर में
(ब) कमल में
(स) आक में
(द) सिंघाड़ा में।
Answer: (द) सिंघाड़ा में
In simple words: सिंघाड़ा (पानी फल) एक जलीय पौधा है जिसमें विशेष जड़ें होती हैं जो प्रकाश संश्लेषण का काम करती हैं, इन्हें स्वांगीकारी जड़ें कहते हैं क्योंकि ये भोजन बनाने में मदद करती हैं।
🎯 Exam Tip: स्वांगीकारी जड़ें हरे रंग की होती हैं और सामान्य जड़ों के विपरीत, ये क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण प्रकाश संश्लेषण करने में सक्षम होती हैं।
सुमेलन सम्बन्धी प्रश्न
Question 1. स्तम्भ A में दिए गए जीवों/पादपों को स्तम्भ B में दिए गए उनके अनुकूलन या उदाहरणों से सुमेलित कीजिए।
Answer:
(i) समोद्भिद → (e) सरसों
(ii) मरुद्भिद स्तनधारी → (c) एलोवेरा
(iii) जलोद्भिद → (a) वेलिसनेरिया
(iv) एकिडना → (b) अण्डे देने वाला
(v) सैलामेण्डर → (f) उभयचर
(vi) समुद्री घोड़ा (हिप्पोकैम्पस) → (d) मत्स्य
In simple words: यह मिलान विभिन्न जीव प्रकारों को उनके आवासों, अनुकूलनों या विशेषताओं से जोड़ता है।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, प्रत्येक विकल्प को ध्यान से देखें और जीव विज्ञान के अपने ज्ञान का उपयोग करके सबसे उपयुक्त जोड़े को पहचानें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. किस जगत के जीवों की कोशिका में काइटिन की बनीं कोशिका भित्ति पायी जाती है ?
Answer: कवक (Fungi) जगत के जीवों की कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है। काइटिन एक कठोर पदार्थ है जो कवकों को संरचनात्मक सहायता प्रदान करता है।
In simple words: कवक की कोशिका की दीवार काइटिन नामक पदार्थ से बनी होती है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि पौधों की कोशिका भित्ति सेल्यूलोज की बनी होती है, जबकि कवक की कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
Question 3. थैलस शब्द को परिभाषित कीजिए।
Answer: थैलस एक ऐसा पादप शरीर है जिसे जड़, तना और पत्तियों जैसे अलग-अलग हिस्सों में बाँटा नहीं जा सकता। यह अक्सर सरल और अविभाजित होता है, जैसा कि शैवाल में देखा जाता है।
In simple words: थैलस एक पौधे का ऐसा शरीर है जिसे जड़, तना या पत्ती में नहीं बाँटा जा सकता, जैसे शैवाल।
🎯 Exam Tip: थैलस संरचना उन पौधों में पायी जाती है जो अपेक्षाकृत कम विकसित होते हैं, जैसे शैवाल, कवक और ब्रायोफाइटा के कुछ सदस्य।
Question 4. ब्रायोफाइटा वर्ग के पादपों को पादप जगत का उभयचर क्यों कहा जाता है ?
Answer: ब्रायोफाइटा को पादप जगत का उभयचर इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे जमीन पर रहते हैं लेकिन लैंगिक प्रजनन के लिए बाहरी जल पर निर्भर करते हैं। पानी उनके नर युग्मकों (शुक्राणुओं) को अंडे तक पहुँचने में मदद करता है।
In simple words: ब्रायोफाइटा ज़मीन पर उगते हैं लेकिन प्रजनन के लिए उन्हें पानी चाहिए, इसलिए उन्हें "पौधों का उभयचर" कहते हैं।
🎯 Exam Tip: उभयचरों की तरह, ब्रायोफाइटा भी दो वातावरणों - जमीन और पानी - से जुड़े होते हैं, खासकर प्रजनन के लिए।
Question 5. क्रिप्टोगैम्स किन्हें कहते हैं ?
Answer: क्रिप्टोगैम्स ऐसे पादप हैं जिनमें जनन अंग छिपे हुए या अस्पष्ट होते हैं। ये बीजाणुओं द्वारा प्रजनन करते हैं और इनमें फूल या बीज नहीं बनते। शैवाल, ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा इसके उदाहरण हैं।
In simple words: क्रिप्टोगैम्स वे पौधे हैं जिनके प्रजनन अंग छिपे होते हैं और वे फूल या बीज नहीं बनाते।
🎯 Exam Tip: "क्रिप्टोगैम्स" शब्द का अर्थ है "छिपा हुआ प्रजनन", जो इन पौधों की विशेषता को दर्शाता है।
Question 6. चीड़ व देवदार के पादपों को आप पादपों के किस समूह में रखेंगे ?
Answer: चीड़ और देवदार के पादपों को अनावृतबीजी (Gymnosperms) समूह में रखा जाता है। इन पौधों में बीज नग्न होते हैं, यानी वे किसी फल के अंदर बंद नहीं होते।
In simple words: चीड़ और देवदार के पेड़ अनावृतबीजी कहलाते हैं क्योंकि उनके बीज खुले होते हैं।
🎯 Exam Tip: अनावृतबीजी पौधे शंकु (cones) पैदा करते हैं जिनमें बीज विकसित होते हैं, जो फूलों और फलों वाले आवृतबीजी पौधों से भिन्न होते हैं।
Question 7. संघ पोरीफेरा के दो प्रमुख लक्षण लिखिए।
Answer: संघ पोरीफेरा के दो प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
• उनके पूरे शरीर पर छोटे-छोटे छिद्र (ओस्टिया) पाए जाते हैं, जिनके माध्यम से जल शरीर में प्रवेश करता है।
• इनके शरीर में एक बड़ी केंद्रीय गुहा होती है जिसे स्पंजगुहा (स्पोंगोसील) कहते हैं, और शरीर को सहारा देने के लिए कंटक (स्पिरूल) मौजूद होते हैं।
In simple words: पोरीफेरा के शरीर में बहुत सारे छोटे छेद होते हैं और एक बड़ी केंद्रीय गुहा होती है, जो उनकी पहचान है।
🎯 Exam Tip: पोरीफेरा को आमतौर पर स्पंज के रूप में जाना जाता है और ये सबसे सरल बहुकोशिकीय जीव होते हैं।
Question 8. पाँच जगत वर्गीकरण के आधार पर जगत एनीमेलिया के जीवों की परिभाषा दीजिए।
Answer: पाँच जगत वर्गीकरण के अनुसार, जगत एनीमेलिया के जीव यूकरियोटिक (सत्य केंद्रक वाले), बहुकोशिकीय (कई कोशिकाओं से बने), विषमपोषी (अपना भोजन स्वयं न बनाने वाले) और प्राणिसम (ठोस भोजन निगलकर पोषण प्राप्त करने वाले) होते हैं।
In simple words: एनीमेलिया जगत के जीव ऐसे प्राणी हैं जो अनेक कोशिकाओं वाले, अपना भोजन खुद न बनाने वाले और भोजन को निगलकर खाते हैं।
🎯 Exam Tip: एनीमेलिया जगत के जीव गतिशील होते हैं (चलने-फिरने में सक्षम) और उनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है, जो उन्हें प्लांटी और फंजाई जगत से अलग करता है।
Question 9. निडेरिया संघ को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ?
Answer: निडेरिया संघ को सीलेन्टेरेटा (Coelenterata) के नाम से भी जाना जाता है। इस संघ के जीवों में दंश कोशिकाएँ (stinging cells) पाई जाती हैं।
In simple words: निडेरिया को सीलेन्टेरेटा भी कहते हैं।
🎯 Exam Tip: सीलेन्टेरेटा नाम उनकी केंद्रीय गुहा को संदर्भित करता है, जिसे सीलेन्टेरॉन कहते हैं, जो पाचन और संवहन दोनों का काम करती है।
Question 11. संघ एनीलिड़ा के दो जन्तुओं के नाम लिखिए।
Answer: संघ एनीलिड़ा के दो जन्तुओं के नाम हैं:
• केचुआ (Earthworm)
• जोंक (Leech)
In simple words: एनीलिडा संघ के दो उदाहरण केचुआ और जोंक हैं।
🎯 Exam Tip: एनीलिडा को खंडित कृमि भी कहते हैं, क्योंकि उनके शरीर कई खंडों में विभाजित होते हैं।
Question 12. पक्षी वर्ग व स्तनधारी वर्ग के जन्तुओं की कोई दो प्रमुख समानताएँ लिखिए।
Answer: पक्षी वर्ग (एवीज) और स्तनधारी वर्ग (मैमेलिया) के जन्तुओं की दो प्रमुख समानताएँ इस प्रकार हैं:
• दोनों वर्गों के जन्तुओं में हृदय चार कोष्ठकी (Four chambered heart) होता है, जिसमें दो आलिंद और दो निलय होते हैं।
• दोनों वर्ग के जन्तु समतापी (Homeothermic) होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे अपने शरीर का तापमान स्थिर बनाए रख सकते हैं।
In simple words: पक्षियों और स्तनधारियों दोनों में चार-कक्षीय हृदय होता है और वे अपने शरीर का तापमान एक जैसा रख सकते हैं।
🎯 Exam Tip: चार-कक्षीय हृदय और समतापी होना उच्च चयापचय दर और सक्रिय जीवन शैली का समर्थन करता है, जो इन दोनों वर्गों की विशेषता है।
Question 13. किस आवास के पौधों में मूलतंत्र अनुपस्थित या अल्प विकसित होता है ?
Answer: जलोभिदों या जलीय आवास के पौधों में मूलतंत्र अनुपस्थित या अल्प विकसित होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये पौधे पानी में डूबे रहते हैं और जल तथा पोषक तत्वों को सीधे अपनी शरीर की सतह से अवशोषित कर सकते हैं।
In simple words: पानी में रहने वाले पौधों में जड़ें कम या नहीं होतीं, क्योंकि वे सीधे पानी से सब कुछ सोख लेते हैं।
🎯 Exam Tip: जलीय पौधों में जड़ों का मुख्य कार्य अक्सर पानी को अवशोषित करने के बजाय पौधे को substratum (आधार) से जोड़ना होता है।
Question 14. किस प्रकार के पौधों के अंगों में वायु प्रकोष्ठ (air chambers) पाये जाते हैं ?
Answer: जलीय पादप या जलोभिदों में वायु प्रकोष्ठ (air chambers) पाये जाते हैं। ये प्रकोष्ठ पौधों को पानी में तैरने में मदद करते हैं और ऑक्सीजन का भंडारण भी करते हैं।
In simple words: पानी में उगने वाले पौधों में हवा से भरे छोटे चैंबर होते हैं जो उन्हें तैरने और सांस लेने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: ये वायु प्रकोष्ठ, जिन्हें एरेनकाइमा (Aerenchyma) भी कहते हैं, पौधों को buoyancy (उत्प्लावकता) प्रदान करते हैं और जलमग्न परिस्थितियों में गैसों का आदान-प्रदान सुगम बनाते हैं।
Question 15. मरुस्थलीय जन्तुओं के ऐसे दो अनुकूलन लिखिए जो उनकी जल संरक्षण में मदद करते हैं।
Answer: मरुस्थलीय जन्तुओं के दो अनुकूलन जो उनकी जल संरक्षण में मदद करते हैं, वे हैं:
• वे अत्यन्त सान्द्र मल-मूत्र का उत्सर्जन करते हैं, जिससे शरीर से जल की हानि कम होती है।
• उनके शरीर में स्वेद ग्रन्थियों (पसीने की ग्रंथियों) का अभाव होता है या वे अल्पविकसित होती हैं, जिससे पसीने के माध्यम से जल का नुकसान रोका जा सके।
In simple words: रेगिस्तान के जानवर कम पानी वाला पेशाब करते हैं और उन्हें पसीना नहीं आता, जिससे वे पानी बचा पाते हैं।
🎯 Exam Tip: मरुस्थलीय जानवरों में जल संरक्षण के अन्य अनुकूलन रात में सक्रिय रहना (निशाचर), बिलों में रहना और पानी वाले भोजन का सेवन करना शामिल हैं।
Question 17. किन्हीं दो जीवों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए।
Answer: दो जीवों के वैज्ञानिक नाम इस प्रकार हैं:
• आम: मैंगीफेरा इंडिका (Mangifera indica)
• मनुष्य: होमो सैपियंस (Homo sapiens)
वैज्ञानिक नामकरण जीवों को एक सार्वभौमिक पहचान प्रदान करता है, जिससे दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से पहचानना आसान हो जाता है।
In simple words: आम का वैज्ञानिक नाम मैंगीफेरा इंडिका है और मनुष्य का होमो सैपियंस है।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नाम हमेशा इटैलिक में लिखे जाते हैं, और वंश (genus) का पहला अक्षर बड़ा और प्रजाति (species) का पहला अक्षर छोटा होता है।
Question 18. पृथ्वी पर जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र कौन से हैं ?
Answer: पृथ्वी पर भूमध्यरेखा के दोनों ओर के क्षेत्र, अर्थात् कर्क रेखा व मकर रेखा के बीच के क्षेत्र, जैव विविधता में समृद्ध हैं। इन क्षेत्रों को वृहद् जैवविविधता क्षेत्र (Mega diversity region) कहा जाता है। इन क्षेत्रों में गर्म जलवायु और भरपूर वर्षा के कारण विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
In simple words: भूमध्य रेखा के पास वाले इलाके, जैसे कर्क और मकर रेखा के बीच के क्षेत्र, दुनिया में सबसे ज़्यादा जीवों वाले स्थान हैं।
🎯 Exam Tip: इन क्षेत्रों में उच्च वर्षा, स्थिर तापमान और अधिक सूर्यप्रकाश होता है, जो पौधों और जीवों की विविधता को बढ़ावा देता है।
Question 19. उस संघ का नाम लिखिए जिसके जन्तुओं में दंश कोशिकाएँ पायी जाती हैं।
Answer: दंश कोशिकाएँ (stinging cells) निडेरिया या सीलेन्टेरेटा (Cnidaria or Coelenterata) संघ के जन्तुओं में पायी जाती हैं। ये कोशिकाएँ शिकार को पकड़ने और आत्मरक्षा के लिए जहर छोड़ती हैं।
In simple words: निडेरिया संघ के जीवों में डंक मारने वाली कोशिकाएँ होती हैं।
🎯 Exam Tip: दंश कोशिकाएँ, जिन्हें निडोब्लास्ट (cnidoblasts) भी कहते हैं, निडेरिया के पहचान चिन्हों में से एक हैं और इनमें निमेटोसिस्ट (nematocysts) नामक कैप्सूल होते हैं जो जहर निकालते हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. पोरीफेरा व निडेरिया संघ के जीवों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
| विशेषता | पोरीफेरा (Porifera) | निडेरिया (Cnidaria) |
|---|---|---|
| शारीरिक संगठन | कोशिकीय स्तर का संगठन पाया जाता है। | ऊतक स्तर का शारीरिक संगठन पाया जाता है। |
| छिद्र | पूरे शरीर पर छोटे-छोटे छिद्र (Ostia) पाये जाते हैं। | ओस्टिया नहीं पाये जाते। |
| गतिशीलता | सभी जन्तु अचल (sessile) व जलीय आधार से जुड़े होते हैं। | जैली फिश, हाइड्रा स्वतन्त्र व चल जीव हैं। कोरल अचल होते हैं। |
| गुहा | स्पंज गुहा पायी जाती है। | सीलेन्टेरॉन गुहा पाई जाती है। |
🎯 Exam Tip: तुलना करते समय, हमेशा स्पष्ट और संक्षिप्त बिंदुओं का उपयोग करें जो दोनों समूहों के बीच प्रमुख अंतरों को उजागर करें।
Question 3. जीवों के वैज्ञानिक नामों का क्या महत्व हैं ?
Answer: जीवों के वैज्ञानिक नामों का महत्व यह है कि वे पूरी दुनिया में जीवों की पहचान में एकरूपता लाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं में एक ही जीव के कई स्थानीय नाम हो सकते हैं, जिससे भ्रम पैदा होता है। वैज्ञानिक नाम (जैसे, मनुष्य के लिए होमो सैपियंस) एक सार्वभौमिक पहचान प्रदान करता है जो किसी भी भाषा या क्षेत्र में नहीं बदलता, जिससे वैज्ञानिक अध्ययन और संचार आसान हो जाता है।
In simple words: वैज्ञानिक नाम से पूरी दुनिया में किसी भी जीव को एक ही नाम से जाना जाता है, जिससे कोई भ्रम नहीं होता।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नामकरण की द्विनाम पद्धति (binomial nomenclature) कैरोलस लीनियस द्वारा दी गई थी और यह जीवों को एक वंश (genus) और एक प्रजाति (species) नाम देती है।
Question 4. जगत मोनेरा के प्रमुख लक्षण लिखिए।
Answer: जगत मोनेरा के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
• सभी जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं, जिसका अर्थ है कि उनमें एक सुसंगठित केंद्रक और झिल्लीदार कोशिकांग (जैसे माइटोकॉन्ड्रिया) नहीं होते हैं।
• पोषण के आधार पर, वे स्वपोषी (अपना भोजन स्वयं बनाने वाले) या विषमपोषी (दूसरों पर निर्भर रहने वाले) हो सकते हैं।
• जनन मुख्य रूप से अलैंगिक संलयन (fission) द्वारा होता है; इनमें वास्तविक लैंगिक जनन नहीं पाया जाता।
जीवाणु और नील हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया) जगत मोनेरा के उदाहरण हैं।
In simple words: मोनेरा के जीव बहुत छोटे होते हैं, उनमें असली केंद्रक नहीं होता, वे खुद खाना बना सकते हैं या दूसरों से ले सकते हैं, और वे बंटकर बच्चे पैदा करते हैं।
🎯 Exam Tip: मोनेरा जगत के जीव पृथ्वी पर सबसे पुराने और सबसे सरल जीव हैं, जो लगभग सभी वातावरणों में पाए जाते हैं।
Question 5. मोनेरा जगत के किसी जीव का चित्र बनाइए।
Answer: [पाठ्यपुस्तक में दिए गए मोनेरा जगत के जीव (जैसे बैक्टीरिया) का चित्र देखें। इस चित्र में कोशिका भित्ति, कोशिका द्रव्य, ग्लाइकोजन कण आदि दर्शाए जाते हैं।]
In simple words: आप अपनी किताब में बैक्टीरिया जैसे मोनेरा जीव का चित्र देख सकते हैं।
🎯 Exam Tip: एक साफ और सुस्पष्ट चित्र बनाएँ, जिसमें सभी महत्वपूर्ण भागों को सही ढंग से लेबल किया गया हो।
Question 6. आवृतबीजी व अनावृतबीजियों में चार अन्तर बताइये।
Answer:
| विशेषता | आवृतबीजी (Angiosperms) | अनावृतबीजी (Gymnosperms) |
|---|---|---|
| बीज की स्थिति | बीज फल (परिपक्व अण्डाशय) के अन्दर बन्द रहते हैं। | बीज नग्न या अनावृत होते हैं, अर्थात किसी संरचना से ढके नहीं होते। |
| बीजपत्र | एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री प्रकार के हो सकते हैं। | बीजों में हमेशा दो बीजपत्र पाये जाते हैं। |
| परागण | परागण वायु, कीट, जल किसी भी प्रकार से हो सकता है। | केवल वायु परागण पाया जाता है। |
| जीवन रूप | शाक, लता, झाड़, वृक्ष सभी जीवन रूप पाये जाते हैं। | केवल झाड़ या वृक्ष होते हैं। |
🎯 Exam Tip: आवृतबीजी पौधों में दोहरा निषेचन होता है, जो अनावृतबीजी पौधों में अनुपस्थित होता है, और यह एक महत्वपूर्ण अंतर है।
Question 7. यूग्लीना व पैरामीशियम के सरल चित्र बनाइए।
Answer: [पाठ्यपुस्तक में दिए गए यूग्लीना और पैरामीशियम के सरल और नामांकित चित्र देखें। यूग्लीना में कशाभिका, केंद्रक और क्लोरोप्लास्ट होते हैं, जबकि पैरामीशियम में सिलिया, गुरुकेन्द्रक और सूक्ष्मकेन्द्रक होते हैं।]
In simple words: अपनी किताब में यूग्लीना और पैरामीशियम के आसान चित्र देखें।
🎯 Exam Tip: चित्रों को बनाते समय उनके मुख्य भागों को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ और उन्हें सही ढंग से लेबल करें ताकि उनकी पहचान और कार्य स्पष्ट हो सकें।
Question 8. किसी एक शैवाल व एक ब्रायोफाइट का चित्र बनाए।
Answer: [पाठ्यपुस्तक में दिए गए किसी एक शैवाल (जैसे यूलोथ्रिक्स या क्लैडोफोरा) और किसी एक ब्रायोफाइट (जैसे मार्केशिया या फ्यूर्नरिया) के नामांकित चित्र देखें।]
In simple words: अपनी किताब में शैवाल और ब्रायोफाइट के चित्र देखें।
🎯 Exam Tip: शैवाल और ब्रायोफाइट के चित्रों में उनकी थैलस संरचना, राइजॉइड्स (यदि उपस्थित हों), और प्रजनन अंगों को सही ढंग से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 9. संघ प्लेटीहैल्मिथीज, एस्केल्मिथीज व एनीलिडा की तुलना कीजिए।
Answer:
| विशेषता | प्लेटीहैल्मिथीज (Platyhelminthes) | एस्केल्मिथीज (Aschelminthes) | एनीलिडा (Annelida) |
|---|---|---|---|
| शरीर का आकार | चपटे कृमियों का संघ, शरीर चपटे होते हैं। | गोल कृमियों का संघ, शरीर बेलनाकार होते हैं। | वलयी कृमियों का संघ, शरीर खंडित व वलयों का बना होता है। |
| देहगुहा | देहगुहा अनुपस्थित । | कूटदेह गुहा उपस्थित । | वास्तविक देहगुहा उपस्थित । |
| जीवन शैली | अधिकांश परजीवी, कुछ मुक्तजीवी। | मुक्तजीवी जलीय या परजीवी। | मुक्तजीवी, कुछ परजीवी। |
| शरीर समरूपता | त्रिकोरकी, द्विपार्श्व सममित । | त्रिकोरकी, द्विपार्श्व सममित। | त्रिकोरकी, द्विपार्श्व सममित। |
🎯 Exam Tip: इन संघों के मुख्य लक्षणों, जैसे शारीरिक संगठन, देहगुहा की उपस्थिति और जीवन शैली को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 10. उभयचर व रेप्टीलिया वर्ग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
| विशेषता | उभयचर (Amphibia) | रेप्टीलिया (Reptilia) |
|---|---|---|
| त्वचा | शरीर पर शल्क (बाह्य कंकाल) नहीं पाये जाते, त्वचा नम होती है। | शरीर शल्कों (Scales) से ढका होता है, त्वचा सूखी होती है। |
| निषेचन | निषेचन के लिए बाह्य जल की आवश्यकता होती है। निषेचन बाह्य माध्यम जल में सम्पन्न होता है। | निषेचन के लिए बाह्य जल आवश्यक नहीं। निषेचन आन्तरिक होता है। |
| श्वसन | लार्वा अवस्था में गलफड़े, वयस्क में फेफड़े, नम त्वचा आदि से होता है। | श्वसन केवल फेफड़ों से होता है। |
| हृदय | हृदय त्रिकोष्ठकी होता है। | हृदय अपूर्ण रूप से चार कोष्ठीय या कुछ सरीसृपों में चार कोष्ठीय होता है। |
🎯 Exam Tip: उभयचरों को उनके अंडे सेने के लिए पानी की आवश्यकता होती है, जबकि सरीसृप सूखी जमीन पर अंडे दे सकते हैं क्योंकि उनके अंडे सुरक्षात्मक आवरण वाले होते हैं।
निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. आपकी पुस्तक में दिये पृष्ठधारी जन्तुओं के विभिन्न वर्गों की निम्न आधार पर तुलना कीजिए-हृदय में कोष्ठों की संख्या, समतापी या असमतापी, अप्रजक या सजीव प्रजक, बाह्य कंकाल, श्वसन अंग, निषेचन प्रकार।
Answer:
| विशेषता | मत्स्य (Fish) | एम्फीबिया (Amphibia) | रेप्टीलिया (Reptilia) | एवीज (Aves) | स्तनधारी (Mammals) |
|---|---|---|---|---|---|
| हृदय में कोष्ठ संख्या | द्विकोष्ठकी | त्रिकोष्ठकी | त्रिकोष्ठकी या अपूर्ण रूप से चार | चार कोष्ठकी | चार कोष्ठकी |
| असमतापी/समतापी | असमतापी | असमतापी | असमतापी | समतापी | समतापी |
| प्रजनन | अण्डप्रजक | अण्डप्रजक | अण्डप्रजक | अण्डप्रजक | सजीव प्रजक |
| बाह्य कंकाल | शल्क | अनुपस्थित | शल्क | पर (feather) | बाल (hair) |
| श्वसन अंग | गलफड़े (गिल्स) | लारवा में गिल्स, फेफड़े, त्वचा, मुखगुहा | फेफड़े | फेफड़े | फेफड़े |
| निषेचन प्रकार | बाह्य निषेचन | बाह्य निषेचन | आन्तरिक निषेचन | आन्तरिक निषेचन | आन्तरिक निषेचन |
🎯 Exam Tip: विभिन्न कशेरुकी वर्गों के बीच इन तुलनात्मक विशेषताओं को याद रखने से उनकी विकासवादी प्रगति और अनुकूलन को समझने में मदद मिलती है।
Question 2. अपृष्ठवंशी व पृष्ठवंशी जन्तुओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
| विशेषता | पृष्ठवंशी (Chordate) | अपृष्ठवंशी (Non-chordate) |
|---|---|---|
| नोटोकोर्ड | जीवन की किसी न किसी अवस्था में छड़नुमा रचना नोटोकोर्ड (Notochord) शरीर की पृष्ठ सतह पर पाई जाती है, जो रीढ़ की हड्डी में विकसित हो सकती है। | नोटोकोर्ड पूर्णतः अनुपस्थित होता है, अतः रीढ़ की हड्डी (Vertebral column) का भी पूर्णतः अभाव होता है। |
| तंत्रिका रज्जु | तंत्रिका रज्जु खोखला व पृष्ठ सतह पर होता है। | मेरू तन्तु ठोस व अधर सतह पर होता है। |
| हीमोग्लोबिन | हीमोग्लोबिन लाल रुधिर कोशिकाओं में पाया जाता है। | हीमोग्लोबिन अनुपस्थित होता है या रक्त प्लाज्मा में घुला होता है। |
| क्लोम दरारें | जीवन की किसी न किसी अवस्था में युग्मित क्लोम दरारें (gill slits) पायी जाती हैं। | युग्मित क्लोम दरारें अनुपस्थित होती हैं। |
| पूंछ | गुदाद्वार के पीछे पूँछ (post anal tail) पायी जाती है। | गुदाद्वार शरीर के पिछले सिरे पर होता है, पूंछ अनुपस्थित होती है। |
| देहगुहा | त्रिकोरकी व वास्तविक देहगुहा वाले होते हैं। | द्विकोरकी, त्रिकोरकी, या कूटदेहगुही होते हैं। |
🎯 Exam Tip: पृष्ठवंशी जीवों के चार प्रमुख विशिष्ट लक्षण (नोटोकोर्ड, पृष्ठ तंत्रिका रज्जु, ग्रसनी क्लोम दरारें और पश्च गुदा पूंछ) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
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