RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम्

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Detailed वैदिकसाहित्यम् RBSE Solutions for Class 12 Sanskrit

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Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् RBSE Solutions PDF

वस्तुनिष्ठप्रश्नाः

 

Question 1. वेदाः कति भागेषु सन्ति-
(क) एकस्मिन्
(ख) द्वयोः
(ग) त्रिषु।
(घ) चतुषु
Answer: (घ) चतुषु
In simple words: वेद चार भागों में बंटे हुए हैं। यह वेदों के पारंपरिक विभाजन को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: वेदों के मुख्य विभाजन को याद रखें, जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

 

Question 2. धर्ममूलम् उच्यते-
(क) पुराणानि
(ख) भारतम्
(ग) धर्मशास्त्रम्
(घ) चतुषु वेदेषु प्राचीनतमः वेदः अस्ति। (यह Q3 के साथ मिलकर एक प्रश्न बन रहा है)

(इस प्रश्न में विकल्प (घ) अधूरा है और अगले प्रश्न का अंश लग रहा है। दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिसे स्पष्ट करने के लिए Q3 के साथ इसकी संरचना को भी ध्यान में रखा जाएगा। यदि यह एक अलग प्रश्न है, तो शेष विकल्पों पर आधारित होगा। OCR के अनुसार, Q2 के बाद Q3 का प्रश्न शुरू होता है।)Answer: दिए गए विकल्पों के अनुसार, धर्म का मूल 'धर्मशास्त्रम्' को कहा जाता है। धर्मशास्त्र वेदों और स्मृतियों पर आधारित है, जो समाज के लिए नियमों और कर्तव्यों का निर्धारण करता है।
In simple words: धर्म की शुरुआत धर्मशास्त्रों से मानी जाती है। ये वो ग्रंथ हैं जो सही और गलत के नियम सिखाते हैं।

🎯 Exam Tip: भारतीय परंपरा में 'धर्म' एक व्यापक अवधारणा है, जिसका मूल विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में पाया जाता है।

 

Question 3. चतुषु वेदेषु प्राचीनतमः वेदः अस्ति।
(क) यजुर्वेदः
(ख) सामवेदः
(ग) ऋग्वेदः।
(घ) अथर्ववेदः।
Answer: (ग) ऋग्वेदः।
In simple words: चार वेदों में से, ऋग्वेद सबसे पुराना माना जाता है। यह सबसे प्राचीन ज्ञान का संग्रह है।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद को सबसे पुराना वेद माना जाता है क्योंकि इसमें सबसे प्राचीन स्तोत्र और भजन शामिल हैं।

 

Question 4. 'अपौरुषेयं वाक्यं वेद इति' प्रोक्तम्-
(क) सायणेन।
(ख) महीधरेण
(ग) कैय्यटेन
(घ) उव्वटेन।
Answer: (क) सायणेन।
In simple words: यह बात कि वेद किसी पुरुष द्वारा नहीं बनाए गए हैं, बल्कि शाश्वत ज्ञान हैं, सायण ने कही थी। सायण एक प्रसिद्ध वैदिक भाष्यकार हैं।

🎯 Exam Tip: 'अपौरुषेय' का अर्थ है कि वेद मनुष्य द्वारा नहीं रचे गए हैं, बल्कि अनादि और नित्य हैं।

 

Question 5. ऋग्वेदः विभक्तः अस्ति
(क) एकधा
(ख) द्विधा
(ग) त्रिधा
(घ) चतुर्धा।
Answer: (ख) द्विधा
In simple words: ऋग्वेद को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है। ये भाग संहिता और ब्राह्मण ग्रंथ हैं।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद के विभाजन को याद रखें, जो संहिता और ब्राह्मण ग्रंथों में होता है।

 

Question 6. ऋग्वेदः मण्डलेषु विभक्तः अस्ति
(क) एकस्मिन्।
(ख) त्रिषु
(ग) देशसु
(घ) अष्टसु।
Answer: (ग) देशसु
In simple words: ऋग्वेद को दस मंडलों में बांटा गया है। ये मंडल विभिन्न सूक्तों और ऋचाओं का संग्रह हैं।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद के दस मंडलों के विभाजन को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. यज्ञे ऋत्विजः भवन्ति-
(क) एकः
(ख) द्वौ
(ग) त्रयः
(घ) चत्वारः।
Answer: (घ) चत्वारः।
In simple words: यज्ञ में चार मुख्य ऋत्विज होते हैं। ये ऋत्विज यज्ञ को सही तरीके से पूरा करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: चार ऋत्विजों के नाम याद रखें: होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा।

 

Question 9. सामवेदे कति मन्त्राः सन्ति-
(क) 1359
(ख) 1889
(ग) 1589
(घ) 1669
Answer: (ग) 1589
In simple words: सामवेद में कुल 1589 मंत्र हैं। इनमें से कई मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, लेकिन उन्हें गाए जाने योग्य बनाया गया है।

🎯 Exam Tip: सामवेद को भारतीय संगीत का मूल माना जाता है, और इसमें गाए जाने वाले मंत्रों की संख्या महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' प्रोक्तम्-
(क) कृष्णेन
(ख) अर्जुनेन
(ग) युधिष्ठिरेण
(घ) व्यासेन।
Answer: (क) कृष्णेन
In simple words: भगवान कृष्ण ने कहा था, "वेदों में मैं सामवेद हूँ"। यह कथन सामवेद के महत्व को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: यह प्रसिद्ध उक्ति भगवद गीता के दसवें अध्याय (विभूति योग) से है, जो भगवान कृष्ण की दिव्य विभूतियों का वर्णन करती है।

 

Question 11. वेदान् अपौरुषेयान् मन्यन्ते-
(क) प्राचीनभारतीयविद्वांसः।
Answer: (क) प्राचीनभारतीयविद्वांसः।
In simple words: प्राचीन भारतीय विद्वान वेदों को अपौरुषेय मानते हैं। इसका मतलब है कि वेद किसी इंसान ने नहीं बनाए, बल्कि वे शाश्वत और दैवीय ज्ञान हैं।

🎯 Exam Tip: 'अपौरुषेय' शब्द वैदिक साहित्य की एक मौलिक अवधारणा है, जिसका अर्थ है कि वेद किसी पुरुष या देवता द्वारा रचित नहीं हैं, बल्कि अनादि और नित्य ज्ञान हैं।

 

Question 12. मैक्समूलरमते ऋग्वेदस्य रचना जाता
(क) 1500 ई. पू. समीपे
(ख) 1600 ई. पू. समीपे
(ग) 1150 ई. पू. समीपे
(घ) 800 ई. पू. समीपे।
Answer: (ग) 1150 ई. पू. समीपे
In simple words: मैक्स मूलर के अनुसार, ऋग्वेद की रचना लगभग 1150 ईसा पूर्व में हुई थी। यह वेदों के काल निर्धारण के बारे में एक महत्वपूर्ण पश्चिमी मत है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न विद्वानों ने वेदों के रचना काल के बारे में अलग-अलग मत दिए हैं; मैक्स मूलर का मत उनमें से एक प्रमुख है।

 

Question 13. बालगङ्गधरतिलकमते ऋवेदस्य रचनाकालः अस्ति
(क) 6000 वर्षपूर्वम्।
(ख) 5000 वर्षपूर्वम्
(ग) 4000 वर्षपूर्वम्।
(घ) 3000 वर्षपूर्वम्।
Answer: (क) 6000 वर्षपूर्वम्।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक के अनुसार, ऋग्वेद की रचना लगभग 6000 वर्ष पूर्व हुई थी। उन्होंने ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था।

🎯 Exam Tip: बाल गंगाधर तिलक का मत, ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण, मैक्स मूलर जैसे पश्चिमी विद्वानों के मतों से भिन्न है।

 

Question 14. वेदस्य अङ्गानि सन्ति
(क) पञ्च
(ख) घडू
(ग) सप्त।
(घ) अष्ट।
Answer: (ख) घडू
In simple words: वेद के छह अंग होते हैं। ये अंग वेदों को सही ढंग से समझने और उनका उपयोग करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: वेदांगों के नाम याद रखें: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष।

 

Question 15. येन वेदमन्त्राणामुच्चारणं शुद्धं सम्पाद्येत, तच्छास्त्रस्य नाम अस्ति
(क) शिक्षा
(ख) कल्पः
(ग) छन्दः
(घ) व्याकरणम्।
Answer: (क) शिक्षा
In simple words: वह शास्त्र जो वेदमंत्रों का शुद्ध उच्चारण सिखाता है, उसे शिक्षा कहा जाता है। यह वेदों के सही पाठ के लिए बहुत ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: शिक्षा वेदांग का मुख्य उद्देश्य वैदिक ध्वनियों और उनके उच्चारण की शुद्धता को बनाए रखना है, ताकि मंत्रों का सही प्रभाव हो।

ऋग्वेदस्य परिचयः संक्षेपेज़ लिखत।

 

Question 1. ऋग्वेद का संक्षेप में परिचय दीजिए।
Answer: वैदिक साहित्य की सभी रचनाओं में ऋग्वेद सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण है। इस वेद में प्राचीन भारतीय आदर्शों, मर्यादाओं, ज्ञान और मानवता का जीवंत चित्रण किया गया है। छंदों में बंधी होने के कारण इसे 'ऋग्वेद संहिता' नाम दिया गया है। छंदों में बंधी पद्यात्मक मंत्रों को 'ऋक्' या 'ऋचा' कहा जाता है। 'संहिता' शब्द का अर्थ 'संग्रह' होता है, इसलिए ऋचाओं के विशाल संग्रह को ही ऋग्वेद कहते हैं। ऋग्वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति का दर्पण भी है।
In simple words: ऋग्वेद सबसे पुराना और ज़रूरी वेद है। इसमें भारतीय ज्ञान, आदर्श और मानवता के बारे में लिखा है। यह छंदों में लिखे मंत्रों का संग्रह है।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद के तीन प्रमुख पहलू याद रखें: प्राचीनतम वेद, भारतीय संस्कृति का दर्पण, और पद्यात्मक मंत्रों का संग्रह।

 

Question 2. वेदों के रचनाकाल के विषय में विद्वानों के मत संक्षेप में लिखिए।
Answer: प्राचीन भारतीय विद्वान वेदों को अपौरुषेय (मानव निर्मित नहीं) मानते हैं। उनके अनुसार, वेदों की रचना के समय पर विचार करना व्यर्थ है क्योंकि वे शाश्वत हैं। वहीं, कुछ पश्चिमी विद्वान अपनी बुद्धि और तर्क के आधार पर वेदों का रचनाकाल निर्धारित करते हैं। कुछ भारतीय विद्वान भी इसी मार्ग का अनुसरण करके वेदकाल का निर्धारण करने का प्रयास करते हैं। वेदों का वास्तविक समय बहुत पुराना है, लेकिन इसे समझने के लिए विभिन्न विद्वानों ने अपने तर्क दिए हैं।
मैक्स मूलर के अनुसार, बुद्ध के 600 वर्ष पूर्व से छंदों के युग का अस्तित्व माना जाता है। प्रत्येक युग के विकास के लिए उन्होंने दो सौ वर्षों का समय निर्धारित किया। इसलिए उनके मत में ऋग्वेद की रचना 1150 ईसा पूर्व के बाद की नहीं हो सकती।
डॉ. अविनाशचंद्र के अनुसार, वेदों में उल्लिखित अनेक भूगर्भशास्त्रीय तत्वों के आधार पर गणना करने पर वेद का रचनाकाल 25 हजार वर्ष पूर्व माना जाता है।
शंकर बालकृष्ण ने शतपथ ब्राह्मण में वर्णित कृत्तिका नक्षत्र के आधार पर वेदों की कालगणना की। उनके मत से ऋग्वेद 5500 ईसा पूर्व जितना प्राचीन है।
बाल गंगाधर तिलक ने मृगशिरा नक्षत्र में वसंत संपात को साधने वाले अनेक वेद वाक्यों को एकत्र करके वेदों के रचनाकाल की गणना की। उनके मत से ऋग्वेद की रचना 6000 ईसा पूर्व मानी गई है।
जर्मन विद्वान याकोबी भी तिलक के मत का समर्थन करते हैं। उनके अनुसार ऋग्वेद की रचना का काल 4500 ईसा पूर्व निर्धारित है।
उपर्युक्त मतों के विश्लेषण से यह कहा जा सकता है कि वेदों की रचनाकाल की निचली सीमा 4500 ईसा पूर्व से शुरू होकर 1500 ईसा पूर्व तक अवश्य रही होगी। यह दर्शाता है कि वेदों का ज्ञान बहुत पुराना है और समय के साथ इसमें और भी बातें जुड़ती गईं।
In simple words: भारतीय विद्वान वेद को भगवान का बनाया हुआ मानते हैं, इसलिए उनके बनने के समय पर बात नहीं करते। पर कुछ विदेशी विद्वान और कुछ भारतीय विद्वान वेदों के बनने का समय बताते हैं। मैक्स मूलर इसे 1150 ईसा पूर्व, बाल गंगाधर तिलक 6000 साल पहले और डॉ. अविनाशचंद्र 25 हज़ार साल पहले का बताते हैं। सभी मानते हैं कि वेद बहुत पुराने हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न विद्वानों के प्रमुख मतों और उनके द्वारा प्रस्तावित वेदों के रचनाकाल को याद रखें, विशेषकर मैक्स मूलर, तिलक और अविनाशचंद्र के मत।

 

Question 3. वेदाङ्गानि कति सन्ति? संक्षेपेण वर्णयत।
Answer: वेदांग छह हैं: शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद और ज्योतिष। ये वेद के अंग हैं और उन्हें समझने में मदद करते हैं।
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।
अर्थात्: शिक्षा वेद की नाक है, व्याकरण मुख है। इसलिए सभी अंगों के साथ वेद का अध्ययन करने वाला ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। वेदों को सही ढंग से समझने के लिए इन अंगों का ज्ञान आवश्यक है।

1. शिक्षा: यह वह शास्त्र है जिससे वेदमंत्रों का उच्चारण शुद्ध किया जाता है। वेदों में स्वरों का महत्व सर्वविदित है और स्वर ज्ञान शिक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए यह शिक्षाशास्त्र वेदांग है। वर्तमान में लगभग तीस शिक्षा ग्रंथ उपलब्ध हैं। पाणिनीया शिक्षा सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

2. कल्पः: ब्राह्मणकाल में यज्ञों का इतना प्रचार हुआ कि उनके उचित ज्ञान के लिए पूर्ण परिचय प्रदान करने वाले ग्रंथों की आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता को कम शब्दों में पूरा करने के लिए कल्पसूत्रों की रचना हुई। कल्पसूत्र दो प्रकार के होते हैं: श्रौतसूत्र और स्मार्तसूत्र। श्रौतसूत्र वैदिक यज्ञ विधि को प्रकाशित करते हैं। स्मार्तसूत्र भी दो प्रकार के होते हैं: गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र।

3. निरुक्तम्: 'निरुक्त' वह है जो निर्वाचन विधि से पदों के अर्थ को पूर्ण रूप से बताता है। यद्यपि व्याकरण से भी पदों के अर्थ का ज्ञान होता है, फिर भी निरुक्त के अनुसार ही अर्थों का निर्वचन किया जाना चाहिए। यास्क मुनि ने इसे व्याकरण से अलग शास्त्र के रूप में प्रस्तुत किया। उपलब्ध निरुक्त ग्रंथ यास्क की कृति है। पाणिनी से भी प्राचीन यास्क 900 ईसा पूर्व के माने जाते हैं।

4. व्याकरणम्: भाषा लोक व्यवहार को सफल बनाती है। यदि भाषा न होती तो यह संसार अंधकार में डूब जाता। जैसा कि दण्डी ने कहा है:
इदमन्धन्तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्।
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।
अर्थात्: यदि शब्दों का ज्ञान रूपी प्रकाश संसार में न चमके तो तीनों लोक अंधकारमय हो जाएं। भाषा को शुद्ध रूप से समझने के लिए व्याकरण की आवश्यकता होती है। व्याकरण ज्ञान के बिना मनुष्य शुद्ध शब्दों का प्रयोग करने में सक्षम नहीं होता। वेद की रक्षा के लिए भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है। व्याकरण की वेदों की रक्षा करने की क्षमता के कारण ही इसे वेदांग माना जाता है। महर्षि पतंजलि ने व्याकरण के अध्ययन के सभी प्रयोजनों को महाभाष्य में बताया है, जैसे - 'रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्।' (रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंदेह)।

5. छन्दः: मंत्रों के छंदोबद्ध होने के कारण छंदों के ज्ञान के बिना वेदमंत्रों का उचित उच्चारण नहीं किया जा सकता। शौनक द्वारा रचित ऋक्प्रातिशाख्य के अंतिम भाग में छंदों का विस्तृत वर्णन है। यह वेदों के सही पाठ और उच्चारण के लिए ज़रूरी है, क्योंकि छंदों के नियम मंत्रों की लय और संरचना को नियंत्रित करते हैं।

6. ज्योतिषम्: यह वेदांग यज्ञ के लिए सही समय का निर्धारण करता है, क्योंकि यज्ञ वैदिक अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ज्योतिषशास्त्र काल निर्धारण का विज्ञान है। 'आर्चज्योतिष' में कहा गया है:
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिष वेद स वेद यज्ञम्।
अर्थात्: वेद यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए हैं और यज्ञ काल के अनुसार किए जाते हैं। इसलिए यह काल विधान शास्त्र ज्योतिष है, और जो ज्योतिष को जानता है, वह वेद और यज्ञ दोनों को जानता है।
In simple words: वेद के छह अंग हैं: शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद और ज्योतिष। शिक्षा सही उच्चारण सिखाती है, कल्प यज्ञ के नियम बताता है, निरुक्त शब्दों के अर्थ समझाता है, व्याकरण भाषा को शुद्ध करता है, छंद मंत्रों की लय बताता है, और ज्योतिष शुभ समय निर्धारित करता है। ये सभी वेद को समझने और सही ढंग से इस्तेमाल करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: छह वेदांगों के नाम और उनके प्रमुख कार्य संक्षेप में याद रखें। प्रत्येक वेदांग का एक विशिष्ट उद्देश्य है जो वैदिक अध्ययन में सहायक होता है।

निबन्धात्मकप्रश्नाः

 

Question 1. यजुर्वेद के भेदों के विषय में पौराणिक मत का विवेचन कीजिए।
Answer: यजुर्वेद मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है: कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। पौराणिक मत के अनुसार, व्यास ने वैशम्पायन को वेद सिखाए, और वैशम्पायन ने अपने शिष्य याज्ञवल्क्य को। किसी कारण से वैशम्पायन याज्ञवल्क्य से क्रोधित हो गए और कहा, "मेरे द्वारा पढ़ाए गए वेद को वापस कर दो।" याज्ञवल्क्य ने गुरु के वचन का पालन करते हुए तुरंत पढ़े हुए वेद को वमन कर दिया। वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर पक्षी का रूप धारण कर उस वमन किए हुए वेद को ग्रहण किया। यही वमन किया हुआ वेद कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है।
वैशम्पायन के कुपित होने पर याज्ञवल्क्य ने वेद का त्याग कर दिया था। बाद में उन्होंने फिर से वेद प्राप्त करने के लिए सूर्यदेव की आराधना की। सूर्यदेव से प्राप्त वेद 'शुक्ल यजुर्वेद' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन दोनों वेदों में बहुत अंतर देखने को मिलता है।
शुक्ल यजुर्वेद में विनियोग वाक्य रहित मंत्र हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में विनियोग वाक्यों सहित मंत्र हैं। शुक्ल यजुर्वेद एक मिश्रित रूप नहीं है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद मिश्रित रूप है। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता को वाजसनेयि संहिता भी कहते हैं। इसके नामकरण के पीछे यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना की थी, और सूर्य ने घोड़े का रूप धारण कर उन्हें वेद का उपदेश दिया था। तभी से यह संहिता वाजसनेयि संहिता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इस यजुर्वेद में 40 अध्याय, 303 अनुवाक, 1975 कंडिका (मंत्र), 29625 शब्द और 88875 अक्षर हैं। इस वेद के पहले अध्याय में दर्शपौर्णमास, दूसरे में पिण्डपितृयज्ञ, तीसरे में अग्निहोत्र चातुर्मास्येष्टि, चौथे से आठवें अध्याय तक अग्निष्टोमविधान सोमयाग, नौवें में वाजपेय और राजसूय, दसवें में सौत्रामणि, ग्यारहवें से अठारहवें अध्याय तक अग्निचयन, उखाभरण, चितियां, रुद्रह, शतरुद्रिय, वसोर्धारा, राष्ट्रभृत् का वर्णन है। इसके बाद चालीसवें अध्याय तक अश्वमेध, पुरुषमेध, पितृमेध, सर्वमेध जैसे विविध यज्ञों का वर्णन है। इसका अंतिम अध्याय ईशावास्योपनिषद है। यह वेदों के भीतर की विविधता को दर्शाता है।
In simple words: यजुर्वेद दो तरह का होता है - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। पौराणिक कथा के अनुसार, गुरु वैशम्पायन के गुस्सा होने पर शिष्य याज्ञवल्क्य ने वेद वापस कर दिए थे। वैशम्पायन के दूसरे शिष्यों ने तित्तिर पक्षी बनकर उन वेदों को ले लिया, जो कृष्ण यजुर्वेद कहलाए। फिर याज्ञवल्क्य ने सूर्य भगवान से फिर से वेद मांगे, जो शुक्ल यजुर्वेद कहलाए। शुक्ल यजुर्वेद में बस मंत्र हैं, कृष्ण यजुर्वेद में मंत्र और उनके प्रयोग के तरीके भी हैं।

🎯 Exam Tip: यजुर्वेद के दो प्रमुख भेदों (कृष्ण और शुक्ल) और उनकी उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा को याद रखें। साथ ही, दोनों के बीच के मुख्य अंतरों को भी समझें।

 

Question 2. सामवेद का महत्व स्पष्ट कीजिए।
Answer: वैदिक साहित्य में सामवेद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'वेदों में मैं सामवेद हूँ' कहकर इसके महत्व को उजागर किया है। महर्षि शौनक ने भी कहा है - 'सामानि यो वेत्ति स वेदतत्त्वम्' अर्थात् जो साम को जानता है, वही वेदों के रहस्य को जानता है। यह दर्शाता है कि सामवेद का ज्ञान कितना गहरा और आवश्यक है।
सामवेद अपनी गायन की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध है। इसमें ऋचाएँ ही गाई जाती हैं। सामवेद में 1548 मंत्र हैं, जिनमें से 75 मंत्र 'ऋग्वेद' में नहीं मिलते, बाकी ऋग्वेद में भी हैं। सामवेद के मंत्रों को सात स्वरों में गाया जाता है, जबकि ऋग्वेद के मंत्रों को तीन स्वरों में गाया जाता है। यही अंतर दोनों वेदों के समान मंत्रों में है। वास्तव में, सामगान के प्राण स्वर ही हैं। 'साम' का आरंभ और अंत 'ओम्' शब्द से होता है। सामवेद भारतीय संगीत का मूल आधार है, और इसके अध्ययन से ध्वनि विज्ञान, स्वर विज्ञान और मंत्रों की शक्ति को समझा जा सकता है।
In simple words: सामवेद वैदिक साहित्य में बहुत खास है। भगवान कृष्ण ने कहा था कि वेदों में वे सामवेद हैं। महर्षि शौनक ने भी कहा है कि साम को जानने वाला ही वेद का रहस्य जानता है। सामवेद में गाने वाले मंत्र होते हैं, जिनमें से कई ऋग्वेद से लिए गए हैं, पर उन्हें अलग तरह से गाया जाता है। यह भारतीय संगीत का आधार भी है।

🎯 Exam Tip: सामवेद के महत्व को दर्शाने वाली कृष्ण की उक्ति और शौनक का कथन याद रखें। सामवेद का मुख्य गुण उसकी गायन शैली और भारतीय संगीत से उसका संबंध है।

 

Question 3. अथर्ववेद के विषय को संक्षेप में प्रतिपादित कीजिए।
Answer: अथर्ववेद का विषय तीन भागों में विभाजित है: अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत। अध्यात्म विभाग के अंतर्गत ब्रह्म, परमात्मा, चारों आश्रमों और वर्णाश्रम धर्मों का निर्देश मिलता है। अधिभूत विभाग में राजा, राज्य, संग्राम आदि विषयों का वर्णन है। अधिदैवत विभाग में देवता, यज्ञ और काल संबंधी विषयों का विवेचन है। इस वेद का ज्ञान प्राचीन भारतीय समाज और उसकी जीवनशैली को समझने में मदद करता है।
अथर्ववेद में रोगों को दूर करने वाले अनेक मंत्र संकलित हैं, जिन्हें 'भैषज्यानि' (औषधि) कहा जाता है। इसमें रोगों (रुज) को दानव रूप में कल्पित किया गया है, जिनसे रोग उत्पन्न होते हैं। यहीं रोगों को दूर करने और उनके प्रवर्तक असुरों को नष्ट करने के लिए विभिन्न उपाय वर्णित हैं। खांसी को दूर करने के लिए एक स्थान पर ऐसी प्रार्थना की गई है।
यहां 'आयुष्यसूक्त' में स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति के लिए अनेक प्रार्थना मंत्र संकलित हैं। यहीं दीर्घायु के लिए 'जीवेम शरदः शतम्' (हम सौ वर्षों तक जीवित रहें) की प्रार्थना है। अथर्ववेद के कुछ सूक्तों में अनिष्ट निवारण, पशु रक्षा, हल चलाने, बीज बोने और अन्न की वृद्धि से संबंधित विभिन्न प्रार्थना मंत्र हैं, जिन्हें 'पौष्टिकानि' कहा जाता है।
'प्रायश्चित्त' के अंतर्गत विभिन्न यज्ञ यागादि अनुष्ठानों में हुए दोषों को दूर करने और पाप मुक्ति के लिए प्रायश्चित्त विधान किया गया है। अपराध मुक्ति का एक मंत्र इस प्रकार है:
यदि जाग्रत यदि स्वप्नेन एनस्योऽकरम्।
भूतं मा तस्माद् भव्यं च दपदादिव मुञ्चताम्।।
अर्थात्: यदि मैंने जागते हुए या सपने में कोई पाप किया हो, तो मुझे भविष्य में भी उससे मुक्त करें।
यहां कुछ मंत्रों में तत्कालीन राजनैतिक दशा का चित्रण भी मिलता है। वे मंत्र 'राजकर्माणि' के रूप में प्रसिद्ध हैं।
अथर्ववेद में विज्ञान के विविध अंगों का विकास भी दिखाई देता है। इसके विस्तृत अवलोकन से ज्ञात होता है कि उस समय 'विज्ञान' विकसित अवस्था में था। रोग उत्पन्न करने वाले कृमियों का विस्तृत वर्णन और उन्हें नष्ट करने के उपाय भी वर्णित हैं। यहां शल्यचिकित्सा (सर्जरी) का भी उल्लेख है, जो चिकित्सा विज्ञान के उन्नत ज्ञान को दर्शाता है।
In simple words: अथर्ववेद तीन मुख्य बातों पर है: आत्मा और भगवान, राजा और राज्य, और देवता व यज्ञ। इसमें बीमारी ठीक करने के मंत्र हैं, जिन्हें 'भैषज्य' कहते हैं। इसमें लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए भी प्रार्थनाएं हैं। साथ ही, पशुओं की रक्षा और खेती के लिए भी मंत्र हैं। यह वेद बताता है कि तब का समाज कैसा था और विज्ञान कितना आगे था, जैसे बीमारियों और सर्जरी के बारे में जानकारी।

🎯 Exam Tip: अथर्ववेद के तीन मुख्य विषय (अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत) और उसके व्यावहारिक उपयोगों (चिकित्सा, राजकर्म, पौष्टिकानि) को याद रखें।

 

Question. ब्राह्मणम्, आरण्यकम्, उपनिषदश्च वैदिकसाहित्यस्य पूरकसंहिताः सन्ति। तेषां संक्षेपेण वर्णनमत्र क्रियते-
(i) ब्राह्मणग्रन्थाः-वेदो द्विविधः मन्त्रभागः ब्राह्मणभागश्च। मन्त्रभागेन सदृशः ब्राह्मणभागः अपि वेदः एव अस्ति। संहितानन्तरम् अस्य द्वितीय स्थानम् अस्ति। ब्राह्मणग्रन्थाः वेदव्याख्यारूपाः सन्ति। वेदशेषभूता इमे ब्राह्मणग्रन्थाः यज्ञानुष्ठानस्य विस्तृतं वर्णनं कुर्वन्ति। कतिचन कथा अपि ब्राह्मणेषु प्राप्यन्ते।। अत्र यज्ञक्रियायाः रहस्यमयस्य अर्थस्य प्रतिपादनम् अस्ति, अनेकेषु स्थलेषु वैदिकमन्त्राणां दार्शनिकः विचारः दृश्यते। यज्ञक्रियारीतेः व्यवधानवर्णनम्, यजमानस्य यज्ञफलप्राप्तेः सम्यक् निरूपणम् च अत्र कृतमस्ति। प्रत्येकवेदशाखानुसारेण ब्राह्मणानि आरण्यकग्रन्थाश्च भिन्नाः सन्ति
(ii) आरण्यकम्-यस्य साहित्यस्य अध्ययन अध्यापनं च नगरग्रामाभ्यां दूरात् अरण्ये भवति स्म तत् साहित्यम्' आरण्यकम्' कथ्यते अरण्येषु निवासिनां वानप्रस्थानाम् यज्ञादेः कर्मविवेचनात्मकाः ग्रन्थाः 'आरण्यकम्' कथ्यन्ते। आचार्यसायणमते अरण्येषु अध्यापनकारणादेव एतत् साहित्यम् 'आरण्यकम्' इति नाम्ना प्रसिद्धम्। एतेषु आरण्यकेषु यज्ञानां आध्यात्मिकानां विषयाणां विवेचनं कृतमस्ति एतेषु प्राणविद्यायाः महिमा प्राप्यते ऐतरेये आरण्यके प्राणस्य विभिन्नगुणानां उल्लेखः प्राप्यते-“प्राणेन एव अन्तरिक्षस्य वायोः च स्रष्टा अस्ति। प्राण एव पिता अस्ति।” आरण्यकेषु प्राणः ऋषिरूपेण कल्पितः अस्ति एवम् 'प्राणविद्या' अस्ति यस्याः साधना शान्ते एकान्ते च वातावरणे भवति।।
(iii) उपनिषदः-वेदान्तः वेदान्त एव उपनिषद् कथ्यते उपनिषच्छब्दः उप-नि-उपसर्गद्वयपूर्वस्य क्विप्रत्ययान्तस्य 'षद्लू' धातोः योगात् निष्पन्नः भवति।'षद्ल' धातोः अर्थद्वयम् अस्ति-विशरणं = नाशम्, गतिः = प्राप्तिः, अवसादनं = शिथिलनम् च अस्य अर्थः भवति यत् या विद्या परम्परया गुरोः समीपे उपविश्य प्राप्यते, यथा च यया समस्तानर्थोत्पादिकानां सांसारिकक्रियाणां नाशः भवति, संसारस्य कारणभूताया अविद्यायाः बन्धनं शिथिलं भवति, ब्रह्मसाक्षात्कारः च भवति, सा विद्या उपनिषद् कथ्यते अत्र ब्रह्म-जीव-जगत्सम्बन्धिविषयाणां विशदं विवेचनं प्राप्यते उपनिषत्सु ब्रह्म-जीव-संसार-सम्बन्धिरहस्यमापि प्रतिपादितमस्ति। मुक्तोनिषदि उपनिषदां संख्या 108 उल्लिखिता। तासु दश उपनिषदः प्रसिद्धाः- ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्डक-माण्डूक्य-तैत्तिरीय-ऐतरेय-छान्दोग्य-बृहदारण्यकोपनिषदः श्वेता- श्वतरोपनिषदेकादश्यपि प्रसिद्धा अस्ति। उपनिषदः भारतीयाध्यात्मविद्यायाः ज्वलन्ति रत्नानि महर्षयः यानि आध्यात्मिकतत्त्वानि ज्ञानदृशा साक्षादकुर्वन् तानि सर्वाणि तत्त्वानि अत्र वर्णितानि सन्ति।
Answer: ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद वैदिक साहित्य के पूरक ग्रंथ हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है:

(i) **ब्राह्मणग्रंथ:** वेद दो भागों में हैं – मंत्र भाग और ब्राह्मण भाग। मंत्र भाग के समान ही ब्राह्मण भाग भी वेद का ही हिस्सा है। संहिताओं के बाद इसका दूसरा स्थान है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की व्याख्या करते हैं। ये ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञों के अनुष्ठान का विस्तृत वर्णन करते हैं। इनमें कुछ कथाएँ भी मिलती हैं। यहां यज्ञ क्रिया के रहस्यमय अर्थों को समझाया गया है, और कई जगहों पर वैदिक मंत्रों के दार्शनिक विचार भी दिखते हैं। यज्ञ करने के तरीके, बाधाएँ और यजमान को मिलने वाले यज्ञ के फल का सही वर्णन इसमें किया गया है। हर वेद शाखा के अनुसार ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथ अलग-अलग होते हैं।

(ii) **आरण्यक:** वह साहित्य जिसका अध्ययन और अध्यापन नगरों और ग्रामों से दूर वन में होता था, उसे 'आरण्यक' कहा जाता है। वनों में निवास करने वाले वानप्रस्थियों के लिए यज्ञ आदि कर्मों का विवेचन करने वाले ग्रंथ 'आरण्यक' कहलाते हैं। आचार्य सायण के मत के अनुसार, वनों में अध्यापन के कारण ही यह साहित्य 'आरण्यक' नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन आरण्यकों में यज्ञों के आध्यात्मिक विषयों का विवेचन किया गया है। इनमें प्राणविद्या का महत्व भी बताया गया है। ऐतरेय आरण्यक में प्राण के विभिन्न गुणों का उल्लेख है - "प्राण से ही अंतरिक्ष और वायु के सृष्टा हैं। प्राण ही पिता है।" आरण्यकों में प्राण को ऋषि के रूप में कल्पित किया गया है। प्राणविद्या वह विद्या है जिसकी साधना शांत और एकांत वातावरण में होती है।

(iii) **उपनिषद:** 'वेदांत' को ही उपनिषद कहा जाता है। 'उपनिषद' शब्द 'उप' और 'नि' उपसर्ग तथा 'षद्लू' धातु के योग से बना है, जिसमें 'क्विप्' प्रत्यय लगता है। 'षद्लू' धातु के दो अर्थ हैं - 'विशरण' (नाश होना), 'गति' (प्राप्त करना), और 'अवसादन' (शिथिल होना)। इसका अर्थ है कि वह विद्या जो परंपरा से गुरु के समीप बैठकर प्राप्त की जाती है, और जिससे सभी अनर्थ उत्पन्न करने वाली सांसारिक क्रियाओं का नाश होता है, संसार के कारणभूत अविद्या का बंधन शिथिल होता है, और ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, वही विद्या उपनिषद कहलाती है। इसमें ब्रह्म, जीव और जगत से संबंधित विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया है। उपनिषदों में ब्रह्म, जीव और संसार से संबंधित रहस्यों का भी प्रतिपादन है। मुक्तोपनिषद में 108 उपनिषदों का उल्लेख है। उनमें से दस उपनिषद प्रसिद्ध हैं: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर उपनिषद। उपनिषद भारतीय अध्यात्म विद्या के उज्ज्वल रत्न हैं। महर्षियों ने ज्ञान के द्वारा जिन आध्यात्मिक तत्वों का साक्षात्कार किया, वे सभी तत्व यहां वर्णित हैं। यह वेदों का सार और गूढ़ ज्ञान प्रदान करते हैं।
In simple words: ब्राह्मण ग्रंथ वेद की व्याख्या करते हैं और यज्ञों के बारे में बताते हैं। आरण्यक ग्रंथ वे हैं जिनका अध्ययन जंगल में होता था, इनमें यज्ञों के आध्यात्मिक मतलब और प्राण के बारे में बताया गया है। उपनिषद वेदों का आखिरी हिस्सा हैं, जिन्हें वेदांत भी कहते हैं। ये हमें ब्रह्म, आत्मा और दुनिया के गहरे रहस्यों के बारे में सिखाते हैं। ये ग्रंथ हमें जीवन के सच्चे ज्ञान की ओर ले जाते हैं।

🎯 Exam Tip: ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों की परिभाषा, उनके मुख्य विषय और महत्व को याद रखें। ये तीनों वैदिक साहित्य के अभिन्न अंग हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

 

Question 1. वेदव्याख्यारूपाः सन्ति
(अ) उपनिषद्ग्रन्थाः
(ब) आरण्यकग्रन्थाः
(स) ब्राह्मणग्रन्थाः
(द) व्याकरणम्।
Answer: (स) ब्राह्मणग्रन्थाः
In simple words: ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की व्याख्या करते हैं। वे मंत्रों के अर्थ और यज्ञों के तरीकों को विस्तार से समझाते हैं।

🎯 Exam Tip: ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के कर्मकांडीय हिस्से की व्याख्या करते हैं, जबकि उपनिषद उनके दार्शनिक पहलुओं पर केंद्रित होते हैं।

 

Question 2. यस्य साहित्यस्य अध्ययनम् अध्यापनं च नगरग्रामाभ्यां दूरात्तरं भवति स्म तत् साहित्यं कथ्यते
(अ) ब्राह्मणम्
(ब) आरण्यकम्।
(स) उपनिषदः
(द) वेदान्तः।
Answer: (ब) आरण्यकम्।
In simple words: वह साहित्य जिसका अध्ययन और अध्यापन शहरों और गांवों से दूर जंगल में होता था, उसे आरण्यक कहते हैं। ये ग्रंथ आध्यात्मिक चिंतन के लिए होते थे।

🎯 Exam Tip: आरण्यकों का नाम 'अरण्य' (जंगल) से आया है, क्योंकि ये ग्रंथ जंगल में पढ़े-पढ़ाए जाते थे।

 

Question 3. भारतीयानां मते वेदरचनाकालविचारः सर्वथा निरर्थकोऽस्ति यतो हि वेदाः
(अ) अपौरुषेयाः
(ब) काल्पनिकाः
(स) नाशरहिताः
(द) चत्वारः।
Answer: (अ) अपौरुषेयाः
In simple words: भारतीयों का मानना है कि वेद किसी मनुष्य द्वारा नहीं बनाए गए हैं, बल्कि वे शाश्वत हैं। इसलिए उनके रचनाकाल के बारे में सोचना व्यर्थ है।

🎯 Exam Tip: 'अपौरुषेय' का अर्थ है जो किसी पुरुष द्वारा रचित न हो, बल्कि अनादि और नित्य हो। यह वैदिक ज्ञान की मौलिक विशेषता है।

 

Question 4. रोग-निवारकाः मन्त्राः कस्मिन् वेदे संकलिताः?
(अ) ऋग्वेदे
(ब) यजुर्वेदे।
(स) सामवेदे
(द) अथर्ववेदे।
Answer: (द) अथर्ववेदे।
In simple words: रोगों को ठीक करने वाले मंत्र अथर्ववेद में मिलते हैं। इस वेद में बीमारियों से बचाव और उपचार के कई तरीके बताए गए हैं।

🎯 Exam Tip: अथर्ववेद को 'भैषज्य वेद' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें चिकित्सा और औषधि से संबंधित ज्ञान का विस्तृत वर्णन है।

 

Question 5. छन्दोबद्धानां पद्यात्मकानां मन्त्राणां नाम अस्ति
(अ) ऋक्
Answer: (अ) ऋक्
In simple words: छंदों में बंधे पद्यात्मक मंत्रों को 'ऋक्' कहते हैं। ऋग्वेद में ऐसे ही मंत्रों का संग्रह है।

🎯 Exam Tip: 'ऋक्' शब्द ऋग्वेद से संबंधित है, जिसका अर्थ है स्तुतिपरक मंत्र जो छंदों में बद्ध होते हैं।

 

Question 6. पौराणिकमतानुसारं व्यासः वेदं प्रोवाच
(अ) याज्ञवल्क्याय
(ब) कश्यपाय
(स) वैशम्पनाय
(द) वसिष्ठाय
Answer: (स) वैशम्पनाय
In simple words: पौराणिक कहानियों के अनुसार, वेद व्यास ने वेद वैशम्पायन को सिखाए थे। वैशम्पायन वेद व्यास के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।

🎯 Exam Tip: वेद व्यास ने अपने शिष्यों को वेदों का ज्ञान दिया, और वैशम्पायन ने यजुर्वेद का प्रचार किया।

 

Question 7. 'सामानि यो वेत्ति स वेदतत्त्वम्' इति उक्तम्
(अ) सायणेन
(ब) शौनकेन
(स) श्रीकृष्णेन
(द) महीधरेण
Answer: (ब) शौनकेन
In simple words: यह बात कि 'जो साम को जानता है, वही वेद के तत्व को जानता है' शौनक ऋषि ने कही थी। यह कथन सामवेद के गहरे महत्व को बताता है।

🎯 Exam Tip: शौनक ऋषि वैदिक अनुक्रमणियों और प्रातिशाख्यों के लिए प्रसिद्ध हैं, और उन्होंने सामवेद के महत्व पर भी प्रकाश डाला है।

 

Question 8. संगीतशास्त्रस्य मूलमस्ति
(अ) अग्निसूक्तम्
(ब) पृथिवीसूक्तम्
(स) नाट्यशास्त्रम्
(द) सामगानम्।
Answer: (द) सामगानम्।
In simple words: संगीतशास्त्र का मूल सामगान में है। सामवेद के मंत्रों को गाए जाने की परंपरा से ही भारतीय संगीत का जन्म हुआ।

🎯 Exam Tip: सामवेद को भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति का स्रोत माना जाता है, जिसमें विभिन्न स्वर और तालों का प्रयोग होता है।

 

Question 9. 'साम' इत्यस्य आरम्भः अवसानं च भवति-
(अ) 'ओम्' शब्देन
(ब) 'भो:' शब्देन
(स) 'हे' इति शब्देन
Answer: (अ) 'ओम्' शब्देन
In simple words: साम का आरंभ और अंत 'ओम्' शब्द से होता है। 'ओम्' एक पवित्र ध्वनि है जो ब्रह्मांड की मूलभूत ध्वनि मानी जाती है।

🎯 Exam Tip: 'ओम्' शब्द न केवल सामगान में, बल्कि अधिकांश वैदिक मंत्रों और उपनिषदीय दर्शन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ब्रह्म का प्रतीक है।

 

Question 10. वेदव्याख्यारूपाः सन्ति
(अ) उपनिषद्ब्रन्थाः
(ब) आरण्यकग्रन्थाः
(स) ब्राह्मणग्रन्थाः
(द) व्याकरणम्।
Answer: (स) ब्राह्मणग्रन्थाः
In simple words: ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की व्याख्या करते हैं। वे वैदिक मंत्रों के अर्थ और उनके प्रयोग विधि को समझाते हैं।

🎯 Exam Tip: ब्राह्मण ग्रंथों का मुख्य कार्य यज्ञों के कर्मकांडीय पहलुओं और संबंधित मंत्रों का विस्तृत विवरण देना है।

 

Question 11. वेदान्त एवं कथ्यते
(अ) आरण्यकम्।
(ब) उपनिषद्
(स) ब्राह्मणम्।
(द) शिक्षा।
Answer: (ब) उपनिषद्
In simple words: उपनिषद को ही वेदांत भी कहते हैं। वेदांत का अर्थ है 'वेद का अंत' या 'वेद का सार'।

🎯 Exam Tip: उपनिषद वेदों के ज्ञानकाण्ड से संबंधित हैं और इनमें आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान तथा सृष्टि के रहस्यों पर गहन दार्शनिक विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

 

Question 12. उपलभ्यमानो निरुक्तग्रन्थोऽस्ति
(अ) याज्ञवल्क्यस्य
(ब) पराशरस्य
(स) पतञ्जलेः
(द) यास्कस्य।
Answer: (द) यास्कस्य।
In simple words: अभी जो निरुक्त ग्रंथ उपलब्ध है, वह यास्क ऋषि द्वारा लिखा गया है। यह ग्रंथ शब्दों के अर्थ की व्याख्या करता है।

🎯 Exam Tip: निरुक्त वेदांग का मुख्य कार्य वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति और उनके सही अर्थों को स्पष्ट करना है।

 

Question 13. कालविज्ञापकं शास्त्रं वर्तते-
(अ) ज्योतिषम्
(ब) छन्दः
(स) शिक्षा
(द) व्याकरणम्।
Answer: (अ) ज्योतिषम्
In simple words: वह शास्त्र जो समय का ज्ञान कराता है, उसे ज्योतिष कहते हैं। यह वेद के छह अंगों में से एक है।

🎯 Exam Tip: ज्योतिष वेदांग का मुख्य उद्देश्य यज्ञों और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए शुभ समय का निर्धारण करना है।

 

Question 2. 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' इति ब्रुवन् सामवेदस्य महिमा केन उद्घोषिताः?
Answer: 'वेदों में मैं सामवेद हूँ' ऐसा कहकर सामवेद की महिमा भगवान श्रीकृष्ण ने बताई है। यह कथन भगवद गीता से लिया गया है। इस कथन से सामवेद का महत्व और उसकी दिव्यता स्पष्ट होती है, क्योंकि स्वयं भगवान ने इसे अपनी विभूतियों में से एक बताया है।
In simple words: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था, "वेदों में मैं सामवेद हूँ।" इस बात से सामवेद का महत्व पता चलता है।

🎯 Exam Tip: यह उक्ति भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली है और सामवेद के आध्यात्मिक तथा दार्शनिक महत्व को स्थापित करती है।

 

Question 3. 'छन्दः शास्त्रम्' ग्रन्थः केन आचार्येण विरचितः?
Answer: 'छन्दः शास्त्रम्' ग्रंथ पिङ्गलाचार्य द्वारा लिखा गया है। यह ग्रंथ वैदिक और लौकिक छंदों के नियमों का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें मात्रा, वर्ण, गण आदि के आधार पर छंदों की संरचना को समझाया गया है।
In simple words: छंदों का शास्त्र 'पिंगलाचार्य' ने लिखा है। यह ग्रंथ छंदों के नियम बताता है।

🎯 Exam Tip: पिङ्गलाचार्य का 'छन्दः शास्त्रम्' भारतीय छंदशास्त्र का एक मानक ग्रंथ है, जिसका प्रयोग काव्य और मंत्रों की रचना में होता है।

 

Question 4. शिक्षा वेदस्य किं अस्ति?
Answer: शिक्षा वेद का घ्राणम् (नाक) है। यह वेद के छह अंगों में से एक है और इसका मुख्य कार्य वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण को सिखाना है। जैसे नाक से हम सांस लेते हैं, वैसे ही शिक्षा वेदों को सही ढंग से बोलने में मदद करती है।
In simple words: शिक्षा वेद की नाक है। यह हमें वेदमंत्रों का सही उच्चारण करना सिखाती है।

🎯 Exam Tip: वेदांगों को वेद के अंगों के रूप में कल्पित किया गया है, जिसमें प्रत्येक अंग का एक विशिष्ट कार्य होता है जो वेद के पूर्ण ज्ञान के लिए आवश्यक है।

 

Question 5. सूक्तमण्डलभेदेन कः वेदः विभक्तः?
Answer: सूक्त और मंडलों के भेद से ऋग्वेद विभाजित है। ऋग्वेद को दस मंडलों में बांटा गया है, और प्रत्येक मंडल में कई सूक्त होते हैं। यह विभाजन ऋग्वेद की सामग्री को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करता है।
In simple words: ऋग्वेद को सूक्त और मंडलों में बांटा गया है। इसमें दस मंडल और कई सूक्त हैं।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद का यह विभाजन उसकी विशालता और विषय-वस्तु की विविधता को दर्शाता है।

 

Question 6. वेदानां रचनाकालविषये तिलकमहोदयस्य मतं लिखत।
Answer: बाल गंगाधर तिलक ने वेदों के रचनाकाल के विषय में अपना मत प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, उन्होंने मृगशिरा नक्षत्र में वसंत संपात (वसंत विषुव) के साधक अनेक वेद वाक्यों को एकत्र किया। मृगशिरा में वसंत संपात का काल कृत्तिका नक्षत्र के काल से लगभग 2000 वर्ष पूर्व संभव है। इस गणना के आधार पर तिलक महोदय के मत में ऋग्वेद का रचनाकाल 6000 वर्ष पूर्व रहा होगा। यह मत ज्योतिषीय गणना पर आधारित है।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि ऋग्वेद 6000 साल पहले लिखा गया था। उन्होंने ज्योतिष की मदद से यह समय निकाला था।

🎯 Exam Tip: बाल गंगाधर तिलक का मत, ज्योतिषीय प्रमाणों पर आधारित होने के कारण, अन्य विद्वानों के मतों से भिन्न और विशिष्ट है।

 

Question 7. ऋग्वेदस्य प्रमुखचतसृणां शाखानां नामानि लिखत।
Answer: ऋग्वेद की प्रमुख चार शाखाओं के नाम हैं: शाकल, वाष्कल, आश्वलायन और शांखायन। ये शाखाएँ ऋग्वेद के विभिन्न पाठ और परंपराओं को दर्शाती हैं। माण्डूकायन भी एक अन्य शाखा है।
In simple words: ऋग्वेद की मुख्य शाखाएँ हैं: शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, और शांखायन।

🎯 Exam Tip: ऋग्वेद की विभिन्न शाखाएँ उसके पाठ और व्याख्या में थोड़ी भिन्नता दर्शाती हैं, लेकिन मूल संदेश एक ही रहता है।

 

Question 8. वेदशब्दस्य का व्युत्पत्तिः किञ्चार्थः?
Answer: 'वेद' शब्द 'विद्' धातु से बना है। 'विद्' धातु के कई अर्थ हैं, जैसे जानना (ज्ञान), प्राप्त करना (लाभ), विचार करना (सत्ता), और रहना (निवास)। इसलिए 'वेद' शब्द का अर्थ है 'ज्ञान का भंडार' या 'जिससे ज्ञान प्राप्त होता है'। यह ज्ञान अलौकिक और शाश्वत होता है, जो मनुष्य को सत्य की ओर ले जाता है।
In simple words: 'वेद' शब्द 'विद्' धातु से आता है, जिसका मतलब 'जानना' है। इसलिए वेद का मतलब है 'ज्ञान'।

🎯 Exam Tip: 'वेद' शब्द की व्युत्पत्ति और उसके बहुअर्थी होने के कारण इसकी व्यापकता को याद रखें, जो इसे केवल धार्मिक ग्रंथ से कहीं अधिक बनाता है।

 

Question 9. महर्षिणा शौनकेन सामविषये किम् उक्तम्?
Answer: महर्षि शौनक ने सामवेद के विषय में कहा है कि 'सामानि यो वेत्ति स वेदतत्त्वम्।' इसका अर्थ है कि जो साम को जानता है, वही वेदों के रहस्य को जानता है। यह कथन सामवेद के गहरे आध्यात्मिक महत्व को बताता है, क्योंकि यह न केवल गायन का शास्त्र है, बल्कि इसमें गूढ़ ज्ञान भी समाहित है।
In simple words: महर्षि शौनक ने कहा कि जो सामवेद को जानता है, वही वेदों का सच्चा ज्ञान रखता है।

🎯 Exam Tip: शौनक के इस कथन से सामवेद का महत्व स्पष्ट होता है कि यह केवल संगीत नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक ज्ञान का स्रोत है।

 

Question 10. यज्ञे कति ऋत्विजः भवन्ति? तेषां नामानि अपि लिखत।
Answer: यज्ञ में चार ऋत्विज होते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं:
• होता,
• अध्वर्युः,
• उद्गाता,
• ब्रह्मा च।
होता ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करता है, अध्वर्यु यजुर्वेद के मंत्रों के साथ कर्मकांड करता है, उद्गाता सामवेद के मंत्रों का गायन करता है, और ब्रह्मा अथर्ववेद के ज्ञाता के रूप में पूरे यज्ञ का निरीक्षण और मार्गदर्शन करता है।
In simple words: यज्ञ में चार मुख्य पंडित होते हैं: होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। ये सब अलग-अलग काम करते हैं।

🎯 Exam Tip: चारों ऋत्विजों के नाम और उनके संबंधित वेदों को याद रखें, क्योंकि वे यज्ञ के विभिन्न चरणों को संपन्न करते हैं।

 

Question 11. सामविकारः किम् कथ्यते? कतिविधाश्च सामविकाराः?
Answer: सामगान में संगीत के अनुरूप जो शाब्दिक परिवर्तन किए जाते हैं, उसे 'सामविकार' कहते हैं। सामविकार छह प्रकार के होते हैं: विकार, विश्लेषण, विकर्षण, अभ्यास, विराम और स्तोमरूपादयः। ये विकार सामवेद के मंत्रों को गाने की विशेष शैलियों को दर्शाते हैं। ये सामगान को और भी मधुर और प्रभावी बनाते हैं।
In simple words: सामगान में मंत्रों में जो बदलाव करके गाते हैं, उसे सामविकार कहते हैं। ये छह तरह के होते हैं।

🎯 Exam Tip: सामविकार सामगान की विशिष्टता का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो मंत्रों को संगीत के साथ जोड़ने में मदद करते हैं।

 

Question 12. ऋग्वेदस्य अथर्ववेदस्य च ब्राह्मणग्रन्थानां नामानि लिखत।।
Answer: ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ हैं: ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकि ब्राह्मण। अथर्ववेद का एक ब्राह्मण ग्रंथ है: गोपथ ब्राह्मण। ये ब्राह्मण ग्रंथ संबंधित वेदों के कर्मकांडों और मंत्रों की व्याख्या करते हैं।
In simple words: ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय और कौषीतकि हैं। अथर्ववेद का ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न वेदों के ब्राह्मण ग्रंथों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे प्रत्येक वेद की कर्मकांडीय परंपराओं का हिस्सा हैं।

 

Question 13. कीदृशाः ग्रन्थाः 'आरण्यकम्' कथ्यन्ते?
Answer: ऐसे ग्रंथ 'आरण्यक' कहलाते हैं जिनका अध्ययन और अध्यापन नगर और ग्राम से दूर वन में होता था। ये ग्रंथ वानप्रस्थियों द्वारा यज्ञों आदि के कर्मों का विवेचन करने वाले होते हैं। आचार्य सायण के मत के अनुसार, वनों में अध्यापन के कारण ही यह साहित्य 'आरण्यक' नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनमें आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों पर गहन चिंतन किया गया है।
In simple words: जो ग्रंथ जंगल में पढ़े-पढ़ाए जाते थे, उन्हें आरण्यक कहते हैं। इनमें वानप्रस्थियों के लिए यज्ञ और आध्यात्मिक बातों पर चर्चा होती थी।

🎯 Exam Tip: आरण्यक ग्रंथों का संबंध वनों में किए जाने वाले आध्यात्मिक चिंतन और यज्ञों के प्रतीकात्मक अर्थों से है, जो उपनिषदों के ज्ञान का आधार बने।

 

Question 14. का विद्या उपनिषद् कथ्यते?
Answer: वह विद्या जो परंपरा से गुरु के समीप बैठकर प्राप्त की जाती है, और जिससे सभी अनर्थ उत्पन्न करने वाली सांसारिक क्रियाओं का नाश होता है, संसार के कारणभूत अविद्या का बंधन शिथिल होता है, और ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, वही विद्या उपनिषद कहलाती है। इसमें ब्रह्म, जीव और जगत से संबंधित गहन रहस्यों का विवेचन किया गया है। यह मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है।
In simple words: वह विद्या जो गुरु से पास बैठकर सीखी जाती है, जिससे बुरे विचारों का नाश होता है, और ब्रह्म का ज्ञान होता है, उसे उपनिषद कहते हैं।

🎯 Exam Tip: उपनिषद विद्या आत्मज्ञान और परब्रह्म के ज्ञान पर केंद्रित है, जिसका लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है।

 

Question 16. श्रौतसूत्रेषु के विषयाः विवेचिताः सन्ति?
Answer: श्रौतसूत्रों में, अग्नित्रयाधानम्, अग्निहोत्रम्, दर्शपूर्णमासौ, पशुयागः और कई प्रकार के सोमयाग जैसे विषय विस्तार से समझाए गए हैं। ये प्राचीन वैदिक कर्मकांडों की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, जो यज्ञों की विधियों को स्पष्ट करते हैं।
In simple words: श्रौतसूत्र उन नियमों के बारे में बताते हैं जो यज्ञों को सही तरीके से करने के लिए आवश्यक हैं। इनमें कई तरह के यज्ञों की पूरी जानकारी दी गई है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय, श्रौतसूत्रों में वर्णित मुख्य यज्ञों के नामों को स्पष्ट रूप से लिखें ताकि पूर्ण अंक प्राप्त हो सकें।

 

Question 17. ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः महर्षयः के सन्ति?
Answer: ज्योतिष शास्त्र के मुख्य प्रवर्तक महर्षि ये हैं: सूर्य, पितामह, व्यास, वसिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा, लोमश, पौलिश, च्यवन, यवन, भृगु और शौनक। ये सभी प्राचीन काल के विद्वान थे जिन्होंने ज्योतिष के ज्ञान को आगे बढ़ाया और वेदों में छिपे खगोलीय ज्ञान को जन सामान्य तक पहुँचाया।
In simple words: ज्योतिष विज्ञान को शुरू करने वाले कई बड़े ऋषि-मुनि थे। इनमें सूर्य, व्यास, वसिष्ठ और कश्यप जैसे कई ज्ञानी लोग शामिल थे, जिन्होंने इस विद्या को फैलाया।

🎯 Exam Tip: ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है। कुछ प्रमुख नामों को सही ढंग से प्रस्तुत करने से उत्तर प्रभावी होता है।

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Detailed Explanations for वैदिकसाहित्यम्

Our expert teachers have provided step-by-step explanations for all the difficult questions in the Class 12 Sanskrit chapter. Along with the final answers, we have also explained the concept behind it to help you build stronger understanding of each topic. This will be really helpful for Class 12 students who want to understand both theoretical and practical questions. By studying these RBSE Questions and Answers your basic concepts will improve a lot.

Benefits of using Sanskrit Class 12 Solved Papers

Using our Sanskrit solutions regularly students will be able to improve their logical thinking and problem-solving speed. These Class 12 solutions are a guide for self-study and homework assistance. Along with the chapter-wise solutions, you should also refer to our Revision Notes and Sample Papers for वैदिकसाहित्यम् to get a complete preparation experience.

FAQs

Where can I find the latest RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् for the 2026-27 session?

The complete and updated RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 12 Sanskrit are as per latest RBSE curriculum.

Are the Sanskrit RBSE solutions for Class 12 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Sanskrit concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 12 RBSE solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using RBSE language because RBSE marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 12 Sanskrit. You can access RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Sanskrit RBSE solutions for Class 12 as a PDF?

Yes, you can download the entire RBSE Solutions Class 12 Sanskrit वैदिकसाहित्यम् in printable PDF format for offline study on any device.