RBSE Solutions Class 12 Practical Geography Chapter 4 सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना तन

Step-by-Step Textbook Solutions for Class 12 Geography Chapter 04 सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना तन

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RBSE Class 12 Pratical Geography Chapter 4 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

 

Question 1. सुदूर संवेदन से आप क्या समझते हैं ?
Answer: सुदूर संवेदन का अर्थ है किसी वस्तु को बिना छुए, दूर से ही उसके बारे में जानकारी या सूचनाएँ प्राप्त करना। इसमें कृत्रिम उपग्रहों, हवाई जहाजों या अन्य प्लेटफार्मों पर लगे विशेष उपकरणों (संवेदकों) का उपयोग करके पृथ्वी की सतह की विशेषताओं और अन्य जानकारियों को जमा किया जाता है। इससे आंकड़े और चित्र तैयार किए जाते हैं, और फिर इन प्राप्त तथ्यों की व्याख्या की जाती है। यह तकनीक पर्यावरण निगरानी और संसाधन प्रबंधन में बहुत उपयोगी है। सुदूर संवेदन में इन सभी गतिविधियों को शामिल किया जाता है।
In simple words: सुदूर संवेदन मतलब किसी चीज को बिना छुए, दूर से ही उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करना. इसमें उपग्रहों या विमानों से खास उपकरण डेटा लेते हैं, फिर उसका विश्लेषण होता है.

🎯 Exam Tip: सुदूर संवेदन की परिभाषा लिखते समय 'स्पर्श किए बिना' और 'सूचनाएँ प्राप्त करना' जैसे मुख्य शब्दों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. सुदूर संवेदन के वायुमंडलीय प्लेटफॉर्म कौन से हैं?
Answer: सुदूर संवेदन के वायुमंडलीय प्लेटफॉर्म नीचे दिए गए हैं:
1. गुब्बारे
2. हेलीकॉप्टर
3. ड्रोन
ये सभी प्लेटफॉर्म पृथ्वी की सतह से अपेक्षाकृत कम ऊँचाई पर रहकर डेटा इकट्ठा करने में मदद करते हैं. ये छोटे क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी देने के लिए विशेष रूप से उपयोगी होते हैं. गुब्बारे और हेलीकॉप्टर अक्सर शोध के लिए उपयोग किए जाते हैं, जबकि ड्रोन अब कृषि और निगरानी जैसे कामों में काफी प्रचलित हो गए हैं. इनके माध्यम से वास्तविक समय में सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं.

🎯 Exam Tip: वायुमंडलीय प्लेटफॉर्म उन उपकरणों को कहते हैं जो वायुमंडल के भीतर रहकर काम करते हैं, जबकि अंतरिक्ष प्लेटफॉर्म वायुमंडल के बाहर काम करते हैं.

 

Question 3. सुदूर संवेदन की प्रक्रियाओं को स्पष्ट कीजिए।
Answer: सुदूर संवेदन एक वैज्ञानिक विधि है जिसमें दूर से लगे संवेदकों द्वारा परावर्तित प्रकाश के आवेगों का विश्लेषण किया जाता है. इससे किसी स्थान, वस्तु या घटना से जुड़ी जानकारी आंकड़े या छवियों के रूप में प्राप्त की जाती है. इस प्रक्रिया में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा, जो गर्मी या प्रकाश के रूप में होती है, तरंगों के रूप में चलती है. यह ऊर्जा पृथ्वी की विभिन्न वस्तुओं से टकराकर प्रतिक्रिया करती है, और यह प्रतिक्रिया हर वस्तु के लिए अलग होती है. पृथ्वी की सतह और आने वाली ऊर्जा की इस परस्पर क्रिया से विद्युत चुम्बकीय आवेग पैदा होते हैं, जो वापस संवेदक तक पहुंचते हैं. इन आवेगों को ग्रहण करने के लिए सुदूर संवेदन में उपयुक्त प्लेटफॉर्म (जैसे उपग्रह) चुने जाते हैं. वहां स्थिर संवेदक इन परावर्तित आवेगों को डिजिटल रूप में रिकॉर्ड करते हैं. इन सभी जानकारियों को भू-आंकड़ा केंद्रों में कंप्यूटर में सुरक्षित रखा जाता है. यह पूरी प्रक्रिया हमें पृथ्वी की विशेषताओं को समझने में मदद करती है.
In simple words: सुदूर संवेदन में, दूर से लगे उपकरण प्रकाश की तरंगों को पकड़ते हैं. ये तरंगें पृथ्वी की चीजों से टकराकर वापस आती हैं. इन तरंगों का विश्लेषण करके हम उस जगह की जानकारी पाते हैं, जिसे बाद में कंप्यूटर में सेव कर लिया जाता है.

🎯 Exam Tip: प्रक्रिया समझाते समय विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा, संवेदक, परावर्तन और डिजिटल रिकॉर्डिंग जैसे प्रमुख चरणों को क्रम से बताना चाहिए.

 

Question 4. भारत में सुदूर संवेदन कार्यक्रम के प्रारंभिक विकास पर लेख लिखिए।
Answer: भारत सुदूर संवेदन के क्षेत्र में दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण देशों में से एक है. भारत के पास ऐसी तकनीक है जिससे वह विदेशी उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में स्थापित कर सकता है. भारत में सुदूर संवेदन कार्यक्रम के शुरुआती विकास का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:
1. सुदूर संवेदन तकनीक के विकास में होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम साराभाई, पी. रामा पिसरोतय, यू. आर. राव, सतीश धवन और कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन जैसे वैज्ञानिकों ने बहुत बड़ा योगदान दिया.
2. पी. रामा पिसरोतय ने सबसे पहले सुदूर संवेदन तकनीक का उपयोग नारियल की खेती में लगने वाली बिल्ट रूट बीमारी को पहचानने के लिए किया था.
3. 1960 के दशक में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हवाई जहाजों में लगे संवेदकों का उपयोग करके देश के कई हिस्सों में कृषि भूमि के उपयोग, वनों के प्रकार, मिट्टियों के प्रकार और प्रदूषण के बारे में जानकारी के लिए हवाई सर्वेक्षण किए.
4. अंतरिक्ष से सुदूर संवेदन का काम भारत में 1975 में शुरू हुआ, जब इसरो ने आर्यभट्ट नामक पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा.
5. इसरो ने जुलाई 1979 में भास्कर-1 और अप्रैल 1983 में भास्कर-2 को रूस के रॉकेटों की मदद से अंतरिक्ष में भेजा.
6. मई 1981 में इसरो ने रोहिणी श्रृंखला के RS - D1 और RS - D2 उपग्रहों को श्री हरिकोटा से SLV - 3 रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में भेजा. ये उपग्रह पूरी तरह से भारत में ही बने थे.
7. भारतीय अंतरिक्ष विभाग ने 75 केंद्र और 8000 से ज्यादा टेलीफोन सर्किट जोड़े हुए हैं.
8. इनसेट - IC और इनसेट - I को फ्रेंच गुयाना के कोरू केंद्र से लॉन्च किया गया था. इनसेट - 2 श्रृंखला का आखिरी उपग्रह 2E भी 3 अप्रैल, 1999 को कोरू से ही भेजा गया था. इससे दूरदर्शन और दूरसंचार के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई.
9. 1988 से 26 मई, 1999 तक इसरो ने सात उपग्रहों को ध्रुवीय और वृत्ताकार सूर्य-तुल्यकालिक कक्षाओं में स्थापित किया. इनमें चार IRS - 1 और तीन IRS – P श्रृंखला के उपग्रह थे.
10. इसरो ने 1994 में सूर्य-तुल्यकालिक उपग्रहों की नई श्रृंखला IRS – P शुरू की. 26 मई, 1994 तक इस श्रृंखला के IRS-P2, IRS – P3 और IRS-P4 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जा चुके थे. यह सभी प्रयास भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक थे.
11. 26 मई, 1999 को इसरो ने अपनी स्वदेशी तकनीक से बने PSLV - 2C रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा के शार केंद्र से एक साथ तीन सुदूर संवेदन उपग्रह भेजे:
1. भारत का IRS – P4
2. कोरिया का KITSAT
3. जर्मनी का TUBSAT
इन सभी उपग्रहों को सफलतापूर्वक उनकी अपनी-अपनी सूर्य-तुल्यकालिक कक्षाओं में स्थापित करके भारत ने विश्व में प्रशंसा बटोरी. पिछले 15 सालों में भारत ने सुदूर संवेदन के क्षेत्र में बहुत बड़ी सफलताएँ हासिल की हैं.
In simple words: भारत में सुदूर संवेदन कार्यक्रम 1960 के दशक में शुरू हुआ था, जिसमें भाभा और साराभाई जैसे वैज्ञानिकों ने योगदान दिया. पहले हवाई सर्वेक्षण हुए, फिर 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह भेजा गया. इसरो ने कई स्वदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे, जिससे भारत ने इस क्षेत्र में बड़ी तरक्की की.

🎯 Exam Tip: भारत के सुदूर संवेदन कार्यक्रम के विकास को समझाने के लिए प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम, महत्वपूर्ण उपग्रहों के नाम, और उनकी लॉन्चिंग के वर्ष याद रखना जरूरी है.

 

Question 5. भौगोलिक सूचना तंत्र क्या है?
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) एक ऐसी प्रणाली है जो सुदूर संवेदन तकनीक से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करके नतीजे तक पहुँचने में मदद करती है. इसमें पृथ्वी की सतह से जुड़े डेटा को दर्ज करना, जमा करना, उसे व्यवस्थित करना, विश्लेषण करना और दिखाना जैसे सभी काम शामिल हैं. भौगोलिक सूचना तंत्र सूचनाओं का एक बहुत बड़ा भंडार है. इसमें स्थानीय डेटा और विशेष जानकारियों की स्थिति का पता लगाकर पृथ्वी से संबंधित डेटा को इकट्ठा करना, जमा करना, जांचना, समन्वय करना, बदलाव करना, विश्लेषण करना और दिखाना शामिल होता है. यह सिस्टम हमें भौगोलिक जानकारी को बेहतर तरीके से समझने और उपयोग करने में सहायता करता है.
In simple words: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) एक कंप्यूटर सिस्टम है जो भौगोलिक जानकारी को इकट्ठा करता है, जमा करता है, उसका विश्लेषण करता है और उसे दिखाता है. यह हमें पृथ्वी से जुड़ी चीजों को समझने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: GIS की परिभाषा में डेटा संग्रह, विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण जैसे मुख्य कार्य शामिल होने चाहिए.

 

Question 6. भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) की परिभाषा बताइए।
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) की परिभाषा कई विद्वानों ने दी है, जिनमें क्लार्क, बुरों, एरोनोफ, पार्कर, गुड चाइल्ड, स्मिथ और डी. डी. चौनियाल प्रमुख हैं. पार्कर के अनुसार, "कोई भी सूचना तकनीक जो पृथ्वी की सतह और नीचे की सतह के डेटा को इकट्ठा करती है, विश्लेषण करती है और दिखाती है, उसे GIS कहते हैं." पार्कर ने यह भी कहा है कि भौगोलिक सूचना तंत्र एक ऐसी सूचना तकनीकी विज्ञान है जो स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा को इकट्ठा करने, विश्लेषण करने और प्रस्तुत करने में सक्षम है. यह हमें भूगोलीय डेटा को व्यवस्थित रूप से समझने और उपयोग करने की शक्ति प्रदान करता है.
In simple words: GIS वह तकनीक है जो जमीन और उसके नीचे के डेटा को इकट्ठा करती है, जाँचती है और दिखाती है. यह स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा को समझने में मददगार है.

🎯 Exam Tip: GIS की परिभाषा देते समय 'स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा' तथा 'संग्रह, विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण' जैसे शब्दों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है.

 

Question 7. भौगोलिक सूचना तंत्र से क्या लाभ है?
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) से मिलने वाले मुख्य लाभ नीचे दिए गए हैं:
1. उपयोगकर्ता संबंधित स्थानीय जगहों के बारे में सवाल पूछ सकते हैं और उनसे जुड़े गुणों या विशेषताओं को देखकर उनका विश्लेषण कर सकते हैं.
2. सूचनाओं का विश्लेषण करके उन्हें मानचित्र पर आसानी से दिखाया जा सकता है.
3. स्थानिक ऑपरेटरों का उपयोग करके नए डेटा समूह बनाए जा सकते हैं.
4. अलग-अलग डेटा आइटम को एक-दूसरे के साथ जोड़ा जा सकता है. GIS, योजना बनाने, निर्णय लेने और पर्यावरण को समझने में बहुत सहायक है.
In simple words: GIS हमें किसी जगह के बारे में सवाल पूछने, जानकारी को नक़्शे पर देखने, नया डेटा बनाने और अलग-अलग जानकारियों को जोड़ने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: लाभों को संक्षेप में बताएं और यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक बिंदु GIS के एक विशिष्ट फायदे को दर्शाता हो.

 

Question 8. भौगोलिक सूचना तंत्र के कौन-कौन से प्रकार हैं?
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र से मुख्य रूप से दो प्रकार के डेटा मिलते हैं:
1. स्थानीय आंकड़े: ये वे आंकड़े होते हैं जिन्हें उनकी जगह, रेखाओं, क्षेत्रों और बनावट के आधार पर दिखाया जाता है. जैसे, किसी सड़क का नक्शा या किसी जंगल का आकार. ये आंकड़े सीधे भौगोलिक स्थिति से जुड़े होते हैं.
2. गैर-स्थानीय आंकड़े: इनमें मात्रा, संख्या और विशेष विवरण होता है, जो सीधे भौगोलिक स्थिति से संबंधित नहीं होते. उदाहरण के लिए, किसी शहर की जनसंख्या या साक्षरता दर. भौगोलिक सूचना तंत्र में गुणों और उनकी श्रेणियों को भी शामिल किया जाता है. बाईं ओर अक्सर गैर-स्थानिक आंकड़े दिखाए जाते हैं, जबकि दाहिनी ओर स्थानीय आंकड़े जैसे राज्यों की जनसंख्या और साक्षरता आदि को दिखाया जाता है. दोनों प्रकार के डेटा मिलकर पूरी जानकारी को समझने में मदद करते हैं.
In simple words: भौगोलिक सूचना तंत्र दो तरह के डेटा देता है: स्थानीय डेटा (जगह से जुड़ा) और गैर-स्थानीय डेटा (मात्रा या विवरण).

🎯 Exam Tip: इन दो प्रकारों के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए सरल उदाहरणों का उपयोग करें.

 

Question 9. चित्र रेखा पुंज एवं सदिश आंकडा मॉडल के मध्य कोई चार अन्तर बताइए।
Answer: चित्र रेखा पुंज (Raster) एवं सदिश (Vector) आंकड़ा मॉडल में मुख्य चार अंतर नीचे दिए गए हैं:

चित्र रेखापुंज (Raster)सदिश (Vector) आंकडा मॉडल
1. इसमें डेटा को ग्रिड (जाल) के रूप में ग्राफिक्स द्वारा दिखाया जाता है.1. एक सदिश आंकड़ा मॉडल डेटा को बिंदुओं का उपयोग करके दिखाता है. इसमें रेखाओं और क्षेत्रों का निर्माण होता है.
2. इसे दिखाने के लिए बहुत ज्यादा जगह (मेमोरी) की आवश्यकता होती है.2. इसे दिखाने के लिए कम जगह (मेमोरी) की आवश्यकता होती है.
3. मिश्रित सेल्स (कोशिकाओं) की स्थिति में गलतियाँ आ सकती हैं.3. यह किसी जगह की बनावट को दिखाने और विश्लेषण करने में अधिक सही होता है.
4. डेटा को जमा करने के लिए अच्छी मेमोरी व्यवस्था चाहिए होती है.4. इसमें कम मेमोरी की आवश्यकता होती है.


दोनों मॉडल के फायदे और नुकसान हैं, और उनका चुनाव उपयोग पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए, तस्वीरों या ऊंचाई के डेटा के लिए रास्टर मॉडल अच्छा होता है, जबकि सीमाओं या सड़कों के लिए सदिश मॉडल बेहतर होता है.
In simple words: रास्टर मॉडल डेटा को छोटे चौकोर (पिक्सेल) में दिखाता है, जबकि सदिश मॉडल डेटा को बिंदुओं, रेखाओं और क्षेत्रों के रूप में दिखाता है. रास्टर को ज्यादा मेमोरी चाहिए और उसमें गलतियाँ हो सकती हैं, जबकि सदिश कम मेमोरी लेता है और ज्यादा सटीक होता है.
🎯 Exam Tip: तुलनात्मक प्रश्नों में हमेशा दोनों पक्षों के बराबर बिंदुओं को स्पष्ट और संक्षिप्त तरीके से प्रस्तुत करें.

 

Question 10. भौगोलिक सूचना तंत्र के मुख्य घटक कौन से हैं?
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) के मुख्य चार घटक नीचे दिए गए हैं:
1. हार्डवेयर: इसमें वे सभी भौतिक उपकरण आते हैं जो डेटा को प्रोसेस करते हैं, दिखाते हैं, इनपुट और आउटपुट करते हैं. जैसे कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर. यह डेटा को दर्ज करने, संपादित करने, विश्लेषण करने और बदलने में मदद करता है.
2. सॉफ्टवेयर: ये वे प्रोग्राम होते हैं जो GIS को चलाने में मदद करते हैं. यह व्यक्तिगत कंप्यूटर से लेकर बड़े सुपर कंप्यूटर तक पर काम कर सकता है. इसमें डेटा प्रबंधन और विश्लेषण के लिए जरूरी टूल्स होते हैं, जो GIS को प्रभावी बनाते हैं.
3. आंकड़े: GIS में स्थानिक (जगह से जुड़े) और गैर-स्थानिक (जगह से सीधे जुड़े नहीं) दोनों तरह के डेटा की जानकारी होती है. यह डेटा ही GIS का आधार होता है.
4. व्यक्ति: GIS को चलाने और उपयोग करने वाले लोग इसके महत्वपूर्ण घटक हैं. इसमें एक व्यक्ति से लेकर बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ शामिल हो सकती हैं. ये लोग GIS की योजना बनाते हैं, उसे लागू करते हैं और परिणामों का विश्लेषण करते हैं. इन सभी घटकों का एक साथ काम करना GIS को सफल बनाता है.
In simple words: GIS के चार मुख्य हिस्से हैं: हार्डवेयर (कंप्यूटर), सॉफ्टवेयर (प्रोग्राम), आंकड़े (जानकारी), और व्यक्ति (उपयोगकर्ता). ये सब मिलकर GIS को काम करने में मदद करते हैं.

🎯 Exam Tip: GIS के घटक बताते समय, प्रत्येक घटक का एक संक्षिप्त विवरण देना आवश्यक है कि वह GIS में क्या भूमिका निभाता है.

 

Question 11. चित्र रेखा पुंज (Raster) संरचना के कोई दो गुण व दो दोष निम्नानुसार हैं-
Answer: चित्र रेखा पुंज (Raster) संरचना के दो गुण और दो दोष इस प्रकार हैं:
गुण:
1. इसमें डेटा को वर्गों के जाल (ग्रिड) के रूप में ग्राफिक्स द्वारा दिखाया जाता है. यह चित्रों और स्कैन की गई तस्वीरों को दिखाने के लिए बहुत अच्छा होता है.
2. इसकी पंक्तियों और स्तंभों में निर्देशांक किसी भी छोटे पिक्सेल की पहचान कर सकते हैं. इससे हर बिंदु की स्थिति आसानी से पता चल जाती है.
दोष:
1. इसमें नेटवर्क संबंधों को ठीक से नहीं दिखाया जा सकता है. यह सड़कों या नदियों के नेटवर्क जैसे जटिल संबंधों को दर्शाने में मुश्किल पैदा करता है.
2. मिश्रित सेल्स (कोशिकाओं) की स्थिति में अशुद्धियाँ आ जाती हैं. जब एक पिक्सेल में एक से ज़्यादा तरह की जानकारी हो, तो सटीकता कम हो जाती है.
रास्टर डेटा मॉडल सरल होते हैं और इमेज प्रोसेसिंग के लिए उपयुक्त होते हैं, लेकिन बड़ी फाइलों और कुछ भौगोलिक विश्लेषणों के लिए इनकी सीमाएं होती हैं.
In simple words: रास्टर डेटा ग्रिड में चित्र दिखाता है और हर बिंदु को पहचानता है. लेकिन यह नेटवर्क अच्छे से नहीं दिखाता और मिक्स जानकारी में गलतियाँ हो सकती हैं.

🎯 Exam Tip: रास्टर संरचना के गुणों और दोषों को याद करते समय, इसे पिक्सेल-आधारित इमेजिंग से जोड़कर देखें, जिससे समझना आसान हो जाएगा.

 

Question 12. सदिश (Vector) संरचना के कोई दो गुण व दो दोष बताइए।
Answer: सदिश (Vector) संरचना के दो गुण और दो दोष इस प्रकार हैं:
गुण:
1. यह सांस्कृतिक लक्षणों को दिखाने के लिए बहुत उपयोगी है. जैसे, सड़कों, इमारतों या प्रशासनिक सीमाओं को सटीक रूप से दिखाना.
2. सदिश संरचना में भौगोलिक स्थितियों से संबंधित डेटा को जमा किया जाता है. ये डेटा बहुत सटीक होते हैं, इसलिए इन्हें और सरल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती और इनके ग्राफ भी देखने में सुंदर लगते हैं. इससे विवरणों की सटीकता बनी रहती है.
दोष:
1. इसकी प्रक्रिया जटिल होती है और इसे बदलना भी मुश्किल होता है. एक बार डेटा बनने के बाद, उसमें बड़े बदलाव करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
2. डेटा का विश्लेषण और गणना एक जटिल प्रक्रिया है. रास्टर डेटा की तुलना में, सदिश डेटा पर कुछ विश्लेषण करना अधिक मुश्किल होता है.
सदिश मॉडल भूगर्भीय मानचित्रण, शहरी नियोजन, और भूमि उपयोग के विश्लेषण जैसे कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त है.
In simple words: सदिश डेटा सांस्कृतिक चीजों को अच्छे से दिखाता है और बहुत सटीक होता है, जिससे सुंदर ग्राफ बनते हैं. लेकिन इसे बदलना मुश्किल है और इसका विश्लेषण भी जटिल होता है.

🎯 Exam Tip: सदिश संरचना के गुणों में सटीकता और स्पष्टता पर जोर दें, जबकि दोषों में जटिलता और संशोधन में कठिनाई को उजागर करें.

 

Question 13. भौगोलिक सूचना तंत्र की क्रियाओं का अनुक्रम बताइए।
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) की क्रियाओं का क्रम नीचे दिया गया है:
1. स्थानिक आंकड़ा निवेश (Spatial Data Input): सबसे पहले भौगोलिक डेटा को सिस्टम में डाला जाता है. यह डेटा नक्शे, उपग्रह चित्र या हवाई तस्वीरों से आ सकता है.
2. गुण व्यास की प्रविष्टि (Entering of the Attribute Data): इसके बाद स्थानिक डेटा से जुड़ी गैर-स्थानिक जानकारी (जैसे जनसंख्या, फसल का प्रकार) दर्ज की जाती है. यह डेटा तालिका के रूप में होता है. यह अनुक्रम GIS को व्यवस्थित रूप से काम करने में मदद करता है और सटीक विश्लेषण प्रदान करता है.
यह प्रक्रिया GIS को प्रभावी ढंग से कार्य करने और विभिन्न भौगोलिक विश्लेषणों को पूरा करने में सक्षम बनाती है.
In simple words: GIS के काम करने का तरीका पहले जगह की जानकारी डालना (स्पेशल डेटा), फिर उससे जुड़ी दूसरी जानकारी (एट्रीब्यूट डेटा) डालना है.

🎯 Exam Tip: GIS क्रियाओं का अनुक्रम बताते समय, स्थानिक डेटा और गुण डेटा के बीच के संबंध को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है.

 

Question 14. भौगोलिक सूचना तंत्र के उपयोग के क्षेत्र बताइये।
Answer: भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) के उपयोग के क्षेत्र नीचे दिए गए हैं:
1. वन संसाधनों के संरक्षण व प्रबन्धन में:
• वनाग्नि मानचित्र (जंगल की आग के नक्शे बनाना)
• जैव विविधता का संरक्षण (विभिन्न जीव-जंतुओं और पौधों को बचाना)
• पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन (पर्यावरण पर पड़ रहे असर को जानना)
• वन आवरण मानचित्र (जंगलों के फैलाव के नक्शे)
2. जल संसाधन संरक्षण व नियोजन में:
• धरातलीय जल संसाधन का मानचित्रण (जमीन पर मौजूद पानी के स्रोतों के नक्शे बनाना)
• बाढ़ से हानि का मूल्यांकन (बाढ़ से होने वाले नुकसान का अनुमान लगाना)
• जलग्रहण प्राथमिकता (पानी इकट्ठा करने वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देना)
• बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का मानचित्रण (बाढ़ प्रभावित इलाकों के नक्शे बनाना)
3. मृदा संसाधन संरक्षण में:
• मृदा मानचित्र (मिट्टी के नक्शे बनाना)
• मृदा का आकलन (मिट्टी की गुणवत्ता की जांच करना)
• लवणीय तथा क्षारीय मृदाओं का मानचित्र (खारी और क्षारीय मिट्टी के नक्शे बनाना)
• भू-सिंचाई योग्यता मानचित्र (जमीन की सिंचाई क्षमता के नक्शे बनाना)
4. कृषि संसाधन संरक्षण में:
• फसल क्षेत्र के उत्पादन का आकलन (फसल पैदावार का अनुमान लगाना)
• सूखे का मूल्यांकन (सूखे के असर की जांच करना)
• फसल उत्पादकता मॉडलों का विकास (फसल की पैदावार बढ़ाने के तरीके खोजना)
GIS इन सभी क्षेत्रों में डेटा-आधारित निर्णय लेने में मदद करता है, जिससे संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो पाता है. यह हमें प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और विकास योजनाओं को बेहतर बनाने में भी सहायता करता है.
In simple words: GIS का उपयोग जंगल, पानी, मिट्टी और खेती के संसाधनों को बचाने और उनका सही इस्तेमाल करने में होता है. इससे आग, बाढ़, सूखा जैसी समस्याओं को समझने और उनसे निपटने में मदद मिलती है.

🎯 Exam Tip: GIS के उपयोग के क्षेत्रों को याद करते समय, हर क्षेत्र के तहत कम से कम दो या तीन विशिष्ट उदाहरणों को याद रखना फायदेमंद होता है.

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