Official RBSE Solutions for Class 12 Political Science: Chapter 24 जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता
Review structured textbook solutions for Class 12 Political Science Chapter 24 जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता. Built according to RBSE guidelines for the 2026-27 academic year, these downloadable answers support daily revision and problem-solving accuracy.
Chapter-wise Solutions for Political Science: Chapter 24 जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता
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Question 1. जाति भारत में एक महत्वपूर्ण दल है। निम्न में से किस विद्वान ने कहा है?
(अ) महात्मा गाँधी
(ब) स्वामी विवेकानन्द
(स) जयप्रकाश नारायण
(द) सरदार पटेल
Answer: (अ) महात्मा गाँधी
In simple words: महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि भारत में जाति एक बहुत जरूरी समूह है। उनका मानना था कि जाति भारतीय समाज और राजनीति में एक बड़ा रोल निभाती है।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में अक्सर समाजशास्त्र या राजनीति विज्ञान के प्रमुख विचारकों के कथन पूछे जाते हैं। नाम और उनके विचारों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. भारत विभाजन का प्रमुख कारण क्या था?
(अ) जातिवाद
(ब) साम्प्रदायिकता
(स) भाषावाद
(द) भ्रष्टाचार
Answer: (स) भाषावाद
In simple words: भारत का विभाजन मुख्य रूप से भाषा के अंतर के कारण हुआ था। विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले लोगों के बीच अपनी-अपनी पहचान को लेकर मतभेद थे, जो विभाजन का एक कारण बने।
🎯 Exam Tip: भारत विभाजन के कारणों पर आधारित प्रश्न में दिए गए विकल्पों पर ध्यान दें, क्योंकि कभी-कभी उत्तर सबसे स्पष्ट कारण की बजाय किसी अन्य महत्वपूर्ण कारक को दर्शाता है।
Question 5. गुजरात के गोधरा में साम्प्रदायिक घटना हुई
(अ) फरवरी 2000
(ब) मार्च 2001
(स) फरवरी 1992
(द) दिसम्बर 1995
Answer: (अ) फरवरी 2000
In simple words: गुजरात के गोधरा शहर में बड़ी साम्प्रदायिक घटना फरवरी 2000 में हुई थी। इस घटना से पूरे राज्य में तनाव फैल गया था।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और उनके सही समय को याद रखना जरूरी है, खासकर जब घटनाओं की तिथियाँ पूछी जाएँ।
Question 6. साम्प्रदायिकता का प्रमुख दुष्परिणाम होता है
(अ) राजनीतिक अस्थिरता
(ब) राष्ट्रीय एकता में बाधा
(स) आर्थिक हानि
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (ब) राष्ट्रीय एकता में बाधा
In simple words: साम्प्रदायिकता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह देश की एकता को तोड़ देती है। जब लोग धर्म के नाम पर बंट जाते हैं, तो वे एक साथ मिलकर काम नहीं कर पाते, जिससे देश कमजोर होता है।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों पर प्रश्न आने पर, राष्ट्रीय एकता पर पड़ने वाले प्रभाव को मुख्य बिंदु के रूप में उजागर करें।
Question 7. पूना पैक्ट जिन नेताओं के बीच हुआ, वे हैं-
(अ) पं. जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार पटेल
(ब) महात्मा गांधी एवं अम्बेडकर
(स) तिलक एवं लाला लाजपत राय
(द) इंदिरा गाँधी एवं वाजपेयी
Answer: (अ) पं. जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार पटेल
In simple words: पूना पैक्ट का समझौता पं. जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल के बीच हुआ था। यह एक महत्वपूर्ण समझौता था जिसने देश की राजनीति पर असर डाला।
🎯 Exam Tip: प्रसिद्ध समझौतों और उनमें शामिल प्रमुख नेताओं के नाम को सही ढंग से याद करें।
RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. जातिवाद किसे कहते हैं?
Answer: जातिवाद का अर्थ है अपनी जाति के प्रति बहुत गहरा लगाव रखना। इसका मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति अपनी जाति को बहुत ज्यादा महत्व देता है और दूसरी जातियों को कमतर समझता है। यह भावना समाज में भेदभाव को बढ़ाती है।
In simple words: जब कोई अपनी जाति से बहुत अधिक जुड़ाव महसूस करता है और उसे दूसरों से बेहतर समझता है, तो इसे जातिवाद कहते हैं।
🎯 Exam Tip: जातिवाद की परिभाषा देते समय 'अत्यधिक लगाव' और 'अन्य जातियों के प्रति उपेक्षा' जैसे कीवर्ड्स का प्रयोग करें।
Question 2. वैदिक काल में जाति का आधार क्या होता था?
Answer: वैदिक काल में जाति का आधार व्यक्ति के कर्म और उसके व्यवसाय पर निर्भर करता था। जन्म से नहीं, बल्कि लोग अपने काम के हिसाब से अपनी जाति तय करते थे। यह व्यवस्था लोगों को अपनी रुचि के अनुसार काम करने की आजादी देती थी।
In simple words: वैदिक काल में जाति, व्यक्ति के काम और पेशे से तय होती थी।
🎯 Exam Tip: वैदिक काल में जाति व्यवस्था की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए 'कर्म' और 'व्यवसाय' जैसे शब्दों का उपयोग करें।
Question 3. सांप्रदायिकता किसे कहते हैं?
Answer: सांप्रदायिकता एक ऐसी सोच है जहाँ कोई व्यक्ति या समूह अपने धर्म या भाषा के हितों को राष्ट्र के बाकी हितों से ज्यादा महत्व देता है। इसका मतलब है कि वे अपने समुदाय के लाभ को पूरे देश के लाभ से ऊपर रखते हैं। यह भावना समाज में बंटवारा पैदा करती है।
In simple words: सांप्रदायिकता वह भावना है जब लोग अपने धर्म या भाषा को देश के हितों से बढ़कर मानते हैं।
🎯 Exam Tip: सांप्रदायिकता की परिभाषा में 'धर्म/भाषा के आधार पर अपने हितों को प्राथमिकता देना' और 'राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा' जैसे तत्वों को शामिल करें।
Question 4. ब्रिटिश सरकार की कौन - सी नीति ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है?
Answer: ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने भारत में सांप्रदायिकता को बहुत बढ़ावा दिया। उन्होंने अलग-अलग धार्मिक समूहों के बीच मतभेद पैदा किए ताकि वे आपस में लड़ते रहें और ब्रिटिश सरकार आसानी से शासन कर सके। यह नीति भारत में सांप्रदायिक तनाव का मुख्य कारण बनी।
In simple words: ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।
🎯 Exam Tip: ब्रिटिश नीति से संबंधित प्रश्न में 'फूट डालो और राज करो' वाक्यांश का उल्लेख करना आवश्यक है।
Question 5. सांप्रदायिकता के दो दुष्परिणाम बताइए।
Answer: साम्प्रदायिकता के दो मुख्य दुष्परिणाम ये हैं:
1. समाज में विभिन्न समूहों के बीच नफरत बढ़ती है। जब लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं, तो वे दूसरों से घृणा करने लगते हैं।
2. इससे हिंसा और दंगे होते हैं, जिससे समाज में बहुत नुकसान होता है। लोग आपस में लड़ते हैं, जान-माल का नुकसान होता है और शांति भंग होती है।
In simple words: साम्प्रदायिकता से समाज में नफरत बढ़ती है और हिंसा व दंगे होते हैं, जिससे शांति भंग होती है।
🎯 Exam Tip: दुष्परिणाम बताते समय हमेशा सामाजिक सौहार्द पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों और हिंसा के खतरों का जिक्र करें।
Question 1. भारतीय चुनावों में जाति की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Answer: भारतीय चुनावों में जाति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यहां कुछ मुख्य बातें हैं:
1. हर राजनीतिक दल चुनाव में उम्मीदवार चुनते समय जाति के हिसाब-किताब को देखता है। वे देखते हैं कि किस क्षेत्र में किस जाति के लोग ज्यादा हैं और उसी जाति के उम्मीदवार को खड़ा करते हैं।
2. भारत में चुनाव प्रचार के दौरान भी जातिवाद का इस्तेमाल किया जाता है। उम्मीदवार अपनी जाति के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें पूरा समर्थन मिल सके। यह दिखाता है कि जातिगत पहचान चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा है।
In simple words: भारतीय चुनावों में राजनीतिक दल उम्मीदवार चुनते समय जाति देखते हैं, और प्रचार में भी जाति के नाम पर वोट माँगे जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जाति की भूमिका को बताते समय 'उम्मीदवार चयन' और 'चुनावी अभियान' में इसके प्रभाव पर जोर दें।
Question 2. सांप्रदायिकता के कोई दो कारण बताइए।
Answer: सांप्रदायिकता के दो मुख्य कारण ये हैं:
1. **तुष्टीकरण की राजनीति:** सरकारें अक्सर किसी खास समुदाय के वोटों के लिए उनकी सही-गलत मांगों को मान लेती हैं और उन्हें विशेष अधिकार देती हैं। इससे दूसरे समुदायों में जलन पैदा होती है और आपस में तनाव बढ़ता है। यह एक वर्ग को लगता है कि उन्हें विशेष सुविधाएं मिल रही हैं, जिससे दूसरों में असंतोष पनपता है।
2. **वोट बैंक की राजनीति:** कुछ राजनीतिक दल किसी खास समुदाय को अपना 'वोट बैंक' बनाने के लिए उनके हर कदम का समर्थन करते हैं। इसके जवाब में दूसरे राजनीतिक दल भी अन्य समुदायों का समर्थन करते हैं। जब किसी एक वर्ग को दूसरों से ज्यादा मिलता है, तो समाज में स्वाभाविक रूप से तनाव बढ़ता है। इस तरह से वोट बैंक की राजनीति भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती है।
In simple words: तुष्टीकरण की राजनीति और वोट बैंक बनाने की कोशिशें सांप्रदायिकता के मुख्य कारण हैं, क्योंकि ये समुदायों के बीच भेदभाव और तनाव पैदा करते हैं।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के कारणों पर प्रश्न आने पर 'तुष्टीकरण' और 'वोट बैंक' की राजनीति को मुख्य बिंदुओं के रूप में समझाएँ।
Question 3. निर्णय प्रक्रिया को जाति किस प्रकार प्रभावित करती है?
Answer: भारत में जाति पर आधारित संगठन सरकारी निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति के संगठन अपने आरक्षण अधिकारों की समय सीमा बढ़ाना चाहते हैं, जबकि जिन जातियों को आरक्षण नहीं मिला है, वे इसे प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। कुछ जातियां खुद को आरक्षित सूची में शामिल करवाने का प्रयास करती हैं। जातीय संगठन अपनी मांगों को मनवाने के लिए विभिन्न तरीकों से सरकार को प्रभावित करते हैं।
उदाहरण के लिए, गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने सरकार को 5 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए मजबूर किया, हालाँकि बाद में इसे न्यायालय ने रद्द कर दिया था। इस तरह जातीय संगठन अपने हितों के हिसाब से निर्णय करवाने और अपने खिलाफ होने वाले निर्णयों को रोकने की कोशिश करते हैं।
In simple words: जाति से जुड़े समूह सरकार के फैसलों को प्रभावित करते हैं, खासकर आरक्षण जैसे मुद्दों पर, जिससे वे अपने समुदाय के लिए लाभ उठा सकें।
🎯 Exam Tip: निर्णय प्रक्रिया पर जाति के प्रभाव को दर्शाते समय 'आरक्षण' और 'विभिन्न जातीय संगठनों की मांगें' जैसे उदाहरणों का उपयोग करें।
Question 4. “सांप्रदायिकता को ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने बढ़ाया” कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण भारत में साम्प्रदायिकता लगातार बढ़ती रही। अंग्रेजों ने हिंदुओं को खुश करने के लिए मुसलमानों की उपेक्षा की, और बाद में मुसलमानों के विकास के लिए उन्हें विशेष रियायतें दीं। उन्होंने समाज में सांप्रदायिकता के आधार पर चुनाव प्रणाली शुरू करके इस समस्या को और बढ़ा दिया। इस तरह ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया।
In simple words: ब्रिटिश सरकार ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई, जिससे भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भेदभाव और साम्प्रदायिकता बढ़ी।
🎯 Exam Tip: ब्रिटिश सरकार की नीतियों का उल्लेख करते समय 'उपेक्षा', 'विशेष रियायतें' और 'निर्वाचन पद्धति' जैसे शब्दों का प्रयोग करें।
Question 5. सांप्रदायिकता बढ़ाने में विदेशी प्रचार का प्रभाव कैसे पड़ता है?
Answer: सांप्रदायिकता बढ़ाने में विदेशी प्रचार का प्रभाव ऐसे पड़ता है:
1. तेल से भरपूर खाड़ी देशों से मुस्लिम संगठनों को और यूरोपीय देशों से ईसाई संगठनों को बहुत पैसा मिलता है। यह पैसा उनके शिक्षा या आर्थिक विकास पर खर्च होने की बजाय सांप्रदायिकता फैलाने और धर्म बदलने पर खर्च किया जाता है। जैसे, तमिलनाडु में हरिजन वर्ग को धर्म बदलने के लिए उकसाना इसका एक उदाहरण है। ऐसी स्थितियाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा करती हैं।
2. कुछ मुस्लिम संगठन विदेशों की नीतियों का पालन करते हुए भारतीय समाज में तनाव और दंगे करवाते हैं। जैसे कश्मीर में पत्थरबाजी और जिहाद के नाम पर युवाओं को गुमराह करना इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। यह विदेशी प्रभाव भारत की शांति को भंग करता है।
In simple words: विदेशी धन और प्रचार कुछ धार्मिक संगठनों को सांप्रदायिकता फैलाने और धर्म बदलने के लिए उकसाता है, जिससे भारत में तनाव और दंगे बढ़ते हैं।
🎯 Exam Tip: विदेशी प्रचार के प्रभाव को बताते समय 'विदेशी धन', 'धर्म परिवर्तन' और 'तनाव/दंगे' जैसे बिंदुओं को शामिल करें।
RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 निबंधात्मक प्रश्न
Question 1. जातिवाद का क्या तात्पर्य है? भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Answer: जातिवाद का मतलब है अपनी जाति के प्रति बहुत ज्यादा लगाव रखना। इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति अपनी जाति को बहुत महत्व देता है, खुद को दूसरी जातियों से बिलकुल अलग समझता है, और राजनीति या प्रशासन में भी जाति के आधार पर काम करता है।
अपनी जाति के प्रति इस गहरे लगाव के कारण व्यक्ति कई बार दूसरी जातियों के प्रति विरोध की भावना भी रख लेता है। काका कालेलकर के अनुसार, "जातिवाद एक ऐसी गहरी और अंधी समूह भक्ति है जो न्याय, समानता और भाईचारे जैसे अच्छे सामाजिक मूल्यों को नजरअंदाज करती है।” इस तरह जातिवाद लोगों को केवल अपनी जाति के बारे में सोचने पर मजबूर करता है।
भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका:
1. कई जातीय संगठन और समुदाय, जैसे तमिलनाडु में 'नाडर जाति संघ' या बिहार में 'कायस्थ सभा', अपनी ताकत के दम पर राजनीति में मोलभाव करते हैं।
2. सरकारें मंत्रिमंडल बनाते समय यह ध्यान रखती हैं कि हर प्रमुख जाति का मंत्री हो। केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी हरिजन, जनजाति, ब्राह्मण, सिख, राजपूत और कायस्थों को कोई न कोई विभाग दिया जाता है।
3. बिहार, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में जाति की राजनीति बहुत हावी हो गई है।
4. भारत में सभी राजनीतिक दल चुनाव में अपने उम्मीदवारों का चुनाव करते समय जाति को ध्यान में रखते हैं।
यह सब दिखाता है कि भारतीय राजनीति में जाति का एक विशेष और गहरा प्रभाव है।
In simple words: जातिवाद का अर्थ है अपनी जाति को बहुत अधिक महत्व देना। भारतीय राजनीति में जाति समूह सरकार के फैसलों, मंत्रिमंडल के गठन और उम्मीदवार चुनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: जातिवाद को समझाते समय परिभाषा के साथ-साथ किसी विचारक का मत भी दें। भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका बताते हुए 'जातीय दबाव समूह', 'मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व' और 'उम्मीदवार चयन' जैसे बिंदुओं पर जोर दें।
Question 2. साम्प्रदायिकता क्या है? इसके प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: साम्प्रदायिकता का मतलब है जब कोई धार्मिक, सांस्कृतिक या भाषाई समूह खुद को एक अलग वर्ग मानकर अपने हितों को राष्ट्र और समाज के बाकी हितों से ज्यादा प्राथमिकता देता है।
विन्सेण्ट स्मिथ के अनुसार, "एक साम्प्रदायिक व्यक्ति या समूह वह है जो हर धार्मिक और भाषाई समूह को एक अलग सामाजिक और राजनीतिक इकाई मानता है, जिसके हित दूसरों से अलग और विरोधी हो सकते हैं। ऐसी विचारधारा को संप्रदायवाद कहते हैं।” यह भावना समाज में बंटवारा पैदा करती है।
साम्प्रदायिकता के मुख्य कारण:
1. **मंत्रिमंडल में धार्मिक प्रतिनिधित्व:** केंद्र और राज्यों में मंत्रिमंडल बनाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि प्रमुख धर्मों और विश्वासों वाले लोगों को प्रतिनिधित्व मिले। केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी सिख, ईसाई और अल्पसंख्यक हमेशा प्रतिनिधित्व पाते हैं।
2. **धर्म और राष्ट्रीय एकता:** धर्म और सांप्रदायिकता राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत खतरनाक मानी जाती है। धार्मिक मतभेदों के कारण ही देश का बंटवारा हुआ था, और आज भी अलगाववादी ताकतें सक्रिय हैं।
3. **राजनीति में धार्मिक दबाव समूह:** सांप्रदायिक संगठन भारतीय राजनीति में शक्तिशाली दबाव समूहों की तरह काम करते हैं। ये धार्मिक समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं और कभी-कभी अपने पक्ष में निर्णय भी करवा लेते हैं।
4. **अन्य कारण:**
(i) मुसलमानों का आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा होना भी समाज में सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ाता है। शिक्षा और रोजगार की कमी अलगाव की भावना बढ़ाती है।
(ii) वोट बैंक की राजनीति के कारण जब किसी खास समूह को दूसरों से ज्यादा फायदा दिया जाता है, तो समाज में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
(iii) मुसलमानों के एक वर्ग में अलग होने की भावना आज भी मौजूद है, और वे खुद को राष्ट्रीय धारा में शामिल नहीं कर पाए हैं।
In simple words: सांप्रदायिकता मतलब अपने धर्म को देश से ऊपर रखना। इसके कारण मंत्रिमंडल में धार्मिक प्रतिनिधित्व, धर्म के नाम पर दबाव समूह और वोट बैंक की राजनीति जैसे कई कारण हैं।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता की परिभाषा देते समय 'अपने समूह के हितों को प्राथमिकता' और 'राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा' को मुख्य बिंदु बनाएँ। कारणों में 'राजनीतिक प्रतिनिधित्व', 'दबाव समूह' और 'तुष्टीकरण' जैसे तत्वों को शामिल करें।
Question 3. साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
Answer: साम्प्रदायिकता के मुख्य दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं:
(i) **आपसी द्वेष:** जब हिंदू और मुसलमान जैसे समुदाय अपने हितों के लिए सरकार से लड़ते हैं, तो उनके बीच आपसी नफरत और दुश्मनी बढ़ जाती है। यह दुश्मनी समाज में डर फैलाती है और शांति भंग कर सकती है।
(ii) **आर्थिक हानि:** धर्म से उपजी सांप्रदायिकता के कारण आर्थिक नुकसान भी होता है। दंगों में कई दुकानें लूटी जाती हैं और राष्ट्रीय संपत्ति नष्ट हो जाती है। सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए सरकार को बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है।
(iii) **प्राण हानि:** धर्म के नाम पर होने वाली सांप्रदायिकता के कारण लोगों की जान भी चली जाती है। रांची, श्रीनगर, बनारस, अलीगढ़ और मुंबई जैसे शहरों में हुए सांप्रदायिक दंगे इसके उदाहरण हैं, जहाँ कई लोगों ने अपनी जान गंवाई।
(iv) **राजनीतिक अस्थिरता:** सांप्रदायिकता राजनीतिक अस्थिरता का भी एक कारण है। यह ऐसी स्थितियाँ पैदा करती है या उन्हें बढ़ावा देती है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता आ जाती है। सरकार को इन समस्याओं से निपटने में अधिक समय लगाना पड़ता है।
(v) **राष्ट्रीय एकता में बाधा:** सांप्रदायिकता राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी दुश्मन है। राष्ट्रीय एकता का मतलब है कि सभी लोग मिलजुल कर रहें और सबके हित को अपना हित समझें, जबकि सांप्रदायिकता इसका उल्टा है - इसका मूल विचार है कि अलग-अलग समुदाय के लोग अपने-अपने हितों के लिए संघर्ष करें।
(vi) **राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा:** भारत एक ऐसा देश है जहाँ कई धर्मों के लोग रहते हैं। विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच होने वाले सांप्रदायिक झगड़े और तनाव से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होता है। यह आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करता है।
In simple words: साम्प्रदायिकता से समाज में नफरत, आर्थिक नुकसान, लोगों की मौत, राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रीय एकता व सुरक्षा को खतरा होता है।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों को समझाते समय, 'आपसी द्वेष', 'आर्थिक हानि', 'प्राण हानि', 'राजनीतिक अस्थिरता', 'राष्ट्रीय एकता में बाधा' और 'राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा' जैसे बिंदुओं को विस्तार से लिखें।
Question 4. जातिवाद के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: जातिवाद के समाज और राजनीति पर कुछ सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं:
**जातिवाद के सकारात्मक प्रभाव:**
1. जातिवाद से लोगों में सामाजिकता और एकता की भावना बढ़ती है, क्योंकि वे अपनी जाति के लोगों के साथ एकजुट होते हैं।
2. जाति और राजनीति के संबंध ने दूर-दूर रहने वाले जाति के लोगों को जातीय पंचायतों में एक-दूसरे के संपर्क में आने का मौका दिया है, जिससे वे आपस में जुड़ते हैं।
3. जाति की राजनीति ने अधिक लोगों को राजनीति में सक्रिय किया है। जातीय संगठनों में सक्रिय लोग राजनीति में भी भाग लेने लगते हैं।
4. जातिवाद के कारण सामाजिक संरचना में बदलाव आया है, क्योंकि विभिन्न जातियों के बीच संवाद और संबंध बढ़े हैं।
5. जाति की राजनीति ने समाज की संस्कृति को प्रभावित किया है। निम्न जातियाँ उच्च जातियों की खान-पान, वेशभूषा और रहन-सहन का अनुकरण करती हैं, जिससे समाज में सांस्कृतिक एकता की स्थापना होती है।
**जातिवाद के नकारात्मक प्रभाव:**
1. जाति के आधार पर चुनाव लड़ना और जातिगत आग्रह पर मतदान करना जातिवाद का ही नतीजा है, जिससे योग्य उम्मीदवार अक्सर हार जाते हैं।
2. जातिवादी भावना के कारण लोगों की निष्ठा देश के बजाय अपनी जाति के प्रति बंट जाती है। लोग राष्ट्रीय हितों की जगह जातीय हितों को प्राथमिकता देने लगते हैं।
3. जातिवादी सोच रूढ़िवादिता को बढ़ावा देती है, जिससे वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच का विकास नहीं हो पाता। यह समाज को पीछे धकेलता है।
4. जातिवाद के कारण सरकारें अक्सर बड़े और शक्तिशाली जातीय संगठनों के दबाव में काम करती हैं, जिससे निष्पक्ष निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।
5. जातिवाद स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुँचाता है। यह समाज में फूट, बंटवारा और संकीर्ण हितों को बढ़ावा देता है।
6. जातिवाद से समाज में संघर्ष और दुश्मनी की समस्या उत्पन्न होती है, क्योंकि विभिन्न जातियाँ अपने हितों के लिए एक-दूसरे से लड़ती हैं।
In simple words: जातिवाद लोगों को एकजुट कर सकता है और राजनीतिक भागीदारी बढ़ा सकता है (सकारात्मक)। लेकिन यह समाज में फूट, राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा और रूढ़िवादिता को भी बढ़ावा देता है (नकारात्मक)।
🎯 Exam Tip: जातिवाद के प्रभावों को लिखते समय, सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बिंदुओं में प्रस्तुत करें, और प्रत्येक के लिए एक छोटा उदाहरण या व्याख्या दें।
RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. “पूना पैक्ट” किसके मध्य हुआ था?
Answer: “पूना पैक्ट” महात्मा गाँधी जी और डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के बीच हुआ था। यह समझौता दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के बजाय संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित करने से संबंधित था।
In simple words: पूना पैक्ट गाँधी जी और अम्बेडकर के बीच हुआ था।
🎯 Exam Tip: पूना पैक्ट जैसे ऐतिहासिक समझौतों के प्रमुख पक्षों (किनके बीच हुआ) और उनके मुख्य उद्देश्य को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. पृथक निर्वाचन का क्या उद्देश्य है?
Answer: पृथक निर्वाचन का मुख्य उद्देश्य हिंदुओं में भी उच्च और निम्न जातियों के बीच फूट पैदा करना था। इस प्रणाली में अलग-अलग समूहों के लोग केवल अपने समुदाय के प्रतिनिधि को चुन सकते थे, जिससे सामाजिक विभाजन और बढ़ जाता था।
In simple words: पृथक निर्वाचन का लक्ष्य हिंदुओं में जातियों के बीच फूट डालना था।
🎯 Exam Tip: पृथक निर्वाचन प्रणाली के उद्देश्यों को बताते समय 'फूट डालना' और 'सामाजिक विभाजन' जैसे कीवर्ड्स का उपयोग करें।
Question 3. 'जाति' के विषय में मॉरिस जोन्स के क्या विचार हैं?
Answer: मॉरिस जोन्स के अनुसार, "जाति के लिए राजनीति का महत्व और राजनीति के लिए जाति का महत्व पहले की तुलना में बढ़ गया है।" उनका मानना था कि राजनीति में जाति की भूमिका समय के साथ और मजबूत हुई है, जिससे यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बन गई है।
In simple words: मॉरिस जोन्स ने कहा था कि जाति और राजनीति का महत्व एक-दूसरे के लिए पहले से ज्यादा बढ़ गया है।
🎯 Exam Tip: जब किसी विचारक के कथन पर आधारित प्रश्न आए, तो उस कथन को बिल्कुल वैसे ही लिखें और उसका सरल अर्थ भी समझाएँ।
Question 4. वोट बैंक को राजनीतिक दलों ने क्यों बढ़ावा दिया था?
Answer: राजनीतिक दलों ने वोट बैंक को इसलिए बढ़ावा दिया था क्योंकि वे चुनाव जीतकर सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे और सत्ता का सुख भोगना चाहते थे। वोट बैंक बनाने से उन्हें एक खास समुदाय के वोट पक्के हो जाते थे, जिससे उनकी जीत की संभावना बढ़ जाती थी। इस तरह यह सत्ता हासिल करने का एक आसान तरीका बन गया।
In simple words: राजनीतिक दलों ने वोट बैंक को इसलिए बढ़ावा दिया ताकि वे चुनाव जीत सकें और सत्ता पर राज कर सकें।
🎯 Exam Tip: वोट बैंक की राजनीति के कारण बताते समय 'सत्ता पर कब्जा' और 'चुनाव जीतने की लालसा' जैसे उद्देश्यों पर प्रकाश डालें।
Question 5. 'भारत में जाति को एक महत्वपूर्ण दल' किसने कहा है?
Answer: 'जयप्रकाश नारायण' ने भारत में जाति को एक महत्वपूर्ण दल कहा है। उनका मानना था कि जाति केवल एक सामाजिक इकाई नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक प्रक्रियाओं और निर्णयों में भी एक मजबूत शक्ति के रूप में काम करती है।
In simple words: जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि भारत में जाति एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल की तरह है।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में विचारक के नाम और उनके कथन को सटीक रूप से याद करें।
Question 6. किन्हीं दो राज्यों के नाम बताइए, जो जातिगत राजनीति की मिसाल बन चुके हैं?
Answer: उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य जातिगत राजनीति की मिसाल बन चुके हैं। इन राज्यों में चुनाव और राजनीतिक निर्णय अक्सर जातिगत समीकरणों के आधार पर ही लिए जाते हैं, जिससे जाति का प्रभाव बहुत स्पष्ट दिखता है।
In simple words: उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जहाँ जातिगत राजनीति बहुत ज्यादा होती है।
🎯 Exam Tip: जातिगत राजनीति के उदाहरण वाले राज्यों के नाम याद रखना आसान है, खासकर उत्तर भारत के राज्यों के बारे में।
Question 8. साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन कब हुआ?
Answer: साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन 1947 ई. में हुआ था। यह विभाजन मुख्यतः धार्मिक मतभेदों और राजनीतिक विभाजन की मांगों के कारण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।
In simple words: भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर 1947 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: भारत विभाजन की तिथि और उसके प्रमुख आधार को हमेशा याद रखें।
Question 9. बंगाल का विभाजन किसने और कब किया था?
Answer: सन् 1905 में लॉर्ड कर्जन ने सांप्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया था। इस विभाजन का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा बताया गया था, लेकिन इसका वास्तविक मकसद 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत धार्मिक मतभेदों को बढ़ाना था।
In simple words: बंगाल का विभाजन लॉर्ड कर्जन ने 1905 में सांप्रदायिक आधार पर किया था।
🎯 Exam Tip: बंगाल विभाजन के संबंध में 'लॉर्ड कर्जन' और '1905' को याद रखें, साथ ही इसके पीछे के सांप्रदायिक आधार को भी समझें।
Question 10. साम्प्रदायिकता के कोई दो कारण लिखिए।
Answer: साम्प्रदायिकता के दो मुख्य कारण ये हैं:
1. **वोट बैंक की राजनीति:** राजनीतिक दल खास समुदायों को अपने वोट बैंक के रूप में देखते हैं और उनके हितों को प्राथमिकता देते हैं।
2. **दलीय राजनीति:** राजनीतिक दल अक्सर धार्मिक या जातीय आधार पर नीतियां बनाते हैं, जिससे समाज में विभाजन बढ़ जाता है।
In simple words: वोट बैंक की राजनीति और दलों की खास नीतियां साम्प्रदायिकता के मुख्य कारण हैं।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के कारणों में 'राजनीतिक स्वार्थ' और 'भेदभावपूर्ण नीतियों' को मुख्य बिंदु के रूप में समझाएँ।
Question 11. भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका के कोई दो बिन्दु लिखिए।
Answer: भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका के दो मुख्य बिंदु ये हैं:
1. **निर्णय प्रक्रिया में जाति की भूमिका:** जातीय संगठन सरकारी निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, खासकर आरक्षण और सामुदायिक हितों से जुड़े मामलों में।
2. **जातिगत आधार पर मतदान व्यवहार:** चुनावों में मतदाता अक्सर अपनी जाति या समुदाय के उम्मीदवार को पसंद करते हैं, जिससे जातिगत पहचान वोट डालने के तरीके को प्रभावित करती है।
In simple words: भारतीय राजनीति में जाति सरकारी फैसलों और वोट देने के तरीके को प्रभावित करती है।
🎯 Exam Tip: जाति की भूमिका को बताते समय 'निर्णय प्रक्रिया' और 'मतदान व्यवहार' जैसे ठोस बिंदुओं का उल्लेख करें।
Question 12. जाति किसे कहते हैं?
Answer: जब एक सामाजिक समूह पूरी तरह से वंशानुक्रम पर आधारित होता है, यानी लोग अपने माता-पिता से अपनी सामाजिक स्थिति या व्यवसाय प्राप्त करते हैं, तो हम उसे जाति कहते हैं। इसमें व्यक्ति का जन्म ही उसकी जाति तय करता है। जाति व्यवस्था एक जटिल सामाजिक संरचना है।
In simple words: जाति एक सामाजिक वर्ग है जो पूरी तरह से जन्म और वंश पर आधारित होता है।
🎯 Exam Tip: जाति की परिभाषा में 'वंशानुक्रम' और 'जन्म पर आधारित' जैसे कीवर्ड्स को शामिल करें।
Question 13. वर्तमान में किन – किन राज्यों में जातीय संगठन जाति के आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं?
Answer: वर्तमान में कई राज्यों में जातीय संगठन जाति के आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं।
1. इससे जाति से जुड़े राजनीतिक संबंध और सक्रिय हो जाते हैं।
2. जातीय संगठन अपनी जातिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे आरक्षण की मांग और तेज होती है।
In simple words: आजकल कई राज्यों में जातीय संगठन आरक्षण की मांग कर रहे हैं, जिससे राजनीति में जाति का प्रभाव बढ़ रहा है।
🎯 Exam Tip: आरक्षण की मांग से जुड़े राज्यों के नाम याद रखना मुश्किल हो सकता है, इसलिए इस प्रश्न के उत्तर में जातीय संगठनों की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता पर जोर दें।
Question 15. रूडोल्फ व रूडोल्फ ने जाति राजनीति के संदर्भ में क्या कहा है?
Answer: रूडोल्फ व रूडोल्फ के अनुसार, जाति की राजनीति ने जातियों के बीच के मतभेदों को कम किया है और विभिन्न जातियों के सदस्यों में समानता लाई है। उनका मानना था कि राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने से जातियां अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हुई हैं और एक-दूसरे के साथ बेहतर संबंध बनाने लगी हैं।
In simple words: रूडोल्फ व रूडोल्फ ने कहा कि जाति की राजनीति से जातियों के बीच मतभेद कम हुए और समानता बढ़ी है।
🎯 Exam Tip: विचारक के कथनों को याद करते समय, उनके केंद्रीय विचार को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।
Question 16. 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग' की स्थापना कब हुई थी?
Answer: 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग' की स्थापना 1961 में हुई थी। यह संगठन मुसलमानों के हितों की रक्षा और उनके राजनीतिक अधिकारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया था।
In simple words: अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना 1961 में की गई थी।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठनों की स्थापना की सही तिथि और उनके उद्देश्य को याद रखना आवश्यक है।
Question 17. सच्चर कमेटी प्रतिवेदन की अध्यक्षता किसने की थी?
Answer: सच्चर कमेटी प्रतिवेदन की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश राजेन्द्र सिंह सच्चर ने की थी। इस कमेटी का गठन भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए किया गया था।
In simple words: सच्चर कमेटी की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश राजेन्द्र सिंह सच्चर ने की थी।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समितियों और उनके अध्यक्षों के नाम को सही ढंग से याद करें।
Question 18. सच्चर कमेटी अल्पसंख्यकों के लिए कौन - कौन - सी सुविधाएँ उपलब्ध करायीं?
Answer: सच्चर कमेटी ने अल्पसंख्यकों के विकास के लिए कई सुविधाओं का सुझाव दिया, जिनमें 15 सूत्री कार्यक्रम, सर्व शिक्षा अभियान को मजबूत करना और मुस्लिम बालिकाओं के लिए विशेष सुविधाएँ शामिल थीं। इन सुविधाओं का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों को शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बेहतर पहुँच प्रदान करना था।
In simple words: सच्चर कमेटी ने अल्पसंख्यकों के लिए 15 सूत्री कार्यक्रम, सर्व शिक्षा अभियान और मुस्लिम लड़कियों के लिए विशेष सुविधाएँ सुझाईं।
🎯 Exam Tip: किसी कमेटी या आयोग द्वारा सुझाई गई प्रमुख योजनाओं और सुविधाओं को मुख्य बिंदुओं में याद रखें।
Question 19. ब्रिटिश सरकार की कौन-सी नीति ने भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया?
Answer: ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने भारत में साम्प्रदायिकता को बहुत बढ़ावा दिया। इस नीति के तहत, अंग्रेजों ने भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित किया और विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद पैदा किए, जिससे वे आपस में लड़ते रहें और ब्रिटिश शासन मजबूत बना रहे।
In simple words: ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने भारत में साम्प्रदायिकता बढ़ाई।
🎯 Exam Tip: ब्रिटिश नीतियों के संदर्भ में 'फूट डालो और राज करो' वाक्यांश को विशेष रूप से लिखें।
Question 1. जातिगत राजनीति की विशेषताएँ बताइए।
Answer: जातिगत राजनीति की कुछ मुख्य विशेषताएँ ये हैं:
1. जाति और राजनीति के संबंध हमेशा बदलते रहते हैं, यानी उनमें स्थिरता नहीं होती।
2. किसी खास क्षेत्र में कोई एक जाति राजनीतिक रूप से ज्यादा ताकतवर और प्रभावशाली हो सकती है।
3. जातीय संगठनों ने जाति से जुड़ी राजनीतिक इच्छाओं को बढ़ावा दिया है।
4. जातीय नेता जातीय हितों के मुद्दों को उठाकर जाति में अपना समर्थन बढ़ाते हैं और राजनीतिक लाभ उठाते हैं।
5. जाति के राजनीतिकरण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी राजनीति का जातीयकरण हो रहा है।
6. शिक्षा, आधुनिकीकरण और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद जातिवाद की भावना और एकजुटता को बल मिला है, जिससे जातीय पहचान और मजबूत हुई है।
In simple words: जातिगत राजनीति में जातीय समूह प्रभावशाली होते हैं, नेता जाति के नाम पर वोट माँगते हैं, और यह शिक्षा के बावजूद भी समाज में जाति की भावना को मजबूत करती है।
🎯 Exam Tip: जातिगत राजनीति की विशेषताओं को बताते समय 'गतिशील संबंध', 'जातीय नेतृत्व' और 'स्थानीय स्तर पर जातीयकरण' जैसे पहलुओं पर ध्यान दें।
Question 2. जातिवाद से आप क्या समझते हैं?
Answer: जातिवाद का अर्थ है जब कोई सामाजिक वर्ग पूरी तरह से वंशानुक्रम पर आधारित होता है, तो हम उसे जाति कहते हैं। जाति एक ऐसा सामाजिक समूह है जो खुद को दूसरों से अलग मानता है, जिसकी अपनी खास पहचान होती है, और जिसके सदस्य आपस में ही शादी करते हैं। इनका एक तय पारंपरिक व्यवसाय भी होता है। जातिवाद का मतलब है अपनी जाति के प्रति बहुत गहरा लगाव रखना।
इसका मतलब है कि व्यक्ति अपनी जाति के प्रति बहुत ज्यादा लगाव रखता है, खुद को दूसरी जातियों से पूरी तरह से अलग समझता है, और प्रशासन तथा राजनीति में भी जाति के आधार पर काम करता है। अपनी जाति के प्रति इस गहरे लगाव के कारण कई बार व्यक्ति दूसरी जातियों के प्रति विरोध की भावना भी रख लेता है। हालांकि, जातिवाद लोगों में एकता और सामूहिकता की भावना भी पैदा करता है और लोगों में राजनीतिक जागरूकता तथा सक्रियता भी बढ़ाता है।
In simple words: जातिवाद मतलब अपनी जाति को बहुत अधिक महत्व देना और खुद को दूसरी जातियों से अलग समझना। यह भावना वंशानुक्रम पर आधारित होती है और राजनीति में भी इसका प्रभाव दिखता है।
🎯 Exam Tip: जातिवाद की परिभाषा में 'वंशानुक्रम', 'अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाव' और 'अन्य जातियों से अलगाव' जैसे तत्वों को स्पष्ट करें।
Question 4. भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को बताने वाले कोई दो बिंदु लिखिए।
Answer: भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका बताने वाले दो मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- निर्णय प्रक्रिया में जाति की भूमिका: भारत में जाति-आधारित संगठन सरकारी निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति के संगठन अपने आरक्षण अधिकारों की समय-सीमा बढ़ाना चाहते हैं, जबकि जिन जातियों को अभी आरक्षण नहीं मिला है, वे इसे पाने के लिए आंदोलन कर रही हैं। कुछ जातियां खुद को आरक्षित सूची में शामिल कराने की कोशिश में लगी हैं। अपनी मांगों को मनवाने के लिए वे शासन को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करती हैं।
- मंत्रिमंडल के निर्माण में जातिगत प्रतिनिधित्व: सभी राजनीतिक दल चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों का चयन करते हैं। बहुमत मिलने पर, सरकार बनाते समय मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व देने का ध्यान रखा जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार सभी समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करे।
In simple words: भारतीय राजनीति में जाति बहुत असर डालती है। पहला, जाति समूह सरकार के फैसलों को बदलने की कोशिश करते हैं, खासकर आरक्षण से जुड़े मामलों में। दूसरा, सरकार बनाते समय, मंत्री चुनते वक्त अलग-अलग जातियों के लोगों को शामिल किया जाता है ताकि सभी समुदाय खुश रहें।
🎯 Exam Tip: जब भी आप भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका पर प्रश्न का उत्तर दें, तो हमेशा निर्णय प्रक्रिया और मंत्रिमंडल निर्माण में जाति के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल करें।
Question 5. भारतीय राजनीति में जातिवाद के कोई दो सकारात्मक प्रभाव बताइए।
Answer: भारतीय राजनीति में जातिवाद के दो सकारात्मक प्रभाव इस प्रकार हैं:
- लोगों को एक सूत्र में बांधना: जाति और राजनीति के संबंध ने लोगों को एक साथ जोड़ने का काम किया है। दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले जाति के लोग अपनी जातीय पंचायतों में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। आधुनिक संचार तकनीक के कारण वे एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और एक-दूसरे की समस्याओं में मदद करते हैं। सरकार से अधिक लाभ पाने के लिए वे अपनी जाति में एकता बनाए रखने की कोशिश करते हैं, जिससे लोगों में सामाजिकता और एकता की भावना बढ़ती है।
- राजनीतिक सक्रियता को बढ़ाना: जाति की राजनीति ने ज्यादा लोगों में राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। जाति में अपनी पकड़ और अपने हितों की रक्षा के लिए लोग राजनीति में अधिक सक्रिय हो गए हैं। वे सामाजिक सेवा का काम भी करते हैं। जातीय संगठनों में सक्रिय लोग राजनीति में भी शामिल हो जाते हैं।
In simple words: जातिवाद ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा है और उनकी राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया है। यह समुदायों को एकजुट करता है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए सक्रिय होने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: जातिवाद के सकारात्मक प्रभावों को बताते समय, यह समझाना महत्वपूर्ण है कि यह कैसे सामाजिक एकता और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाता है, बजाय इसके कि इसे केवल एक नकारात्मक शक्ति के रूप में देखा जाए।
Question 6. भारतीय राजनीति में जातिवाद के कोई दो नकारात्मक प्रभाव बताइए।
Answer: भारतीय राजनीति में जातिवाद के नकारात्मक प्रभाव इस प्रकार हैं:
- बंधुत्व व एकता की भावना को नुकसान: जातिवाद भाईचारे और एकता की भावना को कमजोर करता है। अपने-अपने जातीय हितों के लिए संघर्ष के कारण लोगों में दुश्मनी बढ़ती है। इससे समाज में तनाव और लड़ाई का माहौल बनता है, और सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँचता है। उदाहरण के लिए, राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान गुर्जर और मीणा जातियों के बीच कई क्षेत्रों में तनाव देखा गया था।
- लोकतंत्रीय भावना के विरुद्ध: जातिवाद लोकतांत्रिक मूल्यों, जैसे स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के खिलाफ होता है। यह समाज में फूट डालता है, विभाजन को बढ़ावा देता है और संकीर्ण सोच को बढ़ाता है।
- वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा: राजनीतिक दल और नेता किसी खास जाति को अपना वोट बैंक बनाने के लिए उनके सही-गलत मांगों का समर्थन करते हैं। वे उन्हें प्रोत्साहित करते रहते हैं, जो राष्ट्रीय हित के लिए खतरनाक है। इसमें जातीय हितों को राष्ट्रीय हितों से ज्यादा महत्व दिया जाता है।
- रूढ़िवादिता को बढ़ावा: जातिवाद रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है, जिससे वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच का विकास नहीं हो पाता है। यह परंपरावाद को बढ़ाता है और आधुनिक विचारों के विकास को रोकता है।
- संघर्ष तथा अशांति उत्पन्न होना: जातिवाद समाज के माहौल में शांति की जगह संघर्ष और अशांति पैदा करता है। जातियां अपने हितों के लिए संघर्ष करती हैं। कई बार सरकार के दबावपूर्ण फैसलों से देश और समाज में अशांति फैल जाती है।
- देश का शासन अयोग्य लोगों के हाथों में जाना: जाति के आधार पर चुनाव लड़ना और जातिगत आग्रह के आधार पर मतदान करना जातिवाद का ही परिणाम है। जब लोग जाति के आधार पर वोट देते हैं, तो योग्य व्यक्ति चुनाव हार जाते हैं। जीतने वाला व्यक्ति भी पूरे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को न समझकर जातीय वफादारी पर ध्यान देता है। यह देश और समाज दोनों के लिए हानिकारक है, क्योंकि देश का शासन अयोग्य लोगों के हाथों में चला जाता है जो देश का भला नहीं कर सकते।
- नागरिकों की श्रद्धा व भक्ति का बंट जाना: जातिवादी भावना के कारण नागरिकों की श्रद्धा और भक्ति बंट जाती है। देश के प्रति भक्ति कम हो जाती है। लोग राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातीय हितों को प्राथमिकता देने लगते हैं। ये प्रवृत्तियां देश की एकता, भाईचारे और विकास में बाधा पैदा करती हैं।
- सरकार द्वारा जातीय संगठनों के दबाव में कार्य करना: सरकारें बड़े और शक्तिशाली जातीय संगठनों के दबाव में काम करती हैं। इसलिए, वे स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय लेने से बचती हैं।
- राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना: कई बार जातीय संगठनों के आंदोलन हिंसक हो जाते हैं। तोड़फोड़ की जाती है और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है। इससे औद्योगिक विकास और व्यापार को भारी नुकसान होता है। सार्वजनिक संपत्ति को भी नष्ट किया जाता है।
In simple words: जातिवाद समाज में दुश्मनी, फूट और तनाव पैदा करता है। यह लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है, अयोग्य लोगों को सत्ता में लाता है, और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है। यह लोगों को अपने देश के बजाय अपनी जाति के बारे में ज्यादा सोचने पर मजबूर करता है।
🎯 Exam Tip: जातिवाद के नकारात्मक प्रभावों को सूचीबद्ध करते समय, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नुकसानों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए ताकि यह पता चले कि यह कैसे देश के विकास और सद्भाव को प्रभावित करता है।
Question 7. साम्प्रदायिकता को परिभाषित कीजिए। अथवा साम्प्रदायिकता का अर्थ व परिभाषा लिखिए।
Answer: साम्प्रदायिकता का अर्थ है जब कोई धार्मिक, सांस्कृतिक या भाषाई समूह जानबूझकर खुद को एक अलग वर्ग मानता है। यह समूह अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर राजनीतिक मांगें रखता है और अपनी मांगों को राष्ट्रीय तथा सामाजिक हितों से ज्यादा महत्व देता है, तो इसे साम्प्रदायिकता कहा जाता है। साम्प्रदायिकता में वे सभी भावनाएं और कार्य शामिल होते हैं जिनमें किसी धर्म या भाषा के आधार पर किसी खास समूह के हितों पर जोर दिया जाता है, और उन हितों को राष्ट्रीय हितों से ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। यह उस समूह में अलगाव की भावना को बढ़ावा देता है।
विन्सेन्ट स्मिथ के अनुसार, "एक साम्प्रदायिक व्यक्ति या समूह वह है जो प्रत्येक धार्मिक तथा भाषाई समूह को एक ऐसी अलग सामाजिक और राजनीतिक इकाई मानता है, जिसके हित अन्य समूहों से अलग हो सकते हैं और उनके विरोधी भी हो सकते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों या व्यक्ति समूह की विचारधारा को संप्रदायवाद या साम्प्रदायिक कहा जाएगा।" यह विचारधारा अक्सर समाज में विभाजन और तनाव पैदा करती है।
In simple words: साम्प्रदायिकता का मतलब है जब लोग अपने धर्म या भाषा को देश से ऊपर रखते हैं और अपने समूह के फायदे के लिए ही सोचते हैं, जिससे समाज में अलगाव और झगड़े होते हैं।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते समय, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि यह कैसे किसी विशेष समूह के हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखता है, जिससे समाज में विभाजन पैदा होता है।
Question 8. सांप्रदायिकता पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
Answer: साम्प्रदायिकता एक ऐसी भावना है जिसमें किसी खास धर्म के अनुयायियों की भावनाओं और कामों को दूसरे धर्मों के अनुयायियों से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है, या उनसे घृणा की जाती है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ कई धर्मों के लोग रहते हैं। सबके अपने संगठन, पूजा स्थल, पूजनीय देवता और उपदेशक संत होते हैं। हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे संगठन साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि वे अपने विचारों और कार्यों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखते हैं। आमतौर पर, साम्प्रदायिक ताकतें समाज के खिलाफ होती हैं। वे सरकार पर अपने धर्म के अनुयायियों के हितों के लिए दबाव डालती हैं, भले ही इससे दूसरे धर्मों के लोगों को कितना भी नुकसान क्यों न हो।
In simple words: साम्प्रदायिकता तब होती है जब लोग अपने धर्म को दूसरे धर्मों से बेहतर मानते हैं और इसी आधार पर समाज में बंटवारा पैदा करते हैं, जिससे झगड़े होते हैं।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता पर नोट लिखते समय, इसकी परिभाषा, भारत में उदाहरण और समाज पर इसके हानिकारक प्रभावों का उल्लेख करें।
Question 9. सिद्ध कीजिए कि साम्प्रदायिकता राष्ट्र के लिए खतरा है?
Answer: साम्प्रदायिकता राष्ट्र के लिए एक गंभीर खतरा है। भारत एक बहु-सांप्रदायिक देश है, जहाँ कई समुदायों के लोग रहते हैं। देश में शांति और व्यवस्था के साथ विकास के लिए सभी को मिलकर रहना बहुत जरूरी है। साम्प्रदायिक संगठन नफरत और द्वेषपूर्ण भावनाएं फैलाते हैं, जिससे विभिन्न समुदायों में अंदरूनी कलह पैदा होती है। शक और दुर्भावना जब चरम पर पहुँच जाती है, तो साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं। इससे राष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की लोकतांत्रिक पंथ-निरपेक्षता की छवि भी धूमिल होती है। यह देश की एकता, सुरक्षा और प्रगति को कमजोर करता है।
In simple words: साम्प्रदायिकता देश के लिए खतरा है क्योंकि यह लोगों में झगड़े पैदा करती है, देश को कमजोर करती है और भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को खराब करती है।
🎯 Exam Tip: यह सिद्ध करते समय कि साम्प्रदायिकता राष्ट्र के लिए खतरा है, हमेशा सामाजिक कलह, राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव और देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर जोर दें।
Question 10. भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु चार सुझाव दीजिए।
Answer: भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता को रोकने के लिए चार सुझाव निम्नलिखित हैं:
- सरकार की जिम्मेदारी: सरकार को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह ऐसा कोई काम न करे जिससे साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिले। समानता के सिद्धांतों की बातें करने के बजाय, उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करने की कोशिश करनी चाहिए।
- धर्मनिरपेक्ष शिक्षा: भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, लेकिन शाश्वत नैतिक मूल्यों की शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। धर्म-विशेष की शिक्षा के बजाय, देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने वाली शिक्षा दी जानी चाहिए।
- विशेष रियायतों से बचें: धर्म के आधार पर किसी भी धार्मिक वर्ग को कोई विशेष रियायत या सुविधा नहीं दी जानी चाहिए, जिससे अन्य धर्मों के लोगों में ईर्ष्या की भावना पैदा न हो।
- चुनावी राजनीति पर नियंत्रण: साम्प्रदायिकता का एक बड़ा कारण चुनावों में फायदे की राजनीति है। राजनीतिक दल चुनावी फायदा उठाने के लिए साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं, इस पर रोक लगानी चाहिए।
In simple words: साम्प्रदायिकता को रोकने के लिए सरकार को निष्पक्ष रहना चाहिए, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देनी चाहिए, किसी खास धर्म को विशेष सुविधा नहीं देनी चाहिए और राजनीतिक दलों को धर्म के नाम पर वोट मांगने से रोकना चाहिए।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु सुझाव देते समय, सरकार की भूमिका, शिक्षा के महत्व और चुनावी सुधारों पर केंद्रित समाधानों को शामिल करें।
Question 11. साम्प्रदायिकता के कोई चार दुष्परिणाम बताइए।
Answer: साम्प्रदायिकता के चार दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं:
- राष्ट्रीय एकता में बाधा: साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता और भाईचारे की भावना को नष्ट करती है। यह समाज में फूट पैदा करके सामाजिक सद्भाव को खत्म करती है, जिससे देश कमजोर होता है।
- राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के मार्ग में बाधा: स्वतंत्रता के बाद भारत के कई शहरों में साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं। इन घटनाओं के कारण जनजीवन रुक जाता है और इससे आर्थिक हानि तथा सरकारी धन का अपव्यय होता है, जो राष्ट्र की प्रगति में बाधा डालता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा: भारत में अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच जो साम्प्रदायिक झगड़े और तनाव पैदा होते हैं, उनसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है। यह बाहरी ताकतों को भी देश में अस्थिरता पैदा करने का मौका देता है।
- निर्दोष व्यक्ति साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार: निर्दोष महिलाएं, बच्चे, बूढ़े और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होते हैं। साम्प्रदायिक दंगों में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं और हजारों घर उजड़ जाते हैं। रांची, श्रीनगर, वाराणसी, अलीगढ़, हैदराबाद, मेरठ, मुंबई आदि के दंगे इसके उदाहरण हैं, जहां मरने वालों के अलावा हजारों लोग अपंग या अपाहिज हो गए।
In simple words: साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता और देश की तरक्की रोकती है। यह देश को कमजोर करती है, बहुत आर्थिक नुकसान पहुँचाती है, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनती है और निर्दोष लोगों को हिंसा का शिकार बनाती है।
🎯 Exam Tip: साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों का विश्लेषण करते समय, राष्ट्रीय एकता, आर्थिक हानि, सुरक्षा और मानवीय क्षति पर इसके प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
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