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Detailed Chapter 1 न्याय RBSE Solutions for Class 12 Political Science
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Class 12 Political Science Chapter 1 न्याय RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 बहुंचयनात्मक प्रश्न
Question 1. पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय की व्याख्या सर्वप्रथम किस विचारक ने की थी?
(अ) संत ऑगस्टाइन
(ब) अरस्तू
(स) प्लेटो
(द) एक्कीनास
Answer: (स) प्लेटो
In simple words: पश्चिमी राजनीतिक विचारों में न्याय के बारे में सबसे पहले प्लेटो ने समझाया था. उन्होंने न्याय को बहुत महत्वपूर्ण बताया.
🎯 Exam Tip: प्लेटो का 'रिपब्लिक' न्याय के सिद्धांत पर आधारित है, इसलिए उनका नाम याद रखना महत्वपूर्ण है जब न्याय की प्रारंभिक व्याख्या की बात आती है.
Question 2. वितरणात्मक न्याय की अवधारणा के प्रतिपादक हैं
(अ) प्लेटो
(ब) अरस्तू
(द) जॉन रॉल्स
Answer: (ब) अरस्तू
In simple words: अरस्तू ने वितरणात्मक न्याय का विचार दिया था. इसका मतलब है कि चीजों को लोगों के योगदान और योग्यता के अनुसार बांटा जाना चाहिए.
🎯 Exam Tip: वितरणात्मक न्याय अक्सर योग्यता और योगदान पर आधारित होता है. अरस्तू इस विचार के मुख्य प्रणेता हैं.
Question 4. न्याय की निष्पक्षता को राजव्यवस्था की आधारभूत प्रवृत्ति इनमें से कौन विचारक मानते हैं?
(अ) वृहस्पति
(ब) मनु एवं कौटिल्य
(स) प्लेटो
(द) आचार्य नरेन्द्र देव
Answer: (ब) मनु एवं कौटिल्य
In simple words: मनु और कौटिल्य जैसे विचारकों का मानना था कि किसी भी अच्छी सरकार के लिए न्याय का निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है. यह सरकार के काम करने का सबसे पहला और मुख्य तरीका है.
🎯 Exam Tip: भारतीय राजनीतिक चिंतन में, मनु और कौटिल्य को न्याय की नींव और निष्पक्षता पर विशेष जोर देने वाले विचारकों के रूप में देखा जाता है.
Question 5. कानून के उल्लंघन पर दिया जाने वाला दण्ड न्याय के किस रूप को परिलक्षित करता है?
(अ) नैतिक न्याय
(ब) राजनीतिक न्याय
(स) आर्थिक न्याय
(द) कानूनी न्याय
Answer: (द) कानूनी न्याय
In simple words: जब कोई कानून तोड़ता है और उसे सजा मिलती है, तो यह कानूनी न्याय का एक उदाहरण है. इसका मतलब है कि कानून के अनुसार ही फैसला होता है.
🎯 Exam Tip: कानूनी न्याय हमेशा नियमों और प्रक्रियाओं पर आधारित होता है, जिसका उद्देश्य अपराधों के लिए उचित दंड सुनिश्चित करना है.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. न्याय के भारतीय प्रतिपादक कौन-कौन हैं?
Answer: न्याय के भारतीय प्रतिपादकों में मनु, कौटिल्य, वृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, विदुर और सोमदेव जैसे नाम महत्वपूर्ण हैं. इन सभी विचारकों ने भारतीय परंपरा में न्याय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है.
In simple words: भारत में न्याय के बारे में मनु, कौटिल्य, वृहस्पति, शुक्र जैसे कई बड़े thinkers ने बताया है.
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन में न्याय को धर्म और कर्तव्य से जोड़ा जाता है, इसलिए इन विचारकों के नाम और उनके योगदान को याद रखना महत्वपूर्ण है.
Question 2. प्लेटो ने अपने किस ग्रन्थ में न्याय सम्बन्धी विचार प्रस्तुत किये हैं?
Answer: प्लेटो ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रिपब्लिक' में न्याय सम्बन्धी अपने विचार प्रस्तुत किए हैं. यह पुस्तक उनके राजनीतिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
In simple words: प्लेटो ने अपनी किताब 'रिपब्लिक' में न्याय के बारे में लिखा है.
🎯 Exam Tip: 'रिपब्लिक' प्लेटो का सबसे प्रसिद्ध कार्य है और यह न्याय, आदर्श राज्य और शिक्षा पर उनके विचारों को समझने के लिए केंद्रीय है.
Question 3. प्लेटो ने अपने न्याय सिद्धान्त में समाज की कितनी श्रेणियाँ बताई हैं?
Answer: प्लेटो ने अपने न्याय सिद्धान्त में समाज की तीन मुख्य श्रेणियाँ बताई हैं. ये श्रेणियाँ शासक वर्ग, सैनिक वर्ग और उत्पादक वर्ग हैं, जो समाज में अलग-अलग काम करते हैं.
In simple words: प्लेटो ने न्याय के अपने सिद्धांत में समाज को तीन हिस्सों में बांटा है.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के न्याय सिद्धांत में, समाज के इन तीन वर्गों को उनके स्वभाव और कार्यों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है, और उनके सामंजस्य से न्यायपूर्ण राज्य बनता है.
Question 4. 'रिपब्लिक' पुस्तक के रचयिता कौन हैं?
Answer: 'रिपब्लिक' पुस्तक के रचयिता प्लेटो हैं. यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है, जिसमें उन्होंने न्याय, राजनीति और आदर्श राज्य पर अपने विचारों को विस्तार से समझाया है.
In simple words: 'रिपब्लिक' किताब प्लेटो ने लिखी है.
🎯 Exam Tip: 'रिपब्लिक' प्लेटो के दर्शन का केंद्रबिंदु है, और इसमें न्याय, शिक्षा और आदर्श शासन के उनके विचार समाहित हैं.
Question 5. अरस्तू ने न्याय के कितने प्रकार बताये हैं?
Answer: अरस्तू ने न्याय के दो मुख्य प्रकार बताए हैं. ये हैं वितरणात्मक न्याय और सुधारात्मक न्याय, जो समाज में अलग-अलग स्थितियों में लागू होते हैं.
1. वितरणात्मक व राजनीतिक न्याय
2. सुधारात्मक न्याय
In simple words: अरस्तू ने न्याय को दो तरह का बताया है: एक बांटने वाला और दूसरा गलतियों को सुधारने वाला.
🎯 Exam Tip: अरस्तू के न्याय के प्रकारों को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न्याय की व्यापक समझ के लिए एक आधार प्रदान करते हैं.
Question 6. अरस्तू का वितरणात्मक न्याय सिद्धान्त किस बात पर बल देता है?
Answer: अरस्तू का वितरणात्मक न्याय सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि समाज में शक्ति और संसाधनों का वितरण व्यक्ति की योग्यता और उसके योगदान के अनुसार होना चाहिए. इसमें सभी को समान हिस्सा देने की बजाय, हर किसी को उसकी मेहनत और काबिलियत के हिसाब से कुछ मिले.
In simple words: अरस्तू का कहना था कि चीजें लोगों की काबिलियत और योगदान के हिसाब से बांटनी चाहिए.
🎯 Exam Tip: वितरणात्मक न्याय में 'योग्यता' और 'योगदान' जैसे शब्द महत्वपूर्ण हैं. परीक्षा में इन पर जोर देना चाहिए.
Question 7. अरस्तू के सुधारात्मक न्याय का क्या उद्देश्य है?
Answer: अरस्तू के सुधारात्मक न्याय का उद्देश्य अन्य व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेप से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है. इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति के साथ गलत व्यवहार न हो.
In simple words: सुधारात्मक न्याय का मकसद लोगों के हक की रक्षा करना है, ताकि कोई दूसरा उन्हें नुकसान न पहुंचाए.
🎯 Exam Tip: सुधारात्मक न्याय का मुख्य बिंदु 'अधिकारों की रक्षा' और 'हस्तक्षेप की रोकथाम' है, जो न्यायपूर्ण समाज के लिए आवश्यक है.
Question 8. मध्यकाल में न्याय के दो प्रतिपादक कौन थे?
Answer: मध्यकाल में न्याय के दो प्रमुख प्रतिपादक संत ऑगस्टाइन और थॉमस एक्कीनास थे. इन दोनों विचारकों ने अपने-अपने तरीके से न्याय की अवधारणा को समझाया.
1. सन्त ऑगस्टाइन
2. थॉमस एक्कीनास
In simple words: मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन और थॉमस एक्कीनास ने न्याय के बारे में मुख्य रूप से बताया.
🎯 Exam Tip: मध्यकालीन विचारकों ने न्याय को अक्सर धर्म और ईश्वरीय कानून से जोड़ा, जो उनके समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता है.
Question 9. आर्थिक विषमता की बात किस विचारक ने कही है?
Answer: 'अज्ञानता के पर्दे' सिद्धान्त के प्रतिपादक जॉन रॉल्स हैं. उन्होंने सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के न्यायपूर्ण वितरण पर जोर दिया था, यह सुनिश्चित करने के लिए कि सबसे कमजोर वर्गों को भी अधिकतम लाभ मिले.
In simple words: जॉन रॉल्स ने 'अज्ञानता के पर्दे' के सिद्धांत से आर्थिक गैर-बराबरी की बात की है.
🎯 Exam Tip: जॉन रॉल्स का 'अज्ञानता का पर्दा' सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो निष्पक्षता सुनिश्चित करता है.
Question 11. जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए किस सिद्धान्त की स्थापना की है?
Answer: जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए निम्नलिखित दो मौलिक नैतिक सिद्धान्तों की स्थापना की है. उनके अनुसार, ये सिद्धांत एक न्यायपूर्ण समाज की नींव बनाते हैं.
1. अधिकतम स्वतन्त्रता स्वयं की स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिए आवश्यक है.
2. व्यक्ति व राज्य द्वारा ऐसी सामाजिक व आर्थिक स्थितियाँ स्थापित की जाती हों जो सबके लिए कल्याणकारी हों। सबकी प्रगति के लिए इन्होंने 'अज्ञानता के पर्दे' सिद्धान्त का प्रतिपादन किया.
In simple words: जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय के लिए दो मुख्य सिद्धांत बताए हैं: सभी को सबसे ज्यादा आजादी मिले और 'अज्ञानता के पर्दे' का इस्तेमाल करके समाज को सबके लिए अच्छा बनाया जाए.
🎯 Exam Tip: जॉन रॉल्स के सिद्धांत में 'अधिकतम स्वतंत्रता' और 'अज्ञानता का पर्दा' दो प्रमुख अवधारणाएँ हैं, जो सामाजिक न्याय के उनके मॉडल का आधार हैं.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्लेटो के न्याय से आप क्या समझते हैं?
Answer: प्लेटो के विचार में न्याय का मतलब है कि हर व्यक्ति को अपना तय किया हुआ काम करना चाहिए और दूसरों के काम में दखल नहीं देना चाहिए. यह प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो के चिंतन का मुख्य हिस्सा था. प्लेटो ने अपनी किताब 'रिपब्लिक' में न्याय के बारे में साफ-साफ बताया है.
प्लेटो ने न्याय के दो रूप बताए हैं:
1. व्यक्तिगत न्याय
2. सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय
प्लेटो ने न्याय को आत्मा का एक गुण माना है. उनके अनुसार, जैसे व्यक्ति की आत्मा में न्याय होता है, वैसे ही राज्य में भी होता है. यह आत्मा व्यक्तित्व के अलग-अलग हिस्सों में संतुलन बनाए रखती है, ठीक वैसे ही जैसे राज्य के तीनों वर्ग- शासक, सैनिक और उत्पादक- एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाते हैं. प्लेटो ने न्याय को एक नैतिक सिद्धांत के रूप में समझाया है.
In simple words: प्लेटो के लिए न्याय का मतलब है कि हर कोई अपना काम करे और दूसरों के काम में दखल न दे. उन्होंने व्यक्तिगत और सामाजिक न्याय की बात कही है.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के न्याय सिद्धांत में 'अपना कार्य करना' और 'दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करना' केंद्रीय विचार हैं, जो एक न्यायपूर्ण समाज की संरचना को दर्शाते हैं.
Question 2. अरस्तू के न्याय सम्बन्धी विचारों पर टिप्पणी कीजिए।
Answer: अरस्तू का मानना है कि न्याय का संबंध मानवीय रिश्तों को नियंत्रित करने से है. उनके अनुसार, न्याय में वह सब कुछ शामिल है जो सही और कानूनी है. इसमें समान और उचित वितरण पर जोर दिया जाता है, और यह भी कहा जाता है कि अगर कुछ अन्यायपूर्ण है तो उसे सुधारा जा सकता है. अरस्तू ने न्याय को दो प्रकार का बताया है: वितरणात्मक न्याय और सुधारात्मक न्याय. उनका सिद्धांत समाज में निष्पक्षता और संतुलन बनाए रखने पर केंद्रित है.
In simple words: अरस्तू का मानना था कि न्याय से लोगों के रिश्ते सही रहते हैं. इसमें सही बंटवारा और गलतियों को सुधारना शामिल है.
🎯 Exam Tip: अरस्तू के विचारों में 'उचित', 'विधिक', 'समान वितरण' और 'सुधार की संभावना' न्याय के महत्वपूर्ण पहलू हैं.
Question 3. न्याय के परम्परागत एवं आधुनिक दृष्टिकोण की तुलना कीजिए।
Answer: न्याय के पुराने और नए तरीकों की तुलना हम कुछ बातों के आधार पर कर सकते हैं. पुराने समय में न्याय को नैतिकता से जोड़ा जाता था, जबकि आजकल इसे कानून और नियमों से देखा जाता है. आधुनिक दृष्टिकोण उपयोगिता और सार्वजनिक कल्याण पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है, जबकि पारंपरिक दृष्टिकोण व्यक्तिगत गुणों पर आधारित था.
| क्र.सं | आधार | परम्परागत | आधुनिक |
|---|---|---|---|
| 1. | क्षेत्र | नैतिकता न्याय को आधार है। | कानून न्याय का आधार है। |
| 2. | प्रमुख विचारक | प्लेटो, अरस्तू, सन्त ऑगस्टाइन, थॉमस एक्कीनास आदि | डेविड ह्यूम, हॉब्स, कार्ल मार्क्स, बेन्थम, जे. एस. मिल, जॉन रॉल्स आदि |
| 3. | प्रकृति या स्वरूप | प्रकृति या स्वरूप न्याय आत्मा का गुण है। | न्याय का आशय नियमों का पालन करने से है क्योंकि नियम सर्वहित के आधार हैं। |
| 4. | उपयोगिता | न्याय एक नैतिक सिद्धान्त है जो व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित व सन्तुलित करता है। वस्तुओं का वितरण योग्यता के आधार पर करने पर बल देता है। | न्याय विधिक है जिसमें उपयोगिता को मूल मन्त्र माना गया है। यह वस्तुओं व सेवाओं का वितरण उपयोगिता के आधार पर करने पर बल देता है। |
In simple words: पुराने समय में न्याय को सही व्यवहार और आत्मा के गुण से जोड़ा जाता था. आज के समय में इसे कानूनों और नियमों से देखा जाता है, जो सबके फायदे के लिए होते हैं.
🎯 Exam Tip: तुलना करते समय, पारंपरिक न्याय में 'नैतिकता' और 'व्यक्तिगत गुण' तथा आधुनिक न्याय में 'कानून' और 'सार्वजनिक उपयोगिता' जैसे कीवर्ड्स को हाइलाइट करना चाहिए.
Question 4. न्याय के सार्वभौमिक मूल्यों की वर्तमान समय में क्या प्रांसगिकता है? बताइए।
Answer: न्याय के सार्वभौमिक मूल्य आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. पुराने पश्चिमी और भारतीय विचारों में न्याय को हमेशा अच्छे व्यवहार और नैतिकता का आधार माना गया है. भारतीय दर्शन में 'धर्म' को न्याय का आधार माना गया है, जिसका अर्थ है सही कार्य करना. प्लेटो ने न्याय को आत्मा का गुण और एक अच्छा सामाजिक गुण बताया है. न्याय हमेशा नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करता है, जिससे समाज में संतुलन और व्यवस्था बनी रहती है. आज भी ये मूल्य हमें निष्पक्ष और सही फैसले लेने में मदद करते हैं.
In simple words: न्याय के पुराने और अच्छे सिद्धांत आज भी काम आते हैं. वे हमें सही काम करने, निष्पक्ष रहने और समाज में अच्छा व्यवहार बनाए रखने में मदद करते हैं.
🎯 Exam Tip: न्याय के सार्वभौमिक मूल्य जैसे निष्पक्षता, समानता और कर्तव्यपरायणता आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे समाज में व्यवस्था और मानवीय गरिमा को बनाए रखने में मदद करते हैं.
Question 5. उपयोगितावादियों द्वारा दी गयी न्याय की अवधारणा परम्परागत दृष्टिकोण से किस प्रकार भिन्न है?
Answer: उपयोगितावादियों द्वारा दी गई न्याय की अवधारणा पुराने विचारों से अलग है. उपयोगितावाद का मुख्य लक्ष्य 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' है, जबकि पारंपरिक न्याय नैतिकता और व्यक्तिगत गुणों पर आधारित था. उपयोगितावादी न्याय नियमों के पालन और सार्वजनिक उपयोगिता पर जोर देता है, जबकि पारंपरिक न्याय सही चरित्र और योग्यता के अनुसार वितरण की बात करता था.
| क्र.सं | परम्परागत दृष्टिकोण | उपयोगितावादी दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| 1. | न्याय नैतिक एवं विधिक है। | न्याय का आशय नियमों का पालन करने से है। |
| 2. | सद्धरित्रता, सद्गुण, औचित्यपूर्णता आदि न्याय के स्रोत हैं। | सार्वजनिक उपयोगिता एकमात्र न्याय का स्रोत है। |
| 3. | सार्वजनिक वस्तुओं व सेवाओं का वितरण योग्यता आधार पर आनुपातिक रूप में होना चाहिए। | सार्वजनिक वस्तुओं व सेवाओं का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए। अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख, न्याय का मूल है। |
| 4. | परम्परागत दृष्टिकोण के समर्थक प्लेटो, अरस्तू आदि हैं। | उपयोगितावादी दृष्टिकोण के समर्थक डेविड ह्यूम, बेन्थम, जे.एस. मिल आदि हैं। |
In simple words: उपयोगितावादी न्याय ज्यादा लोगों के ज्यादा फायदे पर जोर देता है, जबकि पुराना न्याय लोगों के अच्छे स्वभाव और योग्यता पर केंद्रित था.
🎯 Exam Tip: उपयोगितावाद में 'अधिकतम सुख' और 'नियमों का पालन' मुख्य बिंदु हैं, जो पारंपरिक न्याय के 'नैतिक गुणों' और 'योग्यता-आधारित वितरण' से भिन्न हैं.
Question 6. जॉन रॉल्स के न्याय सम्बन्धी विचार संक्षेप में लिखिए।
Answer: जॉन रॉल्स ने अपनी मशहूर किताब 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' में सामाजिक न्याय को नए तरीके से समझाया है. उन्होंने पुराने न्याय के विचारों का विरोध किया और न्याय के लिए दो मुख्य बातें बताईं: समाज में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को इस तरह से ठीक किया जाए कि सबसे गरीब लोगों को सबसे ज्यादा फायदा मिले, और सबको समान अवसर मिलें ताकि वे ऊंचे पद और सम्मान पा सकें. इसे 'अज्ञानता के पर्दे' का सिद्धांत भी कहते हैं.
1. सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाए कि इन दोनों से
• न्यूनतम लाभान्वित व्यक्तियों अर्थात् सबसे अधिक पिछड़ों को अधिकतम लाभ हो तथा
• प्रत्येक को उचित अवसर की समानता की स्थिति में पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति सुलभ हो.
In simple words: जॉन रॉल्स का कहना था कि समाज में ऐसी व्यवस्था हो कि सबसे गरीब लोगों का सबसे ज्यादा फायदा हो और सबको बराबर मौके मिलें.
🎯 Exam Tip: जॉन रॉल्स के सिद्धांत में 'अज्ञानता का पर्दा', 'न्यूनतम लाभान्वित व्यक्ति' और 'अवसर की समानता' जैसे कीवर्ड्स को समझना और उनका उल्लेख करना आवश्यक है.
Question 7. न्याय के सार्वलौकिक एवं स्थिर तत्त्वों पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: न्याय के सार्वलौकिक और स्थिर तत्व वे हैं जो हर जगह और हर समय समान रहते हैं. पश्चिमी और भारतीय दोनों विचारों में, अच्छे चरित्र को न्याय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. यह तत्व ऐसा है जो हमेशा समाज के लिए एक उदाहरण होता है. भारतीय परंपरा में 'धर्म' को आदर्श माना गया है, जिसका मतलब है अपने कर्तव्य को निभाना और दूसरों के काम में बेवजह दखल न देना, यही न्याय है. अरस्तू का मानना था कि जो सही और कानूनी है, जो समान और उचित वितरण करता है, वही न्यायसंगत है. आधुनिक विचारक डेविड ह्यूम ने 'सार्वजनिक उपयोगिता' को न्याय का आधार माना है, यानी जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का भला हो. जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी उपयोगिता को ही न्याय का मुख्य आधार माना. ये सभी विचार हमेशा बने रहते हैं और इन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
In simple words: न्याय के कुछ ऐसे सिद्धांत हैं जो हमेशा एक जैसे रहते हैं, जैसे अच्छा व्यवहार, कर्तव्य निभाना और सबका भला सोचना. ये सिद्धांत हर समाज और समय में सही माने जाते हैं.
🎯 Exam Tip: 'सचरित्रता', 'धर्म', 'सार्वजनिक उपयोगिता' और 'न्यायसंगत वितरण' जैसे तत्व न्याय के सार्वभौमिक और स्थिर पहलुओं को उजागर करते हैं.
Question 8. “आर्थिक न्याय के अभाव में सामाजिक एवं राजनीतिक न्याय अर्थहीन है।” स्पष्ट कीजिए।
Answer: अगर समाज में आर्थिक न्याय नहीं है, तो सामाजिक और राजनीतिक न्याय का कोई मतलब नहीं रह जाता. सामाजिक न्याय यह कहता है कि समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो और हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का पूरा मौका मिले. राजनीतिक न्याय का मतलब है कि सबको समान अधिकार और विकास के समान अवसर मिलें, जिससे भेदभाव खत्म हो और सबका भला हो. लेकिन असलियत यह है कि सामाजिक और राजनीतिक न्याय तब तक पूरी तरह से सफल नहीं हो सकते, जब तक लोगों को आर्थिक न्याय न मिले. धन-संपत्ति ही सभी व्यवस्थाओं की जड़ है. जब तक अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ी खाई रहेगी, तब तक किसी भी तरह के न्याय की उम्मीद करना बेकार है.
In simple words: जब तक लोग आर्थिक रूप से बराबर नहीं होते, तब तक समाज में कोई भी न्याय (सामाजिक या राजनीतिक) अधूरा ही रहेगा.
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 'आर्थिक समानता', 'भेदभाव का अंत' और 'संपत्ति का वितरण' जैसे कीवर्ड्स को जोड़कर उत्तर को प्रभावी बनाया जा सकता है.
Question 9. “न्याय मूल रूप से एक नैतिक सिद्धान्त है जिसकी अलग – अलग विचारकों ने अपने-अपने ढंग से व्याख्या की है” स्पष्ट कीजिए।
Answer: न्याय का सीधा संबंध नैतिकता से है. जब कोई व्यक्ति अपने विचारों, व्यवहारों, रहन-सहन और कार्यों में नैतिक नियमों का पालन करता है, तो उसे न्यायपूर्ण माना जाता है. शुरुआती दौर में न्याय का मतलब एक अच्छे और चरित्रवान इंसान के गुणों पर विचार करना था. अरस्तू ने संसाधनों के समान और उचित वितरण की बात कही, जिसे उन्होंने एक नैतिक सिद्धांत बताया. उनका मानना था कि प्रकृति ने सभी को समान बनाया है, इसलिए राज्य के संसाधनों पर सबका समान अधिकार है. संत ऑगस्टाइन ने न्याय को ईश्वरीय राज्य से जोड़ा, जबकि एक्कीनास ने व्यवस्थित जीवन और कर्तव्य पालन को न्याय माना. डेविड ह्यूम और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे आधुनिक विचारकों ने अधिकतम सार्वजनिक सुख को ध्यान में रखकर वस्तुओं और सेवाओं के वितरण पर जोर दिया. ये सभी विचार बताते हैं कि न्याय एक नैतिक सिद्धांत है जिसका मुख्य उद्देश्य सबका कल्याण है.
In simple words: न्याय असल में सही-गलत का एक सिद्धांत है, जिसे हर बड़े विचारक ने अपने-अपने तरीके से समझाया है. सबका मानना था कि न्याय का मकसद समाज में सबका भला करना है.
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में विभिन्न विचारकों (अरस्तू, ऑगस्टाइन, ह्यूम, मिल) और उनके नैतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, साथ ही 'जनकल्याण' और 'उचित वितरण' जैसे शब्दों का उपयोग करें.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. न्याय से आप क्या समझते हैं? न्याय के परम्परागत सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
Answer: न्याय का अर्थ एवं परिभाषा- न्याय को पश्चिमी और भारतीय राजनीतिक विचारों में एक बहुत महत्वपूर्ण अवधारणा माना गया है. यह सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि नैतिक सोच का भी एक जरूरी हिस्सा है. अंग्रेजी शब्द 'justice' लैटिन शब्द 'Justitia' से आया है, जिसका मतलब है 'जोड़ने का काम'. इस तरह, न्याय वह व्यवस्था है जिससे एक व्यक्ति दूसरे से जुड़ा रहता है. न्याय की अवधारणा यह है कि एक समाज में सभी लोग अपने अधिकारों का उपयोग करें और अपने कर्तव्यों का पालन करें, ताकि पूरा समाज एक-दूसरे से जुड़ा रहे. सामाजिक व्यवस्था में हर व्यक्ति का अपना सही स्थान है, और उसे वह स्थान मिलना ही न्याय है.
कई राजनीतिक विचारकों ने न्याय की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं:
प्लेटो के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति को अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है.”
अरस्तु के अनुसार, “न्याय वह सम्पूर्ण सद्गुण है जो हम एक-दूसरे के साथ व्यवहार में प्रदर्शित करते हैं.”
डेविड ह्यूम के अनुसार, "न्याय के उदय का एकमात्र आधार सार्वजनिक उपयोगिता है.”
सन्त ऑगस्टाइन के अनुसार, “न्याय एक व्यवस्थित व अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्तव्यों का पालन करने में निहित है जिनकी व्यवस्था माँग करती है.”
आजकल न्याय को ऐसी अवधारणा के रूप में स्वीकार किया गया है जो जीवन की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
न्याय का परम्परागत सिद्धान्त:
न्याय के पुराने सिद्धांतों में अच्छे गुण, चरित्र, सही काम, आध्यात्मिकता और औचित्यपूर्णता को इंसान का स्वाभाविक गुण मानकर न्याय को समझाया गया है. जो काम इन बातों पर खरे उतरते थे, उन्हें न्यायपूर्ण माना जाता था. प्लेटो ने न्याय को आत्मा का गुण माना है. उनका मानना है कि न्याय व्यक्ति का अपना अच्छा गुण और राजनीतिक समाज के लिए भी एक जरूरी गुण है. न्याय नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करने वाला तत्व भी है. संत ऑगस्टाइन न्याय को राज्य का एक बहुत जरूरी तत्व मानते हैं. थॉमस एक्कीनास ने कानून और न्याय को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया है. उन्होंने लिखा है, “न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीने तथा उन कर्तव्यों को पूरा करने में है जिनकी व्यवस्था जरूरी है.” शुरुआती न्याय विचारों में मानव की नैतिकता, उसके अच्छे गुणों और प्राकृतिक बातों को भगवान की देन मानकर न्याय की अवधारणा को स्वीकार किया गया है.
In simple words: न्याय का मतलब है सही काम करना और सबको सही हक देना. पुराने समय में न्याय को नैतिकता और अच्छे स्वभाव से जोड़ा जाता था.
🎯 Exam Tip: न्याय की परिभाषाएँ देते समय विभिन्न विचारकों जैसे प्लेटो, अरस्तू, डेविड ह्यूम और ऑगस्टाइन के योगदान को शामिल करें. पारंपरिक सिद्धांत में 'नैतिकता', 'धर्म' और 'कर्तव्य' जैसे शब्दों पर जोर दें.
Question 2. प्लेटो व अरस्तू के न्याय पर विचारों की समीक्षा कीजिए।
Answer: प्लेटो और अरस्तू के न्याय संबंधी विचारों को हम इस तरह से समझ सकते हैं:
प्लेटो के न्याय सम्बन्धी विचार:
न्याय के बारे में सबसे पहले यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने बताया था. उनके विचारों का मुख्य आधार न्याय की अवधारणा थी. प्लेटो की मशहूर किताब 'रिपब्लिक' में उन्होंने न्याय की प्रकृति और उसके महत्व को साफ-साफ समझाया है. प्लेटो ने न्याय को इंसान का स्वाभाविक गुण माना है. उनके अनुसार, न्याय वह अच्छा गुण है जिससे प्रेरित होकर इंसान सबका भला चाहता है. प्लेटो का मानना है कि न्याय वह सिद्धांत है जिसमें हर व्यक्ति अपना तय किया हुआ काम करता है और दूसरों के काम में दखल नहीं देता. प्लेटो ने न्याय के दो प्रकार बताए हैं:
1. व्यक्तिगत न्याय
2. सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय
प्लेटो ने एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने के लिए नागरिकों को तीन वर्गों में बांटा था- शासक वर्ग, सैनिक वर्ग और उत्पादक वर्ग. उन्होंने तर्क दिया कि जब ये तीनों वर्ग अपने-अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएंगे, तो राज्य की व्यवस्था अपने आप न्यायपूर्ण हो जाएगी. दूसरों के काम में बेवजह दखल देने को प्लेटो ने व्यक्ति और राज्य दोनों के लिए बुरा माना है. प्लेटो न्याय को आत्मा का एक मानवीय गुण मानते हैं. उनके अनुसार, जैसे आत्मा में न्याय का विचार होता है, वैसे ही राज्य में भी न्याय होता है. आत्मा में न्याय की धारणा व्यक्तित्व के अलग-अलग हिस्सों में संतुलन बनाती है. राज्य में व्याप्त न्याय समाज के हर वर्ग में सामंजस्य बनाता है. प्लेटो ने न्याय के सिद्धांत को एक नैतिक सिद्धांत के रूप में पेश किया है.
अरस्तू के न्याय सम्बन्धी विचार:
प्लेटो की तरह, अरस्तू ने भी न्याय को राज्य के लिए एक जरूरी तत्व माना है. अरस्तू का मानना है कि न्याय का संबंध मानवीय कानूनों को नियंत्रित करने से है. अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे में एक जैसी सोच होने के कारण ही राज्य बनता है. अरस्तू के अनुसार, न्याय में वह सब कुछ शामिल है जो सही और कानूनी है, जो समान और उचित वितरण पर विश्वास रखता है, साथ ही जो इस बात पर जोर देता है कि अगर कुछ अन्यायपूर्ण है तो उसे हमेशा सुधारा जा सकता है. अरस्तू ने न्याय के दो प्रकार बताए हैं:
1. वितरणात्मक या राजनीतिक न्याय तथा
2. सुधारात्मक न्याय
In simple words: प्लेटो ने कहा कि न्याय का मतलब है अपना काम करना और दूसरों के काम में दखल न देना, जबकि अरस्तू ने कहा कि न्याय का मतलब है सही बंटवारा और गलतियों को सुधारना. दोनों ही न्याय को राज्य के लिए बहुत जरूरी मानते थे.
🎯 Exam Tip: दोनों दार्शनिकों के विचारों की तुलना करते समय, प्लेटो के 'कार्य विभाजन' और अरस्तू के 'वितरणात्मक व सुधारात्मक न्याय' पर विशेष ध्यान दें, और उनके कार्यों ('रिपब्लिक') का उल्लेख करें.
Question 3. आपकी राय में न्याय की भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नता/साम्यता है? विवेचन कीजिए।
Answer: न्याय की भारतीय और पश्चिमी अवधारणाओं में कुछ समानताएँ और कुछ अंतर हैं. इन दोनों का अध्ययन हम इस प्रकार कर सकते हैं.
समानता:
1. पश्चिमी और भारतीय दोनों विचारकों ने न्याय की निष्पक्षता को राजनीतिक व्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण माना है. दोनों मानते हैं कि न्याय ही सरकार का आधार है.
2. दोनों ही परंपराओं में इंसान के कर्तव्यों को पूरा करने पर जोर दिया गया है. हर व्यक्ति को अपना धर्म निभाना चाहिए.
3. दोनों परंपराओं के अनुसार, इंसान को अपना तय किया हुआ काम करना चाहिए और दूसरों के काम में बेवजह दखल नहीं देना चाहिए, यही न्याय है.
4. प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतकों- मनु और कौटिल्य ने पश्चिमी विचारकों की तरह ही न्याय की निष्पक्षता और सच्चाई पर बहुत जोर दिया है.
5. प्रजा की संपत्ति और जीवन की रक्षा करना तथा गलत तत्वों और अव्यवस्था फैलाने वालों को दंडित करना- इन दोनों विचारों में समान बातें हैं.
6. प्राचीन भारतीय राजनीतिक और सामाजिक चिंतन में 'धर्म' की अवधारणा प्लेटो के न्याय सिद्धांत से बहुत मिलती-जुलती है.
असमानता:
1. पश्चिमी परंपरा में न्याय को एक अच्छे चरित्र वाले इंसान के गुणों के आधार पर समझाया गया था, जबकि भारतीय चिंतन में 'धर्म' को ही न्याय के रूप में माना गया था.
2. जहाँ प्लेटो के न्याय की अवधारणा मुख्य रूप से राजनीतिक और सामाजिक थी, वहीं भारतीय चिंतन में न्याय को पहले से ही कानूनी रूप में स्वीकार कर लिया गया था.
In simple words: भारतीय और पश्चिमी न्याय में कुछ बातें एक जैसी हैं, जैसे न्याय का निष्पक्ष होना और कर्तव्य निभाना. लेकिन अंतर यह है कि भारतीय न्याय 'धर्म' से जुड़ा है, जबकि पश्चिमी न्याय व्यक्ति के अच्छे स्वभाव पर केंद्रित था.
🎯 Exam Tip: समानता और असमानता दोनों को स्पष्ट करें. भारतीय संदर्भ में 'धर्म' और 'कानूनी न्याय' को, जबकि पश्चिमी संदर्भ में 'नैतिकता' और 'व्यक्तिगत गुण' को हाइलाइट करें.
Question 4. न्याय के विविध रूपों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: न्याय के विविध रूप- पहले न्याय को सिर्फ दो रूपों- नैतिक और कानूनी- में देखा जाता था, लेकिन आजकल न्याय को और भी कई तरीकों से समझा जाने लगा है. आज कानूनी न्याय के अलावा सामाजिक और आर्थिक न्याय को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है. न्याय के अलग-अलग रूप इस प्रकार हैं:
1. नैतिक न्याय: नैतिक न्याय का मतलब है कि इंसान का व्यवहार सही और समाज के लिए अच्छा हो. जो काम सही, करुणा, अहिंसा और ईमानदारी जैसे नैतिक नियमों के हिसाब से होते हैं, उन्हें नैतिक न्याय कहा जाता है. अगर इंसान का व्यवहार नैतिकता के खिलाफ है, तो वह नैतिक न्याय के विरुद्ध माना जाता है. पुराने समय से लेकर आज तक, सभी राजनीतिक चिंतक सत्य, अहिंसा, करुणा, वचनबद्धता और उदारता जैसे गुणों को नैतिक सिद्धांतों का हिस्सा मानते रहे हैं.
2. कानूनी न्याय: कानूनी न्याय में वे सभी नियम और कानूनी व्यवहार शामिल हैं जिनका पालन करना जरूरी होता है. इसमें दो मुख्य बातें आती हैं:
• कानूनों का न्यायोचित होना तथा
• कानूनों को न्यायोचित ढंग से लागू होना. इसके साथ ही जो व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है, उसे बिना किसी पक्षपात के दंडित किया जाना चाहिए.
3. राजनीतिक न्याय: राजनीतिक न्याय का अर्थ है कि राज्य के मामलों में जनता की भागीदारी हो. सभी लोगों को वोट देने का अधिकार, सरकारी पदों पर समान अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मिलना राजनीतिक न्याय में शामिल है. राजनीतिक न्याय में समानता बहुत महत्वपूर्ण है. यह भेदभाव और असमानता को स्वीकार नहीं करता और सभी लोगों के कल्याण पर आधारित होना चाहिए. ऐसा न्याय केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है. राजनीतिक न्याय संविधान और संवैधानिक शासन से ही मिल सकता है. किसी खास वर्ग या व्यक्ति को विशेष अधिकार न देना राजनीतिक न्याय का एक और महत्वपूर्ण गुण है.
4. सामाजिक न्याय: सामाजिक न्याय का मतलब है कि सामाजिक स्थिति के आधार पर लोगों में भेदभाव न हो और हर व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का पूरा मौका मिले. राज्य को हर व्यक्ति को अच्छा जीवन जीने के लिए सुविधाएं देनी चाहिए. सामाजिक न्याय के बिना समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. जॉन रॉल्स जैसे राजनीतिक विचारक ने सामाजिक न्याय को बहुत महत्व दिया है.
5. आर्थिक न्याय: आर्थिक न्याय का उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता लाना है. आर्थिक न्याय का सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि आर्थिक संसाधनों का वितरण करते समय राज्य को व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए. आर्थिक न्याय गरीब और अमीर के बीच की खाई को कम करने पर बल देता है.
In simple words: न्याय के कई रूप हैं: नैतिक न्याय (अच्छे व्यवहार पर आधारित), कानूनी न्याय (नियमों का पालन), राजनीतिक न्याय (सबको बराबर राजनीतिक अधिकार) और सामाजिक-आर्थिक न्याय (समाज और धन में बराबरी).
🎯 Exam Tip: न्याय के प्रत्येक रूप (नैतिक, कानूनी, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक) की स्पष्ट परिभाषा और उसके मुख्य तत्वों का उल्लेख करें. उदाहरणों के साथ अवधारणाओं को समझाना प्रभावी रहेगा.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 बहुंचयनात्मक प्रश्न
Question 1. 'रिपब्लिक' निम्न में से किसके द्वारा लिखित ग्रन्थ है?
(अ) अरस्तू
(ब) प्लेटो
(स) संत ऑगस्टाइन
(द) हॉब्स
Answer: (ब) प्लेटो
In simple words: 'रिपब्लिक' नामक प्रसिद्ध किताब प्लेटो ने लिखी है.
🎯 Exam Tip: यह एक सीधा सवाल है, इसलिए प्लेटो और उनके प्रसिद्ध कार्य 'रिपब्लिक' का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है.
Question 3. 'न्याय मानवीय सम्बन्धों का नियमन है'- यह कथन किससे सम्बद्ध है?
(अ) प्लेटो
(ब) अरस्तू
(स) हॉब्स
(द) जे.एस.मिल
Answer: (ब) अरस्तू
In simple words: अरस्तू ने कहा था कि न्याय से इंसानों के रिश्ते सही रहते हैं.
🎯 Exam Tip: अरस्तू का न्याय सिद्धांत मानव संबंधों और सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करने पर केंद्रित था, इसलिए इस कथन को उनसे जोड़ना सही है.
Question 4. 'ईश्वरीय राज्य का सिद्धान्त' निम्न विचारकों में से किससे सम्बन्धित है?
(अ) अरस्तू
(ब) कार्ल मार्क्स
(स) डेविड ह्यूम
(द) संत ऑगस्टाइन
Answer: (द) संत ऑगस्टाइन
In simple words: 'ईश्वरीय राज्य' का विचार संत ऑगस्टाइन से जुड़ा है.
🎯 Exam Tip: संत ऑगस्टाइन ने 'द सिटी ऑफ गॉड' में ईश्वरीय राज्य की अवधारणा को विस्तार से समझाया है, जो उनके दर्शन का एक केंद्रीय बिंदु है.
Question 5. निम्न में से किसे उपयोगितावाद का प्रवर्तक माना जाता है?
(अ) थॉमस एक्कीनास
(ब) हॉब्स
(स) जे.एस.मिल
(द) जैरेमी बेन्थम्
Answer: (द) जैरेमी बेन्थम्
In simple words: जैरेमी बेन्थम् ने उपयोगितावाद की शुरुआत की थी, जिसमें अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख की बात कही जाती है.
🎯 Exam Tip: जैरेमी बेन्थम् 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' के सिद्धांत के साथ उपयोगितावाद के जनक के रूप में प्रसिद्ध हैं.
Question 6. 'ए थ्योरी आफ जस्टिस' नामक पुस्तक के लेखक हैं
(अ) डेविड ह्यूम
(ब) जॉन रॉल्स
(स) अरस्तू
(द) कार्ल मार्क्स
Answer: (ब) जॉन रॉल्स
In simple words: 'ए थ्योरी आफ जस्टिस' किताब जॉन रॉल्स ने लिखी है.
🎯 Exam Tip: जॉन रॉल्स की यह पुस्तक सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, इसलिए इसके लेखक का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है.
Question 7. 'अज्ञानता के पर्दे' सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं
Answer: (अ) जॉन रॉल्स
In simple words: 'अज्ञानता के पर्दे' का सिद्धांत जॉन रॉल्स ने दिया है. इस सिद्धांत से लोगों को निष्पक्ष तरीके से फैसले लेने में मदद मिलती है.
🎯 Exam Tip: 'अज्ञानता का पर्दा' सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को विकसित करने के लिए एक वैचारिक उपकरण है, जो निष्पक्षता सुनिश्चित करता है. जॉन रॉल्स इस अवधारणा के प्रमुख प्रणेता हैं.
Question 8. 'अर्थशास्त्र' निम्न में से किसके द्वारा लिखित ग्रन्थ है?
(अ) मनु
(ब) कौटिल्य
(स) शुक्र
(द) बृहस्पति
Answer: (ब) कौटिल्य
In simple words: 'अर्थशास्त्र' किताब कौटिल्य ने लिखी है, जो राजनीति और शासन के बारे में है.
🎯 Exam Tip: कौटिल्य की 'अर्थशास्त्र' प्राचीन भारतीय राजनीति और प्रशासन पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, और इसमें न्याय के सिद्धांतों का भी वर्णन है.
Question 9. सत्य, करुणा, उदारता, अहिंसा आदि गुण किस प्रकार के न्याय से सम्बद्ध हैं?
(अ) कानूनी न्याय
(ब) राजनीतिक न्याय
(स) नैतिक न्याय
(द) सामाजिक न्याय
Answer: (स) नैतिक न्याय
In simple words: सच बोलना, दया करना, उदार होना और अहिंसा जैसे अच्छे गुण नैतिक न्याय से जुड़े हैं.
🎯 Exam Tip: नैतिक न्याय व्यक्तिगत व्यवहार और मूल्यों पर आधारित होता है, जबकि अन्य प्रकार के न्याय सामाजिक संरचनाओं या कानूनी प्रक्रियाओं से संबंधित होते हैं.
Question 10. किस प्रणाली में सम्पूर्ण वितरण के मानदण्ड पूर्व निर्धारित होते हैं?
(अ) शुद्ध प्रतिस्पर्धात्मक प्रणाली
(ब) शुद्ध सत्तावादी प्रणाली
(स) काल्पनिक साम्यवादी समाज
(द) लोकतन्त्रात्मक प्रणाली
Answer: (ब) शुद्ध सत्तावादी प्रणाली
In simple words: शुद्ध सत्तावादी प्रणाली में सब कुछ पहले से तय होता है कि क्या और कैसे बांटा जाएगा.
🎯 Exam Tip: शुद्ध सत्तावादी प्रणाली में, वितरण के सभी मानदंड केंद्रीय प्राधिकरण द्वारा तय किए जाते हैं, जिसमें व्यक्तियों के पास बहुत कम स्वायत्तता होती है.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्लेटो के अनुसार न्याय से क्या तात्पर्य है? अथवा प्लेटो के अनुसार न्याय को परिभाषित कीजिए।
Answer: प्लेटो के अनुसार, "प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना ही न्याय है.” यह प्लेटो के न्याय सिद्धांत का मूल है, जिसमें वह एक व्यवस्थित समाज की कल्पना करते हैं.
In simple words: प्लेटो कहते हैं कि न्याय का मतलब है सब अपना-अपना काम करें और दूसरों के काम में टांग न अड़ाएं.
🎯 Exam Tip: प्लेटो की परिभाषा में 'अपना निर्दिष्ट कार्य' और 'अनावश्यक हस्तक्षेप न करना' मुख्य बिंदु हैं, जो उनके आदर्श राज्य की संरचना को दर्शाता है.
Question 2. किस राजनीतिक चिंतक ने अपने दर्शन में न्याय को मनुष्य को आत्मीय गुण माना है?
Answer: प्लेटो ने अपने दर्शन में न्याय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है. उनका मानना था कि न्याय आत्मा का एक आंतरिक गुण है जो व्यक्ति को सही दिशा में ले जाता है.
In simple words: प्लेटो ने न्याय को इंसान की आत्मा का एक खास गुण बताया है.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के लिए न्याय सिर्फ एक सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत गुण भी था जो आत्मा में निहित होता है.
Question 4. प्लेटो की भाँति न्याय को एक मौलिक सद्गुण किस राजनीतिक चिंतक ने माना है?
Answer: ऑगस्टाइन ने प्लेटो की तरह ही न्याय को एक मौलिक सद्गुण माना है. उनका मानना था कि न्याय एक व्यवस्थित जीवन का आधार है, जो ईश्वर के नियमों का पालन करने से आता है.
In simple words: ऑगस्टाइन ने भी प्लेटो की तरह न्याय को एक खास और अच्छा गुण माना है.
🎯 Exam Tip: ऑगस्टाइन ने न्याय को ईश्वरीय राज्य के संदर्भ में समझाते हुए इसे एक महत्वपूर्ण नैतिक गुण के रूप में प्रस्तुत किया.
Question 5. इबेन्स्टीन ने प्लेटो के न्याय-दर्शन के विषय में क्या कहा है?
Answer: इबेन्स्टीन ने प्लेटो के न्याय दर्शन के विषय में लिखा है- 'न्याय के विचार-विमर्श में प्लेटो के राजनीतिक दर्शन के सभी तत्व निहित हैं.' इसका मतलब है कि प्लेटो का न्याय संबंधी सिद्धांत उनके पूरे राजनीतिक चिंतन का आधार है.
In simple words: इबेन्स्टीन ने कहा कि प्लेटो के न्याय के विचार में ही उनके सारे राजनीतिक विचार छिपे हैं.
🎯 Exam Tip: इबेन्स्टीन का यह कथन प्लेटो के न्याय सिद्धांत के महत्व को दर्शाता है, कि यह उनके समग्र राजनीतिक दर्शन का केंद्रबिंदु है.
Question 6. प्लेटो ने न्याय के किन दो रूपों का उल्लेख किया है।
Answer: प्लेटो ने न्याय के दो मुख्य रूपों का उल्लेख किया है. ये हैं व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक या राज्य से संबंधित न्याय. उन्होंने इन दोनों को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया.
1. व्यक्तिगत न्याय
2. सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय
In simple words: प्लेटो ने न्याय को दो तरह का बताया है: एक व्यक्ति के लिए और दूसरा समाज या राज्य के लिए.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के न्याय के ये दो रूप एक व्यक्ति के भीतर और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने की उनकी व्यापक अवधारणा को दर्शाते हैं.
Question 7. प्लेटो ने न्याय सिद्धान्त में मानवीय आत्मा में निहित किन तीन तत्त्वों का उल्लेख किया है ?
Answer: प्लेटो ने अपने न्याय सिद्धांत में मानवीय आत्मा में निहित तीन मुख्य तत्वों का उल्लेख किया है- तृष्णा, शौर्य और बुद्धि. उनका मानना था कि इन तीनों के संतुलन से ही व्यक्ति में न्याय स्थापित होता है.
In simple words: प्लेटो ने इंसान की आत्मा में तीन खास चीजें बताई हैं: इच्छा, हिम्मत और समझ.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के आत्मा के इन तीन तत्वों का संबंध समाज के तीन वर्गों (उत्पादक, सैनिक, शासक) से है, और यह उनके न्यायपूर्ण समाज के सिद्धांत की नींव है.
Question 8. शासक वर्ग में किस आत्मिक मानवीय तत्त्व की प्रधानता मिलती हैं?
Answer: शासक वर्ग में बुद्धि रूपी मानवीय आत्मिक तत्त्व की प्रधानता पाई जाती है. प्लेटो के अनुसार, शासकों को बुद्धिमान और विवेकशील होना चाहिए ताकि वे राज्य का सही ढंग से संचालन कर सकें.
In simple words: शासक वर्ग में बुद्धि की प्रधानता होती है.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के आदर्श राज्य में, प्रत्येक वर्ग के पास एक प्रमुख आत्मिक गुण होता है, और शासक वर्ग का मार्गदर्शक गुण 'बुद्धि' है.
Question 9. प्लेटो ने उत्पादक या सहायक वर्ग में किस मानवीय आत्मा के तत्त्व की प्रधानता बताई है?
Answer: प्लेटो ने उत्पादक या सहायक वर्ग में तृष्णा (इच्छा) रूपी मानवीय आत्मा के तत्त्व की प्रधानता बताई है. यह वर्ग मुख्य रूप से भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित करता है.
In simple words: प्लेटो ने बताया है कि उत्पादक वर्ग में इच्छा और जरूरतों की प्रधानता होती है.
🎯 Exam Tip: उत्पादक वर्ग का मुख्य कार्य समाज की भौतिक जरूरतों को पूरा करना है, और इस कार्य के लिए 'तृष्णा' या 'इच्छा' का गुण महत्वपूर्ण माना गया है.
Question 11. अरस्तू के अनुसार न्याय का सरोकार किससे है?
Answer: अरस्तू के अनुसार, न्याय का मुख्य संबंध मानवीय रिश्तों और उनके नियमों से है. वे मानते थे कि न्याय लोगों के बीच के बर्ताव को सही ढंग से चलाने का काम करता है.
In simple words: अरस्तू का मानना था कि न्याय का सीधा संबंध इंसान के आपसी व्यवहार और रिश्तों को सही रखने से है.
🎯 Exam Tip: अरस्तू के न्याय सिद्धांत को लिखते समय 'मानवीय सम्बन्धों के नियमन' इस मुख्य बिन्दु पर ध्यान दें.
Question 12. अरस्तू का वितरणात्मक न्याय क्या है?
Answer: अरस्तू के वितरणात्मक न्याय के अनुसार, राजनीतिक पद और अधिकार व्यक्तियों को उनकी योग्यता और राज्य के लिए किए गए उनके योगदान के आधार पर दिए जाने चाहिए. इस प्रकार न्याय सबको समान नहीं बल्कि योग्यतानुसार मिलता है.
In simple words: अरस्तू के वितरणात्मक न्याय का मतलब है कि लोगों को उनकी काबिलियत और योगदान के हिसाब से पद और अधिकार मिलने चाहिए.
🎯 Exam Tip: वितरणात्मक न्याय में 'योग्यता' और 'योगदान' शब्दों का प्रयोग करें. इससे उत्तर अधिक सटीक बनता है.
Question 13. सुधारात्मक न्याय से अरस्तू का क्या अभिप्राय है?
Answer: अरस्तू के सुधारात्मक न्याय का मतलब ऐसे न्याय से है जिसका लक्ष्य नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अन्य व्यक्तियों को रोकना है. यह न्याय समाज में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है.
In simple words: सुधारात्मक न्याय का मतलब है लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और गलत कामों को होने से रोकना.
🎯 Exam Tip: सुधारात्मक न्याय के उद्देश्य को 'नागरिकों के अधिकारों की रक्षा' के रूप में स्पष्ट करें.
Question 14. अरस्तू के सुधारात्मक न्याय में राज्य का क्या उत्तरदायित्व है?
Answer: अरस्तू के सुधारात्मक न्याय में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तियों के जीवन, संपत्ति, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करे. राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के अधिकारों का हनन न हो.
In simple words: राज्य का काम है कि वह लोगों की जान, माल, आज़ादी और इज्जत की हिफाज़त करे.
🎯 Exam Tip: इस उत्तर में राज्य के 'जीवन, संपत्ति, स्वतंत्रता एवं सम्मान की रक्षा' जैसे कर्तव्यों पर जोर दें.
Question 15. मध्यकालीन दो ईसाई विचारकों के नाम बताइये जिन्होंने न्याय की अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं।
Answer: न्याय के संबंध में अपनी अवधारणाएँ प्रस्तुत करने वाले दो मध्यकालीन ईसाई विचारक ये हैं:
1. संत ऑगस्टाइन
2. थॉमस एक्कीनास
In simple words: संत ऑगस्टाइन और थॉमस एक्कीनास दो ऐसे ईसाई विचारक थे जिन्होंने मध्यकाल में न्याय के बारे में अपने विचार बताए.
🎯 Exam Tip: मध्यकालीन विचारकों में मुख्य रूप से संत ऑगस्टाइन और थॉमस एक्कीनास के नाम याद रखें.
Question 17. संत ऑगस्टाइन द्वारा लिखित पुस्तक का नाम बताइए।
Answer: संत ऑगस्टाइन द्वारा लिखी गई पुस्तक का नाम 'द सिटी ऑफ गॉड' है. यह पुस्तक उनके न्याय संबंधी विचारों को दिखाती है.
In simple words: संत ऑगस्टाइन ने 'द सिटी ऑफ गॉड' नाम की किताब लिखी थी.
🎯 Exam Tip: प्रमुख विचारकों की प्रमुख पुस्तकों के नाम याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर 'द सिटी ऑफ गॉड'.
Question 18. संत ऑगस्टाइन किस सन्दर्भ में न्याय की विवेचना करते हैं?
Answer: संत ऑगस्टाइन परिवार, लौकिक राज्य (दुनियावी सरकार) और ईश्वरीय राज्य के संदर्भ में न्याय के बारे में बताते हैं. वे मानते थे कि असली न्याय ईश्वरीय राज्य में ही संभव है.
In simple words: संत ऑगस्टाइन परिवार, दुनिया के राज्य और भगवान के राज्य के नजरिए से न्याय को समझाते हैं.
🎯 Exam Tip: संत ऑगस्टाइन के विचारों में 'ईश्वरीय राज्य' और 'लौकिक राज्य' का संदर्भ देना आवश्यक है.
Question 19. संत ऑगस्टाइन के अनुसार न्याय क्या है?
Answer: संत ऑगस्टाइन के अनुसार, न्याय का मतलब है व्यक्ति का ईश्वरीय राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना. वे मानते थे कि भगवान के प्रति निष्ठा ही सच्चा न्याय है.
In simple words: संत ऑगस्टाइन कहते हैं कि भगवान के राज्य के लिए अपने फर्ज निभाना ही न्याय है.
🎯 Exam Tip: संत ऑगस्टाइन की परिभाषा में 'ईश्वरीय राज्य' और 'कर्तव्य पालन' मुख्य शब्द हैं. इनको ज़रूर शामिल करें.
Question 20. मध्यकाल में किस राजनीतिक चिंतक ने ईश्वरीय राज्य में न्याय को एक अपरिहार्य तत्व माना?
Answer: मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन ने ईश्वरीय राज्य में न्याय को एक बहुत ज़रूरी तत्व माना. वे मानते थे कि बिना न्याय के कोई भी राज्य सफल नहीं हो सकता.
In simple words: संत ऑगस्टाइन ने कहा कि भगवान के राज्य में न्याय बहुत ही जरूरी होता है.
🎯 Exam Tip: 'अपरिहार्य तत्व' का अर्थ 'बहुत ज़रूरी हिस्सा' होता है. इस शब्द के साथ ऑगस्टाइन का नाम याद रखें.
Question 21. थॉमस एक्कीनास ने न्याय की क्या परिभाषा दी है?
Answer: थॉमस एक्कीनास के अनुसार, "न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीने तथा उन कर्तव्यों को पूरा करने में है जिनकी व्यवस्था मांग करती है." इसका मतलब है कि हर किसी को अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए.
In simple words: थॉमस एक्कीनास के हिसाब से, न्याय मतलब ज़िंदगी को नियम से जीना और अपने सारे काम सही से करना है.
🎯 Exam Tip: थॉमस एक्कीनास की परिभाषा में 'व्यवस्थित जीवन' और 'कर्तव्यों का पालन' प्रमुख हैं.
Question 22. समानता को न्याय का मौलिक तत्व किस राजनीतिक चिंतक ने माना?
Answer: थॉमस एक्कीनास ने समानता को न्याय का एक बुनियादी और ज़रूरी तत्व माना. वे मानते थे कि न्याय के लिए सभी को बराबर मानना बहुत महत्वपूर्ण है.
In simple words: थॉमस एक्कीनास ने समानता को न्याय का मुख्य हिस्सा बताया.
🎯 Exam Tip: थॉमस एक्कीनास के संदर्भ में 'समानता' को 'मौलिक तत्व' के रूप में याद रखें.
Question 23. आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा के कोई दो प्रतिपादक बताइए।
Answer: आधुनिक काल में न्याय संबंधी धारणा के दो मुख्य समर्थक जैरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल हैं. इन दोनों ने उपयोगितावाद के आधार पर न्याय को समझाया है.
In simple words: आधुनिक युग में जैरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल न्याय के बड़े समर्थक थे.
🎯 Exam Tip: आधुनिक विचारकों में उपयोगितावाद से जुड़े बेंथम और मिल के नाम अवश्य याद रखें.
Question 25. किस राजनीतिक चिंतक ने अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को ही न्याय का मूल मंत्र माना है?
Answer: जैरेमी बेंथम ने 'अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख' को ही न्याय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना है. वे मानते थे कि जो चीज़ ज़्यादा लोगों को खुश करती है, वही सही है.
In simple words: जैरेमी बेंथम ने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को खुश करना ही न्याय का मुख्य आधार है.
🎯 Exam Tip: 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' सिद्धांत का संबंध हमेशा जैरेमी बेंथम से जोड़ें.
Question 26. न्याय में उपयोगितावाद की विचारधारा के समर्थक किन्हीं दो राजनीतिक विचारकों के नाम बताइए।
Answer: न्याय में उपयोगितावाद की सोच का समर्थन करने वाले दो मुख्य राजनीतिक विचारक हैं:
1. जैरेमी बेंथम
2. जॉन स्टुअर्ट मिल
In simple words: जैरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा कि न्याय वही है जिससे ज़्यादा लोगों को फायदा हो.
🎯 Exam Tip: उपयोगितावाद के दो मुख्य समर्थकों- बेंथम और मिल के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है.
Question 27. अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख से क्या तात्पर्य है?
Answer: 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' के सिद्धांत का संबंध उपयोगितावाद से है. इसका मतलब यह है कि सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं को इस तरह से बांटा जाए जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा मिले और वे खुश रहें. यह सिद्धांत समाज के बड़े वर्ग के कल्याण पर ज़ोर देता है.
In simple words: इस सिद्धांत का मतलब है कि कोई भी काम ऐसा होना चाहिए जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को खुशी मिले और उनका भला हो.
🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को 'उपयोगितावाद' से जोड़कर व्याख्या करें और 'सार्वजनिक वस्तुओं के वितरण' का उदाहरण दें.
Question 28. किन्हीं पाँच भारतीय राजनीतिक विचारकों के नाम बताइए, जिन्होंने राज्य व्यवस्था में न्याय को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है?
Answer: राज्य व्यवस्था में न्याय को महत्वपूर्ण मानने वाले पांच प्रमुख भारतीय राजनीतिक विचारक ये हैं:
- मनु
- कौटिल्य
- बृहस्पति
- शुक्र
- विदुर
In simple words: मनु, कौटिल्य, बृहस्पति, शुक्र और विदुर ये पांच भारतीय विचारक थे जिन्होंने राज्य में न्याय को बहुत ज़रूरी बताया.
🎯 Exam Tip: भारतीय विचारकों के नाम याद रखते समय कम से कम तीन-चार नाम ज़रूर शामिल करें ताकि उत्तर पूर्ण लगे.
Question 29. जॉन रॉल्स द्वारा लिखित पुस्तक का नाम बताइये।
Answer: जॉन रॉल्स द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' है. इस किताब में उन्होंने सामाजिक न्याय के बारे में अपने महत्वपूर्ण विचार बताए हैं.
In simple words: जॉन रॉल्स ने 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' नाम की किताब लिखी थी.
🎯 Exam Tip: जॉन रॉल्स की पुस्तक का नाम 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' हमेशा याद रखें.
Question 30. प्लेटो एवं भारतीय विचारकों की न्याय की अवधारणा में क्या अंतर है?
Answer: प्लेटो की न्याय की अवधारणा मुख्य रूप से राजनीतिक और सामाजिक थी, जबकि भारतीय चिंतन में न्याय को कानूनी रूप में स्वीकार किया गया है. भारतीय परंपरा में धर्म और न्याय को आपस में जुड़ा हुआ माना जाता था.
In simple words: प्लेटो ने न्याय को समाज और राजनीति से जोड़ा, वहीं भारतीय विचारकों ने इसे कानून और धर्म का हिस्सा माना.
🎯 Exam Tip: प्लेटो की अवधारणा को 'राजनीतिक व सामाजिक' और भारतीय चिंतन को 'कानूनी' पहलू से जोड़कर अंतर स्पष्ट करें.
Question 32. किन्हीं दो प्राचीन भारतीय चिंतकों के नाम बताइए जिन्होंने न्याय की निष्पक्षता को राज्य व्यवस्था की आधारभूत पूर्णता माना है?
Answer: मनु और कौटिल्य ऐसे दो प्राचीन भारतीय चिंतक हैं जिन्होंने न्याय की निष्पक्षता को राज्य व्यवस्था की एक ज़रूरी और पूरी तरह से लागू होने वाली चीज़ माना है. वे मानते थे कि न्याय बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए.
In simple words: मनु और कौटिल्य ने कहा कि राज्य के लिए न्याय का निष्पक्ष होना बहुत ज़रूरी है.
🎯 Exam Tip: प्राचीन भारतीय चिंतकों में मनु और कौटिल्य के नाम न्याय के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं.
Question 33. परम्परागत रूप में न्याय की कौन-सी अवधारणाएँ प्रचलित हैं?
Answer: परम्परागत (पुरानी) सोच के हिसाब से न्याय की दो मुख्य अवधारणाएँ प्रचलित थीं:
1. नैतिक न्याय
2. कानूनी न्याय
In simple words: पहले के समय में, न्याय को या तो सही-गलत (नैतिक) या फिर कानून के हिसाब से देखा जाता था.
🎯 Exam Tip: परम्परागत न्याय के दो रूपों - नैतिक और कानूनी न्याय को याद रखें.
Question 34. न्याय के विविध रूपों के नाम लिखिए।
Answer: न्याय के कई अलग-अलग रूप हैं, जो इस प्रकार हैं:
1. नैतिक न्याय
2. कानूनी न्याय
3. राजनीतिक न्याय
4. सामाजिक न्याय
In simple words: न्याय के मुख्य रूप नैतिक, कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक न्याय हैं.
🎯 Exam Tip: न्याय के विभिन्न रूपों को क्रमबद्ध तरीके से लिखना उत्तर को अधिक व्यवस्थित बनाता है.
Question 35. नैतिक सिद्धान्त के तत्वों का उल्लेख कीजिए।
Answer: नैतिक सिद्धांत के मुख्य तत्व हैं- सत्य (सच बोलना), करुणा (दया), अहिंसा (किसी को नुकसान न पहुंचाना), वचनबद्धता (अपनी बात पर कायम रहना) और उदारता (खुले दिल का होना). ये सभी अच्छे मानवीय गुणों को दर्शाते हैं.
In simple words: नैतिक सिद्धांत में सच, दया, अहिंसा, वादे निभाना और दरियादिली जैसे अच्छे गुण आते हैं.
🎯 Exam Tip: नैतिक सिद्धांतों के तत्वों को याद रखते समय इन्हें मानवीय गुणों से जोड़कर देखें.
Question 36. कानूनी न्याय के दो आधारभूत सिद्धान्त क्या हैं?
Answer: कानूनी न्याय के दो मुख्य सिद्धांत ये हैं:
1. कानूनों का न्यायोचित होना (कानून खुद सही हों).
2. कानूनों का न्यायोचित ढंग से लागू होना (कानूनों को सही तरीके से लागू किया जाए).
ये सुनिश्चित करते हैं कि न्याय सिर्फ कागजों पर ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी सही हो.
In simple words: कानूनी न्याय के लिए जरूरी है कि कानून अच्छे हों और उन्हें सही से लागू भी किया जाए.
🎯 Exam Tip: कानूनी न्याय के संदर्भ में 'कानूनों का न्यायोचित होना' और 'न्यायोचित ढंग से लागू होना' दोनों बातों पर ज़ोर दें.
Question 37. सामाजिक न्याय को प्रमुखता देने वाले दो राजनीतिक चिन्तकों के नाम बताइए।
Answer: सामाजिक न्याय को महत्वपूर्ण मानने वाले दो राजनीतिक चिंतक हैं:
1. कार्ल मार्क्स
2. जॉन रॉल्स
दोनों ने अपने सिद्धांतों में समाज में समानता और न्यायपूर्ण वितरण पर जोर दिया.
In simple words: कार्ल मार्क्स और जॉन रॉल्स दो विचारक थे जिन्होंने सामाजिक न्याय को बहुत खास बताया.
🎯 Exam Tip: सामाजिक न्याय से जुड़े विचारकों में कार्ल मार्क्स और जॉन रॉल्स के नाम प्रमुख हैं.
Question 38. कार्ल मार्क्स के अनुसार समाज में वर्ग संघर्ष की स्थिति कब उत्पन्न होती है?
Answer: कार्ल मार्क्स के अनुसार, समाज में वर्ग संघर्ष तब शुरू होता है जब गरीब और अमीर के बीच की दूरी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. जब धन-संपत्ति का असमान वितरण बढ़ता है, तो दोनों वर्गों के बीच टकराव पैदा होता है.
In simple words: कार्ल मार्क्स ने कहा कि जब अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा फर्क आ जाता है, तब समाज में लड़ाई (वर्ग संघर्ष) शुरू होती है.
🎯 Exam Tip: कार्ल मार्क्स के संदर्भ में 'गरीब और अमीर के बीच की खाई' या 'धन की असमानता' को वर्ग संघर्ष का कारण बताएं.
Question 39. परम्परागत न्याय के प्रमुख विचारक कौन थे?
Answer: परम्परागत न्याय के दो मुख्य विचारक थे:
1. प्लेटो
2. अरस्तू
इन्होंने प्राचीन काल में न्याय के सिद्धांतों को गहराई से समझाया.
In simple words: प्लेटो और अरस्तू पुराने समय के न्याय के मुख्य विचारक थे.
🎯 Exam Tip: परम्परागत न्याय के विचारकों में प्लेटो और अरस्तू के नाम हमेशा प्रमुखता से लें.
Question 40. न्याय के परम्परागत व आधुनिक दृष्टिकोण में एक अंतर बताइए।
Answer: न्याय के परम्परागत दृष्टिकोण का संबंध व्यक्ति के चरित्र (नैतिक गुणों) से था, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण का संबंध सामाजिक न्याय से है. परम्परागत न्याय व्यक्ति की नैतिकता पर जोर देता था, जबकि आधुनिक न्याय समाज में समानता और उचित वितरण पर केंद्रित है.
In simple words: पुराने समय में न्याय को व्यक्ति के स्वभाव से जोड़ा जाता था, लेकिन आज इसे समाज की समानता से जोड़ा जाता है.
🎯 Exam Tip: परम्परागत न्याय को 'व्यक्ति के चरित्र' से और आधुनिक न्याय को 'सामाजिक न्याय' से जोड़कर अंतर स्पष्ट करें.
Question 41. न्याय को सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व किसने माना?
Answer: जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना. उनका मानना था कि न्याय का उद्देश्य समाज के अधिकतम लोगों का कल्याण करना होना चाहिए.
In simple words: जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा कि न्याय का सबसे ज़रूरी काम समाज का भला करना है.
🎯 Exam Tip: 'सामाजिक उपयोगिता' और 'जॉन स्टुअर्ट मिल' का संबंध याद रखें.
Question 42. उन प्रणालियों का उल्लेख कीजिए जिनमें न्याय की चर्चा निरर्थक है।
Answer: न्याय की चर्चा उन प्रणालियों में बेमानी (निरर्थक) हो जाती है जहाँ लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता का सम्मान नहीं होता. जैसे, किसी तानाशाही व्यवस्था में न्याय का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता है क्योंकि वहाँ शासक ही सब कुछ तय करता है. न्यायपूर्ण समाज के लिए खुली चर्चा और भागीदारी ज़रूरी है.
In simple words: जहाँ लोगों को कोई अधिकार नहीं मिलता, वहाँ न्याय की बात करना बेकार है.
🎯 Exam Tip: निरर्थक चर्चा का संदर्भ ऐसी व्यवस्थाओं से जोड़ें जहाँ स्वतंत्रता और अधिकारों की कमी हो.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. न्याय की किन्हीं पाँच विशेषताओं का वर्णन कीजिए अथवा प्लेटो के अनुसार न्याय के लक्षण बताइए।
Answer: न्याय की विशेषताओं/लक्षणों के बारे में अलग-अलग विचारकों ने अपने-अपने तरीके से बताया है. प्लेटो ने न्याय की निम्नलिखित पांच मुख्य विशेषताएं बताई हैं:
1. न्याय मनुष्य का एक आंतरिक और आत्मिक गुण है.
2. न्याय वह सद्गुण है जो व्यक्ति को दूसरों की भलाई करने के लिए प्रेरित करता है.
3. प्लेटो न्याय को एक राजनीतिक और नैतिक विचार मानते थे.
4. न्याय व्यक्ति का निजी अच्छा गुण होने के साथ-साथ समाज के लिए भी बहुत ज़रूरी गुण है.
5. न्याय नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है.
In simple words: प्लेटो ने न्याय को इंसान का अंदरूनी अच्छा गुण माना है, जो दूसरों की भलाई कराता है. यह राजनीति और समाज के लिए बहुत ज़रूरी है और फैसलों पर असर डालता है.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के न्याय को 'आत्मीय गुण' और 'नैतिक-राजनीतिक प्रत्यय' के रूप में स्पष्ट करें.
Question 2. वितरणात्मक न्याय के सम्बन्ध में अरस्तू के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: वितरणात्मक न्याय के संबंध में अरस्तू का विचार यह है कि पद, प्रतिष्ठा और धन-संपत्ति का वितरण अंकगणित के हिसाब से बराबर नहीं, बल्कि रेखागणित के अनुपात में होना चाहिए. इसका मतलब है कि सबको एक बराबर हिस्सा न मिलकर, हर व्यक्ति को उसकी योग्यता और योगदान के हिसाब से हिस्सा मिलना चाहिए. अरस्तू के इस संबंध में कुछ खास विचार ये हैं:
1. शक्ति और संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता और उसके योगदान के हिसाब से होना चाहिए.
2. अरस्तू आनुपातिक समानता का समर्थन करते थे.
3. अरस्तू के अनुसार, शासन की बागडोर उन्हीं लोगों को मिलनी चाहिए जो शासन करने के योग्य और सक्षम हों.
4. लाभ और जिम्मेदारियां व्यक्ति की क्षमता और सामर्थ्य के अनुपात में ही मिलनी चाहिए.
अरस्तू का मानना था कि सभी को एक जैसा नहीं बल्कि जो जितनी मेहनत करता है या जितनी क्षमता रखता है, उसे उतना ही मिलना चाहिए. इससे समाज में सही संतुलन बना रहता है.
In simple words: अरस्तू के अनुसार, लोगों को उनकी काबिलियत और मेहनत के हिसाब से चीजें मिलनी चाहिए, न कि सबको बराबर. जो जितना लायक है, उसे उतना ही मिलना चाहिए.
🎯 Exam Tip: वितरणात्मक न्याय में 'योग्यता और योगदान' तथा 'आनुपातिक समानता' मुख्य बिंदु हैं. इसे स्पष्ट करें.
Question 3. सुधारात्मक न्याय के सम्बन्ध में अरस्तू ने राज्य के क्या कर्त्तव्य बताये हैं?
Answer: सुधारात्मक न्याय के संबंध में अरस्तू के अनुसार, राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अन्य व्यक्तियों को रोके और उनकी रक्षा करे. अरस्तू ने राज्य के लिए निम्नलिखित दो कर्तव्य बताए हैं:
1. राज्य को नागरिकों के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए.
2. राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के सम्मान को ठेस न पहुंचे और सभी को समान अवसर मिलें.
अरस्तू प्लेटो के शिष्य थे और उन्होंने न्याय का संबंध मानवीय संबंधों के नियमन से माना है. उनके अनुसार सुधारात्मक न्याय एक महत्वपूर्ण प्रकार का न्याय है जो समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में मदद करता है.
In simple words: अरस्तू ने कहा कि राज्य का काम है कि वह लोगों की जान, माल, आज़ादी और इज्जत की हिफाज़त करे, और किसी को किसी का हक न छीनने दे.
🎯 Exam Tip: सुधारात्मक न्याय में राज्य के कर्तव्यों को 'जीवन, संपत्ति, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा' के रूप में संक्षेप में बताएं.
Question 4. मध्यकाल में न्याय सम्बन्धी विचार क्या थे?
Answer: मध्यकाल में ईसाई विचारकों ने न्याय के बारे में अपने-अपने तरीके से बताया. संत ऑगस्टाइन ने 'ईश्वरीय राज्य' को न्याय का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा माना. उन्होंने लिखा है कि "जिन राज्यों में न्याय नहीं है, वे सिर्फ चोरों और लुटेरों का अड्डा हैं." मध्यकाल के दूसरे प्रमुख विचारक थॉमस एक्कीनास ने समानता को न्याय का मुख्य आधार माना. उन्होंने कानून और न्याय को एक-दूसरे से जोड़ते हुए लिखा है कि "न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीने तथा उन कर्तव्यों को पूरा करने में है जिनकी व्यवस्था मांग करती है." ये विचार इस बात पर जोर देते हैं कि समाज में सही ढंग से रहने और अपने कर्तव्यों का पालन करने से ही न्याय स्थापित होता है.
In simple words: मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन ने कहा कि न्याय के बिना राज्य चोरों का अड्डा है, जबकि थॉमस एक्कीनास ने समानता और नियम से ज़िंदगी जीने को न्याय बताया.
🎯 Exam Tip: मध्यकाल के विचारकों में ऑगस्टाइन और एक्कीनास के नाम उनके प्रमुख विचारों के साथ याद रखें.
Question 5. उपयोगितावादियों ने न्याय की व्याख्या किस प्रकार की है?
Answer: उपयोगितावादी विचारकों- डेविड ह्यूम, जैरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल- ने न्याय की व्याख्या इस प्रकार की है:
1. डेविड ह्यूम के अनुसार, सार्वजनिक उपयोगिता ही न्याय का एकमात्र आधार होनी चाहिए. जो चीज़ ज़्यादा लोगों के लिए उपयोगी है, वही न्याय है.
2. जैरेमी बेंथम के अनुसार, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं का वितरण इस तरह से होना चाहिए जिससे 'अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख' मिले. यही उनका मुख्य सूत्र था.
3. जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का एक महत्वपूर्ण तत्व माना. उन्होंने भी उपयोगिता को ही न्याय का मुख्य हिस्सा बताया.
ये विचारक मानते थे कि न्याय का उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का भला करना और उन्हें खुश रखना होना चाहिए.
In simple words: उपयोगितावादी कहते हैं कि न्याय का मतलब है ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा फायदा और खुशी मिले. डेविड ह्यूम, बेंथम और मिल इसके खास समर्थक थे.
🎯 Exam Tip: उपयोगितावादी दृष्टिकोण में 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' और 'सामाजिक उपयोगिता' मुख्य शब्द हैं.
Question 6. भारतीय राजनीतिक चिंतन में न्याय सम्बन्धी धारणा को स्पष्ट कीजिए।
Answer: भारतीय राजनीतिक चिंतन में न्याय को बहुत महत्व दिया गया है. मनु, कौटिल्य, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, विदुर और सोमदेव जैसे विचारकों ने न्याय को राज्य की आत्मा माना है. मनु और कौटिल्य ने न्याय में निष्पक्षता और सच्चाई पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि जो राजा अपनी प्रजा के लिए न्याय की व्यवस्था नहीं कर सकता, वह जीवित रहने के लायक नहीं है. न्याय का उद्देश्य प्रजा को सुखी जीवन देना और उनके दुखों को दूर करना है.
शुक्र ने राज्य की न्यायपालिका को सही ढंग से बनाने और न्यायिक व्यवस्था को ऐसा रूप देने की बात कही जिससे न्याय का काम बिना किसी पक्षपात के निष्पक्ष तरीके से हो. प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में धर्म का उपयोग न्याय के समान ही हुआ है. कर्म की पुरानी भारतीय अवधारणा व्यक्ति को समाज में उसकी तय जगह और कर्तव्यों का ज्ञान कराती है. भारतीय चिंतन में न्याय को कानूनी रूप में भी स्वीकार किया गया है, यानी कानूनों को सही तरीके से लागू करना न्याय का हिस्सा है.
In simple words: भारतीय सोच में न्याय को राजा का सबसे जरूरी काम माना गया है. मनु और कौटिल्य ने कहा कि राजा को निष्पक्ष न्याय करना चाहिए ताकि लोग सुखी रहें. धर्म और कानून भी न्याय का अहम हिस्सा थे.
🎯 Exam Tip: भारतीय चिंतन में न्याय को 'राज्य का प्राण', 'धर्म से संबंध', और 'निष्पक्षता' जैसे बिन्दुओं से स्पष्ट करें.
Question 7. नैतिक न्याय क्या है और राजनीतिक चिंतक इसे कैसे देखते हैं?
Answer: जब व्यक्ति का आचरण और व्यवहार नैतिक नियमों के अनुसार होता है और समाज के लिए सही होता है, तो उसे नैतिक न्याय कहा जाता है. अगर व्यक्ति का व्यवहार नैतिकता के खिलाफ है, तो उसे नैतिक न्याय के विरुद्ध माना जाता है. पुराने समय से लेकर आज तक सभी राजनीतिक चिंतक सत्य, अहिंसा, करुणा, वचनबद्धता और उदारता जैसे गुणों को नैतिक सिद्धांतों का हिस्सा मानते आ रहे हैं. इन गुणों को अपनाना व्यक्ति को न्यायपूर्ण बनाता है.
नैतिक न्याय का संबंध व्यक्ति की अंतरात्मा से होता है, जो उसे सही और गलत के बीच अंतर करने में मदद करती है. यह सिर्फ बाहरी कानूनों का पालन करना नहीं, बल्कि अंदर से सही होना भी है.
In simple words: नैतिक न्याय का मतलब है जब कोई इंसान ईमानदारी, दया और अहिंसा जैसे अच्छे गुणों के साथ व्यवहार करता है. यह इंसान के स्वभाव से जुड़ा है और उसे सही काम करने के लिए प्रेरित करता है.
🎯 Exam Tip: नैतिक न्याय को 'व्यक्ति के आचरण', 'नैतिक नियमों' और 'सत्य, अहिंसा, करुणा' जैसे गुणों से जोड़कर बताएं.
Question 8. राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के साधनों का उल्लेख कीजिए।
Answer: राजनीतिक न्याय की अवधारणा समानता पर आधारित है. एक राजव्यवस्था में सभी व्यक्तियों को समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए. वहाँ कोई भेदभाव या असमानता नहीं होनी चाहिए. सभी का कल्याण हो-ऐसी अवधारणा राजनीतिक न्याय से जुड़ी है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के कुछ साधन ये हैं:
1. वयस्क मताधिकार: सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार.
2. विचार, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोगों को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आज़ादी.
3. बिना किसी भेदभाव के सार्वजनिक पद पर आसीन होने का अधिकार: सभी को बिना किसी भेदभाव के सरकारी पदों पर बैठने का अवसर.
4. किसी विशेष वर्ग या व्यक्ति को विशेष अधिकार प्रदान न करना: किसी एक समूह को ज़्यादा फायदे न देना.
ये साधन सुनिश्चित करते हैं कि सभी नागरिकों को राजनीति में बराबर की भागीदारी और अधिकार मिलें.
In simple words: राजनीतिक न्याय पाने के लिए सबको वोट देने का हक, बोलने की आज़ादी, सरकारी नौकरी के बराबर अवसर और किसी को खास फायदा न देना ज़रूरी है.
🎯 Exam Tip: राजनीतिक न्याय के साधनों में 'मताधिकार', 'स्वतंत्रता', 'समान अवसर' और 'विशेष अधिकार न देना' जैसे बिंदु शामिल करें.
Question 9. आर्थिक न्याय की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
Answer: आर्थिक न्याय का मतलब समाज में आर्थिक समानता लाना है, हालांकि व्यवहार में यह हमेशा संभव नहीं हो पाया है. आर्थिक न्याय के सिद्धांत का मानना है कि:
1. आर्थिक संसाधनों को बांटते समय राज्य को व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए.
2. आर्थिक न्याय गरीबी और अमीरी के बीच की असमानता को कम करने पर जोर देता है.
3. यह व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को सीमित करने पर जोर देता है.
समाजवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि जिस समाज में आर्थिक असमानता ज़्यादा गहरी होगी, वहाँ वर्ग संघर्ष (अमीरों और गरीबों के बीच लड़ाई) उतना ही मुश्किल होगा.
आर्थिक न्याय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति केवल गरीबी के कारण अवसरों से वंचित न रहे.
In simple words: आर्थिक न्याय का मतलब है समाज में पैसों की बराबरी लाना और अमीर-गरीब का फर्क कम करना. राज्य को पैसे बांटते समय लोगों की आर्थिक हालत का ध्यान रखना चाहिए.
🎯 Exam Tip: आर्थिक न्याय की अवधारणा में 'आर्थिक समानता', 'गरीबी-अमीरी की खाई कम करना' और 'व्यक्तिगत संपत्ति का सीमित अधिकार' मुख्य हैं.
RBSE Class 12 Political Science Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. प्लेटो ने राज्य और समाज का वर्गीकरण किन आधारों पर किया है? बताइए।
Answer: प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो के चिंतन का मुख्य आधार न्याय की संकल्पना थी. प्लेटो ने मानवीय आत्मा के तीन तत्वों - बुद्धि, शौर्य और तृष्णा - के आधार पर राज्य और समाज को तीन वर्गों में बांटा है:
1. शासक या अभिभावक वर्ग: यह समाज का सबसे प्रभावशाली वर्ग है. यह पूरे राज्य या समाज का प्रतिनिधित्व करता है. इस वर्ग में बुद्धि की मात्रा सबसे ज़्यादा होती है. इनका काम ज्ञान और विवेक से शासन करना होता है.
2. सैनिक वर्ग या रक्षक वर्ग: यह मध्यम स्तर का वर्ग है. इसका काम पूरे समाज और राज्य की रक्षा करना होता है. इस वर्ग में शौर्य (बहादुरी) तत्व की प्रधानता होती है. ये अपनी जान जोखिम में डालकर देश की सुरक्षा करते हैं.
3. उत्पादक या सहायक वर्ग: यह समाज का निचले स्तर का वर्ग है. इसे आधार वर्ग भी कहा जा सकता है. इस वर्ग में इंद्रिय सुख, तृष्णा और इच्छा तत्व की अधिकता पाई जाती है. इनका काम समाज के लिए उत्पादन करना है, जैसे किसान और कारीगर.
प्लेटो मानते थे कि सभी मनुष्यों में ये तीनों तत्व कुछ-कुछ मात्रा में होते हैं. परंतु जिस तत्व की मात्रा व्यक्ति में ज़्यादा होती है, वही उसके गुणों को बढ़ावा देती है. प्लेटो ने तर्क दिया कि जब ये तीनों वर्ग अपने-अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेंगे और एक-दूसरे के कामों में बेवजह दखल नहीं देंगे, तब राज्य की व्यवस्था अपने आप न्यायपूर्ण हो जाएगी. उनका मानना था कि न्याय एक नैतिक सिद्धांत है जो समाज में संतुलन बनाए रखता है.
In simple words: प्लेटो ने इंसान की आत्मा के तीन हिस्सों - बुद्धि, बहादुरी और इच्छा - के आधार पर समाज को शासक, सैनिक और उत्पादक वर्गों में बांटा है. उन्होंने कहा कि जब हर वर्ग अपना काम ईमानदारी से करेगा, तो समाज में न्याय रहेगा.
🎯 Exam Tip: प्लेटो के वर्गीकरण में 'बुद्धि, शौर्य, तृष्णा' और उनके संबंधित वर्गों (शासक, सैनिक, उत्पादक) का स्पष्ट उल्लेख करें.
Question 2. न्याय के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: न्याय का ऐतिहासिक विकास कई चरणों में हुआ है:
(i) प्लेटो का न्याय सिद्धांत:
न्याय के संबंध में सबसे पहले विचार यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने दिए. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'रिपब्लिक' में उन्होंने न्याय की प्रकृति और उसके महत्व को समझाया है. प्लेटो ने न्याय को मनुष्य का आत्मिक गुण माना. उनके अनुसार, न्याय वह सद्गुण है जिससे व्यक्ति दूसरों की भलाई चाहता है. प्लेटो का मानना था कि न्याय एक ऐसी अवधारणा है जिसमें हर व्यक्ति अपना तय काम करता है और दूसरों के काम में दखल नहीं देता. उन्होंने न्याय के दो रूप बताए- व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक या राज्य से संबंधित न्याय. वे न्याय को आत्मा का मानवीय सद्गुण मानते थे. प्लेटो के अनुसार, आत्मा में निहित न्याय का विचार राज्य में निहित न्याय के समान है. आत्मा में न्याय का विचार व्यक्ति के अलग-अलग पक्षों में संतुलन बनाता है.
(ii) अरस्तू के न्याय संबंधी विचार:
अरस्तू ने भी न्याय को राज्य के लिए एक आवश्यक तत्व माना है. उनका मानना था कि लोगों के मन में न्याय के बारे में एक जैसी धारणा होती है, इसी वजह से राज्य अस्तित्व में आता है. अरस्तू के अनुसार न्याय में वह सब शामिल है जो उचित और कानूनी है, जो समान और न्यायपूर्ण वितरण पर जोर देता है, और जो किसी भी अन्यायपूर्ण चीज़ में सुधार की संभावना रखता है. अरस्तू ने न्याय के दो भेद बताए हैं- वितरणात्मक या राजनीतिक न्याय और सुधारात्मक न्याय. वितरणात्मक न्याय का सिद्धांत कहता है कि राजनीतिक पद व्यक्तियों को उनकी योग्यता और राज्य के प्रति उनकी सेवा के अनुसार मिलने चाहिए. सुधारात्मक न्याय में राज्य का काम है कि वह व्यक्ति के जीवन, संपत्ति, सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा करे. अरस्तू का न्याय सिद्धांत समाज में संतुलन और व्यवस्था बनाए रखने पर जोर देता है.
(iii) मध्यकालीन न्याय संबंधी विचार:
मध्यकाल में ईसाई विचारकों ने न्याय की अपनी-अपनी तरह से व्याख्या की. संत ऑगस्टाइन ने 'ईश्वरीय राज्य' की अवधारणा प्रस्तुत की और उसे न्याय का एक आवश्यक तत्व माना. उन्होंने लिखा है कि जिन राज्यों में न्याय नहीं है, वे सिर्फ चोरों और लुटेरों के अड्डे हैं. थॉमस एक्कीनास नामक विचारक ने समानता को न्याय का मौलिक आधार माना. उन्होंने कानून और न्याय को एक-दूसरे से जोड़ते हुए कहा कि न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीने तथा उन कर्तव्यों को पूरा करने में है जिनकी व्यवस्था मांग करती है.
(iv) आधुनिक काल में न्याय संबंधी धारणा:
आधुनिक काल में न्याय संबंधी धारणा के मुख्य समर्थक डेविड ह्यूम, जैरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल हैं. डेविड ह्यूम ने न्याय का अर्थ सिर्फ नियमों का पालन करना माना. उन्होंने सार्वजनिक उपयोगिता को न्याय का एकमात्र स्रोत बताया. उपयोगितावाद के जनक जैरेमी बेंथम के अनुसार, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए, जिसका मुख्य सूत्र 'अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख' है. जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का महत्वपूर्ण तत्व माना. उन्होंने भी उपयोगिता को ही न्याय का मूल अंग माना है.
आज के समय में प्राकृतिक कानून पर आधारित न्याय की कल्पना पर विश्वास नहीं किया जाता. आज न्याय के संबंध में केवल वही कल्पना स्वीकार की जा सकती है जो जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हो. जॉन रॉल्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' में आधुनिक संदर्भ में सामाजिक न्याय का विश्लेषण किया है. उन्होंने न्याय संबंधी पुरानी सोच का विरोध किया. रॉल्स के न्याय संबंधी विचार दो मुख्य बातों पर आधारित हैं:
1. हर व्यक्ति को मूलभूत स्वतंत्रता की पूरी व्यवस्था मिलनी चाहिए, जो सभी के लिए समान हो.
2. सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को इस तरह से ठीक किया जाए कि इनसे सबसे कम फायदा पाने वाले लोगों (यानी सबसे ज़्यादा पिछड़े हुए) को सबसे ज़्यादा लाभ मिले और हर किसी को उचित अवसर मिले ताकि वे पद और सम्मान प्राप्त कर सकें. रॉल्स समाज के लिए उसी सिद्धांत को सबसे न्यायपूर्ण मानते हैं जिसमें लोग स्वेच्छा से 'अज्ञानता के पर्दे' को स्वीकार करते हैं.
प्राचीन भारतीय अवधारणा भी व्यक्ति को समाज में उसकी तय जगह और कर्तव्यों का ज्ञान कराती है. भारतीय चिंतन में न्याय को कानूनी रूप में स्वीकार किया गया है. मनु और कौटिल्य ने न्याय में निष्पक्षता और सत्यता पर जोर दिया और कहा कि जो राजा अपनी प्रजा के लिए न्याय नहीं कर सकता, वह जीवित रहने के योग्य नहीं है.
In simple words: न्याय का विचार प्लेटो और अरस्तू से शुरू होकर मध्यकाल में ईसाई सोच से जुड़ा. फिर आधुनिक युग में बेंथम, मिल और रॉल्स जैसे विचारकों ने इसे 'अधिकतम लोगों के सुख' और 'सामाजिक समानता' से जोड़ा. भारतीय परंपरा में भी न्याय को धर्म और कानून से जोड़कर देखा गया है.
🎯 Exam Tip: न्याय के ऐतिहासिक विकास को प्लेटो, अरस्तू, मध्यकालीन विचारकों (ऑगस्टाइन, एक्कीनास), आधुनिक विचारकों (ह्यूम, बेंथम, मिल, रॉल्स) और भारतीय चिंतन के प्रमुख बिन्दुओं में बांटकर प्रस्तुत करें.
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