RBSE Solutions Class 12 Physics Chapter 16 इलेक्ट्रॉनिकी

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Detailed Chapter 16 इलेक्ट्रॉनिकी RBSE Solutions for Class 12 Physics

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Class 12 Physics Chapter 16 इलेक्ट्रॉनिकी RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 Physics Chapter 16 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

RBSE Class 12 Physics Chapter 16 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. परमशून्य ताप पर नैज जर्मेनियम और नैज सिलिकॉन होते हैं-
(अ) अतिचालक
(ब) अच्छे अर्धचालक
(स) आदर्श कुचालक
(द) चालक
Answer: (स) आदर्श कुचालक
In simple words: परमशून्य तापमान पर, शुद्ध जर्मेनियम और सिलिकॉन किसी भी बिजली का संचालन नहीं करते हैं और एक आदर्श इन्सुलेटर (कुचालक) की तरह व्यवहार करते हैं।

🎯 Exam Tip: यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है कि परमशून्य ताप पर नैज अर्धचालक आदर्श कुचालक होते हैं, क्योंकि उनके संयोजकता बैंड और चालन बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल बहुत अधिक होता है।

 

Question 2. कुचालक में संयोजकता बैंड और चालन बैंड के मध्य वर्जित ऊर्जा अन्तराल निम्नलिखित कोटि का होता है।
(अ) 0.1 eV
(ब) 6 eV
(स) 1 eV
(द) 10 eV
Answer: (ब) 6 eV
In simple words: कुचालकों में, इलेक्ट्रॉन संयोजकता बैंड से चालन बैंड तक नहीं जा पाते, क्योंकि उनके बीच बहुत बड़ा ऊर्जा का अंतर होता है, लगभग 6 eV का।

🎯 Exam Tip: कुचालकों में ऊर्जा बैंड का अंतर 3 eV से अधिक होता है, जो आमतौर पर 6 eV की सीमा में आता है, जिससे इलेक्ट्रॉन चालन के लिए उपलब्ध नहीं हो पाते।

 

Question 3. नैज सिलिकॉन में कक्ष ताप पर आवेश वाहकों की प्रति एंकाक आयतन संख्या \(1.6 \times 10^{16}\)/m³ है। यदि इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता \(0.15 \text{ m}^2 \text{ V}^{-1}\text{s}^{-1}\) तथा होल गतिशीलता \(0.05 \text{ m}^2 \text{ V}^{-1}\text{s}^{-1}\) है तब सिलिकॉन की चालकता (\(\Omega^{-1} \text{ m}^{-1}\) में) है।
(अ) \(1.28 \times 10^{-4}\)
(ब) \(3.84 \times 10^{-4}\)
(स) \(5.12 \times 10^{-4}\)
(द) \(2.14 \times 10^{-4}\)
Answer: (स) \(5.12 \times 10^{-4}\)
एकांक आयतन संख्या (\(n\)) \( = 1.6 \times 10^{16}/\text{m}^3 \)
इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता (\(\mu_e\)) \( = 0.150 \text{ m}^2 \text{ V}^{-1}\text{s}^{-1} \)
होल गतिशीलता (\(\mu_h\)) \( = 0.050 \text{ m}^2 \text{ V}^{-1}\text{s}^{-1} \)
चालकता (\(\sigma\)) \( = n e (\mu_e + \mu_h) \)
\( = 1.6 \times 10^{-19} \times 1.6 \times 10^{16} \times (0.150 + 0.050) \)
\( = 2.56 \times 10^{-3} \times 0.2 \)
\( = 0.512 \times 10^{-3} \)
\( = 5.12 \times 10^{-4} \)
In simple words: सिलिकॉन की चालकता निकालने के लिए, हमें आवेश वाहकों की संख्या, इलेक्ट्रॉनिक आवेश और इलेक्ट्रॉन व होल की गतिशीलता को जोड़ना होता है। यह गणना दिखाती है कि कुल चालकता \(5.12 \times 10^{-4} \Omega^{-1} \text{ m}^{-1}\) है।

🎯 Exam Tip: चालकता की गणना करते समय सभी इकाइयों को SI प्रणाली में रखना सुनिश्चित करें और \(e\) (इलेक्ट्रॉनिक आवेश) का मान \(1.6 \times 10^{-19}\) C सही ढंग से उपयोग करें।

 

Question 4. एक NPN ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक की तरह उपयोग में लाया जा रहा है तो-
(अ) इलेक्ट्रॉन आधार से संग्राहक की ओर चलते हैं।
(ब) होल उत्सर्जक से आधार की ओर चलते हैं।
(स) होल आधार से उत्सर्जक की ओर चलते हैं।
(द) इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक से आधार की ओर चलते हैं।
Answer: (द) इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक से आधार की ओर चलते हैं।
In simple words: NPN ट्रांजिस्टर में, मुख्य आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। जब इसे एम्पलीफायर की तरह उपयोग किया जाता है, तो इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक से आधार की ओर गति करते हैं।

🎯 Exam Tip: NPN ट्रांजिस्टर में इलेक्ट्रॉन, उत्सर्जक से आधार में प्रवेश करते हैं और फिर अधिकांश संग्राहक की ओर चले जाते हैं, जबकि बहुत कम इलेक्ट्रॉन आधार से होकर गुजरते हैं।

 

Question 5. संलग्न चित्र में दिये गये परिपथ के लिये बूलीय समीकरण होगा।
Answer: (स) A+B=y (चूँकि A के आगे NO7 के कारण A)
In simple words: दिए गए परिपथ के लिए बूलीय समीकरण \(Y = A+B\) है, जो एक OR गेट का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें यह भी बताया गया है कि यदि \(A\) के आगे एक NOT गेट लगाया जाए, तो उसका आउटपुट \(\bar{A}\) होगा।

🎯 Exam Tip: किसी भी बूलीय समीकरण को समझने के लिए, हमेशा दिए गए लॉजिक गेट्स की पहचान करें और उनके मानक बूलीय एक्सप्रेशन को जोड़कर अंतिम समीकरण प्राप्त करें।

 

Question 6. किसी 'एन्ड द्वार' के लिये तीन क्रमशः A, B व C है तो इसका निर्गत Y होगी
(अ) \(Y = A.B + C\)
(ब) \(Y = A + B + C\)
(स) \(Y = A + B.C\)
(द) \(Y = A. B.C\)
Answer: (द) \(Y = A. B.C\)
In simple words: एक AND गेट में, आउटपुट \(Y\) तभी 1 होता है जब सभी इनपुट (\(A\), \(B\), और \(C\)) 1 हों। इसका बूलीय समीकरण \(Y = A \cdot B \cdot C\) होता है।

🎯 Exam Tip: AND गेट के लिए, सभी इनपुट टर्मिनलों को आपस में गुणा किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल तभी आउटपुट हाई (1) हो जब सभी इनपुट हाई हों।

 

Question 7. किसी ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ आधार परिपथ में धारा प्रवर्धन गुणांक 0.95 है। जब उत्सर्जक धारा 2 mA है तब आधार धार है।
(अ) 0.1 mA
(ब) 0.2 mA
(स) 0.19 mA
(द) 1.9 mA
Answer: (अ) 0.1 mA
उभयनिष्ठ आधार परिपथ में धारा प्रवर्धन गुणांक (\(\alpha\)) \( = 0.95 \)
उत्सर्जक धारा (\(I_E\)) \( = 2 \text{mA} \)
हम जानते हैं कि
\( \alpha = \frac{I_C}{I_E} \)

\( \implies I_C = \alpha \times I_E \)
\( = 0.95 \times 2 \text{mA} \)
\( = 1.9 \text{mA} \)
और, \( I_E = I_B + I_C \)

\( \implies I_B = I_E - I_C \)
\( = 2 \text{mA} - 1.9 \text{mA} \)
\( = 0.1 \text{mA} \)
In simple words: ट्रांजिस्टर के लिए, उत्सर्जक धारा आधार धारा और संग्राहक धारा का योग होती है। धारा प्रवर्धन गुणांक (\(\alpha\)) का उपयोग करके हम संग्राहक धारा निकालते हैं, और फिर इसे उत्सर्जक धारा से घटाकर आधार धारा प्राप्त करते हैं।

🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में, \(I_E = I_B + I_C\) संबंध और \(\alpha = I_C/I_E\) या \(\beta = I_C/I_B\) सूत्रों का सही उपयोग करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. तरंगदैर्ध्य ज्ञात करो यदि \(E_g = 0.7 \text{ eV}\) है।
Answer: \( \lambda_{max} = \frac{1242}{E_g \text{ eV}} \text{ nm} \)
\( = \frac{1242}{0.7} \text{ nm} \)
\( = 1774.28 \text{ nm} \)
\( = 17742.8 \text{ A}^\circ \)
\( \approx 17700 \text{ A}^\circ \)
In simple words: जब ऊर्जा अंतराल (\(E_g\)) 0.7 eV दिया गया हो, तो अधिकतम तरंगदैर्ध्य की गणना एक मानक सूत्र का उपयोग करके की जाती है। इसका मान लगभग \(17700 \text{ A}^\circ\) आता है।

🎯 Exam Tip: ऊर्जा बैंड अंतराल से अधिकतम तरंगदैर्ध्य की गणना के लिए सूत्र \(\lambda_{max} = \frac{hc}{E_g}\) का उपयोग किया जाता है, जहाँ \(hc\) का मान 1242 eV-nm होता है।

 

Question 9. चित्र में प्रदर्शित दो NAND द्वारों में प्राप्त तर्क द्वार है
(अ) AND द्वार
(ब) OR द्वार
(स) XOR द्वार
(द) NOR द्वार
Answer: (अ) AND द्वार
In simple words: जब दो NAND गेट को विशेष तरीके से जोड़ा जाता है (एक NAND गेट के आउटपुट को दूसरे NAND गेट के दोनों इनपुट से जोड़कर), तो वे मिलकर एक AND गेट की तरह काम करते हैं।

🎯 Exam Tip: NAND गेट एक सार्वभौमिक गेट है, जिसका अर्थ है कि इससे अन्य सभी मूलभूत लॉजिक गेट (AND, OR, NOT) बनाए जा सकते हैं। इस संयोजन को डी-मॉर्गन के प्रमेय से भी समझा जा सकता है।

 

Question 10. दो सर्वसम PN संधियाँ एक बैटरी के साथ श्रेणीक्रम में चित्र के अनुसार जोड़ी जा सकती है किन संधियों के लिए विभव पतन बराबर है।
(अ) परिपथ 1 व 2 में
(ब) परिपथ 2 व 3 में
(स) परिपथ 3 व 1 में
(द) केवल परिपथ 1 में
Answer: (ब) परिपथ 2 व 3 में
In simple words: यदि दो समान PN संधियाँ एक बैटरी के साथ श्रेणीक्रम में जोड़ी जाती हैं, तो परिपथ 2 और 3 में विभव पतन बराबर होगा। यह स्थिति तब बनती है जब डायोड समान रूप से फॉरवर्ड या रिवर्स बायस्ड हों।

🎯 Exam Tip: श्रेणीक्रम में जुड़े समान घटकों में समान धारा बहने पर विभव पतन भी समान होता है, बशर्ते उनकी प्रतिरोधक विशेषताएँ एक जैसी हों।

सधि डायोड में विसरण धारा की दिशा P-क्षेत्र से N क्षेत्र की ओर होती है।

 

Question 2. ट्रांजिस्टर के लिये धारा प्रवर्धन गुणों का \(\alpha\) व \(\beta\) में सम्बन्ध लिखिये।
Answer: ट्रांजिस्टर के धारा प्रवर्धन गुणांक \(\alpha\) (अल्फा) और \(\beta\) (बीटा) के बीच का संबंध इस प्रकार है:
\( \beta = \frac{\alpha}{1-\alpha} \)
यह संबंध यह दर्शाता है कि एक ट्रांजिस्टर की वर्तमान लाभ क्षमता दूसरे के साथ कैसे जुड़ी है।
In simple words: \(\alpha\) और \(\beta\) ट्रांजिस्टर के लिए दो अलग-अलग लाभ गुणांक हैं। उन्हें इस सूत्र से जोड़ा जाता है, ताकि आप एक से दूसरे का मान निकाल सकें।

🎯 Exam Tip: \(\alpha\) हमेशा 1 से कम होता है (आमतौर पर 0.95 से 0.99), जबकि \(\beta\) का मान 1 से बहुत अधिक (20 से 200) हो सकता है, जिससे यह दर्शाता है कि कॉमन एमिटर विन्यास में अधिक धारा लाभ मिलता है।

 

Question 3. क्या किसी अनअभिनत P-N संधि पर उपस्थित रोधिका विभव को संधि के सिरों के मध्य वोल्टमीटर जोड़ कर नापा जा सकता है?
Answer: नहीं, किसी अनअभिनत P-N संधि पर उपस्थित रोधिका विभव को संधि के सिरों के मध्य वोल्टमीटर जोड़ कर नहीं मापा जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वोल्टमीटर को काम करने के लिए धारा की आवश्यकता होती है, और अनअभिनत संधि में कोई बाहरी धारा नहीं बहती है। वोल्टमीटर आंतरिक रूप से जुड़े होने पर भी प्रतिरोध के कारण धारा को रोकता है, जिससे वास्तविक विभव का पता नहीं चलता।
In simple words: आप बिना किसी बिजली के P-N जंक्शन पर वोल्टमीटर लगाकर वोल्टेज नहीं माप सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि वोल्टमीटर को काम करने के लिए थोड़ी सी बिजली चाहिए होती है, जो उस समय वहां नहीं होती।

🎯 Exam Tip: वोल्टमीटर को एक सक्रिय परिपथ में जोड़कर ही विभव मापा जा सकता है, जहाँ धारा प्रवाहित हो रही हो। अनअभिनत P-N संधि पर, आंतरिक विभव संतुलन के कारण शुद्ध धारा शून्य होती है।

 

Question 4. ओर द्वार के लिये सत्यता सारणी बनाईये।
Answer: OR गेट के लिए सत्यता सारणी (Truth Table) इस प्रकार है। OR गेट एक ऐसा लॉजिक गेट है जिसका आउटपुट (निर्गत) 1 होता है, यदि उसके कोई भी एक या दोनों इनपुट (निवेशी) 1 हों। यदि सभी इनपुट 0 हों, तो आउटपुट भी 0 होता है।

AB\(A+B=Y\)
000
011
101
111

In simple words: OR गेट की सत्यता सारणी दिखाती है कि अगर कोई भी इनपुट ऑन (1) है, तो आउटपुट भी ऑन (1) होगा।

🎯 Exam Tip: OR गेट के सत्यता सारणी में केवल तभी आउटपुट '0' होता है जब सभी इनपुट '0' हों। बाकी सभी स्थितियों में आउटपुट '1' होता है।

 

Question 5. उस तर्क द्वार का नाम लिखिये जिसमें निर्गत तब ही 1 होता है जब सभी निवेशी 1 होते हैं।
Answer: वह तर्क द्वार जिसमें निर्गत (आउटपुट) तभी 1 होता है जब उसके सभी निवेशी (इनपुट) 1 हों, उसे AND गेट कहते हैं। यह गेट लॉजिक गुणन का कार्य करता है। इसका उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि एक विशेष स्थिति तभी सक्रिय हो जब सभी आवश्यक शर्तें पूरी हों।
In simple words: जिस लॉजिक गेट में सभी इनपुट 1 होने पर ही आउटपुट 1 आता है, उसे AND गेट कहते हैं।

🎯 Exam Tip: AND गेट में, यदि कोई भी इनपुट 0 होता है, तो आउटपुट भी 0 होगा। आउटपुट 1 होने के लिए सभी इनपुट का 1 होना अनिवार्य है।

 

Question 6. ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक क रूप में काम लाने के लिये कौनसी संधि पश्च बायासित की जाती है?
Answer: ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में काम में लाने के लिए आधार-संग्राहक संधि (Base-Collector Junction) को पश्च बायासित (Reverse Biased) किया जाता है। उत्सर्जक-आधार संधि (Emitter-Base Junction) को अग्र बायासित (Forward Biased) रखा जाता है। यह विन्यास प्रवर्धन के लिए आवश्यक धारा नियंत्रण प्रदान करता है।
In simple words: ट्रांजिस्टर को एम्पलीफायर बनाने के लिए, बेस और कलेक्टर के बीच का जोड़ (जंक्शन) रिवर्स बायस्ड होता है।

🎯 Exam Tip: ट्रांजिस्टर के प्रवर्धन मोड में, उत्सर्जक-आधार संधि को अग्र-अभिनत और आधार-संग्राहक संधि को पश्च-अभिनत रखना आवश्यक है ताकि ट्रांजिस्टर सक्रिय क्षेत्र में काम कर सके।

 

Question 8. चित्र में प्रदर्शित डायोड किस अभिनति में है? (+10 V ——|><|—— +5 V)
Answer: दिए गए चित्र में डायोड की p-साइड +10 V पर है और n-साइड +5 V पर है। चूंकि p-साइड का विभव (\(+10 \text{ V}\)) n-साइड के विभव (\(+5 \text{ V}\)) से अधिक है, इसलिए संधि अग्र अभिनति (Forward Bias) में है। यदि p-साइड का विभव n-साइड से कम होता, तो यह पश्च अभिनति होती।
In simple words: चित्र में दिखाया गया डायोड अग्र अभिनति में है, क्योंकि उसके पॉजिटिव सिरे पर ज्यादा वोल्टेज है।

🎯 Exam Tip: किसी डायोड की अभिनति (बायस) निर्धारित करते समय, p-क्षेत्र और n-क्षेत्र के सापेक्ष विभवों की तुलना करें। यदि \(V_p > V_n\), तो यह अग्र अभिनति है; यदि \(V_p < V_n\), तो यह पश्च अभिनति है।

RBSE Class 12 Physics Chapter 16 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. दिष्टकरण क्या है? सेतु तरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र बनाइये।
Answer:
दिष्टकरण (Rectification): प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदलने की प्रक्रिया को दिष्टकरण कहते हैं। यह क्रिया इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे डायोड का उपयोग करके की जाती है। जिस उपकरण का उपयोग दिष्टकरण के लिए किया जाता है, उसे दिष्टकारी (Rectifier) कहते हैं। p-n संधि डायोड को दिष्टकारी के रूप में उपयोग किया जाता है क्योंकि यह अग्र अभिनति में सुचालक की तरह और उत्क्रम अभिनति में कुचालक की तरह व्यवहार करता है। इस गुण का लाभ उठाकर p-n संधि डायोड का उपयोग दिष्टकारी के रूप में होता है। डायोड वाल्व की तरह, p-n डायोड दो प्रकार से दिष्टकारी के रूप में कार्य करता है: (1) अर्धतरंग दिष्टकारी, (2) पूर्णतरंग दिष्टकारी, और (3) पूर्णतरंग सेतु दिष्टकारी।

पूर्णतरंग सेतु दिष्टकारी (Full wave Bridge Rectifier): यह दिष्टकारी प्रत्यावर्ती धारा के पूर्ण चक्कर को दिष्टधारा में परिवर्तित करता है। इस प्रकार के दिष्टकारी में चार संधि डायोड का उपयोग किया जाता है, जो एक ब्रिज के रूप में व्यवस्थित होते हैं (चित्र 16.36 में दिखाया गया है)।

कार्यविधि:
निवेशी प्रत्यावर्ती विभव को एक ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली पर लगाया जाता है।
धनात्मक अर्धचक्र में: द्वितीयक कुंडली का सिरा A धनात्मक और सिरा B ऋणात्मक होता है। इस स्थिति में, डायोड \(D_1\) और \(D_3\) अग्र अभिनत होते हैं, जबकि \(D_2\) और \(D_4\) उत्क्रम अभिनत होते हैं। धारा चित्र में दिखाए अनुसार प्रवाहित होती है, और \(D_2\) व \(D_4\) में कोई चालन नहीं होता।
ऋणात्मक अर्धचक्र में: द्वितीयक कुंडली का सिरा A ऋणात्मक और सिरा B धनात्मक होता है। इस स्थिति में, डायोड \(D_2\) और \(D_4\) अग्र अभिनत होते हैं, जबकि \(D_1\) और \(D_3\) उत्क्रम अभिनत होते हैं। धारा B से प्रारंभ होकर चित्र में दिखाए अनुसार प्रवाहित होती है।
इस प्रकार, सेतु दिष्टकारी में किसी भी समय केवल दो संधि डायोड धारा प्रवाह में योगदान देते हैं, और शेष दो डायोड चालन नहीं करते। लोड प्रतिरोध (\(R_L\)) में धारा प्रत्येक चक्र में P से Q की ओर बहती है, जिसके कारण निर्गत विभव दिष्ट प्रकृति का होता है। यह निर्गत विभव पूर्ण तरंग दिष्टकारी के समान होता है। फिल्टर परिपथ का उपयोग करके नियत दिष्टधारा प्राप्त की जाती है। चित्र 16.38 में आउटपुट तरंगों और एक संधारित्र फिल्टर परिपथ को दर्शाया गया है जो AC घटकों (उर्मिकाओं) को हटाकर शुद्ध DC प्राप्त करने में मदद करता है।
In simple words: दिष्टकरण का मतलब है AC बिजली को DC बिजली में बदलना। सेतु दिष्टकारी में चार डायोड होते हैं जो AC को पूरी तरह से DC में बदल देते हैं। यह हर आधे चक्कर में अलग-अलग डायोड का उपयोग करके होता है।

🎯 Exam Tip: पूर्ण तरंग सेतु दिष्टकारी के लाभों में उच्च दक्षता और कम उर्मिका (ripples) शामिल हैं, क्योंकि यह AC इनपुट के दोनों अर्धचक्रों का उपयोग करता है। डायोड की उचित बायसिंग को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक एवं संग्राहक की तुलना में आधार को बहुत पतला क्यों बनाया जाता है?
Answer: ट्रांजिस्टर में आधार (base) को उत्सर्जक (emitter) और संग्राहक (collector) की तुलना में बहुत पतला बनाया जाता है, ताकि उत्सर्जक से निकलने वाले अधिकांश आवेश वाहक (जैसे इलेक्ट्रॉन) आधार क्षेत्र को पार करके सीधे संग्राहक तक पहुँच सकें। आधार की पतली परत यह सुनिश्चित करती है कि आधार में आवेश वाहकों का बहुत कम recombination (पुनर्संयोजन) हो। इससे आधार धारा कम रहती है और ट्रांजिस्टर का धारा लाभ (\(\beta\)) अधिक होता है, जिससे यह एक कुशल प्रवर्धक के रूप में कार्य करता है।
In simple words: ट्रांजिस्टर में बेस को पतला इसलिए बनाते हैं ताकि उत्सर्जक से निकलने वाली ज्यादा से ज्यादा बिजली संग्राहक तक पहुंच सके और कम से कम बिजली बेस में रुककर बर्बाद हो।

🎯 Exam Tip: आधार की पतली और हल्की डोपिंग यह सुनिश्चित करती है कि ट्रांजिस्टर का \(\beta\) मान उच्च रहे, जिससे यह कमजोर संकेतों को प्रभावी ढंग से प्रवर्धित कर सके।

 

Question 4. तर्क द्वार से आप क्या समझते है। XOR द्वार का प्रतीक चिन्ह बनाते हुए इसकी सत्यता सारणी दीजिये।
Answer:
तर्क द्वार (Logic Gate): तर्क द्वार एक इलेक्ट्रॉनिक परिपथ होता है जो एक या एक से अधिक इनपुट (निवेशी) लेता है और एक लॉजिकल आउटपुट (निर्गत) उत्पन्न करता है। ये गेट बूलीय बीजगणित के सिद्धांतों पर काम करते हैं और डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के बिल्डिंग ब्लॉक्स होते हैं।

XOR द्वार (Exclusive OR Gate): XOR द्वार एक ऐसा लॉजिक गेट है जिसका आउटपुट 1 होता है यदि उसके इनपुट विषम संख्या में 1 हों (यानी, जब एक इनपुट 1 हो और दूसरा 0 हो)। यदि दोनों इनपुट समान हों (दोनों 0 या दोनों 1), तो आउटपुट 0 होता है। इसका बूलीय व्यंजक \(Y = A \oplus B = A\overline{B} + \overline{A}B\) होता है। चित्र 16.89 में XOR गेट का प्रतीक और चित्र 16.10 में इसका निर्माण दिखाया गया है।

XOR द्वार की सत्यता सारणी:

AB\(A \oplus B = Y\)
000
011
101
110

In simple words: XOR गेट का मतलब है 'या तो यह या वह, लेकिन दोनों नहीं'। इसकी सारणी बताती है कि अगर इनपुट अलग-अलग हों तो आउटपुट 1 होगा, और अगर इनपुट एक जैसे हों तो आउटपुट 0 होगा।

🎯 Exam Tip: XOR गेट को 'विषमता डिटेक्टर' भी कहा जाता है, क्योंकि यह केवल तभी उच्च आउटपुट देता है जब इसके इनपुट की संख्या विषम हो।

विशेष तथ्य: एकीकृत परिपथ (Integrated Circuits)

एकीकृत परिपथ (IC) एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक चिप होता है जिसमें कई इलेक्ट्रॉनिक घटक जैसे प्रतिरोधक, संधारित्र, डायोड, ट्रांजिस्टर, लॉजिक गेट आदि एक साथ जुड़े होते हैं। ये सभी घटक एक छोटे पैकेज में बंद होते हैं और एक ही अर्ध-चालक चिप (semiconductor chip) पर बनाए जाते हैं, जिससे वे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

चित्र 16.90 (a) में 0.05 cm मोटाई का पतला सिलिकॉन क्रिस्टल का टुकड़ा (स्लाइस) दिखाया गया है, जिसे 'सिलिकॉन वेफर' कहते हैं। इसका व्यास 2.5 cm से 10 cm तक होता है। चित्र 16.90 (b) में 50 mil × 50 mil आकार की छोटी सिलिकॉन चिप दिखाई गई है। इस पर विभिन्न घटक बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, 6.5 mil x 4 mil के क्षेत्र A में ट्रांजिस्टर, 4.5 mil x 4 mil के क्षेत्र B में डायोड और 12 mil x 2 mil के क्षेत्र में प्रतिरोधक बनाया जा सकता है। चित्र 16.90 (c) में सिलिकॉन चिप को केसिंग में लगाया गया है, जिसमें पिन आंतरिक रूप से IC से जुड़े होते हैं और बाहरी संयोजन के लिए उपयोग किए जाते हैं।

चिप पर मौजूद घटकों की संख्या के आधार पर एकीकृत परिपथों को निम्न वर्गों में बांटा गया है:

  • स्माल स्केल इण्टीग्रेशन (S.S.I.) – परिपथ अवयवों की संख्या \(\le 10\)
  • मीडियम स्केल इण्टीग्रेशन (M.S.I.), परिपथ अवयवों की संख्या \(\le 100\)
  • लॉर्ज स्केल इण्टीग्रेशन (L.S.I.), परिपथ अवयवों की संख्या \(\le 1000\)
  • वेरी लॉर्ज स्केल इण्टीग्रेशन (V.L.S.I.), परिपथ अवयवों की संख्या \(\le 1000\)

परत बनाने के लिए फोटोलिथोग्राफी और अशुद्धियों के विसरण जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है। धातुकरण प्रक्रिया द्वारा चिप पर धातु की पतली फिल्म चढ़ायी जाती है ताकि आंतरिक संयोजन हो सके।

परम्परागत इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की तुलना में एकीकृत परिपथ के लाभ (Advantages of Integrated Circuits over Conventional Electronic Circuits):

  1. कम संयोजनों के कारण इनकी विश्वसनीयता बहुत अधिक होती है।
  2. एक ही अर्ध-चालक चिप पर अनेक घटक होने के कारण इनका आकार बहुत छोटा होता है।
  3. छोटे आकार के कारण इनका भार बहुत कम होता है।
  4. इनकी कुल लागत बहुत कम होती है।
  5. प्रचालन के लिए कम शक्ति की आवश्यकता होती है।

परम्परागत इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की तुलना में एकीकृत परिपथों की सीमाएँ (Limitations of Integrated Circuits over Conventional Circuits):

  1. यदि एकीकृत परिपथ का कोई घटक खराब हो जाता है, तो पूरी IC बदलनी पड़ती है।
  2. 10 वाट से अधिक शक्ति वाले एकीकृत परिपथ बनाना संभव नहीं है।
  3. एकीकृत परिपथों में एक ही अर्ध-चालक चिप पर प्रेरक (inductors) और ट्रांसफार्मर (transformers) उत्पन्न करना संभव नहीं है। ये घटक अर्ध-चालक चिप में बाहर से संयोजित किए जाते हैं।

एकीकृत परिपथों के उपयोग (Uses of Integrated Circuits):

  1. टेलीविजन, रेडियो, वीडियो कैसेट रिकॉर्डर और कंप्यूटर बनाने में एकीकृत परिपथों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
  2. एकीकृत परिपथों की बड़े पैमाने पर उपलब्धता ने ही बाजार में कंप्यूटरों की उपलब्धता बढ़ाई है।

 

Question 5. ट्रांजिस्टर आधारित NOT द्वार का परिपथ चित्र बनाईये तथा इसकी सत्यता सारिणी दीजिये।
Answer:
NOT गेट को व्युत्क्रमक (Inverter) भी कहते हैं। यह एक ऐसा लॉजिक गेट है जिसमें केवल एक इनपुट और एक आउटपुट होता है। आउटपुट इनपुट के विपरीत होता है। यदि इनपुट 0 है, तो आउटपुट 1 होगा, और यदि इनपुट 1 है, तो आउटपुट 0 होगा।

NOT गेट की सत्यता सारणी:

निवेशी (A)निर्गत \(Y (=\overline{A})\)
01
10

NOT गेट का बूलीय व्यंजक: \(Y = \overline{A}\)

NOT गेट का व्यवहार में प्राप्त करना (Realization of NOT Gate):
NOT गेट को डायोड की सहायता से प्राप्त करना संभव नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए ट्रांजिस्टर का उपयोग किया जाता है। चित्र 16.77 में एक NPN ट्रांजिस्टर का उपयोग करके एक NOT गेट परिपथ दिखाया गया है।

कार्यविधि:
1. जब इनपुट A को 0 V (LOW) से जोड़ा जाता है, तो आधार-उत्सर्जक संधि और उत्सर्जक-आधार संधि दोनों पश्च अभिनत (reverse biased) हो जाती हैं। इस स्थिति में, आधार धारा और संग्राहक धारा दोनों लगभग शून्य होती हैं। ट्रांजिस्टर इस अवस्था में 'कट-ऑफ मोड' में होता है। निर्गत Y पर वोल्टेज लगभग 5 V होता है, जो कि अवस्था 1 (HIGH) के संगत है। इस प्रकार, जब A = 0, तो Y = 1 होता है।
2. जब इनपुट A को 5 V (HIGH) से जोड़ा जाता है, तो आधार-उत्सर्जक संधि अग्र अभिनत (forward biased) हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप संग्राहक धारा का मान अधिक होता है, और निर्गत Y पर वोल्टेज का मान गिर जाता है, जो कि अवस्था 0 (LOW) के संगत है। इस प्रकार, जब A = 1, तो Y = 0 होता है।
In simple words: NOT गेट इनपुट को उल्टा कर देता है। अगर इनपुट 0 है तो आउटपुट 1 होगा, और अगर इनपुट 1 है तो आउटपुट 0 होगा। इसे बनाने के लिए ट्रांजिस्टर का इस्तेमाल करते हैं।

🎯 Exam Tip: ट्रांजिस्टर आधारित NOT गेट में, ट्रांजिस्टर संतृप्ति (saturation) और कट-ऑफ (cut-off) क्षेत्रों के बीच स्विच करता है ताकि इनपुट के विपरीत आउटपुट मिल सके।

 

Question 6. चित्र में दिये गये तार्किक परिपथ के लिये बूलीय व्यंजक लिखिये। इस परिपथ के लिये सत्यता सारणी भी बनाईये।।
Answer:
दिया गया तार्किक परिपथ एक OR गेट का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके इनपुट A और B हैं।

बूलीय व्यंजक:
\( Y = A+B \)
यह दर्शाता है कि यदि कोई भी इनपुट A या B (या दोनों) 1 है, तो आउटपुट Y भी 1 होगा।

सत्यता सारणी:

AB\(Y = A+B\)
000
011
101
111

In simple words: इस परिपथ का बूलीय समीकरण \(Y = A+B\) है, जिसका मतलब है कि यह एक OR गेट है। इसकी सत्यता सारणी दिखाती है कि अगर कोई भी इनपुट 1 है, तो आउटपुट भी 1 होगा।

🎯 Exam Tip: OR गेट को 'लॉजिकल योग' गेट भी कहा जाता है। इसके आउटपुट को निर्धारित करने के लिए इनपुटों में से किसी एक के 'सत्य' (1) होने पर ध्यान दें।

 

Question 7. जेनर डायोड द्वारा वोल्टता नियमन के लिये काम आने वाले परिपथ का चित्र बनाइकर इसकी प्रक्रिया संक्षेप में समझाइये।
Answer:
जेनर डायोड (Zener Diode): जेनर डायोड एक विशेष प्रकार का p-n संधि डायोड होता है जिसे विशेष रूप से रिवर्स बायस में भंजन क्षेत्र (breakdown region) में लगातार काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, बिना खराब हुए। जब एक p-n संधि डायोड को रिवर्स बायस में एक निश्चित वोल्टेज (जेनर वोल्टेज) तक बढ़ाया जाता है, तो धारा का मान अचानक बढ़ जाता है। इस वोल्टेज को भंजन वोल्टता या जेनर वोल्टता (\(V_Z\)) कहते हैं। इस गुण के कारण जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज नियामक (Voltage Regulator) के रूप में किया जाता है। चित्र 16.39 (a) में इसका सांकेतिक निरूपण दिखाया गया है।

वोल्टता नियमन के लिए जेनर डायोड का उपयोग:
जेनर डायोड का एक महत्वपूर्ण उपयोग वोल्टेज नियमन है। यह इस सिद्धांत पर काम करता है कि भंजन क्षेत्र में, जेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता लगभग स्थिर बनी रहती है, भले ही उसमें प्रवाहित धारा में महत्वपूर्ण परिवर्तन क्यों न हो।

परिपथ की कार्यविधि (Working of Circuit):
चित्र 16.41 में एक सरल जेनर डायोड वोल्टेज नियामक परिपथ दिखाया गया है। इसमें एक अनियंत्रित (परिवर्तनशील) DC वोल्टेज (\(V_L\)) को एक श्रेणी प्रतिरोध (\(R_S\)) के माध्यम से जेनर डायोड के साथ जोड़ा जाता है, ताकि यह रिवर्स बायस में रहे।
• जब निवेशी वोल्टेज (\(V_{in}\)) या लोड धारा (\(I_L\)) में परिवर्तन होता है, तो जेनर डायोड के माध्यम से बहने वाली धारा (\(I_Z\)) में परिवर्तन होता है।
• लेकिन, जेनर डायोड के भंजन क्षेत्र में काम करने के कारण, इसके सिरों पर वोल्टेज (\(V_Z\)) स्थिर बनी रहती है। यह स्थिर वोल्टेज लोड (\(R_L\)) के सिरों पर प्राप्त होती है।
• श्रेणी प्रतिरोध (\(R_S\)) का मान जेनर डायोड की पावर रेटिंग और जेनर वोल्टता पर निर्भर करता है, ताकि डायोड में अधिकतम अनुमेय धारा से अधिक धारा प्रवाहित न हो।
यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि लोड को एक स्थिर आउटपुट वोल्टेज मिलती है, भले ही इनपुट वोल्टेज या लोड प्रतिरोध बदलें। चित्र 16.42 में आउटपुट वोल्टेज बनाम इनपुट वोल्टेज का ग्राफ भी दिखाया गया है, जो दर्शाता है कि जेनर क्षेत्र में निर्गत वोल्टेज नियत रहती है।
In simple words: जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए किया जाता है। यह रिवर्स बायस में एक खास वोल्टेज पर काम करता है, जहां इसका वोल्टेज नहीं बदलता, भले ही इसमें से कितनी भी धारा बहे। इससे हम अस्थिर बिजली को स्थिर कर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: जेनर डायोड की मुख्य विशेषता इसका भंजन क्षेत्र में स्थिर वोल्टेज व्यवहार है। हमेशा सुनिश्चित करें कि जेनर डायोड को उसकी अधिकतम शक्ति रेटिंग के भीतर संचालित किया जाए।

RBSE Class 12 Physics Chapter 16 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. ऊर्जा बैण्ड सिद्धांत के आधार पर चालकों, अर्धचालकों तथा कुचालकों में विभेदन स्पष्ट कीजिये। नैज अर्धचालकों में धारा चालक की प्रक्रिया समझाइये।
Answer: ठोस पदार्थों में ऊर्जा बैंडों के सिद्धांत के अनुसार, हम चालकों, अर्धचालकों और कुचालकों के बीच अंतर समझ सकते हैं। ठोसों में परमाणु एक-दूसरे के बहुत पास होते हैं, जिससे उनके ऊर्जा स्तर आपस में मिल जाते हैं और ऊर्जा बैंड बना लेते हैं। मुख्य रूप से दो बैंड होते हैं: संयोजकता बैंड (valence band) और चालन बैंड (conduction band). चालकों में, संयोजकता बैंड और चालन बैंड एक-दूसरे पर चढ़े हुए होते हैं, या उनके बीच का ऊर्जा अंतराल (energy gap) बहुत कम होता है। इससे इलेक्ट्रॉन आसानी से चालन बैंड में जा सकते हैं और विद्युत धारा प्रवाहित कर सकते हैं। तांबा एक अच्छा चालक है। अर्धचालकों में, संयोजकता बैंड और चालन बैंड के बीच एक छोटा सा ऊर्जा अंतराल होता है। सामान्य तापमान पर कुछ इलेक्ट्रॉन इस अंतराल को पार करके चालन बैंड में पहुँच जाते हैं, जिससे थोड़ी धारा प्रवाहित होती है। जब इन्हें गर्म किया जाता है, तो अधिक इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में चले जाते हैं, जिससे इनकी चालकता बढ़ जाती है। सिलिकॉन और जर्मेनियम इसके उदाहरण हैं। कुचालकों में, संयोजकता बैंड और चालन बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल बहुत बड़ा होता है, जिसे इलेक्ट्रॉन आसानी से पार नहीं कर सकते। इसलिए इनमें विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती। लकड़ी और प्लास्टिक अच्छे कुचालक हैं। नैज अर्धचालकों में, कमरे के तापमान पर, कुछ इलेक्ट्रॉन तापीय ऊर्जा पाकर संयोजकता बैंड से निकलकर चालन बैंड में पहुँच जाते हैं। जब एक इलेक्ट्रॉन संयोजकता बैंड छोड़ता है, तो वहाँ एक खाली जगह बन जाती है जिसे 'होल' (hole) कहते हैं। इलेक्ट्रॉन और होल दोनों ही धारा के वाहक के रूप में काम करते हैं। जब विद्युत क्षेत्र लगाया जाता है, तो इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में विपरीत दिशा में गति करते हैं, और होल संयोजकता बैंड में विद्युत क्षेत्र की दिशा में गति करते हैं, जिससे धारा प्रवाहित होती है। यह प्रक्रिया अर्धचालक के गुणों को समझने में मदद करती है।
In simple words: ठोस चीजों में, इलेक्ट्रॉन के लिए ऊर्जा के अलग-अलग रास्ते होते हैं, जिन्हें बैंड कहते हैं। अगर ये रास्ते जुड़े हों या पास हों, तो बिजली आसानी से बहती है (चालक)। अगर रास्ते थोड़े दूर हों, तो थोड़ी बिजली बहती है (अर्धचालक)। अगर रास्ते बहुत दूर हों, तो बिजली नहीं बहती (कुचालक)। अर्धचालकों में, गर्मी मिलने पर कुछ इलेक्ट्रॉन रास्ता पार कर लेते हैं, जिससे बिजली बहने लगती है।

🎯 Exam Tip: ऊर्जा बैंडों को चित्रों से समझाना और चालकों, अर्धचालकों, कुचालकों के बीच के मुख्य अंतर (ऊर्जा अंतराल) को स्पष्ट रूप से बताना महत्वपूर्ण है। नैज अर्धचालकों में इलेक्ट्रॉन-होल युग्म कैसे बनते हैं, यह भी समझाएं।

 

Question 2. PN संधि क्या होती है? इसके निर्माण के समय संधि तल पर होन वाली क्रिया को समझाइये। इस संधि को अग्र अभिनत करने पर अवक्षय पतर पर होने वाले प्रभाव को भी समझाइये।
Answer: PN संधि एक ऐसा उपकरण है जो एक p-प्रकार के अर्धचालक को n-प्रकार के अर्धचालक से जोड़कर बनाया जाता है। इसमें p-प्रकार में अधिक होल (धन आवेश) होते हैं और n-प्रकार में अधिक इलेक्ट्रॉन (ऋण आवेश) होते हैं। यह एक डायोड का मूल हिस्सा है। जब p-प्रकार और n-प्रकार के अर्धचालकों को आपस में जोड़ा जाता है, तो संधि तल पर कुछ इलेक्ट्रॉन n-क्षेत्र से p-क्षेत्र में चले जाते हैं और कुछ होल p-क्षेत्र से n-क्षेत्र में चले जाते हैं। इलेक्ट्रॉन और होल एक-दूसरे से मिलकर उदासीन हो जाते हैं। n-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन के निकलने से वहाँ धनात्मक आयन (दाता आयन) बच जाते हैं, और p-क्षेत्र में होल के निकलने से वहाँ ऋणात्मक आयन (ग्राही आयन) बच जाते हैं। इन आयनों के कारण संधि के दोनों ओर एक परत बन जाती है जहाँ कोई मुक्त आवेश वाहक नहीं होता। इस परत को 'अवक्षय परत' (depletion layer) या 'अवक्षय क्षेत्र' कहते हैं। यह परत लगभग 10-6 मीटर से 10-8 मीटर मोटी होती है। इस परत में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है जो आगे आवेश वाहकों के विसरण को रोकता है। इस विद्युत क्षेत्र के कारण एक 'विभव प्राचीर' (potential barrier) बन जाता है, जिसका मान 0.1V से 0.5V के बीच होता है और यह तापमान पर निर्भर करता है। p-प्रकार n-प्रकार अवक्षय परत {/* p-type region */} o {/* hole */} o o o o o o o o कोटर ग्राही आयन संधि {/* n-type region */} {/* electron */} इलेक्ट्रॉन दाता आयन {/* Depletion region charges */} + + +

चित्र 16.16 (p-n संधि की आंतरिक संरचना)

अग्र अभिनति (Forward Biasing) में, p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक सिरे से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक सिरे से जोड़ा जाता है। इससे बाहरी विद्युत क्षेत्र, विभव प्राचीर के आंतरिक विद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में लगता है। यदि बाहरी वोल्टेज विभव प्राचीर से अधिक हो जाती है, तो अवक्षय परत की चौड़ाई कम हो जाती है। यह परत पतली होने लगती है, जिससे आवेश वाहक (होल और इलेक्ट्रॉन) आसानी से संधि को पार कर पाते हैं और विद्युत धारा बहने लगती है। इस अवस्था में डायोड कम प्रतिरोध दिखाता है।
In simple words: PN संधि दो तरह के अर्धचालकों को जोड़कर बनती है। जहाँ ये जुड़ते हैं, वहाँ एक खाली जगह (अवक्षय परत) बन जाती है, जिसमें बिजली के कण नहीं होते। जब हम इसे सही तरीके से बैटरी से जोड़ते हैं (अग्र अभिनति), तो यह खाली जगह छोटी हो जाती है, और बिजली बहने लगती है।

🎯 Exam Tip: PN संधि की परिभाषा, अवक्षय परत का निर्माण, विभव प्राचीर, और अग्र अभिनति में अवक्षय परत की चौड़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए। चित्र बनाना हमेशा अच्छा होता है।

 

Question 3. प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र बनाइयें एवं इसकी कार्यविधि समझाइए।
Answer: दिष्टकरण वह प्रक्रिया है जिससे प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदला जाता है। इसके लिए दिष्टकारी (rectifier) नामक उपकरण का उपयोग किया जाता है। पूर्ण तरंग दिष्टकारी AC के पूरे चक्र को DC में बदलता है। एक आम पूर्ण तरंग दिष्टकारी "सेतु दिष्टकारी" (bridge rectifier) होता है, जिसमें चार डायोड उपयोग किए जाते हैं। सेतु दिष्टकारी का परिपथ चित्र: {/* Transformer */} Vin {/* Bridge Rectifier */} {/* Diodes */} {/* D1 */} D1 {/* D2 */} D2 {/* D3 */} D3 {/* D4 */} D4 {/* Connections */} {/* Load Resistor */} RL Vout {/* Input terminals of bridge */} {/* Output terminals of bridge */}

चित्र 16.36 (सेतु दिष्टकारी परिपथ)

कार्यविधि: 1. धनात्मक अर्ध-चक्र: जब AC इनपुट का ऊपरी सिरा धनात्मक और निचला सिरा ऋणात्मक होता है, तो डायोड D1 और D3 अग्र-अभिनत होते हैं (चालू हो जाते हैं)। डायोड D2 और D4 उत्क्रम-अभिनत होते हैं (बंद रहते हैं)। धारा D1 से होते हुए लोड प्रतिरोध RL से गुजरती है और फिर D3 से वापस स्रोत तक आती है। 2. ऋणात्मक अर्ध-चक्र: जब AC इनपुट का ऊपरी सिरा ऋणात्मक और निचला सिरा धनात्मक होता है, तो डायोड D2 और D4 अग्र-अभिनत होते हैं (चालू हो जाते हैं)। डायोड D1 और D3 उत्क्रम-अभिनत होते हैं (बंद रहते हैं)। धारा D4 से होते हुए लोड प्रतिरोध RL से गुजरती है (पिछले आधे चक्र के समान दिशा में) और फिर D2 से वापस स्रोत तक आती है। इस प्रकार, AC इनपुट के दोनों अर्ध-चक्रों के दौरान, लोड प्रतिरोध RL में धारा हमेशा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है, जिससे हमें दिष्ट धारा मिलती है। इस प्रक्रिया में, आउटपुट वोल्टेज का पैटर्न पूरे तरंग दिष्टकारी जैसा ही होता है।
In simple words: पूर्ण तरंग दिष्टकारी AC बिजली को DC बिजली में बदलता है। इसमें चार डायोड लगे होते हैं। जब AC का एक हिस्सा आता है, तो दो डायोड चालू होकर बिजली को एक ही दिशा में भेजते हैं। जब AC का दूसरा हिस्सा आता है, तो बाकी दो डायोड चालू होकर फिर से बिजली को उसी दिशा में भेजते हैं। इस तरह, लोड पर हमेशा एक ही दिशा में बिजली मिलती है।

🎯 Exam Tip: सेतु दिष्टकारी का परिपथ चित्र स्पष्ट होना चाहिए और दोनों अर्ध-चक्रों के लिए डायोडों की स्थिति (चालू/बंद) तथा धारा के प्रवाह की दिशा का वर्णन सटीक होना चाहिए।

 

Question 4. किसी PN संधि डायोड के अग्र एवं उत्क्रम अभिनति अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करने हेतु आवश्यक प्रायोगिक व्यवस्था को परिपथ चित्र बनाते हुए समझाइए। प्राप्त वक्रों के आरेख भी बनाइए।
Answer: PN संधि डायोड के अग्र (forward) और उत्क्रम (reverse) अभिनति अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करने के लिए, हमें एक प्रायोगिक परिपथ की आवश्यकता होती है। यह वक्र डायोड में प्रवाहित धारा (I) और उसके सिरों पर लगे वोल्टेज (V) के बीच संबंध को दर्शाता है। **प्रायोगिक व्यवस्था:** PN संधि डायोड के अभिलाक्षणिक वक्र को मापने के लिए, हम नीचे दिए गए परिपथ का उपयोग करते हैं। इस परिपथ में एक DC विद्युत आपूर्ति (बैटरी), एक प्रतिरोधक (धारा को सीमित करने के लिए), एक एमीटर (धारा मापने के लिए), और एक वोल्टमीटर (वोल्टेज मापने के लिए) शामिल होते हैं। **अग्र अभिनति परिपथ (Forward Bias Circuit):** {/* Battery */} V {/* Resistor */} R {/* Ammeter */} A {/* Diode */} {/* Voltmeter */} V {/* Ground */}

अग्र अभिनति प्रायोगिक परिपथ

**कार्यविधि (अग्र अभिनति):** 1. डायोड के p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक सिरे से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक सिरे से जोड़ें। 2. धीरे-धीरे बैटरी वोल्टेज बढ़ाएं और वोल्टमीटर (V) तथा एमीटर (A) से वोल्टेज और धारा के मान नोट करें। 3. शुरुआत में, धारा बहुत कम होती है (लगभग शून्य), क्योंकि विभव प्राचीर को पार करने के लिए एक निश्चित वोल्टेज की आवश्यकता होती है (लगभग 0.7V सिलिकॉन के लिए और 0.3V जर्मेनियम के लिए)। 4. जब वोल्टेज इस सीमा को पार कर जाती है, तो धारा तेजी से बढ़ने लगती है। **उत्क्रम अभिनति परिपथ (Reverse Bias Circuit):** {/* Battery */} V {/* Resistor */} R {/* Ammeter */} A {/* Diode (reversed) */} {/* Voltmeter */} V {/* Ground */}

उत्क्रम अभिनति प्रायोगिक परिपथ

**कार्यविधि (उत्क्रम अभिनति):** 1. डायोड के p-क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक सिरे से और n-क्षेत्र को धनात्मक सिरे से जोड़ें। 2. धीरे-धीरे बैटरी वोल्टेज बढ़ाएं और वोल्टमीटर (V) तथा एमीटर (A) से वोल्टेज और धारा के मान नोट करें। 3. उत्क्रम अभिनति में, डायोड में केवल बहुत कम उत्क्रम रिसाव धारा (reverse leakage current) प्रवाहित होती है, जो माइक्रोएम्पीयर (\( \mu A \)) की कोटि की होती है। 4. जब उत्क्रम वोल्टेज बहुत अधिक हो जाती है (भंजन वोल्टेज), तो धारा अचानक तेजी से बढ़ जाती है। **अभिलाक्षणिक वक्र के आरेख:** {/* Axes */} {/* X-axis */} {/* Y-axis */} {/* Axis Labels */} अग्र अभिनति (\(V_F\)) उत्क्रम धारा (\(\mu A\) में) अग्र धारा (mA में) उत्क्रम अभिनति (\(V_R\)) {/* Origin */} 0 {/* Forward Bias Curve */} I {/* Reverse Bias Curve */} Vz भंजन वोल्टता

चित्र 16.40 (PN संधि डायोड के अभिलाक्षणिक वक्र)


In simple words: डायोड की विशेषताओं को देखने के लिए, हम उसे बैटरी से दो तरीकों से जोड़ते हैं: सीधा (अग्र अभिनति) और उल्टा (उत्क्रम अभिनति)। सीधे जोड़ने पर, एक खास वोल्टेज के बाद बिजली तेजी से बढ़ती है। उल्टे जोड़ने पर, बिजली लगभग नहीं बहती, लेकिन बहुत ज्यादा वोल्टेज देने पर अचानक बहने लगती है। हम इन वोल्टेज और बिजली के मानों को मापकर ग्राफ बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: दोनों अभिनति (अग्र और उत्क्रम) के लिए अलग-अलग परिपथ चित्र बनाएं और यह बताएं कि वोल्टमीटर और एमीटर को कैसे जोड़ा जाता है। वक्रों के आरेख में, अग्र अभिनति में 'नी वोल्टेज' और उत्क्रम अभिनति में 'भंजन वोल्टेज' को स्पष्ट रूप से चिन्हित करें।

 

Question 5. संधि टांजिस्टर क्या होता है? आवश्यकत चित्र बनाकर PNP ट्रांजिस्टर की क्रिया विधि समझाइए।
Answer: संधि ट्रांजिस्टर एक तीन-टर्मिनल वाला अर्धचालक उपकरण है जो विद्युत संकेतों को बढ़ाने (प्रवर्धित करने) और स्विच करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसका आविष्कार विलियम शॉकले, जॉन बार्डीन और वाल्टर ब्रैटन ने 1948 में बेल लैब्स में किया था। ट्रांजिस्टर मूल रूप से एक क्रिस्टल होता है जिसमें तीन अलग-अलग चालकता वाले क्षेत्र होते हैं। बीच का क्षेत्र (आधार) बाकी दोनों क्षेत्रों (उत्सर्जक और संग्राहक) की तुलना में बहुत पतला होता है, और इसकी डोपिंग भी अलग होती है। संरचना के आधार पर ट्रांजिस्टर दो प्रकार के होते हैं: 1. NPN ट्रांजिस्टर 2. PNP ट्रांजिस्टर PNP ट्रांजिस्टर में, एक पतली n-प्रकार की परत को दो p-प्रकार की मोटी परतों के बीच रखा जाता है। इसमें उत्सर्जक और संग्राहक p-प्रकार के होते हैं, और आधार n-प्रकार का होता है। इसमें आवेश वाहक मुख्य रूप से होल होते हैं। p n p E B C

चित्र 16.50 (PNP ट्रांजिस्टर की सैद्धांतिक रचना)

**PNP ट्रांजिस्टर की कार्यविधि:** 1. **अभिनति (Biasing):** PNP ट्रांजिस्टर को काम करने के लिए, उत्सर्जक-आधार संधि को अग्र अभिनत (forward biased) किया जाता है और संग्राहक-आधार संधि को उत्क्रम अभिनत (reverse biased) किया जाता है। 2. **होल का प्रवाह (Hole Flow):** जब उत्सर्जक-आधार संधि अग्र अभिनत होती है, तो p-प्रकार के उत्सर्जक से बहुत सारे होल n-प्रकार के आधार में प्रवेश करते हैं। 3. **आधार में होल का व्यवहार (Behavior of Holes in Base):** आधार पतला और हल्का डोप किया हुआ होता है। आधार में प्रवेश करने वाले अधिकांश होल, संग्राहक-आधार संधि की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि संग्राहक उत्क्रम अभिनत होता है और n-प्रकार के आधार में होल की संख्या कम होती है। आधार में कुछ होल इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलकर उदासीन हो जाते हैं (रिकॉम्बिनेशन), जिससे आधार धारा (\(I_B\)) बनती है, लेकिन यह धारा बहुत कम होती है। 4. **संग्राहक में होल (Holes in Collector):** आधार को पार करने वाले अधिकांश होल (लगभग 95-99%) संग्राहक-आधार संधि को पार करके p-प्रकार के संग्राहक में पहुँच जाते हैं, जिससे संग्राहक धारा (\(I_C\)) बनती है। इस तरह, एक छोटी आधार धारा को नियंत्रित करके एक बड़ी संग्राहक धारा को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे प्रवर्धन संभव होता है। ट्रांजिस्टर को अक्सर एक 'इलेक्ट्रॉनिक वाल्व' की तरह सोचा जा सकता है, जो छोटे सिग्नल से बड़े सिग्नल को नियंत्रित करता है।
In simple words: संधि ट्रांजिस्टर तीन सिरों वाला एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक पुर्जा है जो बिजली के संकेतों को बड़ा करता है। PNP ट्रांजिस्टर में, बीच में एक पतली 'n' परत होती है और दोनों तरफ 'p' परतें होती हैं। यह काम तब करता है जब हम इसे खास तरीके से बिजली देते हैं। इसमें ज्यादातर 'होल' नाम के कण एक तरफ से दूसरी तरफ जाते हैं, जिससे बिजली बहती है।

🎯 Exam Tip: ट्रांजिस्टर के तीन टर्मिनल (उत्सर्जक, आधार, संग्राहक) और उनकी डोपिंग स्तर को समझाएं। PNP ट्रांजिस्टर की अभिनति और होल प्रवाह की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से बताएं, विशेषकर आधार की पतली परत और हल्के डोपिंग के महत्व पर जोर दें।

 

Question 6. उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में संयोजित किसी ट्रांजिस्टर के अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करने के लिए प्रायोगिक व्यवस्था का परिपथ का चित्र बनाते हुए वर्णन कीजिए। प्राप्त वक्रों के आरेख भी बनाईए तथा वोल्टता लाभ व धारा लाभ के सूत्र लिखिए।
Answer: उभयनिष्ठ उत्सर्जक (Common Emitter - CE) विन्यास ट्रांजिस्टर का सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला विन्यास है, क्योंकि यह अच्छा धारा लाभ और वोल्टेज लाभ प्रदान करता है। इस विन्यास में, उत्सर्जक इनपुट और आउटपुट दोनों परिपथों के लिए उभयनिष्ठ होता है। **प्रायोगिक व्यवस्था (NPN ट्रांजिस्टर के लिए):** {/* Input Circuit (Base-Emitter) */} Rh1 A {/* Battery VBB */} VBB + {/* Transistor NPN */} {/* Base connection */} {/* Emitter */} {/* base line */} {/* Emitter to ground */} {/* Collector */} B E C {/* Output Circuit (Collector-Emitter) */} Rh2 A {/* Battery VCC */} + VCC {/* Voltmeters */} V VBE V VCE {/* Ground */}

चित्र 16.58 (उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास का परिपथ)

**अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करना:** 1. **निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र (Input Characteristic Curves):** - संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज \(V_{CE}\) को एक निश्चित मान पर सेट करें (उदाहरण के लिए, 2V या 4V)। - आधार-उत्सर्जक वोल्टेज \(V_{BE}\) को धीरे-धीरे बदलें (परिवर्तनीय प्रतिरोध Rh1 का उपयोग करके)। - प्रत्येक \(V_{BE}\) मान के लिए आधार धारा \(I_B\) (एमीटर A1 से) को नोट करें। - \(V_{BE}\) और \(I_B\) के बीच ग्राफ प्लॉट करें। यह वक्र अग्र अभिनत डायोड के वक्र जैसा दिखता है। {/* Axes */} {/* X-axis */} {/* Y-axis */} {/* Axis Labels */} आधार-उत्सर्जक वोल्टता VBE (V में) आधार धारा IB (µA में) {/* X-axis ticks */} 0.2 0.4 0.6 0.8 1.0 1.2 {/* Y-axis ticks */} 50 100 150 200 250 {/* Curves */} VCE = 2V VCE = 4V

चित्र 16.59 (निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र)

2. **निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र (Output Characteristic Curves):** - आधार धारा \(I_B\) को एक निश्चित मान पर सेट करें (परिवर्तनीय प्रतिरोध Rh1 का उपयोग करके)। - संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज \(V_{CE}\) को धीरे-धीरे बदलें (परिवर्तनीय बैटरी Vcc का उपयोग करके)। - प्रत्येक \(V_{CE}\) मान के लिए संग्राहक धारा \(I_C\) (एमीटर A2 से) को नोट करें। - \(V_{CE}\) और \(I_C\) के बीच ग्राफ प्लॉट करें। यह प्रक्रिया \(I_B\) के कई अलग-अलग मानों के लिए दोहराई जाती है। {/* Axes */} {/* X-axis */} {/* Y-axis */} {/* Axis Labels */} संग्राहक उत्सर्जक वोल्टता VCE (V में) संग्राहक धारा IC (mA में) {/* X-axis ticks */} 5 10 15 20 25 {/* Y-axis ticks */} 1 2 3 4 5 6 {/* Curves */} IB = 60 µA IB = 40 µA IB = 20 µA IB = 0 µA

चित्र 16.60 (निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र)

3. **पारस्परिक या अन्योन्य अभिलाक्षणिक वक्र (Transfer Characteristic Curve):** - संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज \(V_{CE}\) को एक निश्चित मान पर सेट करें। - आधार धारा \(I_B\) को धीरे-धीरे बदलें। - प्रत्येक \(I_B\) मान के लिए संग्राहक धारा \(I_C\) नोट करें। - \(I_B\) और \(I_C\) के बीच ग्राफ प्लॉट करें। {/* Axes */} {/* X-axis */} {/* Y-axis */} {/* Axis Labels */} आधार धारा IB (µA में) संग्राहक धारा IC (mA में) {/* X-axis ticks */} 100 200 300 400 500 {/* Y-axis ticks */} 2 4 6 8 10 {/* Curve */} VCE = 3V

चित्र 16.61 (पारस्परिक अभिलाक्षणिक वक्र)

**वोल्टेज लाभ (\(A_V\)) और धारा लाभ (\(A_i\)) के सूत्र:** वोल्टेज लाभ \(A_V = \frac{\text{निर्गत संकेत वोल्टता}}{\text{निवेशी संकेत वोल्टता}} = \frac{V_o}{V_i}\)
धारा लाभ \(A_i = \frac{\text{निर्गत संकेत धारा}}{\text{निवेशी संकेत धारा}} = \frac{I_c}{I_b}\)
शहरी इलाकों में बिजली के संकेतों को मजबूत बनाने के लिए ट्रांजिस्टर का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है।
In simple words: ट्रांजिस्टर की विशेषताओं को जानने के लिए, हम उसे एक खास तरीके से जोड़ते हैं (उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास)। फिर, हम इनपुट वोल्टेज बदलकर इनपुट धारा मापते हैं और उसका ग्राफ बनाते हैं। इसी तरह, इनपुट धारा को स्थिर रखकर आउटपुट वोल्टेज बदलकर आउटपुट धारा मापते हैं और उसका भी ग्राफ बनाते हैं। इससे हमें ट्रांजिस्टर की काम करने की क्षमता पता चलती है।

🎯 Exam Tip: उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास का परिपथ चित्र, निवेशी और निर्गत दोनों अभिलाक्षणिक वक्रों के आरेख, और वोल्टेज व धारा लाभ के सूत्र स्पष्ट रूप से दिए जाने चाहिए। वक्रों के मुख्य निष्कर्षों का वर्णन करें।

 

Question 7. प्रवर्धन से आप क्या समझते है? एक PNP ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ प्रवर्धक का नामांकित चित्र बनाते हुए इसमें प्रवर्धन की क्रिया समझाते हुए वोल्टता लाभ का सूत्र ज्ञात कीजिए।
Answer: प्रवर्धन वह प्रक्रिया है जिसमें एक कमजोर विद्युत सिग्नल (धारा या वोल्टेज) को उसी आवृत्ति के एक मजबूत सिग्नल में बदला जाता है। जिस उपकरण से यह काम किया जाता है उसे प्रवर्धक (amplifier) कहते हैं। ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में उपयोग किया जा सकता है। **PNP ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक विन्यास:** {/* Input Circuit (Base-Emitter) */} Rh1 A {/* Battery VBB */} VBB + {/* Transistor PNP */} {/* Base connection */} {/* Emitter, reversed arrow */} {/* Emitter to ground */} {/* Collector */} B E C {/* Output Circuit (Collector-Emitter) */} Rh2 A {/* Battery VCC */} + VCC {/* Voltmeters */} V VBE V VCE {/* Ground */}

चित्र 16.58 (PNP ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास)

**प्रवर्धन की क्रियाविधि:** उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में, PNP ट्रांजिस्टर को इस प्रकार अभिनत किया जाता है कि उत्सर्जक-आधार संधि अग्र अभिनत (Forward Biased) होती है और संग्राहक-आधार संधि उत्क्रम अभिनत (Reverse Biased) होती है। 1. **इनपुट सिग्नल (Input Signal):** एक छोटा AC सिग्नल आधार-उत्सर्जक संधि पर दिया जाता है। 2. **आधार धारा का परिवर्तन (Base Current Change):** जब इनपुट सिग्नल \(V_{BE}\) में बदलाव करता है, तो आधार धारा \(I_B\) में परिवर्तन होता है। चूंकि उत्सर्जक-आधार संधि अग्र अभिनत है, इसलिए \(I_B\) में छोटे बदलावों के परिणामस्वरूप उत्सर्जक धारा \(I_E\) में बड़े बदलाव होते हैं। 3. **संग्राहक धारा का नियंत्रण (Collector Current Control):** ट्रांजिस्टर में, उत्सर्जक धारा \(I_E = I_B + I_C\) होती है। चूंकि आधार बहुत पतला होता है, अधिकांश (लगभग 95-99%) आवेश वाहक (होल) आधार से संग्राहक में चले जाते हैं। इसलिए, \(I_C\) लगभग \(I_E\) के बराबर होता है, और \(I_B\) बहुत कम होता है। \(I_B\) में एक छोटा सा परिवर्तन \(I_C\) में एक बड़ा परिवर्तन लाता है। 4. **आउटपुट सिग्नल (Output Signal):** संग्राहक धारा \(I_C\) एक लोड प्रतिरोधक (Rc) से होकर गुजरती है। \(I_C\) में बड़े परिवर्तनों के कारण \(R_C\) पर एक बड़ा वोल्टेज ड्रॉप (\(V_{out} = I_C \times R_C\)) उत्पन्न होता है, जो इनपुट सिग्नल का एक प्रवर्धित रूप होता है। इस प्रकार, कमजोर इनपुट सिग्नल एक मजबूत आउटपुट सिग्नल में बदल जाता है। यह प्रवर्धन की मूल विशेषता है, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में बहुत काम आती है। **वोल्टेज लाभ (\(A_V\)) का सूत्र:** वोल्टेज लाभ को आउटपुट वोल्टेज में परिवर्तन और इनपुट वोल्टेज में परिवर्तन के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। \(A_V = \frac{\Delta V_{CE}}{\Delta V_{BE}}\) या, यदि लोड प्रतिरोध \(R_L\) और इनपुट प्रतिरोध \(R_{in}\) हों, तो \(A_V = -\beta_{ac} \frac{R_L}{R_{in}}\) यहां, ऋण चिह्न इंगित करता है कि आउटपुट वोल्टेज इनपुट वोल्टेज के सापेक्ष 180 डिग्री आउट-ऑफ-फेज होता है।
In simple words: प्रवर्धन का मतलब है एक छोटी बिजली को बड़ा करना। PNP ट्रांजिस्टर को एक खास तरीके से जोड़कर, हम एक छोटे सिग्नल को इनपुट करते हैं। यह छोटा सिग्नल ट्रांजिस्टर की आधार धारा में छोटे बदलाव लाता है, जिससे संग्राहक धारा में बड़े बदलाव होते हैं। ये बड़े बदलाव एक रेसिस्टर से गुजरकर एक बड़ा आउटपुट वोल्टेज बनाते हैं, जो मूल छोटे सिग्नल का बड़ा रूप होता है।

🎯 Exam Tip: प्रवर्धन की परिभाषा, PNP ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास का नामांकित परिपथ चित्र, और इसकी कार्यविधि का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है। वोल्टेज लाभ के सूत्र को सही ढंग से लिखें और यह भी बताएं कि ऋण चिह्न क्या दर्शाता है।

 

Question 8. विशिष्ट प्रयोजनार्थ कार्य लिए जाने वाले कुछ डायोड के नाम लिखिए तथा इनके परिपथ प्रतीक बनाइए। इनकी कार्यप्रणाली एवं उपयोगो का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
Answer: कुछ खास कामों के लिए बने डायोड के नाम और उनके प्रतीक नीचे दिए गए हैं। ये डायोड सामान्य डायोड से अलग तरीके से काम करते हैं, जिससे उन्हें विशेष उपयोगों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
1. जेनर डायोड (Zener Diode): यह डायोड हमेशा उल्टे बायस (reverse bias) में काम करता है। इसका उपयोग वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए होता है, जैसे कि बिजली के उपकरणों को ज़्यादा वोल्टेज से बचाना।
2. लाइट एमिटिंग डायोड (LED): यह एक ऐसा डायोड है जो बिजली के गुजरने पर रोशनी देता है। इसका उपयोग रोशनी पैदा करने के लिए होता है, जैसे कि डिस्प्ले स्क्रीन, इंडिकेटर लाइट और घरों की रोशनी में।
3. फोटोडायोड (Photodiode): यह डायोड प्रकाश पड़ने पर बिजली पैदा करता है। इसका उपयोग प्रकाश को पहचानने और मापने के लिए होता है, जैसे कि रिमोट कंट्रोल और प्रकाश सेंसर में।
4. सोलर सेल (Solar Cell): यह एक बड़ा फोटोडायोड है जो सूरज की रोशनी को सीधे बिजली में बदलता है। इसका उपयोग सौर ऊर्जा पैदा करने के लिए होता है।
5. टनल डायोड (Tunnel Diode): यह एक तेज़ डायोड है जो बहुत हाई फ्रीक्वेंसी पर काम कर सकता है। इसका उपयोग हाई-स्पीड स्विच और ऑसिलेटर सर्किट में होता है।
In simple words: कुछ खास डायोड होते हैं जैसे जेनर डायोड जो वोल्टेज ठीक रखता है, LED जो लाइट देता है, फोटोडायोड जो लाइट से बिजली बनाता है, और सोलर सेल जो सूरज की ऊर्जा से बिजली बनाता है।

🎯 Exam Tip: विशेष डायोड्स के नाम, उनके प्रतीक और उनके मुख्य उपयोगों को याद रखें। प्रत्येक डायोड की खास विशेषता (जैसे जेनर डायोड का रिवर्स बायस में वोल्टेज विनियमन) को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 9. द्विवेशी डायोड ओर (OR) द्वार एवं एन्ड (AND) द्वार के परिपथ चित्र बनाते हुए इसकी कार्य विधि समझाइए तथा संगत सत्य सारणी बनाइए।
Answer: OR गेट और AND गेट दो मूल लॉजिक गेट हैं जो डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होते हैं। ये गेट इनपुट सिग्नल के आधार पर आउटपुट सिग्नल उत्पन्न करते हैं।

OR गेट (OR Gate):
OR गेट का काम यह है कि यदि उसके दो या दो से अधिक इनपुट में से कोई एक भी '1' (हाई) हो, तो उसका आउटपुट '1' ही होता है। आउटपुट '0' (लो) तभी होगा जब सभी इनपुट '0' हों।
इसका प्रतीक चित्र 16.70 जैसा होता है।
OR गेट की सत्यता सारणी (Truth Table):

निवेशी (Input) Aनिवेशी (Input) Bनिर्गत (Output) Y = A+B
000
011
101
111

इसका बुलियन व्यंजक \( Y = A+B \) होता है।
OR गेट को डायोड का उपयोग करके भी बनाया जा सकता है।

AND गेट (AND Gate):
AND गेट का काम यह है कि यदि उसके सभी इनपुट '1' हों, तभी उसका आउटपुट '1' होगा। यदि कोई भी इनपुट '0' हुआ, तो आउटपुट '0' ही होगा।
इसका प्रतीक चित्र 16.73 जैसा होता है।
AND गेट की सत्यता सारणी (Truth Table):

निवेशी (Input) Aनिवेशी (Input) Bनिर्गत (Output) Y = A.B
000
010
100
111

इसका बुलियन व्यंजक \( Y = A.B \) होता है।
AND गेट को भी डायोड का उपयोग करके बनाया जा सकता है।
In simple words: OR गेट तब '1' आउटपुट देता है जब कोई भी इनपुट '1' हो, जबकि AND गेट तब '1' आउटपुट देता है जब सभी इनपुट '1' हों। ये डिजिटल सर्किट के मूल बिल्डिंग ब्लॉक हैं।

🎯 Exam Tip: लॉजिक गेट्स के प्रतीक, सत्यता सारणी और बुलियन व्यंजक तीनों को सही ढंग से बनाना सीखें। डायोड के साथ परिपथ बनाते समय इनपुट और आउटपुट के वोल्टेज स्तरों को स्पष्ट करें।

 

Question 1. कक्ष ताप पर नैज जरमेनियम की एक प्लेट जिसका क्षेत्रफल \( 2 \times 10^{-4} \) तथा मोटाई \( 1.2 \times 10^{-3} \)m है में उत्पन्न विद्युत धारा ज्ञात करो जब इसके फलकों के मध्य 5V का विभवान्तर आरोपित किया जाता है। कक्ष ताप पर जरमेनियम में नैज आवेश वालक घनत्व \( 1.6 \times 10^6/\text{m}^3 \) है। इलेक्ट्रॉन तथा होल की गतिशीलताएँ क्रमश: \( 0.4\text{m}^2\text{v}^{-1}\text{s}^{-1} \) तथा \( 0.2 \text{m}^2\text{v}^{-1}\text{s}^{-1} \) है। (उत्तर \( 1.28 \times 10^{-13} \)A)
Answer:दिया गया है: प्लेट का क्षेत्रफल (A) \( = 2 \times 10^{-4} \text{ m}^2 \) मोटाई (l) \( = 1.2 \times 10^{-3} \text{ m} \) विभवान्तर (V) \( = 5 \text{ V} \) आवेश वाहक घनत्व (n) \( = 1.6 \times 10^6/\text{m}^3 \) इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता \( (\mu_{\text{e}}) = 0.4 \text{ m}^2\text{V}^{-1}\text{s}^{-1} \) होल की गतिशीलता \( (\mu_{\text{h}}) = 0.2 \text{ m}^2\text{V}^{-1}\text{s}^{-1} \) जरमेनियम की चालकता (\( \sigma \)) का सूत्र है: \( \sigma = ne(\mu_{\text{e}} + \mu_{\text{h}}) \)
\( \implies \sigma = (1.6 \times 10^6) \times (1.6 \times 10^{-19}) \times (0.4 + 0.2) \)
\( \implies \sigma = (1.6 \times 10^6) \times (1.6 \times 10^{-19}) \times (0.6) \)
\( \implies \sigma = 1.536 \times 10^{-13} \text{ S/m} \) अब, विद्युत धारा (I) का सूत्र है: \( I = \frac{V}{R} \) जहाँ प्रतिरोध (R) \( = \frac{\rho l}{A} = \frac{l}{\sigma A} \) है।
\( \implies I = \frac{V}{\frac{l}{\sigma A}} = \frac{V \sigma A}{l} \)
\( \implies I = \frac{5 \text{ V} \times (1.536 \times 10^{-13} \text{ S/m}) \times (2 \times 10^{-4} \text{ m}^2)}{1.2 \times 10^{-3} \text{ m}} \)
\( \implies I = \frac{1.536 \times 10^{-16}}{1.2 \times 10^{-3}} \)
\( \implies I = 1.28 \times 10^{-13} \text{ A} \) इस तरह, जरमेनियम प्लेट में प्रवाहित धारा \( 1.28 \times 10^{-13} \text{ A} \) है।
In simple words: हमने पहले जरमेनियम की चालकता (कितनी आसानी से बिजली गुजरती है) निकाली, फिर उस चालकता और दिए गए वोल्टेज-क्षेत्रफल-मोटाई का उपयोग करके प्लेट से बहने वाली कुल बिजली की मात्रा (धारा) ज्ञात की।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, सबसे पहले सभी दिए गए मानों को SI इकाइयों में लिखें। चालकता और धारा के सूत्रों को सही ढंग से लागू करें और गणना करते समय घातों का विशेष ध्यान रखें।

 

Question 2. चित्र में प्रदर्शित परिपथ में लगे दोनों आयोडों का अग्रप्रतिरोध 500 तथा उत्क्रम प्रतिरोध अनन्त है। यदि बैटरी का विद्युत वाहक बल 6 V है तो 1000 प्रतिरोध से प्रवाहित धारा ज्ञात करो।
Answer:परिपथ का विश्लेषण: दिए गए परिपथ में एक डायोड D1 और एक डायोड D2 हैं। बैटरी 6V की है। डायोड D2 बैटरी के ऋणात्मक सिरे से P-क्षेत्र से जुड़ा है, और N-क्षेत्र धनात्मक सिरे से जुड़ा है। इसका मतलब है कि डायोड D2 पश्च अभिनति (reverse biased) में है। चूंकि पश्च अभिनति प्रतिरोध अनंत दिया गया है, इसलिए डायोड D2 से कोई धारा प्रवाहित नहीं होगी और यह एक खुले परिपथ की तरह व्यवहार करेगा।
डायोड D1 बैटरी के धनात्मक सिरे से P-क्षेत्र से जुड़ा है, और N-क्षेत्र ऋणात्मक सिरे से जुड़ा है। इसका मतलब है कि डायोड D1 अग्र अभिनति (forward biased) में है। इसका अग्र प्रतिरोध 500 \( \Omega \) दिया गया है। परिपथ का कुल प्रतिरोध (R):
\( \implies \) कुल प्रतिरोध = डायोड D1 का अग्र प्रतिरोध + \( 100 \Omega \) प्रतिरोध + \( 1000 \Omega \) प्रतिरोध
\( \implies \text{R} = 500 \, \Omega + 100 \, \Omega + 1000 \, \Omega \)
\( \implies \text{R} = 1600 \, \Omega \) परिपथ में प्रवाहित धारा (I): ओम के नियम के अनुसार, \( I = \frac{V}{R} \)
\( \implies I = \frac{6 \text{ V}}{1600 \, \Omega} \)
\( \implies I = 0.00375 \text{ A} \)
\( \implies I = 3.75 \text{ mA} \) इस प्रकार, \( 1000 \, \Omega \) प्रतिरोध से प्रवाहित धारा \( 3.75 \text{ mA} \) है।
In simple words: हमने देखा कि एक डायोड उल्टा जुड़ा है, इसलिए उससे कोई करंट नहीं जाएगा। फिर, दूसरे डायोड और बाकी प्रतिरोधों को जोड़कर कुल प्रतिरोध निकाला। अंत में, ओम के नियम का उपयोग करके कुल करंट पता किया।

🎯 Exam Tip: डायोड की अभिनति (बायसिंग) को ध्यान से पहचानें - अग्र अभिनति में यह कम प्रतिरोध दिखाता है, जबकि पश्च अभिनति में यह बहुत अधिक (अनंत) प्रतिरोध दिखाता है और कोई धारा प्रवाहित नहीं होती।

 

Question 3. उभयनिष्ठ आधार विन्यास में किसी ट्रांजिस्टर को धारा प्रवर्धन है। इसकी उत्जसर्जक धारा में 5.0 मिलीऐम्पियर परिवव्रन करने पर संग्राहक धारा में परिवर्तन की गणना कीजिये। आधारा धारा में क्या परिवर्तन होगा।
Answer:दिया गया है: उभयनिष्ठ आधार विन्यास में धारा प्रवर्धन गुणांक \( (\alpha) = 0.99 \) उत्सर्जक धारा में परिवर्तन \( (\Delta \text{I}_{\text{E}}) = 5.0 \text{ mA} \) हम जानते हैं कि धारा प्रवर्धन गुणांक (\( \alpha \)) का सूत्र है: \( \alpha = \frac{\Delta \text{I}_{\text{C}}}{\Delta \text{I}_{\text{E}}} \) जहाँ \( \Delta \text{I}_{\text{C}} \) संग्राहक धारा में परिवर्तन है। संग्राहक धारा में परिवर्तन \( (\Delta \text{I}_{\text{C}}) \) की गणना:
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{C}} = \alpha \times \Delta \text{I}_{\text{E}} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{C}} = 0.99 \times 5.0 \text{ mA} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{C}} = 4.95 \text{ mA} \) आधार धारा में परिवर्तन (\( \Delta \text{I}_{\text{B}}) \) की गणना: हम जानते हैं कि उत्सर्जक धारा, आधार धारा और संग्राहक धारा का योग होती है: \( \Delta \text{I}_{\text{E}} = \Delta \text{I}_{\text{B}} + \Delta \text{I}_{\text{C}} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{B}} = \Delta \text{I}_{\text{E}} - \Delta \text{I}_{\text{C}} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{B}} = 5.0 \text{ mA} - 4.95 \text{ mA} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{B}} = 0.05 \text{ mA} \) अतः, संग्राहक धारा में परिवर्तन \( 4.95 \text{ mA} \) है और आधार धारा में परिवर्तन \( 0.05 \text{ mA} \) है। ट्रांजिस्टर के कार्य सिद्धांत के अनुसार, एक छोटी आधार धारा बड़े संग्राहक धारा को नियंत्रित करती है।
In simple words: हमने ट्रांजिस्टर के धारा बढ़ाने के गुणक (\( \alpha \)) का उपयोग करके उत्सर्जक धारा के बदलाव से संग्राहक धारा में बदलाव निकाला। फिर, कुल धारा के नियम का उपयोग करके आधार धारा में बदलाव पता किया।

🎯 Exam Tip: ट्रांजिस्टर के तीन मुख्य धाराओं (उत्सर्जक, आधार, संग्राहक) के बीच संबंध (\( \text{I}_{\text{E}} = \text{I}_{\text{B}} + \text{I}_{\text{C}} \)) और धारा प्रवर्धन गुणांक (\( \alpha \)) के सूत्र को याद रखें। गणना करते समय मिलीएम्पियर (mA) जैसी इकाइयों का सही उपयोग करें।

 

Question 4. एक PN संधि के लिए विभव प्राचीर का औसतमान 0.1v है तथा संधि पर \( 10^5 \text{ V/m} \) का विद्युत क्षेत्र उपस्थिति है। इस संधि के लिए अवक्षय परत की मोटाई कितनी होगी। (उत्तर \( 10^{-6} \)m)
Answer:दिया गया है: विभव प्राचीर \( (\text{V}_{\text{B}}) = 0.1 \text{ V} \) संधि पर विद्युत क्षेत्र \( (\text{E}) = 10^5 \text{ V/m} \) हम जानते हैं कि अवक्षय परत में विद्युत क्षेत्र और विभव प्राचीर के बीच संबंध इस प्रकार है: \( \text{E} = \frac{\text{V}_{\text{B}}}{\text{W}} \) जहाँ W अवक्षय परत की मोटाई है। अवक्षय परत की मोटाई (W) की गणना:
\( \implies \text{W} = \frac{\text{V}_{\text{B}}}{\text{E}} \)
\( \implies \text{W} = \frac{0.1 \text{ V}}{10^5 \text{ V/m}} \)
\( \implies \text{W} = 0.1 \times 10^{-5} \text{ m} \)
\( \implies \text{W} = 1 \times 10^{-6} \text{ m} \) अतः, PN संधि के लिए अवक्षय परत की मोटाई \( 1 \times 10^{-6} \text{ m} \) है। यह बहुत पतली परत होती है।
In simple words: हमने दिए गए विभव और विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके अवक्षय परत की मोटाई (चौड़ाई) निकाली। यह परत PN संधि में बनती है जहाँ कोई चार्ज कैरियर नहीं होते।

🎯 Exam Tip: विद्युत क्षेत्र, विभव प्राचीर और अवक्षय परत की मोटाई के बीच संबंध को याद रखें। यह सूत्र डायोड के मूलभूत गुणों को समझने में मदद करता है।

 

Question 5. एक ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में जोड़ा गया है। संग्राहक परिपथ में 8V को शक्ति प्रदाय लगा है तथा संग्राहक के श्रेणी क्रम में लगे 8000 प्रतिरोध पर विभवपात 0.5 v है। यदि धारा प्रवर्धन गुणांक \( \alpha = 0.96 \) है तो आधारा धारा ज्ञात कीजिए।
Answer:दिया गया है: संग्राहक शक्ति प्रदाय \( (\text{V}_{\text{CC}}) = 8 \text{ V} \) लोड प्रतिरोध \( (\text{R}_{\text{C}}) = 8000 \, \Omega \) लोड प्रतिरोध पर विभवपात \( (\text{V}_{\text{RC}}) = 0.5 \text{ V} \) धारा प्रवर्धन गुणांक \( (\alpha) = 0.96 \) सबसे पहले, संग्राहक धारा \( (\text{I}_{\text{C}}) \) ज्ञात करते हैं: ओम के नियम से, लोड प्रतिरोध पर विभवपात \( \text{V}_{\text{RC}} = \text{I}_{\text{C}} \times \text{R}_{\text{C}} \)
\( \implies 0.5 \text{ V} = \text{I}_{\text{C}} \times 8000 \, \Omega \)
\( \implies \text{I}_{\text{C}} = \frac{0.5}{8000} \text{ A} \)
\( \implies \text{I}_{\text{C}} = 0.0000625 \text{ A} \)
\( \implies \text{I}_{\text{C}} = 0.0625 \text{ mA} \)
\( \implies \text{I}_{\text{C}} \approx 0.063 \text{ mA} \) अब, धारा लाभ \( (\beta) \) ज्ञात करते हैं। \( \alpha \) और \( \beta \) के बीच संबंध है: \( \beta = \frac{\alpha}{1-\alpha} \)
\( \implies \beta = \frac{0.96}{1-0.96} \)
\( \implies \beta = \frac{0.96}{0.04} \)
\( \implies \beta = 24 \) आधार धारा \( (\text{I}_{\text{B}}) \) ज्ञात करते हैं: हम जानते हैं कि \( \beta = \frac{\text{I}_{\text{C}}}{\text{I}_{\text{B}}} \)
\( \implies \text{I}_{\text{B}} = \frac{\text{I}_{\text{C}}}{\beta} \)
\( \implies \text{I}_{\text{B}} = \frac{0.0625 \text{ mA}}{24} \)
\( \implies \text{I}_{\text{B}} \approx 0.0026 \text{ mA} \)
\( \implies \text{I}_{\text{B}} \approx 2.6 \, \mu \text{A} \) अतः, आधार धारा लगभग \( 2.6 \, \mu \text{A} \) है। ट्रांजिस्टर में, एक छोटा आधार करंट एक बड़े संग्राहक करंट को नियंत्रित करता है।
In simple words: पहले, हमने लोड प्रतिरोध पर वोल्टेज ड्रॉप का उपयोग करके संग्राहक करंट निकाला। फिर, दिए गए \( \alpha \) से \( \beta \) का मान ज्ञात किया। अंत में, \( \beta \) और संग्राहक करंट का उपयोग करके आधार करंट की गणना की।

🎯 Exam Tip: ट्रांजिस्टर के विभिन्न मापदंडों (\( \alpha, \beta, \text{I}_{\text{C}}, \text{I}_{\text{B}}, \text{I}_{\text{E}} \)) के बीच संबंधों को स्पष्ट रूप से समझें। ओम का नियम और \( \alpha - \beta \) संबंध ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 

Question 6. एक उभयनिष्ठ उज्सर्जक प्रवर्धक में आधार धारा में 50µA की वृद्धि होने पर संग्राहक धारा में 1.0 mA की वृद्धि होती है। धारा लाभ B की गणना करो। उत्सर्जक धारा में क्या परिवर्तन होगा। b के प्राप्त मान से a की गणना करो। (उत्तर \( \beta = 20, \Delta \text{I}_{\text{E}} = 1050 \text{ A}, \alpha = 0.95 \))
Answer:दिया गया है: आधार धारा में वृद्धि \( (\Delta \text{I}_{\text{B}}) = 50 \, \mu \text{A} = 50 \times 10^{-6} \text{ A} \) संग्राहक धारा में वृद्धि \( (\Delta \text{I}_{\text{C}}) = 1.0 \text{ mA} = 1.0 \times 10^{-3} \text{ A} = 1000 \, \mu \text{A} \) धारा लाभ \( (\beta) \) की गणना: उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में धारा लाभ (\( \beta \)) का सूत्र है: \( \beta = \frac{\Delta \text{I}_{\text{C}}}{\Delta \text{I}_{\text{B}}} \)
\( \implies \beta = \frac{1000 \, \mu \text{A}}{50 \, \mu \text{A}} \)
\( \implies \beta = 20 \) उत्सर्जक धारा में परिवर्तन \( (\Delta \text{I}_{\text{E}}) \) की गणना: हम जानते हैं कि उत्सर्जक धारा आधार और संग्राहक धाराओं का योग होती है: \( \Delta \text{I}_{\text{E}} = \Delta \text{I}_{\text{B}} + \Delta \text{I}_{\text{C}} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{E}} = 50 \, \mu \text{A} + 1000 \, \mu \text{A} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{E}} = 1050 \, \mu \text{A} \)
\( \implies \Delta \text{I}_{\text{E}} = 1.05 \text{ mA} \) \( \alpha \) की गणना \( \beta \) के मान से: \( \alpha \) और \( \beta \) के बीच संबंध है: \( \alpha = \frac{\beta}{1+\beta} \)
\( \implies \alpha = \frac{20}{1+20} \)
\( \implies \alpha = \frac{20}{21} \)
\( \implies \alpha \approx 0.9523 \)
\( \implies \alpha \approx 0.95 \) अतः, धारा लाभ \( \beta = 20 \), उत्सर्जक धारा में परिवर्तन \( 1050 \, \mu \text{A} \) है, और \( \alpha \approx 0.95 \) है। ये गणनाएँ दिखाती हैं कि कैसे एक छोटी आधार धारा, संग्राहक और उत्सर्जक धाराओं में बड़े बदलाव ला सकती है, जो ट्रांजिस्टर के प्रवर्धन गुण को दर्शाता है।
In simple words: हमने आधार और संग्राहक धाराओं में वृद्धि का उपयोग करके पहले \( \beta \) का मान निकाला। फिर, कुल धारा के नियम से उत्सर्जक धारा में परिवर्तन ज्ञात किया। अंत में, \( \beta \) के मान से \( \alpha \) का मान पता किया।

🎯 Exam Tip: सभी धाराओं को एक ही इकाई (जैसे \( \mu \text{A} \) या \( \text{mA} \)) में बदलने का ध्यान रखें ताकि गणनाएँ आसान और सही हों। \( \alpha \) और \( \beta \) के बीच के संबंधों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. संलग्न चित्र के परिपथ में बहने वाली धारा तथा जेनर डायोड के सिरों के बीच विभवान्तर ज्ञात करो, यदि लोड प्रतिरोध \( \text{R}_{\text{L}} = 2\text{k}\Omega \) के सिरो के बीच विभवान्तर 15V रहता है। जेनर डायोड की कार्यशील न्यूनतम धारा 10 mA है।
Answer:दिया गया है: लोड प्रतिरोध \( (\text{R}_{\text{L}}) = 2\text{k}\Omega = 2 \times 10^3 \, \Omega \) लोड प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर \( (\text{V}_{\text{L}}) = 15 \text{ V} \) जेनर डायोड की कार्यशील न्यूनतम धारा \( (\text{I}_{\text{Zmin}}) = 10 \text{ mA} = 10 \times 10^{-3} \text{ A} \) 1. जेनर डायोड के सिरों के बीच विभवान्तर \( (\text{V}_{\text{Z}}) \): चूंकि जेनर डायोड लोड प्रतिरोध के समानांतर क्रम में जुड़ा है, तो जेनर डायोड के सिरों के बीच का विभवान्तर लोड प्रतिरोध के सिरों के बीच के विभवान्तर के बराबर होगा।
\( \implies \text{V}_{\text{Z}} = \text{V}_{\text{L}} \)
\( \implies \text{V}_{\text{Z}} = 15 \text{ V} \) 2. लोड धारा \( (\text{I}_{\text{L}}) \): ओम के नियम के अनुसार, लोड धारा \( \text{I}_{\text{L}} = \frac{\text{V}_{\text{L}}}{\text{R}_{\text{L}}} \)
\( \implies \text{I}_{\text{L}} = \frac{15 \text{ V}}{2 \times 10^3 \, \Omega} \)
\( \implies \text{I}_{\text{L}} = 7.5 \times 10^{-3} \text{ A} \)
\( \implies \text{I}_{\text{L}} = 7.5 \text{ mA} \) 3. कुल परिपथ धारा \( (\text{I}) \): जेनर डायोड और लोड प्रतिरोध समानांतर में हैं, इसलिए कुल धारा (जो रेजिस्टर R से होकर गुजरती है) जेनर धारा (\( \text{I}_{\text{Z}} \)) और लोड धारा (\( \text{I}_{\text{L}} \)) का योग होगी। चूंकि जेनर डायोड अपनी कार्यशील न्यूनतम धारा \( \text{I}_{\text{Zmin}} \) पर काम कर रहा है, हम \( \text{I}_{\text{Z}} = \text{I}_{\text{Zmin}} \) मान सकते हैं।
\( \implies \text{I} = \text{I}_{\text{Z}} + \text{I}_{\text{L}} \)
\( \implies \text{I} = 10 \text{ mA} + 7.5 \text{ mA} \)
\( \implies \text{I} = 17.5 \text{ mA} \) अतः, जेनर डायोड के सिरों के बीच विभवान्तर 15 V है और परिपथ में बहने वाली कुल धारा 17.5 mA है। जेनर डायोड यहां वोल्टेज को स्थिर रखने का काम कर रहा है।
In simple words: हमने देखा कि जेनर डायोड और लोड समानांतर में हैं, तो उनका वोल्टेज बराबर होगा। फिर, लोड पर वोल्टेज और प्रतिरोध से लोड करंट निकाला। आखिर में, जेनर डायोड की न्यूनतम करंट और लोड करंट को जोड़कर कुल परिपथ करंट ज्ञात किया।

🎯 Exam Tip: जेनर डायोड के वोल्टेज रेगुलेटर सर्किट को समझते समय, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि यह रिवर्स बायस में वोल्टेज को स्थिर रखता है। समानांतर कनेक्शन में वोल्टेज समान रहता है और धाराएँ जुड़ती हैं।

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