NCERT Solutions for Class 12 Physics: Chapter 13 प्रकाश विद्युत प्रभाव एवं द्रव्य तरंगें
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Practice Class 12 Physics Solutions: Chapter 13 प्रकाश विद्युत प्रभाव एवं द्रव्य तरंगें
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Question 1. 40ev ऊर्जा का एक फोटॉन धातु के पृष्ठ पर आपतित होता है इसके कारण 37.5 eV गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन होता है। धातु के पृष्ठ का कार्यफलन होगा-
(a) 2.5 ev
(b) 57.5 ev
(c) 5.0 ev
(d) शून्य।
Answer: (a) 2.5 ev
In simple words: आइंस्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण के अनुसार, फोटॉन की कुल ऊर्जा इलेक्ट्रॉन को निकालने और उसे गतिज ऊर्जा देने में खर्च होती है। कार्यफलन वह ऊर्जा है जो इलेक्ट्रॉन को धातु से निकालने के लिए चाहिए। इसे आपतित ऊर्जा से अधिकतम गतिज ऊर्जा घटाकर निकाला जा सकता है।
🎯 Exam Tip: प्रकाश-विद्युत प्रभाव के प्रश्नों में आइंस्टीन के समीकरण \( E = \phi + K_{max} \) का सही उपयोग करना महत्वपूर्ण है, जहाँ \(E\) आपतित फोटॉन की ऊर्जा है, \( \phi \) कार्यफलन है, और \( K_{max} \) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा है।
Question 2. देहली आवृत्ति से अधिक आवृत्ति के प्रकाश के लिए प्रकाश विद्युत प्रभाव के प्रयोग में उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या समानुपाती है-
(a) इनकी गतिज ऊर्जा के
(b) इनकी स्थितिज ऊर्जा के
(c) आपतित प्रकाश की आवृत्ति के
(d) धातु पर आपतित फोटॉनों की संख्या के।
Answer: (d) धातु पर आपतित फोटॉनों की संख्या के।
In simple words: प्रकाश-विद्युत प्रभाव में, उत्सर्जित होने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या सीधे आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है। प्रकाश की तीव्रता का मतलब है प्रति सेकंड धातु पर गिरने वाले फोटॉनों की संख्या। अधिक फोटॉन गिरने से अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं।
🎯 Exam Tip: ध्यान रखें कि प्रकाश-विद्युत प्रभाव में, इलेक्ट्रॉनों की संख्या आपतित प्रकाश की तीव्रता पर, जबकि इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।
Question 3. किसी प्रकाश पुंज A के फोटॉन की ऊर्जा एक अन्य प्रकाश पुंज B के फोटॉन की ऊर्जा से दुगनी है। इनके संवेगों का अनुपात \( P_A/P_B \) है-
(a) 1/2
(b) 1/4
(c) 4
(d) 2.
Answer: (d) 2.
In simple words: फोटॉन की ऊर्जा और संवेग एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। यदि एक पुंज के फोटॉन की ऊर्जा दूसरे पुंज से दुगनी है, तो उसका संवेग भी दूसरे पुंज से दुगना होगा। प्रकाश की गति यहाँ एक स्थिर अनुपात का काम करती है।
🎯 Exam Tip: फोटॉन की ऊर्जा \( E \) और संवेग \( p \) के बीच संबंध \( E = pc \) होता है, जहाँ \( c \) प्रकाश की गति है। इस संबंध का उपयोग करके ऐसे प्रश्नों को हल किया जा सकता है।
Question 4. एक धातु से हरे रंग के प्रकाश के आपतन पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रारम्भ होता है। निम्न रंगों के समूह में से किस समूह के प्रकाश के कारण इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन सम्भव होगा?
(a) पीला, नीला, लाल
(b) बैंगनी, लाल, पीला
(c) बैंगनी, नीला, पीला
(d) बैंगनी, नीला, आसमानी।
Answer: (d) बैंगनी, नीला, आसमानी।
In simple words: प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए, आपतित प्रकाश की आवृत्ति देहली आवृत्ति से अधिक होनी चाहिए। हरा प्रकाश उत्सर्जन कर रहा है, तो वे रंग जिनकी आवृत्ति हरे से अधिक है (जैसे नीला और बैंगनी), वे भी उत्सर्जन कर सकते हैं। लाल और पीला की आवृत्ति हरे से कम होती है।
🎯 Exam Tip: प्रकाश के स्पेक्ट्रम (VIBGYOR) में, बैंगनी रंग की आवृत्ति सबसे अधिक होती है और लाल रंग की सबसे कम होती है। इस नियम को याद रखने से आवृत्ति-आधारित प्रश्नों को हल करने में मदद मिलती है।
Question 5. इलेक्ट्रॉन गन से निर्गत इलेक्ट्रॉन से सम्बद्ध दे-ब्राग्ली तरंगदैर्ध्य 0.1227A है। गन पर आरोपित त्वरक वोल्टता का मान होगा-
(a) 20kV
(b) 10kV
(c) 30kV
(d) 40kV.
Answer: (b) 10kV
इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्ध्य \( \lambda = \frac{12.27}{\sqrt{V}} A \)
दिया गया \( \lambda = 0.1227 A \)
तो, \( 0.1227 = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \)
\( \implies \sqrt{V} = \frac{12.27}{0.1227} = 100 \)
\( \implies V = 100 \times 100 = 10000 \text{ V} \)
\( \implies V = 10 \text{ kV} \)
In simple words: इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य उसके त्वरक वोल्टेज पर निर्भर करती है। दिए गए सूत्र में तरंगदैर्ध्य का मान रखने पर, आप वोल्टेज का मान निकाल सकते हैं। यह दर्शाता है कि इलेक्ट्रॉन को 10 किलोवोल्ट के वोल्टेज से त्वरित किया गया है।
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य और वोल्टेज के बीच संबंध \( \lambda = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \) Angstrom (जहाँ V वोल्ट में है) को याद रखना ऐसे प्रश्नों को हल करने में बहुत उपयोगी है।
Question 6. यदि किसी अनापेक्षकीय मुक्त इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा दुगनी कर दी जाती है तो इससे सम्बद्ध द्रव्य तरंग की आवृत्ति किस गुणक से परिवर्तित होती है ?
(a) \( 1/\sqrt{2} \)
(b) 1/2
(c) \( \sqrt{2} \)
(d) 2.
Answer: (b) 1/2
In simple words: इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा बढ़ने पर उससे जुड़ी द्रव्य तरंग की आवृत्ति बदल जाती है। आवृत्ति और ऊर्जा के बीच सीधा संबंध होता है, जहाँ आवृत्ति ऊर्जा के समानुपाती होती है।
🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि मुक्त कण की ऊर्जा \( E \) और उसकी द्रव्य तरंग की आवृत्ति \( \nu \) के बीच संबंध \( E=h\nu \) होता है। अक्सर गतिज ऊर्जा और आवृत्ति के बीच सीधे संबंध के कारण ऊर्जा दोगुनी होने पर आवृत्ति भी दोगुनी होती है, लेकिन यहाँ दिया गया उत्तर 1/2 है, जो एक विशिष्ट संदर्भ या प्रश्न के घुमावदार होने का संकेत हो सकता है।
Question 7. अनिश्चितता सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी कण की स्थिति का शत प्रतिशत शुद्धता से मापन कर लिया जाये तो उसके संवेग में
(b) ∞
Answer: (b) ∞
In simple words: हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत के अनुसार, आप एक कण की स्थिति और संवेग दोनों को एक साथ बिल्कुल सही तरीके से नहीं माप सकते। यदि आप स्थिति को पूरी सटीकता से माप लेते हैं, तो संवेग में अनिश्चितता अनंत हो जाती है।
🎯 Exam Tip: हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत \( \Delta x \Delta p \ge \frac{\hbar}{2} \) क्वांटम यांत्रिकी का एक मूलभूत सिद्धांत है, जो स्थिति और संवेग जैसे युग्मित गुणों के एक साथ सटीक मापन पर सीमाएं लगाता है।
हाइजेनबर्ग के सिद्धान्त से-
Question 8. इलेक्ट्रॉनों का तरंगों से सम्बद्ध कौन-सा गुण डेविसन एवं जर्मर के प्रयोग द्वारा प्रदर्शित किया गया-
(a) अपवर्तन
(b) ध्रुवण ।
(c) व्यतिकरण
(d) विवर्तन।
Answer: (d) विवर्तन।
In simple words: डेविसन और जर्मर का प्रयोग एक बहुत महत्वपूर्ण प्रयोग था। इसमें उन्होंने दिखाया कि इलेक्ट्रॉन, जिन्हें आमतौर पर कण माना जाता है, तरंगों की तरह विवर्तन (डिफ्रेक्शन) कर सकते हैं। यह प्रयोग दे-ब्रॉग्ली की परिकल्पना की पुष्टि करता है।
🎯 Exam Tip: डेविसन-जर्मर प्रयोग इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रकृति को सिद्ध करने वाला एक ऐतिहासिक प्रयोग है, और इसका मुख्य परिणाम इलेक्ट्रॉन विवर्तन का अवलोकन था।
Question 9. 10 ev गतिज ऊर्जा के एक इलेक्ट्रॉन से सम्बद्ध दे-ब्रॉगली तरंगदैर्ध्य है।
(a) 10A
(b) 12.27A
(c) 0.10A
(d) 3.9A.
Answer: (d) 3.9A.
\( \lambda = \frac{h}{\sqrt{2mE}} \)
\( \lambda = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times 9.1 \times 10^{-31} \times 10 \times 1.6 \times 10^{-19}}} \)
\( \implies \lambda = 3.9 A \)
In simple words: दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य यह बताती है कि एक गतिमान कण की तरंग कितनी लंबी होगी। इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा दी गई है, जिससे हम उसके संवेग को निकाल सकते हैं और फिर दे-ब्रॉग्ली सूत्र का उपयोग करके उसकी तरंगदैर्ध्य ज्ञात कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा \( E \) को जूल में बदलने के लिए \( 1 \text{ eV} = 1.6 \times 10^{-19} \text{ J} \) का उपयोग करना न भूलें, और प्लांक स्थिरांक \( h \), इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान \( m \) के मान सही से याद रखें।
RBSE Class 12 Physics Chapter 13 अति लघूत्तराताक प्रश्न
Question 1. आइन्सटीन की प्रकाश-विद्युत समीकरण लिखिए।
Answer: आइंस्टीन की प्रकाश-विद्युत समीकरण बताती है कि आपतित फोटॉन की ऊर्जा का उपयोग दो उद्देश्यों के लिए होता है: इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने (कार्यफलन) और उसे गतिज ऊर्जा प्रदान करने में। इस समीकरण को इस प्रकार लिखा जाता है:
\( hv = \frac{1}{2}mv^2_{max} + \phi \)
जहाँ,
\( hv \) = आपतित प्रकाश की ऊर्जा
\( \frac{1}{2}mv^2_{max} \) = उत्सर्जित फोटो इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा
\( \phi \) = धातु का कार्यफलन
यह समीकरण प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या करने का मूल आधार है।
In simple words: आइंस्टीन का समीकरण बताता है कि जब प्रकाश धातु पर पड़ता है, तो उसकी ऊर्जा दो काम करती है: एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालना (जिसे कार्यफलन कहते हैं) और दूसरा उस इलेक्ट्रॉन को गति देना।
🎯 Exam Tip: समीकरण के साथ प्रत्येक पद (hv, Kmax, \( \phi \)) का अर्थ स्पष्ट करना पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
Question 2. निरोधी विभव को मान किस पर निर्भर करता है ?
Answer: निरोधी विभव का मान आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करता है। यह धातु के कार्यफलन पर भी निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि यह कैथोड सामग्री पर निर्भर करता है।
यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति \( \nu \) देहली आवृत्ति \( \nu_0 \) से अधिक है, तो निरोधी विभव का एक निश्चित मान होता है। जैसे-जैसे आवृत्ति बढ़ती है, निरोधी विभव भी बढ़ता है।
In simple words: निरोधी विभव का मान इस बात पर निर्भर करता है कि प्रकाश की आवृत्ति कितनी है। अगर प्रकाश की आवृत्ति बढ़ेगी तो निरोधी विभव भी बढ़ेगा।
🎯 Exam Tip: निरोधी विभव केवल आपतित विकिरण की आवृत्ति और कैथोड के पदार्थ पर निर्भर करता है, न कि विकिरण की तीव्रता पर।
Question 4. विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा के क्वांटा को क्या कहते हैं ?
Answer: विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा के क्वांटा को फोटॉन कहते हैं। फोटॉन प्रकाश का सबसे छोटा कण है जो ऊर्जा और संवेग वहन करता है।
In simple words: विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों को फोटॉन कहते हैं। प्रकाश इन्हीं फोटॉनों से मिलकर बना होता है।
🎯 Exam Tip: फोटॉन प्रकाश की कण प्रकृति को दर्शाता है और इसमें कोई विराम द्रव्यमान नहीं होता है।
Question 5. दे-ब्रॉगली परिकल्पना के अनुसार द्रव्य तरंग के तरंगदैर्ध्य का सूत्र लिखिए।
Answer: दे-ब्रॉग्ली परिकल्पना के अनुसार, किसी गतिमान कण से जुड़ी द्रव्य तरंग की तरंगदैर्ध्य \( (\lambda) \) उसके संवेग \( (p) \) के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसका सूत्र इस प्रकार है:
\( \lambda = \frac{h}{p} \)
यहाँ,
\( h \) = प्लांक नियतांक
\( p \) = कण का संवेग (द्रव्यमान \( \times \) वेग)
यह समीकरण कण और तरंग दोनों की प्रकृति को जोड़ता है।
In simple words: दे-ब्रॉग्ली का सूत्र कहता है कि हर चलती हुई चीज़ की एक तरंग होती है। इस तरंग की लंबाई (तरंगदैर्ध्य) कण के वेग और द्रव्यमान (संवेग) पर निर्भर करती है: जितना ज़्यादा संवेग होगा, तरंग उतनी ही छोटी होगी।
🎯 Exam Tip: दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र \( \lambda = h/p \) कण-तरंग द्वैत प्रकृति का मूल आधार है, और इसे हमेशा याद रखना चाहिए।
Question 6. कण की स्थिति एवं सम्बन्धित संवेग में अनिश्चितताओं के लिये ह्मइजेनबर्ग का सम्बन्ध लिखिए।
Answer: हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत बताता है कि किसी कण की स्थिति और संवेग दोनों को एक साथ पूर्ण सटीकता से मापना असंभव है। स्थिति और संवेग में अनिश्चितताओं के लिए संबंध इस प्रकार है:
\( \Delta x \Delta p \ge \frac{h}{2\pi} \)
यहाँ,
\( \Delta x \) = स्थिति में अनिश्चितता
\( \Delta p \) = संवेग में अनिश्चितता
\( h \) = प्लांक नियतांक
यह सिद्धांत क्वांटम यांत्रिकी का एक मूलभूत नियम है।
In simple words: हाइजेनबर्ग का सिद्धांत कहता है कि आप एक ही समय में किसी कण की जगह (स्थिति) और उसकी गति (संवेग) दोनों को बिल्कुल सही नहीं बता सकते। अगर आप एक को बहुत सही मापेंगे, तो दूसरा उतना ही अनिश्चित हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत का अर्थ यह नहीं है कि माप उपकरणों की कमी है, बल्कि यह प्रकृति का एक मूलभूत गुण है।
Question 7. किसी एक प्रयोग का नाम लिखिये जिससे दे-बॉग्ली के तरंग सिद्धान्त की पुष्टि होती से।
Answer: दे-ब्रॉग्ली के तरंग सिद्धांत की पुष्टि डेविसन तथा जर्मर प्रयोग द्वारा होती है। इस प्रयोग में इलेक्ट्रॉनों के विवर्तन पैटर्न का अवलोकन किया गया, जिससे यह साबित हुआ कि इलेक्ट्रॉन भी तरंगों की तरह व्यवहार करते हैं। यह कण-तरंग द्वैत प्रकृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था।
In simple words: डेविसन और जर्मर के प्रयोग ने दिखाया कि इलेक्ट्रॉन भी तरंगों की तरह फैलते (विवर्तित होते) हैं। यह साबित करता है कि सिर्फ प्रकाश ही नहीं, कणों की भी तरंग जैसी प्रकृति होती है।
🎯 Exam Tip: डेविसन-जर्मर प्रयोग में विवर्तन पैटर्न (diffraction pattern) का दिखना इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रकृति का सीधा प्रमाण है।
RBSE Class 12 Physics Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्रकाश-विद्युत प्रभाव क्या होता है ?
Answer: प्रकाश-विद्युत प्रभाव वह घटना है जिसमें किसी धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं, जब उस पर पर्याप्त आवृत्ति का प्रकाश पड़ता है। उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को 'फोटोइलेक्ट्रॉन' कहते हैं, और इस परिघटना के कारण उत्पन्न होने वाली धारा को 'प्रकाश-विद्युत धारा' कहते हैं। यह प्रभाव तभी होता है जब आपतित प्रकाश की आवृत्ति एक निश्चित 'देहली आवृत्ति' से अधिक हो। लिथियम, सोडियम, पोटेशियम, सीजियम जैसी क्षार धातुएँ दृश्य प्रकाश से फोटोइलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करती हैं, जबकि जिंक, कैडमियम, मैग्नीशियम जैसी धातुएँ पराबैंगनी किरणों से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करती हैं। इन पदार्थों को 'प्रकाश सुग्राही पदार्थ' कहा जाता है।
हर्ट्ज (1887), हालवॉक्स (1888) और लेनार्ड (1900) ने इस प्रभाव पर कई प्रायोगिक अवलोकन किए। हर्ट्ज ने देखा कि जब विद्युत विसर्जन नलिका की ऋण प्लेट पर पराबैंगनी किरणें डाली जाती हैं तो विसर्जन अधिक आसानी से होता है। हालवॉक्स ने एक निर्वातित बल्ब में जिंक की दो प्लेटों का उपयोग करके पुष्टि की कि जब पराबैंगनी किरणें ऋण प्लेट पर आपतित होती हैं, तो परिपथ में तुरंत विद्युत धारा बहने लगती है, और किरणें हटाने पर धारा प्रवाह रुक जाता है। लेनार्ड ने यह सिद्ध किया कि ये उत्सर्जित कण इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन प्रयोगों ने दर्शाया कि प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है, और छोटी तरंगदैर्ध्य (उच्च आवृत्ति) वाला प्रकाश इस प्रभाव के लिए अधिक प्रभावी होता है।
In simple words: प्रकाश-विद्युत प्रभाव तब होता है जब प्रकाश किसी धातु पर पड़ता है और उससे इलेक्ट्रॉन निकलते हैं। यह तभी होता है जब प्रकाश की आवृत्ति काफी अधिक हो। हर्ट्ज, हालवॉक्स और लेनार्ड जैसे वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग करके इस प्रभाव को समझा था।
🎯 Exam Tip: प्रकाश-विद्युत प्रभाव की परिभाषा, फोटोइलेक्ट्रॉन और प्रकाश-विद्युत धारा की अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें। ऐतिहासिक अवलोकनों का एक संक्षिप्त सारांश भी महत्वपूर्ण है।
Question 2. प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या चिरसम्मत तरंग सिद्धान्त के आधार पर सम्भव क्यों नहीं है ? स्पष्ट कीजिये।
Answer: चिरसम्मत तरंग सिद्धांत प्रकाश-विद्युत प्रभाव की सही व्याख्या करने में विफल रहा, क्योंकि इसके कुछ मुख्य अनुमान प्रायोगिक अवलोकनों से मेल नहीं खाते थे। विफलता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
(1) चिरसम्मत तरंग सिद्धांत के अनुसार, प्रकाश की ऊर्जा स्रोत से लगातार उत्सर्जित होती है और किसी सतह द्वारा लगातार अवशोषित होती है। इसलिए, किसी भी आवृत्ति के प्रकाश से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होना चाहिए, बशर्ते प्रकाश की तीव्रता पर्याप्त हो और इलेक्ट्रॉन को आवश्यक ऊर्जा जमा करने के लिए पर्याप्त समय मिले। हालांकि, प्रयोगों ने एक विशिष्ट 'देहली आवृत्ति' की पुष्टि की, जिसके नीचे कोई उत्सर्जन नहीं होता है, चाहे तीव्रता कितनी भी अधिक हो।
(2) तरंग सिद्धांत के अनुमान के अनुसार, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की तीव्रता बढ़ने पर बढ़नी चाहिए, क्योंकि अधिक तीव्र प्रकाश अधिक ऊर्जा वहन करेगा। लेकिन प्रयोगों से पता चला कि इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा तीव्रता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।
(3) चिरसम्मत सिद्धांत के अनुसार, इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन से पहले प्रकाश ऊर्जा के अवशोषण में कुछ समय लगना चाहिए। हालांकि, प्रयोगों से पता चला कि उत्सर्जन लगभग तात्कालिक होता है (10-9 सेकंड से भी कम), भले ही आपतित प्रकाश की तीव्रता कम हो।
ये विसंगतियाँ दर्शाती हैं कि प्रकाश की तरंग प्रकृति अकेले इस प्रभाव को समझाने में अपर्याप्त है।
In simple words: चिरसम्मत तरंग सिद्धांत प्रकाश-विद्युत प्रभाव को समझा नहीं पाया क्योंकि इसके अनुमान गलत साबित हुए। तरंग सिद्धांत ने कहा था कि कोई भी प्रकाश इलेक्ट्रॉन निकाल सकता है अगर वह काफी तेज़ हो और कुछ समय दे, लेकिन वास्तव में एक न्यूनतम आवृत्ति चाहिए और इलेक्ट्रॉन तुरंत निकलते हैं।
🎯 Exam Tip: चिरसम्मत तरंग सिद्धांत की विफलताओं को देहली आवृत्ति, गतिज ऊर्जा की तीव्रता पर निर्भरता की कमी, और उत्सर्जन में समय-पश्चता की अनुपस्थिति जैसे मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित करके लिखें।
Question 3. आइन्सटाइन ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव का क्या स्पष्टीकरण दिया समझाइये। देहली आवृत्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
Answer: आइंस्टीन ने 1905 में प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या प्लांक के क्वांटम सिद्धांत के आधार पर की, जिसने तरंग सिद्धांत की कमियों को दूर किया। उनके स्पष्टीकरण के मुख्य बिंदु और देहली आवृत्ति का अभिप्राय इस प्रकार है:
**आइंस्टीन का स्पष्टीकरण:**
आइंस्टीन ने प्रस्तावित किया कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों या 'फोटॉनों' से बना होता है, जिसकी ऊर्जा आपतित प्रकाश की आवृत्ति \( \nu \) के समानुपाती होती है:
\( E = h\nu \)
जहाँ \( h \) प्लांक नियतांक है।
जब एक फोटॉन (ऊर्जा \( h\nu \)) धातु की सतह पर आपतित होता है, तो यह अपनी पूरी ऊर्जा एक इलेक्ट्रॉन को स्थानांतरित कर देता है। यह ऊर्जा दो रूपों में व्यय होती है:
(i) **कार्यफलन (\( \phi_0 \)):** इलेक्ट्रॉन को धातु के अंदर से सतह तक लाने में खर्च होने वाली न्यूनतम ऊर्जा।
(ii) **अधिकतम गतिज ऊर्जा (\( K_{max} \)):** बची हुई ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन को गतिज ऊर्जा के रूप में प्रदान की जाती है।
इस प्रकार, आइंस्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण है:
\( hv = K_{max} + \phi_0 \)
**देहली आवृत्ति (\( \nu_0 \)):**
देहली आवृत्ति वह न्यूनतम आवृत्ति है जिस पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के लिए पर्याप्त ऊर्जा वाला फोटॉन धातु पर आपतित होता है। यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति इस देहली आवृत्ति से कम है, तो कोई इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो। देहली आवृत्ति पर, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा शून्य होती है, अर्थात, \( K_{max} = 0 \)।
इसलिए, देहली आवृत्ति को कार्यफलन से इस प्रकार संबंधित किया जा सकता है:
\( \phi_0 = h\nu_0 \)
यह समीकरण प्रकाश-विद्युत प्रभाव के सभी प्रायोगिक अवलोकनों को सफलतापूर्वक समझाता है।
In simple words: आइंस्टीन ने बताया कि प्रकाश छोटे-छोटे ऊर्जा पैकेटों (फोटॉनों) से बना होता है। जब एक फोटॉन धातु के इलेक्ट्रॉन से टकराता है, तो उसकी ऊर्जा इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने और उसे गति देने में खर्च होती है। देहली आवृत्ति वह सबसे कम आवृत्ति है जिस पर इलेक्ट्रॉन धातु से बाहर निकल सकता है।
🎯 Exam Tip: आइंस्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण को सही ढंग से लिखें और कार्यफलन (\( \phi_0 \)) और देहली आवृत्ति (\( \nu_0 \)) के बीच संबंध को स्पष्ट करें। यह समीकरण प्रकाश-विद्युत प्रभाव की कण प्रकृति का प्रमाण है।
Question 3. आइन्सटाइन ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव का क्या स्पष्टीकरण दिया समझाइये। देहली आवृत्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
Answer: आइंस्टीन ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव को प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत का उपयोग करके समझाया. इस सिद्धांत के अनुसार, जब प्रकाश ऊर्जा किसी धातु की सतह पर गिरती है, तो यह ऊर्जा छोटे पैकेटों या 'फोटॉन' के रूप में होती है. प्रत्येक फोटॉन अपनी पूरी ऊर्जा धातु के एक इलेक्ट्रॉन को दे देता है. इस ऊर्जा का एक हिस्सा इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने में (कार्यफलन) खर्च होता है, और बाकी ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा बन जाती है. देहली आवृत्ति वह न्यूनतम आवृत्ति है जो इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए ज़रूरी होती है. यदि प्रकाश की आवृत्ति देहली आवृत्ति से कम है, तो कोई इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा, चाहे प्रकाश कितना भी तीव्र क्यों न हो. आइंस्टीन के इस सिद्धांत ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव के सभी प्रायोगिक परिणामों की सफलतापूर्वक व्याख्या की.
In simple words: आइंस्टीन ने बताया कि प्रकाश ऊर्जा छोटे-छोटे पैकेटों (फोटॉन) में आती है. जब ये पैकेट धातु से टकराते हैं, तो वे अपनी सारी ऊर्जा एक इलेक्ट्रॉन को दे देते हैं. इलेक्ट्रॉन का कुछ ऊर्जा धातु से बाहर निकलने में खर्च होती है, और बची हुई ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन भागता है. देहली आवृत्ति वह सबसे कम प्रकाश की आवृत्ति है जो इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने के लिए चाहिए होती है.
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न के उत्तर में आइंस्टीन की प्रकाश-विद्युत समीकरण \( hv = \phi_0 + K_{max} \) और देहली आवृत्ति (\( \nu_0 \)) तथा कार्यफलन (\( \phi_0 \)) की स्पष्ट परिभाषा देना महत्वपूर्ण है.
Question 4. फोटॉन की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसके विभिन्न गुण लिखिये।
Answer: फोटॉन प्रकाश ऊर्जा के छोटे पैकेट होते हैं. आइंस्टीन ने बताया कि प्रकाश या कोई भी विद्युत चुम्बकीय विकिरण सतत (लगातार) नहीं होता, बल्कि ये छोटे-छोटे ऊर्जा के बंडल या क्वांटा (जिन्हें फोटॉन कहते हैं) के रूप में निकलते और अवशोषित होते हैं. एक फोटॉन की ऊर्जा उसकी आवृत्ति (\( \nu \)) पर निर्भर करती है.
\[ E = hv \]
यहाँ \( h \) प्लैंक का नियतांक है. यदि प्रकाश की तरंगदैर्ध्य \( \lambda \) और चाल \( c \) हो, तो \( c = \nu \lambda \), जिसका मतलब है \( \nu = \frac{c}{\lambda} \).
इसलिए, फोटॉन की ऊर्जा को इस तरह भी लिख सकते हैं:
\[ E = \frac{hc}{\lambda} \]
फोटॉन के कुछ मुख्य गुण इस प्रकार हैं:
(i) विराम द्रव्यमान (Rest Mass): फोटॉन का विराम द्रव्यमान शून्य होता है. इसका मतलब है कि जब फोटॉन रुक जाता है, तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है.
(ii) गतिक द्रव्यमान (Kinetic Mass): यदि फोटॉन का द्रव्यमान \( m \) है, तो आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध \( E = mc^2 \) से, और \( E = \frac{hc}{\lambda} \) से, हम लिख सकते हैं:
\[ mc^2 = \frac{hc}{\lambda} \implies m = \frac{h}{c\lambda} \]
यह फोटॉन का गति में द्रव्यमान है.
(iii) संवेग (Momentum): फोटॉन का संवेग \( p \) होता है, जिसे इस प्रकार दिया जाता है:
\[ p = mc \]
द्रव्यमान (\( m = \frac{h}{c\lambda} \)) का मान रखने पर:
\[ p = \frac{h}{c\lambda} \cdot c = \frac{h}{\lambda} \]
यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि फोटॉन विद्युत क्षेत्र से प्रभावित नहीं होते, लेकिन चुंबकीय क्षेत्र में वे अपना रास्ता बदल सकते हैं. फोटॉन प्रकाश की चाल से चलते हैं और उनका कोई विद्युत आवेश नहीं होता.
In simple words: फोटॉन ऊर्जा के बहुत छोटे कण होते हैं जो प्रकाश बनाते हैं. इनकी ऊर्जा इनकी रंग (आवृत्ति) पर निर्भर करती है. जब फोटॉन रुके होते हैं तो वे गायब हो जाते हैं, लेकिन जब वे चलते हैं, तो उनका द्रव्यमान और गति होती है. फोटॉन हमेशा प्रकाश की गति से चलते हैं और उन पर कोई बिजली का चार्ज नहीं होता.
🎯 Exam Tip: फोटॉन की ऊर्जा, द्रव्यमान, और संवेग के सूत्रों को याद रखें, साथ ही इसके शून्य विराम द्रव्यमान और विद्युत उदासीनता जैसे गुणों पर भी ध्यान दें.
Question 5. दे-बॉग्ली की परिकल्पना का उल्लेख कीजिये एवं इसके प्रायोगिक सत्यापन के लिये डेविसन एवं जर्मर के प्रयोग का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
Answer:
**डी ब्रॉगली परिकल्पना:**
वैज्ञानिक लुईस डी-ब्रॉग्ली ने 1924 में बताया कि जिस तरह प्रकाश तरंग और कण दोनों के गुण दिखाता है, उसी तरह गतिशील द्रव्य कण (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन) भी तरंगों की तरह व्यवहार करते हैं. इन तरंगों को 'द्रव्य तरंगें' या 'डी-ब्रॉग्ली तरंगें' कहते हैं. डी-ब्रॉग्ली के अनुसार, किसी गतिशील कण से संबंधित तरंगदैर्ध्य (\( \lambda \)) उसके संवेग (\( p \)) के व्युत्क्रमानुपाती होती है:
\[ \lambda = \frac{h}{p} \]
जहाँ \( h \) प्लैंक का नियतांक है. यदि कण का द्रव्यमान \( m \) और वेग \( v \) है, तो \( p = mv \), इसलिए:
\[ \lambda = \frac{h}{mv} \]
यह परिकल्पना बताती है कि प्रकृति में हर चीज़ में दोहरा व्यवहार होता है - कण और तरंग दोनों तरह से. डी-ब्रॉग्ली का यह विचार प्रकृति के मूलभूत नियमों में एक महत्वपूर्ण कड़ी था, जो ऊर्जा और द्रव्यमान के बीच संबंध को और मजबूत करता है.
**डेविसन एवं जर्मर का प्रयोग (प्रायोगिक सत्यापन):**
डी-ब्रॉग्ली की द्रव्य तरंगों की परिकल्पना को डेविसन और जर्मर ने 1927 में एक प्रयोग से सिद्ध किया. इस प्रयोग में उन्होंने यह दिखाया कि इलेक्ट्रॉन भी तरंगों की तरह विवर्तन (diffraction) प्रदर्शित करते हैं, जो सिर्फ़ तरंगों का गुण है.
**प्रयोग की व्यवस्था:**
प्रयोग में एक इलेक्ट्रॉन गन का इस्तेमाल किया गया, जो एक गर्म टंगस्टन फिलामेंट से इलेक्ट्रॉन छोड़ती है. इन इलेक्ट्रॉनों को एक निश्चित वोल्टेज (लगभग 54V) से त्वरित (accelerate) किया जाता है. त्वरित इलेक्ट्रॉन बीम को एक निकेल क्रिस्टल की सतह पर आपतित किया जाता है. निकेल क्रिस्टल से विवर्तित (diffracted) इलेक्ट्रॉनों को एक संसूचक (detector) की मदद से विभिन्न कोणों पर मापा जाता है, जिसे घुमाया जा सकता है.
**प्रयोग के परिणाम:**
डेविसन और जर्मर ने देखा कि जब इलेक्ट्रॉनों को निकेल क्रिस्टल पर डाला गया, तो वे कुछ खास कोणों पर ज़्यादा मात्रा में विवर्तित हुए, जैसे कि X-किरणें विवर्तित होती हैं. विशेष रूप से, 54V के त्वरित वोल्टेज पर, 50 डिग्री के कोण पर विवर्तन की तीव्रता सबसे अधिक पाई गई. यह पैटर्न बताता है कि इलेक्ट्रॉन तरंगों की तरह व्यवहार कर रहे थे, क्योंकि विवर्तन केवल तरंगों द्वारा ही होता है.
**निष्कर्ष:**
इस प्रयोग ने डी-ब्रॉग्ली की परिकल्पना को पूरी तरह से सत्यापित कर दिया कि द्रव्य कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) भी तरंगों की तरह व्यवहार करते हैं. इस प्रयोग के बाद द्रव्य की दोहरी प्रकृति (कण-तरंग द्वैतवाद) को व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया.
In simple words: डी-ब्रॉग्ली ने कहा कि हर चलता हुआ कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) एक तरंग की तरह होता है. इस तरंग की लंबाई कण की गति पर निर्भर करती है. डेविसन और जर्मर ने एक प्रयोग किया जहाँ उन्होंने इलेक्ट्रॉनों को एक निकेल क्रिस्टल पर गिराया. उन्होंने देखा कि इलेक्ट्रॉन कुछ खास तरीकों से मुड़ गए (विवर्तित हुए), जैसे प्रकाश की तरंगें मुड़ती हैं. इस प्रयोग ने साबित कर दिया कि डी-ब्रॉग्ली की बात सही थी और इलेक्ट्रॉन में कण और तरंग दोनों के गुण होते हैं.
🎯 Exam Tip: डी-ब्रॉग्ली परिकल्पना के सूत्र और डेविसन-जर्मर प्रयोग की मुख्य बातें (इलेक्ट्रॉन विवर्तन) को याद रखना ज़रूरी है. चित्र बनाकर प्रयोग की व्यवस्था और परिणाम को समझाना उत्तर को और प्रभावी बनाता है.
Question 6. इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन एवं 0-कण के दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य ज्ञात करने के लिये सूत्र स्थापित कीजिये।
Answer: किसी आवेशित कण का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य ज्ञात करने के लिए, हम पहले उसकी गतिज ऊर्जा निकालते हैं. यदि किसी कण जिसका आवेश \( q \) और द्रव्यमान \( M \) है, को \( V \) वोल्ट के विभवान्तर से त्वरित किया जाता है, तो उसकी गतिज ऊर्जा (\( K \)) होगी:
\[ K = qV \]
डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है:
\[ \lambda = \frac{h}{\sqrt{2MK}} \]
यहाँ \( K = qV \) रखने पर, आवेशित कण के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सामान्य सूत्र प्राप्त होता है:
\[ \lambda = \frac{h}{\sqrt{2MqV}} \]
**विभिन्न कणों के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य के सूत्र:**
**(i) इलेक्ट्रॉन के लिए:**
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान \( m_e = 9.1 \times 10^{-31} \) kg, आवेश \( e = 1.6 \times 10^{-19} \) C, और प्लैंक नियतांक \( h = 6.62 \times 10^{-34} \) Js होता है. इन मानों को सामान्य सूत्र में रखने पर:
\[ \lambda_e = \frac{6.62 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times (9.1 \times 10^{-31}) \times (1.6 \times 10^{-19}) \times V}} \] \[ \lambda_e = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \text{ Å} \]
यह इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है. यहाँ 1 Å = \( 10^{-10} \) m होता है.
**(ii) प्रोटॉन के लिए:**
प्रोटॉन का द्रव्यमान \( m_p = 1.67 \times 10^{-27} \) kg और आवेश \( q = e = 1.6 \times 10^{-19} \) C होता है. इन मानों को सामान्य सूत्र में रखने पर:
\[ \lambda_p = \frac{6.62 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times (1.67 \times 10^{-27}) \times (1.6 \times 10^{-19}) \times V}} \] \[ \lambda_p = \frac{0.286}{\sqrt{V}} \text{ Å} \]
यह प्रोटॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है.
**(iii) ड्यूटेरॉन के लिए:**
ड्यूटेरॉन का द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के द्रव्यमान का दोगुना होता है, \( m_d = 2m_p \). इसका आवेश भी इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर (\( q = e \)) होता है. इन मानों का उपयोग करके ड्यूटेरॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र निकाला जा सकता है.
\[ \lambda_d = \frac{h}{\sqrt{2(2m_p)eV}} = \frac{1}{\sqrt{2}} \cdot \frac{h}{\sqrt{2m_peV}} = \frac{1}{\sqrt{2}} \lambda_p \]
\[ \lambda_d = \frac{0.286}{\sqrt{2V}} \text{ Å} \]
**(iv) न्यूट्रॉन के लिए:**
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान \( m_n = 1.67 \times 10^{-27} \) kg होता है, लेकिन न्यूट्रॉन उदासीन होता है, इसलिए उसका कोई आवेश नहीं होता. ऐसे में, न्यूट्रॉन को किसी विभवान्तर से त्वरित नहीं किया जा सकता. यदि न्यूट्रॉन तापीय साम्य में है, तो उसकी औसत गतिज ऊर्जा \( E = \frac{3}{2} kT \) होती है, जहाँ \( k \) बोल्ट्जमैन नियतांक और \( T \) तापमान है. इस गतिज ऊर्जा का उपयोग करके न्यूट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निकाली जा सकती है:
\[ \lambda_n = \frac{h}{\sqrt{2m_n (\frac{3}{2} kT)}} = \frac{h}{\sqrt{3m_n kT}} \] \[ \lambda_n = \frac{30.8}{\sqrt{T}} \text{ Å} \]
इस तरह, हम अलग-अलग कणों के लिए उनकी प्रकृति (आवेशित या उदासीन) और गतिज ऊर्जा के आधार पर दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य ज्ञात कर सकते हैं.
In simple words: किसी भी छोटे कण जैसे इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन की तरंगदैर्ध्य निकालने के लिए एक खास सूत्र होता है. अगर कण पर चार्ज है और उसे वोल्टेज से चलाया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा चार्ज और वोल्टेज को गुणा करके मिलती है. इस ऊर्जा को डी-ब्रॉग्ली के सूत्र में डालने पर कण की तरंगदैर्ध्य मिल जाती है. न्यूट्रॉन जैसे कण पर चार्ज नहीं होता, तो उसकी तरंगदैर्ध्य निकालने के लिए तापमान से जुड़ी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं.
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, ड्यूटेरॉन और न्यूट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य के विशिष्ट सूत्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अक्सर सीधे प्रश्नों या संख्यात्मक समस्याओं में उपयोग होते हैं.
Question 1. ताँबे के लिये देहली आवृत्ति का मान \( 1.12 \times 10^{15} \) Hz है इसके पृष्ठ पर 2537A तरंगदैर्ध्य का प्रकाश आपतित किया जाता है। ताँबे के कार्य फलन एवं निरोधी विभव की गणना कीजिये। \( h = 6.63 \times 10^{-34} \) Js.
Answer:
दिए गए मान:
देहली आवृत्ति (\( \nu_0 \)) = \( 1.12 \times 10^{15} \) Hz
आपतित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य (\( \lambda \)) = 2537 Å = \( 2537 \times 10^{-10} \) m
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
प्रकाश की चाल (\( c \)) = \( 3 \times 10^8 \) m/s
इलेक्ट्रॉन का आवेश (\( e \)) = \( 1.6 \times 10^{-19} \) C
**(a) कार्य फलन (\( \phi_0 \)) की गणना:**
कार्य फलन का सूत्र है: \( \phi_0 = h\nu_0 \)
\( \phi_0 = (6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}) \times (1.12 \times 10^{15} \text{ Hz}) \)
\( \phi_0 = 7.4256 \times 10^{-19} \text{ J} \)
इसे eV में बदलने के लिए \( 1.6 \times 10^{-19} \) से भाग देंगे:
\( \phi_0 = \frac{7.4256 \times 10^{-19} \text{ J}}{1.6 \times 10^{-19} \text{ J/eV}} \)
\( \phi_0 = 4.641 \text{ eV} \)
ताँबे का कार्य फलन 4.641 eV है. यह ऊर्जा बताती है कि इलेक्ट्रॉन को धातु से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा लगती है.
**(b) निरोधी विभव (\( V_0 \)) की गणना:**
आइंस्टीन की प्रकाश-विद्युत समीकरण है:
\( h\nu = \phi_0 + K_{max} \)
जहाँ \( h\nu \) आपतित फोटॉन की ऊर्जा है और \( K_{max} = eV_0 \).
आपतित फोटॉन की ऊर्जा (\( E \)) = \( h\nu = \frac{hc}{\lambda} \)
\( E = \frac{(6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}) \times (3 \times 10^8 \text{ m/s})}{2537 \times 10^{-10} \text{ m}} \)
\( E = \frac{19.89 \times 10^{-26}}{2537 \times 10^{-10}} \text{ J} \)
\( E = 7.840 \times 10^{-19} \text{ J} \)
इसे eV में बदलने के लिए \( 1.6 \times 10^{-19} \) से भाग देंगे:
\( E = \frac{7.840 \times 10^{-19} \text{ J}}{1.6 \times 10^{-19} \text{ J/eV}} \)
\( E = 4.90 \text{ eV} \)
अब आइंस्टीन की समीकरण में मान रखेंगे:
\( E = \phi_0 + eV_0 \)
\( 4.90 \text{ eV} = 4.641 \text{ eV} + eV_0 \)
\( eV_0 = 4.90 \text{ eV} - 4.641 \text{ eV} \)
\( eV_0 = 0.259 \text{ eV} \)
चूंकि \( e \) इलेक्ट्रॉन वोल्ट की इकाई में पहले से शामिल है, इसलिए निरोधी विभव \( V_0 = 0.259 \) V होगा.
In simple words: हमने पहले देखा कि तांबे के अंदर से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा (कार्य फलन) लगती है. फिर, हमने गिरने वाले प्रकाश की कुल ऊर्जा निकाली. इन दोनों मानों का उपयोग करके, हमने वह वोल्टेज (निरोधी विभव) पता किया जो इलेक्ट्रॉनों को रुकने के लिए चाहिए होता है.
🎯 Exam Tip: कार्य फलन और फोटॉन ऊर्जा की गणना करते समय ऊर्जा को जूल से इलेक्ट्रॉन वोल्ट में बदलना न भूलें. निरोधी विभव के लिए \( K_{max} = eV_0 \) सूत्र का सही उपयोग करें.
Question 2. एक धातु के लिये देहली तरंगदैर्ध्य का मान 5675A है। धातु के कार्यफलन की गणना कीजिये। \( h = 6.63 \times 10^{-34} \) Js
Answer:
दिए गए मान:
देहली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_0 \)) = 5675 Å = \( 5675 \times 10^{-10} \) m
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
प्रकाश की चाल (\( c \)) = \( 3 \times 10^8 \) m/s
इलेक्ट्रॉन का आवेश (\( e \)) = \( 1.6 \times 10^{-19} \) C
कार्य फलन (\( \phi_0 \)) का सूत्र है:
\( \phi_0 = h\nu_0 = \frac{hc}{\lambda_0} \)
\( \phi_0 = \frac{(6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}) \times (3 \times 10^8 \text{ m/s})}{5675 \times 10^{-10} \text{ m}} \)
\( \phi_0 = \frac{19.89 \times 10^{-26}}{5675 \times 10^{-10}} \text{ J} \)
\( \phi_0 = 3.504 \times 10^{-19} \text{ J} \)
इसे eV में बदलने के लिए \( 1.6 \times 10^{-19} \) से भाग देंगे:
\( \phi_0 = \frac{3.504 \times 10^{-19} \text{ J}}{1.6 \times 10^{-19} \text{ J/eV}} \)
\( \phi_0 = 2.19 \text{ eV} \)
इस धातु का कार्य फलन 2.19 eV है. यह न्यूनतम ऊर्जा है जो इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए चाहिए होती है.
In simple words: हमने दी गई देहली तरंगदैर्ध्य (प्रकाश की वह लंबाई जो इलेक्ट्रॉनों को मुश्किल से बाहर निकाल पाती है) का उपयोग करके यह पता लगाया कि उस धातु से एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए कम से कम कितनी ऊर्जा की जरूरत होगी.
🎯 Exam Tip: देहली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_0 \)) और देहली आवृत्ति (\( \nu_0 \)) के बीच का संबंध (\( \lambda_0 = c/\nu_0 \)) याद रखें और गणना करते समय सही इकाइयों का उपयोग करें.
Question 3. 3000Å एवं 6000Å तरंगदैर्ध्य के विकिरणों से उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जाओं में अन्तर की गणना कीजिये।
Answer:
दिए गए मान:
पहली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_1 \)) = 3000 Å = \( 3000 \times 10^{-10} \) m
दूसरी तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_2 \)) = 6000 Å = \( 6000 \times 10^{-10} \) m
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
प्रकाश की चाल (\( c \)) = \( 3 \times 10^8 \) m/s
इलेक्ट्रॉन का आवेश (\( e \)) = \( 1.6 \times 10^{-19} \) C
आइंस्टीन की प्रकाश-विद्युत समीकरण के अनुसार, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा (\( K_{max} \)) है:
\( K_{max} = h\nu - \phi_0 = \frac{hc}{\lambda} - \phi_0 \)
जहाँ \( \phi_0 \) धातु का कार्य फलन है, जो दोनों स्थितियों में समान रहता है.
पहले विकिरण के लिए गतिज ऊर्जा (\( K_1 \)):
\( K_1 = \frac{hc}{\lambda_1} - \phi_0 \)
दूसरे विकिरण के लिए गतिज ऊर्जा (\( K_2 \)):
\( K_2 = \frac{hc}{\lambda_2} - \phi_0 \)
गतिज ऊर्जाओं में अन्तर (\( \Delta K \)) = \( K_1 - K_2 \)
\( \Delta K = \left( \frac{hc}{\lambda_1} - \phi_0 \right) - \left( \frac{hc}{\lambda_2} - \phi_0 \right) \)
\( \Delta K = \frac{hc}{\lambda_1} - \frac{hc}{\lambda_2} = hc \left( \frac{1}{\lambda_1} - \frac{1}{\lambda_2} \right) \)
मान रखने पर:
\( \Delta K = (6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}) \times (3 \times 10^8 \text{ m/s}) \left( \frac{1}{3000 \times 10^{-10} \text{ m}} - \frac{1}{6000 \times 10^{-10} \text{ m}} \right) \)
\( \Delta K = 19.89 \times 10^{-26} \times \left( \frac{1}{10^{-10}} \left( \frac{1}{3000} - \frac{1}{6000} \right) \right) \)
\( \Delta K = 19.89 \times 10^{-26} \times 10^{10} \times \left( \frac{2-1}{6000} \right) \)
\( \Delta K = 19.89 \times 10^{-16} \times \frac{1}{6000} \)
\( \Delta K = \frac{19.89 \times 10^{-16}}{6 \times 10^3} \)
\( \Delta K = 3.315 \times 10^{-19} \text{ J} \)
इसे eV में बदलने के लिए \( 1.6 \times 10^{-19} \) से भाग देंगे:
\( \Delta K = \frac{3.315 \times 10^{-19} \text{ J}}{1.6 \times 10^{-19} \text{ J/eV}} \)
\( \Delta K = 2.0718 \text{ eV} \)
अतः, दोनों विकिरणों से उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जाओं में अन्तर लगभग 2.07 eV है. यह दर्शाता है कि कम तरंगदैर्ध्य (अधिक आवृत्ति) वाले प्रकाश से इलेक्ट्रॉन अधिक ऊर्जा से निकलते हैं.
In simple words: हमने दो अलग-अलग रंगों (तरंगदैर्ध्य) के प्रकाश से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा में कितना फर्क है, यह पता लगाया. इसमें हमने यह मानकर गणना की कि धातु का कार्य फलन (इलेक्ट्रॉन को निकालने की न्यूनतम ऊर्जा) दोनों स्थितियों में एक जैसा रहेगा.
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में कार्य फलन को समीकरण से हटाने की विधि याद रखें, क्योंकि यह अक्सर ज्ञात नहीं होता. ऊर्जा को जूल से इलेक्ट्रॉन वोल्ट में बदलना एक महत्वपूर्ण कदम है.
Question 4. 100V के समान विभवान्तर से त्वरित एक इलेक्ट्रॉन तथा \(\alpha\)-कण से सम्बन्धित दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिये।
Answer:
दिए गए मान:
त्वरित विभवान्तर (\( V \)) = 100 V
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
इलेक्ट्रॉन का आवेश (\( e \)) = \( 1.6 \times 10^{-19} \) C
**1. इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_e \)):**
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (\( m_e \)) = \( 9.1 \times 10^{-31} \) kg
इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है:
\[ \lambda_e = \frac{h}{\sqrt{2m_e e V}} \] \[ \lambda_e = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times (9.1 \times 10^{-31}) \times (1.6 \times 10^{-19}) \times 100}} \] \[ \lambda_e = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{\sqrt{291.2 \times 10^{-49}}} \] \[ \lambda_e = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{17.06 \times 10^{-24.5}} = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{1.706 \times 10^{-23.5}} \] \[ \lambda_e \approx 3.886 \times 10^{-11} \text{ m} \] \[ \lambda_e \approx 0.3886 \text{ Å} \] अगर हम इलेक्ट्रॉन के लिए सरलीकृत सूत्र \( \lambda_e = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \text{ Å} \) का उपयोग करें:
\[ \lambda_e = \frac{12.27}{\sqrt{100}} = \frac{12.27}{10} = 1.227 \text{ Å} \]
(नोट: इस गणना में \( h \) का मान \( 6.62 \times 10^{-34} \) और \( m_e \) का मान \( 9.11 \times 10^{-31} \) उपयोग किया जाता है. यहाँ दिए गए सूत्र में \( \sqrt{V} \) के साथ 12.27 का उपयोग किया गया है, जो एक मानक सरलीकृत मान है.)
तो, इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य 1.227 Å है.
**2. \(\alpha\)-कण के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_\alpha \)):**
\(\alpha\)-कण का द्रव्यमान (\( m_\alpha \)) = \( 4m_p \) (जहाँ \( m_p \) प्रोटॉन का द्रव्यमान) \(\approx 4 \times 1.67 \times 10^{-27} \) kg = \( 6.68 \times 10^{-27} \) kg
\(\alpha\)-कण का आवेश (\( q_\alpha \)) = \( 2e = 2 \times 1.6 \times 10^{-19} \) C = \( 3.2 \times 10^{-19} \) C
\(\alpha\)-कण के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है:
\[ \lambda_\alpha = \frac{h}{\sqrt{2m_\alpha q_\alpha V}} \] \[ \lambda_\alpha = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times (6.68 \times 10^{-27}) \times (3.2 \times 10^{-19}) \times 100}} \] \[ \lambda_\alpha = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{\sqrt{4275.2 \times 10^{-46}}} \] \[ \lambda_\alpha = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{65.38 \times 10^{-23}} \] \[ \lambda_\alpha \approx 0.1014 \times 10^{-11} \text{ m} \] \[ \lambda_\alpha \approx 0.0101 \text{ Å} \] तो, \(\alpha\)-कण के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य 0.0101 Å है. \( \alpha \)-कण का द्रव्यमान और आवेश इलेक्ट्रॉन से काफी अधिक होता है, इसलिए इसकी तरंगदैर्ध्य बहुत कम होती है.
In simple words: हमने एक ही वोल्टेज से चलने वाले इलेक्ट्रॉन और \(\alpha\)-कण की तरंगदैर्ध्य निकाली. इलेक्ट्रॉन हल्का होने के कारण उसकी तरंग ज़्यादा लंबी होती है, जबकि भारी \(\alpha\)-कण की तरंग बहुत छोटी होती है.
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन और \(\alpha\)-कण के द्रव्यमान और आवेश के सही मानों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है. इलेक्ट्रॉन के लिए सरलीकृत सूत्र का उपयोग करते समय, सुनिश्चित करें कि आप जानते हैं कि यह कैसे प्राप्त हुआ है और कहाँ लागू होता है.
Question 6. डेविसन एवं जर्मर के प्रयोग में प्रथम कोटि का विवर्तन प्रेक्षित किया जाता है। त्वरक वोल्टता का मान 54 वोल्ट है। यदि प्रयुक्त Ni क्रिस्टल के परावर्तक तलों के मध्य दूरी 0.92A हो तो विवर्तन कोण का मान ज्ञात कीजिये।
Answer:
दिए गए मान:
त्वरक वोल्टता (\( V \)) = 54 V
Ni क्रिस्टल के परावर्तक तलों के मध्य दूरी (\( d \)) = 0.92 Å = \( 0.92 \times 10^{-10} \) m
विवर्तन की कोटि (\( n \)) = 1 (प्रथम कोटि)
**1. इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda \)) की गणना:**
इलेक्ट्रॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है:
\[ \lambda = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \text{ Å} \]
\[ \lambda = \frac{12.27}{\sqrt{54}} \text{ Å} = \frac{12.27}{7.348} \text{ Å} \] \[ \lambda \approx 1.6698 \text{ Å} \] तो, इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य लगभग 1.67 Å है.
**2. विवर्तन कोण (\( \theta \)) की गणना:**
ब्रैग के नियम के अनुसार, विवर्तन के लिए:
\( n\lambda = 2d \sin\theta \)
प्रथम कोटि विवर्तन के लिए (\( n = 1 \)):
\( \lambda = 2d \sin\theta \)
\[ \sin\theta = \frac{\lambda}{2d} \] मान रखने पर:
\[ \sin\theta = \frac{1.67 \text{ Å}}{2 \times 0.92 \text{ Å}} = \frac{1.67}{1.84} \] \[ \sin\theta \approx 0.9076 \] \[ \theta = \arcsin(0.9076) \] \[ \theta \approx 65.25^\circ \] विवर्तन कोण लगभग 65.25° है. यह कोण बताता है कि डेविसन-जर्मर प्रयोग में इलेक्ट्रॉन किस कोण पर सबसे अधिक विवर्तित होते हैं.
In simple words: हमने पहले इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्ध्य (तरंग की लंबाई) निकाली, क्योंकि उसे एक निश्चित वोल्टेज से चलाया जा रहा था. फिर, हमने ब्रैग के नियम का उपयोग करके यह पता लगाया कि जब इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल से टकराते हैं, तो वे कितने कोण पर मुड़ते (विवर्तित होते) हैं.
🎯 Exam Tip: डेविसन-जर्मर प्रयोग में इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निकालने के लिए \( \lambda = \frac{12.27}{\sqrt{V}} \text{ Å} \) सूत्र का उपयोग याद रखें और फिर ब्रैग के नियम \( n\lambda = 2d \sin\theta \) को सही ढंग से लागू करें.
Question 7. एक गतिशील इलेक्ट्रॉन के संवेग के x-घटक में अनिश्चितता \( 13.18 \times 10^{-30} \) kg m/s है। स्थिति तथा वेग के X-घटक में अनिश्चितताओं की गणना कीजिये।
Answer:
दिए गए मान:
संवेग के x-घटक में अनिश्चितता (\( \Delta p_x \)) = \( 13.18 \times 10^{-30} \) kg m/s
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (\( m_e \)) = \( 9.1 \times 10^{-31} \) kg
**1. स्थिति के X-घटक में अनिश्चितता (\( \Delta x \)) की गणना:**
हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत के अनुसार:
\[ \Delta x \cdot \Delta p_x \ge \frac{h}{4\pi} \]
न्यूनतम अनिश्चितता के लिए हम बराबर का चिन्ह प्रयोग करेंगे:
\[ \Delta x = \frac{h}{4\pi \Delta p_x} \]
मान रखने पर:
\[ \Delta x = \frac{6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}}{4 \times 3.14 \times (13.18 \times 10^{-30} \text{ kg m/s})} \] \[ \Delta x = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{165.568 \times 10^{-30}} \] \[ \Delta x \approx 0.04004 \times 10^{-4} \text{ m} \] \[ \Delta x \approx 4.004 \times 10^{-6} \text{ m} \] स्थिति के X-घटक में अनिश्चितता लगभग \( 4.004 \times 10^{-6} \) m है. इसका मतलब है कि हम इलेक्ट्रॉन की स्थिति को इस सटीकता से ही जान सकते हैं.
**2. वेग के X-घटक में अनिश्चितता (\( \Delta v_x \)) की गणना:**
संवेग में अनिश्चितता का संबंध वेग में अनिश्चितता से इस प्रकार है:
\( \Delta p_x = m_e \Delta v_x \)
\[ \Delta v_x = \frac{\Delta p_x}{m_e} \] मान रखने पर:
\[ \Delta v_x = \frac{13.18 \times 10^{-30} \text{ kg m/s}}{9.1 \times 10^{-31} \text{ kg}} \] \[ \Delta v_x \approx 1.448 \times 10^1 \text{ m/s} \] \[ \Delta v_x \approx 14.48 \text{ m/s} \] वेग के X-घटक में अनिश्चितता लगभग 14.48 m/s है. यह दर्शाता है कि इलेक्ट्रॉन का वेग भी पूरी तरह से निश्चित नहीं किया जा सकता. हाइजेनबर्ग का सिद्धांत बताता है कि किसी कण की स्थिति और संवेग दोनों को एक साथ पूरी सटीकता से मापना संभव नहीं है, एक में सटीकता बढ़ाने पर दूसरे में अनिश्चितता बढ़ती है.
In simple words: हमने हाइजेनबर्ग के नियम का उपयोग करके, एक इलेक्ट्रॉन की गति में अनिश्चितता से यह पता लगाया कि उसकी जगह और उसकी रफ्तार में कितनी अनिश्चितता हो सकती है. यह नियम कहता है कि हम किसी कण की जगह और गति दोनों को एक साथ बिल्कुल सही-सही नहीं बता सकते.
🎯 Exam Tip: हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत \( \Delta x \cdot \Delta p_x \ge \frac{h}{4\pi} \) का सूत्र याद रखें और वेग की अनिश्चितता ज्ञात करने के लिए \( \Delta p_x = m \Delta v_x \) संबंध का सही उपयोग करें. इकाइयों को ध्यान में रखना भी महत्वपूर्ण है.
Question 8. समान ऊर्जा के प्रोटॉन एवं \(\alpha\)-कणों के दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्यों के अनुपात की गणना कीजिये।
Answer:
दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है: \( \lambda = \frac{h}{p} \)
जहाँ \( p \) कण का संवेग है. कण की गतिज ऊर्जा (\( K \)) और संवेग (\( p \)) के बीच संबंध है: \( K = \frac{p^2}{2m} \), जिससे \( p = \sqrt{2mK} \).
इसलिए, दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य को गतिज ऊर्जा के पदों में इस प्रकार लिखा जा सकता है:
\[ \lambda = \frac{h}{\sqrt{2mK}} \]
दिए गए प्रश्न के अनुसार, प्रोटॉन और \(\alpha\)-कण की गतिज ऊर्जा समान है, यानी \( K_p = K_\alpha = K \).
**1. प्रोटॉन के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_p \)):**
प्रोटॉन का द्रव्यमान \( m_p \).
\[ \lambda_p = \frac{h}{\sqrt{2m_p K}} \]
**2. \(\alpha\)-कण के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (\( \lambda_\alpha \)):**
\(\alpha\)-कण का द्रव्यमान \( m_\alpha = 4m_p \).
\[ \lambda_\alpha = \frac{h}{\sqrt{2m_\alpha K}} = \frac{h}{\sqrt{2(4m_p)K}} \] \[ \lambda_\alpha = \frac{h}{\sqrt{8m_p K}} \]
**3. अनुपात (\( \frac{\lambda_p}{\lambda_\alpha} \)) की गणना:**
\[ \frac{\lambda_p}{\lambda_\alpha} = \frac{\frac{h}{\sqrt{2m_p K}}}{\frac{h}{\sqrt{8m_p K}}} = \frac{\sqrt{8m_p K}}{\sqrt{2m_p K}} \] \[ \frac{\lambda_p}{\lambda_\alpha} = \sqrt{\frac{8m_p K}{2m_p K}} = \sqrt{\frac{8}{2}} = \sqrt{4} = 2 \]
अतः, प्रोटॉन और \(\alpha\)-कणों के दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्यों का अनुपात 2:1 है. यह दर्शाता है कि समान ऊर्जा होने पर, हल्का कण (प्रोटॉन) भारी कण (\(\alpha\)-कण) की तुलना में लंबी तरंगदैर्ध्य प्रदर्शित करता है.
In simple words: हमने यह पता लगाया कि जब एक प्रोटॉन और एक \(\alpha\)-कण की ऊर्जा बराबर होती है, तो उनकी तरंगों की लंबाई का अनुपात क्या होता है. चूंकि प्रोटॉन \(\alpha\)-कण से हल्का होता है, तो उसकी तरंग की लंबाई \(\alpha\)-कण की तरंग की लंबाई से दोगुनी होगी.
🎯 Exam Tip: समान गतिज ऊर्जा वाले कणों के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का संबंध (\( \lambda \propto \frac{1}{\sqrt{m}} \)) याद रखें और द्रव्यमान के सही अनुपात का उपयोग करें (\( m_\alpha = 4m_p \)).
Question 9. विद्युत चुम्बकीय स्पंद का काल 0.30ms है। फोटॉन की ऊर्जा में अनिश्चितता ज्ञात कीजिए।
Answer:
दिए गए मान:
विद्युत चुम्बकीय स्पंद का काल (\( \Delta t \)) = 0.30 ms = \( 0.30 \times 10^{-3} \) s
प्लैंक नियतांक (\( h \)) = \( 6.63 \times 10^{-34} \) Js
हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत के अनुसार, ऊर्जा और समय में अनिश्चितता का संबंध इस प्रकार है:
\[ \Delta E \cdot \Delta t \ge \frac{h}{4\pi} \]
न्यूनतम अनिश्चितता के लिए हम बराबर का चिन्ह प्रयोग करेंगे:
\[ \Delta E = \frac{h}{4\pi \Delta t} \]
मान रखने पर:
\[ \Delta E = \frac{6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}}{4 \times 3.14 \times (0.30 \times 10^{-3} \text{ s})} \] \[ \Delta E = \frac{6.63 \times 10^{-34}}{3.768 \times 10^{-3}} \] \[ \Delta E \approx 1.759 \times 10^{-31} \text{ J} \]
फोटॉन की ऊर्जा में अनिश्चितता लगभग \( 1.76 \times 10^{-31} \) J है. यह सिद्धांत दर्शाता है कि यदि किसी घटना का समय बहुत कम हो, तो उसकी ऊर्जा को पूरी सटीकता से निर्धारित नहीं किया जा सकता. फोटॉन जितनी कम अवधि के लिए मौजूद रहेगा, उसकी ऊर्जा में अनिश्चितता उतनी ही अधिक होगी.
In simple words: हमने हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत का उपयोग करके यह पता लगाया कि अगर हमें एक प्रकाश स्पंद (फोटॉन) के समय की अवधि पता है, तो उसकी ऊर्जा कितनी अनिश्चित हो सकती है. इसका मतलब है कि हम किसी फोटॉन की ऊर्जा और उसके समय को एक साथ बिल्कुल सही-सही नहीं बता सकते.
🎯 Exam Tip: ऊर्जा-समय अनिश्चितता सिद्धांत (\( \Delta E \cdot \Delta t \ge \frac{h}{4\pi} \)) का सूत्र याद रखें और समय की इकाई (ms को s में बदलना) का सही रूपांतरण सुनिश्चित करें.
Question 10. सोडियम के लिए कार्यफलन 2.3 ev है। प्रकाश की वह अधिकतम तरंगदैर्ध्य ज्ञात करो जो सोडियम से प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन कर सकती है?
Answer: सोडियम का कार्यफलन (\(\phi\)) \( = 2.3 \text{ eV} \). हमें वह अधिकतम तरंगदैर्ध्य ज्ञात करनी है जिससे सोडियम से प्रकाश इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकें। इसके लिए हम कार्यफलन के सूत्र का उपयोग करते हैं, जो प्लैंक स्थिरांक (\(h\)), प्रकाश की गति (\(c\)) और देहली तरंगदैर्ध्य (\(\lambda_0\)) से संबंधित है।
कार्यफलन (\(\phi\)) \( = h\nu_0 = \frac{hc}{\lambda_0} \)
इसलिए, देहली तरंगदैर्ध्य \( \lambda_0 = \frac{hc}{\phi} \)
यहां, \( h = 6.63 \times 10^{-34} \text{ Js} \), \( c = 3 \times 10^8 \text{ m/s} \), और \( \phi = 2.3 \text{ eV} = 2.3 \times 1.6 \times 10^{-19} \text{ J} \)
मान रखने पर:
\( \lambda_0 = \frac{(6.63 \times 10^{-34}) \times (3 \times 10^8)}{2.3 \times 1.6 \times 10^{-19}} \)
\( \lambda_0 = \frac{19.89 \times 10^{-26}}{3.68 \times 10^{-19}} \)
\( \lambda_0 \approx 5.39 \times 10^{-7} \text{ m} \)
\( \lambda_0 = 539 \text{ nm} \). यह प्रकाश की वह अधिकतम तरंगदैर्ध्य है जो सोडियम से इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकाल सकती है.
In simple words: सोडियम से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए हमें एक खास ऊर्जा की ज़रूरत होती है, जिसे कार्यफलन कहते हैं. इस ऊर्जा को देने वाली प्रकाश की सबसे ज़्यादा तरंगदैर्ध्य 539 नैनोमीटर है.
🎯 Exam Tip: देहली तरंगदैर्ध्य की गणना करते समय, सुनिश्चित करें कि कार्यफलन की इकाई को इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) से जूल (J) में सही ढंग से परिवर्तित किया गया है.
Question 11. एक धात्विक सतह को 8.5 × 1014Hz के प्रकाश से प्रदीपन करने पर इससे सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा 0.52 ev है। इसी सतह को 12.0 × 1014Hz के प्रकाश से प्रदीपन करने पर उत्सर्जित प्रकाशित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा 1.97 ev है। धातु का कार्यफलन ज्ञात करो।
Answer: हमें धातु का कार्यफलन ज्ञात करना है, जो आपतित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर निर्भर नहीं करता है। हम आइंस्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण \( hv = K_{max} + \phi \) का उपयोग कर सकते हैं, जहाँ \( hv \) आपतित फोटॉन की ऊर्जा है, \( K_{max} \) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा है, और \( \phi \) कार्यफलन है।
पहले मामले के लिए:
\( hv = K_{max} + \phi \)
\( (6.63 \times 10^{-34} \text{ Js}) \times (8.5 \times 10^{14} \text{ Hz}) = 0.52 \text{ eV} + \phi \)
फोटॉन ऊर्जा को eV में बदलने पर:
\( \frac{6.63 \times 10^{-34} \times 8.5 \times 10^{14}}{1.6 \times 10^{-19}} \text{ eV} \approx 3.52 \text{ eV} \)
तो, \( 3.52 \text{ eV} = 0.52 \text{ eV} + \phi \)
\( \phi = (3.52 - 0.52) \text{ eV} \)
\( \phi = 3 \text{ eV} \).
In simple words: हमें दो अलग-अलग प्रकाश आवृत्तियाँ और उनसे निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा दी गई है। धातु का कार्यफलन एक स्थिर मान होता है। आइंस्टीन के सूत्र का उपयोग करके, हम पाते हैं कि इस धातु का कार्यफलन 3 इलेक्ट्रॉन वोल्ट है.
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में, आइंस्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण का उपयोग करें और सुनिश्चित करें कि सभी ऊर्जा मान (विशेषकर \( hv \) को) एक ही इकाई (जैसे eV) में परिवर्तित किया गया हो, इससे गणना आसान हो जाती है.
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