RBSE Solutions Class 12 Physics Chapter 10 प्रत्यावर्ती धारा

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Detailed Chapter 10 प्रत्यावर्ती धारा RBSE Solutions for Class 12 Physics

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Class 12 Physics Chapter 10 प्रत्यावर्ती धारा RBSE Solutions PDF

Rbse Class 12 Physics Chapter 10 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग माध्य मूल का मान होता है
(अ) शिखर मान का दुगुना
(ब) शिखर मान का आधा
(स) शिखर मान के बराबर
(द) शिखर का मान \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) गुना।
Answer: (द) शिखर का मान \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) गुना।
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान (RMS) उसके शिखर मान का \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) गुना होता है। यह मान हमें बताता है कि प्रत्यावर्ती धारा कितनी प्रभावी है, जैसे दिष्ट धारा होती है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि वर्ग माध्य मूल मान (RMS value) वह प्रभावी मान होता है जो समान ऊष्मा उत्पन्न करता है, जितना कि दिष्ट धारा उत्पन्न करती है। इसे \( I_{rms} = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \) के रूप में दर्शाया जाता है, जहाँ \( I_0 \) शिखर मान है।

 

Question 3. प्रत्यावर्ती धारा की कला वोल्टता की कला से \( \frac{\pi}{2} \) कोण से पीछे रहती है, जब परिपथ में
(अ) केवल प्रतिरोध हो
(ब) केवल प्रेरकत्व हो
(स) केवल धारिता हो
(द) धारिता और प्रतिरोध हो।
Answer: (ब) केवल प्रेरकत्व हो
In simple words: शुद्ध प्रेरकत्व वाले परिपथ में, वोल्टता धारा से \( \frac{\pi}{2} \) (या 90 डिग्री) आगे चलती है, जिसका मतलब है कि धारा वोल्टता से \( \frac{\pi}{2} \) पीछे होती है। यह प्रेरक के गुण के कारण होता है जो धारा के बदलाव का विरोध करता है।

🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को याद रखने के लिए, "ELI the ICE man" वाक्यांश का उपयोग करें: E (वोल्टेज) L (प्रेरकत्व) I (धारा) - यानी प्रेरकत्व में E, I से पहले आता है (E आगे चलता है). I (धारा) C (संधारित्र) E (वोल्टेज) - यानी संधारित्र में I, E से पहले आता है (I आगे चलता है).

 

Question 4. \( C\omega \) को मात्रक है-
(अ) ओम
(ब) म्हो
(स) वोल्ट
(द) एम्पियर।
Answer: (ब) म्हो
In simple words: \( C\omega \) का मात्रक म्हो होता है, क्योंकि यह धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)) का उल्टा होता है, और प्रतिघात का मात्रक ओम होता है। म्हो विद्युत चालकता की इकाई है।

🎯 Exam Tip: धारितीय प्रतिघात \( X_C = \frac{1}{C\omega} \) होता है। इसलिए \( C\omega \) का मात्रक \( \frac{1}{\Omega} \) होगा, जिसे म्हो या साइमन भी कहते हैं। प्रतिरोध और प्रतिघात दोनों को ओम में मापा जाता है, जबकि चालकता को म्हो में मापा जाता है।

 

Question 5. परिपथ में संधारित्र-
(अ) प्रत्यावर्ती धारा को गुजरने देता है।
(ब) प्रत्यावर्ती धारा को रोक देता है।
Answer: (अ) प्रत्यावर्ती धारा को गुजरने देता है।
In simple words: एक संधारित्र प्रत्यावर्ती धारा (AC) को अपने में से गुजरने देता है, लेकिन दिष्ट धारा (DC) को रोक देता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि AC धारा की आवृत्ति होती है, जिससे संधारित्र लगातार चार्ज और डिस्चार्ज होता रहता है।

🎯 Exam Tip: संधारित्र दिष्ट धारा के लिए एक खुले परिपथ की तरह कार्य करता है (क्योंकि \( X_C = \frac{1}{C\omega} \), और दिष्ट धारा के लिए \( \omega = 0 \), इसलिए \( X_C = \infty \)). प्रत्यावर्ती धारा के लिए, इसकी प्रतिघात आवृत्ति के साथ बदलती रहती है, जिससे यह AC को गुजरने देता है।

 

Question 6. किसका मात्रक समान नहीं है
(अ) \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \)
(ब) \( \sqrt{\mathrm{LC}} \)
(स) RC
(द) \( \frac{L}{R} \)
Answer: (अ) \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \)
In simple words: \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \) का मात्रक आवृत्ति का होता है, जबकि अन्य विकल्प (\( \sqrt{\mathrm{LC}} \), RC, \( \frac{L}{R} \)) समय के मात्रक हैं। इसलिए, \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \) का मात्रक बाकी विकल्पों से अलग है।

🎯 Exam Tip: \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \) अनुनादी आवृत्ति (\( \omega_0 \)) के कोणीय आवृत्ति का सूत्र है, इसलिए इसका मात्रक रेडियन/सेकंड होता है, जो आवृत्ति के मात्रक से संबंधित है। RC और \( \frac{L}{R} \) दोनों RC और RL परिपथों के समय स्थिरांक हैं, जिनका मात्रक सेकंड होता है।

 

Question 7. एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ 10kHz आवृत्ति पर अनुनादित होता है। यदि आवृत्ति बढ़ाकर 12Hz कर दी जाए तो परिपथ की प्रतिबाधा पर क्या प्रभाव पड़ेगा-
(अ) अपरिवर्तित रहेगी।
(ब) 1.2 गुना बढ़ जाएगी।
(स) बढ़ जाएगी और धारितीय हो जाएगी।
(द) बढ़ जाएगी और प्रेरणिक हो जाएगी।
Answer: (द) बढ़ जाएगी और प्रेरणिक हो जाएगी।
In simple words: जब एक परिपथ अनुनाद में होता है, तो उसकी प्रतिबाधा न्यूनतम (प्रतिरोध के बराबर) होती है। यदि आवृत्ति को अनुनादी आवृत्ति से बढ़ाया जाता है, तो प्रेरणिक प्रतिघात धारितीय प्रतिघात से अधिक हो जाता है, जिससे कुल प्रतिबाधा बढ़ जाती है और परिपथ प्रेरणिक व्यवहार दिखाता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में, प्रेरणिक प्रतिघात (\( X_L \)) और धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)) बराबर होते हैं, और परिपथ विशुद्ध रूप से प्रतिरोधी होता है (\( Z = R \)). जब आवृत्ति बढ़ती है, तो \( X_L \) बढ़ता है (\( X_L = \omega L \)) और \( X_C \) घटता है (\( X_C = \frac{1}{\omega C} \)), जिससे \( X_L > X_C \) हो जाता है, और परिपथ का व्यवहार प्रेरणिक हो जाता है।

 

Question 8. एक परिपथ में धारा की कला वोल्टता की कला से \( \frac{\pi}{3} \) कोण पीछे है, परिपथ में अवयव है।
(अ) R तथा C
(ब) R तथा L
(स) L तथा C
(द) केवल C
Answer: (ब) R तथा L
In simple words: यदि धारा वोल्टता से कला में पीछे है, तो इसका मतलब है कि परिपथ में एक प्रेरक तत्व (L) मौजूद है। प्रतिरोध (R) के साथ प्रेरक तत्व (L) होने पर ही धारा वोल्टता से पीछे रह सकती है।

🎯 Exam Tip: L-R परिपथ में, धारा वोल्टता से \( \phi \) कोण पीछे रहती है, जहाँ \( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \). C-R परिपथ में, धारा वोल्टता से \( \phi \) कोण आगे रहती है, जहाँ \( \tan \phi = \frac{X_C}{R} \). शुद्ध प्रतिरोध में धारा और वोल्टता एक ही कला में होते हैं।

 

Question 9. शुद्ध प्रेरकत्व या धारिता का शक्ति गुणांक का मान होता है।
(अ) एक
(ब) शून्य
(स) 1
(द) शून्य से अधिक।
Answer: (ब) शून्य
In simple words: शुद्ध प्रेरकत्व (Inductor) या शुद्ध धारिता (Capacitor) वाले परिपथ में शक्ति गुणांक शून्य होता है। इसका मतलब है कि इन घटकों में कोई वास्तविक शक्ति खर्च नहीं होती, केवल ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है।

🎯 Exam Tip: शक्ति गुणांक \( \cos \phi \) होता है, जहाँ \( \phi \) वोल्टता और धारा के बीच का कलांतर है। शुद्ध प्रेरकत्व और धारिता के लिए, कलांतर \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) होता है, और \( \cos(\frac{\pi}{2}) = 0 \). एक आदर्श प्रतिरोध के लिए, कलांतर शून्य होता है और शक्ति गुणांक 1 होता है।

 

Question 10. एक प्रत्यावर्ती परिपथ में शक्ति की हानि किए बिना धारा को कम कर सकता है-
(अ) शुद्ध प्रेरकत्व का प्रयोग कर
(ब) शुद्ध प्रतिरोध प्रयुक्त कर
(स) प्रतिरोध और प्रेरकत्व लगाकर
(द) प्रतिरोध तथा धारिता प्रयुक्त कर ।
Answer: (अ) शुद्ध प्रेरकत्व का प्रयोग कर
In simple words: शुद्ध प्रेरकत्व का उपयोग करके प्रत्यावर्ती धारा को बिना शक्ति खोए कम किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक आदर्श प्रेरक में कोई प्रतिरोध नहीं होता, इसलिए इसमें कोई ऊष्मा उत्पन्न नहीं होती और वास्तविक शक्ति का क्षय नहीं होता।

🎯 Exam Tip: शुद्ध प्रेरक में औसत शक्ति व्यय शून्य होता है क्योंकि धारा और वोल्टता के बीच कलांतर 90 डिग्री होता है। इससे यह धारा के प्रवाह का विरोध करता है (प्रेरणिक प्रतिघात के कारण) लेकिन ऊर्जा का क्षय नहीं करता। चोक कॉइल इसका एक उदाहरण है।

 

Question 11. धारा \( I = I_0 \sin\left(\omega t-\frac{\pi}{2}\right) \) प्रत्यावर्ती परिपथ में प्रवाहित हो रही है। यदि प्रत्यावर्ती वोल्टता \( V = V_0 \sin \omega t \) हो तो व्यय होने वाली शक्ति है-
(अ) \( \frac{\mathrm{V}_{0} \mathrm{I}_{0}}{\mathrm{R}} \)
(ब) \( \frac{\mathrm{V}_{0} \mathrm{I}_{0}}{\sqrt{2}} \)
(स) \( \frac{\mathrm{V}_{0} \mathrm{I}_{0}}{2} \)
(द) शून्य
Answer: (द) शून्य
In simple words: यहाँ धारा और वोल्टता के बीच का कलांतर \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) है। जब कलांतर 90 डिग्री होता है, तो परिपथ में व्यय होने वाली औसत शक्ति शून्य होती है। यह स्थिति शुद्ध प्रेरकत्व या शुद्ध धारिता वाले परिपथ में होती है।

🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति \( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \) होती है। यहाँ, वोल्टता \( V = V_0 \sin \omega t \) और धारा \( I = I_0 \sin(\omega t - \frac{\pi}{2}) \) के बीच कलांतर \( \phi = \frac{\pi}{2} \) है। क्योंकि \( \cos(\frac{\pi}{2}) = 0 \), इसलिए औसत शक्ति \( P_{av} = 0 \) होगी।

 

Question 12. श्रेणी LCR परिपथ में अनुनाद की स्थिति में यदि धारिता \( C = 1\mu F \) तथा \( L = 1\mu H \) हो तो आवृत्ति का मान कितने हज होगा।
(अ) \( 10^6 \)
(ब) \( 2\pi \times 10^6 \)
(स) \( \frac{10^{6}}{2 \pi} \)
(द) \( 2\pi \times 10^{-6} \)
Answer: (स) \( \frac{10^{6}}{2 \pi} \)
In simple words: अनुनादी आवृत्ति को \( f_0 = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) सूत्र से निकालते हैं। दिए गए मानों को इस सूत्र में रखने पर हमें आवृत्ति का मान \( \frac{10^6}{2\pi} \) हर्ट्ज मिलता है।

🎯 Exam Tip: अनुनादी आवृत्ति का सूत्र \( f_0 = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) याद रखना महत्वपूर्ण है। माइक्रो (\( \mu \)) उपसर्ग का मतलब \( 10^{-6} \) होता है, इसलिए गणना करते समय \( 1\mu F = 10^{-6} F \) और \( 1\mu H = 10^{-6} H \) का उपयोग करना सुनिश्चित करें।

 

Question 13. ट्रांसफार्मर की क्रोड पटलित इसलिए होनी है ताकि -
(अ) चुम्बकीय क्षेत्र बढ़ जाए ।
(ब) क्रोड में अवशेष चुम्बकत्व कम हो जाए।
(स) क्रोड की चुम्बकीय संतृप्ति का मान बढ़ जाए
(द) भंवर धाराओं के कारण ऊर्जा हानि कम हो।
Answer: (द) भंवर धाराओं के कारण ऊर्जा हानि कम हो।
In simple words: ट्रांसफार्मर की क्रोड को पतली-पतली चादरों (पटलित) से बनाने से उसमें उत्पन्न होने वाली भंवर धाराएं कम हो जाती हैं। भंवर धाराएं ऊर्जा का क्षय करती हैं, इसलिए उन्हें कम करने से ट्रांसफार्मर की दक्षता बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: पटलित क्रोड का उपयोग करने से क्रोड का प्रभावी प्रतिरोध बढ़ जाता है, जिससे भंवर धाराओं का मान कम हो जाता है। भंवर धाराएं (Eddy Currents) चालक में उत्पन्न होने वाली धाराएं हैं जो चुम्बकीय क्षेत्र के बदलने से उत्पन्न होती हैं और ऊष्मा के रूप में ऊर्जा का क्षय करती हैं।

 

Question 14. संलग्न चित्र में अनुनादी स्थिति को प्रदर्शित करने वाला बिन्दु है
(अ) A
(ब) B
(स) C
(द) D
Answer: (अ) A
In simple words: अनुनाद की स्थिति में, प्रेरकत्व और धारिता के प्रतिघात बराबर होते हैं। चित्र में बिंदु A वह स्थान दिखाता है जहाँ प्रतिघात के मान एक-दूसरे को काटते हैं, जो अनुनाद की स्थिति को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में \( X_L = X_C \) होता है, जहाँ \( X_L \) प्रेरणिक प्रतिघात और \( X_C \) धारितीय प्रतिघात है। इस बिंदु पर परिपथ का प्रतिरोध न्यूनतम होता है, और धारा अधिकतम होती है।

 

Question 15. 100% दक्षता वाले ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक व द्वितीयक कुण्डलियों में प्रवाहित हो रही धारा का अनुपात 1: 4 से तो प्राथमिक द्वितीयक कुण्डलियों पर वोल्टता का अनुपात है।
(अ) 1:4
(ब) 4:1
(स) 1:2
(द) 2:1.
Answer: (ब) 4:1
In simple words: एक आदर्श ट्रांसफॉर्मर में, धाराओं का अनुपात वोल्टता के अनुपात का व्युत्क्रम होता है। यदि प्राथमिक और द्वितीयक धारा का अनुपात 1:4 है, तो प्राथमिक और द्वितीयक वोल्टता का अनुपात 4:1 होगा।

🎯 Exam Tip: आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए शक्ति हानि नहीं होती है, इसलिए \( P_{input} = P_{output} \). इसका मतलब है \( V_p I_p = V_s I_s \). इससे \( \frac{V_p}{V_s} = \frac{I_s}{I_p} \) होता है। इस सूत्र का उपयोग करके आप आसानी से ऐसे प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं।

Rbse Class 12 Physics Chapter 10 अति लघूत्तरातगक प्रश्न

 

Question 1. एक प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण निम्न है। \( V = 200 \sqrt{2} \sin 100 \pi t \) इसका वर्ग माध्य मूल मान तथा आवृत्ति लिखो।
Answer: दिए गए समीकरण को \( V = V_0 \sin \omega t \) से तुलना करने पर,
शिखर मान \( V_0 = 200\sqrt{2} \mathrm{V} \)
कोणीय आवृत्ति \( \omega = 100\pi \ \mathrm{rad/s} \)
वर्ग माध्य मूल मान (RMS value):
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{200\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 200 \mathrm{V} \)
आवृत्ति (\( \nu \)):
\( \omega = 2\pi\nu \)
\( 100\pi = 2\pi\nu \)
\( \nu = \frac{100\pi}{2\pi} = 50 \mathrm{Hz} \)
In simple words: दिए गए वोल्टता के समीकरण से, हम अधिकतम वोल्टता और कोणीय आवृत्ति का पता लगा सकते हैं। वर्ग माध्य मूल मान अधिकतम वोल्टता को \( \sqrt{2} \) से भाग करके मिलता है, और आवृत्ति कोणीय आवृत्ति को \( 2\pi \) से भाग करके निकाली जाती है। एक प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण हमें बताता है कि समय के साथ वोल्टता कैसे बदल रही है।

🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टता या धारा के समीकरण को हमेशा मानक रूप \( V = V_0 \sin(\omega t + \phi) \) या \( I = I_0 \sin(\omega t + \phi) \) से तुलना करके \( V_0 \) (शिखर मान) और \( \omega \) (कोणीय आवृत्ति) के मानों को पहचानें। फिर, \( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} \) और \( \nu = \frac{\omega}{2\pi} \) का उपयोग करके आवश्यक मान ज्ञात करें।

 

Question 3. किसी प्रत्यावर्ती धारा का समीकरण \( I = I_0, \sin \omega t \) है तो प्रेरकत्व परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण लिखो।
Answer: जब एक शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा \( I = I_0 \sin \omega t \) प्रवाहित होती है, तो वोल्टता धारा से \( \frac{\pi}{2} \) (या 90 डिग्री) आगे रहती है।
इसलिए, प्रेरकत्व परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण होगा:
\( V = V_0 \sin\left(\omega t + \frac{\pi}{2}\right) \)
In simple words: शुद्ध प्रेरकत्व वाले परिपथ में, वोल्टता हमेशा धारा से 90 डिग्री आगे चलती है। इसका मतलब है कि अगर धारा एक निश्चित समय पर शिखर पर है, तो वोल्टता उससे थोड़ा पहले ही शिखर पर पहुँच चुकी होगी। यह ऊर्जा को संचित करने वाले प्रेरकत्व के गुण के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: यह संबंध शुद्ध प्रेरकत्व वाले AC परिपथों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। याद रखें कि प्रेरकत्व में वोल्टता धारा से आगे होती है, जबकि धारिता में धारा वोल्टता से आगे होती है। प्रतिरोध में, दोनों एक ही कला में होते हैं।

 

Question 4. किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में किसी समय वोल्टता \( V = 200 \sin 314t \) है तो प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति लिखो।
Answer: दिए गए वोल्टता समीकरण को मानक समीकरण \( V = V_0 \sin \omega t \) से तुलना करने पर,
कोणीय आवृत्ति \( \omega = 314 \ \mathrm{rad/s} \)
आवृत्ति (\( \nu \)) का सूत्र है:
\( \omega = 2\pi\nu \)
\( 314 = 2\pi\nu \)
\( \nu = \frac{314}{2 \times 3.14} \)
\( \nu = \frac{314}{6.28} \)
\( \nu = 50 \mathrm{Hz} \)
In simple words: वोल्टता के समीकरण में 't' के साथ जो संख्या होती है, वह कोणीय आवृत्ति होती है। इस कोणीय आवृत्ति को \( 2\pi \) से भाग करने पर हमें सामान्य आवृत्ति मिल जाती है, जो यहाँ 50 हर्ट्ज है। यह आवृत्ति बताती है कि एक सेकंड में धारा कितनी बार अपनी दिशा बदलती है।

🎯 Exam Tip: पाई (\( \pi \)) का मान 3.14 के रूप में अक्सर उपयोग किया जाता है। अपनी गणनाओं को सही रखने के लिए इस मान को ध्यान से उपयोग करें। कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) रेडियन प्रति सेकंड में होती है, और आवृत्ति (\( \nu \)) हर्ट्ज में होती है।

 

Question 5. प्रत्यावती धारा की आवृत्ति बढ़ाने पर प्रेरणिक प्रतिघात तथा धारितीय प्रतिघात पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: जब प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति (\( \nu \)) बढ़ाई जाती है:
1. प्रेरणिक प्रतिघात (\( X_L \)):
\( X_L = \omega L = 2\pi\nu L \)
चूँकि \( X_L \) आवृत्ति (\( \nu \)) के सीधे आनुपातिक है, इसलिए आवृत्ति बढ़ने पर प्रेरणिक प्रतिघात भी बढ़ता है।
2. धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)):
\( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{2\pi\nu C} \)
चूँकि \( X_C \) आवृत्ति (\( \nu \)) के व्युत्क्रमानुपाती है, इसलिए आवृत्ति बढ़ने पर धारितीय प्रतिघात घटता है।
In simple words: जब प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति बढ़ती है, तो प्रेरकत्व का प्रतिरोध (प्रेरणिक प्रतिघात) बढ़ जाता है। लेकिन, संधारित्र का प्रतिरोध (धारितीय प्रतिघात) घट जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि प्रेरक बदलते हुए क्षेत्र का विरोध करता है, जबकि संधारित्र उच्च आवृत्ति पर आसानी से चार्ज और डिस्चार्ज हो जाता है।

🎯 Exam Tip: इस संबंध को याद रखें: \( X_L \) आवृत्ति के समानुपाती होता है (अधिक आवृत्ति, अधिक \( X_L \)), जबकि \( X_C \) आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होता है (अधिक आवृत्ति, कम \( X_C \)). यह LCR परिपथों के व्यवहार को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. एक कुण्डली का प्रेरकत्व 0.1H है। 50Hz आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा के लिए इसके प्रतिघात का मान ज्ञात करो।
Answer: दिया गया है:
प्रेरकत्व \( L = 0.1 \mathrm{H} \)
आवृत्ति \( \nu = 50 \mathrm{Hz} \)
प्रेरणिक प्रतिघात (\( X_L \)) का सूत्र है:
\( X_L = 2\pi\nu L \)
\( X_L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 0.1 \)
\( X_L = 31.4 \ \Omega \)
In simple words: कुण्डली का प्रतिघात, जिसे प्रेरणिक प्रतिघात कहते हैं, इस बात पर निर्भर करता है कि कुण्डली का प्रेरकत्व कितना है और धारा की आवृत्ति कितनी है। इसे \( 2\pi\nu L \) से ज्ञात किया जाता है, और यहाँ इसका मान 31.4 ओम है।

🎯 Exam Tip: यह सुनिश्चित करें कि आप \( \pi \) का सही मान (आमतौर पर 3.14 या 22/7) उपयोग करें। प्रेरणिक प्रतिघात की इकाई ओम होती है, ठीक प्रतिरोध की तरह।

 

Question 8. श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में प्रेरकत्व तथा धारिता पर विभवान्तर के मध्य कलान्तर कितना होगा ?
Answer: श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में प्रेरकत्व (\( L \)) और धारिता (\( C \)) पर विभवान्तरों के बीच का कलांतर 180° होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रेरकत्व पर वोल्टता धारा से 90° आगे होती है, और धारिता पर वोल्टता धारा से 90° पीछे होती है। ये दोनों वोल्टताएँ एक-दूसरे के विपरीत दिशा में होती हैं।
In simple words: एक LCR परिपथ में अनुनाद की स्थिति में, प्रेरकत्व और संधारित्र पर वोल्टता एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत होती हैं, इसलिए उनके बीच का अंतर 180 डिग्री होता है।

🎯 Exam Tip: अनुनादी स्थिति में, \( V_L \) और \( V_C \) के मान बराबर होते हैं लेकिन वे एक-दूसरे के 180° कला-विपरीत होते हैं, इसलिए एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं। इस वजह से, परिपथ की परिणामी वोल्टता केवल प्रतिरोध पर वोल्टता के बराबर होती है।

 

Question 9. श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में प्रतिबाधा का मान कितना होता है ?
Answer: श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में प्रतिबाधा (\( Z \)) का मान परिपथ के प्रतिरोध (\( R \)) के बराबर होता है। अनुनाद की स्थिति में, प्रेरणिक प्रतिघात (\( X_L \)) और धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)) बराबर और विपरीत होते हैं, जिससे वे एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं (\( X_L - X_C = 0 \)). इसलिए, कुल प्रतिबाधा न्यूनतम हो जाती है।
In simple words: LCR परिपथ में अनुनाद के समय, कुल रुकावट (प्रतिबाधा) केवल प्रतिरोध के बराबर होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुण्डली और संधारित्र की रुकावटें एक-दूसरे को खत्म कर देती हैं।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में, \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \). चूंकि \( X_L = X_C \), तो \( X_L - X_C = 0 \), इसलिए \( Z = \sqrt{R^2 + 0^2} = R \). यह परिपथ में अधिकतम धारा के प्रवाह की स्थिति है।

 

Question 10. प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रेरकत्व, धारिता तथा प्रतिरोध के लिए शक्ति गुणांक को क्या मान होता है?
Answer: प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में अलग-अलग घटकों के लिए शक्ति गुणांक के मान इस प्रकार हैं:
1. शुद्ध प्रेरकत्व के लिए: शक्ति गुणांक शून्य (0) होता है।
2. शुद्ध संधारित्र के लिए: शक्ति गुणांक शून्य (0) होता है।
3. शुद्ध प्रतिरोध के लिए: शक्ति गुणांक एक (1) होता है।
In simple words: प्रेरक और संधारित्र में बिजली का कोई सच्चा उपयोग नहीं होता, इसलिए उनका शक्ति गुणांक शून्य होता है। प्रतिरोध में, बिजली का पूरा उपयोग होता है, इसलिए इसका शक्ति गुणांक एक होता है।

🎯 Exam Tip: शक्ति गुणांक (\( \cos \phi \)) वोल्टता और धारा के बीच के कलांतर (\( \phi \)) पर निर्भर करता है। शुद्ध प्रेरकत्व और संधारित्र के लिए \( \phi = 90^\circ \), इसलिए \( \cos 90^\circ = 0 \). शुद्ध प्रतिरोध के लिए \( \phi = 0^\circ \), इसलिए \( \cos 0^\circ = 1 \).

 

Question 11. \( \sqrt{\mathbf{LC}} \) का मात्रक क्या होता है?
Answer: \( \sqrt{\mathbf{LC}} \) का मात्रक सेकंड (समय) होता है।
इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:
प्रेरकत्व (L) का मात्रक हेनरी (H) है, और हेनरी \( \mathrm{H} = \frac{\mathrm{Volt} \cdot \mathrm{Second}}{\mathrm{Ampere}} \) होता है।
धारिता (C) का मात्रक फैराड (F) है, और फैराड \( \mathrm{F} = \frac{\mathrm{Ampere} \cdot \mathrm{Second}}{\mathrm{Volt}} \) होता है।
तो, \( \mathrm{L} \times \mathrm{C} = \left(\frac{\mathrm{Volt} \cdot \mathrm{Second}}{\mathrm{Ampere}}\right) \times \left(\frac{\mathrm{Ampere} \cdot \mathrm{Second}}{\mathrm{Volt}}\right) = \mathrm{Second}^2 \)
\( \sqrt{\mathrm{LC}} = \sqrt{\mathrm{Second}^2} = \mathrm{Second} \)
In simple words: \( \sqrt{\mathrm{LC}} \) एक भौतिक राशि है जिसका मात्रक सेकंड होता है। यह अक्सर LC परिपथों के दोलन काल या समय स्थिरांक से जुड़ा होता है।

🎯 Exam Tip: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि \( \frac{1}{\sqrt{\mathrm{LC}}} \) कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) का मात्रक रेडियन/सेकंड होता है, जिसका व्युत्क्रम सेकंड होता है। यह LC परिपथों में अनुनाद के लिए एक महत्वपूर्ण संबंध है।

 

Question 12. श्रेणी LCR परिपथ में धारिता को चार गुना करने पर समान अनुनादी आवृत्ति के लिए प्रेरकत्व का मान कितना करना होगा।
Answer: श्रेणी LCR परिपथ की अनुनादी आवृत्ति (\( \omega_0 \)) का सूत्र है:
\( \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} \)
समान अनुनादी आवृत्ति बनाए रखने के लिए, यदि धारिता (C) को चार गुना किया जाता है (\( C' = 4C \)), तो प्रेरकत्व (L) को तदनुसार बदलना होगा।
\( \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{L'C'}} \)
\( \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{L'(4C)}} \)
दोनों तरफ वर्ग करने पर:
\( \frac{1}{LC} = \frac{1}{4L'C} \)
\( 4L'C = LC \)
\( 4L' = L \)
\( L' = \frac{L}{4} \)
अतः, प्रेरकत्व को एक चौथाई करना होगा।
In simple words: यदि हम चाहते हैं कि एक LCR परिपथ की अनुनादी आवृत्ति वही रहे और धारिता को चार गुना बढ़ा दें, तो हमें प्रेरकत्व को चार गुना कम करना होगा। यह इसलिए है क्योंकि आवृत्ति प्रेरकत्व और धारिता के गुणनफल के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों को हल करते समय, सूत्र को ध्यान में रखें और यह समझें कि विभिन्न घटक एक दूसरे से कैसे संबंधित हैं। अनुनादी आवृत्ति को स्थिर रखने के लिए, LC का गुणनफल स्थिर रहना चाहिए।

 

Question 14. एक ट्रांसफार्मर की प्राथमिक और द्वितीयक कुण्डली में घेरों की संख्या का अनुपात 1 : 4 है। यह कौन-सा ट्रांसफार्मर हैं?
Answer: दिया गया है कि प्राथमिक और द्वितीयक कुण्डली में घेरों की संख्या का अनुपात 1:4 है।
इसका अर्थ है: \( \frac{N_p}{N_s} = \frac{1}{4} \)
जिसका मतलब है \( N_s = 4 N_p \), यानी द्वितीयक कुण्डली में घेरों की संख्या प्राथमिक कुण्डली से अधिक है (\( N_s > N_p \)).
चूँकि द्वितीयक कुण्डली में घेरों की संख्या प्राथमिक कुण्डली से अधिक है, इसलिए यह एक उच्चायी (Step-up) ट्रांसफार्मर है। उच्चायी ट्रांसफार्मर इनपुट वोल्टता को बढ़ाकर आउटपुट वोल्टता देता है।
In simple words: जब किसी ट्रांसफार्मर की आउटपुट कुण्डली (द्वितीयक) में तार के फेरों की संख्या इनपुट कुण्डली (प्राथमिक) से ज्यादा होती है, तो उसे उच्चायी ट्रांसफार्मर कहते हैं। यह कम वोल्टता को ज्यादा वोल्टता में बदलने का काम करता है।

🎯 Exam Tip: उच्चायी ट्रांसफार्मर में \( N_s > N_p \) और \( V_s > V_p \) होता है, जबकि अपचायी ट्रांसफार्मर में \( N_s < N_p \) और \( V_s < V_p \) होता है। ट्रांसफार्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर काम करता है।

 

Question 15. प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में वाटसेन धारा का मान लिखो।
Answer: प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में वाटहीन धारा (Wattless current) का मान \( I = I_0 \sin \phi \) होता है। यहाँ \( I_0 \) धारा का शिखर मान है, और \( \phi \) वोल्टता और धारा के बीच का कलांतर है। वाटहीन धारा परिपथ में कोई वास्तविक शक्ति व्यय नहीं करती है क्योंकि यह वोल्टता के लंबवत होती है।
In simple words: वाटहीन धारा वह धारा होती है जो परिपथ में कोई शक्ति खर्च नहीं करती। इसका मान \( I_0 \sin \phi \) होता है, जहाँ \( \phi \) वोल्टता और धारा के बीच का कलांतर है।

🎯 Exam Tip: वाटहीन धारा को "निष्क्रिय धारा" भी कहते हैं। यह धारा घटक प्रेरणिक या धारितीय प्रतिघातों से जुड़ा होता है और ऊर्जा को स्रोत और परिपथ के बीच आगे-पीछे करता रहता है, लेकिन इसका कोई शुद्ध ऊर्जा स्थानांतरण नहीं होता।

Rbse Class 12 Physics Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. दिष्ट धारा की तुलना में प्रत्यावर्ती धारा को प्राथमिकता क्यों दी जाती है? समझाइए।
Answer: प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) की तुलना में कई कारणों से प्राथमिकता दी जाती है:
1. **वोल्टता परिवर्तन:** प्रत्यावर्ती धारा को ट्रांसफार्मर का उपयोग करके आसानी से उच्च वोल्टता से निम्न वोल्टता या निम्न वोल्टता से उच्च वोल्टता में बदला जा सकता है। यह लंबी दूरी तक बिजली के संचरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
2. **कम शक्ति हानि:** उच्च वोल्टता पर (धारा को कम रखकर) लंबी दूरी तक बिजली का संचरण करने से ऊष्मा के रूप में शक्ति हानि (\( I^2R \)) बहुत कम हो जाती है। दिष्ट धारा में, वोल्टता को आसानी से बदला नहीं जा सकता।
3. **उत्पादन और संचरण की लागत:** प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (alternators) दिष्ट धारा जनित्रों की तुलना में अधिक मजबूत, कुशल और निर्माण में कम खर्चीले होते हैं। AC को उत्पन्न करना और संचरित करना भी अधिक किफायती है।
4. **आसानी से परिवर्तन:** AC को दिष्टकारी (rectifiers) का उपयोग करके आसानी से दिष्ट धारा में बदला जा सकता है, जिससे यह विभिन्न उपयोगों के लिए बहुमुखी बन जाती है।
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा दिष्ट धारा से बेहतर है क्योंकि इसे आसानी से ऊँची या नीची वोल्टता में बदला जा सकता है, जिससे दूर तक बिजली भेजने में बहुत कम नुकसान होता है। इसे बनाना और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी सस्ता और आसान है। यह आधुनिक बिजली प्रणालियों का आधार है।

🎯 Exam Tip: लंबी दूरी के संचरण में उच्च वोल्टता पर AC का उपयोग करने का मुख्य लाभ शक्ति हानि को कम करना है। \( P_{loss} = I^2R \). अगर आप वोल्टता बढ़ाते हैं, तो समान शक्ति संचारित करने के लिए धारा \( I \) कम हो जाती है, जिससे \( I^2R \) हानि नाटकीय रूप से घट जाती है।

 

Question 2. 220V पर प्रत्यावर्ती धारा, 220V पर दिष्ट धारा से अधिक घातक है क्यों?
Answer: 220V प्रत्यावर्ती धारा (AC) 220V दिष्ट धारा (DC) से अधिक घातक होती है, इसके कई कारण हैं:
1. **शिखर मान (Peak Value):** प्रत्यावर्ती धारा के लिए, 220V उसका RMS (वर्ग माध्य मूल) मान होता है। इसका शिखर मान \( V_0 = V_{rms} \times \sqrt{2} = 220 \times 1.414 \approx 311 \mathrm{V} \) होता है। जबकि 220V दिष्ट धारा का मान हमेशा 220V ही रहता है। मानव शरीर को अधिक नुकसान शिखर वोल्टता से होता है।
2. **शरीर पर प्रभाव:** प्रत्यावर्ती धारा शरीर में मांसपेशीय संकुचन (tetany) उत्पन्न कर सकती है, जिससे व्यक्ति बिजली के स्रोत से चिपक सकता है। दिष्ट धारा आमतौर पर एक झटके के साथ शरीर को दूर धकेल देती है। AC के झटके के कारण हृदय की गति में गड़बड़ी (fibrillation) होने की संभावना भी अधिक होती है।
3. **आवृत्ति (Frequency):** 50-60 Hz की आवृत्ति वाली AC मानव शरीर के लिए विशेष रूप से खतरनाक होती है, क्योंकि यह तंत्रिका तंत्र और हृदय की प्राकृतिक विद्युत क्रिया को बाधित करती है।
**प्रत्यावर्ती धारा के दोष (Defects):**
(i) प्रत्यावर्ती धारा का सीधा उपयोग विद्युत अपघटन (electrolysis), इलेक्ट्रोप्लेटिंग या विद्युत चुम्बक बनाने जैसे कार्यों में नहीं किया जा सकता है, जिनके लिए स्थिर दिष्ट धारा की आवश्यकता होती है।
(ii) AC परिपथों में प्रेरकत्व और धारिता के कारण शक्ति गुणांक कम हो सकता है, जिससे वास्तविक शक्ति का व्यय कम हो जाता है और वाटहीन धारा का प्रवाह बढ़ जाता है।
In simple words: 220V की AC बिजली 220V की DC बिजली से ज्यादा खतरनाक होती है क्योंकि AC में असल में वोल्टता 311V तक ऊपर-नीचे होती है, जबकि DC की वोल्टता स्थिर रहती है। AC से शरीर की मांसपेशियां अकड़ सकती हैं और व्यक्ति बिजली के स्रोत से चिपक सकता है, जिससे दिल पर बुरा असर पड़ता है। AC का सीधा उपयोग कुछ कामों में नहीं हो पाता, जैसे बैटरी चार्ज करना।

🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि AC का RMS मान वह प्रभावी मान होता है जो DC के समान प्रभाव उत्पन्न करता है, लेकिन इसका तात्कालिक मान (शिखर मान) काफी अधिक हो सकता है, जो इसे अधिक खतरनाक बनाता है।

 

Question 13. ट्रांसफार्मर किस सिद्धान्त पर कार्य करता है? इसका उपयोग लिखो।
Answer: ट्रांसफार्मर **अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)** के सिद्धांत पर कार्य करता है।
**अन्योन्य प्रेरण का सिद्धांत:** जब एक कुण्डली (प्राथमिक कुण्डली) में प्रवाहित होने वाली प्रत्यावर्ती धारा के कारण उत्पन्न होने वाले चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो इस कुण्डली के पास रखी दूसरी कुण्डली (द्वितीयक कुण्डली) में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (EMF) उत्पन्न होता है। ट्रांसफार्मर में, प्राथमिक कुण्डली में AC प्रवाहित होती है, जिससे क्रोड में एक बदलता हुआ चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है, और यह फ्लक्स द्वितीयक कुण्डली से जुड़कर उसमें प्रेरित EMF उत्पन्न करता है।
**उपयोग (Uses):**
ट्रांसफार्मर का मुख्य उपयोग प्रत्यावर्ती वोल्टता को बढ़ाने या घटाने के लिए किया जाता है। इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:
1. **विद्युत शक्ति का संचरण:** बिजलीघरों से उपभोक्ताओं तक बिजली को लंबी दूरी तक संचरित करने के लिए उच्च वोल्टता (और कम धारा) पर AC का उपयोग किया जाता है, जिससे शक्ति हानि कम होती है। ट्रांसफार्मर का उपयोग वोल्टता को बढ़ाने (स्टेप-अप) और वितरण केंद्रों पर उसे घटाने (स्टेप-डाउन) के लिए किया जाता है।
2. **घरेलू उपकरण:** विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे टीवी, कंप्यूटर, चार्जर आदि में आवश्यक कम वोल्टता प्रदान करने के लिए ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।
3. **वेल्डिंग मशीन:** उच्च धारा और कम वोल्टता प्रदान करने के लिए विशेष ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।
4. **मापन उपकरण:** वोल्टता और धारा को मापने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों (जैसे वोल्टमीटर और एमीटर) में ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।
In simple words: ट्रांसफार्मर 'अन्योन्य प्रेरण' नाम के विज्ञान के सिद्धांत पर काम करता है। इसका मतलब है कि जब एक तार की कुण्डली में बिजली बदलती है, तो पास की दूसरी कुण्डली में अपने आप बिजली पैदा हो जाती है। ट्रांसफार्मर का मुख्य काम बिजली के वोल्टेज को बढ़ाना या घटाना है। इसका इस्तेमाल दूर तक बिजली भेजने, घरों के उपकरणों और फैक्ट्रियों में होता है।

🎯 Exam Tip: अन्योन्य प्रेरण यह सुनिश्चित करता है कि प्राथमिक और द्वितीयक कुण्डली के बीच सीधे विद्युत संपर्क के बिना ऊर्जा का स्थानांतरण हो। ट्रांसफार्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) के साथ काम करता है, क्योंकि दिष्ट धारा (DC) के लिए चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन नहीं होता है।

 

Question 14. ट्रांसफार्मर में ऊर्जा हानि किन-किन कारणों से होती हैं ? इन्हें किस प्रकार कम किया जा सकता है?
Answer: ट्रांसफार्मर में ऊर्जा हानि मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से होती है, और इन्हें कम करने के तरीके भी बताए गए हैं:

  • (i) ताम्रिक हानि (Copper Loss): यह हानि कुण्डलियों के प्रतिरोध के कारण उत्पन्न ऊष्मा के रूप में होती है। इसे कम करने के लिए कुण्डलियों का प्रतिरोध कम रखा जाता है, जिसके लिए मोटे तार का उपयोग किया जाता है।
  • (ii) लौह हानि (Iron Loss): यह हानि ट्रांसफार्मर की क्रोड में भंवर धाराओं (eddy currents) के कारण होती है। इसे कम करने के लिए क्रोड को पटलित (laminated) बनाया जाता है, जिससे भंवर धाराएँ कम हो जाती हैं।
  • (iii) शैथिल्य हानि (Hysteresis Loss): यह हानि क्रोड के बार-बार चुम्बकित और विचुम्बकित होने से होती है, जिससे आंतरिक घर्षण के कारण क्रोड गर्म हो जाती है। इसे कम करने के लिए क्रोड नर्म लोहे या सिलिकॉन स्टील जैसे पदार्थ से बनाई जाती है, जिनकी शैथिल्य हानि कम होती है।
  • (iv) चुम्बकीय क्षरण (Magnetic Leakage): यह तब होता है जब प्राथमिक कुण्डली द्वारा उत्पन्न कुछ चुम्बकीय फ्लक्स रेखाएँ द्वितीयक कुण्डली से जुड़ने के बजाय हवा में चली जाती हैं। इस हानि को कम करने के लिए अधिक चुम्बकशीलता (more permeability) वाले पदार्थ की क्रोड बनाई जाती है, जैसे कच्चा लोहा या सिलिकॉन स्टील। ट्रांसफार्मर में इन हानियों को कम करना उसकी दक्षता को बढ़ाता है, जिससे कम ऊर्जा व्यर्थ होती है।

प्रत्यावर्ती वोल्टता के प्रेषण में ट्रान्सफॉर्मर का उपयोग (Use of Transformer in A.C. Transmission)
विद्युत ऊर्जा को पावर हाउस से उपभोक्ता तक तारों के माध्यम से भेजा जाता है। यदि संचरण लाइन का प्रतिरोध R है और उसमें I धारा बहती है, तो उसमें उत्पन्न ऊष्मा \( H = I^2Rt \) होगी। यह ऊष्मा वातावरण में चली जाती है, जिससे ऊर्जा की हानि होती है। दूरस्थ स्थानों तक प्रत्यावर्ती धारा भेजने में होने वाली हानि निम्न कारकों पर निर्भर करती है:

  • (i) तारों के प्रतिरोध R पर,
  • (ii) प्रवाहित धारा के वर्ग (\( I^2 \)) पर।

ऊर्जा हानि को कम करने के लिए, तारों के प्रतिरोध को यथासंभव कम किया जाना चाहिए (मोटे तार का उपयोग करके, क्योंकि \( R = \rho \frac{l}{A} \implies R \propto \frac{1}{A} \)) और धारा को यथासंभव कम किया जाना चाहिए। ट्रांसफार्मर का उपयोग करके धारा को कम किया जा सकता है। उच्चायी ट्रांसफार्मर उच्च वोल्टता और निम्न धारा पर विद्युत भेजते हैं, जिससे \( I^2R \) हानि कम होती है। गंतव्य स्थान पर अपचायी ट्रांसफार्मर से वोल्टता को फिर से कम किया जाता है।

In simple words: ट्रांसफार्मर में ऊर्जा की हानि प्रतिरोध, भंवर धाराओं, चुम्बकन-विचुम्बकन और फ्लक्स लीकेज से होती है। इन्हें कम करने के लिए मोटे तार, पटलित क्रोड और सही सामग्री का उपयोग किया जाता है। बिजली को दूर भेजने में भी ट्रांसफार्मर का उपयोग करके धारा को कम करके ऊर्जा हानि घटाई जाती है।

🎯 Exam Tip: जब ऊर्जा हानि के कारण और उन्हें कम करने के उपाय पूछे जाएँ, तो प्रत्येक हानि का नाम, कारण और निवारण विधि स्पष्ट रूप से बताएँ। संचरण में ट्रांसफार्मर की भूमिका को भी संक्षेप में समझाएँ।

 

Question 15. श्रेणी R-L परिपथ में धारा और वोल्टता के मध्य कलान्तर तथा प्रतिबाधा का व्यंजक ज्ञात करो।
Answer:

L-R परिपथ (L-R-Circuit)
जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रतिरोध (R) और प्रेरकत्व (L) दोनों होते हैं, तो प्रतिरोध के सिरों पर प्रत्यावर्ती विभवान्तर \( V_R \) और प्रेरकत्व के सिरों के मध्य \( V_L \) उत्पन्न होता है। हम जानते हैं कि प्रतिरोध में प्रत्यावर्ती धारा एवं विभवान्तर समान कला में होते हैं और प्रेरकत्व में विभवान्तर धारा से कला में \( \frac{\pi}{2} \) आगे होता है।

एक श्रेणी R-L परिपथ में एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत जुड़ा होता है, जिसमें एक प्रतिरोध (R) और एक प्रेरकत्व (L) श्रेणी में लगे होते हैं। यदि स्रोत से बहने वाली धारा \( I = I_0 \sin \omega t \) है, तो प्रतिरोध के सिरों पर विभवान्तर (जो धारा के साथ कला में होता है) \( V_R = V_R \sin \omega t \) होगा। वहीं, प्रेरकत्व के सिरों पर विभवान्तर (जो धारा से \( \pi/2 \) आगे होता है) \( V_L = V_L \sin (\omega t + \pi/2) \) होगा।

चित्र 10.29 में R-L परिपथ का सदिश आरेख (फेजर) दिखाया गया है। इसमें प्रतिरोध के पार वोल्टता \( V_R \) को क्षैतिज अक्ष पर दर्शाया गया है, और प्रेरकत्व के पार वोल्टता \( V_L \) को ऊर्ध्वाधर अक्ष पर, \( V_R \) से 90° आगे दर्शाया गया है। परिणामी वोल्टता \( V \) इन दोनों का सदिश योग है, जो पाइथागोरस प्रमेय से प्राप्त किया जा सकता है।

VR VL V \(\phi\) O

परिणामी वोल्टता \( V \) का वर्ग माध्य मूल मान:
\[ V = \sqrt{V_R^2 + V_L^2} \]
या
\[ V^2 = V_R^2 + V_L^2 \]
समीकरण (4) को \( I^2 \) से भाग देने पर:
\[ \frac{V^2}{I^2} = \frac{V_R^2}{I^2} + \frac{V_L^2}{I^2} \]
या
\[ \left(\frac{V}{I}\right)^2 = \left(\frac{V_R}{I}\right)^2 + \left(\frac{V_L}{I}\right)^2 \]
परिपथ की प्रतिबाधा (Impedance) Z को \( Z = \frac{V}{I} \), प्रतिरोध R को \( R = \frac{V_R}{I} \), और प्रेरणिक प्रतिघात \( X_L \) को \( X_L = \frac{V_L}{I} \) के रूप में परिभाषित किया जाता है। अतः,
\[ Z^2 = R^2 + X_L^2 \]
या
\[ Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \]
यहाँ \( Z = \frac{V}{I} \) L-R परिपथ का समतुल्य (equivalent) प्रतिरोध है, जिसे परिपथ की प्रतिबाधा (Impedance) कहते हैं। इसका मात्रक ओम (\( \Omega \)) है।

परिणामी विभवान्तर धारा से कला में \( \phi \) आगे होता है। कलान्तर \( \phi \) का व्यंजक इस प्रकार दिया जाता है:
\[ \tan \phi = \frac{V_L}{V_R} = \frac{I X_L}{I R} = \frac{X_L}{R} = \frac{2\pi f L}{R} \]
अतः परिणामी विभवान्तर का समीकरण:
\[ V = V_0 \sin (\omega t + \phi) \]

In simple words: R-L परिपथ में, वोल्टता धारा से आगे चलती है। प्रतिरोध और प्रेरकत्व दोनों के कारण कुल रुकावट को प्रतिबाधा कहते हैं। इसे \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \) से निकालते हैं, जहाँ \( R \) प्रतिरोध है और \( X_L \) प्रेरकत्व का प्रतिघात है। धारा और वोल्टता के बीच का कोण \( \phi \) होता है, जिसे \( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \) से पाया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: R-L परिपथ के लिए प्रतिबाधा और कलान्तर के सूत्रों को याद रखें, और फेजर आरेख बनाते समय \( V_L \) को \( V_R \) से \( 90^\circ \) आगे दर्शाना न भूलें।

 

RBSE Class 12 Physics Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. एक प्रत्यावर्ती वोल्टता परिपथ में शुद्ध प्रेरकत्व लगा है। परिपथ में धारा का मान, कलान्तर, प्रतिघात तथा औसत व्यय ऊर्जा दर ज्ञात करो। फेजर आरेख भी बनाओ।
Answer:

शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ (Circuit contains Pure Inductor)
जब एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से एक नगण्य प्रतिरोध वाली (L प्रेरकत्व वाली) कुण्डली जोड़ी जाती है, तो उसे केवल प्रेरकत्व वाला प्रत्यावर्ती धारा परिपथ कहते हैं। प्रत्यावर्ती धारा की दिशा और परिमाण समय के साथ लगातार बदलते रहते हैं, अतः कुण्डली में स्व-प्रेरित विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है। यह उत्पन्न विभवान्तर आरोपित वोल्टेज का विरोध करता है।

माना तात्कालिक आरोपित वोल्टता \( V = V_0 \sin \omega t \) ...(1)
यदि प्रेरकत्व में तात्कालिक धारा \( I \) हो तो तात्कालिक स्वप्रेरित वि. वा. बल \( e = -L \frac{di}{dt} \) ...(2)
किरचॉफ के द्वितीय नियम से, \( V + e = 0 \)
या \( V_0 \sin \omega t - L \frac{di}{dt} = 0 \) [समी. (1) व (2) से]
या \( V_0 \sin \omega t = L \frac{di}{dt} \)
या \( di = \frac{V_0}{L} \sin \omega t \cdot dt \)
समाकलन करने पर,
\[ \int di = \int \frac{V_0}{L} \sin \omega t \cdot dt \]
या
\[ I = \frac{V_0}{L} \left( - \frac{\cos \omega t}{\omega} \right) \]
\[ I = - \frac{V_0}{\omega L} \cos \omega t \]
\[ I = \frac{V_0}{\omega L} \sin \left( \omega t - \frac{\pi}{2} \right) \]

इस समीकरण को \( I = I_0 \sin \left( \omega t - \frac{\pi}{2} \right) \) से तुलना करने पर, जहाँ \( I_0 = \frac{V_0}{\omega L} \) शिखर धारा का मान है।
यहाँ \( Z = \omega L \) है, जिसे प्रेरणिक प्रतिघात (Inductive Reactance) कहते हैं और इसे \( X_L \) से प्रदर्शित करते हैं। अतः, \( Z = X_L = \omega L \) ...(7)

समीकरण (1) और \( I = I_0 \sin \left( \omega t - \frac{\pi}{2} \right) \) से स्पष्ट है कि शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ में धारा, आरोपित वोल्टता से कला में \( \frac{\pi}{2} \) (या \( 90^\circ \)) पीछे रहती है।

ग्राफीय निरूपण (चित्र 10.18 (a)):

t V, I O V0 I0 T/4 T/2 3T/4 T

वेक्टर निरूपण (चित्र 10.18 (b)):

V0 I0 \(\frac{\pi}{2}\)

प्रेरणिक प्रतिघात (Inductive Reactance):
प्रेरणिक प्रतिघात \( X_L = \omega L = 2\pi f L \)। यह प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति \( f \) के समानुपाती होता है। जैसे-जैसे आवृत्ति बढ़ती है, \( X_L \) का मान भी बढ़ता है।

f XL

चित्र 10.19 में \( X_L \) का आवृत्ति के साथ परिवर्तन दिखाया गया है, जो एक सीधी रेखा के रूप में है।

प्रत्यावर्ती धारा एवं दिष्ट धारा में शुद्ध प्रेरकत्व का व्यवहार (Behaviour of Pure Inductance in Case of D.C. & A.C.)
प्रेरणिक प्रतिघात \( X_L = \omega L = 2\pi f L \)। दिष्ट धारा के लिए आवृत्ति \( f = 0 \) होती है, इसलिए \( X_L = 0 \)। इसका मतलब है कि शुद्ध प्रेरकत्व दिष्ट धारा के मार्ग में कोई रुकावट नहीं डालता है। लेकिन प्रत्यावर्ती धारा के लिए \( f > 0 \) होने पर \( X_L \) का मान होता है, अतः यह प्रत्यावर्ती धारा के लिए रुकावट पैदा करता है।

औसत व्यय ऊर्जा दर (Average Power Dissipation):
परिपथ में व्यय शक्ति \( P = VI \)。 शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ में वोल्टता और धारा के बीच कलांतर \( \frac{\pi}{2} \) होता है।
\[ P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \]
यहाँ \( \phi = \frac{\pi}{2} \), इसलिए \( \cos \phi = \cos (\frac{\pi}{2}) = 0 \)
अतः, \( P_{av} = V_{rms} I_{rms} (0) = 0 \)

शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ में औसत शक्ति क्षय शून्य होता है। इसका मतलब है कि प्रेरकत्व विद्युत ऊर्जा को अवशोषित नहीं करता है, बल्कि ऊर्जा को प्रत्यावर्ती रूप से संग्रहीत और मुक्त करता है। पहले आधे चक्र में यह ऊर्जा अवशोषित करता है और अगले आधे चक्र में इसे स्रोत को वापस कर देता है। इसीलिए इसे 'वाटहीन धारा' परिपथ भी कहते हैं।

स्किन इफेक्ट (Skin Effect):
उच्च आवृत्तियों पर प्रत्यावर्ती धारा केवल तार के पृष्ठ (surface) पर प्रवाहित होती है, तार के अंदरूनी हिस्से में कम धारा होती है। इस प्रभाव को स्किन इफेक्ट कहते हैं। इस प्रभाव के कारण तार का प्रतिरोध बढ़ जाता है। इसे कम करने के लिए, AC प्रवाह वाले चालक के पतले तारों को समानांतर क्रम में जोड़कर और उन पर कुचालक की परत चढ़ाकर पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ाया जाता है, जिससे तार का प्रतिरोध कम हो जाता है।

In simple words: शुद्ध प्रेरकत्व वाले परिपथ में धारा वोल्टेज से 90 डिग्री पीछे रहती है। इसकी रुकावट को प्रेरणिक प्रतिघात \( (X_L) \) कहते हैं, जो आवृत्ति पर निर्भर करता है। इस परिपथ में औसतन कोई ऊर्जा खर्च नहीं होती। जब बहुत तेज़ धारा चलती है, तो वह तार के बाहरी हिस्से से बहती है, जिसे स्किन इफेक्ट कहते हैं।

🎯 Exam Tip: शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ के लिए धारा और वोल्टता के बीच \( 90^\circ \) का कलान्तर (धारा पीछे) और शून्य औसत शक्ति क्षय को याद रखना महत्वपूर्ण है। फेजर आरेख में इस कला संबंध को सही ढंग से दिखाएं।

 

Question 2. एक प्रत्यावर्ती वोल्टता R-L परिपथ पर आरोपित है। परिपथ में प्रतिबाधा, धारा के व्यंजक निगमित कीजिए तथा फेजर आरेख बनाओ।
Answer:

L-R परिपथ (L-R-Circuit)
जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रतिरोध (R) और प्रेरकत्व (L) दोनों श्रेणी क्रम में जुड़े होते हैं, तो इसे R-L परिपथ कहते हैं। प्रतिरोध के सिरों पर विभवान्तर \( V_R \) धारा के साथ कला में होता है, जबकि प्रेरकत्व के सिरों पर विभवान्तर \( V_L \) धारा से \( \frac{\pi}{2} \) (या \( 90^\circ \)) आगे होता है।

माना प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से प्रवाहित धारा \( I = I_0 \sin \omega t \) है।
तब प्रतिरोध के सिरों पर विभवान्तर \( V_R = V_R \sin \omega t \) ...(2)
और प्रेरकत्व के सिरों पर विभवान्तर \( V_L = V_L \sin (\omega t + \pi/2) \) ...(3)

परिपथ में परिणामी वोल्टता \( V \) इन दोनों विभवान्तरों \( V_R \) और \( V_L \) का सदिश योग होती है। चित्र 10.29 में इसका फेजर आरेख दिखाया गया है।

VR VL V \(\phi\) O

परिणामी वोल्टता \( V \) का शिखर मान \( V_0 \) या वर्ग माध्य मूल मान \( V_{rms} \) इस प्रकार दिया जाता है:
\[ V = \sqrt{V_R^2 + V_L^2} \]
या
\[ V^2 = V_R^2 + V_L^2 \] जहाँ \( V_R = IR \) और \( V_L = IX_L \)। मान रखने पर:
\[ (IZ)^2 = (IR)^2 + (IX_L)^2 \]
\[ I^2Z^2 = I^2R^2 + I^2X_L^2 \]
दोनों पक्षों को \( I^2 \) से भाग देने पर:
\[ Z^2 = R^2 + X_L^2 \]
या
\[ Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \] यह R-L परिपथ की प्रतिबाधा (Impedance) है, जहाँ \( X_L = \omega L \) प्रेरणिक प्रतिघात है। इसका मात्रक ओम (\( \Omega \)) है।

धारा का व्यंजक:
परिणामी वोल्टता धारा से कला में \( \phi \) आगे रहती है। कलान्तर \( \phi \) इस प्रकार दिया जाता है:
\[ \tan \phi = \frac{V_L}{V_R} = \frac{I X_L}{I R} = \frac{X_L}{R} \] धारा का तात्क्षणिक व्यंजक होगा:
\[ I = I_0 \sin (\omega t - \phi) \]

In simple words: R-L परिपथ में, वोल्टता धारा से आगे होती है। परिपथ की कुल रुकावट को प्रतिबाधा (Z) कहते हैं, जो प्रतिरोध (R) और प्रेरकत्व (L) दोनों के कारण होती है। Z का मान \( \sqrt{R^2 + X_L^2} \) होता है। धारा, वोल्टता से \( \phi \) कोण पीछे रहती है, जहाँ \( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \) होता है।

🎯 Exam Tip: R-L परिपथ में प्रतिबाधा और कलान्तर के सूत्रों को सही ढंग से याद करें। फेजर आरेख बनाते समय, \( V_R \) को क्षैतिज और \( V_L \) को \( 90^\circ \) ऊपर (धारा की दिशा से) दिखाएं, और परिणामी वोल्टता \( V \) को सही कलान्तर \( \phi \) के साथ दर्शाएं।

 

प्रश्न 2. एक प्रत्यावर्ती वोल्टता R-L परिपथ पर आरोपित है। परिपथ में प्रतिबाधा, धारा के व्यंजक निगमित कीजिए तथा फेजर आरेख बनाओ।
Answer: जब एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रतिरोध (R) और प्रेरकत्व (L) दोनों श्रेणी क्रम में जुड़े होते हैं, तो प्रतिरोध के सिरों पर प्रत्यावर्ती विभवान्तर \(V_R\) और प्रेरकत्व के सिरों पर प्रत्यावर्ती विभवान्तर \(V_L\) उत्पन्न होता है। हम जानते हैं कि प्रतिरोध में प्रत्यावर्ती धारा और विभवान्तर समान कला में होते हैं, जबकि प्रेरकत्व में विभवान्तर धारा से \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) आगे होता है। एक R-L परिपथ में वोल्टेज और धारा के बीच के संबंध को समझने के लिए सदिश आरेख का उपयोग किया जाता है।
यदि धारा \( I = I_0 \sin \omega t \) है, तो प्रतिरोध के सिरों पर विभवान्तर \( V_R = V_R \sin \omega t \) होगा, और प्रेरकत्व के सिरों पर विभवान्तर \( V_L = V_L \sin (\omega t + \pi/2) \) होगा।

इन तीनों को सदिश आरेख पर दर्शाने पर, परिणामी विभवान्तर \( V \) का मान इस प्रकार दिया जाता है:
\( V = \sqrt{V_R^2 + V_L^2} \)

परिपथ की प्रतिबाधा \( Z \) निकालने के लिए, हम इस समीकरण को \( I^2 \) से भाग देते हैं:
\( \left(\frac{V}{I}\right)^2 = \left(\frac{V_R}{I}\right)^2 + \left(\frac{V_L}{I}\right)^2 \)


\( Z^2 = R^2 + X_L^2 \)

\( \implies Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \) ... (5)
यहाँ, \( Z = \frac{V}{I} \) को L-R परिपथ की प्रतिबाधा (Impedance) कहते हैं। इसका मात्रक ओम (\( \Omega \)) है। प्रतिबाधा \( Z \) परिपथ के कुल अवरोध को दर्शाती है।

प्रेरकत्व का प्रतिघात \( X_L = \omega L = 2\pi f L \) है। इसलिए, प्रतिबाधा का मान \( Z = \sqrt{R^2 + (2\pi f L)^2} \) होता है। यदि प्रतिबाधा \( Z \) का मान पता हो, तो हम परिपथ में विभवान्तर का वर्ग माध्य मूल मान (RMS value) और शिखर मान (peak value) ज्ञात कर सकते हैं।

परिपथ में विभवान्तर का वर्ग माध्य मूल मान:
\( V_{rms} = Z I_{rms} = I_{rms} \sqrt{R^2 + (2\pi f L)^2} \)

और शिखर मान:
\( V_0 = Z I_0 = I_0 \sqrt{R^2 + (2\pi f L)^2} \)

धारा एवं विभवान्तर के मध्य कलान्तर - सदिश आरेख से स्पष्ट है कि L-R परिपथ में परिणामी विभवान्तर (V) धारा (I) से कला में आगे रहता है। यदि कलान्तर \( \phi \) हो, तो यह चित्र के अनुसार होगा:
\( \tan \phi = \frac{V_L}{V_R} = \frac{I X_L}{I R} = \frac{X_L}{R} = \frac{2\pi f L}{R} \)

अतः, परिणामी विभवान्तर धारा से कला में \( \phi \) आगे है, इसलिए परिणामी विभवान्तर का समीकरण \( V = V_0 \sin (\omega t + \phi) \) है ... (8)
यह स्पष्ट है कि L-R परिपथ में कलान्तर (phase difference) \( \phi \) का मान हमेशा शून्य से अधिक लेकिन 90 डिग्री से कम होता है।

R-L परिपथ का फेजर आरेख:
VR VL V I φ R-C परिपथ का फेजर आरेख:
VR VC V I φ R-C परिपथ का प्रतिबाधा फेजर आरेख:
प्रतिरोध अक्ष प्रतिघात अक्ष VC ωt φ
In simple words: R-L परिपथ में, वोल्टेज करंट से थोड़ा आगे होता है। प्रतिबाधा (Z) प्रतिरोध (R) और प्रेरकत्व के प्रतिघात (\(X_L\)) के कारण कुल अवरोध है। फेज आरेख हमें वोल्टेज और करंट के बीच का कोण समझने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: L-R परिपथ के लिए, वोल्टेज हमेशा धारा से आगे रहता है, और यह कोण (\(\phi\)) हमेशा 0 डिग्री से 90 डिग्री के बीच होता है।

 

प्रश्न 3. अनुनादी परिपथ से क्या तात्पर्य है? श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ के लिए आवश्यक प्रतिबन्ध बताइए तथा अनुनादी आवृत्ति का व्यंजक स्थापित करो। इस परिपथ का कहाँ उपयोग होता है।
Answer:
एक अनुनादी परिपथ वह परिपथ होता है जिसमें एक विशेष आवृत्ति पर धारा या वोल्टेज का मान अधिकतम या न्यूनतम हो जाता है। श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में एक प्रतिरोध (R), एक प्रेरकत्व (L), और एक संधारित्र (C) एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत के साथ श्रेणी क्रम में जुड़े होते हैं। यह परिपथ विशिष्ट आवृत्तियों पर काम करता है।

इस परिपथ की प्रतिबाधा (Z) होती है:
\( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \)

अनुनाद की स्थिति में, प्रेरकत्व प्रतिघात \( X_L \) और धारिता प्रतिघात \( X_C \) बराबर हो जाते हैं:
\( X_L = X_C \)

\( \implies \omega L = \frac{1}{\omega C} \)

\( \implies \omega^2 = \frac{1}{LC} \)

\( \implies \omega = \frac{1}{\sqrt{LC}} \)

चूँकि \( \omega = 2\pi f \), अनुनादी आवृत्ति (\( f_0 \)) का व्यंजक होगा:
\( f_0 = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) ... (1)

अनुनाद की स्थिति में, \( X_L - X_C = 0 \) होने के कारण, प्रतिबाधा न्यूनतम हो जाती है:
\( Z = \sqrt{R^2 + 0^2} = R \)

चूँकि प्रतिबाधा न्यूनतम है, परिपथ में प्रवाहित धारा (\( I = V/Z \)) अधिकतम होती है। अनुनाद की स्थिति में धारा और विभवान्तर समान कला (same phase) में होते हैं, क्योंकि कलान्तर \( \phi = 0 \) होता है (\( \tan \phi = \frac{X_L - X_C}{R} = 0 \))।

अनुनादी परिपथों का उपयोग:
वैद्युत अनुनाद का उपयोग रेडियो और टीवी रिसीवर में 'ट्यूनिंग' के लिए किया जाता है। जब आप रेडियो स्टेशन बदलते हैं, तो आप वास्तव में रिसीवर के LCR परिपथ की अनुनादी आवृत्ति को बदल रहे होते हैं ताकि वह वांछित स्टेशन की आवृत्ति से मेल खाए। इससे उस स्टेशन से आने वाली तरंगों की धारा अधिकतम हो जाती है और हमें वह स्टेशन स्पष्ट सुनाई देता है।

अनुनादी LCR परिपथ का प्रतिबाधा आरेख:
प्रतिरोध अक्ष प्रतिघात अक्ष Z = R
अनुनादी LCR परिपथ का फेजर आरेख:
R Imax Vmax VOC
धारा का आवृत्ति के साथ परिवर्तन (अनुनाद वक्र):
आवृत्ति f धारा I अनुनाद वक्र
प्रतिबाधा का आवृत्ति के साथ परिवर्तन:
f Z fr Zmin = R
प्रतिरोध, प्रतिघात एवं प्रतिबाधा की आवृत्ति पर निर्भरता:
ω Z, X R XL XC
रेडियोग्राही में अनुनादी परिपथ:
यह एक ब्लॉक आरेख है जिसमें एक AC स्रोत, एक प्रेरकत्व, एक संधारित्र और एक प्रतिरोध श्रेणी क्रम में जुड़े होते हैं। साथ ही, एक वेरिएबल संधारित्र (ट्यूनिंग के लिए) और एक एंटेना भी होता है।
In simple words: अनुनादी परिपथ वह है जहाँ एक खास फ्रीक्वेंसी पर करंट सबसे ज़्यादा या सबसे कम होता है। LCR सर्किट में यह तब होता है जब इंडक्टिव और कैपेसिटिव रिएक्टेंस बराबर हो जाते हैं। इसका उपयोग रेडियो ट्यून करने में होता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में \(X_L = X_C\) होना एक महत्वपूर्ण शर्त है, जो परिपथ की न्यूनतम प्रतिबाधा और अधिकतम धारा सुनिश्चित करती है।

 

प्रश्न 4. श्रेणी L-C-R परिपथ के लिए आवृत्ति एवं धारा के मध्य सम्बन्ध को ग्राफ द्वारा प्रदर्शित करो। अर्द्धशक्ति बिन्दु आवृत्तियों को दशति हुए बैण्ड चौड़ाई के लिए आवश्यक सूत्र स्थापित करो।
Answer:
श्रेणी L-C-R परिपथ में, अनुनादी आवृत्ति (\( f_0 \)) पर धारा अधिकतम होती है। जब आवृत्ति को अनुनादी आवृत्ति से थोड़ा बदला जाता है, तो धारा का मान कम हो जाता है। ऐसी आवृत्तियाँ जिन पर धारा का मान अनुनादी धारा के अधिकतम मान का \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) गुना हो जाता है, उन्हें अर्द्धशक्ति बिन्दु आवृत्तियाँ (Half Power Frequencies) कहा जाता है। इन आवृत्तियों पर परिपथ द्वारा खपत की गई शक्ति भी अधिकतम शक्ति की आधी हो जाती है।

धारा का आवृत्ति के साथ अनुनाद वक्र (अर्द्धशक्ति बिन्दु आवृत्तियों के साथ):
X f I f1 fo f2
बैण्ड चौड़ाई (Band Width) इन दो अर्द्धशक्ति आवृत्तियों \( f_1 \) और \( f_2 \) के बीच के अंतर को कहते हैं।
बैण्ड चौड़ाई \( = f_2 - f_1 \)

अर्द्धशक्ति आवृत्तियों \( f_1 \) और \( f_2 \) पर, धारा का मान शिखर धारा \( I_0 \) का \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) गुना होता है, यानी \( I = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \)।
यहाँ \( I = \frac{V_{rms}}{Z} \) और \( I_0 = \frac{V_{rms}}{R} \), तो हम लिख सकते हैं:
\( \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{V_{rms}}{R\sqrt{2}} \)

\( \implies Z = R\sqrt{2} \)

\( \implies \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} = R\sqrt{2} \)

दोनों तरफ वर्ग करने पर:
\( R^2 + (X_L - X_C)^2 = 2R^2 \)

\( \implies (X_L - X_C)^2 = R^2 \)

\( \implies X_L - X_C = \pm R \)

दो आवृत्तियाँ मिलेंगी, एक \( f_1 \) के लिए और दूसरी \( f_2 \) के लिए।
\( \omega L - \frac{1}{\omega C} = R \) (उच्च आवृत्ति \( f_2 \) के लिए) ... (1)

\( \omega L - \frac{1}{\omega C} = -R \) (निम्न आवृत्ति \( f_1 \) के लिए) ... (2)

समीकरण (1) और (2) को हल करने पर, हमें अर्द्धशक्ति आवृत्तियाँ मिलती हैं:
\( f_1 = \frac{1}{2\pi} \left( -\frac{R}{2L} + \sqrt{\left(\frac{R}{2L}\right)^2 + \frac{1}{LC}} \right) \)

\( f_2 = \frac{1}{2\pi} \left( \frac{R}{2L} + \sqrt{\left(\frac{R}{2L}\right)^2 + \frac{1}{LC}} \right) \)

बैण्ड चौड़ाई \( \Delta f = f_2 - f_1 \):
\( \Delta f = \frac{1}{2\pi} \left( \frac{R}{2L} + \sqrt{\left(\frac{R}{2L}\right)^2 + \frac{1}{LC}} \right) - \frac{1}{2\pi} \left( -\frac{R}{2L} + \sqrt{\left(\frac{R}{2L}\right)^2 + \frac{1}{LC}} \right) \)

\( \implies \Delta f = \frac{1}{2\pi} \left( \frac{R}{2L} + \frac{R}{2L} \right) \)

\( \implies \Delta f = \frac{1}{2\pi} \left( \frac{R}{L} \right) \)

\( \implies \Delta f = \frac{R}{2\pi L} \)
In simple words: बैण्ड चौड़ाई वह रेंज है जहाँ LCR सर्किट में करंट सबसे ज़्यादा रहता है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि सर्किट कितना 'शार्प' है, यानी फ्रीक्वेंसी में थोड़ा सा बदलाव होने पर करंट कितनी तेज़ी से गिरता है।

🎯 Exam Tip: बैण्ड चौड़ाई जितनी कम होती है, अनुनाद उतना ही तीक्ष्ण (sharp) होता है, जो रेडियो रिसीवर जैसे अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 5. प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में शक्ति का सूत्र स्थापित करो। प्रतिघात रहित एवं प्रतिरोध रहित परिपथ के लिए उपयुक्त सूत्र में क्या परिवर्तन होता है? शक्ति गुणांक को भी परिभाषित कीजिये।
Answer:
प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में, तात्क्षणिक शक्ति \( P = V I \) होती है, जहाँ \( V \) तात्क्षणिक वोल्टेज और \( I \) तात्क्षणिक धारा है। यदि \( V = V_0 \sin \omega t \) और \( I = I_0 \sin (\omega t - \phi) \) हो (धारा वोल्टेज से \( \phi \) कोण पीछे है), तो औसत शक्ति का सूत्र इस प्रकार प्राप्त होता है:
\( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \)
यह सूत्र प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति को दर्शाता है। यहाँ \( \cos \phi \) को शक्ति गुणांक (Power Factor) कहते हैं।

शक्ति गुणांक (Power Factor): शक्ति गुणांक को प्रत्यावर्ती परिपथ में प्रतिरोध (R) और प्रतिबाधा (Z) के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।
\( \cos \phi = \frac{R}{Z} \)
यह एक विमाहीन राशि है जो यह बताती है कि परिपथ में कितनी शक्ति वास्तव में उपयोग की जा रही है। इसका मान 0 से 1 के बीच होता है।

प्रतिघात रहित परिपथ (Purely Resistive Circuit): यदि परिपथ में केवल प्रतिरोध (R) है और कोई प्रेरकत्व या संधारित्र नहीं है, तो प्रतिघात \( (X_L - X_C) = 0 \) होता है। इस स्थिति में, \( Z = R \) और \( \phi = 0 \) होता है।
\( \cos \phi = \frac{R}{R} = 1 \)
इसलिए, औसत शक्ति \( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos (0) = V_{rms} I_{rms} \) होती है। इस स्थिति में अधिकतम शक्ति का उपयोग होता है।

प्रतिरोध रहित परिपथ (Purely Reactive Circuit): यदि परिपथ में केवल प्रेरकत्व (L) या केवल संधारित्र (C) है और कोई प्रतिरोध नहीं है (\( R = 0 \)), तो \( \phi = \pm \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) होता है।
\( \cos \phi = \cos (\pm \frac{\pi}{2}) = 0 \)
इसलिए, औसत शक्ति \( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos (\pm \frac{\pi}{2}) = 0 \) होती है। ऐसे परिपथ में कोई शक्ति व्यय नहीं होती है क्योंकि ऊर्जा स्रोत और परिपथ के बीच लगातार आदान-प्रदान होता रहता है, लेकिन शुद्ध ऊर्जा का क्षय नहीं होता है।

यह त्रिकोणमितीय संबंध शक्ति गुणांक के लिए भी उपयोगी है:
\( \sec^2 \phi = 1 + \tan^2 \phi = 1 + \frac{X^2}{R^2} = \frac{R^2 + X^2}{R^2} \)

\( \implies \sec^2 \phi = \frac{Z^2}{R^2} \) (क्योंकि \( Z^2 = R^2 + X^2 \))

\( \implies \sec \phi = \frac{Z}{R} \)

\( \implies \cos \phi = \frac{R}{Z} \)

शक्ति गुणांक एक महत्वपूर्ण राशि है क्योंकि यह तय करता है कि कितनी शक्ति वास्तव में काम करने के लिए उपलब्ध है। कम शक्ति गुणांक का मतलब है कि परिपथ में अधिक व्यर्थ धारा बह रही है, जिससे बिजली की हानि बढ़ जाती है। ट्रांसफार्मर, मोटर और पंखे जैसे उपकरणों में उच्च शक्ति गुणांक बनाए रखना ऊर्जा दक्षता के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: शक्ति गुणांक हमें बताता है कि एसी सर्किट में कितनी बिजली असली काम कर रही है। अगर सिर्फ प्रतिरोध है, तो सारी बिजली काम आती है। अगर सिर्फ प्रेरक या संधारित्र है, तो कोई बिजली खर्च नहीं होती।

🎯 Exam Tip: उच्च शक्ति गुणांक (1 के करीब) ऊर्जा दक्षता के लिए बेहतर होता है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि अधिकतम विद्युत शक्ति का उपयोग हो।

RBSE Class 12 Physics Chapter 10 आंकिक प्रश्न

 

प्रश्न 1. किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता \( V = 50 \sin (157t + \phi) \) V है तो ज्ञात कीजिए (अ) प्रत्यावर्ती वोल्टता का वर्ग माध्य मूल मान (ब) प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृत्ति।
Answer:
हल:
दिया गया है प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण:
\( V = 50 \sin (157t + \phi) \)
इसे मानक समीकरण \( V = V_0 \sin (\omega t + \phi) \) से तुलना करने पर, हमें मिलता है:
शिखर वोल्टता \( V_0 = 50 \text{ V} \)
कोणीय आवृत्ति \( \omega = 157 \text{ rad/s} \)

(अ) प्रत्यावर्ती वोल्टता का वर्ग माध्य मूल मान (\( V_{rms} \)):
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} \)

\( V_{rms} = \frac{50}{1.414} \)

\( V_{rms} \approx 35.36 \text{ V} \)

(ब) प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृत्ति (\( f \)):
हम जानते हैं कि \( \omega = 2\pi f \)

\( \implies 157 = 2 \times 3.14 \times f \)

\( \implies f = \frac{157}{2 \times 3.14} \)

\( \implies f = \frac{157}{6.28} \)

\( \implies f = 25 \text{ Hz} \)
In simple words: हमें दी गई वोल्टेज इक्वेशन से सीधे पीक वोल्टेज और एंगुलर फ्रीक्वेंसी मिलती है। फिर हम इन मानों का उपयोग करके RMS वोल्टेज और सर्किट की फ्रीक्वेंसी निकाल सकते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टता के मानक समीकरण \( V = V_0 \sin(\omega t + \phi) \) को याद रखना और \( V_0, \omega \) और \( f \) के बीच के संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 2. किस समय \( t \) पर ज्यावक्रीय प्रत्यावर्ती धारा का मान अपने शिखर मान का (i) आधा (ii) \( \frac{\sqrt{3}}{2} \) गुना होगा?
Answer:
हल:
ज्यावक्रीय प्रत्यावर्ती धारा का तात्क्षणिक मान का समीकरण होता है:
\( I = I_0 \sin \omega t \)

(i) जब धारा का मान शिखर मान का आधा हो (\( I = \frac{I_0}{2} \)):
\( \frac{I_0}{2} = I_0 \sin \omega t \)

\( \implies \sin \omega t = \frac{1}{2} \)

\( \implies \omega t = \frac{\pi}{6} \)

\( \implies t = \frac{\pi}{6\omega} \)

चूँकि \( \omega = \frac{2\pi}{T} \) (जहाँ \( T \) आवर्तकाल है):
\( t = \frac{\pi}{6 \times \frac{2\pi}{T}} \)

\( \implies t = \frac{T}{12} \)

(ii) जब धारा का मान शिखर मान का \( \frac{\sqrt{3}}{2} \) गुना हो (\( I = \frac{\sqrt{3}}{2} I_0 \)):
\( \frac{\sqrt{3}}{2} I_0 = I_0 \sin \omega t \)

\( \implies \sin \omega t = \frac{\sqrt{3}}{2} \)

\( \implies \omega t = \frac{\pi}{3} \)

\( \implies t = \frac{\pi}{3\omega} \)

चूँकि \( \omega = \frac{2\pi}{T} \):
\( t = \frac{\pi}{3 \times \frac{2\pi}{T}} \)

\( \implies t = \frac{T}{6} \)
In simple words: ज्यावक्रीय धारा एक चक्र में बदलती रहती है। हम समीकरण का उपयोग करके उस समय का पता लगा सकते हैं जब धारा अपने अधिकतम मान का एक विशिष्ट हिस्सा होती है।

🎯 Exam Tip: \( \sin \theta \) के मानक मानों को याद रखना इस प्रकार के प्रश्नों को हल करने के लिए महत्वपूर्ण है। ध्यान दें कि \( \omega t \) का मान रेडियन में लिया जाता है।

 

प्रश्न 3. \( 10\Omega \) का एक प्रतिरोध तथा 100mH का एक प्रेरकत्व श्रेणी क्रम में एक प्रत्यावर्ती वोल्टता स्रोत \( V = 100 \cos 100t \) से जुड़े हैं। परिपथ में प्रवाहित धारा और वोल्टता के मध्य कलान्तर ज्ञात करो।
Answer:
उत्तर:
दिया गया है:
प्रतिरोध \( R = 10\Omega \)
प्रेरकत्व \( L = 100 \text{ mH} = 100 \times 10^{-3} \text{ H} = 0.1 \text{ H} \)
वोल्टेज समीकरण \( V = 100 \cos 100t \)
इस समीकरण की तुलना \( V = V_0 \cos \omega t \) से करने पर, हमें कोणीय आवृत्ति \( \omega = 100 \text{ rad/s} \) मिलती है।

सबसे पहले, प्रेरकत्व का प्रतिघात (\( X_L \)) ज्ञात करते हैं:
\( X_L = \omega L \)
\( X_L = 100 \text{ rad/s} \times 0.1 \text{ H} \)
\( X_L = 10\Omega \)

अब, धारा और वोल्टता के बीच कलान्तर (\( \phi \)) ज्ञात करते हैं। L-R परिपथ के लिए कलान्तर का सूत्र है:
\( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \)

\( \tan \phi = \frac{10\Omega}{10\Omega} \)

\( \tan \phi = 1 \)

\( \implies \phi = 45^\circ \) या \( \frac{\pi}{4} \) रेडियन।
L-R परिपथ में, वोल्टेज हमेशा धारा से \( \phi \) कोण आगे रहता है।
In simple words: एक रेसिस्टर और इंडक्टर जुड़े होने पर, वोल्टेज और करंट के बीच हमेशा एक एंगल होता है। इस एंगल को खोजने के लिए हमें इंडक्टर के रिएक्टेंस और रेसिस्टेंस की जरूरत होती है।

🎯 Exam Tip: L-R परिपथ में वोल्टेज हमेशा धारा से आगे रहता है, जबकि R-C परिपथ में धारा वोल्टेज से आगे रहती है। कलान्तर की गणना के लिए \( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \) (L-R के लिए) और \( \tan \phi = \frac{X_C}{R} \) (R-C के लिए) सूत्र याद रखें।

 

प्रश्न 4. 1kHz आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा के लिए 100 mH के प्रेरकत्व का प्रतिघात ज्ञात करो। यदि स्रोत की वोल्टता 6.28V हो तो प्रेरकत्व में धारा का मान ज्ञात करो।
Answer:
हल:
दिया गया है:
प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति \( f = 1 \text{ kHz} = 1 \times 10^3 \text{ Hz} \)
प्रेरकत्व \( L = 100 \text{ mH} = 100 \times 10^{-3} \text{ H} = 0.1 \text{ H} \)
स्रोत की वोल्टता \( V = 6.28 \text{ V} \)

सबसे पहले, प्रेरकत्व का प्रतिघात (\( X_L \)) ज्ञात करते हैं:
\( X_L = 2\pi f L \)
\( X_L = 2 \times 3.14 \times 1 \times 10^3 \text{ Hz} \times 0.1 \text{ H} \)
\( X_L = 6.28 \times 100 \)
\( X_L = 628\Omega \)

अब, प्रेरकत्व में प्रवाहित धारा (\( I \)) ज्ञात करते हैं:
\( I = \frac{V}{X_L} \)
\( I = \frac{6.28 \text{ V}}{628\Omega} \)
\( I = 0.01 \text{ Amp} \)
In simple words: इंडक्टर का रिएक्टेंस (विरोध) फ्रीक्वेंसी पर निर्भर करता है। हमें फ्रीक्वेंसी और इंडक्टेंस का उपयोग करके रिएक्टेंस निकालना होता है, फिर वोल्टेज से करंट की गणना की जा सकती है।

🎯 Exam Tip: ओम के नियम को AC परिपथ में भी लागू किया जा सकता है, बस प्रतिरोध \( R \) की जगह प्रतिघात \( X_L \) या \( X_C \) का उपयोग करना होता है।

 

प्रश्न 5. एक कुण्डली का प्रेरकत्व 1 हेनरी है। (i) किस आवृत्ति पर इसका प्रतिघात \( 3140\Omega \) होगा? (ii) एक संधारित्र की धारिता क्या होनी चाहिए कि उसी आवृत्ति पर उसका प्रतिघात उतना ही रहे?
Answer:
हल:
दिया गया है:
प्रेरकत्व \( L = 1 \text{ H} \)

(i) किस आवृत्ति पर प्रेरकत्व का प्रतिघात \( X_L = 3140\Omega \) होगा?
हम जानते हैं कि \( X_L = 2\pi f L \)

\( \implies 3140 = 2 \times 3.14 \times f \times 1 \)

\( \implies 3140 = 6.28 \times f \)

\( \implies f = \frac{3140}{6.28} \)

\( \implies f = 500 \text{ Hz} \)

(ii) संधारित्र की धारिता \( C \) क्या होनी चाहिए ताकि उसी आवृत्ति पर उसका प्रतिघात \( X_C = 3140\Omega \) हो?
हम जानते हैं कि \( X_C = \frac{1}{2\pi f C} \)

\( \implies 3140 = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 500 \times C} \)

\( \implies 3140 = \frac{1}{3140 \times C} \)

\( \implies C = \frac{1}{3140 \times 3140} \)

\( \implies C = \frac{1}{9859600} \)

\( \implies C \approx 0.1014 \times 10^{-6} \text{ F} \)

\( \implies C \approx 0.1014 \mu\text{F} \)
In simple words: इंडक्टर और कैपेसिटर दोनों की अपनी एक 'विरोध' क्षमता होती है, जिसे रिएक्टेंस कहते हैं, और यह फ्रीक्वेंसी के साथ बदलता है। इस सवाल में, हमने इंडक्टर के लिए एक खास रिएक्टेंस के लिए फ्रीक्वेंसी निकाली और फिर उसी रिएक्टेंस के लिए कैपेसिटर की क्षमता निकाली।

🎯 Exam Tip: ध्यान दें कि प्रेरकत्व प्रतिघात (\(X_L\)) आवृत्ति के सीधे आनुपातिक होता है, जबकि धारिता प्रतिघात (\(X_C\)) आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

 

प्रश्न 6. एक 120H का संधारित्र 50Hz के स्रोत से जुड़ा है। इसके धारितीय प्रतिघात को मान सह करो। यदि प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति 5MHz कर दी जाए तो प्रतिघात में क्या परिवर्तन होगा?
Answer:
हल:
दिया गया है:
संधारित्र की धारिता \( C = 120 \text{ H} \). (यहाँ, 120H एक संधारित्र के लिए गलत इकाई है, यह प्रेरकत्व के लिए होती है। हम इसे \( C = 120 \mu\text{F} = 120 \times 10^{-6} \text{ F} \) मानते हैं जैसा कि उत्तर में उपयोग किया गया है।)
प्रारंभिक आवृत्ति \( f_1 = 50 \text{ Hz} \)

प्रारंभिक धारिता प्रतिघात (\( X_{C1} \)) ज्ञात करते हैं:
\( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{2\pi f C} \)

\( X_{C1} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 50 \text{ Hz} \times 120 \times 10^{-6} \text{ F}} \)

\( X_{C1} = \frac{1}{37.68 \times 10^{-3}} \)

\( X_{C1} \approx 26.54\Omega \)

नई आवृत्ति \( f_2 = 5 \text{ MHz} = 5 \times 10^6 \text{ Hz} \)

नई धारिता प्रतिघात (\( X_{C2} \)) ज्ञात करते हैं:
\( X_{C2} = \frac{1}{2\pi f_2 C} \)

\( X_{C2} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 5 \times 10^6 \text{ Hz} \times 120 \times 10^{-6} \text{ F}} \)

\( X_{C2} = \frac{1}{3768} \)

\( X_{C2} \approx 0.0002654\Omega \)

धारिता प्रतिघात आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होता है। जब आवृत्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है (50 Hz से 5 MHz), तो धारिता प्रतिघात बहुत कम हो जाता है।
In simple words: कैपेसिटर का विरोध, जिसे रिएक्टेंस कहते हैं, फ्रीक्वेंसी बढ़ने पर कम हो जाता है। बहुत ऊंची फ्रीक्वेंसी पर कैपेसिटर लगभग शॉर्ट सर्किट की तरह काम करता है।

🎯 Exam Tip: धारिता प्रतिघात \( X_C \) का मान आवृत्ति \( f \) के बढ़ने के साथ घटता है। यह दर्शाता है कि संधारित्र उच्च आवृत्तियों को आसानी से गुजरने देता है लेकिन निम्न आवृत्तियों को रोकता है।

 

प्रश्न 7. एक कुण्डली का प्रतिरोध \( R = 10\Omega \) तथा प्रेरकत्व \( L = 0.4\text{H} \) है। इसे 6.5V, \( \frac{30}{\pi}\text{Hz} \) के प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जो शक्ति व्यय ज्ञात करो।
Answer:
हल:
दिया गया है:
प्रतिरोध \( R = 10\Omega \)
प्रेरकत्व \( L = 0.4 \text{ H} \)
स्रोत का वर्ग माध्य मूल वोल्टता \( V_{rms} = 6.5 \text{ V} \)
आवृत्ति \( f = \frac{30}{\pi} \text{ Hz} \)

सबसे पहले, प्रेरकत्व का प्रतिघात (\( X_L \)) ज्ञात करते हैं:
\( X_L = 2\pi f L \)
\( X_L = 2\pi \times \frac{30}{\pi} \text{ Hz} \times 0.4 \text{ H} \)
\( X_L = 2 \times 30 \times 0.4 \)
\( X_L = 60 \times 0.4 = 24\Omega \)

अब, परिपथ की प्रतिबाधा (\( Z \)) ज्ञात करते हैं:
\( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \)
\( Z = \sqrt{(10)^2 + (24)^2} \)
\( Z = \sqrt{100 + 576} \)
\( Z = \sqrt{676} = 26\Omega \)

परिपथ में प्रवाहित वर्ग माध्य मूल धारा (\( I_{rms} \)) ज्ञात करते हैं:
\( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} \)
\( I_{rms} = \frac{6.5 \text{ V}}{26\Omega} \)
\( I_{rms} = 0.25 \text{ A} \)

अब, परिपथ में व्यय शक्ति (\( P_{av} \)) ज्ञात करते हैं:
\( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \)
जहाँ \( \cos \phi = \frac{R}{Z} \)

\( P_{av} = V_{rms} I_{rms} \frac{R}{Z} \)
\( P_{av} = 6.5 \text{ V} \times 0.25 \text{ A} \times \frac{10\Omega}{26\Omega} \)
\( P_{av} = 1.625 \times \frac{10}{26} \)
\( P_{av} = \frac{16.25}{26} \)
\( P_{av} \approx 0.625 \text{ W} \)
In simple words: सर्किट में कितनी बिजली खर्च हो रही है, यह जानने के लिए हमें प्रतिरोध, प्रेरकत्व और वोल्टेज का उपयोग करके रिएक्टेंस, प्रतिबाधा और शक्ति गुणांक की गणना करनी होती है।

🎯 Exam Tip: AC परिपथ में शक्ति व्यय केवल प्रतिरोध के कारण होता है, इसलिए \( P = I_{rms}^2 R \) या \( P = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \) जैसे सूत्रों का उपयोग करें।

 

Question 8. एक 60V तथा 10W का बल्ब 100v के प्रत्यावर्ती स्रोत से जुड़ी है। इसके श्रेणीक्रम में एक प्रेरक कुण्डली जुड़ी है। यदि बल्ब पूर्ण तीव्रता से प्रकाशित होता है तो कुण्डली के प्रेरकत्व का मान ज्ञात करो। (f = 60Hz)
Answer:
बल्ब पर अंकित वोल्टता \( V_{\text{bulb}} = 60 \) वोल्ट
बल्ब की शक्ति \( P_{\text{bulb}} = 10 \) वाट
बल्ब से प्रवाहित धारा \( I = \frac{P_{\text{bulb}}}{V_{\text{bulb}}} = \frac{10}{60} = \frac{1}{6} \) एम्पियर
परिपथ का कुल विभवान्तर \( V = 100 \) वोल्ट
चूंकि बल्ब पूरी चमक से जल रहा है, इसलिए उसमें से \( \frac{1}{6} \) एम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है।
प्रेरक कुण्डली पर विभवान्तर \( V_L = \sqrt{V^2 - V_{\text{bulb}}^2} \)
\( V_L = \sqrt{(100)^2 - (60)^2} \)
\( V_L = \sqrt{10000 - 3600} \)
\( V_L = \sqrt{6400} = 80 \) वोल्ट
प्रेरकीय प्रतिघात \( X_L = \frac{V_L}{I} = \frac{80}{1/6} = 80 \times 6 = 480 \) ओम
हम जानते हैं कि \( X_L = 2 \pi f L \)
तो, प्रेरकत्व \( L = \frac{X_L}{2 \pi f} = \frac{480}{2 \times 3.14 \times 60} \)
\( L = \frac{480}{376.8} \approx 1.273 \) हेनरी
इस प्रकार, कुण्डली का प्रेरकत्व लगभग 1.273 हेनरी है।
In simple words: एक बल्ब और कुण्डली साथ में जुड़े हैं. बल्ब पूरी रोशनी में जल रहा है. हमें कुण्डली का प्रेरकत्व निकालना है. हमने बल्ब की शक्ति और वोल्टता से उसकी धारा निकाली. फिर कुल वोल्टता और बल्ब की वोल्टता से कुण्डली पर वोल्टता निकाली. आखिर में इस वोल्टता और धारा से प्रेरकत्व का मान ज्ञात किया.

🎯 Exam Tip: Remember to clearly distinguish between the voltage across the bulb and the total voltage of the source when solving such problems. Also, ensure you use the correct formula for inductive reactance.

 

Question 9. \( V_{\text{rms}} = 120\text{V} \) तथा \( f = 60\text{Hz} \) का एक प्रत्यावर्ती स्रोत \( L = 200\text{mH} \), \( C = 40\mu\text{F} \) तथा \( R = 20\Omega \) के श्रेणी परिपथ से जुड़ी है। निम्न राशियों के मान ज्ञात करो-
(i) कुल प्रतिघात
(ii) प्रतिबाधा
(iii) शक्ति गुणांक
(iv) औसत शक्ति ।
Answer:
दिया है:
प्रत्यावर्ती स्रोत का वर्ग माध्य मूल वोल्टता \( V_{\text{rms}} = 120\text{V} \)
आवृत्ति \( f = 60\text{Hz} \)
प्रेरकत्व \( L = 200\text{mH} = 200 \times 10^{-3}\text{H} \)
धारिता \( C = 40\mu\text{F} = 40 \times 10^{-6}\text{F} \)
प्रतिरोध \( R = 20\Omega \)

पहले कोणीय आवृत्ति \( \omega \) ज्ञात करें:
\( \omega = 2 \pi f = 2 \times 3.14 \times 60 = 376.8 \) रेडियन/सेकंड

प्रेरकीय प्रतिघात \( X_L \):
\( X_L = \omega L = 376.8 \times 200 \times 10^{-3} = 75.36 \Omega \)

धारितीय प्रतिघात \( X_C \):
\( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{376.8 \times 40 \times 10^{-6}} = \frac{10^6}{376.8 \times 40} = \frac{1000000}{15072} \approx 66.34 \Omega \)

(i) कुल प्रतिघात (Net Reactance) \( X \):
\( X = X_L - X_C = 75.36 - 66.34 = 9.02 \Omega \)

(ii) प्रतिबाधा (Impedance) \( Z \):
\( Z = \sqrt{R^2 + X^2} \)
\( Z = \sqrt{(20)^2 + (9.02)^2} \)
\( Z = \sqrt{400 + 81.36} = \sqrt{481.36} \approx 21.93 \Omega \)

(iii) शक्ति गुणांक (Power Factor) \( \cos \phi \):
\( \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{20}{21.93} \approx 0.912 \)

(iv) औसत शक्ति (Average Power) \( P_{\text{avg}} \):
\( P_{\text{avg}} = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos \phi \)
पहले \( I_{\text{rms}} \) ज्ञात करें:
\( I_{\text{rms}} = \frac{V_{\text{rms}}}{Z} = \frac{120}{21.93} \approx 5.47 \) एम्पियर
अब औसत शक्ति:
\( P_{\text{avg}} = 120 \times 5.47 \times 0.912 \)
\( P_{\text{avg}} \approx 598.85 \) वाट
इस प्रकार, कुल प्रतिघात 9.02 ओम, प्रतिबाधा 21.93 ओम, शक्ति गुणांक 0.912 और औसत शक्ति 598.85 वाट है।
In simple words: हमें एक बिजली के परिपथ के बारे में कुछ चीजें पता हैं, जैसे वोल्टता और आवृत्ति. इसमें एक प्रेरक, एक संधारित्र और एक प्रतिरोध लगा है. हमें कुल रुकावट (प्रतिघात और प्रतिबाधा), यह बताना है कि बिजली कितनी अच्छी तरह उपयोग हो रही है (शक्ति गुणांक), और परिपथ कितनी बिजली खर्च कर रहा है (औसत शक्ति) निकालना है. हमने पहले हर एक पुर्जे की रुकावट निकाली, फिर कुल रुकावट (प्रतिबाधा) और आखिर में शक्ति गुणांक और औसत शक्ति.

🎯 Exam Tip: Always calculate the inductive and capacitive reactances first, then the total reactance, and finally the impedance. Remember to convert all units to standard SI units (like mH to H, µF to F) before calculations.

 

Question 11. किसी LCR परिपथ में 10mH का प्रेरकत्व, 3\( \Omega \) का प्रतिरोध तथा 1F की धारिता श्रेणीक्रम में 15 cos wt V के स्रोत से जुड़े हैं। अनुनादी आवृत्ति से 10% कम आवृत्ति पर धारा का शिखरे मान ज्ञात करो।
Answer:
दिया है:
प्रेरकत्व \( L = 10\text{mH} = 10 \times 10^{-3}\text{H} = 0.01\text{H} \)
प्रतिरोध \( R = 3\Omega \)
धारिता \( C = 1\text{F} \)
प्रत्यावर्ती वोल्टता \( V = 15 \cos(\omega t) \text{V} \)
इसकी तुलना \( V = V_0 \cos(\omega t) \) से करने पर,
शिखर वोल्टता \( V_0 = 15\text{V} \)

पहले अनुनादी आवृत्ति \( f_r \) ज्ञात करें:
\( f_r = \frac{1}{2 \pi \sqrt{LC}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{0.01 \times 1}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{0.01}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 0.1} = \frac{1}{0.628} \approx 1.59235 \text{Hz} \)

अब, अनुनादी आवृत्ति से 10% कम आवृत्ति \( f \):
\( f = f_r - 0.10 \times f_r = 1.59235 - 0.10 \times 1.59235 \)
\( f = 1.59235 - 0.159235 = 1.433115 \text{Hz} \approx 1.433 \text{Hz} \)

इस नई आवृत्ति पर कोणीय आवृत्ति \( \omega \):
\( \omega = 2 \pi f = 2 \times 3.14 \times 1.433 \approx 8.999 \text{ rad/s} \approx 9 \text{ rad/s} \)

इस आवृत्ति पर प्रेरणिक प्रतिघात \( X_L \):
\( X_L = \omega L = 9 \times 0.01 = 0.09 \Omega \)

इस आवृत्ति पर धारितीय प्रतिघात \( X_C \):
\( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{9 \times 1} = 0.111 \Omega \)

कुल प्रतिघात \( X \):
\( X = X_C - X_L = 0.111 - 0.09 = 0.021 \Omega \)

प्रतिबाधा \( Z \):
\( Z = \sqrt{R^2 + X^2} \)
\( Z = \sqrt{(3)^2 + (0.021)^2} \)
\( Z = \sqrt{9 + 0.000441} = \sqrt{9.000441} \approx 3.00007 \Omega \approx 3 \Omega \)

धारा का शिखर मान \( I_0 \):
\( I_0 = \frac{V_0}{Z} = \frac{15}{3} = 5 \) एम्पियर
इस प्रकार, अनुनादी आवृत्ति से 10% कम आवृत्ति पर धारा का शिखर मान 5 एम्पियर होगा।
In simple words: एक LCR परिपथ में कुछ पुर्जे लगे हैं. हमें सबसे पहले वह आवृत्ति (अनुनादी आवृत्ति) निकालनी है जिस पर यह परिपथ सबसे अच्छा काम करता है. फिर, इस अनुनादी आवृत्ति से 10% कम एक नई आवृत्ति लेनी है. इस नई आवृत्ति पर परिपथ में कितनी ज़्यादा से ज़्यादा धारा बह सकती है (शिखर मान), यह पता करना है.

🎯 Exam Tip: When dealing with LCR circuits, accurately calculating the resonant frequency is crucial. Remember that reactances (XL and XC) change with frequency, which affects the overall impedance and current. Pay close attention to unit conversions for L and C.

 

Question 12. एक प्रेरकत्व L= 200 mH, C = 500 HF, R = 100\( \Omega \) श्रेणीक्रम में 100V के प्रत्यावर्ती स्रोत से जुड़े हैं। ज्ञात करो-
(i) वह आवृत्ति जिस पर परिपथ को शक्ति गुणांक 1 हो
(ii) इस आवृत्ति पर धारा का शिखर मान
(iii) विशेषता गुणांक
Answer:
दिया है:
प्रेरकत्व \( L = 200 \text{mH} = 200 \times 10^{-3}\text{H} = 0.2\text{H} \)
धारिता \( C = 500 \mu\text{F} = 500 \times 10^{-6}\text{F} = 0.0005\text{F} \)
प्रतिरोध \( R = 100\Omega \)
स्रोत वोल्टता \( V_{\text{rms}} = 100\text{V} \)

(i) वह आवृत्ति जिस पर परिपथ को शक्ति गुणांक 1 हो:
शक्ति गुणांक \( \cos \phi = 1 \) तब होता है जब परिपथ अनुनाद की स्थिति में हो, यानी \( X_L = X_C \).
अनुनादी आवृत्ति \( f_r = \frac{1}{2 \pi \sqrt{LC}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{0.2 \times 0.0005}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{0.0001}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 0.01} = \frac{1}{0.0628} \approx 15.92 \text{Hz} \)

(ii) इस आवृत्ति पर धारा का शिखर मान \( I_0 \):
अनुनाद की स्थिति में प्रतिबाधा \( Z = R \).
\( Z = 100 \Omega \)
वर्ग माध्य मूल धारा \( I_{\text{rms}} = \frac{V_{\text{rms}}}{Z} = \frac{100}{100} = 1 \text{A} \)
धारा का शिखर मान \( I_0 = I_{\text{rms}} \sqrt{2} = 1 \times \sqrt{2} = 1.414 \text{A} \)

(iii) विशेषता गुणांक (Quality Factor) \( Q \):
\( Q = \frac{1}{R} \sqrt{\frac{L}{C}} \)
\( Q = \frac{1}{100} \sqrt{\frac{0.2}{0.0005}} \)
\( Q = \frac{1}{100} \sqrt{400} = \frac{1}{100} \times 20 = 0.2 \)
इस प्रकार, शक्ति गुणांक 1 के लिए आवृत्ति 15.92 Hz होगी, जिस पर धारा का शिखर मान 1.414 A और विशेषता गुणांक 0.2 होगा।
In simple words: एक बिजली के परिपथ में एक कुण्डली, एक संधारित्र और एक प्रतिरोध एक साथ जुड़े हैं. हमें पता करना है कि किस आवृत्ति पर यह परिपथ सबसे अच्छा काम करेगा (शक्ति गुणांक 1). फिर, उस आवृत्ति पर सबसे ज़्यादा धारा कितनी बहेगी, और परिपथ की गुणवत्ता (विशेषता गुणांक) क्या होगी. हमने गणित के सूत्रों का उपयोग करके इन सभी मानों को निकाला है.

🎯 Exam Tip: Remember that a power factor of 1 always corresponds to the resonant frequency where \( X_L = X_C \). The quality factor (Q) gives an idea of the circuit's selectivity; a higher Q means a sharper resonance curve.

 

Question 13. एक कुण्डली का शक्ति गुणांक 60 Hz आवृत्ति पर 0.707 है, यदि आवृत्ति 120 Hz हो जाए तो शक्ति गुणांक क्या होगा?
Answer:
दिया है:
पहली आवृत्ति \( f_1 = 60 \text{Hz} \)
पहली स्थिति में शक्ति गुणांक \( \cos \phi_1 = 0.707 \)
हम जानते हैं कि \( \cos \phi = \frac{R}{\sqrt{R^2 + X_L^2}} \) (यह शुद्ध प्रेरक कुण्डली के लिए है, जिसमें सिर्फ प्रतिरोध और प्रेरकत्व हो)
यहाँ \( X_L = 2 \pi f L \)
तो, \( \cos \phi = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (2 \pi f L)^2}} \)

पहली स्थिति में:
\( 0.707 = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (2 \pi \times 60 \times L)^2}} \)
\( (0.707)^2 = \frac{R^2}{R^2 + (120 \pi L)^2} \)
\( 0.5 = \frac{R^2}{R^2 + (120 \pi L)^2} \)
\( 0.5 (R^2 + (120 \pi L)^2) = R^2 \)
\( 0.5 R^2 + 0.5 (120 \pi L)^2 = R^2 \)
\( 0.5 (120 \pi L)^2 = R^2 - 0.5 R^2 = 0.5 R^2 \)
\( (120 \pi L)^2 = R^2 \)
तो, \( 120 \pi L = R \)
इसका मतलब है कि पहली आवृत्ति पर प्रेरकत्व का प्रतिघात प्रतिरोध के बराबर था।

अब, दूसरी आवृत्ति \( f_2 = 120 \text{Hz} \)
इस आवृत्ति पर प्रेरकत्व का प्रतिघात \( X_{L2} = 2 \pi f_2 L = 2 \pi \times 120 \times L = 2 \times (120 \pi L) = 2R \)
दूसरी स्थिति में शक्ति गुणांक \( \cos \phi_2 \):
\( \cos \phi_2 = \frac{R}{\sqrt{R^2 + X_{L2}^2}} \)
\( \cos \phi_2 = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (2R)^2}} = \frac{R}{\sqrt{R^2 + 4R^2}} = \frac{R}{\sqrt{5R^2}} = \frac{R}{R\sqrt{5}} = \frac{1}{\sqrt{5}} \)
\( \cos \phi_2 = \frac{1}{2.236} \approx 0.447 \)
इस प्रकार, 120 Hz आवृत्ति पर शक्ति गुणांक लगभग 0.447 होगा। आवृत्ति बढ़ने पर प्रेरकत्व का प्रभाव बढ़ता है, जिससे शक्ति गुणांक कम हो जाता है।
In simple words: हमें एक कुण्डली का शक्ति गुणांक पता है जब बिजली 60 Hz पर आती है. हमें यह निकालना है कि अगर बिजली 120 Hz पर आए तो शक्ति गुणांक क्या होगा. हमने पहले शक्ति गुणांक के सूत्र का उपयोग करके प्रतिरोध और प्रेरकत्व के बीच का संबंध निकाला. फिर, इस संबंध का उपयोग करके नई आवृत्ति पर नया शक्ति गुणांक निकाला.

🎯 Exam Tip: For a series RL circuit, the power factor is given by \( \cos \phi = R/Z \). Remember that inductive reactance \( X_L = 2 \pi f L \) is directly proportional to frequency, so a change in frequency will directly affect \( X_L \) and thus the impedance Z and power factor.

 

Question 14. एक श्रेणी LCR परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता 230V का स्रोत जुड़ा है। यदि L = 5H, C = 80 HeF, R= 40\( \Omega \) है तो
(i) अनुनादी आवृत्ति
(ii) परिपथ की प्रतिबाधा और अनुनादी आवृत्ति पर धारा का शिखर मान
(iii) परिपथ के तीनों अवयवों के सिरों पर वोल्टता के वर्ग माध्य मूल मान ज्ञात कीजिए।
Answer:
दिया है:
स्रोत का वर्ग माध्य मूल वोल्टता \( V_{\text{rms}} = 230\text{V} \)
प्रेरकत्व \( L = 5\text{H} \)
धारिता \( C = 80 \mu\text{F} = 80 \times 10^{-6}\text{F} \)
प्रतिरोध \( R = 40\Omega \)

(i) अनुनादी आवृत्ति \( f_r \):
\( f_r = \frac{1}{2 \pi \sqrt{LC}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{5 \times 80 \times 10^{-6}}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{400 \times 10^{-6}}} \)
\( f_r = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 20 \times 10^{-3}} \)
\( f_r = \frac{1}{0.1256 \times 20} = \frac{1}{2.512} \approx 0.398 \text{Hz} \)
इस प्रकार, अनुनादी आवृत्ति लगभग 0.398 Hz है।

(ii) परिपथ की प्रतिबाधा और अनुनादी आवृत्ति पर धारा का शिखर मान:
अनुनाद की स्थिति में, प्रतिबाधा \( Z = R \).
\( Z = 40 \Omega \)
अनुनादी आवृत्ति पर वर्ग माध्य मूल धारा \( I_{\text{rms}} = \frac{V_{\text{rms}}}{Z} = \frac{230}{40} = 5.75 \text{A} \)
धारा का शिखर मान \( I_0 = I_{\text{rms}} \sqrt{2} = 5.75 \times 1.414 \approx 8.13 \text{A} \)

(iii) परिपथ के तीनों अवयवों के सिरों पर वोल्टता के वर्ग माध्य मूल मान:
प्रतिरोध के सिरों पर वोल्टता \( V_R = I_{\text{rms}} R = 5.75 \times 40 = 230 \text{V} \)
प्रेरकत्व के सिरों पर वोल्टता \( V_L = I_{\text{rms}} X_L \)
अनुनादी आवृत्ति पर कोणीय आवृत्ति \( \omega_r = 2 \pi f_r = 2 \times 3.14 \times 0.398 \approx 2.5 \text{ rad/s} \)
तो, \( X_L = \omega_r L = 2.5 \times 5 = 12.5 \Omega \)
\( V_L = 5.75 \times 12.5 = 71.875 \text{V} \)
धारिता के सिरों पर वोल्टता \( V_C = I_{\text{rms}} X_C \)
\( X_C = \frac{1}{\omega_r C} = \frac{1}{2.5 \times 80 \times 10^{-6}} = \frac{1}{200 \times 10^{-6}} = \frac{1}{0.0002} = 5000 \Omega \)
\( V_C = 5.75 \times 5000 = 28750 \text{V} \)
इस प्रकार, अनुनादी आवृत्ति 0.398 Hz है, प्रतिबाधा 40 ओम और धारा का शिखर मान 8.13 A है। प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता पर वर्ग माध्य मूल वोल्टता क्रमशः 230V, 71.875V और 28750V है।
In simple words: हमें एक LCR परिपथ में लगे पुर्जों की जानकारी दी गई है. हमें सबसे पहले वह खास आवृत्ति निकालनी है जिस पर यह परिपथ सबसे अच्छा काम करता है (अनुनादी आवृत्ति). फिर उस आवृत्ति पर कुल रुकावट और बहने वाली सबसे ज़्यादा बिजली (धारा का शिखर मान) बतानी है. आखिर में, हर एक पुर्जे (प्रतिरोध, प्रेरकत्व, संधारित्र) पर कितनी वोल्टता है, यह भी बताना है.

🎯 Exam Tip: For an LCR series circuit at resonance, the impedance is equal to the resistance (Z = R), and \( X_L = X_C \). Note that the voltages across L and C can be much higher than the source voltage, especially in resonant circuits, so always calculate them separately.

 

Question 15. एक आदर्श ट्रांसफार्मर 2200V को 220V में परिवर्तित करता है। इसकी प्राथमिक कुण्डली में 5000 फेरे हैं। यदि ट्रांसफार्मर की दक्षता 80% तथा निर्गत शक्ति 8kw है तो ज्ञात करो-
(i) द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या
(ii) प्राथमिक कुण्डली में धारा
(iii) निर्गत धारा
(iv) प्राथमिक कुण्डली की शक्ति
Answer:
दिया है:
प्राथमिक कुण्डली में वोल्टता \( E_p = 2200\text{V} \)
द्वितीयक कुण्डली में वोल्टता \( E_s = 220\text{V} \)
प्राथमिक कुण्डली में फेरों की संख्या \( N_p = 5000 \)
ट्रांसफार्मर की दक्षता \( \eta = 80\% \)
निर्गत शक्ति \( P_{\text{out}} = 8\text{kW} = 8000\text{W} \)

(i) द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या \( N_s \):
एक ट्रांसफार्मर के लिए, \( \frac{E_p}{E_s} = \frac{N_p}{N_s} \)
\( \frac{2200}{220} = \frac{5000}{N_s} \)
\( 10 = \frac{5000}{N_s} \)
\( N_s = \frac{5000}{10} = 500 \)
द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या 500 है।

(ii) प्राथमिक कुण्डली में धारा \( I_p \):
दक्षता \( \eta = \frac{P_{\text{out}}}{P_{\text{in}}} \times 100\% \)
जहाँ \( P_{\text{in}} \) प्राथमिक शक्ति है।
\( 80 = \frac{8000}{P_{\text{in}}} \times 100 \)
\( P_{\text{in}} = \frac{8000 \times 100}{80} = 10000\text{W} = 10\text{kW} \)
प्राथमिक शक्ति \( P_{\text{in}} = E_p I_p \)
\( 10000 = 2200 \times I_p \)
\( I_p = \frac{10000}{2200} = \frac{100}{22} \approx 4.545 \text{A} \)
प्राथमिक कुण्डली में धारा लगभग 4.545 एम्पियर है।

(iii) निर्गत धारा \( I_s \):
निर्गत शक्ति \( P_{\text{out}} = E_s I_s \)
\( 8000 = 220 \times I_s \)
\( I_s = \frac{8000}{220} = \frac{800}{22} \approx 36.36 \text{A} \)
निर्गत धारा लगभग 36.36 एम्पियर है।

(iv) प्राथमिक कुण्डली की शक्ति \( P_{\text{in}} \):
हमने पहले ही इसकी गणना की है।
\( P_{\text{in}} = 10\text{kW} \)
इस प्रकार, द्वितीयक कुण्डली में 500 फेरे हैं, प्राथमिक धारा 4.545 A है, निर्गत धारा 36.36 A है और प्राथमिक शक्ति 10 kW है।
In simple words: एक ट्रांसफार्मर बिजली की वोल्टता को बदलता है. हमें पता है कि वह कितनी वोल्टता को किसमें बदलता है, प्राथमिक कुण्डली में कितने फेरे हैं, वह कितना कुशल है, और कितनी बिजली बाहर देता है. हमें द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या, प्राथमिक और द्वितीयक कुण्डली में बहने वाली धारा, और प्राथमिक कुण्डली की कुल बिजली बतानी है. हमने ट्रांसफार्मर के नियमों और दक्षता के सूत्र का उपयोग करके ये सभी मान निकाले हैं.

🎯 Exam Tip: For transformer problems, always start by listing the given values and their respective symbols (Ep, Es, Np, Ns, P_in, P_out, η). Remember the two key relationships: \( \frac{E_p}{E_s} = \frac{N_p}{N_s} \) and \( \eta = \frac{P_{\text{out}}}{P_{\text{in}}} \times 100\% \). Efficiency is critical when dealing with real (non-ideal) transformers.

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