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Detailed Chapter 10 भय RBSE Solutions for Class 12 Hindi
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Class 12 Hindi Chapter 10 भय RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. दुःख या आपत्ति का पूर्ण निश्चय न होने पर कौन-सा मनोभाव उत्पन्न होता है?
(क) भय
(ख) क्रोध
(ग) लज्जा
(घ) आशंका
Answer: (क) भय
In simple words: जब किसी समस्या या खतरे का पूरा पता न हो, पर उसकी संभावना हो, तो मन में जो भावना आती है, उसे भय कहते हैं। यह भावना हमें सावधान करती है।
🎯 Exam Tip: मनोभावों से संबंधित प्रश्नों में, दिए गए विवरण के साथ सबसे सटीक भावनात्मक प्रतिक्रिया को पहचानना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. साहसी व्यक्ति कठिनाई में फँस जाने पर क्या करता है?
Answer: साहसी व्यक्ति मुश्किल में पड़ने पर डरता नहीं है। वह उस मुश्किल से बाहर निकलने का रास्ता खोजता है और उसे हल करने की कोशिश करता है। ऐसे व्यक्ति हमेशा समस्या का समाधान ढूंढते हैं।
In simple words: जब कोई साहसी व्यक्ति मुसीबत में पड़ता है, तो वह डरता नहीं बल्कि उससे बाहर निकलने का तरीका ढूंढता है।
🎯 Exam Tip: साहसी व्यक्ति की विशेषताओं को बताते समय 'डरता नहीं' और 'उपाय करता है' जैसे प्रमुख वाक्यांशों का उपयोग करें।
Question 2. भय क्या है?
Answer: भय एक ऐसी मानसिक भावना है जो तब पैदा होती है जब हमें किसी आने वाले खतरे का एहसास होता है। यह तब होता है जब हमें लगता है कि हम उस खतरे से खुद को बचा नहीं पाएंगे। यह एक शक्तिशाली भावना है जो हमें खतरे से दूर रहने के लिए प्रेरित करती है।
In simple words: जब हमें किसी आने वाले संकट का पता चलता है और हमें लगता है कि हम उससे बच नहीं सकते, तो मन में जो डर की भावना आती है, उसे भय कहते हैं।
🎯 Exam Tip: भय की परिभाषा में 'भावी संकट', 'बचने की सामर्थ्य न देखना' और 'मनोविकार' जैसे शब्द महत्वपूर्ण हैं।
Question 3. क्रोध और भय में क्या अन्तर है?
Answer: क्रोध तब आता है जब हमें दुःख के कारण का पूरा पता होता है, जबकि भय में हमें सिर्फ यह पता चलता है कि कोई संकट या हानि होने वाली है, उसका पूरा कारण जानना ज़रूरी नहीं होता। क्रोध हमें दुःख के कारण को प्रभावित करने के लिए उकसाता है, जबकि भय हमें उससे दूर भागने के लिए प्रेरित करता है।
In simple words: क्रोध तब आता है जब हम दुःख का कारण जानते हैं, पर भय तब होता है जब हमें सिर्फ यह पता हो कि कुछ बुरा होने वाला है।
🎯 Exam Tip: क्रोध और भय के अंतर को स्पष्ट करते समय 'कारण का ज्ञान' और 'प्रतिक्रिया' (प्रभावित करना या बचना) पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 4. भय भीरुता में कब बदल जाता है?
Answer: भय भीरुता में तब बदल जाता है जब डरना किसी व्यक्ति की आदत बन जाए और उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाए। जब व्यक्ति हर बात से डरने लगता है और वह डर उसके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन जाता है, तो उसे भीरुता कहते हैं। यह अक्सर आत्मविश्वास की कमी के कारण होता है।
In simple words: जब डरना किसी व्यक्ति की आदत बन जाता है और उसके स्वभाव में आ जाता है, तो उसे भीरुता कहते हैं।
🎯 Exam Tip: भीरुता को भय का 'स्वभावगत' या 'आदतन' रूप परिभाषित करें।
Question 5. ऐसी कौन-सी भीरुता है, जिसकी प्रशंसा होती है?
Answer: धर्मभीरुता ही एकमात्र ऐसी भीरुता है जिसकी समाज में प्रशंसा होती है। धर्मभीरुता का मतलब है धर्म के नियमों और सही-गलत के सिद्धांतों का पालन करते हुए गलत काम करने से डरना। यह डर व्यक्ति को अच्छे रास्ते पर चलने में मदद करता है।
In simple words: धर्मभीरुता ही एकमात्र ऐसी भीरुता है जिसकी लोग तारीफ करते हैं, क्योंकि इसमें व्यक्ति गलत काम करने से डरता है।
🎯 Exam Tip: 'धर्मभीरुता' को एकमात्र प्रशंसनीय भीरुता के रूप में पहचानें और उसके सकारात्मक अर्थ को स्पष्ट करें।
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 2. व्यापारी द्वारा नया व्यापार शुरू न करने, पण्डित का शास्त्रार्थ में भाग न लेने का मूल कारण क्या हो सकता है?
Answer: व्यापारी द्वारा नया काम शुरू न करने और पंडित द्वारा वाद-विवाद में हिस्सा न लेने का मुख्य कारण भीरुता की भावना है। व्यापारी को नए व्यापार में घाटा होने का डर होता है, इसलिए वह नया काम नहीं करता। वहीं, पंडित को हारने या अपनी इज्जत खराब होने का डर होता है, इसलिए वह वाद-विवाद से दूर रहता है। दोनों ही अपने डर के कारण आगे नहीं बढ़ते।
In simple words: व्यापारी को नुकसान का डर और पंडित को हारने या बेइज्जती का डर होता है, यही कारण है कि वे नया काम शुरू नहीं करते या वाद-विवाद में भाग नहीं लेते।
🎯 Exam Tip: उदाहरणों के माध्यम से भीरुता के कारण होने वाली क्रियाओं को समझाते समय, प्रत्येक वर्ग के विशिष्ट भय को उजागर करें।
Question 3. भय की अधिकता किसमें रहती है?
Answer: भय की अधिकता असभ्य और जंगली लोगों में ज्यादा देखने को मिलती है। ये लोग डर के कारण ही दूसरों का सम्मान करते हैं। उनके देवी-देवताओं की कल्पना भी डर के प्रभाव से ही हुई है। जिससे वे डरते हैं, उसी की पूजा करते हैं। किसी भी संकट से बचने के लिए वे इन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि देवता उन्हें बचा सकते हैं।
In simple words: असभ्य और जंगली लोगों में डर ज्यादा होता है। वे अपने डर के कारण ही दूसरों का सम्मान करते हैं और देवी-देवताओं की पूजा भी भय के कारण ही करते हैं।
🎯 Exam Tip: असभ्य समाजों में भय के कारणों और उसके सामाजिक-धार्मिक प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 4. सभ्य और असभ्य प्राणियों के भय में क्या अन्तर है?
Answer: असभ्य प्राणियों में भूत-प्रेत और जंगली जानवरों का डर ज्यादा होता है। उन्हें यह डर भी रहता है कि कोई उनकी संपत्ति जबरदस्ती छीन न ले। सभ्य प्राणियों का डर अलग तरह का होता है। उन्हें चिंता रहती है कि कोई चालाक व्यक्ति झूठे कागज़ बनाकर, गलत गवाह पेश करके या कानूनी दाँव-पेंच से उनकी धन-संपत्ति हड़प न ले। इस तरह, दोनों का डर अलग-अलग रूप लेता है।
In simple words: असभ्य लोग भूत-प्रेत और जानवरों से डरते हैं, जबकि सभ्य लोगों को यह डर रहता है कि कोई चालाकी से उनकी संपत्ति छीन न ले।
🎯 Exam Tip: सभ्य और असभ्य समाजों के भय के रूपों को स्पष्ट करते हुए, उनके कारणों में अंतर को रेखांकित करें।
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. दुःख की छाया को हटाने के लिए व्यक्ति किन बलों का उपयोग करता है? और कैसे?
Answer: हर इंसान बड़ा होते ही अपने चारों ओर एक दुःख भरा संसार देखता है। वह धीरे-धीरे अपने ज्ञान और शारीरिक बल का उपयोग करके इसे सुखमय बनाने की कोशिश करता है। वह परेशानियों को जीवन का सामान्य हिस्सा और सुख को खास मानता है। जैसे-जैसे उसकी उम्र और समझ बढ़ती है, उसकी शारीरिक शक्ति और ज्ञान भी बढ़ता जाता है। शुरुआत में वह अपने माता-पिता और परिवार के संपर्क में रहता है और जानता है कि ये लोग उसे सुख देंगे, दुःख नहीं। धीरे-धीरे उसकी झिझक कम होती जाती है और उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। इसी ज्ञान और शारीरिक बल का उपयोग करके वह दुःख से मुक्त होने और सुख पाने की कोशिश करता है।
In simple words: इंसान दुःख दूर करने और सुख पाने के लिए अपने ज्ञान और शारीरिक शक्ति का उपयोग करता है। वह धीरे-धीरे दुनिया को समझता है, अपने डर कम करता है और आत्मविश्वास से आगे बढ़ता है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय 'ज्ञान-बल' और 'शारीरिक बल' को प्रमुखता से बताएं और समझाएं कि ये कैसे दुःख निवारण में मदद करते हैं।
Question 2. “सभ्यता से अन्तर केवल इतना पड़ा है कि दुःख-दान की विधियाँ बहुत गूढ़ और जटिल हो गई हैं।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस पंक्ति का मतलब है कि सभ्यता बढ़ने के साथ दुःख देने के तरीके और भी जटिल और छिपे हुए हो गए हैं। पहले लोग सीधे तौर पर दूसरों को नुकसान पहुंचाते थे, जैसे जबरदस्ती संपत्ति छीन लेना। लेकिन अब, समाज और कानून के विकास के कारण, कोई सीधे तौर पर ऐसा नहीं करता। अब धोखेबाज़ लोग नकली कागजात बनाकर, झूठी गवाही देकर या कानूनी दाँव-पेंच का इस्तेमाल करके दूसरों की संपत्ति छीन लेते हैं। इस तरह दुःख देने का तरीका बदल गया है, पर दुःख देना बंद नहीं हुआ। इस बदलाव से लोगों को लगता है कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन असल में वे दूसरे तरीके के शोषण का शिकार हो जाते हैं।
In simple words: सभ्यता बढ़ने से दुःख देने के तरीके सीधे होने की बजाय मुश्किल और चालाकी भरे हो गए हैं। अब लोग सीधे हिंसा नहीं करते, बल्कि कानूनी तरीकों का गलत इस्तेमाल करके दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं।
🎯 Exam Tip: 'गूढ़ और जटिल' विधियों का मतलब स्पष्ट करने के लिए पुराने और नए तरीकों के उदाहरण दें, जैसे सीधी लूटपाट बनाम कानूनी धोखाधड़ी।
Question 3. भय के साध्य और असाध्य दोनों रूपों को सोदाहरण समझाइए।
Answer: भय के दो रूप होते हैं: साध्य और असाध्य। साध्य भय वह होता है जिससे हम कोशिश करके बच सकते हैं। जैसे, यदि दो दोस्त पहाड़ पर बातें कर रहे हों और अचानक शेर की दहाड़ सुनें, तो वे डरकर पेड़ पर चढ़ जाएं या भाग जाएं, यह साध्य भय है। इस भय को प्रयत्न करके दूर किया जा सकता है। असाध्य भय वह है जिसका निवारण करना असंभव लगे, भले ही कितनी भी कोशिश की जाए। यदि उन्हीं दोस्तों को पेड़ पर चढ़ना न आता हो या वे भाग न सकें और शेर सामने आ जाए, तो उनका भय असाध्य हो जाता है, क्योंकि वे कुछ कर नहीं पाते। यहाँ, भय हमें स्तब्ध कर देता है।
In simple words: साध्य भय वह है जिससे हम कोशिश करके बच सकते हैं, जैसे शेर देखकर भाग जाना। असाध्य भय वह है जिससे बचना मुश्किल या नामुमकिन लगे, जैसे शेर से बच न पाना और डरकर शांत हो जाना।
🎯 Exam Tip: साध्य और असाध्य भय को उदाहरण सहित स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि साध्य में बचाव संभव है जबकि असाध्य में व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है।
Question 4. मनुष्य के भय की वासना की परिहार कैसे होता है?
Answer: मनुष्य के मन से डर की भावना धीरे-धीरे ही दूर होती है। जैसे-जैसे उसकी शारीरिक शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है, उसका ज्ञान भी बढ़ता जाता है। ज्ञान बढ़ने से उसके मन से दुःख का डर हटता जाता है और वह दुःख के कारणों को दूर करने के तरीके जान लेता है। इस तरह, उसके मन में भय की भावना कम होती जाती है। सभ्यता के विकास से भी डर दूर होता है। पहले लोग भूत-प्रेत और जंगली जानवरों से डरते थे, लेकिन अब ज्ञान बढ़ने से वे इनसे नहीं डरते। मनुष्य की शक्तिहीनता और अक्षमता ही भय का मुख्य कारण होती है। एक छोटा बच्चा अपने आस-पास के लोगों से डरता है, लेकिन जैसे-जैसे उसका ज्ञान और आत्मबल बढ़ता है, वह अपने डर पर काबू पा लेता है।
In simple words: मनुष्य अपने मन से डर को धीरे-धीरे दूर करता है। जैसे-जैसे उसकी शारीरिक शक्ति, आत्मविश्वास और ज्ञान बढ़ता है, उसे दुःख के कारणों का पता चलता है और वह उनसे डरना बंद कर देता है।
🎯 Exam Tip: भय निवारण में 'शारीरिक शक्ति', 'आत्मबल' और 'ज्ञान' की भूमिका को विस्तार से समझाएं और सभ्यता के विकास से इसके संबंध को भी बताएं।
Question 5. निर्भयता के लिए शुक्ल जी ने क्या उपाय बताए हैं?
Answer: आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने निर्भयता प्राप्त करने के लिए कुछ उपाय बताए हैं:
1. शारीरिक बल में वृद्धि: जब व्यक्ति का शरीर मजबूत होता है, तो वह दुःख के कारण को दूर कर सकने वाला मानता है और डरता नहीं। साहसी लोग निडर होते हैं। शारीरिक शक्ति हमें चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत देती है।
2. ज्ञान-बल: जब इंसान का ज्ञान बढ़ता है, तो उसे डरने वाले कारणों का पता चल जाता है और उनसे बचने के तरीके भी मालूम हो जाते हैं। इससे वह निडर बन जाता है।
3. सभ्यता का विकास: असभ्य और जंगली लोगों में डर ज्यादा होता है। सभ्यता बढ़ने पर लोगों में निडरता आती है। अपरिचितों, भूत-प्रेतों और जानवरों का डर सभ्य समाजों में कम हो जाता है।
4. सुसंस्कृति और शील: जब इंसान संस्कारी और अच्छे स्वभाव का होता है, तो वह किसी को तकलीफ नहीं पहुंचाता। यह असभ्यता के लक्षण हैं। जब लोग एक-दूसरे को दुःख नहीं देते, तो समाज में निडरता का माहौल बनता है।
5. पराक्रम और उत्पीड़क को दण्डित करना: समाज को निडर बनाने के लिए गलत काम करने वालों को दंडित करना जरूरी है। दुष्ट लोग सज्जनों को सताते हैं और उन्हें दंडित करके ही नियंत्रित किया जा सकता है।
6. आदर्श शासन-व्यवस्था: आज के समय में आर्थिक प्रतिस्पर्धा और शोषण के कारण दुनिया में डर फैला हुआ है। लोगों को शोषण से मुक्त करके ही निडर बनाया जा सकता है, जिसके लिए न्यायप्रिय और आदर्श शासन व्यवस्था जरूरी है।
In simple words: शुक्ल जी ने बताया कि निडर बनने के लिए शारीरिक और ज्ञानी बनना चाहिए, सभ्य समाज बनाना चाहिए, गलत करने वालों को दंड देना चाहिए और अच्छा शासन होना चाहिए।
🎯 Exam Tip: निर्भयता के उपायों को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक बिंदु को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से समझाएं, खासकर 'शारीरिक बल', 'ज्ञान-बल' और 'सभ्यता के विकास' पर।
RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 10 भय निबन्धात्मक प्रश्न
Question 4. असभ्य तथा जंगली जातियों में भय अधिक होता है क्यों? उनके समाज में देवताओं की पूजा में भय की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
Answer: असभ्य और जंगली लोगों में भय बहुत ज्यादा होता है। ऐसे लोगों का परिचय क्षेत्र बहुत छोटा होता है। कई जातियां ऐसी हैं, जहाँ लोग 20-25 से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं जानते। अगर दस-बारह कोस दूर रहने वाला कोई जंगली व्यक्ति उन्हें मारने दौड़े, तो वे भागकर अपनी जान बचाते हैं। यह रक्षा उन्हें तुरंत और हमेशा के लिए करनी पड़ती है। उनका परिचय सीमित होने के कारण ही उन्हें अधिक डर लगता है। जंगली जातियों में भय की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। वे जिनसे डरते हैं, अपनी सुरक्षा के लिए उनका सम्मान भी करते हैं। उनके देवी-देवता भी भय के कारण ही बनते हैं। वे किसी मुसीबत से बचने के लिए एक शक्ति की कल्पना कर लेते हैं और उसकी पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें संकट से बचाए। भय और भय पैदा करने वाले का सम्मान करना असभ्यता की निशानी है। जन्म से ही मनुष्य में भय की भावना प्रमुख होती है। देवता शक्तिशाली होते हैं और वे किसी को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। इस नुकसान से बचने के लिए ही उनका सम्मान किया जाता है। उन्हें खुश रखने के लिए उनकी पूजा की जाती है। इसी कारण सभ्यता और शिक्षा के विकास के साथ धर्म के प्रति लोगों का भय कम होता जाता है।
In simple words: जंगली लोगों को ज्यादा डर लगता है, क्योंकि उनका परिचय सीमित होता है। वे जिनसे डरते हैं, उन्हीं देवी-देवताओं की पूजा करते हैं ताकि वे उन्हें नुकसान न पहुँचाएँ।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में भय के कारणों और उसके सामाजिक-धार्मिक प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
Question 5. “अपरिचित से भय में जीवन का कोई गूढ़ रहस्य छिपा जान पड़ता है।" इस कथन का तर्कपूर्ण समर्थन कीजिए।
Answer: अपरिचित चीज़ों से डरने में जीवन का एक गहरा रहस्य छिपा हुआ लगता है। जंगली समाजों में परिचय का दायरा बहुत सीमित होता है। वे अपरिचित लोगों से डरते हैं। छोटे बच्चों में भी अपरिचित लोगों से डरने का भाव होता है। वे धीरे-धीरे डरना छोड़ते हैं और अपने माता-पिता व रोज़ सामने आने वाले थोड़े लोगों के साथ घुल-मिल जाते हैं। किसी अपरिचित व्यक्ति को देखकर वे तुरंत घर में घुस जाते हैं। जानवरों में भी अपरिचित से डरने का भाव पाया जाता है। पालतू जानवर की तुलना में दूसरे जानवर ज्यादा डरते हैं। वे किसी इंसान को सामने देखकर या तो भाग जाते हैं या उस पर हमला कर देते हैं। धर्म में भी अपरिचित के प्रति डर पाया जाता है। धर्म में जिन्हें सम्मानित और पूज्य माना जाता है, वे शक्तियाँ अक्सर अज्ञात और अपरिचित ही होती हैं। उनकी दंड देने और पीड़ित करने की शक्ति से डरकर ही लोग उनकी पूजा-स्तुति करते हैं और उनके क्रोध से बचना चाहते हैं। धार्मिक देवता अक्सर रहस्य से घिरे होते हैं। अज्ञात शक्ति के डर से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही उनकी पूजा की जाती है। पूजा के पीछे उनके प्रति आभार की भावना भी होती है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री लॉक ने तो ईश्वर को भी इसी कारण मानव द्वारा कल्पित माना है।
In simple words: हमें अपरिचित चीज़ों से डर क्यों लगता है, इसमें जीवन का एक गहरा रहस्य है। जंगली लोग, बच्चे और जानवर भी अपरिचित से डरते हैं। धर्म में भी अज्ञात शक्तियों की पूजा डर के कारण ही की जाती है।
🎯 Exam Tip: कथन की व्याख्या करते समय, अपने विचारों को उदाहरणों से पुष्ट करें जैसे जंगली लोगों, बच्चों और जानवरों के भय का उल्लेख।
Question 17. "सबल और निर्बल देशों के बीच अर्थशोषण की प्रक्रिया अनवरत चल रही है।" कैसे? स्पष्ट कीजिए।
Answer: शक्तिशाली देश कमजोर देशों के बाजारों पर अपना पूरा अधिकार चाहते हैं। वे उन देशों में अपने बनाए हुए सामान को निर्यात करते हैं और अपनी शर्तों पर उनके साथ व्यापार करते हैं। वे कमजोर देशों से सस्ता कच्चा माल और सस्ता श्रम खरीदते हैं, जबकि उन्हें अपना महंगा सामान बेचते हैं। इस तरह शक्तिशाली देश कमजोर देशों का आर्थिक शोषण करते हैं। यह प्रक्रिया बिना रुके लगातार चलती रहती है। एक देश दूसरे देश को व्यापार के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है।
In simple words: ताकतवर देश कमजोर देशों के बाजार पर कब्जा करते हैं। वे उनसे सस्ता सामान खरीदकर अपना महंगा सामान बेचते हैं, जिससे कमजोर देशों का लगातार आर्थिक शोषण होता रहता है।
🎯 Exam Tip: अर्थशोषण के तरीकों को स्पष्ट रूप से बताएँ, जैसे कच्चे माल की खरीद और तैयार माल की बिक्री।
Question 18. “सार्वभौम वणिग्वृत्ति” से लेखक का क्या आशय है?
Answer: 'वणिक' का अर्थ व्यापारी होता है। आजकल पूरी दुनिया के सभी देश व्यापारी बन चुके हैं। वे अपने कारखानों में बने सामान को दूसरे देशों के बाजारों में बेचते हैं। इसके कारण उनमें बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है और वे कमजोर देशों का आर्थिक शोषण करते हैं। इसी को लेखक ने "सार्वभौम वणिग्वृत्ति" कहा है। यह पूरे विश्व में व्यापार के जरिये आर्थिक प्रभुत्व जमाने की होड़ है।
In simple words: "सार्वभौम वणिग्वृत्ति" का मतलब है कि आजकल पूरी दुनिया के देश एक-दूसरे से व्यापार में आगे निकलने की होड़ में हैं और कमजोर देशों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं।
🎯 Exam Tip: "सार्वभौम वणिग्वृत्ति" शब्द का अर्थ और उसके वैश्विक प्रभाव को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 19. शुक्ल जी के कथन "इस सार्वभौम वणिग्वृत्ति से उसका अनर्थ कभी न होता, यदि क्षात्रवृत्ति उसके लक्ष्य से अपना लक्ष्य अलग रखती।” का आशय क्या है?
Answer: 'क्षात्रवृत्ति' का मतलब है क्षत्रिय का धर्म, यानी अच्छा शासन। गलत कामों को रोकना और नियंत्रण करना ही शासन-सत्ता का कर्तव्य है। यदि देशों की सरकारें आर्थिक प्रतिस्पर्धा और शोषण में सहयोग न करतीं और उन्हें नियंत्रित रखतीं, तो दुनिया के गरीब देशों का शोषण, उत्पीड़न और गरीबी रोकी जा सकती थी। इस प्रकार, अगर व्यापार केवल लाभ के लिए न होकर न्यायपूर्ण शासन के अधीन होता, तो इससे बुरा परिणाम नहीं होता।
In simple words: शुक्ल जी का कहना है कि अगर सरकारें अपना काम ठीक से करतीं और आर्थिक शोषण को रोकतीं, तो यह वैश्विक व्यापार की होड़ गलत नहीं होती।
🎯 Exam Tip: क्षात्रवृत्ति और वणिग्वृत्ति के बीच के संबंध को स्पष्ट करते हुए, आदर्श शासन की भूमिका पर जोर दें।
Question 20. "अर्थोन्माद को शासन के भीतर रखने से शुक्ल जी का क्या तात्पर्य है?
Answer: 'अर्थोन्माद' का अर्थ है- धन कमाने का पागलपन। आजकल पूरी दुनिया के देश और लोग धन कमाने के लिए पागल हो चुके हैं। वे पैसा कमाने के लिए सही-गलत, नैतिक-अनैतिक सभी तरीके अपनाते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना है। इस गलत प्रतिस्पर्धा पर नियंत्रण बहुत जरूरी है। इसे नियंत्रण में रखने से दुनिया को अनाचार और अनावश्यक झगड़ों से बचाया जा सकता है। शासन व्यवस्था को नैतिकता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।
In simple words: 'अर्थोन्माद' का मतलब है धन कमाने की पागलपन भरी दौड़। शुक्ल जी चाहते हैं कि सरकार इस पागलपन को रोके, ताकि दुनिया में अन्याय और झगड़े कम हों।
🎯 Exam Tip: "अर्थोन्माद" का अर्थ और उसके दुष्परिणामों को स्पष्ट करें, साथ ही इसके समाधान के रूप में शासन की भूमिका भी बताएँ।
Question. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्य-साधना पर प्रकाश डालिए।
Answer: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ था। उनके पिता पं. चन्द्रबली शुक्ल सुपरवाइजर कानूनगो थे। शुक्ल जी ने मिर्जापुर के मिशन स्कूल से एंट्रेंस परीक्षा पास की। कायस्थ पाठशाला इलाहाबाद में प्रवेश लिया, लेकिन एफ.ए. (इंटर) करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी। उन्होंने सरकारी नौकरी शुरू की, पर आत्मसम्मान के कारण उसे छोड़ दिया और मिर्जापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग मास्टर बन गए। बाद में उन्होंने खुद ही हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला जैसी भाषाओं का गहरा ज्ञान प्राप्त किया। वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा से जुड़े और 'हिन्दी शब्द सागर' का संपादन किया। बाद में वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे। सन् 1941 में उनका देहावसान हो गया। शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य को बहुत कुछ दिया।
In simple words: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 में बस्ती जिले में हुआ था। वे एक महान लेखक और शिक्षाविद थे, जिन्होंने हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला का गहरा अध्ययन किया। उन्होंने कई किताबें लिखीं और हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। 1941 में उनका निधन हो गया।
🎯 Exam Tip: लेखक के जीवन-परिचय को लिखते समय, जन्म स्थान, माता-पिता, शिक्षा, प्रमुख कार्य और मृत्यु जैसी महत्वपूर्ण जानकारियों को शामिल करें।
साहित्यिक परिचय-
शुक्ल जी की पहली प्रकाशित रचना 'मनोहर छटा' नामक कविता थी। बाद में उनका झुकाव गद्य-लेखन की ओर हुआ। उन्होंने हिन्दी गद्य में निबंध, समालोचना जैसी विधाओं में प्रशंसनीय योगदान दिया। उनके मनोविकार संबंधी निबंध हिन्दी में अद्वितीय हैं। समालोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने मौलिक कृतियों की रचना करके नई दिशा दी है। उन्होंने हिन्दी साहित्य का पहला प्रामाणिक इतिहास भी लिखा है। उनकी 'चिंतामणि भाग-1' को मंगला प्रसाद पारितोषिक मिला था। शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य में अपना विशेष स्थान बनाया।
- कृतियाँ-निबन्ध-संग्रह-'चिंतामणि भाग 1 तथा-2' कथा-विचारवीथी (इसमें सूर, तुलसी, जायसी पर लिखी आलोचनाएँ संग्रहीत हैं)
In simple words: शुक्ल जी की पहली रचना 'मनोहर छटा' कविता थी, पर वे गद्य में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने निबंध, आलोचना और 'चिंतामणि' जैसे ग्रंथ लिखे, जिससे हिन्दी साहित्य को बहुत फायदा हुआ।
🎯 Exam Tip: साहित्यिक परिचय में लेखक की प्रमुख रचनाएँ, विधाएँ और साहित्य में उनके योगदान को संक्षेप में स्पष्ट करें।
भय पाठ-सार
Question. आचार्य शुक्ल द्वारा रचित 'भय' शीर्षक निबन्ध का सारांश लिखिए।
Answer: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबंध 'भय' उनके मनोविकार संबंधी निबंधों के संग्रह 'चिंतामणि' से लिया गया है। इस निबंध में उत्साह, करुणा, श्रद्धा-भक्ति, क्रोध आदि मनोविकारों का वर्णन है, और 'भय' भी उनमें से एक है।
भय का भाव: जब किसी आने वाले संकट या दुःख की भावना मन में आती है, और इससे मनुष्य स्तब्ध हो जाता है, तो उसे 'भय' कहते हैं। क्रोध और भय दोनों दुःख से जुड़े हैं। क्रोध तब आता है जब दुःख का कारण पता होता है, जबकि भय इससे बचने की प्रेरणा देता है। भय के लिए दुःख का कारण जानना जरूरी नहीं है, बस यह आभास हो कि दुःख या हानि होगी। भय दो तरह का होता है- साध्य और असाध्य। साध्य भय वह है जिससे प्रयास करके बचा जा सकता है, जबकि असाध्य भय वह है जिससे बचा नहीं जा सकता। भय का साध्य या असाध्य होना परिस्थिति और मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर करता है। जो साहसी नहीं होते, वे दुःख को अनिवार्य मानकर डर जाते हैं, जबकि साहसी व्यक्ति भय से बचने का प्रयास करते हैं।
भीरुता या कायरता: जब भय का सामना न करके उससे भागना मनुष्य की आदत बन जाता है, तो उसे भीरुता या कायरता कहते हैं। इसमें कष्ट सहने की क्षमता में कमी मुख्य कारण है। यह भीरुता बहुत पुरानी है। व्यापारी हानि के डर से नए व्यापार में हाथ नहीं डालते और पंडित अपमान के डर से शास्त्रार्थ से दूर रहते हैं। स्त्रियों की भीरुता रसिक पुरुषों के लिए मनोरंजन का साधन होती है, जबकि पुरुषों की भीरुता निंदनीय मानी जाती है। कुछ लोग धर्म-भीरुता की प्रशंसा करते हैं, क्योंकि धर्म से डरने वाले प्रशंसा के पात्र होते हैं।
आशंका और आशा: जब दुःख का पूरा निश्चय न हो, पर उसकी संभावना मात्र हो, तो मन में जो आवेग रहित भय होता है, उसे आशंका कहते हैं। आशंका का संचार धीमा होता है, पर लंबे समय तक रहता है। दुःख वाले भावों में जो स्थिति आशंका की है, वही सुख वाले भावों में आशा की होती है। जैसे जंगल में चीते के मिलने की आशंका पर यात्री चलता रह सकता है, लेकिन अगर निश्चय हो जाए, तो वह वापस लौट जाएगा या वहीं रुक जाएगा।
भय का स्थायित्व और उससे रक्षा: सभ्य समाज के लोगों में भय का प्रभाव कम समय तक रहता है, क्योंकि वहाँ स्थायी सुरक्षा संभव नहीं है। असभ्य तथा जंगली लोगों में भय से सुरक्षा ज्यादा समय तक रहती है। जंगली लोग केवल परिचय के दायरे में रहने वालों को जानते हैं। दूर रहने वाले मनुष्यों को वे नहीं जानते। अपरिचित लोगों से उनमें डर की भावना होती है।
In simple words: 'भय' एक ऐसी भावना है जो आने वाले खतरे के डर से पैदा होती है। यह साध्य (जिससे बचा जा सके) और असाध्य (जिससे बचा न जा सके) हो सकता है। जब डर स्वभाव बन जाए, तो उसे कायरता कहते हैं। आशंका हल्के डर को कहते हैं। भय से बचाव के लिए परिचय बढ़ाना और शक्ति बढ़ाना जरूरी है।
🎯 Exam Tip: निबंध का सारांश लिखते समय, मुख्य बिंदुओं को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें, निबंध की संरचना और लेखक के विचारों को बनाए रखें।
महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ-
Question 1. किसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्तम्भ-कारक मनोविकार होता है उसी को भय कहते हैं। क्रोध दुःख के कारण पर प्रभाव डालने के लिए आकुल करता है और भय उसकी पहुँच से बाहर होने के लिए। क्रोध दुःख के कारण के स्वरूप-बोध के बिना नहीं होता। यदि दुःख का कारण चेतन होगा और यह समझा जाएगा कि उसने जान-बूझकर दुःख पहुँचाया है, तभी क्रोध होगा। पर भय के लिए कारण का निर्दिष्ट होना जरूरी नहीं; इतना भर मालूम होना चाहिए कि दुःख या हानि पहुँचेगी। (पृष्ठ संख्या 37)
Answer:
कठिन शब्दार्थ- आपदा = संकट। साक्षात्कार = आमना-सामना। आवेग = उत्तेजना। स्तम्भ-कारक = निर्णय लेने में अक्षम बनाने वाला। मनोविकार = मन के भाव। आकुल = विचलित। चेतन = सजीव। निर्दिष्ट = नियत, तय।
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबंध 'भय' से लिया गया है। 'भय' शुक्ल जी का मनोविकार संबंधी निबंध है। लेखक ने इसमें मानव मन के भय नामक भाव के बारे में बताया है और 'क्रोध' से उसकी तुलना की है।
व्याख्या- लेखक कहते हैं कि जब मनुष्य को किसी आने वाले संकट या दुःख का आभास होता है, तो उसके मन में एक ऐसी भावना उत्पन्न होती है जो उसे उत्तेजित करके निर्णय लेने में अक्षम बना देती है। इसी भावना को 'भय' कहते हैं। भय मनुष्य को दुःख से बचने के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य के मन में एक और भावना 'क्रोध' है। क्रोध दुःख के कारण को प्रभावित करने के लिए व्याकुल रहता है। क्रोध तब तक उत्पन्न नहीं होता जब तक दुःख के कारण का स्वरूप ज्ञात न हो। अगर दुःख का कारण कोई सजीव प्राणी हो और यह माना जाए कि उसने जान-बूझकर दुःख पहुँचाया है, तभी क्रोध आएगा। लेकिन भय के लिए कारण का पता होना जरूरी नहीं है, बस इतना पता होना काफी है कि दुःख या हानि होगी। यह हमें किसी खतरे से बचाने का प्राकृतिक तरीका है।
विशेष-
(i) भय क्या है, यह स्पष्ट किया गया है।
(ii) आने वाले दुःख के विचार से क्रोध तथा भय नामक मनोविकार उत्पन्न होते हैं। दोनों के उत्पन्न होने की स्थिति पर विचार किया गया है।
(iii) भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त है और गंभीर है।
(iv) शैली विचार-विश्लेषणात्मक है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि भय वह भावना है जब हमें किसी खतरे का अहसास होता है और हम डर जाते हैं। क्रोध तब आता है जब दुःख का कारण पता हो, पर भय के लिए बस खतरे का आभास ही काफी है।
🎯 Exam Tip: गद्यांश की व्याख्या करते समय, मुख्य मनोविकारों (भय, क्रोध) की परिभाषा और उनके बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
Question 2. भय का विषय दो रूपों में सामने आता है-असाध्य रूप में और साध्य रूप में। असाध्य विषय वह है जिसका किसी प्रयत्न द्वारा निवारण असम्भव हो या असम्भव समझ पड़े। साध्य विषय वह है जो प्रयत्न द्वारा दूर किया या रखा जा सकता हो। दो मनुष्य एक पहाड़ी नदी के किनारे बैठे या आनन्द से बातचीत करते चले जा रहे थे। इतने में सामने से शेर की देहाड़ सुनाई पड़ी। यदि वे दोनों उठकर भागने, छिपने या पेड़ पर चढ़ने आदि का प्रयत्न करें तो बच सकते हैं। विषय के सा य या असाध्य होने की धारणा परिस्थिति की विशेषता के अनुसार तो होती ही है पर बहुत कुछ मनुष्य की प्रकृति पर भी अवलम्बित रहती है। क्लेश के कारण का ज्ञान होने पर उसकी अनिवार्यता का निश्चय अपनी विवशता या अक्षमता की अनुभूति के कारण होता है। यदि यह अनुभूति कठिनाइयों और आपत्तियों को दूर करने के अनभ्यास या साहस के अभाव के कारण होती है, तो मनुष्य स्तम्भित हो जाता है और उसके हाथ-पाँव नहीं हिल सकते। पर कड़े दिल का या साहसी आदमी पहले तो जल्दी डरता नहीं और डरता भी है तो सँभलकर अपने बचाव के उद्योग में लग जाता है। (पृष्ठ संख्या 37)
Answer:
कठिन शब्दार्थ- विषय = कारण (व्यक्ति, घटना आदि)। असाध्य = कठिन, प्रयत्न करके भी जिसका निवारण न हो सके, अनिवार्य। साध्य = निवारणीय, प्रयत्न करने से जिसका निदान संभव हो। धारणा = विचार, विश्वास। प्रकृति = स्वभाव। अवलम्बित = निर्भर। क्लेश = दुःख, कष्ट। विवशता = बाध्यता। अक्षमता = शक्तिहीनता। अनभ्यास = अभ्यास न होना। स्तम्भित = निष्क्रिय। उद्योग = काम।
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'भय' नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। किसी आने वाले दुःख के कारण का सामना होने पर मन में जो तीव्र भावना उत्पन्न होती है, उसको भय कहते हैं। यह दुःख से बचने के लिए प्रेरित करता है। भय के लिए उसका कारण जानना जरूरी नहीं होता।
व्याख्या- लेखक 'भय' नामक मनोविकार के बारे में बताते हैं कि भय दो प्रकार का होता है। एक वह जिससे प्रयास करके बचा जा सकता है, उसे साध्य भय कहते हैं। दूसरा वह जो असाध्य होता है, जिससे प्रयास करने पर भी छुटकारा नहीं मिल पाता, क्योंकि यह अनिवार्य होता है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण दिया गया है: दो लोग पहाड़ी नदी के किनारे बैठे बातें कर रहे थे, तभी उन्हें शेर की दहाड़ सुनाई दी। अगर वे भागने, छिपने या पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करें, तो बच सकते हैं – यह साध्य भय है। भय का साध्य या असाध्य होना परिस्थिति और इंसान के स्वभाव पर निर्भर करता है। जब किसी दुःख का पता चलने पर मनुष्य खुद को कमजोर महसूस करता है और उसे लगता है कि वह उससे बच नहीं सकता, तो यह भय अनिवार्य हो जाता है। अगर यह कमजोरी और मुसीबतों का सामना न करने के कारण है, तो मनुष्य स्तब्ध हो जाता है और उसके हाथ-पैर भी नहीं हिलते। लेकिन साहसी व्यक्ति तुरंत डरते नहीं और डरते भी हैं तो अपने बचाव के लिए तुरंत उपाय करने लगते हैं। यह समझना जरूरी है कि हर समस्या का समाधान होता है, बस हमें उसे खोजने का साहस चाहिए।
In simple words: भय दो तरह का होता है - साध्य (जिससे बचा जा सकता है) और असाध्य (जिससे बचा नहीं जा सकता)। यह इंसान के स्वभाव पर निर्भर करता है। साहसी लोग बचाव के उपाय करते हैं, जबकि कमजोर लोग स्तब्ध हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: साध्य और असाध्य भय की परिभाषा देते समय, उन्हें समझने के लिए उदाहरणों का प्रयोग करें और मनुष्य की प्रतिक्रिया को स्पष्ट करें।
Question 3. भय जब स्वभावगत हो जाता है तब कायरता या भीरुता कहलाता है और भारी दोष माना जाता है, विशेषतः पुरुषों में। स्त्रियों की भीरुता तो उनकी लज्जा के समान ही रसिकों के मनोरंजन की वस्तु रही है। पुरुषों की भीरुता की पूरी निंदा होती है। ऐसा जान पड़ता है कि पुराने जमाने से पुरुषों ने न डरने का ठेका ले रखा है। भीरुता के संयोजक अवयवों में क्लेश सहने की आवश्यकता और उसकी शक्ति का अविश्वास प्रधान है। शत्रु का सामना करने से भागने का अभिप्राय यही होता है कि भागने वाला शारीरिक पीड़ा नहीं सह सकता तभी अपनी शक्ति के द्वारा उस पीड़ा से अपनी शक्ति का विश्वास नहीं रखता। (पृष्ठ संख्या 37)
Answer:
कठिन शब्दार्थ- स्वभावगत होना = आदत बनना। भीरुता = डरपोकपन। कायरता = साहसहीनता, कापुरुषता। निंदा = बुराई। अवयव = अंग।
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'भय' नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। लेखक ने बताया है कि भय साध्य और असाध्य दो प्रकार का होता है। साहसी पुरुष डरते नहीं हैं और अगर डरते भी हैं तो तुरंत उससे निकलने का उपाय ढूंढते हैं।
व्याख्या- लेखक का मानना है कि जब भय इंसान की आदत बन जाता है, तो उसे कायरता या भीरुता कहते हैं और इसे एक बड़ा दोष माना जाता है, खासकर पुरुषों में। स्त्रियाँ भी डरपोक होती हैं, लेकिन उनकी भीरुता को उनकी शर्म की तरह ही सुंदर माना जाता है और यह रसिकों के मनोरंजन का विषय होती है। हालाँकि, पुरुषों की भीरुता की कड़ी निंदा की जाती है। ऐसा लगता है जैसे पुराने समय से पुरुषों ने न डरने की जिम्मेदारी ले रखी है। भीरुता के मुख्य कारणों में दुःख सहने की क्षमता की कमी और अपनी ताकत पर अविश्वास शामिल हैं। जब कोई दुश्मन का सामना करने की बजाय भाग जाता है, तो इसका मतलब है कि वह शारीरिक कष्ट सह नहीं सकता और उसे अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं है कि वह उस कष्ट से बच पाएगा। असल में, आत्म-विश्वास की कमी ही कायरता की जड़ होती है।
विशेष-
(i) जब डरपोकपन स्वभाव का हिस्सा बन जाता है तो उसे कायरता या भीरुता कहते हैं।
(ii) पुरुषों की भीरुता निंदनीय होती है, लेकिन स्त्रियों की भीरुता रसिकों के मनोरंजन का विषय है।
(iii) भाषा साहित्यिक, गंभीर और प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विचार-विवेचनात्मक है। "ऐसा जान पड़ता है...........ठेका ले रखा है" में व्यंग्य-विनोद शैली है।
In simple words: जब डरना किसी की आदत बन जाए तो उसे कायरता या भीरुता कहते हैं। पुरुषों में यह बुरा मानी जाती है, जबकि स्त्रियों में इसे अलग तरह से देखा जाता है। भागने का मतलब है कि इंसान में दर्द सहने की हिम्मत नहीं है और उसे अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं है।
🎯 Exam Tip: भीरुता और कायरता के सामाजिक दृष्टिकोण को समझाते हुए, स्त्री और पुरुष में इसके भिन्न प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 4. एक ही प्रकार की भीरुता ऐसी दिखाई पड़ती है जिसकी प्रशंसा होती है। वह धर्म-भीरुता है। पर हमे तो उसे भी कोई बड़ी प्रशंसा की बात नहीं समझते। धर्म से डरने वालों की अपेक्षा धर्म की ओर आकर्षित होने वाले हमें अधिक धन्य जान पड़ते हैं। जो किसी बुराई से यही समझकर पीछे हटते हैं कि उसके करने से अधर्म होगा, उसकी अपेक्षा वे कहीं श्रेष्ठ हैं जिन्हें बुराई अच्छी ही नहीं लगती। (पृष्ठ संख्या 38)
Answer:
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'भय' नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। लेखक ने भीरुता के अलग-अलग रूपों पर विचार किया है, जिसमें धर्म-भीरुता भी शामिल है।
व्याख्या- लेखक कहते हैं कि भीरुता का एक ही प्रकार ऐसा है जिसकी प्रशंसा की जाती है, वह है 'धर्म-भीरुता', यानी धर्म से डरना। हालाँकि, लेखक इसे बहुत ज्यादा प्रशंसनीय नहीं मानते। उनकी दृष्टि में धर्म से डरने वाले लोगों की बजाय वे लोग ज्यादा अच्छे हैं जो धर्म के प्रति आकर्षित होते हैं और धर्म का पालन करते हैं। जो लोग किसी बुराई से यह सोचकर दूर रहते हैं कि यह अधर्म है, उनकी तुलना में वे लोग अधिक श्रेष्ठ हैं जिन्हें वह बुराई स्वाभाविक रूप से ही अच्छी नहीं लगती। असल में, नैतिक मूल्यों का पालन डर से नहीं, बल्कि आंतरिक समझ और प्रेम से होना चाहिए।
विशेष-
(i) संसार में धर्म-भीरुता की प्रशंसा होती है, लेकिन लेखक के अनुसार यह ठीक बात नहीं है।
(ii) लेखक का मत है कि धर्म से डरना नहीं बल्कि धर्म की ओर आकर्षित होना अच्छी बात है।
(iii) भाषा सरल और विषय के अनुकूल है।
(iv) शैली विवेचनात्मक है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि 'धर्म-भीरुता' (धर्म से डरना) ही एकमात्र ऐसा डर है जिसकी लोग तारीफ करते हैं। पर लेखक इसे ज्यादा अच्छा नहीं मानते। वे कहते हैं कि धर्म से डरने की बजाय, जो लोग धर्म को मानते हैं और बुरे काम नहीं करते, वे ज्यादा श्रेष्ठ हैं।
🎯 Exam Tip: धर्म-भीरुता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए, लेखक के मत को तार्किक रूप से समझाएँ और अपने विश्लेषण को प्रस्तुत करें।
Question 5. पर सभ्य, उन्नत और विस्तृत समाज में भय के द्वारा स्थायी रक्षा की उतनी सम्भावना नहीं होती। इसी से जंगली और असभ्य जातियों में भय अधिक होता है। जिससे वे भयभीत हो सकते हैं। उसी को वे श्रेष्ठ मानते हैं और उसी की स्तुति करते हैं। उसके देवी-देवता भय के प्रभाव से ही कल्पित होते हैं। किसी आपत्ति या दुःख से बचे रहने के लिए ही अधिकतर वे उसकी पूजा करते हैं। अति भय और भय कारक का सम्मान असभ्यता के लक्षण हैं। अशिक्षित होने के कारण अधिकांश भारतवासी भी भय के उपासक हो गए हैं। वे जितना सम्मान एक थानेदार का करते हैं, उतना किसी विद्वान का नहीं। (पृष्ठ संख्या 38-39)
Answer:
कठिन शब्दार्थ- उन्नत = प्रगतिशील, ऊँचा। स्तुति = प्रशंसा। कल्पित = कल्पना द्वारा निर्मित। भय कारक = भय पैदा करने वाला। लक्षण = चिन्ह। उपासक = पुजारी।
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'भय' नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। जंगली लोगों में भय अधिक पाया जाता है और उनका परिचय कुछ ही लोगों से होता है। वे किसी अपरिचित द्वारा हमला होने पर उससे बचकर और भागकर अपनी रक्षा करते हैं, परंतु सभ्य समाज में ऐसा नहीं होता।
व्याख्या- लेखक कहते हैं कि विकसित, प्रगतिशील और विस्तृत समाज में भय के द्वारा स्थायी सुरक्षा की उतनी संभावना नहीं होती। इसी कारण जंगली और असभ्य जातियों में भय अधिक होता है। वे जिससे डरते हैं, उसी को श्रेष्ठ मानते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। उनके देवी-देवता भी भय के प्रभाव से ही कल्पित होते हैं। किसी मुसीबत या दुःख से बचे रहने के लिए ही ज्यादातर लोग उसकी पूजा करते हैं। बहुत ज्यादा भयभीत होना और भय पैदा करने वाले का सम्मान करना असभ्यता की निशानी है। अशिक्षित होने के कारण अधिकतर भारतीय भी भय के उपासक बन गए हैं। वे एक थानेदार का जितना सम्मान करते हैं, उतना किसी विद्वान व्यक्ति का नहीं करते। यह दर्शाता है कि शिक्षा और जागरूकता भय को कम कर सकती है।
विशेष-
(i) लेखक का मानना है कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति को सुखी और निर्भय रहने का अधिकार है। परंतु ये दोनों चीजें बिना प्रयास के मिलना असंभव है।
(ii) विश्व को भयमुक्त रखने के लिए आवश्यक है कि हम किसी को डराएँ नहीं। जो दुष्ट व्यक्ति कहने से न मानें, उनमें दंड का भय पैदा किया जाए।
(iii) भाषा बोधगम्य, साहित्यिक गंभीर है।
(iv) शैली विचारात्मक तथा विवेचनात्मक है।
In simple words: सभ्य समाज में डर से हमेशा सुरक्षा नहीं मिलती, इसलिए जंगली लोगों में डर ज्यादा होता है। वे डरने वालों को ही सबसे अच्छा मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। अशिक्षित लोग भी डरने वालों का ज्यादा सम्मान करते हैं, जैसे थानेदार का।
🎯 Exam Tip: सभ्यता के विकास और भय के संबंध को समझाएँ, साथ ही इस बात पर जोर दें कि अशिक्षा कैसे भय को बढ़ावा देती है।
Question 7. सभ्यता की वर्तमान स्थिति में एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से वैसा भय तो नहीं रहा जैसा पहले रहा करता था, पर एक जाति को दूसरी जाति से, एक देश को दूसरे देश से, भय के स्थायी कारण प्रतिष्ठित हो गए हैं। सबल और सबल देशों के बीच अर्थ-संघर्ष की, सबल और निर्बल देशों के बीच अर्थ-शोषण की प्रक्रिया अनवरत चल रही है; एक क्षण का विराम नहीं है। इस सार्वभौम वणिग्वृत्ति से
Answer:
कठिन शब्दार्थ- कमाना। अनर्थ = हानि। क्षात्रवृत्ति = क्षत्रिय अर्थात् शासन का कर्तव्य, शासन द्वारा शोषण तथा अत्याचार रोकना। लक्ष्य = उद्देश्य। विलक्षण = अनोखा। अर्थोन्माद = आर्थिक पागलपन, धन कमाने के उचित-अनुचित तरीके अपनाना। शासन = नियन्त्रण। प्रतिष्ठा = स्थापना, सम्मान।
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'भय' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध निबंधकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। सभ्यता के विकास से समाज में भय कम हो गया है। भय का रूप बदल गया है। आज कोई व्यक्ति किसी को सीधे तरीके से दुःख नहीं देता। दुःख देने के गुप्त तरीके विकसित हो गए हैं। एक देश दूसरे पर हमला तो नहीं करता, बल्कि व्यापार के माध्यम से शोषण करता है। समाज में भी एक वर्ग दूसरे का शोषण करता है।
व्याख्या- लेखक बताते हैं कि संसार में सभ्यता का तेजी से विकास हुआ है। इस कारण एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से पहले जैसा डर नहीं रहा। परंतु संसार में अब भी एक जाति दूसरी जाति को, एक देश दूसरे देश को सताता और डराता है। पूरे विश्व में एक देश को दूसरे देश और एक जाति को दूसरी जाति से डराने के स्थायी कारण बन गए हैं। दो ताकतवर देशों में कड़ी आर्थिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। एक शक्तिशाली देश दूसरे कमजोर देश का व्यापार जैसे आर्थिक तरीकों से शोषण करता है। ये बातें संसार में लगातार चल रही हैं और इनसे क्षण भर की भी मुक्ति नहीं मिलती। व्यापार द्वारा लाभ कमाने की यह प्रवृत्ति विश्वव्यापी हो चुकी है। ऐसे नियम बनाए गए हैं कि गरीब और अविकसित देश ताकतवर और अमीर देशों के आर्थिक शोषण से बच नहीं पाते। इस व्यापारिक प्रवृत्ति के साथ देशों की सरकारें भी शामिल हो गई हैं। आर्थिक क्रियाओं द्वारा शोषण का लक्ष्य तय हो गया है। शासन सत्ता और व्यापारी वर्ग यानी पूँजीपति वर्ग का उद्देश्य एक ही हो गया है। विश्व में यह जो आर्थिक पागलपन फैला है। व्यक्ति और देश धन के पीछे नैतिकता आदि को छोड़कर भाग रहे हैं। इस पर नियंत्रण कठोर और पवित्र शासन व्यवस्था द्वारा ही हो सकता है। क्षत्रिय धर्म यानी प्रशासन के उच्च आदर्श को बनाए रखने से ही संसार को पूँजीवादी शोषण से बचाया जा सकता है।
विशेष-
(i) लेखक का कहना है कि संसार में एक देश दूसरे देश का व्यापार आदि आर्थिक क्रियाओं से शोषण कर रहा है। देशों की शासन सत्ता भी आर्थिक शोषण में उनकी साझीदार है तथा उनको संरक्षण प्रदान करती है।
(ii) संसार में धन-सत्ता अत्यंत प्रबल है। लोग तथा देश धन के पीछे पागल हो रहे हैं। नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
(iii) भाषा तत्सम शब्द प्रधान, प्रवाहपूर्ण तथा साहित्यिक है।
(iv) शैली विचारात्मक तथा विवेचनात्मक है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि अब लोग सीधे-सीधे नहीं डरते, बल्कि एक देश दूसरे देश का व्यापार से शोषण करता है। शक्तिशाली देश कमजोर देशों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचाते हैं। सरकारें भी इस शोषण में शामिल हैं। इस 'आर्थिक पागलपन' को रोकने के लिए सही शासन जरूरी है।
🎯 Exam Tip: इस गद्यांश की व्याख्या में, आधुनिक समाज में भय के बदलते स्वरूप, आर्थिक शोषण और शासन की भूमिका पर प्रकाश डालें।
Question 8. जिस प्रकार सुखी होने का प्रत्येक प्राणी को अधिकार है, उसी प्रकार मुक्तातंक होने का भी। पर कर्म-क्षेत्र के चक्रव्यूह में पड़कर जिस प्रकार सुखी होना प्रयत्न-साध्य होता है उसी प्रकार निर्भय रहना भी। निर्भयता के सम्पादन के लिए दो बातें अपेक्षित हैं-पहली तो यह कि दूसरों के हमसे किसी प्रकार का भय या कष्ट न हो; दूसरी यह कि हमको कष्ट या भय पहुँचाने का साहस न कर सके। इनमें से एक का सम्बन्ध उत्कृष्ट शील से है और दूसरी का शक्ति और पुरुषार्थ से। इस संसार में किसी को न डराने से ही डरने की सम्भावना दूर नहीं हो सकती। साधु से साधु प्रकृति वाले को क्रूर लोभियों से क्लेश पहुँचता है। अतः उसके प्रयत्नों को विफल या भय-संचार द्वारा रोकने की आवश्यकता से हम बच नहीं सकते। (पृष्ठ संख्या 40)
Answer:
सन्दर्भ व प्रसंग- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबंध 'भय' से लिया गया है। शुक्ल जी कहते हैं कि आज भी एक व्यक्ति दूसरे को और एक देश दूसरे देश को डराता है। केवल डराने के तरीके बदल गए हैं। आजकल व्यापार जैसे आर्थिक तरीके शोषण का साधन बन गए हैं। देशों की सरकारें इस आर्थिक शोषण को बढ़ावा देती हैं। पूरी दुनिया में आतंक फैला हुआ है।
व्याख्या- लेखक कहते हैं कि संसार में हर प्राणी को सुखी रहने का अधिकार है। उसी तरह उसे डर से मुक्त रहने का भी अधिकार है। लेकिन संसार में लोगों के काम करने के तरीके इतने जटिल हो गए हैं कि इसमें फँसकर सुख पाना बहुत मुश्किल हो गया है। उसी तरह बिना कोशिश के कोई निर्भय नहीं रह सकता। संसार में कष्टों और भय का माहौल बना हुआ है। निर्भय रहने के लिए दो बातों का होना जरूरी है। पहली बात यह कि दूसरों को हमसे किसी तरह का डर या कष्ट न हो। हम किसी को कष्ट न दें और न ही डराएँ। दूसरी बात यह कि किसी में इतना साहस न हो कि वह हमें डरा सके। इनमें से पहली बात अच्छे व्यवहार (शील) से जुड़ी है। अगर हम शिष्ट और सुसंस्कृत होंगे तो किसी को डराएँगे नहीं और न ही कष्ट देंगे। दूसरी बात शक्ति और पराक्रम से जुड़ी है। शक्ति का प्रयोग करके दूसरों को डराने और कष्ट देने वालों को रोका जा सकता है। संसार में डराने और डरने की समस्या बनी हुई है। निर्दयी और लालची लोग सज्जन पुरुषों को डराते ही हैं, क्योंकि यह उनका स्वभाव होता है। उन्हें रोकने के लिए दंड का भय पैदा करना जरूरी है। असल में, आत्मरक्षा के लिए दूसरों को डराना नहीं, बल्कि खुद को मजबूत बनाना महत्वपूर्ण है।
विशेष-
(i) लेखक का मानना है कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति को सुखी और निर्भय रहने का अधिकार है। परंतु ये दोनों चीजें बिना प्रयास के मिलना असंभव है।
(ii) विश्व को भयमुक्त रखने के लिए आवश्यक है कि हम किसी को डराएँ नहीं। जो दुष्ट व्यक्ति कहने से न मानें, उनमें दंड का भय पैदा किया जाए।
(iii) भाषा बोधगम्य, साहित्यिक गंभीर है।
(iv) शैली विचारात्मक तथा विवेचनात्मक है।
In simple words: हर इंसान को सुखी और निडर रहने का हक है, पर यह मुश्किल है। निडर रहने के लिए हमें न दूसरों को डराना चाहिए और न किसी को हमें डराने देना चाहिए। इसके लिए अच्छा व्यवहार और ताकत दोनों जरूरी हैं।
🎯 Exam Tip: निर्भयता प्राप्त करने के लिए शील (अच्छा व्यवहार) और शक्ति (पुरुषार्थ) दोनों की भूमिका को स्पष्ट करें, और उदाहरणों से समझाएँ कि दुष्टों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।
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