RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजक यौगिक

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Detailed Chapter 9 उपसहसंयोजक यौगिक RBSE Solutions for Class 12 Chemistry

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Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजक यौगिक RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 9 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 9 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. K3[Fe(CN)6] में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था है –
(अ) 2
(ब) 3
(स) 0
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
Answer: (ब) 3
In simple words: इस यौगिक में, आयरन (Fe) की ऑक्सीकरण अवस्था +3 होती है। इसे CN- लिगेंड और K+ आयनों की ज्ञात ऑक्सीकरण अवस्थाओं का उपयोग करके निकाला जा सकता है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात करने के लिए, केंद्रीय धातु परमाणु को 'x' मानें और लिगेंड व बाहरी आयनों की ज्ञात ऑक्सीकरण अवस्थाओं को जोड़कर यौगिक के कुल आवेश के बराबर रखें।

 

प्रश्न 2. समचतुष्फलकीय ज्यामिति वाला यौगिक है –
(अ) [Ni(CN)2]2-
(ब) [NiCl4]2-
(स) 4
(द) 5
Answer: (ब) [NiCl4]2-
In simple words: [NiCl4]2- यौगिक में परमाणु समचतुष्फलक के आकार में व्यवस्थित होते हैं। यह तब होता है जब केंद्रीय धातु आयन sp³ संकरण दिखाता है।

🎯 Exam Tip: समचतुष्फलकीय ज्यामिति तब बनती है जब केंद्रीय परमाणु का sp³ संकरण होता है और चार लिगेंड जुड़े होते हैं, जैसे [NiCl4]2-. मजबूत लिगेंड वाले dsp² संकरण वाले कॉम्प्लेक्स वर्ग समतलीय ज्यामिति दिखाते हैं।

 

प्रश्न 4. [Pt(NH3)2CI2] के ज्यामितीय समावयवियों की संख्या है -
(अ) 3
(ब) 2
(स) 4
(द) 1
Answer: (ब) 2
In simple words: इस यौगिक के दो ज्यामितीय समावयवी होते हैं: सिस (cis) और ट्रांस (trans)। सिस-समावयवी में समान लिगेंड एक-दूसरे के पास होते हैं, जबकि ट्रांस-समावयवी में वे एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

🎯 Exam Tip: वर्ग समतलीय कॉम्प्लेक्स जैसे \( MA_2B_2 \) (जैसे \( [Pt(NH_3)_2Cl_2] \)) में हमेशा दो ज्यामितीय समावयवी होते हैं: एक सिस-फॉर्म और एक ट्रांस-फॉर्म।

 

प्रश्न 5. एक संकुल यौगिक जो नाइट्रेट व क्लोराइड लिगैण्ड से बना है। AgNO3 के साथ दो मोल AgCl अवक्षेप देता है। इसका सूत्र होगा –
(अ) [Co(NH3)5NO3]CI2
(ब) [Co(NH3)5CI]NO3CI
(स) [Co(NH3)5cl] NO3
(द) उपर्युक्त में कोई नहीं
Answer: (अ) [Co(NH3)5NO3]CI2
In simple words: यदि कॉम्प्लेक्स AgNO3 के साथ दो मोल AgCl अवक्षेप देता है, तो इसका मतलब है कि यौगिक में दो क्लोराइड आयन उपसहसंयोजन मंडल के बाहर हैं। केवल विकल्प (अ) इस शर्त को पूरा करता है।

🎯 Exam Tip: किसी कॉम्प्लेक्स की संरचना को समझने के लिए, हमेशा बाहरी आयनों की संख्या पर ध्यान दें, क्योंकि वे ही होते हैं जो अवक्षेपण परीक्षणों में भाग लेते हैं।

 

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा यौगिक प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करता है?
(अ) [Co(CN)6]3+
(ब) [ZnCl4]2-
(स) [Co(en)2 Cl2]
(द) [Cu(NH3)4]2+
Answer: (स) [Co(en)2 Cl2]
In simple words: [Co(en)2 Cl2] प्रकाशिक समावयवता दिखाता है, जिसका मतलब है कि इसके दर्पण प्रतिबिंब को इस पर सुपरइंपोज नहीं किया जा सकता। यह आमतौर पर ऑक्टाहेड्रल कॉम्प्लेक्स में होता है जिसमें असममित लिगेंड या विशिष्ट ज्यामिति होती है।

🎯 Exam Tip: प्रकाशिक समावयवता उन यौगिकों द्वारा प्रदर्शित की जाती है जिनमें चिरैलिटी होती है, यानी जो अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते। ऑक्टाहेड्रल कॉम्प्लेक्स में, द्विदंतुक लिगेंड की उपस्थिति से अक्सर चिरैलिटी उत्पन्न होती है।

 

प्रश्न 7. [Ni(CO)4) में पाया जाने वाला संकरण है –
(अ) sp
(ब) sp2
(स) dsp2
(द) sp³
Answer: (द) sp³
In simple words: [Ni(CO)4] में, निकल (Ni) धातु sp³ संकरण दिखाता है। इसका मतलब है कि यह चार बॉन्ड बनाता है जो एक समचतुष्फलकीय आकार में व्यवस्थित होते हैं।

🎯 Exam Tip: संकरण का प्रकार केंद्रीय धातु परमाणु और लिगेंड की प्रकृति पर निर्भर करता है। CO एक मजबूत क्षेत्र लिगेंड है, लेकिन Ni(0) में d-ऑर्बिटल में इलेक्ट्रॉन होते हैं जो sp³ संकरण को बढ़ावा देते हैं, जिससे एक समचतुष्फलकीय संरचना बनती है।

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 9 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. संकुल यौगिक K3[Fe(C2O4)3] में केन्द्रीय धातु परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या एवं उपसहसंयोजन संख्या लिखिए।
Answer: K3[Fe(C2O4)3] में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था और उपसहसंयोजन संख्या इस प्रकार हैं:
पहले, हम यौगिक को आयनों में तोड़ते हैं:
\( K_3[Fe(C_2O_4)_3] \rightarrow 3K^+ + [Fe(C_2O_4)_3]^{3-} \)
अब, केंद्रीय Fe परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था 'x' मान लेते हैं। ऑक्सालेट (\( C_2O_4^{2-} \)) एक द्विदंतुक लिगेंड है और इस पर -2 का आवेश होता है। कॉम्प्लेक्स आयन पर कुल आवेश -3 है।
इसलिए, हम समीकरण को ऐसे लिख सकते हैं:
\( x + 3 \times (-2) = -3 \)
\( x - 6 = -3 \)
\( x = +6 - 3 \)
\( x = +3 \)
अतः, Fe की ऑक्सीकरण अवस्था \( +3 \) है।
उपसहसंयोजन संख्या के लिए, ऑक्सालेट एक द्विदंतुक लिगेंड है, जिसका मतलब है कि प्रत्येक ऑक्सालेट लिगेंड दो बंध बनाता है। क्योंकि तीन ऑक्सालेट लिगेंड जुड़े हुए हैं, कुल बंधों की संख्या \( 3 \times 2 = 6 \) होगी। इसलिए, उपसहसंयोजन संख्या 6 है। यह बताता है कि आयरन परमाणु से सीधे छह बंध जुड़े हैं।
In simple words: इस यौगिक में, आयरन (Fe) की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है। यह यौगिक में ऑक्सालेट लिगेंड और कुल आवेश से पता चलता है। उपसहसंयोजन संख्या 6 है क्योंकि तीन ऑक्सालेट लिगेंड जुड़े हुए हैं और प्रत्येक लिगेंड दो बंध बनाता है।

🎯 Exam Tip: उपसहसंयोजन संख्या की गणना करते समय, लिगेंड की दंतुकता (denticity) पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। द्विदंतुक लिगेंड दो बंध बनाते हैं, त्रिदंतुक तीन, आदि।

 

प्रश्न 2. जल की कठोरता के निर्धारण के लिए आवश्यक लिगैण्ड का नाम लिखिए।
Answer: जल की कठोरता के निर्धारण के लिए आवश्यक लिगेंड EDTA-4 (एथिलीनडाइऐमीनटेट्राऐसीटेट) है। यह एक हेक्सादंतुक लिगेंड है जो कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों के साथ स्थायी कॉम्प्लेक्स बनाता है, जो जल की कठोरता के लिए जिम्मेदार होते हैं।
In simple words: EDTA-4 का उपयोग जल की कठोरता को मापने के लिए किया जाता है क्योंकि यह कठोरता पैदा करने वाले तत्वों से जुड़ जाता है।

🎯 Exam Tip: EDTA-4 एक महत्वपूर्ण चेलेटिंग एजेंट है जिसका उपयोग न केवल जल की कठोरता के निर्धारण में बल्कि धातु आयनों के अनुमापन (titration) और विषाक्तता उपचार में भी किया जाता है।

 

प्रश्न 3. Li[AIH4] का IUPAC नाम लिखिए।
Answer: Li[AlH4] का IUPAC नाम लिथियम टेट्राहाइड्रिडोऐलुमिनेट(III) है। इसमें लिथियम एक बाहरी आयन है और ऐलुमिनियम केंद्रीय धातु परमाणु है, जिसके साथ चार हाइड्राइड लिगेंड जुड़े हुए हैं। ऐलुमिनियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
In simple words: इस रसायन का नाम 'लिथियम टेट्राहाइड्रिडोऐलुमिनेट(III)' है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में, केंद्रीय धातु परमाणु के नाम के बाद उसकी ऑक्सीकरण अवस्था को रोमन अंकों में कोष्ठक में लिखा जाता है। यदि कॉम्प्लेक्स आयन ऋणात्मक है, तो धातु के नाम के अंत में '-एट' प्रत्यय जोड़ा जाता है।

 

प्रश्न 5. Ni+2 आयन को चुम्बकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
Answer: Ni+2 आयन का चुम्बकीय आघूर्ण ज्ञात करने के लिए, पहले निकल के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को देखें।
निकल (Ni) का परमाणु क्रमांक 28 होता है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( [Ar] 3d^8 4s^2 \) है।
जब यह \( Ni^{2+} \) आयन बनाता है, तो यह अपने 4s कक्षक से 2 इलेक्ट्रॉन खो देता है।
तो, \( Ni^{2+} \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( [Ar] 3d^8 4s^0 \) हो जाता है।
अब, 3d कक्षक में इलेक्ट्रॉनों का वितरण देखें:
3d कक्षक में 5 ऑर्बिटल्स होते हैं। 8 इलेक्ट्रॉनों को भरने पर, हमारे पास 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बचते हैं।
\( 3d^8 \): \( \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow \uparrow \)
यहां, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या \( n = 2 \) है।
चुम्बकीय आघूर्ण (µ) का सूत्र है: \( \mu = \sqrt{n(n+2)} \) बोर मैग्नेटॉन (BM) में।
यहां, \( n = 2 \).
\( \mu = \sqrt{2(2+2)} \)
\( \mu = \sqrt{2 \times 4} \)
\( \mu = \sqrt{8} \)
\( \mu \approx 2.83 \, BM \)
इसलिए, \( Ni^{2+} \) आयन का चुम्बकीय आघूर्ण लगभग 2.83 BM है। यह इंगित करता है कि \( Ni^{2+} \) अनुचुंबकीय (paramagnetic) है।
In simple words: \( Ni^{2+} \) में दो इलेक्ट्रॉन अकेले रहते हैं। इसका चुम्बकीय आघूर्ण लगभग 2.83 BM होता है।

🎯 Exam Tip: चुम्बकीय आघूर्ण की गणना करते समय, हमेशा पहले धातु आयन के सटीक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को निर्धारित करें और फिर अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की पहचान करें।

 

प्रश्न 6. [Mn2(CO)10] का IUPAC नाम लिखिए।
Answer: [Mn2(CO)10] का IUPAC नाम डिकार्बोनिल डाइमैंगनीज(0) है। यहां, दो मैंगनीज परमाणु 10 कार्बोनिल लिगेंड से जुड़े हैं, और मैंगनीज की ऑक्सीकरण अवस्था 0 है। इस प्रकार के जटिल यौगिकों को मेटल कार्बोनिल कहा जाता है।
In simple words: [Mn2(CO)10] को डिकार्बोनिल डाइमैंगनीज(0) कहते हैं।

🎯 Exam Tip: धातु कार्बोनिल में, धातु की ऑक्सीकरण अवस्था अक्सर शून्य होती है। जब एक से अधिक धातु परमाणु होते हैं, तो धातु के नाम से पहले उपयुक्त उपसर्ग (जैसे डाइ-, ट्राई-) का उपयोग किया जाता है।

 

प्रश्न 7. उभयदंती लिगैण्ड का एक उदाहरण लेकर बताइए कि यह क्यों उभयदंती लिगैण्ड कहलाता है?
Answer: उभयदंती लिगेंड वे एकदंतुक लिगेंड होते हैं जिनमें दो या दो से अधिक दाता परमाणु होते हैं, लेकिन किसी दिए गए समय पर केवल एक ही दाता परमाणु केंद्रीय धातु आयन के साथ बंध बनाता है।
उदाहरण के लिए: सायनाइड लिगेंड (CN-) एक उभयदंती लिगेंड है।
इस लिगेंड में, कार्बन (C) और नाइट्रोजन (N) दोनों परमाणु के पास इलेक्ट्रॉन युग्म होता है जिसे वे दान कर सकते हैं।
यह केंद्रीय धातु आयन से या तो कार्बन परमाणु (जैसे M-CN) के माध्यम से या नाइट्रोजन परमाणु (जैसे M-NC) के माध्यम से जुड़ सकता है। यह दर्शाता है कि इसमें दो अलग-अलग दाता स्थल हैं। यह सुविधा इसे एक ही लिगेंड के साथ विभिन्न बंध बनाने की अनुमति देती है, जिससे आइसोमेरिज्म उत्पन्न होता है।
In simple words: उभयदंती लिगेंड वह होता है जिसमें दो अलग-अलग परमाणु होते हैं जो धातु से जुड़ सकते हैं, लेकिन एक समय में केवल एक ही जुड़ता है। CN- एक उदाहरण है, जो कार्बन या नाइट्रोजन से जुड़ सकता है।

🎯 Exam Tip: उभयदंती लिगेंड आयन को एक से अधिक परमाणु से जोड़ने की क्षमता होती है, जिसके परिणामस्वरूप लिंकेज समावयवता (linkage isomerism) होती है। नाइट्राइट (\( NO_2^- \)) और थायोसायनेट (\( SCN^- \)) अन्य सामान्य उदाहरण हैं।

 

प्रश्न 8. निम्नलिखित लिगैंडों को एकदंतुक, द्विदंतुक..... आदि में वर्गीकरण कीजिए।
(i) en
(ii) CN-
(iii) द्विदंतुक
(iv) द्विदंतुक।
Answer: यहां दिए गए लिगेंडों का वर्गीकरण उनकी दंतुकता (denticity) के आधार पर किया गया है, जो यह बताती है कि एक लिगेंड केंद्रीय धातु आयन से कितने दाता परमाणुओं के माध्यम से जुड़ सकता है।
(i) en (एथिलीनडाइऐमीन) - यह एक द्विदंतुक लिगेंड है। इसमें दो नाइट्रोजन परमाणु होते हैं जो केंद्रीय धातु आयन को इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर सकते हैं।
(ii) CN- (सायनाइड) - यह एक एकदंतुक लिगेंड है। यह या तो कार्बन परमाणु या नाइट्रोजन परमाणु के माध्यम से केंद्रीय धातु आयन से जुड़ता है, लेकिन एक समय में केवल एक ही दाता परमाणु बंध बनाता है।
(iii) द्विदंतुक (यह शायद किसी अन्य लिगेंड के लिए एक सामान्य वर्गीकरण है) - इसका अर्थ है कि लिगेंड केंद्रीय धातु आयन के साथ दो दाता परमाणुओं के माध्यम से बंध बनाता है।
(iv) द्विदंतुक (यह भी किसी अन्य लिगेंड के लिए एक सामान्य वर्गीकरण है) - यह भी यही दर्शाता है कि लिगेंड दो दाता परमाणुओं के माध्यम से बंध बनाता है। द्विदंतुक लिगेंड चेलेट वलय बनाने में महत्वपूर्ण होते हैं।
In simple words: 'en' एक द्विदंतुक लिगेंड है, जबकि 'CN-' एक एकदंतुक लिगेंड है। द्विदंतुक लिगेंड वे होते हैं जो धातु से दो जगह से जुड़ते हैं।

🎯 Exam Tip: लिगेंडों को वर्गीकृत करते समय, उनके रासायनिक सूत्र को देखें और पहचानें कि उनमें कितने परमाणु हैं जो इलेक्ट्रॉन युग्म दान करके केंद्रीय धातु से बंध बना सकते हैं।

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 9 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. कीलेट प्रभाव से आप आप समझते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
Answer: कीलेट प्रभाव एक घटना है जिसमें एक द्विदंतुक या बहुदंतुक लिगेंड (जिसे चेलेटिंग लिगेंड भी कहा जाता है) एक ही केंद्रीय धातु आयन से दो या दो से अधिक दाता परमाणुओं के माध्यम से जुड़ता है। इस तरह के जुड़ने से धातु आयन और लिगेंड के बीच एक वलय जैसी संरचना बनती है, जिसे कीलेट वलय कहा जाता है। इस वलय के बनने से बनने वाले संकुल की स्थिरता बढ़ जाती है।
इस प्रभाव को कीलेट प्रभाव कहते हैं, और यह साधारण एकदंतुक लिगेंड द्वारा बने संकुलों की तुलना में काफी अधिक स्थिरता प्रदान करता है। चेलेट वलय के बनने से एंट्रोपी (यादृच्छिकता) में वृद्धि होती है, जो प्रणाली को अधिक स्थिर बनाती है।
उदाहरण के लिए: एथिलीनडाइऐमीन (en) एक द्विदंतुक लिगेंड है। जब यह कोबाल्ट जैसे धातु आयन से जुड़ता है, तो यह एक स्थिर कीलेट वलय बनाता है।
U Co en
(यह चित्र एक साधारण प्रतिनिधित्व है और वास्तविक आणविक संरचना को पूरी तरह से नहीं दर्शाता है। यह सिर्फ एक वलय जैसी संरचना के विचार को दर्शाता है।) ऐसे वलय का बनना कॉम्प्लेक्स को अधिक स्थिर बनाता है।
In simple words: कीलेट प्रभाव तब होता है जब एक लिगेंड धातु से दो या अधिक जगह से जुड़ता है, जिससे एक वलय जैसा आकार बनता है। इससे कॉम्प्लेक्स बहुत मजबूत और स्थिर हो जाता है।

🎯 Exam Tip: कीलेट प्रभाव को समझाते समय, यह बताएं कि बहुदंतुक लिगेंड कैसे वलय संरचना बनाते हैं और यह वलय संरचना संकुल के स्थायित्व को कैसे बढ़ाती है। एंट्रोपी कारक का उल्लेख करें।

 

प्रश्न 2. अणु सूत्र Co(NH3)5SO4 Br वाले दो संकुलों को बोतल A व B में भरा गया है। इनमें से एक संकुल BaCl2 के साथ श्वेत अवक्षेप जबकि दूसरा AgNO3 के साथ हल्का पीला अवक्षेप देता है, तो बोतल A व B में उपस्थित संकुलों के सूत्र लिखिए।
Answer: इस प्रश्न में, हमें दिए गए अवक्षेपों के आधार पर दो कोबाल्ट कॉम्प्लेक्सों के सूत्रों की पहचान करनी है। यह आयनन समावयवता का एक उदाहरण है।
पहला संकुल (बोतल A) BaCl2 के साथ श्वेत अवक्षेप देता है। BaCl2 सल्फेट आयनों (\( SO_4^{2-} \)) के साथ श्वेत अवक्षेप (\( BaSO_4 \)) बनाता है। इसका मतलब है कि बोतल A में संकुल में सल्फेट आयन उपसहसंयोजन मंडल के बाहर होना चाहिए।
अतः, बोतल A में उपस्थित संकुल है: \( [Co(NH_3)_5Br]SO_4 \)
अभिक्रिया: \( [Co(NH_3)_5Br]SO_4 + BaCl_2 \rightarrow [Co(NH_3)_5Br]Cl_2 + BaSO_4 \downarrow \) (श्वेत अवक्षेप)
दूसरा संकुल (बोतल B) AgNO3 के साथ हल्का पीला अवक्षेप देता है। AgNO3 क्लोराइड आयनों (\( Cl^- \)) या ब्रोमाइड आयनों (\( Br^- \)) के साथ अवक्षेप बनाता है। ब्रोमाइड आयन (\( Br^- \)) के साथ AgBr का हल्का पीला अवक्षेप बनता है। इसका मतलब है कि बोतल B में संकुल में ब्रोमाइड आयन उपसहसंयोजन मंडल के बाहर होना चाहिए।
अतः, बोतल B में उपस्थित संकुल है: \( [Co(NH_3)_5SO_4]Br \)
अभिक्रिया: \( [Co(NH_3)_5SO_4]Br + AgNO_3 \rightarrow [Co(NH_3)_5SO_4]NO_3 + AgBr \downarrow \) (हल्का पीला अवक्षेप)
इस प्रकार, बोतल A में \( [Co(NH_3)_5Br]SO_4 \) और बोतल B में \( [Co(NH_3)_5SO_4]Br \) उपस्थित हैं। ये दोनों संकुल एक-दूसरे के आयनन समावयवी हैं।
In simple words: बोतल A में सल्फेट बाहर है क्योंकि यह \( BaCl_2 \) से प्रतिक्रिया करता है। बोतल B में ब्रोमाइड बाहर है क्योंकि यह \( AgNO_3 \) से प्रतिक्रिया करता है।

🎯 Exam Tip: यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि केवल उपसहसंयोजन मंडल के बाहर के आयन ही विलयन में मुक्त होते हैं और अवक्षेपण अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं। इस जानकारी का उपयोग करके आप कॉम्प्लेक्स की संरचना को निर्धारित कर सकते हैं।

 

प्रश्न 3. निम्नलिखित संकुलों में केन्द्रीय धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए -
(i) K3[Fe(C2O4)3]
(ii) [Fe(CN)6]3+
Answer: केंद्रीय धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात करने के लिए, हम लिगेंड और बाहरी आयनों के आवेश का उपयोग करते हैं।
(i) K3[Fe(C2O4)3]
यह संकुल पहले \( K_3[Fe(C_2O_4)_3] \rightarrow 3K^+ + [Fe(C_2O_4)_3]^{3-} \) में वियोजित होता है।
माना केंद्रीय धातु Fe की ऑक्सीकरण अवस्था 'x' है।
ऑक्सालेट लिगेंड (\( C_2O_4^{2-} \)) पर -2 का आवेश होता है।
संकुल आयन पर कुल आवेश -3 है।
इसलिए:
\( x + 3 \times (-2) = -3 \)
\( x - 6 = -3 \)
\( x = -3 + 6 \)
\( x = +3 \)
अतः, K3[Fe(C2O4)3] में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था \( +3 \) है।
(ii) [Fe(CN)6]3-
यहां, कॉम्प्लेक्स आयन पर कुल आवेश -3 है।
माना केंद्रीय धातु Fe की ऑक्सीकरण अवस्था 'x' है।
सायनाइड लिगेंड (\( CN^- \)) पर -1 का आवेश होता है।
इसलिए:
\( x + 6 \times (-1) = -3 \)
\( x - 6 = -3 \)
\( x = -3 + 6 \)
\( x = +3 \)
अतः, [Fe(CN)6]3- में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था \( +3 \) है।
इन दोनों यौगिकों में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था \( +3 \) है। यह इंगित करता है कि आयरन ने 3 इलेक्ट्रॉन खो दिए हैं।
In simple words: दोनों यौगिकों K3[Fe(C2O4)3] और [Fe(CN)6]3- में आयरन (Fe) की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण अवस्था निकालते समय, कॉम्प्लेक्स आयन के कुल आवेश और लिगेंड के आवेशों को सही ढंग से जोड़ना सुनिश्चित करें। ऋणायनिक लिगेंड के आवेश को कभी न भूलें।

 

प्रश्न 4. sp³, dsp² कक्षक प्रयुक्त करने वाले संकुलों की ज्यामितीय आकृति क्या होगी, प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए?
Answer: संकरण के आधार पर संकुलों की ज्यामितीय आकृतियाँ इस प्रकार होंगी:
1. **sp³ कक्षक प्रयुक्त करने वाले संकुल:**
जब केंद्रीय धातु आयन sp³ संकरण करता है, तो बनने वाले संकुल की ज्यामिति **चतुष्फलकीय (Tetrahedral)** होती है। इस ज्यामिति में, चार लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु के चारों ओर एक चतुष्फलकीय आकार में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें बंध कोण लगभग 109.5° होता है। यह अक्सर तब होता है जब केंद्रीय धातु आयन कमजोर क्षेत्र लिगेंड से जुड़ा होता है या जब d-कक्षक संकरण में भाग नहीं लेते हैं।
उदाहरण: [Ni(CO)4] (निकल टेट्राकार्बोनिल) या [NiCl4]2-।
2. **dsp² कक्षक प्रयुक्त करने वाले संकुल:**
जब केंद्रीय धातु आयन dsp² संकरण करता है, तो बनने वाले संकुल की ज्यामिति **वर्ग समतलीय (Square Planar)** होती है। इस ज्यामिति में, चार लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु के चारों ओर एक ही तल में एक वर्ग के कोनों पर व्यवस्थित होते हैं, जिसमें बंध कोण 90° होता है। यह अक्सर तब होता है जब केंद्रीय धातु आयन मजबूत क्षेत्र लिगेंड से जुड़ा होता है, जिससे d-कक्षक संकरण में भाग लेने के लिए उपलब्ध होते हैं।
उदाहरण: [Ni(CN)4]2- (टेट्रासाइनोनिकलेट(II) आयन)।
U Ni CN CN CN CN 2-
यह [Ni(CN)4]2- की वर्ग समतलीय ज्यामिति को दर्शाता है।
In simple words: sp³ संकरण वाले संकुलों का आकार चतुष्फलकीय होता है, जैसे [Ni(CO)4]। dsp² संकरण वाले संकुलों का आकार वर्ग समतलीय होता है, जैसे [Ni(CN)4]2-।

🎯 Exam Tip: ज्यामिति को संकरण प्रकार से जोड़ना महत्वपूर्ण है। sp³ संकरण चतुष्फलकीय ज्यामिति की ओर ले जाता है, जबकि dsp² संकरण वर्ग समतलीय ज्यामिति की ओर ले जाता है। हमेशा संबंधित उदाहरणों को याद रखें।

 

प्रश्न 5. धातुओं के निष्कर्षण में उपसहसंयोजक यौगिकों के महत्व को समझाइए।
Answer: उपसहसंयोजक यौगिक धातुओं के निष्कर्षण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका उपयोग धातुओं को उनके अयस्कों से अलग करने और शुद्ध करने के लिए किया जाता है।
1. **गोल्ड और सिल्वर का निष्कर्षण:** गोल्ड और सिल्वर जैसी मूल्यवान धातुओं को उनके अयस्कों से निकालने के लिए सायनाइड प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। इसमें धातु को सोडियम सायनाइड या पोटेशियम सायनाइड के घोल के साथ उपचारित किया जाता है। गोल्ड या सिल्वर घुलनशील सायनाइड कॉम्प्लेक्स बनाते हैं (जैसे \( [Ag(CN)_2]^- \) या \( [Au(CN)_2]^- \))।
\( 4Au + 8CN^- + O_2 + 2H_2O \rightarrow 4[Au(CN)_2]^- + 4OH^- \)
बाद में, इस कॉम्प्लेक्स से धातु को जिंक जैसे अधिक क्रियाशील धातु के साथ अपचयन करके अलग किया जाता है।
\( 2[Au(CN)_2]^- + Zn \rightarrow [Zn(CN)_4]^{2-} + 2Au \)
2. **निकल का शोधन (मॉन्ड प्रक्रिया):** निकल धातु को शुद्ध करने के लिए मॉन्ड प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। इसमें अशुद्ध निकल को कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ गर्म किया जाता है, जिससे अस्थिर निकल टेट्राकार्बोनिल कॉम्प्लेक्स \( [Ni(CO)_4] \) बनता है। यह कॉम्प्लेक्स गैसीय अवस्था में शुद्ध होता है।
\( Ni_{अशुद्ध} + 4CO \xrightarrow{50-60^\circ C} Ni(CO)_4 \)
फिर, शुद्ध \( Ni(CO)_4 \) को उच्च तापमान पर विघटित किया जाता है, जिससे शुद्ध निकल धातु प्राप्त होती है।
\( Ni(CO)_4 \xrightarrow{180-200^\circ C} Ni_{शुद्ध} + 4CO \)
3. **धातुकर्म में अन्य उपयोग:** कुछ मामलों में, उपसहसंयोजक यौगिकों का उपयोग धातु आयनों को विशिष्ट रूप से अवक्षेपित करने या उन्हें अन्य अशुद्धियों से अलग करने के लिए भी किया जाता है। यह चयनात्मक निष्कर्षण और शुद्धिकरण में मदद करता है। इन प्रक्रियाओं से औद्योगिक स्तर पर धातुओं का उत्पादन संभव हो पाता है।
In simple words: उपसहसंयोजक यौगिक सोने, चांदी और निकल जैसी धातुओं को उनके अयस्कों से निकालने और शुद्ध करने में मदद करते हैं। वे धातुओं के साथ ऐसे कॉम्प्लेक्स बनाते हैं जो घुलनशील या वाष्पशील होते हैं, जिससे अशुद्धियों से अलग करना आसान हो जाता है।

🎯 Exam Tip: धातुओं के निष्कर्षण में उपसहसंयोजक यौगिकों के अनुप्रयोगों को समझाते समय, मॉन्ड प्रक्रिया और सायनाइड प्रक्रिया के विशिष्ट उदाहरणों को याद रखें। संबंधित रासायनिक समीकरणों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. [Ni(CN)4]2- आयन का स्वच्छ आकृति चित्र बनाते हुए इसके केन्द्रीय परमाणु की संकरण अवस्था को समझाइए।
Answer: [Ni(CN)4]2- आयन में केंद्रीय परमाणु Ni की संकरण अवस्था dsp² होती है, जिसके कारण इसकी ज्यामिति वर्ग समतलीय (square planar) होती है।
निकल (Ni) का परमाणु क्रमांक 28 है।
Ni का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( [Ar] 3d^8 4s^2 \)
संकुल में निकल \( Ni^{2+} \) के रूप में मौजूद है, क्योंकि सायनाइड लिगेंड पर -1 आवेश होता है, और कॉम्प्लेक्स पर कुल आवेश -2 है (\( x + 4(-1) = -2 \implies x = +2 \)).
\( Ni^{2+} \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( [Ar] 3d^8 4s^0 \).
चूंकि सायनाइड (CN-) एक बहुत मजबूत क्षेत्र लिगेंड है, यह 3d कक्षक में इलेक्ट्रॉनों के युग्मन (pairing) का कारण बनता है।
\( 3d^8 \): \( \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow \uparrow \)
CN- लिगेंड की उपस्थिति में (इलेक्ट्रॉन युग्मन के बाद):
\( 3d^8 \): \( \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \_ \)
यहां, एक 3d कक्षक खाली हो जाता है। यह खाली 3d कक्षक, एक 4s कक्षक और दो 4p कक्षक मिलकर dsp² संकरण बनाते हैं।
संकरण: 3d (एक कक्षक) + 4s (एक कक्षक) + 4p (दो कक्षक) \( \rightarrow \) चार dsp² संकरित कक्षक।
ये चार dsp² संकरित कक्षक वर्ग समतलीय ज्यामिति में व्यवस्थित होते हैं। CN- लिगेंड अपने इलेक्ट्रॉन युग्म को इन खाली dsp² संकरित कक्षकों में दान करते हैं, जिससे Ni-C सिग्मा बंध बनते हैं।
आकृति चित्र:
U Ni CN CN CN CN 2-
यह आरेख [Ni(CN)4]2- की वर्ग समतलीय ज्यामिति को दर्शाता है, जहां चार सायनाइड लिगेंड एक केंद्रीय निकल परमाणु के चारों ओर एक वर्ग के कोनों पर व्यवस्थित हैं। संकरित कक्षक लिगेंडों के कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके बंध बनाते हैं, जिससे बंधों की ऊर्जा समान होती है और वे दिशात्मक होते हैं।
In simple words: [Ni(CN)4]2- में, निकल परमाणु dsp² संकरण दिखाता है। सायनाइड लिगेंड मजबूत होने के कारण, d-इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं और एक खाली d कक्षक संकरण में भाग लेता है। इससे कॉम्प्लेक्स की ज्यामिति वर्ग समतलीय हो जाती है।

🎯 Exam Tip: केंद्रीय धातु परमाणु की संकरण अवस्था और ज्यामिति को समझने के लिए, हमेशा लिगेंड की प्रकृति (मजबूत या कमजोर क्षेत्र) और धातु आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर विचार करें। मजबूत क्षेत्र लिगेंड इलेक्ट्रॉनों के युग्मन को बढ़ावा देते हैं।

 

प्रश्न 3. आयनन समावयवता को परिभाषित कीजिए। [CO(NH3)5CI]SO4 एवं [CO(NH3)5SO4] CI के IUPAC नाम लिखिए। इसका प्रमाण दीजिए कि उपर्युक्त दोनों संकुल आयनन समावयव है।
Answer: **आयनन समावयवता (Ionisation Isomerism):**
आयनन समावयवता एक प्रकार की संरचनात्मक समावयवता है जिसमें दो या दो से अधिक संकुल यौगिकों का अणु सूत्र समान होता है, लेकिन वे जलीय विलयन में अलग-अलग आयन देते हैं। यह तब होता है जब उपसहसंयोजन मंडल (coordination sphere) के अंदर और बाहर के आयनों का आदान-प्रदान होता है।
**IUPAC नाम:**
1. **[Co(NH3)5Cl]SO4:**
यह कॉम्प्लेक्स जलीय विलयन में सल्फेट आयन (\( SO_4^{2-} \)) देता है।
IUPAC नाम: पेंटाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III) सल्फेट
2. **[Co(NH3)5SO4]Cl:**
यह कॉम्प्लेक्स जलीय विलयन में क्लोराइड आयन (\( Cl^- \)) देता है।
IUPAC नाम: पेंटाऐम्मीनसल्फेटोकोबाल्ट(III) क्लोराइड
**प्रमाण कि ये आयनन समावयव हैं:**
यह प्रमाणित करने के लिए कि [Co(NH3)5Cl]SO4 और [Co(NH3)5SO4]Cl आयनन समावयव हैं, हम उनकी विलयन में आयन देने की क्षमता का परीक्षण कर सकते हैं।
1. **[Co(NH3)5Cl]SO4 का परीक्षण:**
जब [Co(NH3)5Cl]SO4 के जलीय विलयन में बेरियम क्लोराइड (\( BaCl_2 \)) मिलाया जाता है, तो बेरियम सल्फेट (\( BaSO_4 \)) का एक श्वेत अवक्षेप प्राप्त होता है। यह इंगित करता है कि संकुल के उपसहसंयोजन मंडल के बाहर सल्फेट आयन (\( SO_4^{2-} \)) उपस्थित है।
\( [Co(NH_3)_5Cl]SO_4 (aq) + BaCl_2 (aq) \rightarrow [Co(NH_3)_5Cl]Cl_2 (aq) + BaSO_4 \downarrow (श्वेत अवक्षेप) \)
2. **[Co(NH3)5SO4]Cl का परीक्षण:**
जब [Co(NH3)5SO4]Cl के जलीय विलयन में सिल्वर नाइट्रेट (\( AgNO_3 \)) मिलाया जाता है, तो सिल्वर क्लोराइड (\( AgCl \)) का एक श्वेत अवक्षेप प्राप्त होता है। यह इंगित करता है कि संकुल के उपसहसंयोजन मंडल के बाहर क्लोराइड आयन (\( Cl^- \)) उपस्थित है।
\( [Co(NH_3)_5SO_4]Cl (aq) + AgNO_3 (aq) \rightarrow [Co(NH_3)_5SO_4]NO_3 (aq) + AgCl \downarrow (श्वेत अवक्षेप) \)
चूंकि दोनों संकुल समान अणु सूत्र रखते हैं लेकिन जलीय विलयन में अलग-अलग आयन देते हैं और अलग-अलग अवक्षेपण परीक्षण परिणाम देते हैं, इसलिए वे आयनन समावयव हैं। यह उनके उपसहसंयोजन मंडल में आयनों के आदान-प्रदान के कारण होता है।
In simple words: आयनन समावयवता का मतलब है कि एक ही सूत्र वाले यौगिक पानी में अलग-अलग आयन देते हैं। [Co(NH3)5Cl]SO4 और [Co(NH3)5SO4]Cl इस तरह के दो यौगिक हैं। हम उन्हें रासायनिक परीक्षणों से पहचान सकते हैं।

🎯 Exam Tip: आयनन समावयवता की परिभाषा के साथ, हमेशा दो उदाहरणों के IUPAC नाम और उनके बीच अंतर करने के लिए रासायनिक परीक्षणों को शामिल करें। इससे आपका उत्तर पूर्ण हो जाएगा।

 

प्रश्न 4. निम्नलिखित उपसहसंयोजक यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए।
Answer: उपसहसंयोजक यौगिकों के IUPAC नाम इस प्रकार हैं:
(अ) **[Pt(NH3)2Cl(NO2)]**: यह एक तटस्थ कॉम्प्लेक्स है।
लिगेंड: एम्मीन (\( NH_3 \)), क्लोरिडो (Cl), नाइट्रिटो-N (\( NO_2 \), यदि N से जुड़ा हो)।
IUPAC नाम: डाइऐम्मीनक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनम(II)
यहां, प्लैटिनम की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है (\( x + 2(0) + 1(-1) + 1(-1) = 0 \implies x = +2 \)).
(ब) **Na[BH4]**: यह एक ऋणायनिक कॉम्प्लेक्स आयन है।
लिगेंड: हाइड्रिडो (H).
IUPAC नाम: सोडियम टेट्राहाइड्रिडोबोरट(III)
यहां, बोरॉन की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है (\( x + 4(-1) = -1 \implies x = +3 \)).
(स) **[Co(NH3)4(CO3)]Cl**: यह एक धनायनिक कॉम्प्लेक्स आयन है।
लिगेंड: एम्मीन (\( NH_3 \)), कार्बोनेटो (\( CO_3^{2-} \)).
IUPAC नाम: टेट्राऐम्मीनकार्बोनेटोकोबाल्ट(III) क्लोराइड
यहां, कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है (\( x + 4(0) + 1(-2) = +1 \implies x = +3 \)).
(द) **Zn2[Fe(CN)6]**: यह एक तटस्थ संकुल है, लेकिन दो धातु आयनों से बना है।
लिगेंड: सायनाइड (\( CN^- \)).
IUPAC नाम: डाइज़िंक हेक्सासाइनोफेरेट(II)
यहां, जिंक +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है, और आयरन +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है (\( 2(+2) + x + 6(-1) = 0 \implies 4 + x - 6 = 0 \implies x = +2 \)).
प्रत्येक नामकरण में, लिगेंड को वर्णानुक्रम में सूचीबद्ध किया जाता है (पूर्वसर्गों को छोड़कर), उसके बाद केंद्रीय धातु और उसकी ऑक्सीकरण अवस्था आती है।
In simple words: [Pt(NH3)2Cl(NO2)] को डाइऐम्मीनक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनम(II) कहते हैं। Na[BH4] का नाम सोडियम टेट्राहाइड्रिडोबोरट(III) है। [Co(NH3)4(CO3)]Cl को टेट्राऐम्मीनकार्बोनेटोकोबाल्ट(III) क्लोराइड कहते हैं। और Zn2[Fe(CN)6] का नाम डाइज़िंक हेक्सासाइनोफेरेट(II) है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के नियमों का पालन करते समय, लिगेंड के नाम, उनकी संख्या (मोनो, डाइ, ट्राई), केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और कॉम्प्लेक्स आयन के समग्र आवेश का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

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