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Detailed Chapter 7 p ब्लॉक के तत्व RBSE Solutions for Class 12 Chemistry
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Class 12 Chemistry Chapter 7 p ब्लॉक के तत्व RBSE Solutions PDF
Rajasthan Board RBSE Class 12 Chemistry Chapter 7 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न
Rajasthan Board RBSE Class 12 Chemistry Chapter 7 बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. समूह-15 में से भूपर्पटी (Crustal Rocks) में सर्वाधिक प्रचुरता से पाया जाने वाला तत्व है-
(a) N
(b) As
(c) P
(d) Sb
Answer: (a) N
In simple words: समूह-15 में नाइट्रोजन भूपर्पटी में सबसे ज्यादा पाया जाता है। यह हवा में भी सबसे प्रचुर मात्रा में मौजूद है।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी के प्रत्येक समूह में सबसे प्रचुर तत्व को याद रखना अक्सर महत्वपूर्ण होता है, खासकर जब यह जैविक प्रक्रियाओं या भूवैज्ञानिक संरचनाओं में प्रमुख भूमिका निभाता हो।
Question 2. जब HNO3 धातुओं से अपचयित होता है भूरी गैस प्राप्त होती है
(a) NO
(b) N2O3
Answer: (c) Option not provided in question
In simple words: जब नाइट्रिक अम्ल धातुओं के साथ क्रिया करता है, तो भूरी गैस बनती है, जो आमतौर पर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड \( (\text{NO}_2) \) होती है।
🎯 Exam Tip: यह याद रखें कि \( \text{HNO}_3 \) की सांद्रता के आधार पर बनने वाले उत्पाद भिन्न हो सकते हैं; तनु \( \text{HNO}_3 \) नाइट्रिक ऑक्साइड \( (\text{NO}) \) देता है जबकि सांद्र \( \text{HNO}_3 \) नाइट्रोजन डाइऑक्साइड \( (\text{NO}_2) \) देता है, जो भूरे रंग की गैस होती है।
Question 3. सबसे दुर्बल हाइड्रोलिक अम्ल कौन-सा है?
(a) HI
(b) HBr
(c) HF
(d) HCI.
Answer: (c) HF
In simple words: हाइड्रोजन फ्लोराइड (HF) सबसे कमजोर हाइड्रोलिक अम्ल है क्योंकि फ्लोरीन का आकार छोटा होता है और यह हाइड्रोजन के साथ मजबूत बंध बनाता है, जिसे तोड़ना मुश्किल होता है।
🎯 Exam Tip: हैलाइड अम्लों की अम्लीय शक्ति समूह में नीचे जाने पर बढ़ती है, क्योंकि हैलोजन का आकार बढ़ता है और H-X बंध की शक्ति कम होती जाती है, जिससे H+ आयन आसानी से मुक्त हो पाते हैं।
Question 4. XeOF2 की ज्यामिति निम्न में से कौन-सी होती है?
(a) पिरैमिडी
(b) T-आकृति
(c) अष्टफलकीय
(d) चतुष्फलकीय।
Answer: (c) अष्टफलकीय
In simple words: XeOF2 की ज्यामिति अष्टफलकीय होती है, हालांकि इसमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्मों के कारण थोड़ी विकृति हो सकती है।
🎯 Exam Tip: \( \text{XeOF}_2 \) में केंद्रीय परमाणु जीनॉन है। इसके संकरण और एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्मों की उपस्थिति के आधार पर ज्यामिति निर्धारित की जाती है, जिसके लिए VSEPR सिद्धांत का उपयोग करना सहायक होता है।
Question 5. निम्न में से किसकी आयनन ऐन्यैल्पी सर्वाधिक होती है?
(a) P
(b) N
(c) As
(d) Sb.
Answer: (b) N
In simple words: नाइट्रोजन की आयनन ऐन्यैल्पी सबसे अधिक होती है क्योंकि इसका आकार छोटा होता है और इसके बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन नाभिक से मजबूती से बंधे होते हैं।
🎯 Exam Tip: समूह में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन ऐन्यैल्पी का मान घटता जाता है क्योंकि परमाणुओं का आकार बढ़ता है और बाहरी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होते जाते हैं, जिससे उन्हें हटाना आसान हो जाता है।
Question 6. निम्न में से कौन-सा ऑक्साइड प्रबल अम्लीय स्वभाव है?
(a) P4O10
(b) SO
(c) Cl2O7
(d) Al2O3
Answer: (b) SO
In simple words: सल्फर मोनोऑक्साइड (SO) में सल्फर का ऑक्सीकरण अवस्था कम होती है, जिससे यह प्रबल अम्लीय स्वभाव का होता है।
🎯 Exam Tip: सामान्यतः, किसी तत्व की ऑक्सीकरण संख्या जितनी अधिक होती है, उसका ऑक्साइड उतना ही अधिक अम्लीय होता है। हालांकि, कुछ अपवाद भी हो सकते हैं, जैसे कि सल्फर के कम ऑक्सीकरण अवस्था वाले ऑक्साइड भी अम्लीय होते हैं।
Question 7. निम्न में से कौन-सा ऑक्साइड प्रबल अम्लीय स्वभाव है?
(a) P4O10
(b) SO
(c) Cl2O7
(d) Al2O3
Answer: (c) Cl2O7
In simple words: क्लोरीन हेप्टाऑक्साइड (\(\text{Cl}_2\text{O}_7\)) सबसे प्रबल अम्लीय ऑक्साइड है क्योंकि क्लोरीन की ऑक्सीकरण अवस्था यहाँ सबसे अधिक (+7) होती है।
🎯 Exam Tip: किसी तत्व की ऑक्सीकरण संख्या जितनी अधिक होती है, उसका ऑक्साइड उतना ही अधिक अम्लीय होता है। \( \text{Cl}_2\text{O}_7 \) में क्लोरीन की ऑक्सीकरण अवस्था +7 है, जो इसे अत्यंत अम्लीय बनाती है।
Question 9. हास्य गैस निम्न में से किसे कहा जाता है?
(a) नाइट्रोजन ऑक्साइड
(b) नाइट्रिक ऑक्साइड
(c) नाइट्रोजन ट्राइऑक्साइड
(d) नाइट्रोजन पेन्टा ऑक्साइड।
Answer: (a) नाइट्रोजन ऑक्साइड
In simple words: नाइट्रस ऑक्साइड \( (\text{N}_2\text{O}) \) को हास्य गैस कहते हैं क्योंकि इसे सूंघने पर हँसी आती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न नाइट्रोजन ऑक्साइडों के नाम और उनके रासायनिक सूत्र अक्सर भ्रमित कर सकते हैं; \( \text{N}_2\text{O} \) (नाइट्रस ऑक्साइड) हास्य गैस है, जबकि \( \text{NO} \) (नाइट्रिक ऑक्साइड) नहीं।
Question 10. कौन-से हैलोजन में उच्चतम इलेक्ट्रॉन बन्धुता होती है?
(a) F
(b) Cl
(c) Br
(d) I.
Answer: (b) Cl
In simple words: क्लोरीन में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉन बंधुता होती है, जिसका मतलब है कि यह इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर सबसे ज्यादा खींचता है।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन की तुलना में क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बंधुता अधिक होती है क्योंकि फ्लोरीन का छोटा आकार इसके 2p-कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के बीच मजबूत प्रतिकर्षण पैदा करता है, जिससे यह आने वाले इलेक्ट्रॉन को कम आसानी से समायोजित कर पाता है।
Rajasthan Board RBSE Class 12 Chemistry Chapter 7 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ट्राइहैलाइडों से पेण्टा हैलाइड अधिक सहसंयोजी क्यों होते हैं?
Answer: पेण्टा हैलाइड (PX5) ट्राइहैलाइडों (PX3) की तुलना में अधिक सहसंयोजी होते हैं क्योंकि पेण्टा हैलाइड में केंद्रीय परमाणु (फॉस्फोरस) उच्च ऑक्सीकरण अवस्था (+5) में होता है। केंद्रीय परमाणु पर धनावेश जितना अधिक होता है, वह उतना ही अधिक ध्रुवीकरण क्षमता (polarizing power) दिखाता है। यह हैलाइड आयनों के इलेक्ट्रॉन बादल को अपनी ओर अधिक खींचता है, जिससे बंध में सहसंयोजक गुण बढ़ जाते हैं। ट्राइहैलाइडों में केंद्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था कम (+3) होती है, इसलिए उनकी ध्रुवीकरण क्षमता कम होती है।
In simple words: पेण्टा हैलाइड ज्यादा सहसंयोजी होते हैं क्योंकि उनमें केंद्रीय परमाणु पर ज्यादा धनावेश होता है, जिससे वह हैलाइड आयनों के इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर ज्यादा खींचता है।
🎯 Exam Tip: फाजान के नियम (Fajan's Rule) को याद रखें: केंद्रीय परमाणु पर उच्च धनावेश, छोटे धनायन का आकार और बड़े ऋणायन का आकार सहसंयोजक गुण को बढ़ाते हैं।
Question 2. वर्ग-15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 सबसे प्रबल अपचायक क्यों है?
Answer: बिस्मथ हाइड्राइड (\(\text{BiH}_3\)) वर्ग-15 के हाइड्राइडों में सबसे मजबूत अपचायक होता है क्योंकि यह इस समूह में सबसे कम स्थिर होता है। समूह में ऊपर से नीचे जाने पर, हाइड्राइडों की स्थिरता घटती जाती है। कम स्थिरता इसे आसानी से हाइड्रोजन को छोड़ने और इलेक्ट्रॉन दान करने में मदद करती है, जिससे यह मजबूत अपचयन गुण दिखाता है।
In simple words: BiH3 सबसे अच्छा अपचायक है क्योंकि यह समूह में सबसे कम स्थिर है और आसानी से इलेक्ट्रॉन दान कर सकता है।
🎯 Exam Tip: अपचायक शक्ति का संबंध आमतौर पर बंध की स्थिरता से होता है; एक कम स्थिर बंध वाला यौगिक आसानी से टूटता है और अपचयन में भाग लेता है।
Question 3. N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील क्यों है?
Answer: कमरे के तापमान पर नाइट्रोजन गैस (\(\text{N}_2\)) कम प्रतिक्रियाशील होती है। इसका कारण यह है कि नाइट्रोजन के अणुओं में तीन मजबूत बंध (त्रिआबन्ध) होते हैं, जो \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) अतिव्यापन से बनते हैं। इन बंधों को तोड़ने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिससे \( \text{N}_2 \) अणु बहुत स्थिर होते हैं और आसानी से रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग नहीं लेते।
In simple words: नाइट्रोजन गैस कमरे के तापमान पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं करती क्योंकि इसके परमाणुओं के बीच बहुत मजबूत तीन बंध होते हैं, जिन्हें तोड़ना कठिन है।
🎯 Exam Tip: \( \text{N}_2 \) अणु की उच्च बंध वियोजन ऊर्जा (लगभग 941 kJ/mol) इसकी रासायनिक अक्रियता का मुख्य कारण है, जिसे हमेशा याद रखें।
Question 4. Cu2+ विलयन के साथ अमोनिया कैसे क्रिया करती है?
Answer: कॉपर \( (\text{Cu}^{2+}) \) आयन अमोनिया के साथ मिलकर गहरे नीले रंग का एक संकुल (कॉम्प्लेक्स) यौगिक बनाते हैं। यह संकुल \( [\text{Cu(NH}_3)_4]^{2+} \) के रूप में होता है। यह अभिक्रिया विलयन को गहरे नीले रंग का बना देती है। यह अभिक्रिया कॉपर आयनों की पहचान करने के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण है।
\( \text{Cu}^{2+} (\text{aq}) + 4\text{NH}_3 (\text{aq}) \rightarrow [\text{Cu(NH}_3)_4]^{2+} (\text{aq}) \)
In simple words: कॉपर आयन अमोनिया से मिलकर गहरे नीले रंग का एक नया यौगिक बनाते हैं। इस यौगिक को संकुल कहते हैं।
🎯 Exam Tip: संकुल आयन बनने की प्रक्रिया में, अमोनिया एक लुईस क्षारक के रूप में कार्य करती है और केंद्रीय धातु आयन के साथ सहसंयोजक बंध बनाती है, जिससे अक्सर रंगीन यौगिक बनते हैं।
Question 5. N2O5 में नाइट्रोजन की सह-संयोजकता क्या है?
Answer: सह-संयोजकता किसी परमाणु द्वारा बनाए गए सहभाजित इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या होती है। \( \text{N}_2\text{O}_5 \) में नाइट्रोजन की सह-संयोजकता 4 होती है। यह नाइट्रोजन परमाणु द्वारा केंद्रीय ऑक्सीजन और दो अन्य ऑक्सीजन परमाणुओं के साथ बनाए गए कुल चार बंधों को दर्शाती है। नाइट्रोजन की उच्च विद्युत् ऋणात्मकता और छोटे आकार के कारण यह चार बंधों तक सीमित रहता है, जबकि फास्फोरस जैसे बड़े तत्व अधिक बंध बना सकते हैं।
In simple words: नाइट्रोजन की सह-संयोजकता 4 है। इसका मतलब है कि नाइट्रोजन परमाणु 4 सहभाजित बंध बनाता है।
🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन की अधिकतम सह-संयोजकता 4 होती है क्योंकि इसके पास \( \text{d} \)-कक्षक उपलब्ध नहीं होते हैं, जिससे यह अपने अष्टक का विस्तार नहीं कर सकता।
Question 6. क्या होता है, जबकि PCI5 को गर्म करते हैं?
Answer: जब \( \text{PCl}_5 \) को गर्म किया जाता है, तो यह \( \text{PCl}_3 \) और \( \text{Cl}_2 \) में टूट जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि \( \text{PCl}_5 \) अणु में दो प्रकार के बंध होते हैं: तीन निरक्षीय बंध (equatorial) जो 202 पिकोमीटर लंबे होते हैं, और दो अक्षीय बंध (axial) जो 240 पिकोमीटर लंबे होते हैं। अक्षीय बंध निरक्षीय बंधों की तुलना में कमजोर होते हैं। इसलिए, गर्म करने पर, ये कम स्थिर अक्षीय बंध टूट जाते हैं, जिससे \( \text{PCl}_3 \) और \( \text{Cl}_2 \) बनते हैं।
In simple words: गर्म करने पर \( \text{PCl}_5 \) टूटकर \( \text{PCl}_3 \) और \( \text{Cl}_2 \) बनाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि \( \text{PCl}_5 \) के कुछ बंध कमजोर होते हैं और आसानी से टूट जाते हैं।
🎯 Exam Tip: \( \text{PCl}_5 \) की त्रिकोणीय द्विपिरैमिडीय (trigonal bipyramidal) ज्यामिति में अक्षीय बंधों का लंबा होना और अधिक अस्थिर होना एक सामान्य रासायनिक अवधारणा है।
Question 8. H3PO4 की क्षारकता क्या है ?
Answer: ऑर्थोफॉस्फोरिक अम्ल \( (\text{H}_3\text{PO}_4) \) की क्षारकता 3 होती है। क्षारकता उस अम्ल में मौजूद प्रतिस्थापित होने वाले हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या को बताती है। \( \text{H}_3\text{PO}_4 \) के अणु में तीन -OH समूह होते हैं, जिससे यह तीन प्रोटॉन दान कर सकता है। यह बताता है कि यह अम्ल तीन चरणों में उदासीनीकरण अभिक्रिया कर सकता है।
In simple words: H3PO4 अम्ल की क्षारकता 3 है क्योंकि इसमें तीन -OH समूह होते हैं, जो हाइड्रोजन आयन दे सकते हैं।
🎯 Exam Tip: किसी ऑक्सीअम्ल की क्षारकता उसमें मौजूद 'P-OH' बंधों की संख्या से निर्धारित होती है, न कि कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या से।
Question 9. क्या होता है जब H3PO3 को गर्म करते हैं?
Answer: जब ऑर्थोफॉस्फोरस अम्ल \( (\text{H}_3\text{PO}_3) \) को गर्म किया जाता है, तो यह असमानुपातित (disproportionation) अभिक्रिया करता है। इस अभिक्रिया में, \( \text{H}_3\text{PO}_3 \) एक साथ ऑक्सीकृत और अपचयित होकर फॉस्फीन \( (\text{PH}_3) \) गैस और ऑर्थोफॉस्फोरिक अम्ल \( (\text{H}_3\text{PO}_4) \) बनाता है। फॉस्फीन एक विषैली गैस है। यह अभिक्रिया बताती है कि फॉस्फोरस एक ही यौगिक में विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखा सकता है।
\( 4\text{H}_3\text{PO}_3 \xrightarrow{\Delta} \text{PH}_3\uparrow + 3\text{H}_3\text{PO}_4 \)
In simple words: जब H3PO3 को गर्म करते हैं, तो यह फॉस्फीन गैस और H3PO4 अम्ल में बदल जाता है। इसे असमानुपातन कहते हैं।
🎯 Exam Tip: असमानुपातन अभिक्रियाएँ वे होती हैं जिनमें एक ही पदार्थ एक साथ ऑक्सीकृत और अपचयित होता है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के उत्पाद बनते हैं।
Question 10. H2O एक द्रव तथा H2S विलयन गैस क्यों है?
Answer: पानी \( (\text{H}_2\text{O}) \) कमरे के तापमान पर तरल होता है, जबकि हाइड्रोजन सल्फाइड \( (\text{H}_2\text{S}) \) गैस होती है। ऐसा ऑक्सीजन के छोटे आकार और बहुत अधिक विद्युत् ऋणात्मकता के कारण होता है, जो पानी के अणुओं के बीच मजबूत हाइड्रोजन बंध बनाता है। इन बंधों को तोड़ने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए पानी द्रव अवस्था में रहता है। इसके विपरीत, सल्फर का आकार बड़ा होता है और इसकी विद्युत् ऋणात्मकता कम होती है, जिससे यह हाइड्रोजन बंध नहीं बना पाता। इसलिए, \( \text{H}_2\text{S} \) कमरे के तापमान पर गैस के रूप में मौजूद होता है। हाइड्रोजन बंधों की उपस्थिति किसी पदार्थ के भौतिक गुणों, जैसे क्वथनांक और गलनांक, पर गहरा प्रभाव डालती है।
In simple words: पानी में हाइड्रोजन बंध होते हैं, इसलिए वह द्रव है। \( \text{H}_2\text{S} \) में हाइड्रोजन बंध नहीं होते, इसलिए वह गैस है। ऑक्सीजन छोटा और बहुत विद्युत् ऋणात्मक होता है, जिससे हाइड्रोजन बंध बनते हैं।
🎯 Exam Tip: हाइड्रोजन बंध की उपस्थिति उन यौगिकों के भौतिक गुणों में असामान्यताओं की व्याख्या करने में महत्वपूर्ण है जहाँ एक अत्यधिक विद्युत् ऋणात्मक परमाणु (जैसे O, N, F) हाइड्रोजन से जुड़ा होता है।
Question 11. O3 एक प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्यों क्रिया करती है ?
Answer: ओजोन \( (\text{O}_3) \) एक बहुत शक्तिशाली ऑक्सीकारक है क्योंकि यह आसानी से विघटित होकर नवजात ऑक्सीजन \( ([\text{O}]) \) मुक्त करती है। यह नवजात ऑक्सीजन अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होती है और अन्य पदार्थों को ऑक्सीकृत कर सकती है। इस कारण से \( \text{O}_3 \) विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं में ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करती है। ओजोन का उपयोग पानी को शुद्ध करने और कीटाणुओं को मारने के लिए भी किया जाता है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण क्षमता बहुत अधिक होती है।
\( \text{O}_3 \rightarrow \text{O}_2 + [\text{O}] \)
In simple words: ओजोन एक मजबूत ऑक्सीकारक है क्योंकि यह आसानी से टूटकर बहुत प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन परमाणु देती है, जो दूसरे पदार्थों को ऑक्सीकृत कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: नवजात ऑक्सीजन की उच्च प्रतिक्रियाशीलता ओजोन को एक प्रभावी कीटाणुनाशक और ब्लीचिंग एजेंट बनाती है, जिसे याद रखना चाहिए।
Question 12. जल में H2SO4 के लिए Ka2 << Ka₁ क्यों है?
Answer: सल्फ्यूरिक अम्ल \( (\text{H}_2\text{SO}_4) \) जल में दो चरणों में आयनित होता है क्योंकि यह एक द्विक्षारकीय अम्ल है। पहले चरण में, यह \( \text{H}_3\text{O}^+ \) और \( \text{HSO}_4^- \) आयन बनाता है, जिसके लिए वियोजन स्थिरांक \( \text{Ka}_1 \) का मान बहुत अधिक \( (>10) \) होता है। यह दर्शाता है कि \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) एक प्रबल अम्ल है और लगभग पूरी तरह से आयनित हो जाता है। दूसरे चरण में, \( \text{HSO}_4^- \) आयन और अधिक वियोजित होकर \( \text{H}_3\text{O}^+ \) और \( \text{SO}_4^{2-} \) आयन बनाते हैं, जिसके लिए \( \text{Ka}_2 \) का मान \( (1 \times 10^{-2}) \) बहुत कम होता है। इसका मतलब है कि \( \text{HSO}_4^- \) आयन का जल में वियोजन बहुत कम होता है, इसलिए \( \text{Ka}_2 \) का मान \( \text{Ka}_1 \) से काफी छोटा होता है। यह दो-चरणीय आयनीकरण यह सुनिश्चित करता है कि सल्फ्यूरिक अम्ल हमेशा अपनी अम्लीय प्रकृति बनाए रखता है।
\( \text{H}_2\text{SO}_{4}(\text{aq}) + \text{H}_2\text{O}(\text{l}) \rightarrow \text{H}_3\text{O}^{+}(\text{aq}) + \text{HSO}_{4}^{-}(\text{aq}) \text{ Ka}_1 \gg 10 \)
\( \text{HSO}_{4}^{-}(\text{aq}) + \text{H}_2\text{O}(\text{l}) \rightarrow \text{H}_3\text{O}^{+}(\text{aq}) + \text{SO}_{4}^{2-}(\text{aq}) \text{ Ka}_2 = 1 \times 10^{-2} \)
In simple words: सल्फ्यूरिक अम्ल पहले बहुत आसानी से टूटता है (\(\text{Ka}_1\) बहुत बड़ा), लेकिन दूसरे चरण में (\(\text{HSO}_4^-\)) बहुत मुश्किल से टूटता है (\(\text{Ka}_2\) छोटा), इसलिए \(\text{Ka}_2\) का मान \(\text{Ka}_1\) से बहुत कम होता है।
🎯 Exam Tip: किसी पॉलीप्रोटिक अम्ल के लिए, पहला आयनीकरण हमेशा अगले आयनीकरण से बहुत आसान होता है क्योंकि एक बार प्रोटॉन हट जाने के बाद, नकारात्मक रूप से चार्ज किया गया आयन दूसरे प्रोटॉन को अधिक मजबूती से पकड़ता है।
Question 13. उन दो विषैली गैसों के नाम बताइए, जो क्लोरीन गैस से बनायी जाती हैं?
Answer: क्लोरीन गैस से दो प्रमुख विषैली गैसें बनाई जा सकती हैं: फॉस्जीन \( (\text{COCl}_2) \) और मस्टर्ड गैस \( (\text{ClCH}_2\text{CH}_2\text{SCH}_2\text{CH}_2\text{Cl}) \)। ये दोनों गैसें रासायनिक युद्ध में उपयोग की जा चुकी हैं। फॉस्जीन का उपयोग प्लास्टिक और कीटनाशकों के उत्पादन में भी होता है, लेकिन बहुत सावधानी से।
In simple words: क्लोरीन गैस से फॉस्जीन और मस्टर्ड गैस बनती हैं। ये दोनों बहुत जहरीली गैसें हैं।
🎯 Exam Tip: फॉस्जीन का रासायनिक नाम कार्बोनिल क्लोराइड है, जबकि मस्टर्ड गैस को बिज़ (\( \beta \)) क्लोरोइथाइल सल्फाइड के रूप में जाना जाता है; इनके उपयोगों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 14. I2 से ICl अधिक क्रियाशील क्यों है?
Answer: आयोडीन मोनोक्लोराइड \( (\text{ICl}) \) आणविक आयोडीन \( (\text{I}_2) \) की तुलना में अधिक प्रतिक्रियाशील होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि \( \text{I-Cl} \) बंध \( \text{I-I} \) बंध की तुलना में कमजोर होता है। \( \text{I-Cl} \) बंध के कमजोर होने के कारण, \( \text{ICl} \) आसानी से टूटकर हैलोजन आयन मुक्त करता है, जो फिर तेजी से रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं। इंटरहैलोजन यौगिक जैसे ICl अक्सर अपने घटक हैलोजन से अधिक प्रतिक्रियाशील होते हैं।
In simple words: ICl, I2 से ज्यादा प्रतिक्रियाशील है क्योंकि I-Cl बंध, I-I बंध से कमजोर होता है, जिससे ICl आसानी से टूट जाता है।
🎯 Exam Tip: इंटरहैलोजन यौगिकों की बढ़ी हुई प्रतिक्रियाशीलता अक्सर घटक परमाणुओं के बीच विद्युत् ऋणात्मकता के अंतर और परिणामी बंध ध्रुवीकरण के कारण होती है।
Question 15. हीलियम को गोताखोरी के उपकरणों में उपयोग क्यों किया जाता है ?
Answer: हीलियम का उपयोग गोताखोरी के उपकरणों में किया जाता है क्योंकि यह रक्त में बहुत कम घुलनशील होती है। गहरे पानी में उच्च दाब के कारण नाइट्रोजन रक्त में अधिक घुल जाती है, जिससे डीकंप्रेसन बीमारी (decompression sickness) हो सकती है। हीलियम, नाइट्रोजन की जगह ऑक्सीजन को पतला करने के लिए उपयोग की जाती है, जिससे यह समस्या कम होती है और गोताखोर सुरक्षित रहते हैं। इसकी हल्की प्रकृति भी गोताखोरों के लिए गैस के मिश्रण को सांस लेने में आसान बनाती है।
In simple words: हीलियम खून में कम घुलती है, इसलिए इसे गोताखोरी में इस्तेमाल करते हैं। यह नाइट्रोजन की जगह ऑक्सीजन को पतला करती है ताकि गहरे पानी में दिक्कत न हो।
🎯 Exam Tip: उच्च दाब के वातावरण में गैसों की रक्त में विलेयता बढ़ने के फेफड़े के दबाव के नियम (Henry's Law) को समझें, यह गोताखोरी मिश्रणों के चयन का आधार है।
Question 16. निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिये। XeF6 + H2O + XeO2F2 + HF
Answer: दिए गए रासायनिक समीकरण को संतुलित करने पर, हमें ज़ेनॉन हेक्साफ्लोराइड \( (\text{XeF}_6) \) और पानी \( (\text{H}_2\text{O}) \) की अभिक्रिया से ज़ेनॉन डाइऑक्साइड डिफ्लूओराइड \( (\text{XeO}_2\text{F}_2) \) और हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल \( (\text{HF}) \) प्राप्त होता है। अभिक्रिया को संतुलित करने के लिए, पानी के दो अणु और हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल के चार अणु आवश्यक हैं। संतुलित समीकरण द्रव्यमान के संरक्षण के नियम का पालन करता है, जहाँ अभिकारकों और उत्पादों में प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या समान होती है।
\( \text{XeF}_6 + 2\text{H}_2\text{O} \rightarrow \text{XeO}_2\text{F}_2 + 4\text{HF} \)
In simple words: इस समीकरण को संतुलित करने पर, \( \text{XeF}_6 \) पानी के साथ मिलकर \( \text{XeO}_2\text{F}_2 \) और \( \text{HF} \) बनाता है, जहाँ पानी के 2 अणु और \( \text{HF} \) के 4 अणु होते हैं।
🎯 Exam Tip: जटिल समीकरणों को संतुलित करते समय, सबसे पहले उन तत्वों को संतुलित करें जो केवल एक अभिकारक और एक उत्पाद में दिखाई देते हैं, और ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को अंत में संतुलित करें।
Question 18. NO2 तथा N2O5 की अनुनाद संरचनाओं को लिखिए।
Answer: नाइट्रोजन डाइऑक्साइड \( (\text{NO}_2) \) और नाइट्रोजन पेंटाऑक्साइड \( (\text{N}_2\text{O}_5) \) दोनों ही अनुनाद दिखाते हैं, जिसका अर्थ है कि उनके इलेक्ट्रॉन विभिन्न बंधों के बीच डीलोकलाइज्ड होते हैं। \( \text{NO}_2 \) में, एक इलेक्ट्रॉन बंध बनाने में भाग नहीं लेता, जिससे मुक्त मूलक बनता है। \( \text{N}_2\text{O}_5 \) में, दोनों नाइट्रोजन परमाणु केंद्रीय ऑक्सीजन से जुड़े होते हैं, और प्रत्येक नाइट्रोजन दो ऑक्सीजन परमाणुओं से भी जुड़ा होता है, जिसमें बहु बंधों का अनुनाद होता है। अनुनाद संरचनाएं यह बताती हैं कि एक अणु की वास्तविक संरचना किसी एक लुईस संरचना से बेहतर, कई संरचनाओं का मिश्रण होती है।
(i) \( \text{NO}_2 \) की अनुनादी संरचनायें
(ii) \( \text{N}_2\text{O}_5 \) की अनुनादी संरचनायें
\[ \text{O}=\text{N}^{+}(\text{O})-\text{O}-\text{N}^{+}(\text{O})=\text{O} \quad \leftrightarrow \quad \text{O}^{-}-\text{N}^{+}=\text{O}-\text{O}-\text{N}^{+}(\text{O})=\text{O} \quad \leftrightarrow \quad \text{O}=\text{N}^{+}(\text{O})-\text{O}-\text{N}^{+}=\text{O}-\text{O}^{-} \]In simple words: NO2 और N2O5 दोनों में इलेक्ट्रॉन बंधों के बीच घूमते रहते हैं, जिससे उनकी संरचनाएं स्थिर रहती हैं। इसे अनुनाद कहते हैं।
🎯 Exam Tip: अनुनाद संरचनाओं में हमेशा परमाणुओं की स्थिति वही रहती है, केवल इलेक्ट्रॉन युग्मों की व्यवस्था भिन्न होती है। औपचारिक आवेशों को सही ढंग से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 19. R3 P = O पाया जाता है जबकि R3 N = O नहीं, क्यों (R = ऐल्किल समूहो) ?
Answer: \( \text{R}_3\text{P=O} \) यौगिक मौजूद होता है, जबकि \( \text{R}_3\text{N=O} \) नहीं। इसका कारण यह है कि नाइट्रोजन में \( \text{d} \)-कक्षक नहीं होते, जिसके कारण यह अपनी सहसंयोजकता को चार से अधिक नहीं बढ़ा सकता। नाइट्रोजन, \( \text{p}\pi\text{-p}\pi \) बहु बंध तो बना सकता है, लेकिन \( \text{d} \)-कक्षक की अनुपस्थिति इसे \( \text{p}\pi\text{-d}\pi \) बंध बनाने से रोकती है। इसके विपरीत, फास्फोरस में \( \text{d} \)-कक्षक उपलब्ध होते हैं। इन \( \text{d} \)-कक्षकों का उपयोग करके फास्फोरस अपनी सहसंयोजकता को चार से अधिक बढ़ा सकता है, जिससे यह \( \text{p}\pi\text{-d}\pi \) बंध बना पाता है और \( \text{R}_3\text{P=O} \) जैसे यौगिकों का निर्माण संभव होता है। \( \text{R}_3\text{N=O} \) में नाइट्रोजन को पाँच सहसंयोजकता दर्शानी पड़ेगी, जो संभव नहीं है। यह \( \text{d} \)-कक्षकों की उपलब्धता तत्वों के बंध बनाने की क्षमता को कैसे प्रभावित करती है, इसका एक अच्छा उदाहरण है।
In simple words: फॉस्फोरस \( \text{R}_3\text{P=O} \) बना सकता है क्योंकि उसके पास \( \text{d} \)-कक्षक होते हैं, जिससे वह ज्यादा बंध बना पाता है। नाइट्रोजन \( \text{R}_3\text{N=O} \) नहीं बना सकता क्योंकि उसके पास \( \text{d} \)-कक्षक नहीं होते और वह चार से ज्यादा बंध नहीं बना सकता।
🎯 Exam Tip: दूसरे आवर्त के तत्वों (जैसे नाइट्रोजन) में \( \text{d} \)-कक्षक नहीं होते, जिससे उनकी अधिकतम सहसंयोजकता 4 तक सीमित रहती है, जबकि तीसरे और उसके बाद के आवर्त के तत्व (जैसे फॉस्फोरस) अपने \( \text{d} \)-कक्षक का उपयोग करके सहसंयोजकता का विस्तार कर सकते हैं।
Question 20. समझाइये कि क्यों NH3 क्षारकीय है जबकि BiH₃ केवल दुर्बल क्षारक है।
Answer: अमोनिया \( (\text{NH}_3) \) एक मजबूत क्षारक है, जबकि बिस्मथ हाइड्राइड \( (\text{BiH}_3) \) एक कमजोर क्षारक है। नाइट्रोजन का आकार बहुत छोटा होता है और इसकी विद्युत् ऋणात्मकता बहुत अधिक होती है, जिससे नाइट्रोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है। इस कारण, \( \text{NH}_3 \) में नाइट्रोजन आसानी से एक इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर सकता है, और यह एक प्रबल क्षारक के रूप में कार्य करता है। इसके विपरीत, वर्ग 15 में नीचे जाने पर, परमाणुओं का आकार बढ़ता जाता है और उनकी विद्युत् ऋणात्मकता कम होती जाती है। बिस्मथ का आकार बहुत बड़ा और विद्युत् ऋणात्मकता कम होने के कारण, \( \text{BiH}_3 \) में बिस्मथ इलेक्ट्रॉन युग्म को मुश्किल से दान करता है, जिससे यह एक बहुत दुर्बल क्षारक बन जाता है। क्षारकता की यह प्रवृत्ति आवर्त सारणी में समूह में नीचे जाने पर घटती है।
In simple words: NH3 मजबूत क्षारक है क्योंकि नाइट्रोजन छोटा है और उसके पास इलेक्ट्रॉन घनत्व ज्यादा होता है, जिससे वह आसानी से इलेक्ट्रॉन दान कर सकता है। BiH3 कमजोर क्षारक है क्योंकि बिस्मथ बड़ा है और उसके इलेक्ट्रॉन दान करने की क्षमता कम होती है।
🎯 Exam Tip: किसी तत्व की क्षारकता उसके इलेक्ट्रॉन युग्म दान करने की क्षमता से संबंधित होती है, जो परमाणु के आकार और विद्युत् ऋणात्मकता पर निर्भर करती है।
Question 22. क्या PCI5 ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों का कार्य कर सकता है ? तर्क दीजिये।
Answer: फॉस्फोरस पेंटाक्लोराइड \( (\text{PCl}_5) \) केवल ऑक्सीकारक (oxidizing agent) के रूप में कार्य कर सकता है, अपचायक (reducing agent) के रूप में नहीं। एक ऑक्सीकारक वह होता है जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अपनी ऑक्सीकरण संख्या कम करता है, जबकि एक अपचायक वह होता है जो इलेक्ट्रॉन दान करके अपनी ऑक्सीकरण संख्या बढ़ाता है। \( \text{PCl}_5 \) में फास्फोरस की ऑक्सीकरण संख्या +5 होती है, जो फास्फोरस की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था है। इसलिए, फास्फोरस और इलेक्ट्रॉन दान नहीं कर सकता और अपनी ऑक्सीकरण संख्या नहीं बढ़ा सकता, जिसका अर्थ है कि यह अपचायक के रूप में कार्य नहीं कर सकता। हालांकि, यह इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अपनी ऑक्सीकरण संख्या को +5 से +3 तक कम कर सकता है, इसलिए यह एक मजबूत ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। यह \( \text{PCl}_5 \) की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की क्षमता को दर्शाता है, जिससे यह अन्य तत्वों को ऑक्सीकृत कर पाता है।
(i) \( \text{Sn} + 2\text{PCl}_5 \rightarrow \text{SnCl}_4 + 2\text{PCl}_3 \)
(ii) \( 2\text{Ag} + \text{PCl}_5 \rightarrow 2\text{AgCl} + \text{PCl}_3 \)
In simple words: PCl5 सिर्फ ऑक्सीकारक है, अपचायक नहीं। इसमें फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण संख्या पहले ही सबसे ज्यादा (+5) होती है, इसलिए यह और इलेक्ट्रॉन नहीं दे सकता। लेकिन यह इलेक्ट्रॉन लेकर अपनी ऑक्सीकरण संख्या कम कर सकता है।
🎯 Exam Tip: किसी यौगिक की अधिकतम या न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था उसके ऑक्सीकारक या अपचायक व्यवहार को निर्धारित करती है। उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक केवल ऑक्सीकारक हो सकता है।
Question 23. कौन से एरोसोल्स ओजोन पर्त का क्षय करते हैं ?
Answer: क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), जिन्हें फ्रीऑन भी कहा जाता है, ओजोन परत के क्षय के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार एरोसोल हैं। जब ये CFCs वायुमंडल में ऊपर पहुँचते हैं, तो पराबैंगनी किरणें उन्हें तोड़कर क्लोरीन मुक्त मूलक \( (\text{Cl} \cdot) \) बनाती हैं। ये क्लोरीन मुक्त मूलक ओजोन \( (\text{O}_3) \) अणुओं के साथ अभिक्रिया करके उन्हें ऑक्सीजन \( (\text{O}_2) \) में परिवर्तित कर देते हैं, जिससे ओजोन परत पतली होती जाती है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक क्लोरीन मुक्त मूलक निष्क्रिय नहीं हो जाते। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है, और इसका क्षय त्वचा कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।
\[ \text{ClO}_{(g)} + \text{ClO}_{(g)} \rightarrow \text{Cl}_2(\text{g}) + \text{O}_2(\text{g}) \]In simple words: CFCs (फ्रीऑन) ओजोन परत को नुकसान पहुँचाते हैं। सूरज की किरणें उन्हें तोड़कर क्लोरीन मुक्त कण बनाती हैं। ये कण ओजोन को ऑक्सीजन में बदल देते हैं, जिससे ओजोन परत कमजोर हो जाती है।
🎯 Exam Tip: ओजोन परत के क्षय में क्लोरीन मुक्त मूलकों की उत्प्रेरक भूमिका को याद रखें, क्योंकि एक क्लोरीन परमाणु हजारों ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है।
Question 24. संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 के उत्पादन का वर्णन कीजिये।
Answer: सल्फ्यूरिक अम्ल \( (\text{H}_2\text{SO}_4) \) का उत्पादन संस्पर्श विधि (Contact Process) नामक प्रक्रिया द्वारा किया जाता है, जिसमें तीन मुख्य चरण शामिल होते हैं। पहले चरण में, सल्फर या सल्फाइड अयस्कों को हवा में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड \( (\text{SO}_2) \) बनाया जाता है। दूसरे चरण में, \( \text{SO}_2 \) को वैनेडियम पेंटाऑक्साइड \( (\text{V}_2\text{O}_5) \) उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया कराकर सल्फर ट्राइऑक्साइड \( (\text{SO}_3) \) में परिवर्तित किया जाता है। अंत में, \( \text{SO}_3 \) को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल में अवशोषित करके ओलियम \( (\text{H}_2\text{S}_2\text{O}_7) \) प्राप्त किया जाता है, जिसे बाद में पानी मिलाकर शुद्ध सल्फ्यूरिक अम्ल में बदला जा सकता है। यह औद्योगिक प्रक्रिया दुनिया भर में रासायनिक उद्योग के लिए सल्फ्यूरिक अम्ल के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: सल्फ्यूरिक अम्ल बनाने के लिए संस्पर्श विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें सल्फर को जलाकर \( \text{SO}_2 \) बनाते हैं, फिर \( \text{SO}_2 \) को \( \text{SO}_3 \) में बदलते हैं, और अंत में \( \text{SO}_3 \) को सल्फ्यूरिक अम्ल में घोलकर ओलियम बनाते हैं।
🎯 Exam Tip: संस्पर्श विधि के प्रत्येक चरण के रासायनिक समीकरणों और उत्प्रेरक की भूमिका को याद रखें, क्योंकि यह औद्योगिक रसायन विज्ञान का एक मूलभूत विषय है।
Question 25. SO2 किस प्रकार से एक वायु प्रदूषक है?
Answer: सल्फर डाइऑक्साइड \( (\text{SO}_2) \) एक तीखी गंध वाली, रंगहीन गैस है और एक गंभीर वायु प्रदूषक है। इसका मुख्य हानिकारक प्रभाव श्वसन तंत्र पर पड़ता है। यदि हवा में इसकी मात्रा 5 पीपीएम तक पहुंच जाती है, तो यह त्वचा में जलन पैदा कर सकती है। धुएं के साथ मिलकर, \( \text{SO}_2 \) हमारी श्वास नली को अवरुद्ध कर देती है, जिससे अस्थमा, घुटन और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियाँ हो सकती हैं। यह पौधों के लिए भी हानिकारक है; 0.03 पीपीएम जैसे कम स्तर पर भी, यह पत्तियों के ऊतकों को नष्ट कर देती है और किनारों को क्षतिग्रस्त कर देती है। इसके अलावा, \( \text{SO}_2 \) अम्ल वर्षा का एक प्रमुख कारण है, जो पौधों, नदियों, तालाबों और ऐतिहासिक इमारतों जैसे संगमरमर को नुकसान पहुँचाती है। वायु में सल्फर डाइऑक्साइड का मुख्य स्रोत जीवाश्म ईंधन का जलना है, खासकर बिजली उत्पादन के लिए।
In simple words: SO2 एक जहरीली गैस है जो हवा को प्रदूषित करती है। यह सांस लेने में दिक्कत करती है, पौधों को खराब करती है और अम्ल वर्षा का कारण बनती है, जिससे इमारतें भी खराब होती हैं।
🎯 Exam Tip: \( \text{SO}_2 \) के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों को याद रखें, विशेषकर अम्ल वर्षा और श्वसन संबंधी बीमारियों में इसकी भूमिका।
Question 26. हैलोजन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं ?
Answer: हैलोजन तत्व बहुत मजबूत ऑक्सीकारक (oxidizing agents) होते हैं। ऐसा उनकी उच्च विद्युत् ऋणात्मकता, अत्यधिक ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी और कम बंध वियोजन ऐन्यैल्पी के कारण होता है। ये गुणधर्म उन्हें आसानी से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने और अपचयित होने की क्षमता प्रदान करते हैं। इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने के बाद, हैलोजन अपने नजदीकी अक्रिय गैस के स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को प्राप्त कर लेते हैं। इस उच्च इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति के कारण, वे अन्य पदार्थों को ऑक्सीकृत करते हैं। समूह में नीचे जाने पर हैलोजनों की ऑक्सीकरण क्षमता कम होती जाती है, इसलिए फ्लोरीन \( (\text{F}_2) \) सबसे प्रबल ऑक्सीकारक है और आयोडीन \( (\text{I}_2) \) सबसे दुर्बल ऑक्सीकारक है। हैलोजनों की उच्च इलेक्ट्रॉन बंधुता उन्हें इलेक्ट्रॉन खींचने वाले बल में अद्वितीय बनाती है, जिससे वे रासायनिक रूप से बहुत प्रतिक्रियाशील हो जाते हैं।
\( \text{X}(\text{g}) + \text{e}^- \rightarrow \text{X}^-(\text{g}) \)
In simple words: हैलोजन बहुत अच्छे ऑक्सीकारक होते हैं क्योंकि वे आसानी से इलेक्ट्रॉन ले लेते हैं। फ्लोरीन सबसे मजबूत है और आयोडीन सबसे कमजोर ऑक्सीकारक है।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीकारक क्षमता को प्रभावित करने वाले तीन मुख्य कारकों-उच्च विद्युत् ऋणात्मकता, इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी, और बंध वियोजन ऐन्यैल्पी-को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 28. हैलोजन रंगीन क्यों होते हैं ?
Answer: सभी हैलोजन रंगीन दिखाई देते हैं क्योंकि वे दृश्य प्रकाश क्षेत्र से ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। जब प्रकाश की किरणें हैलोजन अणुओं पर पड़ती हैं, तो उनके बाहरी कोश में मौजूद इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं। प्रत्येक हैलोजन अलग-अलग मात्रा में क्वांटम ऊर्जा को अवशोषित करता है, जिसके परिणामस्वरूप वे अलग-अलग रंग प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, फ्लोरीन पीला होता है, क्लोरीन हरा-पीला, ब्रोमीन लाल और आयोडीन बैंगनी रंग का होता है। जिस रंग का प्रकाश अवशोषित नहीं होता, वही रंग हमें दिखाई देता है। यह अवशोषण स्पेक्ट्रम और देखे गए रंग के बीच के संबंध का एक स्पष्ट उदाहरण है।
In simple words: हैलोजन रंगीन होते हैं क्योंकि वे प्रकाश से ऊर्जा सोखते हैं, जिससे उनके इलेक्ट्रॉन ऊपरी ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं। हर हैलोजन अलग रंग का प्रकाश सोखता है, इसलिए वे अलग-अलग रंगों के दिखते हैं।
🎯 Exam Tip: हैलोजनों के विशिष्ट रंगों को याद रखना रासायनिक पहचान में सहायक होता है; यह उत्तेजित अवस्था में इलेक्ट्रॉनों के संक्रमण के कारण होता है।
Question 29. जल के साथ F2 तथा Cl2 की अभिक्रियायें लिखिये।
Answer: फ्लोरीन \( (\text{F}_2) \) और क्लोरीन \( (\text{Cl}_2) \) दोनों जल के साथ विभिन्न प्रकार से अभिक्रिया करते हैं:
(i) फ्लोरीन जल के साथ: \( \text{F}_2 \) एक बहुत मजबूत ऑक्सीकारक है, और यह जल \( (\text{H}_2\text{O}) \) को ऑक्सीजन \( (\text{O}_2) \) या ओजोन \( (\text{O}_3) \) में ऑक्सीकृत कर देता है।
\( 2\text{F}_2(\text{g}) + 2\text{H}_2\text{O}(\text{l}) \rightarrow 4\text{H}^+ (\text{aq}) + 4\text{F}^- (\text{aq}) + \text{O}_2 (\text{g}) \)
\( 3\text{F}_2(\text{g}) + 3\text{H}_2\text{O} (\text{l}) \rightarrow 6\text{H}^+ (\text{aq}) + 6\text{F}^- (\text{aq}) + \text{O}_3 (\text{g}) \)
(ii) क्लोरीन जल के साथ: \( \text{Cl}_2 \) जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक अम्ल \( (\text{HCl}) \) और हाइपोक्लोरस अम्ल \( (\text{HOCl}) \) बनाता है। हाइड्रोक्लोरस अम्ल एक कमजोर ऑक्सीकारक है।
\( \text{Cl}_2(\text{g}) + \text{H}_2\text{O}(\text{l}) \rightarrow \text{HCl}(\text{aq}) + \text{HOCl}(\text{aq}) \)
In simple words: फ्लोरीन जल के साथ प्रतिक्रिया करके ऑक्सीजन या ओजोन बनाती है। क्लोरीन जल के साथ प्रतिक्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और हाइपोक्लोरस अम्ल बनाती है।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन जल को ऑक्सीकृत करता है जबकि क्लोरीन जल के साथ असमानुपातन अभिक्रिया करता है, यह हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता में अंतर का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
Question 30. उत्कृष्ट गैस के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े क्यों होते हैं ?
Answer: उत्कृष्ट गैसों का परमाण्विक आकार, या परमाण्विक त्रिज्या, उनके संबंधित आवर्त में सबसे अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उत्कृष्ट गैसें अणु नहीं बनाती हैं, और उनकी त्रिज्या को वान्डर वाल्स त्रिज्या के रूप में मापा जाता है। इसके विपरीत, अन्य तत्वों की त्रिज्याओं को सहसंयोजक त्रिज्याओं के रूप में मापा जाता है। चूंकि वान्डर वाल्स त्रिज्याएँ हमेशा सहसंयोजक त्रिज्याओं की तुलना में बड़ी होती हैं, इसलिए उत्कृष्ट गैसों का परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़ा दिखाई देता है। यह त्रिज्या मापने के तरीके में अंतर का परिणाम है, न कि स्वयं परमाणु के आकार में वास्तविक बड़े अंतर का।
In simple words: उत्कृष्ट गैसों का आकार बड़ा दिखता है क्योंकि उनकी त्रिज्या वान्डर वाल्स त्रिज्या से मापी जाती है, जो दूसरे तत्वों की सहसंयोजक त्रिज्या से हमेशा बड़ी होती है। उत्कृष्ट गैसें अणु नहीं बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: वान्डर वाल्स त्रिज्या और सहसंयोजक त्रिज्या के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह परमाणुओं के आकार की तुलना को प्रभावित करता है और उत्कृष्ट गैसों के असामान्य रूप से बड़े आकार की व्याख्या करता है।
Question 11. उन तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये जिनमें H2SO4 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Answer: सल्फ्यूरिक अम्ल \( (\text{H}_2\text{SO}_4) \) कई उद्योगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके तीन प्रमुख उपयोग क्षेत्र निम्नलिखित हैं:
(i) पेट्रोलियम शोधन: इसका उपयोग पेट्रोलियम उत्पादों को शुद्ध करने और अशुद्धियों को दूर करने के लिए किया जाता है।
(ii) सीसा संचायक बैटरियाँ: यह कार और अन्य वाहनों में इस्तेमाल होने वाली सीसा-एसिड बैटरियों में एक प्रमुख इलेक्ट्रोलाइट के रूप में कार्य करता है।
(iii) उर्वरक उत्पादन: अमोनियम सल्फेट और सुपर फॉस्फेट जैसे कई महत्वपूर्ण उर्वरकों के निर्माण में इसका व्यापक रूप से उपयोग होता है, जो कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करते हैं।
सल्फ्यूरिक अम्ल को अक्सर 'रसायनों का राजा' कहा जाता है क्योंकि इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में होता है।
In simple words: सल्फ्यूरिक अम्ल पेट्रोलियम साफ करने में, कारों की बैटरी में और उर्वरक (जैसे अमोनियम सल्फेट) बनाने में बहुत काम आता है।
🎯 Exam Tip: सल्फ्यूरिक अम्ल के औद्योगिक अनुप्रयोगों को याद रखें, क्योंकि यह रसायन विज्ञान और अर्थव्यवस्था दोनों में इसके महत्व को दर्शाता है।
Question 12. संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 की मात्रा में वृद्धि करने के लिये आवश्यक परिस्थितियों को लिखिये।
Answer: सल्फ्यूरिक अम्ल \( (\text{H}_2\text{SO}_4) \) के संस्पर्श प्रक्रम में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, क्योंकि \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) की अधिक मात्रा बनाने के लिए सल्फर ट्राइऑक्साइड \( (\text{SO}_3) \) का अधिक उत्पादन आवश्यक है। \( \text{SO}_3 \) बनाने की अभिक्रिया \( (2\text{SO}_2 + \text{O}_2 \rightleftharpoons 2\text{SO}_3) \) ऊष्माक्षेपी और उत्क्रमणीय है, और अग्र अभिक्रिया में गैसों के आयतन में कमी आती है। इसलिए, ले चैटलियर के सिद्धांत के अनुसार, निम्नलिखित स्थितियाँ आवश्यक हैं:
(i) कम तापमान: लगभग 720 K का तापमान उच्च उत्पाद के लिए आवश्यक है, क्योंकि अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी है।
(ii) उच्च दाब: लगभग 2 बार का उच्च दाब उच्च उत्पाद के लिए आवश्यक है, क्योंकि अग्र अभिक्रिया में गैसों का आयतन घटता है।
(iii) उत्प्रेरक \( (\text{V}_2\text{O}_5) \) की उपस्थिति: यह अभिक्रिया की दर को बढ़ा देता है।
(iv) शुद्ध अभिकारक: गैसों का धूल के कणों और आर्सेनिक यौगिकों जैसी अशुद्धियों से मुक्त होना उच्च उत्पाद के लिए महत्वपूर्ण है।
ये अनुकूल परिस्थितियाँ रासायनिक संतुलन को उत्पादों की दिशा में स्थानांतरित करती हैं, जिससे उत्पादन दक्षता बढ़ती है।
\[ 2\text{SO}_2 + \text{O}_2 \xrightarrow{\text{V}_2\text{O}_5}} 2\text{SO}_3 \text{; } \Delta\text{H} = -196.6 \text{ kJ/mol} \]In simple words: संस्पर्श विधि में ज्यादा सल्फ्यूरिक अम्ल बनाने के लिए, हमें कम तापमान (720K), उच्च दाब (2 बार) और \( \text{V}_2\text{O}_5 \) उत्प्रेरक का उपयोग करना चाहिए। साथ ही, गैसें साफ होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: ले चैटलियर के सिद्धांत का अनुप्रयोग औद्योगिक प्रक्रियाओं में अधिकतम उत्पाद प्राप्त करने के लिए स्थितियों को अनुकूलित करने में महत्वपूर्ण है।
Question 13. आबन्ध वियोजन ऐन्यैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी तथा जलयोजन ऐन्यैल्पी जैसे प्राचलों को महत्व देते हुये F2 तथा Cl2 की ऑक्सीकारक क्षमता की तुलना कीजिये।
Answer: फ्लोरीन \( (\text{F}_2) \) और क्लोरीन \( (\text{Cl}_2) \) दोनों प्रबल ऑक्सीकारक हैं, लेकिन \( \text{F}_2 \) की ऑक्सीकारक क्षमता \( \text{Cl}_2 \) से अधिक होती है। ऑक्सीकारक क्षमता मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करती है: बंध वियोजन ऐन्यैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी और जलयोजन ऐन्यैल्पी।
| फ्लुओरीन | क्लोरीन | |
|---|---|---|
| बंध वियोजन ऐन्यैल्पी | 158.8 kJ/mol | 242.6 kJ/mol |
| इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी | -333 kJ/mol | -349 kJ/mol |
| जलयोजन ऐन्यैल्पी | 515 kJ/mol | 381 kJ/mol |
\[ \text{F}_2 + 2\text{X}^- \rightarrow 2\text{F}^- + \text{X}_2 \text{ (X = Cl, Br तथा I)} \]In simple words: फ्लोरीन क्लोरीन से ज्यादा मजबूत ऑक्सीकारक है। फ्लोरीन की बंध ऊर्जा कम है और उसका आयन पानी में अच्छे से घुलता है (उच्च जलयोजन ऐन्यैल्पी)। ये दोनों कारक मिलकर फ्लोरीन को सबसे शक्तिशाली ऑक्सीकारक बनाते हैं, भले ही क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी ज्यादा हो।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन की उच्च जलयोजन ऐन्यैल्पी इसकी प्रबल ऑक्सीकारक शक्ति में एक महत्वपूर्ण योगदान कारक है, जो इसकी कम बंध वियोजन ऊर्जा और इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी को संतुलित करता है।
Question 14. दो उदाहरणों द्वारा फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार को दर्शाइये।
Answer: फ्लोरीन \( (\text{F}) \) अपने समूह के अन्य तत्वों की तुलना में कुछ असामान्य व्यवहार दिखाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
(i) बहुत छोटा आकार: फ्लोरीन परमाणु का आकार बहुत छोटा होता है।
(ii) कम F-F बंध वियोजन ऐन्यैल्पी: F-F बंध अन्य हैलोजनों के बंधों की तुलना में कमजोर होता है।
(iii) उच्च विद्युत् ऋणात्मकता: यह आवर्त सारणी में सबसे अधिक विद्युत् ऋणात्मक तत्व है।
(iv) \( \text{d} \)-कक्षकों की अनुपलब्धता: फ्लोरीन में \( \text{d} \)-कक्षक नहीं होते, जिससे यह अपनी सहसंयोजकता नहीं बढ़ा सकता।
इन कारणों से फ्लोरीन के असामान्य व्यवहार के दो उदाहरण:
(i) हाइड्रोजन फ्लोराइड \( (\text{HF}) \) द्रव अवस्था में होता है, जबकि अन्य सभी हाइड्रोजन हैलाइड \( (\text{HCl}, \text{HBr}, \text{HI}) \) कमरे के तापमान पर गैसें होते हैं। ऐसा \( \text{HF} \) में मजबूत हाइड्रोजन बंधों की उपस्थिति के कारण होता है।
(ii) फ्लोरीन केवल एक ऑक्सोअम्ल \( (\text{HFO}) \) बनाता है, जबकि अन्य हैलोजन कई ऑक्सोअम्ल बनाते हैं।
ये अद्वितीय गुणधर्म फ्लोरीन को रासायनिक प्रतिक्रियाओं में एक विशेष स्थान देते हैं, खासकर इसकी उच्च प्रतिक्रियाशीलता के लिए।
In simple words: फ्लोरीन कुछ अलग व्यवहार दिखाता है क्योंकि यह बहुत छोटा है, इसकी विद्युत् ऋणात्मकता ज्यादा है और इसमें \( \text{d} \)-कक्षक नहीं होते। उदाहरण के लिए, \( \text{HF} \) द्रव है और यह केवल एक ही ऑक्सोअम्ल बनाता है।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन का असामान्य व्यवहार उसके छोटे आकार और अत्यधिक विद्युत् ऋणात्मकता के सीधे परिणाम हैं; इन मौलिक गुणों को समझने से इसके अद्वितीय रसायन विज्ञान की व्याख्या करने में मदद मिलती है।
Question 15. समुद्र कुछ हैलोजनों का मुख्य स्रोत है। टिप्पणी कीजिये।
Answer: समुद्र और समुद्री स्रोत कई हैलोजन तत्वों के महत्वपूर्ण भंडार हैं। समुद्र के जल में मुख्य रूप से मैग्नीशियम, कैल्शियम, सोडियम और पोटेशियम के क्लोराइड, ब्रोमाइड और आयोडाइड मौजूद होते हैं। इनमें से सोडियम क्लोराइड (सामान्य नमक) सबसे प्रचुर मात्रा में होता है, जो लगभग 2.50% तक पाया जाता है। समुद्री तलछटों में भी सोडियम क्लोराइड और कार्नेलाइट \( (\text{KCl} \cdot \text{MgCl}_2 \cdot 6\text{H}_2\text{O}) \) जैसे हैलोजन यौगिक बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ समुद्री जीव, जैसे समुद्री शैवाल (उदाहरण के लिए, लेमिनेरिया प्रजाति), अपने शरीर में आयोडीन जमा करते हैं, जिनकी मात्रा 0.5% तक हो सकती है। चिली साल्टपीटर में भी 0.2% सोडियम आयोडेट के रूप में आयोडीन पाई जाती है। समुद्री जल में घुले इन आयनों को विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा निष्कर्षण किया जाता है।
In simple words: समुद्र हैलोजन जैसे क्लोरीन, ब्रोमीन और आयोडीन का बड़ा स्रोत है। इसमें नमक (सोडियम क्लोराइड) सबसे ज्यादा होता है। समुद्री शैवाल और कुछ खनिजों में भी आयोडीन पाई जाती है।
🎯 Exam Tip: समुद्री जल से हैलोजन के निष्कर्षण के औद्योगिक तरीकों, जैसे क्लोरीन के लिए इलेक्ट्रोलाइसिस और ब्रोमीन के लिए ब्रोमाइड ऑक्सीकरण, को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 16. नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न क्यों
Answer: नाइट्रोजन \( (\text{N}_2) \) और फॉस्फोरस \( (\text{P}) \) की रासायनिक क्रियाशीलता में महत्वपूर्ण अंतर होता है। नाइट्रोजन एक द्विपरमाणुक अणु \( (\text{N}_2) \) के रूप में मौजूद होता है, जहाँ दोनों नाइट्रोजन परमाणु एक बहुत मजबूत त्रिबंध \( (\text{N} \equiv \text{N}) \) से जुड़े होते हैं। इस त्रिबंध की बंध वियोजन ऊर्जा बहुत अधिक \( (941.4 \text{ kJ/mol}) \) होती है, जिसके कारण नाइट्रोजन कमरे के तापमान पर बहुत अक्रिय या कम क्रियाशील होता है।
इसके विपरीत, फॉस्फोरस आमतौर पर एक चतुष्परमाणुक अणु \( (\text{P}_4) \) के रूप में मौजूद होता है। \( \text{P}_4 \) अणु में \( \text{P-P} \) एकल बंध होते हैं। इन \( \text{P-P} \) एकल बंधों की बंध वियोजन ऊर्जा \( \text{N} \equiv \text{N} \) त्रिबंध की तुलना में बहुत कम होती है, जिससे फॉस्फोरस नाइट्रोजन की तुलना में अत्यधिक क्रियाशील होता है। यही कारण है कि सफेद फॉस्फोरस हवा में स्वतः प्रज्वलित हो जाता है। यह बंध ऊर्जा का अंतर तत्वों के रासायनिक व्यवहार में बड़ा बदलाव लाता है, खासकर उनकी प्रतिक्रियाशीलता में।
In simple words: नाइट्रोजन कम प्रतिक्रियाशील है क्योंकि उसके परमाणुओं के बीच बहुत मजबूत तीन बंध होते हैं, जिन्हें तोड़ना मुश्किल है। फॉस्फोरस अधिक प्रतिक्रियाशील है क्योंकि उसके परमाणुओं के बीच कमजोर एकल बंध होते हैं, जिन्हें आसानी से तोड़ा जा सकता है।
🎯 Exam Tip: तत्वों की प्रतिक्रियाशीलता को समझने के लिए बंध की प्रकृति (एकल, दोहरा, त्रिबंध) और बंध वियोजन ऊर्जा की तुलना करना आवश्यक है, खासकर एक ही समूह में।
प्रश्न 18. NH3 हाइड्रोजन बन्ध बनाती है, परन्तु PH3 नहीं बनाती, क्यों?
Answer: नाइट्रोजन (N) की इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता (विद्युत् ऋणात्मकता) हाइड्रोजन (H) से अधिक होती है, जो कि 3.0 और 2.1 है। इस कारण, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के बीच का N-H बंध बहुत ध्रुवीय (polar) बन जाता है। इसी ध्रुवीयता के कारण NH3 के अणुओं के बीच में हाइड्रोजन बंध बनते हैं, जिससे वे एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।
\( \delta^+ \)\( \text{H} \)
|
\( \delta^- \)\( \text{N} \)--\( \text{H} \) ... \( \delta^- \)\( \text{N} \)--- \( \text{H} \)
|
\( \delta^+ \)\( \text{H} \)
इसके ठीक उलट, फॉस्फोरस (P) और हाइड्रोजन (H) की विद्युत् ऋणात्मकता लगभग बराबर (2.1) होती है। इस वजह से P-H बंध ध्रुवीय नहीं होता है। इसी कारण PH3 के अणु हाइड्रोजन बंध नहीं बना पाते हैं। हाइड्रोजन बंध बनने के लिए एक परमाणु का बहुत ज़्यादा विद्युत् ऋणात्मक होना ज़रूरी है ताकि वह हाइड्रोजन परमाणु पर आंशिक धनात्मक आवेश ला सके।
In simple words: NH3 हाइड्रोजन बंध बनाता है क्योंकि नाइट्रोजन की इलेक्ट्रॉन खींचने की शक्ति हाइड्रोजन से अधिक है, जिससे N-H बंध ध्रुवीय हो जाता है। लेकिन PH3 हाइड्रोजन बंध नहीं बनाता क्योंकि फॉस्फोरस और हाइड्रोजन की इलेक्ट्रॉन खींचने की शक्ति लगभग बराबर होती है, जिससे P-H बंध ध्रुवीय नहीं होता।
🎯 Exam Tip: हमेशा याद रखें कि हाइड्रोजन बंध बनाने के लिए उच्च विद्युत् ऋणात्मकता (जैसे N, O, F) और हाइड्रोजन का सीधा जुड़ाव महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 19. प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं? संपन्न होने वाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
Answer: प्रयोगशाला में नाइट्रोजन गैस बनाने के लिए, अमोनियम क्लोराइड (\( \text{NH}_4\text{Cl} \)) और सोडियम नाइट्रेट (\( \text{NaNO}_2 \)) के पानी में घुले हुए बराबर मात्रा के घोलों को एक साथ गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया में पहले अमोनियम नाइट्राइट बनता है, जो बाद में गर्म करने पर नाइट्रोजन गैस और पानी में बदल जाता है।
\( \text{NH}_4\text{Cl(aq)} + \text{NaNO}_2\text{(aq)} \longrightarrow \text{NH}_4\text{NO}_2\text{(aq)} + \text{NaCl(aq)} \)
\( \text{NH}_4\text{NO}_2\text{(aq)} \xrightarrow{\Delta} \text{N}_2\text{(g)} + 2\text{H}_2\text{O(l)} \)
In simple words: प्रयोगशाला में नाइट्रोजन बनाने के लिए, अमोनियम क्लोराइड और सोडियम नाइट्रेट को पानी में मिलाकर गर्म करते हैं। इससे पहले अमोनियम नाइट्राइट बनता है, फिर वह टूटकर नाइट्रोजन गैस और पानी देता है।
🎯 Exam Tip: समीकरणों को संतुलित करना और भौतिक अवस्थाओं (जैसे (aq), (g), (l)) को सही से दर्शाना ज़रूरी है।
प्रश्न 20. अमोनिया का औद्योगिक उत्पादने कैसे किया जाता है?
Answer: अमोनिया को औद्योगिक स्तर पर 'हैबर विधि' (Haber's Process) का उपयोग करके बनाया जाता है। इस विधि में, नाइट्रोजन गैस (\( \text{N}_2 \)) और हाइड्रोजन गैस (\( \text{H}_2 \)) को मिलाकर, उच्च दबाव (लगभग 200 वायुमंडलीय) और मध्यम तापमान (लगभग 450°C) पर आयरन (लोहा) उत्प्रेरक की उपस्थिति में अभिक्रिया कराई जाती है। इस प्रक्रिया से अमोनिया (\( \text{NH}_3 \)) का निर्माण होता है, जो कई उद्योगों के लिए एक ज़रूरी कच्चा माल है।
In simple words: अमोनिया को हैबर विधि से बड़े कारखानों में बनाते हैं। इसमें नाइट्रोजन और हाइड्रोजन गैस को उच्च दबाव और तापमान पर एक साथ मिलाकर, उत्प्रेरक की मदद से अमोनिया में बदल देते हैं।
🎯 Exam Tip: हैबर विधि के मुख्य कारक- उच्च दाब, मध्यम ताप और आयरन उत्प्रेरक- को हमेशा याद रखें।
प्रश्न 21. उदाहरण देकर समझाइए कि कॉपर धातु HNO3 के साथ अभिक्रिया करके किस प्रकार भिन्न उत्पाद दे सकती है।
Answer: कॉपर धातु नाइट्रिक अम्ल (\( \text{HNO}_3 \)) की सांद्रता (concentration) के आधार पर अलग-अलग उत्पाद देती है।
1. **तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ:** जब कॉपर को तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है, तो यह कॉपर नाइट्रेट (\( \text{Cu(NO}_3\text{)}_2 \)) और नाइट्रिक ऑक्साइड (\( \text{NO} \)) गैस बनाती है।
\( 3\text{Cu} + 8\text{HNO}_3 \text{ (तनु)} \longrightarrow 3\text{Cu(NO}_3\text{)}_2 + 4\text{H}_2\text{O} + 2\text{NO} \)
2. **सांद्र नाइट्रिक अम्ल के साथ:** जब कॉपर को सांद्र नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कराया जाता है, तो यह कॉपर नाइट्रेट (\( \text{Cu(NO}_3\text{)}_2 \)) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (\( \text{NO}_2 \)) गैस बनाती है। इस तरह, अम्ल की सांद्रता बदलने पर अभिक्रिया के उत्पाद भी बदल जाते हैं।
\( \text{Cu} + 4\text{HNO}_3 \text{ (सान्द्र)} \longrightarrow \text{Cu(NO}_3\text{)}_2 + 2\text{H}_2\text{O} + 2\text{NO}_2 \)
In simple words: कॉपर धातु नाइट्रिक अम्ल के साथ अलग-अलग उत्पाद देती है। तनु अम्ल के साथ नाइट्रिक ऑक्साइड (\( \text{NO} \)) बनता है, जबकि सांद्र अम्ल के साथ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (\( \text{NO}_2 \)) गैस बनती है।
🎯 Exam Tip: धातुओं की अम्लों के साथ अभिक्रियाओं में, अम्ल की सांद्रता अक्सर उत्पादों को प्रभावित करती है, इसलिए इसे ध्यान से देखें।
प्रश्न 22. HNH कोण का मान HPH, HASH, तथा HSbH कोणों की अपेक्षा अधिक क्यों है ?
Answer: इन सभी हाइड्राइडों (\( \text{NH}_3 \), \( \text{PH}_3 \), \( \text{AsH}_3 \), \( \text{SbH}_3 \)) में, बीच वाला परमाणु (\( \text{N, P, As, Sb} \)) \( \text{sp}^3 \) संकरित होता है। इसका मतलब है कि इसके चार \( \text{sp}^3 \) ऑर्बिटल होते हैं। इनमें से तीन ऑर्बिटल हाइड्रोजन के साथ मिलकर E-H सिग्मा बंध बनाते हैं, और चौथा ऑर्बिटल एक अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pair) को रखता है।
\( \text{NH}_3 \) में, अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pair) और बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉन जोड़े (bond pair) के बीच का प्रतिकर्षण, दो बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉन जोड़ों के बीच के प्रतिकर्षण से ज़्यादा होता है। इस अधिक प्रतिकर्षण के कारण \( \text{NH}_3 \) का बंध कोण (bond angle) घटकर \( 107.8^\circ \) रह जाता है। जब हम समूह में नाइट्रोजन से नीचे फॉस्फोरस, आर्सेनिक और एंटीमनी की ओर जाते हैं, तो बीच वाले परमाणु का आकार बड़ा होता जाता है, लेकिन उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की शक्ति (विद्युत् ऋणात्मकता) कम होती जाती है। इस वजह से, इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रति इकाई आयतन कम हो जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन जोड़ों के बीच का प्रतिकर्षण बल भी कम हो जाता है। इसी कारण, बंध कोण का मान भी धीरे-धीरे घटता जाता है। केंद्रीय परमाणु के आकार में वृद्धि और विद्युत् ऋणात्मकता में कमी से बंधों की ध्रुवीयता घटती है, जो बंध कोण पर भी असर डालती है।
| \( \text{NH}_3 \) | \( \text{PH}_3 \) | \( \text{AsH}_3 \) | \( \text{SbH}_3 \) |
|---|---|---|---|
| \( 107.8^\circ \) | \( 93.6^\circ \) | \( 91.8^\circ \) | \( 91.3^\circ \) (बन्ध कोण) |
🎯 Exam Tip: VSEPR सिद्धांत (Valence Shell Electron Pair Repulsion theory) का उपयोग करके बंध कोणों की तुलना करते समय, अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pairs) और केंद्रीय परमाणु की विद्युत् ऋणात्मकता के प्रभाव को हमेशा याद रखें।
प्रश्न 23. नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है। तथा फॉस्फोरस \( \text{P}_4 \) के रूप में। क्यों ?
Answer: नाइट्रोजन का परमाणु आकार छोटा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता (विद्युत् ऋणात्मकता) बहुत अधिक होती है। इस कारण, नाइट्रोजन परमाणु आसानी से दूसरे नाइट्रोजन परमाणु के साथ \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध (multiple bonds), विशेष रूप से त्रिबंध, बना सकता है। इसी वजह से नाइट्रोजन हमेशा दो परमाणुओं वाले अणु (\( \text{N}_2 \)) के रूप में पाया जाता है, जहाँ दोनों नाइट्रोजन परमाणु एक मज़बूत त्रिबंध से जुड़े होते हैं। यह त्रिबंध नाइट्रोजन को बहुत स्थिर बनाता है।
इसके विपरीत, फॉस्फोरस का परमाणु आकार बड़ा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता कम होती है। इस कारण, फॉस्फोरस \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध बनाने में ज़्यादा सक्षम नहीं होता है। इसके बजाय, फॉस्फोरस परमाणु सिंगल बंध (\( \text{P-P} \) एकल बंध) बनाना पसंद करते हैं और एक चतुष्परमाणुक अणु (\( \text{P}_4 \)) के रूप में मौजूद होते हैं, जिसमें फॉस्फोरस के चार परमाणु एक टेट्राहेड्रल संरचना बनाते हैं।
In simple words: नाइट्रोजन का छोटा आकार और उच्च विद्युत् ऋणात्मकता उसे ट्रिपल बॉन्ड बनाने में मदद करती है, जिससे वह \( \text{N}_2 \) के रूप में होता है। फॉस्फोरस का बड़ा आकार उसे सिंगल बॉन्ड बनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वह \( \text{P}_4 \) के रूप में होता है।
🎯 Exam Tip: \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंधों की क्षमता छोटे और उच्च विद्युत् ऋणात्मकता वाले परमाणुओं में अधिक होती है, जो उनकी आणविक संरचना को निर्धारित करती है।
प्रश्न 24. श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।
Answer: श्वेत फॉस्फोरस और लाल फॉस्फोरस फॉस्फोरस के दो अलग-अलग रूप हैं, जिनके गुणों में कई महत्वपूर्ण अंतर होते हैं। ये अंतर उनकी आणविक संरचना के कारण होते हैं।
| क्रमांक | गुण | श्वेत फॉस्फोरस | लाल फॉस्फोरस |
|---|---|---|---|
| 3. | गन्ध | लहसुन जैसी गन्ध | गन्धहीन |
| 4. | कठोरता | मोम जैसा मृदु तथा चाकू से काटा जा सकता है | कठोर |
| 5. | विषैली प्रकृति | विषैला | विषैला नहीं होता |
| 6. | विलेयता | \( \text{CS}_2 \) में विलेय | \( \text{CS}_2 \) में अविलेय |
| 7. | गलनांक | 317 K | 563K पर ऊर्ध्वपातित हो जाता है तथा 43 वायुमण्डलीय दाब एवं 862K पर पिघल जाता है |
| 8. | घनत्व | 1.80 | 2.10 |
| 9. | क्रियाशीलता | अति क्रियाशील | कम क्रियाशील |
| 10. | क्लोरीन की क्रिया | क्लोरीन में तीव्रता से जल-कर \( \text{PCl}_3 \) तथा \( \text{PCl}_5 \) बनाता है | गर्म करने पर केवल \( \text{Cl}_2 \) से जुड़ जाता है |
**संरचना**
श्वेत फॉस्फोरस एक टेट्राहेड्रल \( \text{P}_4 \) अणु के रूप में मौजूद होता है, जो इसे बहुत प्रतिक्रियाशील बनाता है।
लाल फॉस्फोरस एक पॉलीमरिक संरचना होती है, जिसमें \( \text{P}_4 \) टेट्राहेड्रल इकाइयाँ एक साथ जुड़ी होती हैं, जिससे यह कम प्रतिक्रियाशील और ज़्यादा स्थिर होता है।
In simple words: श्वेत फॉस्फोरस लहसुन जैसी गंध वाला, मुलायम और ज़हरीला होता है, जो \( \text{CS}_2 \) में घुल जाता है और बहुत ज़्यादा प्रतिक्रियाशील होता है। लाल फॉस्फोरस गंधहीन, कठोर, ज़हरीला नहीं, \( \text{CS}_2 \) में अघुलनशील और कम प्रतिक्रियाशील होता है।
🎯 Exam Tip: फॉस्फोरस के दोनों रूपों की संरचनाओं और उनसे जुड़े मुख्य गुणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर तुलना के लिए पूछे जाते हैं।
प्रश्न 25. फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन श्रृंखलन गुणों को कम प्रदर्शित करती है, क्यों ?
Answer: नाइट्रोजन का परमाणु आकार छोटा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता (विद्युत् ऋणात्मकता) बहुत अधिक होती है। इस कारण, नाइट्रोजन परमाणु \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध (multiple bonds), विशेष रूप से त्रिबंध, आसानी से बना लेता है। \( \text{N}_2 \) अणु में नाइट्रोजन परमाणु एक-दूसरे से एक बहुत मज़बूत त्रिबंध (\( \text{N} \equiv \text{N} \)) से जुड़े होते हैं, जिसकी बंध वियोजन ऊर्जा (\( 941.4 \text{ kJ/mol} \)) बहुत ज़्यादा होती है। यह उच्च ऊर्जा नाइट्रोजन को बहुत स्थिर और कम प्रतिक्रियाशील बनाती है, जिससे वह लंबी श्रृंखलें (chains) नहीं बनाता।
इसके विपरीत, फॉस्फोरस का परमाणु आकार बड़ा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता कम होती है। इस कारण, फॉस्फोरस \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध बनाने में ज़्यादा सक्षम नहीं होता है। इसके बजाय, फॉस्फोरस परमाणु सिंगल बंध (\( \text{P-P} \) एकल बंध) बनाना पसंद करते हैं। \( \text{P-P} \) एकल बंध की बंध ऊर्जा \( \text{N-N} \) एकल बंध की तुलना में अधिक होती है। इस वजह से फॉस्फोरस में एक परमाणु से दूसरे परमाणु तक जुड़ने की क्षमता (श्रृंखलन गुण) नाइट्रोजन से अधिक होती है, जिससे वह \( \text{P}_4 \) (श्वेत या पीला फॉस्फोरस) और पॉलीमरिक (लाल फॉस्फोरस) संरचनाएँ बनाता है। छोटे परमाणुओं में ट्रिपल बॉन्ड बनाने की प्रवृत्ति ज़्यादा होती है, जो उन्हें स्थिर करती है और श्रृंखलन को कम करती है, जबकि बड़े परमाणुओं में सिंगल बॉन्ड बनाना आसान होता है, जिससे वे लंबी श्रृंखलें बनाते हैं।
In simple words: नाइट्रोजन का छोटा आकार और उच्च विद्युत् ऋणात्मकता उसे मज़बूत ट्रिपल बॉन्ड बनाने में मदद करती है, जिससे वह स्थिर रहता है और श्रृंखलन कम होता है। फॉस्फोरस का बड़ा आकार और कम विद्युत् ऋणात्मकता उसे सिंगल बॉन्ड बनाने के लिए प्रेरित करती है, जिससे वह लंबी श्रृंखलें बना पाता है।
🎯 Exam Tip: परमाणु आकार और विद्युत् ऋणात्मकता जैसे कारक तत्वों के बंध बनाने की क्षमता और श्रृंखलन गुणों को बहुत प्रभावित करते हैं।
प्रश्न 26. O, S, Se, Te तथा Po को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था तथा हाइड्राइड निर्माण के संदर्भ में आवर्त सारणी के एक ही वर्ग में रखने का तर्क दीजिये।
Answer: ऑक्सीजन (O), सल्फर (S), सेलेनियम (Se), टेल्यूरियम (Te) और पोलोनियम (Po) तत्वों को आवर्त सारणी के एक ही वर्ग (वर्ग 16) में रखने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाएँ और हाइड्राइड बनाने की क्षमता शामिल है:
(i) **इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:** इन सभी तत्वों के बाहरी कोश (valence shell) का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( \text{ns}^2 \text{np}^4 \) होता है। यह विन्यास दर्शाता है कि उनके पास बाहरी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन हैं, जिनमें से 2 \( \text{s} \)-कक्षक में और 4 \( \text{p} \)-कक्षक में होते हैं। इस समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण, इन सभी तत्वों को आवर्त सारणी के एक ही वर्ग (वर्ग 16) में रखना सही है, क्योंकि यह उनके रासायनिक गुणों की समानता को दर्शाता है। उदाहरण के लिए:
\( _8\text{O} \longrightarrow [\text{He}] 2\text{s}^2 2\text{p}^4 \)
\( _{16}\text{S} \longrightarrow [\text{Ne}] 3\text{s}^2 3\text{p}^4 \)
\( _{34}\text{Se} \longrightarrow [\text{Ar}] 3\text{d}^{10}, 4\text{s}^2, 4\text{p}^4 \)
\( _{52}\text{Te} \longrightarrow [\text{Kr}] 4\text{d}^{10} 5\text{s}^2 5\text{p}^4 \)
\( _{84}\text{Po} \longrightarrow [\text{Xe}] 4\text{f}^{14}, 5\text{d}^{10}, 6\text{s}^2 6\text{p}^4 \)
(ii) **ऑक्सीकरण अवस्था:** इन तत्वों को अपने सबसे करीबी अक्रिय गैस जैसा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पाने के लिए दो अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की ज़रूरत होती है। इसलिए, इनकी न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था -2 होनी चाहिए। ऑक्सीजन और सल्फर जैसे तत्व, जो ज़्यादा इलेक्ट्रॉन खींचने वाले होते हैं, आमतौर पर -2 ऑक्सीकरण अवस्था दिखाते हैं। इन तत्वों के बाहरी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे अधिकतम +6 ऑक्सीकरण अवस्था भी दिखा सकते हैं। इसके अलावा, ये तत्व +2 और +4 जैसी धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी दिखाते हैं। हालाँकि, ऑक्सीजन के पास d-कक्षक नहीं होते, इसलिए वह +4 और +6 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ नहीं दिखाता है। इन सभी ऑक्सीकरण अवस्थाओं की समानता के कारण, इन तत्वों को वर्ग 16 में रखना सही है।
(iii) **हाइड्राइडों का निर्माण:** ये सभी तत्व अपने बाहरी कोश के दो इलेक्ट्रॉनों को हाइड्रोजन के 1s कक्षक के साथ साझा करके अपना अष्टक (octet) पूरा करते हैं। इस तरह, वे सामान्य सूत्र \( \text{EH}_2 \) वाले हाइड्राइड बनाते हैं, जैसे \( \text{H}_2\text{O} \), \( \text{H}_2\text{S} \), \( \text{H}_2\text{Se} \), \( \text{H}_2\text{Te} \) और \( \text{H}_2\text{Po} \)। इन सभी हाइड्राइडों की समान रासायनिक संरचना और गुण, इन तत्वों को वर्ग 16 में रखने के तर्क को पूरी तरह से सही ठहराते हैं। हाइड्राइडों का निर्माण किसी तत्व की रासायनिक समानता को समझने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
In simple words: इन सभी तत्वों को वर्ग 16 में रखने का कारण उनके बाहरी इलेक्ट्रॉनों का एक जैसा विन्यास (\( \text{ns}^2 \text{np}^4 \)), समान ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (विशेषकर -2), और एक जैसे हाइड्राइड (\( \text{EH}_2 \)) बनाने की क्षमता है, जो उनके रासायनिक व्यवहार में समानता को दर्शाती है।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी में तत्वों के वर्गीकरण का मुख्य आधार उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उनसे उत्पन्न होने वाले रासायनिक गुणों की समानता है।
प्रश्न 27. क्यों डाइ-ऑक्सीजन एक गैस है, जबकि सल्फर एक ठोस है ?
Answer: ऑक्सीजन परमाणु का आकार बहुत छोटा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता (विद्युत् ऋणात्मकता) बहुत अधिक होती है। इस कारण, ऑक्सीजन परमाणु आसानी से दूसरे ऑक्सीजन परमाणु के साथ \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध (डबल बॉन्ड) बना सकता है। इसी वजह से ऑक्सीजन दो परमाणुओं वाले अणु (\( \text{O}_2 \)) के रूप में पाया जाता है, जहाँ दोनों ऑक्सीजन परमाणु एक मज़बूत द्विबंध से जुड़े होते हैं। ये \( \text{O}_2 \) अणु एक-दूसरे से बहुत कमज़ोर वान्डर वाल्स आकर्षण बलों (Van der Waals forces) से जुड़े होते हैं। ये कमज़ोर आकर्षण बल कमरे के तापमान पर आसानी से टूट जाते हैं, इसलिए \( \text{O}_2 \) गैस के रूप में रहती है।
इसके विपरीत, सल्फर परमाणु का आकार ऑक्सीजन से बड़ा होता है और उसकी इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता कम होती है। इस कारण, सल्फर \( \text{p}\pi-\text{p}\pi \) बहुल बंध बनाने में ज़्यादा सक्षम नहीं होता है। इसके बजाय, सल्फर परमाणु सिंगल बंध (\( \text{S-S} \) एकल बंध) बनाना पसंद करते हैं और श्रृंखलन (catenation) का गुण दिखाते हैं। सल्फर \( \text{S}_8 \) के क्राउन जैसे रिंग (ring) अणु बनाता है। ये \( \text{S}_8 \) अणु एक-दूसरे से मज़बूत अंतर-आणविक बलों से जुड़े होते हैं, जिसके कारण सल्फर कमरे के तापमान पर ठोस अवस्था में पाया जाता है। किसी तत्व के परमाणु आकार और बंधन क्षमता उसके भौतिक अवस्था को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: ऑक्सीजन छोटा होता है और डबल बॉन्ड बनाता है, जिससे कमज़ोर बल वाले \( \text{O}_2 \) अणु बनते हैं और यह गैस है। सल्फर बड़ा होता है, सिंगल बॉन्ड बनाता है और \( \text{S}_8 \) के रिंग बनाता है, जो मज़बूत बलों से जुड़े होते हैं, इसलिए यह ठोस है।
🎯 Exam Tip: तत्वों के परमाणु आकार, विद्युत् ऋणात्मकता और बहुल बंध बनाने की क्षमता उनके अणुओं के बीच लगने वाले बलों और उनके भौतिक गुणों को सीधे प्रभावित करते हैं।
ठोस S8 अणु
प्रश्न 28. यदि \( \text{O} \longrightarrow \text{O}^- \) तथा \( \text{O} \longrightarrow \text{O}^{2-} \) के इलेक्ट्रॉन लब्धि ऐन्यैल्पी मान पता हो, जो क्रमशः 141 तथा 702 \( \text{kJ mol}^{-1} \) है, तो आप कैसे स्पष्ट कर सकते हैं कि \( \text{O}^{2-} \) स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनते हैं न कि \( \text{O}^- \) वाले ?
Answer: ऑक्सीजन जब किसी धातु के साथ अभिक्रिया करती है, तो वह विभिन्न ऑक्साइड बनाती है। इन ऑक्साइडों में \( \text{O}^{2-} \) आयन ज़्यादातर क्यों बनते हैं, इसे जालक ऊर्जा (lattice energy) के ज़रिए समझा जा सकता है।
ऑक्सीजन में पहला इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर ऊर्जा निकलती है (ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया), जिससे \( \text{O}^- \) आयन बनता है:
\( \text{O(g)} + \text{e}^- \longrightarrow \text{O}^-\text{(g)} \), \( \Delta \text{egH}_1 = -141 \text{ kJ/mol} \)
लेकिन, \( \text{O}^- \) आयन में दूसरा इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर ऊर्जा देनी पड़ती है (ऊष्माशोषी अभिक्रिया), जिससे \( \text{O}^{2-} \) आयन बनता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि \( \text{O}^- \) पर पहले से ही ऋणात्मक आवेश होता है, जो आने वाले इलेक्ट्रॉन को प्रतिकर्षित करता है:
\( \text{O}^-\text{(g)} + \text{e}^- \longrightarrow \text{O}^{2-}\text{(g)} \), \( \Delta \text{egH}_2 = +702 \text{ kJ/mol} \)
जब धातु आयन और ऑक्सीजन आयन मिलकर ऑक्साइड बनाते हैं, तो जालक ऊर्जा निकलती है, जो पूरे यौगिक को स्थिर करती है। \( \text{O}^{2-} \) आयन पर \( -2 \) आवेश होता है, जबकि \( \text{O}^- \) पर \( -1 \) आवेश होता है। आयनों पर ज़्यादा आवेश होने के कारण, \( \text{M}^{2+} \) और \( \text{O}^{2-} \) के बीच जालक ऊर्जा \( \text{M}^+ \) और \( \text{O}^- \) के बीच की जालक ऊर्जा से बहुत ज़्यादा होती है। भले ही \( \text{O}^{2-} \) बनने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है, लेकिन धातु आयनों के साथ मिलकर बनने वाले यौगिकों में \( \text{O}^{2-} \) की उच्च जालक ऊर्जा इस ऊर्जा की कमी को पूरा कर देती है और पूरे यौगिक को बहुत स्थिर बना देती है। जालक ऊर्जा आयनिक यौगिकों की स्थिरता का एक महत्वपूर्ण माप है; जितनी ज़्यादा जालक ऊर्जा होगी, यौगिक उतना ही स्थिर होगा। इसलिए, \( \text{O}^{2-} \) वाले ऑक्साइड ज़्यादा स्थायी और अधिक सामान्य होते हैं।
In simple words: \( \text{O}^{2-} \) आयन वाले ऑक्साइड ज़्यादा बनते हैं, भले ही इसे बनाने में ऊर्जा लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि \( \text{O}^{2-} \) पर ज़्यादा आवेश होने से धातु आयनों के साथ बहुत ज़्यादा जालक ऊर्जा निकलती है, जो पूरे यौगिक को बहुत स्थिर बना देती है।
🎯 Exam Tip: आयनिक यौगिकों की स्थिरता मुख्य रूप से उनकी जालक ऊर्जा पर निर्भर करती है, जो आयनों के आवेश और आकार से प्रभावित होती है।
प्रश्न 29. स्पष्ट कीजिए कि क्यों लगभग एकसमान विद्युत् ऋणात्मकता होने के पश्चात भी नाइट्रोजन हाइड्रोजन आबन्ध निर्मित करता है। जबकि क्लोरीन नहीं?
Answer: नाइट्रोजन और क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता (विद्युत् ऋणात्मकता) लगभग समान होती है। फिर भी, नाइट्रोजन हाइड्रोजन बंध बनाता है, जबकि क्लोरीन नहीं बनाता, क्योंकि हाइड्रोजन बंध बनाने के लिए परमाणु का आकार छोटा और उसकी विद्युत् ऋणात्मकता उच्च होनी चाहिए। नाइट्रोजन का परमाणु आकार बहुत छोटा होता है, जिससे यह अपने हाइड्रोजन परमाणु पर आंशिक धनात्मक आवेश (\( \delta^+ \)) और अपने ऊपर आंशिक ऋणात्मक आवेश (\( \delta^- \)) ला पाता है। इस उच्च ध्रुवीयता के कारण \( \text{NH}_3 \) के अणु आपस में मज़बूत हाइड्रोजन बंध बना लेते हैं।
इसके विपरीत, क्लोरीन का परमाणु आकार नाइट्रोजन की तुलना में काफी बड़ा होता है। बड़े आकार के कारण, क्लोरीन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रति इकाई आयतन कम हो जाता है। भले ही क्लोरीन की विद्युत् ऋणात्मकता अधिक हो, लेकिन इसका बड़ा आकार और इलेक्ट्रॉन घनत्व का फैलाव इसे प्रभावी हाइड्रोजन बंध बनाने से रोकता है। हाइड्रोजन बंधों का बनना अणुओं के गुणों जैसे क्वथनांक और गलनांक को बहुत प्रभावित करता है।
In simple words: नाइट्रोजन का छोटा आकार और उच्च विद्युत् ऋणात्मकता इसे हाइड्रोजन बंध बनाने की अनुमति देती है, भले ही इसकी विद्युत् ऋणात्मकता क्लोरीन के समान हो। क्लोरीन का बड़ा आकार हाइड्रोजन बंध बनने में बाधा डालता है, भले ही उसकी विद्युत् ऋणात्मकता उच्च हो।
🎯 Exam Tip: हाइड्रोजन बंधों के लिए उच्च विद्युत् ऋणात्मकता और छोटा परमाणु आकार दोनों ही आवश्यक शर्तें हैं। केवल विद्युत् ऋणात्मकता ही काफी नहीं है।
प्रश्न 30. केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
Answer: हाइड्रोजन और क्लोरीन के बीच अभिक्रिया सूर्य के मंद प्रकाश की उपस्थिति में होती है, जिससे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनता है। यह अभिक्रिया गैसीय अवस्था में होती है।
\( \text{H}_2 \text{(g)} + \text{Cl}_2 \text{(g)} \xrightarrow{\text{सूर्य का मन्द प्रकाश}} 2\text{HCl (g)} \)
In simple words: हाइड्रोजन और क्लोरीन मिलकर सूर्य की धीमी रोशनी में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रकाश-प्रेरित अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक या प्रकाश की स्थिति को हमेशा समीकरण के ऊपर दर्शाना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 31. नील्स-बर्टलेट Xe तथा \( \text{PtF}_6 \) के बीच अभिक्रिया कराने के लिए कैसे प्रेरित हुए ?
Answer: नील्स बर्टलेट को जीनॉन (\( \text{Xe} \)) और प्लैटिनम हेक्साफ्लोराइड (\( \text{PtF}_6 \)) के बीच अभिक्रिया कराने की प्रेरणा तब मिली, जब उन्होंने देखा कि \( \text{PtF}_6 \) ऑक्सीजन (\( \text{O}_2 \)) के साथ अभिक्रिया करके एक आयनिक ठोस \( \text{O}_2^+\text{[PtF}_6\text{]}^- \) बनाता है। इस अभिक्रिया में \( \text{PtF}_6 \) ऑक्सीजन को \( \text{O}_2^+ \) आयन में ऑक्सीकृत कर देता है।
\( \text{O}_2\text{(g)} + \text{PtF}_6\text{(g)} \longrightarrow \text{O}_2^+\text{[PtF}_6\text{]}^- \)
बर्टलेट ने यह भी पाया कि जीनॉन (\( \text{Xe} \)) की पहली आयनन ऊर्जा \( 1170 \text{ kJ mol}^{-1} \) है, जो ऑक्सीजन (\( \text{O}_2 \)) अणु की पहली आयनन ऊर्जा (\( 1175 \text{ kJ mol}^{-1} \)) के लगभग बराबर है। क्योंकि \( \text{PtF}_6 \) ऑक्सीजन को ऑक्सीकृत कर सकता था, बर्टलेट ने अनुमान लगाया कि वह \( \text{Xe} \) को भी \( \text{Xe}^+ \) में ऑक्सीकृत कर सकता है। इसी सोच ने उन्हें \( \text{Xe} \) और \( \text{PtF}_6 \) के बीच अभिक्रिया कराने के लिए प्रेरित किया। जब उन्होंने इन दोनों को मिलाया, तो एक तेज़ अभिक्रिया हुई और एक लाल ठोस \( \text{Xe}^+\text{[PtF}_6\text{]}^- \) प्राप्त हुआ। यह उत्कृष्ट गैसों के रसायन विज्ञान में एक महत्वपूर्ण खोज थी।
\( \text{Xe} + \text{PtF}_6 \xrightarrow{278\text{K}} \text{Xe}^+\text{[PtF}_6\text{]}^- \)
In simple words: बर्टलेट ने देखा कि \( \text{PtF}_6 \) ऑक्सीजन को ऑक्सीकृत कर सकता है। फिर, उन्होंने पाया कि जीनॉन और ऑक्सीजन की आयनन ऊर्जाएँ लगभग एक जैसी हैं। इस समानता ने उन्हें \( \text{PtF}_6 \) का उपयोग करके जीनॉन को ऑक्सीकृत करने के लिए प्रेरित किया, जिससे पहला जीनॉन यौगिक बना।
🎯 Exam Tip: इस अभिक्रिया का महत्व उत्कृष्ट गैसों को रासायनिक रूप से सक्रिय साबित करने में है, जो पहले अक्रिय मानी जाती थीं।
प्रश्न 32. निम्नलिखित में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्या हैं ?
(i) \( \text{H}_3\text{PO}_3 \)
(ii) \( \text{PCl}_3 \)
(iii) \( \text{Ca}_3\text{P}_2 \)
(iv) \( \text{Na}_3\text{PO}_4 \)
(v) \( \text{POF}_3 \)
Answer: हम प्रत्येक यौगिक में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्था की गणना करेंगे:
(i) \( \text{H}_3\text{PO}_3 \):
हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण अवस्था \( +1 \) और ऑक्सीजन की \( -2 \) होती है।
\( 3(+1) + \text{x} + 3(-2) = 0 \)
\( 3 + \text{x} - 6 = 0 \)
\( \text{x} - 3 = 0 \)
\( \implies \text{x} = +3 \)
(ii) \( \text{PCl}_3 \):
क्लोरीन की ऑक्सीकरण अवस्था \( -1 \) होती है।
\( \text{x} + 3(-1) = 0 \)
\( \text{x} - 3 = 0 \)
\( \implies \text{x} = +3 \)
(iii) \( \text{Ca}_3\text{P}_2 \):
कैल्शियम की ऑक्सीकरण अवस्था \( +2 \) होती है।
\( 3(+2) + 2\text{x} = 0 \)
\( 6 + 2\text{x} = 0 \)
\( 2\text{x} = -6 \)
\( \implies \text{x} = -3 \)
(iv) \( \text{Na}_3\text{PO}_4 \):
सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था \( +1 \) और ऑक्सीजन की \( -2 \) होती है।
\( 3(+1) + \text{x} + 4(-2) = 0 \)
\( 3 + \text{x} - 8 = 0 \)
\( \text{x} - 5 = 0 \)
\( \implies \text{x} = +5 \)
(v) \( \text{POF}_3 \):
ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था \( -2 \) और फ्लोरीन की \( -1 \) होती है।
\( \text{x} + (-2) + 3(-1) = 0 \)
\( \text{x} - 2 - 3 = 0 \)
\( \text{x} - 5 = 0 \)
\( \implies \text{x} = +5 \)
फॉस्फोरस कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखा सकता है, जो उसकी रासायनिक प्रतिक्रियाओं में विविधता लाती हैं।
In simple words: \( \text{H}_3\text{PO}_3 \) और \( \text{PCl}_3 \) में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्था \( +3 \) है, \( \text{Ca}_3\text{P}_2 \) में \( -3 \) है, और \( \text{Na}_3\text{PO}_4 \) और \( \text{POF}_3 \) में \( +5 \) है।
🎯 Exam Tip: यौगिकों में ऑक्सीकरण अवस्था की गणना करते समय, ज्ञात तत्वों की स्थिर ऑक्सीकरण अवस्थाओं का उपयोग करें और ध्यान रखें कि कुल आवेश शून्य होना चाहिए।
प्रश्न 33. निम्नलिखित के लिये सन्तुलित समीकरण लिखिये –
(i) जब \( \text{NaCl} \) को \( \text{MnO}_2 \) की उपस्थिति में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
(ii) जब क्लोरीन गैस को \( \text{NaI} \) के जलीय विलयन में से प्रवाहित किया जाता है।
Answer:
(i) जब सोडियम क्लोराइड (\( \text{NaCl} \)) को मैंगनीज़ डाइऑक्साइड (\( \text{MnO}_2 \)) की उपस्थिति में सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (\( \text{H}_2\text{SO}_4 \)) के साथ गर्म किया जाता है, तो क्लोरीन गैस (\( \text{Cl}_2 \)) उत्पन्न होती है। यह अभिक्रिया हैलोजनों को उनके हैलाइड से बनाने का एक सामान्य तरीका है।
\( 4\text{NaCl} + \text{MnO}_2 + 4\text{H}_2\text{SO}_4 \longrightarrow \text{MnCl}_2 + 4\text{NaHSO}_4 + \text{Cl}_2 \uparrow + 2\text{H}_2\text{O} \)
(ii) जब क्लोरीन गैस (\( \text{Cl}_2 \)) को सोडियम आयोडाइड (\( \text{NaI} \)) के पानी में घुले हुए घोल में से प्रवाहित किया जाता है, तो क्लोरीन, आयोडाइड आयनों को आयोडीन (\( \text{I}_2 \)) में ऑक्सीकृत कर देती है। क्लोरीन आयोडीन से अधिक क्रियाशील होने के कारण ऐसा करती है।
\( \text{Cl}_2 + 2\text{NaI} \longrightarrow 2\text{NaCl} + \text{I}_2 \)
In simple words: पहले में, \( \text{NaCl} \), \( \text{MnO}_2 \) और सांद्र \( \text{H}_2\text{SO}_4 \) को गर्म करने पर क्लोरीन गैस बनती है। दूसरे में, क्लोरीन गैस को \( \text{NaI} \) घोल में डालने पर आयोडीन बनता है।
🎯 Exam Tip: रेडॉक्स अभिक्रियाओं में ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों होते हैं, और सही संतुलित समीकरणों में सभी अभिकारकों और उत्पादों को उनके सही भौतिक अवस्थाओं के साथ दर्शाना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 34. जीनॉन फ्लुओराइड \( \text{XeF}_2 \), \( \text{XeF}_4 \) तथा \( \text{XeF}_6 \) कैसे बनाये जाते हैं ?
Answer: जीनॉन फ्लुओराइड (\( \text{XeF}_2 \), \( \text{XeF}_4 \), \( \text{XeF}_6 \)) को जीनॉन गैस की फ्लोरीन के साथ अभिक्रिया कराकर अलग-अलग तापमान और दबाव की स्थितियों में बनाया जाता है, जिसमें फ्लोरीन के अनुपात को बदला जाता है:
(i) **\( \text{XeF}_2 \) का निर्माण:** जीनॉन (\( \text{Xe} \)) और फ्लोरीन (\( \text{F}_2 \)) गैस को \( 1:5 \) के अनुपात में लेकर, \( 673 \text{K} \) तापमान पर और \( 1 \text{ bar} \) दबाव पर सीधे अभिक्रिया कराने से जीनॉन डाइफ्लोराइड (\( \text{XeF}_2 \)) ठोस बनता है।
\( \text{Xe(g)} + \text{F}_2\text{(g)} \xrightarrow{673\text{K}, 1 \text{ bar}} \text{XeF}_2\text{(s)} \)
(ii) **\( \text{XeF}_4 \) का निर्माण:** जीनॉन (\( \text{Xe} \)) और फ्लोरीन (\( \text{F}_2 \)) गैस को \( 1:5 \) के अनुपात में लेकर, \( 873 \text{K} \) तापमान पर और \( 7 \text{ bar} \) दबाव पर अभिक्रिया कराने से जीनॉन टेट्राफ्लोराइड (\( \text{XeF}_4 \)) ठोस बनता है। इस अभिक्रिया में फ्लोरीन की मात्रा \( \text{XeF}_2 \) बनाने से ज़्यादा रखी जाती है।
\( \text{Xe(g)} + 2\text{F}_2\text{(g)} \xrightarrow{873\text{K}, 7 \text{ bar}} \text{XeF}_4\text{(s)} \)
(iii) **\( \text{XeF}_6 \) का निर्माण:** जीनॉन (\( \text{Xe} \)) और फ्लोरीन (\( \text{F}_2 \)) गैस को \( 1:20 \) के अनुपात में लेकर, \( 573 \text{K} \) तापमान पर और \( 60-70 \text{ bar} \) दबाव पर अभिक्रिया कराने से जीनॉन हेक्साफ्लोराइड (\( \text{XeF}_6 \)) ठोस बनता है।
\( \text{Xe(g)} + 3\text{F}_2\text{(g)} \xrightarrow{573\text{K}, 60-70 \text{ bar}} \text{XeF}_6\text{(s)} \)
\( \text{XeF}_6 \) को जीनॉन टेट्राफ्लोराइड (\( \text{XeF}_4 \)) और डाइऑक्सीजन डाइफ्लोराइड (\( \text{O}_2\text{F}_2 \)) के बीच \( 143 \text{K} \) पर अभिक्रिया कराकर भी बनाया जा सकता है:
\( \text{XeF}_4 + \text{O}_2\text{F}_2 \xrightarrow{143\text{K}} \text{XeF}_6 + \text{O}_2 \)
जीनॉन के फ्लोराइड बनाना संभव है क्योंकि फ्लोरीन सबसे ज़्यादा विद्युत् ऋणात्मक तत्व है और जीनॉन की आयनन ऊर्जा अन्य उत्कृष्ट गैसों की तुलना में कम होती है, जिससे यह बंध बना पाता है।
In simple words: \( \text{XeF}_2 \), \( \text{XeF}_4 \), और \( \text{XeF}_6 \) को जीनॉन और फ्लोरीन को अलग-अलग अनुपात, तापमान और दबाव पर गर्म करके बनाते हैं। \( \text{XeF}_6 \) को \( \text{XeF}_4 \) और \( \text{O}_2\text{F}_2 \) से भी बना सकते हैं।
🎯 Exam Tip: जीनॉन फ्लोराइड के निर्माण की शर्तें (तापमान, दबाव, अभिकारकों का अनुपात) उनके विशिष्ट फ्लोराइड उत्पाद के लिए महत्वपूर्ण हैं और इन्हें ध्यान में रखना चाहिए।
प्रश्न 35. किस उदासीन अणु के साथ \( \text{ClO}^- \) समइलेक्ट्रॉनी है ? क्या यह अणु लूइस क्षारक है ?
Answer: क्लोराइड आयन (\( \text{ClO}^- \)) में कुल \( 17 \text{ (Cl)} + 8 \text{ (O)} + 1 \text{ (ऋणात्मक आवेश)} = 26 \) इलेक्ट्रॉन होते हैं। वह उदासीन अणु जो \( \text{ClO}^- \) के समइलेक्ट्रॉनी (isoelectronic) है, वह क्लोरीन मोनोफ्लोराइड (\( \text{ClF} \)) है, जिसमें \( 17 \text{ (Cl)} + 9 \text{ (F)} = 26 \) इलेक्ट्रॉन होते हैं।
हाँ, \( \text{ClF} \) एक लूइस क्षारक (Lewis base) के रूप में कार्य कर सकता है क्योंकि इसके पास इलेक्ट्रॉन के अकेले जोड़े (lone pairs) होते हैं जिन्हें यह दान कर सकता है। समइलेक्ट्रॉनी प्रजातियों के समान इलेक्ट्रॉन संख्या होने के कारण उनके आकार और कुछ रासायनिक गुण अक्सर समान होते हैं।
In simple words: \( \text{ClO}^- \) का समइलेक्ट्रॉनी उदासीन अणु \( \text{ClF} \) है, क्योंकि दोनों में \( 26 \) इलेक्ट्रॉन होते हैं। \( \text{ClF} \) एक लूइस क्षारक हो सकता है क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन के जोड़े दान कर सकता है।
🎯 Exam Tip: समइलेक्ट्रॉनी प्रजातियों को पहचानने के लिए कुल इलेक्ट्रॉन संख्या की गणना करें, और लूइस क्षारक वे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन के जोड़े दान कर सकते हैं।
प्रश्न 36. निम्नलिखित में से कौन-सा एक अस्तित्व में नहीं है ?
(a) \( \text{XeOF}_4 \)
(b) \( \text{NeF}_2 \)
(c) \( \text{XeF}_2 \)
(d) \( \text{XeF}_6 \)
Answer: (b) \( \text{NeF}_2 \)
जीनॉन के फ्लोराइड जैसे \( \text{XeF}_2 \), \( \text{XeOF}_4 \), और \( \text{XeF}_6 \) सभी अस्तित्व में होते हैं, क्योंकि जीनॉन एक उत्कृष्ट गैस है जिसकी आयनन ऊर्जा अन्य उत्कृष्ट गैसों की तुलना में कम होती है और यह फ्लोरीन जैसे उच्च विद्युत् ऋणात्मक तत्वों के साथ यौगिक बना सकता है। लेकिन, नीऑन डाइफ्लोराइड (\( \text{NeF}_2 \)) अस्तित्व में नहीं है। नीऑन (\( \text{Ne} \)) उत्कृष्ट गैसों में सबसे ऊपर आता है और इसकी पहली और दूसरी आयनन ऊर्जाएँ बहुत ज़्यादा होती हैं। इसका मतलब है कि नीऑन से इलेक्ट्रॉन निकालना बहुत मुश्किल होता है, जिससे यह फ्लोरीन के साथ भी स्थायी यौगिक नहीं बना पाता। यह नीऑन की अक्रिय प्रकृति को दर्शाता है।
In simple words: \( \text{NeF}_2 \) अस्तित्व में नहीं है क्योंकि नीऑन की आयनन ऊर्जाएँ बहुत ज़्यादा होती हैं, जिससे यह फ्लोरीन के साथ स्थायी यौगिक नहीं बना पाता। जीनॉन के फ्लोराइड्स जैसे \( \text{XeF}_2 \), \( \text{XeOF}_4 \), और \( \text{XeF}_6 \) सभी अस्तित्व में होते हैं।
🎯 Exam Tip: उत्कृष्ट गैसों की रासायनिक क्रियाशीलता उनकी आयनन ऊर्जा पर निर्भर करती है; जिनकी आयनन ऊर्जा कम होती है (जैसे जीनॉन), वे यौगिक बना सकते हैं।
प्रश्न 37. उस उत्कृष्ट गैस स्पीशीज का सूत्र देकर संरचना की व्याख्या कीजिये जो कि इनके साथ समसंरचनीय है –
(a) \( \text{ICl}_4^- \)
(b) \( \text{IBr}_2^- \)
(c) \( \text{BrO}_3^- \)
Answer: हम प्रत्येक आयन के समइलेक्ट्रॉनी (isoelectronic) और समसंरचनीय (isostructural) उत्कृष्ट गैस स्पीशीज की पहचान करेंगे:
(a) \( \text{ICl}_4^- \):
\( \text{ICl}_4^- \) में कुल संयोजी इलेक्ट्रॉन \( 7 (\text{I}) + 4 \times 7 (\text{Cl}) + 1 (\text{आवेश}) = 36 \) होते हैं। उत्कृष्ट गैस प्रजाति जो \( \text{ICl}_4^- \) के समइलेक्ट्रॉनी और समसंरचनीय है, वह जीनॉन टेट्राफ्लोराइड (\( \text{XeF}_4 \)) है, जिसमें \( 8 (\text{Xe}) + 4 \times 7 (\text{F}) = 36 \) संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं।
\( \text{XeF}_4 \) की संरचना वर्ग समतलीय (Square Planar) होती है। जीनॉन परमाणु केंद्र में होता है, और चार फ्लोरीन परमाणु एक वर्ग के चारों कोनों पर होते हैं। जीनॉन पर दो अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pairs) होते हैं जो वर्ग के ऊपर और नीचे अक्षीय स्थिति में होते हैं, जिससे अणु को समतलीय आकार मिलता है।
(b) \( \text{IBr}_2^- \):
\( \text{IBr}_2^- \) में कुल संयोजी इलेक्ट्रॉन \( 7 (\text{I}) + 2 \times 7 (\text{Br}) + 1 (\text{आवेश}) = 22 \) होते हैं। उत्कृष्ट गैस प्रजाति जो \( \text{IBr}_2^- \) के समइलेक्ट्रॉनी और समसंरचनीय है, वह जीनॉन डाइफ्लोराइड (\( \text{XeF}_2 \)) है, जिसमें \( 8 (\text{Xe}) + 2 \times 7 (\text{F}) = 22 \) संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं।
\( \text{XeF}_2 \) में \( \text{sp}^3\text{d} \) संकरण होता है और इसकी संरचना रेखीय (Linear) होती है। जीनॉन परमाणु केंद्र में होता है और दो फ्लोरीन परमाणु सीधी रेखा में होते हैं। जीनॉन पर तीन अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pairs) होते हैं जो समतल पर त्रिकोणीय स्थिति में होते हैं, जबकि फ्लोरीन परमाणु अक्षीय स्थिति में होते हैं।
(c) \( \text{BrO}_3^- \):
\( \text{BrO}_3^- \) में कुल संयोजी इलेक्ट्रॉन \( 7 (\text{Br}) + 3 \times 6 (\text{O}) + 1 (\text{आवेश}) = 26 \) होते हैं। उत्कृष्ट गैस प्रजाति जो \( \text{BrO}_3^- \) के समइलेक्ट्रॉनी और समसंरचनीय है, वह जीनॉन ट्राइऑक्साइड (\( \text{XeO}_3 \)) है, जिसमें \( 8 (\text{Xe}) + 3 \times 6 (\text{O}) = 26 \) संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं।
\( \text{XeO}_3 \) में \( \text{sp}^3 \) संकरण होता है और इसकी संरचना त्रिकोणीय पिरामिडीय (Trigonal Pyramidal) होती है। जीनॉन परमाणु केंद्र में होता है और तीन ऑक्सीजन परमाणु पिरामिड के आधार पर होते हैं। जीनॉन पर एक अकेला इलेक्ट्रॉन जोड़ा होता है जो पिरामिड के शीर्ष पर होता है।
In simple words: \( \text{ICl}_4^- \) के लिए \( \text{XeF}_4 \) (वर्ग समतलीय) समसंरचनीय है; \( \text{IBr}_2^- \) के लिए \( \text{XeF}_2 \) (रेखीय) समसंरचनीय है; और \( \text{BrO}_3^- \) के लिए \( \text{XeO}_3 \) (त्रिकोणीय पिरामिडीय) समसंरचनीय है।
🎯 Exam Tip: समसंरचनीय प्रजातियों की पहचान करने के लिए कुल संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या और VSEPR सिद्धांत का उपयोग करके आणविक ज्यामिति का निर्धारण करें।
प्रश्न 38. निऑन तथा ऑर्गन गैसों के उपयोग सूचीबद्ध कीजिये।
Answer: निऑन (Neon) और ऑर्गन (Argon) उत्कृष्ट गैसें हैं जिनके कई महत्वपूर्ण उपयोग हैं:
**निऑन का उपयोग (Uses of Neon)**
1. निऑन बल्बों का उपयोग पौधों को उगाने वाले बागानों (बोटैनिकल गार्डन) और ग्रीनहाउस में रोशनी देने के लिए किया जाता है।
2. निऑन का उपयोग विसर्जन ट्यूब लाइट और प्रदीप्त बल्बों में विज्ञापन प्रदर्शन के लिए किया जाता है, क्योंकि यह अलग-अलग रंगों में चमक पैदा करता है।
**ऑर्गन का उपयोग (Uses of Argon)**
1. ऑर्गन का उपयोग विद्युत् बल्बों को भरने में किया जाता है, क्योंकि यह उच्च तापमान पर भी रासायनिक रूप से अक्रिय रहती है, जिससे बल्ब के फिलामेंट का ऑक्सीकरण नहीं होता और उसकी उम्र बढ़ जाती है।
2. ऑर्गन का उपयोग वेल्डिंग (welding) जैसे धातुकर्म प्रक्रियाओं में एक निष्क्रिय वातावरण बनाने के लिए भी होता है, ताकि गर्म धातुएँ हवा की ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के साथ अभिक्रिया करके ख़राब न हों। उत्कृष्ट गैसें अपनी अक्रिय प्रकृति के कारण विभिन्न औद्योगिक और तकनीकी अनुप्रयोगों में महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: निऑन का उपयोग विज्ञापन रोशनी और पौधों के विकास में होता है। ऑर्गन का उपयोग विद्युत् बल्बों को भरने और वेल्डिंग में एक अक्रिय गैस के रूप में होता है।
🎯 Exam Tip: उत्कृष्ट गैसों के उपयोग अक्सर उनकी अक्रिय प्रकृति और अद्वितीय प्रकाश-उत्सर्जक गुणों पर आधारित होते हैं, जिन्हें याद रखना चाहिए।
प्रश्न 1. वर्ग 15 के तत्वों के सामान्य गुणधर्मों को उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था, परमाण्विक आकार, आयनन ऐन्यैल्पी तथा विद्युत् ऋणात्मकता के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
Answer: वर्ग-15 के तत्वों में नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), आर्सेनिक (As), ऐन्टिमनी (Sb), और बिस्मथ (Bi) शामिल हैं। इन तत्वों को सामूहिक रूप से निकोजेन्स (Pnicogens) कहा जाता है। इस वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर गुणों में क्रमबद्ध परिवर्तन देखा जाता है:
**इस वर्ग में -**
- अधातुएँ (Non Metals): नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P)
- उपधातुएँ (Metalloids): आर्सेनिक (As), ऐन्टिमनी (Sb)
- धातु (Metal): बिस्मथ (Bi)
**सामान्य गुणधर्मों की विवेचना:**
**इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:** इन सभी तत्वों के बाहरी कोश (valence shell) का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( \text{ns}^2 \text{np}^3 \) होता है। यह विन्यास दर्शाता है कि उनके पास बाहरी कोश में 5 इलेक्ट्रॉन हैं, जिनमें से 2 \( \text{s} \)-कक्षक में और 3 \( \text{p} \)-कक्षक में होते हैं।
**परमाण्विक आकार:** समूह में ऊपर से नीचे जाने पर परमाण्विक त्रिज्या लगातार बढ़ती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रत्येक अगले तत्व में एक नया कोश जुड़ जाता है, जिससे बाहरी इलेक्ट्रॉनों की नाभिक से दूरी बढ़ जाती है।
**आयनन ऐन्यैल्पी:** समूह में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन ऐन्यैल्पी (एक इलेक्ट्रॉन को हटाने के लिए ज़रूरी ऊर्जा) घटती जाती है। यह परमाणु का आकार बढ़ने और बाहरी इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का आकर्षण बल कम होने के कारण होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन को निकालना आसान हो जाता है।
**विद्युत् ऋणात्मकता:** समूह में ऊपर से नीचे जाने पर विद्युत् ऋणात्मकता (इलेक्ट्रॉन खींचने की क्षमता) घटती जाती है। यह परमाणु आकार में वृद्धि और नाभिक से बाहरी इलेक्ट्रॉनों की दूरी बढ़ने के कारण होता है।
**ऑक्सीकरण अवस्थाएँ:** ये तत्व विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाते हैं, जैसे \( -3, +3 \), और \( +5 \)।
- \( -3 \) ऑक्सीकरण अवस्था: नाइट्रोजन सबसे ज़्यादा \( -3 \) ऑक्सीकरण अवस्था दिखाता है, जबकि बिस्मथ इस अवस्था को बहुत कम दिखाता है, क्योंकि इसका धात्विक गुण ज़्यादा होता है।
- \( +3 \) ऑक्सीकरण अवस्था: समूह में नीचे जाने पर \( +3 \) ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व बढ़ता है, क्योंकि अक्रिय युग्म प्रभाव (inert pair effect) के कारण \( \text{ns}^2 \) इलेक्ट्रॉन बंध बनाने में भाग नहीं लेते।
- \( +5 \) ऑक्सीकरण अवस्था: समूह में नीचे जाने पर \( +5 \) ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व घटता है।
इस वर्ग के तत्वों में गुणों में धीरे-धीरे परिवर्तन होता है, जहाँ ऊपर के तत्व अधातु होते हैं और नीचे के तत्व धात्विक गुण दिखाते हैं।
In simple words: वर्ग 15 के तत्वों में \( \text{ns}^2 \text{np}^3 \) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है। समूह में नीचे जाने पर परमाण्विक आकार, आयनन ऊर्जा और विद्युत् ऋणात्मकता घटती है। ऑक्सीकरण अवस्थाएँ \( -3, +3 \) और \( +5 \) होती हैं, जिनकी स्थिरता समूह में बदलती रहती है।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी में किसी भी वर्ग के तत्वों के गुणों की विवेचना करते समय, उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को आधार बनाकर परमाणु आकार, आयनन ऊर्जा, विद्युत् ऋणात्मकता और ऑक्सीकरण अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों को क्रमबद्ध रूप से समझाएँ।
प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रत्येक समुच्चय को सामने लिखे गुणों के अनुसार सही क्रम में व्यवस्थित कीजिये -
(1) \( \text{F}_2, \text{Cl}_2, \text{Br}_2, \text{I}_2 \) – आबंध वियोजन ऐन्यैल्पी बढ़ते क्रम में
(2) \( \text{HF, HCl, HBr, HI} \) – अम्ल सामर्थ्य बढ़ते क्रम में
(3) \( \text{NH}_3, \text{PH}_3, \text{AsH}_3, \text{SbH}_3, \text{BiH}_3 \) – क्षारक सामर्थ्य बढ़ते क्रम में
Answer:
(1) **आबंध वियोजन ऐन्यैल्पी का बढ़ता क्रम:** \( \text{I}_2 < \text{F}_2 < \text{Br}_2 < \text{Cl}_2 \)
हैलोजन वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु का आकार बढ़ता है, जिससे उनके बीच बंध की लंबाई बढ़ती है और बंध को तोड़ने के लिए कम ऊर्जा की ज़रूरत होती है। इसलिए, सामान्य क्रम \( \text{Cl}_2 > \text{Br}_2 > \text{I}_2 \) होना चाहिए। हालाँकि, \( \text{F}_2 \) में एक अपवाद होता है। फ्लोरीन का आकार बहुत छोटा होता है, और \( \text{F}_2 \) अणु में फ्लोरीन परमाणुओं पर तीन अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़े (lone pairs) होते हैं। इन अकेले इलेक्ट्रॉन जोड़ों के बीच बहुत ज़्यादा प्रतिकर्षण होता है, जिससे \( \text{F-F} \) बंध कमज़ोर हो जाता है और इसकी बंध वियोजन ऐन्यैल्पी \( \text{Cl}_2 \) और \( \text{Br}_2 \) से भी कम हो जाती है।
(2) **अम्ल सामर्थ्य का बढ़ता क्रम:** \( \text{HF} < \text{HCl} < \text{HBr} < \text{HI} \)
हाइड्राइडों की अम्लता उनके बंध की शक्ति पर निर्भर करती है। समूह में ऊपर से नीचे जाने पर हैलोजन परमाणु का आकार बढ़ता है, जिससे \( \text{H-X} \) बंध की लंबाई बढ़ती है और बंध कमज़ोर होता जाता है। बंध के कमज़ोर होने से उसे तोड़ना आसान हो जाता है, जिससे \( \text{H}^+ \) आयन आसानी से निकल जाता है।
(3) **क्षारक सामर्थ्य का बढ़ता क्रम:** \( \text{BiH}_3 < \text{SbH}_3 < \text{AsH}_3 < \text{PH}_3 < \text{NH}_3 \)
इन हाइड्राइडों में क्षारक सामर्थ्य (Lewis basicity) केंद्रीय परमाणु पर उपलब्ध इलेक्ट्रॉन के अकेले जोड़े को दान करने की क्षमता पर निर्भर करती है। समूह में ऊपर से नीचे जाने पर केंद्रीय परमाणु (N, P, As, Sb, Bi) का आकार बढ़ता है। बड़े आकार के कारण, इलेक्ट्रॉन का अकेला जोड़ा ज़्यादा बड़े स्थान पर फैल जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। इलेक्ट्रॉन घनत्व कम होने से इलेक्ट्रॉन जोड़े को दान करने की क्षमता घट जाती है, इसलिए \( \text{NH}_3 \) सबसे प्रबलतम क्षारक है। रासायनिक गुणों में ये प्रवृत्तियाँ परमाणु आकार, बंध की शक्ति और इलेक्ट्रॉन घनत्व जैसे कारकों पर आधारित होती हैं।
In simple words: हैलोजन की बंध ऊर्जा \( \text{I}_2 < \text{F}_2 < \text{Br}_2 < \text{Cl}_2 \) होती है। हाइड्रोजन हैलाइड की अम्लता \( \text{HF} < \text{HCl} < \text{HBr} < \text{HI} \) बढ़ती है। हाइड्राइड की क्षारक सामर्थ्य \( \text{BiH}_3 < \text{SbH}_3 < \text{AsH}_3 < \text{PH}_3 < \text{NH}_3 \) बढ़ती है।
🎯 Exam Tip: तत्वों के आवर्त सारणी में स्थान और उनके परमाणु गुणों (आकार, विद्युत् ऋणात्मकता) का उनके बंध गुणों और रासायनिक प्रतिक्रियाशीलता पर सीधा प्रभाव पड़ता है, इन प्रवृत्तियों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
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