RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्

Step-by-Step Textbook Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्

Review structured textbook solutions for Class 12 Chemistry Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्. Built according to RBSE guidelines for the 2026-27 academic year, these downloadable answers support daily revision and problem-solving accuracy.

Download Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् Textbook Solutions PDF

View or download the dedicated Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् solution resource below. Engaging with these textbook answers under focused study conditions ensures continuous academic progress and mastery of the 2026-27 curriculum for Chemistry.

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम अति लघूतात्मक प्रश्न

 

Question 1. ऐलुमीनियम एवं आयरन के ऑक्साइड अयस्क का नाम व रासायनिक सूत्र लिखिए।
Answer: ऐलुमीनियम का ऑक्साइड अयस्क बॉक्साइट है, जिसका रासायनिक सूत्र \( \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot 2\text{H}_2\text{O} \) है। आयरन का ऑक्साइड अयस्क हेमेटाइट है, जिसका रासायनिक सूत्र \( \text{Fe}_2\text{O}_3 \) है। ये अयस्क धातुओं के निष्कर्षण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
In simple words: ऐलुमीनियम का अयस्क बॉक्साइट है (\( \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot 2\text{H}_2\text{O} \)), और आयरन का अयस्क हेमेटाइट है (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)).

🎯 Exam Tip: अयस्कों के रासायनिक सूत्र हमेशा सही लिखें, क्योंकि इनमें थोड़ी सी भी गलती पूरा उत्तर गलत कर सकती है।

 

Question 2. धातुमल किसे कहते हैं? एक उदाहरण से समझाइए।
Answer: धातुमल (Slag) वह पदार्थ है जो अयस्क में मौजूद अगलनीय (non-fusible) अशुद्धियों को गालक (flux) की मदद से गलनीय (fusible) यौगिकों में बदल देता है। यह प्रक्रिया अयस्क से अशुद्धियों को अलग करने में सहायता करती है। उदाहरण के लिए, जब आयरन के निष्कर्षण में सिलिका (एक अम्लीय अशुद्धि) को हटाया जाता है, तो कैल्शियम ऑक्साइड (एक क्षारीय गालक) डालकर कैल्शियम सिलिकेट (धातुमल) बनाया जाता है: \( \text{SiO}_2 + \text{CaO} \rightarrow \text{CaSiO}_3 \).
In simple words: धातुमल तब बनता है जब अयस्क में मिली गंदगी (अशुद्धियाँ) गालक से मिलकर पिघलने वाले पदार्थ में बदल जाती है. यह गंदगी को अयस्क से अलग करने में मदद करता है. जैसे, रेत और चूना मिलकर धातुमल बनाते हैं.

🎯 Exam Tip: धातुमल और गालक के बीच का अंतर स्पष्ट रखें, गालक अशुद्धियों को धातुमल में बदलने वाला पदार्थ है, जबकि धातुमल वह अंतिम उत्पाद है जिसे हटाया जाता है।

 

Question 4. प्रकृति में मुक्त अवस्था में पायी जाने वाली किन्हीं दो धातुओं के नाम लिखिए।
Answer: प्रकृति में मुक्त अवस्था में पाई जाने वाली दो प्रमुख धातुएँ सोना (Au) और प्लेटिनम (Pt) हैं। ये धातुएँ बहुत कम अभिक्रियाशील होती हैं, इसलिए ये यौगिकों के रूप में नहीं, बल्कि शुद्ध धातु के रूप में पाई जाती हैं।
In simple words: सोना (Au) और प्लेटिनम (Pt) दो धातुएँ हैं जो प्रकृति में अकेले (किसी और चीज़ से मिली हुई नहीं) मिलती हैं.

🎯 Exam Tip: केवल उन धातुओं के नाम लिखें जो अत्यंत निष्क्रिय होती हैं और वातावरण में रासायनिक रूप से परिवर्तित नहीं होतीं।

 

Question 5. भूपर्पटी में सर्वाधिक मात्रा में उपस्थित धातु का नाम लिखिए।
Answer: भूपर्पटी में सर्वाधिक मात्रा में उपस्थित धातु ऐलुमीनियम (Al) है। यह पृथ्वी की ऊपरी परत में लगभग 7.5% भारानुसार पाया जाता है, जो इसे सबसे प्रचुर धातु बनाता है।
In simple words: ऐलुमीनियम (Al) वह धातु है जो पृथ्वी की ऊपरी परत में सबसे ज़्यादा मात्रा में मिलती है.

🎯 Exam Tip: ध्यान रखें कि 'सर्वाधिक मात्रा में उपस्थित तत्व' ऑक्सीजन है, लेकिन 'धातु' के लिए ऐलुमीनियम सही उत्तर है।

 

Question 6. जिंक के सल्फाइड अयस्क का नाम एवं रासायनिक सूत्र लिखिए।
Answer: जिंक का सल्फाइड अयस्क जिंक ब्लेंड है। इसका रासायनिक सूत्र \( \text{ZnS} \) है। यह जिंक के प्रमुख अयस्कों में से एक है जिससे जिंक धातु का निष्कर्षण किया जाता है।
In simple words: जिंक का सल्फाइड अयस्क जिंक ब्लेंड है, जिसका सूत्र \( \text{ZnS} \) है.

🎯 Exam Tip: जिंक ब्लेंड को स्फैलराइट के नाम से भी जाना जाता है; दोनों में से कोई भी नाम स्वीकार्य है, लेकिन रासायनिक सूत्र याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. खनिज व अयस्क में क्या अन्तर होता है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: खनिज (Minerals) प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ होते हैं जिनमें धातु या उनके यौगिक मौजूद होते हैं। अयस्क (Ores) वे खनिज होते हैं जिनसे धातु को आसानी और आर्थिक रूप से निकाला जा सकता है। इसलिए, सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं। जैसे बॉक्साइट एक खनिज भी है और ऐलुमीनियम का अयस्क भी, लेकिन अभ्रक एक खनिज है पर किसी धातु का अयस्क नहीं।
In simple words: खनिज धरती से मिलने वाली कोई भी चट्टान है जिसमें धातु हो सकती है. अयस्क एक खास खनिज है जिससे धातु को फायदे के साथ निकाला जा सकता है. मतलब, हर अयस्क खनिज होता है, पर हर खनिज अयस्क नहीं होता.

🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि सभी अयस्क, खनिजों का एक विशेष उपसमुच्चय होते हैं।

 

Question 8. ढलवाँ लोहा तथा पिटवाँ लोहा में कार्बन की प्रतिशतता कितनी होती है?
Answer: ढलवाँ लोहा (Cast Iron) में कार्बन की प्रतिशतता लगभग 3% होती है, जो इसे कठोर और भंगुर बनाती है। जबकि पिटवाँ लोहा (Wrought Iron) में कार्बन की प्रतिशतता बहुत कम, लगभग 0.2 से 0.5% होती है, जिससे यह शुद्ध और नमनीय होता है।
In simple words: ढलवाँ लोहे में 3% कार्बन होता है, और पिटवाँ लोहे में बहुत कम कार्बन (0.2 से 0.5%) होता है.

🎯 Exam Tip: ढलवाँ लोहे में कार्बन की अधिक मात्रा उसे भंगुर बनाती है, जबकि पिटवाँ लोहे में कम कार्बन उसे नमनीय बनाता है; यह अंतर गुणों को भी प्रभावित करता है।

 

Question 9. जर्मन सिल्वर का संघटन बताइए।
Answer: जर्मन सिल्वर एक मिश्रधातु है जिसमें मुख्य रूप से कॉपर (Cu) 50-61.6%, जिंक (Zn) 19-17.2%, और निकिल (Ni) 30-21% होता है। इसमें सिल्वर (चाँदी) बिल्कुल नहीं होता, इसका नाम केवल इसके चांदी जैसे चमकदार रूप के कारण पड़ा है।
In simple words: जर्मन सिल्वर तांबा (50-61.6%), जिंक (19-17.2%) और निकिल (30-21%) को मिलाकर बनता है. इसमें असली चाँदी नहीं होती.

🎯 Exam Tip: जर्मन सिल्वर नाम भ्रामक है, क्योंकि इसमें कोई चाँदी नहीं होती; इसके घटकों की प्रतिशतता याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. फेन प्लवन विधि में संग्राही एवं फेन स्थायीकारक के नाम व भूमिका दीजिए।
Answer: फेन प्लवन विधि में संग्राही (Collectors) जैसे सोडियम ऐथिल जैन्थेट, सल्फाइड अयस्क कणों को जल प्रतिकर्षी बनाते हैं ताकि वे झाग के साथ ऊपर आ सकें। फेन स्थायीकारक (Froth Stabilizers) जैसे ऐनिलीन या क्रिसॉल, झाग को अधिक देर तक स्थिर बनाए रखते हैं, जिससे अयस्क कणों को इकट्ठा करने में मदद मिलती है। इन रसायनों का सही चुनाव अयस्क के सफल सांद्रण के लिए महत्वपूर्ण होता है।
In simple words: संग्राही अयस्क कणों को पानी से दूर करते हैं ताकि वे झाग में चिपकें. फेन स्थायीकारक झाग को देर तक बनाए रखते हैं ताकि अयस्क को इकट्ठा किया जा सके.

🎯 Exam Tip: संग्राही और फेन स्थायीकारक दोनों की भूमिका और उनके उदाहरणों को स्पष्ट रूप से समझें; ये सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 

Question 12. बॉक्साइट अयस्क में उपस्थित किन्हीं दो अशुद्धियों के नाम लिखिए।
Answer: बॉक्साइट अयस्क में सामान्यतः पाई जाने वाली दो प्रमुख अशुद्धियाँ आयरन ऑक्साइड (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) और सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) हैं। इन अशुद्धियों को निष्कर्षण प्रक्रिया से पहले हटाना आवश्यक होता है ताकि शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त हो सके।
In simple words: बॉक्साइट में आयरन ऑक्साइड (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) और रेत (\( \text{SiO}_2 \)) जैसी गंदगी मिली होती है.

🎯 Exam Tip: बॉक्साइट ऐलुमीनियम का मुख्य अयस्क है और इसमें आमतौर पर आयरन ऑक्साइड और सिलिका मुख्य अशुद्धियाँ होती हैं।

 

Question 13. निकिल धातु के शोधन में मॉण्ड प्रक्रम से सम्बन्धित रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए।
Answer: निकिल धातु के शोधन के लिए मॉण्ड प्रक्रम में दो मुख्य रासायनिक अभिक्रियाएँ होती हैं: 1. निकिल धातु कार्बन मोनोऑक्साइड से अभिक्रिया करके वाष्पशील निकिल टेट्राकार्बोनिल बनाता है।
\( \text{Ni} (s) + 4\text{CO} (g) \xrightarrow{330-350\text{K}} [\text{Ni}(\text{CO})_4] (g) \) 2. उच्च तापमान पर निकिल टेट्राकार्बोनिल का अपघटन होकर शुद्ध निकिल प्राप्त होता है और कार्बन मोनोऑक्साइड पुनः उपयोग के लिए अलग हो जाता है।
\( [\text{Ni}(\text{CO})_4] (g) \xrightarrow{450-470\text{K}} \text{Ni} (s) + 4\text{CO} (g) \) यह प्रक्रम अशुद्ध निकिल से शुद्ध निकिल प्राप्त करने में अत्यधिक प्रभावी है।
In simple words: मॉण्ड विधि में, पहले निकिल को कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ मिलाकर गैस बनाई जाती है. फिर इस गैस को गर्म करके शुद्ध निकिल अलग कर लिया जाता है.

🎯 Exam Tip: मॉण्ड प्रक्रम में बनने वाले वाष्पशील यौगिक (निकिल टेट्राकार्बोनिल) का सूत्र और उसके निर्माण व अपघटन के लिए सही तापमान सीमाएँ याद रखें।

 

Question 14. सिल्वर एवं गोल्ड का विद्युत् लेपन करने पर इनके कौन से संकुल आयनों का प्रयोग करते हैं?
Answer: सिल्वर और गोल्ड का विद्युत् लेपन (electroplating) करने के लिए उनके सायनाइड संकुल आयनों का प्रयोग किया जाता है। सिल्वर के लिए डायसायनाइडोअर्जेन्टेट(I) आयन \( [\text{Ag}(\text{CN})_2]^- \) और गोल्ड के लिए डायसायनाइडोऑरेट(I) आयन \( [\text{Au}(\text{CN})_2]^- \) का उपयोग होता है। इन संकुलों का उपयोग समान और चिकनी परत चढ़ाने के लिए किया जाता है।
In simple words: चाँदी और सोने की इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए, उनके सायनाइड वाले खास आयन (जैसे \( [\text{Ag}(\text{CN})_2]^- \) और \( [\text{Au}(\text{CN})_2]^- \)) का इस्तेमाल होता है.

🎯 Exam Tip: सायनाइड संकुलों में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और उनके सही सूत्रों को ध्यान से लिखें।

 

Question 15. झाग प्लवन विधि में अवनमक की क्या भूमिका है?
Answer: झाग प्लवन विधि में अवनमक (Depressants) वे पदार्थ होते हैं जिनका उपयोग अयस्क में उपस्थित कुछ अवांछित खनिजों को झाग में आने से रोकने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, सोडियम सायनाइड (NaCN) और सोडियम कार्बोनेट (\( \text{Na}_2\text{CO}_3 \)) का उपयोग जिंक सल्फाइड अयस्क में उपस्थित लेड सल्फाइड को अलग करने में मदद करता है, जिससे केवल वांछित खनिज ही झाग में आ पाता है।
In simple words: अवनमक झाग प्लवन विधि में काम आते हैं ताकि कुछ खराब खनिजों को झाग के साथ ऊपर आने से रोका जा सके. इससे सिर्फ ज़रूरी खनिज ही झाग में इकट्ठा होता है.

🎯 Exam Tip: अवनमक का कार्य चयनिक होता है, यानी यह केवल कुछ विशिष्ट अशुद्धियों को झाग में आने से रोकता है, सभी को नहीं।

 

Question 18. ऐलुमिनो थर्माइट में क्रोमियम ऑक्साइड के अपचयन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
Answer: ऐलुमिनो थर्माइट प्रक्रम में क्रोमियम ऑक्साइड (\( \text{Cr}_2\text{O}_3 \)) का ऐलुमीनियम (Al) द्वारा अपचयन एक अत्यधिक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है जिससे क्रोमियम धातु प्राप्त होती है:
\( \text{Cr}_2\text{O}_3 (s) + 2\text{Al} (s) \rightarrow 2\text{Cr} (s) + \text{Al}_2\text{O}_3 (s) \) यह अभिक्रिया बहुत अधिक ताप पर होती है और इसका उपयोग धातुओं को जोड़ने या धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है।
In simple words: क्रोमियम ऑक्साइड को ऐलुमीनियम से गर्म करने पर क्रोमियम धातु मिलती है और ऐलुमीनियम ऑक्साइड बनता है.

🎯 Exam Tip: यह अभिक्रिया एक प्रकार की विस्थापन अभिक्रिया है जहाँ अधिक अभिक्रियाशील ऐलुमीनियम, क्रोमियम को उसके ऑक्साइड से विस्थापित करता है।

 

Question 19. अम्लीय एवं क्षारीय गालक के एक-एक उदाहरण का नाम व सूत्र लिखिए।
Answer: अम्लीय गालक का एक उदाहरण सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) है, जो क्षारीय अशुद्धियों को हटाने के लिए प्रयोग होता है। क्षारीय गालक का एक उदाहरण कैल्शियम ऑक्साइड (\( \text{CaO} \)) है, जिसे अम्लीय अशुद्धियों को हटाने के लिए उपयोग किया जाता है। ये गालक अशुद्धियों को पिघलने वाले धातुमल में बदलने में सहायक होते हैं।
In simple words: अम्लीय गालक का उदाहरण रेत (\( \text{SiO}_2 \)) है. क्षारीय गालक का उदाहरण चूना (\( \text{CaO} \)) है.

🎯 Exam Tip: अम्लीय गालक क्षारीय अशुद्धियों को निष्क्रिय करते हैं, जबकि क्षारीय गालक अम्लीय अशुद्धियों को निष्क्रिय करते हैं; इस विपरीत प्रकृति को याद रखें।

 

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. Al धातु के निष्कर्षण में निक्षालन (Leaching) का क्या महत्व है?
Answer: ऐलुमीनियम के निष्कर्षण में निक्षालन (Leaching) का अत्यधिक महत्व है क्योंकि यह बॉक्साइट अयस्क से अशुद्धियों को प्रभावी ढंग से हटाने में मदद करता है। बॉक्साइट अयस्क में आमतौर पर सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)), आयरन ऑक्साइड (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) और टाइटेनियम ऑक्साइड (\( \text{TiO}_2 \)) जैसी अशुद्धियाँ होती हैं। निक्षालन प्रक्रिया में, चूर्णित बॉक्साइट अयस्क को सान्द्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड (\( \text{NaOH} \)) विलयन के साथ 473-523K पर गर्म किया जाता है। इस दौरान, ऐलुमिना सोडियम मेटा-ऐलुमिनेट के रूप में घुल जाती है जबकि सिलिका सोडियम सिलिकेट के रूप में घुलती है। आयरन ऑक्साइड और टाइटेनियम ऑक्साइड जैसी अशुद्धियाँ अविलेय रहती हैं और उन्हें छानकर अलग कर लिया जाता है।
\( \text{Al}_2\text{O}_3 (s) + 2\text{NaOH} (aq) + 3\text{H}_2\text{O} (l) \rightarrow 2\text{Na}[\text{Al}(\text{OH})_4] (aq) \)
\( 2\text{Na}[\text{Al}(\text{OH})_4] (aq) + 2\text{CO}_2 (g) \rightarrow \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot \text{xH}_2\text{O} (s) + 2\text{NaHCO}_3 (aq) \) इसके बाद, प्राप्त जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर और 1473K पर गर्म करके शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त कर ली जाती है। यह शुद्धिकरण चरण ऐलुमीनियम धातु के इलेक्ट्रोलाइटिक निष्कर्षण के लिए आवश्यक है।
\( \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot \text{xH}_2\text{O} (s) \xrightarrow{1473\text{K}} \text{Al}_2\text{O}_3 (s) + \text{xH}_2\text{O} (g) \)
In simple words: ऐलुमीनियम निकालने से पहले, निक्षालन विधि से बॉक्साइट अयस्क में मिली रेत (\( \text{SiO}_2 \)) और लोहे जैसी गंदगी को हटाते हैं. इसमें अयस्क को गर्म सोडियम हाइड्रॉक्साइड में घोलते हैं, जिससे ऐलुमीनियम घुल जाता है और गंदगी अलग हो जाती है. फिर घुलने वाले ऐलुमीनियम को शुद्ध करके अलग कर लेते हैं.

🎯 Exam Tip: निक्षालन के दौरान होने वाली सभी रासायनिक अभिक्रियाओं को ध्यानपूर्वक लिखें, खासकर तापमान और अभिकर्मकों का सही उपयोग।

 

Question 2. निस्तापन एवं भर्जन को उदाहरण सहित समझाइए।
Answer: अयस्कों से अशुद्धियों को हटाकर शुद्ध धातु प्राप्त करने के प्रक्रम को निष्कर्षण (Extraction) कहते हैं। यह मुख्य रूप से दो चरणों में होता है, जिनमें निस्तापन और भर्जन महत्वपूर्ण हैं। 1. **निस्तापन (Calcination):** यह वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को उसके गलनांक से कम तापमान पर, वायु की अनुपस्थिति या सीमित आपूर्ति में गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया में कार्बोनेट अयस्कों से कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रेटेड अयस्कों से जलवाष्प जैसे वाष्पशील पदार्थ निकलते हैं। उदाहरण: \( \text{ZnCO}_3 (s) \xrightarrow{\text{Heat}} \text{ZnO} (s) + \text{CO}_2 (g) \) 2. **भर्जन (Roasting):** यह वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को उसके गलनांक से कम तापमान पर, वायु की पर्याप्त उपस्थिति में गर्म किया जाता है। इस विधि का उपयोग आमतौर पर सल्फाइड अयस्कों को ऑक्साइड में बदलने के लिए किया जाता है, जिससे सल्फर डाइऑक्साइड गैस निकलती है। उदाहरण: \( 2\text{ZnS} (s) + 3\text{O}_2 (g) \xrightarrow{\text{Heat}} 2\text{ZnO} (s) + 2\text{SO}_2 (g) \) ये दोनों विधियाँ अयस्क को धातु ऑक्साइड में परिवर्तित करती हैं, जो बाद में धातु में अपचयित हो जाते हैं।
In simple words: निस्तापन में अयस्क को हवा के बिना गर्म करते हैं, जिससे पानी या कार्बन डाइऑक्साइड जैसी चीजें निकल जाती हैं. भर्जन में अयस्क को हवा की मौजूदगी में गर्म करते हैं, जिससे सल्फाइड अयस्क ऑक्साइड में बदल जाते हैं. ये दोनों ही तरीके अयस्क से धातु निकालने के पहले चरण हैं.

🎯 Exam Tip: निस्तापन और भर्जन के बीच मुख्य अंतर वायु की उपस्थिति (भर्जन में) या अनुपस्थिति (निस्तापन में) और उनके द्वारा संसाधित होने वाले अयस्क के प्रकार (कार्बोनेट/हाइड्रेटेड बनाम सल्फाइड) में है।

 

Question 3. ऐलुमीनियम के निष्कर्षण के लिए विद्युत् अपघटनी सेल का नामांकित चित्र बनाइए तथा इसमें होने वाली सम्पूर्ण अभिक्रिया लिखिए।
Answer: ऐलुमीनियम के निष्कर्षण के लिए हॉल-हेरॉल्ट (Hall-Heroult) विधि का उपयोग किया जाता है, जिसमें विद्युत् अपघटनी सेल का प्रयोग होता है। इस सेल में एक इस्पात का टैंक होता है जिसकी आंतरिक परत ग्रेफाइट या कार्बन की बनी होती है, जो कैथोड का कार्य करती है। ऐनोड के रूप में ग्रेफाइट की छड़ों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें पिघले हुए विद्युत् अपघट्य में डुबोया जाता है। विद्युत् अपघट्य ऐलुमिना (\( \text{Al}_2\text{O}_3 \)), क्रायोलाइट (\( \text{Na}_3\text{AlF}_6 \)) और फ्लुओस्पार (\( \text{CaF}_2 \)) का मिश्रण होता है। सेल का कार्य एक विद्युत् धारा प्रवाहित करके ऐलुमिना को ऐलुमीनियम और ऑक्सीजन में विघटित करना है। **अभिक्रियाएँ (Reactions):** **कैथोड पर (At Cathode):**
\( \text{Al}^{3+} + 3\text{e}^- \rightarrow \text{Al} (l) \) **ऐनोड पर (At Anode):**
\( \text{C} (s) + \text{O}^{2-} (l) \rightarrow \text{CO} (g) + 2\text{e}^- \)
\( \text{C} (s) + 2\text{O}^{2-} (l) \rightarrow \text{CO}_2 (g) + 4\text{e}^- \) समग्र अभिक्रिया इस प्रकार लिखी जा सकती है:
\( 2\text{Al}_2\text{O}_3 (l) + 3\text{C} (s) \rightarrow 4\text{Al} (l) + 3\text{CO}_2 (g) \) **विद्युत् अपघटनीय सेल का नामांकित चित्र:** विद्युत् अपघटनी सेल एक आयताकार इस्पात का बर्तन होता है जिसकी भीतरी सतह पर कार्बन की परत कैथोड का काम करती है। इसमें पिघले हुए ऐलुमिना, क्रायोलाइट और फ्लुओस्पार का मिश्रण होता है। कार्बन या ग्रेफाइट की छड़ें ऐनोड के रूप में ऊपर से इसमें डुबोई जाती हैं। पिघला हुआ ऐलुमीनियम नीचे जमा हो जाता है और उसे एक टोंटीयुक्त मार्ग (tap hole) से निकाला जाता है।
In simple words: ऐलुमीनियम को बिजली से अलग करने के लिए एक खास टैंक इस्तेमाल होता है. टैंक के नीचे कार्बन की परत कैथोड होती है और अंदर ग्रेफाइट की छड़ें ऐनोड होती हैं. ऐलुमिना को क्रायोलाइट और फ्लुओस्पार में पिघलाकर बिजली गुजारते हैं. कैथोड पर ऐलुमीनियम बनता है और ऐनोड पर ऑक्सीजन निकलती है, जो कार्बन से मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाती है.

🎯 Exam Tip: सेल के प्रत्येक भाग की भूमिका (कैथोड, ऐनोड, विद्युत् अपघट्य) और संबंधित अभिक्रियाएँ याद रखें, क्योंकि यह ऐलुमीनियम निष्कर्षण का एक केंद्रीय सिद्धांत है।

 

Question 4. विद्युत् अपघटनी विधि से ताँबे का शोधन कैसे किया जाता है। आवश्यक समीकरण की सहायता से समझाइए।
Answer: ताँबे का विद्युत् अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसका उपयोग अशुद्ध ताँबे से शुद्ध ताँबा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस विधि में, अशुद्ध ताँबे की मोटी छड़ को ऐनोड (धनात्मक इलेक्ट्रोड) के रूप में और शुद्ध ताँबे की पतली चादर को कैथोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड) के रूप में उपयोग किया जाता है। विद्युत् अपघट्य के रूप में अम्लीकृत कॉपर सल्फेट (\( \text{CuSO}_4 \)) विलयन का प्रयोग होता है। जब विद्युत् धारा प्रवाहित की जाती है: **ऐनोड पर (At Anode):** अशुद्ध ताँबा ऑक्सीकृत होकर कॉपर आयन (\( \text{Cu}^{2+} \)) बनाता है और विलयन में घुल जाता है। इसमें मौजूद अधिक अभिक्रियाशील धातु अशुद्धियाँ (जैसे Fe, Zn) भी आयन के रूप में घुल जाती हैं, जबकि कम अभिक्रियाशील धातु अशुद्धियाँ (जैसे Ag, Au, Pt) ऐनोड पंख (anode mud) के रूप में नीचे बैठ जाती हैं।
\( \text{Cu} (s) \rightarrow \text{Cu}^{2+} (aq) + 2\text{e}^- \) (अशुद्ध ताँबा)
\( \text{Zn} (s) \rightarrow \text{Zn}^{2+} (aq) + 2\text{e}^- \)
\( \text{Fe} (s) \rightarrow \text{Fe}^{2+} (aq) + 2\text{e}^- \) **कैथोड पर (At Cathode):** विलयन में उपस्थित कॉपर आयन (\( \text{Cu}^{2+} \)) कैथोड पर अपचयित होकर शुद्ध ताँबे के रूप में जमा हो जाते हैं।
\( \text{Cu}^{2+} (aq) + 2\text{e}^- \rightarrow \text{Cu} (s) \) (शुद्ध ताँबा) इस प्रकार, शुद्ध ताँबा कैथोड पर जमा होता जाता है, और अशुद्धियाँ अलग हो जाती हैं।
In simple words: ताँबे को शुद्ध करने के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है. गंदे ताँबे को एक तरफ (ऐनोड) रखते हैं और पतले शुद्ध ताँबे को दूसरी तरफ (कैथोड) रखते हैं. जब बिजली चलाते हैं, तो गंदे ताँबे से शुद्ध ताँबा निकलकर पतले ताँबे पर जमा हो जाता है.

🎯 Exam Tip: विद्युत् अपघटनी शोधन में ऐनोड, कैथोड और विद्युत् अपघट्य की पहचान करना महत्वपूर्ण है, साथ ही ऐनोड और कैथोड पर होने वाली अभिक्रियाओं को भी याद रखें।

 

Question 5. ऐलिंघम आरेख की सहायता से हेमेटाइट अयस्क के अपचयन में ऊष्मागतिकी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
Answer: ऐलिंघम आरेख विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड बनने के लिए मुक्त ऊर्जा परिवर्तन (\( \Delta \text{G}^\circ \)) को तापमान के साथ दर्शाता है, जिससे यह पता चलता है कि कौन सी धातु किस तापमान पर किस अपचायक से अपचयित हो सकती है। हेमेटाइट (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) के अपचयन में ऊष्मागतिकी सिद्धान्त को समझने के लिए ऐलिंघम आरेख का उपयोग किया जाता है। आरेख से निम्नलिखित जानकारी मिलती है: 1. **1073 K से कम तापमान पर:** ऐलिंघम आरेख दर्शाता है कि \( \text{CO} \) से \( \text{CO}_2 \) के निर्माण के लिए मानक गिब्स ऊर्जा (\( \Delta \text{G}^\circ \)) का मान \( \text{Fe}_2\text{O}_3 \) के निर्माण के मान से अधिक ऋणात्मक होता है। इसका मतलब है कि कम तापमान पर \( \text{CO} \), \( \text{Fe}_2\text{O}_3 \) को अपचयित करने के लिए एक बेहतर अपचायक है।
\( \text{Fe}_2\text{O}_3 (s) + 3\text{CO} (g) \xrightarrow{\text{< 1073 K}} 2\text{Fe} (s) + 3\text{CO}_2 (g) \) 2. **1073 K से अधिक तापमान पर:** इस तापमान पर, कार्बन (कोक) से कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) के निर्माण की गिब्स ऊर्जा रेखा \( \text{Fe}_2\text{O}_3 \) की रेखा से नीचे चली जाती है, जिसका अर्थ है कि कोक एक बेहतर अपचायक बन जाता है।
\( \text{Fe}_2\text{O}_3 (s) + 3\text{C} (s) \xrightarrow{\text{> 1073 K}} 2\text{Fe} (s) + 3\text{CO} (g) \) इस प्रकार, वात्या भट्टी (blast furnace) में, निचले और अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में कोक (\( \text{C} \)) अपचायक का काम करता है, जबकि ऊपरी और कम तापमान वाले क्षेत्रों में कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) अपचायक का काम करता है। ऐलिंघम आरेख में एक ग्राफ होता है जो तापमान के साथ \( \Delta \text{G}^\circ \) (मुक्त ऊर्जा परिवर्तन) के मान को दर्शाता है। विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड बनाने वाली रेखाएँ इस ग्राफ पर होती हैं। जिस रेखा का ढलान नीचे की ओर होता है, वह धातु अधिक स्थिर ऑक्साइड बनाती है। दो रेखाओं का कटाव बिंदु उस तापमान को दर्शाता है जहाँ एक अपचायक दूसरे से बेहतर हो जाता है।
In simple words: ऐलिंघम आरेख बताता है कि किस तापमान पर हेमेटाइट से लोहा निकालने के लिए कार्बन या कार्बन मोनोऑक्साइड में से कौन ज़्यादा अच्छा काम करेगा. कम तापमान पर कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) अच्छा होता है, और ज़्यादा तापमान पर कार्बन (कोक) अच्छा होता है.

🎯 Exam Tip: ऐलिंघम आरेख की व्याख्या करते समय, तापमान के आधार पर अपचायकों की प्राथमिकता में बदलाव को स्पष्ट रूप से समझाएँ और संबंधित समीकरणों को सही ढंग से प्रस्तुत करें।

 

Question 6. झाग प्लवन विधि में निम्न पदों के उदाहरण दीजिए –
(1) झाग कारक
(2) प्लवनकारक/संग्राही
(3) फेन स्थायीकारक
(4) सक्रियकारक
Answer: झाग प्लवन विधि में अयस्क के सांद्रण के लिए विभिन्न प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है। इनके उदाहरण निम्नलिखित हैं: 1. **झाग कारक (Frothers):** ये पदार्थ झाग बनाने में मदद करते हैं और उसे स्थिर रखते हैं। उदाहरण: चीड़ का तेल (Pine oil), कपूर का तेल (Camphor oil) 2. **प्लवनकारक/संग्राही (Collectors):** ये सल्फाइड अयस्क कणों को जल प्रतिकर्षी (hydrophobic) बनाते हैं ताकि वे झाग के साथ ऊपर आ सकें। उदाहरण: सोडियम ऐथिल जैन्थेट (Sodium ethyl xanthate), पोटैशियम ऐथिल जैन्थेट (Potassium ethyl xanthate) 3. **फेन स्थायीकारक (Froth Stabilizers):** ये झाग को अधिक समय तक स्थिर बनाए रखते हैं ताकि अयस्क कणों को आसानी से इकट्ठा किया जा सके। उदाहरण: ऐनिलीन (Aniline), क्रिसॉल (Cresols) 4. **सक्रियकारक (Activators):** ये कुछ अवांछित खनिजों की प्लवनशीलता (floatability) को बढ़ाते हैं ताकि उन्हें अलग किया जा सके। उदाहरण: सोडियम सल्फाइड (\( \text{Na}_2\text{S} \)), कॉपर सल्फेट (\( \text{CuSO}_4 \)) 5. **अवनमक (Depressants):** ये कुछ विशिष्ट खनिजों को झाग में आने से रोकते हैं, जिससे वांछित खनिज का चयनिक पृथक्करण संभव होता है। उदाहरण: सोडियम सायनाइड (\( \text{NaCN} \)), सोडियम कार्बोनेट (\( \text{Na}_2\text{CO}_3 \)) ये रसायन अयस्क के घटकों को उनकी प्लवनशीलता के आधार पर अलग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: झाग प्लवन विधि में झाग बनाने के लिए चीड़ का तेल, अयस्क को पानी से दूर रखने के लिए जैन्थेट, झाग को देर तक रोकने के लिए ऐनिलीन और कुछ खास खनिजों को झाग में लाने के लिए सोडियम सल्फाइड जैसे रसायन इस्तेमाल होते हैं. कुछ रसायनों को अवनमक (जैसे सोडियम सायनाइड) कहते हैं जो अवांछित खनिजों को झाग में आने से रोकते हैं.

🎯 Exam Tip: प्रत्येक रसायन का कार्य और उसके दो-दो उदाहरण याद रखें, विशेषकर सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण में इनकी उपयोगिता।

 

Question 7. ऐलुमीनियम के धातुकर्म में निम्न की उपयोगिता बताइए –
(i) क्रायोलाइट
(ii) कार्बन या कोक चूर्ण
(iii) ग्रेफाइट छड़।
Answer: ऐलुमीनियम के धातुकर्म में, विशेष रूप से हॉल-हेरॉल्ट विधि में, इन पदार्थों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है: (i) **क्रायोलाइट (\( \text{Na}_3\text{AlF}_6 \)) की उपयोगिता:** (a) यह ऐलुमिना (\( \text{Al}_2\text{O}_3 \)) के गलनांक को कम करता है। शुद्ध ऐलुमिना का गलनांक बहुत अधिक (लगभग 2323 K) होता है, लेकिन क्रायोलाइट के साथ यह गलनांक लगभग 1270 K तक कम हो जाता है, जिससे ऊर्जा की बचत होती है। (b) यह पिघले हुए विद्युत् अपघट्य की चालकता में वृद्धि करता है, जिससे विद्युत् धारा का प्रवाह आसान हो जाता है। (ii) **कार्बन या कोक चूर्ण की उपयोगिता:** (a) विद्युत् अपघटनी सेल के ऊपर कोक चूर्ण की परत विकिरण द्वारा होने वाली ऊष्मीय हानि (Heat loss) को रोकती है, जिससे ऊर्जा का संरक्षण होता है। (b) कोक चूर्ण ऐनोड के कार्बन को धीरे-धीरे जलने में मदद करता है, जिससे ऐनोड का जीवनकाल बढ़ जाता है। (iii) **ग्रेफाइट छड़ की उपयोगिता:** (a) ग्रेफाइट की छड़ें ऐनोड का कार्य करती हैं और विद्युत् अपघटन के दौरान ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनाती हैं। (b) ग्रेफाइट का उपयोग कैथोड के रूप में भी किया जाता है क्योंकि यह विद्युत् का अच्छा चालक होता है और पिघले हुए ऐलुमीनियम से अभिक्रिया नहीं करता।
In simple words: (i) क्रायोलाइट ऐलुमिना को जल्दी पिघलाता है और बिजली को अच्छे से बहने देता है. (ii) कार्बन या कोक चूर्ण भट्टी को गर्म रखता है और गर्मी बाहर नहीं जाने देता. यह ऐनोड को धीरे-धीरे खर्च होने में मदद करता है. (iii) ग्रेफाइट की छड़ें बिजली के ऐनोड का काम करती हैं और ऐलुमीनियम के अपचयन में मदद करती हैं.

🎯 Exam Tip: ऐलुमीनियम निष्कर्षण में प्रत्येक पदार्थ की भूमिका को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से समझाएँ, क्योंकि यह एक प्रमुख औद्योगिक प्रक्रिया है।

 

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. हॉल हेराल्ट विधि द्वारा बॉक्साइट अयस्क से ऐलुमिना प्राप्त करने में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए। इसके विद्युत् अपघटनीय सेल का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: हॉल-हेरॉल्ट विधि ऐलुमीनियम के निष्कर्षण के लिए एक प्रमुख औद्योगिक प्रक्रिया है। इसमें बॉक्साइट अयस्क से पहले शुद्ध ऐलुमिना (\( \text{Al}_2\text{O}_3 \)) प्राप्त की जाती है, जिसे बाद में विद्युत् अपघटन द्वारा ऐलुमीनियम धातु में अपचयित किया जाता है। **शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त करने की प्रक्रिया (बेयर प्रक्रम):** 1. **निक्षालन (Leaching):** बॉक्साइट को सान्द्र \( \text{NaOH} \) विलयन के साथ 473-523 K पर गर्म किया जाता है, जिससे ऐलुमिना सोडियम मेटा-ऐलुमिनेट के रूप में घुल जाती है, जबकि अशुद्धियाँ (जैसे \( \text{Fe}_2\text{O}_3, \text{SiO}_2, \text{TiO}_2 \)) अविलेय रहती हैं।
\( \text{Al}_2\text{O}_3 (s) + 2\text{NaOH} (aq) + 3\text{H}_2\text{O} (l) \rightarrow 2\text{Na}[\text{Al}(\text{OH})_4] (aq) \) 2. **अवक्षेपण (Precipitation):** विलयन को \( \text{CO}_2 \) गैस से उपचारित किया जाता है, जिससे जलयोजित ऐलुमिना का अवक्षेप प्राप्त होता है।
\( 2\text{Na}[\text{Al}(\text{OH})_4] (aq) + 2\text{CO}_2 (g) \rightarrow \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot \text{xH}_2\text{O} (s) + 2\text{NaHCO}_3 (aq) \) 3. **निस्तापन (Calcination):** जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर और 1473 K पर गर्म करके शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त की जाती है।
\( \text{Al}_2\text{O}_3 \cdot \text{xH}_2\text{O} (s) \xrightarrow{1473\text{K}} \text{Al}_2\text{O}_3 (s) + \text{xH}_2\text{O} (g) \) **विद्युत् अपघटनीय सेल द्वारा ऐलुमीनियम का निष्कर्षण:** इस विधि में, एक बड़े इस्पात के टैंक में कार्बन की परत कैथोड का कार्य करती है, जबकि ग्रेफाइट की छड़ें ऐनोड का कार्य करती हैं। विद्युत् अपघट्य में शुद्ध ऐलुमिना, क्रायोलाइट (\( \text{Na}_3\text{AlF}_6 \)) और फ्लुओस्पार (\( \text{CaF}_2 \)) का मिश्रण होता है। **अभिक्रियाएँ (Reactions):** **कैथोड पर (At Cathode):**
\( \text{Al}^{3+} + 3\text{e}^- \rightarrow \text{Al} (l) \) **ऐनोड पर (At Anode):**
\( \text{C} (s) + \text{O}^{2-} (l) \rightarrow \text{CO} (g) + 2\text{e}^- \)
\( \text{C} (s) + 2\text{O}^{2-} (l) \rightarrow \text{CO}_2 (g) + 4\text{e}^- \) **समग्र अभिक्रिया (Overall Reaction):**
\( 2\text{Al}_2\text{O}_3 (l) + 3\text{C} (s) \rightarrow 4\text{Al} (l) + 3\text{CO}_2 (g) \) **विद्युत् अपघटनीय सेल का नामांकित चित्र:** विद्युत् अपघटनी सेल एक आयताकार इस्पात का बर्तन होता है जिसकी भीतरी सतह पर कार्बन की परत कैथोड का काम करती है। इसमें पिघले हुए ऐलुमिना, क्रायोलाइट और फ्लुओस्पार का मिश्रण होता है। कार्बन या ग्रेफाइट की छड़ें ऐनोड के रूप में ऊपर से इसमें डुबोई जाती हैं। पिघला हुआ ऐलुमीनियम नीचे जमा हो जाता है और उसे एक टोंटीयुक्त मार्ग (tap hole) से बाहर निकाला जाता है।
In simple words: हॉल-हेरॉल्ट विधि में, पहले बॉक्साइट से शुद्ध ऐलुमिना बनाते हैं. इसमें बॉक्साइट को घोलकर गंदगी अलग करते हैं और फिर ऐलुमिना को सुखाकर गर्म करते हैं. इसके बाद, शुद्ध ऐलुमिना को एक बिजली वाले टैंक में पिघलाते हैं, जहाँ कार्बन कैथोड और ग्रेफाइट ऐनोड का काम करते हैं. बिजली से ऐलुमिना टूटकर शुद्ध ऐलुमीनियम धातु में बदल जाता है.

🎯 Exam Tip: हॉल-हेरॉल्ट विधि में शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त करने के प्रत्येक चरण (निक्षालन, अवक्षेपण, निस्तापन) और विद्युत् अपघटनी सेल की अभिक्रियाओं को उनके तापमानों सहित याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. निम्न के उदाहरण देते हुए संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए –
(i) उच्चतापधातुकर्म (Pyrometallurgy)
(ii) विद्युत्धातुकर्म (Electrometallurgy)
(iii) जलधातुकर्म (Hydrometallurgy)
Answer: धातुकर्म (Metallurgy) विभिन्न प्रक्रियाओं का एक समूह है जिनका उपयोग अयस्कों से धातुओं को निकालने और उन्हें शुद्ध करने के लिए किया जाता है। यहाँ तीन मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है: (i) **उच्चतापधातुकर्म (Pyrometallurgy):** यह धातुओं के निष्कर्षण और शोधन की विधि है जिसमें उच्च तापमान पर रासायनिक अभिक्रियाएँ शामिल होती हैं। इस प्रक्रिया में अयस्क को गालक (flux) और अपचायक (reducing agent) के साथ तीव्रता से गर्म किया जाता है ताकि धातु ऑक्साइड को धातु में परिवर्तित किया जा सके। उदाहरण: आयरन के निष्कर्षण के लिए वात्या भट्टी (Blast Furnace) में हेमेटाइट (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) का कोक (\( \text{C} \)) द्वारा अपचयन।
\( \text{Fe}_2\text{O}_3 (s) + 3\text{CO} (g) \xrightarrow{\text{Heat}} 2\text{Fe} (s) + 3\text{CO}_2 (g) \) (ii) **विद्युत्धातुकर्म (Electrometallurgy):** यह धातुकर्म की विधि है जिसमें पिघले हुए धातु के लवणों (molten salts) या धातु के विलयनों के विद्युत् अपघटन (electrolysis) का उपयोग किया जाता है। यह विधि अत्यधिक क्रियाशील धातुओं (जैसे ऐलुमीनियम, सोडियम, मैग्नीशियम) के निष्कर्षण के लिए उपयुक्त है, जिन्हें रासायनिक अपचायकों द्वारा आसानी से अपचयित नहीं किया जा सकता। उदाहरण: हॉल-हेरॉल्ट विधि द्वारा ऐलुमिना (\( \text{Al}_2\text{O}_3 \)) से ऐलुमीनियम का निष्कर्षण। कैथोड पर:
\( \text{Al}^{3+} + 3\text{e}^- \rightarrow \text{Al} (l) \) (iii) **जलधातुकर्म (Hydrometallurgy):** यह विधि धातुओं के निष्कर्षण के लिए जलीय विलयनों (aqueous solutions) का उपयोग करती है। इसमें अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ उपचारित किया जाता है ताकि वांछित धातु एक विलेय संकुल (soluble complex) के रूप में विलयन में आ जाए। फिर इस धातु को एक प्रबल अपचायक धातु द्वारा विस्थापित करके शुद्ध रूप में प्राप्त किया जाता है। उदाहरण: सिल्वर (Ag) और गोल्ड (Au) का सायनाइड प्रक्रिया द्वारा निष्कर्षण, जिसमें धातु को सायनाइड विलयन में घोलकर एक संकुल बनाया जाता है, फिर जिंक जैसी अधिक क्रियाशील धातु से विस्थापित किया जाता है।
\( 4\text{Ag} (s) + 8\text{CN}^- (aq) + 2\text{H}_2\text{O} (l) + \text{O}_2 (g) \rightarrow 4[\text{Ag}(\text{CN})_2]^- (aq) + 4\text{OH}^- (aq) \)
\( 2[\text{Ag}(\text{CN})_2]^- (aq) + \text{Zn} (s) \rightarrow [\text{Zn}(\text{CN})_4]^{2-} (aq) + 2\text{Ag} (s) \) ये विधियाँ धातुओं के गुणों और अयस्कों की प्रकृति के आधार पर चुनी जाती हैं।
In simple words: (i) उच्चतापधातुकर्म में धातु को बहुत ज़्यादा गर्मी देकर निकालते हैं, जैसे भट्टी में लोहा बनाते हैं. (ii) विद्युत्धातुकर्म में बिजली का इस्तेमाल करके धातु को अलग करते हैं, जैसे ऐलुमीनियम को निकालते हैं. (iii) जलधातुकर्म में धातु को पानी या किसी घोल में घोलकर निकालते हैं, जैसे चाँदी और सोना.

🎯 Exam Tip: धातुकर्म की प्रत्येक विधि का सिद्धांत, उसके लिए उपयुक्त धातुओं के उदाहरण और संबंधित प्रमुख अभिक्रियाओं को याद रखें।

 

Question 3. कॉपर ऑक्साइड के अपचयन में सिलिका का अस्तर क्यों लगाया जाता है? इसमें होने वाली अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए। परिवर्तक का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: कॉपर के निष्कर्षण में सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) का अस्तर गालक (flux) के रूप में कार्य करता है। यह कॉपर पायराइट (\( \text{CuFeS}_2 \)) के भर्जन से प्राप्त आयरन ऑक्साइड (\( \text{FeO} \)) जैसी अम्लीय अशुद्धियों के साथ अभिक्रिया करके गलनीय आयरन सिलिकेट (धातुमल) बनाता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है। यह प्रक्रिया धातु को शुद्ध करने में मदद करती है। **अभिक्रियाएँ (Reactions):** अशुद्धियों के साथ गालक की अभिक्रिया:
\( \text{FeO} (s) + \text{SiO}_2 (s) \rightarrow \text{FeSiO}_3 (l) \) (धातुमल) बेसेमर परिवर्तक (Bessemer converter) में कॉपर मैट (\( \text{Cu}_2\text{S} \) और \( \text{FeS} \) का मिश्रण) को वायु प्रवाह के साथ गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया में \( \text{FeS} \) पहले \( \text{FeO} \) और \( \text{SO}_2 \) में ऑक्सीकृत होता है, और \( \text{FeO} \) सिलिका से मिलकर धातुमल बनाता है। फिर \( \text{Cu}_2\text{S} \) ऑक्सीकृत होकर \( \text{Cu}_2\text{O} \) बनाता है, जो \( \text{Cu}_2\text{S} \) के साथ अभिक्रिया करके शुद्ध कॉपर देता है।
\( 2\text{Cu}_2\text{S} (l) + 3\text{O}_2 (g) \rightarrow 2\text{Cu}_2\text{O} (l) + 2\text{SO}_2 (g) \)
\( 2\text{Cu}_2\text{O} (l) + \text{Cu}_2\text{S} (l) \rightarrow 6\text{Cu} (l) + \text{SO}_2 (g) \) **परिवर्तक का नामांकित चित्र:** बेसेमर परिवर्तक एक नाशपाती के आकार का इस्पात का अस्तर वाला बर्तन होता है जिसे झुकाया जा सकता है। इसमें सिलिका का अस्तर लगा होता है। नीचे से इसमें गर्म हवा और रेत जैसी अशुद्धियाँ डालने के लिए शुंडिकाएँ (tuyeres) होती हैं। पिघला हुआ कॉपर मैट इसमें डाला जाता है, और कॉपर धातु नीचे जमा होती है जबकि धातुमल ऊपर तैरता है।
In simple words: कॉपर निकालने में, सिलिका का इस्तेमाल गंदगी (जैसे लोहे का ऑक्साइड) को पिघलाने वाले पदार्थ (धातुमल) में बदलने के लिए होता है. बेसेमर परिवर्तक एक खास भट्टी है जहाँ कॉपर मैट को हवा से गर्म करते हैं, जिससे पहले लोहा अलग होता है और फिर कॉपर सल्फाइड कॉपर ऑक्साइड में बदलकर शुद्ध कॉपर बनाता है.

🎯 Exam Tip: बेसेमर परिवर्तक में होने वाली सभी अभिक्रियाओं को क्रम से याद रखें, खासकर कॉपर मैट के ऑक्सीकरण और स्व-अपचयन को।

 

Question 4. (a) सिल्वर के धातुकर्म में सिल्वर धातु के निक्षालन के लिए वायु की उपस्थिति में किस विलयन का उपयोग किया जाता है? इसमें होने वाली अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (b) आयरन प्राप्त करने के लिए वात्या भट्टी में कम ताप परास (ताप - 1073K) पर C एवं CO में से कौन श्रेष्ठ अपचायक है?
Answer: (a) सिल्वर धातु के निक्षालन (Leaching) के लिए वायु की उपस्थिति में सोडियम सायनाइड (\( \text{NaCN} \)) या पोटैशियम सायनाइड (\( \text{KCN} \)) विलयन का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया को सायनाइड प्रक्रम कहते हैं। सिल्वर धातु सायनाइड और ऑक्सीजन की उपस्थिति में अभिक्रिया करके एक विलेय संकुल आयन बनाती है। अभिक्रिया का समीकरण:
\( 4\text{Ag} (s) + 8\text{CN}^- (aq) + 2\text{H}_2\text{O} (l) + \text{O}_2 (g) \rightarrow 4[\text{Ag}(\text{CN})_2]^- (aq) + 4\text{OH}^- (aq) \) इस संकुल से बाद में जिंक धातु का उपयोग करके सिल्वर को विस्थापित किया जाता है। (b) वात्या भट्टी (Blast Furnace) में कम ताप परास (ताप \( < 1073\text{K} \)) पर आयरन ऑक्साइड (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) के अपचयन के लिए कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) श्रेष्ठ अपचायक है। इस तापमान पर, कार्बन मोनोऑक्साइड की कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत होने की गिब्स ऊर्जा अधिक ऋणात्मक होती है, जो दर्शाता है कि यह \( \text{Fe}_2\text{O}_3 \) को अपचयित करने के लिए अधिक स्थिर और प्रभावी है। अभिक्रिया:
\( \text{Fe}_2\text{O}_3 (s) + 3\text{CO} (g) \xrightarrow{\text{< 1073K}} 2\text{Fe} (s) + 3\text{CO}_2 (g) \)
In simple words: (a) चाँदी को निकालने के लिए उसे सोडियम सायनाइड के घोल में हवा के साथ मिलाते हैं, जिससे चाँदी घुल जाती है. (b) वात्या भट्टी में कम गर्मी पर लोहा बनाने के लिए कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) सबसे अच्छा होता है, क्योंकि यह लोहे के ऑक्साइड को आसानी से लोहे में बदल देता है.

🎯 Exam Tip: (a) सायनाइड प्रक्रिया के समीकरण और (b) ऐलिंघम आरेख के आधार पर विभिन्न तापमानों पर अपचायकों की प्रभावशीलता को याद रखें।

 

Question 5. कॉपर अयस्क (या रद्दी कॉपर) जिसमें कॉपर की मात्रा कम होती है के निक्षालन से कॉपर निष्कर्षण हेतु किस अपचायक का उपयोग किया जाता है? समझाइए।
Answer: निम्न कोटि के कॉपर अयस्क (low-grade copper ores) या रद्दी कॉपर (scrap copper) से कॉपर के निष्कर्षण के लिए निक्षालन (Leaching) विधि का उपयोग किया जाता है। इस विधि में, अयस्क को अम्लों (जैसे \( \text{H}_2\text{SO}_4 \)) के साथ वायु की उपस्थिति में उपचारित किया जाता है। इससे कॉपर Cu(II) आयनों (\( \text{Cu}^{2+} \)) के रूप में विलयन में चला जाता है। अभिक्रियाएँ:
\( 2\text{Cu} (s) + 2\text{H}_2\text{SO}_4 (aq) + \text{O}_2 (g) \rightarrow 2\text{CuSO}_4 (aq) + 2\text{H}_2\text{O} (l) \)
\( \text{Cu} (s) + 2\text{H}^+ (aq) + \frac{1}{2}\text{O}_2 (g) \rightarrow \text{Cu}^{2+} (aq) + \text{H}_2\text{O} (l) \) प्राप्त \( \text{Cu}^{2+} \) आयनों वाले विलयन से कॉपर को निकालने के लिए मुख्य रूप से स्क्रैप आयरन (scrap iron) जैसे अपचायक का उपयोग किया जाता है। आयरन कॉपर आयनों को अपचयित करके शुद्ध कॉपर धातु में बदल देता है, जबकि आयरन स्वयं \( \text{Fe}^{2+} \) आयनों के रूप में विलयन में घुल जाता है।
\( \text{Cu}^{2+} (aq) + \text{Fe} (s) \rightarrow \text{Cu} (s) + \text{Fe}^{2+} (aq) \) इस प्रक्रिया को हाइड्रोमेटालर्जी (hydrometallurgy) भी कहते हैं।
In simple words: कम शुद्धता वाले कॉपर से कॉपर निकालने के लिए निक्षालन विधि का उपयोग करते हैं. इसमें कॉपर को तेजाब और हवा की मदद से घोलते हैं, जिससे कॉपर आयन बन जाते हैं. फिर इन कॉपर आयनों से शुद्ध कॉपर को अलग करने के लिए स्क्रैप लोहे जैसे अपचायक का इस्तेमाल करते हैं.

🎯 Exam Tip: निक्षालन और उसके बाद धातु के अवक्षेपण में शामिल अभिक्रियाओं के समीकरणों को याद रखें, विशेषकर कॉपर के लिए स्क्रैप आयरन का उपयोग।

 

Question 6. धातुओं के शोधन में निम्न विधियों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए –
(i) विद्युत् अपघटनी शोधन
(ii) वॉन-आर्केल विधि
(iii) वर्णलेखिकी
(iv) द्रवीकरण (या द्रव गलन परिष्करण)।
Answer: धातुओं के निष्कर्षण से प्राप्त धातुएँ अक्सर अशुद्ध (Crude Metal) होती हैं जिनमें कई प्रकार की अशुद्धियाँ (जैसे अन्य धातुएँ, अधातुएँ, ऑक्साइड, सिलिकेट) मिली होती हैं। इन अशुद्धियों को हटाने के लिए विभिन्न शोधन विधियों का उपयोग किया जाता है: (i) **विद्युत् अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining):** यह विधि उन धातुओं के लिए उपयोग की जाती है जिन्हें विद्युत् अपघटन द्वारा शुद्ध किया जा सकता है, जैसे कॉपर, जिंक, टिन, निकिल, सिल्वर और गोल्ड। इस विधि में, अशुद्ध धातु को ऐनोड (धनात्मक इलेक्ट्रोड) और शुद्ध धातु की पतली चादर को कैथोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड) बनाया जाता है। विद्युत् अपघट्य धातु के लवण का विलयन होता है। विद्युत् धारा प्रवाहित करने पर, ऐनोड से धातु आयन विलयन में घुल जाते हैं और कैथोड पर शुद्ध धातु के रूप में जमा हो जाते हैं। अधिक सक्रिय अशुद्धियाँ विलयन में रहती हैं, जबकि कम सक्रिय अशुद्धियाँ ऐनोड पंख के रूप में नीचे बैठ जाती हैं। (ii) **वॉन-आर्केल विधि (Van Arkel Method):** यह विधि विशेष रूप से उन धातुओं के लिए उपयोग की जाती है जिनके उच्च शुद्धता वाले नमूनों की आवश्यकता होती है, जैसे टाइटेनियम (Ti) और ज़िरकोनियम (Zr)। इस विधि में, अशुद्ध धातु को पहले एक वाष्पशील यौगिक (जैसे आयोडाइड) में परिवर्तित किया जाता है। यह वाष्पशील यौगिक तब एक गर्म टंगस्टन फिलामेंट पर अपघटित होकर शुद्ध धातु जमा करता है, जबकि अशुद्धियाँ वाष्पशील यौगिक नहीं बनाती हैं और पीछे रह जाती हैं। उदाहरण:
\( \text{Zr} (s) + 2\text{I}_2 (g) \xrightarrow{870\text{K}} \text{ZrI}_4 (g) \)
\( \text{ZrI}_4 (g) \xrightarrow{1800\text{K}} \text{Zr} (s) + 2\text{I}_2 (g) \) (iii) **वर्णलेखिकी (Chromatography):** यह पृथक्करण की एक आधुनिक तकनीक है जो मिश्रण के घटकों को उनकी अधिशोषण क्षमता या विभाजन गुणांक में अंतर के आधार पर अलग करती है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब घटक बहुत कम मात्रा में मौजूद हों या रासायनिक रूप से एक दूसरे के समान हों। धातुओं के शोधन में, विशेष रूप से दुर्लभ पृथ्वी तत्वों या अन्य धातुओं के ट्रेस शुद्धिकरण के लिए, कॉलम क्रोमैटोग्राफी या गैस क्रोमैटोग्राफी का उपयोग किया जाता है। (iv) **द्रवीकरण (Liquation) या द्रव गलन परिष्करण:** यह विधि उन धातुओं के लिए उपयुक्त है जिनका गलनांक कम होता है और उनकी अशुद्धियों का गलनांक अधिक होता है। इस प्रक्रिया में, अशुद्ध धातु को एक ढलान वाली भट्टी पर गर्म किया जाता है। कम गलनांक वाली धातु पिघलकर ढलान से नीचे बह जाती है, जबकि उच्च गलनांक वाली अशुद्धियाँ ठोस अवस्था में पीछे रह जाती हैं। उदाहरण: टिन (Sn), लेड (Pb) और बिस्मथ (Bi) का शोधन।
In simple words: (i) बिजली से शोधन में अशुद्ध धातु से शुद्ध धातु को बिजली की मदद से अलग करते हैं. (ii) वॉन-आर्केल विधि में, धातु को पहले गैस में बदलते हैं, फिर उसे गर्म करके शुद्ध धातु को जमा करते हैं. (iii) वर्णलेखिकी एक तरीका है जिससे बहुत कम मात्रा में मिली हुई चीजों को अलग करते हैं. (iv) द्रवीकरण में कम पिघलने वाली धातु को गर्म करके पिघलाते हैं ताकि वह ज़्यादा पिघलने वाली गंदगी से अलग हो जाए.

🎯 Exam Tip: प्रत्येक शोधन विधि के सिद्धांत को उसके लिए उपयुक्त धातुओं और यदि संभव हो तो संबंधित रासायनिक समीकरणों के साथ याद रखें।

 

Question 8. झाग प्लवन विधि से किन धातु अयस्कों का सान्द्रण किया जाता है? इस विधि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए एवं नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: झाग प्लवन विधि (Froth Flotation Method) मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों (जैसे जिंक सल्फाइड, लेड सल्फाइड, कॉपर सल्फाइड) के सांद्रण के लिए उपयोग की जाती है। यह अयस्क और गैंग (गंदगी) कणों की सतह के गुणों में अंतर, विशेषकर उनके पानी से प्रतिकर्षण या आकर्षण (wettability) के सिद्धांत पर आधारित है। **विधि का वर्णन:** इस विधि में, चूर्णित अयस्क को पानी और चीड़ के तेल (frother) जैसे झाग कारक के साथ एक बड़े टैंक में डाला जाता है। इस मिश्रण में सोडियम ऐथिल जैन्थेट जैसे संग्राही (collector) और कभी-कभी फेन स्थायीकारक (froth stabilizers) जैसे क्रिसॉल या ऐनिलीन भी मिलाए जाते हैं। फिर, मिश्रण में तेज़ हवा प्रवाहित की जाती है। संग्राही पदार्थ सल्फाइड अयस्क कणों की सतह को जल प्रतिकर्षी बनाते हैं, जिससे वे पानी से चिपकने के बजाय तेल में चिपकते हैं। हवा के बुलबुले इन जल प्रतिकर्षी अयस्क कणों को अपनी सतह पर चिपका लेते हैं और उन्हें झाग के साथ ऊपर ले आते हैं। गैंग कण (गंदगी) पानी में गीले होकर नीचे बैठ जाते हैं। झाग को एक ओर हटा दिया जाता है, जिससे अयस्क कण अलग हो जाते हैं। इस प्रकार, सल्फाइड अयस्कों को गैंग से सांद्रित किया जाता है। **नामांकित चित्र:** झाग प्लवन सेल में एक टैंक होता है जिसमें चूर्णित अयस्क, पानी, झाग कारक और संग्राही का मिश्रण होता है। बीच में एक घूमने वाला पैडल होता है जो मिश्रण को हिलाता है और हवा को अंदर खींचता है। हवा के बुलबुले अयस्क कणों को अपने साथ ऊपर ले आते हैं और झाग की एक परत बनाते हैं जिसे एक खुरचनी (scraper) से हटाया जाता है। भारी गैंग कण नीचे बैठ जाते हैं और उन्हें एक अलग रास्ते से निकाल लिया जाता है।
In simple words: झाग प्लवन विधि से सल्फाइड अयस्कों (जैसे जिंक और कॉपर के अयस्क) को शुद्ध करते हैं. इसमें अयस्क को पानी और तेल के साथ मिलाते हैं और हवा भरते हैं. तेल अयस्क कणों को झाग के साथ ऊपर ले आता है, जबकि मिट्टी-गंदगी नीचे बैठ जाती है.

🎯 Exam Tip: झाग प्लवन विधि के सिद्धांत, इसमें प्रयुक्त होने वाले विभिन्न अभिकर्मकों (झाग कारक, संग्राही, स्थायीकारक) की भूमिका और इसके लिए उपयुक्त अयस्कों के प्रकार को समझें।

 

Question 9. कॉपर अयस्क के धातुकर्म में परावर्तनी भट्टी में होने वाली अभिक्रियाओं के समीकरण दीजिए। परावर्तनी भट्टी का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: कॉपर के धातुकर्म में, परावर्तनी भट्टी (Reverberatory Furnace) का उपयोग भर्जित अयस्क को पिघलाने और कॉपर मैट (copper matte) बनाने के लिए किया जाता है। कॉपर पायराइट (\( \text{CuFeS}_2 \)) के भर्जन के बाद प्राप्त \( \text{Cu}_2\text{S} \) और \( \text{FeS} \) के मिश्रण को सिलिका गालक के साथ परावर्तनी भट्टी में पिघलाया जाता है। **भट्टी में होने वाली अभिक्रियाएँ (Reactions):** भर्जन के दौरान \( \text{FeS} \) आंशिक रूप से \( \text{FeO} \) में ऑक्सीकृत होता है:
\( 2\text{FeS} (s) + 3\text{O}_2 (g) \rightarrow 2\text{FeO} (s) + 2\text{SO}_2 (g) \) यह \( \text{FeO} \) सिलिका गालक (\( \text{SiO}_2 \)) के साथ अभिक्रिया करके गलनीय धातुमल (\( \text{FeSiO}_3 \)) बनाता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है:
\( \text{FeO} (s) + \text{SiO}_2 (s) \rightarrow \text{FeSiO}_3 (l) \) (धातुमल) इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, पिघला हुआ कॉपर मैट (\( \text{Cu}_2\text{S} \) और \( \text{FeS} \)) और धातुमल बनते हैं। कॉपर मैट भारी होने के कारण नीचे जमा हो जाता है, जबकि धातुमल ऊपर तैरता है। **परावर्तनी भट्टी का नामांकित चित्र:** परावर्तनी भट्टी एक बंद ईंटों की संरचना होती है जिसमें एक भट्टी का कक्ष (hearth) होता है। ऊपर से अयस्क और गालक को डाला जाता है। आग जलाने के लिए वायु और ईंधन को एक तरफ से प्रवेश कराया जाता है। गर्म गैसें एक मेहराबदार छत (arched roof) से परावर्तित होकर अयस्क को गर्म करती हैं। पिघला हुआ धातुमल ऊपर तैरता है जिसे एक रास्ते से निकाला जाता है, और पिघला हुआ कॉपर मैट नीचे जमा होता है जिसे दूसरे रास्ते से निकाला जाता है। राख भी एक अलग जगह जमा होती है।
In simple words: कॉपर निकालने के लिए परावर्तनी भट्टी का इस्तेमाल होता है. इसमें कॉपर के अयस्क को पिघलाते हैं. भट्टी में लोहे का सल्फाइड (\( \text{FeS} \)) हवा से मिलकर लोहे के ऑक्साइड (\( \text{FeO} \)) में बदल जाता है. यह \( \text{FeO} \) रेत (\( \text{SiO}_2 \)) से मिलकर पिघलने वाली गंदगी (धातुमल) बनाता है. बचा हुआ कॉपर सल्फाइड (\( \text{Cu}_2\text{S} \)) कॉपर मैट कहलाता है.

🎯 Exam Tip: परावर्तनी भट्टी के आरेख को लेबल करना सीखें और \( \text{FeS} \) से \( \text{FeSiO}_3 \) धातुमल बनने की अभिक्रियाओं को याद रखें।

 

Question 10. निम्न पर टिप्पणी लिखिए –
(i) आधात्री (गैंग)/मैट्रिक्स
(ii) गालक
(iii) धातुमल।
Answer: अयस्कों से धातुओं के निष्कर्षण में कई महत्वपूर्ण शब्द और अवधारणाएँ हैं, जिनमें आधात्री, गालक और धातुमल शामिल हैं: (i) **आधात्री (Gangue)/मैट्रिक्स:** आधात्री से तात्पर्य उन अवांछित अशुद्धियों से है जो अयस्क में धातु के यौगिक के साथ प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं। इनमें आमतौर पर मिट्टी, रेत, कंकड़, पत्थर और अन्य अशुद्धियाँ शामिल होती हैं जो अयस्क से धातु को अलग करने की प्रक्रिया को बाधित करती हैं। इन अशुद्धियों को निष्कर्षण से पहले या उसके दौरान हटाना आवश्यक होता है। उदाहरण: बॉक्साइट अयस्क में सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) और आयरन ऑक्साइड (\( \text{Fe}_2\text{O}_3 \)) आधात्री के रूप में मौजूद होते हैं। (ii) **गालक (Flux):** गालक वे पदार्थ होते हैं जिन्हें अयस्क में मिलाया जाता है ताकि उसमें मौजूद अगलनीय (non-fusible) आधात्री को गलनीय (fusible) यौगिकों में परिवर्तित किया जा सके। यह पिघले हुए धातुमल को बनाने में मदद करता है जिसे आसानी से हटाया जा सकता है। गालक की प्रकृति आधात्री की प्रकृति पर निर्भर करती है - अम्लीय आधात्री के लिए क्षारीय गालक और क्षारीय आधात्री के लिए अम्लीय गालक का उपयोग किया जाता है। उदाहरण: अम्लीय गालक: सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) (क्षारीय अशुद्धियों के लिए) क्षारीय गालक: कैल्शियम ऑक्साइड (\( \text{CaO} \)), मैग्नीशियम ऑक्साइड (\( \text{MgO} \)) (अम्लीय अशुद्धियों के लिए) (iii) **धातुमल (Slag):** धातुमल वह गलनीय पदार्थ है जो गालक और आधात्री के बीच अभिक्रिया के परिणामस्वरूप बनता है। यह अवांछित अशुद्धियों को धातु से अलग करने का काम करता है क्योंकि यह धातु से हल्का होता है और पिघली हुई धातु की सतह पर तैरता है। इसे समय-समय पर हटा दिया जाता है। अभिक्रिया: \( \text{Gangue} + \text{Flux} \rightarrow \text{Slag} \) (गलनीय कीट) उदाहरण: जब \( \text{FeO} \) (आधात्री) सिलिका (\( \text{SiO}_2 \)) (गालक) से मिलता है, तो आयरन सिलिकेट (\( \text{FeSiO}_3 \)) धातुमल बनता है।
\( \text{FeO} (s) + \text{SiO}_2 (s) \rightarrow \text{FeSiO}_3 (l) \) ये तीनों घटक धातुकर्म प्रक्रियाओं में एक साथ मिलकर काम करते हैं ताकि शुद्ध धातु प्राप्त की जा सके।
In simple words: (i) आधात्री अयस्क में मिली मिट्टी, रेत या पत्थर जैसी फालतू चीज़ें होती हैं. (ii) गालक वह पदार्थ है जिसे अयस्क में डालते हैं ताकि फालतू चीज़ें पिघलकर अलग हो सकें. (iii) धातुमल वह पिघला हुआ कचरा है जो गालक और आधात्री के मिलने से बनता है, जिसे धातु से अलग कर लिया जाता है.

🎯 Exam Tip: तीनों शब्दों की परिभाषा, उनके बीच का संबंध, और प्रत्येक के लिए एक उपयुक्त उदाहरण याद रखें।

 

Question 11. निम्न वाष्प प्रावस्था प्रक्रमों द्वारा धातु शोधन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए –
Answer: वाष्प प्रावस्था शोधन विधियाँ (Vapour Phase Refining Methods) उन धातुओं के लिए उपयोग की जाती हैं जो आसानी से एक वाष्पशील यौगिक बनाती हैं, जबकि उनकी अशुद्धियाँ ऐसा नहीं करतीं। यह विधि दो मुख्य चरणों पर आधारित है: 1. अशुद्ध धातु को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करके एक वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित किया जाता है। 2. वाष्पशील यौगिक को अपघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है। निम्नलिखित दो प्रमुख वाष्प प्रावस्था प्रक्रम हैं: (i) **मॉण्ड प्रक्रम (Mond's Process):** यह विधि निकिल (Ni) के शोधन के लिए उपयोग की जाती है। अशुद्ध निकिल को 330-350 K पर कार्बन मोनोऑक्साइड (\( \text{CO} \)) के साथ गर्म करने पर वाष्पशील निकिल टेट्राकार्बोनिल (\( [\text{Ni}(\text{CO})_4] \)) बनता है। अशुद्धियाँ अविलेय रहती हैं। इस वाष्पशील यौगिक को 450-470 K तक गर्म करने पर यह अपघटित होकर शुद्ध निकिल देता है।
\( \text{Ni} (s) + 4\text{CO} (g) \xrightarrow{330-350\text{K}} [\text{Ni}(\text{CO})_4] (g) \)
\( [\text{Ni}(\text{CO})_4] (g) \xrightarrow{450-470\text{K}} \text{Ni} (s) + 4\text{CO} (g) \) (ii) **वॉन-आर्केल विधि (Van Arkel Method):** यह विधि टाइटेनियम (Ti) और ज़िरकोनियम (Zr) जैसी धातुओं के अत्यधिक उच्च शुद्धिकरण के लिए उपयोग की जाती है। अशुद्ध धातु को एक वाष्पशील आयोडाइड में परिवर्तित किया जाता है। उदाहरण के लिए, ज़िरकोनियम के लिए, अशुद्ध \( \text{Zr} \) को 870 K पर आयोडीन के साथ गर्म करके वाष्पशील ज़िरकोनियम टेट्राआयोडाइड (\( \text{ZrI}_4 \)) बनाया जाता है। इस \( \text{ZrI}_4 \) गैस को एक गर्म टंगस्टन फिलामेंट (लगभग 1800 K) पर गुज़ारा जाता है, जहाँ यह अपघटित होकर शुद्ध ज़िरकोनियम धातु को फिलामेंट पर जमा करता है और आयोडीन पुनः प्राप्त हो जाता है।
\( \text{Zr} (s) + 2\text{I}_2 (g) \xrightarrow{870\text{K}} \text{ZrI}_4 (g) \)
\( \text{ZrI}_4 (g) \xrightarrow{1800\text{K}} \text{Zr} (s) + 2\text{I}_2 (g) \) इन विधियों का उपयोग उन धातुओं के लिए किया जाता है जो सामान्य शोधन विधियों से शुद्ध नहीं हो सकतीं।
In simple words: वाष्प प्रावस्था शोधन में धातु को पहले एक उड़ने वाली गैस (यौगिक) में बदलते हैं. फिर उस गैस को गर्म करके शुद्ध धातु को अलग कर लेते हैं. मॉण्ड प्रक्रम से निकिल को शुद्ध करते हैं, और वॉन-आर्केल विधि से टाइटेनियम या ज़िरकोनियम जैसी धातुओं को बहुत शुद्ध करते हैं.

🎯 Exam Tip: मॉण्ड और वॉन-आर्केल विधि दोनों के लिए धातु, अभिकर्मक, तापमान और संबंधित रासायनिक अभिक्रियाओं को स्पष्ट रूप से याद रखें, क्योंकि ये उच्च शुद्धता वाली धातुओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।

धातुओं और उनकी अशुद्धियों की प्रकृति के आधार पर उनके शोधन की कुछ विधियाँ यहाँ दी गई हैं:
(क) आसवन (Distillation)
(ख) द्रवीकरण (या गलन परिष्करण) (Liquification)
(ग) दण्ड विलोडन (Polling)
(घ) विद्युत् अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining)
(च) क्षेत्र परिशोधन (Zone Refining)
(छ) वाष्प प्रावस्था परिष्करण (Vapour Phase Refining)
(i) मॉण्ड प्रक्रम (Mond's Process)
(ii) वॉन आर्केल विधि (Van Arckel Method)
(ज) वर्णलेखिकी (क्रोमेटोग्राफी) (Chromatography) विधि

 

Question 12. \( \text{Cr}_2\text{O}_3 \) निर्माण के लिए \( \Delta G^\circ \) का मान \( -540 \, \text{kJmol}^{-1} \) है। तथा \( \text{Al}_2\text{O}_3 \) निर्माण के लिए \( \Delta C^\circ \) का मान \( - 827 \, \text{kJ mol}^{-1} \) है। क्या Al धातु द्वारा \( \text{Cr}_2\text{O}_3 \) का अपचयन सम्भव है?
Answer: एल्युमीनियम द्वारा क्रोमियम ऑक्साइड के अपचयन की संभावना की जाँच करने के लिए, हम अभिक्रिया के लिए मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन \( (\Delta G^\circ) \) की गणना करते हैं। \( \text{Cr}_2\text{O}_3 \) के निर्माण के लिए मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा \( -540 \, \text{kJ/mol} \) है, और \( \text{Al}_2\text{O}_3 \) के लिए यह \( -827 \, \text{kJ/mol} \) है। जब हम \( \text{Cr}_2\text{O}_3 \) के निर्माण की \( \Delta G^\circ \) को \( \text{Al}_2\text{O}_3 \) के निर्माण की \( \Delta G^\circ \) से घटाते हैं, तो हमें अपचयन अभिक्रिया के लिए \( \Delta G^\circ \) प्राप्त होता है। यह अंतर \( -827 - (-540) = -287 \, \text{kJ/mol} \) है। चूंकि समग्र मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन ऋणात्मक है, इसलिए \( \text{Cr}_2\text{O}_3 \) का Al द्वारा अपचयन संभव और स्वतःप्रवर्तित है। यह अभिक्रिया इसलिए अनुकूल है क्योंकि एल्युमीनियम क्रोमियम की तुलना में अधिक स्थिर ऑक्साइड बनाता है। अभिक्रिया को इस प्रकार दर्शाया जा सकता है:
\( \frac{4}{3} \text{Al(s)} + \frac{2}{3} \text{Cr}_2\text{O}_3\text{(s)} \rightarrow \frac{2}{3} \text{Al}_2\text{O}_3\text{(s)} + \frac{4}{3} \text{Cr(s)} \)
इस अभिक्रिया के लिए अंतिम \( \Delta G^\circ \) का मान \( -287 \, \text{kJ/mol} \) है।
In simple words: हम देखते हैं कि जब एल्युमीनियम क्रोमियम ऑक्साइड से ऑक्सीजन लेता है, तो ऊर्जा में कितना बदलाव आता है। एल्युमीनियम ऑक्सीजन के साथ बहुत मजबूत बंधन बनाता है। इस वजह से, अभिक्रिया के लिए कुल ऊर्जा परिवर्तन नकारात्मक है, जिसका मतलब है कि यह अपने आप हो सकती है। इसलिए, एल्युमीनियम आसानी से क्रोमियम ऑक्साइड से ऑक्सीजन हटा सकता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि ऋणात्मक मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन (\( \Delta G^\circ \)) एक स्वतःप्रवर्तित और संभव अभिक्रिया को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि अभिक्रिया आगे बढ़ेगी।

 

Question 13. निम्न अभिक्रियाओं को पूर्ण संतुलित कीजिए-
(i) 2Cu2O + Cu2S →.......... +
(ii) Ag2S +NaCN →. +
(iii) Al2O3 + NaOH →......... +
(iv) CuFeS2 + O2 →. + + SO2
(v) Cu2S + → Cu + SO2
Answer:
(i) \( 2\text{Cu}_2\text{O} + \text{Cu}_2\text{S} \rightarrow 6\text{Cu} + \text{SO}_2\uparrow \)
(ii) \( \text{Ag}_2\text{S} + 4\text{NaCN} \rightarrow 2\text{Na}[\text{Ag(CN)}_2] + \text{Na}_2\text{SO}_4 \)
(iii) \( \text{Al}_2\text{O}_3 + 2\text{NaOH} \rightarrow 2\text{NaAlO}_2 + \text{H}_2\text{O} \)
(iv) \( 2\text{CuFeS}_2 + \text{O}_2 \rightarrow \text{Cu}_2\text{S} + 2\text{FeS} + \text{SO}_2 \)
(v) \( \text{Cu}_2\text{S} + 2\text{Cu}_2\text{O} \xrightarrow{\Delta} 6\text{Cu} + \text{SO}_2 \)
In simple words: रासायनिक अभिक्रियाओं को संतुलित करने का मतलब है कि अभिक्रिया के तीर (रिएक्टेंट और प्रोडक्ट) के दोनों ओर प्रत्येक प्रकार के परमाणु की संख्या समान हो। हम लापता हिस्सों को भरते हैं और उन्हें बराबर करने के लिए संख्याओं को समायोजित करते हैं। यह एक पहेली की तरह है जहाँ सब कुछ पूरी तरह से मेल खाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: रासायनिक समीकरणों को संतुलित करते समय, हमेशा अभिक्रिया के दोनों ओर प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या की जाँच करें। रासायनिक सूत्रों में सबस्क्रिप्ट को बदले बिना गुणांकों (अणुओं के सामने की संख्या) का उपयोग करना याद रखें।

Free study material for Chemistry

Free RBSE Textbook Explanations: Class 12 Chemistry Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्

Chapter Exercise Answers for Class 12 Chemistry

Access structured RBSE textbook solutions for Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्. Designed in alignment with the latest academic curriculum for Class 12 Chemistry, these answers cover all end-of-chapter exercises to support daily learning and homework completion.

Detailed Answer Guides for Chapter 06 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्

Beyond providing final answers, these guides offer step-by-step breakdowns for complex queries in the Class 12 Chemistry module. This approach helps students balance theoretical depth with practical problem-solving skills required for RBSE exams.

Complete Preparation Kit for Class 12 Exams

Consistent practice with these solution guides cultivates faster problem-solving habits and clearer logical structuring. For a complete preparation experience, pair these textbook answers with our dedicated revision notes and sample papers for Class 12 Chemistry.

FAQs

Where can I find the latest RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् for the 2026-27 session?

The complete and updated RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 12 Chemistry are as per latest RBSE curriculum.

Are the Chemistry RBSE solutions for Class 12 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Chemistry concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 12 RBSE solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using RBSE language because RBSE marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 12 Chemistry. You can access RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Chemistry RBSE solutions for Class 12 as a PDF?

Yes, you can download the entire RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक् in printable PDF format for offline study on any device.