RBSE Solutions Class 12 Chemistry Chapter 16 त्रिविम रसायन

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Detailed Chapter 16 त्रिविम रसायन RBSE Solutions for Class 12 Chemistry

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Class 12 Chemistry Chapter 16 त्रिविम रसायन RBSE Solutions PDF

Rbse Class 12 Chemistry Chapter 16 अभ्यास प्रश्न

Rbse Class 12 Chemistry Chapter 16 बहुविकल्पीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. निम्न में से कौनसा त्रिविम समावयवता की श्रेणी में नहीं आता है?
(a) ज्यामितीय समावयवता
(b) संरूपण समावयवता
(c) क्रियात्मक समूह समावयवता
(d) प्रकाशित समावयवता
Answer: (c) क्रियात्मक समूह समावयवता
In simple words: त्रिविम समावयवता में अणुओं की अंतरिक्ष व्यवस्था अलग-अलग होती है, लेकिन क्रियात्मक समूह समावयवता में केवल क्रियात्मक समूह ही बदलता है. यह त्रिविम समावयवता का प्रकार नहीं है.

🎯 Exam Tip: त्रिविम समावयवता के मुख्य प्रकारों जैसे ज्यामितीय, संरूपण और प्रकाशित समावयवता को याद रखें.

 

प्रश्न 2. निम्न में से कौनसा यौगिक ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित नहीं करता है?
(a) 2-ब्युटीन
(b) 1, 2-डाईब्रोमोएथीन
(c) 1, 2-डाईक्लोरोएथीन
(d) 2-ब्यूटाइन
Answer: (d) 2-ब्यूटाइन
In simple words: ज्यामितीय समावयवता उन यौगिकों में पाई जाती है जिनमें डबल बॉन्ड हो और प्रत्येक डबल बॉन्ड वाले कार्बन परमाणु पर अलग-अलग समूह जुड़े हों. 2-ब्यूटाइन में ट्रिपल बॉन्ड होता है, जहाँ मुक्त घूर्णन प्रतिबंधित नहीं होता है.

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय समावयवता के लिए डबल बॉन्ड और प्रत्येक कार्बन पर अलग-अलग समूहों की उपस्थिति मुख्य शर्त है. ट्रिपल बॉन्ड में यह संभव नहीं होता है.

 

प्रश्न 3. प्रकाशित समावयवता के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य
(a) अणु में सममिति अक्ष उपस्थित हो।
(b) अणु में सममिति जल उपस्थित हो।
(c) अणु में सममिति केन्द्र उपस्थित हो।
(d) उक्त में से कोई नहीं।
Answer: (d) उक्त में से कोई नहीं।
In simple words: प्रकाशित समावयवता के लिए अणु में कोई भी सममिति तत्व नहीं होना चाहिए. यदि अणु में सममिति अक्ष, सममिति तल या सममिति केंद्र हो तो वह प्रकाशित अक्रिय होता है.

🎯 Exam Tip: प्रकाशित सक्रियता के लिए अणु का असम्मित होना आवश्यक है, जिसका अर्थ है उसमें किसी भी प्रकार का सममिति तत्व मौजूद नहीं होना चाहिए.

 

प्रश्न 4. मीसो टार्टरिक अम्ल धुवण घूर्णकता प्रदर्शित नहीं करता है क्योंकि
(a) उसमें दो किरेल केन्द्र उपस्थित है।
(b) उसमें बाह्य प्रतिकार हो जाता है।
(c) उसमें सममिति तल विद्यमान है।
(d) उसमें एरिथ्रो रूप उपस्थित है।
Answer: (c) उसमें सममिति तल विद्यमान है।
In simple words: मीसो टार्टरिक अम्ल में दो किरेल कार्बन होते हैं, लेकिन इसमें एक आंतरिक सममिति तल होता है. यह तल अणु को दो हिस्सों में बांटता है जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं, जिससे इसका कुल ध्रुवण घूर्णन शून्य हो जाता है.

🎯 Exam Tip: मीसो यौगिकों की पहचान उनके सममिति तल से होती है, जो उन्हें प्रकाशित अक्रिय बनाता है, भले ही उनमें किरेल केंद्र हों.

 

प्रश्न 5. निम्न में से कौनसा यौगिक प्रकाशित समावयवती प्रदर्शित नहीं करता है?
(a) ऐथिल ऐल्कोहॉल
(b) 2-ब्युटेनॉल
(c) 2-क्लोरो प्रोपेन
(d) लेक्टिक
Answer: (a) ऐथिल ऐल्कोहॉल
In simple words: ऐथिल ऐल्कोहॉल में कोई किरेल कार्बन परमाणु नहीं होता है क्योंकि इसमें कोई भी ऐसा कार्बन नहीं है जिसके चारों समूह अलग-अलग हों. इसलिए, यह प्रकाशित समावयवता नहीं दिखाता है.

🎯 Exam Tip: प्रकाशित समावयवता के लिए कम से कम एक किरेल कार्बन का होना जरूरी है, जिसमें कार्बन से जुड़े चारों समूह भिन्न हों.

 

प्रश्न 6. फिशर प्रक्षेपण सूत्र लिखने के लिए कौनसा कथन सत्य नहीं है?
(a) परस्पर काटती हुई दो लम्बवत रेखायें खींची जाती है।
(b) प्रथम क्रमांक वाला कार्बन बांयी ओर रखा जाता है।
(c) क्षैतिज तल के दोनों समूह ऊपर की ओर प्रक्षेपित होते है।
(d) अणु के तल को 180° से घुमाया जा सकता है।
Answer: (b) प्रथम क्रमांक वाला कार्बन बांयी ओर रखा जाता है।
In simple words: फिशर प्रक्षेपण में सबसे ऊपर वह कार्बन रखा जाता है जिसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है. सामान्यतः यह कार्बन लंबवत रेखा के शीर्ष पर होता है, ना कि बाईं ओर.

🎯 Exam Tip: फिशर प्रक्षेपण में प्राथमिकता वाले समूह को हमेशा लंबवत रेखा के शीर्ष पर रखा जाता है, न कि बाईं ओर.

 

प्रश्न 7. सापेक्ष विन्यास के लिए संदर्भ के रूप में से किसे आधार बनाया गया?
(a) लेक्टिक अम्ल
(b) टार्टरिक अम्ल
(c) ग्लिसरेल्डिहाइड
(d) कोई नहीं
Answer: (c) ग्लिसरेल्डिहाइड
In simple words: सापेक्ष विन्यास का निर्धारण करते समय ग्लिसरेल्डिहाइड को एक मानक यौगिक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसके D और L रूपों का उपयोग अन्य यौगिकों के विन्यास को निर्धारित करने के लिए किया गया है.

🎯 Exam Tip: ग्लिसरेल्डिहाइड एक महत्वपूर्ण संदर्भ अणु है जिसका उपयोग कई प्रकाशित सक्रिय यौगिकों के सापेक्ष विन्यास को समझने में किया जाता है.

 

प्रश्न 9. संरूपण समावयवता के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य नहीं
(a) न्यूमैन एवं सॉहार्स प्रक्षेपण सूत्रों से प्रदर्शित किये जा सकते है।
(b) संरूपीय समावयवियों की संख्या अनन्त होती है।
(c) ग्रसित संरूप सर्वाधिक स्थायी होता है।
(d) वलय तंत्रों में भी संरूपण समावयवता पायी जाती है।
Answer: (c) ग्रसित संरूप सर्वाधिक स्थायी होता है।
In simple words: ग्रसित संरूप में परमाणु एक-दूसरे के करीब होते हैं, जिससे उनमें प्रतिकर्षण होता है और यह इसे कम स्थिर बनाता है. सांतरित संरूपण अधिक स्थिर होता है क्योंकि समूह एक-दूसरे से दूर होते हैं.

🎯 Exam Tip: ग्रसित और सांतरित संरूपणों की सापेक्ष स्थिरता को हमेशा याद रखें; सांतरित संरूपण, आमतौर पर, ग्रसित संरूपण से अधिक स्थिर होता है.

 

प्रश्न 10. विवरिम समावयवियों के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य नहीं है।
(a) ये प्रकाशित ध्रुवण घूर्णकता प्रदर्शित करते हैं।
(b) इन समावयवियों के भौतिक गुणों में भिन्नता पायी जाती है।
(c) इनमें आन्तरिक प्रतिकार होता है।
(d) ये समतल ध्रुवित प्रकाश को प्रणित कर देते हैं।
Answer: (d) ये समतल ध्रुवित प्रकाश को प्रणित कर देते हैं।
In simple words: विवरिम समावयवी अलग-अलग अणु होते हैं, इसलिए वे ध्रुवण घूर्णकता दिखा सकते हैं. उनमें भौतिक गुण भी अलग होते हैं और वे समतल ध्रुवित प्रकाश को घुमाते हैं. आंतरिक प्रतिकार मीसो यौगिकों में होता है, विवरिम समावयवियों में नहीं.

🎯 Exam Tip: विवरिम समावयवियों के प्रकाशित सक्रिय होने की संभावना होती है और उनके भौतिक गुण अलग-अलग होते हैं, जो उन्हें प्रतिबिम्ब समावयवियों से अलग करते हैं.

उत्तरमाला:

1. (c)
2. (d)
3. (d)
4. (c)
5. (a)
6. (b)
7. (c)
8. (c)
9. (c)
10. (d)

Rbse Class 12 Chemistry Chapter 16 अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. समावयवता को परिभाषित कीजिए।
Answer: समावयवता एक ऐसी घटना है जहाँ दो या दो से अधिक यौगिकों का अणुसूत्र (molecular formula) समान होता है, लेकिन उनके परमाणुओं की व्यवस्था अलग-अलग होती है. ऐसे यौगिकों को समावयवी (isomers) कहते हैं. यह उन्हें अलग-अलग रासायनिक और भौतिक गुण प्रदान करती है.
त्रिविम समावयवता (Stereo isomerism): वे यौगिक जिनमें विभिन्न परमाणुओं और समूहों की व्यवस्था तो समान होती है, लेकिन उनकी अंतरिक्ष में व्यवस्थाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तो वे त्रिविम समावयव कहलाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया को त्रिविम समावयवता कहते हैं.
In simple words: समावयवता वह स्थिति है जब दो अलग-अलग चीजों का अणु सूत्र एक जैसा होता है, पर उनके परमाणु अलग तरीके से जुड़े होते हैं. त्रिविम समावयवता तब होती है जब परमाणु अंतरिक्ष में अलग तरह से व्यवस्थित होते हैं.

🎯 Exam Tip: समावयवता की परिभाषा में अणुसूत्र की समानता और संरचनात्मक या त्रिविम व्यवस्था की भिन्नता को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है.

 

प्रश्न 3. प्रकाशिक सक्रियता क्या है?
Answer: प्रकाशिक सक्रियता (Optical Activity) वह गुण है जिसमें कुछ कार्बनिक यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को या तो बाईं ओर या दाईं ओर घुमा सकते हैं. ऐसे यौगिकों को प्रकाश सक्रिय यौगिक कहते हैं और उनके इस गुण को प्रकाशिक सक्रियता कहते हैं. यह गुण अणुओं की असममित संरचना के कारण होता है, जिससे वे प्रकाश को घुमा पाते हैं.
In simple words: प्रकाशिक सक्रियता का मतलब है कि कुछ खास रसायन रोशनी को एक खास दिशा में मोड़ सकते हैं. ये रसायन प्रकाश को या तो बाईं या दाईं ओर घुमा देते हैं.

🎯 Exam Tip: प्रकाशिक सक्रियता की परिभाषा में समतल ध्रुवित प्रकाश के घूर्णन और प्रकाश सक्रिय यौगिकों के बीच संबंध को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए.

 

प्रश्न 4. प्रकाशिक समावयवता के लिए क्या आवश्यक शर्ते हैं?
Answer: प्रकाशिक सक्रिय यौगिकों के लिए कुछ मुख्य आवश्यक शर्तें इस प्रकार हैं:
1. यौगिक में एक असम्मित कार्बन परमाणु का होना बहुत जरूरी है. इसका मतलब है कि कार्बन से जुड़े सभी चारों परमाणु या समूह अलग-अलग होने चाहिए.
2. अणु में किरेल अक्ष मौजूद होना चाहिए.
3. अणु में किरेल तल का मौजूद होना अनिवार्य है.
4. अणु में किसी भी प्रकार के सममिति के तत्व नहीं होने चाहिए.
ये शर्तें यह सुनिश्चित करती हैं कि अणु अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपित न हो सके.
In simple words: प्रकाशित समावयवता के लिए जरूरी है कि अणु में एक ऐसा कार्बन हो जिससे चार अलग-अलग चीजें जुड़ी हों. अणु में कोई सममिति नहीं होनी चाहिए, जिससे वह अपने दर्पण चित्र पर फिट न हो सके.

🎯 Exam Tip: प्रकाशित समावयवता की शर्तों में असम्मित कार्बन (किरेल केंद्र) और सममिति तत्वों का अभाव सबसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं.

 

प्रश्न 5. सममिति के तत्व बताइये।
Answer: अणु में सममिति के मुख्य तत्व जो होते हैं, वे अणु की ज्यामितीय विशेषताओं का वर्णन करते हैं. ये तत्व हैं:
1. सममिति तल (Plane of Symmetry): यह एक काल्पनिक तल है जो अणु को दो ऐसे बराबर हिस्सों में बांटता है जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं.
2. सममिति अक्ष (Axis of Symmetry): यह एक काल्पनिक अक्ष है जिसके चारों ओर अणु को घुमाने पर वह अपनी मूल अवस्था में वापस आ जाता है.
3. सममिति केन्द्र (Centre of Symmetry): यह अणु के केंद्र में एक बिंदु है जिससे होकर विपरीत दिशाओं में जाने पर समान परमाणु मिलते हैं.
In simple words: सममिति के तीन मुख्य हिस्से होते हैं: सममिति तल (जो अणु को दो बराबर हिस्सों में बांटे), सममिति अक्ष (जिसके चारों ओर घुमाने पर अणु पहले जैसा दिखे) और सममिति केंद्र (बीच का बिंदु जहाँ से बराबर दूरी पर समान परमाणु हों).

🎯 Exam Tip: सममिति के तीनों तत्वों - तल, अक्ष और केंद्र - की सही पहचान एक अणु की प्रकाशित सक्रियता निर्धारित करने में मदद करती है.

 

प्रश्न 6. मीसो रूप प्रकाशिक सक्रिय नहीं होता है, क्यों?
Answer: मीसो टार्टरिक अम्ल में ऊपरी और निचले हिस्सों का घूर्णन बराबर होता है और विपरीत दिशा में होता है, जिससे कुल घूर्णन शून्य हो जाता है.
इसका कारण है कि मीसो यौगिकों में एक आंतरिक सममिति तल मौजूद होता है. इस सममिति तल के कारण, अणु का एक हिस्सा समतल ध्रुवित प्रकाश को जितनी मात्रा में दाईं ओर घुमाता है, दूसरा हिस्सा उतनी ही मात्रा में बाईं ओर घुमा देता है. इस प्रकार, दोनों घूर्णन एक-दूसरे को खत्म कर देते हैं, और अणु कुल मिलाकर प्रकाशित अक्रिय हो जाता है.
In simple words: मीसो यौगिक प्रकाशित सक्रिय नहीं होते क्योंकि उनमें एक खास तरह की अंदरूनी सममिति होती है. इसका मतलब है कि अणु का एक हिस्सा प्रकाश को एक तरफ घुमाता है और दूसरा हिस्सा ठीक उतनी ही विपरीत दिशा में घुमाता है, जिससे कुल घुमाव शून्य हो जाता है.

🎯 Exam Tip: मीसो यौगिकों में किरेल कार्बन होते हुए भी आंतरिक प्रतिकार के कारण प्रकाशित अक्रियता होती है, इस बिंदु पर विशेष ध्यान दें.

Rbse Class 12 Chemistry Chapter 16 लघुउत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. ध्रुवण घूर्णकता की परिभाषा लिखिए। उदाहरण सहित बताइये कि यह कैसे अणुओं से मिलती है?
Answer: ध्रुवण घूर्णकता वह गुण है जहाँ कुछ यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बाईं या दाईं तरफ घुमा देते हैं. ऐसे यौगिकों को ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहते हैं, और उनकी प्रकाश को घुमाने की क्षमता को ध्रुवण घूर्णकता कहा जाता है. ध्रुवण घूर्णकता उन यौगिकों में पाई जाती है जिनमें असम्मित कार्बन परमाणु मौजूद हों और उनमें किसी भी प्रकार का सममिति तत्व न हो.
उदाहरणार्थ:
\(\text{लेक्टिक अम्ल}\)
\(\qquad \quad \text{H}\)
\(\qquad \quad |\)
\(\text{CH}_3-\text{C}-\text{COOH}\)
\(\qquad \quad |\)
\(\qquad \quad \text{OH}\)
\(\text{ग्लिसरैल्डिहाइड}\)
\(\qquad \text{CHO}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{CH}_2\text{OH}\)
ये अणु असम्मित होते हैं, अर्थात इनकी दर्पण छवि इन पर अध्यारोपित नहीं की जा सकती, जिससे ये ध्रुवण घूर्णक होते हैं.
In simple words: ध्रुवण घूर्णकता का मतलब है कुछ रसायनों का प्रकाश को मोड़ना. ये रसायन खास होते हैं क्योंकि उनमें एक ऐसा कार्बन होता है जिसके चारों ओर चार अलग-अलग चीजें जुड़ी होती हैं, और इनमें कोई सममिति नहीं होती है.

🎯 Exam Tip: ध्रुवण घूर्णकता को परिभाषित करते समय असम्मित कार्बन और सममिति के अभाव को मुख्य विशेषता के रूप में बताएं, और उदाहरणों को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ.

 

प्रश्न 2. 1-ब्यूटेनॉल प्रकाशिक समावयवता नहीं दिखाता जबकि 2-ब्यूटेनॉल प्रदर्शित करता है, क्यों?
Answer:
\(\qquad \text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\text{CH}_3-\text{CH}_2-\text{C}-\text{CH}_3\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{OH}\)
\(\text{2-ब्यूटेनॉल}\)
हम जानते हैं कि प्रकाशिक समावयवता केवल उन्हीं यौगिकों में पाई जाती है जिनमें असम्मित कार्बन परमाणु होता है. असम्मित कार्बन वह कार्बन होता है जिससे चार अलग-अलग समूह जुड़े होते हैं.
1-ब्यूटेनॉल में कोई असम्मित कार्बन परमाणु नहीं होता है, क्योंकि इसमें कोई भी कार्बन परमाणु ऐसा नहीं है जिससे चार भिन्न-भिन्न समूह जुड़े हों. इसलिए, 1-ब्यूटेनॉल प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित नहीं करता है.
जबकि 2-ब्यूटेनॉल में दूसरा कार्बन परमाणु असम्मित होता है. इससे \(-\text{H}\), \(-\text{OH}\), \(-\text{CH}_3\), और \(-\text{CH}_2\text{CH}_3\) चार अलग-अलग समूह जुड़े होते हैं. इसलिए, 2-ब्यूटेनॉल प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करता है.
In simple words: 1-ब्यूटेनॉल में कोई भी कार्बन ऐसा नहीं है जिससे चार अलग-अलग चीजें जुड़ी हों, इसलिए वह प्रकाशिक समावयवता नहीं दिखाता है. लेकिन 2-ब्यूटेनॉल में एक कार्बन ऐसा होता है जिससे चार अलग-अलग चीजें जुड़ी होती हैं, इसलिए वह प्रकाशिक समावयवता दिखाता है.

🎯 Exam Tip: किसी भी अणु की प्रकाशित सक्रियता का निर्धारण करते समय किरेल केंद्र (असमित कार्बन) की उपस्थिति की जाँच करना सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है.

 

प्रश्न 3. प्रकाश सक्रियता के लिए आवश्यक शर्ते क्या है? प्रकाश सक्रिय अणुओं के उदाहरण दीजिए।
Answer: प्रकाशिक सक्रिय यौगिकों के लिए कुछ आवश्यक शर्तें इस प्रकार हैं:
1. यौगिक में एक असम्मित कार्बन परमाणु का होना बहुत जरूरी है. इसका मतलब है कि कार्बन से जुड़े सभी चारों परमाणु या समूह अलग-अलग होने चाहिए.
2. अणु में किरेल अक्ष मौजूद होना चाहिए.
3. अणु में किरेल तल का मौजूद होना अनिवार्य है.
4. अणु में किसी भी प्रकार के सममिति के तत्व नहीं होने चाहिए.
प्रकाश सक्रिय यौगिकों के उदाहरण:
(i) \(\text{लेक्टिक अम्ल}\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad \quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad \quad |\)
\(\qquad \text{CH}_3\)
(ii) \(\text{2-ब्यूटेनॉल}\)
\(\qquad \text{CH}_3\)
\(\qquad \quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad \quad |\)
\(\qquad \text{C}_2\text{H}_5\)
ये अणु असम्मित संरचना रखते हैं, जिससे वे समतल ध्रुवित प्रकाश को घुमा सकते हैं.
In simple words: प्रकाश सक्रियता के लिए अणु में असम्मित कार्बन और कोई सममिति नहीं होनी चाहिए. इसके उदाहरण लैक्टिक अम्ल और 2-ब्यूटेनॉल हैं, क्योंकि उनमें चार अलग-अलग समूहों वाला कार्बन होता है.

🎯 Exam Tip: प्रकाश सक्रियता की शर्तें और उदाहरण याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर किरेल केंद्र और सममिति तत्वों के बीच के संबंध पर ध्यान केंद्रित करें.

 

प्रश्न 4. लेक्टिक अम्ल के दो प्रकाशिक समावयवेयों की विवेचना कीजिए।
Answer: लेक्टिक अम्ल के दो मुख्य प्रकाशिक समावयवी होते हैं, जिन्हें d-लैक्टिक अम्ल और l-लैक्टिक अम्ल कहते हैं. ये दोनों एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं और एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं हो सकते.
d-लैक्टिक अम्ल:
\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{CH}_3\)
d-लैक्टिक अम्ल समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दाईं तरफ घुमाता है.
l-लैक्टिक अम्ल:
\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{CH}_3\)
l-लैक्टिक अम्ल समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बाईं तरफ घुमा देता है.
ये दोनों समावयवी शारीरिक गुणों में समान होते हैं लेकिन प्रकाश को घुमाने की दिशा में भिन्न होते हैं.
In simple words: लैक्टिक अम्ल के दो प्रकार होते हैं: d-लैक्टिक और l-लैक्टिक. d-लैक्टिक प्रकाश को दाईं ओर घुमाता है, और l-लैक्टिक प्रकाश को बाईं ओर घुमाता है. ये दोनों एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब जैसे होते हैं.

🎯 Exam Tip: d और l समावयवों के बीच अंतर को उनके समतल ध्रुवित प्रकाश के घूर्णन की दिशा से स्पष्ट करें, और याद रखें कि ये भौतिक गुणों में समान होते हैं.

 

प्रश्न 5. उपयुक्त उदाहरण देकर रेसिमिकरण की व्याख्या कीजिए।
Answer: जब वाम ध्रुवण घूर्णक (l या -) और दक्षिण ध्रुवण घूर्णक (d या +) को समान अनुपात में मिलाया जाता है, तो प्राप्त मिश्रण को रेसिमिक मिश्रण कहते हैं. यह मिश्रण प्रकाशित अक्रिय होता है. इस घटना को रेसिमिकरण कहते हैं. रेसिमिकरण को मुख्य रूप से तीन तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है:
(i) गर्म करने से (By Simple Heating): इसे तापीय रेसिमिकरण (Thermal Racemisation) कहते हैं. टार्टरिक अम्ल और लैक्टिक अम्ल जैसे यौगिकों के रेसिमिक मिश्रण इस विधि से प्राप्त किए जा सकते हैं.
\(\text{CH}_3\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(d-अम्ल (दो अणु))}\)
\(\qquad \quad \xrightarrow{\Delta}\)
\(\text{CH}_3\)
\(\quad |\)
\(\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad ||\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\text{(d-इनोल रूप अस्थायी (दो अणु))}\)
यह प्रक्रिया इनोल रूप के माध्यम से रेसिमिक मिश्रण बनाती है.
\(\text{CH}_3\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(d-अम्ल)}\)
\(\quad +\)
\(\text{CH}_3\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(l-अम्ल)}\)
\(\implies \text{रेसिमिक मिश्रण}\)
(ii) स्वतः रेसिमिकरण (Auto Racemisation): कमरे के तापमान पर कुछ यौगिक अपने आप रेसिमिकृत हो जाते हैं, जिसे स्वतः रेसिमिकरण कहते हैं.
उदाहरणार्थ: डाई मेथिल सक्सिनेट कमरे के तापमान पर स्वतः रेसिमिकरण हो जाता है.
रेसिमिकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रकाशित सक्रिय यौगिकों को उनके अक्रिय रूपों में बदलने का एक तरीका है.
In simple words: रेसिमिकरण तब होता है जब एक ही रसायन के दो अलग-अलग प्रकार (जो प्रकाश को अलग दिशाओं में मोड़ते हैं) को बराबर मात्रा में मिलाया जाता है, जिससे वह प्रकाश को मोड़ना बंद कर देता है. यह गर्मी से या अपने आप भी हो सकता है.

🎯 Exam Tip: रेसिमिकरण की परिभाषा में प्रकाशित सक्रिय समावयवों के समानुपातिक मिश्रण और परिणामी प्रकाशित अक्रियता पर जोर दें.

 

प्रश्न 6. उपयुक्त उदाहरण लेकर एरिथ्रो एवं थियो युग्म को समझइये।
Answer: एरिथ्रो और थियो युग्म उन यौगिकों में पाए जाते हैं जिनमें दो किरेल केंद्र होते हैं.
थियो (Threo) रूप: जब दोनों किरेल कार्बन पर जुड़े समान समूह (जैसे -OH) एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं में होते हैं, तो उन्हें थियो रूप कहते हैं.
टार्टरिक अम्ल का थियो रूप:
\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(थ्रियो रूप)}\)
एरिथ्रो (Erythro) रूप: जब दोनों किरेल कार्बन पर जुड़े समान समूह (जैसे -OH) एक ही ओर होते हैं, तो ऐसे समावयव को एरिथ्रो रूप कहते हैं.
एरिथ्रो रूप में, समान समूह अणु के एक ही तरफ होते हैं, जबकि थियो रूप में वे विपरीत तरफ होते हैं.
In simple words: एरिथ्रो और थियो रूप ऐसे रसायन होते हैं जिनमें दो खास कार्बन होते हैं. अगर एक जैसे समूह एक ही तरफ हों तो वह एरिथ्रो रूप है, और अगर वे विपरीत तरफ हों तो वह थियो रूप है.

🎯 Exam Tip: एरिथ्रो और थियो रूपों की पहचान किरेल केंद्रों पर जुड़े समान समूहों की सापेक्ष स्थिति (एक ही तरफ या विपरीत तरफ) के आधार पर करें.

 

प्रश्न 7. निरपेक्ष विन्यास से आप क्या समझते हो?
Answer: निरपेक्ष विन्यास अणु के त्रि-आयामी (3D) अंतरिक्ष में परमाणुओं की वास्तविक व्यवस्था को बताता है.
1950 में X-किरण क्रिस्टलोग्राफी तकनीक विकसित हुई, तब बिजवोयट ने यह पाया कि ग्लिसरेल्डिहाइड के जिस रूप को रोजेनॉफ ने स्वेच्छा से D-विन्यास माना था, वह वास्तव में D-विन्यास ही था. दूसरे शब्दों में, जिस विन्यास को अन्य यौगिकों की तुलना करने के लिए सापेक्ष विन्यास के रूप में मानक माना गया था, वही उसका वास्तविक निरपेक्ष विन्यास निकला.
D-ग्लिसरेल्डिहाइड:
\(\text{CHO}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{CH}_2\text{OH}\)
\(\text{(D-ग्लिसरेल्डिहाइड)}\)
L-ग्लिसरेल्डिहाइड:
\(\text{CHO}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{CH}_2\text{OH}\)
\(\text{(L-ग्लिसरेल्डिहाइड)}\)
निरपेक्ष विन्यास हमें अणु के हर परमाणु की अंतरिक्ष में सही स्थिति बताता है, जो उसकी पहचान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
In simple words: निरपेक्ष विन्यास का मतलब है कि अणु के अंदर परमाणु वास्तव में अंतरिक्ष में कैसे व्यवस्थित हैं. ग्लिसरेल्डिहाइड का D-विन्यास इसका एक अच्छा उदाहरण है, जो दिखाता है कि परमाणु असल में किस जगह पर हैं.

🎯 Exam Tip: निरपेक्ष विन्यास की परिभाषा में अणु में परमाणुओं की वास्तविक त्रि-आयामी व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करें, और ग्लिसरेल्डिहाइड के उदाहरण का उल्लेख करें.

 

प्रश्न 8. संरूपण और विन्यासी समावयवता को समझाइये।
Answer:
विन्यासी समावयवता (Configurational Isomerism): विन्यासी समावयवी वे होते हैं जिन्हें एक-दूसरे में बदलने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस तरह के बदलाव में पुराने रासायनिक बंध टूटते हैं और नए बंध बनते हैं. इसके लिए आमतौर पर 100 kJ mol-1 से अधिक ऊर्जा चाहिए होती है. यही कारण है कि विन्यासी समावयवी कमरे के तापमान पर एक-दूसरे में आसानी से परिवर्तित नहीं हो पाते हैं. इनकी पहचान के लिए बंधों का टूटना और बनना आवश्यक है.
संरूपण समावयवता (Conformational Isomerism): संरूपण समावयवियों को एक-दूसरे में बदलने के लिए बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि ये समावयवी कार्बन-कार्बन बंध के मुक्त घूर्णन (free rotation) के कारण बनते हैं. यहाँ ऊर्जा का मान आमतौर पर 3-15 kJ mol-1 होता है. यह ऊर्जा कमरे के तापमान पर ही उपलब्ध हो जाती है. यही कारण है कि ये समावयवी कमरे के तापमान पर आसानी से एक रूप से दूसरे रूप में बदल जाते हैं.
In simple words: विन्यासी समावयवता में अणुओं को बदलने के लिए बहुत सारी ऊर्जा चाहिए होती है क्योंकि इसमें पुराने बंध टूटते हैं. वहीं, संरूपण समावयवता में बहुत कम ऊर्जा लगती है क्योंकि इसमें सिर्फ परमाणु घूमते हैं, बंध नहीं टूटते.

🎯 Exam Tip: विन्यासी और संरूपण समावयवता के बीच मुख्य अंतर ऊर्जा अवरोध और बंधों के टूटने-बनने की आवश्यकता में है.

 

प्रश्न 9. ज्यामितीय समावयवता से क्या तात्पर्य है? ज्यामितीय समावयवता की आवश्यक शर्ते लिखिये।
Answer: ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism) वह घटना है जहाँ ऐसे यौगिकों में, जिनमें प्रतिबंधित घूर्णन होता है, भिन्न-भिन्न परमाणुओं या समूहों की अंतरिक्ष में व्यवस्था भिन्न-भिन्न होती है. ऐसे यौगिकों को ज्यामितीय समावयव कहते हैं, और इस घटना को ज्यामितीय समावयवता कहते हैं. यह अक्सर द्विबंध या चक्रीय संरचनाओं में पाई जाती है.
ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित करने की मुख्य शर्ते:
(i) इनमें द्विबंध (double bond) या प्रतिबंधित घूर्णन युक्त बंध का होना अनिवार्य है.
(ii) प्रतिबंधित घूर्णन युक्त बंध के दोनों ओर भिन्न-भिन्न प्रतिस्थापी (substituents) होने चाहिए. यदि प्रतिस्थापी समान होंगे तो ज्यामितीय समावयवता नहीं पाई जाएगी.
उदाहरण: सिस-ट्रांस समावयवी
\(\text{H}_3\text{C}\)
\(\qquad \quad \text{H}\)
\(\quad \text{C}=\text{C}\)
\(\text{H}\)
\(\qquad \quad \text{CH}_3\)
\(\text{सिस}\)
\(\text{H}_3\text{C}\)
\(\qquad \quad \text{CH}_3\)
\(\quad \text{C}=\text{C}\)
\(\text{H}\)
\(\qquad \quad \text{H}\)
\(\text{ट्रांस}\)
ज्यामितीय समावयवता तब नहीं पाई जाती जब प्रतिस्थापियों की स्थितियाँ बदलने पर भी त्रिविम में वही विन्यास प्राप्त होता है जो मूल यौगिक में है.
In simple words: ज्यामितीय समावयवता तब होती है जब डबल बॉन्ड वाले अणु में समूहों की व्यवस्था अंतरिक्ष में अलग-अलग होती है. इसकी मुख्य शर्त है कि डबल बॉन्ड हो और हर डबल बॉन्ड वाले कार्बन पर अलग-अलग चीजें जुड़ी हों.

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय समावयवता के लिए द्विबंध या रिंग संरचना और प्रत्येक कार्बन परमाणु पर भिन्न प्रतिस्थापियों की उपस्थिति को हमेशा याद रखें.

 

प्रश्न 10. ऑक्सिम द्वारा प्रदर्शित त्रिविम-समावयवती का वर्णन कीजिए।
Answer: ऑक्सिम में ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism in Oximes) पाई जाती है. ऐल्डिहाइड और कीटोन की क्रिया जब हाइड्रॉक्सिलैमीन (\(\text{H}_2\text{N-OH}\)) के साथ करवाई जाती है, तो क्रमशः ऐल्डॉक्सिम और कीटॉक्सिम प्राप्त होते हैं.
\(\text{R}^1\)
\(\quad |\)
\(\text{C}=\text{O}\)
\(\quad |\)
\(\text{R}^2\)
\(\quad +\)
\(\text{H}_2\text{N}-\text{OH}\)
\(\qquad \quad \xrightarrow{\text{-H}_2\text{O}}\)
\(\text{R}^1\)
\(\quad |\)
\(\text{C}=\text{N}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{R}^2\)
\(\text{(ऑक्सिम)}\)
यदि \(R^1 = \text{H}\) है तो यह ऐल्डिहाइड है.
चूंकि \( \text{C}=\text{N} \) बंध में कार्बन (C) और नाइट्रोजन (N) दोनों sp\(^2\) संकरित होते हैं और उनके बीच द्विबंध होता है, इसलिए मुक्त घूर्णन संभव नहीं है. ऑक्सिम में, यदि नाइट्रोजन परमाणु पर जुड़ा -OH समूह कार्बन पर स्थित हाइड्रोजन या अन्य समूह की ओर होता है तो इसे 'सिन (syn)' स्थिति कहते हैं. यदि यह स्थिति विपरीत हो तो इसे 'एन्टी (anti)' स्थिति कहते हैं.
उदाहराण:
(b) \(\text{बेन्जेल्डॉक्सिम (C}_6\text{H}_5\text{CH}=\text{NOH)}\)
\(\quad \text{C}_6\text{H}_5\)
\(\qquad \quad \text{H}\)
\(\quad \text{C}=\text{N}\)
\(\qquad \quad \text{OH}\)
\(\text{सिन (syn)}\)
\(\quad \text{C}_6\text{H}_5\)
\(\qquad \quad \text{H}\)
\(\quad \text{C}=\text{N}\)
\(\qquad \quad \text{OH}\)
\(\text{ऐन्टी (anti)}\)
(c) \(\text{ऐसीटोफीनोन ऑक्सिम [(CH}_6(\text{CH}_3)\text{C}=\text{NOH)]}\)
\(\quad \text{C}_6\text{H}_5\)
\(\qquad \quad \text{CH}_3\)
\(\quad \text{C}=\text{N}\)
\(\qquad \quad \text{OH}\)
\(\text{सिन (syn)}\)
\(\quad \text{C}_6\text{H}_5\)
\(\qquad \quad \text{CH}_3\)
\(\quad \text{C}=\text{N}\)
\(\qquad \quad \text{OH}\)
\(\text{ऐन्टी (anti)}\)
ऑक्सिम की ज्यामितीय समावयवता इस बात पर निर्भर करती है कि -OH समूह द्विबंध के सापेक्ष किस तरफ स्थित है.
In simple words: ऑक्सिम में भी ज्यामितीय समावयवता होती है, जिसे सिन और एंटी कहते हैं. यह तब होता है जब -OH समूह द्विबंध वाले कार्बन और नाइट्रोजन के सापेक्ष अलग-अलग जगहों पर होता है, क्योंकि डबल बॉन्ड के कारण घूमना मुश्किल होता है.

🎯 Exam Tip: सिन और एंटी ऑक्सिम में -OH समूह की स्थिति को सही ढंग से दर्शाएं और बताएं कि द्विबंध के कारण घूर्णन प्रतिबंधित होता है.

 

प्रश्न 11. संरूपण क्या है? ऐथेन के विभिन्न संरूपणों के न्यूमैन प्रक्षेप बनाइये।
Answer: संरूपण (Conformers) अणु की विभिन्न त्रि-आयामी व्यवस्थाएँ होती हैं जो कार्बन-कार्बन एकल बंध के मुक्त घूर्णन के कारण बनती हैं. ऐथेन (\(\text{C}_2\text{H}_6\)) में दो sp\(^3\) संकरित कार्बन परमाणु एक एकल बंध से जुड़े होते हैं, और इस बंध के चारों ओर मुक्त घूर्णन से कई अलग-अलग संरूपण व्यवस्थाएँ प्राप्त होती हैं. ऐथेन के असंख्य संरूपण बनते हैं, लेकिन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
(i) ग्रसित संरूपण (Eclipsed Conformation): ग्रसित संरूपण में, एक कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं के ठीक पीछे होते हैं, जिससे एक-दूसरे को ढक लेते हैं. इसमें द्वितल कोण (dihedral angle) 0° होता है. यह संरूपण समूहों के बीच प्रतिकर्षण के कारण कम स्थिर होता है.
H H H H H H ग्रस्त या ग्रसित संरूपण
(ii) सांतरित संरूपण (Staggered Conformation): सांतरित संरूपण में, एक कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं के बीच अधिकतम दूरी पर स्थित होते हैं. इसमें द्वितल कोण 60° होता है. यह संरूपण समूहों के बीच कम प्रतिकर्षण के कारण अधिक स्थिर होता है.
H H H H H H सांतरित संरूपण
इनके अतिरिक्त, मध्यवर्ती संरूपणों को विषमतलीय (Skew) संरूपण कहते हैं. सभी संरूपणों में बंधों की लंबाई और कोण समान होते हैं. इन्हें न्यूमैन प्रक्षेपण और सॉहार्स प्रक्षेपण द्वारा आसानी से दर्शाया जाता है.
In simple words: संरूपण अणुओं के अलग-अलग आकार होते हैं जो एकल बंध के चारों ओर घूमने से बनते हैं. ऐथेन में दो मुख्य आकार होते हैं: ग्रसित (जहाँ परमाणु एक-दूसरे के पीछे होते हैं) और सांतरित (जहाँ परमाणु एक-दूसरे से दूर होते हैं). सांतरित आकार अधिक स्थिर होता है.

🎯 Exam Tip: न्यूमैन प्रक्षेपणों को सही ढंग से बनाना और ग्रसित बनाम सांतरित संरूपणों की सापेक्ष स्थिरता को समझाना महत्वपूर्ण है.

 

प्रश्न 12. प्रतिबिम्ब रूपों के वियोजन की लवण निर्माण विधि का वर्णन कीजिए।
Answer: रासायनिक विधियों (Chemical Methods) द्वारा रेसिमिक मिश्रण का वियोजन सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली विधि है. यह सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि प्रतिबिम्ब समावयवियों (Enantiomers) के भौतिक गुण पूरी तरह से समान होते हैं, लेकिन विवरिम समावयवियों (Diastereoisomers) या अप्रतिबिम्ब समावयवियों के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं. इसलिए, उन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है.
इस विधि में, रेसिमिक अम्ल को एक ध्रुवण घूर्णक क्षार (chiral base) के साथ मिलाकर लवण बनाया जाता है. यह प्रक्रिया प्रतिबिम्ब समावयवियों को आपस में विवरिम समावयवियों में बदल देती है. प्राप्त विवरिम समावयवियों को फिर भौतिक विधियों जैसे प्रभाजी क्रिस्टलीकरण, आसवन या विलेयता द्वारा अलग कर लिया जाता है. अंत में, मूल प्रतिबिम्ब समावयवियों को जल अपघटन (hydrolysis) द्वारा फिर से प्राप्त कर लिया जाता है.
पृथककरण की विधि निम्न प्रकार से है:
(+) रेसिमिक मिश्रण
\(\implies\) लवण निर्माण
समान भौतिक गुण
\(\implies\) पृथक् नहीं कर सकते
\(\implies\) (+) विवरिम समावयवी मिश्रण
भिन्न-भिन्न भौतिक गुणधर्म
\(\implies\) पृथक् कर लिए जाते हैं
\(\implies\) जल अपघटन
\(\implies\) d-समावयवी
\(\implies\) l-समावयवी
यह विधि प्रकाशित सक्रिय यौगिकों के शुद्ध रूपों को प्राप्त करने में बहुत उपयोगी है.
In simple words: रेसिमिक मिश्रण को अलग करने के लिए, उसे एक खास क्षार के साथ मिलाते हैं, जिससे वे नए रूप बनाते हैं जिन्हें अलग करना आसान होता है. फिर इन नए रूपों को सामान्य तरीकों से अलग किया जाता है, और फिर से मूल रसायन प्राप्त कर लिए जाते हैं.

🎯 Exam Tip: लवण निर्माण विधि में रेसिमिक मिश्रण को विवरिम समावयवियों में बदलकर पृथक करने के सिद्धांत को स्पष्ट करें, क्योंकि प्रतिबिम्ब समावयवियों के भौतिक गुण समान होते हैं.

Rbse Class 12 Chemistry Chapter 16 निबन्धात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. त्रिविम समावयवता को समझाइये? टार्टरिक अम्ल की त्रिविध समावयवता की विवेचना कीजिए तथा उसके सभी संरचना सूत्र,
Answer: त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism) में यौगिकों का अणुसूत्र और संरचना सूत्र समान होता है, लेकिन उनके परमाणुओं या समूहों की अंतरिक्ष में व्यवस्था अलग-अलग होती है. टार्टरिक अम्ल (\(\text{HOOC-CH(OH)-CH(OH)-COOH}\)) में दो किरेल कार्बन परमाणु होते हैं, जिससे यह त्रिविम समावयवता प्रदर्शित करता है.
टार्टरिक अम्ल के तीन मुख्य त्रिविम समावयवी होते हैं:
1. \(\text{d-(+) टार्टरिक अम्ल}\): यह समतल ध्रुवित प्रकाश को दाईं ओर घुमाता है.
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(थ्रियो युग्म (प्रकाशिक सक्रिय))}\)
2. \(\text{l-(-) टार्टरिक अम्ल}\): यह समतल ध्रुवित प्रकाश को बाईं ओर घुमाता है.
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(थ्रियो युग्म (प्रकाशिक सक्रिय))}\)
3. \(\text{मीसो टार्टरिक अम्ल}\): यह प्रकाशित अक्रिय होता है क्योंकि इसमें एक आंतरिक सममिति तल होता है, भले ही इसमें किरेल केंद्र हों.
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(एरिथ्रो युग्म (प्रकाशिक अक्रिय) मेसो टार्टरिक अम्ल)}\)
\(\text{सममिति तल}\)
आंतरिक प्रतिकार (Internal Compensation): मीसो टार्टरिक अम्ल में, अणु का एक हिस्सा समतल ध्रुवित प्रकाश को दाईं ओर घुमाता है और दूसरा हिस्सा बाईं ओर. ये दोनों घूर्णन एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं, जिससे अणु प्रकाशित अक्रिय हो जाता है.
आणविक किरेलता (Molecular Chirality): कुछ अणु ऐसे भी होते हैं जिनमें किरेल केंद्र मौजूद नहीं होता, फिर भी वे प्रकाशित सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. ऐसे अणु समग्र रूप से असम्मित होते हैं, जैसे कि ऐल्कीन के कुछ उदाहरण.
टार्टरिक अम्ल इन विभिन्न रूपों के माध्यम से त्रिविम समावयवता की जटिलता को दर्शाता है.
In simple words: त्रिविम समावयवता का मतलब है कि अणु के परमाणु अंतरिक्ष में अलग-अलग तरह से व्यवस्थित होते हैं. टार्टरिक अम्ल के तीन मुख्य रूप होते हैं: दो जो प्रकाश को घुमाते हैं (d और l) और एक मीसो रूप जो अंदरूनी सममिति के कारण प्रकाश को नहीं घुमाता.

🎯 Exam Tip: टार्टरिक अम्ल की त्रिविम समावयवता की व्याख्या करते समय, तीनों रूपों (d, l, और मीसो) को उनके संरचना सूत्रों और प्रकाशित सक्रियता के साथ स्पष्ट रूप से समझाएँ.

 

प्रश्न 2. दर्पण अप्रतिबिम्ब विवरिम समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये।
Answer: वे प्रकाशिक समावयवी यौगिक जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब नहीं होते हैं, उन्हें अप्रतिबिम्ब समावयवी या विवरिम समावयवी (Diastereoisomers) कहते हैं. यह घटना विवरिम समावयवता कहलाती है.
इनके गुण निम्न प्रकार से हैं:
1. ये एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते हैं.
2. विवरिम समावयवता केवल उन यौगिकों में पाई जाती है जिनमें कम से कम दो किरेल कार्बन केंद्र होते हैं.
3. विवरिम समावयवियों के भौतिक गुणधर्म जैसे गलनांक, क्वथनांक, विलेयता, और विशिष्ट घूर्णन आदि भिन्न-भिन्न होते हैं.
अतः इन्हें आसानी से प्रभाजी आसवन, प्रभाजी क्रिस्टलीकरण, और क्रोमेटोग्राफिक विधियों द्वारा अलग किया जा सकता है.
उदाहरण के लिए, टार्टरिक अम्ल के चार संभावित त्रिविम समावयवी होते हैं, जिनमें से कुछ विवरिम समावयवी हैं:
(I) और (II) एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब (enantiomers) हैं.
(III) और (IV) भी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब (enantiomers) हैं.
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(I)}\)

\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(II)}\)
यहाँ (I) और (II) आपस में प्रतिबिम्ब समावयव हैं.
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(III)}\)

\(\qquad \text{COOH}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\qquad |\)
\(\qquad \text{COOH}\)
\(\text{(IV)}\)
यहाँ (III) और (IV) आपस में प्रतिबिम्ब समावयव हैं.
लेकिन, (I) और (III) आपस में विवरिम समावयव हैं, क्योंकि वे न तो दर्पण प्रतिबिंब हैं और न ही एक-दूसरे पर अध्यारोपित हो सकते हैं. इसी तरह, (I) और (IV), (II) और (III), तथा (II) और (IV) भी विवरिम समावयव हैं. इनके भौतिक गुणों में भिन्नता होती है, जिससे इन्हें अलग करना आसान हो जाता है.
In simple words: विवरिम समावयवी ऐसे अणु होते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब नहीं होते. उनके भौतिक गुण (जैसे गलनांक) अलग-अलग होते हैं, और उन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है. टार्टरिक अम्ल के अलग-अलग रूप इसका उदाहरण हैं.

🎯 Exam Tip: विवरिम समावयवियों की परिभाषा में दर्पण प्रतिबिंब न होने और भौतिक गुणों में भिन्नता को हाइलाइट करें, तथा टार्टरिक अम्ल के उदाहरण से स्पष्ट करें.

 

प्रश्न 3. त्रिविम समावयवता को समझाइये? टार्टरिक अम्ल की त्रिविध समावयवता की विवेचना कीजिए तथा उसके सभी संरचना सूत्र,
Answer: त्रिविम समावयवता वह घटना है जहाँ यौगिकों का अणुसूत्र और संरचना सूत्र समान होते हैं, लेकिन उनके परमाणुओं या समूहों की अंतरिक्ष में व्यवस्था अलग-अलग होती है. त्रिविम समावयवता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
(1) विन्यासी समावयवता (Configurational Isomerism): विन्यासी समावयवियों को एक-दूसरे में बदलने के लिए बहुत अधिक रासायनिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस परिवर्तन में पुराने बंध टूटते हैं और नए बंध बनते हैं. इसके लिए आवश्यक ऊर्जा का मान लगभग 100 kJ/mol से अधिक होता है. विन्यासी समावयवी कमरे के तापमान पर एक-दूसरे में परिवर्तित नहीं हो पाते हैं.
(2) संरूपण समावयवता (Conformational Isomerism): संरूपण समावयवियों को एक-दूसरे में बदलने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है. ये कमरे के तापमान पर ही एक-दूसरे में बदल जाते हैं क्योंकि परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊर्जा वातावरण में ही मिल जाती है. इसी कारण हम संरूपीय समावयवियों को अलग नहीं कर सकते हैं.
टार्टरिक अम्ल में दो किरेल कार्बन होते हैं, जिससे यह त्रिविम समावयवता प्रदर्शित करता है. इसके मुख्य समावयवी निम्न प्रकार हैं:
थ्रियो युग्म (प्रकाशिक सक्रिय):
\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(I)}\)

\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(II)}\)
एरिथ्रो युग्म (प्रकाशिक अक्रिय) / मीसो टार्टरिक अम्ल:
\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{H}-\text{C}-\text{OH}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(III)}\)
\(\text{सममिति तल}\)

\(\text{COOH}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{HO}-\text{C}-\text{H}\)
\(\quad |\)
\(\text{COOH}\)
\(\text{(IV)}\)
\(\text{सममिति तल}\)
टार्टरिक अम्ल के ये विभिन्न रूप इसकी जटिल त्रिविम रसायन को दर्शाते हैं.
In simple words: त्रिविम समावयवता का मतलब है कि एक जैसे रसायन के परमाणु अंतरिक्ष में अलग-अलग ढंग से लगे होते हैं. विन्यासी समावयवता में बंध टूटते हैं, पर संरूपण में सिर्फ घूमते हैं. टार्टरिक अम्ल के तीन मुख्य रूप होते हैं: d, l (जो प्रकाश को घुमाते हैं) और मीसो (जो अंदरूनी सममिति के कारण प्रकाश को नहीं घुमाते).

🎯 Exam Tip: त्रिविम समावयवता की परिभाषा, उसके प्रकार (विन्यासी और संरूपण), और टार्टरिक अम्ल के तीनों रूपों के संरचना सूत्रों और प्रकाशित गुणों को विस्तार से समझाएँ.

 

Question 4. प्रकाशिक समावयवता से आप क्या समझते हैं? दो सममित कार्बन परमाणु वाले यौगिकों में प्रकाशिक समावयवता की विवेचना कीजिए?
Answer: प्रकाशिक समावयवता (Optical Isomerism) वह गुण है जिसमें कुछ कार्बनिक यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमा सकते हैं। यह संकल्पना सबसे पहले 1848 में लुई पॉश्चर (Louis Pasteur) ने दी थी। उन्होंने देखा कि सोडियम अमोनियम टार्टरेट दो तरह के क्रिस्टल के रूप में मिलता है। ये दोनों क्रिस्टल एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब (Mirror Image) जैसे दिखते थे।

लुई पॉश्चर ने इन क्रिस्टलों को अलग किया और बाद में X-किरण विश्लेषण से पता चला कि ये क्रिस्टल एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब थे, जिन्हें एक-दूसरे पर पूरी तरह से नहीं रखा जा सकता था। ऐसे यौगिक जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं, उन्हें प्रकाशिक समावयव कहते हैं। इस गुण को प्रकाशिक समावयवता कहा जाता है। ऐसे यौगिक जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं, उन्हें ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहते हैं। इस घुमाने की क्षमता को ध्रुवणघूर्णकता कहते हैं।

एक समावयव जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घड़ी की सुई की दिशा में (दाहिनी ओर) घुमाता है, उसे दक्षिणावर्ती समावयव (Dextro-rotatory Isomer) कहते हैं। इसे \( d \) या \( (+) \) से दिखाते हैं। इसके उलट, जो समावयव प्रकाश के तल को घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में (बायीं ओर) घुमाता है, उसे वामध्रुवण घूर्णक (Laevo-rotatory) कहते हैं। इसे \( l \) या \( (-) \) से दिखाते हैं।

उदाहरणार्थ: सोडियम अमोनियम टार्टरेट \( (NaOOC-CH(OH)-CH(OH)-COONH_4) \) में प्रकाशिक समावयवता पाई जाती है।

यह समावयवता उन कार्बनिक यौगिकों में पाई जाती है, जिनमें असममित (Asymmetric) कार्बन परमाणु होते हैं। असममित कार्बन परमाणु वह होता है जिससे चार अलग-अलग समूह जुड़े होते हैं। लैक्टिक अम्ल के अलावा, टार्टरिक अम्ल जैसे यौगिकों में भी यह गुण होता है।

दो काइरल केंद्र वाले यौगिक (Compounds with Two Stereogenic Centres):

यदि किसी यौगिक में दो काइरल केंद्र होते हैं, तो दो स्थितियाँ हो सकती हैं:

(a) जब दोनों काइरल केंद्रों पर असमान समूह या परमाणु हों:
अगर ऐसे यौगिकों में \( n \) काइरल केंद्र मौजूद हों, तो उनमें \( 2^n \) प्रकाशिक समावयवी होते हैं। उदाहरण के लिए, 2,3-डाइक्लोरो-ब्यूटेनोइक अम्ल में दो काइरल केंद्र होते हैं और उन पर असमान समूह जुड़े होते हैं। इसलिए, यहाँ प्रकाशिक समावयवियों की कुल संख्या \( (2)^n = (2)^2 = 4 \) होती है। इन समावयवियों को नीचे दिखाया गया है:

COOH H Cl H Cl CH3 (I) एरिथ्रो रूप COOH Cl H Cl H CH3 (II) एरिथ्रो रूप
COOH H Cl Cl H CH3 (III) थ्रियो रूप COOH Cl H H Cl CH3 (IV) थ्रियो रूप
ऊपर दिए गए चित्र में संरचना I और II एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं, और संरचना III और IV भी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं। ये सभी आपस में प्रतिबिंब समावयवी हैं। इन प्रतिबिंब समावयवियों के भौतिक गुणधर्म भले ही समान हों, पर विवरिम समावयवियों के गुणधर्म अलग-अलग होते हैं, जिससे उन्हें अलग करना आसान हो जाता है।

(b) जब दोनों काइरल केंद्रों पर समान समूह या परमाणु हों:
इस तरह के उदाहरणों में भी \( (2)^n = (2^2) = 4 \) प्रकाशिक समावयवी होते हैं। यहाँ इसका उदाहरण टार्टरिक अम्ल है, जिसके समावयव नीचे दिए गए हैं:

COOH H OH HO H COOH (I) थ्रियो युग्म COOH HO H H OH COOH (II) थ्रियो युग्म
COOH H OH H OH COOH (III) एरिथ्रो युग्म COOH HO H HO H COOH (IV) एरिथ्रो युग्म

टार्टरिक अम्ल के समावयव:

(i) \( d (+) \) टार्टरिक अम्ल: इसमें दोनों असममित कार्बन परमाणु समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर घुमाते हैं।

COOH H OH HO H COOH

(ii) \( l (-) \) टार्टरिक अम्ल: इसमें दोनों असममित कार्बन परमाणु समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बायीं ओर घुमाते हैं।

COOH HO H H OH COOH

(iii) रेसेमिक टार्टरिक अम्ल या \( (dl) \) टार्टरिक अम्ल: इसमें \( d \) और \( l \) अम्ल की बराबर मात्राएँ होती हैं। आंतरिक प्रतिकार (Internal Compensation) के कारण इन्हें \( d \) और \( l \) रूपों में अलग नहीं किया जा सकता।

COOH H OH HO H COOH + COOH HO H H OH COOH

(iv) मीसो टार्टरिक अम्ल: इसमें एक असममित कार्बन परमाणु प्रकाश के तल को बायीं ओर घुमाता है और दूसरा असममित कार्बन परमाणु दायीं ओर घुमाता है। इस कारण पूरा अणु प्रकाशिक रूप से अक्रिय हो जाता है। इसे \( d (+) \) और \( l (-) \) रूपों में भी अलग नहीं किया जा सकता।

COOH H OH H OH COOH

मेसो टार्टरिक अम्ल और रेसेमिक टार्टरिक अम्ल दोनों ही प्रकाशिक रूप से अक्रिय होते हैं।
मेसो टार्टरिक अम्ल: मेसो टार्टरिक अम्ल में एक सममिति तल होता है, जिसके कारण यह प्रकाशिक रूप से अक्रिय होता है। यौगिक का एक आधा हिस्सा समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बायीं ओर घुमाता है, और दूसरा आधा हिस्सा दायीं ओर घुमाता है, जिससे कुल घुमाव शून्य हो जाता है। इस तरह के प्रतिकार को आंतरिक प्रतिकार (Internal Compensation) कहते हैं।

रेसेमिक टार्टरिक अम्ल: रेसेमिक टार्टरिक अम्ल में \( 50\% \) \( d \)-टार्टरिक अम्ल और \( 50\% \) \( l \)-टार्टरिक अम्ल होता है। यह भी प्रकाशिक रूप से अक्रिय होता है। ऐसा बाह्य प्रतिकार (External Compensation) के कारण होता है, जहाँ दोनों समावयवी एक-दूसरे के प्रकाशिक घुमाव को रद्द कर देते हैं।

In simple words: प्रकाशिक समावयवता तब होती है जब कोई रसायन प्रकाश के तल को घुमा सकता है। लुई पॉश्चर ने सबसे पहले यह खोजा था। कुछ यौगिकों में दो ऐसे कार्बन परमाणु होते हैं जो प्रकाश को घुमा सकते हैं। यदि ये दोनों कार्बन अलग-अलग हों, तो \( 2^n \) तरह के समावयव हो सकते हैं। टार्टरिक अम्ल इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसके चार रूप होते हैं: \( d \), \( l \), रेसेमिक और मीसो। रेसेमिक मिश्रण और मीसो रूप प्रकाश को नहीं घुमाते क्योंकि उनके प्रभाव अंदर या बाहर से एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं।

🎯 Exam Tip: जब दो या दो से अधिक काइरल केंद्र हों, तो सभी संभावित समावयवों को बनाना और उनके संबंधों (एनैन्शिओमर, डायस्टीरियोमर, मीसो यौगिक) को पहचानना महत्वपूर्ण है। आंतरिक और बाह्य प्रतिकार के बीच का अंतर स्पष्ट करें।

 

Question 6. ज्यामितीय यौगिकों के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। किन्तु प्रकाशीय समावयवों के भौतिक गुण एक से होते हैं कारण सहित समझाइये।
Answer: ज्यामितीय यौगिकों के भौतिक गुण अलग-अलग होते हैं, जबकि प्रकाशिक समावयवों के भौतिक गुण एक जैसे होते हैं। इसके मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:

  1. ज्यामितीय समावयवी (जैसे समपक्ष और विपक्ष रूप) के द्विध्रुव आघूर्ण का मान अलग-अलग होता है। वहीं, प्रकाशिक समावयवी (एनैन्शिओमर) के द्विध्रुव आघूर्ण का मान समान होता है।
  2. ज्यामितीय समावयवों में विपक्ष रूप, समपक्ष रूपों की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं। लेकिन प्रकाशिक समावयवों का स्थायित्व समान होता है।
  3. ज्यामितीय समावयवों के गलनांक और क्वथनांक के मान द्विध्रुव आघूर्ण के मान में भिन्नता के कारण अलग-अलग होते हैं। जबकि प्रकाशिक समावयवों में द्विध्रुव आघूर्ण का मान समान होने के कारण उनके गलनांक और क्वथनांक भी समान होते हैं।

In simple words: ज्यामितीय यौगिकों के गुण जैसे गलनांक, क्वथनांक अलग होते हैं क्योंकि उनकी संरचना में छोटे-छोटे अंतर होते हैं जो उन्हें अलग तरह से व्यवहार करने पर मजबूर करते हैं। लेकिन प्रकाशिक समावयवी (जो एक-दूसरे के दर्पण जैसे होते हैं) के गुण एक जैसे होते हैं, क्योंकि उनकी बनावट लगभग एक समान होती है, जिससे वे रासायनिक और भौतिक रूप से एक ही तरह का व्यवहार करते हैं।

🎯 Exam Tip: ज्यामितीय और प्रकाशिक समावयवता के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए द्विध्रुव आघूर्ण और स्थायित्व जैसे प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान दें। उदाहरण देकर अपने उत्तर को समझाएँ।

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