RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव

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Detailed Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव RBSE Solutions for Class 12 Biology

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Class 12 Biology Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव RBSE Solutions PDF

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. निम्न किस अंग से वाष्पोत्सर्जन नहीं होता है?
(a) पत्ती
(b) तना
(c) जड़
(d) कच्चे फल
Answer: (c) जड़
In simple words: पौधों में वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया जड़ों से नहीं होती है, क्योंकि जड़ें मिट्टी के अंदर होती हैं और उनका मुख्य काम पानी और पोषक तत्वों को सोखना होता है, न कि पानी को वाष्प के रूप में बाहर निकालना।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि वाष्पोत्सर्जन मुख्य रूप से पौधों के वायवीय भागों (पत्तियां, तना, फूल) से होता है, जहाँ से पानी वाष्प के रूप में निकलता है।

 

Question 3. जलरंध्र पाये जाते हैं -
(a) पर्ण तट पर
(b) पत्ती की ऊपरी सतह पर
(c) पत्ती की निचली सतह पर
(d) छाल में
Answer: (a) पर्ण तट पर
In simple words: जलरंध्र पत्तियों के किनारों पर पाए जाते हैं, जहां से पौधे अतिरिक्त पानी को बूंदों के रूप में बाहर निकालते हैं। ये विशेष छिद्र होते हैं।

🎯 Exam Tip: जलरंध्र (हाइडैथोड्स) पत्तियों के किनारे या सिरे पर स्थित होते हैं और इनसे बिन्दुस्राव (पानी का बूंदों के रूप में निकलना) होता है, जो वाष्पोत्सर्जन से अलग है।

 

Question 4. पौधों में बिन्दुस्राव की क्रिया में निकलने वाला द्रव होता है -
(a) शुद्ध जल
(b) केवल उत्सर्जी पदार्थ
(c) जल व \( \text{CO}_2 \)
(d) जल के साथ कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ।
Answer: (d) जल के साथ कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ।
In simple words: जब पौधे बिन्दुस्राव करते हैं, तो निकलने वाला पानी सिर्फ शुद्ध नहीं होता; उसमें कुछ घुलनशील कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ भी मिले होते हैं। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है।

🎯 Exam Tip: बिन्दुस्राव और वाष्पोत्सर्जन के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें, खासकर निकलने वाले पदार्थ की संरचना के संदर्भ में।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. वाष्पोत्सर्जन कितने प्रकार का होता है? नाम लिखिए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन तीन प्रकार का होता है –
• रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration): यह पत्तियों की सतह पर मौजूद छोटे छिद्रों, जिन्हें रंध्र कहते हैं, से होता है। वाष्पोत्सर्जन का अधिकांश भाग इसी विधि से होता है।
• उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration): यह पत्तियों और तनों की बाहरी परत, क्यूटिकल, से होता है। यह कुल वाष्पोत्सर्जन का एक छोटा हिस्सा होता है।
• वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration): यह पौधों के तनों और कुछ फलों पर पाए जाने वाले छोटे छिद्रों, जिन्हें वातरंध्र कहते हैं, से होता है। यह वाष्पोत्सर्जन की सबसे कम मात्रा होती है।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन तीन तरह का होता है: रंध्रों से, पत्ती की ऊपरी परत से और तने पर मौजूद छोटे छेदों से। हर तरीके में पानी का निकलने का रास्ता अलग होता है।

🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के वाष्पोत्सर्जन और उनसे संबंधित संरचनाओं (रंध्र, क्यूटिकल, वातरंध्र) के नाम और उनके प्रतिशत योगदान को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. द्वार कोशिकाओं की आकृति कैसी होती है?
Answer: द्वार कोशिकाओं की आकृति वृक्काकार (Kidney shaped) होती है। ये किडनी जैसी दिखती हैं।
In simple words: द्वार कोशिकाएं किडनी या सेम के दाने जैसी दिखती हैं।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि मोनोकॉट पौधों में द्वार कोशिकाएं आमतौर पर डम्बल-आकार की होती हैं, जबकि डायकॉट पौधों में ये वृक्काकार होती हैं।

 

Question 4. सक्रिय \( \text{K}^+ \) आयन सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
Answer: सक्रिय \( \text{K}^+ \) आयन सिद्धान्त को जापानी वैज्ञानिक इमामुरा और फ्यूजीनो ने 1959 में दिया था। बाद में लेविट (1974) ने इसमें कुछ बदलाव किए और इसे बेहतर बनाया। यह सिद्धांत रंध्रों के खुलने और बंद होने की प्रक्रिया को समझाता है।
In simple words: इमामुरा और फ्यूजीनो ने \( \text{K}^+ \) आयन सिद्धांत दिया था, जिसे बाद में लेविट ने बदला।

🎯 Exam Tip: इस सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादकों के नाम और वर्ष याद रखें, क्योंकि यह रंध्र गति का सबसे मान्य सिद्धांत है।

 

Question 5. वाष्पोत्सर्जन का कोई एक लाभ बताइए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधों में खनिज लवणों का अवशोषण और उनका पौधों के ऊपरी भागों तक जाना होता है। यह पौधों के लिए पोषक तत्वों के परिवहन में मदद करता है।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन से पौधे मिट्टी से खनिज और पानी खींचते हैं और उसे ऊपर ले जाते हैं।

🎯 Exam Tip: वाष्पोत्सर्जन के लाभों को याद करते समय, पानी और खनिज परिवहन के साथ-साथ पौधों के तापमान को नियंत्रित करने की इसकी भूमिका को भी ध्यान में रखें।

 

Question 6. स्टोमेटा की स्थिति क्या होती है?
Answer: स्टोमेटा के खुलने के समय द्वार कोशिकाएँ स्फीति अवस्था (Turgid condition) में होती हैं। इस अवस्था में कोशिकाएँ पानी से भरी और फूली हुई होती हैं।
In simple words: जब स्टोमेटा खुलते हैं, तो द्वार कोशिकाएं पानी से फूल जाती हैं।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि द्वार कोशिकाओं की स्फीति (पानी से भरा होना) रंध्रों को खोलने का कारण बनती है, जबकि श्लथता (पानी की कमी) उन्हें बंद कर देती है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. वाष्पोत्सर्जन को परिभाषित कीजिए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) वह प्रक्रिया है जिसमें जीवित पौधों के वायवीय भागों (जैसे पत्तियां, तना) से पानी वाष्प के रूप में बाहर निकलता है। यह एक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है जो पौधों के जल संतुलन और खनिज अवशोषण में भूमिका निभाती है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है: रन्ध्रीय, उपत्वचीय और वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन का मतलब है कि पौधों के पत्तों और तनों जैसे खुले हिस्सों से पानी भाप बनकर हवा में चला जाता है।

🎯 Exam Tip: परिभाषा में 'जीवित पादपों के वायवीय भागों' और 'जल का वाष्प के रूप में निकलना' शब्दों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. रन्ध्र उपकरण का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: चित्र : रन्ध्री उपकरण A. खुला रन्ध्र B. बन्द रन्ध्र रन्ध्र H2O H2O H2O H2O द्वार कोशिका स्थूल आन्तरिक भित्ति H2O H2O H2O H2O द्वार कोशिका
रंध्र उपकरण में दो द्वार कोशिकाएं होती हैं जो रंध्र को घेरती हैं। खुला रंध्र तब होता है जब द्वार कोशिकाएं पानी से फूल जाती हैं, जिससे उनके बीच का छेद बड़ा हो जाता है। बंद रंध्र में द्वार कोशिकाएं पानी खो देती हैं और सिकुड़ जाती हैं, जिससे छेद बंद हो जाता है।
In simple words: यह चित्र दिखाता है कि कैसे रंध्र (पौधों की पत्तियों में छेद) खुलते और बंद होते हैं। जब ये खुले होते हैं तो पानी बाहर निकलता है, और बंद होने पर पानी अंदर रहता है।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय, द्वार कोशिकाओं के वृक्काकार आकार, रंध्र के खुले और बंद होने की स्थिति, और सभी महत्वपूर्ण भागों (H2O, रंध्र, द्वार कोशिका, स्थूल आन्तरिक कोशिका भित्ति) को सही ढंग से नामांकित करना सुनिश्चित करें।

 

Question 4. वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले एक बाह्य कारक को वर्णन कीजिए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन की दर को कई बाहरी कारक प्रभावित करते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण कारक **प्रकाश (Light)** है। प्रकाश वाष्पोत्सर्जन को सीधे और परोक्ष दोनों तरीकों से प्रभावित करता है। प्रकाश की उपस्थिति में, रंध्र आमतौर पर खुल जाते हैं, जिससे पानी का वाष्पीकरण बढ़ जाता है। इसके अलावा, प्रकाश परोक्ष रूप से तापमान को बढ़ाता है, जिससे वाष्पोत्सर्जन की दर और भी तेज हो जाती है। तेज धूप में पौधे ज्यादा पानी छोड़ते हैं।
In simple words: प्रकाश वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करता है। जब रोशनी होती है, तो पौधों के रंध्र खुल जाते हैं और पानी ज्यादा भाप बनकर बाहर निकलता है।

🎯 Exam Tip: बाह्य कारकों का वर्णन करते समय, प्रत्येक कारक (जैसे प्रकाश, वायु, तापमान, मृदा जल) का वाष्पोत्सर्जन पर सीधा प्रभाव बताएं।

 

Question 2. स्टोमेटा के खुलने एवं बन्द होने की क्रियाविधि समझाइए।
Answer: अधिकांश पौधों में रंध्र (स्टोमेटा) दो वृक्काकार (किडनी के आकार की) द्वार कोशिकाओं (Guard cells) से बने होते हैं। इन कोशिकाओं के बीच एक छेद होता है जिसे रंध्रीय छिद्र (Stomatal pore) कहते हैं। द्वार कोशिकाओं की भीतरी दीवारें (जो रंध्रीय छिद्र की ओर होती हैं) मोटी होती हैं, जबकि बाहरी दीवारें पतली होती हैं। जब द्वार कोशिकाएं पानी से भरकर स्फीति अवस्था (Turgid) में आती हैं, तो वे फूल जाती हैं। इस दौरान उनकी बाहरी पतली दीवारें बाहर की ओर खिंचती हैं, जिससे भीतरी मोटी दीवारें भी थोड़ी बाहर खींचती हैं और रंध्र खुल जाता है। जब द्वार कोशिकाएं पानी खोकर श्लथ या पिचकी (Flaccid) हो जाती हैं, तो वे अपनी पुरानी स्थिति में आ जाती हैं और रंध्र बंद हो जाता है। द्वार कोशिकाओं के चारों ओर मौजूद कोशिकाएं सहायक कोशिकाएं कहलाती हैं, जो उनकी गति में मदद करती हैं।
In simple words: रंध्रों के खुलने और बंद होने का मुख्य कारण द्वार कोशिकाओं में पानी का भरना या निकलना है। जब वे पानी से भर जाती हैं, तो रंध्र खुल जाते हैं, और जब वे पानी खो देती हैं, तो वे बंद हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: स्टोमेटा की क्रियाविधि समझाते समय द्वार कोशिकाओं की वृक्काकार आकृति, उनकी आंतरिक व बाहरी भित्तियों की मोटाई, और स्फीति व श्लथ अवस्था का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. रन्ध्र गति से सम्बन्धित मान्य सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
Answer: रंध्रों के खुलने और बंद होने की क्रिया को रंध्र गति (Stomatal movement) कहते हैं। इससे संबंधित सबसे मान्य सिद्धांत **सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानान्तरण सिद्धान्त (Active Potassium Ion Transport Theory)** है। इस सिद्धांत को जापानी वैज्ञानिक इमामुरा और फ्यूजीनो ने 1959 में प्रस्तावित किया था, और लेविट (1974) ने इसमें बदलाव करके इसे वर्तमान रूप दिया।
सिद्धांत के अनुसार:
**दिन में (प्रकाश की उपस्थिति में):**
द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल का निर्माण होता है।
\( \downarrow \)
मैलिक अम्ल मैलेट आयन और हाइड्रोजन आयन \( (\text{H}^+) \) में टूट जाता है।
\( \downarrow \)
समीपवर्ती कोशिकाओं से पोटैशियम आयन \( (\text{K}^+) \) द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं, जबकि \( \text{H}^+ \) आयन बाहर निकल जाते हैं।
\( \downarrow \)
पोटैशियम मैलेट का निर्माण होता है, जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरण सांद्रता बढ़ जाती है।
\( \downarrow \)
पानी अंतःपरासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करता है, जिससे वे स्फीत हो जाती हैं और रंध्र खुल जाते हैं।

**रात्रि में (अंधकार में):**
प्रकाश संश्लेषण नहीं होता, जिससे द्वार कोशिकाओं में \( \text{CO}_2 \) की सांद्रता बढ़ जाती है।
\( \downarrow \)
मैलिक अम्ल स्टार्च में परिवर्तित हो जाता है।
\( \downarrow \)
द्वार कोशिकाओं की परासरण सांद्रता कम हो जाती है।
\( \downarrow \)
पानी बहिःपरासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं से बाहर निकलता है, जिससे वे श्लथ अवस्था में आ जाती हैं और रंध्र बंद हो जाते हैं।
यह सिद्धांत पोटैशियम आयनों की गति के माध्यम से द्वार कोशिकाओं की स्फीति में बदलाव को समझाता है, जो रंध्र गति का मुख्य कारण है।
In simple words: रंध्रों का खुलना और बंद होना पोटैशियम आयनों के अंदर-बाहर जाने से नियंत्रित होता है। दिन में ये आयन अंदर आते हैं, पानी कोशिकाओं में भरता है और रंध्र खुलते हैं। रात में आयन बाहर जाते हैं, पानी निकलता है और रंध्र बंद हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानान्तरण सिद्धान्त के मुख्य बिंदुओं को याद रखें, खासकर दिन और रात के दौरान आयनों और पानी की गति को। इसमें मैलिक अम्ल और पोटैशियम मैलेट की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. 'वाष्पोत्सर्जन एक आवश्यक बुराई है।' इस कथन की व्याख्या कीजिए।
Answer: वैज्ञानिकों के विचार में वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया एक 'आवश्यक बुराई' (Necessary evil) है। इसका मतलब है कि वाष्पोत्सर्जन के कुछ फायदे हैं, लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं, जिन्हें पौधों को झेलना पड़ता है।
**वाष्पोत्सर्जन से पौधों को निम्नलिखित लाभ हैं:**
1. यह पौधों में रसारोहण (Ascent of sap) की क्रिया में मदद करता है, जिससे पानी ऊपर चढ़ता है।
2. इसके द्वारा जल और खनिज लवणों का अवशोषण और परिवहन होता है।
3. यह पत्ती के तापमान को कम रखता है, जिससे पौधा ठंडा रहता है।
4. यह पौधे से अतिरिक्त जल को बाहर निकालने में मदद करता है।
5. यह फलों में शर्करा (चीनी) की मात्रा बढ़ाने में भी मदद करता है।
**वाष्पोत्सर्जन से पौधों को निम्नलिखित हानियाँ हैं:**
1. पौधे द्वारा अवशोषित पानी का लगभग 98% भाग वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से जलवाष्प के रूप में उड़ जाता है।
2. कभी-कभी, वाष्पोत्सर्जन के कारण मिट्टी में पानी की कमी हो जाती है।
3. पानी की कमी होने पर एब्सिसिक अम्ल (ABA) का उत्पादन होता है, जिससे पत्तियाँ, फल और फूल समय से पहले गिर सकते हैं।
अतः, वाष्पोत्सर्जन एक ऐसी प्रक्रिया है जो पौधों के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें पानी का बहुत अधिक नुकसान भी होता है।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन पौधों के लिए जरूरी है क्योंकि यह पानी और पोषक तत्व ऊपर पहुंचाता है और उन्हें ठंडा रखता है। लेकिन इसमें बहुत सारा पानी बेकार हो जाता है, जिससे कभी-कभी पौधे सूख सकते हैं या उनके पत्ते गिर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: इस कथन की व्याख्या करते समय, वाष्पोत्सर्जन के लाभ और हानियों दोनों को विस्तार से बताएं, और फिर निष्कर्ष दें कि यह क्यों एक 'आवश्यक बुराई' है।

II. आन्तरिक कारक (Internal factors)

 

Question 6. बिन्दुस्राव पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
Answer: बिन्दुस्राव (Guttation) वह प्रक्रिया है जिसमें कुछ पौधों की पत्तियों के किनारों और सिरों से जल की बूंदें निकलती हैं। यह क्रिया मुख्य रूप से मूलदाब (Root pressure) के प्रभाव से होती है। जब जड़ें पानी को तेजी से सोखती हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती है, तो जाइलम वाहिकाओं में दबाव बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए दबाव के कारण, जल रंध्रों (Hydathodes) नामक विशेष संरचनाओं से पानी बाहर निकलता है।
जलरंध्र पत्तियों की शिराओं (Veins) के सिरों पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। प्रत्येक जलरंध्र के शीर्ष पर एक जलछिद्र (Water pore) होता है, जिसके चारों ओर की कोशिकाएं निष्क्रिय रहती हैं, इसलिए वे हमेशा खुले रहते हैं। जल रंध्र के अंदर कोशिकाओं का एक समूह होता है जिसे ऐपिथेम (Epithem) ऊतक कहते हैं। ऐपिथेम पत्ती की शिराओं की जाइलम वाहिकाओं से जुड़ा होता है। जब जड़ें अधिक पानी सोखती हैं और वाष्पोत्सर्जन कम होता है, तो जाइलम में मूलदाब उत्पन्न होता है। यह पानी को जाइलम से ऐपिथेम की कोशिकाओं में धकेलता है। जब ये कोशिकाएं पानी से भर जाती हैं, तो पानी जलछिद्रों से बूंदों के रूप में बाहर निकल आता है।
बिन्दुस्राव से निकलने वाला पानी शुद्ध नहीं होता, बल्कि इसमें कार्बनिक और अकार्बनिक लवण भी घुले होते हैं। इस घटना का अध्ययन सबसे पहले बर्गरस्टीन (1887) ने किया था। आलू, अरबी, कुछ घासों आदि में सुबह के समय पत्तियों पर बिन्दुस्राव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चित्र 7.2 : (B) जलरन्ध्र की संरचना एपिडर्मिस (Epidermis) रन्ध्र गुहा निष्क्रिय द्वार कोशिकाएं एपीथेम अन्तरकोशीय अवकाश वाहिनिकाएँ (Xylem) खम्भ ऊतक
In simple words: बिन्दुस्राव वह प्रक्रिया है जब पौधों की पत्तियों से पानी की बूंदें बाहर निकलती हैं, खासकर सुबह के समय। यह तब होता है जब जड़ें ज्यादा पानी खींचती हैं और वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

🎯 Exam Tip: बिन्दुस्राव की परिभाषा, इसके कारण (मूलदाब), इसमें शामिल संरचनाएं (जलरंध्र, ऐपिथेम), और इससे निकलने वाले द्रव की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझाएं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

 

Question 2. रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने के लिए कौन-से तत्व भाग लेते है?
Answer: रंध्रों के खुलने तथा बंद होने की क्रियाविधि में पोटैशियम आयन (\( \text{K}^+ \)), हाइड्रोजन आयन (\( \text{H}^+ \)), और हाइड्रॉक्सिल आयन (\( \text{OH}^- \)) जैसे तत्व मुख्य रूप से भाग लेते हैं। ये आयन द्वार कोशिकाओं की स्फीति में परिवर्तन लाकर रंध्रों को नियंत्रित करते हैं।
In simple words: पोटैशियम (\( \text{K}^+ \)), हाइड्रोजन (\( \text{H}^+ \)), और हाइड्रॉक्सिल (\( \text{OH}^- \)) आयन रंध्रों को खोलने और बंद करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: पोटैशियम आयन (K+) को रंध्र गति में सबसे महत्वपूर्ण आयन के रूप में याद रखें, क्योंकि यह द्वार कोशिकाओं के परासरण संतुलन को सीधे प्रभावित करता है।

 

Question 3. वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारकों के नाम लिखिए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले मुख्य वातावरणीय कारक प्रकाश, तापमान, वायुमण्डलीय आर्द्रता, मृदा जल की उपलब्धता और वायुमण्डलीय दाब हैं। ये सभी कारक मिलकर पौधों से पानी के निकलने की दर को बढ़ाते या घटाते हैं।
In simple words: रोशनी, गर्मी, हवा में नमी, मिट्टी में पानी और हवा का दबाव वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: इन सभी कारकों के नाम और उनके वाष्पोत्सर्जन पर पड़ने वाले प्रभावों को संक्षेप में समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. ऐसे दो प्रतिवाष्पोत्सर्जकों के नाम लिखिए जो पादपों में वाष्पोत्सर्जन की देर कम कर देते हैं?
Answer: दो प्रतिवाष्पोत्सर्गी पदार्थ जो पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करते हैं, वे हैं: फेनिल मरक्यूरिक एसीटेट और एब्सिसिक अम्ल। ये पदार्थ पौधों को पानी बचाने में मदद करते हैं।
In simple words: फेनिल मरक्यूरिक एसीटेट और एब्सिसिक अम्ल दो ऐसी चीजें हैं जो पौधों से पानी के नुकसान को कम करती हैं।

🎯 Exam Tip: प्रतिवाष्पोत्सर्गियों के कार्य सिद्धांत को समझें (जैसे रंध्रों को बंद करना, क्यूटिकल की मोटाई बढ़ाना) और उनके उदाहरण याद रखें।

 

Question 6. वाष्पोत्सर्जन की दर को मापने वाला यन्त्र कौन-सा है?
Answer: वाष्पोत्सर्जन की दर को मापने वाला यन्त्र वाष्पोत्सर्जनमापी (Potometer) है। इसका उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि एक निश्चित समय में पौधे द्वारा कितना पानी अवशोषित और वाष्पोत्सर्जित किया गया।
In simple words: वाष्पोत्सर्जन को मापने के लिए पॉटोमीटर नाम का यंत्र इस्तेमाल होता है।

🎯 Exam Tip: 'पोटोमीटर' (Potometer) नाम याद रखें और समझें कि यह उपकरण अप्रत्यक्ष रूप से वाष्पोत्सर्जन दर को मापता है (पानी के अवशोषण की दर को मापकर)।

 

Question 6. अवशोषित जल की मात्रा से अधिक वाष्पोत्सर्जन होने का पादप पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: जब पौधा अवशोषित जल की मात्रा से अधिक पानी का वाष्पोत्सर्जन करता है, तो पादप मुरझा जाता है। इस क्रिया को म्लानि (Wilting) कहते हैं। यह पौधे के सूखने का संकेत है।
In simple words: अगर पौधा जितना पानी लेता है, उससे ज्यादा छोड़ता है, तो वह मुरझा जाता है। इसे म्लानि कहते हैं।

🎯 Exam Tip: म्लानि (Wilting) शब्द की परिभाषा और इसके कारण (वाष्पोत्सर्जन दर > जल अवशोषण दर) को याद रखें।

 

Question 7. जलरन्ध्रों द्वारा होने वाली पादप शारीरिक क्रिया को नाम लिखिए।
Answer: जलरंध्रों द्वारा होने वाली पादप शारीरिक क्रिया बिन्दुस्रावण (Guttation) है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से पत्तियों के किनारों से पानी की बूंदों के रूप में निकलने से संबंधित है।
In simple words: जलरंध्रों से होने वाली पौधे की क्रिया को बिन्दुस्रावण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: जलरंध्र और बिन्दुस्रावण का सीधा संबंध याद रखें।

 

Question 9. पत्तियों में रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने की क्रिया का नियमन किन आयनों द्वारा होता है?
Answer: पत्तियों में रंध्रों के खुलने और बंद होने की क्रिया का नियमन मुख्य रूप से पोटैशियम आयन (\( \text{K}^+ \)) द्वारा होता है। पोटैशियम आयनों की गति द्वार कोशिकाओं के अंदर पानी के प्रवेश और निकास को नियंत्रित करती है।
In simple words: पोटैशियम आयन (\( \text{K}^+ \)) पत्ती के रंध्रों को खोलने और बंद करने में मुख्य भूमिका निभाता है।

🎯 Exam Tip: पोटैशियम आयन (\( \text{K}^+ \)) को रंध्र गति के लिए जिम्मेदार प्राथमिक आयन के रूप में पहचानें।

 

Question 10. पादप से जल हानि किन विधियों द्वारा होती है?
Answer: पादप से जल की हानि मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जन, बिन्दुस्राव और रसस्राव (Bleeding) जैसी प्रक्रियाओं द्वारा होती है। ये तीनों प्रक्रियाएं पौधों से पानी के निकलने के अलग-अलग तरीके हैं।
In simple words: पौधे से पानी का नुकसान वाष्पोत्सर्जन, बिन्दुस्राव और रसस्राव से होता है।

🎯 Exam Tip: जल हानि की तीनों विधियों (वाष्पोत्सर्जन, बिन्दुस्राव, रसस्राव) को उनके मुख्य अंतरों के साथ याद रखें।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं? समझाइए।
Answer: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration) वह प्रक्रिया है जिसमें पत्तियों की सतह पर मौजूद छोटे छिद्रों, जिन्हें रंध्र (Stomata) कहते हैं, के माध्यम से पानी वाष्प के रूप में बाहर निकलता है। पत्तियां वाष्पोत्सर्जन के प्रमुख अंग हैं। यह वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा का 50-97% भाग होता है, क्योंकि पत्तियों पर रंध्रों की संख्या बहुत अधिक होती है और वे सीधे वायुमंडल के संपर्क में होते हैं।
In simple words: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन वह है जब पत्तियों के छोटे छेदों (रंध्रों) से पानी भाप बनकर उड़ता है। यह पौधों में सबसे ज्यादा पानी बाहर निकालने का तरीका है।

🎯 Exam Tip: रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन को वाष्पोत्सर्जन का सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख प्रकार बताएं, क्योंकि यह कुल वाष्पोत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा होता है।

 

Question 2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन क्या है? समझाइए।
Answer: उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration) वह प्रक्रिया है जिसमें अधिकांश मरुभिद् (सूखे वातावरण में उगने वाले) पौधों की पत्तियों की बाहरी परत, जिसे क्यूटिकल (Cuticle) कहते हैं, से पानी वाष्प के रूप में बाहर निकलता है। क्यूटिकल आमतौर पर पानी के लिए अभेद्य (अंदर नहीं जाने देती) होती है, लेकिन कुछ स्थानों पर यह बहुत पतली या टूटी हुई होती है। इन पतले या टूटे हुए स्थानों से पानी की थोड़ी मात्रा वाष्प के रूप में निकलती है। इस विधि से कुल वाष्पोत्सर्जन का 3-10% हिस्सा होता है।
In simple words: उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन तब होता है जब पौधों की बाहरी मोटी परत (क्यूटिकल) से थोड़ा पानी भाप बनकर बाहर निकलता है, खासकर सूखे इलाकों के पौधों में।

🎯 Exam Tip: क्यूटिकल की पानी के प्रति अभेद्यता और उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन की कम मात्रा को ध्यान में रखें।

 

Question 3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन क्या है? समझाइए।
Answer: वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration) वह प्रक्रिया है जिसमें काष्ठीय (लकड़ी वाले) तनों और कुछ फलों की सतह पर मौजूद छोटे-छोटे छिद्रों, जिन्हें वातरंध्र (Lenticels) कहते हैं, से पानी वाष्प के रूप में बाहर निकलता है। कुछ वातावरणीय स्थितियों में, वातरंध्रों से पानी की वाष्प के रूप में हानि होती है। यह कुल वाष्पोत्सर्जन का बहुत छोटा हिस्सा (लगभग 0.1%) होता है।
In simple words: वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन वह है जब पौधों के तनों और फलों पर मौजूद छोटे छेदों (वातरंध्रों) से पानी भाप बनकर निकलता है। यह सबसे कम होने वाला वाष्पोत्सर्जन है।

🎯 Exam Tip: वातरंध्रों की स्थिति (काष्ठीय तने और फल) और वाष्पोत्सर्जन में उनके नगण्य योगदान (0.1%) को याद रखें।

 

Question 5. वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले आन्तरिक कारकों का वर्णन कीजिए।
Answer: वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कई आंतरिक कारक होते हैं:
1. **पत्ती की संरचना (Leaf structure):** पत्ती की बनावट वाष्पोत्सर्जन की दर को बहुत प्रभावित करती है। सूखे इलाकों में उगने वाले पौधों की पत्तियां अक्सर मोटी क्यूटिकल, मोम या बालों से ढकी होती हैं और उनके रंध्र गहरे (धंसे हुए) होते हैं। ये सभी विशेषताएं वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करती हैं। पत्ती के प्रति इकाई क्षेत्र में रंध्रों की संख्या भी एक महत्वपूर्ण कारक है।
2. **मूल प्ररोह अनुपात (Root shoot ratio):** मूल (जड़) और प्ररोह (तना और पत्तियां) के अनुपात में वृद्धि से पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ जाती है। यदि जड़ों की तुलना में प्ररोह बड़ा है, तो पानी का नुकसान अधिक होगा।
3. **पत्ती का अभिविन्यास (Leaf orientation):** पत्तियों का झुकाव भी वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करता है। यदि पत्तियां आपतित विकिरण (सूर्य की किरणों) के सीधे संपर्क में होती हैं (90 डिग्री के कोण पर), तो उन पर सूर्य की किरणों का प्रभाव सबसे अधिक होता है और वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक होती है। इसके विपरीत, यदि पत्तियां विकिरण के समानांतर (समतल) होती हैं, तो वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती है।
In simple words: पत्ती की बनावट, जड़ों और तने का आकार, और पत्तियों का सूर्य की ओर झुकाव जैसे पौधों के अंदरूनी कारक वाष्पोत्सर्जन को कम या ज्यादा कर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: आंतरिक कारकों का वर्णन करते समय, प्रत्येक कारक (पत्ती की संरचना, मूल-प्ररोह अनुपात, पत्ती का अभिविन्यास) का वाष्पोत्सर्जन पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके पीछे के तर्क को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 6. रसस्राव क्या है? समझाइए।
Answer: रसस्राव (Bleeding) वह प्रक्रिया है जब पौधे के किसी कटे हुए या क्षतिग्रस्त हिस्से से रस (Sap) बाहर आता है। पौधों की जाइलम वाहिकाओं में मूलदाब (Root pressure) के कारण सकारात्मक दबाव होता है। जब जाइलम वाहिकाएं कट जाती हैं या उन्हें नुकसान होता है, तो यह रस बाहर निकलने लगता है। उदाहरण के लिए, रबर के पेड़ से निकलने वाले इस तरह के रिसाव को लैटेक्स (Latex) कहते हैं, जिससे रबर बनता है।
In simple words: जब पौधे का कोई हिस्सा कट जाता है, तो उसके अंदर से पानी जैसा द्रव (रस) बाहर निकलने लगता है, इसे रसस्राव कहते हैं।

🎯 Exam Tip: रसस्राव की परिभाषा और इसके कारण (मूलदाब और जाइलम वाहिकाओं की क्षति) को याद रखें।

 

Question 2. रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने से सम्बन्धित सक्रिय K+ स्थानान्तरण क्रियाविधि सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
Answer: रंध्रों के खुलने और बंद होने की क्रिया को रंध्र गति (Stomatal movement) कहते हैं। इनकी क्रियाविधि को समझाने के लिए कुछ परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं।
1. **मांड-शर्करी परिकल्पना (Starch-Sugar Hypothesis):** यह परिकल्पना जे.डी. सायरे (J.D. Sayre, 1923) ने दी थी। इसके अनुसार, दिन में (प्रकाश में) रक्षक कोशिकाओं (Guard cells) में \( \text{CO}_2 \) की मात्रा कम होने से pH मान बढ़ जाता है। उच्च pH पर फॉस्फोराइलेज एंजाइम सक्रिय हो जाता है, जिससे स्टार्च ग्लूकोस-1 फॉस्फेट में बदल जाता है। यह ग्लूकोस-1 फॉस्फेट बाद में ग्लूकोस में परिवर्तित हो जाता है। इससे कोशिकाओं की विसरण दाब न्यूनता (DPD) बढ़ जाती है, वे स्फीति हो जाती हैं और रंध्र खुल जाते हैं। रात में (अंधेरे में) द्वार कोशिकाओं में \( \text{CO}_2 \) की वृद्धि से pH घट जाता है, और ग्लूकोस-1 फॉस्फेट फिर से स्टार्च में बदल जाता है। इससे द्वार कोशिकाएं श्लथ हो जाती हैं और रंध्र बंद हो जाते हैं।
2. **स्टीवार्ड की परिकल्पना (Steward's Hypothesis):** इस परिकल्पना के अनुसार, उच्च pH पर स्टार्च ग्लूकोस-1-फॉस्फेट में टूट जाता है, जो बाद में ग्लूकोस-6-फॉस्फेट और अंत में ग्लूकोस बनाता है। ग्लूकोस-6-फॉस्फेट और ग्लूकोस पानी में ग्लूकोस-1-फॉस्फेट से अधिक घुलनशील होते हैं। इससे द्वार कोशिकाओं के कोशिका रस की सांद्रता काफी बढ़ जाती है, जो रंध्रों के खुलने के लिए पर्याप्त होती है।
\( \text{स्टार्च + फॉस्फेट (अघुलनशील)} \xrightarrow{\text{फॉस्फोराइलेस, pH = 7.0}} \text{ग्लूकोस-1-फॉस्फेट (अकार्बनिक)} \)
\( \text{ग्लूकोस-1-फॉस्फेट} \xrightarrow{\text{फॉस्फोग्लूकोक्यूटेज}} \text{ग्लूकोस + फॉस्फेट} \)
\( \text{ग्लूकोस-6-फॉस्फेट} \xrightarrow{\text{फॉस्फेटेज}} \text{ग्लूकोस + फॉस्फेट (अकार्बनिक)} \)
रंध्रों का बंद होना कम pH पर निर्भर करता है और इसके लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
\( \text{ग्लूकोस + ATP} \xrightarrow{\text{हैक्सोकाइनेज}} \text{ग्लूकोस-1-फॉस्फेट} \)
\( \text{ग्लूकोस-1-फॉस्फेट} \xrightarrow{\text{फॉस्फोराइलेज, pH=5.0}} \text{स्टॉर्च + फॉस्फेट (अकार्बनिक)} \)
3. **सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानान्तरण सिद्धान्त (Active Potassium Ion Transport Theory):** यह सिद्धांत जापानी वैज्ञानिकों इमामुरा और फ्यूजीनो (1959) ने प्रस्तुत किया था और लेविट (1974) ने इसे संशोधित किया। यह वर्तमान में सबसे मान्य सिद्धांत है।
**दिन में (प्रकाश की उपस्थिति में):**
द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल बनता है।
\( \downarrow \)
मैलिक अम्ल मैलेट आयन और \( \text{H}^+ \) आयन में टूट जाता है।
\( \downarrow \)
समीपवर्ती कोशिकाओं से \( \text{K}^+ \) आयन द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं, और \( \text{H}^+ \) आयन बाहर निकलते हैं।
\( \downarrow \)
पोटैशियम मैलेट का निर्माण होता है, जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरण सांद्रता बढ़ जाती है।
\( \downarrow \)
अंतःपरासरण द्वारा जल द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करता है, जिससे वे स्फीत हो जाती हैं और रंध्र खुल जाते हैं।
**रात्रि में (अंधकार में):**
प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है, \( \text{CO}_2 \) की सांद्रता द्वार कोशिकाओं में बढ़ती है।
\( \downarrow \)
मैलिक अम्ल स्टार्च में परिवर्तित हो जाता है।
\( \downarrow \)
द्वार कोशिकाओं की परासरण सांद्रता कम हो जाती है।
\( \downarrow \)
बहिःपरासरण द्वारा जल द्वार कोशिकाओं से बाहर निकलता है, जिससे वे श्लथ अवस्था में आ जाती हैं और रंध्र बंद हो जाते हैं।
In simple words: रंध्रों के खुलने और बंद होने के लिए कई सिद्धांत हैं, जिनमें मांड-शर्करी परिकल्पना, स्टीवार्ड की परिकल्पना और सबसे महत्वपूर्ण सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानान्तरण सिद्धांत शामिल हैं। ये सिद्धांत द्वार कोशिकाओं में आयनों और पानी की गति को समझाते हैं।

🎯 Exam Tip: रंध्र गति के सभी प्रमुख सिद्धांतों को उनके प्रतिपादकों के नाम, मुख्य बिंदुओं और दिन/रात में होने वाली क्रियाओं के साथ याद रखें। पोटैशियम आयन सिद्धांत पर विशेष ध्यान दें।

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