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Detailed Chapter 37 उत्परिवर्तन RBSE Solutions for Class 12 Biology
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Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Biology Chapter 37 बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. जीनोम है-
(अ) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल जीनों की संख्या
(ब) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल गुणसूत्र की संख्या
(स) द्विगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल गुणसूत्र की संख्या
(द) युग्मनज के गुणसूत्रों पर पाये जाने वाले कुल जीन।
Answer: (अ) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल जीनों की संख्या
In simple words: जीनोम एक जीव में गुणसूत्रों के अगुणित सेट पर मौजूद सभी जीनों की कुल संख्या को कहते हैं। यह जीव की पूरी आनुवंशिक जानकारी होती है।
🎯 Exam Tip: जीनोम की परिभाषा याद रखें, जिसमें अगुणित सेट पर कुल जीनों की संख्या शामिल होती है।
Question 2. मनुष्य में पाये जाने वाले न्यूक्लीयोटाइड युग्मों की संख्या लगभग है।
(अ) तीन लाख
Answer: (अ) तीन लाख
In simple words: मानव डीएनए में न्यूक्लीयोटाइड के जोड़े करीब तीन लाख होते हैं, जो हमारी आनुवंशिक बनावट का हिस्सा हैं।
🎯 Exam Tip: मानव जीनोम के आकार से संबंधित संख्यात्मक मानों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर पूछे जाते हैं।
Question 3. DNA फिंगर प्रिंटिंग का आधार क्या है?
(अ) DNA द्वारा हूबहू प्रतिकृति निर्माण से
(ब) DNA की सहायता से अंगुलियों की छाप लेने से
(स) किन्हीं भी दो व्यक्तियों के DNA अनुक्रम चित्र समान नहीं होते हैं।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Answer: (स) किन्हीं भी दो व्यक्तियों के DNA अनुक्रम चित्र समान नहीं होते हैं।
In simple words: डीएनए फिंगर प्रिंटिंग इसलिए काम करती है क्योंकि हर इंसान के डीएनए का पैटर्न अलग होता है, सिवाय जुड़वां बच्चों के।
🎯 Exam Tip: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग का मुख्य सिद्धांत व्यक्तियों के डीएनए में मौजूद अद्वितीय अनुक्रमों पर आधारित है।
Question 4. 'डोली' भेड़ किस विधि से प्राप्त की गयी थी।
(अ) सामान्य संकरण से
(ब) सामान्य जनन विधि से
(स) क्लोनिंग से
(द) ऊतक संवर्धन से।
Answer: (स) क्लोनिंग से
In simple words: डोली भेड़ को क्लोनिंग की मदद से बनाया गया था, जिसमें एक कोशिका से नया जीव बनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: डोली भेड़ क्लोनिंग के सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है, और इसकी विधि को जानना महत्वपूर्ण है।
Question 5. उत्परिवर्तन कहते हैं-
(अ) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ में अस्थाई परिवर्तन को
(ब) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ के स्थाई एवं वंशागत परिवर्तन को
(स) कोशिका के जीवद्रव्य में किसी भी परिवर्तन को
(द) किसी भी प्रकार की विविधता को
Answer: (ब) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ के स्थाई एवं वंशागत परिवर्तन को
In simple words: उत्परिवर्तन का मतलब है कोशिका के डीएनए में ऐसा बदलाव जो हमेशा के लिए रहता है और अगली पीढ़ी में भी जा सकता है।
🎯 Exam Tip: उत्परिवर्तन की मुख्य विशेषता यह है कि यह आनुवंशिक पदार्थ में स्थायी और वंशागत परिवर्तन होता है।
Question 6. उत्परिवर्तन की क्रिया में जब एडीनिन का प्रतिस्थापन ग्वानिन द्वारा होता है, तब यह कहलाता है-
(अ) फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन
(ब) अनुलेखन
Answer: (अ) फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन
In simple words: जब डीएनए में एडीनिन की जगह ग्वानिन आ जाता है, तो पूरा कोड पढ़ने का तरीका बदल जाता है, जिसे फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन कहते हैं।
🎯 Exam Tip: एडीनिन को ग्वानिन द्वारा प्रतिस्थापित करने का परिणाम एक ट्रांसवर्शन (एक प्यूरीन को दूसरे प्यूरीन से बदलना) होता है, और यदि यह कोडिंग क्षेत्र में होता है, तो यह फ्रेम-शिफ्ट उत्परिवर्तन का कारण बन सकता है।
Question 7. आनुवंशिक कूट में पाये जाते हैं-
(अ) तीन क्षारक 64 कोडोन
(ब) तीन क्षारक 18 कोडोन
(स) दो क्षारक 32 कोडोन
(द) दो क्षारक 64 कोडोन
Answer: (अ) तीन क्षारक 64 कोडोन
In simple words: आनुवंशिक कोड में तीन-तीन क्षारकों के समूह होते हैं, और कुल 64 ऐसे समूह (कोडोन) होते हैं जो प्रोटीन बनाने के निर्देश देते हैं।
🎯 Exam Tip: आनुवंशिक कोड में प्रत्येक कोडोन तीन न्यूक्लियोटाइड (क्षारकों) से बना होता है, और कुल 64 संभावित कोडोन होते हैं।
Question 8. बहुगुणिता कृत्रिम रूप से पैदा की जा सकती है-
(अ) कोल्चीसिन द्वारा
(ब) X-किरणों द्वारा
(स) गामा किरणों द्वारा
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Answer: (अ) कोल्चीसिन द्वारा
In simple words: कोल्चीसिन नामक रसायन का उपयोग करके हम पौधों में कोशिकाओं के गुणसूत्रों की संख्या बढ़ा सकते हैं, जिससे कृत्रिम बहुगुणिता पैदा होती है।
🎯 Exam Tip: कोल्चीसिन एक महत्वपूर्ण रासायनिक एजेंट है जिसका उपयोग अक्सर पौधों में कृत्रिम बहुगुणिता को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 37 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट किन अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने शुरू करवाया?
Answer: मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) सन् 1988 में संयुक्त राज्य अमेरिका में शुरू हुई। इसका औपचारिक शुभारंभ 1990 में हुआ था। इस परियोजना को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ तथा डिपार्टमेन्ट ऑफ एनर्जी की भागीदारी से शुरू किया गया था।
In simple words: ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट को अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ और डिपार्टमेन्ट ऑफ एनर्जी ने मिलकर 1988 में शुरू किया था।
🎯 Exam Tip: ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट की शुरुआत की तारीख और इसमें शामिल प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के नाम याद रखें।
Question 2. VNTRS क्या होती है?
Answer: डीएनए में छोटे न्यूक्लियोटाइड के दोहराए जाने वाले क्रम पाए जाते हैं। इनकी संख्या हर व्यक्ति में अलग होती है, लेकिन ये माता-पिता से बच्चों में जाते हैं। इन्हें VNTRs (Variable Number Tandem Repeats) या अनुक्रम पुनरावर्तन कहते हैं। दो अलग-अलग व्यक्तियों में VNTRs की लंबाई समान हो सकती है।
In simple words: VNTRs डीएनए के छोटे हिस्से होते हैं जो बार-बार दोहराए जाते हैं। हर व्यक्ति में इनकी संख्या अलग होती है और ये अगली पीढ़ी में जाते हैं।
🎯 Exam Tip: VNTRs की परिभाषा, उनकी परिवर्तनशीलता और वंशागति को याद रखें, क्योंकि यह डीएनए फिंगरप्रिंटिंग में महत्वपूर्ण हैं।
Question 4. अवियोजन किसे कहते हैं?
Answer: जब कोशिका विभाजन के दौरान गुणसूत्रों के अलग होने के समय अवियोजन (Non-disjunction) हो जाता है, तो इसके कारण नई बनी कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या कम या ज्यादा हो जाती है। इस स्थिति को असुगुणिता या अवियोजन कहते हैं।
In simple words: अवियोजन का मतलब है कि कोशिका बंटवारे के समय गुणसूत्र ठीक से अलग नहीं हो पाते, जिससे नई कोशिकाओं में उनकी संख्या गलत हो जाती है।
🎯 Exam Tip: अवियोजन की परिभाषा और इसके परिणामस्वरूप गुणसूत्र संख्या में होने वाले परिवर्तन को स्पष्ट रूप से समझें।
Question 5. उत्परिवर्तन किसे कहते हैं?
Answer: सभी जीवों की कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ में अचानक होने वाले, स्थायी और वंशानुगत परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (Mutation) कहते हैं। प्रकृति में उत्परिवर्तन लगातार होते रहते हैं।
In simple words: उत्परिवर्तन वो बदलाव हैं जो जीव के डीएनए में अचानक होते हैं, हमेशा के लिए रहते हैं और अगली पीढ़ी में भी जाते हैं।
🎯 Exam Tip: उत्परिवर्तन की परिभाषा में 'अचानक', 'स्थायी' और 'वंशानुगत' जैसे मुख्य शब्दों को शामिल करना सुनिश्चित करें।
Question 6. प्रोब क्या होता है?
Answer: प्रोब डीएनए के ज्ञात अनुक्रम के रेडियोएक्टिव संश्लेषित खंड होते हैं। प्रोब में खास न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम होते हैं जो VNTR अनुक्रमों के पूरक होते हैं। जब प्रोब को पूरक अनुक्रम मिलते हैं, तो वे उनके साथ जुड़ जाते हैं।
In simple words: प्रोब डीएनए का एक छोटा टुकड़ा होता है जिसमें खास डीएनए सीक्वेंस होती है। ये डीएनए के दूसरे टुकड़ों को ढूंढने और उनसे जुड़ने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रोब की भूमिका को डीएनए अनुक्रमों की पहचान करने वाले रेडियोएक्टिव या प्रतिदीप्ति लेबल वाले खंड के रूप में याद रखें।
Question 7. होनोलुलु तकनीक की किस वैज्ञानिक ने एवं कहाँ खोज की थी?
Answer: इस तकनीक को हवाई विश्वविद्यालय में रूजो यानागिमाची के नेतृत्व में तेरूहिको वाकायामा ने 1998 में विकसित किया था।
In simple words: होनोलुलु तकनीक को हवाई विश्वविद्यालय में तेरूहिको वाकायामा ने रूजो यानागिमाची के साथ मिलकर 1998 में बनाया था।
🎯 Exam Tip: इस तकनीक के खोजकर्ता और स्थान को सही ढंग से याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे तथ्यों पर आधारित प्रश्न है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 37 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. जीन उत्परिवर्तन को परिभाषित कीजिए।
Answer: अर्धसूत्री विभाजन के दौरान डीएनए का प्रतिकृतिकरण होता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया बिल्कुल सही या बिना गलती के पूरी होती है। लेकिन कभी-कभी डीएनए का निर्माण गलत हो जाता है। इसमें एक या एक से अधिक नाइट्रोजन क्षारक युग्मों में बदलाव आ जाता है। क्षारक युग्मों का क्रम ही जीन की पहचान होती है। इसलिए, जब परिवर्तन स्वयं जीन में होता है, तो उसे जीन उत्परिवर्तन कहते हैं।
In simple words: जीन उत्परिवर्तन डीएनए के क्षारक युग्मों में होने वाला एक छोटा बदलाव है जो जीन की पहचान को बदल देता है।
🎯 Exam Tip: जीन उत्परिवर्तन की परिभाषा में डीएनए के क्षारक युग्मों में होने वाले परिवर्तन और जीन की विशिष्टता पर इसके प्रभाव को स्पष्ट करें।
Question. जीन उत्परिवर्तन के अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
Answer: जीन उत्परिवर्तन के मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं:
- जीन उत्परिवर्तन पूरी तरह से अनिश्चित होते हैं।
- जीन उत्परिवर्तन किसी भी पहले से अनुमान के बिना हो सकते हैं।
- कोई भी जीन कितनी भी बार उत्परिवर्तित हो सकता है। उत्परिवर्तित जीन कुछ समय के लिए सामान्य स्थिति में भी रह सकता है।
- जीन उत्परिवर्तन एक ही दिशा में होता है। यह एक स्थिति में पूरी तरह से अपनी मूल या सामान्य स्थिति में बदल सकता है।
- लगभग सभी जीनों के वर्तमान रूप, जो पाए जाते हैं, मूल जीन के उत्परिवर्तित रूप हैं।
- कुछ उत्परिवर्तित रूप प्रभावी होते हैं जो अपने विशेष गुण की अभिव्यक्ति को निश्चित रूप से बदल देते हैं, जबकि कुछ उत्परिवर्तित रूप अप्रभावी होते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति उनके प्रभावी रूप द्वारा दब जाती है।
- अधिकतर उत्परिवर्तन जीनों के लिए हानिकारक होते हैं क्योंकि कोशिका की संरचना बहुत जटिल होती है। इसलिए, जीन में किसी भी तरह का परिवर्तन इसके लिए हानिकारक और विनाशकारी होता है।
- प्रभावी जीन उत्परिवर्तन के कारण कोशिका जल्दी मर जाती है। इसलिए, वे नष्ट हो जाते हैं, जबकि अप्रभावी जीन उत्परिवर्तन कोशिका में अधिक समय तक बने रहते हैं, क्योंकि इससे कोशिका की मृत्यु नहीं होती है।
- कुछ सूक्ष्म प्रभावी उत्परिवर्तन जिनका प्रभाव कोशिका की क्रिया के साथ मिल जाता है, वे काफी समय तक बने रहते हैं क्योंकि उत्परिवर्तन होने के बाद भी कोशिका की मृत्यु नहीं होती है।
In simple words: जीन उत्परिवर्तन अचानक होते हैं, उनकी कोई दिशा नहीं होती, और वे एक ही जीन में कई बार हो सकते हैं। ये अच्छे या बुरे हो सकते हैं, और कुछ समय तक छिपे भी रह सकते हैं।
🎯 Exam Tip: जीन उत्परिवर्तन के प्रत्येक अभिलक्षण को बिंदुवार सूचीबद्ध करें और उनकी संक्षिप्त व्याख्या दें, जिससे परीक्षक को सभी महत्वपूर्ण पहलुओं का पता चले।
Question 2. गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों का विस्तृत विवरण कीजिए।
Answer: जब गुणसूत्र की जीन व्यवस्था में कोई अंतर आ जाए या उनमें कोई अतिरिक्त जीन जुड़ जाए या कुछ जीन लुप्त हो जाएं, तो उसे गुणसूत्र उत्परिवर्तन या गुणसूत्रीय विपथन कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं: गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तन और गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन। संरचनात्मक परिवर्तन निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:
- विलोपन (Deletion): किसी खंड की कमी या हानि को विलोपन कहते हैं। यदि गुणसूत्र के बीच वाले भाग में कमी होती है, तो इसे अंतस्थ हीनता (Interstitial deletion) कहते हैं, जबकि सिरे वाले भाग में कमी को अंतस्थ विलोपन (Terminal deletion) कहते हैं।
- स्थानांतरण (Translocation): जब गुणसूत्र का एक टूटा हुआ हिस्सा उसी गुणसूत्र के दूसरे सिरे से जुड़ जाए या किसी अन्य असमजात गुणसूत्र से जुड़ जाए, तो उसे स्थानांतरण कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है:
- एकपाश्विक स्थानांतरण (Unilateral Translocation): इसमें गुणसूत्र का एक खंड दूसरे गुणसूत्र में जाता है, लेकिन आदान-प्रदान नहीं होता।
- द्विपाश्विक स्थानांतरण (Bilateral Translocation): इसमें गुणसूत्र खंडों का आदान-प्रदान दोनों तरफ होता है। यदि यह दो असमजात गुणसूत्रों के बीच पारस्परिक हो, तो इसे पारस्परिक स्थानांतरण (Reciprocal Translocation) कहते हैं। इस प्रक्रिया में स्थान प्रभाव (Position effect) के कारण संतति के लक्षणों में भी परिवर्तन आ सकता है।
- प्रतिलोम व्युत्क्रमण (Inversion): प्रतिलोमन में गुणसूत्र का एक भाग उल्टे क्रम में फिर से व्यवस्थित हो जाता है। इसमें गुणसूत्र पहले दो बिंदुओं पर टूटता है, और टूटा हुआ खंड 180 डिग्री पर घूमकर फिर से जुड़ जाता है। इससे जीन का क्रम व्युत्क्रमित हो जाता है। यह भी स्थान प्रभाव कहलाता है और दो प्रकार का होता है:
- पराकेन्द्री (Paracentric): इसमें सेंट्रोमियर प्रतिलोमित खंड के बाहर रहता है।
- परिकेन्द्री (Pericentric): इसमें प्रतिलोमित खंड में सेंट्रोमियर उपस्थित रहता है।
- द्विगुणन (Duplication): कभी-कभी किसी गुणसूत्र के किसी क्षेत्र की दो बार पुनरावृत्ति हो जाती है, तो इसे जीनों का द्विगुणन या डुप्लीकेशन माना जाता है। ये अतिरिक्त गुणसूत्र टुकड़े द्विगुणित गुणसूत्र के किसी मध्य हिस्से में, सिरों पर या किसी अन्य क्रोमोसोम से जुड़ सकते हैं।
In simple words: गुणसूत्रों में संरचनात्मक बदलाव तब होते हैं जब उनके जीन की व्यवस्था बदल जाती है, जैसे कुछ जीनों का गायब होना, अतिरिक्त जीनों का जुड़ना, या उनके क्रम का बदलना। इसके मुख्य प्रकार हैं विलोपन, स्थानांतरण, प्रतिलोमन और द्विगुणन।
🎯 Exam Tip: गुणसूत्रीय संरचनात्मक परिवर्तनों के विभिन्न प्रकारों-विलोपन, स्थानांतरण, प्रतिलोमन और द्विगुणन-को उनकी परिभाषाओं और प्रभावों के साथ स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 3. मानव जीनोम परियोजना के बारे में विस्तृत लेख लिखिए।
Answer: मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) एक वैज्ञानिक परियोजना है जिसका उद्देश्य किसी जीव के संपूर्ण जीनोम अनुक्रम का पता लगाना है। जीन हमारे जीवन की कुंजी हैं। हम कैसे देखते हैं, कैसे काम करते हैं, यह सब हमारे शरीर में छिपे हुए सूक्ष्म जीन तय करते हैं।
मानव जीनोम परियोजना के लक्ष्य:
- लगभग 30,000 से 35,000 मानव जीन्स की पहचान करना।
- मानव डीएनए बनाने वाले लगभग 3 बिलियन रासायनिक क्षार युग्मों के अनुक्रमों को निर्धारित करना।
- जीनोम संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा करना और विश्लेषण के लिए सबसे तेज, अधिक प्रभावी क्रम तकनीक विकसित करना।
- इस योजना के कारण उठने वाली सामाजिक, नैतिक और कानूनी समस्याओं पर विचार करना।
मानव जीनोम परियोजना की उपलब्धियाँ या विशेषताएँ:
- मानव जीनोम में 3164.7 करोड़ क्षार मिलते हैं।
- प्रत्येक जीन में औसतन 3000 क्षार होते हैं, लेकिन उनके आकार में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं।
- मनुष्य की ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिस्ट्रोफिन (Dystrophin) में 2.4 करोड़ क्षार पाए जाते हैं।
- जीन की संख्या लगभग 30,000 से 31,000 है। लगभग 99.9 प्रतिशत व्यक्तियों के न्यूक्लियोटाइड समान होते हैं।
- ज्ञात जीन्स में से लगभग 50% के कार्यों की जानकारी मिल गई है।
- ज्ञात जीन्स में से लगभग 20% प्रोटीन का कोडन करते हैं।
- पुनरावृत्ति अनुक्रम (नॉनकोडिंग डीएनए) जीनोम का अधिकांश भाग बनाते हैं। इनकी सौ से हजारों बार तक पुनरावृत्ति होती है।
- मानव में अनुक्रमित किया जाने वाला पहला गुणसूत्र 22वां जोड़ा है। यह मानव गुणसूत्रों का सबसे छोटा जोड़ा है। 22वें जोड़े गुणसूत्र पर 272 वास्तविक जीन्स और 143 कूट जीन्स उपस्थित हैं।
- गुणसूत्र X में सबसे ज्यादा जीन (2968) और Y गुणसूत्र में सबसे कम जीन (231) पाए जाते हैं।
- वैज्ञानिकों ने मानव में लगभग 1:4 करोड़ स्थानों पर एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता का पता लगाया है।
- रोग आधारित अनुक्रमों के संबंध में जानकारी प्राप्त हुई है।
मानव जीनोम परियोजना का महत्व:
- फोरेंसिक विज्ञान से जुड़ी तकनीकों में सुधार होगा।
- पौधों के जीनोम अध्ययन से बेहतर रोग नियंत्रण और बेहतर उपज प्राप्त होगी।
- बायोइन्फॉर्मेटिक्स के उपयोग से रोगों की पहचान, रोकथाम और जीन-आधारित तकनीक का विकास होगा।
In simple words: मानव जीनोम परियोजना का लक्ष्य सभी मानव जीनों को जानना, उनके क्रम का पता लगाना और उनसे जुड़ी समस्याओं को समझना था। इससे हमें मानव शरीर और रोगों को समझने में बहुत मदद मिली है।
🎯 Exam Tip: मानव जीनोम परियोजना के लक्ष्यों, उपलब्धियों और महत्व को विस्तार से समझाएं, महत्वपूर्ण संख्यात्मक तथ्यों और अनुप्रयोगों को शामिल करें।
Question 4. D.N.A. फिंगर प्रिंटिंग तकनीक के बारे में विस्तार से समझाइये एवं इसके अनुप्रयोगों को समझाइये।
Answer: डीएनए फिंगर प्रिंटिंग (D.N.A. Finger Printing) एक ऐसी तकनीक है जिससे हर व्यक्ति की पहचान उसके अद्वितीय डीएनए पैटर्न से की जाती है। हर मानव के अंगुलियों के निशान अलग होते हैं, और यही पैटर्न डीएनए में भी होता है। ब्रिटिश आनुवंशिक वैज्ञानिक डॉ. एलेक जेफरीज ने 1984 में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक विकसित की थी। यह तकनीक वंशागत रोगों के लिए पहचान चिह्न प्रदान करती है और उनके शुरुआती उपचार में सहायक होती है।
डीएनए फिंगर प्रिंटिंग की तकनीक निम्नलिखित चरणों में की जाती है:
- सबसे पहले, किसी भी ऊतक जैसे वीर्य, त्वचा कोशिकाएं, रक्त कोशिकाएं या बाल के फॉलिकल कोशिकाओं से डीएनए को उच्च गति के रेफ्रिजेरेटेड अपकेन्द्रण यंत्र (High Speed Refrigerated Centrifuge) द्वारा निकाला जाता है।
- यदि डीएनए की मात्रा बहुत कम है, तो उसे पॉलीमरेज चेन अभिक्रिया (Polymerase Chain Reaction) द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
- इसके बाद, डीएनए को रेस्ट्रिक्शन खंड लंबाई बहुरूपता (Restriction Fragment Length Polymorphism- RFLP) विश्लेषण के लिए विशिष्ट स्थल पहचानने वाले एंजाइम रेस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लीएस द्वारा खंडों में काटा जाता है।
- इन कटे हुए डीएनए के खंडों को एगरोज जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस तकनीक द्वारा आणविक आकार के आधार पर अलग-अलग किया जाता है। इन अलग-अलग हुए डीएनए के खंडों को प्रतिदीप्तिशील रंजक (जैसे इथिडियम ब्रोमाइड) द्वारा अभिरंजित करके पराबैंगनी प्रकाश (Ultra Violet Light) द्वारा देखा जाता है।
- क्षारक रसायनों के उपयोग से डीएनए को द्विरज्जुकीय (Double Stranded) से एकल रज्जुकीय डीएनए (Single Stranded DNA) में परिवर्तित किया जाता है। इस विधि को डीएनए का विकृतिकरण (Denaturation) कहते हैं।
- इस एकल रज्जुकीय डीएनए को एगरोज जेल से नाइट्रोसेलूलोज झिल्ली पर स्थानांतरित किया जाता है। इस प्रक्रिया को 'सदर्न ब्लॉटिंग' (Southern Blotting) कहते हैं।
- इस नाइट्रोसेलूलोज झिल्ली को प्रोब (Probe) के साथ रखा जाता है। प्रोब डीएनए के ज्ञात अनुक्रम का रेडियोएक्टिव संश्लिष्ट खंड होता है। प्रोब में विशिष्ट न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम होते हैं जो VNTR अनुक्रमों के पूरक होते हैं। ये प्रोब पूरक अनुक्रम पाए जाने पर उनके साथ संकरण करते हैं।
- अब इस प्रोब युक्त नाइट्रोसेलूलोज झिल्ली को X-विकिरण से अनावृत (Expose) किया जाता है। वे स्थान जहां प्रोब नाइट्रोसेलूलोज झिल्ली पर स्थित डीएनए से पूरक क्षारक बंध बनाते हैं या संकरण करते हैं, वहां X-विकिरण फिल्म पर एक पैटर्न बनता है।
डीएनए फिंगर प्रिंटिंग/प्रोफाइलिंग के उपयोग:
- फोरेंसिक विज्ञान में अपराधों की जांच में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, जैसे रक्त, बाल, लार या वीर्य के नमूने से डीएनए का विश्लेषण।
- पितृत्व विवादों (Paternity disputes) को सुलझाने में सहायक है।
- आनुवंशिक विविधता (Genetic diversities) का निर्धारण करने में उपयोग किया जाता है।
- जनसंख्या अध्ययन, जैव विकास और मानव इतिहास की खोज में भी इसका प्रयोग होता है।
- आयुर्विज्ञान और स्वास्थ्य-जांच में, गर्भावस्था से पहले या उसके दौरान आनुवंशिक रोगों की जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है।
- प्रवासन के इच्छुक व्यक्ति का डीएनए उसके निकट संबंधी या रक्त संबंधी के डीएनए से मिलाया जाता है ताकि उसकी पहचान की जा सके।
- जैविक विकास को समझने के लिए विभिन्न समूहों के बीच संबंधों का पता लगाने में सहायक है।
In simple words: डीएनए फिंगर प्रिंटिंग एक खास तरीका है जिससे हर व्यक्ति के अनोखे डीएनए पैटर्न को पहचानते हैं। इसका उपयोग अपराध सुलझाने, बच्चों के असली माता-पिता का पता लगाने और बीमारियों को समझने में होता है। इसमें डीएनए को छोटे टुकड़ों में काटकर, अलग करके और फिर खास प्रोब से पहचान कर एक पैटर्न बनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की चरण-दर-चरण प्रक्रिया और इसके विभिन्न अनुप्रयोगों को विस्तृत रूप से समझाएं। सभी प्रमुख चरणों और उपयोग क्षेत्रों को शामिल करें।
Question 5. क्लोनिंग से क्या तात्पर्य है? दुनिया के प्रथम जन्तु क्लोन का निर्माण कैसे हुआ? इसका विवरण दीजिए।
Answer: क्लोन एक ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ 'टहनी' (Twins) है। जिस प्रकार एक पेड़ की सभी शाखाएं बनावट और आनुवंशिक रूप से समान होती हैं, वैसे ही क्लोन भी एक-दूसरे के समान होते हैं।
क्लोनिंग एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा एक कोशिका से कई कोशिकाएं या एक जीन से कई जीन बनाए जा सकते हैं। पौधों में ऊतक संवर्धन विधि में भी इसका उपयोग किया जाता है। जन्तुओं में क्लोनिंग के लिए नाभिकीय स्थानांतरण तकनीक का प्रयोग किया जाता है।
दुनिया के प्रथम जन्तु क्लोन (भेड़ डोली) का निर्माण:
- वैज्ञानिकों ने स्तन कोशिका के केंद्रक को केंद्रक रहित अंडाणु कोशिका के साथ विद्युतीय उद्दीपन द्वारा जोड़ा।
- इस ट्रांसप्लांट कोशिका को संवर्धन माध्यम में लगभग एक सप्ताह तक बढ़ने दिया गया, जहां यह ब्लास्टोसिस्ट अवस्था में परिवर्तित हो गई।
- इस ब्लास्टुला को तीसरी वयस्क भेड़ के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया गया, जिसे 'धात्रेय माता' (Foster mother) कहा गया।
- लगभग 5 महीने की गर्भावस्था के बाद 5 जुलाई 1996 को डोली का जन्म हुआ, जो संसार की पहली क्लोन स्तनधारी थी।
पश्मीना क्लोन बकरी 'नूरी':
- नूरी नामक पश्मीना क्लोन बकरी का जन्म 9 मार्च 2012 को कश्मीर में हुआ। यह विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित एक शोध परियोजना का हिस्सा थी। यह अरबी भाषा से लिया गया नाम है, जिसका अर्थ 'प्रकाश' होता है। पश्मीना भेड़ ठंडे पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली एक प्रजाति है, जिसकी ऊन बहुत कीमती होती है।
In simple words: क्लोनिंग का मतलब है किसी जीव या कोशिका की हूबहू नकल बनाना। दुनिया की पहली क्लोन भेड़ 'डोली' को एक कोशिका से बनाया गया था, जिसमें एक भेड़ की कोशिका के केंद्रक को दूसरी भेड़ के केंद्रक रहित अंडे में डालकर भ्रूण विकसित किया गया और फिर उसे एक तीसरी भेड़ के गर्भ में पाला गया।
🎯 Exam Tip: क्लोनिंग की परिभाषा, डोली भेड़ के क्लोनिंग की प्रक्रिया के मुख्य चरण और उसमें शामिल वैज्ञानिकों की भूमिका को याद रखें।
Question 6. गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तनों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: एक प्रजाति के सभी सदस्यों में गुणसूत्रों की संख्या हमेशा निश्चित होती है। लेकिन कभी-कभी उत्परिवर्तन के कारण जीन में बदलाव नहीं होता, बल्कि पूरे गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी, तिगुनी या कई गुना बढ़ जाती है। इसे गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन या पॉलीप्लॉइडी कहते हैं। कोशिका विभाजन में उपसमान्यता या संकरण के कारण इन गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन आ जाता है। ये परिवर्तन दो प्रकार के हो सकते हैं:
(i) सुगुणिता (Euploidy): किसी जीव या कोशिका में उपस्थित आधारभूत गुणसूत्रों के समूह को एकगुणित (Monoploidy) कहते हैं। यदि किसी जीव में आधारभूत गुणसूत्रों के दो से अधिक समूह पाए जाते हैं तो इसे सुगुणिता कहते हैं। यह भी दो प्रकार की होती है:
- (a) स्व-बहुगुणिता (Autopolyploidy): वे बहुगुणित जिनमें गुणसूत्रों के समान प्राथमिक समूह पाए जाते हैं, स्व-बहुगुणित कहलाते हैं। जैसे- त्रिगुणित (Triploid), चतुर्गुणित (Tetraploid), पंचगुणित (Pentaploid) आदि। इसे कोल्चीसिन रसायन से प्रेरित किया जा सकता है। कोल्चीसिन रसायन कोशिका विभाजन में स्पिंडल को कमजोर करके उसे तोड़ देता है, जिससे गुणसूत्र ध्रुवों पर नहीं जा पाते और उनकी संख्या दोगुनी हो जाती है।
- (b) परबहुगुणिता (Allopolyploidy): इसमें दो अलग-अलग जातियों के दो से अधिक गुणसूत्रों के समूह किसी जीव में उपस्थित होते हैं, जो विभिन्न जातियों के संकरण से होता है। उदाहरण के लिए, रैफेनोबेसिका (2n = 36) को रूसी वैज्ञानिक जी.डी. कार्पेचेंको ने 1927 में रैफेनस सैटाइवस (मूली, 2n = 18) और ब्रेसिका ओलेरेशिया (गोभी, 2n = 18) के बीच संकरण द्वारा प्राप्त किया था। यह पूरी तरह से बंध्य था। गेहूं और राई से निर्मित ट्रिटिकेल मानव द्वारा निर्मित सबसे पहली परगुणित फसल थी।
(ii) असुगुणिता (Aneuploidy): यदि कोशिका विभाजन में गुणसूत्रीय पृथक्करण के समय अवियोजन (Nondisjunction) हो जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप नई बनी कोशिकाओं में एक या एक से अधिक गुणसूत्रों की संख्या कम या ज्यादा हो जाती है। यह भी दो प्रकार की होती है:
- (अ) अधोगुणिता (Hypoploidy): यदि एक या एक से अधिक गुणसूत्र कम हो जाते हैं, तो इसे अधोगुणिता कहते हैं। इसमें:
- एक गुणसूत्र की कमी होने पर उसे न्यूनसूत्रता (Monosomy 2n-1) कहते हैं।
- समजात गुणसूत्रों में से एक युग्म या दो गुणसूत्रों की कमी होने पर उसे द्विन्यूनसूत्री (Nullisomy 2n-2) कहते हैं।
- (ब) अधिगुणिता (Hyperploidy): यदि एक या एक से अधिक गुणसूत्र बढ़ जाते हैं, तो इसे अधिगुणिता कहते हैं। इसमें:
- एक गुणसूत्र की अधिकता होने पर उसे एकाधिसूत्री (Trisomy; 2n+1) कहते हैं। मानव में डाउन सिंड्रोम (Down's Syndrome) या मंगोलिज्म इसका एक उदाहरण है।
- यदि एक समजात गुणसूत्रों में से एक युग्म की अधिकता हो जाती है, तो उसे द्विअधिसूत्री (Tetrasomy; 2n+2) कहते हैं।
In simple words: गुणसूत्रों की संख्या में बदलाव दो तरह के होते हैं: सुगुणिता, जिसमें गुणसूत्रों के पूरे सेट की संख्या बदल जाती है (जैसे दुगुनी या तिगुनी हो जाना), और असुगुणिता, जिसमें एक या कुछ गुणसूत्रों की संख्या कम या ज्यादा हो जाती है, जैसे डाउन सिंड्रोम में।
🎯 Exam Tip: गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तनों के मुख्य प्रकारों (सुगुणिता और असुगुणिता) को उनकी उप-प्रकारों और उदाहरणों के साथ विस्तार से समझाएं, जैसे कि डाउन सिंड्रोम।
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