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Detailed Chapter 24 मानव का रक्त परिसंचरण तंत्र RBSE Solutions for Class 12 Biology
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Class 12 Biology Chapter 24 मानव का रक्त परिसंचरण तंत्र RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Biology Chapter 24 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
RBSE Class 12 Biology Chapter 24 बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. मानव के हृदय की उत्पत्ति होती है-
(अ) एन्डोडर्मल
(ब) एक्टोडर्मल
(स) मीसोडर्मल
(द) एन्डोमीसोडर्मल
Answer: (स) मीसोडर्मल
In simple words: इंसान का दिल मीसोडर्म नाम की एक परत से बनता है।
🎯 Exam Tip: हृदय के विकास की भ्रूण संबंधी उत्पत्ति को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इसके कार्यों को समझने में मदद करता है।
Question 2. रक्त-
(अ) एक ऊतक है
Question 3. अधिक ऊँचाई पर मनुष्य के रक्ताणु में होगी-
(अ) संख्या में वृद्धि
(ब) आकार में वृद्धि
(स) आकार में कमी
(द) संख्या में कमी
Answer: (अ) संख्या में वृद्धि
In simple words: ऊँचाई पर जाने से शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं बढ़ जाती हैं ताकि ज्यादा ऑक्सीजन मिल सके।
🎯 Exam Tip: ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने के कारण शरीर अधिक लाल रक्त कोशिकाएं बनाता है; यह अनुकूलन का एक उदाहरण है।
Question 4. हृदय में संकुचन प्रारम्भ होता है-
(अ) बायें निलय से
(ब) दायें अलिन्द से
(स) बायें अलिन्द से
(द) दायें निलय से
Answer: (ब) दायें अलिन्द से
In simple words: दिल का सिकुड़ना दायें अलिन्द से शुरू होता है, जहाँ से धड़कन का संकेत आता है।
🎯 Exam Tip: SA नोड को हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर कहा जाता है, क्योंकि यह संकुचन की शुरुआत करता है।
Question 5. रक्त का थक्का बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं-
(अ) न्यूट्रोफिल्स
(ब) थ्रोम्बोसाइट्स
(स) एरिथ्रोसाइट्स
(द) मोनोसाइट्स
Answer: (ब) थ्रोम्बोसाइट्स
In simple words: खून का थक्का जमाने में थ्रोम्बोसाइट्स (प्लेटलेट्स) मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: रक्त स्कंदन की प्रक्रिया में थ्रोम्बोसाइट्स की भूमिका और चोट लगने पर उनका सक्रियण याद रखें।
Question 6. निलय संकुचन किसके नियंत्रण में होता है ?
(अ) AVN
(ब) पुर्किंजे तन्तु
Question 7. रुधिर स्कंदन के लिए आवश्यक आयन है।
(अ) \( \text{K}^+ \)
(ब) \( \text{Na}^+ \)
(स) \( \text{Fe}^{2+} \)
(द) \( \text{Ca}^{2+} \)
Answer: (द) Ca2+
In simple words: खून का थक्का जमने के लिए कैल्शियम (\( \text{Ca}^{2+} \)) आयन की जरूरत होती है।
🎯 Exam Tip: कैल्शियम आयन रक्त स्कंदन प्रक्रिया में कई कारकों को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Question 8. लसीका कार्य करता है-
(अ) मस्तिष्क को \( \text{O}_2 \) देना
(ब) \( \text{CO}_2 \) का परिवहन
(स) लसीका ग्रन्थि को श्वेताणु वापस करना
(द) रुधिर को अंतराली तरल वापस देना
Answer: (द) रुधिर को अंतराली तरल वापस देना
In simple words: लसीका खून से निकला तरल वापस खून में पहुँचाने का काम करती है।
🎯 Exam Tip: लसीका तंत्र शरीर के तरल संतुलन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Question 9. स्वस्थ मनुष्य का रक्तचाप सामान्यतः होता है-
(अ) 140/90
(ब) 120/80
(स) 110/70
(द) 130/60
Answer: (ब) 120/80
In simple words: एक सेहतमंद इंसान का ब्लड प्रेशर आमतौर पर 120/80 होता है।
🎯 Exam Tip: 120 mmHg सिस्टोलिक दबाव को दर्शाता है, जब हृदय संकुचित होता है, और 80 mmHg डायस्टोलिक दबाव को दर्शाता है, जब हृदय आराम की स्थिति में होता है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 24 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. लाल रुधिर कणिकाओं का निर्माण कहाँ होता है ?
Answer: लाल रुधिर कणिकाएँ, जिन्हें लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) भी कहते हैं, मुख्य रूप से अस्थिमज्जा (bone marrow) में बनती हैं। अस्थिमज्जा हड्डियों के अंदर पाया जाने वाला एक नरम ऊतक है।
In simple words: लाल रक्त कोशिकाएँ हड्डियों के अंदर अस्थिमज्जा में बनती हैं।
🎯 Exam Tip: अस्थिमज्जा रक्त कोशिकाओं के निर्माण का प्राथमिक स्थल है, और इसे हेमटोपोइेटिक ऊतक के रूप में जाना जाता है।
Question 3. किस रुधिर समूह के व्यक्ति को सार्वत्रिक ग्राही कहते हैं ?
Answer: AB रक्त समूह वाले व्यक्तियों को सार्वत्रिक ग्राही कहा जाता है। इसका मतलब है कि वे किसी भी रक्त समूह (A, B, AB, या O) से रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
In simple words: AB ब्लड ग्रुप वाले लोग किसी भी ब्लड ग्रुप से खून ले सकते हैं, इसलिए उन्हें 'सार्वत्रिक ग्राही' कहते हैं।
🎯 Exam Tip: AB रक्त समूह में कोई एंटीबॉडी नहीं होती है, जो इसे अन्य रक्त समूहों से रक्त प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।
Question 4. गति निर्धारक किसे कहते हैं ?
Answer: साइनो-एट्रियल नोड (SAN) को हृदय का प्राकृतिक गति निर्धारक (पेसमेकर) कहा जाता है। यह हृदय में विद्युत आवेग उत्पन्न करता है जिससे हृदय की धड़कन नियंत्रित होती है। यह प्रति मिनट 72-80 बार आवेग उत्पन्न करता है।
In simple words: SAN, जो हृदय में होता है, धड़कन को शुरू करता है, इसलिए इसे गति निर्धारक कहते हैं।
🎯 Exam Tip: हृदय में विद्युत आवेगों का यह नियमित उत्पादन सुनिश्चित करता है कि हृदय एक स्थिर लय में धड़कता रहे।
Question 5. हृदय चक्र किसे कहते हैं ?
Answer: हृदय चक्र वह पूरी प्रक्रिया है जो हृदय के एक बार धड़कने की शुरुआत से लेकर अगली धड़कन की शुरुआत तक होती है। इसमें हृदय के विभिन्न हिस्सों में होने वाले सभी परिवर्तन शामिल होते हैं।
In simple words: दिल की एक धड़कन के शुरू होने से लेकर अगली धड़कन के शुरू होने तक दिल में जो कुछ होता है, उसे हृदय चक्र कहते हैं।
🎯 Exam Tip: हृदय चक्र में सिस्टोल (संकुचन) और डायस्टोल (विश्राम) दोनों चरण शामिल होते हैं, जो रक्त को शरीर में पंप करने और वापस प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं।
RBSE Class 12 Biology Chapter 24 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. खुला व बन्द रक्त परिसंचरण तन्त्र में अन्तर लिखो।
Answer: खुला और बंद रक्त परिसंचरण तंत्र शरीर में रक्त के प्रवाह के दो अलग-अलग तरीके हैं।
| खुला परिसंचरण तंत्र | बंद परिसंचरण तंत्र |
|---|---|
| 1. रक्त सीधे अंगों और ऊतकों के खुले स्थानों (गुहाओं) में बहता है, जिन्हें रक्त कोटर (Blood Sinus) कहते हैं। | 1. रक्त हृदय से निकलकर वाहिकाओं के एक बंद जाल (धमनियों और केशिकाओं) में बहता है। |
| 2. रक्त कम दबाव पर बहता है। | 2. रक्त उच्च दबाव पर बहता है। |
| 3. रक्त वाहिकाओं से बाहर निकल जाता है। | 3. रक्त हमेशा वाहिकाओं के अंदर बंद रहता है। |
| 4. शरीर के अंग सीधे रक्त के संपर्क में रहते हैं। | 4. शरीर के अंग रक्त के सीधे संपर्क में नहीं रहते हैं। |
| 5. रक्त प्रवाह की गति धीमी होती है। | 5. रक्त प्रवाह की गति तेज होती है। |
| 6. यह कम प्रभावी होता है। | 6. यह अधिक प्रभावी होता है। |
| 7. उदाहरण: कॉकरोच और मोलस्क जैसे कीटों में पाया जाता है। | 7. उदाहरण: मनुष्य, स्तनधारी, पक्षी और केंचुए में पाया जाता है। |
In simple words: खुले तंत्र में खून सीधे अंगों पर बहता है, जबकि बंद तंत्र में खून हमेशा नसों (वाहिकाओं) के अंदर रहता है।
🎯 Exam Tip: इन दोनों प्रणालियों के मुख्य अंतरों को याद रखना महत्वपूर्ण है, जैसे रक्त का प्रवाह, दबाव और जीवों के उदाहरण।
Question 2. रुधिर के कार्य लिखो।
Answer: रक्त शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्य करता है:
- यह पाचन तंत्र से पोषक तत्वों और अवशोषित भोजन को शरीर के सभी अंगों तक पहुँचाता है।
- यह फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है।
- यह कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक वापस लाता है ताकि उसे बाहर निकाला जा सके।
- यह अमोनिया, यूरिया और यूरिक एसिड जैसे हानिकारक अपशिष्ट उत्पादों को उत्सर्जन अंगों (किडनी) तक पहुँचाता है।
- यह हार्मोन, एंजाइम और एंटीबॉडी जैसे पदार्थों को शरीर के विभिन्न हिस्सों में ले जाता है।
- यह हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और अन्य रोगाणुओं से लड़कर शरीर को बीमारियों से बचाता है।
- यह शरीर के तापमान को नियंत्रित और संतुलित रखता है।
- यह चोट लगने पर रक्त का थक्का बनाकर खून के बहाव को रोकता है।
- यह क्षतिग्रस्त क्षेत्रों में पोषक तत्व पहुँचाकर घावों को भरने में मदद करता है।
- यह मृत और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को यकृत और प्लीहा तक ले जाता है ताकि उन्हें नष्ट किया जा सके।
- यह शरीर के विभिन्न अंगों के बीच तालमेल बनाए रखता है और आंतरिक वातावरण को नियंत्रित करता है।
In simple words: रक्त शरीर में पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुँचाता है, अपशिष्ट पदार्थ हटाता है, बीमारियों से बचाता है, और शरीर का तापमान नियंत्रित रखता है।
🎯 Exam Tip: रक्त के प्रत्येक कार्य को संक्षेप में याद रखें, खासकर परिवहन, प्रतिरक्षा और तापमान विनियमन से संबंधित कार्य।
Question 3. मानव के रुधिर वर्ग बताइए।
Answer: मानव रक्त समूह लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मौजूद विशेष प्रतिजनों (एंटीजन) के आधार पर तय होते हैं। मुख्य रूप से दो प्रकार के रक्त समूह तंत्र होते हैं: ABO तंत्र और Rh तंत्र।
(i) **ABO तंत्र (समूह)**: इस तंत्र में दो प्रकार के एंटीजन (A और B) होते हैं, जिनकी खोज लैण्डस्टीनर ने की थी। इन एंटीजन की उपस्थिति के आधार पर रक्त को चार मुख्य समूहों में बांटा गया है:
- **रक्त वर्ग A (Blood group-A)**: इसमें लाल रक्त कोशिकाओं पर एंटीजन A होता है।
- **रक्त वर्ग B (Blood group-B)**: इसमें लाल रक्त कोशिकाओं पर एंटीजन B होता है।
- **रक्त वर्ग AB (Blood group-AB)**: इसमें लाल रक्त कोशिकाओं पर एंटीजन A और B दोनों होते हैं।
- **रक्त वर्ग O (Blood group-O)**: इसमें लाल रक्त कोशिकाओं पर कोई एंटीजन नहीं होता है।
| रुधिर वर्ग (Blood) | प्रतिजन (Antigen) | प्रतिरक्षी (Anti-bodies) (प्लाज्मा में) | रक्त दाता समूह |
|---|---|---|---|
| A | केवल A | केवल b | A, O |
| B | केवल B | केवल a | B, O |
| AB | A तथा B | कोई भी नहीं | A, B, AB, O |
| O | कोई भी नहीं | a तथा b | O |
(ii) **Rh तंत्र**: यह रक्त तंत्र लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर Rh एंटीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित है। इसकी खोज लैण्डस्टीनर और बीनर ने की थी। जिन व्यक्तियों की लाल रक्त कोशिकाओं पर Rh एंटीजन पाया जाता है, उन्हें Rh धनात्मक (Rh + ve) कहा जाता है। जिनमें यह एंटीजन नहीं होता, उन्हें Rh ऋणात्मक (Rh – ve) कहते हैं। Rh कारक रक्त आधान और गर्भावस्था में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
In simple words: मानव रक्त समूह एंटीजन पर आधारित होते हैं, मुख्य रूप से ABO और Rh सिस्टम। ABO में A, B, AB, O समूह होते हैं, और Rh में पॉजिटिव या नेगेटिव होते हैं।
🎯 Exam Tip: ABO और Rh रक्त समूहों के प्रतिजनों (antigens) और प्रतिरक्षियों (antibodies) को समझना रक्त आधान (blood transfusion) के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 4. आर. एच. तन्त्र को समझाओ।
Answer: Rh तंत्र रक्त समूहों का एक महत्वपूर्ण वर्गीकरण है जो लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) की सतह पर एक विशेष Rh एंटीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित है। इस तंत्र की खोज लैण्डस्टीनर और बीनर नामक वैज्ञानिकों ने की थी।
लगभग 80% मनुष्यों में Rh एंटीजन पाया जाता है। यह Rh एंटीजन रीसस बंदर में पाए जाने वाले एंटीजन के समान होता है। जिन व्यक्तियों में Rh एंटीजन होता है, उन्हें Rh-सहित (Rh +ve) कहा जाता है, और जिनमें यह नहीं होता, उन्हें Rh-हीन (Rh –ve) कहा जाता है। यदि Rh-हीन व्यक्ति के रक्त को Rh-सहित रक्त के साथ मिलाया जाता है, तो Rh एंटीजन के खिलाफ विशेष एंटीबॉडी बन जाती हैं। इसलिए, रक्त आधान (blood transfusion) से पहले Rh समूह का मिलान करना बहुत जरूरी है ताकि कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया न हो।
In simple words: Rh तंत्र बताता है कि लाल रक्त कोशिकाओं पर एक खास तरह का प्रोटीन (Rh एंटीजन) है या नहीं। अगर है तो Rh पॉजिटिव, नहीं है तो Rh नेगेटिव।
🎯 Exam Tip: Rh कारक रक्त आधान और गर्भावस्था के दौरान Rh असंगति (Rh incompatibility) के जोखिमों के कारण चिकित्सा में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
Question 6. दोहरा रक्त परिसंचरण का महत्व समझाओ।
Answer: दोहरा रक्त परिसंचरण वह प्रक्रिया है जहाँ रक्त हृदय से होकर शरीर में दो बार गुजरता है - एक बार फेफड़ों के लिए और एक बार शरीर के बाकी हिस्सों के लिए। स्तनधारियों में, धमनियों में बहने वाला शुद्ध रक्त और शिराओं में बहने वाला अशुद्ध रक्त हमेशा अलग-अलग रहते हैं। यह हृदय के पूर्ण विभाजन के कारण संभव होता है, जिससे दो मुख्य लाभ मिलते हैं:
- **शुद्ध और अशुद्ध रक्त का मिश्रण न होना**: ऑक्सीजन युक्त (शुद्ध) और ऑक्सीजन रहित (अशुद्ध) रक्त आपस में कभी नहीं मिलते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि शरीर को हमेशा ऑक्सीजन से भरपूर रक्त मिले।
- **रक्त का कुशल वितरण**: इस प्रणाली से हृदय, संकुचन (Systole) के दौरान धमनियों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों तक शुद्ध रक्त को प्रभावी ढंग से पहुँचा सकता है। प्रसारण (Diastole) के दौरान, शिराओं द्वारा विभिन्न अंगों से अशुद्ध रक्त आसानी से हृदय तक वापस आ जाता है।
In simple words: दोहरा रक्त परिसंचरण का मतलब है कि खून दिल से दो बार गुजरता है। इससे शुद्ध और अशुद्ध खून अलग रहते हैं, और ऑक्सीजन पूरे शरीर में अच्छे से पहुँचती है।
🎯 Exam Tip: दोहरे परिसंचरण का मुख्य महत्व ऑक्सीजन युक्त रक्त की दक्षता और ऑक्सीजन रहित रक्त से उसके अलगाव को सुनिश्चित करना है।
Question 7. रुधिर व लसीका में अन्तर लिखो।
Answer: रुधिर (रक्त) और लसीका शरीर के दो महत्वपूर्ण तरल पदार्थ हैं, लेकिन इनमें कुछ खास अंतर होते हैं:
| रुधिर (Blood) | लसीका (Lymph) |
|---|---|
| 1. इसमें लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs), श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBCs) और प्लेटलेट्स मौजूद होते हैं। | 1. इसमें लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) और प्लेटलेट्स अनुपस्थित होते हैं। |
| 2. श्वेत रक्त कोशिकाओं (WBCs) की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। | 2. श्वेत रक्त कोशिकाओं (WBCs) की संख्या अधिक होती है। |
| 3. फाइब्रिनोजन प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। | 3. फाइब्रिनोजन प्रोटीन की मात्रा कम होती है। |
| 4. ऑक्सीजन (O₂) की मात्रा अधिक और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की मात्रा कम होती है। | 4. ऑक्सीजन (O₂) की मात्रा कम और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की मात्रा अधिक होती है। |
| 5. उपापचयी उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा कम होती है। | 5. उपापचयी उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। |
| 6. अविलेय प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। | 6. अविलेय प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। |
| 7. पोषक पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। | 7. पोषक पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। |
| 8. इसका प्रवाह हृदय से अंगों और अंगों से पुनः हृदय की ओर होता है। | 8. यह केवल अंगों से हृदय की ओर जाता है। |
| 9. यह रक्त वाहिनियों (Blood vessels) में बहता है। | 9. यह लसीका वाहिनियों (Lymph vessels) में बहता है। |
In simple words: रक्त में लाल रक्त कोशिकाएं और ज्यादा ऑक्सीजन होती है, जबकि लसीका में सफेद रक्त कोशिकाएं ज्यादा होती हैं और यह शरीर से अपशिष्ट पदार्थ ले जाती है।
🎯 Exam Tip: रुधिर और लसीका के बीच के प्रमुख अंतरों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर उनकी संरचना और प्रवाह की दिशा के संबंध में।
RBSE Class 12 Biology Chapter 24 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. मानव हृदय की बाह्य संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: मनुष्य का हृदय एक पेशीय अंग है जो पूरे शरीर में रक्त को पंप करता है। यह एक पम्पिंग स्टेशन की तरह काम करता है। हृदय का आकार लगभग एक मुट्ठी के बराबर होता है और इसका विकास मध्यजन स्तर (Mesoderm) से होता है।
हृदय वक्षगुहा (छाती के बीच का स्थान) में थोड़ा बाईं ओर, दोनों फेफड़ों के बीच स्थित होता है। यह एक पतली झिल्ली से ढका होता है जिसे हृदयावरण या पेरीकार्डियम (Pericardium) कहते हैं। इस हृदयावरण में दो परतें होती हैं: बाहरी परत को पारिएटल पेरीकार्डियम और आंतरिक परत को विसेरल पेरीकार्डियम (जो हृदय से चिपकी होती है) या एपिकार्डियम कहते हैं। इन दोनों परतों के बीच एक छोटी सी जगह होती है जिसे हृदयावरणी गुहा (पेरीकार्डियल कैविटी) कहते हैं। इस गुहा में एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसे हृदयावरणी द्रव (पेरीकार्डियल फ्लूइड) कहते हैं, जो हृदय को झटकों से बचाता है और घर्षण कम करता है।
In simple words: मानव हृदय एक मांसपेशियों का पंप है, जो छाती में फेफड़ों के बीच स्थित होता है। यह एक सुरक्षात्मक झिल्ली से ढका होता है और शरीर में रक्त पहुँचाने का काम करता है।
🎯 Exam Tip: हृदय की बाहरी संरचना में उसकी स्थिति, आकार और हृदयावरण की परतों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. मानव हृदय की आन्तरिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: मानव हृदय की आन्तरिक संरचना एक जटिल प्रणाली है जिसमें चार मुख्य कक्ष और कई वाल्व होते हैं जो रक्त प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।
मानव हृदय में चार कक्ष (चेंबर) होते हैं। ऊपरी दो कक्ष, जिन्हें अलिन्द (Auricles) कहते हैं, पतली दीवारों वाले होते हैं। नीचे के दो कक्ष, जिन्हें निलय (Ventricles) कहते हैं, मोटी दीवारों वाले होते हैं।
**अलिन्द (Auricles)**:
हृदय में दो अलिन्द होते हैं - दायाँ अलिन्द (Right auricle) और बायाँ अलिन्द (Left auricle)। दायाँ अलिन्द बायें अलिन्द से थोड़ा बड़ा होता है। प्रत्येक अलिन्द के पीछे एक छोटा उभार होता है जिसे अलिन्द परिशेषिका (Auricular appendix) कहते हैं। अलिन्द भाग चौड़ा और छोटा होता है, और इसकी दीवारें पतली होती हैं। दायाँ अलिन्द पूरे शरीर से अशुद्ध रक्त (ऑक्सीजन रहित) ऊर्ध्व महाशिरा (Superior vena cava) और निम्न महाशिरा (Inferior vena cava) के माध्यम से प्राप्त करता है। बायाँ अलिन्द फेफड़ों से शुद्ध रक्त (ऑक्सीजन युक्त) फुफ्फुसीय शिराओं (Pulmonary veins) के माध्यम से प्राप्त करता है।
**निलय (Ventricles)**:
निलय भाग अलिन्दों की तुलना में बड़ा और अधिक माँसल होता है। हृदय में दो निलय होते हैं - दायाँ निलय (Right ventricle) और बायाँ निलय (Left ventricle)। ये तिरछी अन्तरानिलय पट्टी (Inter ventricular septum) द्वारा अलग रहते हैं। बायाँ निलय दाहिने निलय से अधिक पेशीय होता है क्योंकि इसे पूरे शरीर में रक्त पंप करना होता है। दायाँ निलय अशुद्ध रक्त को फुफ्फुसीय धमनी के माध्यम से फेफड़ों तक पंप करता है, जबकि बायाँ निलय शुद्ध रक्त को महाधमनी के माध्यम से पूरे शरीर में पंप करता है।
**कपाट (Valves)**:
हृदय के कक्षों के अंदर कपाट और पट (सेप्टा) होते हैं। दायें और बायें अलिन्दों के बीच अन्तर अलिन्द पट (Inter auricular septum) होता है, जिस पर एक अण्डाकार खाँच (fossa ovalis) पायी जाती है।
- **त्रिवलन कपाट (Tricuspid valve)**: यह दायें अलिन्द और दायें निलय के बीच होता है, जिसमें तीन वाल्व पत्तियां होती हैं।
- **द्विवलन कपाट (Bicuspid or mitral valve)**: यह बायें अलिन्द और बायें निलय के बीच होता है, इसमें दो वाल्व पत्तियां होती हैं।
- **अर्धचन्द्राकार कपाट (Semilunar valves)**: फुफ्फुसीय धमनी और महाधमनी के आधार पर तीन-तीन अर्धचन्द्राकार कपाट होते हैं। ये कपाट रक्त को वापस हृदय के कक्षों में जाने से रोकते हैं।
हृदय एक पेशीय पंप की तरह काम करता है, जो अपनी मांसपेशियों के नियमित और लयबद्ध संकुचन और विश्राम से रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है। इसी को हृदय की धड़कन या स्पंदन (Heart beat) कहते हैं।
चित्र 24.6 हृदय संचालन बिन्दु SAN तथा AVN
प्रत्येक धड़कन में हृदय एक बार सिकुड़ता है (संकुचन या प्रकुंचन/Systole) और फिर सामान्य अवस्था में लौट आता है (विश्राम या अनुशिथिलन/Diastole)। संकुचन के दौरान रक्त हृदय से धमनियों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों में जाता है, जबकि विश्राम के दौरान रक्त शिराओं के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय में वापस आता है।
हृदय के स्पंदन की यह पुनरावृत्ति हृदय चक्र (Cardiac cycle) कहलाती है। मनुष्य में हृदय स्पंदन की दर लगभग 72 प्रति मिनट होती है। एक हृदय चक्र पूरा होने में 0.8 सेकंड का समय लगता है।
**हृदय चक्र (Cardiac Cycle)**: हृदय चक्र, हृदय के एक स्पंदन की शुरुआत से लेकर अगले स्पंदन की शुरुआत तक हृदय के विभिन्न भागों में होने वाले परिवर्तनों का क्रम है। एक हृदय चक्र 0.8 सेकंड में पूरा होता है।
एक चक्र में दो मुख्य अवस्थाएँ होती हैं:
- **विश्रांति अवस्था (अनुशिथिलन/Diastole)**: इस दौरान हृदय के कक्ष आराम करते हैं और रक्त से भरते हैं।
- **संकुचन अवस्था (प्रकुंचन/Systole)**: इस दौरान हृदय के कक्ष सिकुड़ते हैं और रक्त को बाहर पंप करते हैं।
(2) अलिन्दों का प्रकुंचन (Atrial Systole)- जैसे ही अलिन्दों का अनुशिथिलन (विश्राम) समाप्त होता है, दोनों अलिन्द एक साथ संकुचित होते हैं। यह अवस्था लगभग 0.1 सेकंड तक रहती है। इस संकुचन से लगभग 25% रक्त निष्क्रिय प्रवाह द्वारा पहले ही भर चुके निलयों में चला जाता है। अब, निलयों के अंदर रक्त का दबाव बढ़ जाता है।
चित्र 24.7 हृदय में रुधिर का प्रवाह
(3) निलयों का प्रकुंचन (Ventricular Systole) - अलिन्दों का प्रकुंचन समाप्त होने के तुरंत बाद निलय संकुचित होना शुरू कर देते हैं। यह प्रावस्था लगभग 0.3 सेकंड तक चलती है। संकुचन के कारण निलयों में दबाव बहुत बढ़ जाता है। इस दबाव के कारण रक्त वापस अलिन्दों में नहीं बह पाता है क्योंकि त्रिवलन और द्विवलन कपाट बंद हो जाते हैं। जब निलयों का दबाव फुफ्फुसीय धमनी और महाधमनी के दबाव से अधिक हो जाता है, तो अर्धचन्द्राकार कपाट खुल जाते हैं और रक्त इन वाहिकाओं में प्रवाहित हो जाता है। इस प्रकार, अधिकांश रक्त निलयों से धमनियों में चला जाता है।
(4) निलयों का अनुशिथिलन (Ventricular Diastole) - प्रकुंचन के बाद निलय विश्राम की अवस्था में आ जाते हैं। यह प्रावस्था अनुशिथिलन कहलाती है और लगभग 0.5 सेकंड तक रहती है। इस दौरान निलयों में दबाव कम हो जाता है। रक्त को विपरीत दिशा में बहने से रोकने के लिए अर्धचन्द्राकार कपाट तुरंत बंद हो जाते हैं। जैसे ही निलयों का दबाव कम होता है, अलिन्दों से लगातार आ रहे रक्त का दबाव निलयों की तुलना में अधिक हो जाता है, जिससे अलिन्द-निलय कपाट खुल जाते हैं और रक्त निलयों में भर जाता है।
**हृदय की गति का उद्गम एवं संचरण (Origin and Transmission of Heart beat)**: सभी स्तनधारियों में, हृदय की धड़कन दाहिने अलिन्द की ऊपरी पिछली दीवार में स्थित शिरा अलिन्द घुण्डी (Sino-auricular node या S.A. node) नामक एक छोटी सी रचना से शुरू होती है। यह घुण्डी हृदय की गति को नियंत्रित करती है, इसलिए इसे 'गति निर्धारक' या 'पेसमेकर' (Pace maker) भी कहते हैं। S.A. नोड में विशेष प्रकार की हृदय-पेशियाँ, तंत्रिका तंतु और तंत्रिकाएँ होती हैं। इसमें वेगस तंत्रिका (Vagus nerve) और अनुकम्पी तंत्रिकाएँ (Sympathetic nerves) होती हैं, जो हृदय की गति को कम या बढ़ाने का काम करती हैं।
चित्र 24.9 हृदय की दीवार का विशिष्ट संवहनी तंत्र
हृदय के स्पंदन की शुरुआत S.A. नोड से होती है। संकुचन की लहरें हृदय की मांसपेशियों में फैलती हुई अलिन्द-निलय घुण्डी (A.V. नोड) तक पहुँचती हैं। सबसे पहले दोनों अलिन्द संकुचित होते हैं, जिससे रक्त त्रिवलन और द्विवलन कपाटों को खोलकर निलयों में चला जाता है। निलयों का संकुचन A.V. नोड से संकेत मिलने पर होता है, जिसे S.A. नोड से प्रेरणा मिलती है। फिर संकुचन की प्रेरणा हिज के समूह (Bundle of His) और पुरकिंजे तंतुओं (Purkinje fibres) के माध्यम से निलयों की दीवारों में जाती है, जिससे दोनों निलय संकुचित होते हैं। रक्त अर्धचन्द्राकार कपाटों को खोलकर धमनी चापों में चला जाता है। इस दौरान अलिन्द-निलय कपाट (Atrioventricular valve) बंद हो जाते हैं। S.A. नोड द्वारा नए स्पंदन की शुरुआत होने तक हृदय पूर्ण विश्राम (Diastasis) में रहता है। इस तरह, हृदय चक्र लगातार चलता रहता है।
In simple words: दिल के अंदर चार कमरे होते हैं: दो अलिन्द (ऊपर) और दो निलय (नीचे)। इन कमरों में वाल्व होते हैं जो खून को सही दिशा में बहने देते हैं, ताकि वह वापस न जाए। हृदय की धड़कन SAN नोड से शुरू होती है, फिर यह संदेश AV नोड और हिज के बंडल से होते हुए निलयों तक पहुँचता है, जिससे हृदय एक लय में सिकुड़ता और फैलता है।
🎯 Exam Tip: हृदय के चार कक्षों, उनके बीच के पटों, और प्रत्येक वाल्व की स्थिति व कार्य को ठीक से समझना महत्वपूर्ण है। SAN नोड को पेसमेकर, AV नोड को पेससेटर, और हिज के बंडल व पुरकिंजे तंतुओं को हृदय के विद्युत संचरण प्रणाली के प्रमुख भाग के रूप में याद रखें।
Question 4. रुधिर के थक्का बनने की क्रियाविधि को समझाओ।
Answer: रुधिर का थक्का बनना या रुधिर स्कंदन (Blood Clotting or Blood Coagulation) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो चोट लगने पर रक्त के अत्यधिक बहाव को रोकती है। यह एक सुरक्षात्मक तंत्र है जो घाव से रोगाणुओं को शरीर में प्रवेश करने से भी रोकता है। यह प्रक्रिया रक्त में मौजूद कई स्कंदन कारकों पर निर्भर करती है और मुख्य रूप से तीन चरणों में होती है:
(1) **पहली अवस्था (Step-1)**: जब शरीर में किसी जगह चोट लगती है या रक्त वाहिनियाँ फट जाती हैं, तो क्षतिग्रस्त कोशिकाएँ और रक्त प्लेटलेट्स (Platelets) वायु के संपर्क में आती हैं। ये प्लेटलेट्स टूटकर प्रोथ्रोम्बोप्लास्टिन (Prothromboplastin) नामक एक पदार्थ स्रावित करती हैं। यह प्रोथ्रोम्बोप्लास्टिन, प्लाज्मा में मौजूद कैल्शियम आयन (\( \text{Ca}^{++} \)) के साथ मिलकर थ्रोम्बोप्लास्टिन (Thromboplastin) में बदल जाता है।
\( \text{प्रोथ्रोम्बोप्लास्टिन} + \text{Ca}^{++} \)
\( \implies \text{थ्रोम्बोप्लास्टिन} \)
रक्त में फाइब्रिनोजन (Fibrinogen) और प्रोथ्रोम्बिन (Prothrombin) नामक दो प्रोटीन होते हैं, जिन्हें यकृत (Liver) बनाता है। ये रक्त को जमाने में मदद करते हैं। प्रोथ्रोम्बिन सामान्यतः निष्क्रिय अवस्था में रहता है, क्योंकि रक्त में एक और पदार्थ, एंटीप्रोथ्रोम्बिन (या हिपेरिन), प्रोथ्रोम्बिन को निष्क्रिय रखता है। इसी वजह से रक्त वाहिकाओं के अंदर जमता नहीं है।
(2) **दूसरी अवस्था (Step-II)**: थ्रोम्बोप्लास्टिन, कैल्शियम आयन और ट्रिप्टेज एंजाइम की मदद से एंटीप्रोथ्रोम्बिन के प्रभाव को खत्म कर देता है। इसके परिणामस्वरूप निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन सक्रिय थ्रोम्बिन में बदल जाता है।
\( \text{निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन} \)
\( \implies \text{सक्रिय थ्रोम्बिन} \)
(3) **तीसरी अवस्था (Step III)**: थ्रोम्बिन, रक्त में मौजूद तरल प्रोटीन फाइब्रिनोजन (Fibrinogen) को ठोस रेशेदार फाइब्रिन (Fibrin) में बदल देता है।
\( \text{तरल फाइब्रिनोजन} \xrightarrow{\text{थ्रोम्बिन}} \text{ठोस रेशेदार फाइब्रिन} \)
इस प्रकार बने फाइब्रिन के रेशे घायल स्थान पर एक जाल बना लेते हैं। इस जाल में अनेक रक्त कणिकाएँ उलझ जाती हैं, जिससे एक थक्का (Clot) बन जाता है और रक्त का बहाव रुक जाता है। थक्का सिकुड़ने पर हल्के पीले रंग का तरल पदार्थ सीरम (serum) बाहर निकलता है। रक्त का जमना एक रासायनिक क्रिया है।
**रक्त स्कंदन की क्रिया-विधि का प्रवाह:**
द्वितीय चरण: \( \text{प्रोथोम्बिन (निष्क्रिय प्लाज्मा प्रोटीन)} \xrightarrow{\text{प्रोथ्रोम्बिनेस एन्जाइम}} \text{सक्रिय थ्रोम्बिन} \)
तृतीय चरण: \( \text{घुलनशील फाइब्रिनोजन} + \text{थ्रोम्बिन} \xrightarrow{\text{Ca}^{2+}, \text{फाइब्रिन स्थायीकारी कारक}} \text{फाइब्रिन (अघुलनशील)} \)
\( \implies \text{अघुलनशील फाइब्रिन तन्तु} + \text{RBCs} \)
\( \implies \text{रक्त का थक्का} \)
**रक्त के थक्का बनने में निम्न कारकों की आवश्यकता होती है:**
- कारक I – फाइब्रिनोजन (Fibrinogen)
- कारक II – ऊतक प्रोथ्रोम्बिन (Tissue Prothrombin)
- कारक III – थ्रोम्बोप्लास्टिन (Thromboplastin)
- कारक IV – कैल्शियम आयन (\( \text{Calcium ion} \))
- कारक V – प्रोएक्सीलेरिन या लेबाइल कारक (Proaccylarin or Labile Factor)
- कारक VI – एक्सिलरिन (Accylarin)
- कारक VII – प्रोकनवर्टिन या स्टेबल कारक (Proconvertin or stable Factor)
- कारक VIII – एण्टीहीमोफिलिक ग्लोबिन (Antihaemophilic globin)
- कारक IX – क्रिस्मस कारक या थ्रोम्बोप्लास्टिन अवयव (Crismas Factor)
- कारक X – स्टुअर्ट-पॉवर कारक (Stuart Power Factor)
- कारक XI – प्लाज्मा थ्रोम्बोप्लास्टिन एन्टीसीडेन्ट (Thromboplastin anticident)
- कारक XII – हेगमेन, कारक या सम्पर्क कारक (Hagmen Factor)
- कारक XIII – फाइब्रिन स्थायीकारी कारक (Fibrin Stablizing Factor)
- चोट या कटे स्थान से रक्त बहना बंद हो जाता है, जिससे रक्त व्यर्थ नहीं जाता है।
- वायु से हानिकारक जीवाणुओं का प्रवेश थक्का (Clot) बनने के कारण रुक जाता है, जिससे शरीर की सुरक्षा होती है।
- नष्ट कोशिकाएँ शरीर से बाहर निकल जाती हैं एवं उनके स्थान पर नयी कोशिकाओं का निर्माण हो जाता है।
In simple words: चोट लगने पर खून की प्लेटलेट्स और कैल्शियम मिलकर थ्रोम्बोप्लास्टिन बनाते हैं। फिर यह प्रोथ्रोम्बिन को थ्रोम्बिन में और फाइब्रिनोजन को फाइब्रिन के रेशों में बदल देता है, जिससे खून का थक्का बन जाता है और खून बहना रुक जाता है।
🎯 Exam Tip: रक्त स्कंदन के तीन चरणों और उनमें शामिल प्रमुख कारकों (जैसे प्लेटलेट्स, कैल्शियम, फाइब्रिनोजन, प्रोथ्रोम्बिन) को याद रखें।
Question 5. लसीका तन्त्र का वर्णन करो।
Answer: मानव शरीर में लसीका तंत्र एक महत्वपूर्ण प्रणाली है। इसमें लसीका नामक तरल पदार्थ, लसीका वाहिनियाँ और लसीका ग्रंथियाँ शामिल हैं। यह तंत्र शरीर के विभिन्न हिस्सों से अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल पदार्थ को वापस रक्त परिसंचरण में लाने का काम करता है। लसीका तंत्र हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का भी एक मुख्य हिस्सा है, जो शरीर को बीमारियों और संक्रमण से बचाता है।
लसीका वाहिनियाँ (Lymph Vessels): ये वाहिनियाँ रक्त वाहिकाओं जैसी होती हैं, जो लसीका को अंगों से हृदय की ओर ले जाती हैं। इनमें दाब कम होता है और लसीका का बहाव इन वाहिनियों की दीवारों के संकुचन के कारण होता है। प्रमुख लसीका वाहिनियों में बायीं वक्षीय वाहिनी और दायीं लसीका वाहिनी शामिल हैं। लसीका वाहिनियाँ शरीर के विभिन्न अंगों से लसीका को इकट्ठा करती हैं।
लसीका पर्व संधियाँ (Lymph Nodes): ये लसीका वाहिनियों के बीच-बीच में मौजूद छोटी गांठें होती हैं। इन गांठों में लसीका कोशिकाएं और लिम्फोसाइट्स होते हैं। ये ग्रंथियाँ रक्त में मिलने से पहले मृत कोशिकाओं और बाहरी कणों को लसीका से हटा देती हैं और प्रतिरक्षा कोशिकाओं का निर्माण करती हैं।
लसीका तंत्र के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
(1) लसीका रक्त और ऊतकों के बीच एक माध्यम के रूप में काम करता है। यह पचे हुए पोषक तत्वों, ऑक्सीजन और हार्मोन को ऊतकों तक पहुंचाता है, और अपशिष्ट पदार्थों को ऊतकों से हटाकर रक्त में वापस लाता है।
(2) लसीका तंत्र वसा जैसे पोषक तत्वों के अवशोषण और परिवहन में मदद करता है, खासकर छोटी आंत से।
(3) आंत में अवशोषित वसा, लेक्टिअल्स (वसा अवशोषित करने वाली वाहिनियों) के माध्यम से पहले लसीका तंत्र में जाती है, और फिर वहाँ से रक्त परिसंचरण तंत्र में शामिल हो जाती है।
(4) लसीका में मौजूद सफेद रक्त कोशिकाएं (WBCs) रोगाणुओं को खाकर शरीर को संक्रमण से बचाती हैं। लसीका तंत्र शरीर के अंदरूनी संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक होता है।
In simple words: लसीका तंत्र तरल पदार्थों को रक्त में वापस भेजता है, वसा को शरीर में फैलाता है और हमें बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: लसीका तंत्र के घटकों (लसीका, वाहिनियां, ग्रंथियां) और उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से बताएं। यह शरीर की प्रतिरक्षा और तरल पदार्थ के संतुलन में इसकी भूमिका पर जोर देता है।
Question 6. मानव में रक्त परिसंचरण तन्त्र सम्बन्धी रोगों का वर्णन करो।
Answer: मानव के रक्त परिसंचरण तंत्र से संबंधित कई बीमारियाँ हैं। यहाँ कुछ मुख्य बीमारियों का वर्णन किया गया है:
1. उच्च रक्त दाब (High Blood Pressure): यह वह स्थिति है जब रक्तचाप सामान्य (120/80 mmHg) से अधिक हो जाता है। 120 mmHg को प्रकुंचन (सिस्टोलिक) दाब और 80 mmHg को अनुशिथिलन (डायस्टोलिक) दाब कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति का रक्तचाप लगातार 140/90 mmHg से अधिक रहता है, तो उसे उच्च रक्तचाप माना जाता है। यह हृदय रोगों और मस्तिष्क व गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। नियमित व्यायाम और स्वस्थ आहार इसे नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
3. हृद् शूल (Angina; एन्जाइना): इसे एन्जाइना पेक्टोरिस भी कहते हैं। यह तब होता है जब हृदय की मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है, जिससे छाती में तेज दर्द होता है। यह अक्सर रक्त प्रवाह प्रभावित होने के कारण होता है और किसी भी उम्र के लोगों में हो सकता है, लेकिन मध्यम आयु और वृद्ध लोगों में अधिक सामान्य है।
4. हृदय आघात (Heart Attack): हृदय आघात के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें कोरोनरी धमनी में थक्का जमना या रक्त वाहिका में रुकावट शामिल है। मोटापा, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, कम व्यायाम और रक्त में कोलेस्ट्रॉल का अधिक स्तर भी इसके खतरे को बढ़ाते हैं। हृदय आघात एक गंभीर आपात स्थिति है।
5. रक्ताल्पता (Anaemia): यह तब होता है जब रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) या हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। विटामिन B12, फोलिक एसिड और आयरन की कमी इसके मुख्य कारण हैं। इससे शरीर के ऊतकों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।
6. वेरिकोस शिराएँ (Varicose Veins): ये ऐसी नसें होती हैं जो सूज जाती हैं, मुड़ जाती हैं और सही ढंग से काम नहीं करती हैं। यह अक्सर उन लोगों में देखा जाता है जो लंबे समय तक खड़े रहते हैं, जिससे पैरों की नसों में खिंचाव आता है।
7. हिमोलाइसिस (Haemolysis): यह रक्त कोशिकाओं के फट जाने की प्रक्रिया है, जिससे रक्त लयन होता है। यह विभिन्न कारणों से हो सकता है, जैसे कुछ बीमारियों या दवाइयों के कारण।
8. हृदयपात (Heart Failure): जब हृदय की मांसपेशियाँ अचानक पर्याप्त रक्त पंप करना बंद कर देती हैं, तो इसे हृदयपात कहते हैं। इसके कारण शरीर के विभिन्न अंगों को आवश्यक रक्त आपूर्ति नहीं मिल पाती है। इसे कभी-कभी संकुचित हृदयपात भी कहा जाता है। फेफड़ों में पानी भरना इसका एक बड़ा लक्षण है।
9. हीमोफीलिया या शाही रोग (Haemophilia): यह एक आनुवंशिक रोग है, जिसका जीन 'X' गुणसूत्र पर होता है। इसमें चोट लगने पर रक्त का थक्का नहीं जमता और रक्त बहता रहता है। यह मुख्य रूप से पुरुषों को प्रभावित करता है और महिलाएँ इसकी वाहक होती हैं।
10. ल्यूकोपीनिया (Leukopenia): यह तब होता है जब रक्त में सफेद रक्त कोशिकाओं (WBCs) की संख्या सामान्य से कम हो जाती है। इससे व्यक्ति की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
14. अधिश्वेत रक्तता (Leukemia): यह एक प्रकार का कैंसर है जिसमें रक्त में सफेद रक्त कोशिकाओं (WBCs) की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है। ये असामान्य कोशिकाएं शरीर में फैल सकती हैं और अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती हैं।
In simple words: रक्त परिसंचरण तंत्र के रोगों में उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, एनीमिया और रक्त कैंसर जैसी स्थितियाँ शामिल हैं, जो हृदय और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती हैं।
🎯 Exam Tip: रक्त परिसंचरण तंत्र से संबंधित विभिन्न रोगों के नाम, उनके कारण और प्रमुख लक्षणों को याद रखें। विशिष्ट उदाहरणों के साथ प्रत्येक रोग का वर्णन करें।
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