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Detailed Chapter 22 मानव का पाचन तंत्र RBSE Solutions for Class 12 Biology
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Class 12 Biology Chapter 22 मानव का पाचन तंत्र RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. रेनिन का स्राव कहाँ से होता है -
(a) यकृत
(b) वृहद्रान्त्र
(c) आमाशय
(d) मलाशय
Answer: (c) आमाशय
In simple words: रेनिन एक एंजाइम है जो शरीर में दूध को पचाने में मदद करता है। यह पेट (आमाशय) में बनता है और वहीं से निकलता है। यह शिशुओं में दूध प्रोटीन को तोड़ने के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
🎯 Exam Tip: पाचन एंजाइमों के नाम और उनके स्राव के अंगों को याद रखें, क्योंकि ये अक्सर बहुविकल्पीय प्रश्नों में पूछे जाते हैं।
Question 3. कुप्फर कोशिकाएँ मिलती हैं -
(a) अग्न्याशय में
(b) छोटी आँत में
(c) बड़ी आँत में
(d) यकृत में।
Answer: (d) यकृत में
In simple words: कुप्फर कोशिकाएँ खास तरह की कोशिकाएँ होती हैं जो यकृत (लीवर) में पाई जाती हैं। इनका मुख्य काम खून से गंदी चीज़ों और पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को साफ करना होता है। ये लीवर को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न अंगों में पाई जाने वाली विशेष कोशिकाओं और उनके कार्यों को ध्यान से समझें, खासकर लीवर जैसी महत्वपूर्ण ग्रंथियों की कोशिकाओं को।
Question 4. एमाइलेस विकर किस पर कार्य करता है -
(a) प्रोटीन
(b) कार्बोहाइड्रेट
(c) वसा अम्ल
(d) वसा
Answer: (b) कार्बोहाइड्रेट
In simple words: एमाइलेस एक एंजाइम है जो कार्बोहाइड्रेट को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ता है। यह हमारे मुँह और छोटी आँत में काम करता है, ताकि शरीर खाने से मिली शुगर का इस्तेमाल कर सके। यह पाचन की शुरुआत करता है।
🎯 Exam Tip: प्रमुख पाचन एंजाइमों और उनके सबस्ट्रेट्स (जिन पर वे कार्य करते हैं) का मिलान याद रखें।
Question 5. निष्क्रिय पेप्सिनोजन सक्रिय पेप्सिन में बदल जाता है -
(a) टाइलिन से
(b) HCI से
(c) पित्त रस से
(d) रेनिन से
Answer: (b) HCI से
In simple words: पेट में निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलने के लिए हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCI) की ज़रूरत होती है। HCI पेट में मौजूद होता है और यह बदलाव प्रोटीन के पाचन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करता है कि प्रोटीन पाचन सही ढंग से शुरू हो सके।
🎯 Exam Tip: निष्क्रिय एंजाइमों को सक्रिय करने वाले कारकों को जानें, जैसे पेप्सिनोजन को पेप्सिन में बदलने के लिए HCl की भूमिका।
Question 6. मनुष्य में कितनी लार ग्रन्थियाँ मिलती हैं -
(a) 5 जोड़ी
(b) 2 जोड़ी
(c) 3 जोड़ी
(d) 4 जोड़ी
Answer: (c) 3 जोड़ी
In simple words: इंसानों में तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ होती हैं। ये ग्रंथियाँ लार बनाती हैं, जो भोजन को गीला करने और पचाने में मदद करती है। लार में एंजाइम भी होते हैं जो पाचन की शुरुआत करते हैं।
🎯 Exam Tip: लार ग्रंथियों की संख्या और उनके कार्यों को याद रखें, क्योंकि यह पाचन तंत्र का एक मूलभूत तथ्य है।
Question 7. यकृत कोशिकाएँ बनाती हैं -
(a) पित्त
(b) ट्रिप्सिन
(c) एमाईलोप्सिन
(d) लाइपेज
Answer: (a) पित्त
In simple words: लीवर (यकृत) की कोशिकाएँ पित्त नामक एक तरल पदार्थ बनाती हैं। पित्त वसा को पचाने में मदद करता है और छोटी आँत में भेजा जाता है। यह शरीर से कुछ बेकार पदार्थों को निकालने में भी सहायक होता है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि लीवर पित्त का उत्पादन करता है, जो वसा के पायसीकरण (छोटे कणों में तोड़ने) के लिए आवश्यक है।
Question 8. लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ कहाँ मिलती हैं -
(a) अग्नाशय में
(b) छोटी आँत में
(c) बड़ी आँत में
(d) यकृत में
Answer: (a) अग्नाशय में
In simple words: लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ अग्नाशय में कोशिकाओं का एक छोटा समूह होती हैं। ये कोशिकाएँ इंसुलिन और ग्लूकागॉन जैसे हार्मोन बनाती हैं, जो खून में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करते हैं। ये हार्मोन शरीर की ऊर्जा संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: लैंगरहैंस की द्वीपिकाओं को अग्नाशय से जोड़ें और याद रखें कि ये हार्मोन (इंसुलिन, ग्लूकागॉन) उत्पन्न करती हैं।
Question 9. लाल रुधिर कणिकाओं के परिपक्कन को प्रेरित करने वाला विटामिन है -
(a) D
(b) A
(c) B
(d) B12
Answer: (d) B12
In simple words: विटामिन B12 लाल रक्त कोशिकाओं को ठीक से बढ़ने और परिपक्व होने में मदद करता है। इसकी कमी से एनीमिया (खून की कमी) हो सकती है, क्योंकि शरीर पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएँ नहीं बना पाता। यह विटामिन हमारे तंत्रिका तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: विटामिन B12 को लाल रक्त कोशिका निर्माण और तंत्रिका कार्य से संबंधित याद रखें।
Question 10. आहारनाल का वह भाग जिसमें रसांकुर पाये जाते हैं -
(a) आमाशय
(b) आत्र
(c) ग्रसिका
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (b) आत्र
In simple words: रसांकुर (villi) छोटी आँत (आत्र) में पाए जाने वाले छोटे, उँगली जैसे उभार होते हैं। इनका मुख्य काम पचे हुए भोजन को सोखना और रक्त में मिलाना है, जिससे पोषक तत्व पूरे शरीर में पहुँच सकें। ये अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र को बढ़ा देते हैं।
🎯 Exam Tip: रसांकुरों का कार्य और उनकी उपस्थिति का स्थान (छोटी आँत) पाचन और अवशोषण की प्रक्रिया में उनकी भूमिका को दर्शाता है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. कुप्फर कोशिकाएँ कहाँ पाई जाती हैं ?
Answer: कुप्फर कोशिकाएँ यकृत की भित्ति में पायी जाती हैं। ये विशिष्ट कोशिकाएँ रक्त से हानिकारक पदार्थों, जैसे कि पुराने लाल रक्त कोशिकाओं और जीवाणुओं, को हटाने का कार्य करती हैं। ये लीवर के प्रतिरक्षा कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
In simple words: कुप्फर कोशिकाएँ लीवर (यकृत) की अंदरूनी परत में होती हैं। ये खून को साफ करने का काम करती हैं, जैसे पुरानी खून की कोशिकाओं को हटाना।
🎯 Exam Tip: कुप्फर कोशिकाओं को 'लीवर के सफाईकर्मी' के रूप में याद रखें और उनका स्थान (यकृत) महत्वपूर्ण है।
Question 2. विटामिन K का क्या कार्य होता है ?
Answer: विटामिन K का मुख्य कार्य रक्त का थक्का बनने में सहायता करना है। यह शरीर में उन प्रोटीनों को बनाने में मदद करता है जो चोट लगने पर रक्तस्राव को रोकने के लिए ज़रूरी होते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि घाव जल्दी भरें।
In simple words: विटामिन K का काम खून को जमाना (थक्का बनाना) है। यह चोट लगने पर बहुत ज़रूरी होता है ताकि खून बहना बंद हो जाए।
🎯 Exam Tip: विटामिन K को रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया से सीधे जोड़ें; इसकी कमी से अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है।
Question 3. ग्लाइकोजन का संश्लेषण एवं संग्रहण किस अंग में होता है ?
Answer: ग्लाइकोजन का संश्लेषण (बनाना) और संग्रहण (जमा करना) मुख्य रूप से यकृत (Liver) में होता है। मांसपेशियाँ भी ग्लाइकोजन को जमा करती हैं, लेकिन यकृत शरीर के लिए ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अतिरिक्त ग्लूकोज को संग्रहित करके रखता है।
In simple words: ग्लाइकोजन, जो कि शुगर का भंडार है, लीवर (यकृत) में बनता और जमा होता है। लीवर इसे तब छोड़ता है जब शरीर को ऊर्जा चाहिए होती है।
🎯 Exam Tip: ग्लाइकोजन को लीवर के ऊर्जा भंडारण रूप के रूप में याद रखें, जो रक्त शर्करा को संतुलित करता है।
Question 4. विटामिन D की कमी से शरीर में कौन-से खनिज की कमी हो जाती है ?
Answer: विटामिन D की कमी से शरीर में कैल्शियम नामक खनिज की कमी हो जाती है। विटामिन D हड्डियों को मजबूत रखने के लिए आवश्यक कैल्शियम को अवशोषित करने में मदद करता है। इसकी कमी से हड्डियाँ कमजोर हो सकती हैं।
In simple words: विटामिन D की कमी से शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है। विटामिन D हड्डियों के लिए कैल्शियम सोखने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: विटामिन D और कैल्शियम के बीच सीधा संबंध याद रखें; विटामिन D कैल्शियम अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 5. प्रोटीन ऊर्जा आहारीय अपूर्णता के कारण होने वाले रोग का नाम लिखिए।
Answer: प्रोटीन ऊर्जा आहारीय अपूर्णता (PEM) के कारण होने वाले प्रमुख रोग क्वाशियोरकर तथा मेरास्मस हैं। ये दोनों बीमारियाँ तब होती हैं जब बच्चों को खाने में पर्याप्त प्रोटीन और ऊर्जा नहीं मिलती। ये गंभीर कुपोषण के रूप हैं।
In simple words: प्रोटीन और ऊर्जा की कमी से क्वाशियोरकर और मेरास्मस रोग होते हैं। ये दोनों बच्चों में कुपोषण की गंभीर समस्याएँ हैं।
🎯 Exam Tip: प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण (PEM) के दो मुख्य रूपों (क्वाशियोरकर और मेरास्मस) को याद रखें और उनके कारण समझें।
Question 6. पाचित वसा का अवशोषण कहाँ होता है ?
Answer: पाचित वसा का अवशोषण मुख्य रूप से लसिका तंत्र में विसरण (diffusion) द्वारा होता है। छोटी आँत में वसा अम्लों और मोनोग्लिसराइड्स के रूप में वसा के छोटे कण लसीका वाहिकाओं (जिन्हें लैक्टियल कहते हैं) में प्रवेश करते हैं। ये लसीका वाहिकाएँ तब इन वसा को रक्तप्रवाह में पहुँचाती हैं।
In simple words: पची हुई वसा शरीर के लसीका तंत्र में सोख ली जाती है। यह छोटे टुकड़ों में टूटकर शरीर में फैलती है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि वसा का अवशोषण मुख्य रूप से लसीका तंत्र में होता है, न कि सीधे रक्तप्रवाह में जैसे अन्य पोषक तत्वों का होता है।
Question 8. मानव का दन्तसूत्र लिखिए।
Answer: मानव का दन्त सूत्र: वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र दांतों के प्रकार और संख्या को दर्शाता है। इसमें प्रत्येक जबड़े के आधे हिस्से में काटने वाले (I), फाड़ने वाले (C), अग्रचर्वणक (PM) और चर्वणक (M) दांतों की संख्या दिखाई जाती है। कुल दांतों की संख्या 32 होती है।
\[ \left[ \text{I} = \frac{2}{2}, \text{C} = \frac{1}{1}, \text{PM} = \frac{2}{2}, \text{M} = \frac{3}{3} \right] \times 2 = 32 \]
In simple words: मानव का दन्त सूत्र बताता है कि हमारे मुँह में कितने और किस तरह के दांत हैं। ऊपर और नीचे दोनों जबड़ों में कुल मिलाकर 32 दांत होते हैं।
🎯 Exam Tip: दन्त सूत्र के प्रत्येक अक्षर (I, C, PM, M) का अर्थ और संख्या याद रखें, साथ ही कुल दांतों की संख्या भी।
Question 9. बोलस किसे कहते हैं ?
Answer: मुख गुहिका में जब भोजन लार के साथ अच्छी तरह मिल जाता है और निगलने के लिए एक अर्द्धठोस गोले का रूप ले लेता है, तो उसे बोलस या निवाला कहते हैं। यह भोजन को ग्रसनी से ग्रसिका तक आसानी से ले जाने में मदद करता है।
In simple words: जब खाना मुँह में लार के साथ मिलकर एक मुलायम गोला बन जाता है, जिसे हम निगलते हैं, तो उसे बोलस कहते हैं।
🎯 Exam Tip: बोलस की परिभाषा को भोजन के यांत्रिक और रासायनिक पाचन की प्रारंभिक अवस्था से जोड़ें।
Question 10. ब्रूनर ग्रन्थियाँ किसे कहते हैं ?
Answer: ब्रूनर ग्रंथियाँ छोटी और कुंडलित श्लेष्मा ग्रंथियाँ होती हैं जो ग्रहणी (duodenum) के अधःश्लेष्मिका (submucosa) भाग में पाई जाती हैं। ये ग्रंथियाँ क्षारीय श्लेष्मा का स्राव करती हैं। यह श्लेष्मा पेट से आने वाले अम्लीय काइम से ग्रहणी की परत को बचाने में मदद करता है और एंजाइमों के लिए सही pH स्तर बनाए रखता है।
In simple words: ब्रूनर ग्रंथियाँ छोटी आँत के पहले हिस्से (ग्रहणी) में होती हैं। ये एक गाढ़ा पदार्थ (श्लेष्मा) छोड़ती हैं जो आँत को पेट के एसिड से बचाता है।
🎯 Exam Tip: ब्रूनर ग्रंथियों का स्थान (ग्रहणी की अधःश्लेष्मिका) और उनके कार्य (क्षारीय श्लेष्मा का स्राव करके अम्लीय काइम से सुरक्षा) को याद रखें।
Question 11. पेयर के समूह से क्या तात्पर्य है ?
Answer: पेयर के समूह (Peyer's patches) छोटी आँत के श्लेष्मिका स्तर में पाए जाने वाले लसिका ऊतक के छोटे-छोटे समूह होते हैं। ये या तो अकेले या समूहों में मौजूद होते हैं। ये प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो आंत में हानिकारक जीवाणुओं की पहचान कर उनसे लड़ने में मदद करते हैं। ये आंत के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: पेयर के समूह छोटी आँत में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के झुंड होते हैं। ये शरीर को कीटाणुओं से बचाने का काम करते हैं।
🎯 Exam Tip: पेयर के समूहों को आंत की प्रतिरक्षा प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक के रूप में पहचानें और उनका स्थान (छोटी आँत) याद रखें।
Question 12. ओडाई का अवरोधिनी किसे कहते हैं?
Answer: ओडाई का अवरोधिनी (Sphincter of Oddi) एक पेशीय वाल्व है जो अग्नाशय वाहिनी और सामान्य यकृत वाहिनी के रंध्र (खुले स्थान) पर स्थित होता है। यह पित्त रस और अग्नाशयी रस को ग्रहणी में छोड़ने की मात्रा और समय को नियंत्रित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि ये पाचक रस भोजन के पाचन के लिए सही समय पर पहुँचे।
In simple words: ओडाई का अवरोधिनी एक वाल्व है जो पित्त और अग्नाशय के रस को छोटी आँत में जाने को नियंत्रित करता है।
🎯 Exam Tip: ओडाई के अवरोधिनी को पित्त और अग्नाशयी रस के स्राव को नियंत्रित करने वाले वाल्व के रूप में याद रखें।
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. यकृत के कार्य लिखिए।
Answer: यकृत (Liver) मानव शरीर की सबसे बड़ी पाचक ग्रंथि है। यह भ्रूण की एण्डोडर्म से विकसित होता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लीवर का वजन लगभग 1.2 से 1.5 किलोग्राम होता है और यह 15 से 22 सेंटीमीटर चौड़ा होता है। यह डायाफ्राम के नीचे दाहिनी ओर स्थित होता है और इसमें दो मुख्य पालियाँ होती हैं: दाहिनी पालि और बाईं पालि। दाहिनी पालि बड़ी होती है। यकृत कोशिकाएँ पित्त का स्राव करती हैं, जो पित्ताशय में जमा होता है। पित्त पीले-हरे रंग का होता है और इसमें पित्त वर्णक (जैसे बिलीरुबिन) और पित्त लवण होते हैं। पित्त प्रकृति में क्षारीय होता है और वसा के पाचन में मदद करता है।
यकृत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
1. **ग्लूकोज का नियंत्रण:** यह शरीर में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करता है। आवश्यकता से अधिक ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदलकर संग्रहित करता है (ग्लाइकोजिनेसिस)। जब रक्त में ग्लूकोज की कमी होती है, तो यह संग्रहित ग्लाइकोजन को वापस ग्लूकोज में बदल देता है (ग्लाइकोजिनोलाइसिस)।
2. **ऊर्जा उत्पादन:** यह वसीय अम्ल, अमीनो अम्ल आदि से भी ग्लूकोज का संश्लेषण कर सकता है (ग्लूकोनिओजिनेसिस)।
3. **विटामिन भंडारण:** यह विटामिन A, D और B12 का संश्लेषण और संग्रह करता है।
4. **यूरिया निर्माण:** यह आर्निथीन चक्र के माध्यम से यूरिया बनाता है, जो शरीर से नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट को निकालने में मदद करता है।
5. **प्रतिरक्षा कार्य:** भ्रूण अवस्था में यकृत रक्त बनाने का काम करता है। वयस्क अवस्था में, कुफ्फुर कोशिकाएँ मृत और क्षतिग्रस्त लाल रक्त कोशिकाओं और जीवाणुओं को नष्ट करके शरीर की प्रतिरक्षा में मदद करती हैं।
6. **रक्त थक्का जमना:** यह हेपारिन नामक पदार्थ बनाता है, जो रक्त वाहिकाओं में रक्त को जमने से रोकता है। साथ ही, यह प्रोथोम्बिन और फाइब्रिनोजन जैसे रक्त प्रोटीन भी बनाता है, जो चोट लगने पर रक्त का थक्का बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
7. **पाचन में सहायता:** यह अग्नाशयी रस के एंजाइमों को भोजन पर प्रभावी ढंग से काम करने के लिए परिवर्तित करता है।
In simple words: लीवर हमारे शरीर की सबसे बड़ी पाचक ग्रंथि है। इसके कई काम हैं: यह शुगर को जमा करता है, विटामिन जमा करता है, खून को साफ करता है, और खून को जमने वाले पदार्थ बनाता है। यह पाचन और शरीर को विषैले पदार्थों से बचाने में बहुत मदद करता है।
🎯 Exam Tip: लीवर के कार्यों को तीन मुख्य श्रेणियों में याद रखें: मेटाबॉलिक (शर्करा, वसा, प्रोटीन), डिटॉक्सिफिकेशन और स्टोरेज (विटामिन, खनिज), तथा प्रतिरक्षा।
Question 2. पायसीकरण किसे कहते हैं ? इसका क्या महत्व है ?
Answer: पायसीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वसा के बड़े गोलिकाओं को पित्त लवणों की मदद से बहुत छोटे-छोटे कणों में तोड़ा जाता है। इससे वसा की सतह का क्षेत्रफल बढ़ जाता है, जिससे वसा को पचाने वाले एंजाइम (जैसे लाइपेज) उन पर अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर पाते हैं।
**इसका महत्व:** पायसीकरण का मुख्य महत्व यह है कि यह वसा के पाचन को आसान और कुशल बनाता है। छोटे वसा कणों पर एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है, जिससे वसा का पूरी तरह से पाचन और अवशोषण संभव हो पाता है। इसके बिना वसा का पाचन बहुत मुश्किल होगा।
In simple words: पायसीकरण मतलब वसा के बड़े बूंदों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना। यह पित्त की मदद से होता है और बहुत ज़रूरी है ताकि हमारा शरीर वसा को ठीक से पचा सके।
🎯 Exam Tip: पायसीकरण को वसा पाचन की प्रारंभिक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में याद रखें, जिसमें पित्त लवण की भूमिका केंद्रीय होती है।
Question 3. काइलोमाइक्रॉन क्या है ?
Answer: काइलोमाइक्रॉन छोटे लिपोप्रोटीन कण होते हैं जो आंत की कोशिकाओं में बनते हैं। जब हम वसा का सेवन करते हैं, तो वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड आंत की कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं और ट्राइग्लिसराइड में बदल जाते हैं। फिर इन ट्राइग्लिसराइड्स को प्रोटीन से घेर लिया जाता है, जिससे काइलोमाइक्रॉन नामक ये गोलिकाएँ बनती हैं। इन काइलोमाइक्रॉन का व्यास 0.1 से 3.5 NM होता है। काइलोमाइक्रॉन लसीका केशिकाओं में जाते हैं और फिर रक्तप्रवाह में मिलकर शरीर के विभिन्न हिस्सों तक वसा पहुँचाते हैं।
In simple words: काइलोमाइक्रॉन वसा के छोटे पैकेट होते हैं जो हमारे आंतों में बनते हैं। ये वसा को खून में ले जाने में मदद करते हैं ताकि शरीर उसका उपयोग कर सके।
🎯 Exam Tip: काइलोमाइक्रॉन को आंत से शरीर में आहार वसा के परिवहन का मुख्य साधन समझें और याद रखें कि ये लसीका तंत्र में अवशोषित होते हैं।
Question 4. काशिओरकॉर रोग क्या है ? इसके लक्षण बताइये।
Answer: काशिओरकॉर एक गंभीर कुपोषण का रोग है जो आहार में प्रोटीन की अत्यधिक कमी के कारण होता है, जबकि कैलोरी की मात्रा सामान्य या थोड़ी कम हो सकती है। यह आमतौर पर 1 से 3 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रभावित करता है। यह रोग अक्सर उन क्षेत्रों में देखा जाता है जहाँ बच्चे को स्तनपान जल्दी छुड़वा दिया जाता है और उसे कम प्रोटीन वाला भोजन दिया जाता है।
**लक्षण:**
1. **शारीरिक सूजन:** बच्चे के हाथ, पैर और खासकर पेट में सूजन (एडिमा) आ जाती है, जिससे पेट आगे निकल आता है।
2. **बालों में बदलाव:** बाल पतले हो जाते हैं, आसानी से टूटते हैं, और उनका रंग लाल या सफेद हो सकता है।
3. **त्वचा में बदलाव:** त्वचा काली, खुरदरी और परतदार हो सकती है, जिसमें दरारें पड़ सकती हैं।
4. **विकास में रुकावट:** शारीरिक वृद्धि और मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।
5. **चिड़चिड़ापन और अरुचि:** बच्चा चिड़चिड़ा रहता है और उसे खाने में अरुचि होती है।
सही समय पर प्रोटीन युक्त आहार देने से इस रोग का उपचार संभव है, अन्यथा यह घातक हो सकता है।
In simple words: क्वाशियोरकर प्रोटीन की कमी से होने वाला रोग है। इसमें बच्चों के शरीर और पेट में सूजन आ जाती है, बाल और त्वचा खराब हो जाते हैं। इससे उनका विकास रुक जाता है।
🎯 Exam Tip: क्वाशियोरकर को प्रोटीन की कमी (कैलोरी सामान्य) और 'सूजन' या 'एडिमा' से संबंधित याद रखें। इसके प्रमुख शारीरिक लक्षणों को लिखें।
Question 5. मैरास्मस रोग क्या है ? इसके लक्षण बताइये।
Answer: मैरास्मस या सूखा रोग एक गंभीर कुपोषण की स्थिति है जो आहार में प्रोटीन और ऊर्जा (कैलोरी) दोनों की अत्यधिक कमी के कारण होता है। यह आमतौर पर एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को प्रभावित करता है। यह तब होता है जब शरीर को पर्याप्त पोषक तत्व और ऊर्जा नहीं मिलती।
**लक्षण:**
1. **वजन में अत्यधिक कमी:** शिशु का वजन उसकी उम्र के सामान्य वजन की तुलना में 60 प्रतिशत से भी कम हो जाता है। शरीर बहुत पतला और कमज़ोर हो जाता है।
2. **सूखा और मुरझाया चेहरा:** बच्चे का चेहरा मुरझाया हुआ, सूखा और झुर्रीदार दिखता है, और आँखें अंदर धँसी हुई लगती हैं।
3. **मांसपेशियों का क्षय:** मांसपेशियाँ बहुत पतली हो जाती हैं, और हड्डियाँ (जैसे पसलियाँ) स्पष्ट दिखाई देती हैं।
4. **सूजन का अभाव:** क्वाशियोरकर के विपरीत, शरीर में कोई सूजन (एडिमा) नहीं होती है, और बाल भी अप्रभावित रहते हैं।
5. **कमज़ोरी और सुस्ती:** बच्चा अत्यधिक कमज़ोर और सुस्त रहता है।
यह रोग यदि अनुपचारित छोड़ दिया जाए तो घातक हो सकता है, लेकिन प्रोटीन युक्त आहार और कैलोरी प्रदान करके इसका उपचार संभव है।
In simple words: मैरास्मस रोग प्रोटीन और ऊर्जा दोनों की कमी से बच्चों में होता है। इसमें बच्चा बहुत दुबला-पतला हो जाता है, उसकी त्वचा झुर्रीदार हो जाती है और हड्डियाँ दिखती हैं। इसमें शरीर में सूजन नहीं होती।
🎯 Exam Tip: मैरास्मस को प्रोटीन और कैलोरी दोनों की कमी (ऊर्जा की कमी) और 'सूजन का अभाव' से संबंधित याद रखें। क्वाशियोरकर के साथ तुलना करके इसके लक्षणों को समझें।
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. मनुष्य की आहारनाल का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: मनुष्य की आहारनाल एक लंबी, कुंडलित और पेशीय नली होती है जो मुख (Mouth) से शुरू होकर गुदा (Anus) तक फैली होती है। यह भोजन के पाचन, अवशोषण और अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन का मार्ग है। जीवित अवस्था में इसकी लंबाई लगभग 4.5 मीटर होती है, जबकि मृत्यु के बाद मांसपेशियों के शिथिल होने के कारण यह 7-8 मीटर तक लंबी हो जाती है।
आहारनाल के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
1. मुख (Mouth)
2. मुख गुहिका (Buccal cavity)
3. ग्रसनी (Pharynx)
4. ग्रसिका (Oesophagus)
5. आमाशय (Stomach)
6. क्षुद्रांत (छोटी आँत)
7. वृहदांत्र (बड़ी आँत)
8. मलाशय (Rectum)
9. गुदा (Anus)
**(i) मुख तथा मुख गुहिका (Mouth and Buccal cavity):** मुख ऊपरी और निचले होंठों से घिरा होता है और यह मुख गुहिका में खुलता है। मुख गुहिका का ऊपरी भाग कठोर और कोमल तालू से बना होता है, जबकि पार्श्व में दीवारें और नीचे पेशीय जीभ पाई जाती है। जीभ की सतह पर स्वाद कलिकाएँ (Test buds) होती हैं जो खट्टे, मीठे, नमकीन और कड़वे स्वादों का ज्ञान कराती हैं। मुखद्वार अचल ऊपरी और गतिशील निचले जबड़े से घिरा होता है। दोनों जबड़ों में दांत होते हैं जो भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने और चबाने का कार्य करते हैं। मनुष्य में विषमदंती (Heterodont) प्रकार के दांत पाए जाते हैं क्योंकि दांत विभिन्न आकार-प्रकार के होते हैं। प्रत्येक जबड़े में भोजन को काटने के लिए चार क्रन्तक (Incisors), भोजन को पीसने के लिए दो रदनक (Canines), भोजन को चबाने के लिए चार अग्र चर्वणक (Premolars) तथा भोजन को तोड़ने के लिए छह चर्वणक (Molars) होते हैं। इस प्रकार एक वयस्क मनुष्य में दांतों की कुल संख्या 32 होती है। दांतों का विन्यास दन्त सूत्र से दर्शाया जाता है।
In simple words: मनुष्य की आहारनाल एक लंबी नली है जो मुख से गुदा तक जाती है। इसमें मुँह, भोजन नली, पेट, छोटी और बड़ी आँत जैसे कई अंग होते हैं। मुँह में दांत होते हैं जो भोजन को चबाते हैं, और जीभ स्वाद का पता लगाती है। यह पाचन के लिए पहला कदम है।
🎯 Exam Tip: आहारनाल के सभी प्रमुख भागों को क्रमबद्ध तरीके से याद करें और प्रत्येक भाग का मुख्य कार्य संक्षिप्त में समझाएं। चित्र बनाते समय, प्रमुख अंगों को स्पष्ट रूप से लेबल करें।
Question 8. मानव का दन्तसूत्र लिखिए।
Answer: मानव का दन्त सूत्र दांतों के प्रकार और उनकी संख्या को दर्शाता है। एक वयस्क मनुष्य में कुल 32 दांत होते हैं। डेंटल फार्मूला इस प्रकार है: \( \left[ I = \frac{2}{2}, C = \frac{1}{1}, PM = \frac{2}{2}, M = \frac{3}{3} \right] \times 2 = 32 \) यह सूत्र बताता है कि ऊपरी और निचले जबड़े के आधे हिस्से में दो कृन्तक (Incisors), एक रदनक (Canine), दो अग्र-चर्वणक (Premolars) और तीन चर्वणक (Molars) दांत होते हैं।
In simple words: मानव के दांतों को दिखाने का एक खास तरीका है, जिसमें अलग-अलग तरह के दांतों की संख्या बताई जाती है। एक बड़े इंसान के मुंह में कुल 32 दांत होते हैं।
🎯 Exam Tip: दन्त सूत्र को हमेशा सही तरीके से लिखें, जिसमें प्रत्येक प्रकार के दांतों की संख्या ऊपरी और निचले जबड़े के लिए स्पष्ट हो।
Question 9. बोलस किसे कहते हैं ?
Answer: जब भोजन मुख गुहिका (मुंह) में लार के साथ अच्छी तरह मिल जाता है और चबाने के बाद एक अर्द्धठोस गोले का रूप ले लेता है, तो उसे बोलस या निवाला कहते हैं। यह बोलस फिर निगलने के लिए तैयार होता है। लार भोजन को नरम करती है और पाचन प्रक्रिया की शुरुआत करती है।
In simple words: जब हम खाना चबाते हैं और वह लार के साथ मिलकर एक मुलायम गोला बन जाता है, तो उसे बोलस कहते हैं।
🎯 Exam Tip: बोलस की परिभाषा में 'लार मिश्रित', 'अर्द्धठोस' और 'निगलने के लिए तैयार' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग करें।
Question 10. ब्रूनर ग्रन्थियाँ किसे कहते हैं ?
Answer: ब्रूनर ग्रन्थियाँ (Brunner's gland) छोटी, कुण्डलित श्लेष्मा ग्रन्थियाँ होती हैं जो ग्रहणी (Duodenum) के अधःश्लेष्मा (submucosa) भाग में पाई जाती हैं। ये ग्रन्थियाँ क्षारीय श्लेष्मा का स्राव करती हैं, जो आमाशय से आने वाले अम्लीय काइम से ग्रहणी की परत को बचाने में मदद करता है और एंजाइमों के लिए सही pH बनाए रखता है।
In simple words: ब्रूनर ग्रन्थियाँ छोटी आंत के पहले हिस्से में पाई जाने वाली ग्रंथियाँ हैं, जो एक खास तरल बनाती हैं जो आंत को पेट के तेजाब से बचाता है।
🎯 Exam Tip: ब्रूनर ग्रन्थियों के स्थान (ग्रहणी की अधःश्लेष्मा में) और उनके कार्य (क्षारीय श्लेष्मा स्राव द्वारा सुरक्षा) को स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।
Question 11. पेयर के समूह से क्या तात्पर्य है ?
Answer: पेयर के समूह (Peyer's patches) छोटी आंत के श्लेष्मिका स्तर में पाए जाने वाले लिम्फोइड ऊतक के एकल या समूहों को कहते हैं। ये विशेष रूप से इलियम (छोटी आंत का अंतिम भाग) में अधिक होते हैं। पेयर के समूह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होते हैं और भोजन के साथ आने वाले हानिकारक जीवाणुओं से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: पेयर के समूह छोटी आंत में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के गुच्छे होते हैं। ये शरीर को बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: पेयर के समूह को 'लिम्फोइड ऊतक' के रूप में परिभाषित करें और उनके प्रतिरक्षा कार्य पर जोर दें।
Question 12. ओडाई का अवरोधिनी किसे कहते हैं?
Answer: ओडाई का अवरोधिनी (Sphincter of Oddi) एक पेशीय वाल्व होता है जो सामान्य पित्त वाहिनी (Common bile duct) और अग्नाशयी वाहिनी के ग्रहणी में खुलने वाले बिंदु को नियंत्रित करता है। यह पित्त और अग्नाशयी रस के प्रवाह को नियंत्रित करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि वे सही समय पर और सही मात्रा में पाचन के लिए ग्रहणी में पहुँचें। यह भोजन के पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
In simple words: ओडाई का अवरोधिनी एक प्रकार का दरवाजा है जो पित्त और अग्नाशय के रसों को छोटी आंत में आने देता है, ताकि पाचन सही से हो सके।
🎯 Exam Tip: ओडाई के अवरोधिनी के स्थान (पित्त और अग्नाशयी वाहिनी का ग्रहणी में खुलने का बिंदु) और उसके कार्य (पित्त और अग्नाशयी रस के प्रवाह का नियंत्रण) को बताएं।
RBSE Class 12 Biology Chapter 22 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. यकृत के कार्य लिखिए।
Answer: यकृत मानव शरीर की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथियों में से एक है, जो कई आवश्यक कार्य करता है:
- **पाचन में सहायता:** यकृत पित्त रस का उत्पादन करता है, जो वसा के पायसीकरण में मदद करता है, जिससे वसा का पाचन और अवशोषण आसान हो जाता है।
- **ग्लाइकोजन का संग्रह और विनियमन:** यह अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहीत करता है (ग्लाइकोजेनेसिस)। जब शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, तो यह ग्लाइकोजन को वापस ग्लूकोज में बदल देता है (ग्लाइकोजिनोलाइसिस)।
- **प्रोटीन और वसा का चयापचय:** यकृत अमीनो अम्ल से ग्लूकोज (ग्लूकोनिओजेनेसिस) बना सकता है और प्रोटीन के विभिन्न घटकों को संश्लेषित करता है। यह वसा के चयापचय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- **विषाक्त पदार्थों का निराकरण:** यह रक्त से अल्कोहल, दवाओं और अन्य हानिकारक पदार्थों को फ़िल्टर करके उन्हें निष्क्रिय करता है।
- **यूरिया का निर्माण:** अमोनिया जैसे हानिकारक पदार्थों को कम विषैले यूरिया में परिवर्तित करता है, जिसे फिर गुर्दे द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
- **विटामिन और खनिजों का भंडारण:** यकृत विटामिन ए, डी, ई, के और बी12 के साथ-साथ लौह और तांबे जैसे खनिजों को भी संग्रहीत करता है।
- **रक्त प्रोटीन का संश्लेषण:** यह एल्बुमिन, ग्लोबुलिन, और रक्त के थक्के बनाने वाले कारक जैसे फाइब्रिनोजन और प्रोथोम्बिन जैसे कई रक्त प्रोटीन बनाता है।
- **कुफ्फर कोशिकाएं:** यकृत में विशेष कुफ्फर कोशिकाएं होती हैं जो पुराने और क्षतिग्रस्त लाल रक्त कोशिकाओं और जीवाणुओं को नष्ट करती हैं, जिससे रक्त को साफ रखने में मदद मिलती है।
In simple words: यकृत हमारे शरीर का एक बड़ा अंग है जो खाने को पचाने, शरीर से गंदगी निकालने, ऊर्जा जमा करने और खून बनाने में मदद करता है। यह कई जरूरी काम करता है।
🎯 Exam Tip: यकृत के कार्यों को सूची के रूप में प्रस्तुत करें और प्रत्येक कार्य का एक संक्षिप्त विवरण दें, जैसे पाचन, संग्रह, निराकरण और संश्लेषण।
Question 2. मनुष्य के दन्त का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: मनुष्य के दन्त मुख गुहिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो भोजन को चबाने और तोड़ने में मदद करते हैं। एक वयस्क मनुष्य में कुल 32 दांत होते हैं, और उन्हें विषमदन्ती (heterodont) कहा जाता है क्योंकि वे अलग-अलग आकार और कार्यों के होते हैं।
**दाँतों के प्रकार (Types of Teeth):**
- **कृन्तक (Incisors):** ये सामने के चपटे दांत होते हैं, जिनकी संख्या ऊपरी और निचले जबड़े में कुल 8 (4+4) होती है। इनका मुख्य कार्य भोजन को काटना है।
- **रदनक (Canines):** ये नुकीले दांत होते हैं, जो कृन्तक के बगल में स्थित होते हैं, जिनकी संख्या कुल 4 (2+2) होती है। ये भोजन को फाड़ने के काम आते हैं।
- **अग्र-चर्वणक (Premolars):** ये रदनक के पीछे होते हैं और इनकी संख्या कुल 8 (4+4) होती है। ये भोजन को पीसने और चबाने में मदद करते हैं।
- **चर्वणक (Molars):** ये सबसे पीछे और बड़े दांत होते हैं, इनकी संख्या कुल 12 (6+6) होती है। ये भोजन को अच्छी तरह से पीसने और बारीक करने का काम करते हैं।
**दन्त सूत्र (Dental Formula):** मानव का दन्त सूत्र है: \( \left[ I = \frac{2}{2}, C = \frac{1}{1}, PM = \frac{2}{2}, M = \frac{3}{3} \right] \times 2 = 32 \)
**दाँत की संरचना (Structure of Tooth):** प्रत्येक दाँत तीन मुख्य भागों से मिलकर बना होता है:
- **शिखर (Crown):** यह दाँत का वह भाग है जो मसूड़े के ऊपर दिखाई देता है और इनेमल नामक शरीर के सबसे कठोर पदार्थ से ढका होता है।
- **ग्रीवा (Neck):** यह वह संकरा भाग है जो शिखर और मूल के बीच स्थित होता है, जहाँ दाँत मसूड़े से मिलता है।
- **मूल (Root):** यह दाँत का वह भाग है जो जबड़े की हड्डी में धँसा होता है और दाँत को मजबूती से अपनी जगह पर रखता है। मूल सीमेंटम नामक पदार्थ से ढका होता है।
In simple words: हमारे दांत कई तरह के होते हैं जैसे काटने वाले, फाड़ने वाले और पीसने वाले। हर दांत के तीन मुख्य हिस्से होते हैं - ऊपर का चमकीला हिस्सा (शिखर), बीच का हिस्सा (ग्रीवा) और हड्डी के अंदर का हिस्सा (मूल)।
🎯 Exam Tip: दांतों के प्रकार और उनके कार्य, दन्त सूत्र, और प्रत्येक भाग के साथ दांत की संरचना का स्पष्ट वर्णन करें। स्वच्छ और सटीक आरेख शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण है।
Question 3. मनुष्य में पचे हुए भोजन का अवशोषण कहाँ और कैसे। होता है ?
Answer: मनुष्य में पचे हुए भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से छोटी आंत में होता है, लेकिन कुछ पदार्थ आमाशय और बड़ी आंत में भी अवशोषित होते हैं। यह प्रक्रिया कई तरीकों से होती है:
**1. अवशोषण के स्थान:**
- **छोटी आंत (Small Intestine):** यह अवशोषण का मुख्य स्थान है। इसकी अंदरूनी सतह पर लाखों छोटे, उंगली जैसे उभार होते हैं जिन्हें रसांकुर (villi) कहते हैं। इन रसांकुरों पर भी बहुत छोटे सूक्ष्मांकुर (microvilli) होते हैं, जो अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र को लगभग 100 गुना बढ़ा देते हैं। अधिकांश पोषक तत्व जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसीय अम्ल, मोनोग्लिसराइड, विटामिन और खनिज यहीं अवशोषित होते हैं।
- **आमाशय (Stomach):** कुछ वसा में घुलनशील पदार्थ, जैसे अल्कोहल और कुछ दवाएं, आमाशय की दीवार से सीधे अवशोषित हो जाती हैं।
- **बड़ी आंत (Large Intestine):** यहाँ मुख्य रूप से पानी, कुछ इलेक्ट्रोलाइट्स और कुछ विटामिन (जैसे विटामिन K) का अवशोषण होता है।
**2. अवशोषण की क्रियाविधियाँ:**
- **विसरण (Diffusion):** कुछ पोषक तत्व, जैसे वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड, कोशिका झिल्ली के पार उच्च सांद्रता से कम सांद्रता की ओर चले जाते हैं। यह ऊर्जा के बिना होता है। पानी का अवशोषण परासरण (osmosis) द्वारा होता है।
- **सक्रिय अभिगमन (Active Transport):** ग्लूकोज और अमीनो अम्ल जैसे पोषक तत्वों को रक्त में सक्रिय रूप से ले जाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया कम सांद्रता से उच्च सांद्रता की ओर पदार्थों को ले जाने में भी मदद करती है।
- **सुसाध्य विसरण (Facilitated Diffusion):** कुछ पदार्थ, जैसे फ्रक्टोज, वाहक प्रोटीन की मदद से कोशिका झिल्ली के पार चले जाते हैं, लेकिन इसमें ऊर्जा का उपयोग नहीं होता है।
**3. वसा अवशोषण का विशेष तरीका:** वसा (वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड) सीधे रक्त में नहीं जा सकती। पहले, पित्त लवण की मदद से वसा का पायसीकरण (emulsification) होता है। फिर, वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड पित्त लवणों के साथ मिलकर छोटी-छोटी संरचनाएं बनाते हैं जिन्हें मिसेल (micelles) कहते हैं। ये मिसेल छोटी आंत की कोशिकाओं में प्रवेश करती हैं। कोशिका के अंदर, वे फिर से ट्राइग्लिसराइड्स में बदल जाते हैं और प्रोटीन से घिरकर काइलोमाइक्रॉन (chylomicrons) बनाते हैं। काइलोमाइक्रॉन बहुत बड़े होते हैं, इसलिए वे रक्त केशिकाओं में नहीं जा पाते। इसके बजाय, वे लसिका केशिकाओं (lacteals) में छोड़ दिए जाते हैं और फिर धीरे-धीरे रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं। शरीर के कोशिकाओं तक पहुँचने के बाद, लिपोप्रोटीन लाइपेज एंजाइम काइलोमाइक्रॉन से वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड को छोड़ देता है, जिनका उपयोग ऊर्जा या भंडारण के लिए होता है।
In simple words: हमारा शरीर पचे हुए भोजन के पोषक तत्वों को ज्यादातर छोटी आंत में सोखता है। यह काम रसांकुर नाम की छोटी उंगलियों जैसी संरचनाओं से होता है। पोषक तत्व या तो सीधे कोशिकाओं से होकर गुजरते हैं, या विशेष दरवाजों (प्रोटीन) की मदद से अंदर जाते हैं, या फिर ऊर्जा खर्च करके अंदर खींचे जाते हैं। वसा एक खास तरीके से सोखी जाती है, जिसमें वह पहले छोटी-छोटी बूंदों में बदलती है, फिर मिसेल और काइलोमाइक्रॉन बनाती है, और अंत में खून में मिलती है।
🎯 Exam Tip: अवशोषण के मुख्य स्थान (छोटी आंत), विभिन्न पोषक तत्वों के लिए उपयोग की जाने वाली विभिन्न क्रियाविधियां (विसरण, सक्रिय अभिगमन) और वसा के अवशोषण की विशेष प्रक्रिया (मिसेल और काइलोमाइक्रॉन) को विस्तार से बताएं।
Question 3. मनुष्य में पचे हुए भोजन का अवशोषण कहाँ और कैसे होता है?
Answer: पचे हुए भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से छोटी आंत में होता है। इसमें खाद्य पदार्थ, विटामिन, लवण और जल जैसे पोषक तत्वों को आंत की उपकला कोशिकाओं के माध्यम से रक्त या लसीका में पहुँचाया जाता है। वसा में घुलनशील कुछ पदार्थ, अल्कोहल और दवाएं आमाशय में भी अवशोषित हो सकती हैं, जबकि जल का अवशोषण मुख्य रूप से बड़ी आंत में होता है।
छोटी आंत की अंदरूनी दीवार पर कई वलन, लाखों छोटे रसांकुर (villi) और उनकी उपकला कोशिकाओं पर सूक्ष्मांकुर (microvilli) होते हैं। इन संरचनाओं के कारण अवशोषण के लिए उपलब्ध सतह का क्षेत्रफल लगभग 100 गुना बढ़ जाता है। इन सूक्ष्मांकुरों से एक 'बुश बॉर्डर' बनता है। हर रसांकुर में एक केंद्रीय लसीका केशिका (जिसे लैक्टियल कहते हैं) और रक्त केशिकाएं होती हैं। पाचन के अंतिम उत्पाद, जैसे कि मोनोसैकेराइड (ग्लूकोज, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस), ऐमीनो अम्ल, मोनोग्लिसराइड और वसीय अम्ल, मुख्य रूप से इन सतहों पर अवशोषित होते हैं।
अवशोषण की मुख्य क्रियाविधि सक्रिय अभिगमन (Active transport) और विसरण (Diffusion) हैं। ऐमीनो अम्ल और ग्लूकोज का अवशोषण सक्रिय अभिगमन द्वारा रक्त में होता है।
वसा का अवशोषण वसीय अम्लों, मोनोग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल के रूप में विसरण द्वारा लसीका (lymph) में होता है। पित्त अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वसाओं के साथ पित्त मिलकर छोटी जटिल संरचनाएं बनाता है जिन्हें मिसेल (Micelles) कहते हैं। मिसेल काइम में घुलनशील होते हैं। हर मिसेल वसा और पित्त लवणों की छोटी गोलाकार या बेलनाकार गोलियां होती हैं, जिनका व्यास 3 से 6 µm होता है। इन गोलिकाओं के केंद्रीय भाग में वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड होते हैं, जिनके चारों ओर पित्त लवण जमा होते हैं। जब मिसेल सूक्ष्मांकुर (Microvilli) के पास आते हैं तो वसा कोशिका झिल्ली में घुल जाते हैं। ये अवशोषित वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड कोशिका के अंदर ट्राइग्लिसराइड में बदल जाते हैं। फिर ये ट्राइग्लिसराइड प्रोटीन से घिरकर काइलोमाइक्रॉन (व्यास 0.1 से 3.5 µm) बनाते हैं। ये काइलोमाइक्रॉन बहिकोशिका लयन (Exocytosis) द्वारा कोशिका से बाहर निकलकर लसीका केशिका में चले जाते हैं। ये लसीका तंत्र से होते हुए रक्त प्लाज्मा में पहुँच जाते हैं, जहाँ लिपोप्रोटीन लाइपेस की मदद से ये वसा अम्लों और मोनोग्लिसराइड में बदल दिए जाते हैं। विटामिन और लवण सक्रिय या निष्क्रिय विधि से अवशोषित होते हैं। जल का अवशोषण केवल परासरण (Osmosis) द्वारा होता है, और बड़ी आंत में जल तथा कुछ विटामिन (जैसे विटामिन K) अवशोषित होते हैं।
चित्र 22.5 (अ) अवशोषण की सोडियम सह-अभिगमन प्रक्रिया
चित्र 22.5 (ब) वसा अवशोषण की प्रक्रिया
🎯 Exam Tip: अवशोषण की प्रक्रिया के मुख्य स्थान (छोटी आंत, बड़ी आंत, आमाशय) और उसमें शामिल प्रमुख तंत्र (सक्रिय अभिगमन, विसरण) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. मनुष्य में आंत्रीय पाचन का सविस्तार वर्णन कीजिए।
Answer: मानव के पाचन तंत्र की क्रियाविधि को समझने के लिए इसे कई चरणों में बांटा जा सकता है। ये मुख्य चरण हैं:
1. अंतर्ग्रहण (Ingestion): भोजन को शरीर के अंदर लेना।
2. पाचन (Digestion): बड़े भोजन कणों को छोटे कणों में तोड़ना।
3. अवशोषण (Absorption): पचे हुए भोजन को रक्त या लसीका में मिलाना।
4. स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषित भोजन का उपयोग ऊर्जा या शरीर निर्माण के लिए करना।
5. बहिःक्षेपण (Egestion): बिना पचे हुए भोजन को शरीर से बाहर निकालना।
अब इन चरणों को विस्तार से समझते हैं:
1. अंतर्ग्रहण (Ingestion):
मनुष्य एक सर्वाहारी प्राणी है, जो भोजन को दो मुख्य चरणों में अंदर लेता है- चबाना और निगलना। दांत भोजन को छोटे टुकड़ों में काटते और पीसते हैं, जबकि जीभ उसे लार के साथ मिलाती है। लार में मिले भोजन का अर्ध-ठोस गोला 'बोलस' कहलाता है। मुंह में भोजन की उपस्थिति से चबाने की क्रिया शुरू हो जाती है।
2. पाचन (Digestion):
यह क्रिया आहारनाल के अलग-अलग भागों में होती है:
(a) मुखगुहिका में पाचन (Digestion in Buccal Cavity): लार ग्रंथियों से लार निकलती है, जिसका pH लगभग 6.8 (हल्का अम्लीय) होता है। लार में 'एमाइलेज' एंजाइम कार्बोहाइड्रेट का पाचन शुरू करता है, जिससे स्टार्च माल्टोस और डेक्सट्रिन में टूट जाता है। लार में बाइकार्बोनेट आयन भोजन के अम्लीय प्रभाव को कम करते हैं। मुंह में भोजन कम समय के लिए रहता है, इसलिए स्टार्च का केवल थोड़ा सा ही पाचन हो पाता है।
\( \text{स्टार्च (पॉलिसैकेराइड)} \xrightarrow{\text{एमाइलेज, pH 6-7}} \text{माल्टोस} + \text{डेक्सट्रिन (डाइसैकेराइड)} \)
(b) आमाशय में पाचन (Digestion in Stomach): आमाशय भोजन को मथता है और इसमें जठर रस मिलाता है। भोजन लगभग 3-4 घंटे तक आमाशय में रहता है। प्रोटीन का आंशिक पाचन यहीं होता है। जठर रस में HCl, श्लेष्मा, पेप्सिनोजन और थोड़ी मात्रा में गैस्ट्रिक लाइपेस होते हैं। HCl के कारण जठर रस बहुत अम्लीय (pH 1-2) होता है, जिससे भोजन का pH कम हो जाता है। यह अम्लीय वातावरण लार के एमाइलेज एंजाइम की क्रिया को रोक देता है और भोजन में मौजूद जीवाणुओं को नष्ट करता है। यह भोजन के कठोर भागों को भी नरम करता है। पेप्सिनोजन, जो निष्क्रिय रूप में होता है, HCl की मदद से सक्रिय 'पेप्सिन' में बदल जाता है। सक्रिय पेप्सिन प्रोटीन को प्रोटियोस, पेप्टोन और कुछ पॉलीपेप्टाइड में तोड़ देता है।
आमाशय में पेप्सिन मुख्य प्रोटीन पाचक एंजाइम है। वसा पाचन के लिए जठर लाइपेस एक कमजोर एंजाइम है, जो वसा का बहुत कम पाचन कर पाता है। यह मक्खन में मौजूद वसा (ट्राइब्यूटाइरीन) को वसीय अम्ल में बदल देता है। आमाशय में पाचन के बाद भोजन पतले लेई जैसे पदार्थ 'काइम' में बदल जाता है।
\( \text{दुग्ध वसा} + \text{जठर लाइपेज} \rightarrow \text{वसीय अम्ल} + \text{ग्लिसरॉल} \)
HCl इतना मजबूत अम्ल होने के बावजूद आमाशय की दीवार को नुकसान नहीं पहुंचाता, क्योंकि आमाशय की दीवार पर श्लेष्मा (Mucosa) की एक मोटी परत होती है। यह परत HCl को आमाशय की कोशिकाओं तक पहुंचने से रोकती है, जिससे कोई क्षति नहीं होती।
(c) छोटी आँत में पाचन (Digestion in Small Intestine): आंशिक रूप से पचे हुए प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट वाला अम्लीय काइम (अर्ध-तरल) धीरे-धीरे ग्रहणी में आता है। ग्रहणी में ब्रूनर ग्रंथियां एंजाइम-रहित, क्षारीय तरल (बाइकार्बोनेट युक्त) और बहुत ज़्यादा श्लेष्मा निकालती हैं। यह क्षारीय तरल (pH = 8-9) ग्रहणी की दीवार को अम्लीय जठर रस से बचाता है।
अग्न्याशयी रस और पित्त रस भी ग्रहणी में आते हैं। इनमें मौजूद बाइकार्बोनेट काइम को उदासीन करके उसकी अम्लीयता कम करते हैं।
आंत्र रस में बहुत सारा पानी और विद्युत अपघट्य होता है, लेकिन पाचक एंजाइम बहुत कम होते हैं। यह हल्का क्षारीय (pH = 7.5 – 8) तरल होता है। आंत्र ग्रंथियों की एंटरोसाइट कोशिकाएं पाचक एंजाइम बनाती हैं, जो पाचन क्रिया को पूरा करते हैं। पाचन का ज़्यादातर काम ग्रहणी में ही पूरा हो जाता है, जबकि आंत्र के बाकी हिस्से में अवशोषण होता है। इसके लिए भोजन आंत्र में लगभग 4-5 घंटे तक रहता है।
पित्त लवण (पित्त अम्ल और सोडियम, पोटैशियम के लवण) और लेसीथिन वसा के पायसीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये प्राकृतिक डिटर्जेंट के रूप में काम करते हैं। पित्त लवण और लेसीथिन अणुओं का एक हिस्सा ध्रुवीय होता है और दूसरा अध्रुवीय। अध्रुवीय हिस्सा वसा की बूंदों की सतह में घुल जाता है, और ध्रुवीय हिस्सा भोजन में मौजूद पानी में घुलनशील रहता है। इस क्रिया से वसा की बूंदों का पृष्ठ तनाव कम हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी वसा की बूंदें छोटे आकार (1 µm) की बूंदों में टूट जाती हैं। इस क्रिया को वसा का पायसीकरण (Emulsification) कहते हैं। पायसीकृत वसा पर एंजाइम तेज़ी से काम करते हैं।
अग्नाशयी रस में प्रोटीन पाचक एंजाइम जैसे ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन, कार्बोक्सीपेप्टीडेस और इलास्टेस निष्क्रिय रूप में मौजूद होते हैं। सबसे पहले, आंत्र में मौजूद एंजाइम एंटरोकाइनेज की मदद से निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन सक्रिय ट्रिप्सिन में बदल जाता है। यह सक्रियण कई अन्य निष्क्रिय एंजाइमों को सक्रिय करता है। इलास्टेस भोजन में मौजूद इलास्टिन तंतुओं का पाचन करता है।
अग्नाशयी एमाइलेज स्टार्च, ग्लाइकोजन और अन्य कार्बोहाइड्रेट अणुओं को पानी में घोलकर माल्टोस और ओलिगोसैकेराइड में बदल देता है। यह एक बहुत शक्तिशाली एंजाइम है जो ग्रहणी में मौजूद सभी स्टार्च को लगभग आधे घंटे में पचा देता है।
अग्नाशयी रस में लाइपेस एंजाइम बड़ी मात्रा में होता है। यह एंजाइम भोजन में मौजूद सभी ट्राइग्लिसराइड को कुछ मिनटों में ही पचा देता है। कोलेस्ट्रॉल एस्टर और फॉस्फोलिपिड को पानी में घोलकर उनसे वसीय अम्लों को अलग कर दिया जाता है। राइबोन्यूक्लिऐज और डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिऐज क्रमशः RNA और DNA को न्यूक्लिओटाइड्स में बदल देते हैं।
यहाँ कुछ मुख्य एंजाइमी अभिक्रियाएं दी गई हैं:
\( \text{प्रा-कार्बोक्सि पेप्टीडेस (निष्क्रिय)} \xrightarrow{\text{ट्रिप्सिन}} \text{कार्बोक्सि पेप्टीडेस (सक्रिय)} \)
\( \text{प्रोइलैस्टेस (निष्क्रिय)} \xrightarrow{} \text{इलैस्टेस (सक्रिय)} \)
\( \text{प्रोटियोस, पेप्टोन} \xrightarrow{\text{ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन, pH=7}} \text{छोटे पॉलिपेप्टाइड, ट्राइपेप्टाइड एवं डाइपेप्टाइड} \)
\( \text{पॉलिपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{ऐमीनो पेप्टीडेस, pH=8.5}} \text{डाइपेप्टाइड तथा ऐमीनो अम्ल} \)
\( \text{छोटे पॉलिपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{कार्बोक्सी पेप्टीडेस, pH=7}} \text{ऐमीनो अम्ल, डाइपेप्टाइड} \)
\( \text{पायसीकृत वसा (ट्राइग्लिसराइड)} \xrightarrow{\text{लाइपेस, pH=7}} \text{वसा अम्ल एवं 2-मोनोग्लिसराइड} \)
\( \text{लैक्टोस} \xrightarrow{\text{लैक्टेस, pH=8.5}} \text{ग्लूकोस} + \text{गैलेक्टोस} \)
\( \alpha\text{-सीमित डेक्सट्रिन} \xrightarrow{\alpha\text{-सीमित डेक्सट्रिनेस, pH=8.5}} \text{ग्लूकोस} \)
\( \text{पॉलिपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{ऐमीनो पेप्टीडेस, pH=8.5}} \text{डाइपेप्टाइड तथा ऐमीनो अम्ल} \)
\( \text{डाइपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{डाइपेप्टीडेस, pH=8.5}} \text{ऐमीनो अम्ल} \)
\( \text{ट्राइग्लिसराइड (पायसीकृत)} \xrightarrow{\text{आंत्रीय लाइपेस, pH=8.5}} \text{वसा अम्ल तथा 2-मोनोग्लिसराइड} \)
| भाग | एंजाइम | सब्सट्रेट | उत्पाद |
|---|---|---|---|
| अग्न्याशय | ट्रिप्सिन (ट्रिप्सिनोजन) | प्रोटीन, प्रोटियोस आदि | छोटे पॉलिपेप्टाइड, ट्राइपेप्टाइड, डाइपेप्टाइड |
| काइमोट्रिप्सिन (काइमोट्रिप्सिनोजन) | प्रोटीन, प्रोटियोस आदि | छोटे पॉलिपेप्टाइड, ट्राइपेप्टाइड, डाइपेप्टाइड | |
| कार्बोक्सीपेप्टीडेस (प्रोकार्बोक्सीपेप्टीडेस) | छोटी पॉलिपेप्टाइड, डाइपेप्टाइड | ऐमीनो अम्ल, बड़े, छोटे | |
| इलास्टेस (प्रोइलास्टेस) | इलास्टिन | पॉलिपेप्टाइड | |
| लाइपेस | ट्राइग्लिसराइड | वसा अम्ल, मोनोग्लिसराइड | |
| \( \alpha \)-एमिलेस | स्टार्च | माल्टोस, माल्टोट्रायोस एवं \( \alpha \)-सीमित डेक्सट्रिन | |
| आंत्र श्लेष्मिका | न्यूक्लिऐस | न्यूक्लिक अम्ल | न्यूक्लिओटाइड |
| ऐमीनोपेप्टीडेस | छोटी पॉलिपेप्टाइड, डाइपेप्टाइड | ऐमीनो अम्ल, डाइपेप्टाइड | |
| डाइपेप्टीडेस | डाइपेप्टाइड | दो ऐमीनो अम्ल | |
| माल्टेस | माल्टोस, माल्टोट्रायोस | ग्लूकोस | |
| लैक्टेस | लैक्टोस | ग्लूकोस, गैलेक्टोस | |
| सुक्रेस | सुक्रेस | ग्लूकोस, फ्रक्टोस | |
| \( \alpha \)-सीमित डेक्सट्रिनेस | \( \alpha \)-सीमित डेक्सट्रिन | ग्लूकोस |
3. अवशोषण (Absorption):
पचे हुए भोजन के पदार्थों (जैसे पोषक तत्व, विटामिन, लवण और जल) को आंत की उपकला कोशिकाओं से रक्त या लसीका में ले जाने की प्रक्रिया को अवशोषण कहते हैं। ज़्यादातर पदार्थ छोटी आंत में अवशोषित होते हैं। वसा में घुलनशील कुछ पदार्थ, अल्कोहल और दवाएं आमाशय में अवशोषित हो सकती हैं। जल का अवशोषण मुख्य रूप से बड़ी आंत में होता है।
छोटी आंत की अंदरूनी दीवार पर कई वलन, लाखों छोटे रसांकुर (villi) और उनकी उपकला कोशिकाओं पर सूक्ष्मांकुर (microvilli) होते हैं। इन संरचनाओं के कारण अवशोषण के लिए उपलब्ध सतह का क्षेत्रफल लगभग 100 गुना बढ़ जाता है। इन सूक्ष्मांकुरों से एक 'बुश बॉर्डर' बनता है। हर रसांकुर में एक केंद्रीय लसीका केशिका (जिसे लैक्टियल कहते हैं) और रक्त केशिकाएं होती हैं। पाचन के अंतिम उत्पाद, जैसे कि मोनोसैकेराइड (ग्लूकोज, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस), ऐमीनो अम्ल, मोनोग्लिसराइड और वसीय अम्ल, मुख्य रूप से इन सतहों पर अवशोषित होते हैं।
अवशोषण की मुख्य क्रियाविधि सक्रिय अभिगमन (Active transport) और विसरण (Diffusion) हैं। ऐमीनो अम्ल और ग्लूकोज का अवशोषण सक्रिय अभिगमन द्वारा रक्त में होता है।
वसा का अवशोषण वसीय अम्लों, मोनोग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल के रूप में विसरण द्वारा लसीका (lymph) में होता है। पित्त अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वसाओं के साथ पित्त मिलकर छोटी जटिल संरचनाएं बनाता है जिन्हें मिसेल (Micelles) कहते हैं। मिसेल काइम में घुलनशील होते हैं। हर मिसेल वसा और पित्त लवणों की छोटी गोलाकार या बेलनाकार गोलियां होती हैं, जिनका व्यास 3 से 6 µm होता है। इन गोलिकाओं के केंद्रीय भाग में वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड होते हैं, जिनके चारों ओर पित्त लवण जमा होते हैं। जब मिसेल सूक्ष्मांकुर (Microvilli) के पास आते हैं तो वसा कोशिका झिल्ली में घुल जाते हैं।
चित्र 22.5 (अ) अवशोषण की सोडियम सह-अभिगमन प्रक्रिया
चित्र 22.5 (ब) वसा अवशोषण की प्रक्रिया
🎯 Exam Tip: अवशोषण की प्रक्रिया के मुख्य स्थान (छोटी आंत, बड़ी आंत, आमाशय) और उसमें शामिल प्रमुख तंत्र (सक्रिय अभिगमन, विसरण) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
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