RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 2 नर एवं मादा युग्मकोभिद-संरचना व विकास

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Detailed Chapter 2 नर एवं मादा युग्मकोभिद-संरचना व विकास RBSE Solutions for Class 12 Biology

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Class 12 Biology Chapter 2 नर एवं मादा युग्मकोभिद-संरचना व विकास RBSE Solutions PDF

RBSE Solutions For Class 12 Biology Chapter 2 Pathyapustak Ke Prashnottar

RBSE Solutions For Class 12 Biology Chapter 2 Bahuvikalpiya Prashn

 

Question 1. परागकोष के सबसे भीतरी स्तर टेपीटम का कार्य है -
(अ) स्फुटन
(ब) सुरक्षा
(स) पोषण
(द) यांत्रिकीय
Answer: (स) पोषण
In simple words: टेपीटम परागकोष की सबसे अंदरूनी परत है. इसका मुख्य काम परागकणों को बढ़ने और विकसित होने के लिए पोषण देना है.

🎯 Exam Tip: टेपीटम परागकोष की एक महत्वपूर्ण परत है जो विकासशील परागकणों को पोषक तत्व प्रदान करती है, जिससे उनके सही विकास में मदद मिलती है।

 

Question 3. 100 परागकण उत्पन्न करने के लिये कितने अर्द्धसूत्री विभाजन परागकोष में आवश्यक होंगे?
(अ) 100
(ब) 75
(स) 50
(द) 25
Answer: (स) 50
In simple words: परागकोष में, एक अर्द्धसूत्री विभाजन से चार परागकण बनते हैं. इसलिए, 100 परागकण बनाने के लिए, 25 अर्द्धसूत्री विभाजन की जरूरत होगी, क्योंकि हर विभाजन 4 परागकण देता है.

🎯 Exam Tip: हमेशा याद रखें कि एक लघुबीजाणु मातृ कोशिका (PMC) में एक अर्धसूत्री विभाजन से चार लघुबीजाणु बनते हैं।

 

Question 4. मादा युग्मकोभिद् है -
(अ) भ्रूण
(ब) भ्रूणकोष
(स) भ्रूणपोष
(द) सहायक कोशिका

🎯 Exam Tip: मादा युग्मकोभिद् को भ्रूणकोष के नाम से भी जाना जाता है और यह पौधों में लैंगिक प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. परिपक्व पॉलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष में पाये जाते हैं –
(अ) सात कोशिकाएँ तथा आठ केन्द्रक
(ब) सात केन्द्रक एवं आठ कोशिकाएँ
(स) आठ कोशिकाएँ एवं आठ केन्द्रक
(द) सात कोशिकाएँ एवं सात केन्द्रक

🎯 Exam Tip: पॉलीगोनम प्रकार का भ्रूणकोष आवृतबीजी पौधों में सबसे आम भ्रूणकोष है, जिसकी संरचना को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. आवृतबीजी पादपों में एक परागकण में कितने नर युग्मक बनते हैं।
(अ) एक
(ब) दो
(स) तीन
(द) चार

🎯 Exam Tip: परागकण के अंकुरण के बाद बनने वाले नर युग्मकों की संख्या निषेचन प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करती है।

RBSE Solutions For Class 12 Biology Chapter 2 Atilaghuttaratmak Prashn

 

Question 1. टेपीटम कितने प्रकार की होती है? उनके नाम बताइए।
Answer: टेपीटम दो प्रकार की होती है. इनके नाम हैं: अमीबीय टेपीटम और ग्रन्थिल (या स्रावी) टेपीटम. ये दोनों परागकणों को पोषण देने का काम करती हैं.
In simple words: टेपीटम दो तरह की होती है: अमीबीय और ग्रन्थिल. दोनों ही परागकणों को बढ़ने में मदद करती हैं.

🎯 Exam Tip: टेपीटम परागकोष की सबसे भीतरी परत है और यह परागकणों के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

Question 2. पोलन किट क्या है?
Answer: पोलन किट एक तैलीय परत है जो कई कीट-परागित फूलों के परागकणों की सतह पर पाई जाती है. यह परत परागकणों को चिपचिपा बनाती है, जिससे वे कीटों से आसानी से चिपक जाते हैं और परागण में मदद मिलती है.
In simple words: पोलन किट एक चिपचिपी परत है जो कीटों द्वारा परागित होने वाले फूलों के परागकणों पर होती है, ताकि वे कीटों से चिपक सकें.

🎯 Exam Tip: पोलन किट का मुख्य कार्य परागकणों को कीटों द्वारा परागित होने में मदद करना और उन्हें सूखने से बचाना है।

 

Question 3. पराग नलिका परागकण के किस स्थल से बाहर निकलती है?
Answer: पराग नलिका परागकण के जनन छिद्र (Germ pore) से बाहर निकलती है. ये छिद्र परागकण की बाहरी मोटी परत (बाह्यचोल) पर होते हैं और यहाँ से पराग नलिका बाहर आती है.
In simple words: पराग नलिका परागकण के जनन छिद्र से निकलती है.

🎯 Exam Tip: जनन छिद्र वह स्थान है जहाँ से पराग नलिका बाहर निकलती है, क्योंकि यहाँ बाह्यचोल अनुपस्थित होता है।

 

Question 4. अण्ड समुच्चय क्या होता है?
Answer: अण्ड समुच्चय भ्रूणकोष के बीजाण्डद्वारी छोर पर स्थित तीन कोशिकाओं का एक समूह है. इसमें एक अण्ड कोशिका और दो सहायक कोशिकाएँ होती हैं. यह निषेचन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
In simple words: अण्ड समुच्चय भ्रूणकोष के एक सिरे पर तीन कोशिकाओं का समूह है, जिसमें अण्ड कोशिका और सहायक कोशिकाएँ होती हैं.

🎯 Exam Tip: अण्ड समुच्चय में एक अण्ड कोशिका और दो सहायक कोशिकाएँ होती हैं, जो निषेचन और पराग नलिका को निर्देशित करने में सहायक होती हैं।

 

Question 5. द्वितीयक केन्द्रक कैसे बनता है?
Answer: भ्रूणकोष में, दोनों ध्रुवों से एक-एक केन्द्रक मध्य में आकर आपस में मिल जाते हैं. इस मिलन से ही द्वितीयक केन्द्रक बनता है. यह केन्द्रक बाद में भ्रूणपोष बनाने में मदद करता है.
In simple words: द्वितीयक केन्द्रक भ्रूणकोष के दो ध्रुवीय केन्द्रकों के आपस में मिलने से बनता है.

🎯 Exam Tip: द्वितीयक केन्द्रक, प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक (PEN) बनाने के लिए नर युग्मक के साथ जुड़कर दोहरा निषेचन पूरा करता है।

 

Question 6. नागफनी में किस प्रकार का बीजाण्ड पाया जाता है।
Answer: नागफनी में कुंडलित बीजाण्ड (Circinotropous Ovule) पाया जाता है. इसमें बीजाण्डवृन्त बहुत लंबा होता है और बीजाण्ड को चारों ओर से घेर लेता है.
In simple words: नागफनी में कुंडलित बीजाण्ड होता है, जहाँ बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड को पूरी तरह से लपेटे रहता है.

🎯 Exam Tip: कुंडलित बीजाण्ड एक असामान्य प्रकार का बीजाण्ड है जिसमें बीजाण्डवृन्त अत्यधिक लंबा होकर बीजाण्ड को 360° तक घेर लेता है।

Main Functions Of Tapetum

  • यह विकासशील बीजाणुजन कोशिकाओं, बीजाणुमातृ कोशिकाओं और बढ़ते सूक्ष्मबीजाणुओं को पोषण देता है.
  • यह एन्जाइम और हार्मोन (IAA) बनाता है जो परागकणों की शुरुआती वृद्धि के लिए जरूरी होते हैं.
  • यह प्रोउबिस काय बनाता है, जो परिपक्व परागकण की बाहरी दीवार बनाने के लिए स्पोरोपोलेनिन और अन्य पदार्थ देता है.
  • यह परागकणों के लिए खास तरह के प्रोटीन बनाता है, जिससे वर्तिकाग्र पर निषेचन और अनिषेचन की पहचान होती है.

 

Question 2. परागकण की संरचना का वर्णन कीजिए।
Answer: परागकण की संरचना (Structure of Pollen grain)
हर परागकण आमतौर पर गोल होता है, लेकिन कुछ प्रजातियों में यह अंडाकार या कई भुजाओं वाला भी हो सकता है. हर परागकण के केंद्र में घना जीवद्रव्य दो मजबूत दीवारों से घिरा होता है. बाहरी दीवार को बाह्यचोल (Exine) कहते हैं और अंदरूनी दीवार को अंतश्चोल (Intine) कहते हैं. बाह्यचोल स्पोरोपोलेनिन नामक पदार्थ से बनी मोटी दीवार होती है. यह खुरदरी होती है और इसमें जालिका जैसी, धारीदार या कांटेदार जैसी अलग-अलग आकृतियाँ (Ornamentation) हो सकती हैं. बाह्यचोल परागकण को बाहरी नुकसान से बचाता है, क्योंकि स्पोरोपोलेनिन का भौतिक या जैविक तरीके से आसानी से क्षरण नहीं होता है. बाह्यचोल पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें जनन छिद्र (Germ pores) कहते हैं. इनकी संख्या आमतौर पर 1 से 3 होती है. अंतश्चोल पतला, नरम और झिल्ली जैसा होता है, जो पेक्टिन और सेल्युलोज से बना होता है. परागकण की यह मजबूत बाहरी संरचना उसे कठोर वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है.
In simple words: परागकण आमतौर पर गोल होते हैं और उनकी दो परतें होती हैं: बाहरी बाह्यचोल (मोटी, स्पोरोपोलेनिन से बनी) और अंदरूनी अंतश्चोल (पतली, पेक्टिन व सेल्युलोज से बनी). बाह्यचोल पर जनन छिद्र होते हैं, जहाँ से पराग नलिका निकलती है.

🎯 Exam Tip: परागकण की बाह्यचोल (exine) स्पोरोपोलेनिन से बनी होती है, जो इसे अत्यधिक प्रतिरोधी बनाती है, जबकि अंतश्चोल (intine) पेक्टिन और सेल्युलोज से बनी होती है।

 

Question 3. युबिशकाये क्या होती है?
Answer: युबिशकाय (Ubisch bodies)
स्रावी या ग्रन्थिल टेपीटम (Secretory or glandular tapetum) की कोशिकाओं में वसा जैसी गोल संरचनाएँ पाई जाती हैं, जिन्हें प्रोयुबिस काय (Proubisch bodies) कहते हैं. प्रोयुबिस काय स्पोरोपोलेनिन नामक पदार्थ के जमने से युबिशकाय (Ubisch bodies) में बदल जाते हैं. ये परागकणों के बनने में मदद करते हैं. ये संरचनाएँ परागकण की बाहरी परत (बाह्यचोल) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
In simple words: युबिशकाय छोटी, गोल संरचनाएँ हैं जो टेपीटम कोशिकाओं में बनती हैं. इनमें स्पोरोपोलेनिन जमा होता है और ये परागकण की बाहरी परत बनाने में मदद करती हैं.

🎯 Exam Tip: युबिशकाय परागकण की बाह्यचोल (exine) के निर्माण के लिए आवश्यक स्पोरोपोलेनिन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

Question 4. एक प्रारूपिक बीजाण्ड का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: U Ovule

विभिन्न प्रकार के बीजाण्ड का नामांकित चित्र (A) ऋजु बीजाण्ड को दर्शाता है:

बीजाण्डवृंत बीजाण्डद्वार नाभिका निभाग प्रतिध्रुवी कोशिकाएँ द्वितीयक केन्द्रक अण्ड कोशिका सहायक कोशिका भ्रूणकोष बीजाण्डकाय अध्यावरण
In simple words: बीजाण्ड एक छोटा भाग होता है जिसके कई हिस्से होते हैं जैसे बीजाण्डवृन्त (जो इसे जोड़ता है), बीजाण्डद्वार (एक छोटा छेद), निभाग (आधार), और भ्रूणकोष (जहाँ मादा युग्मक होता है).

🎯 Exam Tip: बीजाण्ड के विभिन्न भागों को सही ढंग से लेबल करना और उनके कार्यों को समझना आवश्यक है, खासकर बीजाण्डद्वार, निभाग और बीजाण्डवृन्त की सापेक्ष स्थिति।

 

Question 5. पोलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: प्रतिमुखी या प्रतिव्यासांत कोशिकाएँ केन्द्रीय या संलीन कोशिका केन्द्रक अण्ड सहायक कोशिकाएँ फिलीफॉर्म उपकरण
In simple words: पॉलीगोनम भ्रूणकोष में एक अंडे, दो सहायक कोशिकाओं, एक केंद्रीय कोशिका (दो ध्रुवीय नाभिक के साथ) और तीन प्रतिध्रुवी कोशिकाओं सहित सात कोशिकाएं और आठ नाभिक होते हैं।

🎯 Exam Tip: पॉलीगोनम प्रकार का भ्रूणकोष एक सात-कोशिकीय और आठ-केन्द्रकीय संरचना है जो एंजियोस्पर्म में सबसे आम है। इसके प्रत्येक घटक को सही ढंग से लेबल करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. ऋजु एवं प्रतीप बीजाण्ड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: ऋजु एवं प्रतीप बीजाण्ड में अन्तर एक सारणी में प्रस्तुत है:

ऋजु बीजाण्ड (Arthrotropous ovule)प्रतीप बीजाण्ड (Anatropous Ovule)
1.इसमें बीजाण्डद्वार, निभाग और बीजाण्डवृन्त एक सीधी रेखा में होते हैं.इसमें बीजाण्डवृन्त की एक तरफा वृद्धि के कारण बीजाण्ड 180° घूमकर उल्टा हो जाता है.
2.यह सबसे सरल प्रकार का बीजाण्ड है.यह आवृतबीजी पौधों में सबसे आम प्रकार का बीजाण्ड है, जो लगभग 82% कुलों में पाया जाता है.
3.यह पोलीगोनोसी और पाइपरेसी कुलों में पाया जाता है.इसमें बीजाण्डद्वार हाइलम के करीब आ जाता है, जबकि बीजाण्डद्वार और निभाग सीधी रेखा में रहते हैं.

In simple words: ऋजु बीजाण्ड सीधा होता है जहाँ सारे भाग एक सीधी लाइन में होते हैं. प्रतीप बीजाण्ड उल्टा होता है क्योंकि वह 180 डिग्री घूम जाता है, और यह फूलों वाले पौधों में सबसे ज्यादा पाया जाता है.

🎯 Exam Tip: ऋजु और प्रतीप बीजाण्ड के बीच का मुख्य अंतर बीजाण्डद्वार, निभाग और बीजाण्डवृन्त की सापेक्ष स्थिति में निहित है। प्रतीप बीजाण्ड एंजियोस्पर्म में सबसे सामान्य प्रकार है।

RBSE Solutions For Class 12 Biology Chapter 2 Nibandhatmak Prashn

 

Question 1. परागकोष की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: परागकोष की संरचना (Structure of Pollen Sac)
पुंकेसर (Stamen) का फूला हुआ ऊपरी भाग परागकोष (Anther) कहलाता है. इसमें दो समानांतर, लगभग बेलनाकार पराग पालियाँ (Pollen lobes) होती हैं. ये दोनों पालियाँ सामने की तरफ एक गहरी खाँच से अलग होती हैं. पीछे की तरफ ये एक मोटी पट्टी से जुड़ी होती हैं जो बंध्य (Sterile) और संवहनी ऊतक (Vascular tissue) से बनी होती है. इस पट्टी को योजी (Connective) कहते हैं. दो पालियों वाले परागकोष को द्विकोष्ठी (Bithecous) कहते हैं. हर परागकोष पाली में आमतौर पर दो प्रकोष्ठ (Chambers) होते हैं, जिन्हें परागधानी (Pollen sac = Microsporangia) कहते हैं. इनके अंदर लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis) द्वारा अगुणित लघुबीजाणुओं (Microspores) या परागकणों (Pollen grains) का निर्माण होता है. इस प्रकार, हर परागकोष में चार परागधानियाँ (Microsporangia) होती हैं. एक पाली की दोनों परागधानियाँ अंदर से बंध्य ऊतक से बनी एक पट्टी से अलग होती हैं. बाहर से देखने पर यह एक उथली खाँच जैसी दिखती हैं.

पुंतन्तु परागकोष योजी (A) (B) (C) परागकण परागपुट परागपुट परागपुट परागपुट बाह्यत्वचा एण्डोथीसियम ओष्ठ कोशिकाएँ टेपीटम संवहन पूल (D) चित्र : परागकोष की संरचना

नवजात परागकोष की अनुप्रस्थ काट में परागकोष को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है:

  1. भित्ति (Wall)
  2. बीजाणुधानियाँ (Microsporangia)
  3. संवहन ऊतक (Vascular tissue)

1. पराग कोष भित्ति (Anther wall): यह बाहर से अंदर की ओर चार परतों की बनी होती है, जो इस प्रकार हैं:

  • बाह्यत्वचा (Epidermis): यह परागकोष को पूरी तरह ढकने वाली सबसे बाहरी और एक-कोशिकीय परत होती है. परिपक्व परागकोष में यह परत सूखकर चपटी हो जाती है.
  • अन्तस्थीसियम (Endothecium): यह परत बाह्यत्वचा के ठीक नीचे होती है और एक-कोशिकीय मोटी परत होती है. इसकी कोशिकाएँ मोटी और लंबी होती हैं. इन कोशिकाओं की अंदरूनी स्पर्शरेखीय दीवारों में सेल्युलोज जमा होने से U-आकार की पट्टियाँ बन जाती हैं.
  • मध्य स्तर (Middle layer): यह अन्तस्थीसियम के अंदर की ओर 1-3 कोशिका मोटा मध्यस्तर होता है. ये कोशिकाएँ पतली दीवारों वाली और कम समय तक रहने वाली होती हैं.
  • टेपीटम (Tapetum): यह परागकोष भित्ति की सबसे अंदरूनी और खास परत होती है, जो बीजाणुजन ऊतक के चारों ओर एक परत के रूप में पाई जाती है. इसकी कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं – अमीबाभ और ग्रन्थिल.

3. संवहन ऊतक (Vascular tissue): पराग पालियों के बीच में संवहनी ऊतक होता है जो पुतंतु से जुड़ा होता है. यह परागकोष को पोषण और पानी देता है. परागकोष की यह जटिल संरचना परागकणों के निर्माण और उन्हें सही तरीके से मुक्त करने में मदद करती है.
In simple words: परागकोष पुंकेसर का ऊपरी भाग है, जिसमें दो पालियाँ होती हैं और हर पाली में दो परागधानियाँ होती हैं. इसकी दीवार में चार परतें (बाह्यत्वचा, अन्तस्थीसियम, मध्य स्तर, टेपीटम) होती हैं और बीच में संवहन ऊतक होता है.

🎯 Exam Tip: परागकोष की संरचना में विभिन्न परतों और उनके कार्यों को याद रखें, खासकर टेपीटम की पोषण भूमिका और संवहन ऊतक का महत्व। आरेख को स्पष्ट रूप से लेबल करना भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. लघुबीजाणु चतुष्क कितने प्रकार के होते हैं? उनको सचित्र उल्लेख कीजिए।
Answer: लघुबीजाणु चतुष्क (Microspore tetrad)
बीजाणुधानी के अंदर, लघुबीजाणु मातृ कोशिका अर्धसूत्री विभाजन द्वारा चार अगुणित लघुबीजाणु बनाती है. ये चारों लघुबीजाणु शुरुआत में एक समूह में व्यवस्थित होते हैं, जिसे लघुबीजाणु चतुष्क (Microspore tetrad) कहते हैं. लघुबीजाणु चतुष्क आमतौर पर पाँच प्रकार के होते हैं, और ये परागकणों के विकास की प्रारंभिक अवस्था को दर्शाते हैं.
प्रकार:

  1. चतुष्फलकीय (Tetrahedral): इसमें एक तरफ से देखने पर केवल तीन लघुबीजाणु दिखते हैं और चौथा इन तीनों के पीछे छिपा होता है. अधिकांश द्विबीजपत्री पौधों में इसी प्रकार के लघुबीजाणु चतुष्क पाए जाते हैं.
  2. समद्विपाश्विक (Isobilateral): इसमें चतुष्क के चारों लघुबीजाणु एक ही तल में दिखते हैं. इस प्रकार के लघुबीजाणु चतुष्क एकबीजपत्री पौधों में पाए जाते हैं.
  3. क्रासित (Decussate): इसमें दो-दो लघुबीजाणु एक-दूसरे से समकोण बनाते हैं. इसमें ऊपर वाले युग्म के दोनों लघुबीजाणु और नीचे वाले युग्म का केवल एक बीजाणु दिखाई देता है. उदाहरण – मैग्नोलिया (Magnolia).
(A) चतुष्फलकीय (B) समद्विपार्श्व (C) क्रासित (D) T-आकारीय (E) रैखिक
  1. T-आकार (T-Shaped): इसमें चतुष्क के दो लघुबीजाणु अनुप्रस्थ रूप में और दो लम्बवत् रूप में व्यवस्थित होते हैं. उदाहरण – एरिस्टोलोकिया (Aristolochea).
  2. रैखिक (Linear): इसमें सभी लघुबीजाणु एक रैखिक क्रम में व्यवस्थित होते हैं. उदाहरण – हैलोफिला (Halophylla).

ये सभी चतुष्क परागकणों के विकास की प्रारंभिक व्यवस्था को दर्शाते हैं.
In simple words: लघुबीजाणु चतुष्क चार लघुबीजाणुओं का समूह है जो परागकोष में बनते हैं. ये चतुष्फलकीय, समद्विपार्श्व, क्रासित, T-आकार और रैखिक जैसे पांच प्रकार के होते हैं.

🎯 Exam Tip: लघुबीजाणु चतुष्क के विभिन्न प्रकारों को उनके व्यवस्था पैटर्न और उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह परागकणों के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं को दर्शाता है।

 

Question 3. बीजाण्ड के विभिन्न प्रकारों का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: बीजाण्ड के प्रकार (Types of Ovules)
बीजाण्डद्वार (Micropyle) और निभाग (Chalaza) की एक-दूसरे से स्थिति के आधार पर बीजाण्ड छह प्रकार के होते हैं, जो पौधों में पाए जाते हैं. ये बीजाण्ड विभिन्न पौधों में अलग-अलग रूप ले सकते हैं.

  1. ऋजु अथवा आर्थोट्रॉपस बीजाण्ड (Orthotropous ovule): इस प्रकार का बीजाण्ड सीधा होता है. इसमें बीजाण्डद्वार, निभाग और बीजाण्डवृन्त (Funicle) एक ही सीधी रेखा में होते हैं. उदाहरण – पॉलीगोनेसी (Polygonaceae) कुल के पौधे, जैसे – पॉलीगोनम (Polygonum), रुमेक्स (Rumex) और पाइपरेसी (Piperaceae) कुल के पौधे जैसे – पान (Betel), काली मिर्च (Black pepper) आदि.
  2. प्रतीप अथवा एनाट्रॉपस बीजाण्ड (Anatropous Ovule): इस प्रकार के बीजाण्ड में बीजाण्डवृन्त की एक तरफा वृद्धि के कारण बीजाण्ड 180° घूमकर उल्टा हो जाता है. इससे बीजाण्डद्वार, हाइलम के करीब आ जाता है और बीजाण्डद्वार तथा निभाग एक सीधी रेखा में रहते हैं. आवृतबीजी पौधों के 82% कुलों में इसी प्रकार के बीजाण्ड पाए जाते हैं, जैसे – चना, मटर, अरंड आदि.
  3. अनुप्रस्थ अथवा एम्फीट्रॉपस बीजाण्ड (Amphitropous Ovule): इस प्रकार का बीजाण्ड फ्यूनिकल के ऊपर अनुप्रस्थ या समकोण पर स्थित होता है. इसमें बीजाण्डद्वार तथा निभाग विपरीत ध्रुवों की ओर होते हैं. उदाहरण-एलिस्मेसी (Alismaceae) तथा ब्यूटोमेसी (Butomaceae) कुल के पादप.
निभाग बीजाण्ड वृन्त (A) निभाग अध्यावरण बीजाण्ड काय (B) बीजाण्ड काय भ्रूणकोष रैफी हाइलम बीजाण्ड वृन्त बीजाण्ड द्वार
बीजाण्ड काय (C) अध्यावरण बीजाण्ड काय (D) भ्रूणकोष अध्यावरण निभाग बीजाण्ड द्वार बीजाण्ड काय (E) भ्रूण कोष अध्यावरण बीजाण्ड द्वार बीजाण्ड वृन्त
भ्रूण कोष (F) निभाग

चित्र : बीजाण्ड के विभिन्न रूप (Forms of Ovule): (A) ऋजु या ऑर्थोट्रॉपस (Orthrotropous), (B) प्रतीप एनाट्रॉपस (Anatropous), (C) एम्फीट्रॉपस (Amphitropous), (D) केम्पाइलोट्रॉपस (Campylotropous), (E) हेमीट्रॉपस (Hemitropous), (F) सरसीनोट्रॉपस (Circinotropous)

  1. वक्र या केम्पाइलोट्रॉपस बीजाण्ड (Campylotropous Ovule): इस प्रकार के बीजाण्ड में बीजाण्डद्वार और निभाग एक सीधी रेखा में नहीं होते हैं. बीजाण्ड में वक्रता (Curvature) के कारण निभाग (Chalaza) बीजाण्डवृन्त (Funicle) के समकोण पर स्थित होता है. इसमें बीजाण्डकाय और भ्रूणकोष (Embryosac) दोनों घोड़े की नाल की तरह मुड़ जाते हैं, जिससे बीजाण्डद्वार भी बीजाण्डवृन्त के करीब आ जाता है. उदाहरण- ब्रेसीकेसी (Brassicaceae) और लेग्युमिनोसी (Leguminoseae) कुल के पौधे.
  2. अर्धप्रतीप या हेमीएनाटॉपस बीजाण्ड (Hemianatropous ovule): जब बीजाण्ड में बीजाण्डद्वार और बीजाण्डवृन्त एक-दूसरे से समकोण पर हों, तो इसे अर्धप्रतीप बीजाण्ड कहते हैं. उदाहरण – रेननकुलेसी (Ranunculaceae) और प्रिमुलेसी (Primulaceae) कुल के पादप.
  3. कुंडलित या सरसीनोट्रॉपस बीजाण्ड (Circinotropous Ovule): इस प्रकार के बीजाण्ड में बीजाण्डवृन्त बहुत लंबा होता है और पूरा बीजाण्ड 360° पर घूम जाता है. बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड को चारों ओर से घेर लेता है और यह बीजाण्ड से केवल एक बिंदु पर जुड़ा रहता है. उदाहरण- प्लम्बेजिनेसी (Plumbaginaceae) और कैक्टेसी (Cactaceae) कुल के पौधों में.

बीजाण्ड के ये विभिन्न प्रकार पौधों में प्रजनन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनकी पहचान उनकी संरचनात्मक विशेषताओं पर निर्भर करती है.
In simple words: बीजाण्ड कई तरह के होते हैं, जैसे सीधा (ऋजु), उल्टा (प्रतीप), मुड़ा हुआ (वक्र), आधा उल्टा (अर्धप्रतीप) और कुंडलित. ये प्रकार बीजाण्डद्वार, निभाग और बीजाण्डवृन्त की स्थिति से तय होते हैं.

🎯 Exam Tip: बीजाण्ड के प्रत्येक प्रकार के नाम, उसकी मुख्य संरचनात्मक विशेषता और कम से कम एक उदाहरण को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर प्रतीप बीजाण्ड जो सबसे आम है।

 

Question 4. आवृतबीजी पादप में नर युग्मकोभिद् के परिवर्धन का सचित्रे वर्णन कीजिए।
Answer: आवृतबीजी पादप में नर युग्मकोभिद् का परिवर्धन (Development of Male Gametophyte in Angiospermic plants)
लघुबीजाणु (Microspore), नर युग्मकोभिद् (Male gametophyte) की पहली कोशिका होती है. यह घने जीवद्रव्य (Dense protoplasm) और स्पष्ट केन्द्रक (Clear nucleus) से युक्त होती है. चतुष्क से अलग होते ही इसका आकार तेजी से बढ़ता है. कोशिकाद्रव्य एक पतली बाहरी झिल्ली के रूप में दिखाई देता है और इसमें कई रसधानियाँ (Vacuoles) बन जाती हैं. नर युग्मकोभिद् के विकास की कुछ अवस्थाएँ परागण से पहले और कुछ परागण के बाद पूरी होती हैं. यह एक जटिल प्रक्रिया है जो परागकणों को निषेचन के लिए तैयार करती है.

(A) बाह्यचोल अंतश्चोल केन्द्रक (B) कायिक कोशिका जननकोशिका (C) (D) नर युग्मक कायिक कोशिका परागनलिका चित्र : परागकण के अंकुरण की विभिन्न अवस्थाएँ

शुरुआत में जनन कोशिका परागकण की दीवार से चिपकी रहती है, लेकिन अपनी दीवार पूरी करने के बाद परागकण की दीवार से अलग हो जाती है और कायिक केन्द्रक की ओर बढ़ती है. परागकण की दीवार से अलग होने पर जनन कोशिका का आकार चपटा हो जाता है, जो बाद में मसूर के दाने जैसी (Lenticular), अंडाकार (Elliptical), कृमिरुपी (Wormiform) या तर्करुपी (Fusiform) हो सकती है. इसके बाद का विकास परागण के बाद होता है. वर्तिकाग्र से पानी और पोषक पदार्थ सोखकर ट्यूब कोशिका ('T'ub cell) फूल जाती है और परागण के किसी एक जनन छिद्र से पराग नलिका (Pollen tube) के रूप में बाहर आती है.
पराग नलिका वर्तिका में रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ती है. पराग नलिका के अगले सिरे पर कायिक कोशिका का केन्द्र होता है और इसके पीछे जनन कोशिका होती है. यहीं पर जनन कोशिका में सूत्री विभाजन होता है जिससे दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो दो नर युग्मकों के रूप में काम करती हैं. हर नर युग्मक एक कोशिकीय, अचल, अगुणित और एककेन्द्रकी होता है. यह पूरी प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि परागकण सफल निषेचन के लिए तैयार हो.
In simple words: नर युग्मकोभिद् का विकास लघुबीजाणु से होता है. परागकण में जनन कोशिका और कायिक कोशिका होती हैं. परागण के बाद, पराग नलिका जनन छिद्र से निकलती है, कायिक कोशिका आगे बढ़ती है, और जनन कोशिका विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है.

🎯 Exam Tip: आवृतबीजी पौधों में नर युग्मकोभिद् के विकास की प्रक्रिया में परागकण का अंकुरण और नर युग्मकों का निर्माण महत्वपूर्ण चरण हैं, जो परागण और निषेचन के लिए आवश्यक हैं।

 

Question 5. आवृतबीजी पादप में भ्रूणकोष परिवर्धन का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: भ्रूणकोष का परिवर्धन (Development of Female Gametophyte or Embryosac)
गुरुबीजाणु (Megaspore) मादा युग्मकोद्भिद् की पहली कोशिका है. गुरुबीजाणु बीजाण्डकाय से पोषण पाकर आकार में बड़ा हो जाता है और बीजाण्डकाय का अधिकतम स्थान घेर लेता है. इसमें छोटी-छोटी कई रसधानियाँ बनती हैं जो मिलकर एक बड़ी रसधानी बनाती हैं. गुरुबीजाणु के केन्द्रक में तीन बार मुक्त केन्द्रीय सूत्री विभाजन (Mitosis) होता है, जिसके परिणामस्वरूप आठ केन्द्रकों का निर्माण होता है. पहले विभाजन से बने दोनों केन्द्रक रसधानी (Vacuole) के बड़ा होने के कारण विपरीत ध्रुवों (निभाग और बीजाण्डद्वार) पर पहुँच जाते हैं. इस प्रक्रिया से भ्रूणकोष की सही संरचना बनती है.

(A) क्रियाशील गुरु बीजाणु (B) विकासशील भ्रूणकोष कोशिका (C) गुरु बीजाणु मातृ कोशिका परिधीय कोशिकाएँ (D) परिधीय कोशिका (E) ध्रुवीय केन्द्रकें अण्ड समुच्चय प्रतिमुखी कोशिकाएँ द्वितीयक केन्द्रक अण्ड कोशिका सहायक कोशिकाएँ (F) गुरु बीजाणु चतुष्क फिलीफॉर्म उपकरण चित्र : भ्रूणकोष या मादा युग्मकोद्भिद् (Female gametophyte) का सामान्य परिवर्द्धन

इस दौरान, भित्ति निर्माण से ये केन्द्रक कोशिकाओं में बदल जाते हैं. अण्ड समुच्चय में एक अण्ड कोशिका (Egg cell) और दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids) होती हैं. इसी तरह, निभागी सिरे पर स्थित तीनों केन्द्रक मिलकर तीन कोशिकाएँ बनाते हैं, जिन्हें प्रतिव्यासांत या प्रतिमुखी कोशिकाएँ (Antipodal cells) कहते हैं. अधिकांश आवृतबीजी पादपों में भ्रूणकोष का परिवर्धन इसी प्रकार होता है, जिसे एकबीजाण्विक पॉलीगोनम प्रकार (Monosporic Polygonum Type) का परिवर्धन कहते हैं. यह प्रक्रिया निषेचन के लिए आवश्यक मादा युग्मक और पोषक वातावरण तैयार करती है.
In simple words: भ्रूणकोष का विकास गुरुबीजाणु से होता है. इसमें केन्द्रक कई बार विभाजित होकर आठ केन्द्रक बनाते हैं, जो बाद में सात कोशिकाओं (एक अण्ड कोशिका, दो सहायक कोशिकाएँ, एक केंद्रीय कोशिका, और तीन प्रतिध्रुवी कोशिकाएँ) में व्यवस्थित हो जाते हैं. यह भ्रूणकोष मादा युग्मकोभिद् का काम करता है.

🎯 Exam Tip: भ्रूणकोष के परिवर्धन में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से गुरुबीजाणु का निर्माण, उसके मुक्त केन्द्रीय विभाजन और अंततः सात-कोशिकीय, आठ-केन्द्रकीय भ्रूणकोष की संरचना को समझना महत्वपूर्ण है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 2 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 2 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 2. एक प्रारूपिक पुष्प के नर तथा मादा जननांगों के नाम लिखिए।
Answer: एक सामान्य फूल में नर जननांग को पुमंग (Androecium) कहते हैं, और मादा जननांग को जायांग (Gynoecium) कहते हैं। ये दोनों अंग पौधे के प्रजनन के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं।
In simple words: एक फूल में नर भाग को पुमंग कहते हैं और मादा भाग को जायांग कहते हैं।

🎯 Exam Tip: हमेशा नर और मादा जननांगों के वैज्ञानिक नाम (जैसे Androecium और Gynoecium) और उनके हिंदी नाम दोनों लिखें ताकि पूरा अंक मिलें।

 

Question 3. पुमंग (Androecium) के एकल सदस्य का नाम लिखिए।
Answer: पुमंग का एक अकेला सदस्य पुंकेसर (Stamen) कहलाता है। प्रत्येक पुंकेसर परागकोष और पुतंतु से मिलकर बना होता है।
In simple words: पुमंग की एक इकाई को पुंकेसर कहते हैं।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि 'पुमंग' पूरे समूह का नाम है, और 'पुंकेसर' उस समूह के एक सदस्य का नाम है।

 

Question 4. पुंकेसर को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
Answer: पुंकेसर को लघुबीजाणुपर्ण (Microsporophyll) के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधे के परागकण बनाने वाले भाग को दर्शाता है।
In simple words: पुंकेसर का दूसरा नाम लघुबीजाणुपर्ण है।

🎯 Exam Tip: यह नाम 'लघुबीजाणु' (परागकण) और 'पर्ण' (पत्ती) से मिलकर बना है, जो इसकी संरचना और कार्य को बताता है।

 

Question 5. जायांग (Gynoecium) की एकल इकाई क्या कहलाती है?
Answer: जायांग की एक अकेली इकाई अण्डप (Carpel) कहलाती है। अण्डप में अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र होते हैं।
In simple words: जायांग की एक इकाई को अण्डप कहते हैं।

🎯 Exam Tip: जिस तरह पुमंग की इकाई पुंकेसर है, उसी तरह जायांग की इकाई अण्डप है, जो प्रजनन में मुख्य भूमिका निभाती है।

 

Question 6. अण्डप को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
Answer: अण्डप को गुरुबीजाणुपर्ण (Mega sporophyll) नाम से भी जाना जाता है। यह नाम गुरुबीजाणु (बीजाण्ड) बनाने वाली पत्ती जैसी संरचना को दर्शाता है।
In simple words: अण्डप को गुरुबीजाणुपर्ण भी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: 'गुरु' शब्द बीजाण्ड के बड़े आकार को इंगित करता है, जबकि 'लघु' परागकण के छोटे आकार को दर्शाता है।

 

Question 7. पुंकेसर के तीन भागों के नाम बताइए।
Answer: पुंकेसर के तीन मुख्य भाग परागकोष (Anther), पुतंतु (Filament) और योजी (Connective) हैं। ये तीनों भाग मिलकर पुंकेसर का पूरा कार्य करते हैं।
In simple words: पुंकेसर के तीन भाग परागकोष, पुतंतु और योजी हैं।

🎯 Exam Tip: इन तीनों भागों के नाम और उनके कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये फूल के नर प्रजनन में आवश्यक हैं।

 

Question 9. मालवेसी कुल के पादपों के पुमंग के परागकोष में कितनी बीजाणुधानियाँ पायी जाती हैं?
Answer: मालवेसी कुल के पौधों में परागकोष एकपालीय (Monothecous) होते हैं। इसलिए, इनमें केवल दो लघु बीजाणुधानियाँ (Microsporangia) पायी जाती हैं।
In simple words: मालवेसी पौधों में परागकोष में दो बीजाणुधानियाँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: सामान्यतः द्विपालीय परागकोष में चार बीजाणुधानियाँ होती हैं, लेकिन एकपालीय प्रकार में केवल दो ही होती हैं।

 

Question 10. प्रपसू कोशिकाएँ किसे कहते हैं?
Answer: प्रत्येक परागपुट (Pollen sac) की कुछ बाहरी कोशिकाओं के नीचे की कोशिकाएँ (अधःस्तवक) अन्य कोशिकाओं से बड़ी और घने जीवद्रव्य वाली हो जाती हैं। इन्हीं विशेष कोशिकाओं को प्रपसू कोशिकाएँ (Archesporial initials) कहते हैं, जो आगे चलकर परागकोष की दीवारों और लघुबीजाणुओं को बनाती हैं।
In simple words: परागपुट की कुछ खास कोशिकाएँ जो बड़ी और घनी होती हैं, उन्हें प्रपसू कोशिकाएँ कहते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रपसू कोशिकाएँ प्रजनन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि वे लघुबीजाणुजनन (microsporogenesis) की प्रक्रिया शुरू करती हैं।

 

Question 11. आवृतबीजी पादपों में परागकोष का परिवर्धन किस प्रकार का होता है?
Answer: आवृतबीजी पौधों में परागकोष का विकास सुबीजाणुधानीय (Eusporangiate) प्रकार का होता है। इसका मतलब है कि परागकोष का विकास एक से ज़्यादा प्रपसू कोशिकाओं से होता है।
In simple words: आवृतबीजी पौधों में परागकोष का विकास सुबीजाणुधानीय तरीके से होता है।

🎯 Exam Tip: सुबीजाणुधानीय विकास में परागकोष की दीवार और बीजाणुजनन ऊतक दोनों कई कोशिकाओं से बनते हैं, जो एक मजबूत संरचना प्रदान करता है।

 

Question 12. प्रपसू कोशिका विभाजित होकर कौन-सी दो कोशिकाओं को निर्माण करती हैं?
Answer: प्रपसू कोशिका विभाजित होकर प्राथमिक भित्तीय कोशिका (Primary parietal cell) और प्राथमिक बीजाणुजन कोशिका (Primary sporogenous cell) बनाती है। प्राथमिक भित्तीय कोशिका परागकोष की दीवार बनाती है, और प्राथमिक बीजाणुजन कोशिका परागकण बनाती है।
In simple words: प्रपसू कोशिका दो कोशिकाएँ बनाती है- प्राथमिक भित्तीय कोशिका और प्राथमिक बीजाणुजन कोशिका।

🎯 Exam Tip: यह विभाजन परागकोष के विकास में एक महत्वपूर्ण पहला कदम है, जो बाद में परागकणों के बनने के लिए जिम्मेदार है।

 

Question 13. परागकोष भित्ति का निर्माण किस कोशिका से होता है?
Answer: परागकोष भित्ति का निर्माण प्राथमिक भित्तीय कोशिका (Primary parietal cell) से होता है। यह कोशिका विभाजित होकर परागकोष की विभिन्न परतों का निर्माण करती है।
In simple words: परागकोष की दीवार प्राथमिक भित्तीय कोशिका से बनती है।

🎯 Exam Tip: प्राथमिक भित्तीय कोशिकाएँ परागकोष की रक्षात्मक परतों को बनाती हैं, जो परागकणों को बढ़ने के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करती हैं।

 

Question 14. परागकोष भित्ति की किस परत में U आकार की रेशेदार पट्टियाँ पायी जाती हैं?
Answer: परागकोष भित्ति की अन्तस्थीसियम (Endothecium) परत में U आकार की रेशेदार पट्टियाँ पायी जाती हैं। ये पट्टियाँ कोशिका की आंतरिक स्पर्शरेखीय दीवारों पर सेलूलोज के जमाव से बनती हैं।
In simple words: U आकार की रेशेदार पट्टियाँ परागकोष की अन्तस्थीसियम परत में होती हैं।

🎯 Exam Tip: ये रेशेदार पट्टियाँ आर्द्रताग्राही होती हैं और परागकोष के स्फुटन में मदद करती हैं, जिससे परागकण बाहर निकल पाते हैं।

 

Question 16. लघुबीजाणुजनन किसे कहते हैं?
Answer: परागकोष की लघुबीजाणुधानी (Microsporangium) में द्विगुणित लघुबीजाणु मातृ कोशिकाओं (Microspore Mother Cells) में अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा चार अगुणित लघुबीजाणुओं (Microspores) के निर्माण की प्रक्रिया को लघुबीजाणुजनन कहते हैं। इस प्रक्रिया से बनने वाले लघुबीजाणु आगे चलकर परागकण बनते हैं।
In simple words: लघुबीजाणु मातृ कोशिका से परागकण बनने की प्रक्रिया को लघुबीजाणुजनन कहते हैं।

🎯 Exam Tip: यह प्रक्रिया फूल वाले पौधों में नर युग्मकों (परागकणों) के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 17. मैग्नोलिया में किस प्रकार के बीजाणु चतुष्क पाए जाते हैं?
Answer: मैग्नोलिया के पौधों में क्रासित (Decussate) प्रकार के बीजाणु चतुष्क पाए जाते हैं। इस प्रकार के चतुष्क में दो लघुबीजाणु एक-दूसरे से समकोण पर होते हैं।
In simple words: मैग्नोलिया में क्रासित प्रकार के बीजाणु चतुष्क मिलते हैं।

🎯 Exam Tip: बीजाणु चतुष्क के विभिन्न प्रकार पौधों की प्रजातियों के बीच भिन्नता दर्शाते हैं, जो वर्गीकरण में भी सहायक होते हैं।

 

Question 18. परागपिण्ड (Pollinium) किसे कहते हैं? एक उदाहरण लिखिए।
Answer: कुछ पौधों में, सारे परागकण आपस में मिलकर एक विशिष्ट, चिपचिपी और ठोस संरचना बना लेते हैं, जिसे परागपिण्ड (Pollinium) कहते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण आक (Calotropis) है।
In simple words: जब सभी परागकण एक साथ चिपक कर एक बड़ी संरचना बनाते हैं, उसे परागपिण्ड कहते हैं, जैसे आक में होता है।

🎯 Exam Tip: परागपिण्ड विशेष रूप से कीट-परागित फूलों में पाए जाते हैं, जहां कीट पूरे परागपिण्ड को एक साथ ले जाते हैं।

 

Question 19. बहुबीजाणुता किसे कहते हैं?
Answer: यदि एक लघुबीजाणु चतुष्क में सामान्य चार लघुबीजाणुओं से ज़्यादा (चार से अधिक) लघुबीजाणु मौजूद हों, तो इस अवस्था को बहुबीजाणुता (Polyapory) कहते हैं। यह एक असामान्य स्थिति है।
In simple words: जब एक चतुष्क में चार से ज़्यादा लघुबीजाणु होते हैं, तो उसे बहुबीजाणुता कहते हैं।

🎯 Exam Tip: सामान्यतः, लघुबीजाणुजनन के बाद चार लघुबीजाणु बनते हैं, लेकिन कुछ आनुवंशिक भिन्नताओं के कारण बहुबीजाणुता हो सकती है।

 

Question 20. नर युग्मकोभिद किसे कहते हैं?
Answer: एक अंकुरित परागकण को नर युग्मकोद्भिद (Male gametophyte) कहते हैं। परागकण अंकुरित होकर परागनली बनाता है जिसमें नर युग्मक होते हैं।
In simple words: अंकुरित परागकण को नर युग्मकोद्भिद कहते हैं।

🎯 Exam Tip: नर युग्मकोद्भिद का मुख्य कार्य मादा युग्मकोद्भिद तक नर युग्मकों को पहुँचाना है, जो प्रजनन के लिए आवश्यक है।

 

Question 21. परागकण की बाह्य तथा अन्तः भित्तियाँ किस पदार्थ की बनी होती हैं?
Answer: परागकण की बाहरी भित्ति (बाह्यचोल) स्पोरोपोलेनिन (Sporopollenin) नामक पदार्थ की बनी होती है, जबकि आंतरिक भित्ति (अंतश्चोल) पेक्टिन (Pectin) और सेलूलोज (Cellulose) की बनी होती है। स्पोरोपोलेनिन परागकण को कठोर सुरक्षा देता है।
In simple words: परागकण की बाहरी दीवार स्पोरोपोलेनिन से और अंदरूनी दीवार पेक्टिन व सेलूलोज से बनती है।

🎯 Exam Tip: स्पोरोपोलेनिन सबसे प्रतिरोधी जैविक पदार्थों में से एक है, जो परागकणों को अत्यधिक पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी सुरक्षित रखता है।

 

Question 23. नर युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या किस प्रकार की होती है?
Answer: नर युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या अगुणित (Haploid) होती है, जिसे \( n \) से दर्शाया जाता है। इसका अर्थ है कि इनमें गुणसूत्रों का केवल एक सेट होता है।
In simple words: नर युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या अगुणित होती है।

🎯 Exam Tip: अगुणित युग्मक निषेचन के बाद द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनाते हैं, जिससे गुणसूत्रों की संख्या सामान्य रहती है।

 

Question 24. बीजाण्ड को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
Answer: बीजाण्ड को गुरुबीजाणुपर्ण (Megasporophyll) के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम उस संरचना को संदर्भित करता है जो गुरुबीजाणु (यानी बीजाण्ड) बनाती है।
In simple words: बीजाण्ड को गुरुबीजाणुपर्ण भी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: 'गुरुबीजाणुपर्ण' शब्द अण्डप के समानार्थक है, जो मादा प्रजनन अंग का हिस्सा है।

 

Question 25. बीजाण्ड वृन्त किसे कहते हैं?
Answer: प्रत्येक बीजाण्ड एक वृंतनुमा संरचना द्वारा अंडाशय की भीतरी दीवार (बीजाण्डासन) से जुड़ा रहता है, जिसे बीजाण्डवृन्त (Funicle) कहते हैं। यह बीजाण्ड को सहारा देता है और उसे पोषण प्रदान करता है।
In simple words: बीजाण्ड जिस डंडी से अंडाशय से जुड़ा होता है, उसे बीजाण्डवृन्त कहते हैं।

🎯 Exam Tip: बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड के लिए एक तरह से पोषण की नली का काम करता है, जो उसे बढ़ने में मदद करता है।

 

Question 26. रैफी किसे कहते हैं?
Answer: कभी-कभी बीजाण्ड वृन्त के अंडाशय से जुड़ने वाले स्थान पर एक उभार जैसी रचना पाई जाती है, जिसे रैफी (Raphe) कहते हैं। यह बीजाण्डवृन्त का विस्तार होता है।
In simple words: बीजाण्डवृन्त जहां अंडाशय से जुड़ता है, वहां एक उभार होता है जिसे रैफी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: रैफी अक्सर प्रतीप बीजाण्ड (Anatropous ovule) में स्पष्ट दिखाई देता है।

 

Question 27. बीजाण्डकाय किसे कहते हैं?
Answer: बीजाण्ड का मुख्य भाग मृदूतकीय कोशिकाओं (Parenchymatous cells) का बना होता है, जिसमें बीजाण्डकोष (Embryo sac) धंसा होता है। इसी मुख्य ऊतक को बीजाण्डकाय (Nucellus) कहते हैं। यह भ्रूणकोष को पोषण देता है।
In simple words: बीजाण्ड का मुख्य भाग जो मृदूतकीय कोशिकाओं से बना होता है और भ्रूणकोष को घेरे रहता है, उसे बीजाण्डकाय कहते हैं।

🎯 Exam Tip: बीजाण्डकाय मादा युग्मकोद्भिद के विकास के लिए प्रारंभिक पोषण प्रदान करता है।

 

Question 28. अण्ड समुच्चय की कोशिकाओं के नाम बताइए।
Answer: अण्ड समुच्चय में एक अण्ड कोशिका (Egg cell) और दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids) होती हैं। ये कोशिकाएँ मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) के बीजाण्डद्वारी छोर पर पाई जाती हैं और निषेचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
In simple words: अण्ड समुच्चय में एक अण्ड कोशिका और दो सहायक कोशिकाएँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: सहायक कोशिकाएँ परागनली को अण्ड कोशिका तक मार्गदर्शन करने में मदद करती हैं।

 

Question 30. किन पौधों में वक़ बीजाण्ड पाया जाता है? दो उदाहरण लिखिए।
Answer: वक़ बीजाण्ड (Campylotropous ovule) क्रूसीफेरी कुल (जैसे- सरसों) और लैग्युमिनोसी कुल (जैसे- मटर) के पौधों में पाया जाता है। इसमें बीजाण्ड काय मुड़ा हुआ होता है।
In simple words: वक़ बीजाण्ड सरसों और मटर जैसे पौधों में पाया जाता है।

🎯 Exam Tip: वक़ बीजाण्ड में बीजाण्डकाय और भ्रूणकोष घोड़े की नाल की तरह मुड़े हुए होते हैं।

 

Question 31. गुरुबीजाणु जनन किसे कहते हैं?
Answer: गुरुबीजाणु मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell) से अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा गुरुबीजाणुओं (Megaspores) के निर्माण की प्रक्रिया को गुरुबीजाणुजनन कहते हैं। यह मादा युग्मकोद्भिद के विकास का पहला कदम है।
In simple words: गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से गुरुबीजाणु बनने को गुरुबीजाणुजनन कहते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं, जो आगे चलकर भ्रूणकोष (मादा युग्मकोद्भिद) बनाते हैं।

 

Question 32. गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्रण होने पर कितने और कैसे गुरु बीजाणु बनते हैं?
Answer: गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्रण (Meiosis) होने पर चार अगुणित (Haploid) गुरुबीजाणु (Megaspores) बनते हैं। इनमें से आमतौर पर एक ही सक्रिय रहता है और बाकी तीन नष्ट हो जाते हैं।
In simple words: गुरुबीजाणु मातृ कोशिका के अर्द्धसूत्रण से चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं।

🎯 Exam Tip: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक ही मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) बनाता है।

 

Question 33. मादा युग्मकोभिद् का निर्माण किसके द्वारा होता है?
Answer: मादा युग्मकोद्भिद (Female gametophyte) का निर्माण एक सक्रिय गुरुबीजाणु (Functional megaspore) से होता है। यह सक्रिय गुरुबीजाणु विभाजित होकर भ्रूणकोष बनाता है।
In simple words: मादा युग्मकोद्भिद एक सक्रिय गुरुबीजाणु से बनता है।

🎯 Exam Tip: भ्रूणकोष मादा युग्मकोद्भिद का दूसरा नाम है, और यह फूल के अंडाशय के भीतर विकसित होता है।

 

Question 34. निभागीय छोर पर उपस्थित तीन कोशिकाओं का समूह क्या कहलाता है?
Answer: निभागीय छोर (Chalazal end) पर उपस्थित तीन कोशिकाओं का समूह प्रतिव्यासांत या प्रतिमुखी कोशिकाएँ (Antipodal cells) कहलाता है। ये कोशिकाएँ भ्रूणकोष में पाई जाती हैं।
In simple words: निभागीय छोर पर तीन कोशिकाओं के समूह को प्रतिव्यासांत कोशिकाएँ कहते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रतिमुखी कोशिकाएँ भ्रूणकोष के निभागीय सिरे पर स्थित होती हैं और भ्रूणकोष के विकास में सहायक भूमिका निभाती हैं।

 

Question 35. एक बीजाण्विक पोलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष में केन्द्रक व कोशिकाओं की संख्या कितनी होती है?
Answer: एक बीजाण्विक पोलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष (Monosporic Polygonum Type Embryo sac) में सात कोशिकाएँ और आठ केन्द्रक होते हैं। यह सबसे सामान्य प्रकार का भ्रूणकोष होता है।
In simple words: पोलीगोनम भ्रूणकोष में सात कोशिकाएँ और आठ केन्द्रक होते हैं।

🎯 Exam Tip: यह '7-कोशिकीय, 8-केन्द्रकीय' संरचना आवृतबीजी पौधों के लिए बहुत विशिष्ट है और निषेचन में महत्वपूर्ण है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. एक आवृतबीजी पुष्प के उन अंगों के नाम बताएँ, जहाँ नर एवं मादा युग्मकोभिद् का विकास होता है।
Answer: एक आवृतबीजी फूल में नर युग्मकोद्भिद (Male Gametophyte) का विकास पुंकेसर (Stamen) के परागकोष (Anther) में परागकणों के रूप में होता है। दूसरी ओर, मादा युग्मकोद्भिद (Female Gametophyte) का विकास स्त्रीकेसर (Pistil) के अंडाशय (Ovary) में बीजाण्ड (Ovule) के अंदर भ्रूणकोष (Embryo sac) के रूप में होता है। ये दोनों संरचनाएं प्रजनन के लिए अनिवार्य हैं।
In simple words: नर युग्मकोद्भिद परागकोष में (परागकणों के रूप में) और मादा युग्mकोद्भिद अंडाशय में (भ्रूणकोष के रूप में) विकसित होते हैं।

🎯 Exam Tip: इन अंगों और उनमें विकसित होने वाली संरचनाओं के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये फूल के प्रजनन चक्र के मुख्य भाग हैं।

 

Question 2. पुंकेसर के विभिन्न भागों के नाम तथा प्रत्येक का कार्य बताइए।
Answer: पुंकेसर के तीन मुख्य भाग होते हैं:
(1) परागकोष (Anther): यह पुंकेसर का फूला हुआ ऊपरी भाग होता है, जहाँ परागकणों का निर्माण और भंडारण होता है। परागकोष फूल के प्रजनन के लिए आवश्यक होता है।
(2) पुतंतु (Filament): यह परागकोष का निचला, पतला डंठल होता है जो परागकोष को धारण करता है। इसका मुख्य कार्य परागकोष को सहारा देना और उसे पोषण और जल उपलब्ध कराना है ताकि वह सही से विकसित हो सके।
(3) योजी (Connective): यह पुतंतु के ऊपरी भाग को परागकोष की पालियों से जोड़ता है। यह परागकोष की दोनों पालियों को आपस में जोड़ने वाली कड़ी के रूप में कार्य करता है।
In simple words: पुंकेसर में परागकोष (परागकण बनाता है), पुतंतु (सहारा और पोषण देता है), और योजी (परागकोष की पालियों को जोड़ता है) होते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक भाग का कार्य उसकी संरचना से जुड़ा होता है, इसलिए उन्हें एक साथ याद रखना आसान होता है।

 

Question 3. लघु बीजाणुधानी किसे कहते हैं? आवृतबीजी पादपों में इनकी संख्या बताइए।
Answer: लघु बीजाणुधानी (Microsporangium) परागकोष के अंदर की वह संरचना है जहाँ लघुबीजाणुओं (परागकणों) का निर्माण होता है। परागकोष की अनुप्रस्थ काट देखने पर यह प्रकोष्ठों (Chambers) में बंटा दिखाई देता है, और ये प्रकोष्ठ ही लघुबीजाणुधानी कहलाते हैं।
आवृतबीजी पौधों में लघु बीजाणुधानियों की संख्या अलग-अलग हो सकती है:
• अधिकांश आवृतबीजियों में परागकोष द्विपालित (Bilobed) होता है, जिसमें चार लघु बीजाणुधानियाँ होती हैं।
• मालवेसी कुल के पौधों में परागकोष एकपालित (Single lothed) होता है, जिसमें दो लघु बीजाणुधानियाँ होती हैं।
In simple words: लघु बीजाणुधानी परागकोष के अंदर की जगह है जहाँ परागकण बनते हैं। ज़्यादातर पौधों में चार होती हैं, लेकिन कुछ में दो भी होती हैं।

🎯 Exam Tip: परागकोष की पालियों और लघु बीजाणुधानियों की संख्या को ध्यान से याद रखें, क्योंकि यह पौधों के वर्गीकरण में भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. प्रपसू कोशिकाएँ किसे कहते हैं? इससे बनने वाली कोशिकाओं के नाम तथा कार्य बताइए।
Answer: विकास की शुरुआती अवस्था में, परागकोष की सबसे बाहरी परत (बाह्यत्वचा) से घिरे अविभेदित कोशिकाओं के समूह को समरूपी समूह (Homogenous mass) कहते हैं। इस समूह में से कुछ अधःस्त्वक कोशिकाएँ आकार में बड़ी और घने जीवद्रव्य वाली हो जाती हैं, जिन्हें प्रपसू कोशिकाएँ (Archesporial initials) कहते हैं।
प्रपसू कोशिकाओं से बनने वाली कोशिकाएँ और उनके कार्य:
1. प्राथमिक भित्तीय कोशिका (Primary parietal cell): यह कोशिकाएँ आगे चलकर परागकोष की भित्ति की विभिन्न परतें (जैसे- अन्तस्थीसियम, मध्य स्तर और टेपीटम) बनाती हैं, जो परागकणों को सुरक्षा और पोषण देती हैं।
2. प्राथमिक बीजाणुजन कोशिका (Primary sporogenous cell): ये कोशिकाएँ लघुबीजाणु मातृ कोशिकाओं (Microspore Mother Cells) के रूप में कार्य करती हैं और अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा लघुबीजाणुओं (परागकणों) का निर्माण करती हैं।
In simple words: प्रपसू कोशिकाएँ परागकोष की खास कोशिकाएँ होती हैं। ये प्राथमिक भित्तीय कोशिकाएँ (जो परागकोष की दीवारें बनाती हैं) और प्राथमिक बीजाणुजन कोशिकाएँ (जो परागकण बनाती हैं) बनाती हैं।

🎯 Exam Tip: प्रपसू कोशिकाएँ परागकोष के विकास में नींव का काम करती हैं, जो प्रजनन के लिए आवश्यक दोनों- सुरक्षात्मक दीवार और प्रजनन कोशिकाएं- बनाती हैं।

 

Question 5. प्राथमिक बीजाणु जनन कोशिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: प्राथमिक बीजाणु जनन कोशिका (Primary sporogenous cell) वह शुरुआती कोशिका है जो प्रपसू कोशिका के विभाजन से बनती है। यह कोशिका आगे चलकर लघुबीजाणु मातृ कोशिका (Microspore Mother Cell) के रूप में कार्य करती है, जिसमें अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) होता है। इस विभाजन के परिणामस्वरूप चार अगुणित (Haploid) लघुबीजाणु (Microspores) या परागकण बनते हैं। ये कोशिकाएँ फूल वाले पौधों में नर युग्मकों के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
In simple words: प्राथमिक बीजाणु जनन कोशिका वह सेल है जो परागकण बनाने के लिए विभाजित होती है।

🎯 Exam Tip: यह कोशिका नर युग्मकोद्भिद के विकास की शुरुआत करती है, जो परागकणों के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

 

Question 6. 2000 परागकणों के निर्माण में कितनी पराग मातृ कोशिकाओं की आवश्यकता होगी? इन कोशिकाओं में किस प्रकार का विभाजन होगा?
Answer: 2000 परागकणों के निर्माण के लिए 500 पराग मातृ कोशिकाओं (Pollen Mother Cells) की आवश्यकता होगी। प्रत्येक पराग मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) होता है, जिससे एक कोशिका से चार अगुणित परागकण बनते हैं।
गणना इस प्रकार है:
एक पराग मातृ कोशिका \( \rightarrow \) 4 परागकण (अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा)
तो, 2000 परागकणों के लिए \( \frac{2000}{4} = 500 \) पराग मातृ कोशिकाओं की आवश्यकता होगी।
In simple words: 2000 परागकण बनाने के लिए 500 पराग मातृ कोशिकाएँ चाहिए होंगी, और उनमें अर्द्धसूत्री विभाजन होगा।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि अर्द्धसूत्री विभाजन से गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है और एक द्विगुणित कोशिका से चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं।

 

Question 7. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
(i) अन्तस्थीसियम
(ii) टेपीटम
Answer:
(i) अन्तस्थीसियम (Endothecium): यह परागकोष भित्ति की दूसरी परत है, जो बाह्यत्वचा के ठीक नीचे स्थित होती है। परागकोष के परिपक्व होने और स्फुटन (Dehiscence) के दौरान इसकी कोशिकाएँ सबसे ज़्यादा विकसित होती हैं। इन कोशिकाओं की आंतरिक और स्पर्शरेखीय दीवारों पर सेलूलोज (Cellulose) का जमाव होने से U-आकार की पट्टियाँ बन जाती हैं। यह परत प्रकृति में आर्द्रताग्राही होती है, यानी यह नमी को सोखती है। शुष्क वातावरण में इनमें खिंचाव या तनाव पैदा होता है, जिससे परागकोष फट जाता है और परागकण बाहर निकल जाते हैं।
(ii) टेपीटम (Tapetum): यह परागकोष भित्ति की सबसे भीतरी और विशेष परत है, जो बीजाणुजन ऊतक (Sporogenous tissue) के चारों ओर एक ही परत के रूप में पाई जाती है। यह लघुबीजाणु चतुष्क अवस्था (Tetrad stage) तक पूरी तरह से विकसित हो जाती है। टेपीटम की कोशिकाओं का जीवद्रव्य घना और केंद्रक स्पष्ट होता है। परिपक्व अवस्था में ये कोशिकाएँ अक्सर एक से ज़्यादा केंद्रक वाली (बहुकेन्द्रकी) और बहुगुणित हो जाती हैं। आवृतबीजी पौधों में कोशिकाओं के स्वभाव के आधार पर टेपीटम दो प्रकार का होता है- अमीबॉइड या पेरिप्लाज्मोडियल टेपीटम, जो विकासशील परागकणों को पोषण देता है, और ग्रन्थिल या स्रावी टेपीटम, जो परागकणों की बाहरी भित्ति (Exine) के निर्माण में सहायक होता है। टेपीटम परागकणों के विकास के लिए आवश्यक पोषण प्रदान करता है, और स्पोरोपोलेनिन जैसे पदार्थ का उत्पादन भी करता है, जो परागकणों की रक्षा करता है।
In simple words: (i) अन्तस्थीसियम परागकोष की एक परत है जिसमें U-आकार की पट्टियाँ होती हैं और यह परागकोष को फटने में मदद करती है। (ii) टेपीटम परागकोष की सबसे अंदर की परत है जो परागकणों को पोषण देती है और उनकी बाहरी दीवार बनाने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: अन्तस्थीसियम परागकोष के फटने में सहायक है, जबकि टेपीटम परागकणों के विकास और सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इन दोनों के कार्यों को अलग-अलग याद रखें।

 

Question 8. परागपिण्ड एवं संयुक्त परागकण से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
Answer:
• परागपिण्ड (Pollinium): कुछ पौधों में, सारे परागकण एक साथ मिलकर एक विशिष्ट, चिपचिपी और ठोस संरचना बना लेते हैं जिसे परागपिण्ड कहते हैं। यह आमतौर पर उन पौधों में देखा जाता है जो कीटों द्वारा परागित होते हैं, क्योंकि कीट पूरे परागपिण्ड को एक साथ ले जाते हैं। इसका उदाहरण आक (Calotropis) और कुछ ऑर्किड हैं।
• संयुक्त परागकण (Compound pollen grains): कुछ पौधों में, परागकण बनने के बाद भी अलग नहीं होते बल्कि चतुष्क के रूप में या बड़े समूहों में जुड़े रहते हैं। ऐसे जुड़े हुए परागकणों को संयुक्त परागकण कहते हैं। इसका उदाहरण ड्रॉसेरा (Drosera) और टाइफा (Typha) जैसे पौधे हैं।
In simple words: परागपिण्ड में सारे परागकण एक साथ चिपक जाते हैं (जैसे आक में), जबकि संयुक्त परागकण में वे चतुष्क या समूह में जुड़े रहते हैं (जैसे ड्रॉसेरा में)।

🎯 Exam Tip: परागपिण्ड कीट परागण में मदद करते हैं, जबकि संयुक्त परागकण अक्सर एक विशेष समूह में फैले होते हैं, जिससे परागण की दक्षता बढ़ती है।

 

Question 9. परागकोष के स्फुटन के विभिन्न प्रकारों को लिखिए।
Answer: परागकोष का स्फुटन (Dehiscence of Anther) वह प्रक्रिया है जिससे परागकोष फट जाता है और परागकण बाहर निकलते हैं। परिपक्व होने पर, परागकोष की मध्यस्तर (Middle layer) और टेपीटम (Tapetum) नष्ट हो जाते हैं। केवल बाहरी परत (बाह्यत्वचा- Epidermis) और आंतरिक परत (अन्तस्थीसियम- Endothecium) बची रहती हैं। अन्तस्थीसियम की कोशिकाएँ आर्द्रताग्राही होती हैं और पानी के वाष्पीकरण से सूख जाती हैं, जिससे उनमें तनाव पैदा होता है। यह तनाव स्टोमियम (Stomium) की कोशिकाओं पर दबाव डालता है, और परागकोष फट जाता है।
परागकोष के स्फुटन के चार मुख्य प्रकार हैं:
1. अनुप्रस्थ स्फुटन (Transverse Dehiscence): इसमें परागकोष की पालियाँ आड़ी दिशा में फटती हैं। उदाहरण: तुलसी (Ocimum sanctum)।
2. लम्बवत् स्फुटन (Longitudinal Dehiscence): इस प्रकार में परागकोष की पालियाँ लंबी दिशा में फटती हैं। उदाहरण: धतूरा (Datura), कपास (Gossypium) आदि।
3. छिद्रमय स्फुटन (Porous Dehiscence): इसमें परागकोष के शीर्ष पर छोटे छिद्र बन जाते हैं जिनसे परागकण बाहर निकलते हैं। उदाहरण: मकोय (Solanum nigrum)।
4. कपाटीय स्फुटन (Valvular Dehiscence): इसमें परागकोष में एक या दो या अधिक कपाट (flaps) बन जाते हैं जो खुलते हैं, और परागकण बाहर फैल जाते हैं। उदाहरण: बारबेरिस (Berberis)।
In simple words: परागकोष का फटना (स्फुटन) कई तरीकों से होता है, जैसे आड़ा (तुलसी), लंबा (धतूरा), छेद से (मकोय), या कपाट से (बारबेरिस)।

🎯 Exam Tip: परागकोष के स्फुटन के प्रकार पौधों की प्रजातियों के लिए विशिष्ट होते हैं और परागण के तरीके को प्रभावित करते हैं, इसलिए प्रत्येक प्रकार के उदाहरण याद रखें।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 2 निबंधात्मक प्रश्न

 

Question 11. लघुबीजाणु जनन तथा गुरुबीजाणुजनन में अन्तर लिखिए।
Answer:

लघु बीजाणु जनन (Microsporogenesis)गुरु बीजाणु जनन (Megasporogenesis)
1. इसमें द्विगुणित (2n) लघुबीजाणु मातृ कोशिका से अगुणित (n) लघुबीजाणुओं या परागकणों का निर्माण होता है।1. इसमें द्विगुणित गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से अगुणित गुरुबीजाणुओं का निर्माण होता है।
2. यह परागकोष की परागधानी या लघुबीजाणु धानी में होता है।2. यह बीजाण्ड या गुरुबीजाणु धानी में होता है।
3. लघुबीजाणुधानी में अनेक लघु बीजाणु मातृ कोशिकाएँ होती हैं।3. गुरुबीजाणु धानी में प्रायः एकल गुरुबीजाणु मातृ कोशिका होती है।
4. एक लघुबीजाणु मातृ कोशिका से चार लघुबीजाणु बनते हैं जो चतुष्कीय चतुष्क में व्यवस्थित होते हैं।4. गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से बने चार गुरुबीजाणु प्रायः रैखिक चतुष्क में व्यवस्थित रहते हैं।
5. प्रायः चारों लघुबीजाणु सक्रिय होते हैं।5. केवल एक गुरुबीजाणु सक्रिय होता है।

In simple words: लघुबीजाणु जनन से परागकण बनते हैं और गुरुबीजाणु जनन से गुरुबीजाणु बनते हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं में कोशिका विभाजन का तरीका और परिणाम अलग-अलग होते हैं।

🎯 Exam Tip: तालिका के रूप में अंतर लिखना बिंदुओं को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करने का एक अच्छा तरीका है, जिससे परीक्षक को समझने में आसानी होती है।

 

Question 2. गुरुबीजाणु पर्ण क्या है? बीजाण्ड की संरचना समझाइए।
Answer: गुरुबीजाणु पर्ण (Megasporophyll) अण्डप (Carpel) का ही दूसरा नाम है। यह मादा प्रजनन अंग का हिस्सा है जो गुरुबीजाणु (बीजाण्ड) को उत्पन्न करता है। आवृतबीजी पौधों में बीजाण्ड की संरचना बहुत जटिल होती है।
बीजाण्ड की संरचना:
एक सामान्य परिपक्व बीजाण्ड लगभग गोलाकार या अंडाकार होता है। इसका मुख्य भाग मृदूतकीय कोशिकाओं (Parenchymatous cells) का बना होता है, जिसे बीजाण्डकाय (Nucellus) कहते हैं। बीजाण्डकाय मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) को पोषण देता है। बीजाण्डकाय को पूरी तरह से अध्यावरण (Integuments) नहीं ढकते हैं, बल्कि कुछ जगह पर एक पतली नलिका जैसी संरचना बनती है जिसे बीजाण्डद्वार (Micropyle) कहते हैं। बीजाण्डकाय का आधार वाला भाग निभाग (Chalaza) कहलाता है, और यहीं से अध्यावरणों की उत्पत्ति होती है।
प्रत्येक बीजाण्ड एक वृंतनुमा संरचना द्वारा अंडाशय की भीतरी दीवार (बीजाण्डासन - Placentation) से जुड़ा होता है। इस डंठल जैसी संरचना को बीजाण्डवृन्त (Funicle) कहते हैं। बीजाण्डवृन्त जिस स्थान पर बीजाण्ड से जुड़ता है उसे नाभिका (Hilum) कहते हैं। कभी-कभी बीजाण्डवृन्त के जुड़ने वाले स्थान पर एक उभार जैसी रचना पाई जाती है जिसे रैफी (Raphe) कहते हैं।
बीजाण्ड में बीजाण्डद्वार के पास मादा युग्मकोद्भिद के रूप में भ्रूणकोष (Embryo sac) पाया जाता है। भ्रूणकोष में बीजाण्डद्वार वाले सिरे पर तीन कोशिकाओं का एक समूह होता है, जिसे अण्ड समुच्चय (Egg apparatus) कहते हैं। इस समुच्चय में नाशपाती के आकार की एक अण्ड कोशिका (Egg cell) और दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids) होती हैं। निभागीय सिरे पर भ्रूणकोष में तीन प्रतिमुखी कोशिकाएँ (Antipodal cells) होती हैं। भ्रूणकोष के बीच में एक केन्द्रीय कोशिका (Central cell) होती है, जिसमें दो अगुणित ध्रुवीय केन्द्रक (Polar nuclei) होते हैं। ये निषेचन से ठीक पहले आपस में मिलकर द्विगुणित द्वितीयक केन्द्रक (Secondary definitive nucleus) बनाते हैं। यह संरचना फूल वाले पौधों में प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: गुरुबीजाणु पर्ण अण्डप का दूसरा नाम है। बीजाण्ड एक गोल संरचना है जिसमें बीजाण्डकाय, बीजाण्डद्वार, निभाग, बीजाण्डवृन्त और भ्रूणकोष जैसे भाग होते हैं। भ्रूणकोष में अण्ड समुच्चय और प्रतिमुखी कोशिकाएँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: बीजाण्ड की संरचना का नामांकित चित्र बनाना और प्रत्येक भाग के कार्य को समझना इस प्रश्न के लिए महत्वपूर्ण है। चित्र के सभी महत्वपूर्ण भागों को सही ढंग से लेबल करें।

 

Question 3. गुरुबीजाणु जनन की प्रक्रिया का सचित्र उल्लेख कीजिए।
Answer: गुरुबीजाणु जनन (Megasporogenesis) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा गुरुबीजाणु मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell) से गुरुबीजाणुओं (Megaspores) का विकास होता है। यह प्रक्रिया फूल वाले पौधों में मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) के निर्माण के लिए पहला कदम है।
प्रक्रिया के चरण:
1. शुरुआती कोशिका: बीजाण्डकाय (Nucellus) की अधस्त्वचा (Hypodermis) में से कोई एक कोशिका प्रपसू आरम्भक (Archesporial cell) के रूप में कार्य करती है। यह कोशिका आकार में बड़ी होती है और इसमें घना जीवद्रव्य व एक स्पष्ट केंद्रक होता है।
2. गुरुबीजाणु मातृ कोशिका: यह प्रपसू आरम्भक कोशिका बिना विभाजन के सीधे गुरुबीजाणु मातृ कोशिका के रूप में कार्य करती है, या कभी-कभी प्राथमिक भित्तीय और प्राथमिक बीजाणुजन कोशिकाओं में विभाजित होने के बाद प्राथमिक बीजाणुजन कोशिका गुरुबीजाणु मातृ कोशिका बनती है। यह द्विगुणित (2n) कोशिका होती है।
3. अर्द्धसूत्री विभाजन: गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) होता है, जिससे चार अगुणित (Haploid) गुरुबीजाणु बनते हैं। ये गुरुबीजाणु अक्सर एक रैखिक चतुष्क (Linear tetrad) के रूप में व्यवस्थित होते हैं।
4. गुरुबीजाणु का विकास: इन चार अगुणित गुरुबीजाणुओं में से, आमतौर पर केवल एक ही (जो निभागीय छोर की ओर होता है) सक्रिय (Functional) रहता है। बाकी तीन गुरुबीजाणु (जो बीजाण्डद्वारी छोर की ओर होते हैं) नष्ट (Degenerate) हो जाते हैं। सक्रिय गुरुबीजाणु फिर मादा युग्मकोद्भिद या भ्रूणकोष को जन्म देने के लिए आगे बढ़ता है।
यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि मादा युग्मकोद्भिद में सही संख्या में गुणसूत्र हों और निषेचन के लिए तैयार हो।
In simple words: गुरुबीजाणु जनन में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से चार गुरुबीजाणु बनते हैं, जिसमें से एक सक्रिय रहता है और भ्रूणकोष बनाता है।

🎯 Exam Tip: गुरुबीजाणु जनन में अर्द्धसूत्री विभाजन और चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक का सक्रिय रहना, ये दो मुख्य बिंदु हैं जिन्हें उत्तर में ज़रूर शामिल करें।

 

Question 4. नर युग्मकोभिद् तथा मादा युग्मकोभिद् में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: नर युग्मकोद्भिद (Male gametophyte) और मादा युग्मकोद्भिद (Female gametophyte) में कई महत्वपूर्ण अंतर होते हैं, जो पौधों के प्रजनन चक्र के लिए आवश्यक हैं:

नर युग्मकोद्भिद (Male Gametophyte)मादा युग्मकोद्भिद (Female Gametophyte)
1. यह परागकण के अंदर विकसित होता है।1. यह बीजाण्ड के अंदर भ्रूणकोष के रूप में विकसित होता है।
2. इसका विकास दो चरणों में होता है- परागण से पहले और परागण के बाद।2. इसका विकास आमतौर पर एक ही चरण में (निषेचन से पहले) पूरा होता है।
3. नर युग्मकोद्भिद (परागकण) परागकोष से बाहर निकलता है।3. मादा युग्mकोद्भिद (भ्रूणकोष) बीजाण्ड के अंदर ही रहता है।
4. इसकी वृद्धि मादा जननांग (स्त्रीकेसर) पर पूरी होती है, क्योंकि नर युग्मकों को मादा युग्मकोद्भिद तक पहुँचना होता है।4. इसकी पूरी वृद्धि बीजाण्ड के अंदर ही होती है।
5. इसमें तीन कोशिकाएँ होती हैं- एक कायिक/नलिका कोशिका और दो नर युग्मक।5. इसमें सात कोशिकाएँ (एक अण्ड कोशिका, दो सहायक कोशिकाएँ, तीन प्रतिमुखी कोशिकाएँ और एक केन्द्रीय संलयन कोशिका) होती हैं और आठ केन्द्रक होते हैं।
6. इसकी सभी कोशिकाएँ (कायिक और जनन कोशिकाएँ) सक्रिय होती हैं और प्रजनन में भाग लेती हैं।6. इसकी सभी कोशिकाएँ आवश्यक नहीं होती हैं; केवल अण्ड कोशिका और केन्द्रीय संलयन कोशिका निषेचन में भाग लेती हैं। सहायक कोशिकाएँ परागनली को रास्ता दिखाती हैं।
7. निषेचन के बाद नर युग्मकोद्भिद का शेष भाग नष्ट हो जाता है।7. निषेचन के बाद मादा युग्मकोद्भिद से भ्रूण और भ्रूणपोष का विकास होता है।

In simple words: नर युग्मकोद्भिद परागकण होता है जो नर युग्मक बनाता है, जबकि मादा युग्मकोद्भिद भ्रूणकोष होता है जो मादा युग्मक बनाता है। दोनों के स्थान, विकास के चरण और कोशिका संरचना अलग-अलग होते हैं।

🎯 Exam Tip: इन दोनों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझने से आवृतबीजी पौधों के प्रजनन चक्र को समझने में मदद मिलती है। तालिका बनाना तुलना के लिए सबसे प्रभावी तरीका है।

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