RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

Official RBSE Solutions for Class 12 Biology: Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

Access comprehensive textbook solutions for Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप using the official curriculum guides for Class 12 Biology. Designed to align with the 2026-27 RBSE standards, these detailed answers help students reinforce core academic concepts.

Chapter-wise Solutions for Biology: Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

View or download the dedicated Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप solution resource below. Engaging with these textbook answers under focused study conditions ensures continuous academic progress and mastery of the 2026-27 curriculum for Biology.

RBSE Class 12 Biology Chapter 18 बहुविकल्पीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. किस पादप में वसीय तेल नहीं मिलता है।
(a) सरसों
(b) नारियल
(c) सूरजमुखी
(d) गुलाब
Answer: (c) सूरजमुखी
In simple words: सूरजमुखी के पौधे में वसीय तेल नहीं होता है।

🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में पौधों और उनसे प्राप्त उत्पादों के बारे में जानकारी याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके विशिष्ट गुणों के संदर्भ में।

 

प्रश्न 3. तीव्र गंध वाला एलिल आइसोथायोसाइनेट किस पादप के तेल में पाया जाता है।
(a) सोयाबीन
(b) सरसों
(c) मूंगफली
(d) अरण्डी
Answer: (b) सरसों
In simple words: सरसों के तेल में एलिल आइसोथायोसाइनेट नाम का एक यौगिक होता है, जिसकी वजह से इसमें तेज गंध आती है।

🎯 Exam Tip: पौधों से जुड़े रासायनिक यौगिकों और उनके विशिष्ट गुणों को याद रखना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, किस पौधे में कौन सा सक्रिय तत्व पाया जाता है, यह अक्सर पूछा जाता है।

 

प्रश्न 4. भ्रूणपोष से तेल किस पादप से मिलता है?
(a) सूरजमुखी
(b) नारियल
(c) मूंगफली
(d) ऑयल पाम
Answer: (b) नारियल
In simple words: नारियल के अंदरूनी हिस्से, जिसे भ्रूणपोष कहते हैं, से तेल निकलता है।

🎯 Exam Tip: पौधों के विभिन्न भागों से प्राप्त होने वाले उत्पादों को ध्यान में रखें, जैसे कि बीज, फल, तना या भ्रूणपोष से क्या मिलता है।

 

प्रश्न 5. पूँज पादप के किस अंग से प्राप्त की जाती है?
(a) पर्णो से
(b) तने से
(c) बीजों से
(d) मूलों से
Answer: (a) पर्णो से
In simple words: पूँज नामक पौधा अपने पत्तों से मिलता है।

🎯 Exam Tip: पादपों के उपयोगी भागों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई पौधों के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग उपयोगों में आते हैं।

 

प्रश्न 7. लौंग पौधे का कौन-सा अंग है।
(a) पुष्प कलिकायें
(b) बीज
(c) उपरोक्त कोई नहीं
(d) फल
Answer: (a) पुष्प कलिकायें
In simple words: लौंग दरअसल पौधे की सूखी हुई फूल की कली होती है।

🎯 Exam Tip: आम मसालों और औषधीय पौधों के किस भाग का उपयोग किया जाता है, यह जानना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 8. लाल मिर्च को तीखापन जिस यौगिक के कारण है, वह है
(a) कुर्कुमिन
(b) कैप्सेइसिन
(c) एनिथॉल
(d) थाइमोल
Answer: (b) कैप्सेइसिन
In simple words: लाल मिर्च में कैप्सेइसिन नाम का रसायन होता है, जिसके कारण यह तीखी लगती है।

🎯 Exam Tip: खाद्य पदार्थों में उनके विशिष्ट स्वाद या गुण के लिए जिम्मेदार रासायनिक यौगिकों के नाम अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं।

 

प्रश्न 9. फादर ऑफ मेडिसिन कौन है?
(a) चरक
(b) हिप्पोक्रेट्स
(c) धनवन्तरि
(d) थियोफ्रास्टस
Answer: (b) हिप्पोक्रेट्स
In simple words: हिप्पोक्रेट्स को चिकित्सा विज्ञान का पिता कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान और चिकित्सा से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों के योगदान और उपाधियों को याद रखें।

 

RBSE Class 12 Biology Chapter 18 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. सरसों के तेल की तीखी गंध किस पदार्थ की उपस्थिति से होती है ?
Answer: सरसों के तेल की तीखी गंध उसमें मौजूद गंधक वाले यौगिक, एलिल आइसोथायोसाइनेट, के कारण होती है।
In simple words: सरसों के तेल में एलिल आइसोथायोसाइनेट नाम का पदार्थ होता है, जिसकी वजह से उसमें तेज गंध आती है।

🎯 Exam Tip: पौधों और उनके उत्पादों के विशिष्ट गुणों के लिए जिम्मेदार रासायनिक यौगिकों को याद रखें।

 

प्रश्न 2. अरण्डी का वानस्पतिक नाम तथा कुल का नाम लिखिए।
Answer: अरण्डी (Castor Oil Plant) का वानस्पतिक नाम रिसिनस काम्युनिस (Ricinus communis) है और इसका कुल यूफोर्बिएसी (Euphorbiaceae) है।
In simple words: अरण्डी का वैज्ञानिक नाम रिसिनस काम्युनिस है और यह यूफोर्बिएसी परिवार का पौधा है।

🎯 Exam Tip: पौधों के वैज्ञानिक नाम (वानस्पतिक नाम) और उनके कुल (परिवार) को सही ढंग से याद करना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 3. सौंफ के बीज चबाने पर मीठे क्यों लगते हैं?
Answer: सौंफ के बीज एनिथोल और फेनचोन नामक यौगिकों की उपस्थिति के कारण चबाने पर मीठे लगते हैं।
In simple words: सौंफ के बीजों में एनिथोल और फेनचोन नाम के पदार्थ होते हैं, जिससे उनका स्वाद मीठा लगता है।

🎯 Exam Tip: पौधों के औषधीय या खाद्य गुणों के लिए जिम्मेदार मुख्य रसायनों के नाम याद रखें।

 

प्रश्न 4. हल्दी का पीला रंग किससे है?
Answer: हल्दी का पीला रंग कुरकुमिन (Curcumin) नामक पदार्थ की उपस्थिति के कारण होता है।
In simple words: हल्दी का पीला रंग उसमें मौजूद कुरकुमिन नामक रसायन के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक रंगों और उनके रासायनिक घटकों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 5. कुनैन किस रोग में उपयोगी है?
Answer: कुनैन मलेरिया रोग के इलाज में बहुत प्रभावी औषधि है।
In simple words: कुनैन का उपयोग मलेरिया बीमारी को ठीक करने के लिए किया जाता है।

🎯 Exam Tip: प्रमुख औषधीय पौधों और उनसे प्राप्त दवाओं का उपयोग किस बीमारी में होता है, यह जानना महत्वपूर्ण है।

 

RBSE Class 12 Biology Chapter 18 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. अशुष्कन व शुष्कन तेल में सोदाहरण विभेदन कीजिए।
Answer: अशुष्कन व शुष्कन तेल में अंतर इस प्रकार है:

अशुष्कन तेल (Non Drying Oil)शुष्कन तेल (Drying Oil)
1. यदि इन तेलों को हवा में खुला रखा जाए, तो वे वायु के संपर्क में आने पर किसी भी प्रकार की कोई परत नहीं बनाते हैं।1. ये तेल वायु के संपर्क में आने पर अपनी सतह पर एक लचीली परत बना लेते हैं।
2. उदाहरण: सरसों, अरण्डी, मूंगफली के तेल।2. उदाहरण: अलसी, सोयाबीन, कुसुम के तेल।

In simple words: कुछ तेल हवा में सूखकर सख्त परत नहीं बनाते (अशुष्कन तेल), जबकि कुछ तेल हवा के संपर्क में आने पर सूखकर एक लचीली परत बना लेते हैं (शुष्कन तेल)।

🎯 Exam Tip: तेलों के प्रकार और उनके गुणों को उदाहरणों के साथ याद करें। उनके मुख्य अंतरों पर ध्यान दें।

 

प्रश्न 2. स्थिर तेल, रेशे, मसाले तथा औषधि प्रदान करने वाले एक-एक पादप का वानस्पतिक नाम तथा उपयोगी पादप भाग बताइये।
Answer:
स्थिर तेल प्रदान करने वाला पादप: मूंगफली (Groundnut)
वानस्पतिक नाम – एरेकिस हाइपोजिया (Arachis hypogea)
तेल के लिए उपयोगी पादप भाग – बीज।

रेशे प्रदान करने वाला पादप: कपास (Cotton)
वानस्पतिक नाम – गॉसीपियम हिर्स्टम (Gossypium hirsutum)
उपयोगी पादप भाग – रेशे के लिए बाह्यबीजचोल पर स्थित सतह रेशे। वसीय तेलों के लिए बीज।

मसाले प्रदान करने वाला पादप: लौंग (Clove)
वानस्पतिक नाम – सिजीजियम एरोमेटिकम (Syzygium aromaticum)
उपयोगी पादप भाग – शुष्क पुष्प कलिकाएँ

औषधि प्रदान करने वाला पादप: कुनैन, या सिनकोना (Quinine tree, or Cinchorna tree)
वानस्पतिक नाम – सिनकोना ऑफिसिनेलिस (Cinchona officinalis)
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ की शुष्क छाल
In simple words: मूंगफली से स्थिर तेल (बीज), कपास से रेशे (बीज पर लगे रेशे), लौंग से मसाले (सूखी फूल की कली) और कुनैन से औषधि (छाल) प्राप्त होती है। हर एक का अपना वैज्ञानिक नाम और उपयोगी हिस्सा होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के पौधों, उनके वैज्ञानिक नामों और उनसे प्राप्त होने वाले उपयोगी भागों को याद रखना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ग से कम से कम एक उदाहरण तैयार करें।

 

प्रश्न 4. बीजों से प्राप्त मसालों के दो उदाहरण दीजिए।
Answer: बीजों से प्राप्त होने वाले दो मसालों के उदाहरण इस प्रकार हैं:
1. काली मिर्च (Black Pepper)
वानस्पतिक नाम – पाइपर नाइग्रम (Piper nigrum)
कुल – पाइपिरेसी (Piperaceae)
उपयोगी पादप भाग – अपरिपक्व शुष्क ड्रप फल। काली मिर्च का मसाले के रूप में व्यापक उपयोग किया जाता है।

2. सौंफ (Fennel)
वानस्पतिक नाम – फीनीकुलम वल्गेअर (Foeniculum vulgare)
कुल – एपीएसी या अम्बेलीफेरी (Apiaceae, or Umbelliferae)
उपयोगी पादप भाग – परिपक्व क्रीमोकार्प फल। सौंफ का प्रयोग मसाले के रूप में अचार आदि को तैयार करने में किया जाता है।
In simple words: बीजों से मिलने वाले मसालों में काली मिर्च और सौंफ शामिल हैं। काली मिर्च एक सूखा फल है, जबकि सौंफ एक पका हुआ फल है, और दोनों का उपयोग खाना बनाने में होता है।

🎯 Exam Tip: मसालों को उनके वानस्पतिक नाम, कुल और उपयोगी भागों के साथ याद करें। उनके मुख्य उपयोगों पर भी ध्यान दें।

 

प्रश्न 5. उत्पत्ति के आधार पर पादप रेशों का वर्गीकरण लिखिए।
Answer: उत्पत्ति के आधार पर पादप रेशों को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
सतह रेशे (Surface Fibres): ये रेशे पौधे के बीज या फल की सतह पर एक अतिरिक्त वृद्धि के रूप में उत्पन्न होते हैं, जैसे कपास।
मृदु, स्तम्भ या बास्ट रेशे (Soft, stem or Bast Fibres): ये रेशे द्विबीजपत्री पौधों के तने के फ्लोएम और परिरम्भ से प्राप्त होते हैं। ये संकीर्ण, लंबे और मजबूत लकड़ी जैसी कोशिकाएँ होती हैं, जैसे जूट, सन, पटसन।
कड़े या पर्ण रेशे (Hard or Leaf Fibres): ये एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों से प्राप्त होते हैं, जैसे मुंज, ऐरा, पटेरी।
In simple words: पौधे से रेशे कहाँ से मिलते हैं, इसके आधार पर तीन प्रकार होते हैं: बीज या फल की सतह से (जैसे कपास), तने से (जैसे जूट), या पत्तियों से (जैसे मुंज)।

🎯 Exam Tip: रेशों के वर्गीकरण को उनके उत्पत्ति स्थान और उदाहरणों के साथ अच्छी तरह से समझें।

 

प्रश्न 6. कुनैन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: कुनैन (Quinine Tree) एक सदाबहार मध्यम आकार का पेड़ या झाड़ी है।
वानस्पतिक नाम – सिनकोना ऑफिसिनेलिस (Cinchona officinalis)
कुल – रूबिएसी (Rubiaceae)
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ की शुष्क छाल

कुनैन को दक्षिण अमेरिका के एंडीज प्रदेश से प्राप्त किया जाता है। भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और अफ्रीका में भी इसकी खेती होती है। कुनैन की छाल से 30 प्रकार के एल्केलाइड मिलते हैं, जिनमें कुनैन, किनीडीन और सिन्कोनीडोन प्रमुख हैं। कुनैन मलेरिया के इलाज में बहुत प्रभावी है। इसका उपयोग निमोनिया और अमीबीय पेचिश में भी किया जाता है।
In simple words: कुनैन एक पेड़ है जिसकी छाल से दवाई मिलती है। इसका वैज्ञानिक नाम सिनकोना ऑफिसिनेलिस है। यह मुख्य रूप से मलेरिया का इलाज करती है और दक्षिण अमेरिका से आती है।

🎯 Exam Tip: औषधीय पौधों के बारे में टिप्पणी लिखते समय, उनके वानस्पतिक नाम, कुल, उपयोगी भाग, उत्पत्ति स्थान और मुख्य उपयोगों को शामिल करना न भूलें।

 

RBSE Class 12 Biology Chapter 18 निबन्धात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. उपयोगिता के आधार पर पादप रेशों का वर्गीकरण देते हुए, वस्त्र रेशों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
Answer: उपयोगिता के आधार पर पादप रेशों को छह वर्गों में बांटा गया है:
वस्त्र रेशे (Textile Fibres): इन रेशों का उपयोग कपड़े, रस्सियाँ, बोरे, सूत आदि बनाने में होता है, जैसे कपास, जूट, सन आदि।
कुर्च या ब्रुश रेशे (Brush Fibres): ये रेशे झाड़ू, ब्रुश बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, जैसे खजूर की पत्तियाँ।
गूंथने तथा खुरदरे बुनने वाले रेशे (Plaiting and rough weaving fibres): इन रेशों का उपयोग टोकरियाँ, चटाइयाँ, कुर्सियों की सीट आदि बनाने में किया जाता है, जैसे बांस।
भराव रेशे (Filling Fibres): जैसे कपास, मदार, सेमल, कोयर (नारियल) आदि के रेशे रजाई, गद्दे तथा तकिए आदि भरने में उपयोग किए जाते हैं।
प्राकृतिक रेशे (Natural Fibres): शहतूत (Broussonetia papyrifera) की छाल से टापा वस्त्र (Tapa cloth) बनाया जाता है।
कागज बनाने वाले रेशे (Paper making fibres): बांस, नीलगिरि (Eucalyptus) कई प्रकार की घासें, सफेदा (Populus alba) आदि सभी कागज बनाने वाले रेशे हैं। इनसे कागज, बोर्ड आदि बनाए जाते हैं।

वस्त्र रेशे (Textile Fibres)
कपास (Cotton):
वानस्पतिक नाम – गॉसीपियम जातियाँ (Gossypium spp.)
कुल – मालवेसी (Malvaceae)
आर्थिक दृष्टि से उपयोगी पादप भाग – रेशों के लिए बाह्यबीजचोल (Testa) पर स्थित सतह रेशे, वसीय तेलों के लिए बीज।

भारत प्राचीन काल से कपास और उससे जुड़े उत्पादों के निर्माण का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ की ढाका मलमल विश्व प्रसिद्ध थी। कपास का पौधा एक साल का, 2-6 फीट ऊंचा होता है। इसका तना सीधा, शाखाहीन, लकड़ी जैसा और भूरे रंग का होता है। पत्तियाँ हथेली जैसी होती हैं, फूल बड़े और पीले रंग के होते हैं। इसके फल कैप्सूल जैसे होते हैं। जब कच्चा फल डोडी कहलाता है, तो कपास का बीज अंडाकार, भूरा होता है और बाहरी बीजकोष पर लंबे, सफेद रेशे उगते हैं। लिंट या स्टेपल व्यापारिक रेशा होता है और इसके साथ छोटे रेशे फज भी होते हैं। MCu-2, 3, Ak-277, सुजाता, महालक्ष्मी, वराहलक्ष्मी आदि कपास की प्रमुख किस्में हैं।

कपास के उपयोग:
• कपास के रेशों (रूई) से सूती कपड़े, मिश्रित कपड़े, होजरी उत्पाद बनाए जाते हैं।
• रेशे शुद्ध सेल्युलोज से बने होते हैं, इसलिए उद्योग में कच्ची सामग्री के रूप में उपयोग होते हैं।
• इनका उपयोग कंबल, रस्से, दरियाँ, फर्श और टायरों को बनाने में किया जाता है।
• गद्दे, तकिए, रजाई भरने में उपयोग होते हैं।
• इन रेशों से अवशोषक रूई, पट्टियाँ आदि बनाई जाती हैं।
• कपास के बीज का उपयोग अर्धशुष्कन खाद्य तेल प्राप्त करने में भी होता है।

सन, सनई (San, Sunhemp):
वानस्पतिक नाम – क्रोटेलेरिया जन्सिया (Crotalaria juncea)
कुल – लेग्युमिनोसी (Leguminosae) अथवा फेबेसी (Fabaceae)
उपकुल – पेपिलियोनेटी (Papilionatae)
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ फ्लोएम रेशे तथा परिरम्भ रेशे।

रेशों का उपयोग:
• सन के रेशों को बटकर मुख्य रूप से रस्से बनाए जाते हैं।
• इन रेशों से किरमिच (Canvas), बोरियाँ, मछली पकड़ने के जाल और पतली डोरियाँ बनाई जाती हैं।
• अपरिपक्व रेशों से सिगरेट का कागज, टिशु पेपर बनाए जाते हैं।
• पूरा पौधा हरी खाद के रूप में उपयोगी होता है।
• बीजों से प्राप्त गोंद छपाई उद्योग में उपयोगी होता है।
In simple words: पादप रेशे छह प्रकार के होते हैं, जैसे कपड़े बनाने वाले, झाड़ू बनाने वाले, चटाई बनाने वाले, भरने वाले, प्राकृतिक रेशे और कागज बनाने वाले। कपास और सन जैसे रेशे कपड़े, रस्सियाँ और अन्य चीजें बनाने में काम आते हैं, और इनके अपने वैज्ञानिक नाम और उपयोग होते हैं।

🎯 Exam Tip: उपयोगिता के आधार पर रेशों का वर्गीकरण करते समय, प्रत्येक वर्ग के नाम, उनके मुख्य उपयोग और कम से कम दो उदाहरण याद करें। वस्त्र रेशों पर विशेष ध्यान दें और उनके वानस्पतिक नाम, कुल तथा उपयोगी भागों का विवरण दें।

 

प्रश्न 2. सर्पगन्धा तथा हींग का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: सर्पगन्धा तथा हींग का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:

सर्पगंधा (Serpent Wood):
वानस्पतिक नाम – रोवॉल्फिया सपेण्टाइना (Rauvolfia serpentina)
कुल – एपोसाइनेसी (Apocynaceae)
उपयोगी पादप भाग – शुष्क मूलें व मूलों की छाल।

उत्पत्ति: इस पादप को 'पागल की दवा' भी कहते हैं। भारत ही इसका मूल उत्पत्ति स्थान है। यह बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और अफ्रीका में भी पाया जाता है। भारत में असोम, हिमालय के तराई प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर इसकी व्यावसायिक खेती होती है।

पादप:
• सर्पगन्धा पादप एक बहुवर्षीय, सदाबहार, रोमरहित, छोटी झाड़ी होती है।
• इसकी जड़ें कंदिल, लहरदार, टेढ़ी-मेढ़ी (साँप की आकृति की), झुर्रीदार और खुरदरी होती हैं। इनकी ताजा जड़ों में साँप जैसी गंध आती है।
• सर्पगन्धा की पत्तियाँ सरल, चक्रिक, बड़ी और भालाकार होती हैं।
• पुष्पक्रम सीमाबद्ध होता है। इसके फूल छोटे, सफेद या हल्के गुलाबी रंग के होते हैं और फल कैप्सूल जैसे होते हैं।
• पादप की जड़ों और छाल से औषधि प्राप्त की जाती है।
• सर्पगन्धा की मूल-छाल में सर्वाधिक (90%) एल्केलोइड्स होते हैं। रिसर्पिन सबसे महत्वपूर्ण एल्केलाइड है और अन्य अजामेलिन, अजामेलिनन, रॉवोल्फिनिन आदि हैं।

उपयोग:
• इसका उपयोग मानसिक रोगों, अनिद्रा, मिर्गी और उच्च रक्तचाप में सपेन्टाइन के रूप में किया जाता है।
• यह तीव्र पागलपन की प्रभावी दवा है।
• इसे सर्पदंश, बिच्छू और कीड़ों के जहर के प्रतिविष (Antitoxin) के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
• यह आसान प्रसव के लिए प्रसूता को दिया जाता है।
• सर्पगन्धा काढ़ा दस्त, पेचिश और आंतों के दर्द में लाभकारी होता है। यह कृमिनाशक भी है।
• सर्पगन्धा से सरपीना, सर्पगन्धा टैबलेट, घनवटी, गुटिका, स्लीपिल्स आदि औषधियाँ बनती हैं।

हींग (Asafoetida):
वानस्पतिक नाम – फेरुला ऐसोफोइटिडा (Ferula asafoetida)
कुल – एपीएसी, या अम्बेलीफेरी (Apiaceae, or Umbellifere)
उपयोगी पादप भाग – मूलकंदों से स्रावित ओलियो गमरेजिन

पादप:
• यह पादप एक बहुवर्षीय छोटी झाड़ी है।
• इसकी मूलें और मूलकंदों की आकृति शंक्वाकार होती है।
• इसका तना सीधा, पत्तियाँ बड़ी और विभाजित होती हैं।
• हींग पादप का पुष्पक्रम छत्रक होता है।
• इसके फूल एकलिंगी और द्विलिंगी होते हैं और फल छोटे होते हैं।
• हींग की खेती अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, ईरान, पाकिस्तान और भारत (जम्मू-कश्मीर) में की जाती है।
• हींग के पादप से हींग प्राप्त करने के लिए एक वर्ष की झाड़ियों को जमीन के पास से काट दिया जाता है। इस भाग से ओलियोरेजिन रिसकर गाढ़ा हींग बन जाता है। हींग का स्वाद गंधकयुक्त यौगिकों और फेरुलिक अम्ल के कारण होता है।

उपयोग:
• इसका उपयोग कुछ विशेष रोगों के लिए किया जाता है, जैसे पुरानी श्वसनीशोथ (Chronic bronchitis), पेट दर्द, अपच, मंदाग्नि, आफरा, मूर्छा, पेट फूलना और मिर्गी आदि।
• हिंग्वाष्टक चूर्ण, योगराज, गुग्गुल, हिंगड़ी वटी आदि प्रमुख आयुर्वेदिक योग हींग से बनते हैं।
• हमारे भोजन में हींग एक प्रमुख मसाले के रूप में उपयोग होती है।
In simple words: सर्पगन्धा एक झाड़ी है जिसकी जड़ें कई बीमारियों, खासकर मानसिक रोगों और मलेरिया में दवा के रूप में काम आती हैं। हींग एक और पौधा है जिसके जड़ों से एक गाढ़ा गोंद निकलता है, जो मसाले के रूप में और पेट की समस्याओं के इलाज में उपयोग होता है।

🎯 Exam Tip: औषधीय पौधों पर विस्तृत वर्णन करते समय, उनके वानस्पतिक नाम, कुल, उपयोगी भाग, उत्पत्ति, पौधे की विशेषताएँ और विशिष्ट उपयोगों को बिंदुवार स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 3. मसालों पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
Answer: मसाले (Spices): हिल (1952) ने मसालों को "सामान्य रूप से शुष्क और कड़े पादप पदार्थ जिनमें सुगंधित तेल (Essential oil) मौजूद हो, और जिन्हें चूर्ण के रूप में उपयोग किया जाता हो," के रूप में परिभाषित किया है। इन्हें खाद्य पूरक (Food adjuncts) कहा जाता है। इनका उपयोग भोजन को स्वादिष्ट, सुगंधित, पाचक और पौष्टिक बनाने के लिए किया जाता है। भारतीय मसालों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

1. लौंग (Clove):
वानस्पतिक नाम – सिजीजियम ऐरोमेटिकम (Syzygium aromaticum)
कुल – मिटेंसी (Myrtaceae)
उपयोगी पादप भाग – शुष्क पुष्प कलिकाएँ।

लौंग सीमाबद्ध पुष्पक्रम से उत्पन्न होती है। लौंग की अधखिली फूलों की कलियों को सुखाकर प्राप्त किया जाता है। इसकी रुचिकर और तीव्र गंध इसमें मौजूद वाष्पशील तेल यूजिनोल (Euginol) के कारण होती है। लौंग गर्म मसाले का प्रमुख घटक है। यह वातहर होने के कारण अजीर्ण और पेट में खिंचाव के इलाज में उपयोग होती है।

2. काली मिर्च (Black Pepper):
वानस्पतिक नाम – पाइपर नाइग्रम (Piper nigrum)
कुल – पाइसिरेसी (Piperaceae)

काली मिर्च के अपरिपक्व सूखे फल को मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है। इसे मसालों का राजा कहते हैं। इसका मसाले और औषधि दोनों के रूप में व्यापक उपयोग होता है। इसे आयुर्वेदिक चूर्णों में भी मिलाया जाता है।

3. हल्दी (Turmeric):
वानस्पतिक नाम – कुरकुमा लौंगा (Curcuma longa)
कुल – जिन्जीबरेसी (Zingiberaceae)

हल्दी के सूखे भूमिगत प्रकंद (Rhizome) को मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग सब्जियों, अचार आदि बनाने में आवश्यक रूप से होता है। यह एक प्रभावी रक्तशोधक औषधि है। इसे चोट लगने पर, त्वचा रोगों, सौंदर्य प्रसाधनों, सूती, रेशमी वस्त्रों को रंगने, धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों में पवित्र पदार्थ के रूप में भी उपयोग किया जाता है। यह सर्दी, जुकाम, खांसी, पीलिया और दमा में भी बहुत लाभकारी है।

4. लालमिर्च (Chillies):
वानस्पतिक नाम – कैप्सिकम एनुअम (Capsicum annuam)
कुल – सोलेनेसी (Salanaceae)

लाल मिर्च के पके लाल सूखे बेर के फल को मसाले के रूप में और कच्चे हरे फलों को सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। लाल मिर्च का चूर्ण एक प्रमुख घटक है।

6. धनिया (Coriander):
वानस्पतिक नाम – कोरिएन्ड्रम सेटाइवम (Coriandrum sativum)
कुल – एपीएसी, या अम्बेलीफेरी (Apiaceae, or Umbellifere)

इसके परिपक्व क्रीमोकार्प फल और पत्तियाँ उपयोग की जाती हैं। इन सूखे फलों के चूर्ण का उपयोग मसाले के रूप में सब्जियों, कढ़ी, चाट, चटनियाँ बनाने में होता है।

7. जीरा (Cumin):
वानस्पतिक नाम – क्यूमिनम साइमिनस (Cuminum cyminurm)
कुल – एपीएसी, या अम्बेलीफेरी (Apiaceae, or Umbellifere)

इसका फल लंबा, अंडाकार और सूखा, परिपक्व क्रीमोकार्प होता है। उपयोगी पादप भाग होने के कारण सब्जियों को तड़का लगाने और सुगंधित करने में उपयोग होता है। भुने हुए जीरे के चूर्ण का उपयोग दही-बड़ों, जलजीरा और आयुर्वेदिक चूर्णों में किया जाता है।

8. अजवायन (Lovage):
वानस्पतिक नाम – ट्रेकीस्पर्मम ऐमी (Trachyspermum ammi)
कुल – एपीएसी, या अम्बेलीफेरी (Apiaceae, or Umbellifere)

इसके भी सूखे, परिपक्व क्रीमोकार्प फल का उपयोग होता है। अजवायन मसालों में प्रमुख स्थान रखती है और मठरी, पकौड़ी, बिस्कुट आदि के पकाने में उपयोग होती है। प्रसव के बाद प्रसूता को अजवायन के लड्डू खिलाए जाते हैं।
In simple words: मसाले सूखे पौधों के हिस्से होते हैं जिनमें सुगंधित तेल होता है, जिनका उपयोग भोजन को स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाने के लिए किया जाता है। लौंग, काली मिर्च, हल्दी, लाल मिर्च, धनिया, जीरा और अजवायन जैसे कई भारतीय मसाले अपने खास गुणों और औषधीय उपयोगों के लिए जाने जाते हैं।

🎯 Exam Tip: मसालों पर निबंध लिखते समय उनकी परिभाषा, सामान्य उपयोग और कम से कम 5-6 प्रमुख भारतीय मसालों का उनके वानस्पतिक नाम, कुल, उपयोगी भाग और विशिष्ट उपयोगों के साथ वर्णन करें।

 

प्रश्न 4. राजस्थान के प्रमुख औषधीय पादपों का वर्णन कीजिए।
Answer: राजस्थान के प्रमुख औषधीय पादपों का वर्णन निम्न प्रकार है:

1. अश्वगंधा (Asutagandha):
वानस्पतिक नाम – विथैनिया सोम्नीफेरा (Withania somnifera)
कुल – सोलेनेसी (Solanaceae)
उपयोगी पादप भाग – मूलें।
औषधीय उपयोग – यह एक शक्तिवर्धक औषधि है, जिसका उपयोग स्नायुओं की कमजोरी को दूर करने के लिए किया जाता है।

2. सतावर (Asparagus):
वानस्पतिक नाम – ऐस्पेरेगस रेसीमोसम (Asparagus racemosus)
कुल – लिलिएसी (Liliaceae)
उपयोगी पादप भाग – मूलें।
औषधीय उपयोग – यह एक शक्तिवर्धक औषधि है, जिसका उपयोग शारीरिक दुर्बलता को समाप्त करने के लिए किया जाता है।

4. अर्जुन (Arjun):
वानस्पतिक नाम – टर्मिनेलिया अर्जुना (Terminalia arjuna)
कुल – कोम्ब्रिटेसी (Combretaceae)
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ की छाल
औषधीय उपयोग – इसका प्रयोग हृदय रोगों में विशेष रूप से किया जाता है।

5. नीम (Neem):
वानस्पतिक नाम – अजेडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta indica)
कुल – मीलिएसी (Meliaceae)
उपयोगी पादप भाग – इसकी तने की छाल, पत्तियाँ आदि विशेष रूप से औषधीय महत्व की होती हैं।
औषधीय उपयोग – यह उत्तम निर्जमीकारी है।

6. ब्राह्मी (Brahmi):
वानस्पतिक नाम – सेन्टेला एशियेटिका (Centella asiatica)
कुल – एपीएसी (Apiaceae)
उपयोगी पादप भाग – इनकी पर्णें विशेष उपयोगी हैं।
औषधीय उपयोग – इसका प्रयोग विशेषकर स्मरण शक्ति को तेज करने के लिए किया जाता है।

7. ग्वारपाठा (Aloe vera):
वानस्पतिक नाम – ऐलोवेरा (Aloe vera)
कुल – लिलिएसी (Liliaceae)
उपयोगी पादप भाग – पर्णें
औषधीय उपयोग – शक्तिवर्धक एवं त्वचा को स्वस्थ करने के लिए प्रयुक्त होती है।

8. तुलसी (Holibasil):
वानस्पतिक नाम – ओसीसम सैक्टम (Ocimum sanctum)
कुल – लेमिएसी (Lamiaceae)
उपयोगी उपयोग – इन्हें खांसी, बुखार आदि में प्रयोग किया जाता है।

9. सोनामुखी:
वानस्पतिक नाम – केसिया एन्गस्टिफोलिया (Cassia angustifolia)
कुल – बसेरेसी (Burseraceae)
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ स्राव
औषधीय उपयोग – गठिया, मोटापे में औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।
In simple words: राजस्थान में कई औषधीय पौधे पाए जाते हैं जैसे अश्वगंधा (कमजोरी), सतावर (शारीरिक दुर्बलता), अर्जुन (हृदय रोग), नीम (कीटाणुनाशक), ब्राह्मी (याददाश्त), ग्वारपाठा (त्वचा और शक्ति), तुलसी (खांसी-बुखार) और सोनामुखी (गठिया)। इन सभी पौधों का अपना वैज्ञानिक नाम और औषधीय उपयोग होता है।

🎯 Exam Tip: औषधीय पादपों का वर्णन करते समय, प्रत्येक पौधे का वानस्पतिक नाम, कुल, उपयोगी भाग और उसके मुख्य औषधीय उपयोग को स्पष्ट रूप से लिखें।

Free study material for Biology

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

Official RBSE Solutions for Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

Access structured RBSE textbook solutions for Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप. Designed in alignment with the latest academic curriculum for Class 12 Biology, these answers cover all end-of-chapter exercises to support daily learning and homework completion.

Step-by-Step Explanations for Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप

Each solution includes detailed reasoning to foster genuine comprehension of Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप concepts. Reviewing these step-by-step breakdowns allows learners to master both analytical and descriptive questions expected in school evaluations.

Next Steps in Your Biology Revision

Frequent review of these structured answers builds strong analytical capabilities and response efficiency. Maximize your academic readiness by combining these textbook solutions with our curated study materials and mock evaluations for Class 12 Biology.

FAQs

Where can I find the latest RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप for the 2026-27 session?

The complete and updated RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 12 Biology are as per latest RBSE curriculum.

Are the Biology RBSE solutions for Class 12 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Biology concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 12 RBSE solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using RBSE language because RBSE marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 12 Biology. You can access RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Biology RBSE solutions for Class 12 as a PDF?

Yes, you can download the entire RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 18 तेल, रेशे, मसाले एवं औषधि उत्पादक पादप in printable PDF format for offline study on any device.