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RBSE Class 12 Biology Chapter 15 बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. कौन से एन्जाइम डी.एन.ए को विशिष्ट स्थल पर काटते हैं
(अ) लाइगेज
(ब) पॉलिमरेज
(स) रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (स) रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज
In simple words: डीएनए को खास जगहों पर काटने वाले एंजाइम को रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज कहते हैं. यह एंजाइम डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े करता है.
🎯 Exam Tip: इस एंजाइम को आण्विक कैंची भी कहा जाता है, जो जीन इंजीनियरिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Question 3. वाहक डी.एन.ए है-
(अ) प्लाज्मिड
(ब) c-DNA
(स) संश्लेषित DNA
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (अ) प्लाज्मिड
In simple words: प्लाज्मिड एक छोटा डीएनए अणु होता है जो जीवाणु कोशिकाओं में पाया जाता है, यह आनुवंशिक इंजीनियरिंग में डीएनए के टुकड़े ले जाने का काम करता है.
🎯 Exam Tip: प्लाज्मिड को अक्सर क्लोनिंग वेक्टर के रूप में उपयोग किया जाता है क्योंकि यह स्वतंत्र रूप से प्रतिकृति बना सकता है।
Question 4. M13 उदाहरण है-
(अ) प्लाज्मिड का
(ब) जीवाणुभोजी का
(स) कॉस्मिड का
(द) उपरोक्त सभी का
Answer: (ब) जीवाणुभोजी का
In simple words: M13 एक प्रकार का वायरस है जो बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, इसे जीवाणुभोजी कहते हैं. यह जीन क्लोनिंग में भी इस्तेमाल होता है.
🎯 Exam Tip: जीवाणुभोजी वे वायरस होते हैं जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं और उनके अंदर अपनी संख्या बढ़ाते हैं।
Question 5. DNA खण्डों की पहचान में कौन-सी ब्लाटिंग तकनीक प्रयोग की जाती है-
(अ) जीनोमिक DNA
(ब) वैस्टर्न
(स) सदर्न
(द) नादर्न
Answer: (स) सदर्न
In simple words: डीएनए के टुकड़ों को पहचानने के लिए सदर्न ब्लॉटिंग नामक एक खास तरीके का इस्तेमाल किया जाता है. यह तकनीक डीएनए के अनुक्रमों को खोजने में मदद करती है.
🎯 Exam Tip: सदर्न ब्लॉटिंग डीएनए के लिए, नॉर्दर्न ब्लॉटिंग आरएनए के लिए और वेस्टर्न ब्लॉटिंग प्रोटीन के लिए प्रयोग की जाती है।
Question 7. जम्पिंग जीन्स कहते हैं-
(अ) फाज्मिड को
(ब) प्लाज्मिड को
(स) कॉस्मिड को
(द) ट्रान्पोजोन्स को।
Answer: (द) ट्रान्पोजोन्स को।
In simple words: जम्पिंग जीन्स ऐसे डीएनए के टुकड़े होते हैं जो जीनोम में अपनी जगह बदल सकते हैं, इसलिए इन्हें ट्रांसपोसोन्स भी कहते हैं.
🎯 Exam Tip: ट्रांसपोसोन्स को "मोबाइल आनुवंशिक तत्व" भी कहा जाता है क्योंकि वे जीनोम के विभिन्न स्थानों पर जा सकते हैं।
Question 8. 1989 में मुलिस ने खोज की थी-
(अ) प्लाज्मिड की
(ब) पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया की
(स) सदर्न ब्लाटिंग तकनीक की
(द) वैस्टर्न ब्लाटिंग तकनीक की
Answer: (ब) पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया की
In simple words: 1989 में मुलिस नाम के वैज्ञानिक ने पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (पीसीआर) को खोजा था, जिससे डीएनए की कई कॉपी बनाना आसान हो गया.
🎯 Exam Tip: पीसीआर (PCR) एक शक्तिशाली तकनीक है जो डीएनए के छोटे टुकड़ों को बहुत कम समय में लाखों-करोड़ों गुना बढ़ा सकती है।
Question 9. C-DNA के निर्माण में प्रयुक्त होता है-
(अ) tRNA
(ब) mRNA
(स) rRNA
(द) DNA
Answer: (ब) mRNA
In simple words: c-DNA बनाने के लिए mRNA का उपयोग किया जाता है, क्योंकि mRNA में जीन की जानकारी होती है जो प्रोटीन बनाने के लिए चाहिए होती है.
🎯 Exam Tip: c-DNA (कॉम्प्लिमेंटरी डीएनए) आरएनए से रिवर्स ट्रांसक्रिपटेस एंजाइम का उपयोग करके बनाया जाता है, जिसमें इंट्रॉन नहीं होते हैं।
RBSE Class 12 Biology Chapter 15 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
Question 1. पुनर्योगज डी.एन.ए. तकनीक की खोज किसने की थी?
Answer: पुनर्योगज डीएनए तकनीक को स्टेनले कोहन, बोयर और उनके साथियों ने मिलकर खोजा था. इस खोज ने आधुनिक आनुवंशिक इंजीनियरिंग की नींव रखी.
In simple words: स्टेनले कोहन और बोयर ने अपने साथियों के साथ पुनर्योगज डीएनए तकनीक को खोजा था.
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिकों के नाम और उनके द्वारा की गई खोजें अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में पूछी जाती हैं, इन्हें याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. पुनर्योगज डी.एन.ए प्रौद्योगिकी की परिभाषा दीजिए।
Answer: किसी भी जीव के डीएनए में बदलाव करने या उसे अपनी इच्छा के अनुसार बदलने के लिए जिन खास तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है, उन्हें पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी कहते हैं. यह तकनीक जीवों के आनुवंशिक गुणों को बदलने में मदद करती है.
In simple words: पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी वह तरीका है जिससे जीव के डीएनए में बदलाव किया जाता है.
🎯 Exam Tip: परिभाषाओं को सरल और स्पष्ट शब्दों में लिखना चाहिए, जिसमें मुख्य शब्दों का सही उपयोग हो।
Question 3. क्लोनिंग वाहक क्या होते हैं?
Answer: क्लोनिंग वाहक ऐसे अणु होते हैं जो किसी बाहरी डीएनए के टुकड़े को अपने अंदर जोड़ लेते हैं, फिर उसे एक उपयुक्त कोशिका (परपोषी) में ले जाते हैं. वहां ये अपनी कई नकलें बनाते हैं, जिससे डीएनए की बहुत सारी प्रतियां बन जाती हैं.
In simple words: क्लोनिंग वाहक वे अणु हैं जो बाहरी डीएनए को कोशिका में ले जाकर उसकी कई प्रतियां बनाने में मदद करते हैं.
🎯 Exam Tip: प्लाज्मिड और जीवाणुभोजी क्लोनिंग वाहकों के सामान्य उदाहरण हैं जो जीन को स्थानांतरित करने में महत्वपूर्ण हैं।
Question 4. आण्विक प्रोब्स क्या है?
Answer: आण्विक प्रोब्स डीएनए या आरएनए के छोटे टुकड़े होते हैं जो किसी जीव के अंदर मौजूद अपने पूरक डीएनए या आरएनए के टुकड़ों को ढूंढने और पहचानने में मदद करते हैं. ये विशेष रूप से लेबल किए जाते हैं ताकि उन्हें आसानी से देखा जा सके.
In simple words: आण्विक प्रोब्स डीएनए या आरएनए के छोटे हिस्से हैं जो जीव में मौजूद अपने जैसे टुकड़ों को खोजने का काम करते हैं.
🎯 Exam Tip: आण्विक प्रोब्स में रेडियोधर्मी या फ्लोरोसेंट टैग लगे होते हैं, जिससे उन्हें लक्ष्य डीएनए या आरएनए से जुड़ने के बाद आसानी से पता लगाया जा सकता है।
Question 5. मार्कर जीन क्या होते हैं? उदाहरण दीजिए।
Answer: मार्कर जीन खास तरह के जीन होते हैं जिनका उपयोग यह पहचानने के लिए किया जाता है कि किस कोशिका में हमने अपना मनचाहा डीएनए सफलतापूर्वक डाला है. जब हम कोई नया जीन किसी वाहक में डालकर कोशिका में भेजते हैं, तो कभी-कभी दूसरे अनचाहे उत्पाद भी बन जाते हैं. मार्कर जीन हमें वांछित डीएनए वाली कोशिकाओं को पहचानने और अलग करने में मदद करते हैं. इसका एक उदाहरण केनामाइसिन प्रतिरोधक जीन है, जो कोशिकाओं को केनामाइसिन एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी बना देता है.
In simple words: मार्कर जीन उन कोशिकाओं को पहचानने में मदद करते हैं जिनमें हमारा नया डीएनए चला गया है, जैसे केनामाइसिन प्रतिरोधक जीन.
🎯 Exam Tip: मार्कर जीन अक्सर एंटीबायोटिक प्रतिरोध प्रदान करते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को उन कोशिकाओं का चयन करने में मदद मिलती है जिनमें वांछित जीन सफलतापूर्वक डाला गया है।
Question 7. जीन लाइब्रेरी क्या है?
Answer: जीन लाइब्रेरी किसी भी जीव के पूरे जीनोम (यानी उसके डीएनए का पूरा सेट) के क्लोन किए गए टुकड़ों का एक बड़ा संग्रह होती है. इसमें जीव के सभी जीन के टुकड़े अलग-अलग वाहकों में मौजूद होते हैं, ताकि उनका अध्ययन किया जा सके.
In simple words: जीन लाइब्रेरी एक जीव के पूरे डीएनए के छोटे-छोटे क्लोन किए गए टुकड़ों का संग्रह है.
🎯 Exam Tip: जीन लाइब्रेरी शोधकर्ताओं को एक जीव के विशिष्ट जीनों को ढूंढने और उनका अध्ययन करने में मदद करती है।
Question 8. कॉस्मिड क्या होते हैं?
Answer: कॉस्मिड विशेष प्रकार के प्लाज्मिड कण होते हैं जिनमें लेम्डा जीवाणुभोजी वायरस के कॉस स्थल (cos sites) वाले डीएनए के टुकड़े डाले जाते हैं. ये बड़े डीएनए के टुकड़ों को क्लोन करने के लिए बहुत उपयोगी होते हैं.
In simple words: कॉस्मिड ऐसे प्लाज्मिड होते हैं जिनमें लेम्डा वायरस के खास डीएनए स्थल होते हैं.
🎯 Exam Tip: कॉस्मिड हाइब्रिड वेक्टर होते हैं, जिनमें प्लाज्मिड और जीवाणुभोजी दोनों के गुण होते हैं, जिससे वे बड़े डीएनए खंडों को क्लोन कर सकते हैं।
Question 9. रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लीएज एन्जाइम को परिभाषित कीजिए।
Answer: रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लीएज एंजाइमों को आण्विक कैंची भी कहा जाता है. ये एंजाइम डीएनए के अणु को बहुत ही खास जगहों पर काटते हैं, जिससे डीएनए के छोटे और नियंत्रित टुकड़े बन जाते हैं. यह जीन इंजीनियरिंग में बहुत महत्वपूर्ण है.
In simple words: रिस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लीएज वे एंजाइम हैं जो डीएनए को विशेष जगहों से काटते हैं, इन्हें आण्विक कैंची भी कहते हैं.
🎯 Exam Tip: ये एंजाइम डीएनए में पैलिंड्रोमिक अनुक्रमों को पहचानते और काटते हैं, जो आनुवंशिक इंजीनियरिंग में बहुत उपयोगी होते हैं।
Question 10. जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस में प्रयोग आने वाले जैल के नाम बताइए।
Answer: जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस एक ऐसी तकनीक है जिसमें डीएनए या प्रोटीन के टुकड़ों को उनके आकार के हिसाब से अलग करने के लिए जैल का उपयोग किया जाता है. इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाले मुख्य जैल अगेरोज जैल और पॉलीएक्राइलेमाइड जैल हैं. ये जैल एक तरह का फिल्टर बनाते हैं जिससे छोटे टुकड़े तेज़ी से और बड़े टुकड़े धीरे-धीरे गुजरते हैं.
In simple words: जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस में अगेरोज जैल और पॉलीएक्राइलेमाइड जैल का उपयोग होता है.
🎯 Exam Tip: अगेरोज जैल बड़े डीएनए खंडों को अलग करने के लिए उपयुक्त है, जबकि पॉलीएक्राइलेमाइड जैल छोटे डीएनए खंडों और प्रोटीन के लिए उपयोग किया जाता है।
Question 11. RFLP का पूरा नाम लिखिए।
Answer: RFLP का पूरा नाम Restriction Fragment Length Polymorphism है. यह एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग डीएनए के अलग-अलग व्यक्तियों के बीच के अंतर को पहचानने के लिए किया जाता है, जो डीएनए फिंगरप्रिंटिंग में महत्वपूर्ण है.
In simple words: RFLP का मतलब Restriction Fragment Length Polymorphism है.
🎯 Exam Tip: आर.एफ.एल.पी. (RFLP) तकनीक का उपयोग पितृत्व परीक्षण और आपराधिक मामलों में डीएनए पहचान के लिए किया जाता है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 15 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. क्लोनिंग वाहक क्या हैं? पुनर्योगज डी.एन.ए. प्रौद्योगिकी में काम आने वाले विभिन्न वाहकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Answer: क्लोनिंग वाहक वे डीएनए अणु होते हैं जो बाहरी डीएनए के टुकड़े को अपने अंदर लेकर एक उपयुक्त परपोषी कोशिका में जाते हैं. वहां ये बाहरी डीएनए की कई प्रतियां बनाने में मदद करते हैं. पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी में कई तरह के वाहक उपयोग किए जाते हैं.
3. कॉस्मिड (Cosmid)- कॉस्मिड को एक संकर वाहक कहते हैं. ये प्लाज्मिड से बनते हैं और इनमें लेम्डा जीवाणुभोजी के कॉस स्थल (cos sites) वाले डीएनए अनुक्रम होते हैं. कॉस स्थल वायरस के डीएनए को एक साथ जोड़ने में मदद करते हैं. कॉलिन्स और हॉन ने सबसे पहले कॉस्मिड की खोज की थी. प्लाज्मिड और जीवाणुभोजी भी सामान्यतः उपयोग होने वाले क्लोनिंग वाहक हैं.
In simple words: क्लोनिंग वाहक बाहरी डीएनए को कोशिका में ले जाकर उसकी कई प्रतियां बनाते हैं. कॉस्मिड एक हाइब्रिड वाहक है जिसमें प्लाज्मिड और जीवाणुभोजी के गुण होते हैं, और इसकी खोज कॉलिन्स और हॉन ने की थी.
🎯 Exam Tip: क्लोनिंग वाहक में एक पहचान स्थल, चयन योग्य मार्कर जीन और एक प्रतिकृति की उत्पत्ति (ORI) होनी चाहिए ताकि यह प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
Question 2. pBR 322 प्लाज्मिड पर टिप्पणी कीजिए।
Answer: pBR 322 एक बहुत ही लोकप्रिय प्लाज्मिड है जिसका उपयोग जीन क्लोनिंग में सबसे अधिक किया जाता है. इस प्लाज्मिड में दो खास मार्कर स्थल होते हैं: टेट्रासाइक्लीन प्रतिरोधक (TetR) और एम्पिसीलीन प्रतिरोधक (AmpR). ये मार्कर जीन वैज्ञानिकों को यह पहचानने में मदद करते हैं कि कौन सी कोशिका ने प्लाज्मिड को सफलतापूर्वक ग्रहण किया है. pBR 322 में 12 अलग-अलग रिस्ट्रिक्शन एंजाइमों के लिए पहचान स्थल भी होते हैं, जो बाहरी डीएनए को इसमें डालने के लिए उपयोग होते हैं. बाहरी डीएनए को आमतौर पर TetR और AmpR जीन के बीच में रिस्ट्रिक्शन एंजाइम की मदद से जोड़ा जाता है. इस प्लाज्मिड का नाम वैज्ञानिकों बोलीवर और रोड्रिगेज के नाम पर रखा गया है.
In simple words: pBR 322 एक बहुत उपयोगी प्लाज्मिड है जिसमें टेट्रासाइक्लीन और एम्पिसीलीन प्रतिरोधक जीन होते हैं, और यह बाहरी डीएनए को जोड़ने के लिए कई रिस्ट्रिक्शन एंजाइम स्थलों वाला एक सामान्य क्लोनिंग वाहक है.
🎯 Exam Tip: pBR 322 में मौजूद एंटीबायोटिक प्रतिरोधक जीन (जैसे TetR और AmpR) का उपयोग रूपांतरित कोशिकाओं के चयन के लिए किया जाता है।
Question 3. निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए-
(i) सदर्न ब्लाटिंग तकनीक
(ii) डी.एन.ए फिंगर प्रिंटिंग
(iii) पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया
(iv) रिस्ट्रिक्शन एन्जाइम का नामकरण
(v) वाहक के लक्षण
Answer:
(i) सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक- यह तकनीक 1975 में ई.एम. सदर्न (E.M. Southern) द्वारा खोजी गई थी. इसमें डीएनए के टुकड़ों को जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस द्वारा अलग किया जाता है, फिर उन्हें नाइट्रोसेल्यूलोज फिल्टर जैसी झिल्ली पर स्थानांतरित किया जाता है. इस झिल्ली पर डीएनए के टुकड़े अपनी जगह पर मजबूती से बंध जाते हैं. इसके बाद, एक खास प्रोब का उपयोग करके डीएनए के विशिष्ट अनुक्रमों की पहचान की जाती है. यह विधि डीएनए विश्लेषण में बहुत महत्वपूर्ण है.
In simple words: सदर्न ब्लॉटिंग एक तकनीक है जिसमें डीएनए के टुकड़ों को अलग करके एक झिल्ली पर स्थानांतरित किया जाता है, फिर उन्हें प्रोब की मदद से पहचाना जाता है.
(ii) डी.एन.ए फिंगर प्रिंटिंग- डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की खोज 1985 में एलेक जेफ्री (Alec Jeffreys) और उनके साथियों ने की थी. इस तकनीक का उपयोग डीएनए में मौजूद खास नाइट्रोजन क्षारों के अनुक्रमों के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान करने के लिए किया जाता है. हर व्यक्ति का डीएनए फिंगरप्रिंट अनोखा होता है, चाहे वह शरीर के किसी भी हिस्से की कोशिका से लिया गया हो. इस प्रक्रिया में, पहले डीएनए को रिस्ट्रिक्शन एंजाइम की मदद से छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. फिर इन टुकड़ों को जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस से बैंड के रूप में अलग किया जाता है. इसके बाद, सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक का उपयोग करके इन बैंडों को एक एक्सरे प्लेट पर यूवी (UV) प्रकाश की मदद से देखा जाता है. यह विधि फोरेंसिक विज्ञान और पितृत्व परीक्षण में बहुत उपयोगी है.
In simple words: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एक ऐसी तकनीक है जो व्यक्ति के डीएनए के खास पैटर्न को पहचान कर उसकी पहचान करती है, जिसे एलेक जेफ्री ने खोजा था.
(iii) पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया- पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (पीसीआर - Polymerase Chain Reaction) एक बहुत ही शक्तिशाली तकनीक है जिसकी खोज 1989 में मुलिस (Mullis) ने की थी. इससे पहले, यूकैरियोटिक और प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में जीन की प्रतियां बनाने के लिए वाहकों की जरूरत होती थी. लेकिन पीसीआर के द्वारा, डीएनए की एक अकेली प्रतिलिपि से बहुत कम समय में लाखों-करोड़ों प्रतियां बनाई जा सकती हैं. इस अभिक्रिया में मुख्य रूप से तीन चरण होते हैं, जो बार-बार दोहराए जाते हैं. इससे डीएनए का कई गुना प्रवर्धन होता है और 20-30 बार दोहराने पर डीएनए की लाखों प्रतियां बन जाती हैं. यह पूरी प्रक्रिया डीएनए थर्मल साइक्लर नामक उपकरण में की जाती है और हर चक्र को पूरा होने में 225 सेकंड लगते हैं.
In simple words: पीसीआर एक तकनीक है जिसे मुलिस ने खोजा था, जिससे डीएनए की एक प्रति से लाखों प्रतियां बहुत कम समय में बनाई जा सकती हैं.
(iv) रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम का नामकरण- रेस्ट्रिक्शन एंजाइमों का नामकरण एक खास तरीके से किया जाता है, जिसमें एंजाइम के स्रोत जीव का नाम शामिल होता है:
- एंजाइम का पहला अक्षर उस जीव के वंश (genus) से लिया जाता है जिससे उसे अलग किया गया है. यह अक्षर हमेशा बड़े (capital) अक्षर में लिखा जाता है.
- इसके बाद के दो अक्षर उस जीव की जाति (species) से लिए जाते हैं. ये अक्षर छोटे (small) अक्षरों में लिखे जाते हैं.
- ये तीनों अक्षर आमतौर पर तिरछे (italics) अक्षरों में लिखे जाते हैं.
उदाहरण के लिए, EcoRI नाम Escherichia coli से आया है, जहाँ 'E' वंश (Escherichia) और 'co' जाति (coli) को दर्शाता है.
In simple words: रेस्ट्रिक्शन एंजाइम का नाम उनके स्रोत जीव के वंश और जाति के पहले अक्षरों से बनता है, जैसे कि EcoRI में 'E' और 'co'.
(v) वाहक के लक्षण- एक अच्छे क्लोनिंग वाहक के लक्षण निम्नलिखित हैं:
- यह आसानी से परपोषी कोशिका में प्रवेश कर सके और आवश्यकता पड़ने पर उसे फिर से अलग भी किया जा सके.
- इसमें एक चिन्हित स्थल (Marker site) होना चाहिए, जो यह पता लगाने में मदद करे कि कौन सी कोशिका रूपांतरित हुई है (यानी जिसमें वाहक प्रवेश कर गया है).
- इसके द्वारा होने वाला रूपांतरण तरीका आसान और कुशल होना चाहिए.
- इसे परपोषी कोशिका के अंदर स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतियां बनाने में सक्षम होना चाहिए.
- वाहक अणु में विशेष प्रतिबन्ध स्थल होने चाहिए, जिन्हें रेस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइम आसानी से काट सकें.
- वांछित बाहरी डीएनए की अभिव्यक्ति के लिए वाहक में ऑपरेटर (Operator), प्रमोटर (Promoter) जैसे नियामक अवयव भी होने चाहिए.
In simple words: एक अच्छे वाहक को कोशिका में आसानी से जाना चाहिए, उसमें मार्कर साइट होनी चाहिए, खुद की प्रतियां बनानी चाहिए, और उसमें खास काटने वाले स्थल व नियामक भाग होने चाहिए.
🎯 Exam Tip: वाहक के लक्षण जीन क्लोनिंग की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं, खासकर स्वतंत्र प्रतिकृति, चयन योग्य मार्कर और मल्टीपल क्लोनिंग साइट की उपस्थिति।
Question 4. जिनोमिक लाइब्रेरी की निर्माण विधि समझाइए।
Answer: किसी भी जीव में मौजूद सभी जीनों या पूरे जीनोम के क्लोन किए गए टुकड़ों के संग्रह को जीनोमिक लाइब्रेरी कहते हैं. किसी जीव के पूरे अगुणित डीएनए सेट को उसका संजीन (Genome) कहा जाता है. जीनोमिक लाइब्रेरी बनाने के लिए, पहले एक कोशिका से उसके पूरे डीएनए को निकाला जाता है. फिर इस डीएनए को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इन टुकड़ों को एक वाहक (जैसे प्लाज्मिड) में डाला जाता है और फिर वाहक को जीवाणु कोशिकाओं में प्रवेश कराया जाता है. प्रत्येक जीवाणु कोशिका में डीएनए का एक अलग टुकड़ा होता है, जिससे एक बड़ी लाइब्रेरी बन जाती है जिसमें पूरे जीव के डीएनए के सभी टुकड़े शामिल होते हैं. इस लाइब्रेरी का उपयोग किसी विशेष जीन को ढूंढने और अध्ययन करने के लिए किया जाता है.
In simple words: जीनोमिक लाइब्रेरी जीव के पूरे डीएनए के क्लोन किए गए टुकड़ों का संग्रह है, जिसे डीएनए को काटकर और वाहक में डालकर जीवाणु में बनाया जाता है.
🎯 Exam Tip: जीनोमिक लाइब्रेरी का उपयोग किसी जीव के संपूर्ण आनुवंशिक जानकारी को सुरक्षित रखने और विशिष्ट जीनों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
RBSE Class 12 Biology Chapter 15 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 5. वाहक के रूप में जीवाणुभोजी की उपयोगिता का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Answer: जीवाणुभोजी वे वायरस होते हैं जो जीवाणु को संक्रमित करते हैं और उनके अंदर अपनी संख्या बढ़ाते हैं. लेम्डा (Lambda) और M13 जैसे जीवाणुभोजी क्लोनिंग वाहकों के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं. प्लाज्मिड की तुलना में, जीवाणुभोजी को बेहतर वाहक माना जाता है क्योंकि उनमें कई खास विशेषताएं होती हैं:
- जीवाणुभोजी में डीएनए के बड़े टुकड़े (लगभग 24 Kb तक) की क्लोनिंग आसानी से की जा सकती है.
- हर जीवाणुभोजी अपनी प्रतिकृति बनाने के बाद एक 'प्लाक' (Plaque) क्षेत्र बनाता है, जिससे यह पहचानना आसान हो जाता है कि कौन सी कोशिका सफलतापूर्वक संक्रमित हुई है.
लेम्डा जीवाणुभोजी (Lambda Bacteriophage) M13 की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि:
- यह ई. कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु का जीवाणुभोजी है, जो प्रयोगशाला में व्यापक रूप से उपयोग होता है.
- इसका डीएनए रेखीय (linear) और दोहरी कुंडली (double-stranded) वाला होता है.
- लेम्डा फाज (phage) में अनावश्यक डीएनए के हिस्से को हटाया जा सकता है, जिससे वाहक का आकार छोटा हो जाता है और उसमें बड़े बाहरी डीएनए के टुकड़े आसानी से जोड़े जा सकते हैं.
In simple words: जीवाणुभोजी ऐसे वायरस हैं जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं और डीएनए के बड़े टुकड़ों की क्लोनिंग के लिए प्लाज्मिड से बेहतर वाहक होते हैं, जैसे लेम्डा और M13.
🎯 Exam Tip: जीवाणुभोजी बड़े डीएनए खंडों को स्थानांतरित करने में सक्षम होते हैं, जो उन्हें कुछ क्लोनिंग अनुप्रयोगों के लिए प्लाज्मिड से बेहतर विकल्प बनाता है।
Question 1. जीन अभियांत्रिकी की पुनर्योगज डी.एन.ए तकनीक के विभिन्न चरणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: जीन अभियांत्रिकी की सामान्य विधि को पुनर्योगज डीएनए तकनीक भी कहते हैं, और यह आनुवंशिक इंजीनियरिंग का एक मुख्य तरीका है. इसके कई चरण होते हैं, जो इस प्रकार हैं:
1. वांछित जीन की पहचान व पृथक्करण (Identification and isolation of desired gene)- सबसे पहले, वांछित जीन (जिस जीन में हमें रुचि है) को पहचाना जाता है और उसे अलग किया जाता है. इसके लिए रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइम का उपयोग होता है, जिसे 1970 में हेमिल्टन ओ. स्मिथ ने खोजा था. रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइम को 'आण्विक कैंची' भी कहते हैं, क्योंकि ये डीएनए अणु को विशिष्ट जगहों पर काटते हैं. ये एंजाइम प्राकृतिक रूप से ई. कोलाई, बैसिलस, स्ट्रेप्टोकोकस, थर्मस एक्वेटिकस जैसे जीवाणुओं में पाए जाते हैं और ये तीन प्रकार के होते हैं: टाइप I, टाइप II और टाइप III. टाइप II एंडोन्यूक्लिएज (जैसे EcoRI, HindII) का उपयोग मुख्य रूप से जीन क्लोनिंग और रिस्ट्रिक्शन मानचित्रण में होता है.
2. क्लोनिंग वाहकों का चयन (Selection of Cloning Vectors)- वांछित जीन को अलग करने के बाद, एक ऐसे वाहक की जरूरत होती है जो इस जीन को परपोषी कोशिका में ले जा सके और वहां अपनी प्रतियां बना सके. एक अच्छे वाहक में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए:
- क्लोनिंग वाहक परपोषी कोशिका में स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतियां बना सके.
- क्लोनिंग वाहक परपोषी में आसानी से प्रवेश कर सके और पुनः पृथक्कृत हो सके.
- रूपांतरित कोशिकाओं के चयन में मदद करने के लिए इसमें एक चिन्हित स्थल (Marker site) होनी चाहिए.
- वाहक अणु में ऐसे विशेष प्रतिबंध स्थल होने चाहिए, जिन्हें रिस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइम आसानी से काट सकें.
- प्रतिबंध स्थल पर बाहरी डीएनए का निवेश आसानी से हो सके.
- वाहकों द्वारा रूपांतरण सरल और दक्ष हो.
- प्रमोटर (Promoter) और ऑपरेटर (Operator) जैसे नियामक अवयव वांछित बाहरी डीएनए की अभिव्यक्ति के लिए वाहकों में उपस्थित होने चाहिए.
ई. कोलाई में प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह के वाहकों का उपयोग किया जा सकता है. इसमें प्रमुख वाहकों में प्लाज्मिड, जीवाणुभोजी और कॉस्मिड शामिल हैं.
In simple words: जीन अभियांत्रिकी में पहले वांछित जीन को रिस्ट्रिक्शन एंजाइम से अलग करते हैं, फिर उसे एक वाहक में डालते हैं, जिसमें खुद की प्रतियां बनाने और पहचानने की क्षमता हो.
🎯 Exam Tip: पुनर्योगज डीएनए तकनीक में जीन पृथक्करण, वाहक चयन, डीएनए लाइगेशन, रूपांतरण और क्लोन की पहचान महत्वपूर्ण चरण हैं।
Question 1. (Continuation)
Answer:
3. पुनर्योगज डीएनए का परपोषी कोशिका में निवेश (Introduction of recombinant DNA into host cell)- पुनर्योगज डीएनए को परपोषी कोशिका में डालने के कई तरीके होते हैं, जैसे रूपांतरण (Transformation), पारक्रमण (Transduction), या इलेक्ट्रोपोरेशन. इन तरीकों से डीएनए परपोषी कोशिका के अंदर प्रवेश कर जाता है, जिसके बाद उसका गुणन होता है.
4. पुनर्योगज DNA का परपोषी कोशिका में गुणन (Multiplication of recombinant DNA in host cell)- एक बार जब पुनर्योगज डीएनए परपोषी कोशिका (जैसे ई. कोलाई) में सफलतापूर्वक प्रवेश कर जाता है, तो वह कोशिका के अंदर अपनी कई प्रतियां बनाना शुरू कर देता है. यह गुणन कोशिका के विभाजन के साथ होता है, जिससे डीएनए की संख्या बढ़ जाती है.
5. क्लोन की गई जीन की पहचान एवं अन्य जीवों में स्थानान्तरण (Identification of cloned gene and its transfer in other organisms)- गुणन के बाद, उन कोशिकाओं की पहचान की जाती है जिनमें वांछित जीन वाला पुनर्योगज डीएनए सफलतापूर्वक प्रवेश कर गया है. इसके लिए मार्कर जीन का उपयोग किया जाता है, जो रूपांतरित कोशिकाओं में एक खास गुण पैदा करते हैं (जैसे एंटीबायोटिक प्रतिरोध). यदि किसी कोशिका में वांछित जीन नहीं जाता है, तो उसे मार्कर जीन की मदद से पहचाना जा सकता है. रिपोर्टर जीन भी होते हैं जो दृश्यमान लक्षण दिखाते हैं, जैसे जुगनू में पाए जाने वाले ल्यूसिफरेज (LUC) जीन से चमक पैदा होती है. सफलतापूर्वक पहचाने गए क्लोन जीन को फिर दूसरे जीवों में स्थानांतरित किया जा सकता है, ताकि उनसे वांछित उत्पाद प्राप्त किए जा सकें.
6. वांछित जीन की अभिव्यक्ति (Expression of desired gene)- वांछित जीन की अभिव्यक्ति का मतलब है कि क्लोन किए गए जीन से प्रोटीन बनाना. इस प्रक्रिया में, क्लोन जीन को ई. कोलाई या किसी अन्य सूक्ष्मजीव, पौधे या जंतु में डाला जाता है, ताकि उससे वांछित उत्पाद मिल सके (जैसे इंसुलिन). जिन पौधों या जंतुओं में बाहरी डीएनए डाला जाता है, उन्हें पारजीनी (Transgenic) पौधे या जंतु कहते हैं.
In simple words: पुनर्योगज डीएनए को कोशिका में डालकर उसकी प्रतियां बनाई जाती हैं, फिर सही जीन वाली कोशिकाओं को पहचानकर, उन्हें दूसरे जीवों में स्थानांतरित किया जाता है ताकि वांछित प्रोटीन या गुण मिल सके.
🎯 Exam Tip: जीन अभिव्यक्ति का अंतिम चरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि वांछित जीन से कार्यात्मक उत्पाद (जैसे प्रोटीन) का उत्पादन हो रहा है, जो आनुवंशिक इंजीनियरिंग का मुख्य लक्ष्य है।
Question 2. सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए।
Answer: सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक की खोज 1975 में ई.एम. सदर्न (E.M. Southern) ने की थी. यह डीएनए खंडों को नाइट्रोसेल्यूलोज फिल्टर पर स्थानांतरित करने और फिर उनका विश्लेषण करने की एक विधि है. इस प्रक्रिया में, पहले डीएनए को रिस्ट्रिक्शन एंजाइम से काटा जाता है और फिर जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस द्वारा उनके आकार के अनुसार अलग किया जाता है. इसके बाद, जैल से डीएनए खंडों को एक नाइट्रोसेल्यूलोज झिल्ली पर स्थानांतरित किया जाता है (जिसे 'ब्लॉटिंग' कहते हैं). इस झिल्ली पर डीएनए स्थायी रूप से बंध जाते हैं. फिर, एक रेडियोएक्टिव या फ्लोरोसेंट प्रोब (एक विशेष डीएनए या आरएनए का टुकड़ा) का उपयोग करके झिल्ली पर वांछित डीएनए अनुक्रमों की पहचान की जाती है. यह तकनीक आनुवंशिक विश्लेषण, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग और आनुवंशिक रोगों की पहचान में बहुत उपयोगी है.
In simple words: सदर्न ब्लॉटिंग एक तकनीक है जिसे ई.एम. सदर्न ने 1975 में खोजा था, इसमें डीएनए के टुकड़ों को जैल से एक झिल्ली पर स्थानांतरित करके विशिष्ट अनुक्रमों की पहचान की जाती है.
🎯 Exam Tip: सदर्न ब्लॉटिंग डीएनए के विशिष्ट अनुक्रमों की पहचान के लिए बहुत सटीक है और इसका उपयोग आनुवंशिक विकार, कैंसर अनुसंधान और फोरेंसिक जांच में होता है।
Question 3. प्लाज्मिड पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए।
Answer: प्लाज्मिड छोटे, वृत्ताकार, सर्पिलाकार और दोहरी कुंडली वाले डीएनए अणु होते हैं जो जीवाणु कोशिकाओं में मुख्य गुणसूत्र (क्रोमोसोम) के अलावा पाए जाते हैं. इनकी खोज 1952 में लेडरबर्ग ने की थी. प्लाज्मिड की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- ये जीवाणु कोशिका में गुणसूत्र के अतिरिक्त मौजूद होते हैं.
- ये वृत्ताकार, सर्पिलाकार और द्विरज्जुकी (double-stranded) अणु होते हैं.
- प्लाज्मिड अपनी प्रतिकृति (replicate) स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं, यानी उन्हें कोशिका के मुख्य डीएनए पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
- प्लाज्मिड में एक या अधिक विशिष्ट प्रतिबंध स्थल (restriction sites) होते हैं, जहाँ वांछित जीन को डाला जा सकता है.
प्लाज्मिड को जीन क्लोनिंग में सबसे अधिक उपयोग किया जाता है, खासकर pBR322 जैसे प्लाज्मिड. उनमें एंटीबायोटिक प्रतिरोधक जीन (जैसे टेट्रासाइक्लिन और एम्पिसिलिन प्रतिरोधक) और कई रिस्ट्रिक्शन एंजाइमों के लिए पहचान स्थल होते हैं. बाहरी डीएनए को इन एंटीबायोटिक प्रतिरोधक जीनों के बीच में रिस्ट्रिक्शन एंजाइम की मदद से डाला जाता है.
द्विगुणन की स्थिति के अनुसार, प्लाज्मिड को 'अधिकाभ' (Episome) भी कहा जाता है, यदि यह जीवाणु के मुख्य गुणसूत्र से जुड़ा रहता है और उसके साथ ही द्विगुणन करता है. यदि यह स्वतंत्र रूप से द्विगुणन करता है, तो इसे केवल प्लाज्मिड कहा जाता है.
In simple words: प्लाज्मिड जीवाणु में पाए जाने वाले छोटे, वृत्ताकार डीएनए अणु हैं जो स्वतंत्र रूप से प्रतिकृति बनाते हैं और जीन क्लोनिंग में बहुत उपयोगी होते हैं.
🎯 Exam Tip: प्लाज्मिड में प्रतिकृति की उत्पत्ति (ORI), चयन योग्य मार्कर और मल्टीपल क्लोनिंग साइट का होना उसे एक आदर्श क्लोनिंग वेक्टर बनाता है।
Question 4. आण्विक प्रोब्स से आप क्या समझते हैं? इनके उपयोग का वर्णन कीजिए।
Answer: आण्विक प्रोब्स ऐसे डीएनए या आरएनए के छोटे टुकड़े होते हैं जिन्हें रेडियोधर्मी या फ्लोरोसेंट अणुओं से टैग किया जाता है. ये जीव में मौजूद अपने पूरक डीएनए या आरएनए अनुक्रमों को ढूंढने और पहचानने में मदद करते हैं. ये प्रोब्स एकल-स्ट्रैंडेड होते हैं और लक्षित न्यूक्लिक एसिड से जुड़कर (हाइब्रिडाइजेशन) उसकी उपस्थिति का पता लगाते हैं. इनकी पहचान डीएनए या आरएनए खंडों की सहायता से की जा सकती है. आण्विक प्रोब्स के उपयोग निम्नलिखित हैं:
- भोजन में मौजूद दूषित पदार्थों (contaminants) की पहचान आण्विक प्रोब्स की मदद से की जा सकती है.
- जीन अभियांत्रिकी (genetic engineering) में शोध के लिए विशिष्ट डीएनए खंडों की पहचान करने के लिए इनका उपयोग होता है.
- प्रोब्स की सहायता से फसल प्रजनन के लिए अच्छे बीज और पौधों की किस्मों की पहचान की जाती है.
- प्रोब्स का उपयोग पितृत्व संबंधी मामलों को सुलझाने में, अपराध विज्ञान में और पारिवारिक रिश्तेदारी स्थापित करने में भी होता है.
In simple words: आण्विक प्रोब्स डीएनए या आरएनए के टैग किए गए टुकड़े होते हैं जो जीव में विशिष्ट डीएनए या आरएनए अनुक्रमों को ढूंढते हैं, इनका उपयोग भोजन की जांच, जीन पहचान और फोरेंसिक में होता है.
🎯 Exam Tip: आण्विक प्रोब्स विशिष्ट डीएनए या आरएनए अनुक्रमों के साथ उच्च आत्मीयता से बंधते हैं, जिससे वे नैदानिक और फोरेंसिक अनुप्रयोगों में महत्वपूर्ण होते हैं।
Question 5. आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
Answer: आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) एक बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसमें डीएनए का कृत्रिम संश्लेषण करना, डीएनए के खंडों की मरम्मत करना, किसी वांछित जीन को स्थापित करना और कुछ न्यूक्लियोटाइडों को हटाना या बदलना शामिल है. इसे पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA technology) भी कहते हैं. आनुवंशिक इंजीनियरिंग का उपयोग अनुसंधान और कई व्यावसायिक उत्पादों को बनाने के लिए किया जा रहा है. मानव जीनों की खोज और रोगों के कारणों का पता लगाने में भी इस तकनीक ने मदद की है, जिससे रोगों के उपचार में भी सहायता मिल रही है. आनुवंशिक अभियांत्रिकी के महत्व निम्नलिखित हैं:
1. आनुवंशिक रोगों का पता लगाना (Diagnosing genetic diseases or disorders)- एम्नियोसेंटेसिस तकनीक से पहले गर्भ में कई आनुवंशिक रोगों का पता लगाया जाता था, लेकिन पुनर्योगज डीएनए तकनीक से क्लोन किए गए डीएनए अनुक्रमों के उपलब्ध होने से अब गर्भस्थ शिशु के पूरे जीनोटाइप का निरीक्षण किया जा सकता है. इस विधि से डीएनए में विलोपन (deletion), प्रतिलोपन (inversion) और बिंदु उत्परिवर्तन (point mutation) जैसे सभी परिवर्तनों का पता लगाया जा सकता है. पश्चिमी देशों में, इस विधि का उपयोग गर्भस्थ शिशुओं में सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और फिनाइल कीटोनूरिया जैसे रोगों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है. यह तकनीक आनुवंशिक बीमारियों का शीघ्र निदान करने में सहायक है.
In simple words: आनुवंशिक इंजीनियरिंग डीएनए में बदलाव करके नए उत्पाद बनाने और बीमारियों का पता लगाने में मदद करती है, जैसे आनुवंशिक रोगों का निदान.
🎯 Exam Tip: आनुवंशिक इंजीनियरिंग आनुवंशिक रोगों के निदान और उपचार में क्रांति ला रही है, जिससे व्यक्तिगत चिकित्सा के नए द्वार खुल रहे हैं।
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