RBSE Solutions Class 12 Biology Chapter 13 पादप वृद्धि

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Detailed Chapter 13 पादप वृद्धि RBSE Solutions for Class 12 Biology

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Class 12 Biology Chapter 13 पादप वृद्धि RBSE Solutions PDF

Rbse Class 12 Biology Chapter 13 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

Rbse Class 12 Biology Chapter 13 बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. सबसे पहले जिस पादप हार्मोन की खोज हुई, वह है।
(अ) ऑक्सिन
(ब) जिब्बरेलिन
(स) इथाइलिन
(द) साइटोकाइनिन
Answer: (अ) ऑक्सिन
In simple words: ऑक्सिन वह पहला पादप हार्मोन है जिसे खोजा गया था। यह पौधों की वृद्धि में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🎯 Exam Tip: पादप हार्मोनों के नाम और उनके मुख्य कार्यों को याद रखें, खासकर ऑक्सिन, जिब्बरेलिन और साइटोकाइनिन के।

 

Question 3. गैसीय अवस्था में मिलने वाला हार्मोन है-
(अ) ऑक्सिन
(ब) जिब्बरेलिन
(स) साइटोकाइनिन
(द) इथाइलिन
Answer: (द) इथाइलिन
In simple words: इथाइलिन एकमात्र पादप हार्मोन है जो गैसीय रूप में पाया जाता है। यह फलों को पकने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट गुणों वाले हार्मोनों पर ध्यान दें, जैसे इथाइलिन का गैसीय अवस्था में होना।

 

Question 4. पतझड़ के समय पौधों में कौन-सा हार्मोन सबसे अधिक सक्रिय होता है-
(अ) 1AA
(ब) ABA
(स) GA
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (ब) ABA
In simple words: पतझड़ के समय एब्सिसिक अम्ल (ABA) नामक हार्मोन सबसे ज्यादा काम करता है। यह पत्तियों को गिराने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: हार्मोनों के विशिष्ट पर्यावरणीय स्थितियों (जैसे पतझड़) में सक्रियता को समझें।

 

Question 5. शीर्षस्थ प्रभाविता पाई जाती है-
(अ) ऑक्सिन के कारण
(ब) जिब्बरेलिन के कारण
(स) साइटोकाइनिन के कारण
(द) इथाइलिन के कारण
Answer: (अ) ऑक्सिन के कारण
In simple words: पौधों में ऑक्सिन हार्मोन के कारण मुख्य तने का ऊपरी हिस्सा तेजी से बढ़ता है और बगल की शाखाओं की वृद्धि रुक जाती है। इसे शीर्षस्थ प्रभाविता कहते हैं।

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन के प्रमुख कार्यों में शीर्षस्थ प्रभाविता एक महत्वपूर्ण बिंदु है। इसे उदाहरण के साथ याद रखें।

 

Question 7. मूल शीर्ष की वृद्धि को संदमित करने वाला हार्मोन है-
(अ) साइटोकाइनिन
(ब) ऑक्सिन
(स) जिब्बरेलिन
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (ब) ऑक्सिन
In simple words: ऑक्सिन हार्मोन, जो तने की वृद्धि बढ़ाता है, जड़ के ऊपरी हिस्से की वृद्धि को कम कर देता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि ऑक्सिन के प्रभाव तने और जड़ में अलग-अलग होते हैं; तने में वृद्धि को बढ़ावा देता है, जबकि जड़ में इसे रोकता है।

 

Question 8. खेतों में द्विबीजपत्री खरपतवार को नियंत्रित करने में प्रयोग किया जाता है-
(अ) 1AA
(ब) GA
(स) 1BA
(द) 2-4D
Answer: (द) 2-4D
In simple words: 2-4D नामक रसायन का उपयोग खेतों में उगने वाले चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को खत्म करने के लिए किया जाता है। यह एक प्रकार का ऑक्सिन है।

🎯 Exam Tip: खरपतवार नियंत्रण में उपयोग किए जाने वाले विशिष्ट हार्मोनों के नाम और उनके अनुप्रयोगों को ध्यान में रखें।

 

Question 9. पादपों में किस वृद्धि नियन्त्रक को स्ट्रेस हार्मोन कहा जाता है-
(अ) 1AA
(ब) ABA
(स) 1BA
(द) NAA
Answer: (ब) ABA
In simple words: एब्सिसिक अम्ल (ABA) को पौधों का स्ट्रेस हार्मोन कहा जाता है क्योंकि यह पौधों को सूखे या अन्य तनावपूर्ण स्थितियों से बचाने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: एब्सिसिक अम्ल को "तनाव हार्मोन" कहने के कारण को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 1. समग्र वृद्धिकाल से आप क्या समझते हैं ?
Answer: समग्र वृद्धिकाल उस अधिकतम वृद्धि अवधि को कहते हैं जिसके दौरान पौधों में सबसे अधिक वृद्धि होती है। इस समय पौधे अपनी पूरी क्षमता से बढ़ते हैं। पौधों की जीवन प्रक्रिया में यह एक महत्वपूर्ण चरण होता है।
In simple words: समग्र वृद्धिकाल वह समय होता है जब कोई पौधा सबसे तेजी से बढ़ता है।

🎯 Exam Tip: समग्र वृद्धिकाल को परिभाषित करते समय "अधिकतम वृद्धि" और "विशेष अवधि" जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग करें।

 

Question 2. कौन-सा पदार्थ फलों के कृत्रिम परिपक्कन के लिए प्रयोग किया जाता है ?
Answer: फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए एथिलीन (Ethylene) नामक पदार्थ का उपयोग किया जाता है। यह एक प्राकृतिक पादप हार्मोन भी है जो फलों के पकने की प्रक्रिया को तेज करता है।
In simple words: फलों को जल्दी पकाने के लिए एथिलीन का उपयोग करते हैं।

🎯 Exam Tip: फलों को पकाने वाले हार्मोन के रूप में एथिलीन का नाम याद रखें।

 

Question 3. शीतन उपचार के लिए अनुकूलतम तापक्रम कौन-सा है ?
Answer: शीतन उपचार के लिए सबसे अच्छा तापमान \( 0^{\circ}C \) से \( 5^{\circ}C \) के बीच होता है। इस कम तापमान में कुछ पौधों की वृद्धि और विकास को नियंत्रित किया जाता है। यह अक्सर बीजों को अंकुरित करने या फूलों के विकास को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
In simple words: पौधों को ठंडे मौसम में खास उपचार देने के लिए \( 0^{\circ}C \) से \( 5^{\circ}C \) तापमान सबसे अच्छा होता है।

🎯 Exam Tip: शीतन उपचार के लिए सही तापमान सीमा को याद रखें।

 

Question 4. जियेटिन क्या है ?
Answer: जियेटिन (Zeatin) एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला साइटोकाइनिन हार्मोन है। यह पहला साइटोकाइनिन था जिसे मक्का के दाने से अलग किया गया था और यह कोशिका विभाजन में मदद करता है।
In simple words: जियेटिन एक प्राकृतिक पौधा हार्मोन है जो साइटोकाइनिन परिवार का सदस्य है।

🎯 Exam Tip: जियेटिन की पहचान "प्राकृतिक साइटोकाइनिन" और "मक्का से प्राप्त" के रूप में करें।

 

Question 5. वर्नेलिन क्या होता है ?
Answer: वर्नेलिन एक हार्मोन है जो फूलों के बनने की प्रक्रिया को शुरू करने वाले फ्लोरीजन (Florigen) नामक हार्मोन का पूर्वगामी (precursor) है। यह कम तापमान के संपर्क में आने के बाद पौधों में बनता है।
In simple words: वर्नेलिन वह पदार्थ है जो फूलों के बनने की शुरुआत करता है।

🎯 Exam Tip: वर्नेलिन को फ्लोरीजन के पूर्वगामी के रूप में पहचानें और फूलों के विकास में इसकी भूमिका को समझें।

 

Question 6. जीर्णता तथा रन्ध्रों को बन्द करने वाले हॉर्मोन का नाम बताइए।
Answer: जीर्णता (पौधे के पुराने होने की प्रक्रिया) को प्रेरित करने वाला हार्मोन एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid) है, और यह रन्ध्रों (पत्तियों के छोटे छेद) को बंद करने में भी मदद करता है। साइटोकाइनिन भी जीर्णता को प्रभावित करता है।
In simple words: एब्सिसिक अम्ल पत्तियों को पुराना करता है और पौधों के रंध्रों को बंद करता है।

🎯 Exam Tip: एब्सिसिक अम्ल (ABA) के दो मुख्य कार्यों - जीर्णता और रंध्रों को बंद करना - को याद रखें।

 

Question 8. दो संश्लिष्ट ऑक्सिन के नाम बताइए।
Answer: दो संश्लिष्ट ऑक्सिन इण्डोल-3 ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA) और नैफ्थेलीन ऐसीटिक अम्ल (NAA) हैं। ये मानव निर्मित रसायन हैं जो प्राकृतिक ऑक्सिन के समान कार्य करते हैं और पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।
In simple words: IBA और NAA दो ऐसे ऑक्सिन हैं जिन्हें प्रयोगशाला में बनाया जाता है।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक और संश्लिष्ट पादप हार्मोनों के बीच अंतर को जानें और प्रत्येक के उदाहरण याद रखें।

 

Question 9. अनिषेक फलन को किस हॉर्मोन द्वारा प्रेरित किया जा सकता है ?
Answer: अनिषेक फलन (बीज रहित फल का बनना) को ऑक्सिन (Auxins) और जिब्बरेलिन (Gibberellins) हार्मोनों द्वारा प्रेरित किया जा सकता है। ये हार्मोन निषेचन के बिना ही फलों के विकास में मदद करते हैं।
In simple words: अनिषेक फलन के लिए ऑक्सिन और जिब्बरेलिन हार्मोनों का उपयोग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: अनिषेक फलन के लिए जिम्मेदार हार्मोनों को जानें और यह भी समझें कि बीज रहित फल कैसे बनते हैं।

 

Question 10. प्रसुप्ति किसे कहते हैं ?
Answer: प्रसुप्ति (Dormancy) पौधों में एक ऐसी अवस्था है जब बीज या कलियाँ शरीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं। इस दौरान उनकी वृद्धि रुक जाती है, भले ही उनके आसपास का वातावरण वृद्धि के लिए अनुकूल हो। यह पौधों को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने में मदद करती है।
In simple words: प्रसुप्ति वह स्थिति है जब बीज या कली सही मौसम में भी बढ़ना बंद कर देते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रसुप्ति की परिभाषा को स्पष्ट करें और समझें कि यह पौधों के लिए कैसे फायदेमंद है।

 

Question 11. फोटोब्लास्टिक बीज किसे कहते हैं ?
Answer: फोटोब्लास्टिक बीज वे होते हैं जिनका अंकुरण (उगना) प्रकाश की अवधि, उसकी गुणवत्ता और मात्रा के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। इन बीजों को अंकुरित होने के लिए प्रकाश की एक विशेष मात्रा या प्रकार की आवश्यकता होती है।
In simple words: फोटोब्लास्टिक बीज वे हैं जिन्हें उगने के लिए खास तरह की रोशनी चाहिए होती है।

🎯 Exam Tip: फोटोब्लास्टिक बीजों की विशेषता को परिभाषित करते समय "प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता" पर जोर दें।

Rbse Class 12 Biology Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. सिग्मॉइड वृद्धि चाप क्या होता है ?
Answer: यदि कोशिका, पादप अंग या पूरे पौधे की वृद्धि दर को प्रभावित करने वाले कारकों को स्थिर रखा जाए और फिर वृद्धि दर का समय के साथ ग्राफ बनाया जाए, तो हमें एक S-आकृति का वक्र मिलता है। इसी S-आकृति या सिग्मॉइड चाप को सिग्मॉइड वृद्धि चाप (Sigmoid growth curve) कहते हैं। यह वक्र किसी भी जीव की वृद्धि को दर्शाता है और इसमें आमतौर पर चार भाग होते हैं: धीमी शुरुआत, तेज वृद्धि, फिर धीमी वृद्धि और अंत में स्थिरता।
In simple words: सिग्मॉइड वृद्धि चाप एक S-आकार का ग्राफ होता है जो दिखाता है कि पौधे कैसे बढ़ते हैं - पहले धीरे, फिर तेज, और फिर धीमी गति से।

🎯 Exam Tip: सिग्मॉइड वृद्धि चाप की S-आकृति का वर्णन करें और इसके मुख्य चरणों (जैसे प्रारंभिक, तीव्र और स्थिर) को समझाएं।

 

Question 2. मुक्त तथा बन्धित ऑक्सिन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: ऑक्सिन, जिसका अर्थ "बढ़ना" है, पौधों में प्ररोह की कोशिकाओं के बढ़ने को प्रेरित करने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन समूह है। इसकी खोज सबसे पहले मानव मूत्र से की गई थी, जिसमें ऑक्सिन-a, ऑक्सिन-b, और इण्डोल-3 एसिटिक अम्ल (IAA) जैसे प्रकार शामिल थे। प्राकृतिक ऑक्सिन IAA है, जबकि संश्लिष्ट ऑक्सिन जैसे इण्डोल-3 ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA) और नैफ्थेलीन ऐसीटिक अम्ल (NAA) प्रयोगशाला में बनाए जाते हैं।

ऑक्सिन की खोज चार्ल्स डार्विन ने 1890 में की थी, जब उन्होंने देखा कि पौधों के ऊपरी हिस्से में कोई पदार्थ होता है जो वृद्धि को नियंत्रित करता है। उन्होंने केनेरी घास पर प्रयोग किया, जिसमें उन्होंने पाया कि प्रकाश की एक दिशा में पड़ने पर प्ररोह उसकी तरफ मुड़ता है। बॉयसन-जेनसन और पाल ने भी इस पर प्रयोग किए। वेंट (1926-28) ने जई के प्ररोह से वृद्धि को प्रेरित करने वाले पदार्थ को अलग किया, जिसे बाद में ऑक्सिन नाम दिया गया। उन्होंने यह भी देखा कि प्रकाश पड़ने पर ऑक्सिन की मात्रा कम होती है।

ऑक्सिन के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं:
1. **शीर्षस्थ प्रभाविता:** मुख्य तने के बढ़ने से पार्श्व शाखाओं की वृद्धि रुक जाती है। यदि शीर्षस्थ कलिका को काट दिया जाए तो पार्श्व शाखाएँ बढ़ने लगती हैं।
2. **कोशिका दीर्धीकरण:** यह प्ररोह के ऊपरी हिस्से में कोशिकाओं को लंबा करने में मदद करता है।
3. **जड़ों का बनना:** ऑक्सिन जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है, इसलिए कलमों को जल्दी जड़ें उगाने के लिए इसमें डुबोया जाता है।
4. **अनिषेक फलन:** यह बिना निषेचन के बीज रहित फलों (जैसे नींबू, संतरा) के निर्माण को प्रेरित करता है।
5. **फसलों को गिरने से बचाना:** ऑक्सिन का छिड़काव गेहूं जैसी फसलों के निचले हिस्से को मजबूत बनाता है, जिससे वे तेज हवा में गिरती नहीं हैं।
6. **प्रसुप्ति नियंत्रण:** यह बीजों और कंदों में प्रसुप्ति बनाए रखता है, जिससे उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
7. **पुष्पों की सघनता कम करना:** कुछ वृक्षों में बहुत अधिक फूल आने पर फलों की संख्या तो बढ़ती है, लेकिन आकार छोटा रह जाता है। ऑक्सिन का छिड़काव करके अनावश्यक फूलों को कम किया जा सकता है।
8. **खरपतवारों का उन्मूलन:** 2-4D जैसे संश्लिष्ट ऑक्सिन द्विबीजपत्री खरपतवारों को नष्ट करने में सहायक होते हैं।
9. **पर्वों का लघुकरण:** नाशपती और सेब जैसे पौधों में NAA का छिड़काव करके छोटी शाखाओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
10. **ऊतक संवर्धन:** ऊतक संवर्धन तकनीक में ऑक्सिन जड़ निर्माण और कैलस (अविभेदित कोशिकाओं का समूह) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
In simple words: ऑक्सिन पौधों में बढ़ने वाला एक हार्मोन है जो तने को लंबा करता है, जड़ों को बनाता है, और फलों को बीज रहित बना सकता है। इसकी खोज डार्विन और वेंट ने की थी। यह पौधों को सीधा रखने, खरपतवार हटाने और नए पौधे बनाने जैसे कई कामों में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन की खोज और इसके विभिन्न कार्यों को बिंदुवार लिखें। प्राकृतिक और संश्लिष्ट ऑक्सिन के उदाहरण देना न भूलें।

 

Question 3. बैकने रोग क्या होता है ?
Answer: बैकने रोग (Bakanae disease) धान के पौधों में पाया जाता है, जिसे "बेवकूफ नवोभिद् रोग" (Foolish seedling disease) भी कहते हैं। इस रोग के कारण धान के पौधे असामान्य रूप से लंबे और पतले हो जाते हैं, लेकिन उनमें फूल नहीं आते और वे फल या बीज पैदा करने में असमर्थ रहते हैं। यह रोग जिबरेला फ्यूजीकुराई (Gibberella fugikuroi) नामक कवक के कारण होता है। यह कवक एक हार्मोन बनाता है, जिसे जिब्बरेलिन कहते हैं, जिसके अत्यधिक उत्पादन से पौधों में यह असाधारण वृद्धि होती है।
In simple words: बैकने रोग धान के पौधों में होता है, जिससे पौधे बहुत लंबे और पतले हो जाते हैं लेकिन फल नहीं देते। यह एक फंगस के कारण होता है जो ज्यादा जिब्बरेलिन हार्मोन बनाता है।

🎯 Exam Tip: बैकने रोग के लक्षणों, इसके कारण (कवक) और पौधे में इसके प्रभाव (जिब्बरेलिन उत्पादन) को स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 4. शीर्ष प्रभाविता से आप क्या समझते हैं ?
Answer: शीर्ष प्रभाविता या शिखाग्र प्रमुखता (Apical dominance) एक ऐसी स्थिति है जिसमें पौधे की मुख्य शीर्षस्थ कलिका की उपस्थिति के कारण पार्श्व (बगल की) या कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि पूरी तरह या आंशिक रूप से रुक जाती है। इस अवस्था में, शीर्ष कलिका ऑक्सिन हार्मोन बनाती है, जो नीचे की ओर चला जाता है। यह ऑक्सिन पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोक देता है। यदि शीर्षस्थ कलिका को काट दिया जाए, तो पार्श्व और कक्षस्थ कलिकाएँ बढ़ने लगती हैं, जिससे पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है। मेहंदी और चने जैसे पौधों में शीर्ष कलिकाओं को काटकर उन्हें झाड़ीनुमा आकार दिया जाता है।
In simple words: शीर्ष प्रभाविता का मतलब है कि जब पौधे की मुख्य ऊपरी कली बढ़ती है, तो बगल की कलियाँ नहीं बढ़तीं। ऑक्सिन हार्मोन इसमें मदद करता है।

🎯 Exam Tip: शीर्ष प्रभाविता को परिभाषित करें, इसमें ऑक्सिन की भूमिका बताएं और उदाहरण दें कि इसे कैसे कम किया जाता है।

 

Question 6. अंकुरण के अन्त में नवोद्भिद् के शुष्क भार में कमी क्यों आ जाती है ?
Answer: अंकुरण के अंत में नवोद्भिद् (नया पौधा) के शुष्क भार में कमी आ जाती है क्योंकि अंकुरण के दौरान बीज में जमा हुआ भोजन उपापचयी क्रियाओं (energy-releasing processes) में उपयोग होता है। बीज अपने अंदर के भोजन का इस्तेमाल ऊर्जा बनाने और बढ़ने के लिए करता है। बाद में, जब पत्तियां विकसित हो जाती हैं, तो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया शुरू होती है और पौधे का शुष्क भार फिर से बढ़ने लगता है।
In simple words: जब बीज उगना शुरू करता है, तो वह अपने अंदर का खाना इस्तेमाल करता है, जिससे उसका वजन कम हो जाता है। बाद में जब पत्तियां निकलती हैं, तो खाना खुद बनाने लगता है।

🎯 Exam Tip: शुष्क भार में कमी का कारण बताते समय "भोजन का उपयोग" और "उपापचयी क्रियाएँ" जैसे शब्दों का प्रयोग करें।

 

Question 7. मेहन्दी की झाड़ियों के शीर्षभाग की माली कटिंग क्यों करता रहता है ?
Answer: माली मेहन्दी की झाड़ियों के शीर्ष भाग की कटिंग इसलिए करता रहता है क्योंकि शीर्षस्थ कलिकाओं की उपस्थिति में पार्श्व (बगल की) या कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि रुक जाती है, जिसे शीर्ष प्रमुखता (Apical dominance) कहते हैं। जब माली शीर्षस्थ कलिकाओं को काट देता है, तो पार्श्व कलिकाएँ बढ़ने लगती हैं और पौधा झाड़ीनुमा आकार ले लेता है। यह मेहंदी की झाड़ियों को घना और सुंदर बनाने के लिए किया जाता है।
In simple words: माली मेहंदी की ऊपरी शाखाओं को काटता है ताकि बगल वाली शाखाएं बढ़ें और झाड़ी घनी हो जाए।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय शीर्ष प्रमुखता के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से बताएं और उदाहरण के साथ समझाएं।

 

Question 8. फाइटोक्रोम क्या है एवं इसका क्या महत्त्व है ?
Answer: फाइटोक्रोम एक प्रोटीन युक्त वर्णक (रंग देने वाला पदार्थ) है जो सभी हरे पौधों (हरी शैवाल, लाल शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी और आवृतबीजी पौधों) में पाया जाता है। यह प्रकाश के विभिन्न तरंगदैर्ध्यों, खासकर लाल और सुदूर-लाल प्रकाश को अवशोषित करता है। फाइटोक्रोम दो रूपों में मौजूद होता है: \( P_{660} \) (फाइटोक्रोम रेड) और \( P_{730} \) (फाइटोक्रोम सुदूर-लाल)। ये रूप एक-दूसरे में बदल सकते हैं, और यह पौधों में प्रकाश के प्रति प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।

फाइटोक्रोम का महत्व:
1. **पुष्पन का नियंत्रण:** यह पौधों में फूल आने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। दिन की रोशनी में \( P_{730} \) बनता है, जो कुछ पौधों में फूल आने को रोकता है और कुछ में बढ़ाता है।
2. **बीज अंकुरण:** यह कई बीजों के अंकुरण को प्रभावित करता है, खासकर उन बीजों में जिन्हें उगने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है।
3. **पौधों की आकृति:** यह पौधों की पत्ती के विकास, तने के विस्तार और अन्य वृद्धि प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है, जिससे पौधे की समग्र आकृति प्रभावित होती है।
In simple words: फाइटोक्रोम पौधों में पाया जाने वाला एक खास रंग का पदार्थ है जो रोशनी को पहचानता है। यह पौधों को कब फूल खिलाने हैं और कब उगना है, यह सब तय करने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: फाइटोक्रोम के दोनों रूपों (Pfr और Pr) और उनकी प्रकाश-निर्भर रूपांतरण प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से बताएं। इसके महत्व को पुष्प विकास और अंकुरण के संदर्भ में समझाएं।

 

Question 9. एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन क्यों कहते हैं ?
Answer: एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid या ABA) को तनाव हार्मोन कहा जाता है क्योंकि यह पौधों को प्रतिकूल पर्यावरणीय स्थितियों, जैसे सूखा या अत्यधिक ठंड, से बचाने में मदद करता है। यह एक प्राकृतिक वृद्धि अवरोधक हार्मोन है जिसका रासायनिक सूत्र \( C_{15}H_{20}O_4 \) होता है। ABA का संश्लेषण हरितलवक में कैरोटिनॉइड के टूटने से होता है, खासकर जब पानी की कमी हो।

ABA के कोशिकीय प्रभाव:
1. **पत्तियों का विगलन (Abscission of leaves):** ABA के घोल का पत्तियों पर छिड़काव करने से वे जल्दी गिर जाती हैं।
2. **कलियों तथा बीजों की प्रसुप्ति (Dormancy of buds and seeds):** ABA कलियों और बीजों की प्रसुप्ति को प्रेरित करता है, जिससे उनकी वृद्धि और अंकुरण रुक जाता है।
3. **वाष्पोत्सर्जन रोधी (Antitranspirant):** ABA की थोड़ी मात्रा पत्तियों के रंध्रों को आंशिक रूप से बंद कर देती है, जिससे पौधे से पानी का वाष्पीकरण कम हो जाता है।
4. **वृद्धि का संदमन (Inhibition of growth):** ABA कोशिका विभाजन और कोशिका विकास दोनों को धीमा कर देता है।
5. **जीर्णता (Senescence):** ABA कई पौधों में जीर्णता (पुराने होने की प्रक्रिया) को तेज करता है, जिससे क्लोरोफिल, प्रोटीन और RNA तेजी से खत्म होते हैं।
6. **तनाव हार्मोन के रूप में:** पानी की कमी होने पर पत्तियों में ABA का निर्माण बढ़ जाता है, जिससे रंध्र बंद हो जाते हैं। यह 56% वाष्पोत्सर्जन और 14% प्रकाश संश्लेषण को कम करता है। इस तरह, यह पौधे को तनाव से बचाता है।
In simple words: एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन कहते हैं क्योंकि यह पौधों को सूखे या ठंड जैसी मुश्किल परिस्थितियों में बचाता है। यह पत्तियों को गिराने, बीजों को सुप्तावस्था में रखने और पानी बचाने के लिए रंध्रों को बंद करने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: एब्सिसिक अम्ल की रासायनिक संरचना और इसके विभिन्न शारीरिक प्रभावों को विस्तार से बताएं, खासकर तनाव प्रबंधन में इसकी भूमिका पर जोर दें।

यह भी जानें

  • पौधों में घावों को भरने के लिए ट्रोमेटिन नामक फाइटोक्रोम होता है।
  • इथाइलीन मिथियोनीन नामक अमीनो अम्ल से बनता है।
  • मैलिक हाइड्राजाइड एक प्रति-जिब्बरेलिन हार्मोन है।
  • इथाइलीन से "स्लीप डिसीज" होता है।
  • जीर्णावस्था को साइटोकाइनिन लम्बित करता है। इसे रिचमोण्ड लैंग प्रभाव कहते हैं। साइटोकाइनिन की अधिकता से बिचेज (Bichez) नामक यंत्र क्रेस्कोग्राफ कहलाता है।

 

Question 5. प्रसुप्ति किसे कहते हैं ? प्रसुप्ति के कारण तथा इनको समाप्त करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
Answer: प्रसुप्ति (Dormancy) पौधों में एक ऐसी अवस्था है जब बीज या कलियाँ शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाती हैं। इस दौरान उनकी वृद्धि रुक जाती है, भले ही उनके आसपास का वातावरण वृद्धि के लिए अनुकूल हो। यह पौधों को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने में मदद करती है और बीजों को लंबे समय तक जीवित रहने में सहायता करती है। मरुस्थलीय पौधों में यह अवधि 5 से 10 साल तक हो सकती है।

प्रसुप्ति के कारण:
प्रसुप्ति के कई कारण होते हैं, जिन्हें आंतरिक (बीज की संरचना से संबंधित) और बाहरी (वातावरण से संबंधित) कारकों में बांटा जा सकता है:
1. **कठोर बीजावरण (Hard seed coat):** कुछ बीजों का बाहरी आवरण बहुत कठोर होता है, जिससे पानी या ऑक्सीजन अंदर नहीं जा पाते। यह अंकुरण को रोकता है और कभी-कभी भ्रूण को विकसित होने से भी रोकता है। उदाहरण: चना, मटर, एमेरेन्थस।
2. **अपरिपक्व भ्रूण (Immaturity of embryo):** कुछ पौधों में बीज के फैलने से पहले भ्रूण पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे बीज तब तक अंकुरित नहीं हो सकते जब तक भ्रूण परिपक्व न हो जाए। उदाहरण: गिंग्को बाइलोबा।
3. **उत्तरपक्वन काल की आवश्यकता (Requirement of after-ripening period):** कुछ बीजों को अंकुरित होने के लिए पकने के बाद कुछ समय तक आराम करने की आवश्यकता होती है। इस अवधि को उत्तरपक्वन काल कहते हैं। उदाहरण: गेहूं, जौ।
4. **विशिष्ट तापमान और प्रकाश की आवश्यकता (Requirement of specific temperature and light):** कुछ बीजों को अंकुरित होने के लिए विशेष तापमान या प्रकाश की आवश्यकता होती है। शीत ऋतु में प्राकृतिक शीत उपचार होता है। कुछ बीज फोटोब्लास्टिक होते हैं, जिन्हें अंकुरण के लिए प्रकाश चाहिए होता है। उदाहरण: चेरी, ओक, तंबाकू।
5. **अंकुरण निरोधकों की उपस्थिति (Presence of germination inhibitors):** कुछ फलों के गूदे में ऐसे पदार्थ होते हैं जो बीजों को अंकुरित होने से रोकते हैं। इन पदार्थों को अंकुरण निरोधक कहते हैं, जैसे एब्सिसिक अम्ल (ABA) और फिनोलिक अम्ल। मिट्टी में पड़े रहने पर ये पदार्थ धीरे-धीरे पानी में घुल जाते हैं।

प्रसुप्ति को दूर करने की विधियाँ:
बीजों की प्रसुप्ति को तोड़ने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं जो पौधे की प्रजाति पर निर्भर करते हैं:
1. **खुरचना (Scarification):** इस विधि में कठोर बीजावरण को तोड़कर या खुरचकर नरम किया जाता है। कभी-कभी तनु अम्ल (\( H_2SO_4 \)), गर्म पानी या वसा विलायकों में भिगोकर इसे नरम किया जाता है।
2. **शीतन उपचार (Chilling treatment):** जिन बीजों को अंकुरण के लिए प्राकृतिक ठंड की आवश्यकता होती है, उन्हें कृत्रिम रूप से ठंडा करके प्रसुप्ति तोड़ी जा सकती है।
3. **एकांतर तापमान (Exposure to alternate temperature):** कुछ पौधों की प्रसुप्ति को उच्च और निम्न तापमानों के संपर्क में लाकर समाप्त किया जा सकता है।
4. **प्रकाश (Light):** कुछ फोटोब्लास्टिक बीजों को लाल प्रकाश में रखकर उनकी अंकुरण क्षमता को बढ़ाया जाता है।
5. **दाब (Pressure):** कुछ प्रसुप्त बीजों को 18-20°C तापमान पर 2000 वायुमंडलीय दाब पर रखने से उनका बीजावरण कमजोर हो जाता है और पानी के लिए पारगम्यता बढ़ जाती है, जिससे अंकुरण क्षमता बढ़ती है।
6. **वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग (Use of growth regulators):** कुछ प्रसुप्त बीजों की प्रसुप्ति को तोड़ने के लिए जिब्बरेलिन, इथाइलिन और थायोयूरिया जैसे वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग किया जा सकता है।
In simple words: प्रसुप्ति वह समय है जब बीज या कलियाँ बढ़ना बंद कर देती हैं ताकि वे खराब मौसम से बच सकें। यह कठोर बाहरी परत, अधूरे भ्रूण, या खास तापमान और रोशनी की ज़रूरत जैसे कारणों से होता है। इसे खत्म करने के लिए बीजों को खुरचा जाता है, ठंडा किया जाता है, रोशनी दी जाती है या कुछ खास दवाएं (हार्मोन) डाली जाती हैं।

🎯 Exam Tip: प्रसुप्ति की परिभाषा, उसके कारणों (आंतरिक और बाहरी) और उसे तोड़ने की विभिन्न विधियों को व्यवस्थित रूप से समझाएं। प्रत्येक बिंदु का संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 1. निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(अ) वृद्धि की प्रावस्थाएँ
(ब) वृद्धि गतिकी।
Answer:
(अ) **वृद्धि की प्रावस्थाएँ (Phase of Growth)**
पौधों में सभी विभज्योतक (Meristems) में विभाजन की क्रिया सूत्री विभाजन (Mitosis) से होती है. इससे एक कोशिका से दो नई कोशिकाएँ बनती हैं. इनमें से कुछ कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं और नई कोशिकाएँ बनाती हैं. कुछ कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता खो देती हैं. ये कोशिकाएँ पहले बढ़ती हैं और फिर अलग-अलग गुणों के अनुसार परिपक्व ऊतक व अंग बनाती हैं. पौधे के किसी भी अंग की वृद्धि को समझने के लिए तीन मुख्य अवस्थाएँ देखी जा सकती हैं:
1. **कोशिका विभाजन प्रावस्था (Cell division phase):** यह अवस्था तने और जड़ के ऊपरी विभज्योतक (apical meristems) तक सीमित रहती है. इस हिस्से की कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं और संख्या में बढ़ती जाती हैं. इन कोशिकाओं में बहुत सारा जीवद्रव्य, एक बड़ा केंद्रक और पतली सेलुलोज की दीवार होती है. इन कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ (Vacuoles) और उनके बीच खाली जगह नहीं होती है.
2. **कोशिका विवर्धन प्रावस्था (Cell elongation phase):** यह अवस्था उन कोशिकाओं के ठीक नीचे होती है जो विभाजन अवस्था में होती हैं. इस अवस्था में कोशिकाओं के अंदर कई छोटी-छोटी रिक्तिकाएँ बन जाती हैं. इनमें पानी और पानी में घुले हुए पदार्थ जमा होते रहते हैं, और आखिर में सभी रिक्तिकाएँ मिलकर एक बड़ी रिक्तिका (Vacuole) बनाती हैं. यह बड़ी रिक्तिका कोशिका के केंद्र में ऐसे स्थित होती है कि केंद्रक और कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) कोशिका की दीवार की अंदरूनी सतह पर एक पतली परत के रूप में चिपके रहते हैं. इसे कोशिका दृति (Primordial utricle) कहते हैं. कोशिकाएँ इस चरण में लंबाई में बढ़ती हैं.
3. **परिपक्वता प्रावस्था (Maturation phase):** इस अवस्था में कोशिकाएँ अपने अंतिम आकार और कार्य को प्राप्त करती हैं. वे विशिष्ट कार्यों को करने के लिए रूपांतरित होती हैं, जैसे पानी का परिवहन या प्रकाश संश्लेषण. यह सुनिश्चित करता है कि पौधे के विभिन्न हिस्से सही ढंग से काम कर सकें.

(ब) **वृद्धि गतिकी (Growth kinetics)**
किसी निश्चित समय में किसी पौधे के अंग के आकार या वजन में होने वाली बढ़ोतरी को वृद्धि दर (Growth rate) कहते हैं. वृद्धि दर को ज्यामितीय (geometric) और अंकगणितीय (arithmetic) रूप में दिखाया जा सकता है.
**ज्यामितीय वृद्धि:** इसमें एक कोशिका से बनी दोनों पुत्री कोशिकाएँ फिर से विभाजित होती हैं. इस तरह, हर विभाजन के बाद कोशिकाओं की संख्या दोगुनी होती जाती है, जैसे \( 1 \rightarrow 2 \rightarrow 4 \rightarrow 8 \rightarrow 16 \) आदि. ज्यामितीय वृद्धि युग्मनज (Zygote) के शुरुआती विभाजनों में देखी जा सकती है.
**अंकगणितीय वृद्धि:** इसमें हर विभाजन से बनी दो कोशिकाओं में से एक कोशिका स्थायी हो जाती है और केवल दूसरी कोशिका ही आगे विभाजित होती है. इस तरह, हर विभाजन से केवल एक नई कोशिका की बढ़ोतरी होती है, जैसे \( 1 \rightarrow 1 \rightarrow 1 \rightarrow 1 \) आदि. यह विभाजन प्ररोह (shoot) और मूल शीर्ष (root apex) पर होता.

**वृद्धि वक्र (Growth curve):** वृद्धि दर को प्रभावित करने वाले कारकों को स्थिर रखते हुए, यदि हम कोशिका, पादप अंग या पूरे पौधे की वृद्धि को मापें, तो पाते हैं कि इसकी दर हमेशा एक जैसी नहीं होती. यदि वृद्धि दर और समय के बीच एक ग्राफ खींचा जाए, तो एक 'S' के आकार का या सिग्मोइड वक्र बनता है, जिसे वृद्धि वक्र कहते हैं. यह वृद्धि वक्र चार भागों में बांटा जा सकता है:
1. **मंद वृद्धिकाल (Lag period):** यह वृद्धि की शुरुआती अवस्था है जहाँ वृद्धि दर धीमी होती है. इस अवस्था में कोशिका में अंदरूनी बदलाव होते हैं और जमा किए गए खाद्य पदार्थों का उपयोग होता है, जिससे उसके सूखे वजन में कमी आती है. कोशिका विभाजन से नई कोशिकाएँ बनती हैं, जिससे आयतन धीरे-धीरे बढ़ता है.
2. **अधिकतम वृद्धिकाल (Log period):** इस अवस्था में कोशिकाओं के बढ़ने के कारण वृद्धि बहुत तेज़ी से होती है.
In simple words: पौधों का बढ़ना कई चरणों में होता है, जैसे कोशिकाएँ बनना, फिर उनका लंबा होना, और फिर परिपक्व होना. बढ़ने की दर को हम दो तरह से देख सकते हैं: एक में संख्या दोगुनी होती जाती है, और दूसरी में हर बार एक नई कोशिका जुड़ती है. पौधे की वृद्धि का ग्राफ 'S' जैसा बनता है, जिसमें शुरुआत में धीमी वृद्धि होती है और फिर तेज़ी से बढ़ती है.

🎯 Exam Tip: जब भी टिप्पणी लिखने को कहा जाए, तो विषय को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर, हर हिस्से को स्पष्ट रूप से समझाएँ और उदाहरण दें.

 

Question 2. वृद्धि का मापन किस प्रकार किया जाता है ? वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
Answer: **वृद्धि मापन (Growth Measurement)**
पौधों में वृद्धि दर को उनके विभिन्न अंगों (जैसे पत्ती, फूल, फल) के आकार, क्षेत्रफल या वजन में बढ़ोतरी के रूप में मापा जा सकता है. पौधे की वृद्धि को मापने के कई तरीके हैं:
1. **कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि:** कोशिकाएँ जितनी ज़्यादा बढ़ती हैं, उतनी ही वृद्धि मानी जाती है.
2. **कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों के आकार में वृद्धि:** जब कोशिकाओं, ऊतकों या अंगों का आकार बढ़ता है, तो उसे भी वृद्धि मानते हैं.
3. **शुष्क भार में वृद्धि:** पौधे का सूखा वजन बढ़ना, उसकी वृद्धि को दर्शाता है.
4. **रेखीय नाप द्वारा वृद्धि:** वृद्धि को मापने के लिए कई विधियाँ और उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं:
    (1) **सरल या सीधी विधि (Simple or straight method):** यह वृद्धि मापने का सबसे आसान तरीका है. इसमें पौधे के अंग की शुरुआती लंबाई स्केल से मापी जाती है. फिर कुछ समय बाद उसकी लंबाई को दोबारा मापकर यह देखा जाता है कि कितनी बढ़ोतरी हुई. यह बढ़ी हुई लंबाई ही उस निश्चित समय में हुई वृद्धि को बताती है.
    (2) **वृद्धिमापी द्वारा (By Auxanometer):** आमतौर पर, पौधे की सीधी वृद्धि को इसी उपकरण से मापा जाता है. यह उपकरण एक छोटी घिरनी (Pulley) पर काम करता है. पौधे के तने के सिरे पर एक धागा बांधा जाता है, जिसे घिरनी के ऊपर से ले जाकर दूसरे सिरे पर वजन बांध दिया जाता है. जब पौधा बढ़ता है, तो धागे से बंधा हुआ वजन नीचे आता है, जिससे घिरनी घूमती है. घिरनी के घूमने से जुड़ा एक सूचक स्केल पर चलता है, जो लंबाई में हुई वृद्धि को दिखाता है. इस तरह, चाप सूचक (Arc indicator) की मदद से वृद्धि को बड़ा करके देखा जा सकता है, और इसका मान घिरनी के व्यास और सूचक की लंबाई पर निर्भर करता है. यह हमें बताता है कि पौधे ने कितनी वृद्धि की है.
In simple words: हम पौधे की वृद्धि को कई तरह से माप सकते हैं, जैसे कि पत्तियों, फूलों या फलों का आकार, वजन, या कोशिकाओं की संख्या. एक आसान तरीका है उसकी लंबाई को स्केल से मापना. दूसरा तरीका है 'ऑक्सानोमीटर' नाम के उपकरण का इस्तेमाल करना, जो पौधे की लंबाई में होने वाली छोटी से छोटी बढ़ोतरी को भी दिखा देता है.

🎯 Exam Tip: वृद्धि मापन के विभिन्न तरीकों को स्पष्ट रूप से समझाएँ और प्रत्येक विधि के लिए उपयुक्त उदाहरण या उपकरण का उल्लेख करें.

 

Question 3. ऑक्सिन क्या होता है ? पादप वृद्धि पर इसके कार्यिकीय प्रभावों की विवेचना कीजिए।
Answer: **ऑक्सिन (Auxins)**
ऑक्सिन शब्द ग्रीक शब्द 'Auxein' से आया है, जिसका मतलब 'बढ़ाना' या 'वृद्धि करना' है. यह पौधों में पाया जाने वाला एक समूह है जो सबसे पहले खोजा गया था. ये पौधे के प्ररोह की कोशिकाओं की लंबाई (Elongation) को बढ़ाते हैं. तीन तरह के ऑक्सिन सबसे पहले मानव मूत्र (Human urine) से अलग किए गए थे, जिनके नाम हैं: ऑक्सिन-a, ऑक्सिन-b और इण्डोल-3 एसिटिक अम्ल. इण्डोल एसिटिक अम्ल और इसी तरह के गुण वाले सभी प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से बनाए गए पदार्थ ऑक्सिन कहलाते हैं.

**ऑक्सिन की परिभाषा (Definition of Auxins):** ये वे कार्बनिक पदार्थ होते हैं जो बहुत कम सांद्रता (0.01 मोलर से कम) में प्ररोह की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं.

**ऑक्सिन की रासायनिक प्रकृति (Chemical nature of auxins):**
कोगल (1931) ने उन पदार्थों को ऑक्सिन नाम दिया जो जई के प्रांकुरचोल (Coleoptile of oat) में मोड़ पैदा कर सकते थे. कोगल और हैगन-स्मिट (1931) ने मानव मूत्र से ऑक्सिन जैसे पदार्थ अलग किए और इसे ऑक्सिन-A नाम दिया, जिसका रासायनिक सूत्र \( \text{C}_{18}\text{H}_{32}\text{O}_5 \) है. ऑक्सिन को दो मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है:
1. **प्राकृतिक ऑक्सिन (Natural Auxins):** ये ऑक्सिन पौधे में प्राकृतिक रूप से बनते हैं. कोगल और उनके साथियों ने मानव मूत्र से हेटेरोऑक्सिन (Heteroauxin) नाम का एक और पदार्थ अलग किया. इसका सूत्र \( \text{C}_{10}\text{H}_9\text{O}_2\text{N} \) है और इसे इण्डोल-3-एसिटिक अम्ल (IAA) भी कहते हैं. यह पौधे में पाया जाने वाला एक प्राकृतिक ऑक्सिन है. अन्य प्राकृतिक ऑक्सिन IAA के ही रूप होते हैं. प्राकृतिक ऑक्सिन पौधे के शीर्षस्थ विभज्योतक (apical meristem) में बनते हैं और इसका निर्माण ट्रिप्टोफन नामक अमीनो अम्ल से होता है. इसके लिए जिंक (Zn) बहुत ज़रूरी होता है.
2. **संश्लिष्ट ऑक्सिन (Synthetic Auxins):** कुछ कृत्रिम रासायनिक यौगिक भी ऑक्सिन की तरह काम करते हैं, जैसे नैफ्थलीन एसिटिक अम्ल (NAA), इण्डोल-3-ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA), 2-4 डाइक्लोरो फिनॉक्सि एसिटिक अम्ल (2-4D), और इण्डोल-3-प्रोपियोनिक अम्ल (IPA). ये सभी ऑक्सिन की तरह ही काम करते हैं.

**पादप वृद्धि पर ऑक्सिन के कार्यिकीय प्रभाव (Physiological effects):**
1. **शीर्ष प्रभाविता या शिखाग्र प्रमुखता (Apical dominance):** शीर्षस्थ कलिका की मौजूदगी में पार्श्व या कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि पूरी तरह या आंशिक रूप से रुक जाती है. इसे शीर्ष प्रभाविता कहते हैं. शीर्ष कलिका ऑक्सिन बनाती है जो नीचे की ओर जाती है, जिससे पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि रुक जाती है. अगर शीर्षस्थ कलिका को काट दिया जाए, तो पार्श्व और कक्षस्थ कलिकाएँ बढ़ने लगती हैं, जिससे पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है. मेहँदी और चने में शीर्ष कलिकाओं को काटकर पौधे को झाड़ीदार बनाया जाता है.
2. **कोशिका दीर्धीकरण (Cell elongation):** ऑक्सिन का मुख्य काम प्ररोह के ऊपरी हिस्से में नई बनी कोशिकाओं को लंबा करना है. प्ररोह में ज़्यादा ऑक्सिन, शीर्ष दीर्धीकरण को बढ़ावा देता है. इसलिए प्ररोह शीर्ष प्रकाश की ओर झुकता है (धनात्मक प्रकाशानुवर्ती) और गुरुत्वाकर्षण के विपरीत बढ़ता है (ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती).
3. **जड़ों का समारंभन (Root Initiation):** ऑक्सिन जड़ों के निकलने को प्रेरित करता है. गुलाब, बोगेनविलिया, नींबू, संतरा जैसे पौधों में तने या कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं. अगर कलम के निचले सिरे को ऑक्सिन के घोल में डुबोकर लगाया जाए, तो कटे हुए हिस्से से जड़ें जल्दी निकल आती हैं. इस काम को बड़े पैमाने पर करने के लिए IBA (इण्डोल ब्यूटाइरिक अम्ल) का इस्तेमाल किया जाता है.
4. **अनिषेक फलन (Parthenocarpy):** बिना निषेचन के अंडाशय से फल बनने की क्रिया अनिषेक फलन कहलाती है. ऐसे फल बीज रहित होते हैं. जैसे संतरा, नींबू, तरबूज, बैंगन और अंगूर. यदि फूल की कलिका अवस्था में पुंकेसरों को हटाकर वर्तिकाग्र पर ऑक्सिन छिड़का जाए, तो बीज रहित अनिषेक फल बनते हैं.
5. **फसली पौधों को गिरने से बचाव (Prevention of lodging):** गेहूँ जैसी कई फसली फसलें कमज़ोर होने के कारण तेज़ हवा से जड़ के पास से मुड़कर गिर जाती हैं. छोटे पौधों पर ऑक्सिन छिड़कने से पौधों का निचला हिस्सा मज़बूत हो जाता है और उनके हवा से गिरने की संभावना कम हो जाती है.
6. **प्रसुप्तावस्था नियंत्रण (Control of Dormancy):** ऑक्सिन बीजों और कंदों में सुप्तावस्था बनाए रखता है. ऑक्सिन बीजों के अंकुरण (Germination of seeds) और कलिकाओं के खुलने को रोकता है, जिससे उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. NAA के छिड़काव से आलू के कंदों को लगभग तीन साल तक संग्रहीत किया जा सकता है.
7. **पुष्पों की सघनता कम करना (Thinning of flowers):** आम की कुछ किस्मों में किसी साल बहुत ज़्यादा फूल आते हैं. इससे फलों की संख्या तो बढ़ जाती है, लेकिन उनका आकार छोटा रह जाता है. ऑक्सिन जैसे-NAA का छिड़काव करके अनावश्यक फूलों को नियंत्रित किया जा सकता है.
In simple words: ऑक्सिन एक तरह का पौधा हार्मोन है जो पौधों को बढ़ने में मदद करता है. यह तने और शाखाओं को लंबा करता है, जड़ों को बनाता है, बिना बीज वाले फल बनाने में मदद करता है, और कुछ पौधों को हवा में गिरने से बचाता है. यह बीजों को सुप्त अवस्था में रखता है ताकि उन्हें लंबे समय तक रखा जा सके.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन के परिचय, प्रकार और प्रत्येक शारीरिक प्रभाव को सटीक वैज्ञानिक शब्दों के साथ सरल भाषा में समझाएँ, उदाहरण भी दें.

 

Question 4. ऑक्सिन की खोज के सम्बन्ध में विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोगों का वर्णन कीजिए।
Answer: **ऑक्सिन (Auxins)**
ऑक्सिन शब्द ग्रीक शब्द 'Auxein' से आया है, जिसका अर्थ है 'बढ़ना'. यह पहला पादप हार्मोन समूह था जिसकी खोज हुई थी. यह पौधों में प्ररोह की कोशिकाओं की लंबाई (दीर्धीकरण) को प्रेरित करता है.

**ऑक्सिन की खोज (Discovery of Auxins):**
ऑक्सिन की खोज कई वैज्ञानिकों के प्रयोगों से हुई है, जिन्होंने जैविक विकास के सिद्धांत में महत्वपूर्ण योगदान दिया:
1. **चार्ल्स डार्विन और फ्रेन्सिस डार्विन (1890):** चार्ल्स डार्विन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महसूस किया कि पौधे के शीर्ष पर कोई वृद्धि-प्रेरित करने वाला पदार्थ होता है. उन्होंने और फ्रेन्सिस डार्विन ने अपनी पुस्तक 'द पॉवर ऑफ मूवमेन्ट इन प्लाण्ट्स' में केनेरी घास (Phalis canartensis) पर किए गए प्रयोगों का वर्णन किया. उन्होंने देखा कि जब प्रांकुरचोल (Coleoptile) को एक तरफ से प्रकाश मिलता है, तो वह प्रकाश की ओर मुड़ जाता है. इस प्रयोग से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रांकुरचोल के शीर्ष पर कोई पदार्थ बनता है जो नीचे की ओर जाता है और जिसके कारण मोड़ पैदा होता है.
2. **बॉयसन जेनसन (Boysen Jensen, 1910-13):** इन्होंने जई (Avena sativa) के प्रांकुरचोल पर प्रयोग किए. उन्होंने बताया कि यदि प्रांकुरचोल का शीर्ष काट दिया जाए, तो वह प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता है. लेकिन अगर कटे हुए शीर्ष को फिर से लगा दिया जाए, तो यह क्षमता वापस आ जाती है. उन्होंने यह भी देखा कि यदि शीर्ष और नीचे के तने के बीच जिलेटिन का एक टुकड़ा रखा जाए, तब भी मुड़ने की क्षमता बनी रहती है. इसका मतलब है कि वृद्धि-प्रेरक पदार्थ जिलेटिन से होकर नीचे जा सकता है.
3. **पाल (Pall, 1919):** पाल ने इस संबंध में और विस्तृत प्रयोग किए और साबित किया कि शीर्ष भाग में एक रसायन होता है जो वृद्धि को बढ़ावा देता है. उन्होंने यह भी बताया कि शीर्ष में बनने वाला यह पदार्थ पानी में घुलनशील होता है.
4. **एफ. डब्ल्यू. वेन्ट (F.W. Went, 1926-28):** वेन्ट को ऑक्सिन की खोज का श्रेय दिया जाता है. उन्होंने वृद्धि-प्रेरक पदार्थ को अलग करने में सफलता पाई. उन्होंने जई के प्रांकुरचोल का शीर्ष काटा और उसे अगार (Agar) के घनाकार टुकड़े के ऊपर रखा. बाद में उन्होंने शीर्ष को अगार से अलग करके अगार के छोटे-छोटे टुकड़े किए. इन टुकड़ों को प्रांकुरचोल के कटे हुए तने पर रखा, और पाया कि वृद्धि फिर से शुरू हो गई. इसके विपरीत, अगर साधारण अगार के टुकड़े रखे जाएँ, तो वृद्धि नहीं होती. इससे साबित हुआ कि कुछ पदार्थ प्रांकुरचोल से अगार खंड में जाते हैं और वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. वेन्ट ने यह भी पाया कि जब प्रांकुरचोल को एक तरफ से प्रकाश मिलता है, तो रोशनी वाले हिस्से में ऑक्सिन की मात्रा कम हो जाती है. उन्होंने एक और प्रयोग में जई के शीर्ष को अगार के दो टुकड़ों के बीच एक पतली अभ्रक की प्लेट रखकर देखा, जिससे शीर्ष आधा-आधा दोनों टुकड़ों पर रहा. उन्होंने पाया कि एक तरफ से प्रकाश डालने पर हार्मोन का 65% हिस्सा अप्रकाशित हिस्से के टुकड़े में जमा हो जाता है.
In simple words: ऑक्सिन की खोज कई वैज्ञानिकों ने की थी. डार्विन ने देखा कि पौधे प्रकाश की ओर मुड़ते हैं. बॉयसन जेनसन और पाल ने बताया कि पौधे के ऊपरी हिस्से में कोई पदार्थ होता है जो बढ़ने में मदद करता है. फिर, वेन्ट ने उस पदार्थ को अलग किया और उसे ऑक्सिन कहा. उनके प्रयोगों ने दिखाया कि यह पदार्थ कैसे पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करता है.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन की खोज से जुड़े हर वैज्ञानिक के प्रयोग और उनके निष्कर्ष को क्रमबद्ध और स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करें.

 

Question 1. समग्र वृद्धिकाल से आप क्या समझते हैं?
Answer: पौधों में वृद्धि का एक खास समय होता है जब वे सबसे तेज़ी से बढ़ते हैं. इसी सबसे अधिक वृद्धि वाले समय को 'समग्र वृद्धिकाल' (Grand period of growth) कहा जाता है. इस दौरान पौधे अपनी अधिकतम वृद्धि क्षमता दिखाते हैं, जो उनके विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है.
In simple words: पौधों के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले खास समय को समग्र वृद्धिकाल कहते हैं.

🎯 Exam Tip: समग्र वृद्धिकाल की परिभाषा देते समय 'अधिकतम वृद्धि' और 'खास समय' जैसे प्रमुख शब्दों का उपयोग करें.

 

Question 2. कौन-सा पदार्थ फलों के कृत्रिम परिपक्कन के लिए प्रयोग किया जाता है?
Answer: फलों को जल्दी पकाने के लिए एथिलीन (Ethylene) नामक पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है. एथिलीन एक प्राकृतिक पादप हार्मोन भी है जो फलों को पकने में मदद करता है, लेकिन इसे कृत्रिम रूप से भी उपयोग किया जाता है ताकि फल जल्दी तैयार हो सकें. यह फलों के रंग, स्वाद और सुगंध को बदलने में सहायक होता है.
In simple words: फलों को जल्दी पकाने के लिए एथिलीन का उपयोग किया जाता है.

🎯 Exam Tip: फलों के कृत्रिम परिपक्वन के लिए एथिलीन (Ethylene) का नाम और इसके पादप हार्मोन होने का तथ्य अवश्य लिखें.

 

Question 3. शीतन उपचार के लिए अनुकूलतम तापक्रम कौन-सा है?
Answer: शीतन उपचार (Chilling treatment) के लिए सबसे अच्छा तापमान 0°C से 5°C के बीच होता है. यह कम तापमान बीजों या पौधों को उनके विकास चक्र के लिए तैयार करता है, जिससे वे सही समय पर अंकुरित या फूल दे सकें. इस प्रक्रिया से पौधों को सर्दियों की परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है.
In simple words: पौधों को शीतन उपचार देने के लिए 0°C से 5°C का तापमान सबसे सही होता है.

🎯 Exam Tip: शीतन उपचार का अनुकूलतम तापक्रम रेंज (0°C से 5°C) को सटीक रूप से याद रखें.

 

Question 4. जियेटिन क्या है?
Answer: जियेटिन (Zeatin) एक प्राकृतिक साइटोकाइनिन है, जो पहली बार खोजा गया था. साइटोकाइनिन पादप हार्मोन का एक समूह है जो पौधों में कोशिका विभाजन और वृद्धि को बढ़ावा देता है, जिससे नए पत्तों और तनों का विकास होता है. जियेटिन मुख्य रूप से मक्का के भ्रूणपोष में पाया जाता है.
In simple words: जियेटिन एक प्राकृतिक साइटोकाइनिन है, जो कोशिका विभाजन में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: जियेटिन को 'प्रथम प्राकृतिक साइटोकाइनिन' और इसके 'कोशिका विभाजन' के कार्य के साथ उल्लेख करें.

 

Question 5. वर्नेलिन क्या होता है?
Answer: वर्नेलिन एक हार्मोन फ्लोरीजन (Florigen) का अग्रदूत (precursor) है, जो पौधों में फूलों के खिलने की प्रक्रिया को शुरू करता है. फ्लोरीजन खुद एक काल्पनिक हार्मोन है जिसे फूल बनने के लिए पौधों में बनता हुआ माना जाता है, खासकर जब उन्हें सही पर्यावरणीय संकेत मिलते हैं. वर्नेलिन पौधों को ठंडे तापमान के संपर्क में आने के बाद फूलने के लिए तैयार करता है.
In simple words: वर्नेलिन एक पदार्थ है जो फूलों के खिलने वाले हार्मोन फ्लोरीजन को बनाने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: वर्नेलिन को 'फ्लोरीजन का अग्रदूत' और 'पुष्पन क्रिया को प्रारंभ करने वाला' गुण के साथ समझाएँ.

 

Question 6. जीर्णता तथा रन्ध्रों को बन्द करने वाले हॉर्मोन का नाम बताइए।
Answer: जीर्णता (पौधे के पुराने होकर मरने की प्रक्रिया) को नियंत्रित करने और रन्ध्रों (पत्तियों के छोटे छिद्र) को बंद करने में एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid) नामक हार्मोन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह हार्मोन पौधों को तनावपूर्ण स्थितियों, जैसे पानी की कमी, से बचाता है, जिससे पत्तियां सूखने से बचती हैं. साइटोकाइनिन भी जीर्णता को कुछ हद तक धीमा कर सकता है.
In simple words: एब्सिसिक अम्ल जीर्णता को बढ़ाता है और रन्ध्रों को बंद करता है.

🎯 Exam Tip: जीर्णता और रन्ध्रों को बंद करने वाले हार्मोन के रूप में एब्सिसिक अम्ल का नाम ज़रूर लिखें.

 

Question 7. मूल शीर्ष की वृद्धि को संदमित करने वाला हार्मोन है-
(अ) साइटोकाइनिन
(ब) ऑक्सिन
(स) जिब्बरेलिन
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (ब) ऑक्सिन
In simple words: ऑक्सिन हार्मोन जड़ों की वृद्धि को धीमा करता है, जबकि यह तनों की वृद्धि को बढ़ाता है.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन के दोहरे प्रभाव को याद रखें: यह तने की वृद्धि को बढ़ावा देता है लेकिन जड़ों की वृद्धि को रोकता है.

 

Question 8. दो संश्लिष्ट ऑक्सिन के नाम बताइए।
Answer: दो संश्लिष्ट ऑक्सिन हैं: इण्डोल-3 ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA) और नैफ्थेलीन ऐसीटिक अम्ल (NAA). ये मानव निर्मित पदार्थ हैं जो प्राकृतिक ऑक्सिन की तरह पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं, जैसे जड़ों के विकास को बढ़ावा देना और फलों को गिरने से रोकना. इन ऑक्सिनों का उपयोग कृषि में पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.
In simple words: IBA और NAA दो ऐसे ऑक्सिन हैं जिन्हें इंसान बनाते हैं.

🎯 Exam Tip: दो संश्लिष्ट ऑक्सिनों के पूरे नाम और उनके संक्षिप्त रूप (IBA, NAA) दोनों को याद रखें.

 

Question 9. अनिषेक फलन को किस हॉर्मोन द्वारा प्रेरित किया जा सकता है?
Answer: अनिषेक फलन (Parthenocarpy) को प्रेरित करने के लिए ऑक्सिन (Auxins) और जिब्बरेलिन (Gibberellins) नामक हार्मोन का उपयोग किया जा सकता है. अनिषेक फलन वह प्रक्रिया है जिसमें बिना निषेचन के फल विकसित होते हैं, जिससे बीज रहित फल प्राप्त होते हैं. जिब्बरेलिन इस प्रक्रिया में ऑक्सिन से भी ज्यादा प्रभावी होता है.
In simple words: अनिषेक फलन को ऑक्सिन और जिब्बरेलिन हार्मोन से शुरू किया जा सकता है, जिससे बिना बीज वाले फल बनते हैं.

🎯 Exam Tip: अनिषेक फलन को प्रेरित करने वाले हार्मोन के रूप में ऑक्सिन और जिब्बरेलिन दोनों का उल्लेख करें, साथ ही यह भी बताएँ कि जिब्बरेलिन अधिक प्रभावी है.

 

Question 10. प्रसुप्ति किसे कहते हैं?
Answer: प्रसुप्ति (Dormancy) वह स्थिति है जब बीज या कलियाँ अपनी शारीरिक क्रियाओं को रोककर निष्क्रिय हो जाते हैं, भले ही आसपास की परिस्थितियाँ उनके विकास के लिए अनुकूल हों. यह एक तरह का आराम का समय होता है जो उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है और सही समय आने पर फिर से सक्रिय होने में मदद करता है. यह पौधों में ऊर्जा बचाने का एक तरीका है.
In simple words: प्रसुप्ति तब होती है जब बीज या कलियाँ बढ़ना बंद कर देती हैं और आराम की स्थिति में चली जाती हैं.

🎯 Exam Tip: प्रसुप्ति की परिभाषा में 'शारीरिक क्रियात्मक निष्क्रियता' और 'अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद' जैसे कीवर्ड शामिल करें.

 

Question 11. फोटोब्लास्टिक बीज किसे कहते हैं?
Answer: फोटोब्लास्टिक बीज (Photoblastic seeds) ऐसे बीज होते हैं जिनका अंकुरण प्रकाश की उपस्थिति, उसकी गुणवत्ता (रंग) और मात्रा पर निर्भर करता है. कुछ बीजों को अंकुरण के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, जबकि कुछ को प्रकाश से दूर रहना पड़ता है. यह प्रकाश की संवेदनशीलता उन्हें सही समय पर अंकुरित होने में मदद करती है.
In simple words: फोटोब्लास्टिक बीज वे होते हैं जिनका अंकुरण प्रकाश पर निर्भर करता है.

🎯 Exam Tip: फोटोब्लास्टिक बीजों की परिभाषा में 'प्रकाश की अवधि, गुणवत्ता और मात्रा के प्रति संवेदनशीलता' पर जोर दें.

 

Question 1. सिग्मॉइड वृद्धि चाप क्या होता है?
Answer: जब हम किसी पौधे या उसके अंग की वृद्धि दर को मापते हैं और इसे समय के साथ एक ग्राफ पर दिखाते हैं, तो हमें एक 'S' आकार का वक्र मिलता है, जिसे सिग्मॉइड वृद्धि चाप (Sigmoid growth curve) कहते हैं. यह वक्र दिखाता है कि शुरुआत में वृद्धि धीमी होती है (मन्द वृद्धिकाल), फिर तेज़ हो जाती है (अधिकतम वृद्धिकाल), और अंत में फिर से धीमी होकर स्थिर हो जाती है (स्थिर वृद्धिकाल). इस वक्र में कुल चार भाग होते हैं: मन्द, तेज़, स्थिर और अंत में कमी का चरण. यह वक्र पौधों की वृद्धि के सामान्य पैटर्न को दर्शाता है, जिसमें सभी जीवधारी बढ़ते हैं.
In simple words: सिग्मॉइड वृद्धि चाप एक 'S' आकार का ग्राफ है जो दिखाता है कि पौधे की वृद्धि पहले धीमी, फिर तेज़ और अंत में धीमी होकर रुक जाती है.

🎯 Exam Tip: सिग्मॉइड वृद्धि चाप को 'S-आकृति' और उसके तीन मुख्य चरणों (मन्द, अधिकतम, स्थिर वृद्धिकाल) के साथ स्पष्ट करें.

 

Question 2. मुक्त तथा बन्धित ऑक्सिन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: ऑक्सिन हार्मोन पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करता है, और यह दो रूपों में पाया जाता है: मुक्त ऑक्सिन और बन्धित ऑक्सिन.
मुक्त ऑक्सिन (Free Auxins): ये ऑक्सिन पौधे के अंदर सक्रिय रूप से काम करते हैं. ये सीधे तौर पर कोशिका विभाजन, दीर्धीकरण (कोशिका का बड़ा होना), और नए अंगों के विकास में मदद करते हैं. ये आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं और वृद्धि को प्रभावित करते हैं.
बन्धित ऑक्सिन (Bound Auxins): ये ऑक्सिन पौधे के अंदर किसी और पदार्थ से जुड़े होते हैं, जैसे प्रोटीन या चीनी. इस रूप में ये सीधे सक्रिय नहीं होते, बल्कि एक भंडार के रूप में काम करते हैं. जब पौधे को ऑक्सिन की ज़रूरत होती है, तो ये बन्धित ऑक्सिन टूटकर मुक्त ऑक्सिन में बदल जाते हैं. यह पौधों को ऑक्सिन की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद करता है, ताकि उनकी वृद्धि सही तरीके से हो सके. इस तरह, पौधे अपनी वृद्धि को आवश्यकतानुसार समायोजित कर पाते हैं.
In simple words: मुक्त ऑक्सिन सीधे पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि बन्धित ऑक्सिन भंडार के रूप में होते हैं और ज़रूरत पड़ने पर सक्रिय हो जाते हैं.

🎯 Exam Tip: मुक्त ऑक्सिन को 'सक्रिय' और 'गतिशील' बताएँ, जबकि बन्धित ऑक्सिन को 'भंडार' और 'अक्रिय' रूप में समझाएँ.

 

Question 1. समग्र वृद्धिकाल से आप क्या समझते हैं?
Answer: पौधों में वृद्धि का एक निश्चित समय होता है जब वे सबसे तेज़ी से बढ़ते हैं. इसे 'समग्र वृद्धिकाल' (Grand period of growth) कहते हैं. इस दौरान पौधों में अधिकतम वृद्धि होती है. यह समय पौधों के पूरे जीवनकाल का वह हिस्सा होता है जब उनकी कोशिकाएँ सबसे ज़्यादा सक्रिय होती हैं और आकार में बड़ी होती हैं. यह पौधों के जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है.
In simple words: समग्र वृद्धिकाल पौधे के जीवन का वह समय होता है जब वह सबसे तेज़ी से बढ़ता है.

🎯 Exam Tip: 'अधिकतम वृद्धिकाल' को 'समग्र वृद्धिकाल' से जोड़कर स्पष्ट करें, जिसमें पौधे अपनी अधिकतम क्षमता दिखाते हैं.

 

Question 2. कौन-सा पदार्थ फलों के कृत्रिम परिपक्कन के लिए प्रयोग किया जाता है?
Answer: फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए एथिलीन (Ethylene) नामक पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है. एथिलीन एक पादप हार्मोन है जो प्राकृतिक रूप से फलों को पकाता है, लेकिन इसका कृत्रिम उपयोग भी बड़े पैमाने पर किया जाता है ताकि फल जल्दी पककर बाज़ार में उपलब्ध हो सकें. यह फलों के रंग, स्वाद और मुलायमपन को बदलता है.
In simple words: एथिलीन एक पदार्थ है जो फलों को जल्दी पकाने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: एथिलीन को फलों के 'कृत्रिम परिपक्वन' के लिए उपयोग किए जाने वाले मुख्य पदार्थ के रूप में याद रखें.

 

Question 3. शीतन उपचार के लिए अनुकूलतम तापक्रम कौन-सा है?
Answer: शीतन उपचार के लिए सबसे अच्छा तापमान 0°C से 5°C के बीच होता है. इस कम तापमान पर बीजों या पौधों को रखा जाता है ताकि उनकी वृद्धि या पुष्पन (फूल खिलने) की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके. यह उपचार अक्सर उन पौधों के लिए किया जाता है जिन्हें फूलने के लिए ठंडी सर्दियों की अवधि की आवश्यकता होती है.
In simple words: शीतन उपचार के लिए सबसे सही तापमान 0°C से 5°C होता है.

🎯 Exam Tip: शीतन उपचार का सटीक तापक्रम रेंज (0°C से 5°C) को याद रखना ज़रूरी है.

 

Question 4. जियेटिन क्या है?
Answer: जियेटिन (Zeatin) एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पहला साइटोकाइनिन है. साइटोकाइनिन पौधों के हार्मोन होते हैं जो कोशिका विभाजन को बढ़ावा देते हैं और पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं. जियेटिन को पहली बार मक्का के भ्रूणपोष से अलग किया गया था, और यह पौधों में नए पत्तों और टहनियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
In simple words: जियेटिन सबसे पहला प्राकृतिक साइटोकाइनिन हार्मोन है जो पौधों में कोशिका विभाजन को बढ़ाता है.

🎯 Exam Tip: जियेटिन को 'प्रथम प्राकृतिक साइटोकाइनिन' के रूप में और इसके 'कोशिका विभाजन' के कार्य के साथ याद रखें.

 

Question 5. वर्नेलिन क्या होता है?
Answer: वर्नेलिन एक काल्पनिक हार्मोन है जिसे फ्लोरीजन (Florigen) का अग्रदूत माना जाता है. फ्लोरीजन वह हार्मोन है जो पौधों में फूल खिलने की प्रक्रिया को शुरू करता है. वर्नेलिन की उपस्थिति उन पौधों में मानी जाती है जिन्हें फूलने के लिए ठंडे तापमान की आवश्यकता होती है. यह पौधों को सर्दी के बाद फूलने के लिए तैयार करने में मदद करता है.
In simple words: वर्नेलिन वह पदार्थ है जो फूलों को खिलाने वाले फ्लोरीजन हार्मोन को बनाने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: वर्नेलिन को 'फ्लोरीजन का पूर्वगामी' और 'पुष्पन क्रिया को प्रारम्भ करने वाला' गुण के साथ समझाएँ.

 

Question 6. जीर्णता तथा रन्ध्रों को बन्द करने वाले हॉर्मोन का नाम बताइए।
Answer: जीर्णता (पौधों का बुढ़ापा या पत्तियों का गिरना) को बढ़ाने और रन्ध्रों (पत्तियों पर मौजूद छोटे छेद) को बंद करने वाले हार्मोन का नाम एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid) है. यह हार्मोन पौधों को पानी की कमी जैसी तनावपूर्ण स्थितियों में खुद को बचाने में मदद करता है, जिससे पानी का नुकसान कम होता है. साइटोकाइनिन भी कुछ हद तक जीर्णता को रोक सकता है.
In simple words: एब्सिसिक अम्ल जीर्णता को बढ़ाता है और पत्तियों के रन्ध्रों को बंद करता है.

🎯 Exam Tip: एब्सिसिक अम्ल के इन दोनों कार्यों (जीर्णता और रन्ध्रों को बंद करना) का स्पष्ट उल्लेख करें.

 

Question 8. दो संश्लिष्ट ऑक्सिन के नाम बताइए।
Answer: दो मानव निर्मित ऑक्सिन हैं: इण्डोल-3-ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA) और नैफ्थेलीन ऐसीटिक अम्ल (NAA). ये रसायन पौधों में प्राकृतिक ऑक्सिन की तरह ही काम करते हैं, जैसे जड़ों के विकास को बढ़ावा देना और फलों को गिरने से रोकना. इनका उपयोग कृषि में पौधों की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.
In simple words: IBA और NAA दो ऐसे ऑक्सिन हैं जो प्रयोगशाला में बनाए जाते हैं.

🎯 Exam Tip: संश्लिष्ट ऑक्सिन के रूप में IBA और NAA के पूर्ण और संक्षिप्त नाम दोनों लिखें.

 

Question 9. अनिषेक फलन को किस हॉर्मोन द्वारा प्रेरित किया जा सकता है?
Answer: अनिषेक फलन (Parthenocarpy) को ऑक्सिन (Auxins) और जिब्बरेलिन (Gibberellins) हार्मोन से प्रेरित किया जा सकता है. अनिषेक फलन वह प्रक्रिया है जिसमें फल बिना निषेचन के विकसित हो जाते हैं, जिससे बीज रहित फल पैदा होते हैं. जिब्बरेलिन इस प्रक्रिया को ऑक्सिन से भी ज़्यादा प्रभावी ढंग से बढ़ावा देता है. यह कृषि में बीज रहित फलों के उत्पादन के लिए उपयोगी है.
In simple words: अनिषेक फलन के लिए ऑक्सिन और जिब्बरेलिन हार्मोन का उपयोग किया जाता है.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन और जिब्बरेलिन दोनों का उल्लेख करें, और यह भी बताएँ कि जिब्बरेलिन अनिषेक फलन को अधिक प्रभावी ढंग से प्रेरित करता है.

 

Question 10. प्रसुप्ति किसे कहते हैं?
Answer: प्रसुप्ति (Dormancy) पौधों की वह अवस्था है जब बीज या कलियाँ अस्थायी रूप से अपनी वृद्धि और विकास रोक देती हैं, भले ही उन्हें बढ़ने के लिए सभी अच्छी परिस्थितियाँ मिल रही हों. यह एक तरह की गहरी नींद है जो उन्हें खराब मौसम या अन्य चुनौतियों से बचाती है. इस दौरान वे अपनी ऊर्जा बचाते हैं और सही समय आने पर फिर से सक्रिय होते हैं.
प्रसुप्ति कई कारणों से होती है, जैसे कठोर बीजावरण (बीज का कड़ा खोल), भ्रूण का पूरी तरह विकसित न होना, या कुछ ऐसे रसायन (अवरोधक) जो वृद्धि को रोकते हैं.
प्रसुप्ति को तोड़ने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं:
(1) खुरचना (Scarification): इसमें बीज के कठोर खोल को थोड़ा खुरचकर या तोड़कर मुलायम किया जाता है ताकि पानी अंदर जा सके और बीज अंकुरित हो सके. कभी-कभी हल्के तेज़ाब या गर्म पानी का भी उपयोग होता है.
(2) शीतन उपचार (Chilling treatment): कुछ बीजों को अंकुरण के लिए ठंडे तापमान (0°C से 5°C) की ज़रूरत होती है. उन्हें कृत्रिम रूप से ठंडा करके इस ज़रूरत को पूरा किया जाता है.
(3) तापमान में बदलाव (Alternate temperature): कुछ बीजों को अंकुरित होने के लिए दिन और रात के तापमान में बदलाव की ज़रूरत होती है.
(4) प्रकाश (Light): कुछ बीजों को अंकुरण के लिए लाल प्रकाश की ज़रूरत होती है, जिससे उनकी अंकुरण क्षमता बढ़ती है.
(5) दाब (Pressure): कुछ बीजों को उच्च दाब पर रखने से उनका बीजावरण कमजोर हो जाता है और पानी के लिए ज़्यादा पारगम्य हो जाता है, जिससे वे अंकुरित हो जाते हैं.
In simple words: प्रसुप्ति तब होती है जब बीज या कलियाँ अच्छे माहौल में भी बढ़ना रोक देती हैं; इसे हटाने के लिए बीज को खुरचते हैं, ठंडा करते हैं, या प्रकाश देते हैं.

🎯 Exam Tip: प्रसुप्ति की परिभाषा के साथ उसके कारणों और उसे तोड़ने की विभिन्न विधियों को स्पष्ट रूप से समझाएँ. प्रत्येक विधि का संक्षिप्त विवरण दें.

 

Question 11. फोटोब्लास्टिक बीज किसे कहते हैं?
Answer: फोटोब्लास्टिक बीज (Photoblastic seeds) वे बीज होते हैं जिनका अंकुरण प्रकाश की उपस्थिति, उसके रंग (गुणवत्ता) और तीव्रता (मात्रा) पर निर्भर करता है. इसका मतलब है कि इन बीजों को अंकुरित होने के लिए या तो प्रकाश की ज़रूरत होती है, या प्रकाश से दूर रहने की ज़रूरत होती है. उदाहरण के लिए, तम्बाकू के बीज अंकुरण के लिए प्रकाश पसंद करते हैं. यह प्रकाश की संवेदनशीलता सुनिश्चित करती है कि बीज सही पर्यावरणीय परिस्थितियों में ही अंकुरित हों.
In simple words: फोटोब्लास्टिक बीज वे होते हैं जिनके अंकुरण पर प्रकाश का सीधा असर होता है.

🎯 Exam Tip: फोटोब्लास्टिक बीजों की परिभाषा में 'प्रकाश की अवधि, गुणवत्ता और मात्रा' की संवेदनशीलता को प्रमुखता से बताएँ.

 

Question 1. निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(अ) वृद्धि की प्रावस्थाएँ
(ब) वृद्धि गतिकी।
Answer:
(अ) वृद्धि की प्रावस्थाएँ (Phases of Growth)
पौधों में वृद्धि की प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन चरणों में होती है, जो पौधों के अलग-अलग हिस्सों में देखी जा सकती है. ये चरण मिलकर पौधे के पूर्ण विकास को सुनिश्चित करते हैं.
1. कोशिका विभाजन प्रावस्था (Cell Division Phase): यह अवस्था तने और जड़ के ऊपरी हिस्सों (मेरिस्टेम) में होती है. यहाँ कोशिकाएँ लगातार विभाजित होकर अपनी संख्या बढ़ाती हैं. इन कोशिकाओं में घना जीवद्रव्य, बड़ा केंद्रक और पतली कोशिका भित्ति होती है. इस चरण में केवल कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, आकार नहीं.
2. कोशिका विवर्धन प्रावस्था (Cell Elongation Phase): इस अवस्था में कोशिकाएँ बड़ी होती हैं. यह चरण कोशिका विभाजन वाले क्षेत्र के ठीक नीचे होता है. इसमें कोशिकाएँ पानी सोखती हैं और उनमें छोटी-छोटी रिक्तिकाएँ (पानी से भरी जगहें) बन जाती हैं, जो बाद में मिलकर एक बड़ी रिक्तिका बनाती हैं. इससे कोशिकाएँ आकार में काफी बड़ी हो जाती हैं. इस वृद्धि से पौधे की लम्बाई बढ़ती है.
3. परिपक्वता प्रावस्था (Maturation Phase): इस अंतिम अवस्था में कोशिकाएँ अपने विशेष कार्य के लिए बदल जाती हैं और परिपक्व ऊतक बनाती हैं. इस चरण में कोशिकाएँ एक निश्चित आकार और कार्य प्राप्त कर लेती हैं, जैसे जड़ें पानी सोखने का काम करती हैं या पत्तियां प्रकाश संश्लेषण करती हैं. ये कोशिकाएँ अब और विभाजित या बड़ी नहीं होतीं, बल्कि स्थायी हो जाती हैं.
In simple words: पौधों में वृद्धि तीन चरणों में होती है: पहले कोशिकाएँ संख्या में बढ़ती हैं, फिर आकार में बड़ी होती हैं, और अंत में खास काम करने के लिए बदल जाती हैं.
(ब) वृद्धि गतिकी (Growth Kinetics)
वृद्धि गतिकी का मतलब है कि एक निश्चित समय में किसी पौधे या उसके अंग के आकार या वजन में कितनी वृद्धि हुई है, जिसे 'वृद्धि दर' (Growth rate) कहते हैं. यह वृद्धि दर दो मुख्य तरीकों से हो सकती है:
1. ज्यामितीय वृद्धि (Geometric Growth): इसमें एक कोशिका से बनी दोनों नई कोशिकाएँ फिर से विभाजित होती हैं, जिससे कोशिकाओं की संख्या हर विभाजन के बाद दुगुनी होती जाती है (जैसे 1 → 2 → 4 → 8). यह तेज़ वृद्धि होती है और अक्सर नए अंकुरण में या शुरुआती भ्रूण विकास में देखी जाती है.
2. अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth): इसमें एक कोशिका से बनी दो नई कोशिकाओं में से केवल एक ही आगे विभाजित होती है, जबकि दूसरी स्थायी हो जाती है. इससे हर विभाजन के बाद कोशिकाओं की संख्या में केवल एक नई कोशिका की बढ़ोतरी होती है (जैसे 1 → 1 → 1 → 1). यह वृद्धि धीमी होती है और आमतौर पर तने या जड़ के ऊपरी सिरों पर होती है.
जब हम समय के साथ कुल वृद्धि का ग्राफ बनाते हैं, तो हमें अक्सर एक 'S' आकार का वक्र मिलता है, जिसे 'सिग्मॉइड वृद्धि चाप' (Sigmoid growth curve) कहते हैं. यह वक्र दिखाता है कि वृद्धि पहले धीमी होती है (मन्दवृद्धिकाल), फिर तेज़ होती है (अधिकतम वृद्धिकाल), और अंत में फिर धीमी होकर रुक जाती है (स्थिर वृद्धिकाल). यह वक्र जीवधारियों में वृद्धि के सामान्य पैटर्न को दर्शाता है.
In simple words: वृद्धि गतिकी बताती है कि पौधे कैसे बढ़ते हैं. इसमें दो तरह की वृद्धि होती है: ज्यामितीय (तेज़, संख्या दुगुनी) और अंकगणितीय (धीमी, संख्या धीरे-धीरे बढ़ती है).

🎯 Exam Tip: वृद्धि की तीनों प्रावस्थाओं (विभाजन, विवर्धन, परिपक्वता) और वृद्धि गतिकी के दोनों प्रकारों (ज्यामितीय, अंकगणितीय) को उनके मुख्य लक्षणों के साथ स्पष्ट करें.

 

Question 2. वृद्धि का मापन किस प्रकार किया जाता है? वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
Answer: पौधों में वृद्धि का मापन कई तरीकों से किया जा सकता है, जिससे पता चलता है कि पौधा कितना बढ़ रहा है.
वृद्धि मापन के तरीके (Methods of Growth Measurement):
1. कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि: माइक्रोस्कोप का उपयोग करके कोशिकाओं की संख्या गिनकर वृद्धि मापी जा सकती है.
2. कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों के आकार में वृद्धि: पौधों के पत्तों, फूलों, फलों या पूरे पौधे के आकार और आयतन को मापकर वृद्धि का अनुमान लगाया जाता है.
3. शुष्क भार में वृद्धि: पौधे को सुखाकर उसके वजन में वृद्धि देखकर मापन किया जा सकता है.
4. रेखीय नाप: पौधे की लम्बाई को सीधे स्केल से या विशेष उपकरणों, जैसे ऑक्सैनोमीटर (Auxanometer), से मापा जाता है. ऑक्सैनोमीटर एक उपकरण है जिसमें एक डोरी पौधे से बंधी होती है और एक पुली (घिरनी) से होकर जाती है, जिससे पौधे की लम्बाई बढ़ने पर संकेतक स्केल पर चलता है.
वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Growth):
पौधों की वृद्धि को कई बाहरी और अंदरूनी कारक प्रभावित करते हैं:
1. प्रकाश: प्रकाश संश्लेषण के लिए ज़रूरी है, जिससे पौधे अपना भोजन बनाते हैं. सही मात्रा और गुणवत्ता का प्रकाश वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है.
2. तापमान: हर पौधे के लिए बढ़ने का एक निश्चित तापमान होता है. बहुत कम या बहुत ज़्यादा तापमान वृद्धि को रोक सकता है.
3. पानी: पानी कोशिकाओं के फैलने और पोषक तत्वों के परिवहन के लिए आवश्यक है. पानी की कमी वृद्धि को धीमा कर देती है.
4. पोषक तत्व: मिट्टी में आवश्यक खनिज पोषक तत्व, जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटेशियम, पौधों की स्वस्थ वृद्धि के लिए ज़रूरी हैं.
5. हार्मोन: ऑक्सिन, जिब्बरेलिन, साइटोकाइनिन, एथिलीन और एब्सिसिक अम्ल जैसे पादप हार्मोन वृद्धि, पुष्पन, फल लगने और पत्तियों के गिरने जैसी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं.
6. आनुवंशिक कारक: पौधे की आनुवंशिक बनावट तय करती है कि वह कितनी तेज़ी से और कितना बढ़ सकता है.
7. मिट्टी: मिट्टी की बनावट, pH मान और उसमें मौजूद वायु पौधों की जड़ों के विकास और पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं.
8. वायुमंडल की गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड प्रकाश संश्लेषण के लिए ज़रूरी है, जबकि ऑक्सीजन श्वसन के लिए.
In simple words: पौधों की वृद्धि को उनके आकार, वजन, या कोशिकाओं की संख्या मापकर पता करते हैं. प्रकाश, पानी, तापमान, पोषक तत्व और हार्मोन जैसे कारक उनकी वृद्धि को प्रभावित करते हैं.

🎯 Exam Tip: वृद्धि मापन की विधियों के साथ, प्रकाश, तापमान, पानी, पोषक तत्व और हार्मोन जैसे प्रमुख कारकों का उल्लेख ज़रूर करें जो वृद्धि को प्रभावित करते हैं.

 

Question 3. ऑक्सिन क्या होता है? पादप वृद्धि पर इसके कार्यिकीय प्रभावों की विवेचना कीजिए।
Answer: ऑक्सिन (Auxins) पौधों का एक महत्वपूर्ण हार्मोन समूह है जिसका नाम ग्रीक शब्द 'ऑक्सिन' से आया है, जिसका मतलब 'बढ़ना' होता है. यह हार्मोन पौधों की कोशिकाओं को लंबा करने और उनकी वृद्धि को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका निभाता है. ऑक्सिन को सबसे पहले मानव मूत्र से अलग किया गया था.
पादप वृद्धि पर ऑक्सिन के कार्यिकीय प्रभाव (Physiological Effects of Auxins):
1. शीर्ष प्रमुखता (Apical Dominance): ऑक्सिन मुख्य रूप से तने के ऊपरी हिस्से (शीर्ष कलिका) में बनता है और नीचे की ओर जाता है. यह पार्श्व (साइड) कलिकाओं की वृद्धि को रोकता है, जिससे तना सीधा ऊपर की ओर बढ़ता है. यदि शीर्ष कलिका को हटा दिया जाए, तो पार्श्व कलिकाएँ विकसित होने लगती हैं और पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है.
2. कोशिका दीर्धीकरण (Cell Elongation): ऑक्सिन तने के ऊपरी सिरे की कोशिकाओं को लंबा करने में मदद करता है, जिससे पौधे की लम्बाई बढ़ती है. यही कारण है कि तना प्रकाश की ओर मुड़ता है.
3. जड़ों का आरंभ (Root Initiation): ऑक्सिन जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है. कलम (पौधे का कटा हुआ हिस्सा) को ऑक्सिन के घोल में डुबाने से उसमें जल्दी जड़ें निकल आती हैं. इसका उपयोग गुलाब जैसे पौधों में नए पौधे तैयार करने के लिए किया जाता है.
4. अनिषेक फलन (Parthenocarpy): यह बिना निषेचन के बीज रहित फल बनाने में मदद करता है, जैसे संतरा, नींबू, और तरबूज.
5. फसली पौधों को गिरने से बचाना (Prevention of Lodging): ऑक्सिन का छिड़काव करने से गेहूं जैसे फसलों के निचले हिस्से मजबूत हो जाते हैं, जिससे तेज़ हवा में पौधे गिरने से बचते हैं.
6. प्रसुप्ति नियंत्रण (Control of Dormancy): ऑक्सिन बीजों और कंदों को निष्क्रिय अवस्था में रखता है, जिससे उनका अंकुरण रुक जाता है. यह भंडारण के समय उपयोगी होता है.
7. खरपतवारों का उन्मूलन (Eradication of Weeds): कुछ ऑक्सिन, जैसे 2,4-D, द्विबीजपत्री खरपतवारों को नष्ट करने में उपयोग किए जाते हैं, जिससे फसल को नुकसान नहीं होता.
8. पर्वों का लघुकरण (Shortening of Internodes): NAA जैसे ऑक्सिन का छिड़काव करने से नाशपाती और सेब में छोटी शाखाओं पर फलों का निर्माण बढ़ता है.
9. ऊतक संवर्धन (Tissue Culture): ऊतक संवर्धन तकनीक में ऑक्सिन जड़ों के निर्माण और कैलस (अविभेदित कोशिकाओं का समूह) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
In simple words: ऑक्सिन एक प्लांट हार्मोन है जो कोशिकाओं को लंबा करके पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है. यह तने को सीधा करने, जड़ें बनाने और बीज रहित फल बनाने जैसे कई काम करता है.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन की परिभाषा के साथ उसके कम से कम पाँच मुख्य कार्यिकीय प्रभावों (जैसे शीर्ष प्रमुखता, कोशिका दीर्धीकरण, जड़ों का आरंभ, अनिषेक फलन, खरपतवार उन्मूलन) को स्पष्ट रूप से समझाएँ.

 

Question 4. ऑक्सिन की खोज के सम्बन्ध में विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोगों का वर्णन कीजिए।
Answer: ऑक्सिन की खोज एक लंबी प्रक्रिया थी जिसमें कई वैज्ञानिकों ने योगदान दिया. ऑक्सिन शब्द ग्रीक भाषा के 'ऑक्सिन' से आया है, जिसका अर्थ है 'बढ़ना'. यह पौधों में सबसे पहले खोजा गया हार्मोन था जो कोशिकाओं को लंबा करने में मदद करता है.
ऑक्सिन की खोज के मुख्य प्रयोग:
1. चार्ल्स डार्विन और फ्रेन्सिस डार्विन का प्रयोग (1880): चार्ल्स डार्विन और उनके बेटे फ्रेन्सिस डार्विन ने केनेरी घास (Phalaris canariensis) के प्रांकुरचोल (Coleoptile) पर अध्ययन किया. उन्होंने देखा कि जब प्रांकुरचोल पर एक तरफ से प्रकाश पड़ता है, तो वह प्रकाश की ओर मुड़ जाता है. उन्होंने अनुमान लगाया कि प्रांकुरचोल के ऊपरी सिरे में कोई ऐसा पदार्थ बनता है जो नीचे की ओर जाकर वृद्धि को प्रभावित करता है, जिससे मोड़ आता है. यह उनकी किताब 'द पॉवर ऑफ मूवमेंट इन प्लांट्स' में वर्णित है.
2. बॉयसन-जेनसन का प्रयोग (1910-1913): बॉयसन-जेनसन ने जई (Avena sativa) के प्रांकुरचोल के शीर्ष को काटकर उस पर कुछ प्रयोग किए. उन्होंने दिखाया कि यदि शीर्ष को काटकर फिर से लगा दिया जाए तो मुड़ने की क्षमता वापस आ जाती है. यदि शीर्ष और तने के बीच जिलेटिन का एक टुकड़ा रखा जाए तो भी मुड़ने की क्षमता बनी रहती है, जिसका अर्थ था कि कोई रसायन जिलेटिन से होकर नीचे जा सकता है.
3. पाल का प्रयोग (1919): पाल ने भी बॉयसन-जेनसन के प्रयोगों को आगे बढ़ाया और साबित किया कि प्रांकुरचोल के शीर्ष भाग में वृद्धि को बढ़ावा देने वाले रसायन होते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि ये पदार्थ पानी में घुलनशील होते हैं.
4. एफ.डब्ल्यू. वेन्ट का प्रयोग (1926-1928): वेन्ट ने जई के प्रांकुरचोल से वृद्धि हार्मोन को अलग करने में सफलता प्राप्त की. उन्होंने प्रांकुरचोल के शीर्ष को काटकर उसे अगर (Agar) के छोटे टुकड़ों पर रखा. फिर इन अगर के टुकड़ों को ऐसे प्रांकुरचोल के ऊपर रखा जिनके शीर्ष हटा दिए गए थे. उन्होंने देखा कि जिन अगर के टुकड़ों को शीर्ष पर रखा गया था, वहाँ वृद्धि हुई. उन्होंने यह भी पाया कि जब प्रांकुरचोल को एक तरफ से प्रकाशित किया जाता है, तो ऑक्सिन की मात्रा अप्रकाशित तरफ ज़्यादा होती है, जिससे मुड़ना होता है. इस पदार्थ को उन्होंने ऑक्सिन नाम दिया.
In simple words: ऑक्सिन की खोज कई वैज्ञानिकों ने की, जिसमें डार्विन ने बताया कि शीर्ष भाग में कुछ बनता है जो वृद्धि करता है, और वेन्ट ने उस पदार्थ को अलग करके ऑक्सिन नाम दिया.

🎯 Exam Tip: ऑक्सिन की खोज से संबंधित प्रमुख वैज्ञानिकों (डार्विन, बॉयसन-जेनसन, पाल, वेन्ट) और उनके मुख्य प्रयोगों का संक्षेप में वर्णन करें.

 

Question 5. प्रसप्ति किसे कहते हैं? प्रसप्ति के कारण तथा इनको समाप्त करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
Answer: प्रसुप्ति (Dormancy) पौधों की वह अवस्था है जब बीज या कलियाँ अपनी वृद्धि और विकास को अस्थायी रूप से रोक देती हैं, भले ही उन्हें बढ़ने के लिए सभी अच्छी परिस्थितियाँ मिल रही हों. यह एक गहरी नींद की तरह है जो उन्हें प्रतिकूल वातावरण से बचाता है और सही समय आने पर बढ़ने में मदद करता है. प्रसुप्ति से बीज लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं.
प्रसुप्ति के कारण (Causes of Dormancy):
1. कठोर बीजावरण (Hard Seed Coat): कुछ बीजों का बाहरी खोल बहुत कड़ा होता है, जिससे पानी या ऑक्सीजन अंदर नहीं जा पाते और बीज अंकुरित नहीं हो पाते. उदाहरण: चना, मटर.
2. भ्रूण की अपरिपक्वता (Immature Embryo): कुछ पौधों में बीज के बनने के समय भ्रूण पूरी तरह से विकसित नहीं होता है. ऐसे बीज तब तक अंकुरित नहीं होते जब तक कि भ्रूण पूरी तरह से परिपक्व न हो जाए. उदाहरण: गिंगो बाइलोबा.
3. उत्तरपक्वन काल (After-ripening Period): कुछ बीजों को अंकुरित होने से पहले कुछ समय के लिए आराम की ज़रूरत होती है. इस आराम के दौरान बीज में कुछ अंदरूनी बदलाव होते हैं जो उन्हें अंकुरण के लिए तैयार करते हैं. उदाहरण: गेहूं, जौ.
4. प्रकाश और तापमान की विशेष आवश्यकता (Specific Light and Temperature Requirements): कुछ बीजों को अंकुरण के लिए खास तापमान (जैसे ठंडा) या प्रकाश (जैसे लाल प्रकाश) की ज़रूरत होती है.
5. अंकुरण निरोधकों की उपस्थिति (Presence of Germination Inhibitors): कुछ फलों या बीजों में ऐसे रसायन होते हैं जो अंकुरण को रोकते हैं, जैसे एब्सिसिक अम्ल (ABA), कौमेरिन. ये रसायन बीज को तब तक अंकुरित नहीं होने देते जब तक ये धुलकर हट न जाएँ.
प्रसुप्ति समाप्त करने के उपाय (Methods of Breaking Dormancy):
1. खुरचना (Scarification): बीज के कठोर खोल को यांत्रिक रूप से (खुरचकर) या रासायनिक रूप से (हल्के तेज़ाब या गर्म पानी से) नरम किया जाता है ताकि पानी अंदर जा सके.
2. शीतन उपचार (Chilling Treatment): बीजों को 0°C से 5°C जैसे कम तापमान पर कुछ समय के लिए रखा जाता है. इससे बीजों में रासायनिक बदलाव होते हैं जो अंकुरण को बढ़ावा देते हैं.
3. तापमान में बदलाव (Alternating Temperature): कुछ बीजों को अंकुरित करने के लिए दिन और रात के तापमान में उतार-चढ़ाव की ज़रूरत होती है.
4. प्रकाश उपचार (Light Treatment): कुछ फोटोब्लास्टिक बीजों को लाल प्रकाश देने से उनका अंकुरण तेज़ हो जाता है.
5. दाब उपचार (Pressure Treatment): उच्च वायुमंडलीय दाब पर रखने से कुछ बीजों का खोल कमजोर हो जाता है, जिससे वे अंकुरित हो जाते हैं.
6. वृद्धि नियामकों का उपयोग (Use of Growth Regulators): जिब्बरेलिन जैसे हार्मोन का उपयोग प्रसुप्ति को तोड़ने के लिए किया जा सकता है, खासकर उन बीजों में जिनमें निरोधक रसायन मौजूद होते हैं. जिब्बरेलिन इन निरोधकों के प्रभाव को कम कर देता है.
In simple words: प्रसुप्ति तब होती है जब बीज बढ़ना रोक देते हैं, इसके कारण कठोर खोल, अपरिपक्व भ्रूण या कुछ रसायन हो सकते हैं. इसे तोड़ने के लिए बीज को खुरचते हैं, ठंडा करते हैं, या हार्मोन का उपयोग करते हैं.

🎯 Exam Tip: प्रसुप्ति की विस्तृत परिभाषा के साथ उसके सभी प्रमुख कारणों और उन्हें समाप्त करने की विधियों को उनके उदाहरणों सहित स्पष्ट करें.

 

Question 6. अंकुरण के अन्त में नवोद्भिद् के शुष्क भार में कमी क्यों आ जाती है?
Answer: अंकुरण के आखिर में नए पौधे (नवोद्भिद्) के सूखे वजन में कमी आ जाती है, क्योंकि बीज में जमा हुआ भोजन (जैसे स्टार्च, प्रोटीन, वसा) अंकुरण की प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा बनाने के लिए इस्तेमाल हो जाता है. बीज इस भोजन को श्वसन और नई कोशिकाओं के निर्माण जैसी उपापचयी क्रियाओं में खर्च करता है. जब तक पत्तियां विकसित होकर प्रकाश संश्लेषण शुरू नहीं कर देतीं, तब तक पौधा बीज के भंडारित भोजन पर ही निर्भर रहता है. एक बार पत्तियां बनने और प्रकाश संश्लेषण शुरू होने के बाद, पौधे का शुष्क भार फिर से बढ़ने लगता है.
In simple words: अंकुरण के दौरान बीज अपना जमा भोजन ऊर्जा बनाने में इस्तेमाल कर लेता है, इसलिए नए पौधे का सूखा वजन कम हो जाता है.

🎯 Exam Tip: अंकुरण के दौरान 'बीज के संचित भोजन का उपयोग' और 'उपापचयी क्रियाओं' को शुष्क भार में कमी के मुख्य कारण के रूप में बताएँ.

 

Question 7. मेहन्दी की झाड़ियों के शीर्षभाग की माली कटिंग क्यों करता रहता है?
Answer: माली मेहन्दी की झाड़ियों के ऊपरी हिस्से (शीर्षभाग) की कटिंग इसलिए करता रहता है क्योंकि ऐसा करने से 'शीर्ष प्रमुखता' (Apical dominance) खत्म हो जाती है. शीर्ष प्रमुखता का मतलब है कि जब पौधे के सबसे ऊपरी सिरे पर मौजूद कलिका (शीर्ष कलिका) सक्रिय होती है, तो वह ऑक्सिन हार्मोन बनाती है. यह हार्मोन नीचे जाकर पार्श्व (साइड) कलिकाओं की वृद्धि को रोक देता है, जिससे पौधा ऊपर की ओर बढ़ता है और साइड में फैल नहीं पाता. जब माली शीर्ष कलिका को काट देता है, तो ऑक्सिन का प्रभाव खत्म हो जाता है, जिससे पार्श्व कलिकाएँ विकसित होने लगती हैं और झाड़ी घनी व झाड़ीनुमा बन जाती है. यह मेहन्दी को सुंदर आकार देने और उसे घना बनाए रखने के लिए ज़रूरी है.
In simple words: माली मेहन्दी की कटिंग इसलिए करता है ताकि शीर्ष प्रमुखता खत्म हो और साइड की शाखाएँ निकलकर झाड़ी घनी हो जाए.

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में 'शीर्ष प्रमुखता' और 'ऑक्सिन हार्मोन' के प्रभाव को स्पष्ट रूप से समझाएँ. कटिंग से पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि और झाड़ीनुमा आकार का बनना मुख्य बिंदु हैं.

 

Question 8. फाइटोक्रोम क्या है एवं इसका क्या महत्त्व है?
Answer: फाइटोक्रोम एक खास प्रोटीन युक्त वर्णक (रंग देने वाला पदार्थ) है जो हरे पौधों (शैवाल से लेकर फूल वाले पौधों तक) में पाया जाता है. यह प्रकाश को सोखता है और पौधे के विकास की कई प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है.
फाइटोक्रोम का महत्त्व (Importance of Phytochrome):
1. प्रकाश संवेदनशीलता: फाइटोक्रोम पौधों को विभिन्न प्रकार के प्रकाश, खासकर लाल और सुदूर-लाल प्रकाश, को पहचानने में मदद करता है. यह दो रूपों में होता है: \( P_{r} \) (लाल प्रकाश सोखने वाला) और \( P_{fr} \) (सुदूर-लाल प्रकाश सोखने वाला).
2. पुष्पन का नियंत्रण: यह पौधों में फूल खिलने के समय को नियंत्रित करता है. उदाहरण के लिए, कुछ पौधों को फूलने के लिए दिन का लंबा होना ज़रूरी होता है, जबकि कुछ को छोटा दिन. फाइटोक्रोम इस "फोटोपीरियोडिज्म" को नियंत्रित करता है.
3. बीज अंकुरण: कुछ बीजों के अंकुरण के लिए प्रकाश की ज़रूरत होती है (फोटोब्लास्टिक बीज). फाइटोक्रोम यह सुनिश्चित करता है कि बीज सही प्रकाश स्थितियों में ही अंकुरित हों.
4. छाया से बचना: जब कोई पौधा दूसरे पौधे की छाया में होता है, तो फाइटोक्रोम उसे पहचान लेता है और पौधे को लंबा बढ़ने के लिए प्रेरित करता है ताकि वह प्रकाश तक पहुँच सके.
5. पत्तियों और तनों का विकास: यह पत्तियों के खुलने, तनों के लंबा होने और क्लोरोफिल बनने जैसी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है.
इस प्रकार, फाइटोक्रोम पौधों को उनके आसपास के प्रकाश वातावरण के अनुसार अपनी वृद्धि और विकास को ढालने में मदद करता है, जो उनके जीवित रहने के लिए बहुत ज़रूरी है.
In simple words: फाइटोक्रोम पौधों में पाया जाने वाला एक वर्णक है जो प्रकाश को पहचानकर फूलों के खिलने, बीज के उगने और पौधे के बढ़ने जैसी चीज़ों को नियंत्रित करता है.

🎯 Exam Tip: फाइटोक्रोम को 'प्रोटीन युक्त वर्णक' के रूप में परिभाषित करें और उसके दो मुख्य रूपों (\( P_{r} \) और \( P_{fr} \)) का उल्लेख करें. इसके महत्त्व में पुष्पन, बीज अंकुरण और छाया प्रतिक्रिया को शामिल करें.

 

Question 9. एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन क्यों कहते हैं?
Answer: एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid या ABA) को 'तनाव हार्मोन' (Stress hormone) कहा जाता है क्योंकि यह पौधों को प्रतिकूल पर्यावरणीय स्थितियों, जैसे पानी की कमी, अत्यधिक ठंड या सूखा, से बचाने में मदद करता है. जब पौधे तनाव में होते हैं, तो ABA की मात्रा बढ़ जाती है.
तनाव हार्मोन कहलाने के कारण:
1. रन्ध्रों को बंद करना: ABA पत्तियों पर मौजूद छोटे छिद्रों (रन्ध्रों) को बंद कर देता है, जिससे पौधे से पानी का वाष्पीकरण (पानी का बाहर निकलना) कम हो जाता है. यह पानी की कमी होने पर पौधे को सूखने से बचाता है.
2. बीज प्रसुप्ति: यह बीजों को निष्क्रिय अवस्था (प्रसुप्ति) में रखता है, ताकि वे खराब परिस्थितियों में अंकुरित न हों. यह सुनिश्चित करता है कि बीज अनुकूल मौसम में ही अंकुरित हों.
3. वृद्धि संदमन: ABA पौधों की वृद्धि को धीमा कर देता है, जिससे पौधे तनावपूर्ण समय में अपनी ऊर्जा बचा सकें.
4. पत्तियों का गिरना (Abscission): यह कुछ पौधों में पत्तियों और फलों को गिराने में मदद करता है, खासकर जब वे पुराने हो जाते हैं या पानी की कमी होती है.
इस तरह, ABA पौधों को तनावपूर्ण वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है, इसलिए इसे तनाव हार्मोन कहा जाता है. इसका रासायनिक सूत्र \( C_{15}H_{20}O_{4} \) है और यह हरितलवक में बनता है.
In simple words: एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन कहते हैं क्योंकि यह पौधे को सूखे या ठंड जैसी बुरी परिस्थितियों से बचाता है, जैसे पत्तियों के छेद बंद करके पानी बचाना.

🎯 Exam Tip: एब्सिसिक अम्ल को 'तनाव हार्मोन' क्यों कहते हैं, इसका कारण 'रन्ध्रों को बंद करना' और 'पानी की कमी से बचाना' जैसे प्रमुख प्रभावों के साथ स्पष्ट करें.

 

Question 6. निम्न विषयों पर निबन्ध लिखिए-
(i) जिब्बरेलिन एवं साइटोकाइनिन
(ii) वृद्धि निरोधक पदार्थ
(iii) दीप्तिकालिता
(iv) जीर्णता एवं विलगन
(v) बसन्तीकरण
Answer:
(i) जिब्बरेलिन एवं साइटोकाइनिन (Gibberellins and Cytokinins)
जिब्बरेलिन्स (Gibberellins):
जिब्बरेलिन्स पौधों के हार्मोन का एक समूह है जिसे पहली बार जापान में धान के 'बकाने रोग' (Foolish seedling disease) से खोजा गया था. यह रोग जिबरेला फ्यूजीकोराई (Gibberella fujikuroi) नामक कवक के कारण होता है, जो अत्यधिक लंबा होने वाले धान के पौधे पैदा करता था. जिब्बरेलिन्स का शाब्दिक अर्थ 'बढ़ना' होता है. अब तक 100 से ज़्यादा प्रकार के जिब्बरेलिन्स (जैसे \( GA_1, GA_2, GA_3 \)) खोजे जा चुके हैं, जिनमें \( GA_3 \) सबसे आम है. ये सभी रसायन टरपीन्स होते हैं और प्रकाश से प्रभावित नहीं होते.
कार्यिकीय प्रभाव (Physiological Effects):
1. पर्व दीर्घन (Internode Elongation): जिब्बरेलिन तने के पर्वों (गाँठों के बीच का हिस्सा) को लंबा करता है, जिससे पौधे की लम्बाई बढ़ती है. यह खास तौर पर 'रोजेट' स्वभाव वाले पौधों में देखने को मिलता है, जहाँ पत्तियाँ तने के पास-पास होती हैं. जिब्बरेलिन के छिड़काव से ये पौधे असामान्य रूप से लंबे हो जाते हैं (बोल्टिंग).
2. प्रसुप्ति भंग करना (Breaking Dormancy): यह बीजों और कलिकाओं की प्रसुप्ति को तोड़ता है, जिससे वे जल्दी अंकुरित हो सकें.
3. पुष्पन (Flowering): कुछ पौधों में जिब्बरेलिन फूल खिलने को प्रेरित करता है, खासकर उन पौधों में जिन्हें फूलने के लिए ठंडे तापमान या लंबे दिन की ज़रूरत होती है.
4. अनिषेक फलन (Parthenocarpy): जिब्बरेलिन अनिषेक फलन (बिना निषेचन के फल बनना) को बढ़ावा देता है, जिससे बीज रहित फल जैसे टमाटर और सेब पैदा होते हैं. यह ऑक्सिन से भी ज़्यादा प्रभावी होता है.
5. फल का आकार बढ़ाना: यह सेब जैसे फलों का आकार बढ़ाने में मदद करता है.
साइटोकाइनिन (Cytokinins):
साइटोकाइनिन पौधों के हार्मोन का एक समूह है जो मुख्य रूप से कोशिका विभाजन (साइटोकाइनेसिस) को बढ़ावा देता है. पहली बार जियेटिन (Zeatin) नामक प्राकृतिक साइटोकाइनिन मक्का के भ्रूणपोष से अलग किया गया था. साइटोकाइनिन अक्सर उन जगहों पर बनते हैं जहाँ कोशिका विभाजन तेज़ी से होता है, जैसे जड़ और तने के ऊपरी सिरे, विकसित हो रही कलिकाएँ और तरुण फल. ये t-RNA के निर्माण में भी शामिल होते हैं.
कार्यिकीय प्रभाव (Physiological Effects):
1. कोशिका विभाजन (Cell Division): साइटोकाइनिन ऑक्सिन की उपस्थिति में कोशिका विभाजन को तेज़ करता है, जिससे पौधों में नए ऊतक बनते हैं.
2. अंग निर्माण (Organogenesis): ऊतक संवर्धन (Tissue culture) में, साइटोकाइनिन और ऑक्सिन का सही अनुपात जड़ों या प्ररोहों (तना) के निर्माण को नियंत्रित करता है. ज़्यादा साइटोकाइनिन प्ररोह बनाता है, जबकि ज़्यादा ऑक्सिन जड़ें बनाता है.
3. शीर्ष प्रमुखता का निरोध (Inhibition of Apical Dominance): साइटोकाइनिन शीर्ष कलिका द्वारा होने वाली पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोकने वाले प्रभाव को कम करता है, जिससे पार्श्व कलिकाएँ विकसित होती हैं और पौधा अधिक झाड़ीनुमा बनता है.
4. प्रसुप्ति नष्ट करना (Breaking Dormancy): यह बीजों और कलिकाओं की प्रसुप्ति को तोड़ता है, जिससे वे अंकुरित हो सकें.
5. जीर्णता विलम्ब (Delaying Senescence): साइटोकाइनिन पत्तियों और अन्य अंगों की जीर्णता (बुढ़ापा या मरने की प्रक्रिया) को धीमा करता है, जिससे पत्तियां लंबे समय तक हरी और स्वस्थ रहती हैं. इसे रिचमॉन्ड-लैंग प्रभाव भी कहते हैं.
In simple words: जिब्बरेलिन पौधे को लंबा बढ़ने, प्रसुप्ति तोड़ने और फूल खिलाने में मदद करता है. साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन बढ़ाता है, शाखाएँ निकलने में मदद करता है और पौधे को बूढ़ा होने से बचाता है.

🎯 Exam Tip: जिब्बरेलिन और साइटोकाइनिन दोनों की उत्पत्ति, उनके कम से कम तीन-तीन कार्यिकीय प्रभाव और कोशिका विभाजन/दीर्घीकरण में उनकी भूमिका को स्पष्ट करें.

 

Question 6. निम्न विषयों पर निबन्ध लिखिए-
(ii) वृद्धि निरोधक पदार्थ
Answer:
(ii) वृद्धि निरोधक पदार्थ (Growth Inhibitors):
वृद्धि निरोधक पदार्थ ऐसे रासायनिक यौगिक होते हैं जो पौधों की वृद्धि और विकास की प्रक्रियाओं को धीमा करते हैं या रोकते हैं. ये हार्मोन पौधे के जीवन चक्र में संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, खासकर तनावपूर्ण स्थितियों में.
मुख्य वृद्धि निरोधक पदार्थ:
1. एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid – ABA): यह सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक वृद्धि निरोधक हार्मोन है.
- रन्ध्रों को बंद करना: ABA पानी की कमी होने पर पत्तियों के रन्ध्रों को बंद कर देता है, जिससे पानी का नुकसान कम होता है.
- बीज प्रसुप्ति: यह बीजों और कलिकाओं को निष्क्रिय अवस्था (प्रसुप्ति) में रखता है, ताकि वे प्रतिकूल मौसम में अंकुरित न हों.
- जीर्णता (Senescence): यह पत्तियों और फलों की जीर्णता (बूढ़ा होना और गिरना) को बढ़ाता है.
- इसे 'तनाव हार्मोन' कहा जाता है क्योंकि यह पौधों को सूखे और ठंड जैसे तनावों से बचाता है.
2. एथिलीन (Ethylene): यह एक गैसीय हार्मोन है जो फलों के पकने और जीर्णता में मुख्य भूमिका निभाता है.
- फलों का पकना: एथिलीन फलों के पकने की प्रक्रिया को तेज़ करता है, जिससे फल नरम और मीठे होते हैं.
- जीर्णता और विलगन: यह पत्तियों, फूलों और फलों के गिरने (विलगन) को बढ़ावा देता है.
- तने की मोटाई बढ़ाना: यह तने की मोटाई को बढ़ाता है और लम्बाई को कम करता है.
3. कौमेरिन (Coumarin): यह एक प्राकृतिक पदार्थ है जो बीजों में प्रसुप्ति को प्रेरित करता है.
4. फेनोलिक अम्ल (Phenolic Acid): यह भी कुछ बीजों में अंकुरण को रोकता है.
ये पदार्थ पौधों को उनकी वृद्धि को नियंत्रित करने, तनाव से बचने और जीवन चक्र को सही समय पर पूरा करने में मदद करते हैं. यह संतुलन पौधों के जीवित रहने और सफल प्रजनन के लिए आवश्यक है.
In simple words: वृद्धि निरोधक पदार्थ पौधे को धीमा करते हैं या बढ़ने से रोकते हैं. एब्सिसिक अम्ल और एथिलीन इसके उदाहरण हैं, जो तनाव से बचाते हैं और फलों को पकाते हैं.

🎯 Exam Tip: वृद्धि निरोधक पदार्थों के रूप में एब्सिसिक अम्ल और एथिलीन का उल्लेख करें और उनके मुख्य कार्यिकीय प्रभावों (जैसे प्रसुप्ति, जीर्णता, रन्ध्रों को बंद करना, फल पकना) को स्पष्ट करें.

 

Question 6. निम्न विषयों पर निबन्ध लिखिए-
(iii) दीप्तिकालिता
Answer:
(iii) दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
दीप्तिकालिता वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे दिन और रात की लम्बाई (प्रकाश की अवधि) को महसूस करके अपनी वृद्धि और विकास को नियंत्रित करते हैं. यह खासकर फूल खिलने (पुष्पन) की प्रक्रिया को प्रभावित करती है. अमेरिकी वैज्ञानिकों गार्नर और एलार्ड (1920) ने तम्बाकू पर प्रयोग करके इसकी खोज की थी. उन्होंने पाया कि दिन की लम्बाई पौधों में फूल खिलने के लिए एक महत्वपूर्ण 'क्रान्तिक कारक' है.
दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों का वर्गीकरण (Classification of Plants based on Photoperiodism):
दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है:
1. अल्पदीप्तिकाली पादप (Short-Day Plants - SDP): इन पौधों को फूलने के लिए एक निश्चित 'क्रान्तिक दीप्तिकाल' से कम प्रकाश अवधि और एक लंबी, लगातार अंधेरे की अवधि की ज़रूरत होती है. यदि अंधेरे की अवधि को प्रकाश से बाधित किया जाए, तो फूल नहीं खिलते. उदाहरण: तम्बाकू, सोयाबीन, गन्ना, चावल.
2. दीर्घदीप्तिकाली पादप (Long-Day Plants - LDP): इन पौधों को फूलने के लिए एक निश्चित 'क्रान्तिक दीप्तिकाल' से ज़्यादा प्रकाश अवधि और छोटी अंधेरे की अवधि की ज़रूरत होती है. यदि इन्हें पर्याप्त प्रकाश न मिले, तो फूल नहीं खिलते. उदाहरण: गेहूं, जौ, मूली, पालक.
3. दिवस उदासीन पादप (Day-Neutral Plants - DNP): इन पौधों पर दिन की लम्बाई का कोई खास असर नहीं होता; ये किसी भी प्रकाश अवधि में फूल सकते हैं. उदाहरण: टमाटर, कपास, मक्का, मिर्च, सूरजमुखी.
दीप्तिकालिता की क्रियाविधि (Mechanism of Photoperiodism):
माना जाता है कि पत्तियों में एक 'फ्लोरीजन' (Florigen) नामक काल्पनिक हार्मोन बनता है जो प्रकाश अवधि को महसूस करता है और फिर तने के ऊपरी सिरे तक जाकर फूल खिलने को प्रेरित करता है. फ्लोरीजन दो यौगिकों (जिब्बरेलिन और एन्थेसिन्स) का मिश्रण माना जाता है. फाइटोक्रोम नामक वर्णक इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो लाल और सुदूर-लाल प्रकाश को सोखकर पौधों को दिन की लम्बाई पहचानने में मदद करता है. यह पौधों को अपने आसपास के प्रकाश वातावरण के अनुसार ढालने में सहायता करता है.
In simple words: दीप्तिकालिता वह प्रक्रिया है जहाँ पौधे दिन और रात की लम्बाई को देखकर फूल खिलाते हैं. पौधे तीन तरह के होते हैं: छोटे दिन वाले (SDP), लंबे दिन वाले (LDP) और किसी भी दिन वाले (DNP).

🎯 Exam Tip: दीप्तिकालिता की परिभाषा, उसके आधार पर पौधों का वर्गीकरण (SDP, LDP, DNP) और प्रत्येक श्रेणी के उदाहरणों को स्पष्ट रूप से समझाएँ.

 

Question 6. निम्न विषयों पर निबन्ध लिखिए-
(iv) जीर्णता एवं विलगन
Answer:
(iv) जीर्णता एवं विलगन (Senescence and Abscission):
जीर्णता (Senescence):
जीर्णता वह जैविक प्रक्रिया है जिसमें पौधों के अंग (जैसे पत्तियां, फूल, फल) या पूरा पौधा धीरे-धीरे बूढ़ा होकर मरने लगता है. यह एक प्राकृतिक और अपरिहार्य प्रक्रिया है जो पौधों के जीवन चक्र का हिस्सा है. जीर्णता के दौरान, पौधे अपनी ऊर्जा और पोषक तत्वों को पुराने, मरने वाले अंगों से हटाकर नए, बढ़ते हुए अंगों में भेज देते हैं.
जीर्णता के प्रकार:
1. शीर्ष या प्ररोह जीर्णता: इसमें पौधे का ऊपरी हवाई भाग हर साल मर जाता है, लेकिन जड़ें और भूमिगत तना जीवित रहते हैं और अगले साल फिर से बढ़ते हैं.
2. पर्णपाती जीर्णता: कई पौधों में पतझड़ में पत्तियां मरकर गिर जाती हैं, लेकिन तना और जड़ें जीवित रहती हैं और अनुकूल परिस्थितियों में फिर से पत्तियां निकल आती हैं.
3. क्रमिक जीर्णता: इसमें पहले पुरानी पत्तियां मरती हैं, फिर अन्य पत्तियां, तना और जड़ें धीरे-धीरे मरती हैं.
हार्मोन और जीर्णता: एब्सिसिक अम्ल (ABA) और एथिलीन जीर्णता को बढ़ावा देते हैं, जबकि ऑक्सिन, जिब्बरेलिन और साइटोकाइनिन इसे धीमा कर सकते हैं. साइटोकाइनिन जीर्णता को रोकने में खास भूमिका निभाता है (रिचमॉन्ड-लैंग प्रभाव).
विलगन (Abscission):
विलगन वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे के अंग (जैसे पत्तियां, फूल, फल) मातृ पौधे से अलग होकर गिर जाते हैं. यह जीर्णता का परिणाम हो सकता है. विलगन एक विशेष 'विलगन परत' (Abscission layer) के बनने के कारण होता है, जो अंग के आधार पर विकसित होती है.
विलगन की प्रक्रिया:
1. विलगन परत में कोशिकाएँ कमजोर हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच की दीवारें (मध्य पटलिका) और कोशिका भित्ति पेक्टिनेज और सेल्युलेज जैसे एन्जाइमों द्वारा टूट जाती हैं.
2. इससे कोशिकाएँ एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं, और अंग कमजोर होकर गिर जाता है.
3. विलगन परत के नीचे, पौधे एक सुरक्षात्मक परत बना लेते हैं ताकि कटे हुए स्थान से संक्रमण न फैले.
हार्मोन और विलगन: एब्सिसिक अम्ल विलगन में मुख्य भूमिका निभाता है और इसे बढ़ावा देता है. एथिलीन भी फल और पत्ती विलगन को तेज़ करता है. विलगन हार्मोन असंतुलन के कारण होता है. यह पौधों को पुराने या क्षतिग्रस्त अंगों से छुटकारा पाने में मदद करता है.
In simple words: जीर्णता मतलब पौधे के अंगों का बूढ़ा होकर मरना, और विलगन मतलब उन अंगों का पौधे से अलग होकर गिर जाना.

🎯 Exam Tip: जीर्णता की परिभाषा, उसके प्रकार और विलगन की प्रक्रिया को हार्मोन के प्रभावों के साथ स्पष्ट करें. एब्सिसिक अम्ल और एथिलीन की भूमिका पर विशेष ध्यान दें.

 

Question 6. निम्न विषयों पर निबन्ध लिखिए-
(v) बसन्तीकरण
Answer:
(v) बसन्तीकरण (Vernalization):
बसन्तीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पौधों को फूल खिलने (पुष्पन) के लिए ठंडे तापमान (आमतौर पर 0°C से 5°C) के संपर्क में आना ज़रूरी होता है. यह प्रक्रिया पौधों को यह संकेत देती है कि सर्दी का मौसम बीत चुका है और अब फूल खिलाने का सही समय आ गया है. यह विशेष रूप से उन पौधों में महत्वपूर्ण है जिन्हें सर्दियों की ठंडी अवधि की आवश्यकता होती है, जैसे द्विवर्षीय पौधे.
बसन्तीकरण का महत्त्व:
1. पुष्पन का नियंत्रण: बसन्तीकरण यह सुनिश्चित करता है कि पौधे केवल अनुकूल मौसम में ही फूलें, जब परिस्थितियाँ परागण और बीज बनने के लिए सही हों.
2. फसल चक्र का समायोजन: इस प्रक्रिया का उपयोग करके किसान उन फसलों को वसंत ऋतु में भी उगा सकते हैं जिन्हें सामान्य रूप से सर्दियों की आवश्यकता होती है.
3. अनुकूलन: यह पौधों को ठंडे वातावरण में जीवित रहने और प्रजनन करने में मदद करता है.
बसन्तीकरण की क्रियाविधि:
लायसेन्को (Lysenko, 1928) ने चावल की किस्मों पर अध्ययन करके बसन्तीकरण की अवधारणा को पेश किया. उन्होंने देखा कि कुछ पौधों को फूलने के लिए ठंडे उपचार की ज़रूरत होती है.
बसन्तीकरण की प्रक्रिया में, बीजों या छोटे पौधों को भिगोकर कम तापमान पर कुछ दिनों या हफ्तों तक रखा जाता है. यह ठंडा उपचार पौधों में 'वर्नेलिन' (Vernalin) नामक एक काल्पनिक हार्मोन बनाने के लिए प्रेरित करता है. वर्नेलिन को 'फ्लोरीजन' (Florigen) का अग्रदूत माना जाता है, जो सीधे फूल खिलने को प्रेरित करता है. मेल्चर्स (Melchers, 1939) ने वर्नेलिन का विचार दिया था.
विबसन्तीकरण (Devernalization):
यदि बसन्तीकरण से गुजरे हुए बीजों या पौधों को फिर से उच्च तापमान पर रखा जाए, तो बसन्तीकरण का प्रभाव खत्म हो सकता है. इस प्रक्रिया को विबसन्तीकरण कहते हैं. यह दर्शाता है कि बसन्तीकरण का प्रभाव स्थायी नहीं होता है.
बसन्तीकरण पौधों के भ्रूण और मेरिस्टेमेटिक ऊतकों में होता है, जो ठंडे उपचार के प्रति संवेदनशील होते हैं.
In simple words: बसन्तीकरण वह प्रक्रिया है जहाँ पौधों को फूल खिलाने के लिए ठंडे तापमान की ज़रूरत होती है. यह उन्हें सही समय पर फूलने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: बसन्तीकरण की परिभाषा, उसके महत्त्व और 'वर्नेलिन' व 'फ्लोरीजन' की अवधारणा को स्पष्ट करें. विबसन्तीकरण का भी उल्लेख करें.

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