RBSE Solutions Class 11 Physics Chapter 8 दोलन गति

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Detailed Chapter 8 दोलन गति RBSE Solutions for Class 11 Physics

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Class 11 Physics Chapter 8 दोलन गति RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Physics Chapter 8 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Physics Chapter 8 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. सरल आवर्त गति के लिये त्वरण तथा विस्थापन में क्या सम्बन्ध है?
Answer: सरल आवर्त गति में, त्वरण हमेशा विस्थापन के समानुपाती (proportional) होता है, लेकिन उसकी दिशा विस्थापन के विपरीत होती है. इसका मतलब है कि जब कोई चीज़ सरल आवर्त गति में हिलती है, तो उसे खींचने वाला बल या धक्का देने वाला बल हमेशा उसे अपनी शुरुआती जगह पर वापस लाने की कोशिश करता है.
In simple words: सरल आवर्त गति में, त्वरण और विस्थापन एक-दूसरे के उल्टे होते हैं; जब एक बढ़ता है, दूसरा घटता है और उनकी दिशाएँ विपरीत होती हैं।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति में त्वरण और विस्थापन के बीच विपरीत दिशा का संबंध हमेशा याद रखें, यह इस गति का मूल सिद्धांत है।

 

Question 2. सीमांत सिरे से सरल आवर्त गति प्रारम्भ करने वाले पिण्ड का प्रारम्भिक कला कोण कितना होता है?
Answer: यदि कोई वस्तु सरल आवर्त गति को सीमांत सिरे (यानी अधिकतम विस्थापन की स्थिति) से शुरू करती है, तो उसका प्रारंभिक कला कोण \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) होता है. यह तब होता है जब वस्तु अपनी यात्रा चरम बिंदु से शुरू करती है, न कि संतुलन स्थिति से.
In simple words: जब कोई चीज़ एकदम कोने से हिलना शुरू करती है, तो उसका शुरुआती कोण 90 डिग्री या \( \frac{\pi}{2} \) होता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि संतुलन (माध्य) स्थिति से शुरू होने पर कला कोण शून्य होता है, जबकि चरम (सीमांत) स्थिति से शुरू होने पर यह \( \frac{\pi}{2} \) होता है।

 

Question 3. विस्थापन का मान इसके त्वरण मान से कितने कला कोण से आगे होता है?
Answer: सरल आवर्त गति में, विस्थापन का मान उसके त्वरण के मान से \( \pi \) (180 डिग्री) कला कोण से आगे होता है. इसका मतलब है कि जब विस्थापन अधिकतम होता है, तो त्वरण विपरीत दिशा में अधिकतम होता है, और जब विस्थापन शून्य होता है, तो त्वरण भी शून्य होता है. वे हमेशा एक-दूसरे के विपरीत अवस्था में होते हैं.
In simple words: सरल आवर्त गति में, विस्थापन हमेशा त्वरण से 180 डिग्री आगे होता है, मतलब वे एक-दूसरे के ठीक उल्टे होते हैं।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति में विस्थापन और त्वरण के बीच \( \pi \) (180°) का कला अंतर एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जिसे याद रखना चाहिए।

 

Question 5. सरल लोलक की कुल ऊर्जा तथा दोलन आवृत्ति में क्या संबंध है?
Answer: सरल लोलक की कुल ऊर्जा (\( E \)) और दोलन आवृत्ति (\( n \)) के बीच का संबंध यह है: कुल ऊर्जा \( E = 2\pi^2 m n^2 A^2 \), जहाँ \( m \) लोलक का द्रव्यमान और \( A \) दोलन का आयाम (अधिकतम विस्थापन) है. इस सूत्र से पता चलता है कि कुल ऊर्जा दोलन आवृत्ति के वर्ग के सीधे समानुपाती होती है, यानी आवृत्ति बढ़ने पर कुल ऊर्जा तेजी से बढ़ती है.
In simple words: सरल लोलक की कुल ऊर्जा उसकी दोलन आवृत्ति के वर्ग पर निर्भर करती है, मतलब जितनी तेज दोलन, उतनी ज़्यादा ऊर्जा।

🎯 Exam Tip: कुल ऊर्जा के सूत्र में आवृत्ति को वर्ग के रूप में व्यक्त करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऊर्जा आवृत्ति के वर्ग के समानुपाती होती है।

 

Question 6. यदि 0.1 kg के पिण्ड का आयाम 3 cm तथा दोलन काल 2 s हो तो कुल यांत्रिक ऊर्जा का मान क्या होगा?
Answer:दिया गया है:
पिण्ड का द्रव्यमान \( m = 0.1 \, \text{kg} \)
आयाम \( A = 3 \, \text{cm} = 0.03 \, \text{m} \)
दोलन काल \( T = 2 \, \text{s} \)

कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) का सूत्र है:
\( \omega = \frac{2\pi}{T} = \frac{2\pi}{2} = \pi \, \text{rad/s} \)

कुल यांत्रिक ऊर्जा (\( E \)) का सूत्र है:
\( E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \)

मान रखने पर:
\( E = \frac{1}{2} \times 0.1 \, \text{kg} \times (\pi \, \text{rad/s})^2 \times (0.03 \, \text{m})^2 \)
\( E = \frac{1}{2} \times 0.1 \times (3.14)^2 \times (0.03)^2 \)
\( E = \frac{1}{2} \times 0.1 \times 9.8596 \times 0.0009 \)
\( E = 0.0000443682 \, \text{J} \)
\( E \approx 4.4 \times 10^{-5} \, \text{J} \) (स्रोत में \( 4.4 \times 10^{-4} \) दिया है, यह एक छोटी गणना त्रुटि हो सकती है।)
In simple words: द्रव्यमान, आयाम और दोलन काल का उपयोग करके, हमने पहले कोणीय आवृत्ति निकाली, फिर कुल यांत्रिक ऊर्जा का सूत्र लगाकर मान की गणना की।

🎯 Exam Tip: गणना करते समय, आयाम (और अन्य राशियाँ) को SI इकाइयों (मीटर, किलोग्राम, सेकंड) में बदलना न भूलें। पाई (\( \pi \)) का मान 3.14 या 22/7 लें।

 

Question 7. कठोर स्प्रिंग के स्थान पर उतनी ही लम्बाई की मुलायम स्प्रिंग का उपयोग करने पर दोलन काल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer: यदि कठोर स्प्रिंग की जगह उतनी ही लम्बाई की मुलायम स्प्रिंग का उपयोग किया जाए, तो दोलन काल बढ़ जाएगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुलायम स्प्रिंग का स्प्रिंग नियतांक (\( K \)) कठोर स्प्रिंग की तुलना में कम होता है. चूँकि दोलन काल स्प्रिंग नियतांक के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है (\( T \propto \frac{1}{\sqrt{K}} \)), इसलिए \( K \) कम होने पर \( T \) बढ़ जाता है.
In simple words: मुलायम स्प्रिंग लगाने से दोलन धीरे होंगे, क्योंकि वह कम कठोर होती है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि स्प्रिंग की कठोरता (स्प्रिंग नियतांक \( K \)) और दोलन काल (\( T \)) में विपरीत संबंध होता है, \( T \) स्प्रिंग के लचीलेपन के बढ़ने पर बढ़ता है।

 

Question 8. एक सरल लोलक के दोलन आयाम को उसके वर्तमान मान का आधा कर दिया जाये तो उसके आवर्तकाल का मान कितना होगा?
Answer: यदि एक सरल लोलक के दोलन आयाम को उसके वर्तमान मान का आधा कर दिया जाए, तो उसका आवर्तकाल अपरिवर्तित रहेगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सरल लोलक का आवर्तकाल (छोटे आयामों के लिए) आयाम पर निर्भर नहीं करता है. यह केवल लोलक की लम्बाई और गुरुत्वाकर्षण के त्वरण पर निर्भर करता है.
In simple words: सरल लोलक का झूलने का समय (आवर्तकाल) इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कितना दूर तक झूलता है, इसलिए आयाम आधा करने पर भी समय वही रहेगा।

🎯 Exam Tip: सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र (\( T = 2\pi\sqrt{\frac{L}{g}} \)) याद रखें, जिसमें आयाम नहीं आता है, जो यह दर्शाता है कि यह आयाम पर निर्भर नहीं करता (छोटे कोणों के लिए)।

 

Question 10. सरल आवर्त गति कर रहे कण का त्वरण \( a \) दिया गया है तथा इस कण का आवर्तकाल क्या होगा?
Answer:यदि सरल आवर्त गति कर रहे कण का त्वरण \( a \) दिया गया है, और यह \( a = -\omega^2 x \) के रूप में होता है (जहाँ \( x \) विस्थापन है), तो:
त्वरण की तुलना मानक समीकरण \( a = -\omega^2 x \) से करने पर,
\( \omega^2 = \frac{P}{q} \)

\( \implies \omega = \sqrt{\frac{P}{q}} \)

आवर्तकाल (\( T \)) का सूत्र है:
\( T = \frac{2\pi}{\omega} \)

\( \implies T = \frac{2\pi}{\sqrt{\frac{P}{q}}} \)

\( \implies T = 2\pi \sqrt{\frac{q}{P}} \)
In simple words: जब किसी हिलती हुई चीज़ का त्वरण दिया हो, तो हम उसकी कोणीय गति का पता लगाते हैं। फिर, आवर्तकाल निकालने के लिए \( 2\pi \) को कोणीय गति से भाग कर देते हैं।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति में, त्वरण को हमेशा \( -\omega^2 x \) के रूप में व्यक्त किया जाता है, जहाँ से कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) और फिर आवर्तकाल (\( T \)) निकाला जा सकता है।

 

Question 11. सरल लोलक की कुल ऊर्जा E है। जिस कण पर लोलक का विस्थापन आयाम का आधा होता है, उस क्षण लोलक की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा क्या होगी?
Answer:माना सरल लोलक की कुल ऊर्जा \( E \) है. आयाम \( A \) है.
जिस क्षण लोलक का विस्थापन आयाम का आधा होता है, तो \( y = \frac{A}{2} \).

स्थितिज ऊर्जा (PE) का सूत्र है:
\( PE = \frac{1}{2} m \omega^2 y^2 \)
\( \implies PE = \frac{1}{2} m \omega^2 \left(\frac{A}{2}\right)^2 \)
\( \implies PE = \frac{1}{2} m \omega^2 \frac{A^2}{4} \)
\( \implies PE = \frac{1}{4} \left( \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \right) \)
हम जानते हैं कि कुल ऊर्जा \( E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \).
\( \implies PE = \frac{1}{4} E \)

गतिज ऊर्जा (KE) का सूत्र है:
\( KE = \frac{1}{2} m \omega^2 (A^2 - y^2) \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m \omega^2 \left( A^2 - \left(\frac{A}{2}\right)^2 \right) \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m \omega^2 \left( A^2 - \frac{A^2}{4} \right) \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m \omega^2 \left( \frac{4A^2 - A^2}{4} \right) \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m \omega^2 \left( \frac{3A^2}{4} \right) \)
\( \implies KE = \frac{3}{4} \left( \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \right) \)
\( \implies KE = \frac{3}{4} E \)
अतः, जब विस्थापन आयाम का आधा होता है, तो स्थितिज ऊर्जा \( \frac{1}{4} E \) और गतिज ऊर्जा \( \frac{3}{4} E \) होती है.
In simple words: जब लोलक अपने आधे आयाम पर होता है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा कुल ऊर्जा का एक चौथाई होती है, जबकि गतिज ऊर्जा कुल ऊर्जा का तीन-चौथाई होती है।

🎯 Exam Tip: स्थितिज और गतिज ऊर्जा के सूत्रों को याद रखें और उन्हें आयाम के आधे मान पर लागू करते समय, \( y = \frac{A}{2} \) को सही ढंग से सूत्र में रखें।

 

Question 12. सरल लोलक में प्रत्यानयन बल का मान लिखिये जबकि विस्थापन कोण \( \theta \) कम हो।
Answer: सरल लोलक में, प्रत्यानयन बल वह बल होता है जो लोलक को उसकी संतुलन स्थिति में वापस लाने की कोशिश करता है. जब विस्थापन कोण \( \theta \) कम होता है, तो प्रत्यानयन बल का मान लगभग \( F = -mg\theta \) होता है, जहाँ \( m \) लोलक का द्रव्यमान, \( g \) गुरुत्वाकर्षण त्वरण है. अधिक सटीक रूप से, \( F = -mg \sin\theta \) होता है. छोटे कोणों के लिए, \( \sin\theta \approx \theta \) होता है, इसलिए \( F = -mg\theta \) का उपयोग किया जाता है. ऋण चिह्न (negative sign) दर्शाता है कि बल हमेशा संतुलन स्थिति की ओर लगता है.
In simple words: सरल लोलक को वापस संतुलन में लाने वाला बल, छोटे कोणों के लिए उसके द्रव्यमान, गुरुत्वाकर्षण और कोण के गुणनफल के बराबर होता है, जो उल्टी दिशा में लगता है।

🎯 Exam Tip: छोटे कोणों के लिए \( \sin\theta \approx \theta \) सन्निकटन का उपयोग करें और याद रखें कि प्रत्यानयन बल हमेशा संतुलन स्थिति की ओर निर्देशित होता है (इसलिए ऋण चिह्न)।

RBSE Class 11 Physics Chapter 8 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. वृत्तीय गति का प्रक्षेप सरल आवर्त गति होता है।
Answer:जब कोई कण एक वृत्त के परिधि पर एक समान चाल से घूमता है, तो वृत्त के व्यास पर उस कण के प्रक्षेप (छाया) की गति सरल आवर्त गति होती है. यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो आवर्त गति और सरल आवर्त गति के बीच संबंध को दर्शाती है. Y N O X' X P M A y θ ω
चित्र

इस चित्र में, कण P एक वृत्त पर घूम रहा है, और M उसका व्यास पर प्रक्षेप है. जैसे-जैसे P चलता है, M व्यास के साथ-साथ आगे-पीछे गति करता है. यह गति सरल आवर्त गति होती है.
In simple words: जब कोई चीज़ गोल-गोल घूमती है, तो उसकी सीधी परछाई (प्रक्षेप) सरल आवर्त गति करती है।

🎯 Exam Tip: वृत्तीय गति के प्रक्षेप को सरल आवर्त गति के उदाहरण के रूप में समझें और चित्र के माध्यम से इस संबंध को स्पष्ट करें।

 

Question 2. स. आ. गति के अभिलक्षण एवं समीकरण लिखिये।
Answer:सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion - SHM) एक विशेष प्रकार की दोलन गति है जहाँ एक कण एक निश्चित बिंदु के चारों ओर एक सीधी रेखा में गति करता है, और उस पर लगने वाला प्रत्यानयन बल हमेशा संतुलन स्थिति की ओर होता है और विस्थापन के सीधे समानुपाती होता है.

सरल आवर्त गति के अभिलक्षण:

  • गति हमेशा एक सीधी रेखा में एक निश्चित बिंदु (संतुलन स्थिति) के इर्द-गिर्द होती है.
  • गतिमान वस्तु के त्वरण की दिशा हमेशा संतुलन स्थिति की ओर होती है.
  • दोलन की प्रत्येक स्थिति में कण का त्वरण उसकी संतुलन स्थिति से वस्तु के विस्थापन के सीधे समानुपाती होता है.

सरल आवर्त गति का समीकरण:
सरल आवर्त गति का अवकल समीकरण है:
\( \frac{d^2 y}{d t^2} + \omega^2 y = 0 \)
इस समीकरण का हल (विस्थापन का समीकरण) निम्न प्रकार होता है:
\( y = A \sin(\omega t + \phi) \)
जहाँ:
\( y \) = किसी समय \( t \) पर कण का विस्थापन
\( A \) = दोलन का आयाम (अधिकतम विस्थापन)
\( \omega \) = कोणीय आवृत्ति
\( t \) = समय
\( \phi \) = प्रारंभिक कला कोण (कला नियतांक)

In simple words: सरल आवर्त गति में, चीज़ें एक सीधी लाइन में बीच की जगह के आस-पास हिलती हैं, और उन्हें वापस बीच में खींचने वाला बल उनकी दूरी के बराबर होता है. इसका समीकरण दिखाता है कि समय के साथ विस्थापन कैसे बदलता है।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति के तीन मुख्य अभिलक्षणों को याद रखें: सीधी रेखा में गति, संतुलन की ओर त्वरण, और त्वरण का विस्थापन के समानुपाती होना। अवकल समीकरण और उसके हल को भी याद रखें।

 

Question 3. स. आ. गति में एक समय चक्र अवधि हेतु विस्थापन, वेग एवं त्वरण को ग्राफीय निरूपण कीजिये।
Answer:सरल आवर्त गति में विस्थापन, वेग और त्वरण समय के साथ ज्यावक्रीय रूप से बदलते हैं. एक पूर्ण चक्र के लिए उनका ग्राफीय निरूपण इस प्रकार है:

विस्थापन-समय ग्राफ:
विस्थापन (\( y \)) का समीकरण \( y = A \sin(\omega t + \phi) \) है. यदि \( \phi = 0 \) है, तो ग्राफ मूल बिंदु से शुरू होने वाली एक ज्या (sine) तरंग के रूप में होता है. यह अधिकतम आयाम \( A \) तक जाता है, फिर शून्य पर आता है, फिर \( -A \) तक जाता है, और फिर वापस शून्य पर आता है.

वेग-समय ग्राफ:
वेग (\( v \)) विस्थापन के ग्राफ से \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) आगे होता है. इसका समीकरण \( v = A \omega \cos(\omega t + \phi) \) है. यदि \( \phi = 0 \) है, तो वेग-समय ग्राफ एक कोज्या (cosine) तरंग के रूप में होता है. जब विस्थापन शून्य होता है, वेग अधिकतम होता है, और जब विस्थापन अधिकतम होता है, वेग शून्य होता है.

त्वरण-समय ग्राफ:
त्वरण (\( a \)) वेग के ग्राफ से \( \frac{\pi}{2} \) (90 डिग्री) आगे और विस्थापन के ग्राफ से \( \pi \) (180 डिग्री) आगे होता है. इसका समीकरण \( a = -A \omega^2 \sin(\omega t + \phi) \) है. यदि \( \phi = 0 \) है, तो त्वरण-समय ग्राफ विस्थापन-समय ग्राफ का उलटा (ऋणात्मक ज्या तरंग) होता है. जब विस्थापन अधिकतम होता है, त्वरण विपरीत दिशा में अधिकतम होता है.

संक्षेप में:
- विस्थापन: समय के साथ ज्यावक्रीय रूप से बदलता है.
- वेग: विस्थापन से \( 90^\circ \) आगे होता है, कोज्यावक्रीय रूप से बदलता है.
- त्वरण: वेग से \( 90^\circ \) आगे (या विस्थापन से \( 180^\circ \) आगे) होता है, विस्थापन के विपरीत ज्यावक्रीय रूप से बदलता है.

समय (t) O वेग (v) Vmax वेग-समय त्वरण (a) +a त्वरण-समय

चित्र - विस्थापन, वेग एवं त्वरण का समय के साथ आलेख


In simple words: विस्थापन, वेग और त्वरण समय के साथ एक खास पैटर्न में बदलते हैं; विस्थापन ज्या तरंग जैसा दिखता है, वेग उससे थोड़ा आगे होता है, और त्वरण विस्थापन के ठीक उलटे पैटर्न में होता है।

🎯 Exam Tip: तीनों ग्राफों की सापेक्ष कला (phase) और उनके शून्य और अधिकतम मानों के बिंदुओं को सही ढंग से दर्शाना सुनिश्चित करें। याद रखें कि वेग विस्थापन से \( \frac{\pi}{2} \) और त्वरण विस्थापन से \( \pi \) आगे होता है।

 

Question 4. सिद्ध करें कि परवलयिक विभव कूप में कण स. आ. गति करता है।
Answer:हमें यह सिद्ध करना है कि जब एक कण परवलयिक विभव कूप में होता है, तो वह सरल आवर्त गति करता है.

परवलयिक विभव कूप के लिए स्थितिज ऊर्जा (\( U \)) का समीकरण है:
\( U = \frac{1}{2} k x^2 \)
जहाँ \( k \) एक धनात्मक नियतांक है और \( x \) संतुलन स्थिति से विस्थापन है. यह समीकरण एक परवलयिक ग्राफ बनाता है, जो कुएँ के आकार जैसा दिखता है.

किसी कण पर लगने वाला बल (\( F \)) स्थितिज ऊर्जा के ऋणात्मक ढाल से प्राप्त होता है:
\( F = -\frac{dU}{dx} \)
\( \implies F = -\frac{d}{dx} \left( \frac{1}{2} k x^2 \right) \)
\( \implies F = -\frac{1}{2} k (2x) \)
\( \implies F = -kx \)

यह बल (\( F = -kx \)) हुक के नियम के समान है, जो सरल आवर्त गति की एक शर्त है. यह दर्शाता है कि बल विस्थापन (\( x \)) के सीधे समानुपाती है और इसकी दिशा हमेशा संतुलन स्थिति (जहाँ \( x=0 \)) की ओर होती है (ऋणात्मक चिह्न के कारण).

चूँकि कण पर लगने वाला प्रत्यानयन बल विस्थापन के समानुपाती है और हमेशा संतुलन स्थिति की ओर निर्देशित होता है, इसलिए कण परवलयिक विभव कूप में सरल आवर्त गति करेगा.
In simple words: परवलयिक विभव कूप में, कण पर लगने वाला बल हमेशा उसे बीच की जगह पर वापस खींचता है और उसकी दूरी के बराबर होता है. इसलिए, कण सरल आवर्त गति करता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि बल और स्थितिज ऊर्जा के बीच का संबंध \( F = -\frac{dU}{dx} \) होता है, और सरल आवर्त गति के लिए \( F = -kx \) शर्त को सिद्ध करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. कमानी स्प्रिंग से लटके पिण्ड के दोलन में यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण को समझाइये।
Answer:कमानी स्प्रिंग से लटके पिण्ड के दोलन में यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण होता है, बशर्ते वायु प्रतिरोध या घर्षण जैसे कोई बाहरी अनावर्ती बल मौजूद न हों. यांत्रिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग होती है.

प्रक्रिया:
1. संतुलन स्थिति: जब पिण्ड स्प्रिंग से लटका होता है और स्थिर होता है, तो यह संतुलन स्थिति में होता है. इस समय, इसकी गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा दोनों स्थिर होती हैं (या हम संदर्भ बिंदु के आधार पर शून्य मान सकते हैं).
2. पिण्ड को नीचे खींचना (अधिकतम विस्थापन 'अ'): जब पिण्ड को नीचे खींचकर छोड़ दिया जाता है, तो स्प्रिंग खिंच जाती है. इस खिंचाव के कारण स्प्रिंग में स्थितिज ऊर्जा (\( \frac{1}{2}kx^2 \)) संचित हो जाती है, जहाँ \( x \) खिंचाव है. इस बिंदु पर, पिण्ड क्षण भर के लिए रुकता है, इसलिए इसकी गतिज ऊर्जा शून्य होती है. कुल यांत्रिक ऊर्जा पूरी तरह से स्थितिज ऊर्जा के रूप में होती है.
3. संतुलन स्थिति की ओर लौटना (चित्र 'ब'): जब पिण्ड को छोड़ा जाता है, तो स्प्रिंग पिण्ड को ऊपर की ओर खींचती है. जैसे ही पिण्ड संतुलन स्थिति की ओर बढ़ता है, स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा कम होती जाती है, और यह ऊर्जा पिण्ड की गतिज ऊर्जा (\( \frac{1}{2}mv^2 \)) में बदल जाती है. संतुलन स्थिति से गुजरते समय, पिण्ड का वेग अधिकतम होता है, इसलिए गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है और स्थितिज ऊर्जा (यदि संतुलन स्थिति को संदर्भ बिंदु माना जाए) शून्य होती है. इस बिंदु पर, कुल यांत्रिक ऊर्जा पूरी तरह से गतिज ऊर्जा के रूप में होती है.
4. पिण्ड का ऊपर उठना (अधिकतम विस्थापन 'स'): जड़त्व के कारण पिण्ड संतुलन स्थिति से ऊपर उठ जाता है, जिससे स्प्रिंग दबने लगती है. जैसे ही पिण्ड ऊपर जाता है, इसकी गतिज ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है (स्प्रिंग के दबने के कारण स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है). पिण्ड अपने उच्चतम बिंदु पर क्षण भर के लिए रुकता है, उसकी गतिज ऊर्जा फिर से शून्य हो जाती है, और कुल यांत्रिक ऊर्जा फिर से पूरी तरह से स्थितिज ऊर्जा के रूप में होती है.

इस पूरे दोलन चक्र के दौरान, स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा एक-दूसरे में बदलती रहती हैं, लेकिन उनका योग (कुल यांत्रिक ऊर्जा) हमेशा स्थिर रहता है. यही यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण सिद्धांत है.
In simple words: स्प्रिंग और पिण्ड के दोलन में, गतिज और स्थितिज ऊर्जा एक-दूसरे में बदलती रहती हैं, लेकिन कुल ऊर्जा हमेशा उतनी ही रहती है, बशर्ते कोई बाहर से ऊर्जा न ले या दे।

🎯 Exam Tip: यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण को समझाने के लिए संतुलन, अधिकतम विस्थापन (नीचे) और अधिकतम विस्थापन (ऊपर) इन तीनों स्थितियों पर ध्यान केंद्रित करें और प्रत्येक स्थिति में गतिज और स्थितिज ऊर्जा के परिवर्तन को स्पष्ट करें।

 

Question 6. सरल लोलक का आवर्तकाल सूत्र लिखिये। आवर्तकाल किन-किन कारकों से प्रभावित होता है?
Answer:सरल लोलक का आवर्तकाल (\( T \)) वह समय है जो लोलक को एक पूरा दोलन करने में लगता है. छोटे आयामों के लिए, इसका सूत्र है:
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{L}{g}} \)
जहाँ:
\( L \) = लोलक की प्रभावी लम्बाई (निलंबन बिंदु से गोलक के गुरुत्व केंद्र तक की दूरी)
\( g \) = गुरुत्वाकर्षण त्वरण

आवर्तकाल को प्रभावित करने वाले कारक:
1. प्रभावी लम्बाई (\( L \)): आवर्तकाल लोलक की प्रभावी लम्बाई के वर्गमूल के सीधे समानुपाती होता है (\( T \propto \sqrt{L} \)). इसका मतलब है कि लम्बाई बढ़ने पर आवर्तकाल बढ़ता है और लम्बाई घटने पर घटता है.
2. गुरुत्वाकर्षण त्वरण (\( g \)): आवर्तकाल गुरुत्वाकर्षण त्वरण के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है (\( T \propto \frac{1}{\sqrt{g}} \)). इसका मतलब है कि जहाँ गुरुत्वाकर्षण त्वरण कम होता है (जैसे पहाड़ों पर या खदानों में), वहाँ आवर्तकाल बढ़ जाता है, और लोलक घड़ी धीमी हो जाती है.
3. आयाम: छोटे आयामों के लिए, सरल लोलक का आवर्तकाल आयाम पर निर्भर नहीं करता है. हालाँकि, यदि आयाम बहुत बड़ा है, तो आवर्तकाल थोड़ा बढ़ जाता है.
4. गोलक का द्रव्यमान (\( m \)): आवर्तकाल गोलक के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है. इसका मतलब है कि यदि आप भारी या हल्के गोलक का उपयोग करते हैं, तो आवर्तकाल वही रहेगा (बशर्ते वायु प्रतिरोध नगण्य हो).
In simple words: सरल लोलक का झूलने का समय (आवर्तकाल) उसकी लम्बाई और गुरुत्वाकर्षण बल पर निर्भर करता है; लम्बाई बढ़ाने या गुरुत्वाकर्षण कम होने पर यह धीमा होता है, लेकिन कितना भारी है या कितना दूर तक झूलता है, इससे फर्क नहीं पड़ता (छोटे झूलों के लिए)।

🎯 Exam Tip: आवर्तकाल के सूत्र को याद रखें और प्रत्येक कारक (लम्बाई, \( g \), आयाम, द्रव्यमान) के प्रभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें, खासकर आयाम और द्रव्यमान की स्वतंत्रता पर जोर दें।

 

Question 7. छोटी-छोटी एक जैसी कई स्प्रिंगों को (i) श्रेणी क्रम तथा (ii) समान्तर क्रम में संयोजित करने पर स्प्रिंग नियतांक का मान किस प्रकार प्रभावित होता है?
Answer:जब कई छोटी-छोटी एक जैसी स्प्रिंगों को श्रेणी क्रम या समान्तर क्रम में जोड़ा जाता है, तो उनका प्रभावी स्प्रिंग नियतांक (\( k \)) बदल जाता है:

(i) श्रेणी क्रम संयोजन (Series Combination):
जब \( n \) एक जैसी स्प्रिंगों को श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है, तो संयोजन का प्रभावी स्प्रिंग नियतांक प्रत्येक स्प्रिंग के नियतांक (\( k' \)) का \( \frac{1}{n} \) गुना हो जाता है.
प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k = \frac{k'}{n} \)
यह संयोजन स्प्रिंग को "मुलायम" बनाता है, क्योंकि एक ही बल लगाने पर कुल खिंचाव बढ़ जाता है.

(ii) समान्तर क्रम संयोजन (Parallel Combination):
जब \( n \) एक जैसी स्प्रिंगों को समान्तर क्रम में जोड़ा जाता है, तो संयोजन का प्रभावी स्प्रिंग नियतांक प्रत्येक स्प्रिंग के नियतांक (\( k' \)) का \( n \) गुना हो जाता है.
प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k = nk' \)
यह संयोजन स्प्रिंग को "कठोर" बनाता है, क्योंकि एक ही बल लगाने पर कुल खिंचाव कम हो जाता है.

In simple words: एक जैसी स्प्रिंगों को एक लाइन में जोड़ने पर कुल स्प्रिंग कमजोर होती है, और उन्हें अगल-बगल जोड़ने पर कुल स्प्रिंग मजबूत होती है।

🎯 Exam Tip: श्रेणी क्रम में \( K_{eff} \) घटता है (\( \frac{K'}{n} \)) और समान्तर क्रम में \( K_{eff} \) बढ़ता है (\( nK' \)). यह प्रतिरोधों के विपरीत होता है, इसलिए याद रखने में सावधानी बरतें।

 

Question 8. औसत गतिज या स्थितिज ऊर्जा प्रति दोलन का ग्राफीय निरूपण कीजिये।
Answer:सरल आवर्त गति में, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन एक पूर्ण दोलन चक्र में उनका औसत मान स्थिर रहता है.

गतिज ऊर्जा (\( KE \)) बनाम विस्थापन (\( y \)) का ग्राफ:
गतिज ऊर्जा का सूत्र \( KE = \frac{1}{2} m \omega^2 (A^2 - y^2) \) है. यह एक उल्टा परवलय (parabola) बनाता है. संतुलन स्थिति (\( y=0 \)) पर गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है (\( \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \)), और अधिकतम विस्थापन (\( y=\pm A \)) पर यह शून्य हो जाती है.

O -A +A विस्थापन गतिज ऊर्जा 1/2mw²A²

गतिज ऊर्जा बनाम विस्थापन ग्राफ


स्थितिज ऊर्जा (\( PE \)) बनाम विस्थापन (\( y \)) का ग्राफ:
स्थितिज ऊर्जा का सूत्र \( PE = \frac{1}{2} k y^2 \) (या \( \frac{1}{2} m \omega^2 y^2 \)) है. यह एक परवलय (parabola) बनाता है. संतुलन स्थिति (\( y=0 \)) पर स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है, और अधिकतम विस्थापन (\( y=\pm A \)) पर यह अधिकतम होती है (\( \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \)).

O -A +A विस्थापन स्थितिज ऊर्जा 1/2mw²A²

स्थितिज ऊर्जा बनाम विस्थापन ग्राफ


औसत ऊर्जा प्रति दोलन:
एक पूर्ण दोलन चक्र में, औसत गतिज ऊर्जा और औसत स्थितिज ऊर्जा दोनों \( \frac{1}{4} m \omega^2 A^2 \) के बराबर होती हैं. कुल यांत्रिक ऊर्जा (\( E \)) हमेशा \( \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \) के बराबर और स्थिर रहती है.
In simple words: दोलन करते समय, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा बदलती हैं. गतिज ऊर्जा बीच में सबसे ज्यादा और किनारों पर कम होती है, जबकि स्थितिज ऊर्जा किनारों पर सबसे ज्यादा और बीच में कम होती है. इनका औसत हर बार एक जैसा रहता है।

🎯 Exam Tip: ग्राफ में, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के वक्र एक-दूसरे के पूरक होते हैं, यानी जहाँ एक अधिकतम होता है, दूसरा न्यूनतम होता है, जिससे कुल ऊर्जा हमेशा स्थिर रहती है।

 

Question 9. सरल लोलक बनाने के लिए गोलक को गोलाकार ही क्यों लिया जाता है?
Answer:सरल लोलक बनाने के लिए गोलक को गोलाकार लेने के मुख्य दो कारण हैं:
1. गुरुत्व केंद्र की शुद्धता: गोलाकार वस्तु का गुरुत्व केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर स्थित होता है. इससे लोलक की प्रभावी लम्बाई (\( L \)) को बहुत सटीकता से निर्धारित किया जा सकता है. यदि गोलक अनियमित आकार का होता, तो गुरुत्व केंद्र का पता लगाना मुश्किल होता, जिससे लम्बाई में अनिश्चितता आती और आवर्तकाल की गणना कम सटीक होती.
2. वायु प्रतिरोध कम करना: किसी दिए गए आयतन के लिए, गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल सबसे कम होता है. कम पृष्ठीय क्षेत्रफल का मतलब है कि वायु का प्रतिरोध (drag force) न्यूनतम होगा. इससे लोलक कम ऊर्जा हानि के साथ अधिक समय तक दोलन कर सकेगा, जिससे उसके दोलन अधिक आदर्श सरल आवर्त गति के करीब होंगे.
In simple words: लोलक का गोलक गोलाकार इसलिए होता है ताकि उसका बीच का बिंदु आसानी से मिल जाए और हवा उसे कम रोके, जिससे वह सही से झूल सके।

🎯 Exam Tip: गुरुत्व केंद्र की सटीकता और न्यूनतम वायु प्रतिरोध दोनों ही कारणों को स्पष्ट करें, क्योंकि ये सरल लोलक के आदर्श व्यवहार के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 

Question 10. पुल पार करते समय कदम मिलाकर चलते सैनिकों से कदम तोड़कर चलने (सामान्य व्यक्ति की तरह चलने) को क्यों कहा जाता है?
Answer:पुल पार करते समय सैनिकों से कदम तोड़कर चलने या 'एटेंशन' में न चलने को कहा जाता है ताकि अनुनाद (Resonance) की घटना से बचा जा सके, जो पुल को नुकसान पहुँचा सकती है. इसके पीछे का कारण यह है:
1. प्राकृतिक आवृत्ति: हर पुल की अपनी एक प्राकृतिक दोलन आवृत्ति होती है, जिस पर वह आसानी से दोलन कर सकता है.
2. सैनिकों के कदम: जब सैनिक एक साथ कदम मिलाकर चलते हैं, तो उनके कदमों से उत्पन्न झटकों की एक नियमित आवृत्ति होती है.
3. अनुनाद का खतरा: यदि सैनिकों के कदमों से उत्पन्न झटकों की आवृत्ति पुल की प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर या उसके गुणज (multiple) हो जाती है, तो अनुनाद की घटना घटित हो सकती है. अनुनाद की स्थिति में, पुल बहुत बड़े आयामों के साथ दोलन करना शुरू कर देता है, भले ही बल छोटा हो. यह बड़े दोलन पुल की संरचना पर अत्यधिक तनाव डाल सकते हैं और उसे टूट सकते हैं. इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ अनुनाद के कारण पुल गिरे हैं.
इसलिए, कदम तोड़कर चलने से यह सुनिश्चित होता है कि सैनिकों के कदमों से उत्पन्न बल अनियमित हो जाते हैं और पुल की प्राकृतिक आवृत्ति से मेल नहीं खाते, जिससे अनुनाद का खतरा टल जाता है.
In simple words: सैनिक पुल पर कदम मिलाकर नहीं चलते ताकि उनके कदमों की धड़कन पुल के हिलने की प्राकृतिक दर से न मिल जाए, जिससे पुल बहुत ज़्यादा हिलकर टूट सकता है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की अवधारणा को स्पष्ट करें और बताएं कि कैसे बाहरी बल की आवृत्ति वस्तु की प्राकृतिक आवृत्ति से मेल खाने पर आयाम बढ़ जाता है, जिससे पुलों को नुकसान हो सकता है।

 

Question 11. अवमंदित दोलन से आप क्या समझते हैं?
Answer:अवमंदित दोलन (Damped Oscillations) वे दोलन होते हैं जिनमें बाहरी प्रतिरोधी बलों (जैसे वायु प्रतिरोध, घर्षण या श्यानता) की उपस्थिति के कारण दोलनों का आयाम (अधिकतम विस्थापन) समय के साथ धीरे-धीरे कम होता जाता है. अंततः, दोलन रुक जाते हैं और वस्तु अपनी संतुलन स्थिति पर स्थिर हो जाती है.

O A चित्र - अवमंदित दोलन

कारण:ये प्रतिरोधी बल (अवमंदन बल) हमेशा गति की विपरीत दिशा में कार्य करते हैं, जिससे यांत्रिक ऊर्जा धीरे-धीरे ऊष्मा में बदल जाती है. ऊर्जा की यह हानि दोलनों के आयाम को लगातार कम करती रहती है. उदाहरण के लिए, वायु में झूलता हुआ पेंडुलम धीरे-धीरे रुक जाता है.
In simple words: अवमंदित दोलन मतलब जब कोई चीज़ हवा या घर्षण के कारण धीरे-धीरे झूलना कम कर देती है और अंत में रुक जाती है।

🎯 Exam Tip: अवमंदित दोलन की परिभाषा में प्रतिरोधी बलों (जैसे वायु प्रतिरोध) और उनके कारण ऊर्जा हानि तथा आयाम में कमी पर जोर दें।

RBSE Class 11 Physics Chapter 8 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. आवर्त गति तथा सरल आवर्त गति में अन्तर स्पष्ट कीजिये। सरल आवर्त गति के अभिलक्षण बताइये। उदाहरण सहित अवकल समीकरण भी लिखिये।
Answer:आवर्त गति (Periodic Motion) और सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion) में अंतर:
1. आवर्त गति: यह वह गति है जो निश्चित समय के बाद खुद को दोहराती है. उदाहरण के लिए, पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना, घड़ी की सुइयों का घूमना, या एक वृत्त में समान चाल से चलना. आवर्त गति हमेशा सीधी रेखा में नहीं होती, यह वृत्तीय या कोई भी दोहराव वाली गति हो सकती है.
2. सरल आवर्त गति: यह एक विशेष प्रकार की आवर्त गति है. इसमें कण एक सीधी रेखा में एक निश्चित बिंदु (संतुलन स्थिति) के इर्द-गिर्द गति करता है. इस गति में, कण पर लगने वाला प्रत्यानयन बल हमेशा संतुलन स्थिति की ओर होता है और विस्थापन के सीधे समानुपाती होता है. यह आवर्त गति का सबसे सरल रूप है. उदाहरण के लिए, सरल लोलक का छोटा दोलन, स्प्रिंग से जुड़े द्रव्यमान का दोलन.

संक्षेप में, सभी सरल आवर्त गतियाँ आवर्त गतियाँ होती हैं, लेकिन सभी आवर्त गतियाँ सरल आवर्त गतियाँ नहीं होतीं. सरल आवर्त गति में प्रत्यानयन बल की शर्त का पालन होना आवश्यक है.

सरल आवर्त गति के अभिलक्षण:

  • सीधी रेखा में गति: कण एक निश्चित संतुलन बिंदु के चारों ओर एक सीधी रेखा में गति करता है.
  • त्वरण का संतुलन की ओर: कण का त्वरण हमेशा संतुलन स्थिति की ओर निर्देशित होता है.
  • त्वरण का विस्थापन के समानुपाती: त्वरण का परिमाण संतुलन स्थिति से विस्थापन के सीधे समानुपाती होता है. \( a \propto -x \).
  • काल-समकालिक (Isochronous): छोटे आयामों के लिए, आवर्तकाल आयाम पर निर्भर नहीं करता है.

सरल आवर्त गति का अवकल समीकरण:
एक \( m \) द्रव्यमान के कण पर \( F \) बल लगाने पर उत्पन्न त्वरण \( a = \frac{F}{m} \) होता है. सरल आवर्त गति में प्रत्यानयन बल \( F = -kx \) होता है, जहाँ \( k \) स्प्रिंग नियतांक (या बल नियतांक) है और \( x \) विस्थापन है.
अतः, \( m a = -kx \)
\( \implies m \frac{d^2 x}{d t^2} = -kx \)
\( \implies \frac{d^2 x}{d t^2} + \frac{k}{m} x = 0 \)
\( \implies \frac{d^2 x}{d t^2} + \omega^2 x = 0 \)
जहाँ \( \omega^2 = \frac{k}{m} \) कोणीय आवृत्ति का वर्ग है. यह सरल आवर्त गति का अवकल समीकरण है.

इस समीकरण का हल \( x = A \sin(\omega t + \phi) \) है, जहाँ \( A \) आयाम और \( \phi \) प्रारंभिक कला है.

O Y' Y X X' M A P y N θ ω Y' Y T/4 T/2 3T/4 T

चित्र - वृत्त की परिधि पर होने वाली गति का वृत्त के व्यास पर प्रक्षेप को सरल आवर्त गति दर्शाना


In simple words: आवर्त गति वो है जो बार-बार दोहराई जाती है, जबकि सरल आवर्त गति एक सीधी लाइन में खास तरीके से दोहराई जाने वाली आवर्त गति है जहाँ बल दूरी के बराबर होता है और बीच की ओर लगता है. सरल आवर्त गति में, चीज़ें एक सीधी रेखा में हिलती हैं, उनका खिंचाव बीच की ओर होता है और दूरी के हिसाब से बदलता है, और इसका समीकरण \( \frac{d^2 x}{d t^2} + \omega^2 x = 0 \) है।

🎯 Exam Tip: आवर्त और सरल आवर्त गति के बीच मुख्य अंतर प्रत्यानयन बल की शर्त है. सरल आवर्त गति के अभिलक्षणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, और इसका अवकल समीकरण तथा उसका हल भी याद रखें।

 

Question 2. सिद्ध करें कि नियत कोणीय चाल \( \omega_0 \) से \( a \) त्रिज्यावाले वृतीय पथ में परिक्रमण करने वाले कण का लम्ब पाद बिन्दु, सरल आवर्त गति करता है। इस गति की समीकरण भी लिखिये।
Answer:हमें यह सिद्ध करना है कि एकसमान वृत्तीय गति (UCM) करने वाले कण का व्यास पर प्रक्षेप सरल आवर्त गति (SHM) करता है.

प्रमेय का कथन:जब कोई कण एक स्थिर कोणीय चाल \( \omega \) से \( A \) त्रिज्या के एक वृत्त पर गति करता है, तो वृत्त के किसी भी व्यास पर उसके प्रक्षेप की गति सरल आवर्त गति होती है.

O Y' Y X X' M A P y N θ ω Y' Y T/4 T/2 3T/4 T

चित्र - वृत्त की परिधि पर होने वाली गति का वृत्त के व्यास पर प्रक्षेप को सरल आवर्त गति दर्शाना


प्रूफ:
माना एक कण \( P \) चित्र में दिखाए अनुसार \( O \) केंद्र और \( A \) त्रिज्या के वृत्त पर नियत कोणीय चाल \( \omega \) से घूम रहा है. किसी समय \( t \) पर, कण \( P \) पर है, जो \( X \)-अक्ष से \( \theta \) कोण बनाता है. यहाँ \( \theta = \omega t \).
कण \( P \) का \( Y \)-अक्ष पर प्रक्षेप बिंदु \( M \) है. \( M \) का विस्थापन संतुलन स्थिति \( O \) से \( y \) है. त्रिभुज \( OMP \) से,
\( y = A \sin \theta \)
\( \implies y = A \sin(\omega t) \)

यह विस्थापन का समीकरण है. अब हम वेग और त्वरण निकालेंगे:
वेग (\( v \)) = \( \frac{dy}{dt} = \frac{d}{dt} (A \sin(\omega t)) = A \omega \cos(\omega t) \)

त्वरण (\( a \)) = \( \frac{dv}{dt} = \frac{d}{dt} (A \omega \cos(\omega t)) = -A \omega^2 \sin(\omega t) \)
\( \implies a = -\omega^2 (A \sin(\omega t)) \)
\( \implies a = -\omega^2 y \)

यह समीकरण (\( a = -\omega^2 y \)) दर्शाता है कि कण का त्वरण विस्थापन \( y \) के सीधे समानुपाती है और हमेशा संतुलन स्थिति की ओर निर्देशित होता है (ऋणात्मक चिह्न के कारण). ये सरल आवर्त गति के अभिलक्षण हैं.
अतः, एकसमान वृत्तीय गति करने वाले कण का व्यास पर प्रक्षेप सरल आवर्त गति करता है.

इस गति का समीकरण:
विस्थापन समीकरण: \( y = A \sin(\omega t + \phi) \)
या, अगर कण \( t=0 \) पर \( X \)-अक्ष से गति शुरू करता है, तो \( \phi = 0 \), जिससे \( y = A \sin(\omega t) \)
यदि कण \( t=0 \) पर \( Y \)-अक्ष से गति शुरू करता है, तो \( \phi = \frac{\pi}{2} \), जिससे \( y = A \cos(\omega t) \)
In simple words: जब कोई चीज़ एक गोले में एक जैसी चाल से घूमती है, तो उसकी सीधी परछाई (या प्रक्षेप) ऊपर-नीचे या अगल-बगल सरल आवर्त गति करती है. इस गति का समीकरण \( y = A \sin(\omega t + \phi) \) है।

🎯 Exam Tip: इस प्रूफ में विस्थापन \( y = A \sin(\omega t) \) या \( y = A \cos(\omega t) \) से शुरू करें, और फिर त्वरण \( a = -\omega^2 y \) को प्राप्त करने के लिए दो बार अवकलन करें, जिससे सरल आवर्त गति की शर्त पूरी होती है।

 

Question 3. सरल आवर्त गति में कण की स्थितिज ऊर्जा, गतिज ऊर्जा एवं कुल ऊर्जा के व्यंजक प्राप्त कर यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण की पुष्टि कीजिये।
Answer:सरल आवर्त गति (SHM) में, एक कण की यांत्रिक ऊर्जा (गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग) संरक्षित रहती है, यदि कोई बाहरी अनावर्ती बल (जैसे घर्षण) कार्य न कर रहा हो.

1. गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy - KE):
एक कण जो सरल आवर्त गति कर रहा है, उसका विस्थापन \( y = A \sin(\omega t + \phi) \) होता है.
वेग (\( v \)) = \( \frac{dy}{dt} = A \omega \cos(\omega t + \phi) \)
गतिज ऊर्जा का सूत्र है:
\( KE = \frac{1}{2} m v^2 \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m (A \omega \cos(\omega t + \phi))^2 \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m A^2 \omega^2 \cos^2(\omega t + \phi) \)
हम \( \cos^2 \theta = 1 - \sin^2 \theta \) का उपयोग करके इसे विस्थापन के रूप में भी लिख सकते हैं:
\( y = A \sin(\omega t + \phi) \implies \sin(\omega t + \phi) = \frac{y}{A} \)
\( \cos^2(\omega t + \phi) = 1 - \left(\frac{y}{A}\right)^2 = \frac{A^2 - y^2}{A^2} \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m A^2 \omega^2 \left( \frac{A^2 - y^2}{A^2} \right) \)
\( \implies KE = \frac{1}{2} m \omega^2 (A^2 - y^2) \)
गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है जब \( y=0 \) (संतुलन स्थिति) पर: \( KE_{max} = \frac{1}{2} m A^2 \omega^2 \).
गतिज ऊर्जा न्यूनतम (शून्य) होती है जब \( y=\pm A \) (अधिकतम विस्थापन) पर.

2. स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy - PE):
सरल आवर्त गति में, प्रत्यानयन बल \( F = -kx \) होता है, जहाँ \( k = m\omega^2 \) है. इसलिए \( F = -m\omega^2 y \).
कण को \( y \) दूरी से विस्थापित करने में किया गया कार्य ही स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है.

\( dW = -F dy = -(-m\omega^2 y) dy = m\omega^2 y dy \)
कुल कार्य \( W \) (और स्थितिज ऊर्जा \( U \)) कण को \( 0 \) से \( y \) तक विस्थापित करने में:
\( U = \int_0^y m\omega^2 y dy = m\omega^2 \left[ \frac{y^2}{2} \right]_0^y = \frac{1}{2} m\omega^2 y^2 \)
स्थितिज ऊर्जा अधिकतम होती है जब \( y=\pm A \) (अधिकतम विस्थापन) पर: \( U_{max} = \frac{1}{2} m A^2 \omega^2 \).
स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम (शून्य) होती है जब \( y=0 \) (संतुलन स्थिति) पर.

3. कुल ऊर्जा (Total Energy - E):
कुल यांत्रिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग है:
\( E = KE + U \)
\( \implies E = \frac{1}{2} m \omega^2 (A^2 - y^2) + \frac{1}{2} m \omega^2 y^2 \)
\( \implies E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 - \frac{1}{2} m \omega^2 y^2 + \frac{1}{2} m \omega^2 y^2 \)
\( \implies E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \)
जैसा कि समीकरण से स्पष्ट है, कुल ऊर्जा \( E \) विस्थापन \( y \) या समय \( t \) पर निर्भर नहीं करती है. यह एक स्थिर मान है.

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण की पुष्टि:
उपरोक्त व्यंजकों से यह स्पष्ट होता है कि सरल आवर्त गति में, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा लगातार एक-दूसरे में बदलती रहती हैं. जब एक बढ़ती है, तो दूसरी घटती है, लेकिन उनका योग (\( E \)) हमेशा स्थिर रहता है. यह यांत्रिक ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धांत की पुष्टि करता है.
In simple words: सरल आवर्त गति में, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा एक-दूसरे में बदलती रहती हैं, लेकिन उनका कुल योग हमेशा एक जैसा रहता है. यह दिखाता है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती, बस रूप बदलती है।

🎯 Exam Tip: गतिज और स्थितिज ऊर्जा के लिए अलग-अलग व्यंजक प्राप्त करें और फिर दिखाएं कि उनका योग एक स्थिर मान देता है, जो आयाम और कोणीय आवृत्ति पर निर्भर करता है, लेकिन समय या विस्थापन पर नहीं।

 

Question 8. औसत गतिज या स्थितिज ऊर्जा प्रति दोलन का ग्राफीय निरूपण कीजिये।
Answer:

गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)

सरल आवर्त गति करने वाले पिण्ड की गतिज ऊर्जा उसकी गति के कारण होती है। एक सरल आवर्त गति कर रहे पिण्ड के लिए:

  • तात्क्षणिक विस्थापन \( y = A \sin \omega t \)
  • तात्क्षणिक वेग \( v = A\omega \cos \omega t \)

यहाँ \( A \) पिण्ड की गति का सबसे बड़ा विस्थापन (आयाम) है और \( \omega \) उसकी कोणीय आवृत्ति है। पिण्ड की तात्क्षणिक गतिज ऊर्जा इस प्रकार दी जाती है:

\( KE = \frac{1}{2}mv^2 \)
\( \implies KE = \frac{1}{2}m(A\omega \cos \omega t)^2 \)
\( \implies KE = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \cos^2 \omega t \)

यह समीकरण गतिज ऊर्जा (KE) को समय के साथ दिखाता है। गतिज ऊर्जा विस्थापन के रूप में भी व्यक्त की जा सकती है। हम जानते हैं \( v = \omega\sqrt{A^2 – y^2} \).
मान रखने पर:
\( KE = \frac{1}{2}m\omega^2(A^2 – y^2) \)

यह समीकरण गतिज ऊर्जा (KE) को विस्थापन \( y \) के रूप में दिखाता है।
साम्य स्थिति पर (जब \( y = 0 \)), गतिज ऊर्जा सबसे अधिक होती है: \( KE_{max} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \).
अधिकतम विस्थापन पर (जब \( y = \pm A \)), गतिज ऊर्जा शून्य होती है: \( KE_{min} = 0 \).

औसत गतिज ऊर्जा (Average Kinetic Energy)

एक पूरे चक्कर में औसत गतिज ऊर्जा निकालने के लिए, हम कुल ऊर्जा को कुल समय से भाग देते हैं:

\( \overline{KE} = \frac{\text{एक पूरे चक्कर में गतिज ऊर्जा}}{\text{एक पूरे चक्कर में लगा समय}} \)
\( \implies \overline{KE} = \frac{1}{T} \int_{0}^{T} KE \ dt \)
\( \implies \overline{KE} = \frac{1}{T} \int_{0}^{T} \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \cos^2 \omega t \ dt \)
\( \implies \overline{KE} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \frac{1}{T} \int_{0}^{T} \cos^2 \omega t \ dt \)

हम जानते हैं कि \( \int_{0}^{T} \cos^2 \omega t \ dt = \frac{T}{2} \).
इसलिए,
\( \overline{KE} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \times \frac{T}{2} \)
\( \implies \overline{KE} = \frac{1}{4}m\omega^2 A^2 \)

स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)

सरल आवर्त गति करने वाले दोलक की स्थितिज ऊर्जा उसके विस्थापन के कारण होती है। प्रत्यानयन बल \( F = -m\omega^2 y \) होता है। पिण्ड को \( y \) दूरी से विस्थापित करने में किया गया कुल कार्य स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है।

\( dW = -Fdy \)
\( \implies dW = -(-m\omega^2 y)dy \)
\( \implies dW = m\omega^2 ydy \)
कुल कार्य \( W = \int_{0}^{y} m\omega^2 ydy = \frac{1}{2}m\omega^2 y^2 \)

यही कार्य स्थितिज ऊर्जा \( U \) के रूप में संचित होता है:
\( U = \frac{1}{2}m\omega^2 y^2 \)

साम्य स्थिति पर (जब \( y = 0 \)), स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है: \( U_{min} = 0 \).
अधिकतम विस्थापन पर (जब \( y = \pm A \)), स्थितिज ऊर्जा सबसे अधिक होती है: \( U_{max} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \).

स्थितिज ऊर्जा को समय के रूप में व्यक्त करने के लिए \( y = A \sin \omega t \) का मान रखने पर:
\( U = \frac{1}{2}m\omega^2 (A \sin \omega t)^2 \)
\( \implies U = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \sin^2 \omega t \)

औसत स्थितिज ऊर्जा (Average Potential Energy)

एक पूरे चक्कर में औसत स्थितिज ऊर्जा:

\( \overline{U} = \frac{\text{एक पूरे चक्कर में स्थितिज ऊर्जा}}{\text{एक पूरे चक्कर में लगा समय}} \)
\( \implies \overline{U} = \frac{1}{T} \int_{0}^{T} U \ dt \)
\( \implies \overline{U} = \frac{1}{T} \int_{0}^{T} \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \sin^2 \omega t \ dt \)
\( \implies \overline{U} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \frac{1}{T} \int_{0}^{T} \sin^2 \omega t \ dt \)

हम जानते हैं कि \( \int_{0}^{T} \sin^2 \omega t \ dt = \frac{T}{2} \).
इसलिए,
\( \overline{U} = \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \times \frac{T}{2} \)
\( \implies \overline{U} = \frac{1}{4}m\omega^2 A^2 \)

ग्राफ (Graphical Representation)

गतिज ऊर्जा और विस्थापन के बीच ग्राफ: यह एक परवलय के रूप में होता है, जो \( y=0 \) (साम्य स्थिति) पर अधिकतम मान (\( \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \)) और \( y=\pm A \) (अधिकतम विस्थापन) पर शून्य मान दिखाता है। यह ग्राफ उल्टा U-आकार का होता है।

स्थितिज ऊर्जा और विस्थापन के बीच ग्राफ: यह भी एक परवलय के रूप में होता है, जो \( y=0 \) (साम्य स्थिति) पर शून्य मान और \( y=\pm A \) (अधिकतम विस्थापन) पर अधिकतम मान (\( \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \)) दिखाता है। यह ग्राफ सीधा U-आकार का होता है।

कुल ऊर्जा और विस्थापन के बीच ग्राफ: कुल ऊर्जा (\( E = KE + U \)) हमेशा स्थिर रहती है और \( \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \) के बराबर होती है, इसलिए यह विस्थापन के साथ एक सीधी क्षैतिज रेखा होती है।

गतिज ऊर्जा और समय के बीच ग्राफ: गतिज ऊर्जा समय के साथ \( \cos^2 \omega t \) के रूप में बदलती है। यह \( t=0, T/2, T \) पर अधिकतम और \( t=T/4, 3T/4 \) पर शून्य होती है। इसका ग्राफ हमेशा धनात्मक रहता है क्योंकि \( KE \) कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती।

स्थितिज ऊर्जा और समय के बीच ग्राफ: स्थितिज ऊर्जा समय के साथ \( \sin^2 \omega t \) के रूप में बदलती है। यह \( t=0, T/2, T \) पर शून्य और \( t=T/4, 3T/4 \) पर अधिकतम होती है। इसका ग्राफ भी हमेशा धनात्मक रहता है।

In simple words: गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा एक दोलन के दौरान बदलती रहती हैं। गतिज ऊर्जा तब सबसे ज़्यादा होती है जब चीज़ सबसे तेज़ चलती है (बीच की जगह पर), और स्थितिज ऊर्जा तब सबसे ज़्यादा होती है जब चीज़ रुकी होती है (किनारों पर). इन दोनों का औसत मान पूरे दोलन के लिए \( \frac{1}{4}m\omega^2 A^2 \) होता है.

🎯 Exam Tip: औसत गतिज और स्थितिज ऊर्जा के सूत्र याद रखें, ये दोनों \( \frac{1}{4}m\omega^2 A^2 \) के बराबर होते हैं, जबकि कुल यांत्रिक ऊर्जा \( \frac{1}{2}m\omega^2 A^2 \) होती है, जो इन दोनों के योग के बराबर है.

 

Question 6. सरल लोलक क्या है? अल्प विस्थापन के लिये इसकी गति की विवेचना कीजिये। आवर्तकाल के सूत्र का निगमन कीजिये, यह किन-किन राशियों पर निर्भर करता है?
Answer:

सरल लोलक (Simple Pendulum)

एक सरल लोलक एक व्यवस्था है जिसमें एक भारी कण (गोलक) को एक हल्के, न बढ़ने वाले धागे से लटकाया जाता है, और धागे का दूसरा सिरा एक मजबूत आधार से जुड़ा होता है। यह एक आदर्श सरल लोलक कहलाता है, जिसका व्यवहार में मिलना मुश्किल है। एक आदर्श सरल लोलक में ये गुण होते हैं:

  • यह घर्षण रहित होता है, यानी इसके अंदरूनी और बाहरी सभी हिस्सों में कोई घर्षण नहीं होता।

गति की विवेचना (Discussion of Motion)

जब लोलक के गोलक को उसकी साम्यावस्था से थोड़ा विस्थापित करके छोड़ा जाता है, तो उस पर दो बल लगते हैं:

  • गोलक का भार (mg): यह पृथ्वी के केंद्र की ओर नीचे की ओर लगता है।
  • धागे में तनाव (T): यह धागे की दिशा में ऊपर की ओर लगता है।

गोलक के भार \( mg \) को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है: एक हिस्सा \( mg \cos \theta \) जो धागे में तनाव को संतुलित करता है, और दूसरा हिस्सा \( mg \sin \theta \) जो धागे के लंबवत होता है। यह \( mg \sin \theta \) वाला हिस्सा ही गोलक को वापस उसकी साम्यावस्था की ओर लाने की कोशिश करता है, जिसे प्रत्यानयन बल (restoring force) कहते हैं।

प्रत्यानयन बल \( F = -mg \sin \theta \). (ऋणात्मक चिह्न दिखाता है कि बल विस्थापन के विपरीत दिशा में है।)

यदि कोणीय विस्थापन \( \theta \) बहुत छोटा है, तो \( \sin \theta \) लगभग \( \theta \) के बराबर होता है। साथ ही, \( \theta = x/l \), जहाँ \( x \) विस्थापन है और \( l \) धागे की प्रभावी लम्बाई है।
तो, \( F = -mg(x/l) \).

न्यूटन के दूसरे नियम से \( F = ma \), जहाँ \( a \) त्वरण है।
\( ma = -mg(x/l) \)
\( \implies a = -\frac{g}{l}x \)

चूँकि त्वरण \( a \) विस्थापन \( x \) के समानुपाती है और उसकी दिशा विस्थापन के विपरीत है, इसलिए यह गति सरल आवर्त गति है। सरल आवर्त गति में, \( a = -\omega^2 x \).
तुलना करने पर, \( \omega^2 = \frac{g}{l} \)
या \( \omega = \sqrt{\frac{g}{l}} \).

आवर्तकाल का सूत्र (Formula for Time Period)

आवर्तकाल \( T \) और कोणीय आवृत्ति \( \omega \) के बीच संबंध \( T = \frac{2\pi}{\omega} \) होता है।
\( \implies T = \frac{2\pi}{\sqrt{g/l}} \)
\( \implies T = 2\pi\sqrt{\frac{l}{g}} \).

यह सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र है।

निर्भरता (Dependence on Factors)

आवर्तकाल \( T \) निम्न राशियों पर निर्भर करता है:

  1. गोलक के द्रव्यमान पर: आवर्तकाल द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। यदि झूले पर झूल रही एक लड़की के साथ कोई दूसरी लड़की भी बैठ जाए, तो झूले के आवर्तकाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
  2. आयाम पर: आवर्तकाल आयाम पर निर्भर नहीं करता है, लेकिन यह केवल छोटे कोणीय विस्थापन के लिए सही है।
  3. प्रभावी लम्बाई (\( l \)) पर: आवर्तकाल धागे की प्रभावी लम्बाई के वर्गमूल के समानुपाती होता है। यदि लम्बाई बढ़ती है, तो आवर्तकाल भी बढ़ता है।
  4. गुरुत्वीय त्वरण (\( g \)) पर: आवर्तकाल गुरुत्वीय त्वरण \( g \) के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यदि \( g \) का मान घटता है (जैसे पहाड़ों पर), तो आवर्तकाल बढ़ जाता है, और घड़ी धीमी हो जाती है।

In simple words: सरल लोलक एक भारी गोली को धागे से लटकाने पर बनता है। जब इसे थोड़ा हिलाते हैं, तो यह आगे-पीछे झूलता है। इसका झूलने का समय (आवर्तकाल) धागे की लम्बाई और गुरुत्वाकर्षण बल पर निर्भर करता है, लेकिन गोली के वज़न या कितनी दूर तक हिलाया गया है (छोटे विस्थापनों के लिए) उस पर निर्भर नहीं करता।

🎯 Exam Tip: सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र \( T = 2\pi\sqrt{l/g} \) याद रखना महत्वपूर्ण है। साथ ही, इसकी द्रव्यमान और छोटे आयाम से स्वतंत्रता को भी ध्यान में रखें।

 

Question 7. छोटी-छोटी एक जैसी कई स्प्रिंगों को (i) श्रेणी क्रम तथा (ii) समान्तर क्रम में संयोजित करने पर स्प्रिंग नियतांक का मान किस प्रकार प्रभावित होता है?
Answer:

(i) श्रेणी क्रम संयोजन (Series Combination)

जब स्प्रिंगों को एक के बाद एक जोड़ा जाता है, तो उसे श्रेणी क्रम संयोजन कहते हैं। मान लीजिये दो स्प्रिंगें \( S_1 \) और \( S_2 \) श्रेणी क्रम में जुड़ी हैं, जिनके स्प्रिंग नियतांक \( k_1 \) और \( k_2 \) हैं। जब एक पिण्ड को नीचे खींचते हैं, तो दोनों स्प्रिंगों में अलग-अलग खिंचाव \( y_1 \) और \( y_2 \) होता है, लेकिन उन पर लगने वाला बल \( F \) समान होता है।

कुल विस्थापन \( y = y_1 + y_2 \).
स्प्रिंगों के लिए हुक का नियम: \( F = -k_1 y_1 \) और \( F = -k_2 y_2 \).
तो, \( y_1 = -\frac{F}{k_1} \) और \( y_2 = -\frac{F}{k_2} \).

अगर पूरे संयोजन का प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k \) है, तो कुल विस्थापन \( y = -\frac{F}{k} \).
मान रखने पर:
\( -\frac{F}{k} = -\frac{F}{k_1} - \frac{F}{k_2} \)
\( \implies \frac{1}{k} = \frac{1}{k_1} + \frac{1}{k_2} \).

यदि \( n \) एक जैसी स्प्रिंगें श्रेणी क्रम में जोड़ी जाती हैं, जहाँ प्रत्येक का स्प्रिंग नियतांक \( k' \) है, तो प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k \) के लिए:
\( \frac{1}{k} = \frac{1}{k'} + \frac{1}{k'} + \ldots + \frac{1}{k'} \) (n बार)
\( \implies \frac{1}{k} = \frac{n}{k'} \)
\( \implies k = \frac{k'}{n} \).

तो, श्रेणी क्रम संयोजन में प्रभावी स्प्रिंग नियतांक, प्रत्येक स्प्रिंग के नियतांक का \( \frac{1}{n} \) गुना हो जाता है। इसका मतलब है कि संयोजन मुलायम हो जाता है। इस स्थिति में आवर्तकाल \( \sqrt{n} \) गुना बढ़ जाता है।

इसी तरह, यदि किसी स्प्रिंग को \( n \) बराबर टुकड़ों में काट दिया जाए, तो प्रत्येक टुकड़े का बल नियतांक \( n \) गुना हो जाता है, और आवर्तकाल \( \frac{1}{\sqrt{n}} \) गुना रह जाता है।

(ii) समान्तर क्रम संयोजन (Parallel Combination)

जब स्प्रिंगों को एक-दूसरे के समानांतर जोड़ा जाता है, ताकि उन सभी में समान विस्थापन हो, तो उसे समान्तर क्रम संयोजन कहते हैं। मान लीजिये दो स्प्रिंगें \( S_1 \) और \( S_2 \) समान्तर क्रम में जुड़ी हैं, जिनके स्प्रिंग नियतांक \( k_1 \) और \( k_2 \) हैं। जब एक पिण्ड को नीचे खींचते हैं, तो दोनों स्प्रिंगों में समान विस्थापन \( y \) होता है।

इस स्थिति में, दोनों स्प्रिंगें अलग-अलग बल लगाती हैं, और ये बल जुड़ जाते हैं।
स्प्रिंगों द्वारा लगने वाला बल: \( F_1 = -k_1 y \) और \( F_2 = -k_2 y \).
कुल प्रत्यानयन बल \( F = F_1 + F_2 \).
\( \implies F = -k_1 y - k_2 y \)
\( \implies F = -(k_1 + k_2)y \).

अगर पूरे संयोजन का प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k \) है, तो \( F = -ky \).
तुलना करने पर:
\( k = k_1 + k_2 \).

यदि \( n \) एक जैसी स्प्रिंगें समान्तर क्रम में जोड़ी जाती हैं, जहाँ प्रत्येक का स्प्रिंग नियतांक \( k' \) है, तो प्रभावी स्प्रिंग नियतांक \( k \) के लिए:
\( k = k' + k' + \ldots + k' \) (n बार)
\( \implies k = nk' \).

तो, समान्तर क्रम संयोजन में प्रभावी स्प्रिंग नियतांक, प्रत्येक स्प्रिंग के नियतांक का \( n \) गुना हो जाता है। इसका मतलब है कि संयोजन बहुत कठोर हो जाता है। इस स्थिति में आवर्तकाल \( \frac{1}{\sqrt{n}} \) गुना रह जाता है।

In simple words: जब स्प्रिंगों को एक लाइन में जोड़ते हैं (श्रेणी क्रम), तो वे ज़्यादा लचीली हो जाती हैं, और उनका नियतांक कम हो जाता है। जब उन्हें एक-दूसरे के बगल में जोड़ते हैं (समान्तर क्रम), तो वे ज़्यादा कठोर हो जाती हैं, और उनका नियतांक बढ़ जाता है।

🎯 Exam Tip: श्रेणी क्रम में स्प्रिंग नियतांकों का व्युत्क्रम जुड़ता है (\( 1/k_{eq} = 1/k_1 + 1/k_2 + \ldots \)), जबकि समान्तर क्रम में वे सीधे जुड़ते हैं (\( k_{eq} = k_1 + k_2 + \ldots \)). यह प्रतिरोधों के संयोजन के विपरीत है।

 

Question 8. मुक्त दोलन, अवमंदन तथा प्रणोदित दोलनों को उदाहरण सहित समझाते हुये अनुनाद की विवेचना कीजिये।
Answer: मुक्त दोलन, अवमंदन और प्रणोदित दोलन (Forced Vibrations) को समझने के लिए, हम नीचे हर प्रकार के दोलन को उदाहरणों के साथ समझेंगे और अनुनाद (Resonance) पर भी बात करेंगे:

(1) मुक्त सरल आवर्ती दोलन (Undamped Simple Harmonic Oscillation or Free Oscillations)
जब कोई चीज़ जो हिल सकती है, जैसे एक साधारण लोलक या स्वरित्र द्विभुज, पर सिर्फ़ उसे वापस अपनी जगह लाने वाला बल (प्रत्यानयन बल) लगता है, तो वह चीज़ हमेशा तक हिलती रहती है। इस तरह के हिलने-डुलने को 'मुक्त कंपन' या 'मुक्त दोलन' कहते हैं। इसकी हिलने की गति को 'प्राकृतिक आवृत्ति' (Natural Frequency) कहते हैं। मुक्त दोलन में सिर्फ़ प्रत्यानयन बल काम करता है, और इसमें हिलने की दूरी (आयाम) और ताकत (ऊर्जा) समय के साथ एक जैसी रहती है। इस दोलन को एक स्थिर आयाम वाली साइन तरंग (sine wave) के रूप में देखा जा सकता है।

उदाहरण:
(i) एक साधारण लोलक को उसकी स्थिर स्थिति से थोड़ा हिलाकर छोड़ दें, तो वह अपनी प्राकृतिक गति से झूलता है। अगर हवा का विरोध न हो, तो यह मुक्त दोलन का एक अच्छा उदाहरण है।
(ii) जब एक स्वरित्र द्विभुज को रबर पैड से मारा जाता है, तो उसकी शाखाएं अपनी प्राकृतिक आवृत्ति से हिलती हैं। यह हिलने की गति शाखाओं की मोटाई पर निर्भर करती है और मुक्त दोलन का एक और उदाहरण है।
मुक्त दोलनों में, किसी भी समय वस्तु पर लगने वाला प्रत्यानयन बल उसके विस्थापन (अपनी जगह से हटने) के सीधा समानुपाती होता है। अगर विस्थापन एक इकाई हो, तो प्रत्यानयन बल को वस्तु की कठोरता (S) कहते हैं।
मुक्त दोलन का आवर्तकाल (Time Period): \( T = 2\pi \sqrt{\frac{m}{S}} \)
स्वाभाविक आवृत्ति (Natural Frequency): \( n_0 = \frac{1}{2\pi} \sqrt{\frac{S}{m}} \)
स्वाभाविक कोणीय आवृत्ति (Natural Angular Frequency): \( \omega_0 = 2\pi n_0 = \sqrt{\frac{S}{m}} \)
इससे यह साफ़ होता है कि मुक्त दोलन का आवर्तकाल और आवृत्ति सिर्फ़ वस्तु के द्रव्यमान (m) और कठोरता (S) के अनुपात पर निर्भर करते हैं। अगर द्रव्यमान बढ़ता है या कठोरता घटती है, तो आवर्तकाल बढ़ता है और आवृत्ति घट जाती है।

(2) अवमंदित दोलन (Damped Oscillation)
वास्तव में, कोई भी चीज़ हमेशा तक हिल नहीं सकती। यदि हम एक साधारण लोलक को देखें, तो घर्षण जैसे बलों के कारण ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती जाती है। इससे दोलन का आयाम (हिलने की दूरी) लगातार घटता जाता है और अंत में लोलक रुक जाता है। घर्षण बल हमेशा वस्तु की गति का विरोध करता है। इसलिए, शुरुआत में दी गई ऊर्जा धीरे-धीरे घर्षण के विरुद्ध काम करने में गर्मी के रूप में बदल जाती है। यह ऊर्जा वापस नहीं मिल सकती, इसलिए ऊर्जा कम होने से दोलनों का आयाम धीरे-धीरे कम होता है और अंत में शून्य हो जाता है। आयाम के लगातार कम होते जाने को 'अवमंदन' कहते हैं।
घर्षण बल (अवमंदक बल) की उपस्थिति के कारण घटते आयाम के अवमंदक दोलक का ग्राफ ऐसा दिखता है, जहाँ आयाम धीरे-धीरे कम होता जाता है:
अवमंदित दोलन ग्राफ
इसका मतलब है कि अवमंदक बल वेग (v) के विपरीत दिशा में और उसके समानुपाती होता है:
\( F_d \propto -v \)
\( F_d = -bv \) .....(1)
समीकरण (1) में \( b \) 'अवमंदन नियतांक' कहलाता है, और \( v \) वस्तु का वेग है। \( b \) का मान माध्यम के गुणों, जैसे श्यानता (viscosity), वस्तु के आकार और आकृति पर निर्भर करता है।
प्रत्यानयन बल \( F_R = -ky \) .....(2)
अतः दोलक पर लगने वाला कुल बल, प्रत्यानयन बल और अवमंदक बल का योग होता है:
\( F = F_R + F_d \)
\( F = -ky - bv \)
\( m \frac{d^2y}{dt^2} = -ky - b\frac{dy}{dt} \)
\( \implies m \frac{d^2y}{dt^2} + b\frac{dy}{dt} + ky = 0 \) .....(3)
यह समीकरण बताता है कि समय के साथ हिलने वाली चीज़ की गति कैसे बदलती है।
In simple words: जब कोई चीज़ हिलती है और घर्षण जैसे बल उसे रोकते हैं, तो उसकी हिलने की ताकत कम हो जाती है। धीरे-धीरे, वह कम दूरी तक हिलती है और अंत में रुक जाती है। इस रुकने की प्रक्रिया को अवमंदन कहते हैं।

(3) प्रणोदित कम्पन (Forced Vibrations)
जब किसी वस्तु पर बाहर से कोई ऐसा बल बार-बार लगता है जिसकी हिलने की गति (आवृत्ति) वस्तु की अपनी प्राकृतिक गति से अलग हो, तो शुरुआत में वस्तु अपनी प्राकृतिक गति से ही हिलने की कोशिश करती है। लेकिन बाहर से लगने वाला बल वस्तु को अपनी गति से हिलाने का प्रयास करता है। इससे वस्तु और बाहर के बल की गतियों में एक तरह की होड़ लग जाती है, जिससे कभी तो वस्तु का आयाम बढ़ जाता है और कभी कम हो जाता है। इसका मतलब है कि शुरुआत में वस्तु के कंपन अनियमित होते हैं। लेकिन यह अनियमितता जल्दी ही ख़त्म हो जाती है और अंत में वस्तु सिर्फ़ बाहर से लगने वाले बल की गति (आवृत्ति) से ही हिलने लगती है। इस तरह के दोलनों को 'प्रणोदित दोलन' या 'कम्पन' कहते हैं। इन दोलनों में वस्तु हमेशा बाहर से लगने वाले बल की आवृत्ति से ही कंपन करती है, चाहे उसकी अपनी प्राकृतिक आवृत्ति कुछ भी हो।
In simple words: जब किसी चीज़ पर बाहर से कोई ताकत लगती है जो उसे बार-बार हिलाती है, तो चीज़ धीरे-धीरे बाहर से लगने वाली ताकत की गति से ही हिलने लगती है। इस तरह के हिलने को प्रणोदित कंपन कहते हैं।

अनुनाद (Resonance)
प्रणोदित दोलनों को समझने से हमें पता चलता है कि जब किसी वस्तु पर बाहर से लगने वाले बल की गति (आवृत्ति) उस वस्तु की अपनी प्राकृतिक गति के बराबर हो जाती है, तो वस्तु के प्रणोदित दोलनों का आयाम (हिलने की दूरी) बहुत बड़ा हो जाता है। इस स्थिति को 'अनुनाद' कहते हैं। ऐसी स्थिति में बाहर से लगने वाला बल, वस्तु में सबसे ज़्यादा ऊर्जा भेजता है।

उदाहरण:
चित्र में एक पतली रस्सी पर चार लोलक (A, B, C, D) लटके दिखाए गए हैं। लोलक A और C की लंबाई एक समान है, जबकि लोलक B की लंबाई थोड़ी ज़्यादा और लोलक D की लंबाई थोड़ी कम है। यदि लोलक A को हिलाया जाए, तो रस्सी के माध्यम से अन्य लोलक भी हिलने लगते हैं। इससे लोलक B और D, जिनकी आवृत्ति लोलक A से अलग है, कम आयाम से हिलते हैं। लेकिन लोलक C, जिसकी लंबाई A के बराबर है (यानी प्राकृतिक आवृत्ति भी बराबर है), बहुत बड़े आयाम से हिलना शुरू कर देता है। यह अनुनाद का एक उत्तम उदाहरण है।
अनुनाद लोलक चित्र
अनुनाद तब होता है जब बाहर से लगने वाले बल की आवृत्ति वस्तु की अपनी प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर होती है। इस स्थिति में बाहर से लगने वाला बल वस्तु को हर बार सही समय पर धकेलता है। इससे वस्तु की हिलने की ऊर्जा बढ़ती जाती है, और वह बहुत ज़्यादा दूर तक हिलने लगती है (आयाम बढ़ जाता है)। यदि ऊर्जा का कोई नुकसान न हो, तो अनुनाद की स्थिति में आयाम अनंत तक बढ़ सकता है।

दैनिक जीवन में अनुनाद से संबंधित कुछ घटनाएँ:
(1) प्रत्येक भवन की अपनी एक प्राकृतिक आवृत्ति होती है, जो उसकी ऊँचाई, आकार और निर्माण सामग्री पर निर्भर करती है। जब भूकंप की लहरों की गति भवन की प्राकृतिक आवृत्ति से मिल जाती है, तो भवन बहुत ज़ोर से हिलने लगते हैं और गिरने का खतरा बढ़ जाता है।
(2) सैनिकों को पुल पर कदम मिलाकर नहीं चलना चाहिए। अगर उनके कदमों की गति पुल की प्राकृतिक हिलने की गति से मिल गई, तो पुल बहुत ज़ोर से हिलने लगेगा और टूट सकता है। इसी तरह, रेलगाड़ी के पहियों की आवृत्ति पुल की प्राकृतिक आवृत्ति से मिल जाए तो पुल में अनुनाद से गिरने का खतरा रहता है।
(3) जब एक हिलते हुए स्वरित्र द्विभुज को खाली बॉक्स पर रखते हैं जिसमें हवा भरी हो, तो बॉक्स के अंदर की हवा स्वरित्र की गति से हिलने लगती है। इससे बहुत तेज़ आवाज़ सुनाई देती है। यह अनुनाद के कारण होता है।
(4) हम विशिष्ट आकाशवाणी स्टेशन से प्रसारित कार्यक्रम को रेडियो ट्रांजिस्टर को समस्वरित करके सुनते हैं, जहाँ रेडियो की आवृत्ति स्टेशन की आवृत्ति से मिलाई जाती है।
(5) पुल अथवा सुरंग में से गुज़रते समय ड्राइवर ट्रेन की सीटी नहीं बजाते, ताकि अनुनाद से कोई नुकसान न हो।
In simple words: जब बाहर की ताकत की गति किसी चीज़ की अपनी हिलने की गति से मिल जाती है, तो वह चीज़ बहुत ज़ोर से हिलने लगती है। इसे अनुनाद कहते हैं।

🎯 Exam Tip: इस लंबे उत्तर को भागों में बांटकर याद करें: मुक्त, अवमंदित, और प्रणोदित दोलन की परिभाषा, उनके समीकरण, और दैनिक जीवन के उदाहरण। अनुनाद के मुख्य बिंदुओं पर विशेष ध्यान दें, जैसे प्राकृतिक आवृत्ति से मिलान और अधिकतम आयाम।

 

RBSE Class 11 Physics Chapter 8 आंकिक प्रश्न

 

Question 1. कोई पिण्ड निम्नलिखित समीकरण के अनुसार सरल आवर्त गति से दोलन करता है-
\( x=5.0 \cos \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) m \)
\( t = 1.5s \)
Answer: दिए गए समीकरण के अनुसार सरल आवर्त गति कर रहे पिण्ड के लिए विस्थापन \( x \), वेग \( v \) और त्वरण \( a \) का मान \( t = 1.5 \)s पर ज्ञात करना है।
दिया गया विस्थापन समीकरण:
\( x = 5.0 \cos \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \) मीटर .....(1)
वेग के लिए, विस्थापन का समय के सापेक्ष अवकलन करने पर:
\( v = \frac{dx}{dt} = \frac{d}{dt} \left[ 5 \cos \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \right] \)
\( = -5 \sin \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \times (2\pi) \)
\( = -10\pi \sin \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \) मी./से. .....(2)
त्वरण के लिए, वेग का समय के सापेक्ष अवकलन करने पर:
\( a = \frac{dv}{dt} = \frac{d}{dt} \left[ -10\pi \sin \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \right] \)
\( = -10\pi \cos \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \times (2\pi) \)
\( = -20\pi^2 \cos \left(2 \pi t+\frac{\pi}{4}\right) \) मी./से.² .....(3)
अब, समीकरण (1), (2) और (3) में \( t = 1.5 \)s रखने पर, हम मान ज्ञात कर सकते हैं:
विस्थापन \( x \):
\( x = 5 \cos \left(2 \pi \times 1.5+\frac{\pi}{4}\right) \)
\( = 5 \cos \left(3\pi + \frac{\pi}{4}\right) \)
चूंकि \( \cos(3\pi + \theta) = -\cos(\theta) \), तो
\( x = -5 \cos \left(\frac{\pi}{4}\right) \)
\( = -5 \times \frac{1}{\sqrt{2}} = -\frac{5}{\sqrt{2}} \)
\( = -5 \times 0.707 = -3.535 \) मीटर
वेग \( v \):
\( v = -10\pi \sin \left(3 \pi + \frac{\pi}{4}\right) \)
चूंकि \( \sin(3\pi + \theta) = -\sin(\theta) \), तो
\( v = -10\pi \left(-\sin \frac{\pi}{4}\right) \)
\( = 10\pi \sin \frac{\pi}{4} \)
\( = 10 \times 3.14 \times \frac{1}{\sqrt{2}} \)
\( = 31.4 \times 0.707 \approx 22.2 \) मी./से.
त्वरण \( a \):
\( a = -20\pi^2 \cos \left(3\pi + \frac{\pi}{4}\right) \)
\( = -20\pi^2 \left(-\cos \frac{\pi}{4}\right) \)
\( = 20\pi^2 \cos \frac{\pi}{4} \)
\( = 20 \times (3.14)^2 \times \frac{1}{\sqrt{2}} \)
\( = 20 \times 9.8596 \times 0.707 \)
\( = 197.192 \times 0.707 \approx 139.41 \) मी./से.²
In simple words: हमने दिए गए समय \( t=1.5 \)s पर पिंड की स्थिति, गति और त्वरण को उसके समीकरणों में मान रखकर निकाला। सबसे पहले, विस्थापन का मान ज्ञात किया, फिर विस्थापन के समीकरण का अवकलन करके वेग और त्वरण के समीकरण प्राप्त किए, और अंत में मान रख कर गणना की।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, पहले विस्थापन, वेग और त्वरण के समीकरण \( (x, v, a) \) ज्ञात करें, फिर दिए गए समय का मान रखकर गणना करें। त्रिकोणमितीय सर्वसमिकाओं का सही उपयोग महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. सरल आवर्त गति करते पिण्ड का आवर्तकाल 2 सेकण्ड है। \( t = 0 \) समय से प्रारम्भ होकर कितने समय पश्चात् इसका विस्थापन, आयाम के बराबर होगा?
Answer: हमें वह समय ज्ञात करना है जब सरल आवर्त गति करते पिण्ड का विस्थापन उसके आयाम के बराबर हो।
दिया गया है:
आवर्तकाल \( T = 2 \) सेकण्ड
मान लेते हैं कि गति साम्य स्थिति से प्रारम्भ होती है, तो विस्थापन का समीकरण है:
\( x = A \sin(\omega t) \)
यहाँ, कोणीय आवृत्ति \( \omega = \frac{2\pi}{T} = \frac{2\pi}{2} = \pi \) रेडियन/सेकण्ड
तो, विस्थापन समीकरण बन जाता है:
\( x = A \sin(\pi t) \)
हमें वह समय \( t \) ज्ञात करना है जब विस्थापन \( x \), आयाम \( A \) के बराबर हो, यानी \( x = A \):
\( A = A \sin(\pi t) \)
\( \implies \sin(\pi t) = 1 \)
\( \implies \pi t = \frac{\pi}{2} \)
\( \implies t = \frac{1}{2} \) सेकण्ड
अतः, \( t = 0.5 \) सेकण्ड पश्चात् पिण्ड का विस्थापन उसके आयाम के बराबर होगा।
In simple words: हमें वह समय ढूंढना था जब हिलने वाली चीज़ पूरी दूरी तक पहुँच जाए। चूंकि यह संतुलन से शुरू होती है, तो यह अपनी पूरी दूरी (आयाम) तक पहुँचने में आवर्तकाल का एक-चौथाई समय लेगी।

🎯 Exam Tip: साम्य स्थिति से प्रारम्भ होने वाली सरल आवर्त गति में, पिण्ड आयाम तक पहुँचने में आवर्तकाल का एक-चौथाई \( (T/4) \) समय लेता है। समीकरण में मान रखकर इसकी पुष्टि करें।

 

Question 3. सरल आवर्त गति कर रहे एक कण का अधिकतम वेग 8 cm/s है और माध्य स्थिति से 4 cm दूरी पर त्वरण 16 cm/s² है। आवर्तकाल एवं आयाम ज्ञात करें।
Answer: हमें सरल आवर्त गति कर रहे कण का आवर्तकाल और आयाम ज्ञात करना है।
दिया गया है:
अधिकतम वेग \( V_{max} = 8 \) सेमी./से.
माध्य स्थिति से विस्थापन \( y = 4 \) सेमी.
इस विस्थापन पर त्वरण \( a = 16 \) सेमी./से.²
हम जानते हैं कि सरल आवर्त गति में अधिकतम वेग का सूत्र है:
\( V_{max} = A\omega \) .....(1)
और किसी विस्थापन \( y \) पर त्वरण का सूत्र है:
\( a = \omega^2 y \) .....(2)
समीकरण (2) में दिए गए मान रखने पर:
\( 16 = \omega^2 \times 4 \)
\( \implies \omega^2 = \frac{16}{4} = 4 \)
\( \implies \omega = \sqrt{4} = 2 \) रेडियन/सेकण्ड
अब, \( \omega \) का मान समीकरण (1) में रखने पर, हम आयाम \( A \) ज्ञात कर सकते हैं:
\( 8 = A \times 2 \)
\( \implies A = \frac{8}{2} = 4 \) सेमी.
अब, आवर्तकाल \( T \) की गणना कोणीय आवृत्ति \( \omega \) से की जा सकती है:
\( T = \frac{2\pi}{\omega} \)
\( \implies T = \frac{2\pi}{2} = \pi \)
\( \implies T \approx 3.14 \) सेकण्ड
अतः, आयाम 4 सेमी. और आवर्तकाल 3.14 सेकण्ड है।
In simple words: हमें अधिकतम वेग और एक ख़ास दूरी पर त्वरण दिया गया था। हमने इन मानों का उपयोग करके पहले गति की कोणीय गति (ओमेगा) निकाली। फिर, उस कोणीय गति से हमने गति की पूरी दूरी (आयाम) और एक पूरे चक्र का समय (आवर्तकाल) ज्ञात किया।

🎯 Exam Tip: \( V_{max} = A\omega \) और \( a = \omega^2 y \) जैसे मूल सूत्रों को याद रखें। जब त्वरण दिया हो, तो पहले \( \omega \) ज्ञात करें, और फिर उसका उपयोग करके आयाम और आवर्तकाल निकालें।

 

Question 5. एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है। इसका अधिकतम वेग 3 m/s तथा गति का आयाम 0.2 m है। गति का आवर्त काल ज्ञात कीजिये।
Answer: हमें सरल आवर्त गति कर रहे कण का आवर्तकाल ज्ञात करना है।
दिया गया है:
अधिकतम वेग \( V_{max} = 3 \) m/s
आयाम \( A = 0.2 \) m
हम जानते हैं कि सरल आवर्त गति में अधिकतम वेग का सूत्र है:
\( V_{max} = A\omega \)
यहाँ \( \omega \) कोणीय आवृत्ति है। दिए गए मानों को सूत्र में रखने पर:
\( 3 = 0.2 \times \omega \)
\( \implies \omega = \frac{3}{0.2} = 15 \) रेडियन/सेकण्ड
हम जानते हैं कि कोणीय आवृत्ति \( \omega \) और आवर्तकाल \( T \) के बीच संबंध है:
\( \omega = \frac{2\pi}{T} \)
इस सूत्र से हम आवर्तकाल \( T \) ज्ञात कर सकते हैं:
\( T = \frac{2\pi}{\omega} \)
\( \implies T = \frac{2 \times 3.14}{15} \)
\( \implies T = \frac{6.28}{15} \)
\( \implies T \approx 0.418 \) सेकण्ड
अतः, गति का आवर्तकाल लगभग 0.42 सेकण्ड है।
In simple words: हमें सबसे तेज़ गति और हिलने की पूरी दूरी (आयाम) दी गई थी। हमने इन मानों से पहले गति की कोणीय गति (ओमेगा) निकाली। फिर, उस ओमेगा का उपयोग करके, हमने पता लगाया कि एक पूरा चक्कर लगाने में कितना समय (आवर्तकाल) लगता है।

🎯 Exam Tip: \( V_{max} = A\omega \) और \( \omega = \frac{2\pi}{T} \) जैसे मूल सूत्रों को हमेशा याद रखें। इन दो सूत्रों का उपयोग करके आप अक्सर \( A, \omega, T, V_{max} \) में से कोई भी अज्ञात राशि ज्ञात कर सकते हैं।

 

Question 7. एक सरल आवर्त दोलक का आवर्तकाल 6s है। साम्य स्थिति से गति प्रारम्भ करने वाले दोलक के लिये कितने समय पश्चात् उसका विस्थापन उसके आयाम का आधा होगा?
Answer: हमें वह समय ज्ञात करना है जब दोलक का विस्थापन उसके आयाम का आधा हो।
दिया गया है:
आवर्तकाल \( T = 6 \)s
हमें वह समय \( t \) ज्ञात करना है जब विस्थापन \( y = \frac{A}{2} \) हो।
चूंकि गति साम्य स्थिति से प्रारम्भ होती है, तो विस्थापन समीकरण है:
\( y = A \sin(\omega t) \)
यहाँ \( A \) आयाम है और \( \omega \) कोणीय आवृत्ति है।
\( \omega = \frac{2\pi}{T} = \frac{2\pi}{6} = \frac{\pi}{3} \) रेडियन/सेकण्ड
अब, दिए गए विस्थापन \( y = \frac{A}{2} \) को समीकरण में रखने पर:
\( \frac{A}{2} = A \sin(\omega t) \)
\( \implies \sin(\omega t) = \frac{1}{2} \)
हम जानते हैं कि \( \sin \left(\frac{\pi}{6}\right) = \frac{1}{2} \)। अतः,
\( \omega t = \frac{\pi}{6} \)
\( \implies \frac{\pi}{3} t = \frac{\pi}{6} \)
दोनों ओर \( \pi \) से भाग देने पर:
\( \frac{1}{3} t = \frac{1}{6} \)
\( \implies t = \frac{3}{6} = \frac{1}{2} \) सेकण्ड
अतः, 0.5 सेकण्ड पश्चात् दोलक का विस्थापन उसके आयाम का आधा होगा।
In simple words: हमें यह पता लगाना था कि कितने समय बाद हिलने वाली चीज़ अपनी अधिकतम दूरी के आधे तक पहुंचेगी। चूंकि यह संतुलन से शुरू होती है, हमने समय कोणीय गति और विस्थापन के सूत्र का उपयोग करके वह समय निकाला।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति में साम्य स्थिति से प्रारम्भ होने पर विस्थापन समीकरण \( y = A \sin(\omega t) \) का उपयोग करें। \( \sin \theta \) के मानक मानों और \( \omega = \frac{2\pi}{T} \) सूत्र का सही उपयोग करें।

 

Question 8. 9.0 J कुल ऊर्जा वाले सरल आवर्ती दोलक की किसी क्षण स्थितिज ऊर्जा 5J है। दोलक का आयाम 0.01 m हो तो इस 2 kg द्रव्यमान वाले दोलक का आवर्तकाल ज्ञात कीजिये।
Answer: हमें दोलक का आवर्तकाल ज्ञात करना है।
दिया गया है:
कुल ऊर्जा \( E = 9.0 \) J
किसी क्षण स्थितिज ऊर्जा \( U = 5 \) J
दोलक का आयाम \( A = 0.01 \) m
द्रव्यमान \( m = 2 \) kg
हम जानते हैं कि सरल आवर्त गति में कुल यांत्रिक ऊर्जा \( E \) का सूत्र है:
\( E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \)
यहाँ \( \omega \) कोणीय आवृत्ति है। दिए गए मानों को सूत्र में रखने पर:
\( 9.0 = \frac{1}{2} \times 2 \times \omega^2 \times (0.01)^2 \)
\( \implies 9.0 = 1 \times \omega^2 \times (0.0001) \)
\( \implies \omega^2 = \frac{9.0}{0.0001} \)
\( \implies \omega^2 = 90000 \)
\( \implies \omega = \sqrt{90000} = 300 \) रेडियन/सेकण्ड
अब, आवर्तकाल \( T \) की गणना कोणीय आवृत्ति \( \omega \) से की जा सकती है:
\( T = \frac{2\pi}{\omega} \)
\( \implies T = \frac{2 \times 3.14}{300} \)
\( \implies T = \frac{6.28}{300} \)
\( \implies T \approx 0.0209 \) सेकण्ड
अतः, दोलक का आवर्तकाल लगभग 0.021 सेकण्ड है।
In simple words: हमें कुल ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, आयाम और द्रव्यमान दिए गए थे। कुल ऊर्जा के सूत्र का उपयोग करके हमने पहले दोलक की कोणीय गति (ओमेगा) निकाली। फिर, उस ओमेगा से हमने पता लगाया कि एक पूरा चक्र पूरा करने में कितना समय (आवर्तकाल) लगता है।

🎯 Exam Tip: सरल आवर्त गति में कुल ऊर्जा \( E = \frac{1}{2} m \omega^2 A^2 \) का सूत्र महत्वपूर्ण है। इस सूत्र का उपयोग करके \( \omega \) ज्ञात करें, और फिर \( T = \frac{2\pi}{\omega} \) सूत्र से आवर्तकाल निकालें। सभी इकाइयों को मानक (SI) प्रणाली में रखें।

 

Question 9. यदि चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण का मान पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण मान का छठा भाग है तो चन्द्रमा पर उसी सरल लोलक का आवर्तकाल कितना गुना होगा?
Answer: हमें ज्ञात करना है कि चन्द्रमा पर सरल लोलक का आवर्तकाल पृथ्वी की तुलना में कितना गुना होगा।
हम जानते हैं कि सरल लोलक का आवर्तकाल \( T \) का सूत्र है:
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g}} \)
जहाँ \( l \) लोलक की लम्बाई है और \( g \) गुरुत्वीय त्वरण है।
पृथ्वी पर सरल लोलक का आवर्तकाल \( T_e \) होगा:
\( T_e = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g_e}} \) .....(1)
जहाँ \( g_e \) पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण है।
चन्द्रमा पर उसी लोलक का आवर्तकाल \( T_m \) होगा:
\( T_m = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g_m}} \) .....(2)
जहाँ \( g_m \) चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण है।
समीकरण (2) को समीकरण (1) से भाग देने पर:
\( \frac{T_m}{T_e} = \frac{2\pi \sqrt{l/g_m}}{2\pi \sqrt{l/g_e}} \)
\( \implies \frac{T_m}{T_e} = \sqrt{\frac{g_e}{g_m}} \)
प्रश्न के अनुसार, चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण का छठा भाग है:
\( g_m = \frac{g_e}{6} \)
इस मान को सूत्र में रखने पर:
\( \frac{T_m}{T_e} = \sqrt{\frac{g_e}{g_e/6}} \)
\( \implies \frac{T_m}{T_e} = \sqrt{6} \)
\( \implies T_m = \sqrt{6} \cdot T_e \)
चूंकि \( \sqrt{6} \approx 2.45 \), अतः चन्द्रमा पर आवर्तकाल पृथ्वी की तुलना में लगभग 2.45 गुना होगा।
In simple words: हमें पृथ्वी और चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण बल के बीच का संबंध दिया गया था। चूंकि लोलक का समय गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है, हमने अनुपात का उपयोग करके यह पता लगाया कि चंद्रमा पर लोलक कितना धीमा झूलेगा।

🎯 Exam Tip: सरल लोलक के आवर्तकाल \( T \propto \frac{1}{\sqrt{g}} \) संबंध का उपयोग करें। जब लोलक को एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर ले जाया जाता है, तो उसकी लंबाई \( l \) अपरिवर्तित रहती है, जबकि \( g \) बदलता है।

 

Question 11. एक सेकण्ड लोलक की लम्बाई (जहाँ \( g = 9.8 \) m/s²) 1m है। किसी ग्रह पर जहाँ \( g = 4.9 \) m/s² है, सेकण्ड लोलक की लम्बाई क्या होगी?
Answer: हमें किसी अन्य ग्रह पर सेकण्ड लोलक की लम्बाई ज्ञात करनी है।
एक सेकण्ड लोलक वह लोलक होता है जिसका आवर्तकाल \( T = 2 \) सेकण्ड होता है।
हम जानते हैं कि सरल लोलक का आवर्तकाल \( T \) का सूत्र है:
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g}} \)
इस सूत्र को वर्ग करने पर:
\( T^2 = 4\pi^2 \frac{l}{g} \)
तो, लंबाई \( l \) के लिए सूत्र होगा:
\( l = \frac{T^2 g}{4\pi^2} \)
यह सूत्र दर्शाता है कि यदि आवर्तकाल \( T \) नियत हो, तो लंबाई \( l \) गुरुत्वीय त्वरण \( g \) के सीधा समानुपाती होगी।
यानी, \( \frac{l_1}{g_1} = \frac{l_2}{g_2} \) (जब \( T \) समान हो)
तो, \( l_2 = l_1 \left(\frac{g_2}{g_1}\right) \)
दिए गए मान:
पृथ्वी पर सेकण्ड लोलक की लंबाई \( l_1 = 1 \) m (जहाँ \( g_1 = 9.8 \) m/s²)
ग्रह पर गुरुत्वीय त्वरण \( g_2 = 4.9 \) m/s²
अब मानों को सूत्र में रखने पर:
\( l_2 = 1 \times \left(\frac{4.9}{9.8}\right) \)
\( l_2 = 1 \times \left(\frac{1}{2}\right) \)
\( l_2 = 0.5 \) m
अतः, उस ग्रह पर सेकण्ड लोलक की लंबाई 0.5 मीटर होगी।
In simple words: हमें पृथ्वी पर एक सेकण्ड लोलक की लंबाई और गुरुत्वाकर्षण बल दिया गया था, साथ ही एक दूसरे ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण बल भी। चूंकि सेकण्ड लोलक का समय हमेशा 2 सेकंड होता है, हमने अनुपात का उपयोग करके उस दूसरे ग्रह पर लोलक की लंबाई निकाली।

🎯 Exam Tip: सेकण्ड लोलक के लिए \( T = 2 \)s होता है। जब आवर्तकाल नियत हो, तो लोलक की लम्बाई गुरुत्वीय त्वरण के समानुपाती होती है, यानी \( l \propto g \)। इस संबंध का उपयोग करके अनुपात वाले प्रश्नों को आसानी से हल किया जा सकता है।

 

Question 13. निम्न स्थिति से सरल लोलक के आवर्तकाल में प्रतिशत परिवर्तन का मान ज्ञात कीजिये
(i) लोलक की लम्बाई 5% बढ़ने पर
(ii) लोलक की द्रव्यमान 5% बढ़ने पर
(iii) लोलक की आयाम 5% बढ़ने पर
Answer: हमें सरल लोलक के आवर्तकाल में प्रतिशत परिवर्तन ज्ञात करना है।
हम जानते हैं कि सरल लोलक का आवर्तकाल \( T = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g}} \) होता है।
इसे इस प्रकार भी लिखा जा सकता है: \( T = C l^{1/2} \), जहाँ \( C = 2\pi/\sqrt{g} \) एक स्थिरांक है।
आवर्तकाल में छोटे परिवर्तन के लिए, हम आंशिक अवकलन का उपयोग कर सकते हैं:
\( \ln T = \ln C + \frac{1}{2} \ln l \)
दोनों ओर अवकलन करने पर:
\( \frac{dT}{T} = \frac{1}{2} \frac{dl}{l} \)
प्रतिशत परिवर्तन के रूप में:
\( \frac{dT}{T} \times 100\% = \frac{1}{2} \left(\frac{dl}{l} \times 100\%\right) \)

(i) लोलक की लम्बाई 5% बढ़ने पर:
दिया गया है कि लम्बाई में प्रतिशत परिवर्तन \( \frac{dl}{l} \times 100\% = 5\% \)
तो, आवर्तकाल में प्रतिशत परिवर्तन होगा:
\( \frac{dT}{T} \times 100\% = \frac{1}{2} \times 5\% = 2.5\% \)
अतः, लोलक की लम्बाई 5% बढ़ने पर आवर्तकाल में 2.5% की वृद्धि होगी।

(ii) लोलक की द्रव्यमान 5% बढ़ने पर:
सरल लोलक का आवर्तकाल उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। सूत्र \( T = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g}} \) में द्रव्यमान \( m \) शामिल नहीं है।
अतः, द्रव्यमान में 5% की वृद्धि होने पर आवर्तकाल में कोई परिवर्तन नहीं होगा, यानी प्रतिशत परिवर्तन शून्य होगा।

(iii) लोलक की आयाम 5% बढ़ने पर:
सरल लोलक का आवर्तकाल उसके दोलन के आयाम पर निर्भर नहीं करता है (छोटे आयामों के लिए)। सूत्र \( T = 2\pi \sqrt{\frac{l}{g}} \) में आयाम \( A \) शामिल नहीं है।
अतः, आयाम में 5% की वृद्धि होने पर भी आवर्तकाल में कोई परिवर्तन नहीं होगा, यानी प्रतिशत परिवर्तन शून्य होगा।
In simple words: हमने पता लगाया कि अगर लंबाई 5% बढ़ती है, तो आवर्तकाल 2.5% बढ़ जाएगा। लेकिन, अगर लोलक का वज़न या वह कितनी दूर तक झूलता है (आयाम) बदलता है, तो आवर्तकाल में कोई बदलाव नहीं आएगा।

🎯 Exam Tip: सरल लोलक का आवर्तकाल सिर्फ़ उसकी लम्बाई \( l \) और गुरुत्वीय त्वरण \( g \) पर निर्भर करता है। यह उसके द्रव्यमान और आयाम (छोटे आयामों के लिए) पर निर्भर नहीं करता। प्रतिशत परिवर्तन के लिए आंशिक अवकलन विधि का उपयोग करें।

 

Question 14. एक आदर्श स्प्रिंग से 0.5 kg द्रव्यमान के पिण्ड को लटकाकर ऊर्ध्व दोलन कराये जाते हैं। दोलन काल 1/2 से. है तो स्प्रिंग नियतांक का मान ज्ञात कीजिये।
Answer: दिए गए मान हैं:
पिण्ड का द्रव्यमान \(m = 0.5 \, \text{kg}\)
दोलन काल \(T = \frac{1}{2} \, \text{सेकंड}\)
स्प्रिंग नियतांक \(k\) ज्ञात करना है।

स्प्रिंग से जुड़े पिण्ड के दोलन काल का सूत्र है:
\(T = 2\pi\sqrt{\frac{m}{k}}\)

दोनों पक्षों का वर्ग करने पर:
\(T^2 = (2\pi)^2 \left(\sqrt{\frac{m}{k}}\right)^2\)
\(T^2 = 4\pi^2 \frac{m}{k}\)

अब, स्प्रिंग नियतांक \(k\) के लिए सूत्र को पुनः व्यवस्थित करें:
\(k = \frac{4\pi^2 m}{T^2}\)

दिए गए मानों को सूत्र में रखने पर:
\(k = \frac{4\pi^2 \times 0.5}{(\frac{1}{2})^2}\)

गणना करने पर:
\(k = \frac{4\pi^2 \times 0.5}{\frac{1}{4}}\)
\(k = 4\pi^2 \times 0.5 \times 4\)
\(k = 8\pi^2 \, \text{N/m}\)
In simple words: हमने स्प्रिंग-द्रव्यमान प्रणाली के दोलन काल के सूत्र का उपयोग किया. दिए गए द्रव्यमान और दोलन काल को सूत्र में रखकर, हमने स्प्रिंग नियतांक का मान \(8\pi^2 \, \text{N/m}\) प्राप्त किया.

🎯 Exam Tip: स्प्रिंग-द्रव्यमान प्रणाली के दोलन काल का सूत्र याद रखें, और गणना करते समय दिए गए मानों को सही ढंग से सूत्र में रखें.

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