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Detailed Chapter 6 गुरुत्वाकर्षण RBSE Solutions for Class 11 Physics
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Class 11 Physics Chapter 6 गुरुत्वाकर्षण RBSE Solutions PDF
Rajasthan Board RBSE Class 11 Physics Chapter 6 गुरुत्वाकर्षण
RBSE Class 11 Physics Chapter 6 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
RBSE Class 11 Physics Chapter 6 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. कृत्रिम उपग्रह पर भारहीनता अनुभव होती है लेकिन चन्द्रमा पर क्यों नहीं?
Answer: एक कृत्रिम उपग्रह का द्रव्यमान बहुत कम होता है, इसलिए इसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव नगण्य (बहुत कम) होता है। यही कारण है कि उस पर भारहीनता (वजनहीनता) महसूस होती है। इसके विपरीत, चंद्रमा का द्रव्यमान बहुत अधिक होता है। चंद्रमा के अपने गुरुत्वाकर्षण बल के कारण, उस पर भारहीनता महसूस नहीं होती।
In simple words: कृत्रिम उपग्रह का वजन कम होने के कारण गुरुत्वाकर्षण प्रभाव नहीं होता, इसलिए भारहीनता महसूस होती है। चंद्रमा का वजन ज्यादा होने से उसका अपना गुरुत्वाकर्षण होता है, जिससे भारहीनता महसूस नहीं होती।
🎯 Exam Tip: भारहीनता और गुरुत्वाकर्षण बल के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएँ, खासकर जब विभिन्न पिंडों की बात हो रही हो।
Question 2. किसी उपग्रह को अपनी कक्षा में चक्कर लगाने के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होती है?
Answer: उपग्रह को अपनी कक्षा में घूमने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अभिकेंद्र बल (वह बल जो किसी वस्तु को वृत्ताकार पथ में रखता है) द्वारा किया गया कार्य हमेशा शून्य होता है। अभिकेंद्र बल हमेशा गति की दिशा के लंबवत लगता है।
In simple words: उपग्रह को घूमने के लिए ऊर्जा की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वृत्ताकार गति में अभिकेंद्र बल कोई काम नहीं करता है।
🎯 Exam Tip: यह ध्यान रखें कि यदि बल गति की दिशा के लंबवत है, तो किया गया कार्य शून्य होता है। यह एक महत्वपूर्ण भौतिकी सिद्धांत है।
Question 4. समुद्र में ज्वार-भाटा क्यों उत्पन्न होता है?
Answer: समुद्र में ज्वार-भाटा (ऊँची और नीची लहरें) मुख्य रूप से चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण उत्पन्न होते हैं। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के समुद्रों के पानी को अपनी ओर खींचता है, जिससे ज्वार-भाटा बनता है।
In simple words: चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण समुद्र में ज्वार-भाटा आता है।
🎯 Exam Tip: ज्वार-भाटा का प्राथमिक कारण हमेशा चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव होता है; सूर्य का प्रभाव भी होता है लेकिन चंद्रमा का अधिक महत्वपूर्ण है।
Question 5. पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी क्यों है?
Answer: पृथ्वी अपनी धुरी पर लगातार घूमती रहती है। इस घूर्णन गति के कारण, विषुवत रेखा (भूमध्य रेखा) पर बाहर की ओर लगने वाले अभिकेंद्रीय बल के प्रभाव से पृथ्वी थोड़ी फैल जाती है, जबकि ध्रुवों पर यह थोड़ी चपटी हो जाती है।
In simple words: पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमने के कारण ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के आकार में घूर्णन का प्रभाव एक सामान्य ज्ञान का प्रश्न है; घूर्णन के कारण विषुवत रेखा पर उभार और ध्रुवों पर चपटापन याद रखें।
Question 6. यदि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में घूमती है। तो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा किया गया कार्य क्या होगा?
Answer: जब पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, तो सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल उसे घूमने के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल प्रदान करता है। यह अभिकेंद्र बल हमेशा पृथ्वी की गति की दिशा के लंबवत लगता है। चूंकि बल और विस्थापन के बीच का कोण 90 डिग्री होता है, इसलिए गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।
In simple words: सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी की गति के लंबवत लगता है, इसलिए सूर्य द्वारा पृथ्वी पर किया गया कार्य शून्य होता है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि जब बल और विस्थापन एक-दूसरे के लंबवत होते हैं, तो किया गया कार्य शून्य होता है। यह भौतिकी का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
Question 7. 1 kg wt. (किग्रा भार) में कितने न्यूटन होते हैं?
Answer: 1 किलोग्राम भार (1 kg wt.) में \( 9.8 \) न्यूटन होते हैं। इसे गुरुत्वीय त्वरण \( g \) के मान से गुणा करके निकाला जाता है, जो लगभग \( 9.8 \text{ मी/से}^2 \) होता है।
\( 1 \text{ kg wt.} = 1 \text{ kg} \times 9.8 \text{ मी/से}^2 = 9.8 \text{ न्यूटन} \)
In simple words: 1 किलोग्राम भार का मतलब 9.8 न्यूटन बल होता है।
🎯 Exam Tip: किलोग्राम भार को न्यूटन में बदलने के लिए हमेशा गुरुत्वीय त्वरण (9.8 मी/से\( ^2 \)) से गुणा करें।
Question 8. पृथ्वी तल से किसी वस्तु के लिये पलायन वेग का मान 11.2 km/s है। जब वस्तु क्षैतिज से 30° पर फेंकी जाये तो पलायन वेग का मान क्या होगा?
Answer: पलायन वेग किसी वस्तु के द्रव्यमान या उसे फेंकने के कोण पर निर्भर नहीं करता है। यह केवल उस ग्रह के द्रव्यमान और त्रिज्या पर निर्भर करता है जिससे वस्तु को पलायन करना है। इसलिए, यदि वस्तु को 30° के कोण पर फेंका जाता है, तो भी पलायन वेग का मान 11.2 किमी/से ही रहेगा।
In simple words: पलायन वेग वस्तु के कोण पर निर्भर नहीं करता, इसलिए 30° पर फेंकने पर भी पलायन वेग 11.2 किमी/से रहेगा।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि पलायन वेग वस्तु के द्रव्यमान या प्रक्षेपण कोण से स्वतंत्र होता है। यह केवल ग्रह के गुणों पर निर्भर करता है।
Question 9. चन्द्रमा पृथ्वी की तुलना में बहुत हल्का है, फिर ये पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण द्वारा गिरती क्यों नहीं?
Answer: चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक स्थिर कक्षा में घूमता है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल चंद्रमा को अपनी ओर खींचता है, लेकिन यह बल चंद्रमा की गति की दिशा के हमेशा लंबवत होता है। यह बल चंद्रमा को पृथ्वी पर गिरने नहीं देता बल्कि उसे कक्षा में बनाए रखता है। इसलिए, गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है और चंद्रमा अपनी कक्षा में घूमता रहता है।
In simple words: पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल चंद्रमा की गति के लंबवत होता है, जिससे चंद्रमा पृथ्वी पर गिरता नहीं बल्कि कक्षा में रहता है।
🎯 Exam Tip: ग्रहों या उपग्रहों की कक्षीय गति में, गुरुत्वाकर्षण बल अभिकेंद्र बल के रूप में कार्य करता है और यह गति के लंबवत होता है, जिससे कार्य शून्य होता है और वे गिरते नहीं।
Question 10. 10 ग्राम सोने का भार ध्रुवों पर भूमध्य रेखा की तुलना में अधिक होता है, क्यों?
Answer: पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है और विषुवत रेखा पर उभरी हुई है। इसका मतलब है कि ध्रुवों पर पृथ्वी के केंद्र से दूरी विषुवत रेखा की तुलना में थोड़ी कम होती है। गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है, यानी केंद्र के जितना करीब होगा, गुरुत्वाकर्षण उतना ही अधिक होगा। इसलिए, ध्रुवों पर गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान विषुवत रेखा से अधिक होता है, जिससे किसी वस्तु का भार ध्रुवों पर अधिक महसूस होता है।
In simple words: ध्रुवों पर पृथ्वी के केंद्र से दूरी कम होती है, इसलिए गुरुत्वाकर्षण बल और भार अधिक होता है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि पृथ्वी की ध्रुवों पर चपटी आकृति गुरुत्वाकर्षण त्वरण \( g \) के मान को प्रभावित करती है, जिससे ध्रुवों पर भार अधिक होता है।
Question 11. भारत द्वारा छोड़े गये प्रथम उपग्रह का नाम बताइये।
Answer: भारत द्वारा छोड़ा गया पहला उपग्रह 'आर्यभट्ट' था, जिसे 19 अप्रैल, 1975 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था। यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।
In simple words: भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट था, जिसे 19 अप्रैल, 1975 को लॉन्च किया गया था।
🎯 Exam Tip: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से संबंधित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और नामों को याद रखें, जैसे कि पहले उपग्रह का नाम और उसकी लॉन्च तिथि।
Question 12. गुरुत्वीय क्षेत्र की विमा लिखिये।
Answer: गुरुत्वीय क्षेत्र की विमा (डाइमेंशन) \( \text{[M}^0\text{LT}^{-2}\text{]} \) होती है। यह गुरुत्वीय त्वरण की विमा के समान है क्योंकि गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता गुरुत्वीय त्वरण के बराबर होती है।
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की विमा लंबाई प्रति समय वर्ग है, यानी \( \text{[M}^0\text{LT}^{-2}\text{]} \).
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की विमा गुरुत्वीय त्वरण की विमा के समान होती है। यह याद रखने से आपको ऐसे प्रश्नों को हल करने में मदद मिलेगी।
RBSE Class 11 Physics Chapter 6 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. भार एवं द्रव्यमान में अन्तर समझाइए।
Answer:
किसी वस्तु का भार (Weight) वह बल होता है जिससे पृथ्वी या कोई अन्य ग्रह उसे अपनी ओर खींचता है। यह गुरुत्वीय त्वरण \( g \) पर निर्भर करता है, इसलिए इसका मान अलग-अलग स्थानों पर बदल सकता है। इसका सूत्र \( W = mg \) है।
वहीं, द्रव्यमान (Mass) वस्तु में मौजूद पदार्थ की कुल मात्रा होती है। यह एक स्थिर राशि है और इसका मान ब्रह्मांड में कहीं भी नहीं बदलता।
In simple words: द्रव्यमान वस्तु में पदार्थ की मात्रा है, जो हमेशा स्थिर रहती है। भार गुरुत्वाकर्षण बल है, जो स्थान के अनुसार बदलता रहता है।
🎯 Exam Tip: द्रव्यमान और भार के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और याद रखें कि द्रव्यमान स्थिर होता है जबकि भार गुरुत्वाकर्षण के कारण बदलता है।
Question 2. यदि पृथ्वी के कक्ष में घूमते हुये उपग्रह का द्रव्यमान किसी कारणवश दो गुना हो जाये तो, इसके आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer: किसी उपग्रह का आवर्तकाल (वह समय जो उसे अपनी कक्षा में एक चक्कर पूरा करने में लगता है) उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
उपग्रह के आवर्तकाल का सूत्र है:
\( T = \frac{2\pi r^{3/2}}{\sqrt{GM}} \)
जहाँ \( T \) आवर्तकाल, \( r \) कक्षा की त्रिज्या, \( G \) गुरुत्वाकर्षण नियतांक और \( M \) ग्रह का द्रव्यमान है।
इस सूत्र में उपग्रह का द्रव्यमान \( m \) कहीं भी नहीं आता है। इसलिए, यदि उपग्रह का द्रव्यमान दो गुना हो भी जाए, तो भी उसके आवर्तकाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
In simple words: उपग्रह का द्रव्यमान दोगुना होने पर भी आवर्तकाल नहीं बदलेगा, क्योंकि आवर्तकाल उपग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
🎯 Exam Tip: आवर्तकाल के सूत्र को ध्यान में रखें और यह समझें कि यह उपग्रह के द्रव्यमान से स्वतंत्र होता है।
Question 3. क्या किसी कृत्रिम उपग्रह को ऐसी कक्षा में स्थापित किया जा सकता है कि वह सदैव राजस्थान की राजधानी जयपुर के ऊपर ही दिखायी देता रहे? स्पष्ट कीजिये।
Answer: नहीं, किसी कृत्रिम उपग्रह को इस तरह से स्थापित नहीं किया जा सकता कि वह हमेशा राजस्थान की राजधानी जयपुर के ऊपर ही दिखाई दे।
भू-स्थिर (Geostationary) उपग्रह वे होते हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर दिखाई देते हैं। इनका आवर्तकाल पृथ्वी के घूर्णन काल (24 घंटे) के बराबर होता है, और वे पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ऊपर एक निश्चित ऊँचाई (लगभग 36,000 किमी) पर चक्कर लगाते हैं।
जयपुर भूमध्य रेखा पर स्थित नहीं है। इसलिए, यदि कोई उपग्रह भूमध्य रेखा से दूर किसी स्थान (जैसे जयपुर) के ऊपर हमेशा स्थिर दिखाई दे, तो उसे उस स्थान के ऊपर रहने के लिए लगातार अपनी कक्षा बदलनी पड़ेगी, जो संभव नहीं है। रॉकेट को कम वेग की आवश्यकता पड़ती है यदि उसे पृथ्वी के घूर्णन की दिशा में (पश्चिम से पूर्व) छोड़ा जाए।
In simple words: नहीं, एक भू-स्थिर उपग्रह केवल भूमध्य रेखा पर स्थिर रह सकता है, और जयपुर भूमध्य रेखा पर नहीं है, इसलिए ऐसा संभव नहीं है।
🎯 Exam Tip: भू-स्थिर उपग्रहों की विशेषताओं (24 घंटे आवर्तकाल, भूमध्य रेखा पर स्थिति) को याद रखें और समझें कि वे क्यों केवल भूमध्य रेखा के ऊपर ही स्थिर दिखते हैं।
Question 5. सरल लोलक पर आधारित घड़ी को यदि पृथ्वी के केन्द्र पर रखें तो इसका आवर्तकाल क्या होगा? क्या घड़ी चलेगी?
Answer: यदि एक सरल लोलक पर आधारित घड़ी को पृथ्वी के केंद्र पर रखा जाए, तो पृथ्वी के केंद्र पर गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान शून्य (0) हो जाता है।
एक सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र है:
\( T = 2\pi\sqrt{\frac{L}{g}} \)
चूँकि यहाँ \( g = 0 \) है, तो सूत्र में \( g \) को शून्य रखने पर आवर्तकाल \( T \) अनंत हो जाएगा। इसका मतलब है कि लोलक कभी एक पूरा दोलन नहीं कर पाएगा, और इस प्रकार, घड़ी नहीं चलेगी।
In simple words: पृथ्वी के केंद्र पर \( g \) शून्य होता है, इसलिए लोलक का आवर्तकाल अनंत हो जाएगा और घड़ी काम नहीं करेगी।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि पृथ्वी के केंद्र पर गुरुत्वाकर्षण त्वरण शून्य होता है, और यह सरल लोलक के आवर्तकाल के सूत्र पर सीधा प्रभाव डालता है।
Question 6. हरित गृह प्रभाव के कारण यदि ध्रुवों की बर्फ पिघले तो पृथ्वी पर दिन अवधि पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer: यदि हरित गृह प्रभाव (ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट) के कारण ध्रुवों की बर्फ पिघलती है, तो पिघला हुआ पानी ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर चला जाएगा। इससे पृथ्वी के द्रव्यमान का वितरण बदल जाएगा, जिससे पृथ्वी का जड़त्व आघूर्ण (Moment of Inertia) बढ़ जाएगा।
कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, यदि बाहरी बल आघूर्ण शून्य हो, तो कोणीय संवेग स्थिर रहता है। कोणीय संवेग \( L = I\omega \) होता है, जहाँ \( I \) जड़त्व आघूर्ण और \( \omega \) कोणीय वेग है।
चूँकि \( I \) बढ़ जाएगा, \( \omega \) को कम होना पड़ेगा ताकि \( L \) स्थिर रहे। कोणीय वेग कम होने का मतलब है कि पृथ्वी के घूमने की गति धीमी हो जाएगी, और इस प्रकार, दिन की अवधि बढ़ जाएगी।
In simple words: बर्फ पिघलने से पृथ्वी का द्रव्यमान भूमध्य रेखा पर फैल जाएगा, जिससे पृथ्वी का घूमना धीमा हो जाएगा और दिन लंबा हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: कोणीय संवेग संरक्षण के सिद्धांत को लागू करके यह समझाएँ कि द्रव्यमान के वितरण में बदलाव से जड़त्व आघूर्ण और कोणीय वेग कैसे प्रभावित होते हैं।
Question 7. भिन्न-भिन्न देश अपनी संचार व्यवस्था के लिये संचार उपग्रह कक्षाओं में स्थापित करते हैं, क्या यह कक्षायें भिन्न होती हैं? समझाइए।
Answer: नहीं, संचार उपग्रहों की कक्षाएँ भिन्न नहीं होती हैं। सभी संचार उपग्रहों को भू-स्थिर (Geostationary) कक्षा में स्थापित किया जाता है।
भू-स्थिर उपग्रह वे होते हैं जिनका आवर्तकाल 24 घंटे होता है, यानी वे पृथ्वी के साथ-साथ घूमते हैं। ये भूमध्य रेखा के ऊपर लगभग 36,000 किमी की ऊँचाई पर स्थित होते हैं।
क्योंकि सभी देशों को संचार के लिए ऐसे उपग्रहों की आवश्यकता होती है जो पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर रहें, ताकि एंटीना को बार-बार समायोजित न करना पड़े, इसलिए सभी देशों के संचार उपग्रहों की कक्षाएँ समान होती हैं।
In simple words: नहीं, सभी संचार उपग्रहों की कक्षाएँ समान होती हैं, क्योंकि उन्हें पृथ्वी के साथ स्थिर रहने के लिए भू-स्थिर कक्षा में 36,000 किमी की ऊँचाई पर भूमध्य रेखा के ऊपर स्थापित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: संचार उपग्रहों की भू-स्थिर प्रकृति और उनकी समान कक्षा की आवश्यकता पर जोर दें।
Question 8. यदि पृथ्वी स्वयं की अक्ष के सापेक्ष घूर्णन बन्द कर दे, तो गुरुत्वीय त्वरण के मान में, विषुवत रेखा व ध्रुवों पर क्या परिवर्तन होगा?
Answer: यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमना बंद कर दे, तो गुरुत्वीय त्वरण \( g \) के मान में विषुवत रेखा और ध्रुवों पर परिवर्तन होगा।
जब पृथ्वी घूर्णन कर रही होती है, तो गुरुत्वीय त्वरण \( g' \) का मान इस प्रकार दिया जाता है:
\( g' = g - R\omega^2 \cos^2 \lambda \)
जहाँ \( R \) पृथ्वी की त्रिज्या, \( \omega \) कोणीय वेग और \( \lambda \) अक्षांश कोण है।
यदि पृथ्वी का घूर्णन बंद हो जाए, तो \( \omega = 0 \) होगा।
इस स्थिति में, \( g' = g \) हो जाएगा।
ध्रुवों पर, \( \lambda = 90^\circ \) होता है, और \( \cos^2 90^\circ = 0 \)। इसलिए, ध्रुवों पर \( g' = g \) रहता है (कोई परिवर्तन नहीं होता)।
विषुवत रेखा पर, \( \lambda = 0^\circ \) होता है, और \( \cos^2 0^\circ = 1 \)। इसलिए, जब पृथ्वी घूमती है, तो विषुवत रेखा पर \( g' = g - R\omega^2 \) होता है। यदि घूर्णन रुक जाए (\( \omega = 0 \)), तो \( g' = g \) हो जाएगा। इसका मतलब है कि विषुवत रेखा पर गुरुत्वीय त्वरण बढ़ जाएगा और ध्रुवों के मान के बराबर हो जाएगा।
In simple words: अगर पृथ्वी घूमना बंद कर दे, तो ध्रुवों पर गुरुत्वाकर्षण त्वरण नहीं बदलेगा, लेकिन विषुवत रेखा पर यह बढ़कर ध्रुवों के बराबर हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय त्वरण पर घूर्णन के प्रभाव के सूत्र को याद रखें और ध्रुवों व विषुवत रेखा पर \( \cos^2 \lambda \) के मानों का उपयोग करके अंतर को समझाएँ।
Question 9. क्या कुछ ऐसे आकाशीय पिंड भी होते हैं, जिनके लिये गुरुत्वीय त्वरण का मान अनंत हो सकता है?
Answer: हाँ, ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं जिनके लिए गुरुत्वीय त्वरण का मान बहुत अधिक, यहाँ तक कि सैद्धांतिक रूप से अनंत भी हो सकता है। ब्लैक होल ऐसे पिंडों के उदाहरण हैं। ब्लैक होल में पदार्थ बहुत छोटे से क्षेत्र में अत्यधिक संकेंद्रित होता है, जिससे उनके गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि कोई भी चीज़, यहाँ तक कि प्रकाश भी, उससे बाहर नहीं निकल सकता।
In simple words: हाँ, ब्लैक होल जैसे पिंडों के लिए गुरुत्वाकर्षण त्वरण अनंत हो सकता है क्योंकि उनमें पदार्थ बहुत छोटे स्थान पर अत्यधिक संकेंद्रित होता है।
🎯 Exam Tip: ब्लैक होल को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल अत्यधिक होता है, यह दर्शाता है कि गुरुत्वीय त्वरण की सीमाएँ होती हैं लेकिन कुछ खगोलीय पिंडों में यह बहुत अधिक हो सकता है।
Question 11. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक का S.I, पद्धति में मात्रक बताइए।
Answer: सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक \( G \) का S.I. पद्धति में मात्रक न्यूटन मीटर\( ^2 \) प्रति किलोग्राम\( ^2 \) है, जिसे \( \text{Nm}^2\text{kg}^{-2} \) लिखा जाता है।
In simple words: सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक \( G \) का S.I. मात्रक न्यूटन मीटर वर्ग प्रति किलोग्राम वर्ग (\( \text{Nm}^2\text{kg}^{-2} \)) होता है।
🎯 Exam Tip: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के सूत्र \( F = \frac{GM_1M_2}{r^2} \) से \( G \) का मात्रक निकालना सीखें: \( G = \frac{Fr^2}{M_1M_2} \)।
Question 12. यदि किसी कारणवश उपग्रह की गतिज ऊर्जा 100 प्रतिशत बढ़ जाये तो उसका क्या व्यवहार होगा?
Answer: उपग्रह की गतिज ऊर्जा \( (K) = \frac{GMm}{2r} \) होती है, जबकि स्थितिज ऊर्जा \( (U) = -\frac{GMm}{r} \) होती है।
यदि गतिज ऊर्जा 100 प्रतिशत बढ़ जाए, तो इसका मतलब है कि गतिज ऊर्जा दोगुनी हो जाएगी।
नई गतिज ऊर्जा \( K' = 2K = 2 \times \frac{GMm}{2r} = \frac{GMm}{r} \)
इस स्थिति में, उपग्रह की कुल ऊर्जा \( E' = K' + U \) होगी:
\( E' = \frac{GMm}{r} + \left(-\frac{GMm}{r}\right) = 0 \)
जब उपग्रह की कुल ऊर्जा शून्य हो जाती है, तो वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाता है। इस स्थिति में उपग्रह पृथ्वी की कक्षा से पलायन कर जाएगा और बाहरी अंतरिक्ष में चला जाएगा।
In simple words: यदि उपग्रह की गतिज ऊर्जा 100% बढ़ जाती है, तो उसकी कुल ऊर्जा शून्य हो जाएगी, और वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में पलायन कर जाएगा।
🎯 Exam Tip: गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा और कुल ऊर्जा के सूत्रों को याद रखें। कुल ऊर्जा का शून्य होना पलायन का संकेत देता है।
RBSE Class 11 Physics Chapter 6 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. किसी उपग्रह की गतिज ऊर्जा तथा बंधन ऊर्जा के सूत्र व्युत्पन्न कीजिए।
Answer:
उपग्रह की ऊर्जा (Energy of Satellite)
ग्रहों के चारों ओर घूमने वाले उपग्रहों में गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा दोनों होती हैं, क्योंकि वे गुरुत्वीय क्षेत्र में होते हुए भी गतिमान रहते हैं। यदि ग्रह का द्रव्यमान \( M \) और उपग्रह का द्रव्यमान \( m \) है, और उपग्रह \( r \) त्रिज्या की कक्षा में घूम रहा है, तो उसका कक्षीय वेग \( v_0 \) इस प्रकार दिया जाता है:
\( v_0 = \sqrt{\frac{GM}{r}} \)
तब उपग्रह की गतिज ऊर्जा \( K \) होगी:
\( K = \frac{1}{2}mv_0^2 = \frac{1}{2}m\left(\frac{GM}{r}\right) = \frac{GMm}{2r} \) ....(2)
यह गतिज ऊर्जा हमेशा धनात्मक होती है।
उपग्रह की स्थितिज ऊर्जा \( U \) इस प्रकार दी जाती है:
\( U = -\frac{GMm}{r} \)
यह स्थितिज ऊर्जा हमेशा ऋणात्मक होती है और इसका परिमाण गतिज ऊर्जा से दोगुना होता है।
उपग्रह की कुल ऊर्जा \( E \) गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग होती है:
\( E = K + U = \frac{GMm}{2r} + \left(-\frac{GMm}{r}\right) = -\frac{GMm}{2r} \) ....(3)
समीकरण (3) से पता चलता है कि उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है। इसका मतलब है कि उपग्रह गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ग्रह से बंधा हुआ है।
बंधन ऊर्जा (Binding Energy)
किसी उपग्रह को उसकी वर्तमान कक्षा से अनंत तक भेजने के लिए (या उसकी कुल ऊर्जा को शून्य करने के लिए) जितनी अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे बंधन ऊर्जा कहते हैं।
दूसरे शब्दों में, ग्रह के चारों ओर घूम रहे उपग्रह या किसी अन्य पिंड को दी गई वह न्यूनतम ऊर्जा जिससे उपग्रह अपनी 'बद्ध' (bound) कक्षा को छोड़कर गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाए, उसे बंधन ऊर्जा कहते हैं।
उपग्रह की कुल ऊर्जा का मान \( = -\frac{GMm}{2r} \) है।
इसलिए, उपग्रह को पलायन कराने के लिए हमें \( +\frac{GMm}{2r} \) ऊर्जा बाहर से देनी होगी, ताकि उसकी कुल ऊर्जा शून्य हो जाए।
अतः बंधन ऊर्जा \( = +\frac{GMm}{2r} \)
In simple words: उपग्रह की गतिज ऊर्जा उसकी गति के कारण होती है \( (\frac{GMm}{2r}) \)। कुल ऊर्जा गतिज और स्थितिज ऊर्जा का योग है \( (-\frac{GMm}{2r}) \)। उपग्रह को गुरुत्वाकर्षण से मुक्त करने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को बंधन ऊर्जा \( (+\frac{GMm}{2r}) \) कहते हैं।
🎯 Exam Tip: गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा और कुल ऊर्जा के लिए सूत्रों को स्पष्ट रूप से लिखें और यह समझाएँ कि बंधन ऊर्जा कुल ऊर्जा को शून्य करने के लिए आवश्यक धनात्मक ऊर्जा है।
Question 2. भारतीय खगोलविदों के योगदान का उल्लेख कीजिये।
Answer: भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसमें कई प्रमुख खगोलविदों और मिशनों का उल्लेख किया जा सकता है।
भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई को माना जाता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 15 अगस्त 1969 को उच्च स्तरीय अंतरिक्ष शोध कार्यों के लिए की गई थी। भारतीय अंतरिक्ष की यात्रा पहले उपग्रह 'आर्यभट्ट' (1975) से लेकर वर्तमान में GSAT-18 जैसे प्रक्षेपणों तक काफी सफल रही है। भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर को 1983 में चंद्रशेखर सीमा के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था।
भारत के कुछ प्रमुख अंतरिक्ष मिशन और उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
1. सन् 1963 में भारत ने थुंबा से अपना पहला रॉकेट प्रक्षेपित किया।
2. 1967 में अहमदाबाद में उपग्रह संचार प्रणाली केंद्र की स्थापना की गई।
3. सन् 1972 में अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग की स्थापना विभिन्न शोध कार्यों के लिए हुई।
4. सन् 1975 में भारत का पहला उपग्रह, आर्यभट्ट, 19 अप्रैल को लॉन्च किया गया।
5. 7 जून, 1979 को भास्कर-1 का प्रक्षेपण किया गया।
6. 18 जुलाई, 1980 को रोहिणी RS-1 का सफल प्रक्षेपण हुआ।
7. 31 मई, 1981 को रोहिणी RS-D1 का प्रक्षेपण हुआ।
8. 20 नवंबर, 1981 को भास्कर-2 का प्रक्षेपण हुआ।
9. सन् 1981 में एप्पल नामक संचार उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया।
10. 10 अप्रैल, 1982 को INSAT-1A (INDIAN NATIONAL SATELLITE) का प्रक्षेपण किया गया, और 17 अप्रैल, 1982 को रोहिणी RS-D2 का प्रक्षेपण हुआ।
11. 30 अगस्त 1983 को INSAT-1B को छोड़ा गया।
12. सन् 1984 में भारत के राकेश शर्मा पहले अंतरिक्ष यात्री बने।
13. 1988 में भारत का पहला दूरसंवेदी उपग्रह का प्रक्षेपण हुआ।
14. 12 जून, 1990 को INSAT-1D का सफल प्रक्षेपण हुआ।
15. 10 जुलाई, 1992 को INSAT-2A का प्रक्षेपण हुआ।
16. 23 जुलाई, 1993 को INSAT-2B का प्रक्षेपण हुआ।
17. 7 दिसंबर, 1995 को INSAT-2C का प्रक्षेपण हुआ।
18. 4 जून, 1997 को INSAT-2D प्रक्षेपण के समय खराब हो गया था, लेकिन 29 सितंबर को IRS-1D का सफल प्रक्षेपण रहा।
19. 2001 में GSLV-D1 का आंशिक सफल प्रक्षेपण रहा।
20. 10 अप्रैल, 2003 को INSAT-3A का प्रक्षेपण हुआ।
21. 2004 में GSLV-EDUSAT का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण रहा।
22. 22 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान-1 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण हुआ।
23. 5 नवंबर 2013 को मंगलयान का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण हुआ।
24. मंगलयान (प्रक्षेपण के 298 दिन बाद) मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हुआ।
IRNSS-1G, 22 जून, 2016 को कार्टोसेट-2C; 8 सितंबर, 2016 को INSAT-3DR; 26 सितंबर, 2016 को स्केटसेट-1, 5 अक्टूबर, 2016 को GSAT-18; 15 फरवरी, 2017 को कार्टोसेट-2D का भी सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया।
सदी की महानतम उपलब्धि - चंद्रयान-1
चंद्रयान-1 को 22 अक्टूबर 2008 को चंद्रमा पर भेजा गया था। इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C11 द्वारा प्रक्षेपित किया गया। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी की उपस्थिति का पता लगाकर एक महत्वपूर्ण खोज की थी। ISRO के अनुसार, चंद्रमा पर पानी खनिजों और चट्टानों की सतह पर मौजूद है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा पर पानी और हीलियम गैस की खोज करना था। इस उपलब्धि के लिए भारत विश्व का छठा देश बन गया। कक्षा से संपर्क टूटने के बाद इसे बंद कर दिया गया।
मंगलयान
मंगलयान को सन् 2014 के सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों में शामिल किया गया था। मंगलयान की सफलता अपने पहले ही प्रयास में एक अद्वितीय उपलब्धि थी, जिसने भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा को पूरी दुनिया में स्थापित किया। मंगलयान (Mars Orbiter Mission - MOM) को 5 नवंबर 2013 को ISRO द्वारा श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। 24 सितंबर 2014 को भारत मंगल ग्रह पर पहुँचने वाला पहला ऐसा देश था जिसने अपने पहले प्रयास में ही सफलता हासिल की थी। यह भारतीय वैज्ञानिकों और खगोलविदों की एक उत्कृष्ट उपलब्धि मानी जाती है।
मंगलयान के उद्देश्य
- मीथेन गैस की उपस्थिति से मंगल पर जीवन की संभावना का पता लगाना।
- मंगल की सतह की संरचना और खनिजों की जानकारी प्राप्त करना।
- ऊपरी वातावरण में ड्यूटीरियम (भारी हाइड्रोजन) और हाइड्रोजन की मात्रा का अध्ययन करना।
In simple words: भारत ने डॉ. विक्रम साराभाई और ISRO के नेतृत्व में अंतरिक्ष में कई उपग्रह और मिशन (जैसे आर्यभट्ट, चंद्रयान-1, मंगलयान) भेजे हैं, जिससे दुनिया में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की स्थिति मजबूत हुई है।
🎯 Exam Tip: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख व्यक्तियों, मिशनों (उनके उद्देश्यों और तिथियों के साथ), और महत्वपूर्ण उपलब्धियों (जैसे चंद्रमा पर पानी की खोज) को विस्तार से याद रखें।
Question 3. कक्षीय वेग तथा पलायन वेग से क्या अभिप्राय है? इनके लिये सूत्र स्थापित कर सम्बन्ध बताइये।
Answer:
पलायन वेग (Escape Velocity): पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी वस्तु को ऊपर की ओर फेंकने पर वह किसी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से हमेशा के लिए बाहर निकल जाती है और कभी उस ग्रह पर वापस नहीं आती है।
(i) पृथ्वी की सतह से पलायन वेग के लिए सूत्र का व्युत्पन्न:
माना \( m \) द्रव्यमान वाली किसी वस्तु का पलायन वेग \( v_e \) है। जब वस्तु पृथ्वी की सतह पर होती है, तो उसकी गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा होती है।
पृथ्वी की सतह पर गतिज ऊर्जा \( K = \frac{1}{2}mv_e^2 \)
पृथ्वी की सतह पर स्थितिज ऊर्जा \( U = -\frac{GMm}{R} \)
कुल ऊर्जा \( E = K + U \)
\( E = \frac{1}{2}mv_e^2 - \frac{GMm}{R} \) .....(1)
अनंत दूरी पर, वस्तु की कुल ऊर्जा शून्य होती है \( (E = 0) \)।
इसलिए, समीकरण (1) से:
\( 0 = \frac{1}{2}mv_e^2 - \frac{GMm}{R} \)
\( \frac{1}{2}mv_e^2 = \frac{GMm}{R} \)
\( v_e^2 = \frac{2GM}{R} \)
\( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R}} \) .....(2)
हम जानते हैं कि \( GM = gR^2 \) (जहाँ \( g \) गुरुत्वीय त्वरण है)
\( v_e = \sqrt{\frac{2gR^2}{R}} = \sqrt{2gR} \) .....(3)
पृथ्वी के लिए, \( g = 9.8 \text{ मी/से}^2 \) और \( R = 6400 \text{ किमी} = 6.4 \times 10^6 \text{ मी} \)
समीकरण (3) में मान रखने पर:
\( v_e = \sqrt{2 \times 9.8 \times 6.4 \times 10^6} \)
\( v_e = \sqrt{125.44 \times 10^6} \)
\( v_e \approx 11.2 \times 10^3 \text{ मी/से} = 11.2 \text{ किमी/से} \)
इसका मतलब है कि पृथ्वी की सतह से किसी वस्तु को 11.2 किमी/सेकंड के वेग से फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से हमेशा के लिए पलायन कर जाएगी। यह पलायन वेग वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
चंद्रमा के लिए पलायन वेग का मान:
चंद्रमा का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग \( \frac{1}{80} \) गुना और त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या का लगभग \( \frac{1}{4} \) गुना है।
चंद्रमा का \( g \) पृथ्वी के \( g \) का लगभग \( \frac{1}{6} \) गुना है।
\( v_e = \sqrt{2gR} \) का उपयोग करके, चंद्रमा के लिए पलायन वेग लगभग \( 2.38 \text{ किमी/से} \) आता है, जो पृथ्वी की तुलना में लगभग \( \frac{1}{5} \) गुना है।
(ii) पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई पर स्थित वस्तु को पलायन कराने के लिए वेग:
यदि वस्तु पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई पर हो, तो पृथ्वी के केंद्र से उसकी दूरी \( R+h \) होगी।
इस स्थिति में कुल ऊर्जा समीकरण (1) के समान होगी, बस \( R \) को \( (R+h) \) से बदल देंगे:
\( E = \frac{1}{2}mv_e^2 - \frac{GMm}{R+h} \)
अनंत पर कुल ऊर्जा शून्य \( (E=0) \) होगी, इसलिए:
\( 0 = \frac{1}{2}mv_e^2 - \frac{GMm}{R+h} \)
\( v_e^2 = \frac{2GM}{R+h} \)
\( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R+h}} \) .....(2)
इस समीकरण से स्पष्ट है कि ऊँचाई बढ़ने के साथ पलायन वेग का मान कम होता जाएगा।
\( GM = gR^2 \) रखने पर:
\( v_e = \sqrt{\frac{2gR^2}{R+h}} \)
यदि \( h = R \) (पृथ्वी की त्रिज्या के बराबर ऊँचाई)
\( v_e = \sqrt{\frac{2gR^2}{R+R}} = \sqrt{\frac{2gR^2}{2R}} = \sqrt{gR} \)
\( v_e = \sqrt{9.8 \times 6.4 \times 10^6} \approx 7.92 \text{ किमी/से} \approx 8 \text{ किमी/से} \)
इस स्थिति में पलायन वेग पृथ्वी तल के निकट परिक्रमण करने वाले उपग्रह के कक्षीय वेग के समान होगा।
कक्षीय वेग (Orbital Velocity): कक्षीय वेग वह न्यूनतम वेग है जो किसी वस्तु को किसी ग्रह के चारों ओर एक स्थिर कक्षा में बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है।
कक्षीय वेग \( v_0 \) और पलायन वेग \( v_e \) के बीच संबंध:
हमने देखा कि \( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R}} \) और कक्षीय वेग \( v_0 = \sqrt{\frac{GM}{R}} \)
इससे स्पष्ट है कि \( v_e = \sqrt{2}v_0 \)
अर्थात्, पलायन वेग कक्षीय वेग का \( \sqrt{2} \) गुना होता है।
यदि किसी कारणवश उपग्रह का कक्षीय वेग \( \sqrt{2} \) गुना कर दिया जाए, तो वह अपनी कक्षा से पलायन कर जाएगा। यदि कक्षीय वेग 5 गुना करने पर उपग्रह कक्षा से पलायन कर जाएगा।
In simple words: पलायन वेग वह गति है जिससे कोई वस्तु गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल जाए। कक्षीय वेग वह गति है जिससे वस्तु ग्रह के चारों ओर कक्षा में बनी रहे। पलायन वेग कक्षीय वेग का \( \sqrt{2} \) गुना होता है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग और कक्षीय वेग की परिभाषाएँ, उनके सूत्र और उनके बीच के संबंध \( v_e = \sqrt{2}v_0 \) को याद रखें। प्रत्येक सूत्र के व्युत्पन्न के चरणों को स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 4. g तथा G के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
Answer:
गुरुत्वीय त्वरण (g): जब कोई वस्तु मुक्त रूप से ऊपर से गिरती है, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी गति बढ़ती जाती है। इस बढ़ती हुई गति को गुरुत्वीय त्वरण 'g' कहते हैं। यह त्वरण वस्तु के आकार या द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। गुरुत्वीय त्वरण उस बल के बराबर होता है जिससे ग्रह एकांक द्रव्यमान की वस्तु को अपने केंद्र की ओर आकर्षित करता है। इसका मात्रक मीटर प्रति सेकंड वर्ग (\( \text{मी/से}^2 \)) या न्यूटन प्रति किलोग्राम (\( \text{न्यूटन/किग्रा} \)) है।
नीचे दिया गया चित्र पृथ्वी और उस पर रखी वस्तु के बीच गुरुत्वाकर्षण बल को दर्शाता है:
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल \( F = \frac{GMm}{r^2} \) के अनुसार, मुक्त रूप से गिरती वस्तु के वेग में प्रति सेकंड होने वाली वृद्धि को गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं।
गुरुत्वीय त्वरण \( = \frac{\text{गुरुत्वीय बल}}{\text{गुरुत्वीय द्रव्यमान}} \)
\( g = \frac{F}{m} \)
हम जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण बल \( F = \frac{GMm}{R^2} \) होता है, जहाँ \( M \) पृथ्वी का द्रव्यमान, \( m \) वस्तु का द्रव्यमान और \( R \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
इसलिए, \( g = \frac{\left(\frac{GMm}{R^2}\right)}{m} = \frac{GM}{R^2} \) .....(1)
यदि पृथ्वी को एक गोला माना जाए जिसका औसत घनत्व \( \rho \) हो, तो पृथ्वी का द्रव्यमान \( M = \frac{4}{3}\pi R^3 \rho \) होगा।
इस मान को समीकरण (1) में रखने पर:
\( g = \frac{G \left(\frac{4}{3}\pi R^3 \rho\right)}{R^2} \)
\( g = \frac{4}{3}\pi R G \rho \) .....(3)
यह समीकरण (1) से (3) गुरुत्वीय त्वरण \( g \) और सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक \( G \) के बीच के संबंध को दर्शाते हैं।
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण (\( g \)) वह गति है जिससे वस्तु गुरुत्वाकर्षण से नीचे गिरती है। इसका सूत्र \( g = \frac{GM}{R^2} \) है, जहाँ \( G \) सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक है, \( M \) पृथ्वी का द्रव्यमान और \( R \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय त्वरण \( g \) की परिभाषा, उसके मात्रक और \( g \) व \( G \) के बीच संबंध के लिए व्युत्पत्ति को याद रखें। चित्र को भी स्पष्ट रूप से बनाना महत्वपूर्ण है।
Question 5. सिद्ध कीजिए कि पृथ्वी तल के समीप घूमते हुये उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग 8 km/s होता है।
Answer:
किसी उपग्रह को पृथ्वी तल के समीप एक वृत्ताकार कक्षा में घूमने के लिए आवश्यक वेग को कक्षीय वेग कहते हैं। हमें यह सिद्ध करना है कि यह वेग लगभग 8 किमी/से होता है।
माना \( m \) द्रव्यमान का एक उपग्रह \( R \) त्रिज्या वाली पृथ्वी की सतह के बहुत करीब \( h \) ऊँचाई पर घूम रहा है, जहाँ \( h \) पृथ्वी की त्रिज्या \( R \) की तुलना में बहुत कम है (यानी \( h \approx 0 \))। इस स्थिति में, पृथ्वी के केंद्र से उपग्रह की दूरी लगभग \( R \) ही होगी।
उपग्रह को कक्षा में बनाए रखने के लिए, आवश्यक अभिकेंद्र बल पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा प्रदान किया जाता है:
\( \frac{mv_0^2}{R} = \frac{GMm}{R^2} \)
जहाँ \( v_0 \) कक्षीय वेग, \( M \) पृथ्वी का द्रव्यमान, \( G \) गुरुत्वाकर्षण नियतांक और \( R \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
उपरोक्त समीकरण को हल करने पर:
\( v_0^2 = \frac{GM}{R} \)
\( v_0 = \sqrt{\frac{GM}{R}} \)
हम जानते हैं कि \( GM = gR^2 \) (जहाँ \( g \) गुरुत्वीय त्वरण है)
इसलिए, \( v_0 = \sqrt{\frac{gR^2}{R}} = \sqrt{gR} \)
पृथ्वी के लिए \( g = 9.8 \text{ मी/से}^2 \) और \( R = 6400 \text{ किमी} = 6.4 \times 10^6 \text{ मी} \)
मान रखने पर:
\( v_0 = \sqrt{9.8 \times 6.4 \times 10^6} \)
\( v_0 = \sqrt{62.72 \times 10^6} \)
\( v_0 \approx 7.92 \times 10^3 \text{ मी/से} \)
\( v_0 \approx 7.92 \text{ किमी/से} \)
जो कि लगभग 8 किमी/से के बराबर है।
इस प्रकार, यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी तल के समीप घूमने वाले उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग 8 किमी/से होता है।
In simple words: पृथ्वी के पास उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग 8 किमी/से होता है। यह वेग उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में स्थिर कक्षा में बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
🎯 Exam Tip: कक्षीय वेग के सूत्र \( v_0 = \sqrt{gR} \) को याद रखें और \( g \) व \( R \) के मानक मानों का उपयोग करके गणना करें। यह भी ध्यान दें कि यह सूत्र पृथ्वी के सतह के पास के उपग्रहों के लिए है।
Question 6. भूस्थायी उपग्रह की पृथ्वी तल से ऊँचाई की गणना कीजिए। इसको संचार के रूप में कैसे उपयोग करते हैं?
Answer:
भूस्थायी उपग्रह (Geostationary Satellite): ऐसा उपग्रह जिसका आवर्तकाल (एक चक्कर पूरा करने का समय) पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के आवर्तकाल (24 घंटे) के बराबर होता है, और जो पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर दिखाई देता है, भूस्थायी उपग्रह कहलाता है। यह उपग्रह पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ऊपर एक निश्चित ऊँचाई पर स्थित होता है। इसे तुल्यकालिक उपग्रह भी कहते हैं।
पृथ्वी तल से ऊँचाई की गणना:
भूस्थायी उपग्रह के लिए आवर्तकाल \( T = 24 \) घंटे \( = 24 \times 3600 \) सेकंड \( = 86400 \) सेकंड।
गुरुत्वीय त्वरण \( g = 9.8 \text{ मी/से}^2 \)
पृथ्वी की त्रिज्या \( R = 6.4 \times 10^6 \text{ मी} \)
उपग्रह की कक्षा की त्रिज्या \( r \) के लिए केप्लर का तीसरा नियम उपयोग करते हैं:
\( T^2 = \frac{4\pi^2 r^3}{GM} \)
हम जानते हैं \( GM = gR^2 \)
\( T^2 = \frac{4\pi^2 r^3}{gR^2} \)
अब, \( r^3 = \frac{T^2 gR^2}{4\pi^2} \)
\( r = \left(\frac{T^2 gR^2}{4\pi^2}\right)^{1/3} \)
मान रखने पर:
\( r = \left(\frac{(86400)^2 \times 9.8 \times (6.4 \times 10^6)^2}{4 \times (3.14)^2}\right)^{1/3} \)
\( r = \left(\frac{7.46 \times 10^9 \times 9.8 \times 40.96 \times 10^{12}}{4 \times 9.86}\right)^{1/3} \)
\( r \approx 4.23 \times 10^7 \text{ मी} = 42300 \text{ किमी} \)
यह \( r \) पृथ्वी के केंद्र से उपग्रह की दूरी है।
उपग्रह की पृथ्वी तल से ऊँचाई \( h = r - R \)
\( h = 42300 \text{ किमी} - 6400 \text{ किमी} = 35900 \text{ किमी} \approx 36000 \text{ किमी} \)
अतः भूस्थायी उपग्रह की पृथ्वी तल से ऊँचाई लगभग 36,000 किमी होती है।
संचार के रूप में उपयोग:
भूस्थायी उपग्रहों का उपयोग मुख्य रूप से दूरसंचार कार्यक्रमों के प्रसारण, रेडियो और टेलीविजन संवादों, उल्कापिंडों के अध्ययन और मौसम संबंधी जानकारी प्राप्त करने में होता है। चूंकि ये उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर दिखाई देते हैं, इसलिए जमीन पर लगे एंटीना को उन्हें ट्रैक करने के लिए बार-बार घुमाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ये दुनिया भर में संचार नेटवर्क के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: भूस्थायी उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर रहते हैं, जिनकी ऊँचाई पृथ्वी की सतह से लगभग 36,000 किमी होती है। इनका उपयोग टीवी, रेडियो, फोन और मौसम की जानकारी जैसे संचार के लिए होता है।
🎯 Exam Tip: भूस्थायी उपग्रहों की परिभाषा, उनकी ऊँचाई की गणना के लिए केप्लर के नियमों का उपयोग और उनके विभिन्न संचार अनुप्रयोगों को विस्तार से समझाएँ।
Question 7. पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता को (1) ऊँचाई के साथ (2) गहराई के साथ (3) पृथ्वी के घूर्णन के कारण समझाइये।
Answer: गुरुत्वीय त्वरण \( (g) \) का मान ऊँचाई, गहराई और पृथ्वी के घूर्णन के कारण अलग-अलग जगहों पर भिन्न होता है। जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाते हैं, \( 'g' \) का मान बदलता है।
(1) **पृथ्वी तल के ऊपर जाने पर \( g \) के मान में परिवर्तन:**
पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान \( g = \frac{\mathrm{GM}}{\mathrm{R}^{2}} \) होता है।
जब हम पृथ्वी की सतह से \( h \) ऊँचाई पर जाते हैं, तो गुरुत्वीय त्वरण \( g_h \) का मान हो जाता है:
\( g_h = \frac{\mathrm{GM}}{(\mathrm{R}+h)^{2}} \)
यहां \( \mathrm{M} \) पृथ्वी का द्रव्यमान और \( \mathrm{R} \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
इस समीकरण को सरल करने पर हमें मिलता है:
\( g_h = g \left(1+\frac{h}{R}\right)^{-2} \)
यदि ऊँचाई \( h \) पृथ्वी की त्रिज्या \( \mathrm{R} \) से बहुत कम हो \( (h \ll R) \), तो द्विपद प्रमेय का उपयोग करके हम इसे लगभग लिख सकते हैं:
\( g_h \approx g \left(1-\frac{2h}{R}\right) \)
इसका मतलब है कि जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह से ऊपर जाते हैं, गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान घटता जाता है।
(2) **पृथ्वी तल के भीतर \( h' \) गहराई पर \( g \) का मान:**
पृथ्वी के भीतर \( h' \) गहराई पर गुरुत्वीय त्वरण \( g_{h'} \) का मान होता है:
\( g_{h'} = G \left(\frac{4}{3}\right) \pi \rho (R-h') \)
यहां \( \rho \) पृथ्वी का माध्य घनत्व है।
इसे पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण \( g = G \left(\frac{4}{3}\right) \pi \rho R \) के साथ तुलना करने पर:
\( g_{h'} = g \left(1-\frac{h'}{R}\right) \)
इससे पता चलता है कि जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह के भीतर गहराई में जाते हैं, गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान घटता जाता है। पृथ्वी के केंद्र पर \( (h' = R) \), गुरुत्वीय त्वरण \( g_{h'} = 0 \) होता है।
(3) **पृथ्वी के घूर्णन के कारण \( g \) के मान में परिवर्तन:**
पृथ्वी के आकार के कारण \( g \) का मान विभिन्न होता है। पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है। इसका मतलब है कि विषुवतीय त्रिज्या \( (R_e) \) ध्रुवीय त्रिज्या \( (R_p) \) से अधिक होती है।
घूर्णन के कारण गुरुत्वीय त्वरण \( g' \) का मान अक्षांश \( \lambda \) पर निम्न सूत्र से दिया जाता है:
\( g' = g - R \omega^2 \cos^2 \lambda \)
यहां \( \omega \) पृथ्वी का कोणीय वेग है।
ध्रुवों पर \( (\lambda = 90^\circ) \), \( \cos^2 \lambda = 0 \) होता है, इसलिए \( g' = g \)। ध्रुवों पर \( g \) का मान अधिकतम होता है और घूर्णन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
विषुवत रेखा पर \( (\lambda = 0^\circ) \), \( \cos^2 \lambda = 1 \) होता है, इसलिए \( g' = g - R \omega^2 \)। विषुवत रेखा पर \( g \) का मान न्यूनतम होता है क्योंकि यहाँ घूर्णन का प्रभाव सबसे अधिक होता है।
In simple words: पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण की ताकत जगह-जगह बदलती रहती है। जैसे-जैसे हम ऊपर या गहराई में जाते हैं, यह कम होती जाती है। पृथ्वी के घूमने के कारण भी ध्रुवों की तुलना में भूमध्य रेखा पर गुरुत्वाकर्षण थोड़ा कम होता है।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में, गुरुत्वीय त्वरण की ऊँचाई, गहराई और अक्षांशीय भिन्नता के लिए सही सूत्रों को याद रखना और उनका उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
Question 8. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा को परिभाषित कीजिये। किसी पिंड को पृथ्वी तल से h ऊँचाई तक भेजने में स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन की गणना करो। जब h << R हो तो स्थितिज ऊर्जा परिवर्तन बताओ।
Answer: **गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा:** किसी वस्तु को अनंत से गुरुत्वीय क्षेत्र के भीतर किसी बिंदु तक लाने में जितना कार्य करना पड़ता है, उसे उस बिंदु पर वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। यह एक अदिश राशि है और हमेशा ऋणात्मक होती है। अनंत पर इसका मान शून्य माना जाता है।
\[ U = -\frac{\mathrm{GM} m}{r} \]
यहाँ \( \mathrm{G} \) गुरुत्वाकर्षण नियतांक, \( \mathrm{M} \) ग्रह का द्रव्यमान, \( m \) वस्तु का द्रव्यमान और \( r \) केंद्र से दूरी है।
यदि पिंड पृथ्वी की सतह पर है, तो \( r = R \), इसलिए स्थितिज ऊर्जा \( U_R = -\frac{\mathrm{GM} m}{R} \)
**पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई तक भेजने में स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन:**
पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई तक वस्तु को ले जाने में किया गया कार्य, उसकी स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन \( (\Delta U) \) के बराबर होता है।
\( \Delta U = U_h - U_R \)
\( U_h = -\frac{\mathrm{GM} m}{(R+h)} \) (जहाँ \( R+h \) पृथ्वी के केंद्र से वस्तु की दूरी है)
\( \Delta U = -\frac{\mathrm{GM} m}{(R+h)} - \left(-\frac{\mathrm{GM} m}{R}\right) \)
\( \Delta U = \mathrm{GM} m \left(\frac{1}{R} - \frac{1}{R+h}\right) \)
\( \Delta U = \mathrm{GM} m \left(\frac{R+h-R}{R(R+h)}\right) \)
\( \Delta U = \frac{\mathrm{GM} m h}{R(R+h)} \)
क्योंकि \( \mathrm{GM} = gR^2 \) (गुरुत्वीय त्वरण के संबंध से), हम इसे ऐसे लिख सकते हैं:
\( \Delta U = \frac{gR^2 m h}{R(R+h)} \)
\( \Delta U = \frac{m g h}{\left(1+\frac{h}{R}\right)} \)
**विशेष स्थिति:** जब \( h \ll R \) (ऊँचाई पृथ्वी की त्रिज्या से बहुत कम हो), तो \( \frac{h}{R} \) को नगण्य माना जा सकता है।
तब, \( \Delta U \approx \frac{m g h}{1} = m g h \)
In simple words: गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा वह काम है जो किसी चीज़ को अनंत दूरी से किसी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के अंदर लाने में लगता है। जब हम किसी वस्तु को पृथ्वी से थोड़ी ऊँचाई पर उठाते हैं, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा \( mgh \) के बराबर बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसकी परिभाषा को सटीक रूप से याद रखें और \( \Delta U \) के सूत्र को व्युत्पन्न करने की प्रक्रिया को समझें, विशेषकर \( h \ll R \) वाली स्थिति के लिए।
Question 9. केप्लर ने ग्रह की गति सम्बन्धी निम्न नियम दिये।
Answer: केप्लर ने ग्रहों की गति के संबंध में तीन महत्वपूर्ण नियम दिए, जो इस प्रकार हैं:
**प्रथम नियम (कक्षाओं का नियम):** प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में परिक्रमण करता है, और सूर्य इस दीर्घवृत्त के एक फोकस पर स्थित होता है। इसका मतलब है कि ग्रह की कक्षा गोल नहीं होती, बल्कि थोड़ी खींची हुई होती है।
**द्वितीय नियम (क्षेत्रीय वेग का नियम):** ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली काल्पनिक रेखा समान समय-अंतराल में समान क्षेत्रफल पार करती है। इसका अर्थ है कि ग्रह का क्षेत्रीय वेग (क्षेत्रफल कवर करने की दर) नियत रहता है। जब ग्रह सूर्य के करीब होता है तो वह तेजी से चलता है, और जब दूर होता है तो धीमे चलता है ताकि समान समय में समान क्षेत्रफल कवर हो सके।
\[ \frac{d \mathbf{A}}{d t} = \text{नियतांक} \]
यह नियम कोणीय संवेग के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। यदि ग्रह का द्रव्यमान \( m \) और उसका कोणीय संवेग \( \mathbf{L} \) है, तो क्षेत्रीय वेग \( \frac{d \mathbf{A}}{d t} = \frac{\mathbf{L}}{2m} \) होता है, जो कि एक नियतांक है।
**तृतीय नियम (आवर्तकाल का नियम):** किसी भी ग्रह के परिक्रमण काल \( (T) \) का वर्ग उसकी दीर्घवृत्ताकार कक्षा की अर्ध-दीर्घ अक्ष \( (a) \) के घन के समानुपाती होता है।
\( T^2 \propto a^3 \)
इसका मतलब है कि जो ग्रह सूर्य से जितनी दूर होगा, उसे सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में उतना ही अधिक समय लगेगा।
In simple words: केप्लर ने बताया कि ग्रह सूर्य के चारों ओर गोल नहीं, बल्कि अंडे के आकार की कक्षा में घूमते हैं। जब ग्रह सूर्य के करीब होते हैं तो तेज चलते हैं, और दूर होते हैं तो धीरे। और जो ग्रह सूर्य से ज्यादा दूर होते हैं, उन्हें चक्कर लगाने में भी ज्यादा समय लगता है।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीनों नियम गुरुत्वाकर्षण और ग्रहों की गति को समझने के लिए मौलिक हैं। इन्हें स्पष्ट और क्रमबद्ध तरीके से याद करें, खासकर द्वितीय नियम का 'क्षेत्रफल' संबंधी विवरण।
Question 10. अन्तरिक्ष में भारहीनता को स्पष्ट कीजिए।
Answer: भारहीनता का अनुभव तब होता है जब किसी वस्तु पर लगने वाला प्रतिक्रिया बल शून्य हो जाता है। इसका मतलब है कि कोई वस्तु खुद को सहारा देने के लिए किसी सतह पर बल नहीं लगा रही है। अंतरिक्ष में, विशेषकर कृत्रिम उपग्रहों में, यह स्थिति देखी जाती है। जब कोई उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर एक निश्चित त्रिज्या की कक्षा में घूमता है, तो उसे आवश्यक अभिकेन्द्र बल पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से मिलता है।
मान लीजिए एक उपग्रह में रखी वस्तु पर दो बल कार्य करते हैं:
1. पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल \( (F = \frac{\mathrm{GM}m}{r^2}) \), जो पृथ्वी के केंद्र की ओर लगता है।
2. उपग्रह के तल की प्रतिक्रिया बल \( (R) \), जो केंद्र से बाहर की ओर लगता है।
इन दोनों बलों का परिणामी बल ही वस्तु को अभिकेन्द्र बल प्रदान करता है, ताकि वह कक्षा में घूम सके।
\( \frac{\mathrm{GM}m}{r^2} - R = \frac{m v^2}{r} \)
यदि वस्तु उपग्रह की सतह पर है और उपग्रह मुक्त रूप से गिर रहा है, तो प्रतिक्रिया बल \( R = 0 \) हो जाता है।
इसलिए, वस्तु भारहीनता की स्थिति में होती है, क्योंकि उसे अपने वजन का अनुभव कराने वाला कोई प्रतिक्रिया बल नहीं होता।
In simple words: भारहीनता तब महसूस होती है जब किसी चीज़ को सहारा देने वाला कोई बल न हो। अंतरिक्ष में, उपग्रहों में चीजें तैरती रहती हैं क्योंकि उन पर लगने वाला प्रतिक्रिया बल शून्य हो जाता है, जिससे वे अपना वजन महसूस नहीं करतीं।
🎯 Exam Tip: भारहीनता की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए प्रतिक्रिया बल के शून्य होने की स्थिति को समझाना महत्वपूर्ण है। कृत्रिम उपग्रह का उदाहरण देना इसे समझने में मदद करता है।
Question 11. प्रक्षेपण वेग के लिये सूत्र प्रतिपादित कीजिए।
Answer: प्रक्षेपण वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से सीधा ऊपर की ओर फेंका जाता है, ताकि वह एक निश्चित ऊँचाई तक पहुँचे। इसे उस वेग के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है जो वस्तु को उसकी कक्षा में स्थापित करने के लिए आवश्यक है।
जब किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से \( h \) ऊँचाई तक \( v \) वेग से प्रक्षेपित किया जाता है, तो इसकी कुल यांत्रिक ऊर्जा (गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) संरक्षित रहती है।
पृथ्वी की सतह पर वस्तु की गतिज ऊर्जा \( (K) = \frac{1}{2}mv^2 \) और स्थितिज ऊर्जा \( (U) = -\frac{\mathrm{GM}m}{R} \) है।
तो, कुल ऊर्जा \( E = K + U = \frac{1}{2}mv^2 - \frac{\mathrm{GM}m}{R} \)
अधिकतम ऊँचाई \( h \) पर, वस्तु का वेग शून्य हो जाता है \( (v_f = 0) \), इसलिए गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है। स्थितिज ऊर्जा \( U_f = -\frac{\mathrm{GM}m}{R+h} \) हो जाती है।
ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से:
प्रारंभिक कुल ऊर्जा = अंतिम कुल ऊर्जा
\( \frac{1}{2}mv^2 - \frac{\mathrm{GM}m}{R} = 0 - \frac{\mathrm{GM}m}{R+h} \)
\( \frac{1}{2}mv^2 = \mathrm{GM}m \left(\frac{1}{R} - \frac{1}{R+h}\right) \)
\( \frac{1}{2}mv^2 = \mathrm{GM}m \left(\frac{R+h-R}{R(R+h)}\right) \)
\( \frac{1}{2}mv^2 = \frac{\mathrm{GM}m h}{R(R+h)} \)
\( v^2 = \frac{2\mathrm{GM}h}{R(R+h)} \)
\( v = \sqrt{\frac{2\mathrm{GM}h}{R(R+h)}} \)
क्योंकि \( \mathrm{GM} = gR^2 \), हम इसे ऐसे भी लिख सकते हैं:
\( v = \sqrt{\frac{2gR^2 h}{R(R+h)}} \)
\( v = \sqrt{\frac{2gR h}{(R+h)}} \)
यह प्रक्षेपण वेग का सूत्र है।
In simple words: प्रक्षेपण वेग वह रफ्तार है जिससे किसी चीज़ को पृथ्वी से फेंका जाता है ताकि वह एक खास ऊँचाई तक पहुँच सके। यह वेग पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और फेंकी गई ऊँचाई पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: प्रक्षेपण वेग के सूत्र को व्युत्पन्न करते समय ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत का उपयोग करें। ध्यान दें कि अधिकतम ऊँचाई पर वस्तु की गतिज ऊर्जा शून्य होती है।
Question 12. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम को लिखिये। इसे सदिश रूप में व्यक्त कीजिये तथा दर्शाइये कि इसमें क्रियाप्रतिक्रिया नियम का पालन होता है।
Answer: **न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम:**
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार, ब्रह्मांड में प्रत्येक दो कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। यह आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती होता है और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह बल दोनों कणों को मिलाने वाली सीधी रेखा के अनुदिश कार्य करता है।
यदि \( m_1 \) और \( m_2 \) दो कणों के द्रव्यमान हैं और \( r \) उनके बीच की दूरी है, तो उनके बीच गुरुत्वाकर्षण बल \( F \) निम्न प्रकार से दिया जाता है:
\( F = G \frac{m_1 m_2}{r^2} \)
जहाँ \( G \) एक सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक है, जिसका मान \( 6.67 \times 10^{-11} \mathrm{Nm}^2/\mathrm{kg}^2 \) होता है।
**सदिश रूप में गुरुत्वाकर्षण नियम:**
मान लीजिए \( m_1 \) और \( m_2 \) दो कण हैं, जिनके स्थिति सदिश क्रमशः \( \vec{r_1} \) और \( \vec{r_2} \) हैं।
\( m_1 \) पर \( m_2 \) द्वारा लगाया गया बल \( \vec{F}_{12} \) है, और \( m_2 \) पर \( m_1 \) द्वारा लगाया गया बल \( \vec{F}_{21} \) है।
\( \vec{r}_{12} = \vec{r_1} - \vec{r_2} \) दो कणों के बीच की दूरी को दर्शाने वाला विस्थापन सदिश है, और \( |\vec{r}_{12}| = r \) उनके बीच की दूरी का परिमाण है।
बल \( \vec{F}_{12} = G \frac{m_1 m_2}{r^2} \hat{r}_{21} \)
जहां \( \hat{r}_{21} \) एक इकाई सदिश है जो \( m_2 \) से \( m_1 \) की ओर इंगित करता है।
इसी प्रकार, \( \vec{F}_{21} = G \frac{m_1 m_2}{r^2} \hat{r}_{12} \)
जहां \( \hat{r}_{12} \) एक इकाई सदिश है जो \( m_1 \) से \( m_2 \) की ओर इंगित करता है।
चूंकि \( \hat{r}_{12} = -\hat{r}_{21} \), इसलिए हम लिख सकते हैं:
\( \vec{F}_{12} = -G \frac{m_1 m_2}{r^2} \hat{r}_{12} \)
और \( \vec{F}_{21} = G \frac{m_1 m_2}{r^2} \hat{r}_{12} \)
इस प्रकार, \( \vec{F}_{12} = -\vec{F}_{21} \)
**क्रिया-प्रतिक्रिया नियम का पालन:**
उपरोक्त संबंध \( \vec{F}_{12} = -\vec{F}_{21} \) दर्शाता है कि दो द्रव्यमानों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल परिमाण में समान और दिशा में विपरीत होता है। यह न्यूटन के गति के तीसरे नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम) के अनुरूप है। इसका अर्थ है कि यदि \( m_1 \), \( m_2 \) पर एक बल लगाता है, तो \( m_2 \) भी \( m_1 \) पर समान परिमाण का लेकिन विपरीत दिशा में बल लगाता है।
In simple words: न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम कहता है कि हर चीज़ दूसरी चीज़ को अपनी ओर खींचती है। यह खिंचाव दोनों चीज़ों के वजन पर निर्भर करता है और उनके बीच की दूरी बढ़ने पर कम होता जाता है। यह बल हमेशा बराबर और विपरीत होता है, जैसे आप किसी चीज़ को धक्का देते हैं और वह भी आपको वापस धक्का देती है।
🎯 Exam Tip: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम को लिखते समय सार्वत्रिक नियतांक G के मान और इकाई को अवश्य लिखें। सदिश रूप में इसकी अभिव्यक्ति और क्रिया-प्रतिक्रिया नियम से इसके संबंध को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 1. धातु के दो गोले, जिनका द्रव्यमान क्रमशः 50 kg व 100 kg है तथा इनके केन्द्रों की बीच की दूरी 50 cm है। इनके बीच गुरुत्वाकर्षण ज्ञात कीजिए।
Answer: दिए गए मान हैं:
गोले 1 का द्रव्यमान \( m_1 = 50 \, \text{kg} \)
गोले 2 का द्रव्यमान \( m_2 = 100 \, \text{kg} \)
केन्द्रों के बीच की दूरी \( r = 50 \, \text{cm} = 0.50 \, \text{m} \)
गुरुत्वाकर्षण नियतांक \( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \mathrm{Nm}^2/\mathrm{kg}^2 \)
गुरुत्वाकर्षण बल \( F \) का सूत्र है:
\( F = G \frac{m_1 m_2}{r^2} \)
मान रखने पर:
\( F = (6.67 \times 10^{-11}) \frac{(50)(100)}{(0.50)^2} \)
\( F = (6.67 \times 10^{-11}) \frac{5000}{0.25} \)
\( F = (6.67 \times 10^{-11}) \times 20000 \)
\( F = 133400 \times 10^{-11} \)
\( F = 1.334 \times 10^5 \times 10^{-11} \)
\( F = 1.334 \times 10^{-6} \, \text{N} \)
तो, गोलों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल \( 1.334 \times 10^{-6} \, \text{N} \) है।
In simple words: दो भारी गोलों के बीच का खिंचाव बहुत कम होता है। हमने उनके वजन और दूरी का इस्तेमाल करके पता लगाया कि वे एक-दूसरे को कितने बल से खींचते हैं, जो कि \( 1.334 \times 10^{-6} \) न्यूटन है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण बल के सवालों में हमेशा द्रव्यमान और दूरी को SI इकाइयों (kg और m) में बदलें। गणना करते समय घातांकों का सही ढंग से उपयोग करें।
Question 2. यदि किसी कारणवश, उपग्रह की कक्षीय चाल 41.4 प्रतिशत बढ़ जाये। क्या इस स्थिति में उपग्रह पलायन कर जायेगा? स्पष्ट कीजिए।
Answer: उपग्रह की कक्षीय चाल को \( v_0 \) और पलायन चाल को \( v_e \) मानते हैं।
पृथ्वी की सतह के पास किसी वस्तु के लिए पलायन वेग \( v_e = \sqrt{2} v_0 \) होता है। (जहाँ \( v_0 \) कक्षीय वेग है)
उपग्रह की कक्षीय चाल \( 41.4\% \) बढ़ जाती है, तो नई चाल \( v_0' \) होगी:
\( v_0' = v_0 + \frac{41.4}{100} v_0 \)
\( v_0' = v_0 (1 + 0.414) \)
\( v_0' = 1.414 \, v_0 \)
हम जानते हैं कि \( \sqrt{2} \approx 1.414 \)।
इसलिए, \( v_0' \approx \sqrt{2} v_0 \)
इसका मतलब है कि बढ़ी हुई कक्षीय चाल \( v_0' \) पलायन चाल \( v_e \) के बराबर हो जाती है:
\( v_0' = v_e \)
जब किसी उपग्रह की चाल पलायन वेग के बराबर हो जाती है, तो वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाता है और कभी वापस नहीं आता।
अतः, इस स्थिति में उपग्रह पलायन कर जाएगा।
In simple words: अगर कोई उपग्रह अपनी सामान्य रफ्तार से \( 41.4\% \) तेज हो जाए, तो उसकी नई रफ्तार पृथ्वी से भागने वाली रफ्तार (पलायन वेग) के बराबर हो जाएगी। ऐसा होने पर उपग्रह पृथ्वी की खींच से बाहर निकल जाएगा और अंतरिक्ष में चला जाएगा।
🎯 Exam Tip: कक्षीय वेग और पलायन वेग के बीच के संबंध \( (v_e = \sqrt{2} v_0) \) को याद रखना इस प्रकार के प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है। प्रतिशत वृद्धि को सही ढंग से गणना करें।
Question 4. पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 72 N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर, वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना होगा?
Answer: दिया है:
पृथ्वी के पृष्ठ पर वस्तु का भार \( mg = 72 \, \text{N} \)
ऊँचाई \( h = R/2 \) (पृथ्वी की त्रिज्या की आधी)
हमें \( h \) ऊँचाई पर वस्तु पर गुरुत्वीय बल \( mg_h \) ज्ञात करना है।
किसी ऊँचाई \( h \) पर गुरुत्वीय त्वरण \( g_h \) का सूत्र है:
\( g_h = g \left(1+\frac{h}{R}\right)^{-2} \)
\( h = R/2 \) का मान रखने पर:
\( g_h = g \left(1+\frac{R/2}{R}\right)^{-2} \)
\( g_h = g \left(1+\frac{1}{2}\right)^{-2} \)
\( g_h = g \left(\frac{3}{2}\right)^{-2} \)
\( g_h = g \left(\frac{2}{3}\right)^{2} \)
\( g_h = \frac{4}{9} g \)
अब, \( h \) ऊँचाई पर वस्तु पर गुरुत्वीय बल होगा:
\( F_h = m g_h = m \left(\frac{4}{9} g\right) = \frac{4}{9} (mg) \)
दिए गए भार \( mg = 72 \, \text{N} \) का मान रखने पर:
\( F_h = \frac{4}{9} \times 72 \)
\( F_h = 4 \times 8 \)
\( F_h = 32 \, \text{N} \)
अतः, पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर वस्तु पर गुरुत्वीय बल 32 N होगा।
In simple words: एक वस्तु का वजन पृथ्वी पर 72 न्यूटन है। अगर उसे पृथ्वी की आधी त्रिज्या के बराबर ऊँचाई पर ले जाया जाए, तो उसका वजन घटकर 32 न्यूटन हो जाएगा क्योंकि ऊपर जाने पर गुरुत्वाकर्षण की ताकत कम हो जाती है।
🎯 Exam Tip: ऊँचाई के साथ गुरुत्वीय त्वरण में परिवर्तन के सूत्र को याद रखना महत्वपूर्ण है। \( h \) का मान सही ढंग से सूत्र में रखें और गणना करते समय सावधानी बरतें।
Question 5. पृथ्वी सतह पर पलायन चाल 11.2 km/s है। किसी वस्तु को इस चाल की दो गुनी चाल से फेंकने पर, पृथ्वी से अत्यधिक दूरी पर वस्तु की चाल क्या होगी? सूर्य तथा अन्य आकाशीय पिंडों की उपस्थिति की उपेक्षा करें।
Answer: दिया है:
पृथ्वी की सतह पर पलायन चाल \( v_e = 11.2 \, \text{km/s} \)
वस्तु को फेंका गया चाल \( v = 2 v_e = 2 \times 11.2 = 22.4 \, \text{km/s} \)
जब किसी वस्तु को पलायन वेग से अधिक वेग से फेंका जाता है, तो वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाती है और अनंत तक जाती है। अनंत पर वस्तु की गतिज ऊर्जा कुछ बची हुई ऊर्जा के बराबर होगी।
ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से:
प्रारंभिक कुल ऊर्जा = अंतिम कुल ऊर्जा
\( \frac{1}{2}mv^2 - \frac{\mathrm{GM}m}{R} = \frac{1}{2}mv_f^2 + 0 \) (अनंत पर स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है)
हमें पता है कि \( \frac{2\mathrm{GM}}{R} = v_e^2 \), इसलिए \( \frac{\mathrm{GM}}{R} = \frac{1}{2}v_e^2 \)
\( \frac{1}{2}mv^2 - m \left(\frac{1}{2}v_e^2\right) = \frac{1}{2}mv_f^2 \)
सभी पदों को \( \frac{1}{2}m \) से भाग देने पर:
\( v^2 - v_e^2 = v_f^2 \)
\( v_f = \sqrt{v^2 - v_e^2} \)
दिए गए मान रखने पर:
\( v_f = \sqrt{(2v_e)^2 - v_e^2} \)
\( v_f = \sqrt{4v_e^2 - v_e^2} \)
\( v_f = \sqrt{3v_e^2} \)
\( v_f = v_e \sqrt{3} \)
\( v_f = 11.2 \times 1.732 \, \text{km/s} \)
\( v_f \approx 19.3984 \, \text{km/s} \)
अतः, पृथ्वी से अत्यधिक दूरी पर वस्तु की चाल लगभग \( 19.4 \, \text{km/s} \) होगी।
In simple words: यदि किसी वस्तु को पृथ्वी से इतनी तेज फेंका जाए कि उसकी रफ्तार पलायन वेग से दोगुनी हो, तो वह पृथ्वी की पकड़ से निकल जाएगी। जब वह बहुत दूर निकल जाएगी, तब भी उसकी रफ्तार लगभग \( 19.4 \, \text{km/s} \) बची रहेगी।
🎯 Exam Tip: ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करके इस प्रकार के सवालों को हल करें। याद रखें कि पलायन वेग से अधिक वेग पर फेंकी गई वस्तु अनंत तक जाती है, जहाँ उसकी स्थितिज ऊर्जा शून्य मानी जाती है।
Question 6. तीन समान द्रव्यमान M के पिंड a भुजा के समबाहु त्रिभुज के शीर्ष पर स्थित हैं। तीनों पिंडों को एक वृत्त पर किस चाल से घुमाया जाये कि त्रिभुज वृत्तीय कक्ष की परिधि पर चले तथा त्रिभुज की भुजा अपरिवर्तित रहे?
Answer: मान लीजिए तीनों पिंड एक समबाहु त्रिभुज के शीर्ष पर हैं, जिसकी भुजा \( a \) है। ये पिंड एक वृत्त पर \( v \) चाल से घूम रहे हैं, जिससे त्रिभुज की भुजा अपरिवर्तित रहती है।
त्रिभुज का केंद्र \( (O) \) वृत्त का केंद्र भी होगा। समबाहु त्रिभुज के केंद्र से शीर्ष तक की दूरी \( r \) है।
\( r = \frac{a}{\sqrt{3}} \)
प्रत्येक पिंड पर, अन्य दो पिंडों के कारण गुरुत्वाकर्षण बल लगेगा। इन बलों के घटक केंद्र की ओर होने चाहिए ताकि अभिकेन्द्र बल प्रदान हो सके।
किसी एक पिंड पर अन्य दो पिंडों के कारण लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल का परिमाण \( F = G \frac{M^2}{a^2} \) होता है।
ये दो बल \( 60^\circ \) के कोण पर लगते हैं। केंद्र की ओर घटक \( F_c \) है:
\( F_c = F \cos(30^\circ) + F \cos(30^\circ) = 2F \cos(30^\circ) \)
\( F_c = 2 \left(G \frac{M^2}{a^2}\right) \frac{\sqrt{3}}{2} = \sqrt{3} G \frac{M^2}{a^2} \)
यह अभिकेन्द्र बल \( \frac{Mv^2}{r} \) के बराबर होना चाहिए:
\( \frac{Mv^2}{r} = \sqrt{3} G \frac{M^2}{a^2} \)
\( \frac{Mv^2}{a/\sqrt{3}} = \sqrt{3} G \frac{M^2}{a^2} \)
\( \frac{\sqrt{3} Mv^2}{a} = \sqrt{3} G \frac{M^2}{a^2} \)
दोनों तरफ \( \sqrt{3} M/a \) से भाग देने पर:
\( v^2 = G \frac{M}{a} \)
\( v = \sqrt{\frac{GM}{a}} \)
तो, तीनों पिंडों को \( \sqrt{\frac{GM}{a}} \) की चाल से घुमाना चाहिए।
In simple words: तीन बराबर वजन वाली चीजें एक त्रिभुज बनाती हैं। अगर उन्हें एक गोले के आकार में घूमना है ताकि त्रिभुज वैसे का वैसा ही रहे, तो उन्हें एक खास रफ्तार से चलना होगा। वह रफ्तार पिंडों के वजन और त्रिभुज की भुजा की लंबाई पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: इस तरह के समस्याओं में, गुरुत्वाकर्षण बलों के घटकों को सही ढंग से हल करना और उन्हें अभिकेन्द्र बल के बराबर करना महत्वपूर्ण है। समबाहु त्रिभुज के केंद्र से शीर्ष की दूरी की गणना सावधानी से करें।
Question 7. 3 कि.ग्रा. की वस्तु की स्थितिज ऊर्जा पृथ्वी सतह पर – 54 जूल है, तो इसके पलायन वेग की गणना कीजिए।
Answer: दिए गए मान हैं:
वस्तु का द्रव्यमान \( m = 3 \, \text{kg} \)
पृथ्वी की सतह पर वस्तु की स्थितिज ऊर्जा \( U_R = -54 \, \text{Joule} \)
हम जानते हैं कि पृथ्वी की सतह पर स्थितिज ऊर्जा का सूत्र है:
\( U_R = -\frac{\mathrm{GM}m}{R} \)
इसलिए, \( -54 = -\frac{\mathrm{GM}(3)}{R} \)
\( \frac{\mathrm{GM}}{R} = \frac{54}{3} = 18 \)
अब, पलायन वेग \( v_e \) का सूत्र है:
\( v_e = \sqrt{\frac{2\mathrm{GM}}{R}} \)
\( \frac{\mathrm{GM}}{R} \) का मान रखने पर:
\( v_e = \sqrt{2 \times 18} \)
\( v_e = \sqrt{36} \)
\( v_e = 6 \, \text{m/s} \)
अतः, वस्तु का पलायन वेग \( 6 \, \text{m/s} \) है।
In simple words: एक 3 किलोग्राम की वस्तु की ऊर्जा पृथ्वी पर \( -54 \) जूल है। हमने इस जानकारी का उपयोग करके पता लगाया कि उस वस्तु को पृथ्वी से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए \( 6 \) मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार चाहिए।
🎯 Exam Tip: स्थितिज ऊर्जा के सूत्र और पलायन वेग के सूत्र के बीच के संबंध को याद रखना महत्वपूर्ण है। दिए गए मानों को सही ढंग से प्रतिस्थापित करें और गणना में सटीकता बनाए रखें।
Question 8. पृथ्वी तल से लगभग किस ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का मान सतह की तुलना में 10 प्रतिशत कम हो जायेगा?
Answer: हमें ज्ञात है कि गुरुत्वीय त्वरण (\(g\)) का मान पृथ्वी की सतह से 10% कम हो जाएगा।
अर्थात्, \( g_h = g - 10\% \text{ of } g \)
\( g_h = g - \frac{10}{100} g = \frac{9}{10} g \)
पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का मान (जब \( h \ll R \)):
\( g_h = g \left(1 - \frac{2h}{R}\right) \)
इन दोनों को बराबर रखने पर:
\( \frac{9}{10} g = g \left(1 - \frac{2h}{R}\right) \)
\( \frac{9}{10} = 1 - \frac{2h}{R} \)
\( \frac{2h}{R} = 1 - \frac{9}{10} = \frac{1}{10} \)
\( \frac{2h}{R} = 0.1 \)
\( h = \frac{0.1R}{2} \)
पृथ्वी की त्रिज्या \( R = 6400 \text{ km} \)
\( h = \frac{0.1 \times 6400}{2} \text{ km} \)
\( h = \frac{640}{2} \text{ km} \)
\( h = 320 \text{ km} \)
अतः, पृथ्वी तल से लगभग 320 किमी की ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का मान सतह की तुलना में 10 प्रतिशत कम हो जाएगा।
In simple words: गुरुत्वाकर्षण खिंचाव 10% कम हो जाएगा यदि आप पृथ्वी की सतह से 320 किलोमीटर ऊपर जाते हैं।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में ऊँचाई (\(h\)) और पृथ्वी की त्रिज्या (\(R\)) के संबंध पर ध्यान दें और उचित सूत्र का उपयोग करें, खासकर जब \( h \ll R \) की शर्त लागू हो।
Question 9. पृथ्वी व सूर्य के बीच ऐसा बिन्दु होता है, जहाँ पर दोनों के कारण किसी वस्तु पर नेट गुरुत्वाकर्षण बल शून्य होता है। इसे लैगरेन्जियन बिन्दु भी कहते हैं। पृथ्वी से इस बिन्दु की दूरी ज्ञात कीजिए। सूर्य व पृथ्वी की बीच की दूरी लगभग 108 km है। सूर्य का द्रव्यमान पृथ्वी से 3.24 × 105 गुना है।
Answer: पृथ्वी और सूर्य के बीच एक ऐसा बिंदु होता है जहाँ किसी वस्तु पर लगने वाला कुल गुरुत्वाकर्षण बल शून्य हो जाता है। इस बिंदु को लैग्रेंजियन बिंदु कहते हैं। हमें इस बिंदु की पृथ्वी से दूरी ज्ञात करनी है।
हमें ज्ञात है:
सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी (\(r\)) \( = 10^8 \text{ km} = 10^{11} \text{ m} \)
सूर्य का द्रव्यमान (\(M_s\)) \( = 3.24 \times 10^5 M_e \) (जहाँ \( M_e \) पृथ्वी का द्रव्यमान है)
मान लीजिए पृथ्वी से \( x \) दूरी पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।
गुरुत्वाकर्षण बल शून्य होने के लिए:
पृथ्वी के कारण बल (\(F_E\)) \( = \) सूर्य के कारण बल (\(F_S\))
\( \frac{GM_e m}{x^2} = \frac{GM_s m}{(r-x)^2} \)
\( \frac{M_e}{x^2} = \frac{M_s}{(r-x)^2} \)
\( \frac{1}{x^2} = \frac{3.24 \times 10^5}{(10^{11}-x)^2} \)
दोनों पक्षों का वर्गमूल लेने पर:
\( \frac{1}{x} = \frac{\sqrt{3.24 \times 10^5}}{(10^{11}-x)} \)
\( \frac{1}{x} = \frac{569.2}{(10^{11}-x)} \) (लगभग \( \sqrt{3.24 \times 10^5} \approx 569.2 \))
\( 10^{11}-x = 569.2x \)
\( 10^{11} = 569.2x + x \)
\( 10^{11} = 570.2x \)
\( x = \frac{10^{11}}{570.2} \)
\( x \approx 1.75 \times 10^8 \text{ m} \)
अतः, पृथ्वी से लगभग \( 1.75 \times 10^8 \text{ m} \) की दूरी पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य होगा।
In simple words: पृथ्वी और सूर्य के बीच एक जगह है जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल बिल्कुल नहीं लगता। यह जगह पृथ्वी से करीब 1.75 लाख किलोमीटर दूर है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण बल के संतुलन वाले प्रश्नों में, दोनों पिंडों से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती संबंध का उपयोग करें और ध्यानपूर्वक गणना करें।
Question 10. कल्पना कीजिये कि एक वस्तु किसी बड़े तारे के चारों ओर R त्रिज्या के वृत्तीय कक्षा में घूम रही है, इसका आवर्तकाल T है यदि वस्तु तथा तारे के बीच गुरुत्वाकर्षण बल \( \mathbf{R}^{\left(-\frac{5}{2}\right)} \) के समानुपाती है तो इसका आवर्तकाल त्रिज्या पर किस प्रकार निर्भर करेगा?
Answer: मान लीजिए एक वस्तु एक बड़े तारे के चारों ओर \( R \) त्रिज्या की वृत्ताकार कक्षा में घूम रही है, और इसका आवर्तकाल \( T \) है। यदि वस्तु और तारे के बीच गुरुत्वाकर्षण बल \( R \) की घात \( -5/2 \) के समानुपाती है, तो इसका आवर्तकाल \( T \) कक्षा की त्रिज्या \( R \) पर इस प्रकार निर्भर करेगा:
वस्तु पर कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल (\(F\)):
\( F = \frac{GMm}{R^{5/2}} \)
जहाँ \( G \) गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक, \( M \) तारे का द्रव्यमान, और \( m \) वस्तु का द्रव्यमान है।
वृत्ताकार कक्षा में गति के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल (\(F_c\)):
\( F_c = \frac{mv^2}{R} \)
जहाँ \( v \) वस्तु की कक्षीय चाल है।
कक्षीय चाल और आवर्तकाल के बीच संबंध:
\( v = \frac{2\pi R}{T} \)
गुरुत्वाकर्षण बल अभिकेन्द्रीय बल के बराबर होता है:
\( F = F_c \)
\( \implies \frac{GMm}{R^{5/2}} = \frac{mv^2}{R} \)
\( \implies \frac{GM}{R^{5/2}} = \frac{v^2}{R} \)
\( \implies GM = v^2 R^{3/2} \)
\( \implies GM = \left(\frac{2\pi R}{T}\right)^2 R^{3/2} \)
\( \implies GM = \frac{4\pi^2 R^2}{T^2} R^{3/2} \)
\( \implies GM = \frac{4\pi^2 R^{2 + 3/2}}{T^2} \)
\( \implies GM = \frac{4\pi^2 R^{7/2}}{T^2} \)
आवर्तकाल के लिए पुनर्व्यवस्थित करने पर:
\( T^2 = \frac{4\pi^2 R^{7/2}}{GM} \)
चूंकि \( 4\pi^2 \), \( G \) और \( M \) स्थिरांक हैं, तो:
\( T^2 \propto R^{7/2} \)
\( T \propto (R^{7/2})^{1/2} \)
\( T \propto R^{7/4} \)
अतः, आवर्तकाल \( T \) कक्षा की त्रिज्या \( R \) के \( 7/4 \) घात के समानुपाती है।
In simple words: वस्तु जितनी बड़ी कक्षा में घूमेगी, उसे एक चक्कर पूरा करने में उतना ही ज्यादा समय लगेगा। यह संबंध त्रिज्या की घात 7/4 पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: कक्षीय गति के प्रश्नों में गुरुत्वाकर्षण बल को अभिकेन्द्रीय बल के बराबर रखें और आवर्तकाल के सूत्र में चाल के स्थान पर \( 2\pi R / T \) प्रतिस्थापित करें।
Question 11. चन्द्रमा पर पलायन चाल की गणना कीजिए। दिया है पृथ्वी की त्रिज्या चन्द्रमा से चार गुनी व द्रव्यमान 80 गुना है।
Answer: हमें चन्द्रमा के लिए पलायन वेग की गणना करनी है।
हमें ज्ञात है:
पृथ्वी की त्रिज्या (\(R_e\)) चंद्रमा की त्रिज्या (\(R_m\)) से चार गुना है:
\( R_e = 4R_m \implies R_m = \frac{R_e}{4} \)
पृथ्वी का द्रव्यमान (\(M_e\)) चंद्रमा का द्रव्यमान (\(M_m\)) का 80 गुना है:
\( M_e = 80M_m \implies M_m = \frac{M_e}{80} \)
पलायन वेग का सामान्य सूत्र है:
\( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R}} \)
चंद्रमा के लिए पलायन वेग (\(v_m\)) का सूत्र होगा:
\( v_m = \sqrt{\frac{2GM_m}{R_m}} \)
\( M_m \) और \( R_m \) के मान प्रतिस्थापित करने पर:
\( v_m = \sqrt{\frac{2G \left(\frac{M_e}{80}\right)}{\left(\frac{R_e}{4}\right)}} \)
\( \implies v_m = \sqrt{\frac{2GM_e}{R_e} \times \frac{4}{80}} \)
\( \implies v_m = \sqrt{\frac{2GM_e}{R_e} \times \frac{1}{20}} \)
हम जानते हैं कि पृथ्वी के लिए पलायन वेग \( v_e = \sqrt{\frac{2GM_e}{R_e}} \approx 11.2 \text{ km/s} \)
तो, \( v_m = v_e \times \sqrt{\frac{1}{20}} = \frac{11.2 \text{ km/s}}{\sqrt{20}} \)
\( \sqrt{20} \approx 4.472 \)
\( v_m = \frac{11.2}{4.472} \text{ km/s} \approx 2.504 \text{ km/s} \)
दिए गए मानों के अनुसार, चंद्रमा पर पलायन वेग लगभग 2.5 किमी/सेकंड है।
In simple words: चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से कमजोर है, इसलिए किसी वस्तु को चंद्रमा से बाहर निकलने के लिए कम गति की आवश्यकता होती है, जो लगभग 2.5 किमी/सेकंड है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग के तुलनात्मक प्रश्नों में, द्रव्यमान और त्रिज्या के अनुपात को ध्यान में रखते हुए सूत्र को सरल करें।
Question 12. एक आकाशीय प्रयोगशाला जिसका द्रव्यमान 2 × 103 kg है, को 2R त्रिज्या की कक्षा से 3R त्रिज्या कक्षा में स्थानान्तरित किया जाता है तो किये गये कार्य की गणना करो। यहाँ R = 6400 km (पृथ्वी की त्रिज्या) है।
Answer: अंतरिक्ष प्रयोगशाला को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में ले जाने के लिए किए गए कार्य की गणना करने के लिए हम स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन का उपयोग करेंगे।
हमें ज्ञात है:
प्रयोगशाला का द्रव्यमान (\(m\)) \( = 2 \times 10^3 \text{ kg} \)
पृथ्वी की त्रिज्या (\(R\)) \( = 6400 \text{ km} = 6.4 \times 10^6 \text{ m} \)
प्रारंभिक कक्षीय त्रिज्या (\(r_1\)) \( = 2R \)
अंतिम कक्षीय त्रिज्या (\(r_2\)) \( = 3R \)
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक-द्रव्यमान गुणनफल (\(GM\)) \( = gR^2 \)
जहाँ \( g = 9.8 \text{ m/s}^2 \)
स्थितिज ऊर्जा का सूत्र है:
\( U = -\frac{GMm}{r} \)
किए गए कार्य (\(W\)) का मान स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन (\(\Delta U\)) के बराबर होगा:
\( W = \Delta U = U_2 - U_1 = \left(-\frac{GMm}{r_2}\right) - \left(-\frac{GMm}{r_1}\right) \)
\( \implies W = GMm \left(\frac{1}{r_1} - \frac{1}{r_2}\right) \)
\( r_1 \) और \( r_2 \) के मान प्रतिस्थापित करने पर:
\( W = GMm \left(\frac{1}{2R} - \frac{1}{3R}\right) \)
\( \implies W = GMm \left(\frac{3-2}{6R}\right) \)
\( \implies W = \frac{GMm}{6R} \)
अब, \( GM = gR^2 \) का मान प्रतिस्थापित करने पर:
\( W = \frac{gR^2 m}{6R} = \frac{gRm}{6} \)
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\( W = \frac{9.8 \text{ m/s}^2 \times (6.4 \times 10^6 \text{ m}) \times (2 \times 10^3 \text{ kg})}{6} \)
\( W = \frac{9.8 \times 6.4 \times 2}{6} \times 10^9 \text{ J} \)
\( W = \frac{125.44}{6} \times 10^9 \text{ J} \)
\( W \approx 20.906 \times 10^9 \text{ J} \)
\( W \approx 2.09 \times 10^{10} \text{ J} \)
अतः, प्रयोगशाला को 2R त्रिज्या की कक्षा से 3R त्रिज्या की कक्षा में स्थानांतरित करने के लिए लगभग \( 2.09 \times 10^{10} \text{ जूल} \) कार्य करना होगा।
In simple words: एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला को दूर की कक्षा में ले जाने के लिए बहुत ऊर्जा लगती है, इस मामले में लगभग 2.09 x 1010 जूल।
🎯 Exam Tip: कक्षीय परिवर्तन में किए गए कार्य की गणना करते समय, प्रारंभिक और अंतिम कक्षाओं की स्थितिज ऊर्जा के अंतर का उपयोग करें।
Question 13. यदि पृथ्वी की त्रिज्या 6400 km हो तो किसी वस्तु का भूमध्य रेखा (Equator) पर रेखीय वेग क्या होगा?
Answer: भूमध्य रेखा पर किसी वस्तु का रेखीय वेग पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है।
हमें ज्ञात है:
पृथ्वी की त्रिज्या (\(R\)) \( = 6400 \text{ km} \)
पृथ्वी का आवर्तकाल (\(T\)) \( = 24 \text{ hours} \)
रेखीय वेग (\(v\)) का सूत्र है:
\( v = R\omega \)
जहाँ \( \omega \) कोणीय वेग है, जिसका सूत्र \( \omega = \frac{2\pi}{T} \) है।
तो, \( v = R \frac{2\pi}{T} \)
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\( v = 6400 \text{ km} \times \frac{2 \times 3.14}{24 \text{ hours}} \)
\( v = 6400 \times \frac{6.28}{24} \text{ km/hour} \)
\( v = \frac{40192}{24} \text{ km/hour} \)
\( v \approx 1674.66 \text{ km/hour} \)
इस वेग को मील प्रति घंटा में बदलने पर (1 किमी \( \approx \) 0.621 मील):
\( v = 1674.66 \times 0.621 \text{ miles/hour} \)
\( v \approx 1039.96 \text{ miles/hour} \)
\( v \approx 1040 \text{ miles/hour} \)
अतः, भूमध्य रेखा पर किसी वस्तु का रेखीय वेग लगभग 1675 किमी/घंटा या 1040 मील/घंटा होगा।
In simple words: पृथ्वी घूमती है, और भूमध्य रेखा पर सबसे तेज़ चलती है, इसलिए वहाँ की कोई भी चीज़ लगभग 1675 किमी/घंटा की गति से चल रही होती है।
🎯 Exam Tip: रेखीय वेग की गणना करते समय, \( v = R\omega \) सूत्र का उपयोग करें और सुनिश्चित करें कि सभी इकाइयाँ सुसंगत हों (जैसे, किमी/घंटा या मी/से)।
Question 14. यदि m द्रव्यमान की वस्तु को पृथ्वी सतह से पृथ्वी की त्रिज्या R के बराबर ऊँचाई तक ले जाने में स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि क्या होगी?
Answer: जब \( m \) द्रव्यमान की वस्तु को पृथ्वी की सतह से \( R \) (पृथ्वी की त्रिज्या के बराबर) ऊँचाई तक ले जाया जाता है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि की गणना इस प्रकार की जाएगी:
पृथ्वी की सतह पर स्थितिज ऊर्जा (\(U_1\)) \( = -\frac{GMm}{R} \)
जब वस्तु को \( h = R \) ऊँचाई तक ले जाया जाता है, तो केंद्र से कुल दूरी \( R+h = R+R = 2R \) हो जाती है।
इस ऊँचाई पर स्थितिज ऊर्जा (\(U_2\)) \( = -\frac{GMm}{2R} \)
स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि (\(\Delta U\)) \( = U_2 - U_1 \)
\( \Delta U = -\frac{GMm}{2R} - \left(-\frac{GMm}{R}\right) \)
\( \implies \Delta U = -\frac{GMm}{2R} + \frac{GMm}{R} \)
\( \implies \Delta U = \frac{-GMm + 2GMm}{2R} \)
\( \implies \Delta U = \frac{GMm}{2R} \)
हम जानते हैं कि \( GM = gR^2 \) (जहाँ \( g \) गुरुत्वीय त्वरण है)
तो, \( \Delta U = \frac{gR^2 m}{2R} \)
\( \implies \Delta U = \frac{mgR}{2} \)
अतः, स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि \( \frac{mgR}{2} \) होगी।
In simple words: पृथ्वी की सतह से पृथ्वी की त्रिज्या के बराबर ऊँचाई तक किसी वस्तु को उठाने पर, उसकी स्थितिज ऊर्जा आधी \( mgR \) बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन के प्रश्नों में, हमेशा प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों में केंद्र से दूरियों को सही ढंग से परिभाषित करें।
Question 15. एक उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर r दूरी पर चक्कर लगा रहा है। यदि वृत्तीय कक्षा की त्रिज्या 1% घट जाती है तो उसकी चाल में कितने प्रतिशत परिवर्तन होगा?
Answer: यदि एक उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में घूम रहा है, तो उसकी कक्षीय चाल त्रिज्या पर निर्भर करती है।
प्रारंभिक कक्षीय चाल (\(v\)) का सूत्र है:
\( v = \sqrt{\frac{GM}{r}} \)
जहाँ \( G \) गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक, \( M \) पृथ्वी का द्रव्यमान, और \( r \) कक्षा की त्रिज्या है।
यदि कक्षा की त्रिज्या 1% घट जाती है, तो नई त्रिज्या (\(r'\)) होगी:
\( r' = r - 1\% \text{ of } r = r - 0.01r = 0.99r \)
नई कक्षीय चाल (\(v'\)) होगी:
\( v' = \sqrt{\frac{GM}{r'}} = \sqrt{\frac{GM}{0.99r}} \)
\( \implies v' = \sqrt{\frac{1}{0.99}} \sqrt{\frac{GM}{r}} = \frac{1}{\sqrt{0.99}} v \)
\( \frac{1}{\sqrt{0.99}} \approx \frac{1}{0.994987} \approx 1.00504 \)
तो, \( v' \approx 1.00504 v \)
चाल में प्रतिशत परिवर्तन होगा:
\( \text{प्रतिशत परिवर्तन} = \frac{v' - v}{v} \times 100\% \)
\( = \frac{1.00504v - v}{v} \times 100\% \)
\( = 0.00504 \times 100\% \)
\( \approx 0.504\% \)
जिसे लगभग 0.5% तक पूर्णांकित किया जा सकता है।
अतः, उपग्रह की चाल में लगभग 0.5% की वृद्धि होगी।
In simple words: जब एक उपग्रह पृथ्वी के करीब आता है (उसकी कक्षा की त्रिज्या 1% कम हो जाती है), तो वह थोड़ा तेज़ी से घूमता है, उसकी गति लगभग 0.5% बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: कक्षीय चाल के प्रश्नों में, त्रिज्या में छोटे बदलावों के लिए प्रतिशत परिवर्तन की गणना करते समय \( v \propto \frac{1}{\sqrt{r}} \) संबंध का उपयोग करें।
Question 16. सूर्य की त्रिज्या कितनी हो जाये कि ये काला विविर (Black-Hole) बन जाये? सूर्य द्रव्यमान नियत मानें (1030 kg) तथा प्रक्षेप्य के वेग की अधिकतम सीमा प्रकाश वेग के बराबर मानें क्योंकि आइन्सटीन के विशिष्ट सापेक्षवाद सिद्धान्त के अनुसार किसी वस्तु का वेग प्रकाश वेग से अधिक नहीं हो सकता है।
Answer: एक ब्लैक होल (काला विवर) एक ऐसा आकाशीय पिंड होता है जिससे प्रकाश सहित कोई भी वस्तु बाहर नहीं निकल पाती, क्योंकि उसका गुरुत्वाकर्षण अत्यधिक होता है। सूर्य को एक ब्लैक होल में बदलने के लिए, उसकी त्रिज्या को इतना छोटा होना होगा कि उसका पलायन वेग प्रकाश के वेग के बराबर हो जाए।
हमें ज्ञात है:
सूर्य का द्रव्यमान (\(M\)) \( = 10^{30} \text{ kg} \)
गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (\(G\)) \( = 6.67 \times 10^{-11} \text{ Nm}^2\text{/kg}^2 \)
प्रकाश का वेग (\(c\)) \( = 3 \times 10^8 \text{ m/s} \)
ब्लैक होल बनने के लिए, पलायन वेग (\(v_e\)) प्रकाश के वेग (\(c\)) के बराबर होना चाहिए:
\( v_e = c \)
पलायन वेग का सूत्र है:
\( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R_s}} \)
जहाँ \( R_s \) श्वार्ज़स्चिल्ड त्रिज्या है।
तो,
\( c = \sqrt{\frac{2GM}{R_s}} \)
\( \implies c^2 = \frac{2GM}{R_s} \)
\( \implies R_s = \frac{2GM}{c^2} \)
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\( R_s = \frac{2 \times (6.67 \times 10^{-11} \text{ Nm}^2\text{/kg}^2) \times (10^{30} \text{ kg})}{(3 \times 10^8 \text{ m/s})^2} \)
\( R_s = \frac{13.34 \times 10^{19}}{9 \times 10^{16}} \text{ m} \)
\( R_s = \frac{13.34}{9} \times 10^{19-16} \text{ m} \)
\( R_s \approx 1.482 \times 10^3 \text{ m} \)
\( R_s = 1482 \text{ m} \)
अतः, सूर्य को ब्लैक होल बनने के लिए उसकी त्रिज्या को लगभग 1482 मीटर या 1.482 किमी तक सिकुड़ना होगा।
In simple words: सूर्य को ब्लैक होल बनने के लिए, उसे इतना छोटा होना पड़ेगा कि उसकी त्रिज्या सिर्फ 1.482 किलोमीटर रह जाए, तब उसका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत हो जाएगा कि प्रकाश भी बाहर नहीं निकल पाएगा।
🎯 Exam Tip: ब्लैक होल के श्वार्ज़स्चिल्ड त्रिज्या की गणना करते समय, पलायन वेग को प्रकाश के वेग के बराबर निर्धारित करें और सटीक स्थिरांक मानों का उपयोग करें।
Question 17. पृथ्वी के अन्दर केन्द्र से गुजरती हुई आर-पार सुरंग में किसी वस्तु को डालने पर, सरल आवर्त गति करने लगती है। इसके लिये आवर्तकाल का मान ज्ञात कीजिए। यदि पृथ्वी की 6.4 × 106 m व द्रव्यमान 6 × 1024 kg है।
Answer: यदि पृथ्वी के केंद्र से गुजरने वाली एक सुरंग में किसी वस्तु को गिराया जाए, तो वह सरल आवर्त गति करने लगती है क्योंकि उस पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल विस्थापन के समानुपाती होता है। हमें इसके लिए आवर्तकाल का मान ज्ञात करना है।
हमें ज्ञात है:
पृथ्वी की त्रिज्या (\(R\)) \( = 6.4 \times 10^6 \text{ m} \)
गुरुत्वीय त्वरण (\(g\)) \( = 9.8 \text{ m/s}^2 \)
पृथ्वी के अंदर केंद्र से \( r \) दूरी पर स्थित वस्तु पर गुरुत्वाकर्षण बल (\(F\)) है:
\( F = -\frac{GM_r m}{r^2} \)
जहाँ \( M_r \) \( r \) त्रिज्या के गोले का द्रव्यमान है, \( M_r = M \left(\frac{r^3}{R^3}\right) \)
तो, \( F = -\frac{G M \left(\frac{r^3}{R^3}\right) m}{r^2} = -\frac{GMm}{R^3} r \)
यह सरल आवर्त गति का समीकरण है, \( F = -kr \), जहाँ \( k = \frac{GMm}{R^3} \)
सरल आवर्त गति के लिए आवर्तकाल (\(T\)) का सूत्र है:
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{m}{k}} \)
\( \implies T = 2\pi \sqrt{\frac{m}{\frac{GMm}{R^3}}} = 2\pi \sqrt{\frac{R^3}{GM}} \)
हम जानते हैं कि \( GM = gR^2 \)
तो, \( T = 2\pi \sqrt{\frac{R^3}{gR^2}} = 2\pi \sqrt{\frac{R}{g}} \)
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\( T = 2 \times 3.14159 \times \sqrt{\frac{6.4 \times 10^6 \text{ m}}{9.8 \text{ m/s}^2}} \)
\( T = 6.28318 \times \sqrt{653061.22 \text{ s}^2} \)
\( T = 6.28318 \times 808.12 \text{ s} \)
\( T \approx 5076 \text{ s} \)
मिनटों में बदलने पर:
\( T = \frac{5076}{60} \text{ minutes} \approx 84.6 \text{ minutes} \)
यह लगभग 85 मिनट है।
In simple words: यदि आप पृथ्वी के केंद्र से होते हुए एक सीधी सुरंग में गिरते हैं, तो आप एक छोर से दूसरे छोर तक लगभग 85 मिनट में पहुँचेंगे, जैसे एक पेंडुलम झूलता है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के अंदर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सरल आवर्त गति में आवर्तकाल के लिए \( T = 2\pi \sqrt{\frac{R}{g}} \) सूत्र को याद रखें, जो एक सार्वभौमिक मान है।
Question 18. पृथ्वी की त्रिज्या 4% कम हो जाये तथा द्रव्यमान नियत रहे तो पलायन वेग में क्या परिवर्तन होगा?
Answer: यदि पृथ्वी की त्रिज्या 4% कम हो जाए और उसका द्रव्यमान स्थिर रहे, तो पलायन वेग में परिवर्तन इस प्रकार होगा:
पलायन वेग (\(v_e\)) का सूत्र है:
\( v_e = \sqrt{\frac{2GM}{R}} \)
जहाँ \( G \) गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक, \( M \) पृथ्वी का द्रव्यमान, और \( R \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
यदि त्रिज्या 4% कम हो जाती है, तो नई त्रिज्या (\(R'\)) होगी:
\( R' = R - 4\% \text{ of } R = R - 0.04R = 0.96R \)
नई पलायन वेग (\(v_e'\)) का सूत्र होगा:
\( v_e' = \sqrt{\frac{2GM}{R'}} = \sqrt{\frac{2GM}{0.96R}} \)
\( \implies v_e' = \sqrt{\frac{1}{0.96}} \sqrt{\frac{2GM}{R}} = \frac{1}{\sqrt{0.96}} v_e \)
\( \frac{1}{\sqrt{0.96}} \approx \frac{1}{0.979795} \approx 1.0206 \)
तो, \( v_e' \approx 1.0206 v_e \)
पलायन वेग में प्रतिशत परिवर्तन होगा:
\( \text{प्रतिशत परिवर्तन} = \frac{v_e' - v_e}{v_e} \times 100\% \)
\( = \frac{1.0206 v_e - v_e}{v_e} \times 100\% \)
\( = 0.0206 \times 100\% \)
\( \approx 2\% \)
अतः, पृथ्वी की त्रिज्या 4% कम होने पर पलायन वेग में लगभग 2% की वृद्धि होगी।
In simple words: यदि पृथ्वी थोड़ी सिकुड़ जाए लेकिन उसका वजन वही रहे, तो उससे बाहर निकलने के लिए आपको 2% अधिक गति से चलना होगा।
🎯 Exam Tip: जब त्रिज्या कम होती है, तो पलायन वेग बढ़ जाता है। प्रतिशत परिवर्तन की गणना करते समय \( v_e \propto \frac{1}{\sqrt{R}} \) संबंध का उपयोग करें और गणना में सटीकता बनाए रखें।
Question 19. दो द्रव्यमानों \( M_1 \) और \( M_2 \) के बीच गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने वाले बिंदु की स्थिति ज्ञात कीजिए, तथा उस बिंदु पर गुरुत्वीय विभव भी ज्ञात कीजिए।
Answer: मान लीजिए दो द्रव्यमान \( M_1 \) और \( M_2 \) एक दूसरे से \( d \) दूरी पर रखे हैं। हम बिंदु \( P \) पर गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने की स्थिति और उस पर गुरुत्वीय विभव ज्ञात करेंगे।
गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने के लिए:
मान लीजिए बिंदु \( P \) द्रव्यमान \( M_1 \) से \( x \) दूरी पर है, तो यह \( M_2 \) से \( (d-x) \) दूरी पर होगा।
बिंदु \( P \) पर \( M_1 \) के कारण गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता (\(E_{g1}\)) \( = \frac{GM_1}{x^2} \)
बिंदु \( P \) पर \( M_2 \) के कारण गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता (\(E_{g2}\)) \( = \frac{GM_2}{(d-x)^2} \)
गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने के लिए \( E_{g1} = E_{g2} \):
\( \frac{GM_1}{x^2} = \frac{GM_2}{(d-x)^2} \)
\( \implies \frac{M_1}{x^2} = \frac{M_2}{(d-x)^2} \)
दोनों पक्षों का वर्गमूल लेने पर:
\( \frac{\sqrt{M_1}}{x} = \frac{\sqrt{M_2}}{d-x} \)
\( \implies \sqrt{M_1}(d-x) = \sqrt{M_2}x \)
\( \implies d\sqrt{M_1} - x\sqrt{M_1} = x\sqrt{M_2} \)
\( \implies d\sqrt{M_1} = x(\sqrt{M_1} + \sqrt{M_2}) \)
\( x = \frac{d\sqrt{M_1}}{\sqrt{M_1} + \sqrt{M_2}} \)
यह \( M_1 \) से उस बिंदु की दूरी है जहाँ गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होता है।
गुरुत्वीय विभव (\(V\)) की गणना:
बिंदु \( P \) पर \( M_1 \) के कारण गुरुत्वीय विभव (\(V_1\)) \( = -\frac{GM_1}{x} \)
बिंदु \( P \) पर \( M_2 \) के कारण गुरुत्वीय विभव (\(V_2\)) \( = -\frac{GM_2}{d-x} \)
कुल गुरुत्वीय विभव \( V = V_1 + V_2 = -\frac{GM_1}{x} - \frac{GM_2}{d-x} \)
पहले के संबंध से, \( \frac{\sqrt{M_1}}{x} = \frac{\sqrt{M_2}}{d-x} \), हम लिख सकते हैं \( x = \frac{d\sqrt{M_1}}{\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2}} \) और \( d-x = \frac{d\sqrt{M_2}}{\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2}} \)
इन मानों को \( V \) के सूत्र में प्रतिस्थापित करने पर:
\( V = -\frac{GM_1}{\left(\frac{d\sqrt{M_1}}{\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2}}\right)} - \frac{GM_2}{\left(\frac{d\sqrt{M_2}}{\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2}}\right)} \)
\( \implies V = -\frac{G\sqrt{M_1}(\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2})}{d} - \frac{G\sqrt{M_2}(\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2})}{d} \)
\( \implies V = -\frac{G(\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2})}{d} (\sqrt{M_1} + \sqrt{M_2}) \)
\( \implies V = -\frac{G(\sqrt{M_1}+\sqrt{M_2})^2}{d} \)
\( \implies V = -\frac{G(M_1 + M_2 + 2\sqrt{M_1M_2})}{d} \)
अतः, गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने वाले बिंदु पर गुरुत्वीय विभव \( -\frac{G(M_1 + M_2 + 2\sqrt{M_1M_2})}{d} \) होगा।
In simple words: दो वस्तुओं के बीच एक ऐसा बिंदु होता है जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को काट देता है, जिससे कुल बल शून्य हो जाता है। इस बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण विभव की गणना दोनों वस्तुओं के द्रव्यमान और उनके बीच की दूरी के आधार पर की जाती है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य होने का बिंदु हमेशा दो द्रव्यमानों के बीच छोटे द्रव्यमान के करीब होता है। गुरुत्वीय विभव हमेशा ऋणात्मक होता है, और यह एक अदिश राशि है।
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