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Rbse Class 11 Physics Chapter 13 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. यदि दो निकाय A व B किसी तीसरे निकाय C से अलग-अलग ऊष्मीय साम्य अवस्था में हैं तो A व B क्या आपस में ऊष्मीय साम्य अवस्था में होंगे ?
Answer: हाँ, यदि दो निकाय A और B किसी तीसरे निकाय C के साथ अलग-अलग तापीय संतुलन में हैं, तो निकाय A और B भी आपस में तापीय संतुलन में होंगे। यह ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम है जो ताप की अवधारणा को स्थापित करता है, जैसे कि थर्मामीटर का उपयोग।
In simple words: हाँ, अगर A और B दोनों ही C के साथ तापमान में बराबर हैं, तो A और B भी आपस में तापमान में बराबर होंगे।
🎯 Exam Tip: ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम ताप की परिभाषा का आधार है। इसे हमेशा 'ताप' शब्द से जोड़कर याद रखें।
Question 2. क्या ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से किसी क्रिया के होने की दिशा को ज्ञान हो सकता है?
Answer: नहीं। ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत बताता है, लेकिन यह किसी प्रक्रम की स्वतः प्रवृति या उसकी दिशा के बारे में कोई जानकारी नहीं देता है। किसी प्रक्रम की दिशा जानने के लिए हमें ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का सहारा लेना पड़ता है।
In simple words: नहीं, पहला नियम सिर्फ ऊर्जा के बचने की बात करता है, यह नहीं बताता कि कोई काम किस तरफ होगा या होगा भी या नहीं।
🎯 Exam Tip: याद रखें, प्रथम नियम ऊर्जा की मात्रा से संबंधित है, जबकि द्वितीय नियम ऊर्जा की गुणवत्ता और प्रवाह की दिशा से संबंधित है।
Question 4. किसी आदर्श गैस के रुद्धोष्म प्रसार में P व V के मध्य सम्बन्ध लिखिये।
Answer: आदर्श गैस के रुद्धोष्म प्रसार में दाब (P) और आयतन (V) के मध्य संबंध निम्न है:
\( PV^\gamma = \text{नियतांक} \)
जहाँ \( \gamma = \left(\frac{C_p}{C_v}\right) \)
यहाँ \( \gamma \) गैस की विशिष्ट ऊष्माओं का अनुपात है, जो गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। यह संबंध दर्शाता है कि रुद्धोष्म प्रक्रम में दाब और आयतन एक विशेष नियम का पालन करते हैं।
In simple words: जब कोई गैस बिना ऊष्मा बदले फैलती है, तो उसका दबाव और आयतन एक खास समीकरण \( PV^\gamma = \text{नियतांक} \) से जुड़े होते हैं, जिसमें \( \gamma \) एक खास संख्या है।
🎯 Exam Tip: रुद्धोष्म प्रक्रम में \( PV^\gamma = \text{नियतांक} \) और समतापीय प्रक्रम में \( PV = \text{नियतांक} \) के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से याद रखें।
Question 5. ऊष्मा इंजन की दक्षता की विमा क्या होती है?
Answer: ऊष्मा इंजन की दक्षता विमाहीन होती है। दक्षता को इंजन द्वारा किए गए उपयोगी कार्य और स्रोत से ली गई ऊष्मा के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। चूंकि यह समान भौतिक राशियों का अनुपात है, इसलिए इसकी कोई इकाई या विमा नहीं होती है।
In simple words: ऊष्मा इंजन की दक्षता की कोई माप या इकाई नहीं होती है क्योंकि यह दो एक जैसी चीजों का अनुपात है।
🎯 Exam Tip: 'दक्षता' एक अनुपात होने के कारण हमेशा विमाहीन होती है, चाहे वह किसी भी प्रकार की दक्षता हो।
Question 6. समदाबीय प्रक्रम में निकाय की अवस्था परिवर्तन से दाब में क्या परिवर्तन होता है?
Answer: समदाबीय प्रक्रम में निकाय की अवस्था परिवर्तन से दाब में कोई परिवर्तन नहीं होता, अर्थात दाब परिवर्तन शून्य होता है। इस प्रक्रम को समदाबीय (Isobaric) इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें दाब स्थिर रहता है, जबकि आयतन और तापमान बदल सकते हैं।
In simple words: समदाबीय प्रक्रम में, सिस्टम की स्थिति बदलने पर भी दबाव बिलकुल नहीं बदलता है, यह हमेशा स्थिर रहता है।
🎯 Exam Tip: 'समदाबीय' शब्द का अर्थ ही 'समान दाब' है। इस प्रक्रम में दाब को स्थिर माना जाता है।
Question 7. क्या किसी गैस के ताप में वृद्धि बिना ऊष्मा दिये की जा सकती है?
Answer: हाँ, किसी गैस के ताप में वृद्धि बिना ऊष्मा दिए भी की जा सकती है। यह रुद्धोष्म संपीड़न प्रक्रम में होता है। जब किसी गैस को तेजी से संपीड़ित किया जाता है, तो उस पर कार्य किया जाता है, जिससे उसकी आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है और परिणामस्वरूप उसका तापमान भी बढ़ जाता है।
In simple words: हाँ, एक गैस का तापमान बिना उसे गर्म किए भी बढ़ सकता है, खासकर जब उसे बहुत तेज़ी से दबाया जाता है (रुद्धोष्म संपीड़न)।
🎯 Exam Tip: रुद्धोष्म प्रक्रम में ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता है, लेकिन आंतरिक ऊर्जा और कार्य के बीच संबंध से ताप में परिवर्तन संभव है।
Question 8. ऊष्मागतिकी का शून्य नियम किस ऊष्मागतिकी चर को परिभाषित करता है?
Answer: ऊष्मागतिकी का शून्य नियम 'ताप' (Temperature) को परिभाषित करता है। यह नियम बताता है कि यदि दो निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ तापीय संतुलन में हैं, तो वे आपस में भी तापीय संतुलन में होंगे, जिससे एक सामान्य गुण, जिसे हम तापमान कहते हैं, की अवधारणा स्थापित होती है।
In simple words: ऊष्मागतिकी का शून्य नियम हमें 'तापमान' के बारे में बताता है और इसे परिभाषित करता है।
🎯 Exam Tip: शून्य नियम को अक्सर थर्मामीटर के काम करने के सिद्धांत से जोड़ा जाता है, क्योंकि यह बताता है कि कैसे हम किसी वस्तु का तापमान माप सकते हैं।
Question 9. समतापीय व रुद्धोष्म प्रक्रम में किसी गैस की विशिष्ट ऊष्मा क्या होती है?
Answer: समतापीय प्रक्रम में किसी गैस की विशिष्ट ऊष्मा अनन्त (Infinity) होती है, क्योंकि तापमान को स्थिर रखने के लिए कितनी भी ऊष्मा दी जा सकती है या निकाली जा सकती है। रुद्धोष्म प्रक्रम में, गैस की विशिष्ट ऊष्मा शून्य होती है, क्योंकि इस प्रक्रम में ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है, भले ही तापमान बदल जाए।
In simple words: समतापीय प्रक्रम में गैस की विशिष्ट ऊष्मा असीमित होती है, जबकि रुद्धोष्म प्रक्रम में यह शून्य होती है।
🎯 Exam Tip: समतापीय में \( \Delta T = 0 \) और रुद्धोष्म में \( \Delta Q = 0 \) के कारण विशिष्ट ऊष्मा \( C = \frac{\Delta Q}{m \Delta T} \) के मानों को समझें।
Question 10. कार्नो चक्र किस प्रकार का प्रक्रम है?
Answer: कार्नो चक्र एक आदर्श, उत्क्रमणीय ऊष्मागतिक प्रक्रम है जो एक ऊष्मा इंजन की अधिकतम संभव दक्षता को दर्शाता है। यह चक्र दो निश्चित तापों, स्रोत (उच्च ताप) और सिंक (निम्न ताप) के बीच संचालित होता है। इसकी दक्षता केवल इन तापों पर निर्भर करती है, कार्यकारी पदार्थ पर नहीं।
In simple words: कार्नो चक्र एक बहुत ही खास और आदर्श तरीका है जिससे एक इंजन काम कर सकता है, यह दो अलग-अलग तापमानों के बीच चलता है।
🎯 Exam Tip: कार्नो चक्र को हमेशा एक सैद्धांतिक, आदर्श और उत्क्रमणीय चक्र के रूप में याद रखें, जो वास्तविक इंजनों के लिए एक बेंचमार्क है।
Rbse Class 11 Physics Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. "उत्क्रमणीयता एक आदर्श इंजन की कसौटी है।” उक्त कथन की व्याख्या कीजिये।
Answer: उत्क्रमणीय प्रक्रम (Reversible Process) वह प्रक्रम है जिसे ठीक उन्हीं अवस्थाओं से विपरीत दिशा में संचालित किया जा सकता है, जिन अवस्थाओं से उसे सीधी दिशा में संचालित किया गया था। यदि सीधे प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ \( \Delta Q \) ऊष्मा अवशोषित करता है और \( \Delta W \) कार्य करता है, तो विपरीत प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ पर \( \Delta W \) कार्य करने पर \( \Delta Q \) ऊष्मा प्राप्त होगी। ऐसे प्रक्रम में निकाय और परिवेश की अवस्था में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं होता है। एक आदर्श इंजन की दक्षता को अधिकतम करने के लिए, प्रक्रमों का उत्क्रमणीय होना आवश्यक है, क्योंकि उत्क्रमणीयता का अर्थ है कि कोई भी ऊर्जा हानि नहीं होनी चाहिए। इसलिए, उत्क्रमणीयता को एक आदर्श इंजन की कसौटी माना जाता है।
उत्क्रमणीय प्रक्रम की शर्तें:
- चालन, संवहन और विकिरण से ऊर्जा की हानि नहीं होनी चाहिए।
- घर्षण, विद्युत प्रतिरोध, श्यानता जैसे ऊर्जा हानि करने वाले प्रभाव नहीं होने चाहिए।
- परिवर्तन बहुत धीमी गति से होना चाहिए।
- निकाय साम्यावस्था की स्थिति से अधिक विचलित नहीं होना चाहिए।
अतः व्यवहार में उत्क्रमणीय प्रक्रम असंभव हैं, लेकिन ये एक आदर्श इंजन के लिए एक मानक स्थापित करते हैं।
In simple words: उत्क्रमणीय प्रक्रम वह है जिसे पूरी तरह से उल्टा किया जा सके, बिना किसी बदलाव के। एक आदर्श इंजन के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण गुण है, क्योंकि तभी वह अपनी अधिकतम क्षमता पर काम कर सकता है, पर असल दुनिया में यह संभव नहीं है।
🎯 Exam Tip: उत्क्रमणीयता की शर्तों को याद रखें, जैसे धीमी गति और ऊर्जा हानि का अभाव। ये स्थितियाँ ही एक प्रक्रम को उत्क्रमणीय बनाती हैं।
Question 2. ऊष्मा इंजन की दक्षता की व्याख्या कीजिये।
Answer: ऊष्मा इंजन की दक्षता यह बताती है कि एक ऊष्मा इंजन स्रोत से प्राप्त ऊष्मा के कितने अंश को उपयोगी कार्य में बदल पाता है। इसे \( \eta \) (ईटा) से दर्शाया जाता है।
इसका सूत्र निम्न है:
\( \eta = \frac{\text{किया गया उपयोगी कार्य (W)}}{\text{स्रोत से ली गई ऊष्मा (Q1)}} \)
उदाहरण के लिए, यदि एक इंजन स्रोत से 100 जूल ऊष्मा लेता है और 40 जूल उपयोगी कार्य करता है, तो उसकी दक्षता \( \eta = \frac{40}{100} = 0.4 \) या 40% होगी। दक्षता हमेशा 0 और 1 के बीच या 0% और 100% के बीच होती है।
In simple words: ऊष्मा इंजन की दक्षता यह बताती है कि इंजन कितनी गर्मी को काम में बदल पाता है। यह जितना ज़्यादा होगा, इंजन उतना ही अच्छा काम करेगा।
🎯 Exam Tip: दक्षता की परिभाषा और सूत्र को ठीक से याद रखें। कार्य और ली गई ऊष्मा की इकाइयों को समान रखना महत्वपूर्ण है।
Question 3. ऊष्मागतिकी क्या है? ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम की व्याख्या कीजिये तथा इसके महत्व पर प्रकाश डालिये?
Answer: ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह शाखा है जो ताप, ऊष्मा और ऊर्जा के विभिन्न रूपों के बीच संबंधों का अध्ययन करती है, जिसमें ऊष्मीय ऊर्जा का अन्य ऊर्जाओं में और यांत्रिक कार्य के साथ उसके आदान-प्रदान का विश्लेषण शामिल है।
ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम: यह एक मूलभूत सिद्धांत है जो ताप की अवधारणा को परिभाषित करता है। इस नियम के अनुसार, यदि दो निकाय (जैसे A और B) किसी तीसरे निकाय (C) के साथ अलग-अलग तापीय संतुलन में हैं, तो वे दोनों निकाय (A और B) भी आपस में तापीय संतुलन में होंगे।
निम्न आरेख शून्यांकी नियम को दर्शाता है, जहाँ A और B ऊष्मीय अवरोधक से अलग हैं, लेकिन दोनों C से ऊष्मीय चालक द्वारा जुड़े हैं:
महत्व: यह नियम ताप की अवधारणा के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है, जिससे तापमान को एक मात्रात्मक गुण के रूप में मापा जा सकता है। यह थर्मामीटर के कार्य सिद्धांत को भी समझाता है।
In simple words: ऊष्मागतिकी गर्मी और ऊर्जा के अध्ययन का विज्ञान है। इसका शून्य नियम कहता है कि अगर दो चीजें (A और B) किसी तीसरी चीज (C) के साथ तापमान में बराबर हैं, तो A और B भी आपस में तापमान में बराबर होंगे। इसका महत्व यह है कि यह तापमान को मापने का आधार देता है।
🎯 Exam Tip: ऊष्मागतिकी के तीनों नियमों के केंद्रीय विचारों को याद रखें: शून्य नियम (तापमान), प्रथम नियम (ऊर्जा संरक्षण), द्वितीय नियम (एन्ट्रॉपी और प्रक्रम की दिशा)।
Question 4. एक निकाय की ऊष्मा, कार्य व आन्तरिक ऊर्जा की व्याख्या कीजिये।
Answer:
ऊष्मा (Heat): यह दो निकायों के बीच तापमान अंतर के कारण स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा है। ऊष्मा हमेशा उच्च तापमान से निम्न तापमान की ओर प्रवाहित होती है। यह ऊर्जा का एक रूप है जो तापीय संपर्क के माध्यम से एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली में प्रवाहित होता है।
कार्य (Work): यह भी ऊर्जा का एक स्थानान्तरण है जो किसी निकाय द्वारा या उस पर किया जाता है, लेकिन यह तापमान अंतर पर निर्भर नहीं करता। उदाहरण के लिए, गैस का विस्तार होने पर किया गया या उस पर किया गया कार्य।
आन्तरिक ऊर्जा (Internal Energy): यह किसी निकाय के अणुओं की कुल गतिज और स्थितिज ऊर्जा का योग है। जब किसी निकाय को ऊष्मा दी जाती है, तो उसका कुछ हिस्सा कार्य करने में उपयोग होता है और शेष उसकी आंतरिक ऊर्जा को बढ़ा देता है। यह निकाय की अवस्था पर निर्भर करती है।
In simple words: ऊष्मा वह ऊर्जा है जो तापमान के अंतर से चलती है। कार्य वह ऊर्जा है जो बल लगाने से होती है। आंतरिक ऊर्जा किसी चीज़ के अंदर की कुल ऊर्जा है, जो उसके कणों की गति और स्थिति पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: इन तीनों अवधारणाओं को ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम \( (\Delta Q = dU + \Delta W) \) से जोड़कर समझें, जहाँ ऊष्मा (Q) आंतरिक ऊर्जा (U) और कार्य (W) के रूप में परिवर्तित होती है।
Question 5. ऊष्मागतिकीय चर राशियाँ व ऊष्मागतिकीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं?
Answer:
ऊष्मागतिकीय चर राशियाँ (Thermodynamical State Variables): ये वे मैक्रोस्कोपिक गुण होते हैं जो ऊष्मागतिकीय निकाय की अवस्था को परिभाषित करते हैं। इनमें दाब (P), आयतन (V), और ताप (T) जैसे चर शामिल हैं। ये चर निकाय की अवस्था का वर्णन करते हैं और किसी भी दो चरों को जानने पर तीसरे को निर्धारित किया जा सकता है।
ऊष्मागतिकीय प्रक्रम (Thermodynamical Process): जब किसी ऊष्मागतिकीय निकाय के ऊष्मागतिकीय चर बदलते हैं, तो निकाय की अवस्था में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन को ऊष्मागतिकीय प्रक्रम कहते हैं। कुछ महत्वपूर्ण ऊष्मागतिकीय प्रक्रम निम्न हैं:
- समातापीय प्रक्रम (Isothermal process)
- रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic process)
- समआयतनिक प्रक्रम (Isochoric process)
- समदाबीय प्रक्रम (Isobaric process)
- चक्रीय प्रक्रम (Cyclic process)
यह प्रक्रम ऊर्जा के विभिन्न रूपों के बीच रूपांतरण को समझने में मदद करते हैं।
In simple words: ऊष्मागतिकीय चर वो चीज़ें हैं जो किसी सिस्टम की हालत बताती हैं, जैसे उसका दबाव, आयतन या तापमान। ऊष्मागतिकीय प्रक्रम तब होता है जब ये चर बदलते हैं और सिस्टम की हालत बदल जाती है, जैसे गर्म होना या ठंडा होना।
🎯 Exam Tip: ऊष्मागतिकीय चरों (P, V, T) को हमेशा एक साथ याद रखें और प्रत्येक प्रक्रम के नाम से ही उसकी मुख्य विशेषता का अनुमान लगाएं (जैसे 'समतापीय' मतलब ताप समान)।
Question 6. समतापीय प्रक्रम में किये गये कार्य को समझाइये।
Answer: समतापीय प्रक्रम वह प्रक्रम है जिसमें निकाय का तापमान पूरे प्रक्रम के दौरान स्थिर रहता है (\( \Delta T = 0 \))। यदि किसी गैस के दाब और आयतन में परिवर्तन इस तरह से किया जाए कि उसका तापमान नियत रहे, तो यह एक समतापीय प्रक्रम कहलाता है। इस प्रक्रम में, निकाय अपनी आंतरिक ऊर्जा को स्थिर रखता है।
समतापीय प्रक्रम के लिए आवश्यक प्रतिबंध:
- प्रक्रम बहुत धीमी गति से होना चाहिए ताकि निकाय को परिवेश से ऊष्मा का आदान-प्रदान करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके और तापमान स्थिर बना रहे।
- पात्र की दीवारें ऊष्मा की अच्छी सुचालक होनी चाहिए ताकि निकाय परिवेश के साथ प्रभावी तापीय संपर्क में रह सके।
समतापीय प्रक्रम में गैस का दाब (P) तथा आयतन (V) में खींचा गया ग्राफ एक अतिपरवलय प्राप्त होता है, जिसे समतापीय वक्र कहते हैं। दो समतापीय वक्र कभी भी एक-दूसरे को नहीं काटते, क्योंकि ऐसा होने पर कटाव बिंदु पर एक ही दाब और आयतन के लिए दो अलग-अलग तापमान संभव हो जाएंगे, जो आदर्श गैस समीकरण (PV = nRT) के अनुसार संभव नहीं है।
समतापीय प्रक्रम में किया गया कार्य:
मान लीजिये एक आदर्श गैस जिसका तापमान \( T \) नियत है। यदि गैस का आयतन \( V_1 \) से \( V_2 \) तक फैलता है, तो किया गया कार्य निम्न प्रकार से प्राप्त किया जाता है:
छोटे आयतन परिवर्तन \( dV \) के लिए किया गया कार्य \( dW = PdV \)
आदर्श गैस समीकरण के अनुसार, \( PV = nRT \implies P = \frac{nRT}{V} \)
कुल कार्य \( W \) ज्ञात करने के लिए, हम \( V_1 \) से \( V_2 \) तक समाकलन करते हैं:
\( W = \int_{V_1}^{V_2} P dV \)
\( W = \int_{V_1}^{V_2} \frac{nRT}{V} dV \)
\( W = nRT \int_{V_1}^{V_2} \frac{1}{V} dV \)
\( W = nRT [\ln V]_{V_1}^{V_2} \)
\( W = nRT (\ln V_2 - \ln V_1) \)
\( W = nRT \ln \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \)
यदि प्राकृतिक लघुगणक (ln) को आधार 10 के लघुगणक (log\(_{10}\)) में बदलते हैं, तो:
\( W = 2.303 nRT \log_{10} \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \)
चूँकि समतापीय प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता (\( dU = 0 \)), ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम (\( \Delta Q = dU + \Delta W \)) के अनुसार दी गई ऊष्मा \( \Delta Q \) गैस द्वारा किए गए कार्य \( \Delta W \) के बराबर होती है।
यह प्रक्रिया नीचे दिए गए P-V आरेख द्वारा भी समझाई जा सकती है:
In simple words: समतापीय प्रक्रम में तापमान स्थिर रहता है। इस प्रक्रम में गैस जो काम करती है, उसे \( W = nRT \ln \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \) सूत्र से निकाला जाता है। चूंकि तापमान नहीं बदलता, इसलिए दी गई सारी गर्मी काम में बदल जाती है।
🎯 Exam Tip: समतापीय प्रक्रम के लिए कार्य का सूत्र और उसके प्रतिबंधों को ध्यान में रखें। यह प्रक्रम वास्तविक दुनिया में धीरे-धीरे होता है।
Question 7. ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की व्याख्या कीजिये।
Answer: ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है, जिसके अनुसार ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, बल्कि इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।
जब किसी निकाय को \( \Delta Q \) ऊष्मा दी जाती है, तो इसका कुछ भाग परिवेश के विरुद्ध कार्य \( \Delta W \) करने में उपयोग होता है (जिससे आयतन में वृद्धि होती है), और शेष भाग गैस की आंतरिक ऊर्जा \( dU \) को बढ़ाता है (जिससे ताप में वृद्धि होती है)।
ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार, ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है:
\( \Delta Q = dU + \Delta W \)
इस समीकरण का अर्थ है कि निकाय को दी गई कुल ऊष्मा ( \( \Delta Q \) ) उसके आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन ( \( dU \) ) और उस पर किए गए कार्य ( \( \Delta W \) ) के योग के बराबर होती है। यह नियम बताता है कि ऊष्मा ऊर्जा का ही एक रूप है और ऊष्मागतिकीय निकाय की कुल ऊर्जा हमेशा संरक्षित रहती है।
यह नियम एक पिस्टन-सिलेंडर व्यवस्था द्वारा समझाया जा सकता है, जहाँ पिस्टन के ऊपर दाब (P) है और क्षेत्रफल (A) है:
In simple words: ऊष्मागतिकी का पहला नियम कहता है कि ऊर्जा कभी खत्म नहीं होती, बस रूप बदलती है। अगर आप किसी सिस्टम को गर्मी देते हैं, तो वह गर्मी दो चीजों में बंट जाती है: कुछ सिस्टम के अंदर की ऊर्जा बढ़ाती है, और कुछ सिस्टम बाहर काम करता है।
🎯 Exam Tip: प्रथम नियम के सूत्र \( \Delta Q = dU + \Delta W \) के प्रत्येक पद का अर्थ स्पष्ट रूप से याद रखें और साइन कन्वेंशन (कार्य और ऊष्मा के लिए) को समझें।
Question 8. मेयर के सम्बन्ध की व्युत्पत्ति कीजिये।
Answer: मेयर का संबंध, आदर्श गैस की दो विशिष्ट ऊष्माओं \( C_p \) (स्थिर दाब पर विशिष्ट ऊष्मा) और \( C_v \) (स्थिर आयतन पर विशिष्ट ऊष्मा) के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध स्थापित करता है।
हम जानते हैं कि आदर्श गैस के लिए, जब इसे स्थिर दाब पर गर्म किया जाता है, तो यह कुछ आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि करती है और कुछ कार्य भी करती है। जबकि स्थिर आयतन पर, यह केवल आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि करती है।
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार, स्थिर दाब पर प्रति मोल ऊष्मा परिवर्तन \( \Delta Q_p \) निम्न प्रकार है:
\( \Delta Q_p = dU + P \Delta V \)
हम यह भी जानते हैं कि \( \Delta Q_p = \mu C_p \Delta T \) और \( dU = \mu C_v \Delta T \) ।
आदर्श गैस समीकरण \( PV = \mu RT \) से, स्थिर दाब पर \( P \Delta V = \mu R \Delta T \)
इन मानों को समीकरण में रखने पर:
\( \mu C_p \Delta T = \mu C_v \Delta T + \mu R \Delta T \)
दोनों तरफ \( \mu \Delta T \) से भाग देने पर:
\( C_p = C_v + R \)
\( \implies C_p - C_v = R \)
यह समीकरण मेयर का संबंध कहलाता है। इसके अनुसार, किसी गैस की दो मोलर विशिष्ट ऊष्माओं का अंतर गैस नियतांक (R) के समान होता है। यह संबंध आदर्श गैसों के व्यवहार को समझने में मौलिक है।
In simple words: मेयर का संबंध \( C_p - C_v = R \) हमें बताता है कि स्थिर दबाव पर गैस को गर्म करने के लिए लगने वाली गर्मी ( \( C_p \) ) और स्थिर आयतन पर लगने वाली गर्मी ( \( C_v \) ) में कितना अंतर होता है। यह अंतर गैस नियतांक (R) के बराबर होता है।
🎯 Exam Tip: मेयर के संबंध \( C_p - C_v = R \) को उसके महत्व के साथ याद रखें और इस बात पर ध्यान दें कि यह केवल आदर्श गैसों पर लागू होता है।
Question 9. उत्क्रमणीय व अनुत्क्रमणीय इंजन में अन्तर स्पष्ट कीजिये?
Answer: उत्क्रमणीय और अनुत्क्रमणीय इंजन में मुख्य अंतर उनकी संचालन प्रक्रिया और दक्षता से संबंधित है:
- उत्क्रमणीय प्रक्रम: यह वह प्रक्रम है जिसे विपरीत दिशा में संचालित किया जा सकता है, ठीक उन्हीं चरणों से, जिन चरणों से इसे सीधी दिशा में संचालित किया गया था। इसमें कोई ऊर्जा हानि नहीं होती और निकाय अपनी प्रारंभिक अवस्था में वापस आ सकता है।
- उत्क्रमणीय इंजन: यह वह इंजन है जो उत्क्रमणीय प्रक्रमों के अनुसार कार्य करता है। इसकी दक्षता अधिकतम संभव होती है और यह कार्यकारी पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती, केवल स्रोत और सिंक के तापमान पर निर्भर करती है।
- अनुत्क्रमणीय प्रक्रम: यह वह प्रक्रम है जिसमें कम से कम एक प्रक्रिया ऐसी होती है जिसे विपरीत दिशा में ठीक उसी तरह से संचालित नहीं किया जा सकता। इसमें हमेशा ऊर्जा की हानि होती है (जैसे घर्षण, चालन आदि के कारण) और निकाय अपनी प्रारंभिक अवस्था में वापस नहीं आ पाता।
- अनुत्क्रमणीय इंजन: यह वह इंजन है जो अनुत्क्रमणीय प्रक्रमों के अनुसार कार्य करता है। वास्तविक दुनिया के सभी इंजन अनुत्क्रमणीय होते हैं और इनकी दक्षता हमेशा उत्क्रमणीय इंजन से कम होती है।
सरल शब्दों में, उत्क्रमणीय इंजन एक आदर्श स्थिति है जहाँ कोई ऊर्जा बर्बाद नहीं होती, जबकि अनुत्क्रमणीय इंजन वास्तविक इंजन होते हैं जहाँ हमेशा कुछ ऊर्जा बर्बाद होती है।
In simple words: उत्क्रमणीय इंजन आदर्श होते हैं और इन्हें बिना किसी नुकसान के उल्टा चलाया जा सकता है, जबकि अनुत्क्रमणीय इंजन वास्तविक होते हैं, जिन्हें उल्टा चलाने पर कुछ नुकसान होता है।
🎯 Exam Tip: उत्क्रमणीयता की मुख्य विशेषताओं (कोई हानि नहीं, पूर्ण वापसी) को याद रखें और इसे वास्तविक दुनिया के अनुत्क्रमणीय प्रक्रमों के विपरीत रखें।
Question 10. किसी गैस के रुद्धोष्म प्रसार को समझाते हुये किये गये कार्य की व्याख्या कीजिये।
Answer: रुद्धोष्म प्रक्रम वह होता है जिसमें निकाय और परिवेश के बीच ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान नहीं होता (\( \Delta Q = 0 \))। जब कोई गैस रुद्धोष्म रूप से फैलती है (प्रसार करती है), तो वह स्वयं कार्य करती है, जिससे उसकी आंतरिक ऊर्जा में कमी आती है और उसका तापमान गिर जाता है।
रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए आवश्यक प्रतिबंध:
- गैस का पात्र पूर्णतः कुचालक होना चाहिए ताकि ऊष्मा का आदान-प्रदान न हो सके।
- प्रक्रम बहुत तीव्र गति से होना चाहिए ताकि ऊष्मा के आदान-प्रदान के लिए पर्याप्त समय न मिल सके।
रुद्धोष्म प्रक्रम का अवस्था समीकरण \( PV^\gamma = \text{नियतांक} \) है।
रुद्धोष्म प्रसार में किया गया कार्य:
रुद्धोष्म प्रक्रम में किया गया कार्य \( W \) निम्न प्रकार से व्युत्पन्न किया जाता है:
हम जानते हैं कि \( W = \int_{V_1}^{V_2} P dV \)
रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए \( PV^\gamma = K \) (जहाँ \( K \) एक नियतांक है) \( \implies P = \frac{K}{V^\gamma} \)
मान रखने पर:
\( W = \int_{V_1}^{V_2} \frac{K}{V^\gamma} dV = K \int_{V_1}^{V_2} V^{-\gamma} dV \)
\( W = K \left[ \frac{V^{-\gamma+1}}{-\gamma+1} \right]_{V_1}^{V_2} = \frac{K}{1-\gamma} [V_2^{1-\gamma} - V_1^{1-\gamma}] \)
क्योंकि \( K = P_1 V_1^\gamma = P_2 V_2^\gamma \), मान रखने पर:
\( W = \frac{1}{1-\gamma} [P_2 V_2^\gamma V_2^{1-\gamma} - P_1 V_1^\gamma V_1^{1-\gamma}] \)
\( W = \frac{1}{1-\gamma} [P_2 V_2 - P_1 V_1] \)
आदर्श गैस समीकरण \( PV = nRT \) का उपयोग करके:
\( W = \frac{1}{1-\gamma} [nRT_2 - nRT_1] = \frac{nR}{1-\gamma} (T_2 - T_1) = \frac{nR}{\gamma-1} (T_1 - T_2) \)
रुद्धोष्म प्रसार को नीचे दिए गए P-V वक्र द्वारा दर्शाया गया है:
In simple words: रुद्धोष्म प्रसार में गैस बिना गर्मी लिए फैलती है। जब यह फैलती है, तो खुद काम करती है, जिससे उसकी अंदरूनी ऊर्जा कम होती है और वह ठंडी हो जाती है। काम की गणना के लिए एक खास सूत्र \( W = \frac{nR}{\gamma-1} (T_1 - T_2) \) का उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए कार्य के सूत्र और तापमान परिवर्तन के संबंध को याद रखें। प्रसार में \( T_1 > T_2 \) और संपीड़न में \( T_2 > T_1 \) होता है।
Rbse Class 11 Physics Chapter 13 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. ऊष्मागतिकी के शून्यांकी, प्रथम व द्वितीय नियम की विस्तारपूर्वक व्याख्या कीजिये।
Answer: ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह शाखा है जो ताप, ऊष्मा, ऊर्जा और कार्य के बीच संबंधों का अध्ययन करती है। इसमें ऊर्जा के रूपांतरण और उसकी प्रकृति को समझा जाता है।
1. ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम (Zeroth Law of Thermodynamics):
यह नियम ताप की अवधारणा को परिभाषित करता है। इसके अनुसार, यदि दो निकाय (A और B) किसी तीसरे निकाय (C) के साथ अलग-अलग तापीय संतुलन में हैं, तो वे निकाय (A और B) भी आपस में तापीय संतुलन में होंगे। इसका मतलब है कि उन सभी का तापमान समान होगा।
यह नियम एक सामान्य गुण, 'तापमान' के अस्तित्व को स्थापित करता है, जो ऊर्जा के प्रवाह की दिशा निर्धारित करता है। यह थर्मामीटर के कार्य सिद्धांत का आधार है।
आरेख में, निकाय A और B को एक ऊष्मीय अवरोधक से अलग किया गया है, जबकि दोनों निकाय C के साथ ऊष्मीय चालक के माध्यम से जुड़े हैं:
इसका महत्व यह है कि यह ताप के गुण को स्थापित करता है, जिससे हम विभिन्न प्रणालियों के तापमान की तुलना कर सकते हैं।
2. ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law of Thermodynamics):
यह ऊर्जा संरक्षण का नियम है, जिसके अनुसार ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, बल्कि इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। जब किसी निकाय को \( \Delta Q \) ऊष्मा दी जाती है, तो यह ऊष्मा दो भागों में विभाजित हो जाती है: एक भाग आंतरिक ऊर्जा (\( dU \)) में परिवर्तन के रूप में संग्रहित होता है, और दूसरा भाग परिवेश के विरुद्ध कार्य (\( \Delta W \)) करने में उपयोग होता है।
इसका गणितीय रूप है:
\( \Delta Q = dU + \Delta W \)
जहाँ \( \Delta Q \) निकाय को दी गई ऊष्मा, \( dU \) आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन और \( \Delta W \) निकाय द्वारा किया गया कार्य है।
यह नियम एक पिस्टन-सिलेंडर व्यवस्था द्वारा समझाया जा सकता है, जहाँ पिस्टन के ऊपर दाब (P) है और क्षेत्रफल (A) है:
प्रथम नियम के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें:
- यदि निकाय द्वारा कार्य किया जाता है, तो \( \Delta W \) धनात्मक होता है; यदि निकाय पर कार्य किया जाता है, तो \( \Delta W \) ऋणात्मक होता है।
- यदि निकाय द्वारा ऊष्मा ली जाती है, तो \( \Delta Q \) धनात्मक होता है; यदि निकाय ऊष्मा देता है, तो \( \Delta Q \) ऋणात्मक होता है।
- यदि आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है, तो \( dU \) धनात्मक होता है; यदि आंतरिक ऊर्जा घटती है, तो \( dU \) ऋणात्मक होता है।
यह नियम ऊर्जा के विभिन्न रूपों के बीच रूपांतरण की सीमाओं को नहीं बताता है, बल्कि केवल ऊर्जा की कुल मात्रा को संरक्षित रखता है।
3. ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law of Thermodynamics):
द्वितीय नियम ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की अपूर्णता को दूर करता है। प्रथम नियम केवल ऊर्जा के संरक्षण को बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि कोई प्रक्रम किस दिशा में होगा या कोई ऊर्जा रूपांतरण कितना संभव है। द्वितीय नियम ऊर्जा के प्रवाह की दिशा और उसकी गुणवत्ता से संबंधित है। यह कई कथनों में व्यक्त किया गया है, जिनमें से प्रमुख हैं:
(a) केल्विन-प्लांक का कथन: "ऐसा कोई भी चक्रीय प्रक्रम बनाना असंभव है जिसका एकमात्र परिणाम स्रोत से ऊष्मा का पूर्ण अवशोषण करके उसे पूरी तरह से कार्य में परिवर्तित करना हो।" दूसरे शब्दों में, 100% दक्षता वाला ऊष्मा इंजन बनाना असंभव है। इंजन को कार्य प्राप्त करने के लिए स्रोत और सिंक दोनों की आवश्यकता होती है।
(b) क्लासियस का कथन: "बिना किसी बाहरी कार्य के, निम्न ताप वाली वस्तु से उच्च ताप वाली वस्तु में ऊष्मा का स्वतः स्थानान्तरण असंभव है।" इसका मतलब है कि ऊष्मा अपने आप ठंडी जगह से गर्म जगह की ओर नहीं जा सकती, जैसे कि रेफ्रिजरेटर को काम करने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है।
ये दोनों कथन एक-दूसरे के तुल्य हैं और एक ही मौलिक सिद्धांत को दर्शाते हैं: ऊर्जा का स्वतः प्रवाह हमेशा उच्च ऊर्जा से निम्न ऊर्जा की ओर होता है, और किसी भी ऊर्जा रूपांतरण में हमेशा कुछ ऊर्जा अनुपलब्ध हो जाती है (एन्ट्रॉपी बढ़ती है)।
In simple words: ऊष्मागतिकी में तीन मुख्य नियम हैं। पहला (शून्य नियम) तापमान को परिभाषित करता है। दूसरा (पहला नियम) कहता है कि ऊर्जा न तो बनती है और न नष्ट होती है, बस रूप बदलती है। तीसरा (दूसरा नियम) बताता है कि गर्मी हमेशा गर्म से ठंडी चीज़ की ओर बहती है, और कोई भी इंजन 100% कुशल नहीं हो सकता।
🎯 Exam Tip: तीनों नियमों को अलग-अलग समझें और उनके केंद्रीय संदेशों को याद रखें। द्वितीय नियम के दोनों कथन (केल्विन-प्लांक और क्लासियस) एक-दूसरे के तुल्य हैं, यह महत्वपूर्ण है।
Question 2. ऊष्मागतिकी के विभिन्न प्रक्रमों व उनमें किये गये कार्य की व्याख्या कीजिये।
Answer: ऊष्मागतिकीय प्रक्रम तब होता है जब किसी निकाय के ऊष्मागतिकीय चर (दाब, आयतन, ताप) बदलते हैं। इन प्रक्रमों में ऊर्जा का आदान-प्रदान और कार्य का निष्पादन होता है। मुख्य ऊष्मागतिकीय प्रक्रम और उनमें किए गए कार्य का विवरण निम्न प्रकार है:
1. समतापीय प्रक्रम (Isothermal Process):
इस प्रक्रम में निकाय का तापमान स्थिर रहता है (\( \Delta T = 0 \))। यदि गैस को धीमी गति से संपीड़ित या प्रसारित किया जाता है, और ऊष्मा का आदान-प्रदान परिवेश से हो सकता है, तो तापमान स्थिर रहता है।
कार्य की गणना:
समतापीय प्रक्रम में किया गया कार्य \( W = nRT \ln \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \)
जहाँ \( n \) मोलों की संख्या, \( R \) गैस नियतांक, \( T \) परम तापमान, \( V_1 \) प्रारंभिक आयतन और \( V_2 \) अंतिम आयतन है।
चूँकि आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन शून्य होता है (\( dU=0 \)), प्रथम नियम के अनुसार \( \Delta Q = W \), यानी दी गई सारी ऊष्मा कार्य में बदल जाती है।
2. रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic Process):
इस प्रक्रम में निकाय और परिवेश के बीच ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान नहीं होता (\( \Delta Q = 0 \))। यह या तो एक पूर्ण कुचालक पात्र में होता है या प्रक्रम इतनी तेजी से होता है कि ऊष्मा को आदान-प्रदान का समय नहीं मिलता।
कार्य की गणना:
रुद्धोष्म प्रक्रम में किया गया कार्य \( W = \frac{nR}{\gamma-1} (T_1 - T_2) \)
जहाँ \( \gamma = \frac{C_p}{C_v} \) विशिष्ट ऊष्माओं का अनुपात है।
चूँकि \( \Delta Q = 0 \), प्रथम नियम के अनुसार \( dU = -W \)। यदि गैस कार्य करती है (प्रसार), तो आंतरिक ऊर्जा कम होती है और तापमान गिरता है। यदि गैस पर कार्य किया जाता है (संपीड़न), तो आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है और तापमान बढ़ता है।
3. समआयतनिक प्रक्रम (Isochoric Process):
इस प्रक्रम में निकाय का आयतन स्थिर रहता है (\( \Delta V = 0 \))। चूंकि आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो गैस द्वारा या उस पर कोई कार्य नहीं किया जाता (\( W = P \Delta V = 0 \))।
प्रथम नियम के अनुसार \( \Delta Q = dU \), यानी दी गई सारी ऊष्मा आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि करती है।
4. समदाबीय प्रक्रम (Isobaric Process):
इस प्रक्रम में निकाय का दाब स्थिर रहता है (\( \Delta P = 0 \))। इस प्रक्रम में आयतन और तापमान बदल सकते हैं।
कार्य की गणना: \( W = P \Delta V = P(V_2 - V_1) \)
यह कार्य P-V आरेख में दाब अक्ष के समानांतर एक रेखा के नीचे का क्षेत्रफल होता है।
5. चक्रीय प्रक्रम (Cyclic Process):
इस प्रक्रम में निकाय कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद अपनी प्रारंभिक अवस्था में वापस आ जाता है। चक्रीय प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा में कुल परिवर्तन शून्य होता है (\( \Delta U = 0 \))।
प्रथम नियम के अनुसार \( \Delta Q = W \), यानी एक पूर्ण चक्र में निकाय द्वारा अवशोषित कुल ऊष्मा उसके द्वारा किए गए कुल कार्य के बराबर होती है।
In simple words: ऊष्मागतिकी के प्रक्रम बताते हैं कि सिस्टम में कैसे बदलाव आते हैं, जैसे तापमान या आयतन बदलना। हर प्रक्रम में काम करने का तरीका अलग होता है: समतापीय में तापमान स्थिर रहता है और काम \( nRT \ln \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \) होता है; रुद्धोष्म में गर्मी नहीं बदलती और काम \( \frac{nR}{\gamma-1} (T_1 - T_2) \) होता है; समआयतनिक में आयतन नहीं बदलता तो काम शून्य होता है; समदाबीय में दबाव स्थिर रहता है और काम \( P(V_2 - V_1) \) होता है; और चक्रीय प्रक्रम में सिस्टम अपनी शुरुआती जगह पर वापस आ जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक प्रक्रम की परिभाषा, उसकी विशिष्ट शर्त (\( \Delta T = 0 \) या \( \Delta Q = 0 \)) और उसमें किए गए कार्य के सूत्र को अच्छी तरह से समझें।
Question 3. समतापी व रुद्धोष्म प्रक्रम में अन्तर स्पष्ट करते हुये उक्त प्रक्रमों में किये गये कार्य की गणना कीजिये।
Answer: समतापीय और रुद्धोष्म प्रक्रम ऊष्मागतिकी के दो महत्वपूर्ण प्रक्रम हैं, जिनमें प्रमुख अंतर निम्न प्रकार हैं:
समतापीय प्रक्रम (Isothermal Process):
- तापमान: पूरे प्रक्रम के दौरान तापमान स्थिर रहता है (\( T = \text{नियतांक} \implies \Delta T = 0 \))।
- ऊष्मा विनिमय: निकाय परिवेश से ऊष्मा का आदान-प्रदान करता है ताकि तापमान स्थिर रहे। (\( \Delta Q \ne 0 \))।
- कार्य का स्रोत: आंतरिक ऊर्जा स्थिर रहती है, इसलिए किया गया कार्य सीधे परिवेश से ली गई या दी गई ऊष्मा के कारण होता है।
- प्रक्रिया की गति: यह एक बहुत ही धीमी गति से होने वाला प्रक्रम है ताकि ऊष्मा विनिमय के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
- अवस्था समीकरण: आदर्श गैसों के लिए \( PV = \text{नियतांक} \)।
- विशिष्ट ऊष्मा: अनंत (\( C_V = \infty \))।
- किया गया कार्य: \( W = nRT \ln \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \)
रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic Process):
- तापमान: प्रक्रम के दौरान तापमान बदलता है (\( \Delta T \ne 0 \))। प्रसार में तापमान घटता है और संपीड़न में बढ़ता है।
- ऊष्मा विनिमय: निकाय और परिवेश के बीच ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान नहीं होता (\( \Delta Q = 0 \))।
- कार्य का स्रोत: किया गया कार्य आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन के कारण होता है।
- प्रक्रिया की गति: यह एक बहुत ही तीव्र गति से होने वाला प्रक्रम है ताकि ऊष्मा विनिमय का समय न मिल सके।
- अवस्था समीकरण: आदर्श गैसों के लिए \( PV^\gamma = \text{नियतांक} \)।
- विशिष्ट ऊष्मा: शून्य (\( C_V = 0 \))।
- किया गया कार्य: \( W = \frac{nR}{\gamma-1} (T_1 - T_2) \)
संक्षेप में, समतापीय प्रक्रम में तापमान को स्थिर रखा जाता है, जबकि रुद्धोष्म प्रक्रम में ऊष्मा के प्रवाह को रोका जाता है, जिसके परिणामस्वरूप तापमान में परिवर्तन होता है। दोनों प्रक्रमों में किए गए कार्य के सूत्र अलग-अलग होते हैं क्योंकि उनके मौलिक सिद्धांत भिन्न होते हैं।
In simple words: समतापीय प्रक्रम में तापमान हमेशा एक जैसा रहता है, पर गर्मी का आदान-प्रदान होता है; रुद्धोष्म प्रक्रम में गर्मी का कोई आदान-प्रदान नहीं होता, पर तापमान बदल जाता है। दोनों में काम करने के सूत्र भी अलग-अलग होते हैं।
🎯 Exam Tip: समतापीय और रुद्धोष्म प्रक्रम के बीच के मौलिक अंतरों पर ध्यान दें: तापमान की स्थिरता बनाम ऊष्मा का विनिमय। कार्य के सूत्रों को उनके संबंधित प्रतिबंधों के साथ याद रखें।
RBSE Class 11 Physics Chapter 13 लघुत्तरात्मक प्रश्न
Question 4. कार्यों के उत्क्रमणीय इंजन की कार्यविधि लिखते हुये प्रत्येक प्रक्रम में किये गये कार्य को P-V वक़ द्वारा ज्ञात कीजिये तथा दक्षता का सूत्र व्युत्पन्न कीजिये।
Answer: कार्नो चक्र (Carnot's Cycle) एक आदर्श सैद्धांतिक चक्र है जो एक उत्क्रमणीय इंजन की कार्यविधि को समझने में मदद करता है। इसमें एक ग्राम मोल आदर्श गैस को कार्यकारी पदार्थ के रूप में लिया जाता है। चक्र को चार मुख्य प्रक्रमों में विभाजित किया गया है, जिनमें से दो समतापी (ताप स्थिर) और दो रुद्धोष्म (ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं) होते हैं। इन प्रक्रमों का क्रम इस प्रकार है:
- समतापी प्रसार
- रुद्धोष्म प्रसार
- समतापी संपीडन
- रुद्धोष्म संपीडन
कार्नो चक्र का P-V आरेख (P-V Diagram):
(1) समतापी प्रसार (अवस्था A से B तक): इस पहले चरण में, कार्यकारी पदार्थ को एक ऊष्मा स्रोत पर रखा जाता है जिसका तापमान \(T_1\) होता है। गैस धीरे-धीरे फैलती है और स्रोत से ऊष्मा \((Q_1)\) लेती है, जिससे इसका आयतन \(V_1\) से \(V_2\) तक बढ़ जाता है, लेकिन तापमान \(T_1\) पर स्थिर रहता है। इस प्रक्रम में गैस द्वारा किया गया कार्य \(W_1\) स्रोत से ली गई ऊष्मा \(Q_1\) के बराबर होता है। कार्य का सूत्र है: \(W_1 = \int _{V_1}^{V_2} PdV\)
आदर्श गैस समीकरण \(PV = RT_1\) का उपयोग करके, हम पाते हैं: \(P = \frac{RT_1}{V}\)
तो, किया गया कार्य \(W_1\) है: \(W_1 = \int _{V_1}^{V_2} \frac{RT_1}{V} dV\)
\(W_1 = RT_1 [\log_e V]_{V_1}^{V_2}\)
\(W_1 = RT_1 (\log_e V_2 - \log_e V_1)\)
\(W_1 = RT_1 \log_e \left(\frac{V_2}{V_1}\right)\)
\(W_1 = 2.303 RT_1 \log_{10} \left(\frac{V_2}{V_1}\right) \quad ...(1)\)
(2) रुद्धोष्म प्रसार (अवस्था B से C तक): अब सिलिण्डर को ऊष्मा स्रोत से हटाकर एक कुचालक स्टैंड पर रख दिया जाता है। इस स्थिति में गैस और परिवेश के बीच कोई ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता \((Q=0)\)। गैस का रुद्धोष्म प्रसार होता है, जिससे इसका आयतन \(V_2\) से \(V_3\) तक बढ़ जाता है और तापमान \(T_1\) से \(T_2\) तक घट जाता है क्योंकि गैस आंतरिक ऊर्जा का उपयोग कार्य करने में करती है। रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए \(PV^\gamma = K\) (जहाँ \(K\) नियतांक है), तो \(P = \frac{K}{V^\gamma}\)
किया गया कार्य \(W_2\) है: \(W_2 = \int _{V_2}^{V_3} \frac{K}{V^\gamma} dV\)
\(W_2 = K \left[\frac{V^{-\gamma+1}}{-\gamma+1}\right]_{V_2}^{V_3} = \frac{K}{1-\gamma} [V_3^{1-\gamma} - V_2^{1-\gamma}]\)
चूंकि \(K = P_2V_2^\gamma = P_3V_3^\gamma\), तो: \(W_2 = \frac{1}{1-\gamma} [P_3V_3 - P_2V_2]\)
आदर्श गैस समीकरण \(PV = RT\) का उपयोग करके: \(W_2 = \frac{R}{1-\gamma} (T_2 - T_1) \quad ...(2)\)
(3) समतापी संपीडन (अवस्था C से D तक): इस चरण में, गैस को फिर से एक सिंक (कम तापमान वाला भंडार) पर रखा जाता है जिसका तापमान \(T_2\) होता है। पिस्टन को धीरे-धीरे अंदर धकेला जाता है, जिससे गैस का संपीडन होता है। गैस द्वारा निष्कासित ऊष्मा \((Q_2)\) सिंक में चली जाती है, और तापमान \(T_2\) पर स्थिर रहता है। इस प्रक्रम में गैस पर किया गया कार्य \(W_3\) नकारात्मक होता है। कार्य का सूत्र है: \(W_3 = \int _{V_3}^{V_4} PdV\)
आदर्श गैस समीकरण \(PV = RT_2\) का उपयोग करके, हम पाते हैं: \(W_3 = \int _{V_3}^{V_4} \frac{RT_2}{V} dV\)
\(W_3 = RT_2 [\log_e V]_{V_3}^{V_4} = RT_2 (\log_e V_4 - \log_e V_3)\)
\(W_3 = -RT_2 \log_e \left(\frac{V_3}{V_4}\right)\)
\(W_3 = -2.303 RT_2 \log_{10} \left(\frac{V_3}{V_4}\right) \quad ...(3)\)
(4) रुद्धोष्म संपीडन (अवस्था D से A तक): अंत में, सिलिण्डर को फिर से कुचालक स्टैंड पर रख दिया जाता है। गैस को रुद्धोष्म रूप से संपीडित किया जाता है, जिससे इसका आयतन \(V_4\) से \(V_1\) तक घट जाता है और तापमान \(T_2\) से \(T_1\) तक बढ़ जाता है। इस प्रक्रम में गैस पर किया गया कार्य \(W_4\) सकारात्मक होता है (प्रणाली पर कार्य)। कार्य का सूत्र है: \(W_4 = \frac{R}{1-\gamma} (T_1 - T_2) \quad ...(4)\)
यहां नकारात्मक चिह्न यह दर्शाता है कि गैस पर कार्य किया गया है।
कार्नो चक्र में कुल कार्य \((W)\) इन सभी चार प्रक्रमों में किए गए कार्यों का योग होता है: \(W = W_1 + W_2 + W_3 + W_4\)
समीकरण (10) और (11) से हमें रुद्धोष्म प्रक्रमों के लिए संबंध प्राप्त होते हैं: \(\frac{T_1}{T_2} = \left(\frac{V_3}{V_2}\right)^{\gamma-1} \quad ...(5)\)
और \(\frac{T_1}{T_2} = \left(\frac{V_4}{V_1}\right)^{\gamma-1} \quad ...(6)\)
इनकी तुलना करने पर हमें मिलता है: \(\frac{V_3}{V_2} = \frac{V_4}{V_1} \implies \frac{V_2}{V_1} = \frac{V_3}{V_4} \quad ...(7)\)
कार्नो इंजन की दक्षता \((\eta)\):
दक्षता \(\eta\) को उपयोगी कार्य \((W)\) और स्रोत से ली गई ऊष्मा \((Q_1)\) के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है: \(\eta = \frac{W}{Q_1} = \frac{Q_1 - Q_2}{Q_1} = 1 - \frac{Q_2}{Q_1}\)
समीकरणों (1), (3) और (7) का उपयोग करके, दक्षता का अंतिम सूत्र है: \(\eta = \frac{T_1 - T_2}{T_1} = 1 - \frac{T_2}{T_1} \quad ...(8)\)
इस समीकरण से स्पष्ट होता है कि कार्नो इंजन की दक्षता केवल ऊष्मा स्रोत \((T_1)\) और सिंक \((T_2)\) के तापमान पर निर्भर करती है, कार्यकारी पदार्थ की प्रकृति पर नहीं। साथ ही, दक्षता कभी भी 100% नहीं हो सकती जब तक कि सिंक का तापमान परम शून्य \((0 K)\) न हो जाए।
In simple words: कार्नो चक्र एक आदर्श चक्र है जो बताता है कि इंजन कैसे काम करता है। इसमें चार स्टेप होते हैं: गैस फैलती है, फिर बिना ऊष्मा बदले फैलती है, फिर गैस सिकुड़ती है और अंत में बिना ऊष्मा बदले सिकुड़ती है। इस पूरे चक्र में इंजन जो काम करता है और कितनी ऊष्मा लेता है, उससे उसकी दक्षता निकलती है, जो केवल गर्म और ठंडे हिस्सों के तापमान पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: कार्नो चक्र के सभी चार प्रक्रमों - समतापी प्रसार, रुद्धोष्म प्रसार, समतापी संपीडन और रुद्धोष्म संपीडन - को क्रम में याद रखना और प्रत्येक के लिए कार्य के सूत्र का सही उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के केल्विन प्लांक व क्लासियस के कथनों को लिखिये तथा स्पष्ट कीजिये कि उक्त कथन एक दूसरे के तुल्य हैं।
Answer: ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम ऊर्जा रूपांतरण की सीमाओं को बताता है। इसके कई कथन हैं जो अलग-अलग शब्दों में हैं, लेकिन उनका मूल अर्थ एक ही है। द्वितीय नियम का मुख्य विचार यह है कि 100% दक्षता वाला ऊष्मा-इंजन बनाना असंभव है, यानी किसी स्रोत से ली गई सारी ऊष्मा को पूरी तरह से उपयोगी कार्य में नहीं बदला जा सकता।
इस नियम के दो मुख्य कथन निम्नलिखित हैं:
(1) केल्विन-प्लांक का कथन: इस कथन के अनुसार, ऐसा कोई चक्रीय प्रक्रम संभव नहीं है जो केवल एक ऊष्मा स्रोत से ऊष्मा लेकर उसे पूरी तरह से कार्य में बदल दे। किसी भी ऊष्मा इंजन को कार्य करने के लिए, उसे ऊष्मा स्रोत से ऊष्मा लेनी होगी, उसका कुछ हिस्सा कार्य में बदलना होगा, और बचा हुआ हिस्सा एक ठंडे भंडार (सिंक) को देना होगा। यह दर्शाता है कि इंजन को कार्य करने के लिए कम से कम दो तापमान स्तरों की आवश्यकता होती है।
(2) क्लासियस का कथन: इस कथन के अनुसार, ऐसा कोई चक्रीय प्रक्रम संभव नहीं है जो बिना किसी बाहरी सहायता (जैसे बाहरी कार्य) के ऊष्मा को ठंडी वस्तु से सीधे गर्म वस्तु में स्थानांतरित कर सके। रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर इसका उदाहरण हैं; वे ठंडी जगह से ऊष्मा निकालते हैं और उसे गर्म जगह पर छोड़ते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें बिजली (बाहरी कार्य) की आवश्यकता होती है। बिना बाहरी कार्य के ऊष्मा स्वाभाविक रूप से केवल गर्म से ठंडी जगह की ओर बहती है।
इन दोनों कथनों की तुल्यता: केल्विन-प्लांक और क्लासियस के कथन एक-दूसरे के तुल्य हैं। इसका मतलब है कि यदि एक कथन का उल्लंघन होता है, तो दूसरे का भी उल्लंघन होगा। इसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:
यदि क्लासियस कथन का उल्लंघन करने वाला एक रेफ्रिजरेटर (जो बिना बाहरी कार्य के ठंडी वस्तु से ऊष्मा लेकर उसे गर्म वस्तु को दे देता है) और एक सामान्य ऊष्मा इंजन को जोड़ा जाए, तो यह संयोजन केल्विन-प्लांक कथन का उल्लंघन करेगा। इसी प्रकार, यदि केल्विन-प्लांक कथन का उल्लंघन करने वाला एक इंजन (जो सारी ऊष्मा को कार्य में बदल दे) और एक सामान्य रेफ्रिजरेटर को जोड़ा जाए, तो यह क्लासियस कथन का उल्लंघन करेगा। इस प्रकार, दोनों कथन एक दूसरे की पुष्टि करते हैं और ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम की सीमाओं को स्पष्ट करते हैं। यह नियम हमें बताता है कि ऊर्जा रूपांतरण की कुछ प्राकृतिक सीमाएँ हैं जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता।
In simple words: ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है कि कोई भी मशीन सारी गर्मी को काम में नहीं बदल सकती और न ही ठंडी चीज़ों को बिना किसी मदद के अपने आप गर्म कर सकती है। केल्विन और क्लासियस ने ये बातें अलग-अलग तरीकों से कही हैं, लेकिन उनका मतलब एक ही है: प्रकृति में गर्मी और काम के बदलने के कुछ नियम हैं जिन्हें हम तोड़ नहीं सकते।
🎯 Exam Tip: ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के दोनों कथनों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और फिर एक उदाहरण के साथ उनकी तुल्यता को समझाएँ। यह दिखाने के लिए कि कैसे एक का उल्लंघन दूसरे का उल्लंघन करता है, एक संयुक्त प्रणाली का आरेख उपयोगी हो सकता है।
Question 6. कार्नो प्रमेय का कथन लिखते हुये व्युत्पन्न कीजिये।
Answer: कार्नो प्रमेय (Carnot's Theorem) ऊष्मा इंजन की दक्षता के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें बताता है, खासकर जब वे दो निश्चित तापमानों के बीच काम कर रहे हों। यह प्रमेय हमें समझाता है कि कोई भी वास्तविक इंजन कार्नो इंजन से अधिक कुशल नहीं हो सकता।
इस प्रमेय के दो मुख्य कथन निम्नलिखित हैं:
(अ) किन्हीं दो तापमानों \(T_1\) तथा \(T_2 (T_1 > T_2)\) के बीच काम करने वाले किसी भी उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता, उन्हीं तापमानों के बीच काम करने वाले किसी भी अन्य इंजन की दक्षता से कभी अधिक नहीं हो सकती। इसका मतलब है कि उत्क्रमणीय (रिवर्सिबल) इंजन की दक्षता अधिकतम होती है।
(ब) किन्हीं दो तापमानों \(T_1\) तथा \(T_2 (T_1 > T_2)\) के बीच काम करने वाले सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता समान होती है, चाहे वे किसी भी कार्यकारी पदार्थ का उपयोग क्यों न करें। यह दक्षता केवल तापमान पर निर्भर करती है।
भाग (अ) की व्युत्पत्ति (Proof):
मान लीजिए कि दो इंजन हैं: एक अनुत्क्रमणीय (Irreversible) इंजन I और एक उत्क्रमणीय (Reversible) इंजन R। दोनों इंजन एक ही तापमान स्रोत \((T_1)\) और सिंक \((T_2)\) के बीच काम कर रहे हैं \((T_1 > T_2)\)। हम यह भी मान लेते हैं कि दोनों इंजन प्रत्येक चक्र में समान मात्रा में कार्य \((W)\) उत्पन्न करते हैं।
इंजन I (अनुत्क्रमणीय) की दक्षता \(\eta_1\) है: \(\eta_1 = \frac{W}{Q_1}\)
इंजन R (उत्क्रमणीय) की दक्षता \(\eta_2\) है: \(\eta_2 = \frac{W}{Q_1'}\)
अब, हम यह विरोधाभास मानकर चलते हैं कि अनुत्क्रमणीय इंजन I, उत्क्रमणीय इंजन R से अधिक कुशल है, यानी \(\eta_1 > \eta_2\)।
इसका मतलब है \(\frac{W}{Q_1} > \frac{W}{Q_1'}\)
\( \implies Q_1' > Q_1\)
इसका अर्थ है कि \((Q_1' - Q_1)\) एक धनात्मक राशि है।
अब, हम इन दोनों इंजनों को एक साथ जोड़ देते हैं। इंजन I सामान्य दिशा में काम करता है (ऊष्मा लेता है और कार्य उत्पन्न करता है), जबकि इंजन R को विपरीत दिशा में (रेफ्रिजरेटर के रूप में) चलाया जाता है। इंजन I द्वारा उत्पन्न किया गया कार्य \((W)\) इंजन R को चलाने के लिए उपयोग किया जाता है।
इस संयुक्त प्रणाली में, नेट ऊष्मा जो स्रोत से ली जाती है वह \((Q_1 - Q_1')\) है। चूँकि हमने माना था कि \(Q_1' > Q_1\), तो \((Q_1 - Q_1')\) नकारात्मक है, जिसका मतलब है कि नेट ऊष्मा स्रोत को वापस दी जाती है। इसी तरह, नेट ऊष्मा जो सिंक को दी जाती है वह \((Q_1 - W) - (Q_1' - W) = Q_1 - Q_1'\) है।
इसका मतलब है कि यह संयुक्त प्रणाली बिना किसी बाहरी कार्य के, ठंडे सिंक से ऊष्मा \((Q_1' - Q_1)\) लेकर उसे गर्म स्रोत को दे रही है। यह क्लासियस कथन का सीधा उल्लंघन है, जो कहता है कि ऊष्मा अपने आप ठंडे से गर्म की ओर नहीं जा सकती।
इसलिए, हमारा प्रारंभिक मानना कि \(\eta_1 > \eta_2\) गलत होना चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी अनुत्क्रमणीय इंजन उत्क्रमणीय इंजन से अधिक कुशल नहीं हो सकता।
भाग (ब) की व्युत्पत्ति (Proof):
यह भाग कार्नो प्रमेय के पहले भाग का विस्तार है। इसे सिद्ध करने के लिए, हम दो अलग-अलग उत्क्रमणीय इंजन R और R' की कल्पना करते हैं जो एक ही तापमान \((T_1, T_2)\) के बीच काम कर रहे हैं, लेकिन उनमें कार्यकारी पदार्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।
यदि हम मान लें कि इंजन R' इंजन R से अधिक कुशल है, तो हम उपरोक्त तरीके से एक विरोधाभास तक पहुँच सकते हैं, जिससे क्लासियस या केल्विन-प्लांक कथन का उल्लंघन होगा। इसलिए, सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता समान होनी चाहिए। यह दक्षता कार्यकारी पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि केवल स्रोत और सिंक के तापमान पर निर्भर करती है। यह कार्नो चक्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
In simple words: कार्नो का नियम कहता है कि कोई भी इंजन सबसे अच्छे (उत्क्रमणीय) इंजन से ज़्यादा अच्छा नहीं हो सकता और सारे अच्छे इंजन एक जैसे ही कुशल होते हैं, चाहे वे किसी भी चीज़ से बने हों। यह नियम बताता है कि इंजन की कुशलता सिर्फ़ उसके गर्म और ठंडे हिस्सों के तापमान पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: कार्नो प्रमेय को सिद्ध करने के लिए विरोधाभास विधि (proof by contradiction) का उपयोग करना बहुत प्रभावी होता है। यह सुनिश्चित करें कि आप क्लासियस या केल्विन-प्लांक कथन का सटीक रूप से उपयोग कर रहे हैं।
RBSE Class 11 Physics Chapter 13 आंकिक प्रश्न
Question 1. एक आदर्श इंजन की दक्षता 75% है तथा यह 283 K ताप पर सिंक को \(2 \times 10^3\) W ऊष्मा निष्कासित करता है तो । (i) स्रोत का ताप, (ii) प्रति मिनट इंजन द्वारा किया गया कार्य तथा (iii) एक चक्र में स्रोत से अवशोषित ऊष्मा की गणना कीजिये।
Answer: दिया गया है:
इंजन की दक्षता \( \eta = 75\% = \frac{75}{100} = \frac{3}{4} \)
सिंक का तापमान \( T_2 = 283 K \)
सिंक को निष्कासित ऊष्मा \( Q_2 = 2 \times 10^3 W \)
(i) स्रोत का तापमान \((T_1)\) ज्ञात करना:
एक आदर्श इंजन की दक्षता का सूत्र है: \( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \)
यहां से, \( \frac{T_2}{T_1} = 1 - \eta \)
\( \frac{T_2}{T_1} = 1 - \frac{3}{4} = \frac{1}{4} \)
\( \implies T_1 = 4T_2 \)
\( T_1 = 4 \times 283 K = 1132 K \)
अतः स्रोत का तापमान \(1132 K\) है।
(iii) एक चक्र में स्रोत से अवशोषित ऊष्मा \((Q_1)\) ज्ञात करना:
कार्नो इंजन के लिए, \(\frac{Q_1}{Q_2} = \frac{T_1}{T_2}\)
\( Q_1 = Q_2 \times \frac{T_1}{T_2} \)
\( Q_1 = (2 \times 10^3 W) \times \frac{1132 K}{283 K} \)
\( Q_1 = (2 \times 10^3 W) \times 4 = 8 \times 10^3 W \)
अतः स्रोत से अवशोषित ऊष्मा \(8 \times 10^3 W\) है।
(ii) प्रति मिनट इंजन द्वारा किया गया कार्य \((W)\) ज्ञात करना:
इंजन द्वारा किया गया उपयोगी कार्य \((W)\) अवशोषित और निष्कासित ऊष्मा का अंतर होता है:
\( W = Q_1 - Q_2 \)
\( W = (8 \times 10^3 W) - (2 \times 10^3 W) = 6 \times 10^3 W \)
यह कार्य प्रति सेकंड में है (जूल प्रति सेकंड)। कार्य प्रति मिनट में ज्ञात करने के लिए इसे 60 से गुणा करें:
\( W_{\text{प्रति मिनट}} = 6 \times 10^3 J/s \times 60 s/min = 360 \times 10^3 J/min = 36 \times 10^4 J/min \)
अतः प्रति मिनट इंजन द्वारा किया गया कार्य \(36 \times 10^4 J/min\) है।
In simple words: इंजन की कुशलता 75% है और यह 283 K पर 2000 जूल गर्मी बाहर निकालता है। इससे हमने पता लगाया कि गर्म हिस्से का तापमान 1132 K है। इंजन 8000 जूल गर्मी लेता है और हर मिनट 360000 जूल काम करता है।
🎯 Exam Tip: दक्षता, तापमान और ऊष्मा के बीच संबंधों के लिए सही सूत्र का उपयोग करें। सेल्सियस से केल्विन में तापमान को सही ढंग से परिवर्तित करना न भूलें, और कार्य की गणना करते समय इकाइयों (जैसे प्रति सेकंड से प्रति मिनट) का ध्यान रखें।
Question 2. हिमांक व वाष्पांक के मध्य कार्य कर रहे कार्यों इंजन की दक्षता की गणना कीजिये।
Answer: दिया गया है:
इंजन हिमांक और वाष्पांक के बीच कार्य कर रहा है।
हिमांक तापमान (निम्न तापमान) \( T_2 = 0^\circ C = 0 + 273 = 273 K \)
वाष्पांक तापमान (उच्च तापमान) \( T_1 = 100^\circ C = 100 + 273 = 373 K \)
एक आदर्श इंजन की दक्षता का सूत्र है:
\( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \)
मान रखने पर:
\( \eta = 1 - \frac{273}{373} \)
\( \eta = \frac{373 - 273}{373} = \frac{100}{373} \)
\( \eta \approx 0.2680 \)
प्रतिशत दक्षता में:
\( \eta = 0.2680 \times 100\% = 26.80\% \)
अतः इंजन की दक्षता लगभग \(26.80\%\) है।
In simple words: एक इंजन जो पानी के जमने (0°C) और उबलने (100°C) के तापमानों के बीच काम करता है, उसकी कुशलता निकालने के लिए हम उस सीमांत तापमान के अंतर का उपयोग करते हैं। इस तरह के इंजन की कुशलता लगभग 26.80% होगी।
🎯 Exam Tip: हिमांक और वाष्पांक के तापमानों को केल्विन में सही ढंग से परिवर्तित करें क्योंकि दक्षता के सूत्र में निरपेक्ष तापमान का उपयोग होता है। दक्षता की गणना करते समय भिन्नों को सावधानी से हल करें।
Question 3. एक कार्यों इंजन की दक्षता 40% है। यदि इसका स्रोत का ताप \(193.6^\circ C\) है तब सिंक का ताप ज्ञात करो।
Answer: दिया गया है:
इंजन की दक्षता \( \eta = 40\% = \frac{40}{100} = \frac{2}{5} \)
स्रोत का तापमान \( T_1 = 193.6^\circ C \)
केल्विन में परिवर्तित करने पर: \( T_1 = 193.6 + 273 = 466.6 K \)
सिंक का तापमान \((T_2)\) ज्ञात करना है।
एक आदर्श इंजन की दक्षता का सूत्र है:
\( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \)
यहां से, \( \frac{T_2}{T_1} = 1 - \eta \)
\( T_2 = T_1 (1 - \eta) \)
मान रखने पर:
\( T_2 = 466.6 K \left(1 - \frac{2}{5}\right) \)
\( T_2 = 466.6 K \left(\frac{3}{5}\right) \)
\( T_2 = \frac{1399.8}{5} = 279.96 K \)
सिंक का तापमान सेल्सियस में बदलने पर:
\( T_2 = 279.96 - 273 = 6.96^\circ C \approx 7^\circ C \)
अतः सिंक का तापमान लगभग \(7^\circ C\) है।
In simple words: यदि एक इंजन 40% कुशल है और उसके गर्म हिस्से का तापमान 193.6°C है, तो हम इस जानकारी का उपयोग करके ठंडे हिस्से का तापमान निकाल सकते हैं। ठंडे हिस्से का तापमान लगभग 7°C होगा।
🎯 Exam Tip: तापमान को हमेशा सेल्सियस से केल्विन में बदलना याद रखें जब आप थर्मोडायनामिक्स के सूत्रों का उपयोग कर रहे हों। गणना करते समय दशमलव स्थानों का ध्यान रखें।
Question 4. एक कार्यों रेफ्रिजरेटर 260 K व 400 K तापों के मध्य कार्य करता है। यह निम्न ताप पर सिंक से 600 cal ऊष्मा लेता है तब उच्च ताप पर स्रोत की दी गई ऊष्मा व प्रत्येक चक्र में किये गये कार्य की गणना कीजिये।
Answer: दिया गया है:
रेफ्रिजरेटर के लिए निम्न तापमान (सिंक) \( T_2 = 260 K \)
उच्च तापमान (स्रोत) \( T_1 = 400 K \)
निम्न ताप पर सिंक से ली गई ऊष्मा \( Q_2 = 600 cal \)
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार, एक रेफ्रिजरेटर को ठंडी जगह से गर्मी निकालने के लिए कार्य की आवश्यकता होती है।
(i) उच्च ताप पर स्रोत को दी गई ऊष्मा \((Q_1)\) ज्ञात करना:
एक आदर्श रेफ्रिजरेटर के लिए ऊष्मा और तापमान का संबंध है:
\( \frac{Q_1}{Q_2} = \frac{T_1}{T_2} \)
\( Q_1 = Q_2 \times \frac{T_1}{T_2} \)
मान रखने पर:
\( Q_1 = 600 cal \times \frac{400 K}{260 K} \)
\( Q_1 = 600 \times \frac{40}{26} = 600 \times \frac{20}{13} \)
\( Q_1 = \frac{12000}{13} \approx 923.07 cal \)
अतः उच्च ताप पर स्रोत को दी गई ऊष्मा लगभग \(923.07 cal\) है।
(ii) प्रत्येक चक्र में किये गये कार्य \((W)\) की गणना कीजिये:
रेफ्रिजरेटर द्वारा किया गया कार्य, उच्च ताप को दी गई ऊष्मा और निम्न ताप से ली गई ऊष्मा का अंतर होता है:
\( W = Q_1 - Q_2 \)
\( W = 923.07 cal - 600 cal = 323.07 cal \)
कार्य को जूल में बदलने के लिए, हम जानते हैं कि \(1 cal \approx 4.2 J\):
\( W = 323.07 cal \times 4.2 J/cal \approx 1356.9 J \)
अतः प्रत्येक चक्र में किया गया कार्य लगभग \(1357 J\) है।
In simple words: एक फ्रिज जो 260 K और 400 K के तापमानों के बीच काम करता है, वह ठंडी जगह से 600 कैलोरी गर्मी लेता है। इस काम के लिए, वह गर्म जगह को लगभग 923 कैलोरी गर्मी देता है और हर बार काम करने के लिए उसे लगभग 1357 जूल ऊर्जा की ज़रूरत होती है।
🎯 Exam Tip: रेफ्रिजरेटर के लिए दक्षता (जिसे प्रदर्शन गुणांक कहते हैं) और इंजन की दक्षता के बीच के संबंध को समझें। कैलोरी से जूल में रूपांतरण करना न भूलें, और अपनी गणना में एकरूपता बनाए रखें।
Question 5. किसी कार्यों इंजन की दक्षता 100 K व TK तथा 180 K व 900 K के लिये समान है तब T की गणना करिये।
Answer: दिया गया है:
पहला इंजन के लिए तापमान: \( T_{2A} = 100 K \) और \( T_{1A} = T K \)
दूसरे इंजन के लिए तापमान: \( T_{2B} = 180 K \) और \( T_{1B} = 900 K \)
दोनों इंजनों की दक्षता समान है, यानी \( \eta_A = \eta_B \)
एक आदर्श इंजन की दक्षता का सूत्र है: \( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \)
अगर दक्षताएँ समान हैं, तो उनके \(\frac{T_2}{T_1}\) अनुपात भी समान होंगे:
\( 1 - \frac{T_{2A}}{T_{1A}} = 1 - \frac{T_{2B}}{T_{1B}} \)
\( \implies \frac{T_{2A}}{T_{1A}} = \frac{T_{2B}}{T_{1B}} \)
मान रखने पर:
\( \frac{100 K}{T K} = \frac{180 K}{900 K} \)
\( \frac{100}{T} = \frac{18}{90} \)
\( \frac{100}{T} = \frac{1}{5} \)
\( T = 100 \times 5 \)
\( T = 500 K \)
अतः T का मान \(500 K\) है।
In simple words: अगर दो इंजन अलग-अलग तापमानों के बीच काम करते हैं लेकिन उनकी कुशलता एक जैसी है, तो हम उनके तापमानों के अनुपात को बराबर रखकर एक अज्ञात तापमान का पता लगा सकते हैं। यहाँ, अज्ञात तापमान 500 केल्विन होगा।
🎯 Exam Tip: जब दो इंजनों की दक्षता समान दी गई हो, तो \( \frac{T_2}{T_1} \) अनुपात को बराबर करें। इस प्रकार के प्रश्नों में केल्विन तापमान का उपयोग सीधे किया जा सकता है।
Question 6. दो का इंजन A व B श्रेणीक्रम में कार्यरत हैं। पहला इंजन A, 900 K पर ऊष्मा प्राप्त करता है व T K ताप पर स्थित कुंड को निरस्त कर देता है। दूसरा इंजन B पहले इंजन द्वारा निरस्त ऊष्मा को प्राप्त कर 400 K पर ऊष्मा कुंड को निरस्त कर देता है। निम्न स्थितियों में ताप T की गणना करो (i) जब दोनों इंजनों द्वारा किया गया कार्य समान है। (ii) दोनों इंजनों की दक्षता बराबर है।
Answer: दिया गया है:
इंजन A के लिए:
उच्च तापमान \( T_{1A} = 900 K \)
निम्न तापमान \( T_{2A} = T K \)
इंजन B के लिए:
उच्च तापमान \( T_{1B} = T K \) (यह इंजन A द्वारा निष्कासित ऊष्मा प्राप्त करता है)
निम्न तापमान \( T_{2B} = 400 K \)
(i) जब दोनों इंजनों द्वारा किया गया कार्य समान है \( (W_A = W_B) \):
एक आदर्श इंजन के लिए किया गया कार्य तापमान के अंतर के समानुपाती होता है \( (W \propto T_1 - T_2) \)।
इसलिए, यदि कार्य समान है, तो तापमान का अंतर भी समान होगा:
\( T_{1A} - T_{2A} = T_{1B} - T_{2B} \)
\( 900 - T = T - 400 \)
\( 900 + 400 = T + T \)
\( 1300 = 2T \)
\( T = \frac{1300}{2} = 650 K \)
अतः जब कार्य समान हो, तो T का मान \(650 K\) है।
(ii) जब दोनों इंजनों की दक्षता बराबर है \( (\eta_A = \eta_B) \):
एक आदर्श इंजन की दक्षता का सूत्र है: \( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \)
यदि दक्षताएँ समान हैं, तो उनके \(\frac{T_2}{T_1}\) अनुपात भी समान होंगे:
\( \frac{T_{2A}}{T_{1A}} = \frac{T_{2B}}{T_{1B}} \)
मान रखने पर:
\( \frac{T}{900} = \frac{400}{T} \)
\( T^2 = 900 \times 400 \)
\( T^2 = 360000 \)
\( T = \sqrt{360000} \)
\( T = 600 K \)
अतः जब दक्षता समान हो, तो T का मान \(600 K\) है।
In simple words: जब दो इंजन एक के बाद एक काम करते हैं, तो बीच के तापमान (T) को दो तरीकों से निकाला जा सकता है। अगर दोनों इंजन एक बराबर काम करते हैं, तो बीच का तापमान 650 K होगा। अगर दोनों इंजन एक बराबर कुशल हैं, तो बीच का तापमान 600 K होगा।
🎯 Exam Tip: श्रेणीक्रम में जुड़े इंजनों के लिए, पहले इंजन का निम्न तापमान दूसरे इंजन का उच्च तापमान बन जाता है। कार्य समान होने पर तापमान अंतर को और दक्षता समान होने पर तापमान अनुपात को बराबर करना याद रखें।
Question 7. किसी गैस (\(\gamma = 1.5\)) को रुद्धोष्म प्रक्रम अनुसार संपीडित किया जाता है तो उसका आयतन \(1600 cm^3\) से \(400 cm^3\) हो जाता है। अब यदि प्रारम्भिक दाब को मान \(150 KPa\) है तो अन्तिम दाब की गणना कीजिये तथा गैस पर किये गये कार्य की गणना कीजिये।
Answer: दिया गया है:
विशिष्ट ऊष्मा का अनुपात \( \gamma = 1.5 \)
प्रारम्भिक आयतन \( V_1 = 1600 cm^3 \)
अन्तिम आयतन \( V_2 = 400 cm^3 \)
प्रारम्भिक दाब \( P_1 = 150 KPa \)
(i) अन्तिम दाब \((P_2)\) की गणना:
रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए दाब और आयतन का संबंध है: \( P_1V_1^\gamma = P_2V_2^\gamma \)
\( P_2 = P_1 \left(\frac{V_1}{V_2}\right)^\gamma \)
मान रखने पर:
\( P_2 = 150 KPa \times \left(\frac{1600 cm^3}{400 cm^3}\right)^{1.5} \)
\( P_2 = 150 KPa \times (4)^{1.5} \)
\( P_2 = 150 KPa \times (4^{3/2}) \)
\( P_2 = 150 KPa \times (\sqrt{4})^3 \)
\( P_2 = 150 KPa \times (2)^3 \)
\( P_2 = 150 KPa \times 8 = 1200 KPa \)
अतः अन्तिम दाब \(1200 KPa\) है।
(ii) गैस पर किये गये कार्य \((W)\) की गणना:
रुद्धोष्म प्रक्रम में किए गए कार्य का सूत्र है: \( W = \frac{P_1V_1 - P_2V_2}{\gamma - 1} \)
इकाइयों को SI में बदलें:
\( P_1 = 150 KPa = 150 \times 10^3 Pa \)
\( V_1 = 1600 cm^3 = 1600 \times 10^{-6} m^3 = 1.6 \times 10^{-3} m^3 \)
\( P_2 = 1200 KPa = 1200 \times 10^3 Pa \)
\( V_2 = 400 cm^3 = 400 \times 10^{-6} m^3 = 0.4 \times 10^{-3} m^3 \)
\( P_1V_1 = (150 \times 10^3) \times (1.6 \times 10^{-3}) = 240 J \)
\( P_2V_2 = (1200 \times 10^3) \times (0.4 \times 10^{-3}) = 480 J \)
अब कार्य के सूत्र में मान रखने पर:
\( W = \frac{240 J - 480 J}{1.5 - 1} \)
\( W = \frac{-240 J}{0.5} \)
\( W = -480 J \)
नकारात्मक चिह्न दर्शाता है कि कार्य गैस पर किया गया है (संपीडन के कारण)।
In simple words: एक गैस को संपीड़ित करने पर, उसका आयतन 1600 cm³ से 400 cm³ तक कम हो जाता है। अगर शुरुआती दबाव 150 KPa था, तो अंतिम दबाव 1200 KPa होगा। इस प्रक्रिया में गैस पर कुल 480 जूल काम किया गया।
🎯 Exam Tip: रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए सही संबंध (\(PV^\gamma = \text{नियतांक}\)) का उपयोग करें। आयतन और दाब को गणना से पहले SI इकाइयों में बदलना महत्वपूर्ण है ताकि कार्य जूल में सही ढंग से प्राप्त हो सके।
Question 8. यदि किसी गैस (\(\gamma = 1.5\)) को उसके मूल दाब से 27 गुना दाब पर संपीडित किया जाता है तो उसके ताप में परिवर्तन की गणना कीजिये यदि प्रारम्भिक ताप \(27^\circ C\) है।
Answer: दिया गया है:
विशिष्ट ऊष्मा का अनुपात \( \gamma = 1.5 \)
दाब का अनुपात \( \frac{P_2}{P_1} = 27 \)
प्रारम्भिक तापमान \( T_1 = 27^\circ C \)
केल्विन में परिवर्तित करने पर: \( T_1 = 27 + 273 = 300 K \)
रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए तापमान और दाब का संबंध है:
\( T_2 = T_1 \left(\frac{P_2}{P_1}\right)^{(\gamma-1)/\gamma} \)
घातांक की गणना करें:
\( \frac{\gamma-1}{\gamma} = \frac{1.5 - 1}{1.5} = \frac{0.5}{1.5} = \frac{1}{3} \)
अब \(T_2\) की गणना करें:
\( T_2 = 300 K \times (27)^{1/3} \)
\( T_2 = 300 K \times 3 \)
\( T_2 = 900 K \)
तापमान में परिवर्तन \(( \Delta T )\) ज्ञात करना है:
\( \Delta T = T_2 - T_1 \)
\( \Delta T = 900 K - 300 K = 600 K \)
सेल्सियस में, यह परिवर्तन \(600^\circ C\) के बराबर है।
In simple words: अगर किसी गैस को उसके शुरुआती दबाव से 27 गुना ज़्यादा संपीड़ित किया जाता है और उसका शुरुआती तापमान 27°C है, तो उसका तापमान 900 K तक बढ़ जाएगा। इसका मतलब है कि तापमान में कुल 600 K या 600°C का बदलाव आया।
🎯 Exam Tip: रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए तापमान-दाब संबंध \((T_2 = T_1 (P_2/P_1)^{(\gamma-1)/\gamma})\) को याद रखें और केल्विन तापमान का उपयोग करें। घातांक की गणना में सावधानी बरतें।
Question 10. किसी चक्रीय प्रक्रम का P-V वक़ निम्नानुसार है। तो चक्रीय प्रक्रम में किये गये कार्य की गणना करो।
Answer: चक्रीय प्रक्रम में किया गया कार्य P-V वक्र के तहत घेरे गए क्षेत्रफल के बराबर होता है। यहाँ, यह एक त्रिभुज ABC का क्षेत्रफल है। कार्य \( W = \) त्रिभुज ABC का क्षेत्रफल \( W = \frac{1}{2} \times \text{आधार} \times \text{ऊँचाई} \) \( W = \frac{1}{2} \times \text{CB} \times \text{AC} \) यहाँ, ग्राफ से आधार \( \text{CB} = (4-1) = 3 \) यूनिट और ऊँचाई \( \text{AC} = (4-2) = 2 \) यूनिट है। दिए गए मानों के अनुसार: \( W = \frac{1}{2} \times (3 \times 10^3) \times 2 \) \( \implies W = 3 \times 10^3 \) जूल
In simple words: किसी चक्रीय प्रक्रिया में किया गया काम उस ग्राफ के अंदर के क्षेत्र जितना होता है जो प्रेशर (P) और वॉल्यूम (V) के बीच बनता है। इस सवाल में, यह एक त्रिभुज का क्षेत्रफल है, जिसे आधार और ऊँचाई गुणा करके, फिर आधा करके निकाला जाता है।
🎯 Exam Tip: चक्रीय प्रक्रम में किया गया कार्य हमेशा P-V आरेख द्वारा घेरे गए क्षेत्रफल के बराबर होता है। यदि चक्र दक्षिणावर्त है तो कार्य धनात्मक और यदि वामावर्त है तो कार्य ऋणात्मक होता है।
Question 11. एक कार्नो इंजन 373 K व 283 K के मध्ये कार्य कर रहा है। उसकी दक्षता की गणना कीजिये और बताइये कि दक्षता कब 100% होगी?
Answer: दिए गए तापमान हैं: स्रोत का तापमान \( T_1 = 373 \) केल्विन और सिंक का तापमान \( T_2 = 283 \) केल्विन। एक कार्नो इंजन की दक्षता \( \eta \) का सूत्र है: \( \eta = 1 - \frac{T_2}{T_1} \) अब दिए गए मानों को सूत्र में रखने पर: \( \eta = 1 - \frac{283}{373} \)
\( \implies \eta = \frac{373 - 283}{373} \)
\( \implies \eta = \frac{90}{373} \) दशमलव में बदलने पर, दक्षता लगभग 0.2413 या 24.13% होगी। एक इंजन की दक्षता 100% तब होगी जब सिंक का तापमान \( T_2 = 0 \) केल्विन (परम शून्य) हो। हालाँकि, परम शून्य तापमान प्राप्त करना व्यावहारिक रूप से असंभव है, इसलिए 100% दक्षता वाला इंजन बनाना भी असंभव है। यह ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम के अनुसार है कि कोई भी वास्तविक इंजन 100% कुशल नहीं हो सकता।
In simple words: एक इंजन कितना अच्छा काम करता है, यह जानने के लिए, हम सबसे गर्म और सबसे ठंडे तापमान का उपयोग करते हैं जिसके बीच वह काम करता है। इंजन की दक्षता 100% तब होगी जब सबसे ठंडा तापमान शून्य केल्विन हो, पर ऐसा हो नहीं सकता।
🎯 Exam Tip: दक्षता की गणना करते समय हमेशा तापमान को केल्विन में व्यक्त करें और याद रखें कि कार्नो इंजन की दक्षता केवल तापमान पर निर्भर करती है, कार्यकारी पदार्थ पर नहीं।
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