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Detailed Chapter 1 भौतिक जगत तथा मापन RBSE Solutions for Class 11 Physics
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Class 11 Physics Chapter 1 भौतिक जगत तथा मापन RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Physics Chapter 1 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
RBSE Class 11 Physics Chapter 1 अति लघूत्तरागक प्रश्न
Question 1. S.I. पद्धति में प्रदीपन तीव्रता का मात्रक क्या होता है?
Answer: S.I. पद्धति में प्रदीपन तीव्रता का मात्रक कैन्डेला (Cd) होता है। यह एक मूल मात्रक है जो प्रकाश की शक्ति को बताता है।
In simple words: S.I. में, प्रदीपन तीव्रता को कैन्डेला (Cd) में मापते हैं।
🎯 Exam Tip: सभी मूल मात्रकों और उनके प्रतीकों को याद रखें, क्योंकि ये भौतिकी के मूलभूत तत्व हैं और सीधे पूछे जाते हैं।
Question 2. पदार्थ की मात्रा का मूल मात्रक क्या है?
Answer: पदार्थ की मात्रा का मूल मात्रक मोल (mole) होता है। मोल हमें किसी पदार्थ के परमाणुओं या अणुओं की संख्या को मापने में मदद करता है।
In simple words: पदार्थ की मात्रा को मोल में मापा जाता है।
🎯 Exam Tip: मोल का उपयोग रसायन विज्ञान में बहुत आम है, खासकर जब आप रासायनिक प्रतिक्रियाओं में शामिल कणों की संख्या की गणना करते हैं।
Question 4. प्लांक नियतांक का मात्रक क्या होता है?
Answer: प्लांक नियतांक का मात्रक जूल-सेकण्ड (Js) होता है। यह मात्रक ऊर्जा और समय के संबंध को दर्शाता है, जो क्वांटम यांत्रिकी में महत्वपूर्ण है।
In simple words: प्लांक नियतांक को जूल-सेकण्ड (Js) में नापा जाता है।
🎯 Exam Tip: प्लांक नियतांक क्वांटम भौतिकी में एक महत्वपूर्ण स्थिरांक है, और इसका मात्रक ऊर्जा (जूल) और समय (सेकण्ड) का गुणनफल होता है।
Question 5. संख्या 0.005 में सार्थक अंक कितने होते हैं?
Answer: संख्या 0.005 में एक सार्थक अंक होता है। दशमलव से पहले के शून्य और दशमलव के ठीक बाद के शून्य सार्थक नहीं माने जाते हैं, केवल गैर-शून्य अंक ही सार्थक होते हैं।
In simple words: 0.005 में केवल 5 ही सार्थक अंक है, इसलिए एक सार्थक अंक है।
🎯 Exam Tip: सार्थक अंकों की पहचान करते समय, दशमलव के बाद के शुरुआती शून्य को गिनते नहीं हैं, लेकिन गैर-शून्य अंकों के बीच के शून्य को गिनते हैं।
Question 6. अन्तर्राष्टीय पद्धति में कितने मूल व कितने पूरक मात्रक होते हैं?
Answer: अंतर्राष्ट्रीय पद्धति (S.I. System) में 7 मूल मात्रक और 2 पूरक मात्रक होते हैं। ये मात्रक भौतिकी की सभी शाखाओं में मापन के लिए आधार प्रदान करते हैं।
In simple words: S.I. सिस्टम में 7 मूल और 2 पूरक मात्रक होते हैं।
🎯 Exam Tip: 7 मूल मात्रक (जैसे लंबाई, द्रव्यमान, समय) और 2 पूरक मात्रक (समतल कोण और ठोस कोण) के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 7. बोल्ट्जमैन नियतांक का विमीय सूत्र लिखिए।
Answer: बोल्ट्जमैन नियतांक का विमीय सूत्र \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^2\mathrm{T}^{-2}\mathrm{K}^{-1}] \) होता है। यह विमीय सूत्र ऊर्जा प्रति केल्विन को दर्शाता है।
In simple words: बोल्ट्जमैन नियतांक का विमीय सूत्र \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^2\mathrm{T}^{-2}\mathrm{K}^{-1}] \) है।
🎯 Exam Tip: बोल्ट्जमैन नियतांक गैस के कणों की औसत गतिज ऊर्जा और उसके तापमान के बीच का संबंध बताता है, इसलिए इसके विमीय सूत्र में ऊर्जा और तापमान दोनों शामिल होते हैं।
Question 8. त्रुटियाँ कितने प्रकार की मानी जाती हैं ?
Answer: सामान्यतः त्रुटियाँ तीन प्रकार की मानी जाती हैं: क्रमबद्ध त्रुटियाँ, यादृच्छिक त्रुटियाँ और स्थूल त्रुटियाँ। इन त्रुटियों को समझना और कम करना सटीक मापन के लिए बहुत जरूरी है।
In simple words: त्रुटियाँ तीन तरह की होती हैं: क्रमबद्ध, यादृच्छिक और स्थूल।
🎯 Exam Tip: त्रुटियों के प्रकारों को समझने से आपको किसी भी प्रयोग में मापन की अनिश्चितता को पहचानने और कम करने में मदद मिलेगी।
Question 9. पृष्ठ तनाव की विमा क्या होती है?
Answer: पृष्ठ तनाव की विमा \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^0\mathrm{T}^{-2}] \) होती है। पृष्ठ तनाव बल प्रति लंबाई होता है, इसलिए इसकी विमा में लंबाई का घातांक शून्य होता है।
In simple words: पृष्ठ तनाव की विमा \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^0\mathrm{T}^{-2}] \) है, क्योंकि यह बल प्रति इकाई लंबाई के बराबर है।
🎯 Exam Tip: पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र व्युत्पन्न करते समय, ध्यान रखें कि बल प्रति लंबाई का मतलब है कि लंबाई का एक कारक कट जाता है।
Question 11. आवेग की विमा किसकी विमा के समान होती है?
Answer: आवेग की विमा संवेग की विमा के समान होती है। दोनों का विमीय सूत्र \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^1\mathrm{T}^{-1}] \) होता है, क्योंकि आवेग बल और समय का गुणनफल है, और संवेग द्रव्यमान और वेग का गुणनफल है।
In simple words: आवेग की विमा संवेग की विमा जैसी होती है।
🎯 Exam Tip: आवेग (बल \( \times \) समय) और संवेग (द्रव्यमान \( \times \) वेग) दोनों ही गति से संबंधित अवधारणाएँ हैं और उनका विमीय सूत्र समान होता है।
Question 12. दो विमाहीन राशियों के नाम लिखिए।
Answer: दो विमाहीन राशियाँ कोण और विकृति हैं। इन राशियों का कोई मात्रक नहीं होता, क्योंकि ये समान राशियों के अनुपात होती हैं।
In simple words: कोण और विकृति ऐसी राशियाँ हैं जिनकी कोई विमा नहीं होती।
🎯 Exam Tip: विमाहीन राशियाँ अक्सर समान भौतिक राशियों के अनुपात से बनती हैं, जैसे कोण (चाप/त्रिज्या) या विकृति (लंबाई में परिवर्तन/मूल लंबाई)।
Question 13. नियतांक K में प्रतिशत त्रुटि कितनी होती है?
Answer: नियतांक K में प्रतिशत त्रुटि शून्य होती है। नियतांक वे मान होते हैं जो बदलते नहीं हैं, इसलिए उनमें कोई अनिश्चितता या त्रुटि नहीं होती है।
In simple words: एक नियतांक में कोई त्रुटि नहीं होती, इसलिए प्रतिशत त्रुटि शून्य होती है।
🎯 Exam Tip: भौतिकी में, नियतांकों को सटीक मान माना जाता है, जब तक कि उन्हें प्रयोगात्मक रूप से प्राप्त न किया गया हो, जिस स्थिति में उनमें थोड़ी अनिश्चितता हो सकती है।
Question 14. एक भौतिक राशि \( \mathrm{X} \) के मापन में त्रुटि \( \Delta \mathrm{X} \) हो तो \( \mathrm{X}^{\mathrm{m}} \) में प्रतिशत त्रुटि कितनी होगी?
Answer: यदि एक भौतिक राशि \( \mathrm{X} \) के मापन में त्रुटि \( \Delta \mathrm{X} \) हो, तो \( \mathrm{X}^{\mathrm{m}} \) में प्रतिशत त्रुटि \( \mathrm{m} \frac{\Delta \mathrm{X}}{\mathrm{X}} \times 100\% \) होगी। घात में त्रुटि हमेशा घात से गुणा हो जाती है।
In simple words: अगर \( \mathrm{X} \) में त्रुटि \( \Delta \mathrm{X} \) है, तो \( \mathrm{X}^{\mathrm{m}} \) में प्रतिशत त्रुटि \( \mathrm{m} \) गुणा \( \frac{\Delta \mathrm{X}}{\mathrm{X}} \) होगी।
🎯 Exam Tip: किसी राशि की घात में प्रतिशत त्रुटि की गणना करते समय, घात को राशि की आपेक्षिक त्रुटि से गुणा करना याद रखें।
Question 15. यदि बल तथा लम्बाई लम्बाई के मात्रकों में से प्रत्येक को दुगुना कर दिया जाये, तो ऊर्जा के मात्रक को मान कितने गुना हो जायेगा?
Answer: ऊर्जा का मात्रक बल \( \times \) लंबाई होता है। यदि बल के मात्रक को दुगुना किया जाए और लंबाई के मात्रक को भी दुगुना किया जाए, तो ऊर्जा का नया मात्रक \( (2 \times \text{बल}) \times (2 \times \text{लंबाई}) = 4 \times (\text{बल} \times \text{लंबाई}) \) हो जाएगा। इस प्रकार, ऊर्जा का मात्रक 4 गुना हो जाएगा। ऊर्जा हमेशा बल और विस्थापन के गुणनफल से संबंधित होती है।
In simple words: बल और लंबाई दोनों को दुगुना करने पर, ऊर्जा का मात्रक 4 गुना बड़ा हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: विमीय विश्लेषण का उपयोग करके ऐसे प्रश्नों को हल करें; ऊर्जा का विमीय सूत्र \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^2\mathrm{T}^{-2}] \) है, और चूंकि बल \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^1\mathrm{T}^{-2}] \) है, तो लंबाई \( [\mathrm{L}] \) से गुणा करने पर यह \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^2\mathrm{T}^{-2}] \) बन जाता है।
RBSE Class 11 Physics Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. विज्ञान किसे कहते हैं?
Answer: विज्ञान प्रकृति के सुव्यवस्थित अध्ययन का विषय है। यह जानने की संगठित कोशिश और इससे मिले ज्ञान का नाम है। इसमें भौतिक जगत में होने वाली सभी घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है, जिससे हम दुनिया को बेहतर ढंग से समझ सकें।
In simple words: विज्ञान प्रकृति का ठीक से अध्ययन करना और जानकारी इकट्ठा करना है।
🎯 Exam Tip: विज्ञान की परिभाषा में 'सुव्यवस्थित अध्ययन' और 'क्रमबद्ध ज्ञान' जैसे प्रमुख शब्दों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. एक रेडियन की परिभाषा लिखिए।
Answer: एक रेडियन वह कोण है जो वृत्त के केंद्र पर तब बनता है जब वृत्त के चाप की लंबाई उसकी त्रिज्या के बराबर होती है। यह समतल कोण को मापने का एक तरीका है।
समतल कोण \( \mathrm{d}\theta = \left(\frac{\mathrm{ds}}{\mathrm{r}}\right) \) रेडियन
यदि \( \mathrm{ds} = \mathrm{r} \) तो \( \mathrm{d}\theta = 1 \) रेडियन
In simple words: एक रेडियन वह कोण है जहाँ वृत्त के चाप की लंबाई उसकी त्रिज्या के बराबर होती है।
🎯 Exam Tip: रेडियन एक विमाहीन राशि है, लेकिन फिर भी इसे कोणों के लिए मात्रक के रूप में प्रयोग किया जाता है, खासकर जब गणितीय गणनाएँ की जाती हैं।
Question 4. S.I. पद्धति की विशेषताएँ लिखिए।
Answer: S.I. पद्धति की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. यह एक मैट्रिक या दशमलव पद्धति है, जिसका मतलब है कि इसमें 10 की घातों का उपयोग होता है, जिससे गणना आसान हो जाती है।
2. इस पद्धति में उपयोग किए जाने वाले मात्रक अचर और उपलब्ध मानकों पर आधारित होते हैं, जिससे वे दुनिया भर में समान रहते हैं।
3. इसके सभी मात्रक स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं और उन्हें दोबारा स्थापित किया जा सकता है, जो वैज्ञानिक सटीकता के लिए महत्वपूर्ण है।
4. S.I. पद्धति का उपयोग विज्ञान की सभी शाखाओं में किया जा सकता है, जबकि M.K.S. पद्धति मुख्य रूप से यांत्रिकी तक सीमित है।
5. इस पद्धति में सभी व्युत्पन्न मात्रक मूल मात्रकों को गुणा या भाग करके प्राप्त किए जा सकते हैं। इसका अर्थ है कि एक भौतिक राशि के लिए केवल एक ही मात्रक का उपयोग होता है।
In simple words: S.I. पद्धति दशमलव पर आधारित है, इसके मात्रक हमेशा समान रहते हैं, और यह विज्ञान के हर क्षेत्र में उपयोग की जाती है।
🎯 Exam Tip: S.I. पद्धति एक सुसंगत और तर्कसंगत प्रणाली है, जो मात्रकों को परिभाषित करने और उनका उपयोग करने में एकरूपता सुनिश्चित करती है।
Question 6. क्या विमाहीन एवं मात्रकहीन भौतिक राशि का अस्तित्व संभव है?
Answer: हाँ, विमाहीन और मात्रकहीन भौतिक राशि का अस्तित्व संभव है। आपेक्षिक घनत्व और विकृति इसके अच्छे उदाहरण हैं। इन राशियों में समान प्रकार की भौतिक राशियों का अनुपात होता है, जिससे इनकी कोई विमा या मात्रक नहीं होता।
In simple words: हाँ, कुछ राशियाँ ऐसी होती हैं जिनकी कोई विमा या मात्रक नहीं होता, जैसे आपेक्षिक घनत्व और विकृति।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि सभी मात्रकहीन राशियाँ विमाहीन होती हैं, लेकिन सभी विमाहीन राशियाँ मात्रकहीन नहीं होतीं (जैसे रेडियन, जिसका मात्रक तो होता है लेकिन विमा नहीं)।
RBSE Class 11 Physics Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. अन्तर्राष्टीय मात्रक पद्धति का वर्णन करते हुए विभिन्न मूल मात्रकों की परिभाषाएँ दीजिये।
Answer:
**मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय पद्धति (S.I. System of Units)**
यह M.K.S. पद्धति का बदला हुआ और बड़ा रूप है। सन् 1960 में अंतर्राष्ट्रीय माप और बाट की सामान्य सभा ने मात्रकों की इस अंतर्राष्ट्रीय पद्धति को S.I. (System International) नाम दिया। इसमें भौतिक राशियों को मूल, व्युत्पन्न और पूरक मात्रकों के रूप में बांटा गया है। इस पद्धति में सात मूल राशियाँ और दो पूरक राशियों के मानक मात्रक परिभाषित किए गए हैं। S.I. पद्धति विश्व स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए मानक मात्रक प्रणाली है।
| क्र.सं. | भौतिक राशि का नाम | मात्रक | संकेत (प्रतीक) |
|---|---|---|---|
| 1. | बल का मात्रक | न्यूटन (N) | \( \mathrm{kgm/s^2} \) |
| 2. | ऊर्जा या कार्य का मात्रक | जूल (J) | \( \mathrm{Nm} \) |
| 3. | शक्ति का मात्रक | वॉट (W) | \( \mathrm{J/s} \) |
| 4. | दाब का मात्रक | पास्कल (P) | \( \mathrm{N/m^2} \) |
| 5. | विद्युत आवेश का मात्रक | कूलॉम (C) | \( \mathrm{As} \) |
| 6. | विभवान्तर का मात्रक | वोल्ट (V) | \( \mathrm{W/A} \) |
| 7. | विद्युत प्रतिरोध का मात्रक | ओम \( (\Omega) \) | \( \mathrm{V/A} \) |
| 8. | विद्युत धारिता का मात्रक | फैरड (F) | \( \mathrm{C/V} \) |
| 9. | विद्युत प्रेरकत्व का मात्रक | हैनरी (H) | \( \Omega \mathrm{s} \) |
| 10. | चुम्बकीय फ्लक्स का मात्रक | वेबर (Wb) | \( \mathrm{Vs} \) |
| 11. | चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व | टेस्ला (T) | \( \mathrm{Wb/m^2} \) |
| 12. | प्रदीप्ति फ्लक्स या दीप्त शक्ति का मात्रक | ल्यूमैन (lm) | \( \mathrm{cd/Sr} \) |
| 13. | प्रदीप्तन या प्रदीप्त घनत्व का मात्रक | लक्स (lx) | \( \mathrm{lm/m^2} \) |
**मूल मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय परिभाषाएँ (International definitions of fundamental units)**
(1) **मीटर (Meter):** एक मीटर वह दूरी है जिसमें क्रिप्टॉन-86 से निर्वात में निकलने वाले नारंगी-लाल प्रकाश की 1,650,763.73 तरंगें समाती हैं। दूसरे शब्दों में, यह वह दूरी है जो प्रकाश 1/299,792,458 सेकण्ड में निर्वात में तय करता है।
(2) **किलोग्राम (Kilogram):** एक किलोग्राम अंतर्राष्ट्रीय बाट व माप संस्था, पेरिस में रखे प्लेटिनम-इरेडियम के खास बेलन के द्रव्यमान के बराबर है। यह 4°C पर एक लीटर पानी के द्रव्यमान के भी बराबर होता है।
(3) **सेकण्ड (Second):** यह वह समय है जिसमें सीज़ियम–133 परमाणु 9,192,631,770 बार कंपन करता है। परमाणु घड़ियाँ इसी परिभाषा पर काम करती हैं और समय को बहुत सटीक मापती हैं, जिनमें 5000 सालों में केवल एक सेकण्ड की त्रुटि हो सकती है।
(4) **ऐम्पियर (Ampere):** यह विद्युत धारा का मात्रक है। एक ऐम्पियर वह स्थिर विद्युत धारा है जो निर्वात में एक मीटर दूरी पर रखे दो सीधे समांतर तारों में बहने पर उनके बीच प्रति इकाई लंबाई पर 2 \( \times \) 10-7 न्यूटन/मीटर का बल लगाती है।
(5) **केल्विन (Kelvin):** सामान्य वायुमंडलीय दाब पर पानी के क्वथनांक और बर्फ के गलनांक के अंतर का 1/100 वां हिस्सा 1 केल्विन ताप कहलाता है। जल के त्रिक बिंदु (273.16 केल्विन) ताप का 1/273.16 वां हिस्सा 1 केल्विन कहलाता है। इसका प्रतीक K है।
(6) **केन्डेला (Candela):** यह प्रदीपन तीव्रता का मात्रक है। एक केन्डेला उस प्रदीपन तीव्रता की मात्रा है जो 1/6,00,000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाली कृष्ण वस्तु से लंबवत उत्सर्जित होती है। यह तब होता है जब कृष्ण वस्तु का दाब 101,325 न्यूटन/मीटर2 और तापमान प्लेटिनम के गलनांक (2046 K) के बराबर होता है।
(7) **मोल (Mole):** 1 मोल पदार्थ की वह मात्रा (द्रव्यमान) है जिसमें उतने ही मूल अवयव होते हैं जितने कार्बन-12 के 0.012 किलोग्राम में कार्बन परमाणु होते हैं। यह संख्या एवोगैड्रो संख्या ( \( \mathrm{N_A} = 6.02 \times 10^{23} \) प्रति ग्राम मोल) कहलाती है।
In simple words: S.I. पद्धति एक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली है जिसमें 7 मूल और 2 पूरक मात्रक होते हैं। इसमें मीटर, किलोग्राम, सेकंड, एम्पीयर, केल्विन, कैन्डेला और मोल जैसे मूल मात्रकों की सटीक परिभाषाएँ शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: निबन्धात्मक प्रश्नों में, परिभाषाओं को विस्तार से समझाना और महत्वपूर्ण विशेषताओं को उजागर करना सुनिश्चित करें, साथ ही उदाहरण या सूचियाँ भी दें।
Question 2. मूल मात्रक और व्युत्पन्न मात्रकों में अन्तर उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिये। मात्रकों के लिए कौन-कौनसी पद्धतियाँ प्रचलित हैं?
Answer:
**मूल मात्रक और व्युत्पन्न मात्रकों में अन्तर:**
* **मूल मात्रक:** ये वे मात्रक होते हैं जो किसी अन्य भौतिक राशि पर निर्भर नहीं करते। इन्हें स्वतंत्र माना जाता है और इनसे ही अन्य सभी मात्रक बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, द्रव्यमान, लंबाई और समय के मात्रक (जैसे किलोग्राम, मीटर, सेकंड) मूल मात्रक हैं।
* **व्युत्पन्न मात्रक:** ये वे मात्रक होते हैं जो एक या एक से अधिक मूल मात्रकों को गुणा या भाग करके बनाए जाते हैं। ये मूल मात्रकों पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, बल (न्यूटन), संवेग (किलोग्राम मीटर/सेकंड), कार्य (जूल) और वेग (मीटर/सेकंड) के मात्रक व्युत्पन्न मात्रक हैं।
**मात्रकों के लिए प्रचलित पद्धतियाँ:**
आजकल मात्रकों के लिए कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:
1. **C.G.S. (सेन्टीमीटर-ग्राम-सेकण्ड) पद्धति या गौसीय पद्धति:** इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई और समय को क्रमशः ग्राम, सेंटीमीटर और सेकंड में नापा जाता है।
2. **M.K.S. (मीटर-किलोग्राम-सेकण्ड) पद्धति या जॉर्जी (Gorgi) पद्धति:** इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई और समय को क्रमशः किलोग्राम, मीटर और सेकंड में नापा जाता है।
3. **F.P.S. (फुट-पाउण्ड-सेकण्ड) पद्धति या ब्रिटिश पद्धति:** इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई और समय को क्रमशः पाउण्ड, फुट और सेकंड में नापा जाता है।
4. **International System of Units (S.I.) (अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति):** यह पद्धति M.K.S. पद्धति का बदला हुआ रूप है। इसे 1960 में अंतर्राष्ट्रीय माप तौल समिति द्वारा लागू किया गया था और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। आजकल F.P.S. और C.G.S. पद्धतियों का उपयोग कम हो गया है क्योंकि C.G.S. में मात्रक छोटे होते हैं जिससे संख्यात्मक मान बहुत अधिक हो जाते हैं। अब M.K.S. और S.I. पद्धतियों का ही अधिक उपयोग होता है।
In simple words: मूल मात्रक (जैसे मीटर) स्वतंत्र होते हैं, जबकि व्युत्पन्न मात्रक (जैसे न्यूटन) मूल मात्रकों से बनते हैं। मात्रकों की मुख्य पद्धतियाँ CGS, MKS, FPS और सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली SI हैं।
🎯 Exam Tip: मूल और व्युत्पन्न मात्रकों के बीच का अंतर उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें, और प्रत्येक मात्रक पद्धति की मूल इकाइयों का उल्लेख करें।
Question 3. विमीय विधि द्वारा किसी भौतिक राशि के परिमाण को एक मात्रक पद्धति से दूसरी मात्रक पद्धति में बदलने का सूत्र स्थापित कीजिए।
Answer:
**किसी भौतिक राशि के परिमाण को एक मात्रक पद्धति से दूसरी मात्रक पद्धति में बदलना:**
किसी भी भौतिक राशि को दर्शाने के लिए उसके संख्यात्मक मान और मात्रक मान की आवश्यकता होती है। यदि कोई भौतिक राशि \( \mathrm{Q} \) है और उसका संख्यात्मक मान \( \mathrm{n} \) तथा मात्रक \( \mathrm{u} \) है, तो उनका गुणनफल हमेशा स्थिर रहता है। इसका मतलब है \( \mathrm{Q} = \mathrm{nu} = \) नियतांक।
यदि किसी भौतिक राशि का एक पद्धति में मात्रक \( \mathrm{U_1} \) और परिमाण \( \mathrm{n_1} \) है, और दूसरी पद्धति में मात्रक \( \mathrm{U_2} \) तथा परिमाण \( \mathrm{n_2} \) है, तो:
\( \mathrm{n_1U_1} = \mathrm{n_2U_2} \) (1)
चूंकि भौतिक राशि वही रहती है, इसलिए पद्धति बदलने पर भौतिक राशि की विमाएँ नहीं बदलतीं, लेकिन उसके मात्रक और संख्यात्मक मान बदल सकते हैं।
यदि पहली पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई और समय के मात्रक क्रमशः \( \mathrm{M_1}, \mathrm{L_1} \) और \( \mathrm{T_1} \) हैं, और उनकी विमाएँ क्रमशः \( \mathrm{a}, \mathrm{b} \) और \( \mathrm{c} \) हैं, तो पहली पद्धति के लिए:
\( \mathrm{U_1} = [\mathrm{M_1^a L_1^b T_1^c}] \) (2)
इसी तरह, दूसरी मात्रक पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई और समय के मात्रक क्रमशः \( \mathrm{M_2}, \mathrm{L_2} \) और \( \mathrm{T_2} \) हैं, तो:
\( \mathrm{U_2} = [\mathrm{M_2^a L_2^b T_2^c}] \) (3)
\( \mathrm{U_1} \) और \( \mathrm{U_2} \) के मान समीकरण (2) और (3) से समीकरण (1) में रखने पर:
\( \mathrm{n_1 [\mathrm{M_1^a L_1^b T_1^c}]} = \mathrm{n_2 [\mathrm{M_2^a L_2^b T_2^c}]} \)
\( \implies \mathrm{n_2} = \mathrm{n_1} \left[\frac{\mathrm{M_1}}{\mathrm{M_2}}\right]^{\mathrm{a}} \left[\frac{\mathrm{L_1}}{\mathrm{L_2}}\right]^{\mathrm{b}} \left[\frac{\mathrm{T_1}}{\mathrm{T_2}}\right]^{\mathrm{c}} \) (4)
समीकरण (4) का उपयोग करके किसी भौतिक राशि के मान को एक मात्रक पद्धति से दूसरी मात्रक पद्धति में बदला जा सकता है। यह विमीय विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण उपयोग है।
**उदाहरण:** फुट पाउण्ड/सेकण्ड (F.P.S.) और वाट (M.K.S.) पद्धतियों में शक्ति के मात्रक हैं। शक्ति का विमीय सूत्र \( [\mathrm{M}^1\mathrm{L}^2\mathrm{T}^{-3}] \) होता है। इसलिए, यहाँ से \( \mathrm{a} = 1, \mathrm{b} = 2 \) और \( \mathrm{c} = -3 \) होगा।
F.P.S. पद्धति में:
\( \mathrm{M_1} = \) पाउण्ड, \( \mathrm{L_1} = \) फुट, \( \mathrm{T_1} = \) सेकण्ड
\( \mathrm{n_1} = 550 \times 32 \) फुट पाउण्ड/सेकण्ड
M.K.S. पद्धति में:
\( \mathrm{M_2} = \) किलोग्राम, \( \mathrm{L_2} = \) मीटर, \( \mathrm{T_2} = \) सेकण्ड
\( \mathrm{n_2} = ? \)
\( \mathrm{n_2} = \mathrm{n_1} \left[\frac{\mathrm{M_1}}{\mathrm{M_2}}\right]^{\mathrm{a}} \left[\frac{\mathrm{L_1}}{\mathrm{L_2}}\right]^{\mathrm{b}} \left[\frac{\mathrm{T_1}}{\mathrm{T_2}}\right]^{\mathrm{c}} \)
\( \implies \mathrm{n_2} = 550 \times 32 \left[\frac{1 \text{ पाउण्ड}}{1 \text{ किग्रा}}\right]^{1} \left[\frac{1 \text{ फुट}}{1 \text{ मीटर}}\right]^{2} \left[\frac{1 \text{ सेकण्ड}}{1 \text{ सेकण्ड}}\right]^{-3} \)
\( \implies \mathrm{n_2} = 550 \times 32 \left[\frac{453.6 \text{ ग्राम}}{1000 \text{ ग्राम}}\right]^{1} \left[\frac{30.48 \text{ सेमी}}{100 \text{ सेमी}}\right]^{2} \times (1)^{-3} \)
\( \implies \mathrm{n_2} = 550 \times 32 \times \frac{453.6}{1000} \times \left(\frac{30.48}{100}\right)^2 \)
\( \implies \mathrm{n_2} = \frac{550 \times 32 \times 453.6 \times 30.48 \times 30.48}{1000 \times 100 \times 100} \)
\( \implies \mathrm{n_2} \approx 746 \) वाट (लगभग)
अतः 1 अश्व शक्ति \( \approx 746 \) वाट।
In simple words: हम एक मात्रक प्रणाली से दूसरी में बदलने के लिए विमीय विश्लेषण का उपयोग करते हैं। इसका मुख्य सूत्र \( \mathrm{n_2} = \mathrm{n_1} \left(\frac{\mathrm{M_1}}{\mathrm{M_2}}\right)^{\mathrm{a}} \left(\frac{\mathrm{L_1}}{\mathrm{L_2}}\right)^{\mathrm{b}} \left(\frac{\mathrm{T_1}}{\mathrm{T_2}}\right)^{\mathrm{c}} \) है, जो हमें इकाइयों को बदलने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: विमाओं का सही उपयोग करें और सभी मात्रकों को एक ही प्रणाली में बदलने से पहले उनकी संगत इकाइयों में परिवर्तित करें।
Question 4. विमीय समीकरणों के उपयोग पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
Answer: विमीय समीकरण भौतिकी में कई महत्वपूर्ण उपयोगों के लिए आधार प्रदान करते हैं। इनके मुख्य उपयोग इस प्रकार हैं:
1. **भौतिक राशि के परिमाण को एक मात्रक पद्धति से दूसरी में बदलना:** विमीय विश्लेषण का उपयोग करके हम किसी भौतिक राशि के संख्यात्मक मान को एक मात्रक पद्धति (जैसे M.K.S.) से दूसरी पद्धति (जैसे C.G.S.) में आसानी से बदल सकते हैं। यह सूत्र \( \mathrm{n_2} = \mathrm{n_1} \left[\frac{\mathrm{M_1}}{\mathrm{M_2}}\right]^{\mathrm{a}} \left[\frac{\mathrm{L_1}}{\mathrm{L_2}}\right]^{\mathrm{b}} \left[\frac{\mathrm{T_1}}{\mathrm{T_2}}\right]^{\mathrm{c}} \) द्वारा किया जाता है।
2. **भौतिक सूत्रों की यथार्थता की जाँच करना:** किसी भी भौतिक सूत्र के दोनों पक्षों की विमाएँ समान होनी चाहिए। यदि किसी सूत्र के दोनों पक्षों की विमाएँ भिन्न हैं, तो वह सूत्र गलत है। यह विधि किसी सूत्र की विमीय रूप से सही होने की जाँच करती है, लेकिन यह उसकी शुद्धता की गारंटी नहीं देती।
3. **भौतिक राशियों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना:** यदि हमें यह पता हो कि कोई भौतिक राशि किन-किन अन्य राशियों पर निर्भर करती है, तो हम विमीय संतुलन विधि का उपयोग करके उन राशियों के बीच एक संबंध या सूत्र स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए, पहले एक समीकरण बनाया जाता है और फिर विमाओं को बराबर करके वांछित सूत्र प्राप्त किया जाता है।
In simple words: विमीय समीकरणों का उपयोग इकाइयों को बदलने, सूत्रों की जाँच करने और अलग-अलग भौतिक राशियों के बीच संबंध बनाने के लिए किया जाता है।
🎯 Exam Tip: विमीय विश्लेषण की सीमाएँ भी होती हैं; यह नियतांकों के मानों का पता नहीं लगा सकता और न ही त्रिकोणमितीय या लघुगणकीय संबंधों वाले सूत्रों की जांच कर सकता है।
Question 5. मापन में त्रुटियों से क्या अभिप्राय है? त्रुटियों के संयोजन से त्रुटियाँ किस प्रकार परिवर्तित हो जाती हैं? समझाइये।
Answer:
**मापन में त्रुटियों का अभिप्राय:**
हर यंत्र और हर व्यक्ति के लिए किसी भौतिक राशि को मापने में एक सटीकता की सीमा होती है। किसी भी भौतिक राशि को पूरी तरह से शुद्ध मापना संभव नहीं है। यह अनिश्चितता का सिद्धांत है। मापन में इस अनिश्चितता को 'त्रुटि' कहते हैं। इसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: "किसी भौतिक राशि के असली मान और मापे गए मान के अंतर को त्रुटि कहते हैं।"
मापन में होने वाली त्रुटियों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बांटा गया है:
(A) **क्रमबद्ध त्रुटियाँ (Systematic Errors):** ये त्रुटियाँ एक ही दिशा में होती हैं (या तो हमेशा ज्यादा या हमेशा कम)।
(B) **यादृच्छिक त्रुटियाँ (Random Errors):** ये त्रुटियाँ अनियमित होती हैं और बेतरतीब ढंग से होती हैं।
(C) **स्थूल त्रुटियाँ (Gross Errors):** ये मानवीय लापरवाही या उपकरण के गलत उपयोग से होती हैं।
**त्रुटियों का संयोजन (Combination of Errors):**
जब त्रुटिपूर्ण मापों को जोड़ा, घटाया, गुणा किया या भाग किया जाता है, तो भौतिक राशि के मापन में त्रुटियाँ भी जुड़ या घट जाती हैं। कुल त्रुटि की गणना, उपयोग की गई गणितीय प्रक्रिया पर निर्भर करती है।
**(i) राशियों के योग में त्रुटि (Error in sum of the quantities):**
माना हमारे पास दो राशियाँ \( \mathrm{a} \) और \( \mathrm{b} \) हैं, जिनके मापे गए मान क्रमशः \( (\mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{a}) \) और \( (\mathrm{b} \pm \Delta \mathrm{b}) \) हैं।
माना \( \mathrm{x} = \mathrm{a} + \mathrm{b} \) (1)
यहाँ \( \Delta \mathrm{a} \) राशि \( \mathrm{a} \) की परम त्रुटि है, और \( \Delta \mathrm{b} \) राशि \( \mathrm{b} \) की परम त्रुटि है।
\( \Delta \mathrm{x} \) राशियों के योग के लिए परम त्रुटि है।
समीकरण (1) से:
\( \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = (\mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{a}) + (\mathrm{b} \pm \Delta \mathrm{b}) \)
\( \implies \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = (\mathrm{a} + \mathrm{b}) \pm \Delta \mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{b} \)
\( \implies \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{b} \)
\( \implies \Delta \mathrm{x} = \pm (\Delta \mathrm{a} + \Delta \mathrm{b}) \)
यहाँ \( \Delta \mathrm{x} \) के चार संभव मान \( (+\Delta \mathrm{a} + \Delta \mathrm{b}), (-\Delta \mathrm{a} - \Delta \mathrm{b}), (+\Delta \mathrm{a} - \Delta \mathrm{b}) \) और \( (-\Delta \mathrm{a} + \Delta \mathrm{b}) \) होंगे। इस प्रकार, \( \mathrm{x} \) के मान में अधिकतम परम त्रुटि \( \Delta \mathrm{x} = \pm (\Delta \mathrm{a} + \Delta \mathrm{b}) \) से तय होती है।
योगफल और व्यवकलन दोनों प्रक्रियाओं में अधिकतम परम त्रुटि \( (\Delta \mathrm{a} + \Delta \mathrm{b}) \) ही होती है।
अतः, दो राशियों के योग या व्यवकलन में अधिकतम परम त्रुटि उन अलग-अलग राशियों की परम त्रुटियों के योग के बराबर होती है।
**(iii) राशियों के गुणनफल में त्रुटि (Error in product of quantities):**
माना \( \mathrm{x} = \mathrm{a} \times \mathrm{b} \)
माना \( \Delta \mathrm{a} = \) \( \mathrm{a} \) के लिए परम त्रुटि
माना \( \Delta \mathrm{b} = \) \( \mathrm{b} \) के लिए परम त्रुटि
माना \( \Delta \mathrm{x} = \) \( \mathrm{a} \times \mathrm{b} \) के गुणनफल के लिए परम त्रुटि
तब, \( \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = (\mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{a})(\mathrm{b} \pm \Delta \mathrm{b}) \)
\( \implies \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = \mathrm{ab} \pm \mathrm{a}\Delta \mathrm{b} \pm \mathrm{b}\Delta \mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b} \)
दोनों पक्षों को \( \mathrm{ab} \) से भाग देने पर:
\( \implies 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}} \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} \pm \frac{\Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{ab}} \)
चूंकि \( \Delta \mathrm{a} \) और \( \Delta \mathrm{b} \) के मान बहुत छोटे होते हैं, इसलिए उनका गुणनफल \( \Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b} \) और भी छोटा होगा। अतः, \( \frac{\Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{ab}} \) को नगण्य मानकर छोड़ने पर:
\( \implies \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} \pm \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}} \)
अधिकतम संभावित मान:
\( \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \pm \left(\frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} + \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}\right) \)
**(iv) राशियों के भाग में त्रुटि (Error in division of quantities):**
माना \( \mathrm{x} = \frac{\mathrm{a}}{\mathrm{b}} \)
माना \( \Delta \mathrm{a} = \) \( \mathrm{a} \) के लिए परम त्रुटि
माना \( \Delta \mathrm{b} = \) \( \mathrm{b} \) के लिए परम त्रुटि
माना \( \Delta \mathrm{x} = \) \( \mathrm{a} \) और \( \mathrm{b} \) के भाग के लिए परम त्रुटि
तब, \( \mathrm{x} \pm \Delta \mathrm{x} = \frac{\mathrm{a} \pm \Delta \mathrm{a}}{\mathrm{b} \pm \Delta \mathrm{b}} = \mathrm{x} \left(\frac{1 \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}}}{1 \pm \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}}\right) \)
\( \implies 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \left(1 \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}}\right) \left(1 \pm \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}\right)^{-1} \) (द्विपद प्रमेय से)
\( \implies 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \left(1 \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}}\right) \left(1 \mp \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}\right) \)
\( \implies 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = 1 \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} \mp \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}} \mp \frac{\Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{ab}} \)
यहाँ भी \( \frac{\Delta \mathrm{a}\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{ab}} \) को नगण्य मानकर छोड़ने पर:
\( \implies \pm \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \pm \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} \mp \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}} \)
अधिकतम संभावित मान:
\( \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \pm \left(\frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} + \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}\right) \)
अतः, दो राशियों के गुणन या भागफल की प्रक्रिया में आपेक्षिक त्रुटियों का अधिकतम मान उन अलग-अलग राशियों की आपेक्षिक त्रुटियों के योग के बराबर होता है।
**(v) दो राशियों की घातों के कारण त्रुटि (Error in quantity raised to some power):**
माना \( \mathrm{x} = \frac{\mathrm{a}^{\mathrm{n}}}{\mathrm{b}^{\mathrm{m}}} \)
दोनों ओर लघुगणक लेने पर:
\( \mathrm{log \, x} = \mathrm{n \, log \, a} - \mathrm{m \, log \, b} \)
अवकलन करने पर:
\( \frac{\mathrm{dx}}{\mathrm{x}} = \mathrm{n} \frac{\mathrm{da}}{\mathrm{a}} - \mathrm{m} \frac{\mathrm{db}}{\mathrm{b}} \)
अतः, अधिकतम संभावित आपेक्षिक त्रुटि होगी:
\( \frac{\Delta \mathrm{x}}{\mathrm{x}} = \pm \left(\mathrm{n} \frac{\Delta \mathrm{a}}{\mathrm{a}} + \mathrm{m} \frac{\Delta \mathrm{b}}{\mathrm{b}}\right) \)
In simple words: मापन में त्रुटि का मतलब है कि मापी गई चीज़ और उसकी असली चीज़ में अंतर है। त्रुटियाँ तीन तरह की होती हैं: क्रमबद्ध, यादृच्छिक और स्थूल। जोड़, घटाव, गुणा या भाग करते समय, त्रुटियाँ जुड़ जाती हैं। गुणा और भाग में आपेक्षिक त्रुटियाँ (यानी त्रुटि को असली मान से भाग देने पर) जुड़ जाती हैं, और घात वाली राशियों में त्रुटि घात से गुणा हो जाती है।
🎯 Exam Tip: त्रुटियों के संयोजन के लिए सभी सूत्रों को याद रखें, खासकर गुणनफल और भागफल के लिए आपेक्षिक त्रुटियों को जोड़ना और घात के लिए त्रुटि को घात से गुणा करना।
Question 6. सार्थक अंकों को ज्ञात करने के क्या नियम हैं? प्रत्येक नियम को उदाहरण सहित समझाइये।।
Answer: सार्थक अंक हमें बताते हैं कि किसी माप को कितनी सटीकता से किया गया है। सार्थक अंकों की संख्या वह होती है जिससे किसी राशि को ठीक-ठीक दर्शाया जा सकता है। जब हम किसी संख्या से दशमलव हटा देते हैं और बाईं ओर के शून्य (यदि कोई हों) को छोड़ देते हैं, तो बची हुई संख्या के अंकों को सार्थक अंक कहते हैं। उदाहरणों से यह और स्पष्ट हो जाता है:
- 123.64 में 5 सार्थक अंक हैं, 203.004 में 6 सार्थक अंक हैं।
- 2000 में 4 सार्थक अंक हैं, 0.00031 में 2 सार्थक अंक हैं।
- 1.00031 में 6 सार्थक अंक हैं, 20.00 में 4 सार्थक अंक हैं।
- 0.04050 में 4 सार्थक अंक हैं।
किसी संख्या में सार्थक अंकों की संख्या पता करने के लिए कुछ नियम हैं:
- पहला नियम: सभी गैर-शून्य अंक (1 से 9 तक) सार्थक होते हैं। जैसे, 8696 में चार सार्थक अंक हैं और 636 में तीन सार्थक अंक हैं।
- दूसरा नियम: दो गैर-शून्य अंकों के बीच आने वाले सभी शून्य सार्थक होते हैं। जैसे, 2003 में चार सार्थक अंक हैं और 2.02304 में छह सार्थक अंक हैं।
- तीसरा नियम: यदि संख्या का मान 1 से कम है, तो दशमलव बिंदु के दाहिनी ओर और पहले गैर-शून्य अंक के बाईं ओर वाले शून्य सार्थक नहीं होते हैं। जैसे, 0.00046 में दो सार्थक अंक हैं, जबकि 1.00046 में (नियम 2 के अनुसार) छह सार्थक अंक हैं।
- चौथा नियम: दशमलव बिंदु के अंतिम गैर-शून्य अंक के बाद दाहिनी ओर आने वाले सभी शून्य अंक सार्थक माने जाते हैं। जैसे, 0.000600 में तीन सार्थक अंक हैं और 0.0060 में दो सार्थक अंक हैं।
- पांचवां नियम: गैर-शून्य अंक के दाहिनी ओर स्थित सभी शून्य सार्थक नहीं होते हैं, जब तक कि दशमलव बिंदु न हो। जैसे, 20000 में एक सार्थक अंक है और 4650000 में तीन सार्थक अंक हैं।
In simple words: सार्थक अंक हमें बताते हैं कि कोई माप कितनी सटीक है। इन्हें गिनने के लिए कुछ खास नियम होते हैं, जैसे गैर-शून्य अंकों को हमेशा गिनना, और शून्य कहाँ आते हैं, इस पर ध्यान देना।
🎯 Exam Tip: सार्थक अंकों के नियमों को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे वैज्ञानिक गणनाओं में परिणामों की सटीकता को दर्शाते हैं। उदाहरणों का अभ्यास करने से नियमों को समझने में मदद मिलती है।
Question 7. किसी अंक को पूर्णाकित करने के क्या नियम हैं? प्रत्येक नियम को उदाहरण देते हुए समझाइये।
Answer: किसी संख्या को सार्थक अंकों वाली संख्या में बदलने के लिए हम सन्निकटन (approximation) के सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। इसका मतलब है कि हम संख्या को एक निश्चित संख्या तक के अंकों में छोटा कर देते हैं। इसके लिए कुछ नियम इस प्रकार हैं:
- पहला नियम: जिस अंक को पूर्णांकित करना है, यदि उसके दाईं ओर का अंक 5 से कम है, तो पूर्णांकित किए जाने वाले अंक को अपरिवर्तित रखते हैं। उदाहरण के लिए, 15.43 में 4 को पूर्णांकित करने पर, उसके दाईं ओर का अंक 3 (जो 5 से कम है) है, इसलिए 4 अपरिवर्तित रहेगा। पूर्णांकित अंक 15.4 होगा। इसी तरह, 5.33 को पूर्णांकित करने पर 5.3 प्राप्त होगा।
- दूसरा नियम: जिस अंक को पूर्णांकित करना है, यदि उसके बाद आने वाला अंक 5 से अधिक है, तो पूर्णांकित किए जाने वाले अंक में 1 जोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए, 5.89 में 8 को पूर्णांकित करना है, तो उसके बाद 9 (जो 5 से अधिक है) है, इसलिए 8 में 1 जोड़कर 9 कर देंगे। पूर्णांकित संख्या 5.9 होगी। इसी तरह, 7.66 को 7.7 लिखा जाएगा और 14.628 को 14.63 लिखा जाएगा।
- तीसरा नियम: यदि पूर्णांकित किया जाने वाला अंक 5 है और इस अंक के बाद शून्य आता है, तो पहले वाले अंक को अपरिवर्तित रखते हैं। यदि संख्या शून्य से बड़ी है, तो पूर्णांकित करने के लिए संख्या में 1 जोड़ देंगे। उदाहरण के लिए, \( x = 3.450 \) को 3.4 लिखा जाएगा क्योंकि पूर्णांकित किए जाने वाले अंक 5 के बाद शून्य है। अतः संख्या अपरिवर्तित रहेगी।
- चौथा नियम: यदि पूर्णांकित किया जाने वाला अंक 5 है और इस अंक से पहले की संख्या विषम (odd) है, तो उसमें 1 जोड़ देते हैं। यदि यह संख्या सम (even) है, तो वह अपरिवर्तित रहती है। उदाहरण के लिए, \( x = 4.750 \) को 4.8 लिखा जाएगा (7 विषम है, इसलिए 1 जोड़ा)। जबकि \( 1 = 25.350 \) को 25.4 लिखा जाएगा (3 विषम है, इसलिए 1 जोड़ा)। \( x = 5.850 \) को 5.8 लिखा जाएगा (8 सम है, इसलिए अपरिवर्तित)। \( x = 18.250 \) को 18.2 लिखा जाएगा (2 सम है, इसलिए अपरिवर्तित)।
In simple words: पूर्णांकन का मतलब है किसी संख्या को छोटा करना या उसे निश्चित दशमलव स्थानों तक लिखना। इसके लिए कुछ नियम हैं: यदि अगला अंक 5 से कम है तो कुछ नहीं बदलता, यदि 5 से ज्यादा है तो पिछला अंक बढ़ जाता है। यदि अगला अंक ठीक 5 है, तो उससे पहले वाला अंक सम होने पर वही रहता है, और विषम होने पर एक बढ़ जाता है।
🎯 Exam Tip: पूर्णांकन नियमों को सही ढंग से समझना और लागू करना महत्वपूर्ण है, खासकर जब संख्याओं को एक निश्चित संख्या में सार्थक अंकों या दशमलव स्थानों तक दिखाना होता है।
Question 8. विमीय विश्लेषण विधि के द्वारा किसी सूत्र की सत्यता की जाँच कैसे की जाती है? उदाहरण सहित समझाइये।
Answer: विमीय विश्लेषण विधि से किसी भौतिक सूत्र की सत्यता की जाँच करने के लिए हम विमाओं की एकरूपता के सिद्धांत का उपयोग करते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी भी भौतिक समीकरण में सभी पदों की विमाएँ समान होनी चाहिए। इसका मतलब है कि समीकरण के बाईं ओर की विमाएँ दाईं ओर की विमाओं के बराबर होनी चाहिए।
जाँच के चरण:
- समीकरण के बाईं ओर की विमाएँ ज्ञात करें: समीकरण के बाईं ओर के सभी भौतिक राशियों की विमाएँ लिखें और उन्हें संयोजित करके कुल विमा ज्ञात करें।
- समीकरण के दाईं ओर की विमाएँ ज्ञात करें: समीकरण के दाईं ओर के सभी भौतिक राशियों की विमाएँ लिखें और उन्हें संयोजित करके कुल विमा ज्ञात करें।
- तुलना करें: यदि बाईं ओर की कुल विमा दाईं ओर की कुल विमा के बराबर है, तो सूत्र विमीय रूप से सही माना जाता है।
उदाहरण: गतिज ऊर्जा के सूत्र \( E_k = \frac { 1 }{ 2 } m v^2 \) की सत्यता की जाँच करें।
- बाईं ओर की विमाएँ (\( E_k \)): ऊर्जा की विमा \([M^1L^2T^{-2}]\) होती है।
- दाईं ओर की विमाएँ (\( \frac { 1 }{ 2 } m v^2 \)):
- \( \frac { 1 }{ 2 } \) एक शुद्ध संख्या है, इसकी कोई विमा नहीं होती।
- द्रव्यमान \( m \) की विमा \([M]\) है।
- वेग \( v \) की विमा \([L^1T^{-1}]\) है।
- तो, \( v^2 \) की विमा \([L^1T^{-1}]^2 = [L^2T^{-2}]\) होगी।
- इसलिए, \( m v^2 \) की कुल विमा \([M^1][L^2T^{-2}] = [M^1L^2T^{-2}]\) है।
चूंकि बाईं ओर की विमा \([M^1L^2T^{-2}]\) दाईं ओर की विमा \([M^1L^2T^{-2}]\) के बराबर है, तो सूत्र \( E_k = \frac { 1 }{ 2 } m v^2 \) विमीय रूप से सही है।
In simple words: किसी भी वैज्ञानिक सूत्र को जांचने के लिए, हम यह देखते हैं कि समीकरण के दोनों तरफ की भौतिक राशियों की "शक्तियाँ" (विमाएँ) एक जैसी हैं या नहीं। अगर वे एक जैसी हैं, तो सूत्र सही हो सकता है। जैसे, ऊर्जा के लिए, दोनों तरफ की विमाएँ हमेशा द्रव्यमान, लंबाई और समय के हिसाब से बराबर होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: विमीय विश्लेषण यह जाँचने का एक अच्छा तरीका है कि कोई सूत्र गलत तो नहीं है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं देता कि सूत्र पूरी तरह से सही है (जैसे, संख्यात्मक स्थिरांकों की जाँच नहीं हो पाती)।
Question 9. भौतिक विज्ञान के महत्त्व पर निबन्ध लिखिये।
Answer: भौतिक विज्ञान, विज्ञान की एक बहुत महत्वपूर्ण शाखा है। इसके ज्ञान के बिना विज्ञान की दूसरी शाखाओं का विकास मुश्किल है। भौतिक विज्ञान का विज्ञान की सभी शाखाओं के विकास और समाज के विकास में बहुत बड़ा योगदान है।
- रसायन विज्ञान में भौतिकी का महत्व: एक्स-किरणों के विवर्तन, परमाणु की संरचना और रेडियो-एक्टिविटी के आधार पर कई ठोस पदार्थों की संरचना का गहराई से अध्ययन किया जा सका है। अणुओं के बीच लगने वाले आंतरिक बलों की मदद से रासायनिक संरचना और बंधों के प्रकार को भी समझा गया है।
- जीव विज्ञान में भौतिकी का महत्व: इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के निर्माण से शरीर की कई संरचनाओं का अध्ययन करना संभव हुआ है। साथ ही, प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी का उपयोग कई जैविक नमूनों का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
- गणित में भौतिकी का महत्व: भौतिकी के सिद्धांतों के कारण कई गणितीय विधियों का विकास हुआ है। तकनीकी विकास विशेष रूप से भौतिकी के अनुप्रयोगों से जुड़ा है। भौतिकी के सिद्धांतों और नियमों का उपयोग करके कई उपकरण और यंत्र बनाए गए हैं, जिससे मानव जीवन बहुत आसान और उन्नत हुआ है। कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं:
- परमाणु भट्टी और परमाणु बम का विकास नाभिकीय विखंडन पर आधारित है।
- हवाई जहाजों का उड़ना बरनौली सिद्धांत पर आधारित है।
- डीजल इंजन, पेट्रोल इंजन और भाप इंजन जैसे ऊष्मागतिकी के नियम पर आधारित हैं।
- रॉकेट का चलना न्यूटन के गति के दूसरे और तीसरे नियमों पर आधारित है।
- बिजली बनाने में विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत का उपयोग होता है।
- रेडियो, टेलीविजन, फैक्स, वायरलेस, एसटीडी और आईएसडी जैसी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का उपयोग संचार में होता है।
इन सभी तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भौतिकी प्रौद्योगिकी से संबंधित है।
समाज से संबंध: पिछले कुछ दशकों में, वैज्ञानिक खोजों पर आधारित उत्पादों ने मानव के रोजमर्रा के जीवन को बदल दिया है। संचार और चिकित्सा के क्षेत्रों में बड़े बदलाव हुए हैं, जिसका श्रेय भौतिक विज्ञान को जाता है। कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल, ई-व्यापार जैसी सभी सुविधाओं ने पुरानी धारणाओं को बदल दिया है। संचार के लिए ऑप्टिक फाइबर-केबल और प्रकाश के तंतु के सिद्धांत पर आधारित है। उपग्रह प्रक्षेपण और रिमोट कंट्रोल जैसे आविष्कार भी भौतिक विज्ञान की ही देन हैं।
In simple words: भौतिक विज्ञान बहुत जरूरी है क्योंकि यह बाकी विज्ञान को आगे बढ़ने में मदद करता है। इसने रसायन, जीव विज्ञान और गणित जैसे क्षेत्रों में क्रांति लाई है। भौतिकी के कारण ही हमने कई मशीनें और तकनीकें बनाई हैं, जैसे एक्स-रे मशीन, रॉकेट और इंटरनेट, जिससे हमारा जीवन बहुत बेहतर हो गया है।
🎯 Exam Tip: निबंध लिखते समय, भौतिक विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव और उसके सामाजिक अनुप्रयोगों को स्पष्ट उदाहरणों के साथ उजागर करें ताकि उत्तर विस्तृत और प्रभावशाली लगे।
Question 10. वृहत् दूरियों के मापन की लम्बन विधि को समझाइये। इसकी सहायता से आकाशीय पिण्ड का आकार ज्ञात करने की विधि को विस्तारपूर्वक समझाइये।
Answer:
वृहत् दूरियों का मापन (लम्बन विधि)
बहुत बड़ी दूरियों (जैसे- चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी, किसी तारे की पृथ्वी से दूरी आदि) को सीधे मीटर पैमाने या मापने वाले टेप से नहीं नापा जा सकता। ऐसी स्थिति में लम्बन विधि का उपयोग किया जाता है।
लम्बन का अर्थ: यदि हम किसी वस्तु को अपने सामने रखें और बारी-बारी से अपनी बाईं और दाईं आँख बंद करके उसे देखें, तो हमें लगता है कि पृष्ठभूमि के सापेक्ष वस्तु की स्थिति बदल गई है। इसी को लम्बन (Parallax) कहते हैं। दोनों अवलोकन बिंदुओं के बीच की दूरी को आधारक (Basis) कहते हैं। इसमें दोनों आँखों के बीच की दूरी आधारक है।
(i) लम्बन विधि या विस्थापन विधि (Parallax Method): बहुत बड़ी दूरियों का मापन हम लम्बन विधि से करते हैं।
चित्र के अनुसार, किसी दूरस्थ ग्रह P की दूरी \( s \) ज्ञात करने के लिए हम इसे पृथ्वी पर दो अलग-अलग स्थितियों A और B से एक ही समय पर देखते हैं। A और B के बीच की दूरी \( AB = b \) है। इन दो स्थितियों से ग्रह की अवलोकन दिशाओं के बीच का कोण \( (\theta) \) माप लिया जाता है। कोण \( \angle APB = \theta \) लम्बन कोण या लाम्बनिक कोण कहलाता है।
ग्रह की पृथ्वी से दूरी बहुत अधिक है, इसलिए \( \frac { b }{ s } \ll 1 \), और कोण \( \theta \) बहुत छोटा होता है। इस स्थिति में हम \( AB \) को केंद्र P और त्रिज्या \( s \) वाले वृत्त का चाप \( b \) मान सकते हैं।
अतः \( \theta = \frac { AB }{ s } = \frac { b }{ s } \implies s = \frac { b }{ \theta } \)
यहां \( \theta \) रेडियन में है।
इसलिए, आधार \( b \) और कोण \( \theta \) ज्ञात होने पर \( s \) की गणना की जा सकती है।
आकाशीय पिण्ड का आकार ज्ञात करना:
यदि पृथ्वी से चंद्रमा की औसत दूरी \( s \) हो, और चंद्रमा का व्यास \( D \) हो, तो हम चंद्रमा के किनारों (A और B) को पृथ्वी के अवलोकन बिंदु से देख सकते हैं।
चंद्रमा का कोणीय व्यास \( \alpha \) (रेडियन में) पृथ्वी पर मापा जाता है।
जैसे \( AB = D \), तो \( \alpha = \frac { D }{ s } \implies D = s \alpha \)
इस तरह, यदि \( s \) और \( \alpha \) ज्ञात हों, तो चंद्रमा का व्यास \( D \) ज्ञात कर सकते हैं।
In simple words: लम्बन विधि का उपयोग बहुत दूर की चीज़ों की दूरी मापने के लिए किया जाता है। इसमें पृथ्वी पर दो अलग-अलग जगहों से एक ही समय पर एक दूर के ग्रह को देखते हैं। इन दोनों जगहों के बीच की दूरी और ग्रह पर बनने वाले कोण को मापकर, हम ग्रह की दूरी निकाल लेते हैं। फिर, अगर हमें ग्रह की दूरी और पृथ्वी से उसका कोणीय आकार पता है, तो हम उसका असली आकार भी पता कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: लम्बन विधि को समझाते समय, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि लम्बन कोण \( \theta \) हमेशा रेडियन में मापा जाता है, और दूरियों के बीच संबंध \( s = b/\theta \) और \( D = s\alpha \) का सही उपयोग करें।
RBSE Class 11 Physics Chapter 1 आंकिक प्रश्न
Question 1. किसी कण का वेग \( V = A + Bt \) है तो A व B की विमाएँ क्या होंगी?
Answer: समीकरण के विमीय एकरूपता के सिद्धांत के अनुसार, किसी भी भौतिक समीकरण में, समान भौतिक राशियों को ही जोड़ा या घटाया जा सकता है। इसका मतलब है कि समीकरण में सभी पदों की विमाएँ समान होनी चाहिए।
यहां, दिया गया समीकरण है: \( V = A + Bt \)
वेग \( V \) की विमा \([L^1T^{-1}]\) है।
1. A की विमा:
चूंकि \( A \) को \( V \) में जोड़ा गया है, इसलिए \( A \) की विमा \( V \) की विमा के समान होनी चाहिए।
\( \implies \) A की विमा = वेग \( V \) की विमा
\( \implies \) A की विमा \( = [L^1T^{-1}] \)
2. B की विमा:
चूंकि \( Bt \) को भी \( V \) में जोड़ा गया है, इसलिए \( Bt \) की विमा भी \( V \) की विमा के समान होनी चाहिए।
\( \implies \) \( Bt \) की विमा \( = [L^1T^{-1}] \)
यहां \( t \) समय है, जिसकी विमा \([T]\) है।
\( \implies \) \( B \times [T^1] = [L^1T^{-1}] \)
\( \implies \) \( B \) की विमा \( = \frac { [L^1T^{-1}] }{ [T^1] } \)
\( \implies \) \( B \) की विमा \( = [L^1T^{-2}] \)
अतः, \( A = [M^0L^1T^{-1}] \) और \( B = [M^0L^1T^{-2}] \)
In simple words: किसी भी समीकरण में, जो चीजें आपस में जुड़ती या घटती हैं, उनकी "नाप" (विमा) एक जैसी होनी चाहिए। वेग \(V\) की नाप लंबाई प्रति समय (\(L/T\)) है। चूंकि \(A\) को \(V\) में जोड़ा गया है, तो \(A\) की नाप भी \(L/T\) होगी। \(Bt\) को भी \(V\) में जोड़ा गया है, तो \(Bt\) की नाप भी \(L/T\) होगी। \(t\) समय है, तो \(B\) की नाप लंबाई प्रति समय-वर्ग (\(L/T^2\)) होगी।
🎯 Exam Tip: विमीय एकरूपता का सिद्धांत याद रखें: किसी भी भौतिक समीकरण में केवल उन्हीं राशियों को जोड़ा या घटाया जा सकता है जिनकी विमाएँ समान हों। यह विमाओं को ज्ञात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
Question 3. वास्तविक गैस की अवस्था के वाण्डर वाल्स गैस समीकरण \( \left(P+\frac{a}{V^{2}}\right)(V-b)=R T \) है। यहाँ P दाब, V आयतन, R गैस नियतांक एवं T ताप है। इस समीकरण में नियतांक a एवं b की विमाएँ ज्ञात कीजिए।
Answer: विमीय एकरूपता के सिद्धांत के अनुसार, समीकरण में केवल उन्हीं राशियों को जोड़ा या घटाया जा सकता है जिनकी विमाएँ समान हों। इस सिद्धांत का उपयोग करके हम \( a \) और \( b \) की विमाएँ ज्ञात करेंगे।
1. नियतांक \( b \) की विमा:
समीकरण के पद \( (V-b) \) में, \( b \) को आयतन \( V \) में से घटाया गया है।
\( \implies \) \( b \) की विमा \( = \) आयतन \( V \) की विमा
\( \implies \) \( b = [L^3] \)
2. नियतांक \( a \) की विमा:
समीकरण के पद \( \left(P+\frac{a}{V^{2}}\right) \) में, \( \frac{a}{V^{2}} \) को दाब \( P \) में जोड़ा गया है।
\( \implies \) \( \frac{a}{V^{2}} \) की विमा \( = \) दाब \( P \) की विमा
दाब \( P \) की विमा \( = \frac { बल }{ क्षेत्रफल } = \frac { [M L T^{-2}] }{ [L^2] } = [M L^{-1} T^{-2}] \)
\( \implies \) \( a \) की विमा \( = \) दाब \( P \) की विमा \( \times \) \( V^2 \) की विमा
\( \implies \) \( a = [M L^{-1} T^{-2}] \times ([L^3])^2 \)
\( \implies \) \( a = [M L^{-1} T^{-2}] \times [L^6] \)
\( \implies \) \( a = [M^1 L^5 T^{-2}] \)
अतः, नियतांक \( a \) की विमा \( [M^1 L^5 T^{-2}] \) और नियतांक \( b \) की विमा \( [L^3] \) है।
In simple words: इस समीकरण में, जो चीजें आपस में जुड़ती या घटती हैं, उनकी नाप (विमा) एक जैसी होनी चाहिए। \(V\) आयतन है, इसलिए \(b\) की नाप भी आयतन जैसी (\(L^3\)) होगी। इसी तरह, \(P\) दाब है, तो \(a/V^2\) की नाप भी दाब जैसी (\(ML^{-1}T^{-2}\)) होगी। इससे हम \(a\) की नाप निकाल सकते हैं जो \([M^1 L^5 T^{-2}]\) है।
🎯 Exam Tip: विमीय विश्लेषण में, गुणा और भाग के पदों की विमाएँ अलग-अलग होती हैं, लेकिन जोड़ और घटाव के लिए विमाएँ हमेशा समान होनी चाहिए। यह नियतांकों की विमा ज्ञात करने का मुख्य नियम है।
Question 4. यदि गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियतांक G को मान MKS प्रणाली में \( 6.67 \times 10^{-11} \text{ Nm}^2/\text{kg}^2 \) है तो विमीय विधि से CGS प्रणाली में इसका मान ज्ञात कीजिए।
Answer: सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक \( G \) का विमीय सूत्र \( [M^{-1}L^3T^{-2}] \) होता है।
यहां, विमाएँ हैं: \( a = -1 \), \( b = 3 \), \( c = -2 \)
हमें \( G \) का मान MKS प्रणाली से CGS प्रणाली में बदलना है।
दिया गया है: \( n_1 = 6.67 \times 10^{-11} \text{ Nm}^2/\text{kg}^2 \)
हम जानते हैं कि \( n_2 = n_1 \left[\frac{M_1}{M_2}\right]^a \left[\frac{L_1}{L_2}\right]^b \left[\frac{T_1}{T_2}\right]^c \)
MKS प्रणाली (प्रणाली 1) और CGS प्रणाली (प्रणाली 2) के लिए मान:
| राशि | प्रणाली 1 (MKS) | प्रणाली 2 (CGS) |
|---|---|---|
| द्रव्यमान | \( M_1 = \) 1 kg | \( M_2 = \) 1 g |
| लंबाई | \( L_1 = \) 1 m | \( L_2 = \) 1 cm |
| समय | \( T_1 = \) 1 s | \( T_2 = \) 1 s |
मानों को सूत्र में रखने पर:
\( n_2 = 6.67 \times 10^{-11} \left[\frac{1 \text{ kg}}{1 \text{ g}}\right]^{-1} \left[\frac{1 \text{ m}}{1 \text{ cm}}\right]^{3} \left[\frac{1 \text{ s}}{1 \text{ s}}\right]^{-2} \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11} \left[\frac{1000 \text{ g}}{1 \text{ g}}\right]^{-1} \left[\frac{100 \text{ cm}}{1 \text{ cm}}\right]^{3} \left[1\right]^{-2} \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11} \times [1000]^{-1} \times [100]^3 \times 1 \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11} \times \frac { 1 }{ 1000 } \times (100 \times 100 \times 100) \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11} \times 10^{-3} \times 10^6 \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11+ (-3) + 6} \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-11-3+6} \)
\( \implies n_2 = 6.67 \times 10^{-8} \)
CGS प्रणाली में गुरुत्वाकर्षण नियतांक की इकाई \( \text{dyne cm}^2/\text{g}^2 \) होती है।
अतः, CGS प्रणाली में \( G \) का मान \( 6.67 \times 10^{-8} \text{ dyne cm}^2/\text{g}^2 \) होगा।
In simple words: गुरुत्वाकर्षण के नियम में इस्तेमाल होने वाला \(G\) नाम का एक नंबर होता है, जिसकी नाप \(M^{-1}L^3T^{-2}\) होती है। अगर हमें इस नंबर का मान MKS (मीटर, किलोग्राम, सेकंड) सिस्टम में पता है, तो हम इसे CGS (सेंटीमीटर, ग्राम, सेकंड) सिस्टम में बदलने के लिए विमाओं का उपयोग करते हैं। हम लंबाई, द्रव्यमान और समय की यूनिट बदलने के लिए उनके बीच का अनुपात लेते हैं, और उन्हें \(G\) की नाप के अनुसार घात में रखते हैं। ऐसा करने पर, \(6.67 \times 10^{-11}\) MKS मान \(6.67 \times 10^{-8}\) CGS मान में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: यूनिट बदलने के लिए विमीय विधि का उपयोग करते समय, संबंधित भौतिक राशि के विमीय सूत्र को सही ढंग से लिखें और विभिन्न प्रणालियों में आधार इकाइयों के बीच रूपांतरण कारकों को ध्यान से लागू करें।
Question 5. पारे का घनत्व \( 13.6 \text{ gm/cm}^3 \) है। विमीय विधि से MKS पद्धति में इसका मान ज्ञात करो।
Answer: घनत्व का विमीय सूत्र \( [M^1L^{-3}T^0] \) होता है।
यहां, विमाएँ हैं: \( a = 1 \), \( b = -3 \), \( c = 0 \)
दिया गया मान CGS प्रणाली में है, और हमें इसे MKS प्रणाली में बदलना है।
दिया गया है: \( n_1 = 13.6 \text{ gm/cm}^3 \)
हम जानते हैं कि \( n_2 = n_1 \left[\frac{M_1}{M_2}\right]^a \left[\frac{L_1}{L_2}\right]^b \left[\frac{T_1}{T_2}\right]^c \)
CGS प्रणाली (प्रणाली 1) और MKS प्रणाली (प्रणाली 2) के लिए मान:
| राशि | प्रणाली 1 (CGS) | प्रणाली 2 (MKS) |
|---|---|---|
| द्रव्यमान | \( M_1 = \) 1 g | \( M_2 = \) 1 kg |
| लंबाई | \( L_1 = \) 1 cm | \( L_2 = \) 1 m |
| समय | \( T_1 = \) 1 s | \( T_2 = \) 1 s |
मानों को सूत्र में रखने पर:
\( n_2 = 13.6 \left[\frac{1 \text{ g}}{1 \text{ kg}}\right]^1 \left[\frac{1 \text{ cm}}{1 \text{ m}}\right]^{-3} \left[\frac{1 \text{ s}}{1 \text{ s}}\right]^0 \)
\( \implies n_2 = 13.6 \left[\frac{1 \text{ g}}{1000 \text{ g}}\right]^1 \left[\frac{1 \text{ cm}}{100 \text{ cm}}\right]^{-3} \times 1 \)
\( \implies n_2 = 13.6 \times \left[10^{-3}\right]^1 \times \left[10^{-2}\right]^{-3} \)
\( \implies n_2 = 13.6 \times 10^{-3} \times 10^{(-2) \times (-3)} \)
\( \implies n_2 = 13.6 \times 10^{-3} \times 10^{6} \)
\( \implies n_2 = 13.6 \times 10^{(-3+6)} \)
\( \implies n_2 = 13.6 \times 10^3 \)
अतः, MKS प्रणाली में पारे का घनत्व \( 13.6 \times 10^3 \text{ kg/m}^3 \) है।
In simple words: पारे का घनत्व \(13.6\) ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर दिया गया है। हमें इसे MKS सिस्टम (किलोग्राम प्रति घन मीटर) में बदलना है। घनत्व की नाप द्रव्यमान प्रति लंबाई-घन (\(ML^{-3}\)) है। हम ग्राम को किलोग्राम में और सेंटीमीटर को मीटर में बदलने के लिए उनके अनुपात का उपयोग करते हैं, और उन्हें सही घात में लगाते हैं। गणना करने पर, यह \(13.6 \times 10^3\) किलोग्राम प्रति घन मीटर हो जाता है।
🎯 Exam Tip: घनत्व जैसी राशियों को एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली में बदलते समय, यह सुनिश्चित करें कि आप द्रव्यमान और लंबाई की इकाइयों के लिए सही रूपांतरण कारक का उपयोग कर रहे हैं।
Question 6. विमीय विधि से सूत्र \( Y = \frac { M g L }{ \pi r^2 l } \) की यथार्थता की जाँच करो।
Answer: हम इस सूत्र की विमीय सत्यता की जाँच करने के लिए विमाओं के एकरूपता सिद्धांत का उपयोग करेंगे, जिसका अर्थ है कि समीकरण के दोनों पक्षों की विमाएँ समान होनी चाहिए।
यह सूत्र प्रत्यास्थता गुणांक (Young's Modulus) \( Y \) के लिए है। प्रत्यास्थता गुणांक की विमा \([M^1L^{-1}T^{-2}]\) होती है।
1. बाईं ओर की विमा (\( Y \)):
\( Y \) की विमा \( = [M^1L^{-1}T^{-2}] \)
2. दाईं ओर की विमा (\( \frac { M g L }{ \pi r^2 l } \)):
प्रत्येक पद की विमा इस प्रकार है:
- द्रव्यमान \( M \) की विमा \( = [M] \)
- गुरुत्वीय त्वरण \( g \) की विमा \( = [L^1T^{-2}] \)
- लंबाई \( L \) की विमा \( = [L] \)
- \( \pi \) एक शुद्ध संख्या है, इसकी कोई विमा नहीं होती।
- त्रिज्या \( r \) की विमा \( = [L] \), तो \( r^2 \) की विमा \( = [L^2] \)
- लंबाई में वृद्धि \( l \) की विमा \( = [L] \)
अब दाईं ओर के सभी पदों की विमाओं को एक साथ रखने पर:
\( \text{दाईं ओर की विमा} = \frac { [M] [L^1T^{-2}] [L] }{ [L^2] [L] } \)
\( \implies \text{दाईं ओर की विमा} = \frac { [M L^2 T^{-2}] }{ [L^3] } \)
\( \implies \text{दाईं ओर की विमा} = [M L^{(2-3)} T^{-2}] \)
\( \implies \text{दाईं ओर की विमा} = [M^1 L^{-1} T^{-2}] \)
चूंकि समीकरण के बाईं ओर की विमा \([M^1L^{-1}T^{-2}]\) दाईं ओर की विमा \([M^1L^{-1}T^{-2}]\) के बराबर है, तो विमीय दृष्टि से यह सूत्र सही है।
In simple words: हमें यह जांचना है कि \(Y = \frac{MgL}{\pi r^2 l}\) सूत्र विमाओं के हिसाब से सही है या नहीं। \(Y\) (प्रत्यास्थता गुणांक) की नाप \(ML^{-1}T^{-2}\) होती है। अब हम सूत्र के दूसरी तरफ के सभी हिस्सों की नाप निकालते हैं: \(M\) द्रव्यमान है, \(g\) त्वरण है, \(L\) लंबाई है, \(r\) त्रिज्या है और \(l\) लंबाई में वृद्धि है। \(\pi\) की कोई नाप नहीं होती। जब हम इन सभी की नाप को गुणा और भाग करते हैं, तो हमें \(ML^{-1}T^{-2}\) ही मिलता है। चूंकि दोनों तरफ की नाप एक जैसी है, तो सूत्र विमाओं के हिसाब से सही है।
🎯 Exam Tip: विमीय विश्लेषण में, सभी संख्यात्मक स्थिरांकों (जैसे \( \pi \), 1/2) की कोई विमा नहीं होती। किसी सूत्र की विमीय सत्यता की जाँच करते समय इन स्थिरांकों को छोड़ दें।
Question 7. विमीय विधि से सूत्र \( \frac { 1 }{ 2 } m v^2 = m g h \) की सत्यता की जाँच कीजिए।
Answer: हम इस सूत्र की विमीय सत्यता की जाँच करने के लिए विमाओं के एकरूपता सिद्धांत का उपयोग करेंगे। यह सिद्धांत कहता है कि किसी भी भौतिक समीकरण में, समीकरण के बाईं ओर की कुल विमा दाईं ओर की कुल विमा के बराबर होनी चाहिए।
1. बाईं ओर की विमा (\( \frac { 1 }{ 2 } m v^2 \)):
यह गतिज ऊर्जा का सूत्र है।
\( \frac { 1 }{ 2 } \) एक शुद्ध संख्या है, इसकी कोई विमा नहीं होती।
द्रव्यमान \( m \) की विमा \( = [M^1] \)
वेग \( v \) की विमा \( = [L^1T^{-1}] \)
तो, \( v^2 \) की विमा \( = [L^1T^{-1}]^2 = [L^2T^{-2}] \)
इसलिए, बाईं ओर की कुल विमा \( = [M^1][L^2T^{-2}] = [M^1L^2T^{-2}] \)
2. दाईं ओर की विमा (\( m g h \)):
यह स्थितिज ऊर्जा का सूत्र है।
द्रव्यमान \( m \) की विमा \( = [M^1] \)
गुरुत्वीय त्वरण \( g \) की विमा \( = [L^1T^{-2}] \) (क्योंकि त्वरण \( = \frac { वेग }{ समय } \))
ऊंचाई \( h \) की विमा \( = [L^1] \) (क्योंकि यह एक लंबाई है)
इसलिए, दाईं ओर की कुल विमा \( = [M^1][L^1T^{-2}][L^1] = [M^1L^2T^{-2}] \)
चूंकि समीकरण के दोनों पक्षों की विमाएँ समान हैं (\([M^1L^2T^{-2}]\)), तो विमीय दृष्टि से यह सूत्र सही है। यह सूत्र गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के बीच संबंध को दर्शाता है, और दोनों ऊर्जा रूपों की विमाएँ समान होती हैं।
In simple words: हमें यह जांचना है कि \(1/2 mv^2 = mgh\) सूत्र सही है या नहीं। \(1/2 mv^2\) गतिज ऊर्जा है और \(mgh\) स्थितिज ऊर्जा है। गतिज ऊर्जा की नाप द्रव्यमान \(\times\) (वेग)\(^2\) है, जो \(ML^2T^{-2}\) आती है। स्थितिज ऊर्जा की नाप द्रव्यमान \(\times\) त्वरण \(\times\) ऊंचाई है, जो \(ML^2T^{-2}\) आती है। चूंकि दोनों तरफ की नाप एक जैसी है, तो सूत्र विमाओं के हिसाब से सही है।
🎯 Exam Tip: यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि सभी प्रकार की ऊर्जाओं की विमाएँ समान होती हैं। विमीय विश्लेषण में, जब आप दो भौतिक राशियों की तुलना करते हैं, तो उनकी विमाएँ हमेशा एक जैसी होनी चाहिए।
Question 8. विमीय विधि से पृष्ठ तनाव (T) का सूत्र स्थापित कीजिए, यदि यह केशिका नली की त्रिज्या (r), केशिका नली में द्रव्य स्तम्भ की ऊँचाई (h), घनत्व (d) और गुरुत्वीय त्वरण (g) पर निर्भर करता है।
Answer: मान लीजिए पृष्ठ तनाव \( T \) केशिका नली की त्रिज्या \( r \), द्रव्य स्तम्भ की ऊँचाई \( h \), द्रव्य के घनत्व \( d \) और गुरुत्वीय त्वरण \( g \) पर निर्भर करता है। हम इसे इस प्रकार लिख सकते हैं:
\( T \propto r^a h^b d^c g^e \)
\( \implies T = K r^a h^b d^c g^e \)
जहां \( K \) एक विमाहीन नियतांक है।
विमीय सूत्र:
- पृष्ठ तनाव \( T \) की विमा \( = [M^1 L^0 T^{-2}] \) (बल प्रति लंबाई)
- त्रिज्या \( r \) की विमा \( = [L^1] \)
- ऊँचाई \( h \) की विमा \( = [L^1] \)
- घनत्व \( d \) की विमा \( = [M^1 L^{-3}] \)
- गुरुत्वीय त्वरण \( g \) की विमा \( = [L^1 T^{-2}] \)
अब समीकरण के दोनों पक्षों की विमाएँ बराबर करें:
\( [M^1 L^0 T^{-2}] = [L^1]^a [L^1]^b [M^1 L^{-3}]^c [L^1 T^{-2}]^e \)
\( [M^1 L^0 T^{-2}] = [L^a] [L^b] [M^c L^{-3c}] [L^e T^{-2e}] \)
\( [M^1 L^0 T^{-2}] = [M^c L^{(a+b-3c+e)} T^{-2e}] \)
दोनों पक्षों में समान आधार की घातों की तुलना करने पर:
M की घातों की तुलना:
\( c = 1 \)
T की घातों की तुलना:
\( -2 = -2e \)
\( \implies e = 1 \)
L की घातों की तुलना:
\( 0 = a + b - 3c + e \)
\( 0 = a + b - 3(1) + 1 \)
\( 0 = a + b - 3 + 1 \)
\( 0 = a + b - 2 \)
\( \implies a + b = 2 \)
केशिका वृद्धि के प्रयोगात्मक परिणामों से ज्ञात है कि पृष्ठ तनाव त्रिज्या \( r \) और ऊँचाई \( h \) दोनों पर निर्भर करता है। आमतौर पर, यह \( rh \) के गुणनफल के समानुपाती होता है, जिसका अर्थ है कि \( a \) और \( b \) के बीच कोई विशिष्ट संबंध हो सकता है, जैसे \( a=1, b=1 \) जिससे \( a+b=2 \) संतुष्ट होता है।
इसलिए, \( a=1, b=1, c=1, e=1 \)
इन मानों को सूत्र में रखने पर:
\( T = K r^1 h^1 d^1 g^1 \)
\( \implies T = K r h d g \)
प्रयोगों द्वारा \( K = \frac { 1 }{ 2 } \) प्राप्त होता है।
अतः, पृष्ठ तनाव का सूत्र है: \( T = \frac { r h d g }{ 2 } \)
In simple words: पृष्ठ तनाव (जो पानी की सतह को खिंचा हुआ रखता है) का सूत्र निकालने के लिए हम विमाओं का उपयोग करते हैं। हम मान लेते हैं कि पृष्ठ तनाव केशिका नली की त्रिज्या, ऊँचाई, पानी के घनत्व और गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है। फिर हम हर चीज़ की "नाप" (विमा) लिखते हैं और उन्हें इस तरह जोड़ते हैं कि समीकरण के दोनों तरफ की नाप एक जैसी हो जाए। जब हम ऐसा करते हैं, तो हमें पता चलता है कि पृष्ठ तनाव इन सभी कारकों के गुणनफल का लगभग आधा होता है, यानी \(T = K \times \text{त्रिज्या} \times \text{ऊँचाई} \times \text{घनत्व} \times \text{गुरुत्वाकर्षण}\), जहाँ \(K\) एक नियत संख्या है।
🎯 Exam Tip: विमीय विधि से सूत्र स्थापित करते समय, भौतिक राशि की निर्भरता को घात के रूप में व्यक्त करें और फिर विमाओं के एकरूपता सिद्धांत का उपयोग करके घातों की तुलना करें। अज्ञात नियतांक \( K \) को याद रखना या प्रयोगात्मक रूप से ज्ञात करना होता है।
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