RBSE Solutions Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास

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Detailed Chapter 17 कृषिगत विकास RBSE Solutions for Class 11 Economics

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Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास RBSE Solutions PDF

Rbse Class 11 Economics Chapter 17 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

Rbse Class 11 Economics Chapter 17 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारत की मुख्य खाद्यान्न फसल है
(अ) चावल
(ब) गेहूँ
(स) ज्वार
(द) मक्का
Answer: (अ) चावल
In simple words: भारत में चावल सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली खाने की फसल है. यह देश के बड़े हिस्से में लोगों का मुख्य भोजन है.

🎯 Exam Tip: मुख्य फसलों को याद रखें और उनके भौगोलिक वितरण पर भी ध्यान दें, क्योंकि ऐसे प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं.

 

Question 2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन कौन-सी पंचवर्षीय योजना में लागू किया गया?
Answer: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में लागू किया गया था. इस मिशन का लक्ष्य चावल, गेहूँ और दालों के उत्पादन को बढ़ाना था.
In simple words: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य देश में अनाज और दालों का उत्पादन बढ़ाना था.

🎯 Exam Tip: सरकारी योजनाओं को उनकी शुरुआत की पंचवर्षीय योजना और मुख्य उद्देश्यों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 3. भारत में हरित क्रांति कब अपनाई गई?
(अ) रबी फसल 1965
(ब) रबी फसल 1966
(स) खरीफ फसल 1966
(द) खरीफ फसल 1965
Answer: (स) खरीफ फसल 1966
In simple words: भारत में हरित क्रांति खरीफ फसल 1966 में शुरू हुई थी, जिससे खेती में बड़े बदलाव आए. इस क्रांति ने उच्च उपज वाले बीजों का इस्तेमाल शुरू किया.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की शुरुआत का वर्ष और मुख्य फसल का प्रकार (खरीफ या रबी) दोनों को याद रखना चाहिए.

 

Question 4. निम्नलिखित में से वाणिज्यिक फसल कौन नहीं है
(अ) जूट
(ब) कपास
(स) गन्ना
(द) चावल
Answer: (द) चावल
In simple words: जूट, कपास और गन्ना व्यापार के लिए उगाई जाने वाली फसलें हैं, जबकि चावल मुख्य रूप से खाने के लिए उगाई जाती है.

🎯 Exam Tip: वाणिज्यिक और खाद्यान्न फसलों के बीच का अंतर समझें, क्योंकि यह अर्थशास्त्र और कृषि के लिए एक मौलिक अवधारणा है.

 

Question 5. नाबार्ड की स्थापना कब की गई?
(अ) जुलाई 1988
(ब) जुलाई 1982
(स) जुलाई 1984
(द) जुलाई 1986
Answer: (ब) जुलाई 1982
In simple words: नाबार्ड की स्थापना जुलाई 1982 में हुई थी, जिसका मुख्य काम कृषि और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना है. यह ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए ऋण देता है.

🎯 Exam Tip: नाबार्ड जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना तिथि और उनके मुख्य कार्यों को याद रखें.

 

Question 6. प्रति हैक्टेयर अधिकतम उर्वरकों का उपयोग करने वाला राज्य है
(अ) हरियाणा
Answer: (अ) हरियाणा
In simple words: हरियाणा राज्य में किसान प्रति हैक्टेयर जमीन पर सबसे अधिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं. यह उर्वरकों का अधिक उपयोग करके फसल की पैदावार बढ़ाता है.

🎯 Exam Tip: कृषि से संबंधित राज्यों की रैंकिंग या विशिष्ट विशेषताओं को याद रखें, जैसे कि उर्वरक उपयोग या फसल उत्पादन.

 

Question 7. निम्नलिखित में से कौन-सा कृषि वित्त का गैर-संस्थागत स्रोत नहीं है?
(अ) महाजन
(ब) रिश्तेदार
(स) साहूकार
(द) सहकारी समितियाँ
Answer: (द) सहकारी समितियाँ
In simple words: सहकारी समितियाँ कृषि वित्त का संस्थागत स्रोत हैं, जबकि महाजन, रिश्तेदार और साहूकार गैर-संस्थागत स्रोत हैं. संस्थागत स्रोत सरकार द्वारा नियंत्रित होते हैं.

🎯 Exam Tip: कृषि वित्त के संस्थागत और गैर-संस्थागत स्रोतों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें.

 

Question 8. क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की शुरुआत कब की गई?
(अ) 2 अक्टूबर, 1975
(ब) 2 अक्टूबर, 1976
(स) 2 अक्टूबर, 1977
(द) 2 अक्टूबर, 1978
Answer: (अ) 2 अक्टूबर, 1975
In simple words: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की शुरुआत 2 अक्टूबर, 1975 को हुई थी, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को आसानी से बैंक सेवाएं मिल सकें. इन बैंकों ने ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

🎯 Exam Tip: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की तिथि और उनके मुख्य उद्देश्य को याद रखें, क्योंकि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है.

Rbse Class 11 Economics Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारत की कितनी प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है?
Answer: भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है. कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है.
In simple words: भारत में करीब 65% लोग खेती पर निर्भर हैं, जिसका मतलब है कि उनकी जीविका सीधे या परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी है.

🎯 Exam Tip: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व से जुड़े आंकड़ों को याद रखना चाहिए.

 

Question 2. खाद्यान्न प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 2013-14 में कितनी थी?
Answer: वर्ष 2013-14 में खाद्यान्न की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 2101 किलोग्राम थी. यह दर्शाता है कि कृषि उत्पादकता में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है.
In simple words: 2013-14 में, हर एक हैक्टेयर जमीन से औसतन 2101 किलोग्राम अनाज पैदा हुआ.

🎯 Exam Tip: विशिष्ट वर्षों के लिए कृषि उत्पादन और उत्पादकता से संबंधित डेटा को सटीक रूप से याद रखें.

 

Question 3. नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) तथा पोटाश (K) का आदर्श अनुपात क्या है?
Answer: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) तथा पोटाश (K) का आदर्श अनुपात आमतौर पर 4:2:1 माना जाता है, जो फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए जरूरी है. यह अनुपात मिट्टी और फसल के प्रकार पर निर्भर करता है.
In simple words: पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए, खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का सही अनुपात 4:2:1 होना चाहिए.

🎯 Exam Tip: विभिन्न पोषक तत्वों के आदर्श अनुपात को समझें, क्योंकि यह कृषि विज्ञान में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है.

 

Question 4. भारत में सिंचित क्षेत्र तथा असिंचित क्षेत्र का प्रतिशत क्या है?
Answer: भारत में सिंचित क्षेत्र लगभग 44.9% है, जबकि असिंचित क्षेत्र 53.1% है. यह दर्शाता है कि एक बड़ा हिस्सा अभी भी बारिश पर निर्भर है.
In simple words: भारत में करीब 44.9% जमीन पर सिंचाई होती है, और 53.1% जमीन पर बारिश से खेती होती है.

🎯 Exam Tip: सिंचित और असिंचित भूमि के आंकड़ों को याद रखें, क्योंकि यह कृषि की निर्भरता और विकास को दर्शाता है.

 

Question 5. भारत में तालाबों द्वारा सिंचाई कौन-से राज्यों में की जाती है?
Answer: भारत में तालाबों द्वारा सिंचाई मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक आदि में की जाती है. इन राज्यों में तालाबों का उपयोग पारंपरिक रूप से होता आया है.
In simple words: दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में तालाबों से खेती की सिंचाई ज्यादा होती है.

🎯 Exam Tip: सिंचाई के विभिन्न साधनों और उनसे जुड़े प्रमुख राज्यों को याद रखें.

 

Question 6. भारत में हरित क्रांति का जनक किसे माना जाता है?
Answer: भारत में हरित क्रांति का जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है. उन्होंने उच्च उपज वाले बीजों और आधुनिक कृषि तकनीकों को भारत में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
In simple words: डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति लाने का श्रेय दिया जाता है, जिससे अनाज उत्पादन में भारी वृद्धि हुई.

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृषि आंदोलनों और उनके प्रमुख व्यक्तियों को याद रखें.

 

Question 7. देशी बैंकर क्या है?
Answer: देशी बैंकर वे लोग होते हैं जो ग्रामीणों को महाजन, साहूकार, सगे-संबंधी और जमींदारों के रूप में ऋण प्रदान करते हैं. ये अक्सर अनौपचारिक और उच्च ब्याज दर पर ऋण देते हैं.
In simple words: देशी बैंकर वो होते हैं जो गांवों में लोगों को पैसे उधार देते हैं, जैसे महाजन, साहूकार और रिश्तेदार, लेकिन वे बैंक जैसे नहीं होते.

🎯 Exam Tip: गैर-संस्थागत वित्त स्रोतों की परिभाषा और उदाहरणों को याद रखें.

 

Question 8. नाबार्ड का पूरा नाम लिखिए।
Answer: नाबार्ड का पूरा नाम National Bank for Agriculture and Rural Development है. यह भारत में ग्रामीण और कृषि विकास के लिए एक शीर्ष वित्तीय संस्था है.
In simple words: नाबार्ड का पूरा नाम नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट है. यह खेती और गांव के विकास के लिए पैसा देता है.

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण संगठनों के संक्षिप्त नाम और पूर्ण रूप (एक्रोनिम्स) को याद रखें, क्योंकि ये अक्सर सीधे पूछे जाते हैं.

 

Question 9. 'इंद्रधनुषीय क्रांति किसे कहते हैं?
Answer: इंद्रधनुषीय क्रांति द्वितीय हरित क्रांति को कहते हैं. इसका उद्देश्य कृषि के सभी क्षेत्रों - अनाज, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि को शामिल करते हुए समग्र विकास करना है, ताकि कृषि क्षेत्र का व्यापक विकास हो सके.
In simple words: इंद्रधनुषीय क्रांति दूसरी हरित क्रांति को कहते हैं, जिसका मतलब है खेती के सभी हिस्सों को एक साथ बेहतर बनाना.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के विभिन्न चरणों और उनके विशिष्ट लक्ष्यों को समझें.

 

Question 10. द्वितीय हरित क्रांति के लिए नवम्बर 2006 में आयोजित सम्मेलन की मुख्य थीम क्या थी?
Answer: नवम्बर 2006 में द्वितीय हरित क्रांति के लिए आयोजित सम्मेलन की मुख्य थीम 'नॉलेज एग्रीकल्चर' (ज्ञान कृषि) थी. इसका उद्देश्य आधुनिक ज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग करके कृषि उत्पादन को बढ़ाना था.
In simple words: 2006 में हुई दूसरी हरित क्रांति की मीटिंग का मुख्य विषय 'नॉलेज एग्रीकल्चर' था, यानी खेती में ज्ञान और नई तकनीक का इस्तेमाल करना.

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण सम्मेलनों की तिथियां और उनके मुख्य विषयों को याद रखें.

Rbse Class 11 Economics Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. प्रदूषण रहित कृषि विकास पर एक नोट लिखिए।
Answer: प्रदूषण रहित कृषि विकास, जिसे द्वितीय हरित क्रांति या धारणीय विकास भी कहते हैं, का अर्थ है कृषि में ऐसे संसाधनों और तकनीकों का उपयोग करना जो पर्यावरण के अनुकूल हों और प्रदूषण न फैलाएं. डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और पी.एस. पित्रौदा ने इसके लिए कुछ प्रक्रियाओं पर जोर दिया है:
1. रासायनिक उर्वरकों की जगह जैव-उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.
2. रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैव-कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ाना चाहिए.
3. जल संरक्षण और फसलों के संतुलित व उपयुक्त प्रतिरूपों को अपनाना चाहिए. भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने जनसंख्या वृद्धि के बाद खाद्यान्न संकट से बचने के लिए द्वितीय हरित क्रांति को अपनाने पर जोर दिया था. इसमें खेत से लेकर बाजार तक सभी चीजों को शामिल करना बहुत जरूरी बताया गया था.
In simple words: प्रदूषण रहित खेती का मतलब है पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खेती करना. इसके लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह जैविक तरीके अपनाना और पानी बचाना जरूरी है.

🎯 Exam Tip: प्रदूषण रहित कृषि विकास के मुख्य सिद्धांतों और इसमें शामिल प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से लिखें. इसके साथ ही, संबंधित महत्वपूर्ण व्यक्तियों के योगदान को भी उल्लेख करें.

 

Question 2. 'नाबार्ड का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करें।
Answer: नाबार्ड (NABARD) की स्थापना जुलाई 1982 में CRAFICARD समिति की सिफारिश पर की गई थी, और इसके पहले अध्यक्ष बी. शिवरमन थे. नाबार्ड का पूरा नाम National Bank for Agriculture and Rural Development है, और इसे ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था माना जाता है. भारतीय रिजर्व बैंक ने 1963 में कृषि पुनर्वित्त निगम की स्थापना की थी, जिसका नाम 1975 में बदलकर 'कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम' (ARDC) कर दिया गया. नाबार्ड ने ARDC के सभी कार्य और भारतीय रिजर्व बैंक के कृषिगत साख विभाग के सभी कार्य अपने हाथ में ले लिए. नाबार्ड की शुरुआती चुकता पूंजी 100 करोड़ रुपये थी. यह ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
In simple words: नाबार्ड की स्थापना 1982 में हुई थी ताकि गांवों और खेती के लिए पैसे मिल सकें. यह भारत में खेती के लिए सबसे बड़ी संस्था है और रिजर्व बैंक के कृषि से जुड़े काम भी देखता है.

🎯 Exam Tip: नाबार्ड की स्थापना, पूर्ण रूप, भूमिका और संबंधित संस्थाओं के साथ इसके संबंधों का उल्लेख करें.

 

Question 3. भूमि सुधारों के अंतर्गत किये गए सुधारों को समझाइए।
Answer: भूमि सुधारों के अंतर्गत निम्नलिखित महत्वपूर्ण सुधार किए गए:
• **बिचौलियों की समाप्ति (Abolition of Intermediaries):** पहली पंचवर्षीय योजना में स्थायी बंदोबस्त वाले राज्यों में बिचौलियों को खत्म किया गया. जहाँ भूमि रिकॉर्ड नहीं थे, वहाँ इसे लागू करना मुश्किल था (जैसे बिहार, उड़ीसा, राजस्थान). जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी प्रणालियों को खत्म करने के लिए कई कानून बनाए गए.
• **काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms):** इसमें ऐसे सुधार शामिल थे जहाँ भूमि का मालिक खुद खेती नहीं करता था, बल्कि काश्तकारों को पट्टे पर भूमि देता था.
• **जोतों की चकबंदी (Consolidation of Holdings):** भूमि के उपखंडन और विखंडन की समस्या को हल करने के लिए जोतों की चकबंदी की गई. इसमें किसानों के बिखरे हुए खेतों को एक जगह लाया गया.
• **कृषि का पुनर्गठन (Reorganisation of Agriculture):** भूमि सुधारों के तहत सरकार द्वारा लागू किए गए कानूनों से आंशिक सफलता मिली, और ये सुधार सभी क्षेत्रों में समान रूप से लागू नहीं हो पाए.
In simple words: भूमि सुधारों का मतलब था बिचौलियों को हटाना, खेती करने वालों के हक मजबूत करना और खेतों को एक साथ लाना, ताकि खेती अच्छी हो सके.

🎯 Exam Tip: भूमि सुधारों के मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट रूप से बताएं और प्रत्येक बिंदु का संक्षिप्त विवरण दें. उदाहरणों का प्रयोग करें.

 

Question 4. कृषिगत उत्पादकता पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए कृषि का विकास बहुत जरूरी है. कृषि के विकास के लिए कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के प्रयास किए जाने चाहिए. भारत का मुख्य खाद्यान्न चावल है और गेहूँ दूसरे स्थान पर आता है. कृषि उत्पादकता का मतलब प्रति हैक्टेयर उत्पादन से है. सभी फसलों की उत्पादकता में अलग-अलग रुझान देखे गए. 1950-51 से 2013-14 के बीच सबसे अधिक उत्पादकता गेहूँ की रही, जिसमें 15 गुना वृद्धि हुई (64 लाख टन से बढ़कर 959 लाख टन). मोटे अनाजों का उत्पादन स्थिर रहा. इस दौरान गैर-खाद्यान्न फसलों में तिलहन की उत्पादकता में लगभग 5 गुना और कपास की उत्पादकता में 12 गुना तक वृद्धि हुई. कुल खाद्यान्नों के लिए प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 1950-51 में 552 किलोग्राम से बढ़कर 2013-14 में 2101 किलोग्राम हो गई, जो 70 के दशक में अपनाई गई नई कृषि रणनीति का नतीजा था.
In simple words: कृषि उत्पादकता मतलब एक हैक्टेयर जमीन से कितनी फसल पैदा होती है. भारत में चावल और गेहूं मुख्य फसलें हैं, और पिछले कुछ सालों में खेती की पैदावार काफी बढ़ी है.

🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादकता की परिभाषा, रुझान और प्रमुख फसलों के उदाहरणों का उल्लेख करें. संबंधित वर्षों के आंकड़ों को याद रखने का प्रयास करें.

 

Question 5. सिंचाई परियोजनाओं को किस आधार पर एवं कितने भागों में बाँटा गया है?
Answer: सिंचाई परियोजनाओं को कृषि कमाण्ड क्षेत्र के आधार पर 1978-79 के बाद से तीन वर्गों में बांटा गया है:
• **लघु सिंचाई परियोजना (Small Irrigation Project):** इसके अंतर्गत 2000 हैक्टेयर से कम कृषि कमाण्ड क्षेत्र वाली सिंचाई परियोजनाएं शामिल की जाती हैं. ये छोटी परियोजनाएं स्थानीय स्तर पर किसानों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं.
• **मध्यम सिंचाई परियोजना (Medium Irrigation Project):** इसके अंतर्गत 2000 हैक्टेयर से 10,000 हैक्टेयर के मध्य होने वाले कृषि कमाण्ड क्षेत्र वाली सिंचाई परियोजनाएं शामिल की जाती हैं. ये परियोजनाएं अक्सर एक से अधिक गांवों को कवर करती हैं.
• **बड़ी सिंचाई परियोजना (Large Irrigation Project):** वह सिंचाई परियोजनाएं जिनका कृषि कमाण्ड क्षेत्र 10,000 हैक्टेयर से अधिक होता है, बड़ी सिंचाई परियोजनाएं कहलाती हैं. ये परियोजनाएं बड़े क्षेत्रों को सिंचित करती हैं और इनके लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है.
In simple words: सिंचाई परियोजनाओं को जमीन के आकार के हिसाब से तीन हिस्सों में बांटा गया है - छोटी, मध्यम और बड़ी. छोटी परियोजनाएं 2000 हैक्टेयर से कम, मध्यम 2000 से 10,000 हैक्टेयर और बड़ी 10,000 हैक्टेयर से ज्यादा जमीन को पानी देती हैं.

🎯 Exam Tip: सिंचाई परियोजनाओं के वर्गीकरण के आधार और प्रत्येक वर्ग के लिए कृषि कमाण्ड क्षेत्र के आकार को स्पष्ट रूप से उल्लेख करें.

 

Question 6. कृषि की निम्न उत्पादकता के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: कृषि की निम्न उत्पादकता के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं:
1. **जनसंख्या वृद्धि का दबाव:** कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव है, क्योंकि गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के कम अवसर हैं. ग्रामीण श्रमिकों का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा कृषि में लगा है.
2. **रूढ़िवादिता और अज्ञानता:** भारत में ग्रामीण लोगों में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और अज्ञानता पाई जाती है, जो नई तकनीकों को अपनाने में बाधा डालती है.
3. **छोटे जोतों का आकार:** भारत में खेत छोटे आकार के होते हैं, जिससे कृषि लागत बढ़ जाती है और उत्पादकता कम रहती है.
4. **मध्यस्थों का अस्तित्व:** जमींदार, रसूखदार और महाजन जैसे मध्यस्थों का अस्तित्व अभी भी किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने से रोकता है.
5. **पिछड़ी तकनीकी का प्रयोग:** किसान अक्सर पुरानी और पिछड़ी तकनीकों का उपयोग करते हैं, जिससे उत्पादन क्षमता कम रहती है.
6. **मानसून पर निर्भरता:** भारतीय कृषि अभी भी मानसून पर बहुत अधिक निर्भर है, क्योंकि सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है.
7. **फसल-मूल्य का अभाव:** भारतीय किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता, जिससे वे उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रेरित नहीं होते.
In simple words: भारत में खेती से कम पैदावार के कई कारण हैं, जैसे ज्यादा लोग खेती पर निर्भर हैं, खेतों का छोटा आकार, पुरानी तकनीकें और सिंचाई की कमी.

🎯 Exam Tip: कृषि की कम उत्पादकता के कारणों को बिंदुवार समझाएं और प्रत्येक कारण का संक्षिप्त विवरण दें.

 

Question 7. कृषिगत साख व्यवस्था को अवधि के आधार पर किये गए विभाजन को समझाइए।
Answer: कृषिगत साख व्यवस्था को अवधि के आधार पर तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
**1. अल्पकालीन ऋण (Short Term Loan):**
यह ऋण किसानों को खाद, बीज, उर्वरक और अन्य घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए दिया जाता है. इसकी अवधि 15 माह से कम होती है. यह ऋण सहकारी समितियों, महाजनों और साहूकारों द्वारा प्रदान किया जाता है.
**2. मध्यमकालीन ऋण (Medium Term Loan):**
यह ऋण किसानों को भूमि सुधार करने, कृषि यंत्र खरीदने या बैल आदि खरीदने के लिए दिया जाता है. इसकी अवधि 15 माह से 5 वर्ष के बीच होती है.
**3. दीर्घकालीन ऋण (Long Term Loan):**
यह ऋण भूमि की खरीद, बड़े कृषि यंत्रों की खरीद, कुओं की खुदाई या ट्यूबवेल लगाने जैसे बड़े निवेश के लिए दिया जाता है. इसकी अवधि 5 वर्ष से अधिक होती है.
In simple words: किसानों को दिए जाने वाले कर्ज को समय के हिसाब से बांटा जाता है: कम समय का कर्ज खाद-बीज के लिए, बीच के समय का कर्ज ट्रैक्टर खरीदने के लिए और लंबे समय का कर्ज जमीन खरीदने या बड़े काम के लिए.

🎯 Exam Tip: कृषि ऋण के प्रकारों को उनकी अवधि और उपयोग के आधार पर स्पष्ट रूप से समझाएं.

Rbse Class 11 Economics Chapter 17 निबंधात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व पर लेख लिखिए।
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व (Importance of Agriculture of Indian Economy) बहुत अधिक है. स्वतंत्रता के बाद से भारत की लगभग 65% जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है:
• **राष्ट्रीय आय में कृषि का महत्व (Importance of Agriculture in National Income):** भारत के केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का हिस्सा 56.6% था, जो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना तक घटकर 15.2% रह गया. राष्ट्रीय आय में कृषि के हिस्से में कमी को एक विकासशील अर्थव्यवस्था का संकेत माना जा सकता है. हालांकि, यह अभी भी देश के आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान देती है.
• **रोजगार में कृषि का योगदान (Contribution of Agriculture in Employment):** भारतीय कार्यशील जनसंख्या का लगभग 65% हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है. कृषि से संबंधित गतिविधियों जैसे मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, पशु पालन आदि में रोजगार के अधिक अवसर होने के कारण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इस पर निर्भर है.
• **विदेशी व्यापार में कृषि का महत्व (Importance of Agriculture in Foreign Trade):** भारत कई कृषि वस्तुओं जैसे चाय, तंबाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे, और तेल निकालने के बीज आदि का निर्यात विदेशों में करता है. इससे विदेशी मुद्रा अर्जित होती है और विदेशी मुद्रा कोष भंडार में वृद्धि होती है.
• **आर्थिक नियोजन में कृषि का महत्व (Importance of Agriculture in Economic Planning):** कृषि परिवहन व्यवस्था के विकास का मुख्य आधार है, क्योंकि अधिकांश कृषि वस्तुओं की ढुलाई रेल-परिवहन और सड़क परिवहन द्वारा ही की जाती है. फसल अच्छी होने पर किसानों की क्रय शक्ति बढ़ती है, जिससे उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं की मांग भी बढ़ती है, जो उद्योगों के विकास में मदद करती है. सरकार के वित्त स्रोत भी अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं.
**उपसंहार (Conclusion):** इस प्रकार, कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, और भारतीय अर्थव्यवस्था की समृद्धि इस पर निर्भर करती है. कृषि क्षेत्र के विकास से ही देश की समग्र आर्थिक प्रगति संभव है.
In simple words: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खेती बहुत जरूरी है क्योंकि बहुत से लोग इस पर निर्भर हैं, इससे देश की कमाई बढ़ती है, चीजें विदेशों में बेची जाती हैं, और यह दूसरे उद्योगों को भी मदद करती है.

🎯 Exam Tip: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व को विभिन्न बिंदुओं जैसे राष्ट्रीय आय, रोजगार, विदेशी व्यापार और आर्थिक नियोजन के संदर्भ में समझाएं. हर बिंदु के लिए सटीक आंकड़े और उदाहरण दें.

 

Question 2. हरित क्रांति से क्या तात्पर्य है? इस क्रांति की समीक्षा कीजिए।
Answer: **हरित क्रांति (Green Revolution):**
1960 के दशक की शुरुआत में भारत में नई तकनीकी और अधिक उपज देने वाले बीजों का उपयोग किया गया, जिससे फसलों की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में तेजी से वृद्धि हुई. इसी को 'हरित क्रांति' कहा गया. भारत में हरित क्रांति की वास्तविक शुरुआत 1966 में खरीफ की फसल से मानी जाती है. भारत में डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक माना जाता है, जबकि विश्व में नॉरमन ई. बोरलॉग को इसका जनक कहा जाता है. यह उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीजों से संबंधित एक सामूहिक पैकेज था, जो पूरी अर्थव्यवस्था से जुड़ा था.
भारत में हरित क्रांति को दो चरणों में बांटा गया:
• **प्रथम चरण (First Stage):** इसे 'केंद्रीकरण का चरण' कहा गया. यह मुख्य रूप से गेहूँ और चावल की फसलों पर केंद्रित रहा और इसका क्षेत्रीय विस्तार पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित था.
• **द्वितीय चरण (Second Stage):** इसमें पांच फसलों (गेहूं, चावल, बाजरा, ज्वार और मक्का) को शामिल किया गया और इसे देश के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया गया. इसी कारण इसे 'विकेंद्रीकरण का चरण' कहा जाता है.
**हरित क्रांति की सफलता/प्रभाव (Success or Impact of Green Revolution):**
1. फसलों के कुल उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि हुई. गेहूँ में सबसे अधिक वृद्धि होने के कारण इसे 'गेहूँ-क्रांति' भी कहा जाता है.
**हरित क्रांति की असफलताएं उत्पन्न समस्याएं (Failures or Problems of Green Revolution):**
1. हरित क्रांति मुख्य रूप से गेहूँ की वृद्धि पर केंद्रित रही, मोटे अनाजों पर इसका प्रभाव कम रहा.
2. वाणिज्यिक फसलों (Commercial Crops) के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई.
3. दालों के उत्पादन में कम वृद्धि हुई.
4. हरित क्रांति का प्रभाव सभी क्षेत्रों पर समान रूप से नहीं पड़ा, जिससे कृषि विकास में असंतुलित विकास हुआ.
5. कृषि की नई रणनीति का लाभ शिक्षित और संपन्न किसानों को ही मिला, सीमांत और लघु किसान इसके लाभ से वंचित रहे.
6. हरित क्रांति के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर कई विपरीत प्रभाव पड़े, जैसे- मिट्टी की लवणता-क्षारीयता में वृद्धि, मृदा अपरदन और मृदा प्रदूषण.
7. सरकार द्वारा दी गई कृषिगत रियायतों का लाभ बड़े किसानों को ही मिला.
8. रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बढ़ा, जिससे धारणीय विकास की अवधारणा को नुकसान पहुंचा.
**निष्कर्ष (Conclusion):** हरित क्रांति से कई लाभ मिले, लेकिन इसका प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक ही रहा, जिससे एक और हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी.
In simple words: हरित क्रांति 1960 के दशक में नई खेती की तकनीकों और अच्छे बीजों का इस्तेमाल करके फसल उत्पादन बढ़ाने का आंदोलन था. इससे अनाज बहुत बढ़ा, लेकिन इसका फायदा सबको बराबर नहीं मिला और पर्यावरण पर भी कुछ बुरे असर पड़े.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की परिभाषा, इसके चरण, सफलताएं और समस्याओं का विस्तृत वर्णन करें. मुख्य व्यक्तियों और संबंधित वर्षों का उल्लेख करें.

 

Question 3. कृषिगत आगत क्या है? प्रमुख कृषि आगतों का विवेचन कीजिए।
Answer: **कृषिगत आगत (Agricultural Inputs):**
कृषिगत आगत उन सभी चीजों को कहते हैं जिनका उपयोग कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता है. यदि इनका सही ढंग से प्रबंधन और उचित मात्रा में उपयोग किया जाए, तो कृषि उत्पादकता और उत्पादन में तेजी से वृद्धि की जा सकती है.
**प्रमुख कृषिगत आगत (Main Agricultural Inputs):**
इसके अंतर्गत सिंचाई, उर्वरक, उन्नत किस्म के बीज और कीटनाशकों का प्रयोग शामिल है.
(i) **उर्वरक (Fertilizers):** भारत की भूमि में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस तत्वों की कमी होती है. उर्वरकों का प्रयोग, जैविक खाद के साथ करने पर फसल की वृद्धि तेज होती है. खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाने के लिए उर्वरकों का प्रयोग उचित है. भारत में नाइट्रोजन (N) तथा फॉस्फोरस (P) का उत्पादन होता है, जबकि पोटाश (K) के लिए हम पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं. 2013-14 में भारत में N : P : K का अनुपात 8.2 : 3.2 : 1 था, जो इनके प्रयोग में असंतुलन को दर्शाता है.
(iii) **उन्नत किस्म के बीज (High Yielding Varieties of Seeds):** हरित क्रांति के समय उन्नत किस्म के बीजों पर विशेष जोर दिया गया. 1966 में खरीफ की फसल से उन्नत किस्म के बीजों को अपनाया गया. इसे 'पैकेज कार्यक्रम' कहा गया, क्योंकि इसमें सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग भी जरूरी था. गेहूँ में सर्वाधिक सफलता मिली, जबकि चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का में कम सफलता मिली. कई महत्वपूर्ण फसलों जैसे दलहन, तिलहन, फल और सब्जी पर ध्यान नहीं दिया गया.
(iv) **कीटनाशक दवाएं (Pesticides and Insecticides):** भारत में 10-15 प्रतिशत फसल हर साल पौध संरक्षण की कमी के कारण नष्ट हो जाती है. फसलों को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग जरूरी है. 1970-71 में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग 24.3 हजार टन था जो 2011-12 में बढ़कर 50.58 हजार टन हो गया. दुष्प्रभावों को देखते हुए इन्हें नियंत्रित मात्रा में प्रयोग किया जाने लगा.
(v) **खेती में मशीनीकरण (Farm Mechanization):** नई तकनीकी और मशीनों के प्रयोग से उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि होती है, कुल लागत में कमी आती है, किसानों की आय बढ़ती है, और वे खाद्यान्न फसलों से व्यावसायिक फसलों की ओर बढ़ पाते हैं.
**निष्कर्ष (Conclusion):** कृषि आगतों के व्यवस्थित और उचित प्रयोग से कृषि उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है, जिससे देश का विकास होगा. फार्म मशीनरी, कृषिगत साख और बिजली की व्यवस्था से भी कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है.
In simple words: कृषिगत आगत वो चीजें हैं जो खेती में इस्तेमाल होती हैं, जैसे पानी, खाद, अच्छे बीज और कीटनाशक. इनका सही इस्तेमाल करने से फसल की पैदावार बहुत बढ़ जाती है.

🎯 Exam Tip: कृषि आगतों की परिभाषा दें और फिर प्रत्येक प्रमुख आगत (जैसे उर्वरक, बीज, कीटनाशक) का अलग-अलग वर्णन करें, उनके महत्व और उपयोग को बताएं.

 

Question 4. कृषि वित्त के स्रोतों का वर्णन कीजिए।
Answer: कृषि वित्त के स्रोत (Sources of Agricultural Finance): कृषि वित्त के स्रोतों को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है:
(I) **गैर-संस्थागत स्रोत (Non-Institutional Sources):**
इसके अंतर्गत महाजन, साहूकार, सगे-संबंधी, रिश्तेदार और जमींदार आते हैं. इन्हें 'देशी बैंकर' भी कहते हैं. ये किसानों को आसानी से ऋण देते हैं लेकिन अधिक ब्याज दर पर. यदि किसान ऋण नहीं चुका पाते तो उनसे 'हाली' (बंधुआ मजदूर) के रूप में काम करवाया जाता था, या उन्हें भूमि से बेदखल कर दिया जाता था.
(II) **संस्थागत स्रोत (Institutional Sources):**
संस्थागत साख में निम्नलिखित स्रोतों को शामिल किया जाता है:
• **सहकारी साख संस्थाएं (Cooperative Credit Institutes):** इनकी शुरुआत भारत में 2004 में हुई थी. 2013-14 में कुल संस्थागत साख में इनका हिस्सा 16.9% रहा था. ये मुख्य रूप से अल्पकालीन साख की जरूरतों को पूरा करती हैं और इन्हें तीन भागों में बांटा गया है:
    1. **प्राथमिक साख समितियां (Primary Credit Societies):** ये ग्राम स्तर पर काम करती हैं और उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देती हैं.
    2. **केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank):** ये जिला स्तर पर काम करते हैं और प्राथमिक साख समितियों को ऋण देते हैं (1-3 वर्ष की अवधि के लिए). ये राज्य सहकारी बैंक और प्राथमिक साख समितियों के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं.
    3. **राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Bank):** ये राज्य स्तर पर काम करते हैं और जिला सहकारी बैंकों को दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराते हैं. इन्हें रिजर्व बैंक से वित्त मिलता है.
• **भूमि विकास बैंक (Land Development Bank):** भारत में इसकी स्थापना 1929 में हुई थी. इसे भूमि बंधक बैंक भी कहते हैं. अब ये कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के रूप में किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं.
• **क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks - RRBs):** 2 अक्टूबर, 1975 को 5 बैंकों की स्थापना के साथ इनकी शुरुआत हुई. बाद में इनकी संख्या 196 हो गई, लेकिन 2005 में विलयन के बाद 56 रह गई. कुल संस्थागत साख में इनका योगदान रहा था.
• **व्यापारिक बैंक (Commercial Banks):** ये किसानों को सभी प्रकार के ऋण उपलब्ध कराते हैं, लेकिन इनका योगदान पहले कम था. 1969 और 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद इनका योगदान बढ़ा.
• **सरकार (Government):** सरकार भी किसानों को आपदाओं या विकास के लिए प्रत्यक्ष ऋण देती है.
In simple words: किसानों को पैसा दो तरीकों से मिलता है: एक तो महाजन या रिश्तेदारों जैसे गैर-सरकारी स्रोतों से, और दूसरा बैंकों, सहकारी समितियों और सरकारी संस्थाओं जैसे संस्थागत स्रोतों से.

🎯 Exam Tip: कृषि वित्त के संस्थागत और गैर-संस्थागत स्रोतों का विस्तृत वर्णन करें और प्रत्येक स्रोत के अंतर्गत आने वाली विभिन्न संस्थाओं को समझाएं.

 

Question 5. नाबार्ड की ग्रामीण साख व्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Answer: CRAFICARD समिति की सिफारिश पर जुलाई 1982 में नाबार्ड (NABARD) की स्थापना की गई. यह ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था है. 1963 में भारतीय रिजर्व बैंक ने कृषि पुनर्वित्त निगम की स्थापना की, जिसका नाम 1975 में बदलकर 'कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम' (ARDC) रख दिया गया. नाबार्ड ने ARDC और रिजर्व बैंक के सभी कृषि साख विभागों के कार्यों को अपने हाथ में ले लिया. नाबार्ड की प्राथमिक चुकता पूंजी 100 करोड़ रुपये थी.
नाबार्ड की ग्रामीण साख व्यवस्था में भूमिका (Role of NABARD in Rural Credit System) को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:
1. यह ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सहायता प्रदान करती है.
2. नाबार्ड सहकारी समितियों, सहकारी बैंकों, भूमि विकास बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंकों को अल्पकालीन, मध्यमकालीन और दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराता है.
3. नाबार्ड कृषि तथा ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित सभी गतिविधियों के समन्वय, एकीकरण और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है.
4. यह अपने कृषि साख विभाग के माध्यम से सहकारी क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर रखता है.
5. नाबार्ड सहकारी बैंकों को मौसमी कृषि कार्यों, उर्वरकों की खरीद, कृषि उत्पादन की बिक्री और सहकारी चीनी फैक्ट्रियों की कार्यशील पूंजी के लिए ऋण उपलब्ध कराता है.
6. नाबार्ड राज्य सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय बैंकों को प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त इलाकों में ऋण की अवधि बढ़ाने और भूमि समतलीकरण, कृषि औजारों की खरीद के लिए मध्यमकालीन ऋण प्रदान करता है.
7. नाबार्ड कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार हेतु राज्य सहकारी बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और व्यापारिक बैंकों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करता है.
8. यह राज्य सरकारों को भी सहकारी साख संस्थाओं के योगदान के लिए दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराता है.
9. यह अनुसंधान एवं विकास कोष रखता है, जिससे कृषि और ग्रामीण विकास को प्रोत्साहित किया जा सके और विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार परियोजनाओं का निर्माण किया जा सके.
In simple words: नाबार्ड गांवों में किसानों और सहकारी बैंकों को छोटे-बड़े कर्ज देता है. यह खेती से जुड़े सभी कामों को संभालता है, उन पर नजर रखता है और गांवों के विकास के लिए नए-नए प्रोजेक्ट भी चलाता है.

🎯 Exam Tip: नाबार्ड की स्थापना, उसके मुख्य कार्य और ग्रामीण साख व्यवस्था में उसकी भूमिका को विस्तार से समझाएं. प्रत्येक बिंदु को स्पष्ट और संक्षिप्त रखें.

 

Question 1. प्रत्यक्ष रूप में कौन-से उद्योग कृषि पर निर्भर है?
Answer: प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर उद्योग वे हैं जो अपने कच्चे माल के लिए सीधे कृषि उत्पादों का उपयोग करते हैं. इनमें चाय उद्योग, जूट उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति तेल उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग शामिल हैं. इन सभी उद्योगों का उत्पादन कृषि की उपलब्धता पर निर्भर करता है.
In simple words: चाय, जूट, कपड़े, चीनी और खाने की चीजें बनाने वाले उद्योग सीधे खेती पर निर्भर हैं क्योंकि उन्हें अपना कच्चा माल वहीं से मिलता है.

🎯 Exam Tip: कृषि पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर उद्योगों के नाम और उनके मुख्य उत्पादों को याद रखें.

 

Question 2. भारत द्वारा मुख्य रूप से विदेशों को। निर्यात की जाने वाली वस्तुएँ बताइए।
Answer: भारत मुख्य रूप से विदेशों को कई कृषि उत्पाद निर्यात करता है. इनमें चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे और तेल निकालने के बीज आदि शामिल हैं. इन निर्यातों से भारत को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिलती है.
In simple words: भारत विदेशों में चाय, तंबाकू, मसाले, सूखे मेवे और तेल के बीज जैसी कृषि चीजें बेचता है.

🎯 Exam Tip: भारत के प्रमुख कृषि निर्यातों के कुछ उदाहरणों को याद रखना चाहिए.

 

Question 3. भू-सुधार के अंतर्गत कौन-से कदम उठाये गए?
Answer: भू-सुधार के अंतर्गत निम्नलिखित कदम उठाए गए:
1. बिचौलियों की समाप्ति: इसमें जमींदारी, जागीरदारी और बिचौलियों को खत्म किया गया ताकि किसानों को सीधा लाभ मिल सके.
2. काश्तकारी सुधार: काश्तकारों को उनकी जमीन पर अधिक अधिकार दिए गए और लगान को नियंत्रित किया गया.
3. जोतों का सीमा निर्धारण: सरकार ने भूमि की अधिकतम सीमा तय की ताकि अतिरिक्त जमीन भूमिहीन किसानों को बांटी जा सके.
4. कृषि का पुनर्गठन: इसमें खेतों की चकबंदी (बिखरे हुए खेतों को एक साथ लाना) शामिल है, ताकि खेती अधिक कुशल हो सके.
In simple words: जमीन के सुधार के लिए बिचौलियों को हटाया गया, खेती करने वालों को हक दिए गए, जमीन की हद तय की गई और बिखरे खेतों को इकट्ठा किया गया.

🎯 Exam Tip: भू-सुधार के मुख्य कदमों को बिंदुवार याद रखें और उनका संक्षिप्त विवरण दें.

 

Question 4. NFSM का पूरा नाम बताइए।
Answer: NFSM का पूरा नाम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission) है. इस मिशन का उद्देश्य देश में खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है.
In simple words: NFSM का पूरा नाम नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन है, जिसका मतलब है राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन.

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं के संक्षिप्त नाम और पूर्ण रूप को याद रखें.

 

Question 5. नहरों द्वारा सिंचाई प्रमुख रूप से किन राज्यों में की जाती है?
Answer: नहरों द्वारा सिंचाई प्रमुख रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिणी भारत के राज्यों में की जाती है. इन राज्यों में बड़ी नहर प्रणालियां हैं जो कृषि को पानी उपलब्ध कराती हैं.
In simple words: नहरों से सिंचाई मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिण भारत के राज्यों में होती है.

🎯 Exam Tip: विभिन्न सिंचाई के साधनों और उनसे जुड़े प्रमुख राज्यों को याद रखें.

 

Question 7. भारत की 1966 में खरीफ की उन्नत किस्म का नाम बताइए।
Answer: 1966 में खरीफ की उन्नत किस्म का नाम टाइचुंग नेटिव था. यह एक उच्च उपज वाली धान की किस्म थी जिसे हरित क्रांति के दौरान अपनाया गया था.
In simple words: 1966 में खरीफ की अच्छी किस्म का नाम टाइचुंग नेटिव था, यह धान की एक खास किस्म थी.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति से संबंधित प्रमुख फसलों और उनकी उन्नत किस्मों के नाम याद रखें.

 

Question 8. गेहूँ की 1966 में उन्नत फसलों के नाम लिखिए।
Answer: 1966 में गेहूँ की उन्नत फसलों के नाम लरमा, रोजो 64-ए तथा सोनारा-64 थे. ये उच्च उपज वाली किस्में थीं जिन्होंने हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
In simple words: 1966 में गेहूँ की अच्छी फसलें लरमा, रोजो 64-ए और सोनारा-64 थीं.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के दौरान विकसित गेहूँ की प्रमुख उन्नत किस्मों के नाम याद रखें.

 

Question 9. विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति के जनक कौन हैं?
Answer: विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति के जनक नॉरमन ई. बोरलॉग हैं. उन्हें उच्च उपज वाले बीजों के विकास और उनके उपयोग के माध्यम से दुनिया भर में खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
In simple words: दुनिया में हरित क्रांति की शुरुआत नॉरमन ई. बोरलॉग ने की थी, जिन्होंने अच्छे बीज बनाकर खेती को बहुत आगे बढ़ाया.

🎯 Exam Tip: विश्व और भारत के संदर्भ में हरित क्रांति के जनकों के नाम स्पष्ट रूप से याद रखें.

 

Question 10. सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम किस देश ने अपनायी?
Answer: सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम बांग्लादेश ने अपनायी. ग्रामीण बैंक (Grameen Bank) ने इसकी शुरुआत की, जो गरीब लोगों को बिना किसी गारंटी के छोटे ऋण प्रदान करता है.
In simple words: सूक्ष्म वित्त की शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी, जहां गरीब लोगों को छोटे-छोटे कर्ज दिए जाते थे.

🎯 Exam Tip: सूक्ष्म वित्त जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं की शुरुआत करने वाले देश को याद रखें.

 

Question 11. सर्वप्रथम उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग कहाँ किया गया?
Answer: सर्वप्रथम उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग मैक्सिको तथा ताइवान में किया गया. मैक्सिको में गेहूँ के उन्नत बीज विकसित हुए, जबकि ताइवान में धान के उन्नत बीज विकसित किए गए.
In simple words: सबसे पहले अच्छे बीजों का इस्तेमाल मैक्सिको और ताइवान में हुआ था, जहां गेहूँ और धान के नए बीज बनाए गए.

🎯 Exam Tip: उन्नत किस्म के बीजों के प्रारंभिक उपयोग के स्थानों को याद रखें, क्योंकि यह कृषि विकास की शुरुआत को दर्शाता है.

 

Question 12. प्राचीन काल में किन कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए भारत प्रसिद्ध था?
Answer: प्राचीन काल में भारत ढाका की मलमल, भारतीय मसाले, जूट और वस्त्र जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए पूरे विश्व में अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध था. ये उत्पाद अपनी गुणवत्ता और कारीगरी के लिए जाने जाते थे.
In simple words: पुराने समय में भारत अपनी मलमल, मसाले, जूट और कपड़ों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर था, जिन्हें वह दूसरे देशों में बेचता था.

🎯 Exam Tip: प्राचीन भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों को याद रखें, खासकर वे जो कृषि से संबंधित थे.

 

Question 13. ब्रिटिश काल में कृषि विकास क्यों नहीं हुआ?
Answer: ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत में कृषि विकास नहीं हुआ क्योंकि अंग्रेजों की नीतियां किसानों के शोषण और कच्चे माल की आपूर्ति पर केंद्रित थीं. उन्होंने किसानों को नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन कम हुआ, और सिंचाई या अन्य कृषि सुधारों में निवेश नहीं किया गया. जमींदारी व्यवस्था और उच्च लगान ने किसानों को गरीब बनाए रखा.
In simple words: अंग्रेजों के समय खेती आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि उनकी नीतियां किसानों के शोषण पर टिकी थीं और उन्होंने खेती के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया.

🎯 Exam Tip: ब्रिटिश काल में कृषि के पिछड़ेपन के मुख्य कारणों को समझाएं, जैसे औपनिवेशिक नीतियां और जमींदारी व्यवस्था.

 

Question 14. राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान को आँकड़ों द्वारा बताइए।
Answer: केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार, वर्ष 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का हिस्सा 56.6% था. यह धीरे-धीरे कम होकर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 15.2% रह गया. यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था विकसित हुई, अन्य क्षेत्रों का योगदान बढ़ा, लेकिन कृषि अभी भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है.
In simple words: 1950-51 में देश की कुल कमाई में खेती का हिस्सा 56.6% था, जो बाद में कम होकर 15.2% रह गया, जिससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था बदल रही है.

🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान से संबंधित आंकड़ों को विशिष्ट वर्षों के साथ याद रखें, यह आर्थिक विकास को दर्शाता है.

 

Question 15. विदेशी व्यापार में कृषि का क्या महत्त्व है?
Answer: विदेशी व्यापार में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है. भारत से कई कृषिगत वस्तुएं विदेशों को निर्यात की जाती हैं, जैसे चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे आदि. इन निर्यातों से भारत को विदेशी मुद्रा अर्जित होती है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा कोष में वृद्धि होती है. यह विदेशी व्यापार संतुलन बनाए रखने में भी मदद करता है.
In simple words: खेती विदेशी व्यापार के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि भारत चाय, मसाले जैसी चीजें विदेशों में बेचकर पैसा कमाता है.

🎯 Exam Tip: कृषि के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित करने और व्यापार संतुलन में इसके योगदान पर जोर दें.

 

Question 16. कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण रहे थे?
Answer: ब्रिटिश शासकों द्वारा अपनाई गई लगान वसूली की जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी प्रथाएं किसानों की गरीबी और दयनीयता का मुख्य कारण थीं. इन प्रथाओं ने किसानों से उनकी उपज का बड़ा हिस्सा छीन लिया, जिससे वे खेती में निवेश नहीं कर पाए और कृषि पिछड़ती गई. इससे कृषि विकास रुक गया.
In simple words: खेती इसलिए पीछे रह गई क्योंकि अंग्रेजों के समय जमींदारी और रैयतवारी जैसी लगान की व्यवस्थाओं ने किसानों को गरीब कर दिया था.

🎯 Exam Tip: कृषि के पिछड़ेपन के ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारणों पर ध्यान केंद्रित करें, विशेष रूप से ब्रिटिश नीतियों पर.

 

Question 17. काश्तकारी व्यवस्था (Tenancy System) से क्या तात्पर्य है
Answer: काश्तकारी व्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें भूमि का मालिक स्वयं खेती न करके अपनी भूमि को काश्तकारों (जोतदारों) को पट्टे पर दे देता है. काश्तकार भूमि मालिक को लगान या फसल का एक हिस्सा देते हैं. यह व्यवस्था अक्सर काश्तकारों के शोषण का कारण बनती थी.
In simple words: काश्तकारी व्यवस्था में जमीन का मालिक खुद खेती नहीं करता, बल्कि अपनी जमीन किसी और किसान को किराए पर दे देता है जो खेती करता है.

🎯 Exam Tip: काश्तकारी व्यवस्था की परिभाषा और इसमें शामिल प्रमुख तत्वों को स्पष्ट रूप से समझाएं.

 

Question 18. काश्त अधिकारों की सुरक्षा के क्या उद्देश्य थे?
Answer: काश्त अधिकारों की सुरक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:
1. **काश्तकारों की बेदखली को रोकना:** ताकि भू-स्वामी मनमाने ढंग से काश्तकारों को जमीन से हटा न सकें.
2. **भू-स्वामी को भूमि खुद-काश्त के लिए ही लौटाने की अनुमति देना:** यह सुनिश्चित करना कि भू-स्वामी केवल अपनी वास्तविक जरूरत के लिए ही जमीन वापस ले.
3. **भूमि को भू-स्वामी का लौटाने के बाद भी कुछ भूमि को काश्तकार के पास छोड़ना:** इससे काश्तकारों को अपनी आजीविका बनाए रखने में मदद मिलती थी.
In simple words: खेती करने वालों के हक इसलिए बचाए गए ताकि उन्हें जमीन से हटाया न जाए, मालिक सिर्फ उतनी ही जमीन वापस ले जितनी उसे खुद चाहिए, और थोड़ी जमीन किसान के पास फिर भी रहे.

🎯 Exam Tip: काश्त अधिकारों की सुरक्षा के उद्देश्यों को बिंदुवार स्पष्ट करें.

 

Question 20. निम्न कृषि उत्पादकता का जनसंख्या वृद्धि से क्या सम्बन्ध है? बताइए।
Answer: निम्न कृषि उत्पादकता का जनसंख्या वृद्धि से सीधा संबंध है. कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव आज भी कृषि उत्पादकता को कम रखता है. ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों का लगभग एक बड़ा हिस्सा कृषि से संबंधित कार्यों में संलग्न है. जब अधिक लोग सीमित भूमि पर निर्भर होते हैं, तो प्रति व्यक्ति उत्पादकता कम हो जाती है, जिससे कुल उत्पादकता भी प्रभावित होती है.
In simple words: जब खेती पर ज्यादा लोग निर्भर होते हैं, तो कम जमीन पर ज्यादा लोगों को काम करना पड़ता है, जिससे हर आदमी की पैदावार कम हो जाती है.

🎯 Exam Tip: जनसंख्या वृद्धि और कृषि उत्पादकता के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएं, विशेष रूप से प्रति व्यक्ति उत्पादकता पर पड़ने वाले प्रभाव को.

 

Question 21. भारत में जोतों का आकार कैसा है तथा उसकी कृषि की उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: भारत में जोतों (खेतों) का आकार छोटा है, जिससे कृषि की लागत अधिक आती है और उत्पादकता का स्तर अभी भी कम रहता है. लगभग 80% जोतें सीमांत जोत के रूप में विद्यमान हैं (यानी 1 हैक्टेयर से कम). छोटे आकार के कारण मशीनों का उपयोग मुश्किल होता है और उन्नत तकनीकों को अपनाना महंगा पड़ता है, जिससे प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होता है.
In simple words: भारत में ज्यादातर खेत छोटे हैं, जिससे खेती करने में ज्यादा खर्च आता है और फसल की पैदावार भी कम होती है.

🎯 Exam Tip: जोतों के आकार और कृषि उत्पादकता के बीच के संबंध को समझाएं, और छोटे जोतों की चुनौतियों का उल्लेख करें.

 

Question 22. भारत में कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए सिंचाई सुविधाएँ किस प्रकार से जिम्मेदार हैं?
Answer: आजादी के इतने वर्षों बाद भी अभी 53% भूमि वर्षा पर आश्रित है, जो यह दर्शाता है कि भारत में अभी भी सिंचाई सुविधाओं का अभाव है. अपर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के कारण किसान केवल मानसून पर निर्भर रहते हैं, जिससे फसलें अक्सर सूखे या बाढ़ के कारण खराब हो जाती हैं, और उत्पादकता कम रहती है. नियमित और पर्याप्त सिंचाई के बिना उन्नत बीज और उर्वरकों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता.
In simple words: भारत में खेती की पैदावार कम है क्योंकि बहुत सी जमीन को सिंचाई का पानी नहीं मिलता और वह बारिश पर निर्भर रहती है.

🎯 Exam Tip: सिंचाई सुविधाओं के अभाव और कृषि उत्पादकता पर इसके नकारात्मक प्रभाव को स्पष्ट रूप से बताएं.

 

Question 23. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने हेतु क्या किया गया?
Answer: कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने हेतु ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission-NFSM) को लागू किया गया. इस मिशन का उद्देश्य चावल, गेहूँ और दालों के उत्पादन को बढ़ाना था, ताकि देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और किसानों की आय में वृद्धि हो.
In simple words: ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन' शुरू किया गया था.

🎯 Exam Tip: किसी विशिष्ट पंचवर्षीय योजना के तहत कृषि विकास के लिए शुरू की गई प्रमुख पहल को याद रखें.

 

Question 24. सरकार को कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने हेतु क्या करना चाहिए?
Answer: सरकार को कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने हेतु निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
1. **भूमि सुधारों का क्रियान्वयन:** भूमि सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए, ताकि भूमि का उचित वितरण हो और किसानों को मालिकाना हक मिल सके.
2. **कृषिगत आगतों का समुचित मात्रा में प्रयोग:** उन्नत बीज, उर्वरक और कीटनाशकों का संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए.
3. **साख तथा विपणन सुविधाओं की उपलब्धता:** किसानों को आसान और समय पर ऋण उपलब्ध कराना चाहिए, साथ ही उनकी उपज के लिए बेहतर बाजार और उचित मूल्य सुनिश्चित करना चाहिए.
4. **फसलों हेतु उचित-कीमत नीति लागू करना:** किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले, ताकि वे खेती में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित हों.
In simple words: सरकार को खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए जमीन के सुधार, सही खाद-बीज का इस्तेमाल, कर्ज और बाजार की अच्छी व्यवस्था करनी चाहिए.

🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले प्रमुख कदमों को बिंदुवार बताएं.

 

Question 25. कृषिगत आगतों (Agricultural Inputs) से क्या तात्पर्य है?
Answer: कृषिगत आगतों (Agricultural Inputs) से तात्पर्य उन सभी संसाधनों से है जिनका उपयोग कृषि उत्पादन प्रक्रिया में किया जाता है. इनमें उर्वरक, उन्नत किस्म के बीज, कीटनाशक, सिंचाई, कृषि मशीनरी और श्रम आदि शामिल हैं. ये आगत कृषि उत्पादकता और उत्पादन को सीधे प्रभावित करते हैं.
In simple words: कृषिगत आगत वो चीजें हैं जो खेती में काम आती हैं, जैसे खाद, अच्छे बीज और कीटनाशक, जिनसे फसल उगती है.

🎯 Exam Tip: कृषिगत आगतों की परिभाषा और उनके कुछ मुख्य उदाहरणों को याद रखें.

 

Question 27. मध्यम सिंचाई परियोजना से क्या आशय
Answer: मध्यम सिंचाई परियोजना उन परियोजनाओं को कहते हैं जिनका कृषि कमाण्ड क्षेत्र 2000 हैक्टेयर से 10,000 हैक्टेयर के बीच होता है. ये परियोजनाएं अक्सर कई गांवों के कृषि क्षेत्रों को सिंचित करती हैं और बड़ी परियोजनाओं की तुलना में कम जटिल होती हैं.
In simple words: मध्यम सिंचाई परियोजना वो होती है जो 2000 से 10,000 हैक्टेयर जमीन को पानी देती है.

🎯 Exam Tip: मध्यम सिंचाई परियोजना की परिभाषा को उसके कमाण्ड क्षेत्र के आकार के साथ याद रखें.

 

Question 28. बड़ी सिंचाई परियोजना से आप क्या समझते हैं?
Answer: बड़ी सिंचाई परियोजनाएं वे सिंचाई परियोजनाएं होती हैं जिनका कृषि कमाण्ड क्षेत्र 10,000 हैक्टेयर से अधिक होता है. ये परियोजनाएं अक्सर बड़े बांधों और नहर प्रणालियों के माध्यम से बहुत बड़े क्षेत्रों को सिंचित करती हैं और इनके लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है.
In simple words: बड़ी सिंचाई परियोजना वो होती है जो 10,000 हैक्टेयर से ज्यादा जमीन को पानी देती है, जैसे बड़े बांधों से निकलने वाली नहरें.

🎯 Exam Tip: बड़ी सिंचाई परियोजना की परिभाषा को उसके कमाण्ड क्षेत्र के आकार और विशेषताओं के साथ याद रखें.

 

Question 29. तालाबों द्वारा सिंचाई किन राज्यों में की जाती है?
Answer: तालाबों के द्वारा सिंचाई मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक आदि में की जाती है. ये राज्य पारंपरिक रूप से तालाबों का उपयोग सिंचाई के लिए करते रहे हैं.
In simple words: दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में तालाबों से खेती की सिंचाई ज्यादा होती है.

🎯 Exam Tip: सिंचाई के विभिन्न साधनों और उनसे जुड़े प्रमुख राज्यों को याद रखें.

 

Question 30. शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान किसका है?
Answer: शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान कुओं और नलकूपों का है. वर्ष 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र में इनका योगदान 61.4 प्रतिशत था, जो बढ़कर 783.50 लाख हैक्टेयर हो गया. कुएं और नलकूप छोटे किसानों के लिए महत्वपूर्ण सिंचाई के स्रोत हैं.
In simple words: भारत में सबसे ज्यादा जमीन को कुओं और नलकूपों से पानी मिलता है.

🎯 Exam Tip: शुद्ध सिंचित क्षेत्र में विभिन्न सिंचाई स्रोतों के योगदान को याद रखें, विशेष रूप से सबसे बड़े योगदानकर्ता को.

 

Question 31. उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग आँकड़ों द्वारा बताइए।
Answer: उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग 1966-67 में 18.90 लाख हैक्टेयर भूमि में किया था, जोकि 1998-99 तक बढ़कर 783.50 लाख हैक्टेयर हो गया. यह हरित क्रांति के कारण उन्नत बीजों के उपयोग में हुई भारी वृद्धि को दर्शाता है, जिससे कृषि उत्पादन में भी महत्वपूर्ण वृद्धि हुई.
In simple words: 1966-67 में 18.90 लाख हैक्टेयर जमीन पर अच्छे बीज इस्तेमाल हुए थे, जो 1998-99 तक बहुत बढ़कर 783.50 लाख हैक्टेयर हो गए.

🎯 Exam Tip: उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग में हुई वृद्धि को आंकड़ों के साथ स्पष्ट करें.

 

Question 32. कीटनाशकों के प्रयोग में कितनी वृद्धि हुई?
Answer: कीटनाशकों के प्रयोग में भारी वृद्धि हुई. 1970-71 में इसका प्रयोग 24.3 हजार टन था, जो 2011-12 तक बढ़कर 50.58 हजार टन हो गया. यह दर्शाता है कि फसलों को कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए कीटनाशकों का उपयोग बहुत बढ़ गया है.
In simple words: कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है, 1970-71 में यह 24.3 हजार टन था जो 2011-12 तक 50.58 हजार टन हो गया.

🎯 Exam Tip: कीटनाशकों के प्रयोग में वृद्धि से संबंधित आंकड़ों को याद रखें, जो कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रभाव को दर्शाता है.

 

Question 33. परम्परागत कृषि से क्या तात्पर्य है?
Answer: भारत में पहले परम्परागत कृषि हल, बैल, घोड़े, जोहड़, तालाब आदि के माध्यम से की जाती थी, जिससे उत्पादन व उत्पादकता दोनों का स्तर कम रहता था. इस पद्धति में किसान स्थानीय संसाधनों पर निर्भर रहते थे और मौसम की अनिश्चितता का अधिक प्रभाव पड़ता था.
In simple words: पारंपरिक खेती का मतलब है पुराने तरीकों से खेती करना, जैसे हल और बैल का इस्तेमाल, जिससे पैदावार कम होती थी.

🎯 Exam Tip: परम्परागत कृषि की परिभाषा और उसकी मुख्य विशेषताओं को याद रखें.

 

Question 34. मशीनीकरण (Mechanisation) से क्या तात्पर्य है?
Answer: मशीनीकरण से तात्पर्य कृषि के परम्परागत तरीकों की जगह आधुनिक तरीकों को अपनाकर कृषि करना है. इसमें ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, ट्यूबवेल और अन्य कृषि मशीनों का उपयोग शामिल है, जिससे श्रम और समय की बचत होती है और उत्पादकता बढ़ती है.
In simple words: मशीनीकरण का मतलब है खेती में मशीनें इस्तेमाल करना, पुराने तरीकों की जगह नई मशीनों से काम करना.

🎯 Exam Tip: मशीनीकरण की परिभाषा और कृषि पर इसके प्रभावों को समझाएं.

 

Question 35. हरित क्रान्ति की शुरुआत कब हुई?
Answer: हरित क्रांति की शुरुआत 1966 में खरीफ की फसल से मानी जाती है. उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी तथा कृषि मंत्री श्री सी. सुब्रह्मण्यम ने कृषि की इस रणनीति को अपनाने की बात सबके समक्ष रखी थी, जिससे देश में खाद्य उत्पादन को बढ़ाया जा सके.
In simple words: हरित क्रांति 1966 में खरीफ की फसल के समय शुरू हुई थी, जब इंदिरा गांधी और कृषि मंत्री ने इसे देश में लागू करने की बात कही.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की शुरुआत का वर्ष और संबंधित प्रमुख व्यक्तियों को याद रखें.

 

Question 36. गेहूँ की उन्नत किस्म के बीजों की खोज किसने की तथा इसका क्या प्रभाव पड़ा?
Answer: मैक्सिको में अनुसंधान में संलग्न कृषि वैज्ञानिक नॉरमन ई. बोरलॉग (Norman E. Borlaug) ने गेहूँ के उत्तम किस्म के बीजों की खोज की थी. इन बीजों के प्रयोग से गेहूँ की उत्पादकता को 200 से 250 गुना तक बढ़ाया जा सकता था, जिसने हरित क्रांति को संभव बनाया.
In simple words: नॉरमन ई. बोरलॉग ने गेहूँ के अच्छे बीज खोजे थे, जिससे गेहूँ की पैदावार 200 से 250 गुना बढ़ सकती थी.

🎯 Exam Tip: नॉरमन ई. बोरलॉग और गेहूँ की उन्नत किस्मों के बीच के संबंध को स्पष्ट करें.

 

Question 37. डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने गेहूँ की कौन-सी किस्में विकसित की?
Answer: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने मैक्सिकन गेहूँ के बीजों की कमियां दूर करके गेहूँ की नई किस्में 'शर्बती सोना' व 'पूसा लरमा' को विकसित किया. इन किस्मों ने भारत में गेहूँ के उत्पादन में भारी वृद्धि की और हरित क्रांति को सफल बनाने में मदद की.
In simple words: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने मैक्सिकन गेहूँ के बीजों में सुधार करके 'शर्बती सोना' और 'पूसा लरमा' जैसी नई किस्में बनाईं.

🎯 Exam Tip: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा विकसित गेहूँ की प्रमुख किस्मों के नाम याद रखें.

 

Question 38. 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार किसे मिला?
Answer: नॉरमन ई. बोरलॉग को 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. उन्हें विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने उच्च उपज वाले बीजों का विकास करके लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया.
In simple words: 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार नॉरमन ई. बोरलॉग को मिला था, क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया में खेती को बेहतर बनाया.

🎯 Exam Tip: नॉरमन ई. बोरलॉग को मिले नोबेल पुरस्कार और उनके योगदान को याद रखें.

 

Question 40. हरित क्रांति का प्रथम चरण केन्द्रीयकरण का चरण क्यों कहा जाता है?
Answer: हरित क्रांति के प्रथम चरण (जो 60 से 90 के दशक के मध्य तक रहा) को मुख्यत: गेहूँ तथा चावल की फसलों तक केंद्रित होने के कारण 'केन्द्रीयकरण का चरण' कहा जाता है. इस चरण में केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही उच्च उपज वाली किस्मों और आधुनिक तकनीकों का प्रयोग हुआ.
In simple words: हरित क्रांति के पहले चरण को 'केंद्रीकरण का चरण' कहते हैं क्योंकि यह केवल गेहूँ और चावल जैसी कुछ फसलों और कुछ ही राज्यों तक सीमित था.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के प्रथम चरण की प्रमुख विशेषता और उसके 'केन्द्रीयकरण' कहलाने का कारण स्पष्ट करें.

 

Question 41. हरित क्रांति को गेहूँ-क्रांति क्यों कहा जाता है?
Answer: हरित क्रांति को गेहूँ-क्रांति इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस अवधि में गेहूँ की फसल पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा. इसकी उत्पादकता 851 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 3075 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गई, जिससे गेहूँ के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इस वृद्धि ने देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
In simple words: हरित क्रांति को 'गेहूँ-क्रांति' भी कहा जाता है क्योंकि इस दौरान गेहूँ की पैदावार सबसे ज्यादा बढ़ी, जिससे वह 851 किलोग्राम से 3075 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गई.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति में गेहूँ के उत्पादन में हुई वृद्धि और इसके 'गेहूँ-क्रांति' कहलाने के कारण को आंकड़ों के साथ समझाएं.

 

Question 42. हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों में कितनी वृद्धि हुई?
Answer: हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों के प्रयोग में तीव्र वृद्धि हुई. 1952-53 में उर्वरकों का प्रयोग 66000 टन था, जो 2013-14 में बढ़कर 239.6 लाख टन हो गया. यह वृद्धि उच्च उपज वाले बीजों के साथ उर्वरकों के महत्व को दर्शाती है, जिससे फसल उत्पादन में भारी इजाफा हुआ.
In simple words: हरित क्रांति के समय खाद का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया. 1952-53 में 66000 टन से बढ़कर 2013-14 में 239.6 लाख टन हो गया.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों के प्रयोग में हुई वृद्धि को आंकड़ों के साथ याद रखें.

 

Question 43. हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में क्या परिवर्तन हुआ?
Answer: हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए. इस दौरान 1950-51 में सिंचाई संभाव्यता (Irrigation Potential) 2.26 करोड़ हैक्टेयर थी, जो 2011-12 में बढ़कर 11.32 हैक्टेयर हो गई. इससे अधिक क्षेत्रों को सिंचित किया जा सका, जिससे फसल की पैदावार बढ़ी और मानसून पर निर्भरता कम हुई. नहरों, नलकूपों और कुओं का विस्तार किया गया.
In simple words: हरित क्रांति के समय सिंचाई की सुविधाएं बहुत बढ़ीं. 1950-51 में 2.26 करोड़ हैक्टेयर जमीन को पानी मिलता था, जो 2011-12 तक बढ़कर 11.32 हैक्टेयर हो गया.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में हुई वृद्धि को आंकड़ों के साथ स्पष्ट करें.

 

Question 44. कृषिगत वित्त के विभाजन को बताइए।
Answer: कृषिगत वित्त को मुख्यतः अवधि के आधार पर विभाजित किया जाता है:
1. **अल्पकालीन ऋण:** यह 15 माह से कम अवधि के लिए दिया जाता है और खाद, बीज, और दैनिक घरेलू खर्चों जैसी तत्काल जरूरतों के लिए होता है.
2. **मध्यमकालीन ऋण:** यह 15 माह से 5 वर्ष की अवधि के लिए दिया जाता है और कृषि यंत्र, पशुधन खरीदने या छोटे भूमि सुधारों के लिए होता है.
3. **दीर्घकालीन ऋण:** यह 5 वर्ष से अधिक अवधि के लिए होता है और भूमि खरीदने, बड़े कृषि विकास परियोजनाओं या गहरे कुएं खोदने जैसे बड़े निवेशों के लिए होता है. इसके अतिरिक्त, ऋणों को उत्पादकता के आधार पर उत्पादक ऋण (Productive Loan) और अनुत्पादक ऋण (Unproductive Loan) में भी बांटा जा सकता है.
In simple words: खेती के लिए मिलने वाला पैसा तीन तरह का होता है: कम समय का कर्ज (फसल के लिए), बीच के समय का कर्ज (छोटे मशीन के लिए), और लंबे समय का कर्ज (जमीन या बड़े काम के लिए).

🎯 Exam Tip: कृषिगत वित्त के विभाजन को अवधि के आधार पर स्पष्ट करें, और प्रत्येक प्रकार के ऋण का उपयोग बताएं.

 

Question 1. रोजगार में कृषि के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी लगभग 65 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कृषिगत कार्यों में संलग्न है. कृषि से संबंधित क्रियाएं जैसे-मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, पशु पालन आदि में रोजगार की संभावनाएं अधिक होने के कारण जनसंख्या इन पर अधिक निर्भर है. कृषि क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास अन्य कौशल या अवसर नहीं हैं. हालांकि, गैर-कृषि क्षेत्रों की तुलना में इनकी औसत आय बहुत कम है.
In simple words: भारत में बहुत से लोग खेती से जुड़े काम करते हैं, जैसे मछली पालन या पशुपालन, इसलिए खेती रोजगार का एक बड़ा स्रोत है.

🎯 Exam Tip: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के रोजगार योगदान को आंकड़ों और संबंधित गतिविधियों के साथ बताएं.

 

Question 2. औद्योगिक विकास में कृषि का महत्त्व बताइए।
Answer: औद्योगिक विकास में कृषि की भूमिका बहुत अहम है. कृषि द्वारा ही उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराया जाता है, जैसे-चाय उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति उद्योग तथा बागान उद्योग आदि प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही आश्रित हैं. इनके अलावा चावल कूटना, साबुन बनाना, खाद्य पदार्थों से संबंधित कार्य करना आदि उद्योग कृषि पर अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं. वर्तमान समय में खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) का उद्योग तेजी से विकास कर रहा है, जो पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर है. इससे आय व रोजगार दोनों बढ़ रहे हैं. कृषि क्षेत्र की समृद्धि उद्योगों को बढ़ावा देती है क्योंकि किसान अपनी बढ़ी हुई आय से औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ाते हैं.
In simple words: खेती उद्योगों के लिए कच्चा माल देती है, जैसे चाय, कपास और गन्ना. यह खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योगों को भी बढ़ावा देती है, जिससे नौकरियां बढ़ती हैं.

🎯 Exam Tip: औद्योगिक विकास में कृषि के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान को उदाहरणों के साथ समझाएं.

 

Question 3. आर्थिक नियोजन में कृषि के महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: कृषि का हर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है, जैसे-परिवहन व्यवस्था का मुख्य आधार भी कृषि है क्योंकि रेल-परिवहन व सड़क-परिवहन द्वारा अधिकतर कृषि वस्तुओं की ढुलाई होती है. इसके अलावा यदि फसल अच्छी होती है तो इससे किसानों की क्रय शक्ति में वृद्धि होती है तथा वे उद्योग निर्मित वस्तुओं की मांग करते हैं, जिससे उद्योग जगत् में प्रगति होती है. अत: कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसकी सम्पन्नता पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था की समृद्धि निर्भर है. आर्थिक नियोजन में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह खाद्यान्न सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करती है.
In simple words: खेती देश के आर्थिक प्लान के लिए बहुत जरूरी है. यह परिवहन और उद्योगों को मदद करती है, और जब फसल अच्छी होती है तो किसान ज्यादा सामान खरीदते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था मजबूत होती है.

🎯 Exam Tip: आर्थिक नियोजन में कृषि के महत्व को परिवहन, उपभोक्ता मांग और समग्र आर्थिक स्थिरता के संदर्भ में बताएं.

 

Question 4. काश्तकारी सुधारों से क्या तात्पर्य है?
Answer: काश्तकारी सुधारों से तात्पर्य उन कानूनी और प्रशासनिक उपायों से है, जिनका उद्देश्य काश्तकारों (जो भूमि पर खेती करते हैं लेकिन उसके मालिक नहीं हैं) के अधिकारों की रक्षा करना और उनके शोषण को कम करना है. इन सुधारों में काश्तकारों की बेदखली पर रोक लगाना, भू-स्वामी द्वारा लिए जाने वाले लगान की दरें तय करना और काश्तकारों को उनकी जमीन पर मालिकाना हक देना शामिल था. इन सुधारों का लक्ष्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना था.
In simple words: काश्तकारी सुधारों का मतलब था खेती करने वाले किसानों को जमीन के मालिकों से बचाना, ताकि उन्हें जमीन से हटाया न जाए और उन्हें अपनी मेहनत का सही फल मिले.

🎯 Exam Tip: काश्तकारी सुधारों की परिभाषा और उनके मुख्य उद्देश्यों को स्पष्ट करें.

 

Question 5. जोतों की सीमा-निर्धारण बताइए।
Answer: सरकार ने जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण कर दिया, जिसके द्वारा खेतिहर किसानों को खेत दिए जा सकें. भारत में अधिकांश सीमांत जोत पाई जाती हैं, जिनकी उपज की तुलना में लागत अधिक आती है. देश में उपविभाजन (Sub-division) व उपखंडन (Fragmentation) की समस्या के निदान के लिए जोतों की चकबंदी की गई, अर्थात् किसानों को गांव में उनके बिखरे हुए विभिन्न खेतों के स्थान पर एक ही जगह खेत उपलब्ध करा दिए गए. 2010-11 में जोतों का निर्धारण और उनका प्रतिशत इस प्रकार रहा:

जोतनिर्धारणकुछ जोतों का प्रतिशत (2010-11)
सीमांत जोत1 हैक्टेयर से कम67.0
लघु/छोटी जोत1 हैक्टेयर से 2 हैक्टेयर17.9
अर्द्धमध्यम जोत2 हैक्टेयर से 4 हैक्टेयर10.1
मध्यम जोत4 हैक्टेयर से 10 हैक्टेयर4.3
बड़ी जोत10 हैक्टेयर से अधिक0.8

In simple words: सरकार ने तय किया कि एक किसान के पास कितनी जमीन हो सकती है. छोटे खेत ज्यादा हैं, और बिखरी हुई जमीनों को इकट्ठा करने के लिए चकबंदी की गई.

🎯 Exam Tip: जोतों की सीमा-निर्धारण के उद्देश्य और भारत में जोतों के प्रकारों का प्रतिशत आंकड़ों के साथ समझाएं.

 

Question 6. देश में जोतों का उपविभाजन व उपखण्डन क्यों हुआ?
Answer: देश में जोतों का उपविभाजन व उपखंडन (खेतों के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटना) विभिन्न कानूनी, सामाजिक, आर्थिक व जनांकिकीय कारणों से हुआ. इनमें निजी संपत्ति का अधिकार, उत्तराधिकार का नियम, जनसंख्या की बढ़ती दर, संयुक्त परिवारों का टूटना, बंटाई प्रथा और महाजनों व साहूकारों का किसानों पर बढ़ता दबाव शामिल हैं. इन कारणों से भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गई, जिससे खेती करना मुश्किल और महंगा हो गया. यह अक्सर किसानों की उत्पादकता को कम करता है.
In simple words: खेत इसलिए छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे क्योंकि लोगों के ज्यादा बच्चे हुए, परिवार अलग हुए, और जमीन को बांटने के कानून भी थे.

🎯 Exam Tip: जोतों के उपविभाजन और उपखंडन के कारणों को विस्तार से समझाएं, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और कानूनी कारकों का उल्लेख हो.

 

Question 7. कृषि के पुनर्गठन के विषय में समझाइए।
Answer: कृषि के पुनर्गठन का तात्पर्य कृषि भूमि और प्रणालियों में सुधारों से है ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके और किसानों की स्थिति बेहतर हो सके. इसके अंतर्गत सरकार ने उपखंडन व उपविभाजन की समस्या के समाधान के लिए चकबंदी (Consolidation of Holdings) की. इसका मतलब था कि किसानों के बिखरे हुए खेतों को एक जगह लाया गया, जिससे खेती करना आसान हो गया. हालांकि, भू-सुधारों के बाद सरकार द्वारा लागू कानूनों से आंशिक सफलता ही मिल पाई. जमींदारों ने कानूनों की कमियों का लाभ उठाया और स्वयं को किसान घोषित कर दिया या न्यायालय में जाकर भू-सुधारों से संबंधित कानूनों को चुनौती देकर भूमि के पट्टे अपने रिश्तेदारों के नाम से जारी करवा लिए. देश के सभी क्षेत्रों में इन भू-सुधारों को समान रूप से लागू नहीं किया जा पाया.
In simple words: खेती को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने बिखरे खेतों को इकट्ठा किया. लेकिन ये बदलाव पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए क्योंकि कुछ जमींदारों ने नियमों का फायदा उठाया.

🎯 Exam Tip: कृषि पुनर्गठन की अवधारणा को समझाएं और इसके तहत किए गए प्रयासों और उनकी सफलता के स्तर का उल्लेख करें.

 

Question 9. कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता की प्रवृत्तियों को आँकड़ों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
Answer: कृषि उत्पादकता से आशय प्रति हैक्टेयर उत्पादकता से है. कृषि उत्पादकता की प्रवृत्तियों को हम निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं:

फसलवर्ष 1950-51वर्ष 2013-14
उत्पादन (लाख टन)उत्पादकता (किग्रा/हैक्टेयर)उत्पादन (लाख टन)उत्पादकता (किग्रा/हैक्टेयर)
चावल20666810652424
गेहूँ646659593075
ज्वार5535354925
बाजरा26288921164
दालें84441193764
खाद्यान्न58855226482101
तिलहन624813291153
कपास3088367532
जूट3310431102561

उत्पादन 'लाख टन' में है तथा कपास व जूट के लिए 'लाख गांठ' में है (कपास के लिए एक गांठ = 170 किलोग्राम, जूट के लिए एक गांठ = 180 किग्रा).
[Source : 6th FYP, Govt. of India, Economic Survey 2014-15, Vol.II, Govt. of India, Economic Survey 1980-81]
उपर्युक्त तालिका के अनुसार, उत्पादन की दृष्टि से इस अवधि में सर्वाधिक वृद्धि गेहूँ के उत्पादन में हुई है, जो 64 लाख टन से बढ़कर 959 लाख टन हो गया. जबकि कुल खाद्यान्न उत्पादन 588 लाख टन से बढ़कर 2648 लाख टन हो गया. गैर-खाद्यान्न फसलों में सर्वाधिक वृद्धि (लगभग 12 गुना) कपास की फसल की हुई.
उत्पादकता की दृष्टि से देखें तो कुल खाद्यान्नों की उत्पादकता 1950-51 में 552 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 2013-14 में 2101 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गई. वृद्धि गेहूँ की उत्पादकता में तथा द्वितीय स्थान पर चावल की उत्पादकता में वृद्धि हुई. गैर-खाद्यान्न फसलों में भी उत्पादकता बढ़ी है, जो कृषि क्षेत्र में हुए समग्र विकास को दर्शाती है.
In simple words: यह टेबल दिखाती है कि 1950-51 से 2013-14 तक खेती से होने वाला कुल उत्पादन और प्रति हैक्टेयर पैदावार कितनी बढ़ी है. गेहूं और चावल की पैदावार में सबसे ज्यादा उछाल आया है.

🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादन और उत्पादकता की प्रवृत्तियों को आंकड़ों वाली तालिका के साथ प्रस्तुत करें. विभिन्न फसलों में हुई वृद्धि और कमी को स्पष्ट करें.

 

Question 10. कृषिगत निम्न उत्पादता के चार कारण बताइए।
Answer: कृषिगत निम्न उत्पादकता के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. **जनसंख्या वृद्धि का कृषि क्षेत्र पर बढ़ता दबाव:** आज भी ग्रामीण क्षेत्र में कार्यशील जनसंख्या का लगभग तीन-चौथाई भाग कृषि क्षेत्र में संलग्न है. सीमित भूमि पर अधिक निर्भरता प्रति व्यक्ति उत्पादकता को कम करती है.
2. **भारत के गाँव निवासियों की रूढ़िवादिता, अज्ञानता, अंधविश्वास के कारण:** नई तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने में झिझक के कारण कृषि उत्पादकता कम रहती है.
3. **भारत में जोतों का आकार छोटा होना:** छोटे आकार के खेत मशीनीकरण और आधुनिक कृषि विधियों को अपनाने में बाधा डालते हैं, जिससे कृषि लागत अधिक आती है और उत्पादकता कम रहती है.
4. **सरकार द्वारा भू-स्वामित्व प्रणाली हेतु बनाए गए कानूनों का उचित लाभ किसानों को न मिल पाना:** भू-सुधार कानूनों का ठीक से क्रियान्वयन न होने के कारण गरीब और सीमांत किसानों को उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है.
In simple words: खेती में कम पैदावार के मुख्य कारण हैं: ज्यादा लोग खेती पर निर्भर हैं, किसान पुरानी सोच वाले हैं, खेत बहुत छोटे हैं, और सरकारी कानूनों का फायदा किसानों तक नहीं पहुंच पाता.

🎯 Exam Tip: कृषिगत निम्न उत्पादकता के किन्हीं चार प्रमुख कारणों को बिंदुवार बताएं और प्रत्येक कारण का संक्षिप्त विवरण दें.

 

Question 11. सिंचाई के साधन बताइए।
Answer: सिंचाई के साधन (Means of Irrigation): प्रमुख रूप से वर्तमान में इन्हें तीन भागों में बांटा गया है:
• **नहरों से सिंचाई:** वर्ष 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र के 24.6% भाग पर नहरों से सिंचाई की गई. मुख्यत: नहरों द्वारा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत के राज्य, बिहार आदि राज्यों में सिंचाई की जाती है. नहरें बड़े क्षेत्रों को सिंचित करने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं.
• **तालाबों से सिंचाई:** तालाबों से दक्षिण भारत के अनेक राज्यों; जैसे-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक आदि में सिंचाई की जाती है. वर्ष 2010-11 में तालाबों द्वारा शुद्ध सिंचित क्षेत्र में 3.1% का योगदान दिया गया था. यह पारंपरिक रूप से जल संरक्षण का एक तरीका है.
• **कुओं से सिंचाई:** कुओं में दो प्रकार के कुएं शामिल होते हैं-सतही कुएं व नलकूप. इनके द्वारा उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में तथा हरियाणा में मुख्यत: सिंचाई की जाती है. वर्ष 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र में इसका योगदान 61.4% का था, जोकि सर्वाधिक है. कुएं और नलकूप छोटे किसानों के लिए पानी का एक विश्वसनीय स्रोत प्रदान करते हैं.
In simple words: खेती में पानी देने के मुख्य तरीके तीन हैं: नहरें (जो पंजाब, हरियाणा में ज्यादा हैं), तालाब (जो दक्षिण भारत में ज्यादा हैं), और कुएं-नलकूप (जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं).

🎯 Exam Tip: सिंचाई के विभिन्न साधनों का वर्णन करें और प्रत्येक साधन के उपयोग वाले प्रमुख राज्यों को बताएं.

 

Question 12. हरित क्रांति के प्रथम चरण के विषय में बताइए।
Answer: हरित क्रांति का प्रथम चरण (First Stage of Green Revolution) 60 से 90 के दशक के बीच की अवधि का यह चरण 'केन्द्रीयकरण का चरण' भी कहलाता है. यह मुख्यत: गेहूँ व चावल की फसलों पर ही केन्द्रित रहा तथा इसका क्षेत्रीय विस्तार भी पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा था. इस चरण के आरंभिक वर्षों में गेहूँ के उत्पादन में बहुत तेजी से वृद्धि हुई, इसी वजह से इसे गेहूं की फसल पर केंद्रित चरण भी कहते हैं. इस चरण में उच्च उपज वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई के प्रयोग पर जोर दिया गया.
In simple words: हरित क्रांति का पहला चरण कुछ ही फसलों (गेहूँ और चावल) और कुछ ही राज्यों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) तक सीमित था, इसलिए इसे 'केंद्रीकरण का चरण' कहते हैं.

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के प्रथम चरण की प्रमुख विशेषताओं, फसलों और भौगोलिक विस्तार को स्पष्ट करें.

 

Question 2. वर्तमान में कौन-सा उद्योग पूर्णतया कृषि पर निर्भर है?
(अ) चावल कूटना
(ब) खाद्य प्रसंस्करण
(स) साबुन बनाना
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ब) खाद्य प्रसंस्करण
In simple words: खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पूरी तरह से खेती पर निर्भर है क्योंकि यह फसलों से खाने-पीने की चीजें बनाता है.

🎯 Exam Tip: कृषि पर निर्भर उद्योगों के उदाहरणों को समझें, विशेषकर जो अपने कच्चे माल के लिए सीधे कृषि पर आश्रित हों.

 

Question 3. प्रथम पंचवर्षीय योजना में लगान की सीमा कुल उत्पादन में कितना भाग रखी गई?
(अ) \( \frac{1}{5} \) या \( \frac{1}{4} \)
(ब) \( \frac{1}{6} \) या \( \frac{1}{7} \)
(स) \( \frac{1}{3} \) या \( \frac{1}{4} \)
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (अ) \( \frac{1}{5} \) या \( \frac{1}{4} \)
In simple words: पहली पंचवर्षीय योजना में यह तय किया गया कि किसान अपनी कुल फसल का \( \frac{1}{5} \) या \( \frac{1}{4} \) हिस्सा लगान के तौर पर देंगे.

🎯 Exam Tip: भू-सुधारों के तहत निर्धारित लगान की दरों को याद रखें, विशेष रूप से पंचवर्षीय योजनाओं के संदर्भ में.

 

Question 4. 2010-11 में सीमांत जोत कुल जोतों की कितनी प्रतिशत थी?
(अ) 28%
(ब) 40%
(स) 62%
(द) 67%
Answer: (द) 67%
In simple words: 2010-11 में, कुल खेतों में से 67% खेत सीमांत जोत (छोटे खेत) थे.

🎯 Exam Tip: जोतों के प्रकार और उनके प्रतिशत से संबंधित आंकड़ों को याद रखें, विशेष रूप से सीमांत जोतों के बारे में.

 

Question 5. 2013-14 में गेहूँ का उत्पादकता कितने किलोग्राम प्रति हैक्टेयर थी?
Answer: 2013-14 में गेहूँ की उत्पादकता 3075 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर थी. यह हरित क्रांति के बाद गेहूँ की उत्पादकता में हुई महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाता है.
In simple words: 2013-14 में, हर हैक्टेयर जमीन से 3075 किलोग्राम गेहूँ पैदा हुआ था.

🎯 Exam Tip: किसी विशिष्ट वर्ष के लिए प्रमुख फसल की उत्पादकता के आंकड़ों को याद रखें.

 

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. प्रत्यक्ष रूप में कौन-से उद्योग कृषि पर निर्भर है?
Answer: प्रत्यक्ष रूप से चाय उद्योग, जूट उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और बागान उद्योग कृषि पर निर्भर करते हैं। ये उद्योग सीधे कृषि उत्पादों का उपयोग कच्चे माल के रूप में करते हैं, जिससे किसानों को भी लाभ होता है।
In simple words: चाय, जूट, सूती कपड़े, चीनी, वनस्पति तेल और खाद्य बनाने वाले उद्योग सीधे खेती पर आधारित हैं।

🎯 Exam Tip: जब उद्योगों और कृषि के संबंध के बारे में पूछा जाए, तो सीधे उन उद्योगों के नाम लिखें जो कृषि उत्पादों का सीधे उपयोग करते हैं.

 

Question 2. भारत द्वारा मुख्य रूप से विदेशों को निर्यात की जाने वाली वस्तुएँ बताइए।
Answer: भारत विदेशों को मुख्य रूप से चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे और तेल निकालने वाले बीज जैसी कृषि-उत्पादित वस्तुएँ निर्यात करता है। यह निर्यात देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, जिससे अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
In simple words: भारत विदेशों को चाय, तम्बाकू, मसाले, सूखे मेवे और तेल के बीज बेचता है।

🎯 Exam Tip: निर्यात की जाने वाली कृषि वस्तुओं के कम से कम 3-4 प्रमुख उदाहरण याद रखें.

 

Question 3. भू-सुधार के अंतर्गत कौन-से कदम उठाये गए?
Answer: भू-सुधार के अंतर्गत ये प्रमुख कदम उठाए गए:
1. बिचौलियों की समाप्ति: जमींदारी जैसी प्रथाओं को खत्म किया गया ताकि किसान सीधे अपनी जमीन के मालिक बन सकें।
2. काश्तकारी सुधार: किसानों को जमीन पर बेहतर अधिकार दिए गए और किराए को नियंत्रित किया गया।
3. जोतों का सीमा निर्धारण: जमीन की अधिकतम सीमा तय की गई ताकि अधिक जमीन गरीब किसानों को मिल सके।
4. कृषि का पुनर्गठन: बिखरे हुए खेतों को एक साथ मिलाकर बड़े जोत बनाए गए (चकबंदी)।
In simple words: जमीन सुधार में बिचौलियों को हटाया गया, किसानों को जमीन पर ज्यादा अधिकार मिले, जमीन की सीमा तय हुई और बिखरे खेतों को एक साथ जोड़ा गया।

🎯 Exam Tip: भू-सुधार के प्रमुख कदमों को क्रमवार याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये किसानों के कल्याण के लिए उठाए गए मूलभूत कदम थे.

 

Question 4. NFSM का पूरा नाम बताइए।
Answer: NFSM का पूरा नाम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission) है। यह एक सरकारी योजना है जिसका उद्देश्य देश में खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को बढ़ाना है।
In simple words: NFSM का पूरा नाम नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन है, जिसका लक्ष्य देश में सभी के लिए भोजन उपलब्ध कराना है।

🎯 Exam Tip: इस तरह के संक्षिप्त नामों के लिए पूरा नाम और उसका मुख्य उद्देश्य याद रखें.

 

Question 5. नहरों द्वारा सिंचाई प्रमुख रूप से किन राज्यों में की जाती है?
Answer: नहरों द्वारा सिंचाई मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिणी भारत के कुछ राज्यों में की जाती है। इन राज्यों में नहरों का जाल बहुत फैला हुआ है, जिससे खेती के लिए पानी आसानी से मिलता है।
In simple words: नहरों से सिंचाई पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिणी भारत में ज्यादा होती है।

🎯 Exam Tip: उन राज्यों के नाम याद रखें जहाँ विशिष्ट सिंचाई के तरीके अधिक उपयोग किए जाते हैं, क्योंकि यह क्षेत्रीय कृषि पैटर्न को दर्शाता है.

 

Question 7. भारत की 1966 में खरीफ की उन्नत किस्म का नाम बताइए।
Answer: 1966 में खरीफ की उन्नत किस्म का नाम टाइचुंग नेटिव था। यह चावल की एक किस्म थी जिसे हरित क्रांति के दौरान अधिक उपज के लिए विकसित किया गया था।
In simple words: 1966 में खरीफ की एक अच्छी फसल का नाम टाइचुंग नेटिव था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख फसलों की उन्नत किस्मों के नाम और उनके वर्ष याद रखना ऐतिहासिक कृषि विकास के लिए महत्वपूर्ण है.

 

Question 8. गेहूँ की 1966 में उन्नत फसलों के नाम लिखिए।
Answer: 1966 में गेहूँ की उन्नत फसलें लरमा, रोजो 64-ए और सोनारा-64 थीं। ये किस्में हरित क्रांति के तहत विकसित की गई थीं ताकि गेहूँ का उत्पादन तेजी से बढ़ाया जा सके।
In simple words: 1966 में गेहूँ की अच्छी फसलें लरमा, रोजो 64-ए और सोनारा-64 थीं।

🎯 Exam Tip: उन्नत किस्मों के नाम याद रखें, खासकर गेहूँ के लिए, क्योंकि यह हरित क्रांति की सफलता का एक प्रमुख कारण था.

 

Question 9. विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति के जनक कौन हैं?
Answer: विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति के जनक नॉरमन ई. बोरलॉग हैं। उन्होंने अधिक उपज देने वाली फसल किस्मों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे कई देशों में खाद्य उत्पादन में वृद्धि हुई।
In simple words: दुनिया में हरित क्रांति के जनक नॉरमन ई. बोरलॉग हैं।

🎯 Exam Tip: 'जनक' या 'पिता' जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम हमेशा सही याद रखें, क्योंकि यह सीधा तथ्यात्मक प्रश्न होता है.

 

Question 10. सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम किस देश ने अपनायी?
Answer: सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम बांग्लादेश ने अपनायी। यह छोटे ऋणों और वित्तीय सेवाओं को गरीब लोगों तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण तरीका बन गया है।
In simple words: सूक्ष्म वित्त की शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण आर्थिक अवधारणाओं और उनकी उत्पत्ति के देशों को याद रखना सहायक होता है.

 

Question 11. सर्वप्रथम उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग कहाँ किया गया?
Answer: सर्वप्रथम उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग मैक्सिको तथा ताईवान में किया गया था। इन देशों में प्रयोग सफल होने के बाद ही इन्हें अन्य देशों में भी अपनाया गया।
In simple words: उन्नत बीज सबसे पहले मैक्सिको और ताईवान में इस्तेमाल किए गए थे।

🎯 Exam Tip: कृषि नवाचारों के शुरुआती प्रयोग स्थलों को याद रखें, क्योंकि यह तकनीक के प्रसार को दर्शाता है.

 

Question 12. प्राचीन काल में किन कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए भारत प्रसिद्ध था?
Answer: प्राचीन काल में भारत ढाका की मलमल, भारतीय मसाले, जूट और वस्त्र जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध था। इन उत्पादों की गुणवत्ता और विशिष्टता के कारण इनकी बहुत मांग थी।
In simple words: पुराने समय में भारत मलमल, मसाले, जूट और कपड़े जैसी चीजें विदेशों में बेचकर मशहूर था।

🎯 Exam Tip: भारत के ऐतिहासिक व्यापारिक उत्पादों को याद रखें, विशेषकर कृषि से संबंधित, क्योंकि यह देश की आर्थिक विरासत का हिस्सा है.

 

Question 13. कृषि के पिछड़ेपन का विकास क्यों नहीं हुआ?
Answer: ब्रिटिश शासकों द्वारा अपनाई गई लगान वसूली की पुरानी प्रथाएँ जैसे जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी किसानों को बहुत गरीब बनाती थीं। इन प्रथाओं के कारण किसानों को अपनी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल पाता था, जिससे कृषि क्षेत्र पिछड़ गया।
In simple words: ब्रिटिश राज में पुरानी टैक्स वसूलने की प्रथाओं जैसे जमींदारी के कारण किसान गरीब हो गए, और खेती आगे नहीं बढ़ पाई।

🎯 Exam Tip: कृषि के पिछड़ेपन के ऐतिहासिक कारणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर ब्रिटिश काल की नीतियों का प्रभाव.

 

Question 14. राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान को आँकड़ों द्वारा बताइए।
Answer: केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का हिस्सा 56.6% था। यह योगदान धीरे-धीरे कम होकर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 15.2% रह गया। यह कमी बताती है कि अर्थव्यवस्था में अन्य क्षेत्रों, जैसे उद्योग और सेवा क्षेत्र, का विकास तेजी से हुआ है।
In simple words: 1950-51 में भारत की कुल कमाई का 56.6% खेती से आता था, जो बाद में कम होकर 15.2% रह गया।

🎯 Exam Tip: आँकड़ों को याद रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके पीछे के कारण-जैसे अर्थव्यवस्था का विविधीकरण-को समझना भी उतना ही जरूरी है.

 

Question 15. विदेशी व्यापार में कृषि का क्या महत्त्व है?
Answer: भारत से कई कृषि उत्पाद विदेशों को निर्यात किए जाते हैं, जैसे- चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे आदि। इन निर्यातों से देश को विदेशी मुद्रा मिलती है, जिससे विदेशी मुद्रा कोष में वृद्धि होती है। यह विदेशी व्यापार में कृषि के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि यह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद करता है।
In simple words: भारत चाय, मसाले जैसी चीजें विदेशों को बेचता है, जिससे देश को विदेशी पैसा मिलता है और हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।

🎯 Exam Tip: कृषि के निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जन के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएँ.

 

Question 16. कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण रहे थे?
Answer: ब्रिटिश शासकों द्वारा अपनाई गई पुरानी लगान वसूली की व्यवस्थाएँ जैसे जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी प्रथाएँ भारत में कृषि के पिछड़ेपन का मुख्य कारण थीं। इन प्रथाओं ने किसानों को गरीब और कमजोर बना दिया, जिससे वे कृषि में निवेश या सुधार नहीं कर पाए।
In simple words: ब्रिटिश राज में जमींदारी और ऐसी अन्य प्रथाओं के कारण किसान गरीब हो गए, जिससे खेती पिछड़ गई।

🎯 Exam Tip: कृषि के पिछड़ेपन के कारणों को याद करते समय, औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव पर विशेष ध्यान दें.

 

Question 17. काश्तकारी व्यवस्था (Tenancy System) से क्या तात्पर्य है?
Answer: काश्तकारी व्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें भूमि का मालिक स्वयं खेती न करके अपनी भूमि को किराए पर (पट्टे पर) काश्तकारों को दे देता है। इन काश्तकारों को जमीन पर खेती करने का अधिकार मिलता है, लेकिन वे मालिक नहीं होते। यह व्यवस्था अक्सर किसानों के शोषण का कारण बनती थी।
In simple words: काश्तकारी व्यवस्था में जमीन का मालिक खुद खेती नहीं करता, बल्कि अपनी जमीन दूसरे किसानों को किराए पर देता है।

🎯 Exam Tip: काश्तकारी व्यवस्था की परिभाषा में मालिक और काश्तकार के बीच के रिश्ते और जमीन के स्वामित्व की स्थिति को स्पष्ट करें.

 

Question 18. काश्त अधिकारों की सुरक्षा के क्या उद्देश्य थे?
Answer: काश्त अधिकारों की सुरक्षा के मुख्य उद्देश्य ये थे:
1. काश्तकारों की बेदखली को रोकना: यह सुनिश्चित करना कि जमींदार उन्हें मनमाने ढंग से जमीन से न हटा सकें।
2. भू-स्वामी को भूमि खुद-काश्त के लिए ही लौटाने: यदि मालिक खुद खेती करना चाहता है, तो उसे अपनी जमीन वापस मिल सके।
3. भूमि को भू-स्वामी का लौटाने के बाद भी कुछ भूमि को काश्तकार के पास छोड़ना: ताकि काश्तकार के पास भी अपनी आजीविका के लिए कुछ जमीन बची रहे।
In simple words: काश्तकारों को जमीन से निकालने से रोकना, मालिक को अपनी जमीन वापस देना और फिर भी कुछ जमीन काश्तकार के लिए छोड़ना, ये सब उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने के मकसद थे।

🎯 Exam Tip: काश्तकारों की सुरक्षा के उद्देश्यों को याद करते समय, उनके सामाजिक और आर्थिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करें.

 

Question 20. निम्न कृषि उत्पादकता का जनसंख्या वृद्धि से क्या सम्बन्ध है? बताइए।
Answer: कृषि क्षेत्र पर लगातार बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण आज भी कृषि उत्पादकता कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग तीन-चौथाई) आज भी कृषि से संबंधित कार्यों में लगा हुआ है। इससे छोटे खेतों पर अधिक लोग निर्भर होते हैं, जिससे प्रति व्यक्ति उत्पादकता कम हो जाती है।
In simple words: जनसंख्या बढ़ने से कृषि पर दबाव बढ़ा है, जिससे खेतों में काम करने वाले लोगों की कमाई कम हो गई है।

🎯 Exam Tip: जनसंख्या दबाव और प्रति व्यक्ति उत्पादकता के बीच सीधा संबंध समझाएँ, जिससे स्पष्ट हो कि अधिक लोग कम जमीन पर निर्भर होने से उत्पादकता घटती है.

 

Question 21. भारत में जोतों का आकार कैसा है तथा उसकी कृषि की उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: भारत में जोतों का आकार छोटा होता है, जिससे कृषि की लागत अधिक आती है और उत्पादकता का स्तर भी कम रहता है। आज भी लगभग 80% जोतें सीमांत जोत (बहुत छोटे खेत) के रूप में विद्यमान हैं। छोटे खेतों के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग मुश्किल हो जाता है, जिससे उत्पादन सीमित रहता है।
In simple words: भारत में खेत छोटे होते हैं, जिससे खेती में ज्यादा पैसा लगता है और फसल भी कम होती है।

🎯 Exam Tip: जोत के छोटे आकार और उसके कारण होने वाली उच्च लागत तथा कम उत्पादकता के बीच के संबंध पर जोर दें.

 

Question 22. भारत में कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए सिंचाई सुविधाएँ किस प्रकार से जिम्मेदार हैं?
Answer: आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत में अभी भी 53% भूमि ही सिंचाई पर आश्रित है। यह दर्शाता है कि देश में सिंचाई सुविधाओं का भारी अभाव है, जिससे कृषि की उत्पादकता निम्न बनी हुई है। बारिश पर निर्भरता के कारण खेती अनिश्चित रहती है, जिससे किसान आधुनिक तकनीकों का उपयोग नहीं कर पाते।
In simple words: भारत में अभी भी आधे से ज्यादा खेतों में सिंचाई नहीं होती, इसलिए खेती में उत्पादन कम रहता है।

🎯 Exam Tip: सिंचाई सुविधाओं के अभाव और मानसून पर निर्भरता को निम्न उत्पादकता के मुख्य कारणों के रूप में स्पष्ट करें.

 

Question 23. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने हेतु क्या किया गया?
Answer: ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission-NFSM) को लागू किया गया। इस मिशन का उद्देश्य धान, गेहूँ और दालों के उत्पादन को बढ़ाकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
In simple words: ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में खेती का उत्पादन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन शुरू किया गया था।

🎯 Exam Tip: पंचवर्षीय योजनाओं में शुरू की गई विशिष्ट पहलों और उनके उद्देश्यों को याद रखें.

 

Question 24. सरकार को कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने हेतु क्या करना चाहिए?
Answer: सरकार को कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए भूमि सुधारों को सही ढंग से लागू करना चाहिए। कृषि इनपुट जैसे बीज, उर्वरक का उचित मात्रा में उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए। इसके साथ ही, किसानों को पर्याप्त साख (ऋण) और विपणन सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए तथा फसलों के लिए उचित-कीमत नीति लागू करनी चाहिए। ये कदम किसानों को बेहतर खेती के लिए प्रोत्साहित करेंगे।
In simple words: सरकार को जमीन सुधार करने, सही बीज-खाद देने, आसान कर्ज और अच्छी कीमत दिलाने पर काम करना चाहिए ताकि खेती में उत्पादन बढ़े।

🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों को एक व्यापक नीति के रूप में प्रस्तुत करें, जिसमें भूमि, इनपुट, वित्त और बाजार सभी शामिल हों.

 

Question 25. कृषिगत आगतों (Agricultural Inputs) से क्या तात्पर्य है?
Answer: कृषिगत आगतों से तात्पर्य उन सभी चीजों से है जिनका उपयोग कृषि उत्पादन प्रक्रिया में किया जाता है। इनमें उर्वरक, उन्नत किस्म के बीज और कीटनाशकों का प्रयोग शामिल है। ये आगत फसल की उपज और गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करते हैं।
In simple words: कृषि आगत यानी वे चीजें जो खेती में इस्तेमाल होती हैं, जैसे खाद, अच्छे बीज और कीटनाशक दवाएँ।

🎯 Exam Tip: 'कृषिगत आगत' की परिभाषा में उसके प्रमुख घटकों-उर्वरक, बीज, कीटनाशक-का उल्लेख करना न भूलें.

 

Question 27. मध्यम सिंचाई परियोजना से क्या आशय है?
Answer: मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ वे होती हैं जिनका कृषि कमांड क्षेत्र 2000 हेक्टेयर से 10,000 हेक्टेयर के बीच होता है। ये परियोजनाएँ बड़े क्षेत्रों में पानी पहुँचाने और कृषि उत्पादन को बढ़ाने में मदद करती हैं, लेकिन बड़ी परियोजनाओं जितनी विशाल नहीं होतीं।
In simple words: मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ उन खेतों को पानी देती हैं जो 2000 से 10,000 हेक्टेयर के बीच के होते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार की सिंचाई परियोजनाओं को उनके कमांड क्षेत्र के आकार के आधार पर याद रखें.

 

Question 28. बड़ी सिंचाई परियोजना से आप क्या समझते हैं?
Answer: बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ वे होती हैं जिनका कृषि कमांड क्षेत्र 10,000 हेक्टेयर से अधिक होता है। ये परियोजनाएँ विशाल क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ प्रदान करती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन संभव होता है। ऐसी परियोजनाओं में अक्सर बड़े बाँध और नहरें शामिल होती हैं।
In simple words: बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन को पानी देती हैं।

🎯 Exam Tip: बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को परिभाषित करते समय उनके विशाल आकार और प्रभाव पर जोर दें.

 

Question 29. तालाबों द्वारा सिंचाई किन राज्यों में की जाती है?
Answer: तालाबों द्वारा सिंचाई मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिणी भारत के राज्यों में की जाती है। इन क्षेत्रों में तालाब पारंपरिक रूप से सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं, खासकर जहाँ नहरों का विकास सीमित है।
In simple words: तालाबों से सिंचाई मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में होती है।

🎯 Exam Tip: सिंचाई के विभिन्न साधनों के लिए प्रमुख राज्यों को याद रखें, क्योंकि यह क्षेत्रीय कृषि पद्धतियों को दर्शाता है.

 

Question 30. शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान किसका है?
Answer: शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान कुओं और नलकूपों का है। 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र में इनका योगदान 61.4 प्रतिशत था, जो बढ़कर 783.50 लाख हेक्टेयर हो गया। ये भूमिगत जल का उपयोग करते हैं और कई क्षेत्रों में किसानों के लिए पानी का मुख्य स्रोत हैं।
In simple words: सबसे ज्यादा सिंचाई कुओं और नलकूपों से होती है, जो कुल सिंचित क्षेत्र का 61.4% था।

🎯 Exam Tip: सिंचाई के साधनों में कुओं और नलकूपों के प्रमुख योगदान को याद रखें, साथ ही संबंधित प्रतिशतता या आंकड़े भी.

 

Question 31. उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग आँकड़ों द्वारा बताइए।
Answer: उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग 1966-67 में 18.90 लाख हेक्टेयर भूमि में किया गया था। यह उपयोग 1998-99 तक बढ़कर 783.50 लाख हेक्टेयर हो गया। यह वृद्धि हरित क्रांति के प्रभाव को दर्शाती है, जहाँ उन्नत बीजों के कारण उत्पादन में भारी इजाफा हुआ।
In simple words: उन्नत बीजों का इस्तेमाल 1966-67 में 18.90 लाख हेक्टेयर जमीन पर हुआ था, जो 1998-99 में बढ़कर 783.50 लाख हेक्टेयर हो गया।

🎯 Exam Tip: कृषि नवाचारों जैसे उन्नत बीजों के उपयोग में वृद्धि को आँकड़ों के साथ प्रस्तुत करें, जिससे उनके प्रभाव की स्पष्ट तस्वीर मिले.

 

Question 32. कीटनाशकों के प्रयोग में कितनी वृद्धि हुई?
Answer: कीटनाशकों के प्रयोग में भारी वृद्धि हुई है। 1970-71 में इसका प्रयोग 24.3 हजार टन था, जो बढ़कर 2011-12 में 50.58 हजार टन हो गया। हालाँकि, बढ़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए अब इसके नियंत्रित प्रयोग पर जोर दिया जाता है। कीटनाशकों ने फसलों को कीटों और बीमारियों से बचाने में मदद की है, लेकिन उनके अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ भी बढ़ी हैं।
In simple words: कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल 1970-71 में 24.3 हजार टन से बढ़कर 2011-12 में 50.58 हजार टन हो गया।

🎯 Exam Tip: कीटनाशकों के प्रयोग में वृद्धि के आँकड़ों को याद रखें और साथ ही इसके पर्यावरणीय प्रभावों का भी उल्लेख करें.

 

Question 33. भारत में पहले परम्परागत कृषि हल, बैल, घोड़े, जोहड़, तालाब आदि के माध्यम से की जाती थी, जिससे उत्पादन व उत्पादकता दोनों का स्तर कम रहता था।
Answer: भारत में पुरानी खेती के तरीके, जैसे हल चलाने के लिए बैल या घोड़े का उपयोग करना और जोहड़ व तालाबों से सिंचाई करना, बहुत आम थे। इन तरीकों से कृषि उत्पादन और उत्पादकता दोनों ही कम रहती थी क्योंकि ये आधुनिक मशीनों जितने कुशल नहीं थे।
In simple words: भारत में पहले हल-बैल और तालाबों से खेती होती थी, जिससे फसल का उत्पादन बहुत कम होता था।

🎯 Exam Tip: परंपरागत कृषि पद्धतियों और उनके कम उत्पादन स्तर के बीच के संबंध को स्पष्ट करें, जिससे आधुनिक तकनीकों के महत्व को उजागर किया जा सके.

 

Question 34. मशीनीकरण (Mechanisation) से क्या तात्पर्य है?
Answer: मशीनीकरण का अर्थ है कृषि के पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक मशीनों और तकनीकों का उपयोग करके खेती करना। इसमें ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य कृषि उपकरण शामिल हैं, जो खेती के काम को तेज, आसान और अधिक कुशल बनाते हैं। इससे उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि होती है।
In simple words: मशीनीकरण का मतलब है खेती में पुराने औजारों की जगह नई मशीनों का इस्तेमाल करना।

🎯 Exam Tip: मशीनीकरण की परिभाषा में 'पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीकों' पर जोर दें, और इसके लाभों का भी उल्लेख करें.

 

Question 35. हरित क्रान्ति की शुरुआत कब हुई?
Answer: हरित क्रांति की शुरुआत भारत में 1966 में खरीफ की फसल के साथ मानी जाती है। उस समय श्रीमती इंदिरा गाँधी और कृषि मंत्री श्री सी. सुब्रह्मण्यम ने इस कृषि रणनीति को पूरे देश के सामने रखा था। इसका मुख्य उद्देश्य अधिक उपज देने वाले बीजों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके खाद्य उत्पादन बढ़ाना था।
In simple words: हरित क्रांति 1966 में खरीफ की फसल के समय शुरू हुई, जब इंदिरा गाँधी और कृषि मंत्री ने इस योजना को आगे बढ़ाया।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की शुरुआत के वर्ष और उसमें शामिल प्रमुख हस्तियों के नाम को याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 36. गेहूँ की उन्नत किस्म के बीजों की खोज किसने की तथा इसका क्या प्रभाव पड़ा?
Answer: मैक्सिको में शोध कर रहे कृषि वैज्ञानिक नॉरमन ई. बोरलॉग ने गेहूँ के उत्तम किस्म के बीजों की खोज की थी। इस खोज का प्रभाव यह पड़ा कि गेहूँ की उत्पादकता को 200 से 250 गुना तक बढ़ाया जा सकता था। इन बीजों ने हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
In simple words: नॉरमन ई. बोरलॉग ने गेहूँ के अच्छे बीज खोजे, जिससे गेहूँ का उत्पादन 200 से 250 गुना बढ़ गया।

🎯 Exam Tip: नॉरमन बोरलॉग का नाम और उनकी खोज के कृषि पर पड़े गुणात्मक प्रभाव को स्पष्ट करें.

 

Question 37. डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने गेहूँ की कौन-सी किस्में विकसित की?
Answer: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने मैक्सिकन गेहूँ के बीजों की कमियों को दूर करके गेहूँ की नई किस्में 'शर्बती सोना' और 'पूसा लरमा' को विकसित किया था। इन किस्मों ने भारत में गेहूँ उत्पादन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे देश खाद्य सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ा।
In simple words: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने 'शर्बती सोना' और 'पूसा लरमा' नाम की गेहूँ की नई किस्में बनाईं।

🎯 Exam Tip: डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के योगदान और उनके द्वारा विकसित गेहूँ की किस्मों के नाम याद रखें, क्योंकि उन्हें भारत में हरित क्रांति का जनक माना जाता है.

 

Question 38. 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार किसे मिला?
Answer: 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार नॉरमन ई. बोरलॉग को मिला था। उन्हें विश्व में हरित क्रांति का जनक माना जाता है क्योंकि उन्होंने उच्च उपज देने वाली फसलों को विकसित करके लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया।
In simple words: 1970 में नॉरमन ई. बोरलॉग को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला क्योंकि उन्होंने हरित क्रांति शुरू की।

🎯 Exam Tip: नॉरमन बोरलॉग को मिले पुरस्कार और उनके 'विश्व में हरित क्रांति के जनक' के रूप में पहचान को याद रखें.

 

Question 40. हरित क्रांति का प्रथम चरण केन्द्रीयकरण का चरण क्यों कहा जाता है?
Answer: हरित क्रांति के प्रथम चरण (जो 60 से 90 के दशक के मध्य तक चला) को 'केन्द्रीयकरण का चरण' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मुख्य रूप से गेहूँ और चावल की फसलों पर केंद्रित था। इसका क्षेत्रीय विस्तार भी पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ ही राज्यों तक सीमित था।
In simple words: हरित क्रांति का पहला हिस्सा 'केन्द्रीयकरण' वाला था क्योंकि यह सिर्फ गेहूँ और चावल पर और कुछ ही राज्यों में लागू हुआ था।

🎯 Exam Tip: 'केन्द्रीयकरण' शब्द का अर्थ, इसमें शामिल फसलें और क्षेत्र याद रखें.

 

Question 41. हरित क्रांति को गेहूँ-क्रांति क्यों कहा जाता है?
Answer: हरित क्रांति के दौरान गेहूँ की फसल पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा, इसलिए इसे 'गेहूँ-क्रांति' भी कहा जाता है। इस अवधि में गेहूँ की उत्पादकता 851 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 3075 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई थी। इस भारी वृद्धि ने भारत को गेहूँ उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में मदद की।
In simple words: हरित क्रांति को 'गेहूँ-क्रांति' कहते हैं क्योंकि इस दौरान गेहूँ का उत्पादन बहुत ज्यादा बढ़ गया था, 851 से 3075 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक।

🎯 Exam Tip: गेहूँ की उत्पादकता में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के आँकड़े और उसके कारण हरित क्रांति को मिला यह नाम याद रखें.

 

Question 42. हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों में कितनी वृद्धि हुई?
Answer: हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों के प्रयोग में बहुत तेजी से वृद्धि हुई। 1952-53 में मात्र 66000 टन उर्वरकों का प्रयोग होता था, जो बढ़कर 2013-14 में 239.6 लाख टन हो गया। उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ी और फसलों की पैदावार में इजाफा हुआ।
In simple words: हरित क्रांति के समय खाद का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया; 1952-53 में 66000 टन से 2013-14 में 239.6 लाख टन हो गया।

🎯 Exam Tip: उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि के आँकड़ों को याद रखें और इसके उत्पादन पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को समझाएँ.

 

Question 43. हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में क्या परिवर्तन हुआ?
Answer: हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में भी काफी परिवर्तन हुआ। इस दौरान 1950-51 में सिंचाई संभाव्यता (सिंचाई क्षमता) 2.26 करोड़ हेक्टेयर थी, जो 2011-12 में बढ़कर 11.32 करोड़ हेक्टेयर हो गई थी। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसलों को पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, जिससे अधिक उपज संभव हो पाई।
In simple words: हरित क्रांति के समय सिंचाई की सुविधाएँ बहुत बढ़ गईं; 1950-51 में 2.26 करोड़ हेक्टेयर से 2011-12 में 11.32 करोड़ हेक्टेयर हो गईं।

🎯 Exam Tip: सिंचाई संभाव्यता में हुई वृद्धि के आँकड़ों को याद रखें, क्योंकि यह हरित क्रांति की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलू था.

 

Question 44. कृषिगत वित्त के विभाजन को बताइए।
Answer: कृषिगत वित्त को मुख्य रूप से तीन अवधियों में विभाजित किया जा सकता है: अल्पकालीन ऋण, मध्यमकालीन ऋण और दीर्घकालीन ऋण। अल्पकालीन ऋण फसल बुवाई और कटाई जैसे तत्काल खर्चों के लिए होता है, मध्यमकालीन ऋण कृषि उपकरण खरीदने जैसे कार्यों के लिए होता है, और दीर्घकालीन ऋण भूमि सुधार या बड़े निवेशों के लिए होता है।
In simple words: खेती के लिए दिए जाने वाले कर्ज को छोटे समय के लिए, बीच के समय के लिए और लंबे समय के लिए बांटा गया है।

🎯 Exam Tip: कृषिगत वित्त के तीन प्रमुख विभाजनों और उनके संबंधित उद्देश्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. रोजगार में कृषि के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी लगभग 65% काम करने वाली आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़े कामों में लगी है। मछली पालन, मुर्गी पालन, पशु पालन जैसे कृषि से संबंधित कामों में रोजगार के अवसर अधिक होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या इन पर बहुत निर्भर करती है। हालाँकि, गैर-कृषि क्षेत्रों की तुलना में कृषि से जुड़े लोगों की औसत आय कम होती है, फिर भी यह ग्रामीण रोजगार का एक बड़ा जरिया है।
In simple words: भारत की 65% आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े कामों से रोजगार पाती है, जैसे मछली या पशु पालन।

🎯 Exam Tip: रोजगार में कृषि के महत्व पर प्रकाश डालते समय, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के रोजगारों का उल्लेख करें और जनसंख्या की निर्भरता को भी स्पष्ट करें.

 

Question 2. औद्योगिक विकास में कृषि का महत्त्व बताइए।
Answer: हमारे उद्योगों के विकास में कृषि की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। कृषि ही उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराती है, जैसे- चाय, सूती वस्त्र, चीनी और वनस्पति तेल उद्योगों को। इसके अलावा, चावल कूटना, साबुन बनाना और खाद्य पदार्थों से जुड़े कई काम अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। आजकल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, जो पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। इससे आय और रोजगार दोनों बढ़ रहे हैं।
In simple words: खेती उद्योगों को कच्चा माल देती है, जैसे चाय और चीनी के लिए। खाद्य बनाने वाले उद्योग भी खेती पर निर्भर हैं, जिससे रोजगार और कमाई बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: कृषि के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के औद्योगिक संबंधों को समझाएँ, विशेषकर कच्चे माल की आपूर्ति और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के संदर्भ में.

 

Question 3. आर्थिक नियोजन में कृषि के महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: कृषि का हर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है, खासकर परिवहन व्यवस्था पर, क्योंकि अधिकतर कृषि उत्पादों की ढुलाई ट्रेनों और सड़कों से होती है। यदि फसल अच्छी होती है, तो किसानों की खरीदने की शक्ति बढ़ती है और वे उद्योगों द्वारा बनाई गई चीजों की मांग करते हैं, जिससे उद्योग आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और देश की समृद्धि इसी पर निर्भर करती है।
In simple words: खेती का असर परिवहन पर पड़ता है क्योंकि फसलें ट्रेन-सड़क से जाती हैं। अच्छी फसल से किसानों की खरीद क्षमता बढ़ती है, जिससे उद्योग भी तरक्की करते हैं।

🎯 Exam Tip: आर्थिक नियोजन में कृषि के महत्व को समझाते समय, इसके परिवहन, औद्योगिक विकास और समग्र आर्थिक समृद्धि पर पड़ने वाले प्रभावों को शामिल करें.

 

Question 4. काश्तकारी सुधारों से क्या तात्पर्य है?
Answer: काश्तकारी सुधारों का मतलब उन कानूनों और नीतियों से है जो काश्तकारों के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं और उन्हें जमीन पर मालिकाना हक देते हैं। इन सुधारों का उद्देश्य काश्तकारों को बेदखली से बचाना और भू-स्वामियों को अपनी जमीन खुद काश्त के लिए वापस लौटाने के बाद भी काश्तकारों के पास कुछ जमीन छोड़ना था। इन सुधारों ने पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में अधिक सफलता प्राप्त की।
In simple words: काश्तकारी सुधारों का मतलब था किसानों के जमीन पर अधिकारों को बचाना, उन्हें जमीन से निकालने से रोकना और जमीन का मालिक बनने में मदद करना।

🎯 Exam Tip: काश्तकारी सुधारों को परिभाषित करते समय, उनके मुख्य उद्देश्यों और कुछ सफल राज्यों के उदाहरणों का उल्लेख करें.

 

Question 5. जोतों की सीमा-निर्धारण बताइए।
Answer: सरकार ने जोतों की अधिकतम सीमा तय कर दी ताकि गरीब किसानों को जमीन मिल सके। भारत में अधिकतर जोतें छोटी हैं, जिनसे उत्पादन लागत अधिक आती है। देश में जोतों के बंटवारे और बिखराव की समस्या को दूर करने के लिए चकबंदी की गई, यानी किसानों के बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा किया गया। 2010-11 में जोतों का प्रतिशत इस प्रकार था:

जोतनिर्धारणकुछ जोतों का प्रतिशत (2010-11)
सीमांत जोत1 हेक्टेयर से कम67.0
लघु/छोटी जोत1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर17.9
अर्द्धमध्यम जोत2 हेक्टेयर से 4 हेक्टेयर10.1
मध्यम जोत4 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर4.3
बड़ी जोत10 हेक्टेयर से अधिक0.8

In simple words: सरकार ने तय किया कि एक किसान कितनी जमीन रख सकता है। भारत में अधिकतर खेत छोटे हैं, जिससे लागत ज्यादा और पैदावार कम होती है। बिखरे खेतों को एक जगह करने के लिए चकबंदी की गई।

🎯 Exam Tip: जोतों के सीमा-निर्धारण और चकबंदी के उद्देश्यों को स्पष्ट करें, साथ ही विभिन्न जोतों के प्रतिशत के आंकड़ों को भी शामिल करें.

 

Question 6. देश में जोतों का उपविभाजन व उपखण्डन क्यों हुआ?
Answer: देश में जोतों का उपविभाजन (बंटवारा) और उपखण्डन (छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटना) कई कारणों से हुआ। इनमें कानूनी कारण जैसे निजी संपत्ति का अधिकार और उत्तराधिकार के नियम शामिल थे। सामाजिक और आर्थिक कारण जैसे बढ़ती जनसंख्या, संयुक्त परिवारों का टूटना, बंटाई प्रथा और महाजनों-साहूकारों का दबाव भी इसमें शामिल थे। इन सभी कारणों से भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई।
In simple words: देश में खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए क्योंकि कानूनी नियमों, बढ़ती जनसंख्या, परिवारों के अलग होने और कर्ज के दबाव जैसे कई कारण थे।

🎯 Exam Tip: जोतों के उपविभाजन और उपखण्डन के पीछे के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक कारणों को अलग-अलग समझाएँ.

 

Question 7. कृषि के पुनर्गठन के विषय में समझाइए।
Answer: कृषि के पुनर्गठन का अर्थ है भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे हुए टुकड़ों को एक साथ जोड़कर बड़े और संगठित खेत बनाना, जिसे चकबंदी कहते हैं। भू-सुधारों के बाद भी सरकार द्वारा लागू कानूनों से सिर्फ आंशिक सफलता ही मिली। जमींदारों ने कानूनों की कमियों का फायदा उठाकर स्वयं को किसान बताया और अपनी जमीन रिश्तेदारों के नाम करवा दी। इससे देश के सभी क्षेत्रों में ये सुधार समान रूप से लागू नहीं हो पाए।
In simple words: कृषि पुनर्गठन का मतलब था बिखरे खेतों को एक साथ करना। लेकिन कानूनों में कमी के कारण यह पूरी तरह सफल नहीं हुआ और जमींदारों ने इसका फायदा उठाया।

🎯 Exam Tip: कृषि के पुनर्गठन के मुख्य उद्देश्य को चकबंदी से जोड़कर समझाएँ और बताएं कि इसे लागू करने में क्या चुनौतियाँ आईं.

 

Question 9. कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता की प्रवृत्तियों को आँकड़ों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
Answer: कृषि उत्पादकता का मतलब प्रति हेक्टेयर भूमि पर होने वाला उत्पादन है। कृषि उत्पादकता की प्रवृत्तियों को हम निम्नलिखित तालिका से समझ सकते हैं:

फसलवर्ष 1950-51वर्ष 2013-14
उत्पादनउत्पादकताउत्पादनउत्पादकता
चावल20666810652424
गेहूँ646659593075
ज्वार5535354925
बाजरा26288921164
दालें84441193764
खाद्यान्न58855226482101
तिलहन624813291153
कपास3088367532
जूट3310431102561

उत्पादन 'लाख टन' में है तथा कपास व जूट के लिए 'लाख गांठ' में है (कपास के लिए एक गांठ = 170 किलोग्राम, जूट के लिए एक गांठ = 180 किलोग्राम)।
उपर्युक्त तालिका के अनुसार, इस अवधि में गेहूँ का उत्पादन सबसे ज्यादा बढ़ा है, जो 64 लाख टन से बढ़कर 959 लाख टन हो गया। कुल खाद्यान्न उत्पादन 588 लाख टन से बढ़कर 2648 लाख टन हो गया। गैर-खाद्यान्न फसलों में कपास का उत्पादन सबसे ज्यादा (लगभग 12 गुना) बढ़ा। उत्पादकता की दृष्टि से, कुल खाद्यान्नों की उत्पादकता 1950-51 में 552 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2013-14 में 2101 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। गेहूँ की उत्पादकता में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई, और चावल की उत्पादकता में दूसरे स्थान पर वृद्धि हुई।
In simple words: खेती में उत्पादन और पैदावार कैसे बढ़ी, यह जानने के लिए इस तालिका को देखें। गेहूँ और चावल जैसे अनाजों का उत्पादन और प्रति हेक्टेयर पैदावार काफी बढ़ी है।

🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादन और उत्पादकता की प्रवृत्तियों को समझाते समय, तालिका के मुख्य आँकड़ों पर ध्यान केंद्रित करें और बताएं कि किन फसलों में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई.

 

Question 10. कृषिगत निम्न उत्पादता के चार कारण बताइए।
Answer: कृषिगत निम्न उत्पादकता के चार मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. जनसंख्या वृद्धि का कृषि क्षेत्र पर बढ़ता दबाव: ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक आज भी कृषि से जुड़े हैं, जिससे प्रति व्यक्ति आय कम है।
2. भारत के गाँव के निवासियों की रूढ़िवादिता और अज्ञानता: पुराने विचार और जानकारी की कमी भी कम उत्पादकता का कारण है।
3. भारत में जोतों का आकार छोटा होना: छोटे खेतों के कारण कृषि लागत अधिक आती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं हो पाता।
4. सरकार द्वारा भू-स्वामित्व प्रणाली हेतु बनाए गए कानूनों का उचित लाभ किसानों को न मिल पाना: भूमि सुधारों का पूरा फायदा किसानों तक नहीं पहुँच पाया।
In simple words: खेती में कम उत्पादन के मुख्य कारण हैं- जनसंख्या का दबाव, किसानों की पुरानी सोच, खेतों का छोटा आकार और सरकार के नियमों का फायदा न मिल पाना।

🎯 Exam Tip: कृषि की निम्न उत्पादकता के कारणों को सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी पहलुओं में वर्गीकृत करके समझाएँ.

 

Question 11. सिंचाई के साधन बताइए।
Answer: सिंचाई के साधन (Means of Irrigation) भारत में मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटे गए हैं:

  • नहरों से सिंचाई: 2010-11 में कुल सिंचित क्षेत्र का 24.6% भाग नहरों से सिंचित था। यह मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिणी भारत के राज्यों में प्रचलित है।
  • तालाबों से सिंचाई: दक्षिणी भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में तालाबों से सिंचाई की जाती है। 2010-11 में तालाबों का योगदान शुद्ध सिंचित क्षेत्र में 3.1% था।
  • कुओं से सिंचाई: इसमें सतही कुएँ और नलकूप दोनों शामिल हैं। उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और हरियाणा में यह प्रमुख है। 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र में कुओं और नलकूपों का योगदान 61.4% था, जो सबसे अधिक है।
सिंचाई के ये साधन विभिन्न क्षेत्रों में कृषि को सहारा देते हैं और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने में मदद करते हैं।
In simple words: सिंचाई के मुख्य तरीके नहरें, तालाब और कुएँ-नलकूप हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से ज्यादा सिंचाई होती है।

🎯 Exam Tip: सिंचाई के विभिन्न साधनों को उनके क्षेत्रीय वितरण और कुल सिंचित क्षेत्र में उनके योगदान के साथ याद रखें.

 

Question 12. हरित क्रांति के प्रथम चरण के विषय में बताइए।
Answer: हरित क्रांति का प्रथम चरण (First Stage of Green Revolution) 60 से 90 के दशक के बीच की अवधि का था। इसे 'केन्द्रीयकरण का चरण' भी कहते हैं क्योंकि यह मुख्य रूप से गेहूँ और चावल की फसलों पर केंद्रित था। इस चरण का क्षेत्रीय विस्तार पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था। इस चरण में उत्पादन में बहुत तेजी से वृद्धि हुई, इसी वजह से इसे गेहूँ की फसल पर केंद्रित चरण भी कहते हैं।
In simple words: हरित क्रांति का पहला चरण 60 से 90 के दशक के बीच था। यह गेहूँ और चावल पर केंद्रित था और पंजाब, हरियाणा जैसे कुछ ही राज्यों में सफल हुआ था।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के प्रथम चरण की प्रमुख विशेषताओं, जैसे केंद्रीयकरण, प्रमुख फसलें और क्षेत्रीय सीमाएँ, को स्पष्ट करें.

 

Question 14. हरित क्रांति के चार प्रभाव बताइए।
Answer: हरित क्रांति के चार प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
1. फसलों की कुल उत्पादकता और कुल उत्पादन में वृद्धि हुई। गेहूँ की फसल में अधिक वृद्धि होने के कारण इसे 'गेहूँ-क्रांति' (Wheat Revolution) भी कहा गया।
2. उर्वरकों के प्रयोग में बहुत तेजी से वृद्धि हुई, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ी।
3. सिंचाई सुविधाओं का तेजी से विकास हुआ, जिससे अधिक भूमि सिंचित होने लगी।
4. कृषि में मशीनीकरण (Mechanisation) को बहुत प्रोत्साहन मिला, जिससे फसलों की उत्पादकता और उत्पादन में और वृद्धि हुई।
In simple words: हरित क्रांति से फसल का उत्पादन बढ़ा, खाद का इस्तेमाल बढ़ा, सिंचाई की सुविधाएँ बेहतर हुईं और खेती में मशीनों का उपयोग भी बढ़ा।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभावों को उत्पादन वृद्धि, तकनीकी प्रगति और बुनियादी ढांचे के विकास के संदर्भ में समझाएँ.

 

Question 15. हरित क्रांति की चार असफलताएँ बताइए।
Answer: हरित क्रांति की चार असफलताएँ निम्नलिखित हैं:
1. हरित क्रांति मात्र गेहूँ की फसल पर केंद्रित रही और अन्य मोटे अनाजों, जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।
2. वाणिज्यिक फसलों (Commercial Crops) के उत्पादन में कोई खास वृद्धि नहीं हो पाई, जिससे किसानों को व्यावसायिक लाभ कम मिले।
3. हरित क्रांति का प्रभाव कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित रहा, जिससे कृषि विकास में असंतुलन (Unbalanced Development) पैदा हुआ।
4. कृषि की नई रणनीति का फायदा केवल शिक्षित और संपन्न किसान ही उठा पाए, जबकि छोटे और गरीब किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाया।
In simple words: हरित क्रांति सिर्फ गेहूँ पर ही काम आई, दूसरी फसलों पर नहीं। यह कुछ ही जगहों पर सफल हुई और इसका फायदा सिर्फ अमीर किसानों को ही मिला।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की असफलताओं को क्षेत्रीय असमानता, फसल विविधता की कमी और छोटे किसानों की पहुंच के मुद्दों पर केंद्रित करके समझाएँ.

 

Question 16. उत्पादक तथा अनुत्पादक ऋणों को समझाइए।
Answer: वे ऋण जिनका प्रयोग किसान उत्पादन कार्यों के लिए करते हैं, उन्हें उत्पादक ऋण (Productive Loan) कहा जाता है, जैसे- खाद, बीज, कृषि औजार, बैल खरीदने या भूमि सुधार के लिए। ये ऋण सीधे कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद करते हैं। दूसरी ओर, वे ऋण जिनका प्रयोग किसान अनुत्पादक कार्यों के लिए करते हैं, उन्हें अनुत्पादक ऋण (Unproductive Loan) कहते हैं, जैसे- शादी, मृत्यु-भोज, अन्य सामाजिक संस्कारों या मुकदमेबाजी के लिए लिए गए ऋण। ये ऋण उत्पादन में वृद्धि नहीं करते।
In simple words: उत्पादक ऋण वह है जो खेती बढ़ाने के लिए लिया जाता है, जैसे बीज के लिए। अनुत्पादक ऋण वह है जो शादी या अन्य निजी खर्चों के लिए लिया जाता है।

🎯 Exam Tip: उत्पादक और अनुत्पादक ऋणों को उनके उपयोग के आधार पर स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और दोनों के उदाहरण दें.

 

Question 18. विभिन्न राज्यों में साहूकारों तथा महाजनों पर लगाए गए प्रतिबंध बताइए।
Answer: साहूकारों और महाजनों पर लगाए गए प्रमुख प्रतिबंध निम्नलिखित थे:
1. चक्रवृद्धि ब्याज पर प्रतिबंध लगाया गया, ताकि वे अत्यधिक ब्याज न वसूल सकें।
2. साहूकार ऋणों के अलावा वही खर्च वसूल कर सकते हैं जो कानून में लिखा हो, ताकि वे मनमाने शुल्क न लगा सकें।
3. मूलधन के अलावा झूठे दावों पर प्रतिबंध लगाया गया, जिससे किसानों को धोखे से बचाया जा सके।
4. दूसरे राज्यों में भुगतान से जुड़े प्रावधानों पर प्रतिबंध लगाना, ताकि अंतर-राज्यीय लेनदेन में कोई गड़बड़ी न हो।
In simple words: सरकार ने साहूकारों पर ज्यादा ब्याज लेने, झूठे पैसे मांगने और मनमानी फीस लगाने पर रोक लगा दी।

🎯 Exam Tip: साहूकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को याद रखें, क्योंकि ये किसानों को शोषण से बचाने के लिए महत्वपूर्ण कदम थे.

 

Question 19. कृषिगत साख के संस्थागत स्रोतों के विषय में बताइए।
Answer: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संस्थागत वित्त व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हुई। 1951 से 2013 में संस्थागत वित्त का योगदान कृषि वित्त में बढ़कर 60% हो गया था। संस्थागत वित्त को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक ने प्रो. वी.एस. व्यास की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन किया। इस समिति ने 2004 में 99 सुझाव दिए, जिनमें से 32 सुझावों को रिजर्व बैंक ने मान लिया। संस्थागत स्रोतों में प्रमुख रूप से सहकारी साख संस्थाएँ, भूमि विकास बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, व्यापारिक बैंक और नाबार्ड को शामिल किया जाता है।
In simple words: आजादी के बाद खेती के लिए बैंक और सरकारी संस्थाओं से कर्ज मिलने लगा। रिजर्व बैंक ने कई सुझाव दिए, जिससे सहकारी बैंक, भूमि बैंक और दूसरे बैंक किसानों को कर्ज देने लगे।

🎯 Exam Tip: संस्थागत साख स्रोतों की विकास यात्रा, उनकी प्रमुख संस्थाओं और रिजर्व बैंक की भूमिका को याद रखें.

 

Question 20. सहकारी साख संस्थाओं के विषय में बताइए।
Answer: सहकारी साख संस्थाएँ (Cooperative Credit Institutes) भारत में 2004 में शुरू हुईं। 2013-14 में कुल संस्थागत साख में इनका हिस्सा 169% रहा था, जो मुख्य रूप से किसानों की अल्पकालीन साख की जरूरतों को पूरा करता है। इन्हें तीन भागों में बाँटा गया है:

  • प्राथमिक साख समितियाँ (Primary Credit Societies): ये गाँव के स्तर पर काम करती हैं और उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देती हैं।
  • केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank): ये जिला स्तर पर काम करते हैं और प्राथमिक साख समितियों को 1 से 3 साल के लिए ऋण प्रदान करते हैं।
  • राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Bank): ये राज्य स्तर पर काम करते हैं और जिला सहकारी बैंकों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं, जिसे रिजर्व बैंक से वित्त मिलता है।

In simple words: सहकारी बैंक 2004 में शुरू हुए और किसानों को कम समय के लिए कर्ज देते हैं। ये तीन तरह के होते हैं: गाँव, जिला और राज्य स्तर पर।

🎯 Exam Tip: सहकारी साख संस्थाओं के त्रिस्तरीय ढांचे (प्राथमिक, केंद्रीय, राज्य) और उनकी संबंधित भूमिकाओं को याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 21. भूमि विकास बैंक के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: भूमि विकास बैंक (Land Development Bank) की स्थापना भारत में सबसे पहले 1929 में की गई थी। इन्हें 'भूमि बंधक बैंक' भी कहा जाता है और अब इन्हें 'कृषि और ग्रामीण विकास बैंक' कहते हैं। ये किसानों को लंबी अवधि के लिए ऋण प्रदान करते हैं, जैसे भूमि सुधार या कृषि उपकरण खरीदने के लिए। कुछ राज्यों में इनकी एक ही संगठन व्यवस्था है, जबकि कुछ में दोहरी व्यवस्था है। गाँव स्तर पर प्राथमिक कृषि और विकास बैंक और राज्य स्तर पर राज्य कृषि और ग्रामीण विकास बैंक स्थापित किए गए हैं।
In simple words: भूमि विकास बैंक 1929 में बने थे। इन्हें भूमि बंधक बैंक भी कहते हैं और ये किसानों को लंबी अवधि के लिए कर्ज देते हैं ताकि वे जमीन सुधार या मशीनें खरीद सकें।

🎯 Exam Tip: भूमि विकास बैंक की स्थापना का वर्ष, इसका वैकल्पिक नाम और किसानों को दिए जाने वाले दीर्घकालीन ऋण के महत्व को याद रखें.

 

Question 22. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के विषय में प्रकाश डालिए।
Answer: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks-RRBs) छोटे और सीमांत किसानों, कृषि मजदूरों और दस्तकारों को ऋण देने के लिए 2 अक्टूबर 1975 को शुरू किए गए थे। शुरुआत में 5 बैंक स्थापित किए गए, जिनकी संख्या बाद में बढ़कर 196 हो गई, लेकिन 2005 में विलयन के बाद यह घटकर 56 रह गई। 2013-14 में कुल संस्थागत साख में इनका योगदान 116% था। इनके द्वारा दिए गए कुल ऋण का 90% ग्रामीण क्षेत्र के कमजोर वर्गों को दिया गया।
In simple words: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक 1975 में शुरू हुए थे, ताकि छोटे किसानों, मजदूरों और कारीगरों को कर्ज मिल सके। ये बैंक ग्रामीण गरीबों को सबसे ज्यादा कर्ज देते हैं।

🎯 Exam Tip: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना का उद्देश्य, वर्ष और लक्षित लाभार्थियों (कमजोर वर्ग) पर ध्यान केंद्रित करें.

 

Question 23. व्यापारिक बैंकों का कृषि में योगदान बताइए।
Answer: स्वतंत्रता के दौरान कृषि वित्त में व्यापारिक बैंकों का योगदान बहुत कम था; 1950-51 में यह केवल 9% था। कृषि वित्त में योगदान बढ़ाने के लिए जुलाई 1969 में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, और 1980 में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। इन बैंकों को यह निर्देश दिया गया कि वे 40% वित्त प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे- कृषि, लघु उद्योग और लघु व्यवसाय को दें। 2013-14 में उनका योगदान कृषिगत साख में 71.50% था।
In simple words: पहले बैंक खेती को कम कर्ज देते थे। फिर सरकार ने 1969 और 1980 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और उन्हें कहा कि वे खेती और छोटे उद्योगों को 40% कर्ज दें। अब उनका योगदान 71.50% है।

🎯 Exam Tip: व्यापारिक बैंकों के कृषि में योगदान की वृद्धि को राष्ट्रीयकरण की नीति से जोड़कर समझाएँ, साथ ही प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और प्रतिशत योगदान पर भी ध्यान दें.

 

Question 25. ग्रामीण आधार संरचना विकास फण्ड (RIDF) के विषय में बताइए।
Answer: ग्रामीण आधार संरचना विकास फंड को RIDF भी कहते हैं। इसे 1995-96 में 2000 करोड़ रुपये की लागत से शुरू किया गया था। इसका मुख्य लक्ष्य राज्य सरकारों को गाँवों में विकास के कामों के लिए पैसे देना है। यह फंड सिंचाई, जल प्रबंधन और गाँव की सड़कें बनाने जैसे कई कामों के लिए मदद करता है। यह फंड ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरी सुविधाएं बनाने में मदद करता है ताकि गाँव के लोगों का जीवन बेहतर हो सके।
In simple words: RIDF एक फंड है जो गाँवों में सड़कें, पानी और सिंचाई जैसी सुविधाएँ बनाने के लिए राज्य सरकारों को पैसे देता है।

🎯 Exam Tip: RIDF का पूरा नाम (Rural Infrastructure Development Fund) और इसके मुख्य उद्देश्य को हमेशा याद रखें क्योंकि यह ग्रामीण विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

Question 26. सूक्ष्म वित्त की व्यवस्था के विषय में टिप्पणी करिए।
Answer: सूक्ष्म वित्त या माइक्रो फाइनेंस ऐसी व्यवस्था है जहाँ गरीब लोगों को, खासकर गाँवों में, बिना किसी गिरवी या गारंटी के छोटा लोन मिलता है। यह पैसा छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए होता है। सबसे पहले यह तरीका बांग्लादेश में शुरू हुआ था। गैर-सरकारी संगठन और स्वयं सहायता समूह लोगों को यह मदद देते हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास हो सके।
In simple words: सूक्ष्म वित्त गरीब लोगों को बिना गिरवी रखे छोटे लोन देता है, खासकर गाँवों में, ताकि वे अपनी छोटी जरूरतें पूरी कर सकें और विकास कर सकें।

🎯 Exam Tip: सूक्ष्म वित्त ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए एक प्रभावी उपकरण है; इसके प्रमुख लाभों और इसे प्रदान करने वाली संस्थाओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 27. किसान क्रेडिट कार्ड योजना क्या है?
Answer: किसान क्रेडिट कार्ड योजना 1998-99 में शुरू की गई थी। इस योजना से किसानों को खेती के लिए थोड़े समय का लोन मिलता है। बैंक, केंद्रीय सहकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक इस योजना को चलाते हैं। यह योजना किसानों को समय पर वित्तीय सहायता देकर खेती के काम में मदद करती है।
In simple words: किसान क्रेडिट कार्ड योजना किसानों को खेती के लिए आसान और छोटे समय का कर्ज देती है।

🎯 Exam Tip: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना किसानों को सस्ती दर पर ऋण प्रदान करके कृषि उत्पादन को बढ़ावा देती है, जो कृषि वित्त का एक महत्वपूर्ण साधन है।

 

Question 28. सहकारी विकास फंड से क्या तात्पर्य है?
Answer: सहकारी विकास फंड की स्थापना सहकारी संस्थाओं को मजबूत बनाने और उनके विकास में मदद करने के लिए की गई है। यह फंड सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता और मार्गदर्शन देता है, जिससे वे अपने सदस्यों को बेहतर सेवाएँ दे सकें। इसका मुख्य लक्ष्य सहकारिता आंदोलन को बढ़ावा देना है।
In simple words: सहकारी विकास फंड सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने और उनकी तरक्की के लिए बनाया गया है।

🎯 Exam Tip: सहकारी विकास फंड सहकारी क्षेत्र में स्थिरता और वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है; इसके उद्देश्य और कार्यप्रणाली को जानना आवश्यक है।

 

Question 29. नाबार्ड अपनी वित्त सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति किस प्रकार करता है?
Answer: नाबार्ड अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए भारत सरकार, विश्व बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेता है। यह गारंटी वाले बॉन्ड और दूसरे तरह के ऋण पत्र बेचकर भी पैसे जुटाता है। जब जरूरत होती है, तो यह ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास फंड (RIDF) का भी उपयोग करता है। नाबार्ड इस तरह से ग्रामीण विकास के लिए लगातार धन उपलब्ध करा पाता है।
In simple words: नाबार्ड सरकार, विश्व बैंक और अन्य संस्थाओं से कर्ज लेकर अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करता है, और बॉन्ड बेचकर भी पैसे जुटाता है।

🎯 Exam Tip: नाबार्ड (NABARD) भारत में कृषि और ग्रामीण विकास के लिए सर्वोच्च वित्तपोषण संस्था है; इसके वित्तपोषण के तरीकों को समझना इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।

 

Question 30. कृषि वित्त के विभिन्न स्रोतों के योगदान को संक्षेप में बताइए।
Answer: कृषि के लिए पैसे मिलने के कई तरीके हैं। आज भी किसान ज्यादातर गैर-सरकारी स्रोतों जैसे महाजनों से कर्ज लेते हैं, क्योंकि ये आसानी से मिल जाते हैं। बैंक जैसे सरकारी स्रोतों से कर्ज लेने में बहुत कागजी काम और समय लगता है। सरकार ने किसानों की मदद के लिए कुछ नए रास्ते भी बनाए हैं। इनमें किसान क्रेडिट कार्ड, स्वयं सहायता समूह से पैसे देना और सूक्ष्म वित्त (छोटे लोन) को बढ़ावा देना शामिल है। इन सभी उपायों का लक्ष्य किसानों तक वित्तीय सहायता पहुंचाना है ताकि वे अपनी खेती सुधार सकें।
In simple words: कृषि के लिए कर्ज सरकारी और गैर-सरकारी स्रोतों से मिलता है। गैर-सरकारी स्रोत आसान होते हैं, जबकि सरकारी स्रोतों में कागजी काम ज्यादा होता है। सरकार अब नए तरीके जैसे किसान क्रेडिट कार्ड और छोटे लोन भी दे रही है।

🎯 Exam Tip: कृषि वित्त के संस्थागत और गैर-संस्थागत दोनों स्रोतों को जानना महत्वपूर्ण है, साथ ही सरकार द्वारा किसानों को ऋण उपलब्धता में सुधार के लिए किए गए प्रयासों को भी समझें।

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 निबंधात्मक प्रश्न

 

Question 1. द्वितीय हरित क्रांति के लिए आयोजित सम्मेलन के विषय में बताते हुए इस क्रांति द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
Answer: द्वितीय हरित क्रांति को प्रदूषण-रहित कृषि विकास भी कहते हैं। दिसंबर 2006 में नई दिल्ली में इसके लिए एक बड़ा सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन का मुख्य विषय 'नॉलेज एग्रीकल्चर' था। इसमें यह तय किया गया कि यह क्रांति लगातार खेती को बढ़ाएगी और विश्व व्यापार संगठन (WTO) की चुनौतियों का सामना कर पाएगी। इस क्रांति में कई खास काम किए गए: 1. कृषि उत्पादन बढ़ाना: इस क्रांति में सभी तरह के कृषि उत्पादों, जैसे अनाज, पशुधन, मछली और व्यापारिक फसलों को शामिल किया गया। इसलिए इसे 'इंद्रधनुष क्रांति' भी कहते हैं। इसमें फसल को अच्छे से संभालने और जैविक चीजों का इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। 2. मूल्य बढ़ाना: खेती से जुड़े उत्पादों को प्रोसेस करने (जैसे पेय बनाना) पर ध्यान दिया गया ताकि उनका मूल्य बढ़ सके। 3. बुनियादी ढांचे को मजबूत करना: कृषि के लिए जरूरी सुविधाओं जैसे कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, अच्छी मंडी और संचार व्यवस्था को सुधारने पर जोर दिया गया। इन प्रयासों से कृषि क्षेत्र का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। यह भी तय किया गया कि अगर प्रदूषण रहित खेती की नीतियों को सही से लागू किया जाए, तो भारत को 12वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि वृद्धि दर 4% प्राप्त करने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
In simple words: द्वितीय हरित क्रांति 2006 में शुरू हुई थी, जिसका लक्ष्य बिना प्रदूषण के खेती को बढ़ाना था। इसमें सभी तरह की फसलों और पशुधन पर ध्यान दिया गया, उत्पादों का मूल्य बढ़ाने और खेती की सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया।

🎯 Exam Tip: द्वितीय हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य, 'नॉलेज एग्रीकल्चर' की थीम और इसमें शामिल प्रयासों को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत में सतत कृषि विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

Question 2. भू-सुधार से आपका क्या तात्पर्य है? भारत में भू-सुधार कार्यक्रमों की उन्नति का आलोचनात्मक आंकलन कीजिए। इसकी सफलता के लिए आप क्या सुझाव दे सकते हैं?
Answer: भू-सुधार का अर्थ है कि छोटे किसानों और कृषि मजदूरों को फायदा पहुंचाने के लिए जमीन का मालिकाना हक दोबारा बांटा जाए। प्रो. मिर्डल के अनुसार, भू-सुधार का मतलब है कि लोगों और जमीन के रिश्तों को ठीक से नियोजित और व्यवस्थित किया जाए।
भारत में भू-सुधार कार्यक्रम: 1. बिचौलियों का अंत- आजादी के समय लगभग 40% जमीन पर जमींदारों का राज था। पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं में इन सभी को खत्म कर दिया गया ताकि किसान सीधे जमीन के मालिक बन सकें। 2. काश्तकारी प्रणाली में सुधार- इसमें भू-स्वामित्व की सुरक्षा के नियम बनाए गए कि जमीन का मालिक उतनी ही जमीन रख सकता है जितनी वह खुद जोतता है। लगान को भी अधिकतम 1/5 या 1/4 तक तय किया गया। सरकार ने स्वयं खेती के लिए जमीन वापस लेने के नियम बनाए और काश्तकारों को मालिक बनने का अधिकार दिया गया। 3. जोतों का सीमा निर्धारण- सरकार ने यह तय किया कि कोई भी व्यक्ति कितनी जमीन रख सकता है। इसका मकसद भूमिहीन किसानों को जमीन देना था। हालांकि, भारत में चकबंदी की गति धीमी रही है, जो कि खेतों के बंटवारे की समस्या को हल करने में मदद करती है और कृषि उत्पादन बढ़ाती है। 4. भूमि के प्रबंधन में सुधार- पहली और दूसरी योजनाओं में जमीन के अच्छे प्रबंधन पर जोर दिया गया, जैसे जमीन को समतल करना, बंजर भूमि को खेती लायक बनाना, अच्छे बीज और खाद का उपयोग करना। 5. सहकारी खेती- पहली पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश में लगभग 1,000 सहकारी समितियां थीं। 1959 में, नागपुर अधिवेशन में सहकारी खेती को कृषि सुधार का अंतिम लक्ष्य बताया गया। 6. भूमिहीन किसानों को बसाना और भू-दान- इस योजना के तहत भूमिहीन किसानों को जमीन देने की कोशिश की गई। आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में भू-दान आंदोलन शुरू किया था, जिसका उद्देश्य गरीब लोगों को स्वेच्छा से जमीन दान दिलवाना था ताकि बिना किसी संघर्ष के सामाजिक असमानता खत्म हो।
आलोचनात्मक मूल्यांकन: भू-सुधार कार्यक्रमों की सफलता पूरी तरह से नहीं मिली है क्योंकि कई राज्यों में जमीन के रिकॉर्ड अभी भी अधूरे हैं, प्रशासन का रवैया ठीक नहीं रहा है, और कानूनी विवादों को बढ़ावा मिला है। यह कार्यक्रम ठीक से लागू नहीं हो पाया और भू-सुधार नीतियां देर से आईं। कई जगहों पर आज भी ऊंची लगान ली जाती है।
सफलता के लिए सुझाव: 1. सीमावर्ती क्षेत्रों में पूर्व सैनिकों को जमीन देने में प्राथमिकता दी जाए। 2. खेती में न्यूनतम वेतन तुरंत लागू किया जाए। 3. गाँवों में भूमिहीन लोगों को रहने के लिए जमीन दी जाए। 4. सरकार को बेनामी जमीन का पता लगाकर उसे अपने कब्जे में लेना चाहिए। 5. किसानों को जमीन से वंचित करने वाले जमींदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। भू-सुधारों से जुड़ी अनिश्चितताओं और बाधाओं को जल्द से जल्द खत्म करना चाहिए ताकि एक न्यायपूर्ण और शोषण-मुक्त समाज बन सके।
In simple words: भू-सुधार का मतलब है जमीन का सही बंटवारा ताकि छोटे किसानों को फायदा हो। भारत में यह बिचौलियों को हटाने, लगान तय करने और जमीन की सीमा तय करने जैसे कामों से किया गया। हालांकि, यह पूरी तरह सफल नहीं हुआ है। इसकी सफलता के लिए जमीन के रिकॉर्ड ठीक करने और कानूनी विवादों को रोकने जैसे उपाय जरूरी हैं।

🎯 Exam Tip: भू-सुधार का अर्थ, भारत में इसके मुख्य कार्यक्रम (जैसे बिचौलियों का उन्मूलन और काश्तकारी सुधार), इसकी सफलता में बाधाएं और इसे सफल बनाने के लिए दिए गए सुझावों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है।

 

Question 3. वर्ष 1950 से 1990 के बीच की अवधि में भारतीय कृषि की दशा का वर्णन कीजिए।
Answer: 1950 से 1990 के बीच भारत में खेती की हालत में बहुत बदलाव आए। सरकार ने किसानों की मदद के लिए भू-सुधार और अच्छी किस्म के बीजों का इस्तेमाल बढ़ाया। इन बदलावों को कुछ खास बातों से समझा जा सकता है: 1. भू-सुधार: आजादी के बाद जमींदारी प्रथा खत्म कर दी गई और जमीन रखने की एक सीमा तय की गई। इससे किसानों को बिचौलियों से छुटकारा मिला और वे अपनी जमीन में ज्यादा निवेश करने लगे, जिससे उत्पादन बढ़ा। 2. हरित क्रांति: इस दौर में खेती के लिए अच्छी क्वालिटी के बीज, खाद और कीटनाशक का उपयोग बढ़ा। सिंचाई के साधन भी बेहतर हुए। इन सब से फसलों का उत्पादन बहुत ज्यादा बढ़ गया, जिसे हरित क्रांति कहा गया। इससे भारत खाने-पीने की चीजों में आत्मनिर्भर बन गया। 3. कृषि सहायता: किसानों को अपनी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार से आर्थिक मदद मिली। यह मदद आज भी दी जा रही है, हालांकि इस पर बहस भी चलती रहती है कि इसे जारी रखना चाहिए या नहीं। इन सब कोशिशों से भारतीय खेती ने बहुत तरक्की की और देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। हालांकि, खेती में विकास की और भी बहुत गुंजाइश है, जिसके लिए हमें लगातार कोशिशें करनी होंगी।
In simple words: 1950 से 1990 के बीच भारत की खेती में बहुत सुधार हुए। जमींदारी खत्म हुई, हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ा और किसानों को सरकारी मदद मिली, जिससे देश अनाज में आत्मनिर्भर बन गया।

🎯 Exam Tip: 1950-1990 की अवधि में भारतीय कृषि के महत्वपूर्ण परिवर्तनों, जैसे भू-सुधार, हरित क्रांति और कृषि सहायता के योगदान को संक्षेप में बताएं और यह दर्शाएं कि भारत कैसे आत्मनिर्भर बना।

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