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Detailed Chapter 4 रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना RBSE Solutions for Class 11 Chemistry
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Class 11 Chemistry Chapter 4 रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 4 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. PCl5 का अस्तित्व है किन्तु NCl5 का नहीं, क्योंकि -
(अ) नाइट्रोजन में रिक्त d – कक्षक नहीं होते हैं।
(ब) नाइट्रोजन की आयनन ऊर्जा बहुत अधिक होती है।
(स) नाइट्रोजन का परमाणु क्लोरीन के समान नहीं होता है।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Answer: (अ) नाइट्रोजन में रिक्त d – कक्षक नहीं होते हैं।
In simple words: PCl5 बन सकता है, लेकिन NCl5 नहीं, क्योंकि नाइट्रोजन परमाणु के पास खाली d-कक्षक नहीं होते हैं जो अधिक बंध बनाने में मदद कर सकें।
🎯 Exam Tip: फास्फोरस जैसे तीसरे आवर्त के तत्वों में खाली d-कक्षक होते हैं, जो उन्हें अपने अष्टक का विस्तार करने और अधिक बंध बनाने की अनुमति देते हैं।
Question 2. निम्न में से किसका द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है –
(अ) CIF
(ब) PCl3
(स) BeF2
(द) SO2
Answer: (स) BeF2
In simple words: BeF2 अणु में द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है क्योंकि इसकी सीधी (रेखीय) संरचना होती है, और इसमें बंधों का खिंचाव एक-दूसरे को रद्द कर देता है।
🎯 Exam Tip: रेखीय और सममित अणुओं में, भले ही ध्रुवीय बंध हों, शुद्ध द्विध्रुव आघूर्ण शून्य हो जाता है क्योंकि सभी बंध द्विध्रुव एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं।
Question 4. निम्न में से किस अणु में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाया जाता है –
(अ) NO
(ब) CO
(स) NH3
(द) O2
Answer: (अ) NO
In simple words: NO (नाइट्रिक ऑक्साइड) अणु में एक अकेला, बिना जोड़ा हुआ इलेक्ट्रॉन होता है, जो इसे कुछ खास रासायनिक गुण देता है।
🎯 Exam Tip: अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले अणु अनुचुंबकीय होते हैं (चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं)।
Question 5. निम्न में से कौनसा अणु/आयन sp³ संकरण दिखाता है -
(अ) BF3 और NH2-
(ब) NO2- और NH3
(स) BF3 और NO2-
(द) NH2- और H2O
Answer: (द) NH2- और H2O
In simple words: NH2- आयन और H2O अणु दोनों में केंद्रीय परमाणु (नाइट्रोजन और ऑक्सीजन) sp³ संकरण दिखाते हैं, जिससे उनकी ज्यामिति बनती है।
🎯 Exam Tip: sp³ संकरण में एक s-कक्षक और तीन p-कक्षक मिलकर चार नए sp³ संकर कक्षक बनाते हैं, जो अक्सर चतुष्फलकीय ज्यामिति की ओर ले जाते हैं, भले ही उनमें एकाकी युग्म भी हों।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 4 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नः
Question 6. निम्नलिखित परमाणुओं तथा आयनों के लुइस बिन्दु प्रतीक लिखिए S, S2-, Ar तथा Al3+.
Answer:
S: \( \stackrel{..}{\text{S}} \) (छह वैलेंस इलेक्ट्रॉन)
S2-: \( [\stackrel{..}{\text{S}}:\stackrel{..}{\text{S}}]^{2-} \) (आठ वैलेंस इलेक्ट्रॉन, ऋणायन चार्ज)
Ar: \( \stackrel{..}{\text{Ar}}:\stackrel{..}{\text{Ar}} \) (आठ वैलेंस इलेक्ट्रॉन, निष्क्रिय गैस)
Al3+: \( [\text{Al}^{3+}] \) (कोई वैलेंस इलेक्ट्रॉन नहीं, धनायन चार्ज)
In simple words: लुईस बिंदु प्रतीक में परमाणु के वैलेंस इलेक्ट्रॉनों को डॉट्स के रूप में दिखाया जाता है। आयनों के लिए, चार्ज भी दिखाया जाता है, और वर्ग कोष्ठक का उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: लुइस प्रतीक बनाते समय, वैलेंस इलेक्ट्रॉनों की संख्या का ध्यान रखें और आयनों के लिए कुल चार्ज को वर्ग कोष्ठक के बाहर दर्शाएँ।
Question 8. आबंध सामर्थ्य को आबंध कोटि के रूप में आप किस प्रकार व्यक्त करेंगे?
Answer: जैसे-जैसे आबंध कोटि बढ़ती है, वैसे-वैसे आबंध सामर्थ्य भी बढ़ती है, क्योंकि आबंध ऊर्जा का मान बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि अधिक बंधों वाले अणु को तोड़ने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
In simple words: अधिक बंध का मतलब है अधिक ताकत। अगर दो परमाणुओं के बीच ज्यादा बंध हैं, तो उन्हें तोड़ना मुश्किल होगा।
🎯 Exam Tip: आबंध कोटि सीधे आबंध की ताकत को दर्शाती है; उच्च आबंध कोटि का अर्थ है कि परमाणु अधिक मजबूती से बंधे हुए हैं।
Question 9. N2, O2, Cl2 तथा F2, को बढ़ती आबंध ऊर्जा के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
Answer: इन अणुओं की आबंध ऊर्जा का बढ़ता क्रम इस प्रकार है –
\( \text{F}_2 < \text{Cl}_2 < \text{O}_2 < \text{N}_2 \)
यहां, F2 की आबंध ऊर्जा सबसे कम है और N2 की सबसे अधिक है।
In simple words: F2 को तोड़ना सबसे आसान है, फिर Cl2, फिर O2, और N2 को तोड़ना सबसे मुश्किल है क्योंकि N2 में त्रिक बंध होता है।
🎯 Exam Tip: आबंध ऊर्जा अणु के स्थायित्व का माप होती है। उच्च आबंध कोटि वाले अणुओं (जैसे N2 में त्रिक बंध) की आबंध ऊर्जा सबसे अधिक होती है।
Question 10. CO32- आयन के सन्दर्भ में अनुनाद को समझाइए।
Answer: CO32- आयन में अनुनाद के कारण, तीनों C-O बंध की लंबाई समान होती है। इसका बंध क्रम 1.33 होता है, जो एकल और दोहरे बंध के बीच की स्थिति को दर्शाता है। यह अनुनाद आयन को अधिक स्थिर बनाता है।
In simple words: CO32- में बंध लगातार बदलते रहते हैं, जिससे सभी C-O बंध एक जैसे दिखते हैं और अणु ज्यादा स्थिर हो जाता है।
🎯 Exam Tip: अनुनाद के कारण बंध की लंबाई और ऊर्जा एकल और दोहरे बंधों के औसत के बीच होती है, और अणु का स्थायित्व बढ़ जाता है।
Question 11. निम्नलिखित अणुओं में केन्द्रीय परमाणु का संकरण बताइए – CCl4, H2O, SO2, CO2
Answer:
| अणु | केन्द्रीय परमाणु | संकरण |
|---|---|---|
| CCl4 | कार्बन | sp³ |
| H2O | ऑक्सीजन | sp³ |
| SO2 | सल्फर | sp² |
| CO2 | कार्बन | sp |
In simple words: CCl4 और H2O में sp³ संकरण होता है, SO2 में sp² संकरण होता है, और CO2 में sp संकरण होता है। यह केंद्रीय परमाणु के आसपास के बंधों और एकाकी युग्मों पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: संकरण की गणना करने के लिए केंद्रीय परमाणु के बंध युग्मों (Bond Pairs) और एकाकी युग्मों (Lone Pairs) की कुल संख्या को देखें।
Question 12. कमरे के ताप पर H2O द्रव है, क्यों?
Answer: H2O कमरे के ताप पर द्रव होता है क्योंकि ऑक्सीजन की विद्युतऋणात्मकता अधिक होने के कारण अणुओं के बीच बहुत मजबूत अंतरा-अणुक हाइड्रोजन बंध पाए जाते हैं। ये हाइड्रोजन बंध जल के अणुओं को एक-दूसरे के करीब रखते हैं, जिससे यह द्रव अवस्था में रहता है।
In simple words: पानी कमरे के तापमान पर तरल होता है क्योंकि इसके अणु हाइड्रोजन बंधों से मजबूती से जुड़े होते हैं, जो उन्हें पास रखते हैं।
🎯 Exam Tip: हाइड्रोजन बंध एक महत्वपूर्ण अंतरा-अणुक बल है जो जल, अमोनिया और हाइड्रोजन फ्लोराइड जैसे यौगिकों के भौतिक गुणों को प्रभावित करता है।
Question 15. SO3 तथा NO2 अणुओं की अनुनाद संरचनाएँ लिखिए।
Answer: SO3 तथा NO2 अणुओं की अनुनाद संरचनाएँ निम्न हैं –
In simple words: SO3 और NO2 दोनों कई अलग-अलग संरचनाओं के रूप में मौजूद हो सकते हैं जो एक-दूसरे में बदलती रहती हैं, इसे अनुनाद कहते हैं। इन संरचनाओं में इलेक्ट्रॉन अलग-अलग जगहों पर घूमते रहते हैं।
🎯 Exam Tip: अनुनाद संरचनाएं बनाते समय, परमाणुओं की स्थिति स्थिर रहती है, केवल इलेक्ट्रॉनों का स्थान बदलता है, और कुल आवेश भी समान रहता है।
Question 16. X – अक्ष को अन्तर्नाभिकीय अक्ष मानते हुए बताइए कि निम्नलिखित में कौनसे कक्षक सिग्मा आबंध नहीं बनाएंगे।
(अ) 1s तथा 1s
(ब) 1s तथा 2Px
(स) 2Py तथा 2Py
(द) 1s तथा 2s
Answer: (ब) 1s तथा 2Px
(स) 2Py तथा 2Py
In simple words: 1s और 2Px कक्षक, साथ ही 2Py और 2Py कक्षक, सिग्मा बंध नहीं बना सकते क्योंकि उनकी सममिति X-अक्ष के साथ मेल नहीं खाती, जो कि मुख्य बंध बनाने वाली दिशा है। सिग्मा बंध तभी बनता है जब कक्षक सीधे अक्षीय रूप से ओवरलैप करते हैं।
🎯 Exam Tip: सिग्मा (σ) बंध केवल कक्षकों के अक्षीय अतिव्यापन से बनते हैं। यदि अंतर्नाभिकीय अक्ष को X-अक्ष माना जाता है, तो s-कक्षक और Px कक्षक (या कोई भी p-कक्षक जो अक्षीय रूप से ओवरलैप न करे) सिग्मा बंध नहीं बना पाएंगे।
Question 17. निम्न में से किसकी ध्रुवण शक्ति उच्चतम होगी – Na+, K+, Li⁺, Cs+
Answer: इन आयनों में से Li⁺ की ध्रुवण शक्ति उच्चतम होगी क्योंकि इसका आकार सबसे छोटा है। एक छोटा आयन इलेक्ट्रॉनों को अधिक मजबूती से खींचता है।
In simple words: Li⁺ की खींचने की शक्ति सबसे ज्यादा होती है क्योंकि यह सबसे छोटा आयन है।
🎯 Exam Tip: धनायन का आकार जितना छोटा और आवेश जितना अधिक होता है, उसकी ध्रुवण शक्ति उतनी ही अधिक होती है, जो फैजान के नियमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Question 20. निम्नलिखित अभिक्रिया में Al परमाणु की संकरण अवस्था में परिवर्तन को समझाइए – AlCl3 + Cl → AlCl4¯
Answer: AlCl3 में Al परमाणु पर sp² संकरण होता है, जिसमें तीन बंध होते हैं। लेकिन जब Cl- आयन जुड़ता है और AlCl4¯ आयन बनता है, तो Al परमाणु पर sp³ संकरण हो जाता है, जिससे चार बंध बनते हैं। यह एक केंद्रीय परमाणु के लिए इलेक्ट्रॉनों के बंध युग्मों की संख्या में वृद्धि को दर्शाता है।
In simple words: AlCl3 में Al sp² संकरित होता है। जब एक Cl- जुड़ता है, तो यह AlCl4¯ बन जाता है और Al sp³ संकरित हो जाता है।
🎯 Exam Tip: संकरण अवस्था में परिवर्तन अक्सर केंद्रीय परमाणु से जुड़े परमाणुओं या एकाकी युग्मों की संख्या में बदलाव के कारण होता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 4 लघूत्तरात्मक प्रश्नः
Question 21. अष्टक नियम को परिभाषित कीजिए तथा इस नियम के महत्त्व और सीमाओं को लिखिए।
Answer:
अष्टक नियम (रासायनिक आबंधन का इलेक्ट्रॉनिकी सिद्धांत) – यह नियम कहता है कि जब परमाणु बंध बनाते हैं, तो वे एक-दूसरे से इलेक्ट्रॉनों को साझा या स्थानांतरित करके अपने सबसे बाहरी कोश में आठ इलेक्ट्रॉन पूरे करते हैं। यह अष्टक नियम मुख्य रूप से दूसरे आवर्त के तत्वों और कार्बनिक यौगिकों की संरचना को समझने में सहायक है।
इसके अपवाद (सीमाएँ) निम्न हैं –
• केन्द्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टक (आठ से कम इलेक्ट्रॉन) – कुछ यौगिकों में, केंद्रीय परमाणु के चारों ओर आठ से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं। उदाहरण: LiCl, BeH2, BCl3, AlCl3, BF3.
• विषम इलेक्ट्रॉन अणु – इन अणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या विषम होती है, इसलिए सभी परमाणु अष्टक नियम का पालन नहीं कर पाते। उदाहरण: NO (15e) (नाइट्रिक ऑक्साइड), NO2 (23e) (नाइट्रोजन डाइऑक्साइड)।
• प्रसारित अष्टक (केंद्रीय परमाणु पर आठ से अधिक इलेक्ट्रॉन युक्त यौगिक) – तीसरे और उसके आगे के आवर्त के तत्वों में, केंद्रीय परमाणु अपने 3s, 3p और खाली 3d कक्षकों का उपयोग करके आठ से अधिक इलेक्ट्रॉन रख सकते हैं। उदाहरण: PCl5, SF6.
• अष्टक नियम, उत्कृष्ट गैसों की रासायनिक निष्क्रियता पर आधारित है, लेकिन उनके कुछ यौगिक जैसे XeF2, KrF2 और XeOF2 भी बनते हैं।
• यह अणु की सही आकृति नहीं बताता।
• यह अणुओं के स्थायित्व और ऊर्जा की व्याख्या नहीं करता।
In simple words: अष्टक नियम कहता है कि परमाणु बंध बनाकर आठ इलेक्ट्रॉन पूरे करते हैं। यह कार्बनिक यौगिकों के लिए अच्छा है, लेकिन कुछ अणु आठ से कम या ज्यादा इलेक्ट्रॉन रखते हैं, कुछ में विषम संख्या में इलेक्ट्रॉन होते हैं, और यह अणुओं के आकार या ताकत के बारे में सब कुछ नहीं बताता।
🎯 Exam Tip: अष्टक नियम एक सरल मार्गदर्शक है, लेकिन फैजान के नियम और VSEPR सिद्धांत जैसे उन्नत सिद्धांत रासायनिक बंधों को बेहतर ढंग से समझाते हैं, खासकर उन यौगिकों के लिए जो अष्टक नियम का पालन नहीं करते।
Question 22. निम्न युग्मों में से कौन अधिक सहसंयोजक है और क्यों?
(अ) CuO तथा CuS
(ब) AgCl तथा AgI
(स) PbCl2 तथा PbCl4
(द) NaCl तथा CuCl
Answer:
(अ) CuO तथा CuS में, CuS अधिक सहसंयोजक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि \( \text{S}^{2-} \) आयन का आकार \( \text{O}^{2-} \) आयन की तुलना में बड़ा होता है, जिससे उसका ध्रुवीकरण आसानी से हो जाता है।
(ब) AgCl तथा AgI में, AgI अधिक सहसंयोजक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि \( \text{I}^{-} \) आयन का आकार \( \text{Cl}^{-} \) आयन की तुलना में बड़ा होता है, जिससे उसका ध्रुवीकरण आसानी से हो जाता है।
(स) PbCl2 तथा PbCl4 में, PbCl4 अधिक सहसंयोजक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि Pb पर \( \text{Pb}^{4+} \) आवेश \( \text{Pb}^{2+} \) आवेश की तुलना में अधिक धनावेशित होता है, जिससे यह ऋणायन का ध्रुवीकरण अधिक करता है।
(द) NaCl तथा CuCl में, CuCl अधिक सहसंयोजक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि \( \text{Cu}^{+} \) में छद्म अक्रिय गैस विन्यास (बाह्यतम कोश में 18 इलेक्ट्रॉन) होता है, जबकि \( \text{Na}^{+} \) में अक्रिय गैस विन्यास होता है, जिससे \( \text{Cu}^{+} \) की ध्रुवण शक्ति \( \text{Na}^{+} \) से अधिक होती है।
In simple words: सहसंयोजकता आमतौर पर तब बढ़ती है जब ऋणायन (नकारात्मक आयन) बड़ा होता है या धनायन (सकारात्मक आयन) का आवेश अधिक होता है। CuCl जैसे मामलों में, धनायन की इलेक्ट्रॉन व्यवस्था भी मायने रखती है।
🎯 Exam Tip: फैजान के नियम यह बताते हैं कि कौन सा यौगिक अधिक आयनिक या सहसंयोजक होगा। मुख्य बिंदु धनायन की ध्रुवण शक्ति और ऋणायन की ध्रुवीयता है।
Question 23. NH3 तथा NF3 में से किस अणु का द्विध्रुव आघूर्ण अधिक है और क्यों?
Answer: NH3 तथा NF3 दोनों अणुओं की आकृति पिरामिडीय होती है, जिनमें नाइट्रोजन परमाणु पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है। फ्लोरीन की विद्युतऋणात्मकता नाइट्रोजन की अपेक्षा अधिक होती है, लेकिन नाइट्रोजन की विद्युतऋणात्मकता हाइड्रोजन से अधिक होती है। हालांकि, NH3 का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण NF3 के द्विध्रुव आघूर्ण की अपेक्षा अधिक होता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि NF3 में नाइट्रोजन परमाणु पर उपस्थित एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म का द्विध्रुव आघूर्ण तीन N - F आबंधों के द्विध्रुव आघूर्णों की विपरीत दिशा में होता है। इससे कुल द्विध्रुव आघूर्ण कम हो जाता है।
जबकि NH3 में एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म का द्विध्रुव आघूर्ण तथा तीन N - H आबंधों के परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण की दिशा समान होती है। इससे ये एक-दूसरे के प्रभाव को कम नहीं करते, बल्कि जोड़ते हैं, जिससे कुल द्विध्रुव आघूर्ण बढ़ जाता है।
In simple words: NH3 में द्विध्रुव आघूर्ण NF3 से अधिक होता है। NH3 में, एकाकी युग्म और बंधों का खिंचाव एक ही दिशा में काम करता है, जिससे यह बढ़ जाता है। NF3 में, एकाकी युग्म का खिंचाव बंधों के खिंचाव के विपरीत होता है, जिससे यह कम हो जाता है।
🎯 Exam Tip: द्विध्रुव आघूर्ण को निर्धारित करते समय, अणु की ज्यामिति और बंधों के साथ-साथ एकाकी युग्मों के कारण होने वाले द्विध्रुव आघूर्णों की दिशा पर विचार करें।
Question 24. सिग्मा तथा पाई आबन्ध में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
सिग्मा (\( \sigma \)) आबंध:
यह वह सहसंयोजी आबंध है जो कक्षकों के सीधे (अक्षीय) अतिव्यापन से बनता है, जैसे कि s-s, s-p, या p-p कक्षकों के बीच। सिग्मा आबंध मजबूत होते हैं और हमेशा पहले बनते हैं।
पाई (\( \pi \)) आबंध:
यह वह सहसंयोजी आबंध है जो कक्षकों के पार्श्व (साइड-बाय-साइड) अतिव्यापन से बनता है। पाई आबंध सिग्मा आबंध की तुलना में कमजोर होते हैं और हमेशा सिग्मा आबंध के बाद बनते हैं। पाई आबंध कक्षकों के अक्ष अंतर्नाभिकीय अक्ष के समानांतर होते हैं।
In simple words: सिग्मा बंध सीधे टकराकर बनते हैं और मजबूत होते हैं। पाई बंध साइड से ओवरलैप करके बनते हैं और कमजोर होते हैं। एक दोहरा या तिहरा बंध हमेशा एक सिग्मा और एक या दो पाई बंधों से मिलकर बनता है।
🎯 Exam Tip: सिग्मा बंध कक्षकों के अक्षीय अतिव्यापन से बनते हैं, जबकि पाई बंध कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन से बनते हैं। सिग्मा बंध एकल बंधों में मौजूद होते हैं और बहु-बंधों में हमेशा पहले बनते हैं।
Question 25. परमाणु कक्षकों के रेखीय संयोग से आणविक कक्षक बनने के लिए कौन – कौन सी शर्ते आवश्यक हैं? बताइए।
Answer: परमाणु कक्षकों के रेखीय संयोग से आणविक कक्षक बनने के लिए आवश्यक शर्तें निम्न हैं –
1. संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों की ऊर्जा समान या लगभग समान होनी चाहिए। इसका मतलब है कि समान ऊर्जा वाले कक्षक ही प्रभावी ढंग से जुड़ते हैं। जैसे \( \text{H}_2 \) में एक 1s कक्षक दूसरे 1s कक्षक से संयोग कर सकता है।
2. परमाणुओं की सममिति समान होनी चाहिए। परमाणु कक्षक केवल तभी जुड़ेंगे जब उनकी सममिति आणविक अक्ष के साथ समान हो। उदाहरण के लिए, एक परमाणु का 2pz कक्षक दूसरे परमाणु के 2pz कक्षक से ही संयोग करेगा।
3. संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों के बीच अधिकतम अतिव्यापन होना चाहिए। कक्षकों के बीच जितना अधिक अतिव्यापन होगा, आणविक कक्षकों के नाभिकों के बीच इलेक्ट्रॉन घनत्व उतना ही अधिक होगा, जिससे मजबूत बंध बनेगा।
In simple words: आणविक कक्षक बनाने के लिए, परमाणुओं के कक्षकों की ऊर्जा और आकार एक जैसे होने चाहिए, उनकी ज्यामिति मेल खानी चाहिए, और उन्हें जितना हो सके उतना एक-दूसरे से जुड़ना चाहिए।
🎯 Exam Tip: ये तीन शर्तें प्रभावी आणविक कक्षक बनाने और मजबूत रासायनिक बंधों के निर्माण के लिए मौलिक हैं।
Question 28. ClF3 अणु की आकृति को VSEPR सिद्धान्त के आधार पर समझाइए।
Answer: ClF3 अणु में क्लोरीन परमाणु पर 3 बंध युग्म (b.p.) तथा दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म (l.p) होते हैं। VSEPR सिद्धांत के अनुसार, ये पांच इलेक्ट्रॉन युग्म एक त्रिकोणीय द्विपिरामिडीय ज्यामिति में व्यवस्थित होते हैं। हालांकि, एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक जगह घेरते हैं और उन्हें प्रतिकर्षण कम करने के लिए भूमध्यरेखीय स्थिति में रखा जाता है। इसलिए ClF3 अणु की आकृति 'T'-आकार की होती है।
In simple words: ClF3 अणु का आकार T-जैसा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि केंद्रीय क्लोरीन परमाणु पर तीन बंध और दो अकेले इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं। अकेले युग्म अधिक जगह घेरते हैं और T-आकार बनाने के लिए भूमध्यरेखीय स्थिति में रहते हैं।
🎯 Exam Tip: VSEPR सिद्धांत में, एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म-एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण > एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म-बंध युग्म प्रतिकर्षण > बंध युग्म-बंध युग्म प्रतिकर्षण होता है, जो अणु की अंतिम आकृति को निर्धारित करता है।
Question 29. CO2 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य जबकि SO2 अणु में द्विध्रुव आघूर्ण होता है। कारण समझाइए।
Answer:
CO2 और SO2 दोनों ही यौगिकों में ध्रुवीय बंध होते हैं। लेकिन CO2 की ज्यामिति रेखीय होती है। इसलिए इसके दोनों C-O बंधों के बंध आघूर्ण एक-दूसरे के विपरीत दिशा में होते हैं और उनका प्रभाव निरस्त हो जाता है, जिससे CO2 का शुद्ध द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। इसलिए CO2 एक अध्रुवीय अणु है।
SO2 में ऐसा नहीं होता क्योंकि इसकी ज्यामिति कोणीय (बेंट) होती है। इसलिए इसके बंध आघूर्ण एक-दूसरे को पूरी तरह से रद्द नहीं करते, जिससे SO2 में एक शुद्ध द्विध्रुव आघूर्ण होता है। अतः SO2 एक ध्रुवीय अणु है।
In simple words: CO2 सीधा होता है, इसलिए बंधों का खिंचाव एक-दूसरे को रद्द कर देता है और कोई चुंबकीय खिंचाव नहीं होता। SO2 मुड़ा हुआ (कोणीय) होता है, इसलिए बंधों का खिंचाव रद्द नहीं होता और इसमें चुंबकीय खिंचाव होता है।
🎯 Exam Tip: अणु की ज्यामिति (रेखीय, कोणीय, पिरामिडीय आदि) यह निर्धारित करती है कि बंधों के द्विध्रुव आघूर्ण एक-दूसरे को रद्द करेंगे या नहीं, और इस प्रकार अणु का शुद्ध द्विध्रुव आघूर्ण क्या होगा।
Question 30. BaSO4 आयनिक यौगिक होता है फिर भी जल में अविलेय होता है। क्यों?
Answer: BaSO4 एक आयनिक यौगिक है, फिर भी यह जल में अघुलनशील है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि \( \text{SO}_4^{2-} \) ऋणायन का आकार बहुत बड़ा होता है। इस बड़े आकार के कारण, BaSO4 की जलयोजन ऊर्जा (जल में घुलने पर निकलने वाली ऊर्जा) जालक ऊर्जा (आयनिक बंधों को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा) से कम होती है। जलयोजन ऊर्जा मुख्य रूप से धनायन के आकार पर निर्भर करती है। \( \text{Ba}^{2+} \) धनायन का आकार अन्य क्षार धातु आयनों से अधिक है। इसलिए, आयनिक होने के बावजूद, BaSO4 जल में अघुलनशील रहता है।
जलयोजन ऊर्जा \( \propto \frac{1}{{r}_{+}}{+}\frac {1}{{r}_{-}} \)
In simple words: BaSO4 पानी में नहीं घुलता क्योंकि इसे घुलने के लिए जितनी ऊर्जा मिलती है, उससे ज्यादा ऊर्जा इसे अलग होने के लिए चाहिए होती है, क्योंकि इसका ऋणायन बहुत बड़ा होता है।
🎯 Exam Tip: किसी आयनिक यौगिक की जल में विलेयता जालक ऊर्जा और जलयोजन ऊर्जा के सापेक्षिक मानों पर निर्भर करती है। यदि जलयोजन ऊर्जा जालक ऊर्जा से अधिक हो, तो यौगिक घुलनशील होगा।
Question 31. आयनिक यौगिकों की विलेयता को प्रभावित करने वाले किन्हीं चार कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: आयनिक यौगिकों की विलेयता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:
1. जालक ऊर्जा: उच्च जालक ऊर्जा वाले आयनिक यौगिक आमतौर पर कम घुलनशील होते हैं। जालक ऊर्जा आयनों के बीच के आकर्षण बल पर निर्भर करती है।
2. जलयोजन ऊर्जा: उच्च जलयोजन ऊर्जा वाले आयनिक यौगिक अधिक घुलनशील होते हैं। जलयोजन ऊर्जा आयनों और जल के अणुओं के बीच के आकर्षण बल पर निर्भर करती है।
3. आयनिक आकार:
• धनायन की त्रिज्या बढ़ने पर जलयोजन ऊर्जा कम होती है। इसलिए LiX (LiF < LiCl < LiBr < LiI) की जल में विलेयता का क्रम इस प्रकार होता है – LiF < LiCl < LiBr < LiI.
• क्षारीय मृदा धातुओं के सल्फेट जल में अपेक्षाकृत कम विलेय होते हैं, लेकिन वर्ग में नीचे जाने पर इनकी विलेयता घटती जाती है। (BeSO4 > MgSO4 > CaSO4 > SrSO4 > BaSO4 (जल में विलेयता का घटता क्रम))
4. आयनिक आवेश: आयनों पर आवेश जितना अधिक होगा, जालक ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी और विलेयता उतनी ही कम होगी।
कुछ अन्य उदाहरण:
• क्षार धातुओं के हैलाइडों की जल में विलेयता वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है: LiCl < NaCl < KCl < RbCl < CsCl
• आवर्त में हैलाइडों की जल में विलेयता कम होती है: NaCl > MgCl2 > AlCl3 > SiCl4
• धातुओं के कार्बोनेट सामान्यतः जल में विलेय होते हैं तथा वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनकी जल में विलेयता बढ़ती है: Na2CO3 < K2CO3 < Rb2CO3 < Cs2CO3
• क्षारीय मृदा धातुओं के कार्बोनेट तथा बाई कार्बोनेट अपेक्षाकृत जल में कम विलेय होते हैं, लेकिन वर्ग में नीचे जाने पर इनकी विलेयता बढ़ती है।
In simple words: आयनिक यौगिकों की पानी में घुलने की क्षमता कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे उन्हें अलग करने के लिए कितनी ताकत चाहिए (जालक ऊर्जा) और पानी के अणु उन्हें कितना खींचते हैं (जलयोजन ऊर्जा)। आयनों का आकार और उन पर आवेश भी घुलनशीलता को प्रभावित करते हैं।
🎯 Exam Tip: विलेयता को प्रभावित करने वाले कारकों को समझते समय जालक ऊर्जा और जलयोजन ऊर्जा के बीच के संतुलन पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 32. ध्रुवीय सहसंयोजी आबंध से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
Answer:
ध्रुवीय सहसंयोजी आबंध:
कोई भी आबंध सौ प्रतिशत आयनिक या सहसंयोजी नहीं होता; यह एक आदर्श स्थिति है। जब एक सहसंयोजी आबंध दो समान परमाणुओं (जैसे H2, O2, Cl2, N2, तथा F2) के बीच बनता है, तो साझा किए गए इलेक्ट्रॉन युग्म दोनों परमाणुओं द्वारा समान रूप से आकर्षित होता है। इससे इलेक्ट्रॉन युग्म दोनों नाभिकों के ठीक बीच में रहता है। इसे 'अध्रुवीय सहसंयोजी आबंध' कहते हैं।
इसके विपरीत, HF जैसे विषम परमाणुक अणु में, साझा किया गया इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक विद्युतऋणी परमाणु फ्लोरीन की ओर चला जाता है। इस प्रकार के आबंध को 'ध्रुवीय सहसंयोजी आबंध' कहते हैं। इसमें परमाणुओं पर आंशिक धन आवेश (\( \delta+ \)) और आंशिक ऋण आवेश (\( \delta- \)) उत्पन्न होते हैं।
In simple words: ध्रुवीय सहसंयोजी बंध तब बनता है जब दो अलग-अलग परमाणु इलेक्ट्रॉन साझा करते हैं, लेकिन एक परमाणु इलेक्ट्रॉनों को थोड़ा ज्यादा अपनी ओर खींच लेता है। इससे एक तरफ थोड़ा नकारात्मक और दूसरी तरफ थोड़ा सकारात्मक चार्ज आ जाता है।
🎯 Exam Tip: ध्रुवीय सहसंयोजी बंध में, इलेक्ट्रॉनों का असमान बंटवारा होता है जो परमाणुओं के बीच विद्युतऋणात्मकता के अंतर के कारण होता है।
Question 33. निम्न में से किस यौगिक में क्रमशः दुर्बलतम और प्रबलतम हाइड्रोजन आबंध है – NH3, PH3, H2O, H2S
Answer: इन यौगिकों में से PH3 में सबसे दुर्बलतम हाइड्रोजन आबंध होता है और H2O में सबसे प्रबलतम हाइड्रोजन आबंध होता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि PH3 में फॉस्फोरस (P) की विद्युतऋणात्मकता कम होती है, जिससे H-बंध बनाने की इसकी क्षमता बहुत कम हो जाती है। वहीं, H2O में ऑक्सीजन (O) की विद्युतऋणात्मकता बहुत अधिक होती है, जिससे यह मजबूत हाइड्रोजन बंध बनाता है।
In simple words: PH3 में सबसे कमजोर हाइड्रोजन बंध होता है क्योंकि फॉस्फोरस इलेक्ट्रॉनों को ज्यादा नहीं खींचता। H2O में सबसे मजबूत हाइड्रोजन बंध होता है क्योंकि ऑक्सीजन इलेक्ट्रॉनों को बहुत खींचता है।
🎯 Exam Tip: हाइड्रोजन बंध की शक्ति हाइड्रोजन से बंधे हुए परमाणु की विद्युतऋणात्मकता पर निर्भर करती है। फ्लोरीन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जैसे उच्च विद्युतऋणात्मक परमाणु सबसे मजबूत हाइड्रोजन बंध बनाते हैं।
Question 35. C2H2 अणु में C – C परमाणुओं के बीच त्रि-आबंध के निर्माण को चित्र सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: एथाइन (C2H2) अणु में, प्रत्येक कार्बन परमाणु sp संकरित होता है। इसमें एक s और एक p कक्षक मिलकर दो sp संकर कक्षक बनाते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु पर दो असंकरित p कक्षक (2py और 2pz) भी होते हैं।
दोनों कार्बन परमाणु एक-एक sp संकर कक्षक के अक्षीय अतिव्यापन से एक सिग्मा (\( \sigma \)) बंध बनाते हैं।
प्रत्येक कार्बन परमाणु का शेष एक sp संकर कक्षक हाइड्रोजन परमाणु के s कक्षक से अतिव्यापन करके एक \( \sigma \) बंध बनाता है।
दोनों कार्बन परमाणुओं पर उपस्थित दो-दो असंकरित p कक्षक (2py और 2pz) पार्श्व अतिव्यापन द्वारा दो पाई (\( \pi \)) बंध बनाते हैं।
इस प्रकार, एथाइन में दो कार्बन परमाणुओं के बीच एक सिग्मा और दो पाई बंध होते हैं, जिससे एक त्रि-आबंध बनता है। C2H2 में प्रत्येक कार्बन रेखीय ज्यामिति दर्शाता है तथा बंध कोण 180° होता है। C-C बंध लंबाई 120 Pm होती है।
एथाइन में सिग्मा (\( \sigma \)) बंध के चारों ओर दोनों अक्षों पर दो पाई बंधों के इलेक्ट्रॉन अभ्र बेलनाकार आकृति के रूप में पाये जाते हैं। sp संकरण के अन्य उदाहरण निम्न हैं – CO, HgCl2, CdCl2, [Ag(CN)2]
In simple words: C2H2 में, कार्बन परमाणु sp संकरित होते हैं। वे एक सिग्मा बंध बनाने के लिए सीधे जुड़ते हैं, और फिर दो पाई बंध साइड से जुड़ते हैं, जिससे कुल मिलाकर एक तिहरा बंध बनता है।
🎯 Exam Tip: त्रि-आबंध एक सिग्मा और दो पाई बंधों से मिलकर बनता है। sp संकरण रैखिक ज्यामिति और 180° के बंध कोण से जुड़ा होता है।
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 36. संयोजकता आबंध सिद्धान्त के आधार पर H2 - अणु के विरचन की व्याख्या कीजिए।
Answer:
संयोजकता आबंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT) हिटलर और लंदन द्वारा 1927 में दिया गया था और बाद में पॉलिंग ने इसे विकसित किया। यह सिद्धांत परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन, संकरण, विचरण और अध्यारोपण पर आधारित है। यहां हम H2 अणु के निर्माण के संदर्भ में इसका गुणात्मक विवरण देखेंगे।
VBT के प्रमुख अभिगृहीत (मुख्य बिंदु) निम्नलिखित हैं –
• परमाणु आद्य अवस्था (Ground State) में इलेक्ट्रॉनों का सही संख्या में अयुग्मित होने के लिए उत्तेजित हो सकते हैं, जिससे आवश्यक संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन मिल सकें।
• बंधित परमाणुओं के कक्षकों के बीच जितना अधिक अतिव्यापन होता है, बंध उतना ही प्रबल होता है।
• परमाणु कक्षकों के बीच अतिव्यापन की मात्रा कक्षकों की प्रकृति (संकरित या असंकरित) और अतिव्यापन के प्रकार पर निर्भर करती है।
• जब किसी परमाणु के बाहरी कोश के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अलग-अलग कक्षकों में होते हैं, जिनकी ऊर्जा अलग होती है, तो इन कक्षकों का संकरण होता है ताकि समान ऊर्जा वाले कक्षक बन सकें।
• संकरित कक्षकों का दिशात्मक गुण अधिक होने के कारण इनके बीच अतिव्यापन अधिक होता है, जिससे अधिक प्रबल बंध बनते हैं।
• कुछ यौगिकों के अणुओं को केवल एक लुईस संरचना से नहीं दर्शाया जा सकता, जिससे अनुनाद होता है और अणु का स्थायित्व बढ़ता है।
संयोजकता बंध सिद्धांत से सरलतम अणु (H2) के विरचन की व्याख्या –
मान लीजिए हाइड्रोजन के दो परमाणु A और B हैं, जिनके नाभिक क्रमशः NA और NB हैं और इलेक्ट्रॉन eA और eB हैं। जब ये परमाणु एक-दूसरे से बहुत दूर होते हैं, तो इनके बीच कोई क्रिया (Interaction) नहीं होती। जैसे-जैसे दोनों परमाणु एक-दूसरे के पास आते हैं, उनके बीच आकर्षण और प्रतिकर्षण बल उत्पन्न होते हैं।
आकर्षण बल निम्नलिखित स्पीशीज के बीच उत्पन्न होते हैं –
1. एक परमाणु के नाभिक तथा दूसरे परमाणु के इलेक्ट्रॉनों के बीच (NA - eB, NB - eA)
2. दोनों परमाणुओं के नाभिकों तथा दोनों परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के बीच (NA - eA, NB - eB)
प्रतिकर्षण बल निम्नलिखित स्पीशीज के बीच उत्पन्न होते हैं –
1. दोनों परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के बीच (eA - eB)
2. दोनों परमाणुओं के नाभिकों के बीच (NA - NB)
आकर्षण बल के कारण दोनों परमाणु पास आते हैं जबकि प्रतिकर्षण बल के कारण वे दूर होते हैं। प्रयोगों से पता चला है कि नए आकर्षण बलों का मान नए प्रतिकर्षण बलों के मान की तुलना में अधिक होता है। इसलिए दोनों परमाणु एक-दूसरे के पास आते हैं। इससे उनकी स्थितिज ऊर्जा में कमी होती है और अंत में एक ऐसी स्थिति आती है जहां नेट आकर्षण बल और प्रतिकर्षण बल बराबर हो जाते हैं, और निकाय की ऊर्जा न्यूनतम हो जाती है। इसी बिंदु पर दोनों हाइड्रोजन परमाणुओं के बीच एक बंध बन जाता है। हाइड्रोजन के दो परमाणुओं के बीच आबंध बनने पर ऊर्जा मुक्त होती है। इसी कारण हाइड्रोजन के अणु का स्थायित्व दो पृथक परमाणुओं की अपेक्षा अधिक होता है।
दो परमाणुओं के बीच आबंध बनने पर मुक्त ऊर्जा को आबंध एंथैल्पी या आबंध ऊर्जा कहते हैं, जो निम्न चित्र में न्यूनतम बिंदु पर है। हाइड्रोजन के एक मोल अणुओं के वियोजन के लिए 435.8 kJ ऊर्जा की आवश्यकता होती है। दो नाभिकों के बीच की न्यूनतम दूरी जो न्यूनतम ऊर्जा और अधिकतम स्थायित्व के संगत होती है, उसे आबंध लंबाई कहते हैं।
न्यूनतम स्थितिज ऊर्जा आरेख तब बनता है जब दो परमाणु एक-दूसरे के करीब आते हैं और उनकी स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि होती है तब कोई रासायनिक आबंध नहीं बनता है।
In simple words: VBT बताता है कि H2 अणु कैसे बनता है: दो हाइड्रोजन परमाणु पास आते हैं, उनके इलेक्ट्रॉन बादल ओवरलैप करते हैं। आकर्षण और प्रतिकर्षण बल काम करते हैं। जब अणु सबसे स्थिर अवस्था में होता है, तो एक बंध बन जाता है, और ऊर्जा निकलती है।
🎯 Exam Tip: H2 अणु का निर्माण संयोजकता बंध सिद्धांत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो बंध निर्माण में ऊर्जा परिवर्तन और अतिव्यापन की अवधारणाओं पर जोर देता है।
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 36. संयोजकता आबंध सिद्धान्त के आधार पर \(H_2\) - अणु के विरचन की व्याख्या कीजिए।
Answer:
संयोजकता आबंध सिद्धान्त:
संयोजकता आबंध सिद्धान्त को सबसे पहले हाइटलर और लंडन ने 1927 में दिया था. बाद में पॉलिंग और अन्य वैज्ञानिकों ने इसे और विकसित किया. यह सिद्धान्त परमाणुओं के कक्षकों, तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, कक्षकों के आपस में मिलने (अतिव्यापन), संकरण, और विचरण (Variation) व अध्यारोपण के नियमों पर आधारित है.
यहाँ हम संयोजकता बन्ध सिद्धान्त की मुख्य बातों को समझेंगे:
- यदि किसी परमाणु के पास अपनी सामान्य (मूल) अवस्था में पर्याप्त अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं हैं, तो इलेक्ट्रॉन ऊर्जा पाकर खाली कक्षकों में चले जाते हैं. इससे उसे बन्ध बनाने के लिए आवश्यक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन मिल जाते हैं.
- परमाणु कक्षकों के बीच जितना ज़्यादा अतिव्यापन होता है, बनने वाला बन्ध उतना ही मज़बूत होता है.
- कक्षकों के बीच अतिव्यापन की मात्रा इस बात पर भी निर्भर करती है कि कक्षक किस प्रकार के हैं (संकरित या असंकरित) और वे कैसे आपस में मिल रहे हैं.
- जब किसी परमाणु के बाहरी कोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अलग-अलग कक्षकों में होते हैं, जिनकी ऊर्जा अलग-अलग होती है, तो वे मिलकर समान ऊर्जा वाले कक्षक बनाते हैं. इसे संकरण कहते हैं.
- संकरित कक्षकों में एक निश्चित दिशा होने के कारण वे ज़्यादा अच्छे से अतिव्यापन करते हैं, जिससे ज़्यादा मज़बूत बन्ध बनते हैं.
- कुछ यौगिकों के अणुओं को सिर्फ एक लुइस संरचना से नहीं दिखाया जा सकता. ऐसे अणुओं में अनुनाद होता है, जिससे अणु और ज़्यादा स्थायी हो जाता है.
हम मान लेते हैं कि हाइड्रोजन के दो परमाणु \(A\) और \(B\) हैं. उनके नाभिक \(N_A\) और \(N_B\) हैं, और इलेक्ट्रॉन \(e_A\) और \(e_B\) हैं. जब ये दोनों परमाणु एक-दूसरे से बहुत दूर होते हैं, तो उनके बीच कोई क्रिया (Interaction) नहीं होती. जैसे-जैसे परमाणु पास आते हैं, उनके बीच आकर्षण और प्रतिकर्षण बल काम करने लगते हैं. आकर्षण बल निम्नलिखित स्थितियों में लगता है:
1. एक परमाणु के नाभिक और दूसरे परमाणु के इलेक्ट्रॉन के बीच, जैसे \(N_A\) - \(e_B\) और \(N_B\) - \(e_A\).
2. दोनों परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के बीच, जैसे \(e_A\) - \(e_B\).
प्रतिकर्षण बल निम्नलिखित स्थितियों में लगता है:
1. दोनों परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के बीच, जैसे \(e_A\) - \(e_B\).
2. दोनों परमाणुओं के नाभिकों के बीच, जैसे \(N_A\) - \(N_B\).
आकर्षण बल के कारण दोनों परमाणु पास आते हैं, जबकि प्रतिकर्षण बल उन्हें दूर धकेलता है. प्रयोगों से पता चला है कि नए आकर्षण बलों का मान नए प्रतिकर्षण बलों से ज़्यादा होता है. इस कारण दोनों परमाणु एक-दूसरे के पास आते हैं. इससे उनकी स्थितिज ऊर्जा कम होती जाती है और अंत में एक ऐसी स्थिति आती है जहाँ कुल आकर्षण और प्रतिकर्षण बल बराबर हो जाते हैं. इस बिंदु पर निकाय की ऊर्जा सबसे कम हो जाती है और दोनों हाइड्रोजन परमाणुओं के बीच बन्ध बन जाता है. हाइड्रोजन के दो परमाणुओं के बीच बन्ध बनने पर ऊर्जा निकलती है. इसी कारण हाइड्रोजन का अणु दो अलग-अलग परमाणुओं से ज़्यादा स्थायी होता है.
दो परमाणुओं के बीच बन्ध बनने पर निकलने वाली ऊर्जा को आबंध एंथैल्पी या आबंध ऊर्जा कहते हैं. यह नीचे दिए गए चित्र में सबसे कम ऊर्जा के संगत होती है. इसके विपरीत, हाइड्रोजन के एक मोल अणुओं को अलग करने के लिए 435.8 kJ ऊर्जा की ज़रूरत होती है. नाभिकों के बीच की सबसे कम दूरी, जो सबसे कम ऊर्जा और सबसे ज़्यादा स्थायित्व के संगत होती है, उसे आबंध लम्बाई कहते हैं.
न्यूनतम स्थितिज ऊर्जा आरेख दिखाता है कि जब दो परमाणु एक-दूसरे के पास आते हैं, तो उनकी स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है, लेकिन कोई रासायनिक बन्ध नहीं बनता.
उदाहरण:
जब दो हीलियम परमाणु एक-दूसरे के पास आते हैं तो प्रतिकर्षण बल, आकर्षण बल से ज़्यादा होता है. इससे निकाय की ऊर्जा बढ़ जाती है और वह अस्थायी हो जाता है. इसलिए हीलियम अणु (\(He_2\)) नहीं बनता है, क्योंकि इसके अणु का स्थायित्व बहुत कम होता है.
फॉस्फोरस में एक 3s, तीन 3p, और एक 3d कक्षक मिलकर पाँच \(sp^3d\) संकर कक्षक बनाते हैं. ये कक्षक त्रिकोणीय द्वि-पिरामिड के पाँच कोनों पर होते हैं. \(PCl_5\) में, फॉस्फोरस के ये पाँच \(sp^3d\) संकर कक्षक क्लोरीन परमाणुओं के आधे भरे हुए कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके पाँच P-Cl सिग्मा बन्ध बनाते हैं.
इनमें से तीन P-Cl बन्ध एक ही तल (विषुवतीय तल) में होते हैं और 120° का कोण बनाते हैं. इन्हें विषुवतीय आबंध कहते हैं. बाकी दो P-Cl बन्ध विषुवतीय तल के ऊपर और नीचे होते हैं, जो तल से 90° का कोण बनाते हैं. इन्हें अक्षीय आबंध कहते हैं.
अक्षीय आबंध कक्षक और विषुवतीय आबंध कक्षक के बीच की दूरी कम होने के कारण प्रतिकर्षण ज़्यादा होता है, जिससे अक्षीय आबन्ध की लम्बाई बढ़ जाती है. ये बन्ध विषुवतीय बन्धों की तुलना में कम मज़बूत होते हैं. इसी कारण \(PCl_5\) क्रियाशील होता है और गैसीय अवस्था में \(PCl_3\) और \(Cl_2\) में टूट जाता है: \(PCl_5 \rightarrow PCl_3 + Cl_2\).
मेथेन में कार्बन की उत्तेजित अवस्था (\(6C = 1s^2 2s^1 2px^1 2py^1 2pz^1\)) में एक s कक्षक और तीन p कक्षक मिलकर चार \(sp^3\) संकर कक्षक बनाते हैं. ये संकर कक्षक समान ऊर्जा और आकृति के होते हैं. ये \(sp^3\) संकर कक्षक चतुष्फलक के चार कोनों की ओर होते हैं और इनके बीच का कोण 109°28' होता है. कार्बन के ये चारों \(sp^3\) संकर कक्षक 4 हाइड्रोजन परमाणुओं के s कक्षकों के साथ मिलकर चार \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं.
2. \(C_2H_6\) (एथेन):
एथेन में दोनों कार्बन परमाणु \(sp^3\) संकरित अवस्था में होते हैं. हर कार्बन परमाणु के पास चार \(sp^3\) संकरित कक्षक होते हैं. कार्बन परमाणु के चार \(sp^3\) संकरित कक्षकों में से एक \(sp^3\) संकर कक्षक दूसरे कार्बन परमाणु के एक \(sp^3\) संकर कक्षक के साथ मिलकर \(\sigma\) बन्ध बनाता है. जबकि हर कार्बन परमाणु के बाकी तीन \(sp^3\) संकर कक्षक तीन हाइड्रोजन परमाणुओं के 1s कक्षकों के साथ मिलकर \(sp^3 - s\) \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं. इसमें C - C आबंध लम्बाई 154 Pm और C - H आबंध लम्बाई 109Pm होती है. HCH आबंध कोण 109°28' होता है.
3. हीरा:
हीरे में हर कार्बन परमाणु \(sp^3\) संकरित अवस्था में होता है. इसलिए हर कार्बन पर चार \(sp^3\) संकरित कक्षक होते हैं, जो अपने सबसे पास वाले कार्बन परमाणु के \(sp^3\) संकरित कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं. इस तरह हर कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से चतुष्फलकीय रूप से जुड़कर एक लंबी और जटिल 3D संरचना बनाता है. इसी कारण हीरा सबसे कठोर पदार्थ है और इसका गलनांक बहुत ऊँचा (लगभग 3500°C) होता है. हीरे में कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते, इसलिए यह बिजली का कुचालक होता है.
4. \(NH_3\):
\(NH_3\) में नाइट्रोजन परमाणु की मूल अवस्था का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^2 2s^2 2px^1 2py^1 2pz^1\) होता है. इसके एक s और तीन p कक्षक मिलकर चार \(sp^3\) संकर कक्षक बनाते हैं. इन \(sp^3\) संकर कक्षकों में से तीन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि चौथे \(sp^3\) संकर कक्षक में एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म (lone pair) होता है. नाइट्रोजन के तीन \(sp^3\) संकर कक्षक तीन हाइड्रोजन परमाणुओं के 1s कक्षकों के साथ मिलकर तीन N - H बन्ध बनाते हैं. एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म और बन्ध वाले इलेक्ट्रॉन युग्म के बीच का प्रतिकर्षण दो बन्ध वाले इलेक्ट्रॉन युग्मों की तुलना में ज़्यादा होता है. इस कारण \(NH_3\) में बन्ध कोण 109.5° से घटकर 107° हो जाता है और इसकी आकृति विकृत होकर त्रिकोणीय पिरामिडी हो जाती है. एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के कारण ही \(NH_3\) का द्विध्रुव आघूर्ण ज़्यादा होता है.
5. \(H_2O\):
\(H_2O\) में ऑक्सीजन की मूल अवस्था (\(8O = 2s^2 2px^2 2py^1 2pz^1\)) में एक s कक्षक और तीन p कक्षक मिलकर चार \(sp^3\) संकर कक्षक बनाते हैं. इनमें से दो संकर कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है, और बाकी दो संकर कक्षकों में एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं. ये चार \(sp^3\) संकर कक्षक चतुष्फलकीय ज्यामिति लेते हैं, जिसमें दो कोनों पर हाइड्रोजन परमाणु जुड़े होते हैं और बाकी दो कोनों पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं. एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म-एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण के कारण इसमें बन्ध कोण 109.5° से घटकर 104.5° हो जाता है, और अणु की आकृति कोणीय या V-आकृति की होती है.
यह समझना ज़रूरी है कि \(CH_4\), \(NH_3\), और \(H_2O\) तीनों में केंद्रीय परमाणु \(sp^3\) संकरित अवस्था में होते हैं. लेकिन इनमें इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या में अंतर के कारण इनकी ज्यामिति और बन्ध कोण अलग-अलग होते हैं. \(CH_4\) में चारों बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं, इसलिए इसकी आकृति सममित चतुष्फलकीय होती है और बन्ध कोण 109°28' होता है. \(NH_3\) में एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म और तीन बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं, इसलिए इसकी आकृति त्रिकोणीय पिरामिडी होती है और बन्ध कोण 107° (एकाकी युग्म - बन्ध युग्म प्रतिकर्षण के कारण) होता है. \(H_2O\) में दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म और दो बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं, इसलिए इसकी आकृति कोणीय या V-आकृति की होती है, और बन्ध कोण और भी कम होकर 104°28' रह जाता है (एकाकी युग्म - एकाकी युग्म प्रतिकर्षण के कारण).
\(sp^3\) संकरण के अन्य उदाहरण हैं – \(CCl_4\), \(SiCl_4\), \(NH_4^+\), \(BF_4^-\), \(SO_4^{2-}\), \(NF_3\), \(PCl_3\), \(Cl_2O\), \(OF_2\) तथा \([Ni(CO)_4]\).
(ii) त्रिकोणीय समतलीय अथवा \(sp^2\) संकरण:
\(sp^2\) संकरण को त्रिकोणीय संकरण भी कहते हैं. इस संकरण में एक s कक्षक और दो p कक्षक मिलकर तीन समान \(sp^2\) संकर कक्षक बनाते हैं. \(sp^2\) संकरित कक्षकों में 33% s लक्षण तथा 66% p लक्षण होते हैं.
उदाहरण:
1. \(BCl_3\) या \(BF_3\):
बोरॉन परमाणु की मूल अवस्था का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^2 2s^2 2p^1\) होता है. उत्तेजित अवस्था में एक 2s इलेक्ट्रॉन खाली 2p कक्षक में चला जाता है, जिससे बोरॉन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हो जाते हैं. ये तीन कक्षक (एक 2s तथा दो 2p कक्षक)
2. \(C_2H_4\) (एथिलीन या एथीन):
एथीन में कार्बन की उत्तेजित अवस्था में एक s कक्षक और दो p कक्षक मिलकर तीन \(sp^2\) संकर कक्षक बनाते हैं, और हर कार्बन पर एक असंकरित p कक्षक बच जाता है. एथीन बनने में एक कार्बन परमाणु का \(sp^2\) संकर कक्षक दूसरे कार्बन के \(sp^2\) संकर कक्षक से अक्षीय अतिव्यापन करके C - C \(\sigma\) बन्ध बनाता है. जबकि हर कार्बन परमाणु के बाकी दो \(sp^2\) संकर कक्षक हाइड्रोजन परमाणुओं के s कक्षकों के साथ मिलकर \(sp^2 - s\) \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं. एक कार्बन का असंकरित p कक्षक (2px या 2py) दूसरे कार्बन के समान कक्षक के साथ पार्श्वीय अतिव्यापन करके \(\pi\) बन्ध बनाता है. इसमें कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं के तल के ऊपर और नीचे दो समान इलेक्ट्रॉन बादल होते हैं. \(\pi\) बन्ध बनाने वाले असंकरित p कक्षक अणु की अक्ष के लम्बवत् होते हैं. एथीन में H - C - H और H - C - C बन्ध कोण क्रमशः 117.6° और 121° होता है. C = C बन्ध लम्बाई 134Pm और C - H बन्ध लम्बाई 109Pm होती है. एथीन अणु में \(\sigma\) और \(\pi\) बन्धों का बनना नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है –
3. ग्रेफाइट:
ग्रेफाइट में हर कार्बन परमाणु तीन कार्बन परमाणुओं के साथ सहसंयोजी बन्ध से जुड़ा होता है. इसमें हर कार्बन \(sp^2\) संकरित अवस्था में होता है और C - C - C बन्ध कोण 120° होता है. इस तरह सभी कार्बन परमाणु एक ही तल में जुड़कर षट्कोणीय वलय बनाते हैं. ये षट्कोणीय वलय आपस में जुड़कर एक परत बनाते हैं. \(sp^2\) संकरण के बाद हर कार्बन परमाणु पर एक असंकरित p कक्षक बच जाता है. एक परत के ये p कक्षक दूसरी परत के p कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके कमज़ोर बन्ध बनाते हैं, जिनकी बन्ध लम्बाई ज़्यादा (3.35Å) होती है. लेकिन एक ही परत में C - C बन्ध लम्बाई कम (1.42Å) होती है.
क्योंकि एक परत के सभी कार्बन दूसरी परत के सभी कार्बन परमाणुओं से बन्ध नहीं बनाते हैं, इसलिए इन बचे हुए कार्बन परमाणुओं के p इलेक्ट्रॉन मुक्त रहते हैं, जिनके कारण बिजली का प्रवाह आसानी से होता है. इसी कारण ग्रेफाइट बिजली का सुचालक है. ग्रेफाइट की दो परतों के बीच कमज़ोर बन्ध होने के कारण थोड़ा सा बल लगाने पर ही ये आसानी से टूट जाती हैं, और एक परत दूसरी परत पर फिसल जाती है. इसी कारण ग्रेफाइट मुलायम होता है.
\(sp^2\) संकरण के अन्य उदाहरण हैं – \(SO_3\), \(SnCl_2\), \(SO_2\), \(CH_3^+\), \(CO_3^{2-}\), \(NO_2^-\) तथा \(C_6H_6\).
(iii) त्रिकोणीय द्वि-पिरामिडी अथवा \(sp^3d\) संकरण:
इस संकरण में एक s कक्षक, तीन p कक्षक और एक d कक्षक मिलकर पाँच \(sp^3d\) संकर कक्षक बनाते हैं. ये कक्षक त्रिकोणीय द्वि-पिरामिड की ज्यामिति में होते हैं. \(sp^3d\) संकर कक्षकों में 20% s लक्षण, 60% p लक्षण और 20% d लक्षण होते हैं. इन संकरित कक्षकों के बीच बन्ध कोण 120° और 90° होता है, जिसके कारण मज़बूत बन्ध बनते हैं.
उदाहरण:
1. \(BeCl_2\):
बेरिलियम की मूल अवस्था (Ground State) में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^2 2s^2\) होता है. उत्तेजित अवस्था में एक 2s इलेक्ट्रॉन खाली 2p कक्षक में चला जाता है. एक 2s कक्षक और एक 2p कक्षक संकरित होकर दो sp संकर कक्षक बनाते हैं, जो आपस में 180° का कोण बनाते हैं. हर sp संकर कक्षक क्लोरीन के 2p कक्षक से अक्षीय अतिव्यापन करके दो Be - Cl \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं.
2. \(CO_2\):
\(CO_2\) में कार्बन की उत्तेजित अवस्था (\(6C = 1s^2 2s^1 2px^1 2py^1 2pz^1\)) में 2s और एक 2p कक्षक संकरित होकर दो sp संकर कक्षक बनाते हैं. ये दो sp संकरित कक्षक दो ऑक्सीजन परमाणुओं के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले 2py कक्षकों से अलग-अलग अतिव्यापन करके दो \(\sigma\) बन्ध बनाते हैं. कार्बन परमाणु पर बचे हुए दो असंकरित कक्षक, जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, दोनों ऑक्सीजन परमाणुओं के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले 2pz कक्षकों से अलग-अलग पार्श्वीय अतिव्यापन करके दो \(\pi\) बन्ध बनाते हैं. लेकिन \(CO_2\) की ज्यामिति भी रेखीय होती है और बन्ध कोण का मान 180° होता है.
3. \(C_2H_2\) (एथाइन):
एथाइन में दो कार्बन परमाणुओं के बीच त्रिक-आबन्ध होता है, जिसमें एक \(\sigma\) और दो \(\pi\) बन्ध होते हैं. एथाइन में हर कार्बन रेखीय ज्यामिति दिखाता है और बन्ध कोण 180° होता है.
एथाइन में \(\sigma\) बन्ध के चारों ओर दो \(\pi\) बन्धों के इलेक्ट्रॉन बादल बेलनाकार आकृति में होते हैं. \(sp\) संकरण के अन्य उदाहरण हैं – \(CO\), \(HgCl_2\), \(CdCl_2\), \([Ag(CN)_2]\).
In simple words: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त बताता है कि परमाणु कक्षक कैसे मिलकर बन्ध बनाते हैं. यह सिद्धान्त अणुओं की आकृति, बन्ध कोण और स्थायित्व को समझने में मदद करता है. \(H_2\) अणु में दो हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के पास आकर ऊर्जा कम करते हैं और एक मजबूत बन्ध बनाते हैं.
🎯 Exam Tip: जब भी आपको किसी अणु की संरचना या बन्ध के बारे में पूछा जाए, तो उसके केंद्रीय परमाणु के संकरण को स्पष्ट रूप से समझाएं. उदाहरणों और चित्रों का उपयोग करें.
Question 39. अणु कक्षक सिद्धान्त क्या है? समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं के आणविक कक्षकों का ऊर्जा स्तर समझाते हुए निम्नलिखित श्रेणी के बढ़ते हुए स्थायित्व को समझाइए।
\(O_2^{2-} < O_2^- < O_2 < O_2^+\)
Answer:
अणु कक्षक सिद्धान्त:
संयोजकता बन्ध सिद्धान्त की कमियों को दूर करने के लिए हुंड और मुलिकन ने 1932 में आणविक कक्षक सिद्धान्त दिया था, जो परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन पर आधारित है. आणविक कक्षक सिद्धान्त के अनुसार, परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन से आणविक कक्षक बनते हैं, और परमाणु कक्षक अपनी पहचान खो देते हैं, जबकि संयोजकता बन्ध सिद्धान्त में बन्ध बनने के बाद भी परमाणु अपनी पहचान बनाए रखते हैं.
आणविक कक्षक सिद्धान्त के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. बनने वाले आण्विक कक्षकों की संख्या संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों की संख्या के बराबर होती है. आण्विक कक्षक दो प्रकार के होते हैं – 'आबंधन आण्विक कक्षक' (जो बन्ध बनाने में मदद करते हैं) और 'प्रतिआबंधन आण्विक कक्षक' (जो बन्ध को कमज़ोर करते हैं).
2. आबंधन आण्विक कक्षकों की ऊर्जा प्रतिआबंधन आण्विक कक्षकों की ऊर्जा से कम होती है, इसलिए आबंधन आण्विक कक्षक ज़्यादा स्थायी होते हैं.
3. आण्विक कक्षकों की आकृति संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों की आकृति पर निर्भर करती है.
4. जैसे किसी परमाणु में नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन के मिलने की संभावना परमाणु कक्षक से दिखाई जाती है, वैसे ही किसी अणु में नाभिकों के समूह के चारों ओर इलेक्ट्रॉन के मिलने की संभावना आण्विक कक्षक से दिखाई जाती है.
5. परमाणु कक्षकों की तरह, आण्विक कक्षकों में भी पाउली के नियम और हुंड के नियम के अनुसार इलेक्ट्रॉन भरे जाते हैं.
आण्विक कक्षकों का ऊर्जा स्तर आरेख:
दो परमाणुओं में उपस्थित 1s परमाणु कक्षकों के संयोग से दो आण्विक कक्षक बनते हैं, जिन्हें \(\sigma 1s\) और \(\sigma^* 1s\) कहते हैं. इसी प्रकार दो परमाणुओं के 2s और 2p कक्षकों (कुल 8 कक्षक) के मिलने से आठ आण्विक कक्षक बनते हैं:
आबंधन आण्विक कक्षक: \(\sigma 2s\), \(\sigma 2pz\), \(\pi 2px\), \(\pi 2py\)
प्रतिआबंधन आण्विक कक्षक: \(\sigma^* 2s\), \(\sigma^* 2pz\), \(\pi^* 2px\), \(\pi^* 2py\)
आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का क्रम प्रयोगों द्वारा स्पेक्ट्रमी विधियों से पता चलता है.
द्वितीय आवर्त के तत्वों के समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं जैसे \(O_2\), \(F_2\) के आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार होता है –
\(\sigma 1s < \sigma^* 1s < \sigma 2s < \sigma^* 2s < \sigma 2pz < (\pi 2px = \pi 2py) < (\pi^* 2px = \pi^* 2py) < \sigma^* 2pz\)
द्वितीय आवर्त के बाकी अणुओं जैसे (\(Li_2\), \(Be_2\), \(B_2\), \(C_2\), तथा \(N_2\)) के लिए उपरोक्त क्रम में थोड़ा बदलाव होता है, और \(\sigma 2pz\) की ऊर्जा \(\pi 2px\) तथा \(\pi 2py\) से ज़्यादा होती है. इसलिए इनका क्रम निम्न प्रकार है –
\(\sigma 1s < \sigma^* 1s < \sigma 2s < \sigma^* 2s < (\pi 2px = \pi 2py) < \sigma 2pz < (\pi^* 2px = \pi^* 2py) < \sigma^* 2pz\)
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि \(\pi 2px\) तथा \(\pi 2py\) की ऊर्जा समान होती है, इसलिए इन्हें समभ्रंश कक्षक कहते हैं. इसी प्रकार \(\pi^* 2px\) तथा \(\pi^* 2py\) की ऊर्जा भी समान होती है, इसलिए ये भी समभ्रंश कक्षक होते हैं.
\(Li_2\) से \(N_2\) तक के आण्विक कक्षकों में \(\pi 2px\) तथा \(\pi 2py\) कक्षकों की ऊर्जा \(\sigma 2pz\) कक्षक से कम होती है. इसका संभावित कारण यह है कि इनमें \(\sigma 2s\) और \(\sigma 2pz\) कक्षकों की ऊर्जा में इतना कम अंतर होता है कि वे एक-दूसरे के साथ मिलकर संकरित होने लगते हैं, जिससे \(\sigma 2s\) शुद्ध \(\sigma 2s\) कक्षक नहीं रहता, जबकि \(\sigma 2p\) कक्षक शुद्ध \(\sigma 2p\) कक्षक नहीं रह पाता. इससे कक्षकों की ऊर्जा तो उम्मीद से कम हो जाती है, जबकि \(\sigma 2pz\) कक्षक की ऊर्जा उम्मीद से कुछ ज़्यादा हो जाती है. ऐसा होने पर \(\sigma 2pz\) कक्षक की ऊर्जा \(\pi 2px\) और \(\pi 2py\) कक्षकों की ऊर्जा की तुलना में कुछ ज़्यादा हो जाती है. इसलिए आवर्त के शुरुआती (\(N_2\) तक के) तत्वों का ऊर्जा स्तर आरेख आगे दिया गया है –
\(N_2\) के बाद वाले सरल द्विपरमाणुक अणुओं (\(O_2\), \(F_2\)) का ऊर्जा स्तर आरेख निम्न प्रकार होता है –
उपरोक्त ऊर्जा स्तर आरेख के आधार पर \(O_2\) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा –
\(O_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 = (\pi^* 2py)^1\)
या \(O_2 = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 = (\pi^* 2py)^1\)
तथा आबन्ध कोटि \( = \frac {1}{2} (Nb - Na)\)
\( = \frac {1}{2} (10-6) = 2\)
अतः \(O_2\) अणु में ऑक्सीजन परमाणु एक द्वि-आबंध द्वारा जुड़े होते हैं. ऑक्सीजन अणु के \(\pi^* 2px\) तथा \(\pi^* 2py\) आण्विक कक्षकों में एक-एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, इसलिए ऑक्सीजन अणु अनुचुम्बकीय होना चाहिए, और यह प्रायोगिक तौर पर भी ऐसा ही पाया जाता है. इस प्रकार आण्विक कक्षक सिद्धान्त से ऑक्सीजन के अनुचुम्बकीय व्यवहार की व्याख्या की जा सकती है, जिसे संयोजकता बन्ध सिद्धान्त के आधार पर नहीं समझाया जा सका था.
\(O_2\) के आयन:
1. \(O_2^+\) आयन:
यदि \(O_2\) अणु में से एक इलेक्ट्रॉन कम कर दिया जाए, तो \(O_2^+\) आयन बनेगा. स्वाभाविक है कि वह इलेक्ट्रॉन उसके \(\pi\) - प्रतिआबंधन बन्धी कक्षक में से निकलेगा, और तब उसका विन्यास निम्न प्रकार हो जाएगा – \(KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1\)
अतः बन्ध क्रम \( = \frac {10-5}{2} = 2.5\)
यह \(O_2\) से अधिक स्थायी होता है, और इसकी बन्ध लम्बाई का मान \(O_2\) से कम हो जाता है. इसके अतिरिक्त \(O_2\) अणु में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है.
2. \(O_2^-\) आयन:
यदि \(O_2\) अणु में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ दिया जाए, तो \(O_2^-\) आयन बनता है, और इसका बन्ध क्रम एक ही रह जाएगा. विपरीत बन्धी कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाने से \(O_2^-\) का स्थायित्व और भी कम हो जाएगा. इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होता है –
\(KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2\)
अतः बन्ध क्रम \( = \frac {10-7}{2} = 1.5\)
अर्थात् इसका बन्ध क्रम \(O_2\) अणु से कम होता है, इसलिए इसकी बन्ध दूरी का मान \(O_2\) से अधिक हो जाता है. इसके अतिरिक्त, विपरीत बन्धी कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है, इसलिए \(O_2^-\) का स्थायित्व \(O_2\) से कम हो जाता है, और यह भी अनुचुम्बकीय ही है.
3. \(O_2^{2-}\) आयन:
\(O_2^{2-}\) आयन में एक और इलेक्ट्रॉन जोड़ दिया जाए, तो \(O_2^{2-}\) आयन बनता है, और इसका बन्ध क्रम एक ही रह जाएगा. विपरीत बन्धी कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाने से \(O_2^{2-}\) का स्थायित्व और भी कम हो जाएगा. इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होता है –
\(KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2\)
अतः बन्ध क्रम \( = \frac {10-8}{2} = 1\)
\(O_2^{2-}\) में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होने के कारण यह प्रतिचुम्बकीय होता है.
अतः \(O_2\) तथा इसके विभिन्न आयनों की तुलना निम्न प्रकार है –
स्थायित्व का क्रम – \(O_2^+ > O_2 > O_2^- > O_2^{2-}\)
बन्ध एंथैल्पी का क्रम – \(O_2^+ > O_2 > O_2^- > O_2^{2-}\)
बन्ध लम्बाई का क्रम – \(O_2^+ < O_2 < O_2^- < O_2^{2-}\)
बन्ध क्रम का क्रम – \(O_2^+ (2.5) > O_2 (2) > O_2^- (1.5) > O_2^{2-} (1)\)
In simple words: अणु कक्षक सिद्धान्त बताता है कि परमाणु कक्षक मिलकर नए अणु कक्षक कैसे बनाते हैं. यह सिद्धान्त अणुओं के स्थायित्व, बन्ध लम्बाई और चुंबकीय गुणों को समझने में मदद करता है. \(O_2^+\) सबसे ज़्यादा स्थायी होता है क्योंकि इसमें सबसे ज़्यादा बन्ध होते हैं, जबकि \(O_2^{2-}\) सबसे कम स्थायी होता है क्योंकि इसमें सबसे कम बन्ध होते हैं.
🎯 Exam Tip: विभिन्न आण्विक आयनों के स्थायित्व, बन्ध क्रम, और चुंबकीय गुणों की तुलना करते समय, हमेशा उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर ध्यान दें. अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने पर अणु अनुचुंबकीय होता है.
Question 40. आबंध कोटि से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में आबंध कोटि का परिकलन कीजिए।
\(N_2\), \(C_2\), \(H_2\), \(N_2^-\)
Answer:
आबंध कोटि:
बन्ध बनाने वाले आण्विक कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\(N_b\)) और बन्ध तोड़ने वाले आण्विक कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\(N_a\)) के अंतर के आधे को आबंध कोटि कहते हैं.
आबंध कोटि \( = \frac{1}{2} (N_b - N_a)\)
आण्विक कक्षकों का ऊर्जा स्तर आरेख:
हम पढ़ चुके हैं कि दो परमाणुओं में उपस्थित 1s परमाणु कक्षकों के संयोग से दो आण्विक कक्षक बनते हैं, जिन्हें \(\sigma 1s\) और \(\sigma^* 1s\) कहते हैं. इसी प्रकार, दो परमाणुओं के 2s और 2p कक्षकों (कुल 8 कक्षक) के मिलने से आठ आण्विक कक्षक बनते हैं –
आबंधन आण्विक कक्षक: \(\sigma 2s\), \(\sigma 2pz\), \(\pi 2px\), \(\pi 2py\)
प्रतिआबंधन आण्विक कक्षक: \(\sigma^* 2s\), \(\sigma^* 2pz\), \(\pi^* 2px\), \(\pi^* 2py\)
आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का क्रम प्रयोगों द्वारा स्पेक्ट्रमी विधियों से पता चलता है.
द्वितीय आवर्त के तत्वों के समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं जैसे \(O_2\), \(F_2\) के आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार होता है –
\(\sigma 1s < \sigma^* 1s < \sigma 2s < \sigma^* 2s < \sigma 2pz < (\pi 2px = \pi 2py) < (\pi^* 2px = \pi^* 2py) < \sigma^* 2pz\)
\(Li_2\) से \(N_2\) तक के आण्विक कक्षकों में \(\pi 2px\) तथा \(\pi 2py\) कक्षकों की ऊर्जा \(\sigma 2pz\) कक्षक से कम होती है. इसका संभावित कारण यह है कि इनमें \(\sigma 2s\) और \(\sigma 2pz\) कक्षकों की ऊर्जा में इतना कम अंतर होता है कि वे एक-दूसरे के साथ मिलकर संकरित होने लगते हैं, जिससे \(\sigma 2s\) शुद्ध \(\sigma 2s\) कक्षक नहीं रहता, जबकि \(\sigma 2p\) कक्षक शुद्ध \(\sigma 2p\) कक्षक नहीं रह पाता. इससे \(\sigma\) कक्षकों की ऊर्जा तो उम्मीद से कम हो जाती है, जबकि \(\sigma 2pz\) कक्षक की ऊर्जा उम्मीद से कुछ ज़्यादा हो जाती है. ऐसा होने पर \(\sigma 2pz\) कक्षक की ऊर्जा \(\pi 2px\) और \(\pi 2py\) कक्षकों की ऊर्जा की तुलना में कुछ ज़्यादा हो जाती है. इसलिए आवर्त के शुरुआती (\(N_2\) तक के) तत्वों का ऊर्जा स्तर आरेख आगे दिया गया है –
\(N_2\) के बाद वाले सरल द्विपरमाणुक अणुओं (\(O_2\), \(F_2\)) का ऊर्जा स्तर आरेख निम्न प्रकार होता है –
\(N_2\):
नाइट्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^2 2s^2 2px^1 2py^1 2pz^1\) होता है.
ऊर्जा स्तर आरेख के आधार पर \(N_2\) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\((\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\sigma 2pz)^2\)
तथा आबन्ध कोटि \( = \frac{1}{2} (N_b - N_a) = \frac{1}{2} (10 - 4) = 3\)
अतः दो नाइट्रोजन परमाणुओं के मध्य एक \(\sigma\) तथा दो \(\pi\) बन्ध होते हैं. \(N_2\) अणु में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए इसकी प्रकृति प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) होती है.
\(C_2\):
कार्बन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^2 2s^2 2p^2\) होता है. \(C_2\) के अणु में कुल 12 इलेक्ट्रॉन होते हैं. इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न होगा:
\((\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2\)
तथा आबन्ध कोटि \( = \frac{1}{2} (N_b - N_a) = \frac{1}{2} (8 - 4) = 2\)
इसका ऊर्जा स्तर आरेख से पता चलता है कि \(C_2\) में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए इसे प्रतिचुम्बकीय होना चाहिए. वास्तव में, वाष्प अवस्था में \(C_2\) प्रतिचुम्बकीय होता है, और \(C_2\) के अणुओं में दोनों आबन्ध \(\pi\) - आबन्ध होते हैं, क्योंकि दोनों \(\pi\) आबंधन आण्विक कक्षकों में चार इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, जबकि सामान्यतः अणुओं में द्वि-आबंध एक \(\sigma\) तथा एक \(\pi\) आबन्ध से बना होता है.
\(H_2\):
हाइड्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \(1s^1\) होता है. \(H_2\) अणु में कुल 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: \((\sigma 1s)^2\)
आबन्ध कोटि \( = \frac{1}{2} (N_b - N_a) = \frac{1}{2} (2 - 0) = 1\)
अतः \(H_2\) अणु में एकल बन्ध होता है. इसमें कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) होता है.
\(N_2^-\):
\(N_2\) अणु में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर \(N_2^-\) आयन बनता है. \(N_2\) में कुल 14 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए \(N_2^-\) में 15 इलेक्ट्रॉन होंगे.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
\((\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi^* 2px)^1\)
आबन्ध कोटि \( = \frac{1}{2} (N_b - N_a) = \frac{1}{2} (10 - 5) = 2.5\)
\(N_2^-\) में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (\(\pi^* 2px\)) है, इसलिए यह अनुचुम्बकीय (Paramagnetic) होता है.
| \(B_2\) | \(C_2\) | \(N_2\) | \(O_2\) | \(F_2\) | \(Ne_2\) | |
|---|---|---|---|---|---|---|
| आबंध कोटि | 1 | 2 | 3 | 2 | 1 | 0 |
| चुंबकीय गुण | अनुचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | अनुचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | - |
| संयोजी कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^1 (\pi 2py)^1\) | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2\) | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\sigma 2pz)^2\) | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 (\pi^* 2py)^1\) | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2\) | \((\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2 (\sigma^* 2pz)^2\) |
स्थायित्व का बढ़ता क्रम: \(O_2^{2-} < O_2^- < O_2 < O_2^+\)
इस क्रम में, \(O_2^+\) की आबंध कोटि 2.5 है, \(O_2\) की 2 है, \(O_2^-\) की 1.5 है, और \(O_2^{2-}\) की 1 है. आबंध कोटि जितनी ज़्यादा होती है, अणु उतना ही ज़्यादा स्थायी होता है, इसलिए यह क्रम सही है.
In simple words: आबंध कोटि बताती है कि दो परमाणुओं के बीच कितने रासायनिक बन्ध हैं. ज़्यादा बन्ध मतलब ज़्यादा मज़बूत और स्थायी अणु. \(N_2\) की आबंध कोटि 3 है, \(C_2\) की 2 है, \(H_2\) की 1 है, और \(N_2^-\) की 2.5 है.
🎯 Exam Tip: आबंध कोटि की गणना के लिए हमेशा सही आण्विक कक्षक ऊर्जा स्तर आरेख का उपयोग करें और इलेक्ट्रॉनों को भरने के नियमों का पालन करें. यह सुनिश्चित करेगा कि आप \(N_b\) और \(N_a\) को सही ढंग से गिनें.
Question 40. आबंध कोटि से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में आबंध कोटि का परिकलन कीजिए। N2, C2, H2, N2-
Answer: आण्विक कक्षकों का ऊर्जा स्तर आरेख:
हमें पता है कि जब दो परमाणुओं के \( 1s \) परमाणु कक्षक आपस में मिलते हैं, तो दो नए आण्विक कक्षक बनते हैं। इन्हें \( \sigma 1s \) और \( \sigma^* 1s \) कहते हैं। इसी तरह, दो परमाणुओं के \( 2s \) और \( 2p \) कक्षक (कुल 8 कक्षक) मिलकर आठ नए आण्विक कक्षक बनाते हैं। ये कक्षक इस प्रकार होते हैं:
बन्धी आण्विक कक्षकः \( \sigma 2s, \sigma 2pz, \pi 2px, \pi 2py \)
विपरीत बन्धी आण्विक कक्षकः \( \sigma^* 2s, \sigma^* 2pz, \pi^* 2px, \pi^* 2py \)
आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का क्रम-आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का सही क्रम प्रयोगों द्वारा ज्ञात किया जाता है।
दूसरे आवर्त के तत्वों जैसे \( O_2 \) और \( F_2 \) के द्विपरमाणुक अणुओं के लिए आण्विक कक्षकों की ऊर्जा का बढ़ता क्रम यह होता है:
\( \sigma 1s < \sigma^* 1s < \sigma 2s < \sigma^* 1s < \sigma 2pz < (\pi 2px = \pi 2py) < (\pi^* 2px = \pi^* 2py) < \sigma^* 2pz \)
लेकिन, दूसरे आवर्त के कुछ अन्य अणु जैसे \( Li_2, Be_2, B_2, C_2, \) और \( N_2 \) के लिए यह क्रम थोड़ा अलग होता है। इन अणुओं में \( \sigma 2pz \) कक्षक की ऊर्जा \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों से ज़्यादा होती है, इसलिए इनका क्रम इस तरह है:
\( \sigma 1s < \sigma^* 1s < \sigma 2s < \sigma^* 2s < (\pi 2px = \pi 2py) < \sigma 2pz < (\pi^* 2px = \pi^* 2py) < \sigma^* 2pz \)
यह समझना महत्वपूर्ण है कि \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों की ऊर्जा एक समान होती है, इसलिए इन्हें समभ्रंश कक्षक कहते हैं। इसी तरह, \( \pi^* 2px \) और \( \pi^* 2py \) कक्षकों की ऊर्जा भी एक समान होती है।
\( Li_2 \) से \( N_2 \) तक के अणुओं में, \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों की ऊर्जा \( \sigma 2pz \) कक्षक से कम होती है। इसका कारण यह है कि \( \sigma 2s \) और \( \sigma 2pz \) कक्षकों की ऊर्जा में बहुत कम अंतर होता है, जिससे वे आपस में मिल जाते हैं और संकरित हो जाते हैं। इससे \( \sigma 2s \) शुद्ध \( \sigma 2s \) कक्षक नहीं रह पाता, और \( \sigma 2p_z \) कक्षक भी शुद्ध नहीं रह पाता। इस मिश्रण के कारण, कक्षकों की ऊर्जा कम हो जाती है, जबकि \( \sigma 2pz \) कक्षक की ऊर्जा थोड़ी बढ़ जाती है। इसलिए \( \sigma 2pz \) कक्षक की ऊर्जा \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों की तुलना में कुछ अधिक हो जाती है। अतः, आवर्त सारणी के शुरुआती तत्वों \( (N_2 \) तक) के लिए ऊर्जा स्तर का आरेख इस प्रकार होता है –
यह आरेख \( N_2 \) जैसे छोटे अणुओं के लिए आण्विक कक्षकों के ऊर्जा स्तरों को दिखाता है, जहाँ \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों की ऊर्जा \( \sigma 2pz \) कक्षक से कम होती है।
\( N_2 \) के बाद वाले सरल द्विपरमाणुक अणुओं (\( O_2, F_2 \)) का ऊर्जा स्तर आरेख निम्न प्रकार होता है –
यह आरेख \( O_2 \) और \( F_2 \) जैसे बड़े अणुओं के लिए आण्विक कक्षकों के ऊर्जा स्तरों को दर्शाता है, जहाँ \( \sigma 2pz \) कक्षक की ऊर्जा \( \pi 2px \) और \( \pi 2py \) कक्षकों से कम होती है।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और आण्विक व्यवहार:
विभिन्न आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के बंटवारे को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों को आण्विक कक्षकों की बढ़ती हुई ऊर्जा के क्रम में भरा जाता है। किसी अणु के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से उसकी स्थिरता, आबंध कोटि, आबन्ध लम्बाई और चुंबकीय प्रकृति के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलती हैं –
1. अणुओं का स्थायित्वः
अगर बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या \( (N_b) \) विपरीत बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या \( (N_a) \) से ज़्यादा हो, तो अणु स्थिर होता है।
यदि \( N_b > N_a \), तो अणु स्थायी होगा क्योंकि बन्धी इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होने से बंध का प्रभाव मजबूत होता है।
यदि \( N_a > N_b \), तो अणु अस्थायी होगा क्योंकि विपरीत बन्धी इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होने से अणु अस्थिर हो जाता है।
2. आबंध कोटि या बन्ध क्रमः
आबंध कोटि, बन्धी और विपरीत बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या के अंतर का आधा होती है।
आबंध कोटि \( = \frac {1}{2} (N_b - N_a) \)
यहाँ, \( N_b = \) बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या और \( N_a = \) विपरीत बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या।
यदि आबंध कोटि का मान ऋणात्मक या शून्य हो, तो अणु अस्थायी होगा। बंध क्रम बढ़ने पर अणु की स्थिरता बढ़ती है।
3. आबंध – लम्बाई:
किसी अणु में दो परमाणुओं के बीच की आबंध कोटि, आबंध लम्बाई का अनुमान लगाने में मदद करती है। आबंध लम्बाई, आबंध कोटि के उलटी होती है। यानी, आबंध कोटि बढ़ने पर आबंध लम्बाई कम हो जाती है।
आबंध कोटि \( \propto \) आबन्ध सामर्थ्य \( \propto \) आबन्ध ऊर्जा \( \propto \frac {1}{ आबन्ध~लम्बाई } \)
4. चुम्बकीय प्रकृतिः
अगर किसी अणु के सभी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉन जोड़े में हों, तो वह अणु प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) होता है और चुंबकीय क्षेत्र से दूर भागता है। लेकिन अगर एक या अधिक आण्विक कक्षकों में अकेले इलेक्ट्रॉन हों, तो वह अणु अनुचुम्बकीय (Paramagnetic) होता है और चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होता है।
समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं में आबंधनः
अब हम कुछ समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं में आबंधन को समझेंगे।
1. हाइड्रोजन अणु (\( H_2 \)):
\( H_2 \) अणु दो हाइड्रोजन परमाणुओं के मिलने से बनता है। हर हाइड्रोजन परमाणु के \( 1s \) कक्षक में एक इलेक्ट्रॉन होता है। इसलिए \( H_2 \) अणु में कुल दो इलेक्ट्रॉन होंगे, जो \( \sigma 1s \) आण्विक कक्षक में होते हैं। अतः \( H_2 \) अणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह होगा:
\( H_2 = (\sigma 1s)^2 \)
आबंध कोटि \( = \frac {2-0}{2} = 1 \)
इसका मतलब है कि हाइड्रोजन के दो परमाणु एक-एक बंध से जुड़े होते हैं। \( H_2 \) अणु की वियोजन ऊर्जा \( 438~kJ~mol^{-1} \) है और \( H – H \) बंध की लम्बाई \( 74~pm \) होती है। चूंकि \( H_2 \) में कोई अकेला इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय होता है।
हाइड्रोजन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से \( \sigma 1s \) और \( \sigma^* 1s \) आण्विक कक्षक बनते हैं।
\( H_2^+ \) आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( = (\sigma 1s)^1 \) होता है और इसका बंध क्रम \( = \frac {1}{2} [1-0] = \frac {1}{2} \) होगा। इसमें अकेला इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है।
2. हीलियम अणुः
हीलियम परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 \) होता है। इसलिए \( He_2 \) अणु में कुल चार इलेक्ट्रॉन होंगे।
ये इलेक्ट्रॉन \( \sigma 1s \) और \( \sigma^* 1s \) आण्विक कक्षकों में भरे जाएंगे। अतः \( He_2 \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह होगा:
\( He_2: (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 \)
\( He_2 \) की आबंध कोटि \( = \frac {1}{2} (2-2) = 0 \)
चूंकि \( He_2 \) के लिए आबंध कोटि शून्य है, इसलिए यह अणु अस्थायी होता है और इसका कोई अस्तित्व नहीं होता।
हीलियम अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से \( \sigma 1s \) और \( \sigma^* 1s \) आण्विक कक्षक बनते हैं।
\( He_2^+ \) आयन या \( H – He \) अणु में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^1 \) होगा और बंध क्रम \( = \frac {1}{2} [2-1] = \frac {1}{2} \) होगा। इसलिए ये \( He_2 \) से ज़्यादा स्थिर होते हैं और इनमें एक अकेला इलेक्ट्रॉन होने के कारण ये अनुचुम्बकीय होते हैं।
3. लीथियम अणुः
लीथियम परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^1 \) होता है। इसलिए \( Li_2 \) अणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( Li_2: (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 \)
इस विन्यास को \( KK (\sigma 2s)^2 \) द्वारा भी दिखाया जा सकता है। यहाँ \( KK \) का मतलब है कि अंदरूनी \( K \) कोश (यानी \( (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 \)) बंध बनाने में भाग नहीं लेते हैं।
\( Li_2 \) अणु के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से पता चलता है कि इसमें चार इलेक्ट्रॉन बन्धी आण्विक कक्षकों में और दो इलेक्ट्रॉन विपरीत बन्धी आण्विक कक्षक में होते हैं। अतः इसकी आबंध कोटि \( = \frac {1}{2} (4-2) = 1 \) होगी। इसलिए \( Li_2 \) अणु स्थिर होता है। चूंकि इसमें कोई अकेला इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय होता है और प्रयोगों से भी पता चला है कि गैसीय अवस्था में \( Li_2 \) अणु का अस्तित्व होता है।
लीथियम अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s \) और \( 2s \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
4. \( Be_2 \) अणु:
बेरिलियम परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^2 \) होता है। दो \( Be \) परमाणुओं के कुल 8 इलेक्ट्रॉनों से \( Be_2 \) का अणु बनेगा। इसका ऊर्जा स्तर आरेख इस प्रकार होता है:
\( Be_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 \)
अतः बंध क्रम \( = \frac {1}{2} [4-4] = 0 \)
शून्य बंध क्रम का मतलब है कि बेरिलियम के दो परमाणुओं के बीच कोई सहसंयोजक बंध नहीं बनता है। \( He_2 \) की तरह, \( Be_2 \) अणु का भी कोई अस्तित्व नहीं होता।
बेरिलियम अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s \) और \( 2s \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
5. \( B_2 \) अणु:
बोरॉन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^2, 2p^1 \) होता है। अतः हर बोरॉन परमाणु के पास 5 इलेक्ट्रॉन होते हैं। \( B_2 \) अणु का ऊर्जा स्तर आरेख के आधार पर इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह होगा:
\( B_2 = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^1 (\pi 2py)^1 \)
अतः बंध क्रम \( = \frac {1}{2} [6 – 4] = 1 \)
इसका मतलब है कि दो बोरॉन परमाणुओं के बीच एक \( \pi – \) बंध होता है क्योंकि \( \pi – \) बन्धी आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसलिए इसका अणु सूत्र \( B – B \pi \) होता है। \( B_2 \) अणु में दो अकेले इलेक्ट्रॉन हैं, अतः इसकी प्रकृति अनुचुंबकीय होती है।
बोरॉन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s, 2s \) और \( 2p \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
6. \( C_2 \) अणु:
कार्बन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^2 2p^2 \) होता है। अतः \( C_2 \) के अणु में कुल \( 12 \) इलेक्ट्रॉन होंगे। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( C_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2Px)^2 = (\pi 2Py)^2 \)
या \( KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2Px)^2 = (\pi 2Py)^2 \)
आबंध कोटि \( = \frac {1}{2} (8-4) = 2 \)
\( C_2 \) अणु का ऊर्जा स्तर आरेख से पता चलता है कि इसमें कोई अकेला इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय होना चाहिए और वास्तव में गैसीय अवस्था में \( C_2 \) प्रतिचुम्बकीय होता है। \( C_2 \) के अणुओं में दोनों बंध पाई – बंध होते हैं, क्योंकि दोनों \( \pi \) बन्धी आण्विक कक्षकों में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि सामान्यतः अणुओं में द्वि – बंध, एक सिग्मा और एक पाई बंध से बना होता है।
कार्बन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s, 2s \) और \( 2p \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
7. \( N_2 \) अणुः
नाइट्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^2 2px^1 2py^1 2pz^1 \) होता है।
ऊर्जा स्तर आरेख के आधार पर \( N_2 \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( N_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\sigma 2pz)^2 \)
और आबन्ध कोटि \( = \frac {1}{2} (10 – 4) = 3 \)
अतः दो नाइट्रोजन परमाणुओं के मध्य एक \( \sigma \) और दो \( \pi \) बंध होते हैं। \( N_2 \) अणु में कोई अकेला इलेक्ट्रॉन नहीं है, अतः इसकी प्रकृति प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) होती है।
नाइट्रोजन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s, 2s \) और \( 2p \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
अगर \( N_2 \) अणु में से एक इलेक्ट्रॉन कम कर दिया जाए, तो वह बन्धी अणु कक्षक में से निकलेगा। इसलिए \( N_2^+ \) का बंध क्रम \( 2.5 \) रह जाएगा और इसका व्यवहार अनुचुम्बकीय हो जाएगा। \( N_2^- \) बनाने के लिए \( N_2 \) में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ना पड़ेगा, जिससे इसका बंध क्रम भी \( 2.5 \) होगा और यह भी अनुचुम्बकीय होगा। लेकिन \( N_2^{2-} \) का बंध क्रम \( 2 \) होगा और यह प्रतिचुम्बकीय होगा। अतः इनके स्थायित्व का क्रम इस प्रकार होगा:
स्थायित्व का क्रम \( – N_2 > N_2^{+} = N_2^{-} > N_2^{2-} \)
बन्ध क्रम \( – 3 > 2.5 = 2.5 > 2 \)
8. \( O_2 \) - अणुः
ऑक्सीजन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 1s^2 2s^2 2p^4 \) होता है। हर ऑक्सीजन परमाणु में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः ऑक्सीजन अणु में कुल 16 इलेक्ट्रॉन होंगे।
ऑक्सीजन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख के आधार पर \( O_2 \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( O_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 = (\pi^* 2py)^1 \)
या \( O_2 = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2p_z)^2 (\pi 2px)^2 = (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 = (\pi^* 2py)^1 \)
और आबन्ध कोटि \( = \frac {1}{2} (10-6) = 2 \)
अतः \( O_2 \) अणु में ऑक्सीजन परमाणु के बीच एक दोहरा बंध होता है। \( O_2 \) अणु के \( \pi^* 2px \) और \( \pi^* 2py \) आण्विक कक्षकों में एक-एक अकेला इलेक्ट्रॉन होता है, इसलिए \( O_2 \) अणु को अनुचुम्बकीय होना चाहिए और प्रयोगों से भी ऐसा ही पाया गया है। इस तरह, आण्विक कक्षक सिद्धान्त से ऑक्सीजन के अनुचुंबकीय व्यवहार को समझाया जा सकता है, जिसे संयोजकता बंध सिद्धान्त से नहीं समझाया जा सका था।
ऑक्सीजन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s, 2s \) और \( 2p \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
\( O_2 \) के आयन:
1. \( O_2^+ \) आयन:
अगर \( O_2 \) अणु में से एक इलेक्ट्रॉन कम कर दिया जाए, तो \( O_2^+ \) आयन बनता है। स्वाभाविक है कि वह इलेक्ट्रॉन उसके \( \pi^* \) - विपरीत बन्धी कक्षक में से निकलेगा। तब उसका विन्यास निम्न प्रकार हो जाएगा:
\( O_2^+ = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^1 \)
अतः बंध क्रम \( = \frac {1}{2} (10-5) = 2.5 \)
इसकी बंध लम्बाई का मान \( O_2 \) से कम हो जाता है।
2. \( O_2^- \) आयन:
अगर \( O_2 \) अणु में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ दिया जाए, तो \( O_2^- \) आयन बनता है। तब उसका विन्यास इस प्रकार होगा:
\( O_2^- = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^1 \)
अतः बंध क्रम \( = \frac {1}{2} (10-7) = 1.5 \)
इसका बंध क्रम \( O_2 \) अणु से कम है, इसलिए इसकी बंध दूरी \( O_2 \) से अधिक हो जाती है। इसमें एक अकेला इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह भी अनुचुम्बकीय होता है।
3. \( O_2^{2-} \) आयन:
अगर \( O_2^- \) आयन में एक और इलेक्ट्रॉन जोड़ दिया जाए, तो \( O_2^{2-} \) आयन बनता है। तब उसका विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( O_2^{2-} = KK (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2pz)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2 \)
अतः बंध क्रम \( = \frac {1}{2} (10-8) = 1 \)
\( O_2^{2-} \) में सभी इलेक्ट्रॉन जोड़े में होते हैं, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय होता है।
अतः \( O_2 \) तथा इसके विभिन्न आयनों की तुलना निम्न प्रकार है –
स्थायित्व का क्रम \( – O_2^{2-} < O_2^{-} < O_2^{+} < O_2 \)
बन्ध एन्थैल्पी का क्रम \( – O_2^{2-} < O_2^{-} < O_2^{+} < O_2 \)
बन्ध लम्बाई का क्रम \( – O_2^{2-} > O_2^{-} > O_2^{+} > O_2 \)
बन्ध क्रम का क्रम \( – O_2^{2-} < O_2^{-} < O_2^{+} < O_2 \)
9. \( F_2 \) अणु:
फ्लुओरीन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है – \( 1s^2 2s^2 2px^2 2py^2 2pz^1 \)
\( F_2 \) के संयोजकता कोशों में कुल \( 14 \) इलेक्ट्रॉन होते हैं। विपरीत बन्धी कक्षकों \( (\sigma^* 2pz) \) के अलावा सभी आण्विक कक्षक पूरी तरह भरे हुए होते हैं।
अतः \( F_2 \) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार होगा:
\( F_2 = (\sigma 1s)^2 (\sigma^* 1s)^2 (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2p_z)^2 (\pi 2px)^2 (\pi 2py)^2 (\pi^* 2px)^2 (\pi^* 2py)^2 \)
इसका बंध क्रम \( = \frac {1}{2} (10-8) = 1 \)
अतः इसका अणु सूत्र \( F - F \) होगा और इसमें कोई अकेला इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इसलिए इसकी प्रकृति प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) होती है। विपरीत बन्धी आण्विक कक्षकों में ज़्यादा इलेक्ट्रॉन होने के कारण इसका स्थायित्व कम होता है और इसीलिए इसकी बंध ऊर्जा का मान भी कम होता है।
फ्लुओरीन अणु का ऊर्जा स्तर आरेख, जिसमें \( 1s, 2s \) और \( 2p \) परमाणु कक्षकों के संयोजन से आण्विक कक्षक बनते हैं।
इस प्रकार, आवर्त सारणी के दूसरे आवर्त के समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं (\( B_2 \) से \( Ne_2 \)) के आण्विक कक्षक तथा उनके आण्विक गुणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है:
| \( B_2 \) | \( C_2 \) | \( N_2 \) | \( O_2 \) | \( F_2 \) | \( Ne_2 \) | |
|---|---|---|---|---|---|---|
| आबंध कोटि | 1 | 2 | 3 | 2 | 1 | 0 |
| चुंबकीय गुण | अनुचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | अनुचुंबकीय | प्रतिचुंबकीय | - |
| संयोजी कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2p)^2 \) | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2p)^4 \) | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\pi 2p)^4 (\sigma 2p_z)^2 \) | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2p_z)^2 (\pi 2p)^4 (\pi^* 2p)^2 \) | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2p_z)^2 (\pi 2p)^4 (\pi^* 2p)^4 \) | \( (\sigma 2s)^2 (\sigma^* 2s)^2 (\sigma 2p_z)^2 (\pi 2p)^4 (\pi^* 2p)^4 (\sigma^* 2p_z)^2 \) |
In simple words: आबंध कोटि बताती है कि दो परमाणुओं के बीच कितने रासायनिक बंध हैं। यदि बंधों की संख्या बढ़ती है, तो अणु अधिक स्थिर होता है। अलग-अलग अणुओं के लिए, जैसे \( N_2, C_2, H_2, \) और \( N_2^-, \) हम उनके इलेक्ट्रॉन विन्यास को देखकर उनकी स्थिरता और चुंबकीय गुणों को समझ सकते हैं।
🎯 Exam Tip: आबंध कोटि की गणना करने के लिए हमेशा बन्धी और विपरीत बन्धी इलेक्ट्रॉनों की संख्या का सही पता होना चाहिए। ऊर्जा स्तर आरेख का सही क्रम याद रखें, क्योंकि यह अणुओं के गुणों को समझने में मदद करता है।