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Detailed Chapter 3 आवर्त सारणी RBSE Solutions for Class 11 Chemistry
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Class 11 Chemistry Chapter 3 आवर्त सारणी RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 3 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. मेंडलीव के आवर्त नियम का आधार था -
(अ) संयोजकता
(ब) परमाणु भार
(स) परमाणु क्रमांक
(द) परमाण्वीय आयतन
Answer: (ब) परमाणु भार
In simple words: मेंडलीव ने तत्वों को उनके परमाणु भार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया था। यह उनके आवर्त नियम का मुख्य आधार था।
🎯 Exam Tip: मेंडलीव के आवर्त नियम और आधुनिक आवर्त नियम के आधार (परमाणु भार बनाम परमाणु क्रमांक) को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक सामान्य तुलना बिंदु है।
Question 2. एक तत्त्व जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] \( 3d^24s^2 \) है, किस ब्लॉक से सम्बन्धित है?
(अ) s - ब्लॉक
(ब) p - ब्लॉक
(स) d - ब्लॉक
(द) f - ब्लॉक
Answer: (स) d - ब्लॉक
In simple words: किसी तत्व का अंतिम इलेक्ट्रॉन जिस उपकोश में प्रवेश करता है, वह उसी ब्लॉक से संबंधित होता है। यहां, अंतिम इलेक्ट्रॉन d उपकोश में है, इसलिए यह d-ब्लॉक तत्व है।
🎯 Exam Tip: किसी तत्व का ब्लॉक पहचानने के लिए उसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास देखें; अंतिम इलेक्ट्रॉन का प्रवेश जिस उपकोश (s, p, d, f) में होता है, वही उसका ब्लॉक होता है।
Question 3. परमाणु क्रमांक 58 से 71 तक के तत्त्वों को कहते हैं -
(अ) बोरॉन
(ब) कार्बन
(स) नाइट्रोजन
(द) ऑक्सीजन
Answer: (स) नाइट्रोजन
In simple words: परमाणु क्रमांक 58 से 71 तक के तत्व लैंथेनॉइड श्रेणी में आते हैं। यह श्रेणी आंतरिक संक्रमण तत्वों का हिस्सा है।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी में विभिन्न श्रेणियों (संक्रमण, लैंथेनॉइड, एक्टिनॉइड, क्षार धातु) के परमाणु क्रमांक की सीमाओं को याद रखें।
Question 4. किस आयन की त्रिज्या सर्वाधिक है?
(अ) F-
(ब) Cl-
(स) Br-
(द) I-
Answer: (द) I-
In simple words: हैलोजन समूह में नीचे जाने पर आयनिक त्रिज्या बढ़ती है, क्योंकि कोशों की संख्या बढ़ती जाती है। इसलिए, आयोडीन आयन (I-) की त्रिज्या सबसे अधिक होगी।
🎯 Exam Tip: एक समूह में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु और आयनिक त्रिज्या बढ़ती है, जबकि एक आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर यह घटती है।
Question 5. किस आयन की त्रिज्या सर्वाधिक है?
(अ) F-
(ब) Cl-
(स) Br-
(द) I-
Answer: (द) I-
In simple words: हैलोजन समूह में नीचे जाने पर आयनिक त्रिज्या बढ़ती है, क्योंकि कोशों की संख्या बढ़ती जाती है। इसलिए, आयोडीन आयन (I-) की त्रिज्या सबसे अधिक होगी।
🎯 Exam Tip: किसी भी समूह में तत्वों की त्रिज्या का क्रम निर्धारित करते समय, नाभिकीय आवेश और कोशों की संख्या दोनों पर विचार करें।
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 3 अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. मेंडलीव के आवर्त नियम का आधार क्या था?
Answer: मेंडलीव का आवर्त नियम परमाणु भार पर आधारित था। उन्होंने तत्वों को उनके परमाणु भार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया था।
In simple words: मेंडलीव ने तत्वों को परमाणु भार के हिसाब से लगाया था।
🎯 Exam Tip: मेंडलीव के आवर्त नियम का आधार याद रखें और इसकी तुलना आधुनिक आवर्त नियम से करें।
Question 2. अ
Answer: सत्रहवें वर्ग के सदस्यों को हैलोजन कहते हैं। यह आवर्त सारणी के p-ब्लॉक में स्थित होते हैं और अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं।
In simple words: समूह 17 के तत्वों को हैलोजन कहते हैं।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी में विभिन्न वर्गों के सामान्य नामों को याद रखना महत्वपूर्ण है, जैसे हैलोजन, क्षार धातु आदि।
Question 4. आवर्त सारणी के किन तत्त्वों में उपान्त्य कोश अपूर्ण होता है?
Answer: आवर्त सारणी के संक्रमण तत्त्वों में उपान्त्य कोश अपूर्ण होता है। ये d-ब्लॉक के तत्व होते हैं, जहां \( (n-1)d \) उपकोश आंशिक रूप से भरा होता है।
In simple words: संक्रमण तत्वों में आखिरी से पहले वाला ऊर्जा स्तर पूरा नहीं भरा होता है।
🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की पहचान उनके अपूर्ण d-उपकोश से होती है, जो उनके विशिष्ट गुणों का कारण बनता है।
Question 5. 4F श्रेणी में 14 तत्त्व क्यों होते हैं?
Answer: \( 4F \) उपकोश में 7 कक्षक होते हैं और प्रत्येक कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन भरे जा सकते हैं। इस प्रकार, \( 4F \) श्रेणी में कुल \( 7 \times 2 = 14 \) तत्व होते हैं। इसके अलावा, लैंथेनम (\( La_{57} \)) तथा हैफ्नियम (\( Hf_{72} \)) के परमाणु क्रमांक में 14 का अंतर होता है, इसलिए इनके बीच \( 4F \) श्रेणी के 14 तत्व आते हैं।
In simple words: \( 4F \) उपकोश में 7 कमरे (कक्षक) होते हैं और हर कमरे में 2 इलेक्ट्रॉन आते हैं, इसलिए कुल 14 तत्व होते हैं।
🎯 Exam Tip: किसी उपकोश में कक्षकों की संख्या (\( 2l+1 \)) और प्रति कक्षक अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या (2) को याद रखें, जिससे उस उपकोश में तत्वों की कुल संख्या ज्ञात की जा सके।
Question 6. परायूरेनियम तत्त्व किसे कहते हैं?
Answer: यूरेनियम (\( U_{92} \)) के पश्चात् आने वाले सभी तत्व जो अस्थायी होते हैं और कृत्रिम रूप से बनाए जाते हैं, उन्हें परायूरेनियम तत्व कहते हैं। ये तत्व आमतौर पर रेडियोधर्मी होते हैं।
In simple words: यूरेनियम के बाद वाले जो तत्व लैब में बनते हैं और टिकते नहीं, उन्हें परायूरेनियम तत्व कहते हैं।
🎯 Exam Tip: परायूरेनियम तत्वों की परिभाषा में 'कृत्रिम' और 'अस्थायी' गुणों पर जोर दें।
Question 7. 120 परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व का IUPAC नाम तथा प्रतीक क्या होगा?
Answer: IUPAC के नियमानुसार, 1, 2 तथा 0 अंकों के लिए मूल (root) क्रमशः un, bi तथा nil होंगे। अतः, 120 परमाणु क्रमांक वाले तत्व का नाम Unbinilium तथा प्रतीक Ubn होगा।
In simple words: 120 नंबर वाले तत्व का IUPAC नाम Unbinilium और इसका निशान Ubn है।
🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के नियमों का उपयोग करके 100 से अधिक परमाणु क्रमांक वाले तत्वों के नाम और प्रतीक लिखने का अभ्यास करें।
Question 8. तत्त्व x वर्ग 15 के प्रथम स्थान पर स्थित है। इस तत्त्व का बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
Answer: वर्ग 15 के तत्वों का बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( ns^2np^3 \) होता है। चूंकि तत्व x वर्ग 15 के प्रथम स्थान पर स्थित है, जिसका अर्थ है कि यह दूसरे आवर्त में है (\( n = 2 \))। अतः, इसका बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 2s^22p^3 \) होगा।
In simple words: वर्ग 15 के पहले तत्व का बाहरी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 2s^22p^3 \) होता है।
🎯 Exam Tip: किसी वर्ग के तत्वों के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को याद रखें और आवर्त संख्या (\( n \)) के आधार पर उसे लागू करना सीखें।
Question 9. मेंग
Answer: आधुनिक आवर्त सारणी में लैंथेनॉइडों तथा एक्टिनॉइडों को स्थान नहीं दिया जा सका है तथा लगभग समान गुणों वाले तत्वों को पृथक्-पृथक् वर्गों में रखा गया। जैसे – \( Ba \) व \( Pb \).
In simple words: आधुनिक आवर्त सारणी में लैंथेनॉइड और एक्टिनॉइड को अलग रखा गया है क्योंकि उन्हें मुख्य सारणी में जगह नहीं मिल पाई।
🎯 Exam Tip: आवर्त सारणी में लैंथेनॉइडों और एक्टिनॉइडों के स्थान की सीमाएं और उनके गुणों को समझें।
Question 11. Uub तत्त्व का परमाणु क्रमांक लिखिए।
Answer: Uub तत्व का परमाणु क्रमांक 112 होगा क्योंकि IUPAC नामकरण में U (un) = 1, u (un) = 1 तथा b (bi) = 2 को दर्शाता है।
In simple words: Uub तत्व का परमाणु क्रमांक 112 होता है।
🎯 Exam Tip: IUPAC के नियमों का उपयोग करके परमाणु क्रमांक से तत्व का नाम और प्रतीक ज्ञात करना महत्वपूर्ण है।
Question 12. आवर्त के किस सदस्य का आकार सबसे बड़ा होता हैं?
Answer: आवर्त सारणी के किसी आवर्त में क्षार धातु का आकार सबसे बड़ा होता है। यह आवर्त के बाईं ओर स्थित होते हैं और इनमें न्यूनतम नाभिकीय आवेश होता है।
In simple words: एक लाइन (आवर्त) में, क्षार धातुओं का आकार सबसे बड़ा होता है।
🎯 Exam Tip: आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर परमाणु आकार में कमी आती है, इसलिए क्षार धातुएं (समूह 1) सबसे बड़ी होती हैं।
Question 13. S\(^{2-}\), Cl\(^{-}\), Ar, K\(^{+}\), Ca\(^{2+}\), Sc\(^{3+}\) को आकार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
Answer: इन समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ को आकार के बढ़ते क्रम में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है:
\( Sc^{3+} < Ca^{2+} < K^{+} < Ar < Cl^{-} < S^{2-} \)
यहां परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है, जिससे आयनिक त्रिज्या घटती है।
In simple words: छोटे से बड़े आकार में, ये तत्व और आयन इस तरह से व्यवस्थित होते हैं: स्कैंडियम आयन, कैल्शियम आयन, पोटेशियम आयन, आर्गन, क्लोरीन आयन, सल्फर आयन।
🎯 Exam Tip: समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ के लिए, धनावेश बढ़ने पर आकार घटता है और ऋणावेश बढ़ने पर आकार बढ़ता है।
Question 14. वान्डरवाल्स त्रिज्या किसे कहते हैं?
Answer: किसी तत्व के दो अणुओं के पास स्थित अबन्धित परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी का आधा, वान्डरवाल्स त्रिज्या कहलाता है। यह त्रिज्या परमाणुओं के बीच दुर्बल आकर्षण बलों से संबंधित होती है।
In simple words: जब दो परमाणु एक-दूसरे से जुड़े नहीं होते, तो उनके बीच की सबसे कम दूरी का आधा वान्डरवाल्स त्रिज्या कहलाती है।
🎯 Exam Tip: वान्डरवाल्स त्रिज्या की परिभाषा में 'अबन्धित परमाणुओं' और 'नाभिकों के बीच की दूरी का आधा' शब्दों पर ध्यान दें।
Question 15. Na\(^{+}\), Mg\(^{2+}\) तथा Al\(^{3+}\) आयन में किसकी आयनिक त्रिज्या सबसे छोटी है?
Answer: Na\(^{+}\), Mg\(^{2+}\) तथा Al\(^{3+}\) आयनों में से Al\(^{3+}\) की आयनिक त्रिज्या सबसे छोटी है क्योंकि इसमें नाभिकीय आवेश अधिक होने के कारण नाभिकीय आकर्षण बल अधिक होगा। यह सभी समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ हैं।
In simple words: इन आयनों में, Al\(^{3+}\) की त्रिज्या सबसे छोटी है क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा नाभिकीय खिंचाव है।
🎯 Exam Tip: समइलेक्ट्रॉनिक आयनों में, धनावेश बढ़ने के साथ आयनिक त्रिज्या घटती जाती है क्योंकि नाभिकीय आकर्षण बढ़ता है।
Question 16. उदासीन जनक परमाणु तथा धनायन में से किसकी त्रिज्या छोटी होती है?
Answer: उदासीन जनक परमाणु की तुलना में धनायन की त्रिज्या छोटी होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि धनायन बनने पर इलेक्ट्रॉन त्याग दिए जाते हैं, जिससे शेष इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आवेश का प्रभाव बढ़ जाता है।
In simple words: एक आम परमाणु से जब इलेक्ट्रॉन निकल जाते हैं तो उसका आकार छोटा हो जाता है।
🎯 Exam Tip: धनायन हमेशा अपने जनक परमाणु से छोटा होता है, जबकि ऋणायन हमेशा अपने जनक परमाणु से बड़ा होता है।
Question 18. क्षार धातुओं में किस तत्त्व की आयनन एंथैल्पी सबसे कम होती है?
Answer: क्षार धातुओं में Cs (सीजियम) की आयनन एंथैल्पी सबसे कम होती है क्योंकि इसकी परमाणु त्रिज्या सबसे अधिक होती है। बड़े आकार के कारण, बाहरी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होता है और उसे निकालना आसान हो जाता है।
In simple words: सीजियम (Cs) की आयनन एंथैल्पी सबसे कम होती है क्योंकि इसका आकार सबसे बड़ा होता है।
🎯 Exam Tip: समूह में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण आयनन एंथैल्पी घटती है।
Question 19. आवर्त सारणी में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी वाला तत्त्व कौनसा है?
Answer: आवर्त सारणी में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी क्लोरीन (Cl) की होती है, लेकिन यह ऋणात्मक होती है। फ्लोरीन का आकार छोटा होने के कारण इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अधिक होता है, जिससे उसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी क्लोरीन से कम होती है।
In simple words: क्लोरीन (Cl) में इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर सबसे ज्यादा ऊर्जा निकलती है, यानी इसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी सबसे अधिक होती है।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन और क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी की तुलना अक्सर पूछी जाती है; याद रखें क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी फ्लोरीन से अधिक होती है।
Question 20. Na तथा Mg में से किस तत्त्व की द्वितीय आयनन एंथैल्पी अधिक है?
Answer: Na तथा Mg में से Na की द्वितीय आयनन एंथैल्पी का मान अधिक होता है। सोडियम से पहला इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद यह \( Na^+ \) (स्थायी अक्रिय गैस विन्यास) बनाता है, जिससे दूसरा इलेक्ट्रॉन निकालना बहुत मुश्किल होता है। जबकि Mg से दूसरा इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद भी यह स्थायी विन्यास प्राप्त करता है।
In simple words: Na की दूसरी आयनन एंथैल्पी Mg से ज्यादा होती है, क्योंकि Na से एक इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद वह बहुत स्थिर हो जाता है।
🎯 Exam Tip: आयनन एंथैल्पी की तुलना करते समय, स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (जैसे अर्ध-पूरित या पूर्ण-पूरित कक्षक) की स्थिरता पर ध्यान दें।
Question 21. आवर्त सारणी में सबसे अधिक विद्युतऋणात्मकता वाला तत्त्व कौनसा है?
Answer: आवर्त सारणी में सबसे अधिक विद्युतऋणात्मकता वाला तत्व फ्लुओरीन (F) है। यह सबसे छोटा और सबसे अधिक नाभिकीय आवेश वाला हैलोजन है, जिससे यह इलेक्ट्रॉनों को सबसे अधिक मजबूती से आकर्षित करता है।
In simple words: फ्लोरीन (F) आवर्त सारणी में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉन खींचने वाला तत्व है।
🎯 Exam Tip: फ्लुओरीन आवर्त सारणी का सबसे अधिक विद्युतऋणात्मक तत्व है, इस तथ्य को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 22. विद्युतऋणात्मकता के परिकलन में पॉलिंग एवं मुलिकन मापक्रम में क्या सम्बन्ध है?
Answer: विद्युतऋणात्मकता के परिकलन में पॉलिंग एवं मुलिकन मापक्रम में निम्नलिखित सम्बन्ध है:
\( X_{\text{पॉलिंग}} = \frac { X_{\text{मुलिकन}} }{ 2.8 } \)
यह संबंध दोनों पैमानों के बीच एक अनुमानित रूपांतरण प्रदान करता है।
In simple words: पॉलिंग स्केल पर विद्युतऋणात्मकता, मुलिकन स्केल पर विद्युतऋणात्मकता का लगभग 2.8 गुना होता है।
🎯 Exam Tip: पॉलिंग और मुलिकन पैमानों के बीच के इस सीधे संबंध सूत्र को याद रखें।
Question 23. प्रतिशत आयनिक लक्षण परिकलित करने का सूत्र लिखिए।
Answer: बन्ध में प्रतिशत आयनिक लक्षण परिकलित करने का सूत्र है:
प्रतिशत आयनिक लक्षण \( = 16(X_A – X_B) + 3.5 (X_A – X_B)^2 \)
यहां, \( X_A \) व \( X_B \) तत्त्व A व B की विद्युतऋणता है। यह सूत्र हैनी और स्मिथ द्वारा दिया गया था।
In simple words: किसी बंधन में कितना आयनिक गुण है, उसे तत्वों की विद्युतऋणात्मकता के अंतर वाले एक खास सूत्र से निकालते हैं।
🎯 Exam Tip: हैनी-स्मिथ समीकरण को याद रखें और उसमें प्रयुक्त होने वाले प्रतीकों (\( X_A, X_B \)) का अर्थ समझें।
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 25. क्षारीय मृदा धातुओं की संयोजकता कितनी होती है?
Answer: क्षारीय मृदा धातुओं की संयोजकता 2 (दो) होती है। ये तत्व अपने बाह्यतम कोश के दो इलेक्ट्रॉनों को आसानी से त्याग कर द्विधनायन (\( M^{2+} \)) बनाते हैं।
In simple words: क्षारीय मृदा धातुओं की संयोजकता 2 होती है।
🎯 Exam Tip: क्षारीय मृदा धातुओं (समूह 2) की संयोजकता और उनके द्वारा बनाए गए आयनों के प्रकार को याद रखें।
Question 26. तत्त्वों के वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
Answer: तत्वों की अधिक संख्या और उनके असंख्य यौगिकों के रसायन का अलग-अलग अध्ययन करना बहुत मुश्किल था। इसलिए, वैज्ञानिकों ने तत्वों का वर्गीकरण किया ताकि उनके ज्ञान को व्यवस्थित किया जा सके और उनका अध्ययन आसानी से किया जा सके। इस तरीके से सभी तत्वों से संबंधित रासायनिक तथ्यों को तर्कसंगत बनाया जा सकता था और भविष्य में खोजे जाने वाले अन्य तत्वों का अध्ययन भी आसान हो सकेगा।
In simple words: तत्वों को समझना आसान बनाने के लिए उन्हें बांटा गया, क्योंकि बहुत सारे तत्व और उनके यौगिक हैं।
🎯 Exam Tip: तत्वों के वर्गीकरण के पीछे का मुख्य उद्देश्य 'अध्ययन में सुगमता' और 'गुणों को समझना' था, इसे स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 27. संक्रमण श्रेणी में बाईं से दाईं ओर जाने पर आकार में बहुत कम परिवर्तन होता है, क्यों?
Answer: संक्रमण श्रेणी में बाईं से दाईं ओर जाने पर आकार में बहुत कम परिवर्तन होता है क्योंकि इलेक्ट्रॉन उपान्त्य [(n - 1)d] कोश में भरते हैं। इन इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव (shielding effect), नाभिकीय आकर्षण बल को काफी हद तक संतुलित कर देता है। इसलिए परमाणु आकार लगभग स्थिर रहता है।
In simple words: संक्रमण तत्वों में बाएं से दाएं जाने पर परमाणु का आकार ज्यादा नहीं बदलता, क्योंकि नए इलेक्ट्रॉन बाहरी इलेक्ट्रॉनों को नाभिक के खिंचाव से बचाते हैं।
🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों के लगभग स्थिर परमाणु आकार के लिए 'परिरक्षण प्रभाव' और 'नाभिकीय आकर्षण बल के संतुलन' को मुख्य कारण के रूप में उजागर करें।
Question 28. ऋणायन का आकार सदैव जनक परमाणु से बड़ा होता है, क्यों?
Answer: ऋणायन बनने पर इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। जबकि नाभिकीय आवेश (प्रोटॉनों की संख्या) समान रहता है। इससे इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ता है और नाभिकीय आकर्षण बल पहले की तुलना में कम हो जाता है। इसलिए, ऋणायन का आकार सदैव जनक परमाणु से बड़ा होता है।
In simple words: जब परमाणु इलेक्ट्रॉन लेता है और ऋणायन बनता है, तो इलेक्ट्रॉन ज्यादा होने से वे एक-दूसरे को धकेलते हैं और आकार बढ़ जाता है।
🎯 Exam Tip: ऋणायन के बड़े आकार का कारण 'इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण में वृद्धि' और 'प्रभावी नाभिकीय आवेश में कमी' है।
Question 29. Na से Na\(^{+}\) की अपेक्षा Cs से Cs\(^{+}\) अधिक सरलता से प्राप्त होता है, क्यों?
Answer: वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ता है। अतः आयनन एंथैल्पी का मान कम होता है। Na की तुलना में Cs का परमाणु आकार बहुत बड़ा होता है, इसलिए Cs की आयनन एंथैल्पी का मान भी Na की तुलना में बहुत कम होता है। इसमें से इलेक्ट्रॉन आसानी से निकल जाता है। इसी कारण Na से Na\(^{+}\) की अपेक्षा, Cs से Cs\(^{+}\) प्राप्त होना अधिक आसान है।
In simple words: Cs से Cs\(^{+}\) बनाना आसान है क्योंकि Cs का परमाणु Na से बड़ा होता है, इसलिए उसके इलेक्ट्रॉन को निकालना आसान होता है।
🎯 Exam Tip: समूह में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि, परिरक्षण प्रभाव में वृद्धि, और आयनन एंथैल्पी में कमी के कारण इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
Question 31. क्षारीय धातु द्विधनावेशित आयन क्यों नहीं बनाते हैं?
Answer: प्रथम वर्ग के तत्वों (क्षारीय धातु) के लिए, प्रथम और द्वितीय आयनन एंथैल्पी मानों का अंतर 16 eV से अधिक होता है। अतः, इनकी निम्न ऑक्सीकरण अवस्था (+1) स्थायी होती है, जिसका अर्थ है कि ये \( M^{+1} \) (एक धनावेशित आयन) बनाते हैं न कि \( M^{+2} \) (द्विधनावेशित आयन)। दूसरा इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
In simple words: क्षारीय धातु दो पॉजिटिव चार्ज वाले आयन नहीं बनाते क्योंकि एक इलेक्ट्रॉन निकालने के बाद वे बहुत स्थिर हो जाते हैं, और दूसरा निकालने में बहुत ऊर्जा लगती है।
🎯 Exam Tip: क्षारीय धातुओं की उच्च द्वितीय आयनन एंथैल्पी और परिणामस्वरूप स्थायी \( M^{+1} \) आयन बनाने की प्रवृत्ति को स्पष्ट करें।
Question 32. उत्कृष्ट गैस की आयनन एंथैल्पी अत्यधिक उच्च होती है। कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्कृष्ट गैसों में पूर्ण पूरित कोश स्थायी विन्यास (\( ns^2np^6 \)) होता है। इसका अर्थ है कि इनमें से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह विन्यास बहुत स्थिर होता है। इसलिए, उत्कृष्ट गैसों की आयनन एंथैल्पी अत्यधिक उच्च होती है।
In simple words: उत्कृष्ट गैसों की आयनन एंथैल्पी बहुत ज्यादा होती है, क्योंकि उनके बाहरी इलेक्ट्रॉन पूरी तरह भरे होते हैं और वे बहुत स्थिर होते हैं।
🎯 Exam Tip: पूर्ण पूरित इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की उच्च स्थिरता और उससे जुड़ी उच्च आयनन एंथैल्पी को याद रखें।
Question 33. नाइट्रोजन की आयनन एंथैल्पी ऑक्सीजन से अधिक होती है, क्यों?
Answer: नाइट्रोजन में अर्धपूरित (\( 2p^3 \)) विन्यास होता है, जो कि स्थायी होता है, जबकि ऑक्सीजन का विन्यास (\( 2p^4 \)) होता है जो कि कम स्थायी होता है। इसलिए, नाइट्रोजन के अर्धपूरित स्थायी विन्यास में से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी कारण नाइट्रोजन की आयनन एंथैल्पी ऑक्सीजन की आयनन एंथैल्पी से अधिक होती है।
In simple words: नाइट्रोजन से इलेक्ट्रॉन निकालना मुश्किल है क्योंकि उसका बाहरी इलेक्ट्रॉन आधा भरा होने से वह ज्यादा स्थिर होता है, जबकि ऑक्सीजन उतना स्थिर नहीं होता।
🎯 Exam Tip: अर्ध-पूरित और पूर्ण-पूरित कक्षकों की स्थिरता आयनन एंथैल्पी के मानों को कैसे प्रभावित करती है, इसे समझें।
Question 34. क्षारीय मृदा धातु परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करते, क्यों?
Answer: क्षारीय मृदा धातुओं (द्वितीय वर्ग के तत्व) के लिए प्रथम और द्वितीय आयनन एंथैल्पी मानों का अंतर 11 eV से कम होता है। अतः, इनमें उच्च ऑक्सीकरण अवस्था (+2) स्थायी होती है, जिसका अर्थ है कि ये सीधे ही +2 ऑक्सीकरण अवस्था बनाते हैं, न कि +1। +1 अवस्था में ये उत्कृष्ट गैसों के समान स्थायी विन्यास प्राप्त नहीं करते हैं, और +3 अवस्था इनमें नहीं बनती। इसलिए, क्षारीय मृदा धातु परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करते।
In simple words: क्षारीय मृदा धातु हमेशा +2 ऑक्सीकरण अवस्था दिखाते हैं, क्योंकि ऐसा करने से वे स्थिर हो जाते हैं, और वे दूसरी अवस्थाएं नहीं दिखाते।
🎯 Exam Tip: क्षारीय मृदा धातुओं की केवल +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने का कारण उनकी आयनन एंथैल्पी का कम अंतर और स्थायी विन्यास प्राप्त करना है।
Question 35. NaOH क्षार है जबकि HOCl अम्ल । कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: किसी हाइड्रॉक्साइड में A-O बंधन और O-H बंधन की आपेक्षिक प्रबलता A की विद्युतऋणात्मकता पर निर्भर करती है। NaOH में, Na एक कम विद्युतऋणात्मक धातु है, इसलिए Na-O बंधन अधिक आयनिक होता है और जलीय विलयन में \( OH^- \) आयन मुक्त करता है, जो इसे क्षार बनाता है। वहीं HOCl में, Cl एक अधिक विद्युतऋणात्मक अधातु है, इसलिए O-H बंधन अधिक ध्रुवीय होता है और जलीय विलयन में \( H^+ \) आयन मुक्त करता है, जो इसे अम्ल बनाता है।
In simple words: NaOH क्षार है क्योंकि Na-O बंधन आसानी से टूटता है और \( OH^- \) छोड़ता है। HOCl अम्ल है क्योंकि Cl, O-H बंधन को कमजोर करता है और \( H^+ \) छोड़ता है।
🎯 Exam Tip: किसी तत्व के हाइड्रॉक्साइड की अम्लीय या क्षारीय प्रकृति का निर्धारण उस तत्व की विद्युतऋणात्मकता और A-O बनाम O-H बंधन की ध्रुवीयता के आधार पर करें।
Question 36. CsF बंध में आयनिक लक्षण की प्रतिशतता को परिकलन कीजिए। Cs एवं F की विद्युतऋणताएँ क्रमशः 0.7 तथा 4.0 हैं।
Answer: CsF में बन्ध का प्रतिशत आयनिक गुण की गणना हैनी-स्मिथ समीकरण से की जा सकती है:
प्रतिशत आयनिक गुण \( = 16(X_A – X_B) + 3.5 (X_A – X_B)^2 \)
यहां, \( X_A = 4.0 \) (F की विद्युतऋणता) और \( X_B = 0.7 \) (Cs की विद्युतऋणता)।
विद्युतऋणता में अंतर \( \Delta = X_A - X_B = 4.0 - 0.7 = 3.3 \)
अतः, बन्ध का प्रतिशत आयनिक गुण \( = (16 \times 3.3) + [3.5 (3.3)^2] \)
\( = 52.8 + (3.5 \times 10.89) \)
\( = 52.8 + 38.115 \)
\( = 90.915\% \)
In simple words: CsF बंधन में लगभग 90.9% आयनिक गुण होता है, क्योंकि फ्लोरीन और सीजियम की इलेक्ट्रॉन खींचने की शक्ति में बहुत बड़ा अंतर है।
🎯 Exam Tip: प्रतिशत आयनिक लक्षण की गणना के लिए हैनी-स्मिथ समीकरण को सही ढंग से लागू करें और विद्युतऋणात्मकता के अंतर का ध्यान रखें।
Question 37. कारण सहित समझाइए कि F की इलेक्ट्रॉनिक बंधुता क्लोरीन से कम होती है।
Answer: क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बंधुता, F की इलेक्ट्रॉन बंधुता से अधिक होती है क्योंकि F का आकार छोटा (\( n = 2 \)) होता है। इसमें इलेक्ट्रॉनों का उच्च आवेश घनत्व होता है, जिसके कारण जुड़ने वाला इलेक्ट्रॉन, प्रबल इलेक्ट्रॉन – इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अनुभव करता है। अतः, इसमें इलेक्ट्रॉन जोड़ना मुश्किल होता है। वहीं, Cl का आकार बड़ा (\( n = 3 \)) होने के कारण इसमें इलेक्ट्रॉन जोड़ना आसान होता है और प्रतिकर्षण कम होता है।
In simple words: फ्लोरीन का आकार छोटा होने से उसके इलेक्ट्रॉनों के बीच बहुत धक्का-मुक्की होती है, इसलिए वह नए इलेक्ट्रॉन को आसानी से नहीं ले पाता, जबकि क्लोरीन आसानी से ले लेता है।
🎯 Exam Tip: फ्लोरीन और क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बंधुता के अपवाद को याद रखें, जिसमें आकार और इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण की भूमिका महत्वपूर्ण है।
Question 38. बोरॉन की आयनन एन्थैल्पी बेरिलियम से कम होती है। कारण सहित समझाइए।
Answer: Be (\( 2s^2 \)) में अंतिम इलेक्ट्रॉन s कक्षक में से निकलता है जो कि पूर्ण भरा है तथा इसकी ऊर्जा 2p से कम है। अतः, यह अधिक स्थायी है और यह p कक्षक की तुलना में नाभिक के अधिक पास है (भेदन क्षमता अधिक)। इसमें से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जबकि B (\( 2p^1 \)) का p इलेक्ट्रॉन आसानी से निकल जाता है। इसलिए B की आयनन एंथैल्पी, Be की आयनन एंथैल्पी से कम होती है।
In simple words: बोरॉन की आयनन एंथैल्पी बेरिलियम से कम होती है क्योंकि बेरिलियम के पास एक स्थिर भरा हुआ s-कक्षक होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन निकालना मुश्किल होता है, जबकि बोरॉन का p-कक्षक आसानी से इलेक्ट्रॉन छोड़ देता है।
🎯 Exam Tip: आयनन एंथैल्पी के अपवादों को समझते समय, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (पूर्ण-पूरित या अर्ध-पूरित) और भेदन क्षमता जैसे कारकों पर विचार करें।
Question 39. ऑक्सीजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान उच्च होता है। कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: जब किसी उदासीन परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन जुड़कर ऋणायन बनता है तो ऊर्जा मुक्त होती है। लेकिन जब दूसरा इलेक्ट्रॉन जुड़ता है तो पहले से बने ऋणायन के इलेक्ट्रॉनों और आने वाले इलेक्ट्रॉन के मध्य प्रतिकर्षण होता है। इस प्रतिकर्षण पर काबू पाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान धनात्मक होता है, यानी उच्च ऊर्जा की जरूरत होती है।
In simple words: ऑक्सीजन में दूसरा इलेक्ट्रॉन जोड़ना मुश्किल होता है और इसके लिए ऊर्जा देनी पड़ती है, क्योंकि पहला इलेक्ट्रॉन लेने के बाद जो ऋणायन बनता है, वह नए इलेक्ट्रॉन को दूर धकेलता है।
🎯 Exam Tip: द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता के धनात्मक मान का कारण 'इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण' है, जिसे स्पष्ट रूप से बताएं।
RBSE Class 11 Chemistry Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 41. आवर्त सारणी के दीर्घ स्वरूप पर एक टिप्पणी लिखिए। इस स्वरूप के विभिन्न अभिलक्षणों का विवेचन कीजिए। इसकी क्या – क्या कमियाँ हैं?
Answer: आवर्त सारणी का आधुनिक या दीर्घ रूप तत्वों को उनके परमाणु क्रमांक के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करके प्राप्त होता है। यह मेंडलीव की आवर्त सारणी की तुलना में अधिक विस्तृत है और इसे बोर ने दिया था।
आधुनिक आवर्त सारणी की विशेषताएँ तथा महत्त्वपूर्ण बिन्दु -
- 1. यह आवर्त सारणी परमाणु क्रमांक पर आधारित है। किसी उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या परमाणु क्रमांक के बराबर होती है, इसलिए किसी तत्व की आवर्त सारणी में स्थिति इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर निर्धारित होती है। तत्वों के गुण इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर ही निर्भर करते हैं।
- 2. इस आवर्त सारणी में धातुओं तथा अधातुओं को पूर्ण रूप से पृथक् कर दिया गया है। वर्ग संख्या 1 से 12 तक के तत्व धातु हैं, और वर्ग संख्या 13 से 18 तक के तत्वों में धातु, उपधातु तथा अधातु होते हैं। बोरॉन (B), सिलिकॉन (Si), आर्सेनिक (As), टेल्यूरियम (Te) व एस्टेटाइन (At) के नीचे खींची गयी सीढ़ीनुमा रेखा, आवर्त सारणी को धातुओं (बाएँ) तथा अधातुओं (दाएँ) में विभाजित करती है।
- 3. उत्कृष्ट गैसों (अक्रिय गैसों) में उपकोश पूर्ण हो जाता है। अतः, इन्हें आवर्त सारणी के अंत में 18वें वर्ग में रखा गया है।
- 4. समस्थानिकों तथा समभारिकों की स्थिति की समस्या समाप्त हो गयी है।
- 5. मेंडलीव की आवर्त सारणी के एक ही वर्ग के उपवर्गों को अलग-अलग स्थान देने से विभिन्न गुणों वाले तत्व एक वर्ग में न रहकर भिन्न-भिन्न वर्गों में चले गए हैं।
- 6. मेंडलीव की आवर्त सारणी में समान गुणों वाले तत्वों को एक ही वर्ग में रखने के लिए परमाणु भार के बढ़ते क्रम में व्यवधान उत्पन्न हो गया था लेकिन परमाणु क्रमांक के बढ़ते क्रम के कारण ये स्वतः ही उस क्रम में आ जाते हैं।
- 7. इस आवर्त सारणी से तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को आसानी से समझा जा सकता है।
- 10. वर्ग संख्या 1, 2 व 12 से 17 के तत्वों को प्रसामान्य तत्व (Normal Elements) या प्रतिनिधि तत्व (Representative Elements) कहा जाता है।
- 11. वर्ग संख्या 3 से 11 तक के तत्वों को संक्रमण तत्व कहा जाता है।
- 12. लैंथेनॉइडों तथा एक्टिनॉइडों को सामूहिक रूप से आंतरिक संक्रमण तत्व कहते हैं तथा इन्हें तीसरे वर्ग से संबंधित माना जाता है।
आधुनिक आवर्त सारणी के दोष:
- 1. हाइड्रोजन की स्थिति दीर्घ आवर्त सारणी में भी स्पष्ट नहीं है। हाइड्रोजन के गुणों में क्षार धातुओं और हैलोजनों दोनों के साथ समानता है, जिससे इसे एक निश्चित स्थान देना मुश्किल हो जाता है।
- 2. लैंथेनॉइडों तथा एक्टिनॉइडों को मुख्य आवर्त सारणी में स्थान नहीं दिया जा सका है तथा इन्हें आवर्त सारणी के नीचे ही पृथक् से रखा गया है। इससे आवर्त सारणी की निरंतरता बाधित होती है।
- 3. हीलियम एक उत्कृष्ट गैस है लेकिन इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (\( 1s^2 \)) अन्य उत्कृष्ट गैसों (\( ns^2np^6 \)) से भिन्न है। इसे समूह 18 में रखना इसके विन्यास के अनुरूप नहीं है।
- 4. लगभग समान गुण वाले तत्वों को पृथक्-पृथक् वर्गों में रखा गया है, जैसे \( Ba \) व \( Pb \) तथा \( Cu \) व \( Hg \)। इससे तत्वों के गुणों की समानता का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता।
In simple words: नई आवर्त सारणी तत्वों को उनके परमाणु नंबर के हिसाब से लगाती है, जिससे उनके गुण और इलेक्ट्रॉन व्यवस्था समझना आसान हो जाता है। इसमें धातु और अधातु अलग-अलग होते हैं, और खाली जगहों की समस्या खत्म हो जाती है। लेकिन इसमें हाइड्रोजन की जगह साफ नहीं है और लैंथेनाइड-एक्टिनाइड को अलग रखना पड़ता है।
🎯 Exam Tip: दीर्घ आवर्त सारणी की विशेषताओं और कमियों को क्रमबद्ध रूप से लिखें। परमाणु क्रमांक पर आधारित होने और हाइड्रोजन के स्थान की अनिश्चितता को मुख्य बिंदुओं के रूप में उजागर करें।
Question 42. परमाणु त्रिज्या किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक तथा इसकी आवर्तिता को समझाइए।
Answer: परमाण्वीय त्रिज्या:
परमाणु के नाभिक तथा बाह्यतम कोश (जहां पर इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं) के बीच की दूरी को परमाणु त्रिज्या कहते हैं। एकल गैसीय परमाणु की परमाणु त्रिज्या का सही-सही निर्धारण करना बहुत मुश्किल है क्योंकि इसका मान बहुत कम होता है। साथ ही, तरंग यांत्रिकी के अनुसार परमाणु के चारों ओर उपस्थित इलेक्ट्रॉन अभ्र की कोई स्पष्ट परिसीमा नहीं होती है। अतः, प्रायोगिक विधि से परमाणु त्रिज्या का निर्धारण संभव नहीं है और इसे अप्रत्यक्ष विधि से ज्ञात किया जाता है, जिसमें संयुक्त अवस्था में परमाणुओं के बीच की दूरी के आधार पर परमाणु त्रिज्याओं का आकलन किया जाता है। यह दूरी X-किरण विवर्तन, इलेक्ट्रॉन विवर्तन, न्यूट्रॉन विवर्तन या NMR स्पेक्ट्रमी अध्ययन द्वारा ज्ञात की जाती है।
1. सहसंयोजक त्रिज्या:
सहसंयोजक अणुओं में, एकल आबंध से जुड़े हुए दो समान अधात्विक परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी (सहसंयोजक बन्ध दूरी) को अंतरापरमाणुक दूरी या अंतरानाभिकीय दूरी कहते हैं। इस दूरी का आधा परमाणु त्रिज्या कहलाता है। इसे सहसंयोजक त्रिज्या भी कहते हैं।
\( d_{(a - a)} = r_a + r_a \)
\( r_a = \frac{d_{a-a}}{2} \)
उदाहरण:
क्लोरीन अणु \( Cl_2 \) में क्लोरीन परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी (बन्ध लम्बाई) 198 pm होती है। अतः, क्लोरीन की सहसंयोजक त्रिज्या \( \frac{198}{2} = 99 \text{ pm} \) होती है।
2. धात्विक त्रिज्या:
जब धातु परमाणुओं की त्रिज्या ज्ञात की जाती है तो इसे धात्विक त्रिज्या कहा जाता है। धातुओं के जालक में दो पास-पास स्थित धातु परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी (अंतरानाभिकीय दूरी) का आधा, धात्विक त्रिज्या कहलाती है। जैसे कॉपर धातु में दो पास-पास स्थित कॉपर परमाणुओं के बीच की दूरी 256 pm है, अतः कॉपर की धात्विक त्रिज्या का मान 128 pm होगा। धात्विक त्रिज्या का मान सहसंयोजी त्रिज्या से अधिक होता है लेकिन वान्डर वाल त्रिज्या के मान से कम होता है, क्योंकि सहसंयोजक बन्ध में तो दो परमाणु अतिव्यापन द्वारा संगलित (fused) होते हैं जबकि धात्विक बन्ध में दो धातु परमाणु निकटस्थ रूप से संकुलित (Packed) होते हैं।
3. वान्डर वाल त्रिज्या:
अणुओं के मध्य एक दुर्बल आकर्षण बल पाया जाता है जिसे वान्डर वाल बल कहते हैं। किसी तत्व के दो अणुओं के पास-पास स्थित अबन्धित परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी के आधे को वान्डर वाल त्रिज्या कहते हैं। उत्कृष्ट गैसों की परमाणु त्रिज्या ज्ञात नहीं की जा सकती है क्योंकि वे अणु नहीं बनाती हैं। अतः, इनकी वान्डरवाल त्रिज्या ज्ञात की जाती है जो कि परमाणु त्रिज्या से अधिक होती है। वान्डर वाल त्रिज्या का मान पदार्थ की भौतिक अवस्था पर भी निर्भर करता है। अतः, ठोस अवस्था में यह अधिकतम होता है।
एक सूत्र \( d_{A-B} = r_A + r_B - 0.09 (X_A - X_B) \) भी है, जहाँ \( r_A \) और \( r_B \) परमाणु त्रिज्याएँ हैं, और \( X_A \) व \( X_B \) विद्युतऋणताएँ हैं। यह सूत्र शोमाकर तथा स्टीवेन्सन ने दिया था।
लम्बाई के आधार पर उपरोक्त प्रकार की त्रिज्याओं का घटता हुआ क्रम निम्नानुसार है –
वान्डरवाल्स त्रिज्या > धात्विक त्रिज्या > परमाण्वीय त्रिज्या
परमाणु त्रिज्या को प्रभावित करने वाले कारक:
प्रभावी नाभिकीय आवेश –
1. नाभिक द्वारा बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करना प्रभावी नाभिकीय आवेश कहलाता है। इसे \( Z_{eff} \) द्वारा व्यक्त किया जाता है। \( Z_{eff} \) बढ़ने पर परमाणु त्रिज्या का मान घटता है।
परमाणु त्रिज्या \( \propto \frac{1}{Z_{eff}} \)
2. कोश की संख्या:
मुख्य क्वांटम संख्या (\( n \)) या कोशों की संख्या का मान बढ़ने पर परमाणु त्रिज्या का मान भी बढ़ता है।
परमाणु त्रिज्या \( \propto \) कोशों की संख्या
3. परिरक्षण प्रभाव या आवरण प्रभाव:
मध्यवर्ती कोश के इलेक्ट्रॉनों का, बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों पर डाला गया वह प्रतिकर्षी प्रभाव जिसके कारण बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन नाभिक का आकर्षण कम अनुभव करते हैं, परिरक्षण प्रभाव कहलाता है। इस प्रभाव के कारण परमाणु के संयोजी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया गया \( Z_{eff} \) नाभिक में उपस्थित वास्तविक नाभिकीय आवेश से कम हो जाता है, जिससे परमाणु त्रिज्या का मान बढ़ता है।
4. बंध की संख्या:
सहसंयोजक त्रिज्या बंधों की संख्या पर भी निर्भर करती है। सहसंयोजक बंधों की संख्या बढ़ने पर परमाणु त्रिज्या का मान कम होता है।
परमाणु त्रिज्या में आवर्तिता:
आवर्त सारणी के किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर परमाणु त्रिज्या का मान कम होता जाता है क्योंकि कोश तो वही रहता है। उसी कोश में इलेक्ट्रॉन भरते जाते हैं लेकिन नाभिकीय आवेश (परमाणु क्रमांक) में वृद्धि होने के कारण, नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ता है, जिससे इलेक्ट्रॉन अभ्र सिकुड़ता है। इस प्रकार किसी आवर्त में क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या अधिकतम तथा हैलोजनों की परमाणु त्रिज्या न्यूनतम होती है जैसा कि द्वितीय तथा तृतीय आवर्त के तत्वों की परमाणु त्रिज्या के मान नीचे सारणी में स्पष्ट है।
| द्वितीय आवर्त के तत्त्व | Li | Be | B | C | N | O | F |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| परमाणु त्रिज्या | 152 | 111 | 88 | 77 | 75 | 74 | 72 |
| तृतीय आवर्त के तत्त्व | Na | Mg | Al | Si | P | S | Cl |
| परमाणु त्रिज्या | 186 | 160 | 143 | 117 | 110 | 104 | 99 |
संक्रमण तत्वों में बाएँ से दाएँ जाने पर परमाणु त्रिज्या में कमी बहुत कम होती है अथवा आकार लगभग समान रहता है क्योंकि इलेक्ट्रॉन उपान्त्य [(n - 1)d] कोश में भरते हैं, जिनका परिरक्षण प्रभाव, नाभिकीय आकर्षण बल को काफी हद तक संतुलित कर देता है। d-ब्लॉक में \( 4d \) श्रेणी तथा \( 5d \) श्रेणी के तत्वों का परमाणु आकार लगभग समान होता है जिसका मुख्य कारण लैंथेनॉइड संकुचन है।
सारणी – वर्ग 1 तथा वर्ग 17 के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्या के मान (pm) (यह सारणी पृष्ठ 15 पर है।)
In simple words: परमाणु त्रिज्या, नाभिक और सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी है। यह प्रभावित होती है कि नाभिक इलेक्ट्रॉन को कितना खींचता है, कितने ऊर्जा स्तर हैं, और इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को कितना धकेलते हैं। आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर यह घटती है, और समूह में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती है।
🎯 Exam Tip: परमाणु त्रिज्या की परिभाषा, इसके विभिन्न प्रकार (सहसंयोजक, धात्विक, वान्डरवाल्स), प्रभावित करने वाले कारक (प्रभावी नाभिकीय आवेश, कोशों की संख्या, परिरक्षण प्रभाव, बंध की संख्या), और आवर्त सारणी में इसकी आवर्तिता को विस्तृत रूप से समझाएं।
Question 42. परमाणु त्रिज्या किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक तथा इसकी आवर्तिता को समझाइए।
Answer:
**[Continuing from page 14: periodicity of atomic radius along groups]**
वर्ग 1 तथा वर्ग 17 के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्या के मान (pm)
| Rb | 244 | I | 133 |
|---|---|---|---|
| Cs | 262 | At | 140 |
उत्कृष्ट गैसों की वान्डरवाल्स त्रिज्या को ही परमाण्वीय त्रिज्या माना जाता है, इसलिए इनके आकार आवर्त में सबसे बड़े होते हैं। आवर्त सारणी में किसी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर मुख्य क्वांटम संख्या \( (n) \) का मान बढ़ता जाता है, जिसका मतलब है कि नया कोश जुड़ता जाता है। इस कारण संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होते जाते हैं क्योंकि आंतरिक ऊर्जा स्तरों में भरे इलेक्ट्रॉन बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आकर्षण बल को कम कर देते हैं, जिसे परिरक्षण प्रभाव कहते हैं। इसी वजह से परमाणु त्रिज्या का मान बढ़ता है, जैसा कि वर्ग 1 तथा वर्ग 17 के तत्त्वों के परमाणु आकार के मानों से स्पष्ट है। इसी तरह, वर्ग 1 (क्षार धातु) और वर्ग 17 (हैलोजन) के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्या में भी परिवर्तन होता है।
**आयनिक त्रिज्या:**
1. आयनिक त्रिज्या किसी आयन का आकार बताती है। किसी आयन के नाभिक और उसके अंतिम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी, जहाँ तक आयन का आयनिक बंध में प्रभाव रहता है, उसे आयनिक त्रिज्या कहते हैं।
2. इसे आयनिक क्रिस्टल में स्थित धनायन और ऋणायन के बीच की दूरी के आधार पर ज्ञात किया जाता है।
3. किसी परमाणु में से इलेक्ट्रॉनों के निकलने से धनायन बनते हैं।
4. धनायन की त्रिज्या हमेशा उसके जनक परमाणु से कम होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इलेक्ट्रॉनों की संख्या तो कम हो जाती है, लेकिन नाभिकीय आवेश (प्रोटॉनों की संख्या) तथा प्रभावी नाभिकीय आवेश \( (Z_{\text{eff}}) \) उतना ही रहता है। इस वजह से इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन अभ्र सिकुड़ता है। उदाहरण के लिए, \( \text{Na}^+ \) आयन की त्रिज्या \( \text{Na} \) परमाणु की त्रिज्या से कम होती है।
\( \text{Na}^+ < \text{Na} \)
(95pm) (186pm)
\( \text{Z} = 11, \text{e}^- = 10 \quad \text{Z} = 11, \text{e}^- = 11 \)
जैसे-जैसे धनायन पर आवेश बढ़ता है, वैसे-वैसे \( \text{Z}_{\text{eff}} \) का मान बढ़ेगा, जिससे धनायनिक त्रिज्या का मान कम होगा।
\( \text{Na}^+ > \text{Mg}^{2+} > \text{Al}^{3+} \)
इसी प्रकार \( \text{Fe} > \text{Fe}^{2+} > \text{Fe}^{3+} \)
5. धनायन बनते समय, यदि बाह्यतम कोश पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तो धनायन की त्रिज्या, परमाणु त्रिज्या की तुलना में बहुत कम होती है। उदाहरण के लिए, \( \text{Mg} \) की त्रिज्या \( 1.36 \text{ Å} \) होती है, जबकि \( \text{Mg}^{2+} \) की त्रिज्या \( 0.65 \text{ Å} \) होती है। ऐसा सभी क्षार धातुओं तथा क्षारीय मृदा धातुओं में होता है।
\( \text{Mg}_{(2, 8, 2)} \xrightarrow{-2\text{e}^-} \text{Mg}^{2+}_{(2, 8)} \)
जैसे-जैसे ऋणायन पर आवेश बढ़ता है, वैसे-वैसे इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन में प्रतिकर्षण बढ़ेगा, जिससे ऋणायनिक त्रिज्या का मान बढ़ेगा।
\( \text{F}^- < \text{O}^{2-} < \text{N}^{3-} \)
इसी प्रकार \( \text{O} < \text{O}^- < \text{O}^{2-} \)
8. आयनिक त्रिज्या में आवर्तिता भी सामान्यतः परमाणु त्रिज्या के समान होती है। जैसे, वर्ग में आयनिक त्रिज्या बढ़ती है और आवर्त में आयनिक त्रिज्या कम होती है।
**उदाहरण:**
\( \text{Li}^+ < \text{Na}^+ < \text{K}^+ < \text{Rb}^+ < \text{Cs}^+ \) (वर्ग)
\( \text{F}^- < \text{Cl}^- < \text{Br}^- < \text{I}^- \) (वर्ग)
\( \text{Na}^+ > \text{Mg}^{2+} > \text{Al}^{3+} \) (आवर्त)
**समइलेक्ट्रॉनीय स्पीशीज तथा उनका आकार:**
विभिन्न परमाणुओं तथा आयनों में जब इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, तो इन्हें समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज कहते हैं।
**उदाहरण:**
\( \text{O}^{2-}, \text{F}^-, \text{Na}^+, \text{Mg}^{2+} \) इन सभी स्पीशीज में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान (10) है। लेकिन इनमें नाभिकीय आवेश अलग-अलग होते हैं। अधिक धनावेशित स्पीशीज की त्रिज्या का मान कम होता है, क्योंकि इनमें इलेक्ट्रॉनों की तुलना में प्रोटॉनों की संख्या अधिक होती है। इस वजह से नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण अधिक होता है। इसके विपरीत, अधिक ऋणावेशित स्पीशीज की त्रिज्या अधिक होती है, क्योंकि इनमें प्रोटॉनों की तुलना में इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इस वजह से इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रतिकर्षण, नाभिकीय आवेश से अधिक हो जाता है, जिससे नाभिकीय आकर्षण बल कम हो जाता है। जैसे-
| इलेक्ट्रॉनों की संख्या | स्पीशीज (आकार का बढ़ता क्रम) |
|---|---|
| \( \text{2e}^- \) | \( \text{B}^{3+} < \text{Be}^{2+} < \text{Li}^+ < \text{He} < \text{H}^- \) |
| \( \text{10e}^- \) | \( \text{Al}^{3+} < \text{Mg}^{2+} < \text{Na}^+ < \text{Ne} < \text{F}^- < \text{O}^{2-} < \text{N}^{3-} \) |
| \( \text{18e}^- \) | \( \text{Sc}^{3+} < \text{Ca}^{2+} < \text{K}^+ < \text{Ar} < \text{Cl}^- < \text{S}^{2-} < \text{P}^{3-} \) |
In simple words: परमाणु त्रिज्या, आयनिक त्रिज्या, और समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज का आकार आवर्त सारणी में कुछ खास पैटर्न दिखाते हैं। ये पैटर्न मुख्य रूप से नाभिकीय आवेश, कोशों की संख्या और परिरक्षण प्रभाव से प्रभावित होते हैं।
🎯 Exam Tip: जब भी त्रिज्या के ट्रेंड्स (आवर्तिता) पर प्रश्न हो, तो परमाणु क्रमांक, प्रभावी नाभिकीय आवेश, और कोशों की संख्या जैसे कारकों का उल्लेख ज़रूर करें।
Question 43. किसी तत्त्व की आयनन एन्थैल्पी से आप क्या समझते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक तथा इसकी आवर्तिता को समझाइए।
Answer:
आयनन एन्थैल्पी को सामान्यतया \( \text{kJ mol}^{-1} \) या इलेक्ट्रॉन वोल्ट \( (\text{ev}) \) में व्यक्त किया जाता है और यह हमेशा धनात्मक होती है। इससे पता चलता है कि किसी तत्त्व की आयनन एन्थैल्पी का मान कम होने पर उस परमाणु को आसानी से धनायन में बदला जा सकता है। किसी परमाणु में से पहले, दूसरे और तीसरे इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को क्रमशः प्रथम आयनन एन्थैल्पी \( (\text{IE1}) \), द्वितीय आयनन एन्थैल्पी \( (\text{IE2}) \) तथा तृतीय आयनन एन्थैल्पी \( (\text{IE3}) \) कहते हैं।
\( \text{X}_{(\text{g})} + \text{IE1} \rightarrow \text{X}_{(\text{g})}^+ + \text{e}^- \)
\( \text{X}_{(\text{g})}^+ + \text{IE2} \rightarrow \text{X}_{(\text{g})}^{2+} + \text{e}^- \)
\( \text{X}_{(\text{g})}^{2+} + \text{IE3} \rightarrow \text{X}_{(\text{g})}^{3+} + \text{e}^- \)
इन आयनन एन्थैल्पी मानों का क्रम इस प्रकार होता है -
\( \text{IE1} < \text{IE2} < \text{IE3} \)
किसी तत्त्व की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी, प्रथम आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है, क्योंकि उदासीन परमाणु की तुलना में धनावेशित आयन में प्रभावी नाभिकीय आवेश अधिक होता है। इस वजह से बाह्यतम इलेक्ट्रॉन और नाभिक के बीच आकर्षण बल बढ़ जाता है, जिससे दूसरे इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार, तृतीय आयनन एन्थैल्पी भी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है। जब केवल आयनन एन्थैल्पी दी होती है, तो इसे प्रथम आयनन एन्थैल्पी माना जाता है। परमाणु क्रमांक 1 से 60 तक वाले तत्त्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी तथा परमाणु क्रमांक में संबंध एक ग्राफ में दिखाया जाता है।
**आयनन एन्थैल्पी को प्रभावित करने वाले कारक:**
**2. प्रभावी नाभिकीय आवेश:**
किसी आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर नाभिकीय आवेश और प्रभावी नाभिकीय आवेश \( (Z_{\text{eff}}) \) दोनों बढ़ते हैं। इस कारण बाह्यतम इलेक्ट्रॉन पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ जाता है और आयनन एन्थैल्पी का मान भी बढ़ता है। द्वितीय आवर्त के तत्त्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मानों का बढ़ता क्रम इस प्रकार होता है -
| 2nd आवर्त | Li(3) | Be(4) | B(5) | C(6) | N(7) | O(8) | F(9) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| \( Z_{\text{eff}} \) | 1.30 | 1.95 | 2.60 | 3.25 | 3.90 | 4.55 | 5.20 |
| आयनन एन्थैल्पी (kJ/mol) | 520 | 899 | 801 | 1086 | 1403 | 1314 | 1681 |
इनके परमाणु क्रमांक तथा आयनन एन्थैल्पी मानों के बीच के संबंध को एक ग्राफ में दिखाया जाता है।
**3. परिरक्षण प्रभाव या आवरणी प्रभाव:**
परमाणुओं में आंतरिक कोशों के इलेक्ट्रॉन (क्रोडीय इलेक्ट्रॉन) नाभिक तथा संयोजी इलेक्ट्रॉन के बीच मौजूद होते हैं। इस कारण संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक से परिरक्षित हो जाते हैं, मतलब उस पर नाभिकीय आकर्षण बल कम हो जाता है। इस प्रभाव को परिरक्षण प्रभाव (Shielding Effect) या आवरणी प्रभाव (Screening Effect) कहते हैं। आवरणी-प्रभाव के कारण परमाणु के संयोजी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया गया प्रभावी नाभिकीय आवेश (Effective Nuclear Charge) नाभिक के वास्तविक नाभिकीय आवेश से कम हो जाता है।
आवरणी-प्रभाव उस स्थिति में सबसे प्रभावी होता है, जब आंतरिक कोश पूर्ण भरा होता है। यह स्थिति क्षार धातुओं में होती है, जिनमें \( \text{ns}^1 \) इलेक्ट्रॉन से पहले के कोश में उत्कृष्ट गैस का पूर्णपूरित विन्यास होता है। आंतरिक कोशों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ने पर परिरक्षण प्रभाव बढ़ता है, जिससे नाभिकीय आकर्षण बल कम हो जाता है। इस वजह से आयनन एन्थैल्पी का मान भी कम होता है।
**4. कक्षक का प्रकार:**
कक्षक का प्रकार भी आयनन एन्थैल्पी को प्रभावित करता है। \( \text{s} \)-कक्षक में से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए \( \text{p} \)-कक्षक की तुलना में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, क्योंकि \( \text{s} \)-कक्षक नाभिक के अधिक पास होता है और उसकी भेदन क्षमता अधिक होती है। उदाहरण के लिए, बोरॉन \( (\text{Z} = 5) \) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी बेरिलियम \( (\text{Z} = 4) \) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम होती है, जबकि बोरॉन का नाभिकीय आवेश अधिक है। बेरिलियम में इलेक्ट्रॉन \( \text{2s} \) में से निकलता है, जबकि बोरॉन में इलेक्ट्रॉन \( \text{2p} \) में से निकलता है। \( \text{2s} \) की ऊर्जा \( \text{2p} \) से कम है, इसलिए \( \text{2s} \) अधिक स्थायी है और \( \text{2s} \) की भेदन क्षमता \( \text{2p} \) से अधिक है। इसी तरह, एल्युमीनियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम होती है।
**5. अर्धपूरित एवं पूर्णपूरित कक्षकों का स्थायित्व:**
अर्धपूरित \( (\text{p}^3, \text{d}^5, \text{f}^7) \) तथा पूर्ण पूरित \( (\text{p}^6, \text{d}^{10}, \text{f}^{14}) \) विन्यास वाले कक्षक अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि इनमें इलेक्ट्रॉनों का सममित वितरण होता है और इनकी स्थायीकरण ऊर्जा का मान भी अधिक होता है। इस वजह से ऐसे विन्यास वाले कक्षकों में से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए आयनन एन्थैल्पी का मान भी अधिक होता है। लेकिन पूर्ण पूरित विन्यास, अर्धपूरित विन्यास से भी अधिक स्थायी होता है। इसी कारण उत्कृष्ट गैसों की आयनन एन्थैल्पी का मान अपने आवर्त में सबसे अधिक होता है क्योंकि इनमें पूर्ण पूरित कोश स्थायी विन्यास \( (\text{ns}^2\text{np}^6) \) होता है, जिसमें से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन \( (\text{Z} = 7) \) तथा फॉस्फोरस \( (\text{Z} = 15) \) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मान क्रमशः ऑक्सीजन \( (\text{Z} = 8) \) तथा सल्फर \( (\text{Z} = 16) \) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मानों से अधिक होते हैं क्योंकि \( \text{N} \) तथा \( \text{P} \) में अर्धपूरित \( (\text{2p}^3 \) तथा \( \text{3p}^3) \) विन्यास होता है जो कि \( \text{O} \) तथा \( \text{S} \) के विन्यास \( (\text{2p}^4 \) तथा \( \text{3p}^4) \) से अधिक स्थायी है, जिसमें से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
**6. मुख्य क्वांटम संख्या:**
मुख्य क्वांटम संख्या के मान में वृद्धि के साथ-साथ संयोजी इलेक्ट्रॉन और नाभिक के बीच की दूरी बढ़ती है, जिससे नाभिकीय आकर्षण कम होता है, अतः आयनन एन्थैल्पी का मान घटता है।
\( \text{IE} \propto \frac{1}{\text{Z}_{\text{eff}}} \)
**7. परमाणु या आयन पर कुल आवेश:**
उदासीन परमाणु की तुलना में धनावेशित आयन से इलेक्ट्रॉन को निकालना कठिन होता है क्योंकि धनायन का आकार छोटा होता है और इसमें प्रभावी नाभिकीय आवेश अधिक होता है। अतः \( \text{IE} \) का क्रम इस प्रकार होगा -
\( \text{M}^+ < \text{M}^{2+} < \text{M}^{3+} < \text{M}^{4+} \)
**आयनन एन्थैल्पी में आवर्त के अनुदिश आवर्तिता:**
आवर्त सारणी के किसी आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर परमाणु आकार में कमी होती है, इसलिए आयनन एन्थैल्पी का मान बढ़ता है क्योंकि बाह्यतम इलेक्ट्रॉन पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ता है। इस कारण इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः, किसी आवर्त में क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी का मान सबसे कम होता है क्योंकि इनका परमाणु आकार बड़ा होने के कारण ये आसानी से इलेक्ट्रॉन त्याग देते हैं।
**नोट –**
एल्युमीनियम तथा गैलियम के प्रथम आयनन एन्थैल्पी मान लगभग समान होते हैं क्योंकि एल्युमीनियम से गैलियम तक जाने पर बीच में 10 संक्रमण तत्त्व आते हैं।
**आयनन एन्थैल्पी में वर्ग के अनुदिश आवर्तिता:**
आवर्त सारणी के किसी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ता है, इसलिए आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता है। परमाणु आकार बढ़ने पर बाह्यतम इलेक्ट्रॉन की नाभिक से दूरी बढ़ती है, जिससे उस इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला नाभिकीय आकर्षण बल कम हो जाता है, अतः उसे परमाणु से पृथक् करने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जैसे, क्षार धातुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मानों का घटता क्रम इस प्रकार होता है -
| I वर्ग | Li(3) | Na(11) | K(19) | Rb(37) | Cs(55) |
|---|---|---|---|---|---|
| परमाण्वीय त्रिज्या (\( \text{Å} \)) | 1.30 | 1.95 | 2.60 | 3.25 | 3.55 |
| आयनन एन्थैल्पी (kJ/mol) | 520 | 496 | 419 | 403 | 376 |
आवर्त सारणी के किसी वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर जाने पर आंतरिक कोशों की संख्या में वृद्धि होती है, जिससे परिरक्षण प्रभाव बढ़ता है जो कि नाभिकीय आवेश की तुलना में अधिक होता है। इस कारण वर्ग में आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता है। संक्रमण तत्त्वों में भी आयनन एन्थैल्पी कम होती है क्योंकि परमाणु आकार बढ़ता है।
In simple words: आयनन एन्थैल्पी वह ऊर्जा है जो परमाणु से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए चाहिए। यह नाभिक के खिंचाव, इलेक्ट्रॉन के छिपने के प्रभाव और भरे हुए कोशों जैसे कई कारणों से बदलती है।
🎯 Exam Tip: आयनन एन्थैल्पी को प्रभावित करने वाले कारकों को अच्छी तरह समझें, खासकर पूर्ण और अर्ध-पूर्ण कक्षकों के स्थायित्व के कारण होने वाले अपवादों को याद रखें।
Question 44. विद्युतऋणता के मुख्य अनुप्रयोग क्या हैं?
Answer: विद्युतऋणता के मुख्य अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
| बन्ध का सम्मपन ऊर्जा (Kcalmol-\( ^1 \)) | -04.0 | -22.0 | -12.3 | -1 |
**1. तत्त्वों का धात्विक तथा अधात्विक गुण:**
अधातु तत्त्वों में इलेक्ट्रॉन लेने की प्रवृत्ति अधिक होती है, इसलिए विद्युतऋणात्मकता अधातु गुण का माप है। इस कारण आवर्त में अधातु गुण बढ़ता है, जबकि वर्ग में अधातु गुण कम होता है, जिसका मतलब है कि धातु गुण बढ़ता है।
**2. सहसंयोजक बंध में आंशिक आयनिक गुण:**
दो समान परमाणुओं (जिनकी विद्युतऋणता समान हो) के बीच बने बंध को शुद्ध सहसंयोजी बंध कहते हैं, जैसे \( \text{H}_2, \text{Cl}_2 \) इत्यादि। लेकिन जब दो अलग-अलग परमाणुओं के बीच बंध बनता है, तो बंध में ध्रुवता आ जाती है क्योंकि साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक विद्युत ऋणी परमाणु की ओर विस्थापित हो जाता है। इस प्रकार के बंध को ध्रुवीय सहसंयोजी बंध कहते हैं, जैसे \( \text{H}^{\delta+} - \text{Cl}^{\delta-} \)। \( \text{Cl} \) की विद्युतऋणता \( (\text{E.N.}) \) \( \text{H} \) की विद्युतऋणता से अधिक होती है, इसलिए ध्रुवीय सहसंयोजी बंध में आंशिक आयनिक लक्षण आ गया है। दो परमाणुओं की विद्युतऋणता में जितना अधिक अंतर होगा, बंध में आयनिक लक्षण भी उतना ही अधिक होगा। हैनी तथा स्मिथ ने किसी बंध का प्रतिशत आयनिक गुण ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित संबंध दिया: यदि परमाणु \( \text{A} \) तथा \( \text{B} \) के मध्य बंध बना है, तो बंध में % आयनिक गुण -
\( = (0.16\Delta + 0.035\Delta^2) \times 100 \)
\( = 16\Delta + 3.5\Delta^2 \)
यहाँ \( \Delta = \) विद्युतऋणता में अंतर तथा \( \text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{B}} = \) तत्त्व \( \text{A} \) व \( \text{B} \) की विद्युतऋणता
अतः प्रतिशत आयनिक गुण \( = 16 (\text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{B}}) + 3.5 (\text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{B}})^2 \)
यहाँ \( \text{X}_{\text{A}} > \text{X}_{\text{B}} \)
इस सूत्र के अनुसार, विद्युतऋणता में अंतर 2.1 होने पर बंध में लगभग 50% आयनिक गुण होगा। जैसे -
\( \text{HF} > \text{HCl} > \text{HBr} > \text{HI} \)
बंध में आयनिक गुण का घटता क्रम
| आयनिक लक्षण की प्रतिशतता | H-F | H-Cl | H-Br | H-I |
|---|---|---|---|---|
| 43% | 17% | 13% | 7% |
**3. बंध सामर्थ्य:**
दो परमाणुओं के मध्य विद्युतऋणता में अंतर बढ़ने पर बंध सामर्थ्य तथा स्थायित्व बढ़ता है।
**उदाहरण:**
\( \text{HF} > \text{HCl} > \text{HBr} > \text{HI} \)
बंध सामर्थ्य को घटता क्रम (विद्युतऋणता में अंतर का घटता क्रम)
**4. ऑक्साइडों की क्षारीय तथा अम्लीय प्रवृत्ति:**
सामान्यतः आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर तत्त्वों के ऑक्साइडों की अम्लीय प्रकृति बढ़ती है क्योंकि तत्त्व की विद्युतऋणता बढ़ती है, जिससे ऑक्सीजन तथा तत्त्व की विद्युतऋणता में अंतर कम होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर तत्त्वों के ऑक्साइड की क्षारीय प्रकृति बढ़ती है। जब ऑक्सीजन तथा तत्त्व की विद्युतऋणता में अंतर 2.3 से अधिक होता है, तो ऑक्साइड क्षारीय होगा, और जब यह अंतर 2.3 से कम होता है, तो ऑक्साइड अम्लीय होगा।
अतः \( \text{X}_{\text{O}} - \text{X}_{\text{M}} > 2.3 \) क्षारीय ऑक्साइड
\( \text{X}_{\text{O}} - \text{X}_{\text{M}} < 2.3 \) अम्लीय ऑक्साइड
\( \text{X}_{\text{O}} = \) ऑक्सीजन की विद्युतऋणता
\( \text{X}_{\text{M}} = \) तत्त्व की विद्युतऋणता
**उदाहरण:**
| \( \text{Na}_2\text{O} \) | \( \text{MgO} \) | \( \text{Al}_2\text{O}_3 \) | \( \text{SiO}_2 \) | \( \text{P}_4\text{O}_4 \) | \( \text{SO}_3 \) | \( \text{Cl}_2\text{O}_7 \) | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| \( (\text{X}_{\text{O}} - \text{X}_{\text{M}}) \) | 2.3 | 2.1 | 1.8 | 1.5 | 1.1 | 0.7 | 2.5 |
| क्षारीय | उभय-धर्मी | दुर्बल अम्लीय | प्रबल अम्लीय | प्रबल अम्लीय | प्रबलतम अम्लीय | प्रबल क्षारीय |
क्षारीय गुण का घटता क्रम (अम्लीय गुण का बढ़ता क्रम)
**5. बंध लम्बाई ज्ञात करना:**
शोमाकर तथा स्टीवेन्सन के अनुसार ध्रुवीय सहसंयोजी बंध \( (\text{A} - \text{B}) \) की बंध लम्बाई
\( \text{d}_{\text{A} - \text{B}} = \text{r}_{\text{A}} + \text{r}_{\text{B}} - 0.09 (\text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{B}}) \)
या
\( \text{d}_{\text{A} - \text{B}} = \frac{1}{2} (\text{r}_{\text{A} - \text{A}} + \text{r}_{\text{B} - \text{B}}) - 0.09 (\text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{B}}) \)
यहाँ \( \text{r}_{\text{A}} = \text{A} \) की परमाणु त्रिज्या, \( \text{r}_{\text{B}} = \text{B} \) की परमाणु त्रिज्या
\( \text{X}_{\text{A}} = \text{A} \) की विद्युतऋणता, \( \text{X}_{\text{B}} = \text{B} \) की विद्युतऋणता तथा \( \text{X}_{\text{A}} > \text{X}_{\text{B}} \)
अध्रुवीय बंध के लिए \( \text{X}_{\text{A}} \approx \text{X}_{\text{B}} \)
अतः बंध लम्बाई \( \text{d}_{\text{A} - \text{B}} = \text{r}_{\text{A}} + \text{r}_{\text{B}} \)
उपरोक्त सूत्र से पता चलता है कि दो परमाणुओं के मध्य विद्युतऋणता में अंतर बढ़ने पर, बंध लम्बाई कम होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विद्युतऋणता में अंतर बढ़ने पर बंध का आयनिक गुण (ध्रुवता) बढ़ता है, जिससे परमाणुओं पर आवेश भी बढ़ता है, अतः उनके मध्य आकर्षण बढ़ता है जिससे बंध लम्बाई में कमी होती है।
**6. द्विअंगी अकार्बनिक यौगिकों का सूत्र लिखना तथा उनका IUPAC नामकरण:**
भिन्न-भिन्न तत्त्वों से बने यौगिकों को द्विअंगी यौगिक कहते हैं। अकार्बनिक द्विअंगी यौगिकों के सूत्र लिखते समय कम विद्युत ऋणी तत्त्व के संकेत को पहले और अधिक विद्युत ऋणी तत्त्व के संकेत को बाद में लिखा जाता है। यौगिक का नाम लिखने के लिए, पहले तत्त्व का नाम लिखा जाता है, फिर दूसरे तत्त्व के नाम में 'ide' लगाकर अंत में जोड़ा जाता है। यदि एक से अधिक परमाणु हों, तो उनके नाम से पहले उचित संख्यात्मक उपसर्ग (जैसे di-, tri-, tetra-) का उपयोग किया जाता है।
कुछ अपवाद भी हैं, जैसे \( \text{NH}_3 \) (अमोनिया), \( \text{NH}_2-\text{NH}_2 \) (हाइड्रेजीन), \( \text{NCl}_3 \) (नाइट्रोजन ट्राइक्लोराइड) तथा \( \text{N}_3\text{H} \) (हाइड्रेजोइक अम्ल)। नाम तथा सूत्र पारंपरिक रूप से चले आ रहे हैं, अतः इन्हें IUPAC द्वारा मान्यता दी गयी है।
**7. बंध कोण:**
\( \text{AB}_{\text{x}} \) अणु में \( \text{B} \) की विद्युतऋणता कम होने पर बंध कोण बढ़ता है, इसलिए \( \text{NH}_3 \) का बंध कोण \( \text{NF}_3 \) से अधिक होता है।
| अणु | \( \text{NF}_3 \) | \( \text{NH}_3 \) |
|---|---|---|
| बंध कोण | 102° | 107° |
\( \text{AB}_{\text{x}} \) अणु में केंद्रीय परमाणु \( \text{A} \) की विद्युतऋणता कम होने पर भी \( \text{B} - \text{A} - \text{B} \) बंध कोण घटता है।
| अणु | \( \text{NH}_3 \) | \( \text{PH}_3 \) | \( \text{AsH}_3 \) | \( \text{SbH}_3 \) |
|---|---|---|---|---|
| बंध कोण | 107° | 93.3° | 91.8° | 91.3° |
**8. यौगिकों के जल अपघटन की क्रियाविधि:**
विद्युतऋणता की सहायता से यौगिकों के जल अपघटन से प्राप्त उत्पादों की व्याख्या की जा सकती है। जैसे - \( \text{BCl}_3 \) के जल अपघटन से \( \text{HCl} \) तथा \( \text{H}_3\text{BO}_3 \) बनते हैं।
यह उत्पादों का बनना इस आधार पर समझाया जा सकता है कि \( \text{Cl} \) की \( \text{E.N.} \) \( \text{B} \) की \( \text{E.N.} \) से अधिक है, जिससे \( \text{Cl} \) पर आंशिक ऋणावेश तथा \( \text{B} \) पर आंशिक धनावेश आ जाता है। अतः, धनावेशित बोरोन, जल के ऋणावेशित \( \text{OH}^- \) से तथा ऋणावेशित क्लोरीन, जल के \( \text{H}^+ \) से क्रिया करके \( \text{B(OH)}_3 \) तथा \( \text{HCl} \) देते हैं। इसी प्रकार, \( \text{Cl}_2\text{O} \) के जल अपघटन से \( \text{HOCl} \) प्राप्त होता है।
**9. हाइड्रॉक्साइडों की अम्लीय तथा क्षारीय प्रवृत्ति:**
तत्त्वों के हाइड्रॉक्साइडों की अम्लीय तथा क्षारीय प्रवृत्ति की व्याख्या आयनन एन्थैल्पी के आधार पर की जा चुकी है, लेकिन विद्युतऋणता के आधार पर भी इनके अम्लीय तथा क्षारीय गुण की व्याख्या की जा सकती है। किसी तत्त्व \( (\text{A}) \) के हाइड्रॉक्साइड \( \text{AOH} \) के जलीय विलयन का आयनन दो प्रकार से हो सकता है -
1. \( \text{AOH} \rightleftharpoons \text{A}^+ + \text{OH}^- \) (क्षारीय हाइड्रॉक्साइड)
2. \( \text{AOH} \rightleftharpoons \text{AO}^- + \text{H}^+ \) (अम्लीय हाइड्रॉक्साइड)
यदि \( (\text{X}_{\text{A}} - \text{X}_{\text{O}}) \) \( > (\text{X}_{\text{O}} - \text{X}_{\text{H}}) \), तो \( \text{A} - \text{O} \) बंध की तुलना में \( \text{O} - \text{H} \) बंध अधिक ध्रुवीय होगा, अतः \( \text{AOH} \) के आयनन से \( \text{OH}^- \) प्राप्त होते हैं।
उदाहरण के लिए \( \text{NaOH} \) एक क्षार है और \( \text{HOCl} \) एक अम्ल है।
In simple words: विद्युतऋणता बताती है कि एक परमाणु दूसरे से इलेक्ट्रॉन कितनी शक्ति से खींचता है। यह बंधों के प्रकार (आयनिक या सहसंयोजी), उनके ध्रुवीय होने, और यौगिकों के गुणधर्म जैसे कि ऑक्साइडों की अम्लीय या क्षारीय प्रकृति को समझने में मदद करती है।
🎯 Exam Tip: विद्युतऋणता के अनुप्रयोगों को उदाहरणों के साथ याद रखें, विशेषकर बंधों में आयनिक लक्षण और ऑक्साइडों की अम्लीय/क्षारीय प्रवृत्ति वाले बिंदुओं को।
Question 45. इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक तथा इसकी आवर्तिता को समझाइए।
Answer:
**आवर्त सारणी में तत्त्वों की आवर्त प्रवृत्ति:**
आवर्त सारणी में तत्त्वों की आवर्त प्रवृत्ति को निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है। इसमें इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी, आयनन एन्थैल्पी, अधात्विक गुण, धात्विक गुण, परमाणु त्रिज्या और विद्युतऋणात्मकता जैसे गुणधर्मों को दर्शाया जाता है।
**इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी:**
किसी तत्त्व की तलस्थ अवस्था में एक मोल विलगित गैसीय परमाणु के संयोजकता कोश में इलेक्ट्रॉन के जुड़ने पर मुक्त ऊर्जा को उस तत्त्व की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी कहते हैं। इसका मतलब है कि जब कोई उदासीन गैसीय परमाणु \( (\text{X}) \) इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन में बदलता है, तो इस प्रक्रिया में हुए एन्थैल्पी परिवर्तन को 'इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी' \( (\Delta_{\text{eg}}\text{H}) \) कहते हैं। यह एन्थैल्पी परिवर्तन यह दर्शाता है कि कितनी आसानी से परमाणु इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करके ऋणायन बनाता है।
\( \text{X}_{(\text{g})} + \text{e}^- \rightarrow \text{X}^-_{(\text{g})} + \Delta_{\text{eg}}\text{H} \)
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को सामान्यतः \( \text{kJ mol}^{-1} \) में व्यक्त किया जाता है। किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन जुड़ने पर सामान्यतः ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, अतः इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ऋणात्मक होती है। किसी परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ने से प्राप्त ऋणायन में एक इलेक्ट्रॉन और जोड़ने पर ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं होता, बल्कि ऊर्जा का अवशोषण होता है। इसका मतलब है कि किसी परमाणु में दूसरा इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर ऊर्जा की आवश्यकता होती है क्योंकि जुड़ने वाले इलेक्ट्रॉन तथा ऋणायन के इलेक्ट्रॉन के मध्य प्रतिकर्षण होता है। अतः द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी हमेशा धनात्मक होती है।
**इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को प्रभावित करने वाले कारक तथा आवर्तिता:**
किसी गैसीय परमाणु में इलेक्ट्रॉन जोड़कर ऋणायन बनाने की प्रक्रिया में हुए एन्थैल्पी परिवर्तन के ऋणात्मक मान को इलेक्ट्रॉन बंधुता (Electron affinity) \( (\text{A}_{\text{e}}) \) के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। जब किसी परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने पर ऊर्जा उत्सर्जित होती है, तो इलेक्ट्रॉन बंधुता को धनात्मक माना जाता है, जो ऊष्मागतिकी की परंपरा के विपरीत है। यदि किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन जोड़ने के लिए बाहर से ऊर्जा देनी पड़ती है, तब इलेक्ट्रॉन बंधुता को ऋणात्मक माना जाता है और इलेक्ट्रॉन-बंधुता को परम शून्य ताप पर परिभाषित किया जाता है। इलेक्ट्रॉन बंधुता तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी में निम्नलिखित संबंध होता है – \( \Delta_{\text{eg}}\text{H} = -\text{A}_{\text{e}} - \text{RT} \)
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं -
**1. परमाण्वीय आकार:**
आवर्त सारणी में वर्ग में परमाणु आकार बढ़ने के कारण बाह्यतम कोश की नाभिक से दूरी बढ़ती है, अतः जुड़ने वाले इलेक्ट्रॉन तथा परमाणु के नाभिक के मध्य आकर्षण बल कम होता है, जिससे उत्सर्जित ऊर्जा का मान कम होता है। इसका मतलब है कि इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी कम ऋणात्मक होती है। इसके विपरीत, आवर्त में परमाणु आकार कम होने के कारण आने वाले इलेक्ट्रॉन पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ता है, अतः इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान बढ़ता है।
**2. प्रभावी नाभिकीय आवेश:**
प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ने पर आने वाले इलेक्ट्रॉन तथा परमाणु के नाभिक के मध्य आकर्षण बढ़ता है, जिससे इलेक्ट्रॉन के जुड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है और इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान अधिक ऋणात्मक होता है।
**4. अर्धपूरित तथा पूर्णपूरित कक्षकों का स्थायित्व:**
जब किसी तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अर्धपूरित या पूर्णपूरित होता है, तो वह तुलनात्मक रूप से अधिक स्थायी होता है। इस कारण इसमें इलेक्ट्रॉन जोड़ना मुश्किल होता है और उत्सर्जित ऊर्जा (इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी) का मान भी कम होता है। लेकिन कुछ स्थितियों में, जैसे उत्कृष्ट गैसों में इलेक्ट्रॉन जुड़ने पर ऊर्जा का अवशोषण होता है। इसके विपरीत, जब इलेक्ट्रॉन जुड़ने पर परमाणु अर्धपूरित या पूर्णपूरित स्थायी विन्यास प्राप्त करता है, तो इलेक्ट्रॉन जोड़ना आसान होता है, अतः इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान अपेक्षाकृत अधिक होता है।
**इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य:**
1. वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर जाने पर इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान कम ऋणात्मक होता जाता है क्योंकि परमाणु आकार बढ़ने के कारण जुड़ने वाला इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होता है, अतः इस पर नाभिकीय आकर्षण बल कम लगता है।
2. सामान्यतः, आवर्त सारणी के किसी आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती जाती है क्योंकि प्रभावी नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है। इस वजह से इलेक्ट्रॉन का जुड़ना आसान होता है और जुड़ने वाला इलेक्ट्रॉन नाभिक के पास होने के कारण इस पर नाभिकीय आकर्षण बल अधिक लगता है।
3. 17वें वर्ग के तत्त्वों (हैलोजन) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान अत्यधिक ऋणात्मक होता है क्योंकि ये एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके उत्कृष्ट गैस के समान स्थायी विन्यास प्राप्त कर लेते हैं।
| वर्ग 1 | \( \Delta_{\text{eg}}\text{H} \) | वर्ग 16 | \( \Delta_{\text{eg}}\text{H} \) | वर्ग 17 | \( \Delta_{\text{eg}}\text{H} \) | वर्ग 18 | \( \Delta_{\text{eg}}\text{H} \) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| H | -73 | He | +48 | ||||
| Li | -60 | O | -142 | F | -328 | Ne | +116 |
| Na | -52 | S | -200 | Cl | -348 | Ar | +96 |
| K | -48 | Se | -195 | Br | -325 | Kr | +96 |
| Rb | -47 | Te | -190 | I | -295 | Xe | +77 |
| Cs | -46 | Po | -174 | At | -270 | Rn | +68 |
4. उत्कृष्ट गैसों की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान अत्यधिक धनात्मक होता है क्योंकि इनमें पूर्णपूरित स्थायी विन्यास \( (\text{ns}^2\text{np}^6) \) पाया जाता है। इस कारण इलेक्ट्रॉन को उच्च ऊर्जा स्तर में प्रवेश करना पड़ेगा, जो कि बहुत ही अस्थायी विन्यास होगा क्योंकि इतनी दूरी पर नाभिकीय आकर्षण बल नहीं लग पाता है।
5. क्षार धातुओं की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान बहुत कम ऋणात्मक होता है क्योंकि इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बहुत कम होती है।
6. प्रथम वर्ग में हाइड्रोजन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिकतम ऋणात्मक होती है क्योंकि यह एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर हीलियम के समान स्थायी विन्यास प्राप्त कर लेता है।
7. द्वितीय वर्ग के तत्त्व \( \text{Be} \) तथा \( \text{Mg} \) इत्यादि की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान धनात्मक होता है, मतलब इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर ऊर्जा देनी पड़ती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें क्रमशः बाह्यतम \( \text{2s}^2 \) तथा \( \text{3s}^2 \) कक्षक पूर्ण भरे हैं। इस वजह से आने वाला इलेक्ट्रॉन क्रमशः उच्च ऊर्जा के \( \text{2p} \) तथा \( \text{3p} \) कक्षक में प्रवेश करता है जिस पर नाभिकीय आकर्षण बल नहीं लग पाता है। इसलिए इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति नहीं होती है।
8. नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी क्रमशः कार्बन तथा सिलिकन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी से कम ऋणात्मक होती है क्योंकि अर्धपूरित स्थायी विन्यास \( (\text{2p}^3 \) तथा \( \text{3p}^3) \) होने के कारण इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति कम होती है, जबकि कार्बन तथा सिलिकन में एक इलेक्ट्रॉन जुड़ने पर अर्धपूरित स्थायी विन्यास प्राप्त होता है, अतः ये आसानी से इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेते हैं। नाइट्रोजन के छोटे आकार के कारण इसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तो धनात्मक होती है। तृतीय आवर्त के इन तत्त्वों के बड़े आकार \( (n = 3) \) के कारण ये आने वाला इलेक्ट्रॉन \( \text{3p} \) कक्षक में जाता है, जिसका आवेश घनत्व कम होने के कारण यह इलेक्ट्रॉन को कम प्रतिकर्षित करते हैं। इस वजह से इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक होती है। अतः फ्लुओरीन \( (\text{F}) \) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी क्लोरीन \( (\text{Cl}) \) से कम होती है। इसी कारण आवर्त सारणी में अधिकतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी क्लोरीन की होती है।
In simple words: इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी बताती है कि परमाणु कितनी आसानी से इलेक्ट्रॉन ले पाता है। यह परमाणु के आकार, नाभिक के खिंचाव और कक्षकों की स्थिरता पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी की परिभाषा, धनात्मक और ऋणात्मक मानों का अर्थ, और विशेष रूप से क्लोरीन की अधिकतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के कारण को समझें।
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