RBSE Solutions Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीक

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Detailed Chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीक RBSE Solutions for Class 11 Chemistry

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Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीक RBSE Solutions PDF

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायनः कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किस विधि द्वारा नाइट्रोजन का निर्धारण किया जाता है?
(अ) लीबिंग विधि
(ब) लैसे विधि
(स) जैल्डाल विधि
(द) केरियस विधि
Answer: (स) जैल्डाल विधि
In simple words: नाइट्रोजन की मात्रा पता करने के लिए जैल्डाल विधि का उपयोग किया जाता है।

🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन के निर्धारण के लिए विभिन्न प्रयोगशाला विधियों और उनके उपयोग को याद रखें, जैसे जैल्डाल, ड्यूमा, और लैसे विधि।

 

प्रश्न 2. नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर बना सोडियम लवण है –
(अ) \( \text{NaNO}_2 \)
(ब) \( \text{NaNO}_3 \)
(स) \( \text{NaCN} \) (सोडियम सायनाइड)
(द) \( \text{NaSCN} \) (सोडियम थायोसायनाइड)
Answer: (स) \( \text{NaCN} \) (सोडियम सायनाइड)
In simple words: जब नाइट्रोजन वाले कार्बनिक यौगिक को सोडियम के साथ मिलाते हैं, तो सोडियम सायनाइड बनता है। यह नाइट्रोजन का पता लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण टेस्ट है।

🎯 Exam Tip: लैसेन परीक्षण (सोडियम संलयन परीक्षण) के उत्पादों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजन का पता लगाने के लिए उपयोग होता है। नाइट्रोजन के लिए NaCN बनता है।

 

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौनसा यौगिक है?
(अ) 2 – मेथिल ब्यूटेन
(ब) 2 – मेथिल प्रोपेन
(स) 2 – ऐथिल ब्यूटेन
(द) 2 – ब्यूटाइन
Answer: (ब) 2 – मेथिल प्रोपेन
In simple words: यह एक सामान्य रसायन विज्ञान का सवाल है जो अलग-अलग यौगिकों के नाम और संरचना को पहचानने पर आधारित है। यहां, 2-मेथिल प्रोपेन सही उत्तर है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण नियमों का अभ्यास करें ताकि आप दिए गए संरचनाओं के सही नामों को पहचान सकें या नामों से संरचनाएं बना सकें।

 

प्रश्न 4. COOR क्रियात्मक समूह का पूर्वलग्न है -
(अ) कार्बोमायल
(ब) कार्बोनिल
(स) कार्बोक्सी
(द) ऐल्कॉक्सीकार्बोनिल
Answer: (द) ऐल्कॉक्सीकार्बोनिल
In simple words: जब COOR समूह किसी बड़े अणु का हिस्सा होता है, तो इसके नाम के आगे 'ऐल्कॉक्सीकार्बोनिल' शब्द लगता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न क्रियात्मक समूहों के पूर्वलग्न और अनुलग्न नामों की सूची को अच्छी तरह याद करें, क्योंकि यह IUPAC नामकरण के लिए महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौनसा प्रतिस्थापी समूह +I प्रभाव नहीं दर्शाता है –
(अ) \( \text{– CHO} \)
(ब) \( \text{- CH}_3 \)
(स) \( \text{– CH}_2\text{R} \)
(द) \( \text{- CHR}_2 \)
Answer: (अ) \( \text{– CHO} \)
In simple words: \( \text{– CHO} \) समूह इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर खींचता है, इसलिए यह \( \text{+I} \) प्रभाव नहीं दिखाता है। दूसरे विकल्प इलेक्ट्रॉन देते हैं, तो वे \( \text{+I} \) प्रभाव दिखाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रेरणिक प्रभाव (+I और -I) को अच्छी तरह समझें और विभिन्न समूहों को उनके इलेक्ट्रॉन देने या खींचने की क्षमता के आधार पर पहचानना सीखें।

 

प्रश्न 6. निम्नलिखित में कौनसा नाभिकस्नेही है –
(अ) \( \text{Br}^+ \)
(ब) \( \text{R - OH} \)
(स) \( \text{FeCl}_3 \)
(द) \( \text{CO}_2 \)
Answer: (ब) \( \text{R - OH} \)
In simple words: नाभिकस्नेही ऐसे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन-युग्म दान कर सकते हैं। \( \text{R - OH} \) (जैसे अल्कोहल) में ऑक्सीजन पर अकेले इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिन्हें वह दान कर सकता है।

🎯 Exam Tip: नाभिकस्नेही (nucleophile) और इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile) की परिभाषाएँ और उनके उदाहरणों को समझें। नाभिकस्नेही इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होते हैं और इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करते हैं।

 

प्रश्न 7. निम्नलिखित में सबसे स्थायी कार्बधनायन है –
(अ) \( \text{CH}_3^+ \)
(ब) \( ^+\text{CH}_2\text{CH}_3 \)
(स) \( (\text{CH}_3)_2\text{CH}^+ \)
(द) \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \)
Answer: (द) \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \)
In simple words: तृतीयक कार्बधनायन सबसे स्थिर होता है क्योंकि इसमें तीन मेथिल समूह होते हैं जो इलेक्ट्रॉन देकर धनावेश को फैलाते हैं।

🎯 Exam Tip: कार्बधनायनों के स्थायित्व के क्रम को याद रखें (तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक > मेथिल)। यह अतिसंयुग्मन और प्रेरणिक प्रभाव के कारण होता है।

 

प्रश्न 8. समांश विदलन से बनता है –
(अ) कार्बधनायन
(ब) कार्बऋणायन
(स) कार्बोकेटायन
(द) मुक्त मूलक
Answer: (द) मुक्त मूलक
In simple words: जब कोई रासायनिक बंधन बराबर भागों में टूटता है, तो दोनों परमाणुओं को एक-एक इलेक्ट्रॉन मिलता है। इससे मुक्त मूलक बनते हैं।

🎯 Exam Tip: समांश विदलन (homolytic cleavage) और विषमांश विदलन (heterolytic cleavage) के बीच का अंतर और उनसे बनने वाले उत्पादों (मुक्त मूलक, कार्बधनायन, कार्बऋणायन) को समझें।

 

प्रश्न 9. निम्नलिखित में कौनसा समूह योगात्मक अभिक्रिया नहीं देता है -
(अ) \( \text{C = C} \)
(ब) \( \text{C = C} \)
(स) \( \text{C = O} \)
(द) \( \text{CH}_3 \text{ - CH}_3 \text{ (C – C)} \)
Answer: (द) \( \text{CH}_3 \text{ - CH}_3 \text{ (C – C)} \)
In simple words: \( \text{CH}_3 \text{ - CH}_3 \) में केवल सिंगल बॉन्ड होते हैं, जो योगात्मक अभिक्रिया नहीं करते। डबल या ट्रिपल बॉन्ड वाले यौगिक ही योगात्मक अभिक्रिया देते हैं।

🎯 Exam Tip: योगात्मक अभिक्रियाएँ आमतौर पर असंतृप्त यौगिकों (डबल या ट्रिपल बॉन्ड वाले) द्वारा दिखाई जाती हैं। संतृप्त यौगिक (सिंगल बॉन्ड वाले) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ देते हैं।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 10. -I प्रेरणिक प्रभाव के दो उदाहरण दीजिये।
Answer: \( \text{– CN} \) तथा \( \text{– COOH} \) समूह \( \text{– I} \) प्रभाव दर्शाते हैं।
In simple words: \( \text{-I} \) प्रभाव का मतलब है जब कोई समूह इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर खींचता है। सायनाइड और कार्बोक्सिलिक एसिड ऐसे ही समूह हैं।

🎯 Exam Tip: \( \text{-I} \) प्रभाव दर्शाने वाले समूहों की सूची याद करें। ये समूह इलेक्ट्रॉन आकर्षी (electron-withdrawing) होते हैं और पास के परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन घनत्व को अपनी ओर खींचते हैं।

 

प्रश्न 11. दो उदासीन एवं दो ऋणात्मक आवेश के नाभिक स्नेही के नाम लिखिये।
Answer:
उदासीन नाभिक स्नेही – \( \text{NH}_3 \) तथा \( \text{R-O-H} \)
ऋणात्मक आवेश युक्त नाभिक स्नेही – \( \text{Cl}^- \) तथा \( \text{RO}^- \)
In simple words: नाभिकस्नेही वे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन दे सकते हैं। उदासीन नाभिकस्नेही में अमोनिया और अल्कोहल आते हैं। ऋणात्मक नाभिकस्नेही में क्लोराइड आयन और एल्कोक्साइड आयन जैसे आयन आते हैं।

🎯 Exam Tip: नाभिकस्नेही को उदासीन या ऋणात्मक आवेश के आधार पर पहचानना सीखें। उनके पास हमेशा अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जिन्हें वे दान कर सकते हैं।

 

प्रश्न 12. जेल्डाल (केल्डाल) विधि में नाइट्रोजन प्रतिशतता का समीकरण लिखो।
Answer: नाइट्रोजन की प्रतिशतता \( = \frac{1.4 \times \text{N}_1 \times \text{V}_1}{\text{W}} \% \)
जहाँ,
\( \text{N}_1 = \) अम्ल की नॉर्मलता
\( \text{V}_1 = \) प्रयुक्त अम्ल का आयतन
\( \text{W} = \) कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान
In simple words: जेल्डाल विधि में नाइट्रोजन की मात्रा निकालने के लिए एक सूत्र होता है। इसमें अम्ल की शक्ति और आयतन को यौगिक के वजन से गुणा करके एक स्थिरांक से भाग देते हैं, जिससे नाइट्रोजन का प्रतिशत निकल आता है।

🎯 Exam Tip: जेल्डाल विधि के समीकरण के सभी पदों को सही ढंग से याद करें, खासकर स्थिरांक 1.4 को, जो सूत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

प्रश्न 14. कार्बन एवं हाइड्रोजन का निर्धारण किस विधि से किया जाता है, नाम लिखिए।
Answer: कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण लीबिंग की दहन विधि से किया जाता है।
In simple words: कार्बन और हाइड्रोजन को मापने के लिए लीबिंग की दहन विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें यौगिक को जलाकर बने उत्पादों को मापा जाता है।

🎯 Exam Tip: कार्बनिक यौगिकों में तत्वों के मात्रात्मक निर्धारण की विभिन्न विधियों के नाम और उनके मुख्य सिद्धांतों को याद रखें।

 

प्रश्न 15. अनुनाद को परिभाषित कीजिए।
Answer: किसी यौगिक की एक से अधिक संरचनाएँ होने पर, यदि उनमें से किसी एक संरचना द्वारा उस यौगिक के सभी गुणों को नहीं समझाया जा सकता, तो इन संरचनाओं को अनुनादी संरचनाएँ कहते हैं। वास्तविक यौगिक इन सभी संरचनाओं के मिश्रित रूप (अनुनाद संकर) के समान व्यवहार करता है। इस गुण को अनुनाद कहते हैं।
In simple words: जब एक ही चीज की कई अलग-अलग तस्वीरें हों, और कोई भी एक अकेली तस्वीर उसकी पूरी बात न बता पाए, तो उन सभी तस्वीरों को मिलाकर उसकी असली पहचान बनती है। यही अनुनाद है।

🎯 Exam Tip: अनुनाद की परिभाषा को स्पष्ट रूप से समझें और याद करें, यह कार्बनिक रसायन विज्ञान में कई यौगिकों की स्थिरता और प्रतिक्रियाशीलता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 16. कार्बऋणायन में कार्बन परमाणु का संकरण बताइए।
Answer: कार्बऋणायन में कार्बन परमाणु \( \text{sp}^3 \) संकरित होता है।
In simple words: कार्बऋणायन में कार्बन परमाणु के साथ तीन सिंगल बॉन्ड और एक इलेक्ट्रॉन-युग्म होता है, जिससे उसका संकरण \( \text{sp}^3 \) होता है।

🎯 Exam Tip: कार्बधनायन, कार्बऋणायन और मुक्त मूलक में कार्बन परमाणु के संकरण और ज्यामिति को याद रखें, क्योंकि यह उनकी प्रतिक्रियाशीलता को प्रभावित करता है।

 

प्रश्न 17. प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम लिखिए।
Answer: प्राथमिक \( < \) द्वितीयक \( < \) तृतीयक
In simple words: सबसे स्थिर कार्बधनायन वह होता है जिसमें धनावेशित कार्बन से सबसे ज्यादा अल्काइल समूह जुड़े होते हैं (तृतीयक), फिर द्वितीयक, और प्राथमिक सबसे कम स्थिर होता है।

🎯 Exam Tip: कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम और उसके पीछे के कारण (जैसे अतिसंयुग्मन और प्रेरणिक प्रभाव) को स्पष्ट रूप से समझें।

 

प्रश्न 18. कार्बान को परिभाषित कीजिए।
Answer: कार्बान एक रासायनिक स्पीशीज है जिसमें कार्बन परमाणु पर एक इलेक्ट्रॉन-युग्म और दो एकल बॉन्ड होते हैं, जिससे कुल छह संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। यह इलेक्ट्रॉन न्यून होता है और बहुत प्रतिक्रियाशील होता है।
In simple words: कार्बान एक ऐसा कार्बन परमाणु है जिसके पास दो बॉन्ड और दो अकेले इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके बाहर छह इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए इसे इलेक्ट्रॉन की कमी होती है और यह बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करता है।

🎯 Exam Tip: कार्बान की परिभाषा, संरचना, और इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रकृति को याद रखें, यह कार्बनिक अभिक्रियाओं के मध्यवर्ती के रूप में महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 20. \( \text{OHC - CH}_2\text{-CH}_2 \text{ - COOH} \) का IUPAC नाम लिखिये।
Answer: 4 – ऑक्सो ब्यूटेनोइक अम्ल।
In simple words: इस यौगिक में एल्डिहाइड और कार्बोक्सिलिक एसिड दोनों समूह हैं। कार्बोक्सिलिक एसिड मुख्य समूह है, और एल्डिहाइड को 'ऑक्सो' के रूप में लिखा जाता है, इसलिए इसका नाम 4-ऑक्सो ब्यूटेनोइक एसिड है।

🎯 Exam Tip: उन यौगिकों के IUPAC नामकरण के नियमों का अभ्यास करें जिनमें दो या दो से अधिक क्रियात्मक समूह होते हैं, और वरीयता क्रम को याद रखें।

 

प्रश्न 21. \( \text{- OH} \) समूह का पूर्व लग्न और अनुलग्न नाम लिखिये।
Answer: \( \text{- OH} \) समूह का पूर्वलग्न हाइड्रॉक्सी तथा अनुलग्न ऑल होता है।
In simple words: \( \text{-OH} \) समूह को 'हाइड्रॉक्सी' तब कहते हैं जब यह एक छोटा हिस्सा होता है और 'ऑल' तब कहते हैं जब यह मुख्य हिस्सा होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न क्रियात्मक समूहों के लिए पूर्वलग्न (prefix) और अनुलग्न (suffix) दोनों को जानना IUPAC नामकरण के लिए अनिवार्य है।

 

प्रश्न 22. \( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-C}\equiv\text{C-CH}_2\text{- CH}_2 \) का व्युत्पन्न प्रणाली में नाम लिखिये।
Answer: डाइएथिल एसीटिलीन।
In simple words: इस यौगिक में ट्रिपल बॉन्ड के दोनों ओर दो एथिल समूह जुड़े हुए हैं, इसलिए इसे डाइएथिल एसीटिलीन कहते हैं।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के साथ-साथ सामान्य या व्युत्पन्न नामकरण विधियों का भी अभ्यास करें, क्योंकि कुछ यौगिकों के लिए ये नाम भी महत्वपूर्ण होते हैं।

 

प्रश्न 23. दो निकटतम सजात अणुभार में कितना अन्तर होता है?
Answer: दो निकटतम सजात अणुओं के अणुभार में 14 का अन्तर होता है। यह अन्तर \( \text{-CH}_2 \) समूह के कारण होता है।
In simple words: एक ही परिवार के दो पास-पास के यौगिकों के वजन में 14 का फर्क होता है, क्योंकि उनके बीच एक \( \text{CH}_2 \) समूह का अंतर होता है।

🎯 Exam Tip: सजातीय श्रेणी की परिभाषा और उनकी विशेषताओं, विशेष रूप से अणुभार में \( \text{CH}_2 \) समूह का अंतर, को याद रखें।

 

प्रश्न 24. दो एरोमैटिक विषम चक्रीयों के नाम एवं संरचना लिखिये।
Answer: थायोफीन और पिरीडीन दो एरोमैटिक विषम चक्रीय यौगिक हैं।
थायोफीन:
Sथायोफीन
पिरीडीन:
Nपिरीडीन
अतः इनमें विषम परमाणु सल्फर (S) तथा नाइट्रोजन हैं।
In simple words: थायोफीन और पिरीडीन दो रिंग वाले यौगिक हैं जिनमें कार्बन के अलावा दूसरे एटम भी होते हैं (जैसे सल्फर और नाइट्रोजन)। ये एरोमैटिक होते हैं और इनके अपने खास गुण होते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न विषमचक्रीय यौगिकों के नाम, संरचना और उनमें उपस्थित विषम परमाणुओं को याद रखें। एरोमैटिकता की शर्तों को भी ध्यान में रखें।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 25. नाइट्रोजन, सल्फर तथा हैलोजनों का परीक्षण किस विधि के द्वारा किया जाता है?
Answer: नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजनों का परीक्षण लैसेन परीक्षण (सोडियम संलयन निष्कर्ष) विधि द्वारा किया जाता है।
In simple words: नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजन जैसे तत्वों का पता लगाने के लिए एक खास तरीके का इस्तेमाल होता है जिसे लैसेन परीक्षण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: लैसेन परीक्षण कार्बनिक यौगिकों में उपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजन जैसे तत्वों के गुणात्मक विश्लेषण की एक महत्वपूर्ण विधि है। इसके सिद्धांत और प्रक्रिया को याद रखें।

 

प्रश्न 26. निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र तथा IUPAC नाम दीजिए –
Answer:
1. फॉर्मिक अम्ल – \( \text{HCOOH} \), मेथेनोइक अम्ल
2. ऐथिल ऐसीटेट – \( \text{CH}_3\text{COOC}_2\text{H}_5 \), एथिल एथेनोएट
3. ऐथिल मेथिल ईथर – \( \text{CH}_3\text{ – CH}_2 \text{ - O - CH}_3 \), मेथॉक्सी एथेन।
In simple words: यहां पर कुछ सामान्य यौगिकों के नाम और उनके IUPAC नाम दिए गए हैं। जैसे, फॉर्मिक एसिड को मेथेनोइक एसिड कहते हैं और एथिल एसीटेट को एथिल एथेनोएट कहते हैं।

🎯 Exam Tip: सामान्य और IUPAC नामकरण दोनों का अभ्यास करें, क्योंकि परीक्षा में किसी भी नामकरण प्रणाली का उपयोग करने के लिए कहा जा सकता है। क्रियात्मक समूहों को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 27. समांश एवं विषमांश विखण्डन में क्या अन्तर है?
Answer:
समांश विखण्डन में, जब कोई सहसंयोजी बन्ध टूटता है, तो बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म का एक-एक इलेक्ट्रॉन दोनों परमाणुओं पर चला जाता है। इससे मुक्त मूलक बनते हैं। यह उच्च ताप, प्रकाश या अध्रुवीय माध्यम में होता है।
विषमांश विखण्डन में, बन्ध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु पर चले जाते हैं। इससे आयन (कार्बधनायन या कार्बऋणायन) बनते हैं। यह निम्न ताप या ध्रुवीय माध्यम में होता है।
In simple words: जब कोई बॉन्ड टूटता है, तो अगर इलेक्ट्रॉन बराबर बंटें तो 'समांश विदलन' होता है और मुक्त मूलक बनते हैं। अगर इलेक्ट्रॉन एक तरफ चले जाएं तो 'विषमांश विदलन' होता है और आयन बनते हैं। उनकी होने की स्थितियां भी अलग-अलग होती हैं।

🎯 Exam Tip: समांश और विषमांश विखण्डन की परिभाषाओं, उनके उत्पादों (मुक्त मूलक और आयन) और उनकी परिस्थितियों (तापमान, विलायक) को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 29. किन्हीं चार उदासीन इलेक्ट्रानस्नेही के उदाहरण दीजिये।
Answer: \( \text{SO}_3 \), \( \text{AlCl}_3 \), \( \text{BF}_3 \) तथा \( \text{FeCl}_3 \) ऐसे उदासीन यौगिक हैं जो इलेक्ट्रॉन स्नेही के समान व्यवहार करते हैं।
In simple words: इलेक्ट्रॉनस्नेही वे होते हैं जिन्हें इलेक्ट्रॉन पसंद होते हैं और जो इलेक्ट्रॉन-युग्म को अपनी ओर खींचते हैं। सल्फर ट्राइऑक्साइड, एल्युमिनियम क्लोराइड, बोरोन ट्राइफ्लोराइड और फेरिक क्लोराइड इसके कुछ उदाहरण हैं।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनस्नेही की परिभाषा और उदासीन इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरण याद रखें। ये इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रजातियाँ होती हैं जो इलेक्ट्रॉन-समृद्ध केंद्रों पर हमला करती हैं।

 

प्रश्न 30. निम्नलिखित में \( \text{+I} \) प्रभाव के घटते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए – \( (\text{CH}_3)_2\text{CH -, CH}_3 \text{ -, (CH}_3)_3\text{C -,CH}_3 \text{CH}_2 \text{ -} \)
Answer: \( (\text{CH}_3)_3 \text{C}^- > (\text{CH}_3)_2\text{CH}^- > \text{CH}_3 \text{ - CH}_2 \text{ -} > \text{CH}_3 \text{ -} \)
यह \( \text{+I} \) प्रभाव का घटता क्रम है।
In simple words: \( \text{+I} \) प्रभाव (इलेक्ट्रॉन देने की क्षमता) अल्काइल समूहों के आकार के साथ बढ़ता है। सबसे बड़ा अल्काइल समूह सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉन देता है, इसलिए उसका \( \text{+I} \) प्रभाव सबसे ज्यादा होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न अल्काइल समूहों के \( \text{+I} \) प्रभाव के क्रम को याद रखें (तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक > मेथिल)। यह कार्बनिक यौगिकों के स्थायित्व और प्रतिक्रियाशीलता को समझने में मदद करता है।

 

प्रश्न 31. एल्केन, एल्कीन एवं एल्केनोन की तृतीय समजात के नाम एवं संरचना लिखिए।
Answer:
1. एल्केन – \( \text{CH}_3 \text{ - CH}_2 \text{ - CH}_3 \) (प्रोपेन)
2. एल्कीन – \( \text{CH}_3 \text{ - CH}_2 \text{ - CH = CH}_2 \) (ब्यूट – 1 – ईन)
3. एल्केनोन – \( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH}_2\text{-C(=O)-CH}_3 \) (पेन्टेन-2-ऑन)
In simple words: एल्केन, एल्कीन और एल्केनोन अलग-अलग तरह के कार्बनिक यौगिक हैं। इनके तीसरे सदस्य के उदाहरण क्रमशः प्रोपेन, ब्यूट-1-ईन और पेन्टेन-2-ऑन हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न सजातीय श्रेणियों (एल्केन, एल्कीन, एल्काइन, अल्कोहल, कीटोन आदि) के सामान्य सूत्र, नामकरण और उनके पहले कुछ सदस्यों को याद रखें।

 

प्रश्न 32. एल्केनों को पेराफिन्स क्यों कहते हैं?
Answer: एल्केनों को पेराफिन्स भी कहा जाता है, क्योंकि ये बहुत कम क्रियाशील होते हैं। लैटिन भाषा में 'Para' का अर्थ है 'कम' तथा 'affins' का अर्थ है 'क्रियाशीलता'। इस कम क्रियाशीलता का कारण इनमें प्रबल सिग्मा \( (\sigma) \) बन्धों का पाया जाना है।
In simple words: एल्केनों को 'पेराफिन्स' कहते हैं क्योंकि ये ज्यादा रिएक्टिव नहीं होते। 'पैरा' का मतलब 'कम' और 'अफिन्स' का मतलब 'रिएक्शन' है।

🎯 Exam Tip: एल्केनों की कम प्रतिक्रियाशीलता को सिग्मा बॉन्ड की मजबूत प्रकृति और उनकी संतृप्त संरचना से जोड़कर समझें।

 

प्रश्न 33. क्लोरोफार्म, फार्मिक अम्ल एवं आइसो पेन्टेन के IUPAC नाम लिखिए।
Answer:
क्लोरोफार्म: ट्राइक्लोरोमेथेन
फार्मिक अम्ल: मेथेनोइक अम्ल
आइसो पेन्टेन: 2-मेथिल ब्यूटेन
In simple words: क्लोरोफार्म, फार्मिक एसिड और आइसो पेन्टेन के ये नाम उनके IUPAC नियमों के अनुसार हैं।

🎯 Exam Tip: सामान्य नामों वाले यौगिकों के IUPAC नामकरण का अभ्यास करें, क्योंकि यह एक सामान्य परीक्षा प्रश्न होता है।

 

प्रश्न 34. आइसोब्यूटिल एल्कोहॉल एवं ब्यूटिल क्लोराइड के सूत्र लिखिये।
Answer:
1. आइसोब्यूटिल एल्कोहॉल: \( (\text{CH}_3)_2\text{CH-CH}_2\text{OH} \)
2. ब्यूटिल क्लोराइड: \( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH}_2\text{-CH}_2\text{Cl} \)
In simple words: आइसोब्यूटिल एल्कोहॉल में एक \( \text{OH} \) समूह होता है और ब्यूटिल क्लोराइड में एक \( \text{Cl} \) समूह होता है, और इनकी कार्बन चेन का आकार अलग होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न आइसोमर्स के संरचनात्मक सूत्रों और उनके सामान्य व IUPAC नामों का अभ्यास करें।

 

प्रश्न 35. निम्नलिखित को इलेक्ट्रॉनस्नेही एवं नाभिकस्नेही में विभेदित कीजिए – \( \text{NH}_3, \text{BF}_3, \text{H}_2\text{O}, \text{FeCl}_3, \text{ŌH}, \text{H}_3\text{O}^+, \text{SO}_3, \text{:CCl}_2 \).
Answer:
1. इलेक्ट्रॉनस्नेही – \( \text{BF}_3, \text{FeCl}_3, \text{H}_3\text{O}^+, \text{SO}_3, \text{:CCl}_2 \)
2. नाभिकस्नेही – \( \text{NH}_3, \text{H}_2\text{O}, \text{ŌH} \)
In simple words: इलेक्ट्रॉनस्नेही वे होते हैं जिन्हें इलेक्ट्रॉन चाहिए (जैसे \( \text{BF}_3 \))। नाभिकस्nehi वे होते हैं जिनके पास अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं और वे उन्हें दे सकते हैं (जैसे \( \text{NH}_3 \))।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनस्नेही और नाभिकस्नेही के बीच उनके इलेक्ट्रॉन घनत्व और प्रतिक्रियाशील केंद्रों के आधार पर अंतर करना सीखें।

 

प्रश्न 36. इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ किन यौगिकों में पायी जाती हैं? समझाइये।
Answer: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ एल्कीनों तथा एल्काइनों में पायी जाती हैं। ये अभिक्रियाएँ असंतृप्त यौगिकों के बहुबंधों पर इलेक्ट्रॉनस्नेही के आक्रमण से शुरू होती हैं, जिसके बाद एक कार्बोकेटायन बनता है और फिर एक नाभिकस्नेही उस पर हमला करता है।
उदाहरण के लिए:
जब एक असंतृप्त यौगिक \( \text{>C=C<} \) पर \( \text{X-Y} \) का योग होता है, तो पहले \( \text{X}^+ \) इलेक्ट्रॉनस्नेही \( \text{>C=C<} \) पर हमला करता है जिससे एक कार्बोकेटायन बनता है।
\( \text{>C=C<} + \text{X-Y} \rightarrow \text{>C}^+\text{ - C-X} \xrightarrow{\text{+Y-}} \text{Y - C - C - X} \)
इसी प्रकार, \( \text{CH}_3\text{-CH=CH}_2 + \text{HCl} \rightarrow \text{CH}_3\text{-CH(Cl)-CH}_3 \)
In simple words: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ उन यौगिकों में होती हैं जिनमें डबल या ट्रिपल बॉन्ड होते हैं, जैसे एल्कीन और एल्काइन। इसमें पहले एक इलेक्ट्रॉन चाहने वाला कण (इलेक्ट्रॉनस्नेही) बॉन्ड पर हमला करता है।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं के तंत्र को समझें, विशेष रूप से मार्कोवनिकोव नियम और कार्बोकेटायन के निर्माण और पुनर्व्यवस्था को।

 

प्रश्न 38. समांश एवं विषमांश विखण्डन में अन्तर कीजिए।
Answer:
समांश विखण्डन में, विदलित होने वाले बन्ध के साझे इलेक्ट्रॉन युग्म का एक-एक इलेक्ट्रॉन दोनों परमाणुओं पर चला जाता है। इससे मुक्त मूलक बनते हैं।
विषमांश विखण्डन में, बन्ध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु पर चले जाते हैं, जिससे आयन बनते हैं।
समांश विखण्डन उच्च ताप, प्रकाश तथा अध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है, जबकि विषमांश विखण्डन निम्न ताप तथा ध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है।
In simple words: समांश विदलन में बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन बराबर बंटते हैं और मुक्त मूलक बनते हैं। विषमांश विदलन में इलेक्ट्रॉन एक तरफ जाते हैं और आयन बनते हैं। उनकी होने की स्थितियां भी अलग-अलग होती हैं।

🎯 Exam Tip: समांश और विषमांश विखण्डन के बीच के प्रमुख अंतरों को एक तालिका के रूप में याद रखना मददगार होगा, जिसमें उत्पादों और प्रतिक्रिया की शर्तों को शामिल किया गया हो।

 

प्रश्न 39. मुक्तमूलक अभिक्रिया समझाइए।
Answer: वे अभिक्रियाएँ जिनमें मुक्तमूलक मध्यवर्ती के रूप में बनता है, उन्हें मुक्त मूलक अभिक्रिया कहते हैं। इन अभिक्रियाओं में समांश विखण्डन होता है। मुक्त मूलक अत्यधिक क्रियाशील होते हैं और श्रृंखला अभिक्रियाएँ करते हैं।
उदाहरण:
1. मुक्तमूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया: \( \text{CH}_4 + \text{Cl}_2 \xrightarrow{\text{h}\nu} \text{CH}_3\text{Cl} + \text{HCl} \)
2. मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया:
\( \text{CH}_2 = \text{CH}_2 + \text{HBr} \xrightarrow{\text{पराक्साइड}} \text{CH}_3 \text{ - CH}_2 \text{ - Br} \)
मुक्तमूलक अभिक्रियाएँ श्रृंखला अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
In simple words: मुक्त मूलक अभिक्रियाएँ तब होती हैं जब छोटे-छोटे, बहुत तेजी से रिएक्ट करने वाले कण (जिन्हें मुक्त मूलक कहते हैं) बनते हैं और फिर आगे रिएक्शन करते हैं। ये रिएक्शन अक्सर चेन रिएक्शन की तरह होते हैं।

🎯 Exam Tip: मुक्त मूलक अभिक्रियाओं के मुख्य चरणों (शृंखला प्रारंभ, संचरण और समापन) को समझें और विभिन्न प्रकार की मुक्त मूलक अभिक्रियाओं के उदाहरण याद रखें।

 

प्रश्न 41. 2 – मेथॉक्सी – 2 – मेथिल प्रोपेन का संरचना सूत्र दीजिये।
Answer: 2 – मेथॉक्सी – 2 – मेथिल प्रोपेन का संरचना सूत्र:
\[ \text{CH}_3\text{-C(CH}_3)(\text{OCH}_3)\text{-CH}_3 \] या
\[ \begin{array}{c} \text{CH}_3 \\ \mid \\ \text{CH}_3\text{-C-CH}_3 \\ \mid \\ \text{OCH}_3 \end{array} \]
In simple words: यह एक ईथर का नाम है जिसकी संरचना में एक कार्बन परमाणु से दो मेथिल समूह और एक मेथॉक्सी समूह जुड़ा होता है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण से संरचना सूत्र बनाना और संरचना सूत्र से IUPAC नामकरण करना दोनों का अच्छी तरह अभ्यास करें।

 

प्रश्न 42. थायोफीन एवं पिरीडीन में उपस्थित विषम परमाणु बताइये।
Answer: थायोफीन तथा पिरीडीन के संरचना सूत्र निम्नलिखित हैं –
थायोफीन में विषम परमाणु सल्फर (S) है।
पिरीडीन में विषम परमाणु नाइट्रोजन (N) है।
थायोफीन:
Sथायोफीन
पिरीडीन:
Nपिरीडीन
In simple words: थायोफीन में सल्फर और पिरीडीन में नाइट्रोजन, ये दोनों ही विषम परमाणु हैं। ये कार्बन के अलावा रिंग में मौजूद होते हैं।

🎯 Exam Tip: विषमचक्रीय यौगिकों में विषम परमाणुओं (जैसे N, O, S) को पहचानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये यौगिकों के रासायनिक गुणों को प्रभावित करते हैं।

 

प्रश्न 43. निम्नलिखित में से किसमें अधिक अतिसंयुग्मन होगा? कारण सहित बताइये – \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \) व \( \text{CH}_3 \text{ – CH}_2^+ \)
Answer: \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \) में अतिसंयुग्मन अधिक होगा क्योंकि इसमें \( \alpha \)-हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या 9 है, जबकि \( \text{CH}_3 \text{ – CH}_2^+ \) में केवल 3 \( \alpha \)-हाइड्रोजन परमाणु हैं। \( \alpha \)-हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या अधिक होने पर अतिसंयुग्मन भी अधिक होता है। इसी कारण \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \) , \( \text{CH}_3 \text{ – CH}_2^+ \) से अधिक स्थायी है।
In simple words: \( (\text{CH}_3)_3\text{C}^+ \) में ज्यादा अतिसंयुग्मन होता है क्योंकि इसमें ज्यादा हाइड्रोजन एटम ऐसे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन देकर धनावेश को फैला सकते हैं। इससे यह ज्यादा स्थिर बनता है।

🎯 Exam Tip: अतिसंयुग्मन की अवधारणा को समझें और इसे कार्बधनायनों और मुक्त मूलकों की स्थिरता की व्याख्या करने के लिए उपयोग करें। \( \alpha \)-हाइड्रोजन की संख्या अतिसंयुग्मन की सीमा को निर्धारित करती है।

 

प्रश्न 45. विलोपन अभिक्रिया को उचित उदाहरण से समझाइये।
Answer: विलोपन अभिक्रिया में किसी यौगिक में से एक या अधिक छोटे अणु (जैसे \( \text{H}_2\text{O} \), \( \text{HX} \)) का विलोपन होता है, जिससे यौगिक में एक नया बहुबंध (डबल या ट्रिपल बॉन्ड) बनता है। ये अभिक्रियाएँ आमतौर पर एक या दो पदों में सम्पन्न होती हैं।
उदाहरण – एकपदीय विलोपन (E1) अभिक्रिया:
\[ \begin{array}{c} \text{B} + \text{H-CH}_2\text{-CH}_2\text{-X} \\ \downarrow \\ \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{BH}^+ + \text{X}^- \end{array} \] द्विपदीय विलोपन (E2) अभिक्रिया:
\[ \begin{array}{c} \text{H}_3\text{C-C(CH}_3)\text{X} \\ \downarrow \text{+B}^- \\ \text{CH}_3\text{-C(CH}_3)\text{-CH}_2 \\ \downarrow \text{ -H}^+ \\ \text{H}_3\text{C-C=CH}_2 \end{array} \]In simple words: विलोपन अभिक्रिया में किसी अणु से छोटे-छोटे हिस्से निकल जाते हैं, और एक डबल बॉन्ड बन जाता है। जैसे, अल्कोहल से पानी निकालकर एल्कीन बनाना।

🎯 Exam Tip: विलोपन अभिक्रियाओं (E1 और E2) के तंत्र, उनकी शर्तों और उत्पादों को समझें। सेट्ज़ेफ़ (Saytzeff) नियम को भी ध्यान में रखें।

 

प्रश्न 46. बैलेस्टाइन परीक्षण समझाइये।
Answer: बैलेस्टाइन परीक्षण द्वारा हैलोजन का परीक्षण किया जाता है। इसमें कॉपर के तार को ऑक्सीकारक बुन्सन ज्वाला में गर्म करके उस पर थोड़ा सा पदार्थ लगाकर पुनः गर्म करते हैं। यदि ज्वाला का रंग हरा हो जाता है, तो इससे यौगिक में हैलोजन की उपस्थिति सिद्ध होती है। इस परीक्षण में कॉपर हैलाइड बनता है।
In simple words: बैलेस्टाइन परीक्षण में एक तार पर नमूना लेकर आग में गर्म करते हैं। अगर उसमें हैलोजन हो, तो आग का रंग हरा हो जाता है, क्योंकि कॉपर और हैलोजन मिलकर हरे रंग का यौगिक बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: हैलोजन के गुणात्मक विश्लेषण के लिए बैलेस्टाइन परीक्षण के सिद्धांत और प्रक्रिया को याद रखें। ध्यान दें कि यह नाइट्रोजन, सल्फर या फॉस्फोरस जैसे अन्य तत्वों की उपस्थिति में गलत परिणाम दे सकता है।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 निबन्धात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 48. संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये –
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम
(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्त
(स) सजातीय श्रेणी।
Answer:
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम:
केकुले (1858) ने कार्बन तथा इसके यौगिकों के विषय में एक सिद्धान्त दिया जिसके महत्त्वपूर्ण बिन्दु निम्न हैं -
1. कार्बन परमाणु चतुःसंयोजी होता है अर्थात् इसकी संयोजकता चार होती है।
2. कार्बन परमाणु अन्य कार्बन परमाणुओं से बन्धित होकर विभिन्न विवृत श्रृंखला (Open Chain) तथा संवृत श्रृंखला (Closed Chain) यौगिक बना सकता है। कार्बन के इस गुण को श्रृंखलन कहते हैं।
3. कार्बन परमाणु अन्य कार्बन परमाणुओं या दूसरे तत्त्व के परमाणुओं के साथ एकल बन्ध, द्विबन्ध या त्रिबन्ध द्वारा बन्धित हो सकता है। इस आधार पर कार्बन परमाणु की चार संयोजकताएँ निम्नलिखित चार प्रकार से पूर्ण हो सकती है –
(a) चार एकल बंधों द्वारा – जैसे –
मेथेन: \( \text{CH}_4 \)
एथेन: \( \text{CH}_3\text{-CH}_3 \)
नियोपेन्टेन: \( \text{C(CH}_3)_4 \)
क्लोरोफॉर्म: \( \text{CHCl}_3 \)
(b) एक एकल बन्ध तथा एक द्विबन्ध द्वारा – जैसे –
एथीन: \( \text{CH}_2=\text{CH}_2 \)
मेथिल सायनाइड: \( \text{CH}_3\text{-C}\equiv\text{N} \)
हाइड्रोजन सायनाइड: \( \text{H-C}\equiv\text{N} \)
(c) एक एकल बन्ध तथा एक त्रिबन्ध द्वारा – जैसे –
ऐसीटिलीन: \( \text{H-C}\equiv\text{C-H} \)
मेथिल सायनाइड: \( \text{CH}_3\text{-C}\equiv\text{N} \)
हाइड्रोजन सायनाइड: \( \text{H-C}\equiv\text{N} \)
(d) दो द्विबन्धों द्वारा – जैसे –
एलीन: \( \text{CH}_2=\text{C}=\text{CH}_2 \)
कार्बन डाइऑक्साइड: \( \text{O}=\text{C}=\text{O} \)
कीटीन: \( \text{CH}_2=\text{C}=\text{O} \)
In simple words: केकुले के नियम बताते हैं कि कार्बन की चार वैलेंसी होती है और यह सीधी या रिंग वाली चेन बना सकता है। यह दूसरे कार्बन या दूसरे एटम के साथ सिंगल, डबल या ट्रिपल बॉन्ड भी बना सकता है।

🎯 Exam Tip: केकुले की चतुःसंयोजकता के नियम, श्रृंखलन और विभिन्न प्रकार के बंधों के गठन को अच्छी तरह से समझें, क्योंकि ये कार्बनिक रसायन विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत हैं।

(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्तः
ले बेल तथा वान्ट हॉफ के अनुसार कार्बन की चारों संयोजकताएं एक समचतुष्फलक (Tetrahedron) के चारों शीर्षों की ओर इंगित होती हैं तथा कार्बन परमाणु इस चतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित होता है। कार्बन के चारों बन्ध एक-दूसरे के साथ \( 109^\circ 28' \) का कोण बनाते हैं, जिसे बंध कोण (Bond angle) कहते हैं। कार्बन की चारों संयोजकताएँ समान होती हैं।
कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति के पक्ष में प्रमाण:
मेथेन के एक हाइड्रोजन परमाणु को जब किसी अन्य परमाणु या समूह द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है तो केवल एक ही प्रकार का उत्पाद प्राप्त होता है। इसी प्रकार जब इसमें से दो हाइड्रोजन परमाणुओं का प्रतिस्थापन किया जाए तो भी एक ही प्रकार का द्विप्रतिस्थापी उत्पाद बनता है। जैसे – \( \text{CH}_3\text{ – Cl} \) तथा \( \text{CH}_2\text{Cl}_2 \)।
कार्बन परमाणु की ज्यामिति को चतुष्फलकीय न मानकर वर्गाकार समतलीय या वर्गाकार पिरैमिडी माना जाए तो मेथेन के द्विप्रतिस्थापी उत्पाद \( \text{CH}_2\text{Cl}_2 \text{ (Ca}_2\text{b}_2) \) की दो प्रकार की संरचनाएं संभव हैं, जबकि वास्तव में इसकी केवल एक ही संरचना होती है। वर्गाकार समतलीय ज्यामिति में कार्बन परमाणु तथा चारों प्रतिस्थापी एक ही तल में स्थित होते हैं जबकि वर्गाकार पिरैमिडी ज्यामिति में चारों प्रतिस्थापी एक ही तल में वर्ग के चारों कोनों पर स्थित होते हैं तथा कार्बन परमाणु इस वर्गाकार तल के ऊपर या नीचे स्थित होता है।
वर्गाकार ज्यामिति में \( \text{CH}_2\text{Cl}_2 \) की दो संभव संरचनाएँ:
HHClClसंभावना 1HHClClसंभावना 2
\( \text{CH}_2\text{Cl}_2 \) की केवल एक संरचना की व्याख्या चतुष्फलकीय ज्यामिति द्वारा ही की जा सकती है, इससे कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति की पुष्टि होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्बन की चारों संयोजकताएँ एक ही तल में स्थित नहीं होती हैं।
In simple words: वान्टहॉफ और ली बेल ने बताया कि कार्बन के चार बॉन्ड एक पिरामिड की तरह होते हैं, जो एक दूसरे से \( 109^\circ 28' \) के कोण पर होते हैं। इस पिरामिड जैसी संरचना को ही टेट्राहेड्रल कहते हैं। इससे यह साबित होता है कि कार्बन के बॉन्ड एक ही प्लेन में नहीं होते।

🎯 Exam Tip: वान्टहॉफ और ली बेल के सिद्धांत को समझें और कार्बन की चतुष्फलकीय ज्यामिति के प्रमाणों को याद रखें। यह त्रिविम रसायन विज्ञान की नींव है।

(स) सजातीय श्रेणी:
संरचनात्मक गुणों में समानता रखने वाले कार्बनिक यौगिकों के समूह के सदस्यों को बढ़ते हुए अणुभार के क्रम में लिखा जाता है, तो उस श्रेणी को सजातीय श्रेणी कहते हैं। कार्बनिक यौगिकों के समूह अथवा ऐसी श्रेणी, जिसमें एक विशिष्ट क्रियात्मक समूह उपस्थित हो, सजातीय श्रेणी बनाते हैं। सजातीय श्रेणी के सदस्य जिनके अणु सूत्रों में एक या अधिक \( \text{> CH}_2 \) का अन्तर होता है, को सजात अथवा समजात कहते हैं तथा इस गुण को सजातीयता कहते हैं। सजात कभी समावयवी नहीं होते तथा समावयवी कभी सजात नहीं होते हैं, क्योंकि सजातों के अणु सूत्र में \( \text{> CH}_2 \) का अन्तर होता है, जबकि समावयवियों का अणुसूत्र हमेशा समान होता है।
सजातीय श्रेणी के अभिलक्षण (विशेषताएँ) – सजातीय श्रेणी की निम्न विशेषताएँ होती हैं –
1. सजातीय श्रेणी के दो क्रमागत सदस्यों के मध्य \( \text{-CH}_2 \) का अन्तर होता है। अतः उनके अणुभार में 14 का अन्तर होता है।
2. किसी सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
3. इस श्रेणी के यौगिकों के भौतिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन होता है क्योंकि भौतिक गुण अणुभार पर निर्भर करते हैं।
4. सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों के रासायनिक गुण सामान्यतः समान होते हैं क्योंकि रासायनिक गुण मुख्यतः क्रियात्मक समूह पर निर्भर करते हैं।
5. किसी सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों को एक सामान्य विधि द्वारा बनाया जा सकता है।
In simple words: सजातीय श्रेणी एक ही तरह के यौगिकों का समूह होती है, जिनके गुण और संरचना मिलते-जुलते हैं। उनके वजन में 14 का अंतर होता है और उन्हें एक सामान्य सूत्र से दिखाया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: सजातीय श्रेणी की परिभाषा, विशेषताओं और सजातीयता के महत्व को याद रखें, क्योंकि यह कार्बनिक यौगिकों के वर्गीकरण और गुणों को समझने में मदद करता है।

 

Question 48. संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये –
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम
(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्त
(स) सजातीय श्रेणी।
Answer:
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम:
केकुले ने 1858 में कार्बन और उसके यौगिकों के बारे में एक सिद्धांत दिया था। इसके मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
1. कार्बन परमाणु की संयोजकता चार होती है.
2. कार्बन परमाणु दूसरे कार्बन परमाणुओं से जुड़कर खुली या बंद श्रृंखला वाले यौगिक बना सकता है. कार्बन के इस गुण को श्रृंखलन कहते हैं.
3. कार्बन परमाणु दूसरे कार्बन परमाणुओं या अन्य तत्वों के परमाणुओं के साथ सिंगल, डबल या ट्रिपल बॉन्ड बना सकता है. इस आधार पर कार्बन परमाणु की चारों संयोजकताओं को नीचे चार तरीकों से पूरा किया जा सकता है:
(a) चार सिंगल बॉन्ड द्वारा – जैसे –
H
|
H-C-H
|
H
मेथेन
H H
|
H-C-C-H
|
H H
एथेन
CH3
|
CH3-C-CH3
|
CH3
नियोपेन्टेन
Cl
|
H-C-Cl
|
Cl
क्लोरोफॉर्म
(c) एक सिंगल बॉन्ड और एक ट्रिपल बॉन्ड द्वारा – जैसे –
\( H-C \equiv C-H \)
ऐसीटिलीन
\( CH_3-C \equiv N \)
मेथिल सायनाइड
\( H-C \equiv N \)
हाइड्रोजन सायनाइड
(d) दो डबल बॉन्ड द्वारा – जैसे –
\( CH_2 = C = CH_2 \)
एलीन
\( O = C = O \)
कार्बन डाइऑक्साइड
\( CH_2 = C = O \)
कीटीन
(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्त:
ले बेल और वान्टहॉफ के अनुसार, कार्बन की चारों संयोजकताएं एक समचतुष्फलक (टेट्राहेड्रॉन) के चारों कोनों की ओर होती हैं. कार्बन परमाणु इस समचतुष्फलक के केंद्र पर होता है. कार्बन के चारों बॉन्ड एक-दूसरे के साथ 109°28' का कोण बनाते हैं. इसे बॉन्ड एंगल कहते हैं. कार्बन की चारों संयोजकताएं बराबर होती हैं.
कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति के पक्ष में प्रमाण:
मेथेन के एक हाइड्रोजन परमाणु को किसी अन्य परमाणु या समूह से बदलने पर केवल एक ही प्रकार का उत्पाद बनता है. इसी तरह, जब इसमें से दो हाइड्रोजन परमाणुओं को बदला जाता है, तब भी एक ही प्रकार का डि-सब्सटिट्यूटेड उत्पाद बनता है, जैसे \( CH_3-Cl \) और \( CH_2Cl_2 \).
यदि कार्बन परमाणु की ज्यामिति को चतुष्फलकीय न मानकर वर्गाकार समतलीय या वर्गाकार पिरामिडी माना जाए, तो मेथेन के डि-सब्सटिट्यूटेड उत्पाद \( CH_2Cl_2 \) (Ca2b2) की दो प्रकार की संरचनाएं संभव हैं, जबकि असल में इसकी केवल एक ही संरचना होती है.
वर्गाकार समतलीय ज्यामिति में कार्बन परमाणु और चारों सब्सटिट्यूएंट एक ही तल में होते हैं, जबकि वर्गाकार पिरामिडी ज्यामिति में चारों सब्सटिट्यूएंट एक ही तल में वर्ग के चारों कोनों पर होते हैं, और कार्बन परमाणु इस वर्गाकार तल के ऊपर या नीचे होता है.

H
|
C
/
Cl
|
H
Cl
|
C
/
H
|
Cl
वर्गाकार ज्यामिति में \( CH_2Cl_2 \) की दो संभव संरचनाएँ

\( CH_2Cl_2 \) की केवल एक संरचना को चतुष्फलकीय ज्यामिति से ही समझाया जा सकता है, जिससे कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति की पुष्टि होती है. यह साफ है कि कार्बन की चारों संयोजकताएं एक ही तल में नहीं होती हैं.

कार्बनिक यौगिकों की इलेक्ट्रॉन विवर्तन और अन्य प्रयोगों से पुष्टि हो चुकी है. ले बेल और वान्टहॉफ का सिद्धांत कार्बनिक यौगिकों में त्रिविम समावयवता को समझने में बहुत मददगार रहा है. कार्बन उत्तेजित अवस्था में चतुःसंयोजकता दिखाता है, और कार्बनिक यौगिकों में तीन प्रकार के संकरण पाए जाते हैं –
1. \( sp^3 \) संकरण
2. \( sp^2 \) संकरण तथा
3. sp संकरण
जिनमें क्रमशः चतुष्फलकीय, त्रिकोणीय समतल और रेखीय ज्यामिति होती है, और सहसंयोजी बॉन्ड दो परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन से बनते हैं, जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं.
(स) सजातीय श्रेणी:
कार्बनिक यौगिकों के वे समूह, जिनमें संरचनात्मक गुण समान होते हैं और जिनके सदस्यों को बढ़ते हुए अणुभार के क्रम में लिखा जाता है, उन्हें सजातीय श्रेणी कहते हैं. एक कार्बनिक यौगिकों का समूह, जिसमें एक विशिष्ट क्रियात्मक समूह हो, सजातीय श्रेणी बनाता है.
सजातीय श्रेणी के सदस्य, जिनके अणु सूत्रों में एक या अधिक \( >CH_2 \) का अंतर होता है, उन्हें सजात या समजात कहते हैं, और इस गुण को सजातीयता कहते हैं. सजात कभी समावयवी नहीं होते, और समावयवी कभी सजात नहीं होते, क्योंकि सजातों के अणु सूत्र में \( >CH_2 \) का अंतर होता है, जबकि समावयवियों का अणुसूत्र हमेशा समान होता है.
सजातीय श्रेणी की विशेषताएँ – सजातीय श्रेणी की निम्न विशेषताएँ होती हैं –
1. सजातीय श्रेणी के दो लगातार सदस्यों के बीच \( -CH_2 \) का अंतर होता है. इसलिए उनके अणुभार में 14 का अंतर होता है.
2. सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र से दिखाया जा सकता है.
3. इस श्रेणी के यौगिकों के भौतिक गुणों में धीरे-धीरे बदलाव होता है, क्योंकि भौतिक गुण अणुभार पर निर्भर करते हैं.
4. सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों के रासायनिक गुण आमतौर पर समान होते हैं, क्योंकि रासायनिक गुण मुख्यतः क्रियात्मक समूह पर निर्भर करते हैं.
5. सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों को एक सामान्य विधि से बनाया जा सकता है.
सजातीय श्रेणियों के कुछ मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं –
ऐथीन प्रोपीन \( (C_3H_6) \) ब्यूट-1-इन \( (C_4H_8) \)
n = 2 n = 3 n = 4
III. ऐल्काइन-सामान्य सूत्र \( (C_nH_{2n-2}) \)
n=2 \( C_2H_2 \),
n = 3 \( CH_3-C \equiv C-H \ (C_3H_4) \)
IV. ऐल्किल हैलाइड-सामान्य सूत्र \( (C_nH_{2n+1}. X) \)
n=1 \( CH_3-X \), n = 2 \( C_2H_5-X \)
n = 3 \( C_3H_7-X \)
V. ऐल्कोहॉल (ऐल्केनॉल)-सामान्य सूत्र \( (C_nH_{2n+1}OH) \)
या \( C_nH_{2n+2}O \)
n = 1 \( CH_3OH \), n = 2 \( C_2H_5OH \)
n = 3 \( C_3H_7OH \)
VI. ऐल्डिहाइड तथा कीटोन (ऐल्केनैल तथा ऐल्केनोन) –
सामान्य सूत्र \( (C_nH_{2n}O) \)
n = \( CH_2O \); (HCHO) n = 2 \( CH_3CHO \)
n = 3 \( CH_3CH_2CHO \) तथा \( CH_3COCH_3 \)
VII. कार्बोक्सिलिक अम्ल-सामान्य सूत्र \( = C_nH_{2n}O_2 \)
n = 1 \( CH_2O_2 \ (H-COOH) \) फार्मिक अम्ल
n = 2 \( C_2H_4O_2 \ (CH_3-COOH) \) ऐसिटिक अम्ल
VIII. प्राथमिक ऐमीन-सामान्य सूत्र \( = C_nH_{2n+1}-NH_2 \)
या \( C_nH_{2n+3}N \)
n = 1 \( CH_3N \ (CH_3NH_2) \) मेथिल ऐमीन
n = 2 \( C_2H_7N \ (CH_3-CH_2-NH_2) \) ऐथिल ऐमीन
नोट – एक से अधिक सजातीय श्रेणियों के सामान्य सूत्र समान हो सकते हैं. इसलिए इन श्रेणियों के यौगिक आपस में क्रियात्मक समूह समावयवी होते हैं. जैसे –
1. एल्कीन तथा साइक्लोऐल्केन
2. ऐल्कोहॉल तथा ईथर
3. ऐल्डिहाइड तथा कीटोन
4. कार्बोक्सिलिक अम्ल तथा एस्टर आदि.
कार्बन परमाणुओं के प्रकार – कार्बन परमाणु चार प्रकार के होते हैं –
1. प्राथमिक (Primary) p या 1°
2. द्वितीयक (Secondary) s या 2°
3. तृतीयक (Tertiary) t या 3°
4. चतुष्कीय (Quaternary) q या 4°
उदाहरण:
\( \overset{1^\circ}{CH_3} \)
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH}-\overset{2^\circ}{CH_2}-\overset{4^\circ}{\underset{\overset{1^\circ}{CH_3}}{|}}C-\overset{1^\circ}{CH_3} \)
\( \overset{3^\circ}{} \)
(इसमें 5 प्राथमिक, 2 द्वितीयक, 1 तृतीयक तथा 1 चतुष्कीय कार्बन है)
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH}=\overset{2^\circ}{CH}-\overset{1^\circ}{CH_3} \)
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH_2}-\overset{1^\circ}{OH} \)
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH_2}-\overset{O}{||}CH_2 \)
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{1^\circ}{CH_2}-O-\overset{1^\circ}{CH_2}-\overset{1^\circ}{CH_3} \)
हाइड्रोजन परमाणुओं के प्रकार – हाइड्रोजन परमाणु तीन प्रकार के होते हैं –
1. प्राथमिक (Primary) p या 1°
2. द्वितीयक (Secondary) s या 2°
3. तृतीयक (Tertiary) t या 3°
वे हाइड्रोजन परमाणु जो प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) कार्बन परमाणुओं से जुड़े होते हैं, उन्हें क्रमशः 1°, 2° तथा 3° हाइड्रोजन परमाणु कहते हैं.
उदाहरण:
\( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH}-\overset{3^\circ}{CH_3} \)
\( \overset{1^\circ}{CH_3} \)
इसमें 9 प्राथमिक हाइड्रोजन (1°H) तथा 1 तृतीयक हाइड्रोजन (3°H) उपस्थित है.
इसी प्रकार \( \overset{1^\circ}{CH_3}-\overset{2^\circ}{CH_2}-\overset{3^\circ}{CH_2}-\overset{4^\circ}{\underset{\overset{1^\circ}{CH_3}}{|}}C-\overset{1^\circ}{CH_3} \)
में 1°H, 2°H तथा 3°H उपस्थित हैं.
In simple words: सजातीय श्रेणी एक ही तरह के रासायनिक गुणों वाले यौगिकों का समूह होता है. इनमें सदस्यों का अणुभार बढ़ता जाता है और उनके बीच \( -CH_2 \) ग्रुप का अंतर होता है. कार्बन परमाणुओं को प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुष्कीय में बांटा जाता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वे कितने अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़े हैं.

🎯 Exam Tip: जब भी सजातीय श्रेणी या कार्बन परमाणुओं के प्रकार पर टिप्पणी लिखने को कहा जाए, तो परिभाषा के साथ उदाहरण और उनकी विशेषताओं को स्पष्ट रूप से समझाएं.

 

Question 49. निम्नलिखित की व्याख्या कीजिए -
(अ) प्रेरणिक प्रभाव
(ब) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव
(स) मीसोमेरिक प्रभाव
(द) अतिसंयुग्मन।
Answer:
(अ) प्रेरणिक प्रभाव:
ध्रुवीय सहसंयोजक बंध की उपस्थिति के कारण किसी समूह या परमाणु द्वारा कार्बन श्रृंखला में पास के बंधों में इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन को प्रेरणिक प्रभाव कहते हैं.
उदाहरण -
\( \overset{\delta\delta\delta +}{CH_3}-\overset{\delta\delta +}{CH_2}-\overset{\delta +}{CH_2}-\overset{\delta -}{CH_2}-Cl \)
3 2 1
C-Cl बंध ध्रुवीय होता है. इसके कारण कार्बन-1 पर आंशिक धनावेश \( (\delta+) \) और क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश \( (\delta-) \) बन जाता है.
आंशिक आवेशों को दिखाने के लिए \( \delta \) (डेल्टा) चिह्न का प्रयोग होता है. इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन को तीर के निशान \( (\delta+ \text{ से } \delta-) \) से दिखाया जाता है.
कार्बन-1 पर आंशिक धनावेश होने के कारण, यह पास के C-C बंध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर खींचता है. इससे C₁ पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कुछ हद तक पूरा हो जाता है, और कार्बन-2 पर भी थोड़ा धनावेश \( (\delta\delta+) \) बन जाता है.
लेकिन यह धनावेश C-1 पर स्थित धनावेश से कम होता है. इसका मतलब है कि C-Cl बंध की ध्रुवीयता के कारण पास के बंध में ध्रुवीयता पैदा होती है.
यह प्रभाव कार्बन श्रृंखला में आगे बढ़ता है, लेकिन बंधों की संख्या बढ़ने के साथ यह प्रभाव कम होता जाता है, और तीन बंधों के बाद नगण्य हो जाता है.
प्रेरणिक प्रभाव हाइड्रोजन के मुकाबले देखा जाता है, और इसका प्रेरणिक प्रभाव शून्य माना जाता है.
प्रेरणिक प्रभाव कार्बन श्रृंखला से जुड़े प्रतिस्थापी समूह की इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित या प्रतिकर्षित करने की क्षमता पर निर्भर करता है. इस आधार पर प्रेरणिक प्रभाव को दो प्रकारों में बांटा जाता है –
(1) ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव या इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रभाव (-I):
यह प्रभाव उन परमाणुओं या समूहों द्वारा दिखाया जाता है जिनकी विद्युत ऋणता हाइड्रोजन से ज्यादा होती है. इसलिए यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रभाव होता है. इसमें प्रतिस्थापी समूह पर ऋणात्मक चिह्न आता है, इसलिए इसे –I प्रभाव कहते हैं.
निम्नलिखित समूह –I प्रभाव दिखाते हैं, और उनके –I प्रभाव का क्रम निम्नलिखित है –
\( NO_2 > SO_3R > -CN > -COOH > F > Cl > Br > I > OAr > COOR > OH > -COR > C_6H_5 \)
(2) धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव या इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव (+I):
वे परमाणु या समूह जिनकी विद्युत ऋणता हाइड्रोजन से कम होती है, वे +I प्रभाव दिखाते हैं. इसमें प्रतिस्थापी पर धनावेश आता है, इसलिए इसे +I प्रभाव कहते हैं. यह एक इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव है. आमतौर पर, ऐल्किल समूह +I प्रभाव दिखाते हैं. इसका कारण अतिसंयुग्मन है, लेकिन यह –I प्रभाव से कमजोर होता है.
ऐल्किल समूह का आकार बढ़ने पर +I प्रभाव बढ़ता है, लेकिन समान कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्किल समूहों में शाखन (Branching) बढ़ने पर +I प्रभाव बढ़ जाता है. इसलिए विभिन्न ऐल्किल समूहों के +I प्रभाव का क्रम निम्नलिखित है –
\( \overset{(CH_3)_3C-}{(3^\circ)} > \overset{(CH_3)_2CH-}{(2^\circ)} > \overset{CH_3-CH_2-}{(1^\circ)} > \overset{CH_3-}{(1^\circ)} \)
प्रेरणिक प्रभाव के अनुप्रयोग – प्रेरणिक प्रभाव की मदद से अम्लों और क्षारों की सामर्थ्य (प्रबलता) को समझाया जा सकता है –
(1) कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीय प्रबलता:
–COOH से जुड़े समूह की प्रकृति पर निर्भर करती है. जब –COOH समूह से जुड़ा समूह +I प्रभाव दिखाता है, तो इसके इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी गुण के कारण –COOH के –O–H समूह के ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है. इससे अम्ल का आयनन कम हो जाता है, और \( H^+ \) देने की प्रवृत्ति भी कम हो जाती है. इसका मतलब है कि +I प्रभाव बढ़ने पर अम्लीय गुण कम होता है –
\( H-\overset{O}{||}C-OH > CH_3-\overset{O}{||}C-OH > CH_3-CH_2-\overset{O}{||}C-OH > \overset{CH_3}{\underset{CH_3}{|}}CH-\overset{O}{||}C-OH > \overset{CH_3}{\underset{CH_3}{|}}C-\overset{O}{||}C-OH \)
फार्मिक अम्ल एसीटिक अम्ल प्रोपिऑनिक अम्ल आइसोब्यूटिरिक अम्ल पिवेलिक अम्ल
(अम्लीय सामर्थ्य का घटता क्रम)
जब कार्बोक्सिलिक अम्लों में –I प्रभाव दिखाने वाला समूह होता है, तो इसके इलेक्ट्रॉन आकर्षी गुण के कारण –COOH के –O–H समूह के ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है. इससे अम्ल का आयनन बढ़ जाता है, और \( H^+ \) देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. इसका मतलब है कि –I प्रभाव बढ़ने पर अम्लीय गुण बढ़ता है.
\( Cl-\overset{O}{||}C-OH < CH_2Cl-\overset{O}{||}C-OH < CHCl_2-\overset{O}{||}C-OH < CCl_3-\overset{O}{||}C-OH \)
(अम्लीय सामर्थ्य का बढ़ता क्रम)
इस उदाहरण में –Cl की संख्या बढ़ रही है, जिससे –I प्रभाव भी बढ़ रहा है, और इसलिए अम्लीय गुण में वृद्धि हो रही है.
(ब) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव:
(1) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव एक अस्थायी प्रभाव है. यह प्रभाव केवल आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में होता है, और अभिकर्मक के हटते ही यह प्रभाव खत्म हो जाता है.
(2) यह प्रभाव \( >C=C<, -C \equiv C- \) और \( >C=O \) जैसे समूहों वाले यौगिकों द्वारा दिखाया जाता है.
(3) आक्रमणकारी अभिकर्मक की मांग पर साझित इलेक्ट्रॉन युग्म का मल्टीपल बॉन्ड \( (C=C, C \equiv C) \) से बंधे एक परमाणु पर पूरी तरह से विस्थापित होना इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव कहलाता है.
(4) इस प्रभाव में इलेक्ट्रॉन के संचलन को मुड़े हुए तीर के निशान \( (\curvearrowright) \) द्वारा दिखाया जाता है.
(5) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव दो प्रकार का होता है -
(a) +E प्रभाव
(b) –E प्रभाव
(a) धनात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (+E प्रभाव): इसमें मल्टीपल बॉन्ड के \( \pi \)-इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक जुड़ता है. जैसे -
\( >C=C< + H^+ \rightarrow >\overset{H}{C}-\overset{+}{C}< \)
(आक्रमणकारी अभिकर्मक)
(b) ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (-E प्रभाव): इस प्रभाव में मल्टीपल बॉन्ड के \( \pi \)-इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक नहीं जुड़ता है. जैसे –
\( >C=O + CN^- \rightarrow >\overset{CN}{C}-\overset{\ominus}{O}< \)
(आक्रमणकारी अभिकर्मक)
(स) मीसोमेरिक प्रभाव:
डबल बॉन्ड की आपसी क्रिया या पाई बॉन्ड और पास के परमाणु पर मौजूद एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के बीच की आपसी क्रिया के कारण इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मीसोमेरिक प्रभाव या अनुनाद प्रभाव कहलाता है.
यह प्रभाव \( +M \) और \( -M \) दो प्रकार का होता है:
(1) धनात्मक मीसोमेरिक प्रभाव (+M प्रभाव):
इस प्रभाव में इलेक्ट्रॉन युग्म बहुबंध से दूर या प्रतिस्थापी समूह से दूर होता है, यानी इलेक्ट्रॉन बेन्जीन वलय की ओर विस्थापित होते हैं. इसका मतलब है कि \( +M \) प्रभाव वाले समूह इलेक्ट्रॉन देते (प्रतिकर्षित करते) हैं. इस इलेक्ट्रॉन विस्थापन के कारण अणु में ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है.
उदाहरण ऐनिलीन –
NH₂
\( +R \) प्रभाव दिखाने वाले समूह निम्नलिखित हैं-
-X (हैलोजन), -OH, -OR, \( -\overset{O}{||}C-R \), -NH2, -NHR, -NR2, -NHCOR आदि.
इसलिए धनात्मक अनुनाद प्रभाव तभी होता है जब बेन्जीन वलय से जुड़े परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हो.
संयुग्मित निकाय:
किसी खुली श्रृंखला या चक्रीय निकाय में एकांतर सिंगल और डबल बॉन्ड होने पर इसे 'संयुग्मित निकाय' कहते हैं. 3-ब्यूटाडाइईन, ऐनिलीन, नाइट्रोबेन्जीन आदि इसके उदाहरण हैं. ऐसे निकायों में \( \pi \)-इलेक्ट्रॉन विस्थापित होते हैं, जिससे अणु में ध्रुवीयता पैदा होती है.
(2) ऋणात्मक अनुनाद प्रभाव (-R या –M प्रभाव):
इस प्रभाव में इलेक्ट्रॉन का विस्थापन संयुग्मित अणु में बंधे परमाणु या प्रतिस्थापी समूह की ओर होता है, यानी इलेक्ट्रॉन बेन्जीन वलय से बाहर की ओर विस्थापित होते हैं. इसका मतलब है कि \( -M \) प्रभाव वाले समूह इलेक्ट्रॉन आकर्षित करते हैं, जिससे बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है.
उदाहरण – नाइट्रोबेन्जीन
NO₂
\( -R \) प्रभाव दिखाने वाले समूह निम्नलिखित हैं-
-COOH, -CHO, \( >C=O \), –CN, -NO₂ आदि.
इसलिए ऋणात्मक अनुनाद प्रभाव तभी होता है जब बेन्जीन वलय से जुड़े परमाणु की विद्युत ऋणता कार्बन से अधिक हो, और उस पर खाली या आंशिक रूप से भरा हुआ p-कक्षक हो.
(द) अतिसंयुग्मन:
कार्बनिक यौगिकों में प्रतिस्थापी समूह के \( \sigma \) बंधों और पास के \( \pi \) सिस्टम के बीच \( \sigma - \pi \) अस्थायीकरण को अतिसंयुग्मन कहते हैं. इसे बॉन्ड-लेस रेजोनेंस भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें 1-कार्बन परमाणु और \( H^+ \) के बीच कोई वास्तविक बॉन्ड नहीं होता. अतिसंयुग्मन एक सामान्य स्थायित्व प्रभाव है, जिसमें \( \sigma \) इलेक्ट्रॉनों का अनुनाद होता है.
इसलिए इसे \( \sigma \) बॉन्ड रेजोनेंस भी कहते हैं. इसमें किसी असंतृप्त सिस्टम के परमाणु से सीधे बंधे ऐल्किल समूह के C-H आबंध या असहभाजित p कक्षक वाले परमाणु के \( \sigma \) इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है.
इसलिए ऐल्किल समूह के C-H आबंध के \( \sigma \) इलेक्ट्रॉन पास के असंतृप्त सिस्टम या असहभाजित p कक्षक के साथ आंशिक संयुग्मन दिखाते हैं. अतिसंयुग्मन एक स्थायी प्रभाव है.
एथिल कार्बधनायन \( (CH_3CH_2^+) \) से अतिसंयुग्मन को समझा जा सकता है, जिसमें धनावेशित कार्बन पर एक खाली p कक्षक होता है. मेथिल समूह का एक C-H आबंध, खाली p कक्षक के तल के साथ संरेखण में हो जाता है, जिसके कारण C-H आबंध के इलेक्ट्रॉन खाली p कक्षक में विस्थापित हो जाते हैं, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है.
अतिसंयुग्मन
CHHHCH3p कक्षक
अतः इस अतिव्यापन से कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि पास के \( \sigma \) आबंध के कारण धनावेश का विस्थानीकरण हो जाता है.
\( H-\overset{H}{\underset{H}{|}}C-\overset{+}{C}=C \longleftrightarrow H-\overset{H}{\underset{H}{|}}C=C-\overset{+}{C} \longleftrightarrow H-\overset{H}{\underset{H}{|}}C=C-\overset{+}{C} \longleftrightarrow H-\overset{H}{\underset{H}{|}}C=C-\overset{+}{C} \)
\( H \quad H \quad H \quad H \)
आमतौर पर, धनावेशित कार्बन से जुड़े ऐल्किल समूहों की संख्या बढ़ने पर अतिसंयुग्मन अधिक होता है, जिससे कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ता है. इसलिए विभिन्न कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है.
\( (CH_3)_3C^+ > (CH_3)_2CH^+ > CH_3CH_2^+ > CH_3^+ \)
\( (3^\circ) \quad (2^\circ) \quad (1^\circ) \)
अतिसंयुग्मन ऐल्कीनों और ऐल्किलऐरीनों द्वारा भी दिखाया जाता है. इसके द्वारा ऐल्कीनों के आपेक्षिक स्थायित्व को समझाया जा सकता है. प्रोपीन में अतिसंयुग्मन द्वारा इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण निम्न प्रकार होता है –
CH₃
In simple words: प्रेरणिक प्रभाव में पास के बंधों में इलेक्ट्रॉन थोड़े-थोड़े विस्थापित होते हैं, इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में मल्टीपल बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन पूरी तरह से एक परमाणु पर चले जाते हैं जब कोई अभिकर्मक आता है. मीसोमेरिक प्रभाव में मल्टीपल बॉन्ड और एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के बीच इलेक्ट्रॉनों का बंटवारा होता है, और अतिसंयुग्मन में \( \sigma \) बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन पास के \( \pi \) सिस्टम में फैल जाते हैं, जिससे स्थिरता बढ़ती है.

🎯 Exam Tip: इन सभी प्रभावों की परिभाषा, उदाहरण और उनके प्रकारों को अच्छे से समझें. प्रेरणिक प्रभाव के लिए अम्लीय/क्षारीय शक्ति पर इसके प्रभाव को याद रखें, इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव के लिए यह एक अस्थायी प्रभाव है, और मीसोमेरिक/अतिसंयुग्मन के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन पैटर्न महत्वपूर्ण हैं.

 

Question 50. निम्नलिखित तत्त्वों, नाइट्रोजन, सल्फर एवं ब्रोमीन के गुणात्मक विश्लेषण का रसायन लिखिए।
Answer:
(1) नाइट्रोजन का परीक्षण:
लैसे विलयन की थोड़ी मात्रा को एक परखनली में लेकर उसमें बराबर मात्रा में ताज़ा बना फेरस सल्फेट \( (FeSO_4) \) का संतृप्त विलयन मिलाते हैं. इसमें एक-दो बूंद सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन डालते हैं (यहाँ हरा अवक्षेप नाइट्रोजन की उपस्थिति नहीं दर्शाता). अब इस मिश्रण को गरम करके ठंडा करते हैं, और इसमें फेरिक क्लोराइड की कुछ बूंदें मिलाते हैं.
इसके बाद, इसमें 3-4 बूंद सांद्र हाइड्रोक्लोरिक या सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल मिलाने पर यदि विलयन का रंग हरा नीला (प्रशियन ब्लू) हो जाए, तो यौगिक में नाइट्रोजन उपस्थित होता है. इसमें प्रयुक्त अभिक्रियाएँ निम्न हैं:
\( FeSO_4 + 2NaOH \rightarrow Fe(OH)_2 \downarrow + Na_2SO_4 \)
\( Fe(OH)_2 + 6NaCN \rightarrow Na_4[Fe(CN)_6] + 2NaOH \)
सोडियम फेरोसायनाइड
(सोडियम हेक्सासायनोफेरेट II)
\( 3Na_4[Fe(CN)_6]+4FeCl_3 \rightarrow Fe_4[Fe(CN)_6]_3 + 12NaCl \)
फेरिक फेरोसायनाइड (प्रशियन ब्लू)
[आयरन (III) हेक्सासायनोफेरेट (II)]
(2) सल्फर का परीक्षण:
सल्फर का परीक्षण दो तरीकों से किया जाता है:
1. एक परखनली में लैसे विलयन (सोडियम निष्कर्ष) लेकर उसमें 3-4 बूंदें सोडियम नाइट्रोप्रसाइड विलयन मिलाते हैं. यदि विलयन का रंग बैंगनी हो जाए, तो यौगिक में सल्फर उपस्थित है. सोडियम निष्कर्ष में उपस्थित सोडियम सल्फाइड, लेड सल्फाइड का काला अवक्षेप बनाता है:
\( (CH_3COO)_2 Pb + Na_2S \rightarrow 2CH_3COONa + PbS \downarrow \)
काला अवक्षेप
(3) हैलोजनों का परीक्षण:
1. सोडियम निष्कर्ष में 50 प्रतिशत नाइट्रिक अम्ल डालकर उबालते हैं. विलयन को ठंडा करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट के ताज़ा बने विलयन की कुछ बूंदें डालते हैं. यदि श्वेत अवक्षेप आता है, जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में घुल जाता है, और तनु नाइट्रिक अम्ल डालने पर फिर से अवक्षेप आता है, तो क्लोरीन की उपस्थिति दर्शाता है.
\( NaCl + AgNO_3 \rightarrow AgCl \downarrow + NaNO_3 \)
(श्वेत अवक्षेप)
\( AgCl + 2NH_4OH \rightarrow [Ag(NH_3)_2]Cl + 2H_2O \)
विलेय
\( [Ag(NH_3)_2]Cl + 2HNO_3 \rightarrow AgCl \downarrow +2NH_4NO_3 \)
यदि हल्के पीले रंग का अवक्षेप आता है, जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में आंशिक रूप से विलेय होता है, तो ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है.
\( NaBr + AgNO_3 \rightarrow NaNO_3 + AgBr \downarrow \)
(हल्का पीला अवक्षेप)
यदि गहरे पीले रंग का अवक्षेप आता है, जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में पूरी तरह से अविलेय होता है, तो आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है.
\( NaI + AgNO_3 \rightarrow NaNO_3 + AgI \downarrow \)
(गहरा पीला अवक्षेप)
2. सोडियम निष्कर्ष की थोड़ी सी मात्रा को तनु नाइट्रिक अम्ल द्वारा अम्लीकृत करके कुछ बूंदें क्लोरोफार्म या कार्बन टेट्राक्लोराइड की डालकर बूंद-बूंद करके ताज़ा क्लोरीन जल डालकर हिलाते हैं –
क्लोरोफॉर्म की परत का रंग लाल-भूरा या नारंगी हो जाता है, जो ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है.
\( 2NaBr + Cl_2 \rightarrow 2NaCl + Br_2 \)
\( Br_2 + \) क्लोरोफार्म \( \rightarrow \) ब्रोमीन का क्लोरोफार्म में लाल-भूरा विलयन
क्लोरोफार्म की परत का रंग गुलाबी या बैंगनी हो जाता है, जो आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है.
\( 2NaI + Cl_2 \rightarrow 2NaCl + I_2 \)
\( I_2 + \) क्लोरोफार्म \( \rightarrow \) आयोडीन का क्लोरोफार्म में बैंगनी विलयन
In simple words: नाइट्रोजन का पता लगाने के लिए फेरस सल्फेट और फेरिक क्लोराइड के साथ परीक्षण किया जाता है, जिससे प्रशियन ब्लू रंग मिलता है. सल्फर के लिए सोडियम नाइट्रोप्रसाइड या लेड सल्फाइड परीक्षण होता है. हैलोजनों के लिए सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण किया जाता है, जो अवक्षेप के रंग और अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में घुलनशीलता के आधार पर क्लोरीन, ब्रोमीन और आयोडीन का पता लगाता है.

🎯 Exam Tip: गुणात्मक विश्लेषण के लिए, हर तत्व के परीक्षण का सिद्धांत, अभिकर्मक, होने वाली अभिक्रियाएं और अंतिम परिणाम (जैसे रंग या अवक्षेप) को याद रखें. रासायनिक समीकरणों को सही ढंग से लिखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 51. ड्यूमा एवं जेल्डाल (केल्डाल) विधि का वर्णन कीजिए। नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना समझाइए।
Answer:
ड्यूमा विधि:
सिद्धान्त:
कार्बनिक यौगिक और क्यूप्रिक ऑक्साइड के मिश्रण को कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में तेज़ गरम करने पर यौगिक में मौजूद कार्बन और हाइड्रोजन क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड और जल (वाष्प) में ऑक्सीकृत हो जाते हैं, और नाइट्रोजन गैस निकलती है.
\( C_xH_yN_z + [2x + y/2] CuO \xrightarrow{गर्म} xCO_2 + y/2H_2O + z/2 N_2 + (2x + y/2)Cu \)
थोड़ी मात्रा में बने नाइट्रोजन के ऑक्साइडों को कॉपर के गरम तार पर प्रवाहित करके नाइट्रोजन में बदल दिया जाता है. उत्पन्न गैसों के मिश्रण को एक नाइट्रोमीटर में KOH के जलीय विलयन के ऊपर इकट्ठा करते हैं, जिससे \( CO_2 \) गैस KOH के विलयन में अवशोषित हो जाती है.
CO₂ गैसभट्टीकार्बनिक यौगिकCuO के बड़े कणकॉपर नलीनाइट्रोजन गैसKOH विलयनमर्करी सीलनाइट्रोमीटरनाइट्रोजन के निर्धारण की ड्यूमा की विधि
गणना:
माना कि ड्यूमा के प्रयोग में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा 'm' ग्राम है, एकत्रित \( N_2 \) का आयतन \( V_1 \) ml है और कक्ष का तापमान \( T_1K \) है. तो मानक ताप और दाब (S.T.P) पर \( N_2 \) का आयतन (V) =
\( V = \frac{P_1 \times V_1}{T_1} \times \frac{273}{760} \)
यहाँ \( P_1 \) और \( V_1 \) क्रमशः \( N_2 \) का दाब और आयतन हैं. \( P_1 \) वह दाब है जिस पर नाइट्रोजन को इकट्ठा किया गया है, जो वायुमंडलीय दाब से अलग है.
\( \implies \) \( N_2 \) का द्रव्यमान \( = \frac{28}{22400} \times \) S.T.P. पर \( N_2 \) का आयतन
\( \implies \) यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता \( = \frac{\text{S.T.P. पर } N_2 \text{ का आयतन}}{\text{यौगिक का भार}} \times 100 \)
अंशांकित नली में इकट्ठे नाइट्रोजन गैस का आयतन मापा जाता है. प्रयोग के तापमान और दाब पर मापे गए नाइट्रोजन के आयतन को गैस समीकरण द्वारा मानक ताप व दाब (S.T.P) पर बदलकर नाइट्रोजन की मात्रा की गणना कर ली जाती है. कार्बनिक यौगिक और नाइट्रोजन की मात्राओं से यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता की गणना की जाती है.
जेल्डॉल विधि:
नाइट्रोजन के निर्धारण की यह एक अच्छी और व्यावहारिक विधि है, लेकिन यह विधि:
(i) विषम चक्रीय यौगिकों (जैसे पिरीडीन, पायरोल, क्विनोलीन आदि) के लिए उपयोग नहीं की जा सकती.
(ii) नाइट्रो और एजो समूह युक्त यौगिकों के लिए भी यह विधि उपयुक्त नहीं है, क्योंकि दी गई प्रायोगिक परिस्थितियों में ये यौगिक नाइट्रोजन को अमोनियम सल्फेट में नहीं बदलते.
सिद्धान्त:
इस विधि में नाइट्रोजन युक्त यौगिक को सांद्र \( H_2SO_4 \) के साथ क्यूप्रिक सल्फेट तथा पोटैशियम सल्फेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में तब तक गरम करते हैं जब तक कि विलयन पारदर्शी न हो जाए. इससे इसमें मौजूद नाइट्रोजन, अमोनियम सल्फेट \( ((NH_4)_2SO_4) \) में बदल जाती है. इसे \( NaOH \) के अधिकता में गरम करने पर अमोनिया गैस निकलती है. प्राप्त गैस को मानक \( H_2SO_4 \) विलयन के ज्ञात आयतन में अवशोषित कर लिया जाता है. इसके बाद बचे हुए \( H_2SO_4 \) का अनुमापन \( NaOH \) के मानक विलयन द्वारा करके (उदासीनीकरण) इसकी मात्रा ज्ञात कर लेते हैं. अम्ल \( (H_2SO_4) \) की प्रारंभिक मात्रा और अभिक्रिया के बाद बची हुई मात्रा का अंतर, अमोनिया के साथ अभिकृत, अम्ल की मात्रा के बराबर होगा.
\( \text{कार्बनिक यौगिक} + H_2SO_4 \xrightarrow{\text{सान्द्र}} (NH_4)_2SO_4 \)
(अमोनियम सल्फेट)
\( (NH_4)_2SO_4 + 2NaOH \rightarrow Na_2SO_4 + 2NH_3 + 2H_2O \)
\( 2NH_3 + H_2SO_4 \rightarrow (NH_4)_2SO_4 \)
कैल्डॉल विधि में उपयोग होने वाला उपकरण नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है.
पाचनकैल्डॉल फ्लास्कनाइट्रोजन के आकलन की कैल्डॉल विधिकैल्डॉल आसवनH₂Oस्टैण्डपाचन से प्राप्त पदार्थ + NaOHH₂Oमानक H₂SO₄ का ज्ञात आयतन
गणना:
कार्बनिक यौगिक और अमोनिया की मात्राओं की मदद से यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता की गणना की जा सकती है.
माना कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = W ग्राम,
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = \( V_1 \) मिली,
अम्ल की नार्मलता = \( N_1 \)
नार्मलता की परिभाषा के अनुसार, 1N \( NH_3 \) विलयन के 1000 मिली में 17 ग्राम अमोनिया और 14 ग्राम नाइट्रोजन होती है.
\( \implies \) 1N \( NH_3 \) विलयन के \( V_1 \) मिली में नाइट्रोजन \( = \frac{14 \times V_1 \times N_1}{1000} \) ग्राम
यौगिक में नाइट्रोजन का भार \( = \frac{14 \times V_1 \times N_1}{1000} \) ग्राम
अतः, यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता \( = \frac{\text{नाइट्रोजन का भार}}{\text{यौगिक का भार}} \times 100 \)
\( = \frac{14 \times V_1 \times N_1 \times 100}{W \times 1000} \)
\( = \frac{1.4 \times N_1 \times V_1}{W} \% \)
In simple words: ड्यूमा विधि में कार्बनिक यौगिक को गरम करके नाइट्रोजन गैस निकालते हैं, जिसे इकट्ठा करके मात्रा निकालते हैं. जेल्डॉल विधि में नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलकर सल्फ्यूरिक अम्ल से अवशोषित किया जाता है, फिर उसकी मात्रा निकालकर प्रतिशतता की गणना करते हैं. दोनों विधियों में नाइट्रोजन की मात्रा और यौगिक के कुल भार से प्रतिशतता निकाली जाती है.

🎯 Exam Tip: ड्यूमा और जेल्डॉल दोनों विधियों का सिद्धांत, प्रक्रिया, और गणना सूत्र याद रखें. दोनों विधियों के लाभ और सीमाएं भी महत्वपूर्ण हैं. समीकरणों को सही ढंग से लिखना सुनिश्चित करें.

 

Question 18. कार्बान को परिभाषित कीजिए।
Answer:
कार्बऋणायन एक ऐसी स्पीशीज़ है जिसमें कार्बन परमाणु पर एक नकारात्मक आवेश और एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, जिससे कार्बन का अष्टक पूरा होता है. कार्बऋणायन सहसंयोजी बंध के विषमांश विखंडन से भी बनता है.
कार्बधनायन की तरह ही कार्बऋणायन भी अस्थायी और क्रियाशील होते हैं. वे नाभिक स्नेही या लुईस क्षार (इलेक्ट्रॉन दाता) की तरह व्यवहार करते हैं, क्योंकि उनमें इलेक्ट्रॉनों की अधिकता होती है.
उदाहरण:
\( \overset{\ominus}{CH_3} \)
मेथिल कार्बऐनायन
\( CH_3\overset{\ominus}{CH_2} \)
एथिल कार्बऐनायन
कार्बऋणायन की आकृति:
एकल इलेक्ट्रॉन युग्म
\( sp^3 \) संकरण
कार्बऋणायन की कक्षीय संरचना:
कार्बऋणायन में ऋणावेशित कार्बन परमाणु \( sp^3 \) संकरित अवस्था में होता है. इसमें ऋणावेशित कार्बन परमाणु तीन \( sp^3 \) संकरित कक्षकों से अन्य तीन परमाणुओं के साथ \( \sigma \) बंध बनाता है, और चौथे \( sp^3 \) संकरित कक्षक में एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होता है. इसलिए इसकी संरचना पिरामिडीय होती है.
कार्बऋणायन का बनना:
जब एक बेस किसी कार्बनिक यौगिक से प्रोटॉन निकालता है, तो कार्बऋणायन बनता है.
उदाहरण: \( R-CH_2-H + OH^- \rightarrow R-\overset{\ominus}{CH_2} + H_2O \)
कार्बऋणायनों का स्थायित्व:
कार्बऋणायन भी तीन प्रकार के होते हैं – प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) और तृतीयक (3°). इनके स्थायित्व का क्रम कार्बधनायन के विपरीत होता है –
\( CH_3^- > CH_3-CH_2^- > (CH_3)_2CH^- > (CH_3)_3C^- \)
\( (1^\circ) \quad (2^\circ) \quad (3^\circ) \)
धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+I प्रभाव) बढ़ने पर कार्बऋणायनों का स्थायित्व कम होता है, क्योंकि +I प्रभाव के कारण ऋणावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है, जिससे उनकी क्रियाशीलता बढ़ जाती है. इसके विपरीत, ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव (-I प्रभाव) के कारण कार्बऋणायनों का स्थायित्व बढ़ता है, क्योंकि इससे ऋणावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है.
In simple words: कार्बऋणायन एक कार्बन परमाणु होता है जिस पर नकारात्मक चार्ज और एक खाली इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, जिससे उसका अष्टक पूरा हो जाता है. ये नाभिक स्नेही होते हैं और इनका स्थायित्व तृतीयक से प्राथमिक तक घटता जाता है.

🎯 Exam Tip: कार्बऋणायन की परिभाषा, संरचना, बनने की प्रक्रिया और स्थायित्व के क्रम को याद रखना महत्वपूर्ण है. ध्यान दें कि इसकी स्थायित्व का क्रम कार्बधनायन से उल्टा होता है.

 

Question. कार्बीन को परिभाषित कीजिए।
Answer:
कार्बीन एक विशेष प्रकार का मध्यवर्ती है जो तब बनता है जब किसी अभिक्रिया में एक ही कार्बन परमाणु से समांश विखंडन द्वारा दो समूह निकलते हैं. यहाँ दोनों बंध समान रूप से टूटते हैं, जिससे कार्बन परमाणु पर दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं. ये दोनों इलेक्ट्रॉन अलग-अलग बंधों के समांश विखंडन से प्राप्त होते हैं.
उदाहरण:
\( :CH_2 \) या \( :CCl_2 \)
कार्बीन में एक कार्बन परमाणु दो सहसंयोजी बंधों द्वारा दो परमाणुओं से जुड़ा होता है और इस कार्बन परमाणु पर दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं. कार्बीन इलेक्ट्रॉन-न्यून होते हैं क्योंकि उनके कार्बन परमाणु के बाहरी कक्ष में केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं.
कार्बीन के प्रकार:
कार्बीन मध्यवर्ती दो प्रकार के होते हैं –
1. सिंगलेट कार्बीन: इसमें दोनों अयुग्मित इलेक्ट्रॉन एक ही कक्षक में होते हैं और उनका स्पिन एक-दूसरे के विपरीत होता है, जिससे इसका चुंबकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है.
2. ट्रिपलेट कार्बीन: इसमें दोनों अयुग्मित इलेक्ट्रॉन दो अलग-अलग कक्षकों में होते हैं और उनका स्पिन भी विपरीत नहीं होता है, जिससे इसमें स्थायी चुंबकीय आघूर्ण पूरा होता है.
कार्बीन का बनना:
\( CH_4 \xrightarrow{\text{तापीय अपघटन}} :CH_2 + H_2 \)
\( CH_2N_2 \xrightarrow{hv \text{ या ताप}} :CH_2 + N_2 \)
In simple words: कार्बीन एक कार्बन परमाणु होता है जिसमें दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं. यह तब बनता है जब एक ही कार्बन से दो बॉन्ड समान रूप से टूटते हैं. यह सिंगलेट या ट्रिपलेट रूप में हो सकता है, इस बात पर निर्भर करता है कि अयुग्मित इलेक्ट्रॉन कैसे व्यवस्थित हैं.

🎯 Exam Tip: कार्बीन की परिभाषा, उसके बनने की विधि और सिंगलेट व ट्रिपलेट कार्बीन के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है. उदाहरणों को भी याद रखें.

 

Question. नाइट्रीन को परिभाषित कीजिए।
Answer:
नाइट्रीन, कार्बन की तरह ही एक उदासीन, इलेक्ट्रॉन-न्यून स्पीशीज़ होती है, जिसमें नाइट्रोजन परमाणु पर चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन और एक सहसंयोजी बंध होता है.
नाइट्रीन भी दो प्रकार के हो सकते हैं:
1. सिंगलेट नाइट्रीन: \( R-\overset{\uparrow \downarrow}{N} \)
2. ट्रिपलेट नाइट्रीन: \( R-\overset{\uparrow}{\underset{\uparrow}{N}} \)
रासायनिक अभिक्रियाओं में सिंगलेट नाइट्रीन एक इलेक्ट्रॉन स्नेही की तरह और ट्रिपलेट नाइट्रीन एक द्विमूलक की तरह व्यवहार करती है.
In simple words: नाइट्रीन एक नाइट्रोजन परमाणु है जिस पर इलेक्ट्रॉन कम होते हैं और उस पर एक अकेला बॉन्ड और दो इलेक्ट्रॉन युग्म (या दो अलग-अलग अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) होते हैं. यह भी सिंगलेट या ट्रिपलेट रूप में होता है.

🎯 Exam Tip: नाइट्रीन की परिभाषा और उसके प्रकार (सिंगलेट और ट्रिपलेट) को याद रखें. इसका व्यवहार (इलेक्ट्रॉन स्नेही या द्विमूलक) भी महत्वपूर्ण है.

 

प्रश्न 53. (अ) मुक्तमूलकों के स्थायित्व एवं अभिक्रियाओं पर प्रकाश डालिये। (ब) कार्बधनायनों के प्राप्त करने की विधियाँ, अभिक्रियाएँ एवं स्थायित्व की विवेचना कीजिए।
Answer:
(अ) मुक्तमूलकों के स्थायित्व एवं अभिक्रियाओं पर प्रकाश डालिये:
उदासीन मध्यवर्ती स्पीशीज (परमाणु या समूह) जिनमें विषम संख्या में इलेक्ट्रॉन होते हैं उन्हें मुक्त मूलक कहते हैं। मुक्त मूलक समांश विखण्डन से बनते हैं। अन्य मध्यवर्ती स्पीशीज के समान मुक्त मूलक भी अस्थायी तथा क्रियाशील होते हैं। मुक्त मूलक अनुचुम्बकीय होते हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है। इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित करने की प्रबल प्रवृत्ति होती है अतः ये शीघ्रता से एक - दूसरे के साथ या अन्य अणुओं के साथ अभिक्रिया करके अपने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित कर लेते हैं।
मुक्त मूलकों का बनना -
\( Cl-Cl \overset{\text{hv या ऊष्मा}}{\longrightarrow} Cl \cdot + Cl \cdot \)
मुक्त मूलक की कक्षीय संरचना -

असंकरित कक्षक में विषम इलेक्ट्रॉन sp² - संकरित कार्बन परमाणु H H H

कार्बनिक मुक्त मूलक (जैसे \( CH_3 \)) में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युक्त कार्बन परमाणु \( sp^2 \) संकरित अवस्था में होते हैं (इसे \( sp^3 \) संकरित भी मानते हैं) अतः मेथिल मुक्त मूलक की त्रिकोणीय समतल ज्यामिति होती है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन असंकरित p कक्षक में रहता है।
मुक्त मूलकों का स्थायित्व:
मुक्त मूलकों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है - प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक, जब अयुग्मित इलेक्ट्रॉन क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक कार्बन परमाणु पर उपस्थित होता है।
मुक्त मूलकों के स्थायित्व का क्रम भी कार्बधनायनों के समान ही होता है अर्थात् इनके स्थायित्व का क्रम निम्न है जिसका कारण बढ़ता हुआ अतिसंयुग्मन तथा धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव है।
\( CH_3 \cdot < CH_3CH_2 \cdot < CH(CH_3)_2 \cdot < C(CH_3)_3 \cdot \)
(1)° मेथिल मुक्त मूलक < (1)° प्राथमिक एथिल मुक्त मूलक < (2)° द्वितीयक आइसोप्रोपिल मुक्त मूलक < (3)° तृतीयक-ब्यूटिल मुक्त मूलक
In simple words: मुक्त मूलक वे कण होते हैं जिनमें एक अकेला (अयुग्मित) इलेक्ट्रॉन होता है। ये बहुत अस्थायी और जल्दी प्रतिक्रिया करते हैं। इनकी स्थिरता कार्बन परमाणुओं से जुड़े अन्य समूहों पर निर्भर करती है, जैसे ज्यादा शाखाएं होने पर ये अधिक स्थिर होते हैं।

🎯 Exam Tip: मुक्त मूलक, कार्बधनायन और कार्बऋणायन जैसे मध्यवर्ती रासायनिक अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए इनकी संरचना और स्थायित्व को समझना आवश्यक है।

 

प्रश्न 53. (ब) कार्बधनायनों के प्राप्त करने की विधियाँ, अभिक्रियाएँ एवं स्थायित्व की विवेचना कीजिए।
Answer:
मुक्त मूलक प्रतिस्थापन - ये अभिक्रियाएँ मुक्त मूलक द्वारा सम्पन्न होती हैं जिसमें प्रकाश (hv) या परऑक्साइड की उपस्थिति आवश्यक है।
उदाहरण:
\( CH_4 + Cl_2 \overset{hv}{\longrightarrow} CH_3Cl + HCl \)
ये अभिक्रियाएँ लगातार चलती रहती हैं अतः इन्हें श्रृंखला अभिक्रियाएँ कहते हैं।
मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रियाएँ - इस प्रकार की अभिक्रियाओं में
\( >C=C< \) या \( -C \equiv C- \)
पर मुक्त मूलक, जो कि प्रकाश की उपस्थिति में अभिकर्मक के समांश विखण्डन द्वारा बनता है का योग होकर एक मध्यवर्ती मुक्त मूलक बनता है। यह मध्यवर्ती किसी अन्य परमाणु या यौगिक या मुक्त मूलक से अभिक्रिया कर उत्पाद बनाता है। यह भी एक श्रृंखला अभिक्रिया है तथा खराश के नियम द्वारा होती है।
\( Cl-Cl \overset{hv}{\longrightarrow} 2Cl \cdot \)
\( >C=C<+Cl \cdot \longrightarrow > \overset{\cdot}{C}-\overset{Cl}{C}< \)
मध्यवर्ती मुक्तमूलक
अन्य उदाहरण-
\( CH_3-CH=CH_2 + HBr \overset{\text{परऑक्साइड}}{\longrightarrow} CH_3-CH_2-CH_2Br \)
(ब) कार्बधनायनों के प्राप्त करने की विधियाँ, अभिक्रियाएँ एवं स्थायित्व:
कार्बधनायन:
वह मध्यवर्ती अस्थायी स्पीशीज जिसमें कार्बन पर धनावेश होता है, उसे कार्बधनायन कहते हैं। पहले इसे कार्बोनियम आयन भी कहा जाता था। कार्बधनायन में धनावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉनों का षष्टक (6 इलेक्ट्रॉन) (Sextet) होता है अतः यह कार्बन इलेक्ट्रॉन न्यून होता है। तथा इस पर \( sp^2 \) संकरण होता है एवं इसकी आकृति त्रिकोणीयसमतल होती है। कार्बधनायन अत्यधिक अस्थायी तथा क्रियाशील होते हैं।
कार्बधनायन का बनना - कार्बधनायन सहसंयोजक बंध के विषमांश विखण्डन द्वारा कुछ अभिक्रियाओं में मध्यवर्ती के रूप में बनते हैं।
एथिलीन \( \overset{+}{\text{एथिल कार्बधनायन}} \)
कार्बधनायन की आकृति - कार्बधनायन की आकृति त्रिकोणीय समतल होती है, जिसमें धनावेशित कार्बन \( sp^2 \) संकरित होता है (बन्ध कोण 120°) अतः \( CH_3 \) में कार्बन के तीन \( sp^2 \) संकरित कक्षक हाइड्रोजन के 1s कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके \( C(sp^2)-H(1s) \) सिग्मा बन्ध बनाते हैं तथा असंकरित रिक्त p कक्षक इस तल के लंबवत् होता है।

असंकरित रिक्त 2p-कक्षक sp²- संकरित कार्बन परमाणु + H H H 120°

कार्बधनायनों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है - प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) जिनमें धनावेशित कार्बन क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक होता है।
उदाहरण - \( CH_3 \overset{+}{\text{मेथिल धनायन}} \) या मेथिल कार्बधनायन कहते हैं। इसी प्रकार \( CH_3CH_2 \overset{+}{\text{एथिल कार्बधनायन}} \) (एक प्राथमिक कार्बधनायन), \( (CH_3)_2CH \overset{+}{\text{आइसोप्रोपिल कार्बधनायन}} \) (एक द्वितीयक कार्बधनायन) एवं \( (CH_3)_3C \overset{+}{\text{तृतीयक ब्यूटिलकार्बधनायन}} \) (एक तृतीयक कार्बधनायन) कहा जाता है।
कार्बधनायनों का स्थायित्व - कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है -
तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक
\( (CH_3)_3C^+ > (CH_3)_2CH^+ > CH_3CH_2^+ > CH_3^+ \)
ऐल्किल कार्बधनायनों के स्थायित्व की व्याख्या अतिसंयुग्मन तथा प्रेरणिक प्रभाव द्वारा की जा सकती है। अतिसंयुग्मन बढ़ने पर, धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+I प्रभाव) में भी वृद्धि होती है जिससे कार्बधनायन के धनावेश का विस्थानीकरण होता है। इसलिए कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ जाता है। अतः धनावेशित कार्बन से जुड़े एल्किल समूहों की संख्या बढ़ने पर कार्बधनायन के स्थायित्व में वृद्धि होती है क्योंकि एल्किल समूह के इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी गुण के कारण ये इलेक्ट्रॉन न्यून कार्बन की इलेक्ट्रॉन न्यूनता में कमी कर देते हैं। लेकिन ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव (-I प्रभाव) के कारण कार्बधनायन के स्थायित्व में कमी होती है। वे कार्बधनायन जिनमें \( \pi \) इलेक्ट्रॉनों का अनुनाद होता है। उनका स्थायित्व ऐल्किल कार्बधनायनों से अधिक होता है तथा अनुनाद के बढ़ने पर इनका स्थायित्व बढ़ता है।
उदाहरण -
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन - इसमें एक इलेक्ट्रॉनस्नेही का प्रतिस्थापन अन्य इलेक्ट्रॉनस्नेही द्वारा होता है।
उदाहरण - ऐरोमैटिक यौगिकों में वाक्य में प्रतिस्थापन
\( C_6H_6 + NO_2(HNO_3 + H_2SO_4) \longrightarrow C_6H_5NO_2 + H^+ \)
\( C_6H_6 + Br_2 \overset{FeBr_3}{\longrightarrow} C_6H_5Br + HBr \)
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ - ये ऐल्कीन और ऐल्काइन के द्विबंध एवं त्रिबंध पर निम्नलिखित प्रकार से दर्शायी जा सकती हैं -
\( >C=C<+X-Y \longrightarrow \overset{+}{C}-\overset{Y}{C}< \overset{कार्बोकेटायन}{\longrightarrow} X-\overset{C}{C}-\overset{Y}{C}< \)
उदाहरण -
\( CH_2=CH_2 + HBr \longrightarrow CH_3-CH_2-Br \)
In simple words: कार्बधनायन ऐसे कण होते हैं जिनमें कार्बन परमाणु पर धन आवेश होता है और उसके आसपास छह इलेक्ट्रॉन होते हैं। वे अस्थिर होते हैं और त्रिकोणीय समतल आकार के होते हैं। वे अक्सर रासायनिक प्रतिक्रियाओं में बनते हैं और उनकी स्थिरता आसपास के परमाणुओं की संख्या पर निर्भर करती है।

🎯 Exam Tip: कार्बधनायनों की स्थिरता का क्रम बहुत महत्वपूर्ण है और इसे हाइपरकंजुगेशन और प्रेरक प्रभाव जैसे कारकों से समझा जा सकता है। इसे याद रखें कि अधिक शाखाएं अधिक स्थिरता प्रदान करती हैं।

 

प्रश्न 54. नामकरण की रूढ़ प्रणाली को उदाहरण सहित समझाइए, इसकी सीमाएँ क्या हैं?
Answer:
रूढ़ पद्धति या सामान्य नाम पद्धति:
कार्बनिक यौगिकों के नामकरण की यह सबसे पुरानी पद्धति है। इस पद्धति में यौगिकों का नाम उनके स्रोत, स्थान, विशिष्ट गुण, आविष्कार तथा उपयोग इत्यादि के आधार पर दिया जाता है। इस प्रकार के नाम सरल तथा छोटे होते हैं लेकिन नियमबद्ध न होने के कारण अलग-अलग याद रखना पड़ता है तथा इनका यौगिक की संरचना से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कुछ महत्त्वपूर्ण यौगिकों के रूढ़ नाम सारणी में दिए गए हैं -
सारणी: कार्बनिक यौगिकों के रूढ़नाम

क्रम सं.यौगिकसामान्य नाम
1.\( CH_4 \)मेथेन
2.\( (H_3C)_2CO \)ऐसीटोन
3.\( CHCl_3 \)क्लोरोफार्म
4.\( C_6H_6 \)बेन्जीन
5.\( C_6H_5OCH_3 \)ऐनीसॉल
6.\( C_6H_5NH_2 \)ऐनिलीन
7.\( C_6H_5COCH_3 \)ऐसीटोफीनोन

कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त कार्बन के एक नवीन क्रिस्टलीय अपररूप \( C_{60} \) का नाम 'बकमिन्स्टर फुलरीन' रखा गया, क्योंकि इसकी आकृति अल्पांतरी गुंबदों से मिलती है। इसे प्रसिद्ध अमेरिकी वास्तुकार आर. बुक मिन्स्टर फुलर ने लोकप्रिय बनाया।
कार्बनिक यौगिकों के नाम के साथ नार्मल, आइसो तथा नियो प्रयुक्त करने के नियम
1. नार्मल (n): सीधी श्रृंखला युक्त ऐल्केन तथा इनके व्युत्पन्नों के नाम में n का प्रयोग करते हैं लेकिन IUPAC पद्धति में n का प्रयोग नहीं किया जाता है।
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_3 \) n-ब्यूटेन
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3 \) n-पेन्टेन
2. आइसो (iso): एल्केन, एल्कीन तथा इनके व्युत्पन्नों में जब यौगिक के एक सिरे पर एक कार्बन से दो मेथिल समूह जुड़े हों

CH₃ CH- CH-

तथा शेष कार्बन श्रृंखला सीधी हो तब आइसो का प्रयोग करते हैं।
3. नियो (Neo): एल्केन तथा इनके व्युत्पन्नों में यौगिक के एक सिरे की तरफ

CH₃ CH₃ CH₃

समूह हो तथा शेष कार्बन श्रृंखला सीधी हो तो नियो का प्रयोग किया जाता है।
कुछ कार्बनिक यौगिकों के सामान्य अथवा रूढ़ नाम निम्नलिखित हैं -

क्रम सं.यौगिकसामान्य नाम
1.\( CH_4 \)मेथेन
2.\( (H_3C)_2CO \)ऐसीटोन
3.\( CHCl_3 \)क्लोरोफार्म
4.\( C_6H_6 \)बेन्जीन
5.\( C_6H_5OCH_3 \)ऐनीसॉल
6.\( C_6H_5NH_2 \)ऐनिलीन
7.\( C_6H_5COCH_3 \)ऐसीटोफीनोन

ऐल्केन के एकसंयोजी मूलक: ऐल्केन में से एक हाइड्रोजन परमाणु हटाने पर प्राप्त मूलक को ऐल्किल मूलक कहते हैं। ऐल्किल समूह का नाम प्राप्त करने के लिए संबंधित ऐल्केन के नाम से ऐन (ane) को इल (yl) द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
उदाहरण -

प्रोपेन(i) \( CH_3-CH_2CH_2 \)-n-प्रोपिल (Pr)
\( CH_3-CH_2-CH_3 \)(ii) \( CH_3-\overset{\text{I}}{CH}-CH_3 \)आइसोप्रोपिल प्रोपिल या द्वितीयक (Pri)

ब्यूटेन के मूलक - ब्यूटेन \( (C_4H_{10}) \) के दो समावयवी होते हैं - n - ब्यूटेन तथा आइसोब्यूटेन। n - ब्यूटेन से दो तथा आइसोब्यूटेन से भी दो ऐल्किल मूलक प्राप्त होते हैं। अतः ब्यूटेन के एकसंयोजी मूलक [ब्यूटिल (Bu)] चार होते हैं।
(1) n - ब्यूटेन \( (C_4H_{10}) \):
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_3 \longrightarrow CH_3-CH_2-CH_2-CH_2- \)
n-ब्यूटिल
\( \longrightarrow CH_3-CH_2-\overset{\text{I}}{CH}-CH_3 \)
द्वितीयक ब्यूटिल (Sec. Butyl)
(2) आइसोब्यूटेन \( (C_4H_{10}) \):

CH₃ CH₃-CH-CH₃ \( \longrightarrow \) CH₃-CH-CH₂- आइसोब्यूटिल \( \longrightarrow \) CH₃-\overset{\text{I}}{C}-CH₃ CH₃ तृतीयक (tert.) ब्यूटिल

पेन्टेन के मूलक - पेन्टेन \( (C_5H_{12}) \) के तीन समावयवी होते हैं - n - पेन्टेन, आइसोपेन्टेन तथा नियोपेन्टेन जिनसे क्रमशः 3, 4 तथा 1 एकसंयोजी मूलक बनते हैं। अतः पेन्टेन के एकसंयोजी मूलक (पेन्टिल) आठ होते हैं। पेन्टिल मूलक को एमिल भी कहा जाता है।
(1) n - पेन्टेन:
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3 \)
(2) आइसोपेन्टेन:

CH₃ CH₃-CH-CH₂-CH₃ \( \longrightarrow \) CH₃-CH-CH₂-CH₂-CH₂ CH₃ आइसोपेन्टिल \( \longrightarrow \) CH₃-CH-CH-CH₃ CH₃ सक्रिय आइसोपेन्टिल या द्वितीयक आइसोपेन्टिल \( \longrightarrow \) CH₃-\overset{\text{I}}{C}-CH₂-CH₃ CH₃ तृतीयक पेन्टिल या तृतीयक ऐमिल \( \longrightarrow \) CH₂-CH-CH₂-CH₃ CH₃ सक्रिय ऐमिल (3) नियोपेन्टेन: CH₃ CH₃-\overset{\text{I}}{C}-CH₃ \(\longrightarrow\) CH₃-\overset{\text{I}}{C}-CH₂- CH₃ CH₃ नियोपेन्टिल

कुछ महत्वपूर्ण असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के मूलक निम्नलिखित हैं -
(i) \( CH_2=CH- \) वाइनिल (Vinyl)
(ii) \( CH_2=CH-CH_2- \) एलिल (Allyl)
(iii) \( CH \equiv C-CH_2- \) प्रोपार्जिल (Propargyl)
कुछ महत्वपूर्ण ऐरोमैटिक मूलक निम्नलिखित हैं -

CH₂- (iii) या \( C_6H_5-CH_2- \) बेन्जिल (Benzyl) CH- (iv) \( C_6H_5CH< \) बेंजल (Benzal) या बेंजिलिडीन (Benzylidene) \( C \equiv \) (v) \( C_6H_5CH \equiv \) बेन्जो (Benzo) या बेंजिलिडाइन (Benzylidyne) CH₃ (vi) ऑर्थोटॉलिल (Orthotolyl)

(vii) \( (C_6H_5)_2CH- \) बेन्जहाइड्रिल (Benzhydril)
(viii) \( (C_6H_5)_3C- \) ट्रिटिल (Trityl)
(ix) \( C_6H_5CO- \) बेन्जॉयल (Benzoyl)
सामान्य नाम पद्धति में विभिन्न सजातीय श्रेणियों के कार्बनिक यौगिकों का नामकरण
(i) एल्कीन - ऐल्कीनों को सामान्य नाम ऐल्किलीन होता है तथा द्विबन्ध की स्थिति के आधार पर इनमें \( \alpha \) (1), \( \beta \) (2) इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण:

(Et)
\( CH_3-CH_2-CH_3 \)प्रोपेन\( CH_3-\overset{\text{(i)}}{\text{CH}}_2CH_2- \) n-प्रोपिल (Pr)
(ii) \( CH_3-\overset{\text{I}}{CH}-CH_3 \) आइसोप्रोपिल प्रोपिल या द्वितीयक (Prl)

\( CH_3-C=CH_2 \) आइसोब्यूटिलीन
\( CH_3 \)
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH=CH_2 \alpha \)-पेन्टिलीन (\( \alpha \)-एमिलीन)
\( CH_3-CH_2-CH=CH-CH_3 \beta \)-पेन्टिलीन
(ii) एल्काइन - कुछ एल्काइनों के सामान्य नाम निम्नलिखित
\( CH \equiv CH \) एसिटिलीन
\( CH_3-C \equiv CH \) एलिलीन
\( CH_3-C \equiv C-CH_3 \) क्रोटोनिलीन
निम्नलिखित सजातीय श्रेणियों को सामान्य नाम ऐल्किल या अन्य मूलकों के नाम के आधार पर दिया जाता है।
(iii) R-X ऐल्किल हैलाइड
(iv) R-OH ऐल्किल ऐल्कोहॉल
(v) R-SH ऐल्किल थायोऐल्कोहॉल या ऐल्किल मरकैप्टन
(vi) R-C \( \equiv \) N ऐल्किल सायनाइड
(vii) R-N \( \equiv \) C ऐल्किल आइसोसायनाइड या ऐल्किल
उदाहरण

(iv) \( CH_3-CH_2-OH \)CH₃-CH-CH₃
एथिल ऐल्कोहॉल (ऐल्कोहॉल)OH
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल या घर्षण एल्कोहॉल (Rubbing Alcohol)
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2OH \)\( CH_3-CH-CH_2-CH_3 \)
n-ब्यूटिल ऐल्कोहॉलOH
द्वितीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल
(v) \( CH_3-SH \)\( CH_3-CH_2-CH_2SH \)
मेथिल थायोऐल्कोहॉलn-प्रोपिल थायोऐल्कोहॉल
(vi) \( CH_3-CH_2-CN \)\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_3 \)
एथिल सायनाइडCN
तृतीयक ब्यूटिल सायनाइड
(vii) \( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_2-NC \)\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_2-NC \)
मेथिल आइसोसायनाइडCH₃
नियोपेन्टिल आइसोसायनाइड

दो या दो से अधिक मूलकों युक्त यौगिकों के सामान्य नाम -
(viii) ईथर (R-O-R¹) जब R = R¹ डाइएल्किल ईथर (सरल ईथर) R \( \ne \) R¹ ऐल्किल ऐल्किल' ईथर (मिश्रित ईथर)
जब ऐल्किल समूह भिन्न - भिन्न होते हैं तो उन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है।
उदाहरण - अंग्रेजी वर्णमाला क्रम देखते समय Iso तथा Neo का पहला अक्षर देखा जाता है लेकिन n -, sec., tert. इत्यादि का नहीं।
\( CH_3-O-CH_3 \) डाइमेथिल ईथर
\( CH_3-O-CH_2-CH_3 \) एथिलमेथिल ईथर
\( C_2H_5-O-C_2H_5 \) डाइऐथिल ईथर (ईथर)
(x) ऐमीन (Amines):
ऐमीन तीन प्रकार के होते हैं-प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) ऐमीन जिनके क्रियात्मक समूह क्रमशः -
\( -NH_2 \) (ऐमीनो)
\( -NH- \) (इमीनो)
तथा
\( -N- \)
(नाइट्रिलो या तृतीयक नाइट्रोजन) हैं। ऐमीनों को सामान्य नाम निम्न प्रकार दिया जाता है -
प्राथमिक ऐमीन (R - \( NH_2 \)) - ऐल्किलऐमीन
उदाहरण -
\( -CH_3-NH_2 \) मेथिलऐमीन
\( CH_2=CH-CH_2-NH_2 \) ऐलिलऐमीन
\( CH_3-\overset{\text{I}}{CH}-CH_3 \) आइसोप्रोपिलऐमीन
\( NH_2 \)
द्वितीयक ऐमीन (R - NH - R¹)
जब R = R¹ डाइऐल्किलऐमीन
R \( \ne \) R' ऐल्किल ऐल्किल' ऐमीन (अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में)
उदाहरण -
\( CH_3-CH_2-NH-CH_2-CH_3 \) डाइएथिलऐमीन
\( CH_3-\overset{\text{I}}{NH}-CH< \) आइसोप्रोपिलमेथिलऐमीन
\( CH_3 \)
\( CH_3 \)
तृतीयक ऐमीन \( (R-\overset{\text{I}}{N}-R^{11}) \)
\( R¹ \)
जब R = R¹ = R¹¹ ट्राइऐल्किलऐमीन
N-मेथिलऐथेनैमीन
\( CH_3 \)
N-ऐथिलप्रोपेन-2-ऐमीन
(c) तृतीयक ऐमीन:
द्वितीयक ऐमीन के समान तृतीयक ऐमीन में भी अधिकतम कार्बन परमाणुओं की जनक श्रृंखला लेकर शेष दो मूलकों को N, N - प्रतिस्थापी माना जाता है।
\( CH_3-N-CH_3 \) डाइमेथिलमेथेनैमीन
\( CH_3 \)
\( CH_3-N-CH_2-CH_3 \) N-एथिल-N-मेथिलप्रोपेन - 1-ऐमीन
\( CH_2CH_3 \)
(xiv) ईथर:
ईथर में जनक श्रृंखला (अधिकतम कार्बन) का चयन करके शेष समूह के लिए पूर्वलग्न ऐल्कॉक्सी प्रयुक्त किया जाता है। इसमें कोई अनुलग्न नहीं होता है।
\( CH_3-O-CH_3 \) मेथॉक्सीमेथेन
\( CH_3-CH_2-O-CH_3 \) एथॉक्सीमेथेन
\( CH_3-O-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_3 \) 2-मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
इस उदाहरण में मेथॉक्सी तथा मेथिल की स्थिति समान है लेकिन इन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा गया है।
\( CH_3-\overset{\text{I}}{CH}-CH_2-\overset{\text{I}}{CH}-CH_2-CH_3 \) 3-मेथॉक्सी-5-मेथिलहेक्सेन
\( CH_3 \)
\( OCH_3 \)
इस उदाहरण में अंकन करते समय मेथिल की तुलना में मेथॉक्सी को महत्व दिया गया है।
(xv) ऐल्किल हैलाइड:
(xvi) नाइट्रो ऐल्केन:
\( CH_3-CH_2-NO_2 \) नाइट्रोएथेन
\( CH_3-CH_2-\overset{\text{I}}{CH}-CH_3 \) 1-नाइट्रोब्यूटेन
\( NO_2 \)
\( CH_3-CH_2-\overset{\text{I}}{CH}-CH_2-CH_3 \) 3-नाइट्रोपेन्टेन
\( NO_2 \)
VI. बहुक्रियात्मक समूह (एक से अधिक भिन्न - भिन्न क्रियात्मक समूह) युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण -
किसी यौगिक में उपस्थित सभी क्रियात्मक समूहों में से जो समूह, वरीयता क्रम में पहले आता है उसे मुख्य क्रियात्मक समूह तथा अन्य क्रियात्मक समूहों को प्रतिस्थापी माना जाता है। अतः किसी बहुक्रियात्मक समूह युक्त यौगिक में मुख्य क्रियात्मक समूह ज्ञात करने के बाद इस यौगिक को भी एक क्रियात्मक समूह युक्त यौगिक के समान मानकर ही नाम दिया जाता है।
क्रियात्मक समूहों की प्राथमिकता का घटता क्रम निम्न प्रकार होता है -
\( -COOH, -SO_3H, -COOR, -COX, -CONH_2, -CN, -NC, -CHO, >C=O, -OH, -NH_2, -OR, >C=C<, -C \equiv C- \)
बहुक्रियात्मक समूहयुक्त यौगिक के नामकरण के लिए निम्नलिखित नियम प्रयुक्त होते हैं -
(1) सर्वप्रथम उस सर्वाधिक लम्बी कार्बन श्रृंखला (जनक श्रृंखला) का चयन करते हैं जिसमें मुख्य क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है। अन्य क्रियात्मक समूह (प्रतिस्थापी) भी जनक श्रृंखला से जुड़े होने चाहिए।
(2) जब - CN, - COX, - \( CONH_2 \) तथा - COOR समूह प्रमुख क्रियात्मक समूह के रूप में नहीं होते हैं तो इनके कार्बन को जनक श्रृंखला में नहीं लिया जाता है।
(3) जनक श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है जिस सिरे से मुख्य क्रियात्मक समूह को न्यूनतम अंक मिलता है।
(4) यौगिक का नाम लिखते समय मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न तथा अन्य क्रियात्मक समूहों (प्रतिस्थापी के रूप में) एवं ऐल्किल समूहों को पूर्वलग्न के रूप में अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है एवं अंकन करते समय भी इनका अंग्रेजी वर्णमाला क्रम ही देखा जाता है।
(5) यदि यौगिक में द्विबन्ध (C=C) अथवा त्रिबन्ध (C \( \equiv \) C) भी उपस्थित है तो इसका नाम मुख्य क्रियात्मक समूह के नाम से पहले तथा कार्बन श्रृंखला के नाम के पश्चात् लिखते हैं। द्विबन्ध अथवा त्रिबन्ध की स्थिति भी इसके नाम के साथ दर्शायी जाती है।
(6) जब ऐल्डिहाइड समूह (- CHO) प्रतिस्थापी के रूप में होता है तथा इस समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में लिया गया है तो इसके लिए पूर्वलग्न ऑक्सो प्रयुक्त किया जाता है अन्यथा फार्मिल का प्रयोग किया जाएगा।
उदाहरण -
\( CHO \)
4-फॉर्मिल -3-मेथिलहेक्स-2-ईन-1-ओइक अम्ल
उदाहरण -
(i) में - CHO समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में लिया गया है। अतः पूर्वलग्न 'ऑक्सो' का प्रयोग किया गया है जबकि उदाहरण
(ii) में - CHO समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में नहीं है, अतः पूर्वलग्न 'फार्मिल' प्रयुक्त किया गया है।
(iii) \( CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-CH_3 \) 7-हाइड्रॉक्सी हेप्टेन-2-ओन
\( OH \)
(iv) \( Br-CH_2-CH=CH_2 \) 3-ब्रोमोप्रोप-1-ईन
(v) \( CH_3-CH_2-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CHO \) 3-हाइड्रॉक्सीपेन्टेनैल
(vi) \( CH_3-CH_2-O-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2 \) 1-एथॉक्सीप्रोपेन-2-ऑल
(vii) \( CH_3-\overset{\text{Br}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-\overset{\text{CHO}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CN \) 5-ब्रोमो 2-फार्मिलहेक्सेननाइट्राइल
(viii) \( CH_3-CH_2-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-\overset{\text{SO₃H}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH \) 2-ऑक्सो पेन्टेन-3-सल्फोनिक अम्ल
(ix) \( \overset{\text{NH₂}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-\overset{\text{CN}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-OC_2H_5 \) एथिल-2-ऐमीनो-4-सायनोब्यूटेनॉएट
(x) \( HO-\overset{\text{CHO}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{NH₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}-COOH \) 2-ऐमीनो-3-फार्मिल ब्यूटेन-1, 4-डाइऑइकअम्ल
(i) 5 - ऐमीनो - 3 - मेथिल - 4- ऑक्सो हेक्स - 2 - ईन - 1 - ऐल -
श्रृंखला के नाम 'हेक्स' के अनुसार छ: कार्बन की श्रृंखला बनाते हैं तथा इसका किसी एक सिरे से (माना दायीं ओर से) क्रमांकन करते हैं। अब C5 पर ऐमीनो समूह \( (-NH_2) \), C3 पर मेथिल समूह तथा C2 - C3 के मध्य द्विबन्ध लगाते हैं। C4 को कीटोनिक समूह \( (-CO-) \) में तथा प्रथम कार्बन (C1) को एल्डिहाइड समूह (- CHO) में परिवर्तित कर देते हैं, क्योंकि इन दोनों समूहों के कार्बन परमाणु जनक श्रृंखला में गिने जा चुके हैं।
\( \overset{\text{5}}{C}-\overset{\text{4}}{C}(=O)-\overset{\text{3}}{C}(CH_3)=\overset{\text{2}}{C}-\overset{\text{1}}{C}H=O \)
\( NH_2 \)
अब कार्बन परमाणुओं की संयोजकता को पूर्ण करने के लिए आवश्यक हाइड्रोजन परमाणु लगा देते हैं, जिससे निम्नलिखित संरचना प्राप्त होती है -
\( \overset{\text{5}}{H_2N}-\overset{\text{4}}{CH}-\overset{\text{3}}{C}(CH_3)=\overset{\text{2}}{C}H-\overset{\text{1}}{C}H=O \)
(ii) 4-ऐमीनो -2-क्लोरो -2,3-डाइमेथिलपेन्टेनोइकअम्ल
\( H_3C-\overset{\text{Cl}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{NH₂}}{\overset{\text{I}}{C}}H-COOH \)
VIII. यौगिक के गलत नाम से सही नाम लिखना: किसीयौगिक के गलत नाम को सही करने के लिए निम्न विधि प्रयुक्त की जाती है। सर्वप्रथम गलत नाम से उपर्युक्त विधि के अनुसार यौगिक की संरचना लिख लेते हैं।
उदाहरण – 4 – ऐमीनो – 3 – हाइड्रॉक्सी – ब्यूट - 2 - ईन
यौगिक के नाम के अनुसार सर्वप्रथम चार कार्बन की एक श्रृंखला बनाकर उसका एक सिरे से क्रमांकन कर लेते हैं। अब कार्बन 2 तथा 3 के मध्य एक द्विबन्ध लगाते हैं। कार्बन 3 पर एक – OH समूह तथा कार्बन 4 पर एक – \( NH_2 \) समूह लगाते हैं। अब प्रत्येक कार्बन की संयोजकता हाइड्रोजन परमाणुओं की आवश्यक संख्या से पूर्ण करते हैं तो निम्नलिखित संरचना प्राप्त होती है -
\( H_2N-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{I}}{CH}=CH_2 \)
इसका सही नाम लिखने के लिए IUPAC नियम के अनुसार जनक श्रृंखला का अंकन करके मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न प्रयुक्त करने पर निम्नलिखित नाम प्राप्त होगा -
1 - ऐमीनोब्यूट - 2 - ईन - 2 - ऑल
(i) बेन्जीन व्युत्पन्नों की नाम पद्धति:
(2) द्विप्रतिस्थापी बेन्जीन व्युत्पन्नों का नाम देते समय प्रतिस्थापी समूहों की स्थितियाँ संख्याओं द्वारा दर्शायी जाती हैं तथा वलय का अंकन इस प्रकार किया जाता है कि प्रतिस्थापियों को न्यूनतम अंक मिलें। जैसे यौगिक (b) का नाम 1,3 – डाइक्लोरो बेन्जीन होगा न कि 1, 5 डाइक्लोरोबेन्जीन।
उदाहरण -

(a) Cl Cl (b) Cl Cl (c) Cl Cl

1, 2-डाइक्लोरोबेन्जीन 1, 3-डाइक्लोरोबेन्जीन 1, 4-डाइक्लोरोबेन्जीन
(3) एरोमेटिक यौगिकों के नामांकरण की रूढ़ पद्धति में 1, 2 -; 1, 3 - तथा 1, 4 - स्थितियों को क्रमशः ऑर्थो (o), मेटा (m) तथा पैरा (p) पूर्वलग्नों द्वारा दर्शाया जाता है। अतः 1, 3 - डाइक्लोरोबेन्जीन का रूढ़ नाम मेटा डाइक्लोरोबेन्जीन है तथा 1, 2 - तथा 1, 4 - डाइक्लोरोबेन्जीन को क्रमशः ऑर्थो (o) तथा पैरा (p) डाइक्लोरोबेन्जीन कहते हैं।
(4) त्रि तथा बहुप्रतिस्थापी बेन्जीन के IUPAC नामकरण में प्रतिस्थापियों की स्थितियाँ, न्यूनतम संख्या के नियम का पालन करते हुए दी जाती हैं।
(5) कभी - कभी बेन्जीन व्युत्पन्न के रूढ़ नाम को मूल यौगिक के रूप में (जनक) लिया जाता है तथा मूल यौगिक के प्रतिस्थापी की स्थिति को संख्या 1 देकर इस प्रकार अंकन किया जाता है कि शेष प्रतिस्थापियों को न्यूनतम अंक मिलें तथा प्रतिस्थापियों के नाम अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखे जाते हैं।
उदाहरण -

NO₂ Cl CH₃ 2-क्लोरो-1-मेथिल-4-नाइट्रोबेन्जीन (न कि-4-मेथिल-5-क्लोरोनाइट्रोबेन्जीन) Cl NO₂ NO₂ 1-क्लोरो-2, 4-डाइनाइट्रोबेन्जीन (न कि 4-क्लोरो-1, 3-डाइनाइट्रोबेन्जीन) OH CH₃ CH₃ 3, 4-डाइमेथिलफीनॉल OMe Cl CH₃ 2-क्लोरो-4-मेथिल ऐनिसोल (Me = मेथिल) NH₂ CH₃ C₂H₅ 4-एथिल-2-मेथिल ऐनिलीन

(6) जब बेन्जीन वलय तथा क्रियात्मक समूह संतृप्त हाइड्रोकार्बन श्रृंखला से जुड़े होते हैं तब बेन्जीन वलय को जनक न मानकर इसे प्रतिस्थापी माना जाता है तथा इसका नाम फेनिल दिया जाता है एवं इसे \( C_6H_5 - \) या संक्षेप में Ph लिखते हैं।
VII. IUPAC नामकरण के नियम एवं उदाहरण:
ऐल्केनों का IUPAC नामकरण:
I. सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केन:
कार्बन - कार्बन एकल बन्ध युक्त हाइड्रोकार्बनों (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) को ऐल्केन कहते हैं। पहले इन्हें पैराफिन (Paraffins) भी कहा जाता था क्योंकि ये बहुत कम क्रियाशील होते हैं तथा लैटिन भाषा में Para का अर्थ है कम तथा affins का अर्थ है क्रियाशीलता। ऐल्केनों में मेथेन \( (CH_4) \), एथेन \( (C_2H_6) \), प्रोपेन \( (C_3H_8) \) तथा ब्यूटेन \( (C_4H_{10}) \) सामान्य नाम है लेकिन IUPAC पद्धति में इन्हीं नामों को मान लिया गया है। ब्यूटेन के पश्चात् शेष एल्केनों के नाम उनकी सीधी श्रृंखला की संरचना पर आधारित होते हैं तथा उनका नाम देते समय कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर पूर्वलग्न एवं इसके पश्चात् अनुलग्न ऐन (ane) का प्रयोग किया जाता है।
कुछ सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के पूर्व लग्न, नाम तथा उदाहरण निम्नलिखित हैं -
सारणी - सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के नाम

कार्बन परमाणुओं की संख्यापूर्वलग्न (Prefix)सूत्रउदाहरण (Examples) नाम
\( C_1 \)मेथ (Meth)\( CH_4 \)मेथेन (Methane)
\( C_2 \)एथ (Eth)\( C_2H_6 \)ऐथेन (Ethane)
\( C_3 \)प्रोप (Prop)\( C_3H_8 \)प्रोपेन (Propane)
\( C_4 \)ब्यूट (But)\( C_4H_{10} \)ब्यूटेन (Butane)
\( C_5 \)पेन्ट (Pent)\( C_5H_{12} \)पेन्टेन (Pentane)
\( C_6 \)हेक्स (Hex)\( C_6H_{14} \)हैक्सेन (Hexane)
\( C_7 \)हेप्ट (Hept)\( C_7H_{16} \)हेप्टेन (Heptane)
\( C_8 \)ऑक्ट (Oct)\( C_8H_{18} \)ऑक्टेन (Octane)
\( C_9 \)नोन (Non)\( C_9H_{20} \)नोनेन (Nonane)
\( C_{10} \)डेक (Dec)\( C_{10}H_{22} \)डेकेन (Decane)
\( C_{11} \)अन्डेक (Undec)\( C_{11}H_{24} \)अन्डेकेन (Undecane)
\( C_{12} \)डोडेक (Dodec)\( C_{12}H_{26} \)डोडेकेन (Dodecane)
\( C_{13} \)ट्राइडेक (Tridec)\( C_{13}H_{28} \)ट्राइडेकेन (Tridecane)
\( C_{20} \)आइकोस (Eicos)\( C_{20}H_{42} \)आइकोसेन (Eicosane)
\( C_{30} \)ट्राइकोन्ट (Triacont)\( C_{30}H_{62} \)ट्राइकोन्टेन (Triacontane)

II. शाखित श्रृंखलायुक्त एल्केन:
शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों में कार्बन परमाणुओं की एक या एक से अधिक छोटी श्रृंखलाएँ जनक श्रृंखला के कई कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़ी होती हैं। इन शाखाओं को ऐल्किन मूलक या ऐल्किल समूह कहा जाता है जो कि शाखित तथा अशाखित दोनों प्रकार की होती हैं। ऐल्किल मूलकों के नामों का अध्ययन इसी अध्याय में पूर्व में किया जा चुका है।
शाखित श्रृंखला युक्त ऐल्केनों का नाम देने के लिए ऐल्किल समूह का नाम पूर्वलग्न के रूप में तथा जनक श्रृंखला ऐल्केन का नाम अनुलग्न के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के IUPAC नामकरण में प्रयुक्त नियम निम्न प्रकार हैं -
(1) दीर्घतम कार्बन श्रृंखला का चयन:
सर्वप्रथम यौगिक में दीर्घतम कार्बन श्रृंखला का चयन किया जाता है, जिसे जनक श्रृंखला या मूल श्रृंखला (Root Chain) या मुख्य श्रृंखला (Main Chain) कहते हैं। संरचना (1) में जनक श्रृंखला में नौ कार्बन हैं। इसी यौगिक की संरचना II में प्रदर्शित जनक श्रृंखला का चयन सही नहीं है, क्योंकि इसमें आठ कार्बन हैं।
I \( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_3 \)
II \( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2 \)
(2) वरीय कार्बन श्रृंखला का चयन (अधिकतम प्रतिस्थापी चयन नियम):
किसी ऐल्केन में यदि सबसे लम्बी श्रृंखला (समान कार्बन युक्त) की दो या दो से अधिक सम्भावनाएँ हैं तो उस कार्बन श्रृंखला का मुख्य श्रृंखला के रूप में चयन किया जाता है, जिसमें प्रतिस्थापियों या पाश्र्व श्रृंखला की संख्या अधिकतम हो।
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2 \)
इस यौगिक में सीधी श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं की संख्या 5 है। परन्तु इसमें केवल एक ही प्रतिस्थापी (आइसो प्रोपिल) जुड़ा है जबकि अंकित मुख्य श्रृंखला में 5 कार्बन परमाणुओं के साथ दो प्रतिस्थापी (एथिल तथा मेथिल) जुड़े हैं।
(3) कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला का क्रमांकन (लघुसंख्यक नियम):
जनक ऐल्केन को ज्ञात करने के लिए चयनित मुख्य श्रृंखला के कार्बन परमाणुओं का अंकन किया जाता है। यह क्रमांकन यौगिक के उस सिरे से प्रारम्भ करते हैं, जिधर से शाखा के रूप में उपस्थित ऐल्किल समूहों को न्यूनतम अंक मिले।
\( H_3C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_3 \)
उपर्युक्त उदाहरण में क्रमांकन बाईं ओर से होना चाहिए (कार्बन संख्या 2 तथा 6 पर शाखा), न कि दाईं ओर से (कार्बन संख्या 4 तथा 8 पर शाखा)।
(4) न्यूनतम प्रतिस्थापी योग नियम:
यदि किसी यौगिक में समान प्रतिस्थापी दोनों सिरों से समान अंक पर स्थित हैं तथा इनके अतिरिक्त कोई अन्य प्रतिस्थापी भी उपस्थित है तो कार्बन श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है जिधर से प्रतिस्थापियों की स्थिति के अंकों का योग न्यूनतम हो।
उदाहरणार्थ:
गलत
\( H_3C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}} \)
2 + 4 + 5 = 11 गलत
सही
\( H_3C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH \)
2 + 3 + 5 = 10 सही
(5) प्रतिस्थापियों का नामोल्लेख करने के नियम:
शाखा के रूप में स्थित ऐल्किल समूहों के नाम एल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न के रूप में लिखे जाते हैं तथा इन ऐल्किल समूहों (प्रतिस्थापियों) की स्थिति को संख्या द्वारा दर्शाया जाता है। भिन्न - भिन्न प्रकार के ऐल्किल - समूहों के नामों को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है चाहे श्रृंखला में उनकी स्थिति कुछ भी हो। ऐल्किल समूह तथा संख्या के मध्य संयोजक - रेखा एवं ऐल्किल समूह तथा जनक श्रृंखला ऐल्केन को मिलाकर लिखा जाता है।
उदाहरण:
\( H_3C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_3 \)
6-एथिल-2-मेथिलनोनेन
(6) जब यौगिक में दो या दो से अधिक समान प्रतिस्थापी उपस्थित होते हैं तो उनकी संख्याओं के मध्य अल्पविराम (कोमा) लगाते हैं तथा इन प्रतिस्थापी समूहों के नाम को दुबारा न लिखकर इन्हें उचित पूर्वलग्न, जैसे - डाई, ट्राई, टेट्रा इत्यादि द्वारा दर्शाया जाता है। लेकिन इन्हें (डाई, ट्राई) अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नहीं लिया जाता है। तथा यौगिक का नाम लिखते समय प्रतिस्थापी समूहों के नामों को ही अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में लिया जाता है।
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \)
2, 4-डाइमेथिलपेन्टेन
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \)
2, 2, 4-ट्राइमेथिलपेन्टेन
(7) अंग्रेजी वर्णमाला क्रम नियम:
जब किसी यौगिक में दो असमान प्रतिस्थापियों की स्थिति समान होती है तो अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में पहले आने वाले प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है। अतः निम्नलिखित यौगिक का सही नाम 3 - एथिल - 6 - मेथिलऑक्टेन है, न कि 6 - एथिल - 3 - मेथिल ऑक्टेन।
\( CH_3-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3 \)
3-एथिल-6-मेथिलऑक्टेन
(8) जब प्रतिस्थापी (ऐल्किल समूह) बड़ा एवं जटिल होता है। तथा जिसका कोई सामान्य नाम नहीं होता तो उसका भी IUPAC नाम दिया जाता है जिसमें शाखित श्रृंखला के उस कार्बन को प्रथम अंक दिया जाता है जो जनक श्रृंखला से जुड़ा होता है एवं ऐसे जटिल प्रतिस्थापी का नाम कोष्ठक में लिखा जाता है। जैसे -
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}- \)
1, 3-डाइमेथिलब्यूटिल
जब प्रतिस्थापियों का सामान्य नाम लिखा जाता है तो उनका अंग्रेजी वर्णमाला क्रम देखते समय आइसो (iso) तथा नियो (neo) पूर्वलग्नों को मूल ऐल्किल समूह के नाम का भाग माना जाता है। अतः इनका प्रथम अक्षर अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में देखा जाता है। परन्तु पूर्वलग्न द्वितीयक (sec -) तथा तृतीयक (tert -) को मूल ऐल्किल समूह के नाम का भाग नहीं माना जाता अतः इनका प्रथम अक्षर अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नहीं देखा जाता है। आइसो तथा अन्य पूर्वलग्नों का प्रयोग आई.यू.पी.ए.सी. पद्धति में भी किया जाता है।
उदाहरण -
\( \overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2 \)
5-(2, 2-डाइमेथिलप्रोपिल)-नोनेन
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2 \)
5-द्वितीयक-ब्यूटिल-4-आइसोप्रोपिलडेकेन
III. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का नामकरण:
वे हाइड्रोकार्बन जिनमें कम से कम एक द्विबन्ध \( (>C=C<) \) या एक त्रिआबन्ध \( (-C \equiv C-) \) उपस्थित होता है उन्हें असंतृप्त हाइड्रोकार्बन कहते हैं। \( >C=C< \) युक्त यौगिकों को ऐल्कीन तथा \( -C \equiv C- \) युक्त यौगिकों को एल्काइन कहा जाता है।
(1) एल्कीनों का नामकरण: एल्कीनों का I.U.PA.C. नामकरण निम्नलिखित नियमों के अनुसार दिया जाता है।
नियम 1.
मुख्य श्रृंखला में द्विआबन्ध को लेकर इसको न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा इसके लिए अनुलग्न-इन प्रयुक्त होता है एवं अनुलग्न से पहले द्विबन्ध की स्थिति बतायी जाती है।
उदाहरण - \( CH_2=CH-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) ब्यूट-1-ईन
\( H_2C=\overset{\text{CH₂CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_2-CH_3 \) 2-एथिल-पेन्ट-1-ईन
यद्यपि इसमें सीधी श्रृंखला सबसे लम्बी है परन्तु इसमें \( C=C \) नहीं है।
नियम 2.
मुख्य श्रृंखला का अंकन करते समय द्वि-आबन्ध को पाश्र्व श्रृंखला \( (CH_3 - \) अथवा \( C_2H_5 - \) समूह) की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन द्विबन्ध दोनों सिरों से समान स्थिति पर आता है तो प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है।
\( CH_2=CH-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 3-मेथिल ब्यूट-1-इन
नियम 3.
जब किसी यौगिक में द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की स्थिति समान होती है तो द्वि - आबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है, अन्यथा द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध में से जो भी पहले आता है उसी सिरे से अंकन कर दिया जाता है लेकिन नाम लिखते समय पहले ईन तथा हेप्ट-4-ईन-2-आइन।
नियम 4. जब यौगिक में दो द्वि - आबन्ध होते हैं तो इन्हें एल्कोडाइईन कहा जाता है।
\( CH_2=CH-CH=CH_2 \) ब्यूटा-1, 3-डाइईन
\( CH_2=\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH=CH_2 \) 2-मेथिलब्यूटा-1, 3-डाइईन
एल्काइनों का नामकरण:
नियम 1. त्रि - आबन्ध को जनक श्रृंखला में लेकर उसे न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा शेष नियम एल्कीनों के समान ही होते हैं।
\( CH \equiv C-CH_2-CH_2-CH_3 \) पेन्ट-1-आइन
नियम 2. पाश्र्व श्रृंखला की तुलना में त्रिआबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है।
\( CH_3-C \equiv C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_3 \) ब्यूट-2-आइन
\( CH \equiv C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2 \) 3,3-डाइमेथिलपेन्ट-1-आइन
नियम 3. यौगिक में दो या अधिक त्रिआबन्ध उपस्थित होने पर डाइआइन, ट्राइआइन इत्यादि अनुलग्न प्रयुक्त किए जाते हैं।
\( H-C \equiv C-C \equiv C-C \equiv C-H \) हेक्सा-1, 3, 5-ट्राइआइन
\( H_2C=CH-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH=CH-C \equiv CH \) 5-मेथिल-3, 6-हेप्टा डाइईन-1-आइन
(इस यौगिक में दायीं ओर से अंकन किया गया है क्योंकि इससे द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध दोनों को न्यूनतम अंक मिले हैं।) असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के अन्य उदाहरण -
\( H_2C=C(CH_3)-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}H_2-CH_3 \) 4-एथिल-5-मेथिल-हेक्स-2-ईन
\( H_2C=\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}H_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CH_2 \)
2, 5-डाईमेथिलहेक्स-1-ईन-3-आइन
IV. चक्रीय संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नामकरण:
एकल चक्रीय ऐलिसाइक्लिक संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नाम संबंधित खुली श्रृंखला ऐल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न 'साइक्लो' लगाकर दिया जाता है। पार्श्व श्रृंखलाओं के नामकरण में खुली (विवृत) श्रृंखला यौगिकों के नियम ही प्रयुक्त होते हैं।

साइक्लोब्यूटेन


3-एथिल-1, 1-डाइमेथिसाइक्लोहेक्सेन (अधिक प्रतिस्थापीयुक्त कार्बन को न्यूनतम अंक दिया गया है।)


1-मेथिल-3-प्रोपिल साइक्लोहेक्सेन (अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में अंकन किया गया है।)

क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण (IUPAC Nomenclature of Compounds having Functional Group)
V. एक क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का नामकरण:
(i) सर्वप्रथम यौगिक में उपस्थित क्रियात्मक समूह की पहचान की जाती है, ताकि उपयुक्त अनुलग्न का चयन किया जा सके। अनुलग्न भी दो प्रकार के होते हैं - प्राथमिक तथा द्वितीयक। प्राथमिक अनुलग्न कार्बन परमाणुओं के मध्य बन्ध के प्रकार को दर्शाता है जैसे ऐन, पूर्वलग्न के रूप में अंग्रेजी वर्णक्रम में लिखा जाता है।
विभिन्न क्रियात्मक समूहों को वरीयता क्रम, उनके अनुलग्न तथा पूर्वलग्न नीचे दी गयी सारणी में दिए गए हैं।
सारणी - विभिन्न क्रियात्मक समूहों को वरीयता क्रम, अनुलग्न तथा पूर्वलग्न

वरीयता क्रमसजातीय श्रेणीक्रियात्मक समूहअनुलग्न (Suffix)पूर्वलग्न (Prefix)
1कार्बोक्सिलिक अम्ल-COOHओइक अम्लकार्बोक्सी
2सल्फोनिक अम्ल-SO₃Hसल्फोनिक अम्लसल्फो
3ऐसिड ऐन्हाइड्राइड-CO-O-CO-ओइक ऐन्हाइड्राइड-
4एस्टर-COORएल्किल, ओएटएल्कॉक्सी कार्बोनिल
5ऐसिड हैलाइड-COXऑयल हैलाइडहैलोकार्बोनिल या हैलोफार्मिल
6ऐसिड ऐमाइड-CO-NH₂ऐमाइडकार्बेमॉयल या ऐमीडो
7सायनाइड-CNनाइट्राइलसायनो
8आइसोसायनाइड-NCआइसोसायनाइड या आइसोनाइट्राइलआइसोसायनो
9ऐल्डिहाइड-CHOऐलफार्मिल या आक्सो
10कीटोन\( >C=O \)ऑनऑक्सो
11ऐल्कोहॉल-OHऑलहाइड्रॉक्सी
12थायो ऐल्कोहॉल-SHथायोलमर्केप्टो
13ऐमीन-NH₂एमीनएमीनो
14ईथर-OR-एल्कॉक्सी
15ऐल्कीन\( >C=C< \)ईन-
16ऐल्काइन\( -C \equiv C- \)आइन-

निम्नलिखित समूह हमेशा प्रतिस्थापी (पूर्वलग्न) के रूप में ही प्रयुक्त होते हैं तथा इनका कोई अनुलग्न नहीं होता है।

3. -Arएरिल (Aryl)
4. -Fफ्लुओरो (Fluoro)
5. -Clक्लोरो (Chloro)
6. -Brब्रोमो (Bromo)
7. -Iआयोडो (Iodo)
8. -NO₂नाइट्रो (Nitro)

कुछ क्रियात्मक समूहों के अतिरिक्त अनुलग्न भी दिए गए हैं।

क्रियात्मक समूहअतिरिक्त अनुलग्न (Additional Suffix)
-COOHकार्बोक्सिलिक अम्ल (Carboxylic Acid)
-COOR(ऐल्किल) कार्बोक्सिलेट (Alkyl) Carboxylate
-COXकार्बोनिल हैलाइड (Carbonyl halide)
-CONH₂कार्बोक्सेमाइड (Carboxamide)
-CNकार्बोनाइट्राइल (Carbonitrile)
-CHOकार्बऐल्डिहाइड (Carbaldehyde)

उदाहरण
(i) \( H_3C-\overset{\text{CH₂-OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}H_2-\overset{\text{CH₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}H_2-CH_3 \) 2-ऐथिलपेन्टेन-1-ऑल
नोट -
(i) यदि क्रियात्मक समूह जनक श्रृंखला के दोनों सिरों से समान स्थिति है तो श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है। जिधर से प्रतिस्थापी निकट होता है। जैसे -
\( CH_3-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 2-मेथिलपेन्टेन-3-ऑन
\( CH_3-\overset{\text{Cl}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन
(प्रतिस्थापी क्लोरो को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में निम्नतम स्थिति दी गई है)
(ii) यदि किसी यौगिक में एक ही प्रकार के क्रियात्मक समूहों की संख्या एक से अधिक है तो उनके अनुलग्न से पहले डाइ, ट्राई, टेट्रा इत्यादि लिखा जाता है।
\( HOOC-CH_2-COOH \) एथेनडाइओइक अम्ल एथेन-1, 2-डाइऑल
\( CH_2(OH)-CH(OH)-CH_2(OH) \) प्रोपेन 1, 2, 3-ट्राइऑल
\( CH_3-CH_2-CH(CN)-CH_2-CN \) 3-मेथिल हैक्सेन-1, 6-डाइनाइट्राइल
\( CH_3-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-CH_3 \) ब्यूटेन-2, 3-डाइओन
एक क्रियात्मक समूह युक्त विभिन्न सजातीय श्रेणियों के यौगिकों के IUPAC नाम - जब किसी यौगिक में निम्नलिखित क्रियात्मक समूह उपस्थित है या ये प्राथमिक क्रियात्मक समूह के रूप में उपस्थित हैं तो इनके कार्बन को जनक श्रृंखला में लिया जाता है तथा श्रृंखला का अंकन भी इसी कार्बन से प्रारम्भ किया जाता है -
- COOH, - COCl, - \( CONH_2 \), COOR, - CHO, - CN
(i) कार्बोक्जिलिक एसिड:
\( CH_3-(CH_2)_2COOH \) ब्यूटेनोइक अम्ल
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-COOH \) आइसो ब्यूटाइरिक अम्ल (Iso Butyric Acid)
(ii) सल्फोनिक अम्ल:
\( CH_3-CH_2-CH_2-SO_3H \) प्रोपेन-1-सल्फोनिक अम्ल
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2-SO_3H \) एथेन सल्फोनिक अम्ल
\( CH_3-CH_2-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-SO_3H \) पेन्टेन-2-सल्फोनिक अम्ल
(iii) एसिड ऐन्हाइड्राइड:
\( CH_3-CO-O-CO-CH_3 \) एथेनाइक ऐन्हाइड्राइड
\( CH_3-CH_2-CO-O-CO-CH_2-CH_3 \) प्रोपेनॉइक ऐन्हाइड्राइड
(iv) एस्टर (Ester): एस्टर के नाम में सर्वप्रथम ऑक्सीजन से जुडे एल्किल समूह को लिखा जाता है।
\( CH_3-CO-O-CH_3 \) मेथिल एथेनॉएट
\( CH_3-CH_2-CO-O-CH_3 \) मेथिल प्रोपेनोएट
\( CH_3-CO-O-CH_2-CH_3 \) एथिल एथेनॉएट
\( H_3C-\overset{\text{CH₂O}}{\overset{\text{I}}{HC}}=\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-O-CH_3 \) मेथिल-2-एथिलब्यूट-2-ईन-1-ऑएट
(v) ऐसिड हैलाइड:
(vi) ऐसिड एमाइड:
\( H-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-NH_2 \) मेथेनैमाइड
\( CH_3-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-NH_2 \) एथेनैमाइड
\( H_3C-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}H_2-\overset{\text{CH₂}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-NH_2 \) 2,3-डाइमेथिलपेन्टैनामाइड
\( CH_3-(CH_2)_2CONH_2 \) ब्यूटेनेमाइड
(vii) सायनाइड:
\( CH_3-C \equiv N \) एथेननाइट्राइल
\( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-C \equiv N \) पेन्टेननाइट्राइल
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}=C-\overset{\text{I}}{C}=N \) 2-मेथिलब्यूट-2-ईन-1-नाइट्राइल
(viii) आइसोसायनाइड:
\( CH_3-CH_2-NC \) एथेनआइसोनाइट्राइल
\( CH_3-NC \) मेथेनआइसोनाइट्राइल
(ix) ऐल्डिहाइड:
\( HCHO \) मेथेनैल
\( CH_3-CHO \) एथेनैल
\( CH_3-(CH_2)_2CHO \) ब्यूटेनैल
\( CH_3-CH_2-CH=CH-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CHO \) 2-मेथिलहेक्स-3-ईन-1-ऐल
\( CH_3-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{C}}-CHO \) 2,2-डाइमेथिलप्रोपेनैल
(x) कीटोन:
\( CH_3-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-CH_3 \) डाइमेथिलकीटोन (ऐसीटोन)
\( CH_3-\overset{\text{O}}{\overset{\text{II}}{C}}-CH_2-CH_2-CH_3 \) मेथिल-n-प्रोपिलकीटोन
(xi) ऐल्कोहॉल:
\( CH_3-OH \) मेथेनॉल
\( CH_3-CH_2-OH \) एथेनॉल
\( CH_3-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-CH_3 \) ब्यूटेन-2-ऑल
\( CH_3-\overset{\text{OH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_2-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}} \) 2-मेथिलप्रोपेन-1-ऑल
(xii) थायो ऐल्कोहॉल:
\( CH_3-CH_2-SH \) एथेनथॉयोल
\( CH_3-\overset{\text{SH}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}_2 \) 2-मेथिलब्यूटेन-2-थॉयोल
(xiii) ऐमीन:
ऐमीन तीन प्रकार के होते है:
(a) प्राथमिक (1°)
(b) द्वितीयक (2°)
(c) तृतीयक (3°)
(a) प्राथमिक ऐमीन:
\( CH_3-NH_2 \) मेथेनऐमीन या मेथेनैमीन
\( CH_3-CH_2-CH_2-NH_2 \) प्रोपेन-1-ऐमीन
\( CH_3-\overset{\text{NH₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}-\overset{\text{CH₃}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 3-मेथिलब्यूटेन-2-ऐमीन
(xiv) ईथर:
\( CH_3-O-CH_3 \) मेथॉक्सीमेथेन
\( CH_3-O-CH_2-CH_3 \) एथॉक्सीमेथेन
(xv) ऐल्किल हैलाइड:
(xvi) नाइट्रो ऐल्केन:
\( CH_3-CH_2-NO_2 \) नाइट्रोएथेन
\( CH_3-CH_2-\overset{\text{NO₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 1-नाइट्रोब्यूटेन
\( CH_3-CH_2-CH_2-\overset{\text{NO₂}}{\overset{\text{I}}{CH}}-CH_3 \) 3-नाइट्रोपेन्टेन
In simple words: रूढ़ प्रणाली में यौगिकों के नाम उनके स्रोत या खास गुणों पर आधारित होते हैं, जो याद रखने में आसान होते हैं लेकिन संरचना से सीधे जुड़े नहीं होते। IUPAC प्रणाली एक व्यवस्थित तरीका है जो नियमों का पालन करता है, जिससे यौगिकों के नाम उनकी संरचना से मेल खाते हैं, चाहे वे कितने भी जटिल क्यों न हों।

🎯 Exam Tip: कार्बनिक यौगिकों के नामकरण में IUPAC प्रणाली को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि यह स्पष्ट और सार्वभौमिक है, जबकि रूढ़ नाम ऐतिहासिक महत्व रखते हैं लेकिन सीमित उपयोग के होते हैं। दोनों प्रणालियों के उदाहरणों का अभ्यास करें।

 

Question 55. IUPAC नामकरण के नियमों की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए।
Answer:

IUPAC नामकरण प्रणाली:
आई.यू.सी. (IUC) / आई.यू.पी.ए.सी. (IUPAC) को सुव्यवस्थित (Systematic) या जेनेवा प्रणाली भी कहते हैं। सामान्य या रूढ़ नामों में कुछ कमियाँ थीं:

  • किसी एक यौगिक के एक से अधिक नाम हो सकते थे, जैसे मेथिल ऐल्कोहॉल को 'काष्ठ स्पिरिट' या 'कार्बिनॉल' भी कहते थे।
  • जब कार्बन श्रृंखला लम्बी होती थी, तो उसके समावयवों की संख्या बहुत बढ़ जाती थी, जिससे रूढ़ प्रणाली में नाम देना बहुत मुश्किल हो जाता था (जैसे नोनेन के 35 समावयवी)।

इन कमियों को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने IUPAC प्रणाली अपनाई। यह एक सुव्यवस्थित पद्धति है जहाँ यौगिक का नाम उसकी संरचना के अनुसार दिया जाता है। IUPAC नाम लिखने के लिए सबसे पहले मूल हाइड्रोकार्बन और उससे जुड़े क्रियात्मक समूहों को पहचानना होता है। जनक हाइड्रोकार्बन के नाम में उपयुक्त पूर्वलग्न (Prefix) तथा अनुलग्न (Suffix) जोड़कर यौगिक का नाम दिया जाता है।

I. सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केन:
कार्बन-कार्बन एकल बन्ध युक्त संतृप्त हाइड्रोकार्बनों को ऐल्केन कहते हैं। इन्हें पैराफिन (Paraffins) भी कहा जाता था क्योंकि ये बहुत कम क्रियाशील होते हैं। लैटिन में 'Para' का अर्थ है कम और 'affins' का अर्थ है क्रियाशीलता। मेथेन \( (CH_4) \), एथेन \( (C_2H_6) \), प्रोपेन \( (C_3H_8) \) तथा ब्यूटेन \( (C_4H_{10}) \) के सामान्य नाम IUPAC पद्धति में स्वीकार किए गए हैं। ब्यूटेन के बाद के ऐल्केनों के नाम उनकी सीधी श्रृंखला की संरचना पर आधारित होते हैं। उनका नाम देते समय कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर पूर्वलग्न और अनुलग्न 'ऐन' (ane) का प्रयोग किया जाता है।
सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के पूर्व लग्न, नाम तथा उदाहरण:

कार्बन परमाणुओं की संख्यापूर्वलग्न (Prefix)सूत्रनाम (Examples)
\( C_1 \)मेथ (Meth)\( CH_4 \)मेथेन (Methane)
\( C_2 \)एथ (Eth)\( C_2H_6 \)ऐथेन (Ethane)
\( C_3 \)प्रोप (Prop)\( C_3H_8 \)प्रोपेन (Propane)
\( C_4 \)ब्यूट (But)\( C_4H_{10} \)ब्यूटेन (Butane)
\( C_5 \)पेन्ट (Pent)\( C_5H_{12} \)पेन्टेन (Pentane)
\( C_6 \)हेक्स (Hex)\( C_6H_{14} \)हैक्सेन (Hexane)
\( C_7 \)हेप्ट (Hept)\( C_7H_{16} \)हेप्टेन (Heptane)
\( C_8 \)ऑक्ट (Oct)\( C_8H_{18} \)ऑक्टेन (Octane)
\( C_9 \)नोन (Non)\( C_9H_{20} \)नोनेन (Nonane)
\( C_{10} \)डेक (Dec)\( C_{10}H_{22} \)डेकेन (Decane)
\( C_{11} \)अन्डेक (Undec)\( C_{11}H_{24} \)अन्डेकेन (Undecane)
\( C_{12} \)डोडेक (Dodec)\( C_{12}H_{26} \)डोडेकेन (Dodecane)
\( C_{13} \)ट्राइडेक (Tridec)\( C_{13}H_{28} \)ट्राइडेकेन (Tridecane)
\( C_{20} \)आइकोस (Eicos)\( C_{20}H_{42} \)आइकोसेन (Eicosane)
\( C_{30} \)ट्राइकोन्ट (Triacont)\( C_{30}H_{62} \)ट्राइकोन्टेन (Triacontane)

II. शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केन:
शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों में कार्बन परमाणुओं की एक या एक से अधिक छोटी श्रृंखलाएँ जनक श्रृंखला के कई कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़ी होती हैं। इन शाखाओं को ऐल्किल मूलक या ऐल्किल समूह कहा जाता है।

शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के IUPAC नामकरण के नियम:

  1. दीर्घतम कार्बन श्रृंखला का चयन:
    यौगिक में सबसे लम्बी कार्बन श्रृंखला को जनक श्रृंखला या मूल श्रृंखला (Root Chain) के रूप में चुनते हैं।
    उदाहरण:
    I. \( CH_3 - CH(CH_3) - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH_3 \) (इसमें 9 कार्बन हैं)
    II. \( CH_3 - CH(CH_3) - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH(CH_2CH_3) - CH_2 - CH_2 \) (इसमें 8 कार्बन हैं, अतः यह गलत चयन है)
  2. वरीय कार्बन श्रृंखला का चयन (अधिकतम प्रतिस्थापी चयन नियम):
    यदि सबसे लम्बी श्रृंखला (समान कार्बन युक्त) की दो या दो से अधिक संभावनाएँ हैं, तो उस कार्बन श्रृंखला का मुख्य श्रृंखला के रूप में चयन किया जाता है जिसमें प्रतिस्थापियों या पार्श्व श्रृंखला की संख्या अधिकतम हो।
    उदाहरण: यहाँ सीधी श्रृंखला में 5 कार्बन हैं और एक प्रतिस्थापी (आइसोप्रोपिल) जुड़ा है, जबकि चिह्नित मुख्य श्रृंखला में 5 कार्बन हैं और दो प्रतिस्थापी (एथिल तथा मेथिल) जुड़े हैं।
  3. कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला का क्रमांकन (लघुसंख्यक नियम):
    जनक ऐल्केन को ज्ञात करने के लिए चयनित मुख्य श्रृंखला के कार्बन परमाणुओं का अंकन उस सिरे से प्रारम्भ करते हैं, जिधर से शाखा के रूप में उपस्थित ऐल्किल समूहों को न्यूनतम अंक मिले।
    उदाहरण: उपर्युक्त उदाहरण में क्रमांकन बाईं ओर से होना चाहिए (कार्बन संख्या 2 तथा 6 पर शाखा), न कि दाईं ओर से (कार्बन संख्या 4 तथा 8 पर शाखा)।
  4. न्यूनतम प्रतिस्थापी योग नियम:
    यदि किसी यौगिक में समान प्रतिस्थापी दोनों सिरों से समान अंक पर स्थित हैं तथा इनके अतिरिक्त कोई अन्य प्रतिस्थापी भी उपस्थित है तो कार्बन श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है जिधर से प्रतिस्थापियों की स्थिति के अंकों का योग न्यूनतम हो।
    उदाहरणार्थ:
    गलत: \( CH_3-CH(CH_3)-CH_2-CH(CH_3)-CH_2-CH(CH_3) \) (जिसमें संख्याएँ 2, 4, 5 आती हैं, तो योग 11 है)
    सही: \( CH_3-CH(CH_3)-CH_2-CH(CH_3)-CH_2-CH(CH_3) \) (जिसमें संख्याएँ 2, 3, 5 आती हैं, तो योग 10 सही है)।
  5. प्रतिस्थापियों का नामोल्लेख करने के नियम:
    शाखा के रूप में स्थित ऐल्किल समूहों के नाम एल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न के रूप में लिखे जाते हैं तथा इन ऐल्किल समूहों (प्रतिस्थापियों) की स्थिति को संख्या द्वारा दर्शाया जाता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के ऐल्किल-समूहों के नामों को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है चाहे श्रृंखला में उनकी स्थिति कुछ भी हो। ऐल्किल समूह तथा संख्या के मध्य संयोजक-रेखा एवं ऐल्किल समूह तथा जनक श्रृंखला ऐल्केन को मिलाकर लिखा जाता है।
    उदाहरण: \( H_3C-CH(CH_3)-CH_2-CH_2-CH_2-CH(CH_2CH_3)-CH_2-CH_2-CH_3 \) का नाम `6-एथिल-2-मेथिलनोनेन` है।
  6. जब यौगिक में दो या दो से अधिक समान प्रतिस्थापी उपस्थित होते हैं:
    उनकी संख्याओं के मध्य अल्पविराम (कोमा) लगाते हैं तथा इन प्रतिस्थापी समूहों के नाम को दुबारा न लिखकर इन्हें उचित पूर्वलग्न, जैसे-डाई, ट्राई, टेट्रा इत्यादि द्वारा दर्शाया जाता है। लेकिन इन्हें (डाई, ट्राई) अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नहीं लिया जाता है। यौगिक का नाम लिखते समय प्रतिस्थापी समूहों के नामों को ही अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में लिया जाता है।
    उदाहरण: \( CH_3-CH(CH_3)-CH_2-CH(CH_3)-CH_3 \) का नाम `2,4-डाइमेथिलपेन्टेन` है।
  7. अंग्रेजी वर्णमाला क्रम नियम:
    जब किसी यौगिक में दो असमान प्रतिस्थापियों की स्थिति समान होती है, तो अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में पहले आने वाले प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है।
    उदाहरण: \( CH_3-CH(CH_2CH_3)-CH_2-CH_2-CH_2-CH(CH_3)-CH_2-CH_2-CH_3 \) का सही नाम `3-एथिल-6-मेथिलऑक्टेन` है, न कि `6-एथिल-3-मेथिलऑक्टेन`।
  8. जब प्रतिस्थापी (ऐल्किल समूह) बड़ा एवं जटिल होता है:
    तथा जिसका कोई सामान्य नाम नहीं होता तो उसका भी IUPAC नाम दिया जाता है जिसमें शाखित श्रृंखला के उस कार्बन को प्रथम अंक दिया जाता है जो जनक श्रृंखला से जुड़ा होता है एवं ऐसे जटिल प्रतिस्थापी का नाम कोष्ठक में लिखा जाता है।
    उदाहरण: \( CH_3-CH_2-CH_2-CH(CH(CH_3)_2)-CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3 \) में से `5-(2,2-डाइमेथिलप्रोपिल)-नोनेन`।
    उदाहरण: \( H_3C-CH_2-CH_2-CH(CH(CH_3)_2)-CH(CH_2CH_3)-CH_2-CH_2-CH_2-CH_3 \) में से `5-द्वितीयक-ब्यूटिल-4-आइसोप्रोपिलडेकेन`।

III. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का नामकरण:
वे हाइड्रोकार्बन जिनमें कम से कम एक द्विबन्ध \( (>C=C<) \) या एक त्रिआबन्ध \( (-C \equiv C-) \) उपस्थित होता है, उन्हें असंतृप्त हाइड्रोकार्बन कहते हैं। \( >C=C< \) युक्त यौगिकों को ऐल्कीन तथा \( -C \equiv C- \) युक्त यौगिकों को एल्काइन कहा जाता है।

(1) एल्कीनों का नामकरण:
एल्कीनों के IUPAC नामकरण के नियम निम्नलिखित हैं:

  1. नियम 1: मुख्य श्रृंखला में द्विआबन्ध को लेकर इसको न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा इसके लिए अनुलग्न '-ईन' (ene) प्रयुक्त होता है एवं अनुलग्न से पहले द्विबन्ध की स्थिति बतायी जाती है।
    उदाहरण: \( CH_2=CH-CH(CH_3)-CH_3 \) का नाम `ब्यूट-1-ईन` है।
    उदाहरण: \( CH_2=CH-CH_2-CH(CH_2CH_3)-CH_2-CH_3 \) का नाम `2-एथिल-पेन्ट-1-ईन` है।
  2. नियम 2: मुख्य श्रृंखला का अंकन करते समय द्वि-आबन्ध को पार्श्व श्रृंखला \( (CH_3 - \) अथवा \( C_2H_5 - \) समूह) की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन द्विबन्ध दोनों सिरों से समान स्थिति पर आता है तो प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है।
    उदाहरण: \( CH_2=CH-CH(CH_3)-CH_3 \) का नाम `3-मेथिल ब्यूट-1-इन` है।
  3. नियम 3: जब किसी यौगिक में द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की स्थिति समान होती है, तो द्वि-आबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है, अन्यथा द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध में से जो भी पहले आता है उसी सिरे से अंकन कर दिया जाता है लेकिन नाम लिखते समय पहले 'ईन' तथा बाद में 'आइन' लिखते हैं।
    उदाहरण: `हेप्ट-4-ईन-2-आइन`।
  4. नियम 4: जब यौगिक में दो द्वि-आबन्ध होते हैं, तो इन्हें ऐल्काडाइईन कहा जाता है।
    उदाहरण: \( CH_2=CH-CH=CH_2 \) का नाम `ब्यूटा-1,3-डाइईन` है।
    उदाहरण: \( CH_2=C(CH_3)-CH=CH_2 \) का नाम `2-मेथिलब्यूटा-1,3-डाइईन` है।

ऐल्काइनों का नामकरण:

  1. नियम 1: त्रि-आबन्ध को जनक श्रृंखला में लेकर उसे न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा शेष नियम एल्कीनों के समान ही होते हैं।
    उदाहरण: \( CH \equiv C - CH_2 - CH_2 - CH_3 \) का नाम `पेन्ट-1-आइन` है।
  2. नियम 2: पार्श्व श्रृंखला की तुलना में त्रिआबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है।
    उदाहरण: \( CH_3 - C \equiv C - CH_3 \) का नाम `ब्यूट-2-आइन` है।
    उदाहरण: \( CH \equiv C - C(CH_3)_2 - CH_2 - CH_3 \) का नाम `3,3-डाइमेथिलपेन्ट-1-आइन` है।
  3. नियम 3: यौगिक में दो या अधिक त्रिआबन्ध उपस्थित होने पर 'डाइआइन', 'ट्राइआइन' इत्यादि अनुलग्न प्रयुक्त किए जाते हैं।
    उदाहरण: \( H-C \equiv C-C \equiv C-C \equiv C-H \) का नाम `हेक्सा-1,3,5-ट्राइआइन` है।
    उदाहरण: \( H_2C=CH-CH(CH_3)-CH=CH-C \equiv CH \) का नाम `5-मेथिल-3,6-हेप्टा डाइईन-1-आइन` है।

IV. चक्रीय संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नामकरण:
एकल चक्रीय ऐलिसाइक्लिक संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नाम संबंधित खुली श्रृंखला ऐल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न 'साइक्लो' लगाकर दिया जाता है। पार्श्व श्रृंखलाओं के नामकरण में खुली (विवृत) श्रृंखला यौगिकों के नियम ही प्रयुक्त होते हैं।
उदाहरण:
`साइक्लोब्यूटेन`
`साइक्लोऑक्टेन`
उदाहरण: `3-एथिल-1,1-डाइमेथिलसाइक्लोहेक्सेन` (अधिक प्रतिस्थापीयुक्त कार्बन को न्यूनतम अंक दिया गया है।)
उदाहरण: `1-मेथिल-3-प्रोपिल साइक्लोहेक्सेन` (अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में अंकन किया गया है।)

V. क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण:

(i) क्रियात्मक समूह की पहचान:
सर्वप्रथम यौगिक में उपस्थित क्रियात्मक समूह की पहचान की जाती है, ताकि उपयुक्त अनुलग्न का चयन किया जा सके। अनुलग्न भी दो प्रकार के होते हैं-प्राथमिक तथा द्वितीयक। प्राथमिक अनुलग्न कार्बन परमाणुओं के मध्य बन्ध के प्रकार को दर्शाता है जैसे 'ऐन', 'ईन' या 'आइन' तथा द्वितीयक अनुलग्न क्रियात्मक समूह को दर्शाता है। यदि एक से अधिक क्रियात्मक समूह उपस्थित हों तो वरीयता क्रम का पालन किया जाता है।

विभिन्न क्रियात्मक समूहों को वरीयता क्रम, उनके अनुलग्न तथा पूर्वलग्न:

वरीयता क्रमसजातीय श्रेणीक्रियात्मक समूहअनुलग्न (Suffix)पूर्वलग्न (Prefix)
1कार्बोक्सिलिक अम्ल\( -COOH \)ओइक अम्लकार्बोक्सी
2सल्फोनिक अम्ल\( -SO_3H \)सल्फोनिक अम्लसल्फो
3ऐसिड ऐन्हाइड्राइड\( -CO-O-CO- \)ओइक ऐन्हाइड्राड-
4एस्टर\( -COOR \)ऐल्किल, ओएटऐल्कॉक्सी कार्बोनिल
5ऐसिड हैलाइड\( -COX \)ऑयल हैलाइडहैलोकार्बोनिल या हैलोफार्मिल
6ऐसिड ऐमाइड\( -CO-NH_2 \)ऐमाइडकार्बेमॉयल या ऐमीडो
7सायनाइड\( -CN \)नाइट्राइलसायनो
8आइसोसायनाइड\( -NC \)आइसोसायनाइड या आइसोनाइट्राइलआइसोसायनो
9ऐल्डिहाइड\( -CHO \)ऐलफार्मिल या आक्सो
10कीटोन\( >C=O \)ऑनऑक्सो
11ऐल्कोहॉल\( -OH \)ऑलहाइड्रॉक्सी
12थायो ऐल्कोहॉल\( -SH \)थायोलमर्केप्टो
13ऐमीन\( -NH_2 \)एमीनऐमीनो
14ईथर\( -OR \)-ऐल्कॉक्सी
15ऐल्कीन\( >C=C< \)ईन-
16ऐल्काइन\( -C \equiv C- \)आइन-

निम्नलिखित समूह हमेशा प्रतिस्थापी (पूर्वलग्न) के रूप में ही प्रयुक्त होते हैं तथा इनका कोई अनुलग्न नहीं होता है।

क्रियात्मक समूहअतिरिक्त अनुलग्न (Additional Suffix)
\( -COOH \)कार्बोक्सिलिक अम्ल (Carboxylic Acid)
\( -COOR \)(ऐल्किल) कार्बोक्सिलेट (Alkyl) Carboxylate
\( -COX \)कार्बोनिल हैलाइड (Carbonyl halide)
\( -CONH_2 \)कार्बोक्सेमाइड (Carboxamide)
\( -CN \)कार्बोनाइट्राइल (Carbonitrile)
\( -CHO \)कार्बऐल्डिहाइड (Carbaldehyde)

उदाहरण:
(i) \( H_3C - CH_2 - CH_2 - CH_2 - CH(CH_2-OH) - CH_3 \) का नाम `2-ऐथिलपेन्टेन-1-ऑल` है।
(नोट - यदि क्रियात्मक समूह जनक श्रृंखला के दोनों सिरों से समान स्थिति में है तो श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है जिधर से प्रतिस्थापी निकट होता है।)
उदाहरण: \( CH_3-CH(CH_3)-C(=O)-CH_2-CH_3 \) का नाम `2-मेथिलपेन्टेन-3-ऑन` है।
उदाहरण: \( CH_3-CH(Cl)-CH(CH_3)-CH_2-CH_3 \) का नाम `2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन` है।

(ii) यदि किसी यौगिक में एक ही प्रकार के क्रियात्मक समूहों की संख्या एक से अधिक है:
तो उनके अनुलग्न से पहले 'डाइ', 'ट्राई', 'टेट्रा' इत्यादि लिखा जाता है।
उदाहरण:
\( HOOC-COOH \) का नाम `एथेनडाइओइक अम्ल` है।
\( HO-CH_2-CH_2-OH \) का नाम `एथेन-1,2-डाइऑल` है।
\( HO-CH_2-CH(OH)-CH_2-OH \) का नाम `प्रोपेन-1,2,3-ट्राइऑल` है।
\( CH_3-C(=O)-C(=O)-CH_3 \) का नाम `ब्यूटेन-2,3-डाइओन` है।
\( CH_3-CH_2-CH(CN)-CH_2-CH(CN)-CH_3 \) का नाम `3-मेथिलहैक्सेन-1,6-डाइनाइट्राइल` है।

VI. बहुक्रियात्मक समूह (एक से अधिक भिन्न-भिन्न क्रियात्मक समूह) युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण:
किसी यौगिक में उपस्थित सभी क्रियात्मक समूहों में से जो समूह वरीयता क्रम में पहले आता है उसे मुख्य क्रियात्मक समूह तथा अन्य क्रियात्मक समूहों को प्रतिस्थापी माना जाता है। अतः किसी बहुक्रियात्मक समूह युक्त यौगिक में मुख्य क्रियात्मक समूह ज्ञात करने के बाद इस यौगिक को भी एक क्रियात्मक समूह युक्त यौगिक के समान मानकर ही नाम दिया जाता है।
क्रियात्मक समूहों की प्राथमिकता का घटता क्रम निम्न प्रकार होता है:
\( -COOH > -SO_3H > -COOR > -COX > -CONH_2 > -CN > -NC > -CHO > >C=O > -OH > -SH > -NH_2 > -OR > >C=C< > -C \equiv C- \)

बहुक्रियात्मक समूहयुक्त यौगिक के नामकरण के लिए निम्नलिखित नियम:

  1. (1) सर्वप्रथम उस सर्वाधिक लम्बी कार्बन श्रृंखला (जनक श्रृंखला) का चयन:
    करते हैं जिसमें मुख्य क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है। अन्य क्रियात्मक समूह (प्रतिस्थापी) भी जनक श्रृंखला से जुड़े होने चाहिए।
  2. (2) जब कार्बन जनक श्रृंखला में नहीं लिया जाता है:
    \( -CN, -COX, -CONH_2 \) तथा \( -COOR \) समूह प्रमुख क्रियात्मक समूह के रूप में नहीं होते हैं तो इनके कार्बन को जनक श्रृंखला में नहीं लिया जाता है।
  3. (3) जनक श्रृंखला का क्रमांकन:
    उस सिरे से किया जाता है जिस सिरे से मुख्य क्रियात्मक समूह को न्यूनतम अंक मिलता है।
  4. (4) यौगिक का नाम लिखते समय:
    मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न तथा अन्य क्रियात्मक समूहों (प्रतिस्थापी के रूप में) एवं ऐल्किल समूहों को पूर्वलग्न के रूप में अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है एवं अंकन करते समय भी इनका अंग्रेजी वर्णमाला क्रम ही देखा जाता है।
  5. (5) यदि यौगिक में द्विबन्ध (C=C) अथवा त्रिबन्ध (C≡C) भी उपस्थित है:
    तो इसका नाम मुख्य क्रियात्मक समूह के नाम से पहले तथा कार्बन श्रृंखला के नाम के पश्चात् लिखते हैं। द्विबन्ध अथवा त्रिबन्ध की स्थिति भी इसके नाम के साथ दर्शायी जाती है।
  6. (6) जब ऐल्डिहाइड समूह (-CHO) प्रतिस्थापी के रूप में होता है:
    तथा इस समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में लिया गया है तो इसके लिए पूर्वलग्न 'ऑक्सो' प्रयुक्त किया जाता है अन्यथा 'फार्मिल' का प्रयोग किया जाएगा।

उदाहरण:
(i) \( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-CH_2-C(=O)-CH(OH)-CH_3 \) का नाम `7-हाइड्रॉक्सी हेप्टेन-2-ओन` है।
(ii) \( Br-CH_2-CH=CH_2 \) का नाम `3-ब्रोमोप्रोप-1-ईन` है।
(iii) \( CH_3-CH_2-CH(OH)-CH_2-CHO \) का नाम `3-हाइड्रॉक्सीपेन्टेनैल` है।
(iv) \( CH_3-CH_2-O-CH_2-CH(OH)-CH_3 \) का नाम `1-एथॉक्सीप्रोपेन-2-ऑल` है।
(v) \( CH_3-CH(Br)-CH_2-CH_2-CH(CHO)-CN \) का नाम `5-ब्रोमो-2-फार्मिलहेक्सेननाइट्राइल` है।
(vi) \( CH_3-CH_2-CH(SO_3H)-C(=O)-CH_3 \) का नाम `2-ऑक्सो पेन्टेन-3-सल्फोनिक अम्ल` है।
(vii) `एथिल-2-ऐमीनो-4-सायनोब्यूटेनॉएट` (संरचना: \( C_2H_5OOC-CH(NH_2)-CH_2-CH(CN)-COOH \)).
(viii) \( HOOC-CH(NH_2)-CH(CHO)-COOH \) का नाम `2-ऐमीनो-3-फार्मिल ब्यूटेन-1,4-डाइऑइकअम्ल` है।
(ix) `5-ऐमीनो-3-मेथिल-4-ऑक्सो हेक्स-2-ईन-1-ऐल`।
(x) `1-ऐमीनोब्यूट-2-ईन-2-ऑल`।

VII. यौगिक के गलत नाम से सही नाम लिखना:
किसी यौगिक के गलत नाम को सही करने के लिए निम्न विधि प्रयुक्त की जाती है। सर्वप्रथम गलत नाम से उपयुक्त विधि के अनुसार यौगिक की संरचना लिख लेते हैं।
उदाहरण: गलत नाम `4-ऐमीनो-3-हाइड्रॉक्सी-ब्यूट-2-ईन`।
यौगिक के नाम के अनुसार सर्वप्रथम चार कार्बन की एक श्रृंखला बनाकर उसका एक सिरे से क्रमांकन कर लेते हैं। अब कार्बन 2 तथा 3 के मध्य एक द्विबन्ध लगाते हैं। कार्बन 3 पर एक \( -OH \) समूह तथा कार्बन 4 पर एक \( -NH_2 \) समूह लगाते हैं। अब प्रत्येक कार्बन की संयोजकता हाइड्रोजन परमाणुओं की आवश्यक संख्या से पूर्ण करते हैं तो निम्नलिखित संरचना प्राप्त होती है:
\( H_2N-CH_2-C(=O)-CH=CH_2 \)
इसका सही नाम लिखने के लिए IUPAC नियम के अनुसार जनक श्रृंखला का अंकन करके मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न प्रयुक्त करने पर निम्नलिखित नाम प्राप्त होगा: `1-ऐमीनोब्यूट-2-ईन-2-ऑल`।

VIII. बेन्जीन व्युत्पन्नों के नामकरण:

(1) सामान्य नाम:
कुछ सामान्य बेन्जीन व्युत्पन्न और उनके नाम:
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \end{tikzpicture} \) `बेन्जीन` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {Br}; \end{tikzpicture} \) `ब्रोमोबेन्जीन` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {CH$_3$}; \end{tikzpicture} \) `मेथिल बेन्जीन (टॉलूईन)` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {OH}; \end{tikzpicture} \) `हाइड्रॉक्सी बेन्जीन (फीनॉल)`
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {OCH$_3$}; \end{tikzpicture} \) `मेथॉक्सीबेन्जीन (ऐनीसॉल)` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {NH$_2$}; \end{tikzpicture} \) `ऐमीनोबेन्जीन (ऐनीलोन)` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {NO$_2$}; \end{tikzpicture} \) `नाइट्रोबेन्जीन` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {CHO}; \end{tikzpicture} \) `बेन्जैल्डिहाइड` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) ellipse (0.5cm and 0.3cm); \node at (0,0.5) {COOH}; \end{tikzpicture} \) `बेन्जोइक अम्ल`

(2) द्विप्रतिस्थापी बेन्जीन व्युत्पन्नों का नाम:
प्रतिस्थापी समूहों की स्थितियाँ संख्याओं द्वारा दर्शायी जाती हैं तथा वलय का अंकन इस प्रकार किया जाता है कि प्रतिस्थापियों को न्यूनतम अंक मिलें।
उदाहरण:
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.7] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (-0.5,0.7) node[above left] {Cl}; \draw (0.5,0.7) node[above right] {Cl}; \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \end{tikzpicture} \) `1,2-डाइक्लोरोबेन्जीन` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.7] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (-0.7,0) node[left] {Cl}; \draw (0.5,0.7) node[above right] {Cl}; \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \end{tikzpicture} \) `1,3-डाइक्लोरोबेन्जीन` ; \( \begin{tikzpicture}[scale=0.7] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (-0.7,0) node[left] {Cl}; \draw (0.7,0) node[right] {Cl}; \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \end{tikzpicture} \) `1,4-डाइक्लोरोबेन्जीन`

रूढ़ पद्धति में: 1,2-स्थितियों को ऑर्थो (o-), 1,3-स्थितियों को मेटा (m-) तथा 1,4-स्थितियों को पैरा (p-) पूर्वलग्नों द्वारा दर्शाया जाता है। अतः `1,3-डाइक्लोरोबेन्जीन` का रूढ़ नाम `मेटा डाइक्लोरोबेन्जीन` है तथा `1,2-डाइक्लोरोबेन्जीन` को `ऑर्थो (o-)` तथा `1,4-डाइक्लोरोबेन्जीन` को `पैरा (p-)` डाइक्लोरोबेन्जीन कहते हैं।

(3) त्रि तथा बहुप्रतिस्थापी बेन्जीन के IUPAC नामकरण:
प्रतिस्थापियों की स्थितियाँ न्यूनतम संख्या के नियम का पालन करते हुए दी जाती हैं।
उदाहरण:
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \node at (0.5,0.7) {NO$_2$}; \node at (-0.5,0.7) {CH$_3$}; \node at (0.7,0) {Cl}; \end{tikzpicture} \) `2-क्लोरो-1-मेथिल-4-नाइट्रोबेन्जीन`
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \node at (0.5,0.7) {NO$_2$}; \node at (-0.5,0.7) {NO$_2$}; \node at (0.7,0) {Cl}; \end{tikzpicture} \) `1-क्लोरो-2,4-डाइनाइट्रोबेन्जीन`
\( \begin{tikzpicture}[scale=0.6] \draw (0,0) circle (0.5); \draw (0,0) node[circle,fill,inner sep=0.08cm]{}; \node at (0.5,0.7) {CH$_3$}; \node at (-0.5,0.7) {OH}; \node at (0,-0.7) {CH$_3$}; \end{tikzpicture} \) `3,4-डाइमेथिलफीनॉल`

(4) जब बेन्जीन वलय तथा क्रियात्मक समूह संतृप्त हाइड्रोकार्बन श्रृंखला से जुड़े होते हैं:
तब बेन्जीन वलय को जनक न मानकर इसे प्रतिस्थापी माना जाता है तथा इसका नाम फेनिल दिया जाता है एवं इसे \( C_6H_5 - \) या संक्षेप में Ph लिखते हैं।
उदाहरण:
\( C_6H_5-CH_2-CH_2-OH \) का नाम `2-फेनिलएथेनॉल` है।
\( C_6H_5-CH_2-CHO \) का नाम `2-फेनिलएथेनैल` है।

विभिन्न क्रियात्मक समूहों के सामान्य नाम:

  1. ऐल्कोहॉल (R-OH):
    उदा. \( CH_3-CH_2-OH \) (एथिल ऐल्कोहॉल), \( (CH_3)_2CH-OH \) (आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल), \( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-OH \) (n-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल), \( CH_3-CH_2-CH(OH)-CH_3 \) (द्वितीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल)।
  2. थायोऐल्कोहॉल (R-SH):
    उदा. \( CH_3-SH \) (मेथिल थायोऐल्कोहॉल), \( CH_3-CH_2-CH_2-SH \) (n-प्रोपिल थायोऐल्कोहॉल)।
  3. सायनाइड (R-C≡N):
    उदा. \( CH_3-CH_2-C \equiv N \) (एथिल सायनाइड), \( (CH_3)_3C-C \equiv N \) (तृतीयक ब्यूटिल सायनाइड)।
  4. आइसोसायनाइड (R-N≡C):
    उदा. \( CH_3-N \equiv C \) (मेथिल आइसोसायनाइड), \( (CH_3)_3C-CH_2-N \equiv C \) (नियोपेन्टिल आइसोसायनाइड)।
  5. ईथर (R-O-R'):
    यदि \( R = R' \) तो डाइऐल्किल ईथर (सरल ईथर), यदि \( R \ne R' \) तो ऐल्किल ऐल्किल' ईथर (मिश्रित ईथर) कहलाता है। अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नाम लिखा जाता है।
    उदा. \( CH_3-O-CH_3 \) (डाइमेथिल ईथर), \( CH_3-O-CH_2-CH_3 \) (एथिलमेथिल ईथर), \( C_2H_5-O-C_2H_5 \) (डाइऐथिल ईथर)।
  6. ऐमीन (Amines):
    ऐमीन तीन प्रकार के होते हैं: प्राथमिक \( (1^\circ) \) \( (R-NH_2) \), द्वितीयक \( (2^\circ) \) \( (R-NH-R') \) तथा तृतीयक \( (3^\circ) \) \( (R-N-R'R'') \)।
    प्राथमिक ऐमीन उदा. \( CH_3-NH_2 \) (मेथेनऐमीन), \( CH_2=CH-CH_2-NH_2 \) (ऐलिलऐमीन), \( (CH_3)_2CH-NH_2 \) (आइसोप्रोपिलऐमीन)।
    द्वितीयक ऐमीन उदा. \( CH_3-CH_2-NH-CH_2-CH_3 \) (डाइएथिलऐमीन), \( (CH_3)_2CH-NH-CH_3 \) (आइसोप्रोपिलमेथिलऐमीन)।
    तृतीयक ऐमीन उदा. \( R-N(R')R'' \) (ट्राइऐल्किलऐमीन)।
  7. ऐल्डिहाइड (R-CHO):
    उदा. \( H-CHO \) (फार्मैल्डिहाइड), \( CH_3-CHO \) (ऐसिटैल्डिहाइड), \( CH_3-CH_2-CHO \) (प्रोपिऑनऐल्डिहाइड), \( CH_3-CH_2-CH_2-CHO \) (n-ब्यूटिरैल्डिहाइड), \( (CH_3)_2CH-CHO \) (आइसोब्यूटिरैल्डिहाइड), \( CH_3-CH_2-CH_2-CH_2-CHO \) (n-वैलेरेल्डिहाइड)।
  8. कार्बोक्सिलिक अम्ल (RCOOH):
    उदा. \( H-COOH \) (फार्मक अम्ल), \( CH_3-COOH \) (ऐसिटिक अम्ल)।
  9. अम्ल के एस्टर:
    उदा. \( H-C(=O)-O-CH_3 \) (मेथिल फॉर्मेट), \( H-C(=O)-O-C_6H_5 \) (फेनिल फार्मेट), \( CH_3-C(=O)-O-C_2H_5 \) (एथिल एसीटेट), \( CH_3-C(=O)-O-CH(CH_3)_2 \) (आइसोब्यूटिल ऐसीटेट)।
  10. अम्ल के ऐन्हाइड्राइड:
    उदा. \( CH_3-C(=O)-O-C(=O)-CH_3 \) (ऐसीटिक ऐन्हाइड्राइड), \( CH_3-CH_2-C(=O)-O-C(=O)-CH_2-CH_3 \) (प्रोपिऑनिक ऐन्हाइड्राइड), \( CH_3-C(=O)-O-C(=O)-CH_2-CH_3 \) (ऐसीटिक प्रोपिऑनिक ऐन्हाइड्राइड)।

In simple words: IUPAC naming provides a clear and systematic way to name chemical compounds based on their structure. It involves identifying the main carbon chain, functional groups, and using specific prefixes and suffixes, along with numbering rules, to create a unique name. This system helps chemists worldwide communicate precisely about chemical structures.

🎯 Exam Tip: When explaining IUPAC rules, always include at least one clear example for each rule to show how it applies to real compounds. Remember to highlight the advantages of IUPAC over common names, such as clarity and lack of ambiguity.

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