RBSE Solutions Class 11 Business Studies Chapter 5 व्यावसायिक पूँजीवित्त

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Detailed Chapter 5 व्यावसायिक पूँजीवित्त RBSE Solutions for Class 11 Business Studies

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Class 11 Business Studies Chapter 5 व्यावसायिक पूँजीवित्त RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. समता अंशधारी कहलाते हैं –
(अ) कम्पनी के स्वामी
(ब) कम्पनी के साझेदार
(स) कम्पनी के अधिकारी
(द) कम्पनी के कर्मचारी
Answer: (अ) कम्पनी के स्वामी
In simple words: जो लोग समता अंश खरीदते हैं, वे कम्पनी के मालिक कहलाते हैं।

🎯 Exam Tip: यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि समता अंशधारी कम्पनी के वास्तविक मालिक होते हैं और उन्हें वोट देने का अधिकार भी होता है।

 

Question 3. पट्टा करार में पट्टाधारी को निम्न अधिकार प्राप्त हैं –
(अ) पट्टाकार द्वारा अर्जित लाभ
(ब) परिसम्पत्ति का विशिष्ट अवधि के लिये उपयोग
(स) सम्पत्तियों का विक्रय
(द) संगठन के प्रबन्ध में भाग लेने का अधिकार
Answer: (ब) परिसम्पत्ति का विशिष्ट अवधि के लिये उपयोग
In simple words: पट्टा करार में, पट्टाधारी को एक तय समय के लिए किसी संपत्ति का उपयोग करने का हक मिलता है।

🎯 Exam Tip: पट्टाधारी को संपत्ति का मालिक नहीं बनाया जाता, बस एक निश्चित समय के लिए उसे इस्तेमाल करने की अनुमति मिलती है।

 

Question 4. वाणिज्यिक प्रपत्रों की भुगतान अवधि सामान्यतः होती है –
(अ) 20 से 40 दिन
(ब) 60 से 90 दिन
(स) 120 से 365 दिन
(द) 90 से 364 दिन
Answer: (द) 90 से 364 दिन
In simple words: वाणिज्यिक प्रपत्रों के पैसे लौटाने की अवधि आमतौर पर 90 दिन से लेकर 364 दिन तक होती है।

🎯 Exam Tip: वाणिज्यिक प्रपत्र एक छोटा कर्ज होता है, जिसकी भुगतान अवधि एक साल से कम होती है।

 

Question 5. दीर्घकालीन ऋण की अवधि होती है –
(अ) एक वर्ष
(ब) तीन वर्ष
(स) दो वर्ष
(द) पाँच या अधिक वर्ष
Answer: (द) पाँच या अधिक वर्ष
In simple words: लम्बे समय के लिए लिए गए कर्ज की अवधि पाँच साल या उससे ज्यादा की होती है।

🎯 Exam Tip: दीर्घकालीन ऋण आमतौर पर बड़ी परियोजनाओं या स्थायी संपत्तियों को खरीदने के लिए लिया जाता है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 2. पूर्वाधिकार अंशों का अर्थ बताइये।
Answer: पूर्वाधिकार अंश ऐसे अंश होते हैं, जिन्हें समता अंशों की तुलना में लाभांश और पूंजी वापसी में पहले प्राथमिकता मिलती है। इसका मतलब है कि इन्हें पहले लाभांश मिलता है और कंपनी बंद होने पर पूंजी भी पहले वापस की जाती है।
In simple words: पूर्वाधिकार अंश उन अंशों को कहते हैं, जिन्हें लाभांश और पूंजी लौटाने में समता अंशों से पहले अधिकार मिलता है।

🎯 Exam Tip: पूर्वाधिकार अंशों पर लाभांश की दर आमतौर पर तय होती है, और इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होता।

 

Question 3. पट्टा पर वित्तीयन से क्या आशय है?
Answer: पट्टा (लीज) पर वित्तीयन एक समझौता होता है। इसमें संपत्ति का मालिक अपनी संपत्ति को किसी और पक्ष को एक निश्चित समय के लिए उपयोग करने का अधिकार देता है। इसके बदले में वह पक्ष मालिक को नियमित भुगतान करता है।
In simple words: पट्टा वित्तीयन वह तरीका है, जिसमें एक व्यक्ति किसी संपत्ति का उपयोग करने के लिए दूसरे व्यक्ति को किराए पर देता है और बदले में पैसे चुकाता है।

🎯 Exam Tip: पट्टा वित्तीयन में संपत्ति का स्वामित्व मालिक के पास ही रहता है, केवल उपयोग का अधिकार किराएदार को मिलता है।

 

Question 4. बैंक अधिविकर्ष क्या है?
Answer: बैंक अधिविकर्ष वह सुविधा है जिसमें बैंक अपने चालू खाताधारक को उसके खाते में जमा राशि से ज्यादा पैसे निकालने की अनुमति देता है। यह एक तरह का अल्पकालीन ऋण होता है।
In simple words: बैंक अधिविकर्ष का मतलब है कि बैंक ग्राहक को उसके खाते में जमा से ज्यादा पैसे निकालने की इजाजत देता है।

🎯 Exam Tip: यह सुविधा केवल चालू खाताधारकों के लिए होती है और उन्हें इस अतिरिक्त राशि पर ब्याज देना पड़ता है।

 

Question 5. स्वामित्व कोष का अर्थ बताइये।
Answer: स्वामित्व कोष वह धन है जो व्यवसाय के मालिकों (जैसे एकल व्यापारी, साझेदार या कंपनी के शेयरधारक) द्वारा व्यवसाय में लगाया जाता है। यह व्यवसाय की अपनी पूंजी होती है।
In simple words: स्वामित्व कोष वह पैसा है जो व्यवसाय के मालिक खुद अपनी कंपनी में लगाते हैं।

🎯 Exam Tip: यह कंपनी की अपनी पूंजी होती है और इसे वापस नहीं करना पड़ता जब तक कि कंपनी बंद न हो जाए।

 

Question 6. संचित आय क्या है?
Answer: कंपनियाँ अपनी कमाई गई सारी आय को शेयरधारकों में लाभांश के रूप में नहीं बांटतीं। वे लाभ का कुछ हिस्सा भविष्य की जरूरतों के लिए बचाकर रखती हैं। इसी बचे हुए लाभ को संचित आय कहा जाता है।
In simple words: संचित आय वह लाभ है जिसे कंपनी शेयरधारकों में नहीं बांटती बल्कि भविष्य के लिए बचाकर रखती है।

🎯 Exam Tip: संचित आय कंपनी के लिए वित्त का एक महत्वपूर्ण आंतरिक स्रोत है, जिसे बिना किसी बाहरी खर्च के उपयोग किया जा सकता है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. नकद साख एव बैंक अधिविकर्ष में कोई चार अन्तर बताइये।
Answer: नकद साख और बैंक अधिविकर्ष में चार मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:
1. नकद साख किसी भी व्यक्ति या फर्म को मिल सकती है, जबकि बैंक अधिविकर्ष केवल चालू खाता रखने वालों को ही दिया जाता है।
2. बैंक अधिविकर्ष के लिए अलग से खाता खोलने की जरूरत नहीं होती है, लेकिन नकद साख में एक अलग खाता खोला जाता है।
3. नकद साख में ऋण की राशि दी गई प्रतिभूतियों के मूल्य पर निर्भर करती है, जबकि बैंक अधिविकर्ष ग्राहक के लेन-देन और जमा राशि के औसत पर आधारित होता है।
4. नकद साख पर ब्याज दर बैंक अधिविकर्ष की तुलना में अक्सर ज्यादा होती है।
In simple words: नकद साख सभी को मिल सकती है, जबकि बैंक अधिविकर्ष सिर्फ चालू खाताधारकों के लिए है। नकद साख में अलग खाता खुलता है, अधिविकर्ष में नहीं। नकद साख की रकम प्रतिभूति पर आधारित होती है, अधिविकर्ष की लेन-देन पर। नकद साख पर ब्याज दर आमतौर पर ज्यादा होती है।

🎯 Exam Tip: इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि नकद साख किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती है जबकि बैंक अधिविकर्ष केवल चालू खाताधारकों के लिए ही होता है।

 

Question 2. समता अंशों एवं पूर्वाधिकार अंशों में कोई चार अन्तर बताइये।
Answer: समता अंशों और पूर्वाधिकार अंशों में चार मुख्य अंतर नीचे दिए गए हैं:

अंतर का आधारसमता अंशपूर्वाधिकार अंश
अंकित मूल्यसामान्यतया समता अंशों का अंकित मूल्य से कम होता है।पूर्वाधिकार अंशों का अंकित मूल्य ज्यादा होता है।
मताधिकारसमता अंशधारी को वोट देने का अधिकार होता है।सामान्य परिस्थितियों में इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होता। यदि दो वर्ष तक लाभांश न दिया जाये तो मतदान का अधिकार मिल जाता है।
लाभांशसमता अंशधारियों को सबसे बाद में लाभांश दिया जाता है।पूर्वाधिकार अंशों पर निश्चित दर से लाभांश समता अंशों से पहले दिया जाता है।
जोखिमइन पर जोखिम की मात्रा ज्यादा रहती है।इन पर अपेक्षाकृत जोखिम कम रहती है।

In simple words: समता अंशों का मूल्य कम होता है, उन्हें वोट देने का अधिकार होता है, लाभांश सबसे आखिर में मिलता है और इनमें ज्यादा जोखिम होता है। इसके उलट, पूर्वाधिकार अंशों का मूल्य ज्यादा होता है, वोट का अधिकार कम मिलता है, लाभांश पहले मिलता है और जोखिम कम होता है।

🎯 Exam Tip: लाभांश और पूंजी वापसी में प्राथमिकता ही पूर्वाधिकार अंशों को समता अंशों से अलग करती है।

 

Question 4. अंशों एवं ऋणपत्रों में अन्तर बतलाइये।
Answer: अंशों और ऋणपत्रों में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:

अंतर का आधारअंशऋणपत्र
प्रकृतिअंश स्वामित्व कोष का हिस्सा होते हैं।ऋणपत्र उधार कोष का हिस्सा होते हैं।
स्थितिये कम्पनी के स्वामी होते हैं।ये कम्पनी के लेनदार होते हैं।
नियंत्रणइनके हाथ में कम्पनी का नियंत्रण होता है।इनका कम्पनी के कार्यों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है।
मताधिकारइनके पास मताधिकार होता है।इनको मत देने का कोई अधिकार नहीं होता है।
प्रतिफलइन्हें नियमित प्रतिफल का अधिकार नहीं होता।इन्हें नियमित ब्याज प्राप्त करने का अधिकार होता है।

In simple words: अंश स्वामित्व पूंजी का हिस्सा होते हैं और अंशधारक कंपनी के मालिक होते हैं, जिन्हें नियंत्रण और वोट का अधिकार होता है। वहीं, ऋणपत्र उधार पूंजी का हिस्सा होते हैं और ऋणपत्रधारक कंपनी के लेनदार होते हैं, जिन्हें नियंत्रण या वोट का अधिकार नहीं होता, बल्कि निश्चित ब्याज मिलता है।

🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि अंश पूंजी कंपनी के स्वामित्व को दर्शाती है जबकि ऋणपत्र बाहरी कर्ज को दिखाते हैं।

 

Question 5. पोर्टफोलियो विनियोग को समझाइये।
Answer: विदेशियों द्वारा भारतीय कंपनियों के अंशों (शेयरों) और ऋणपत्रों (डिबेंचरों) में सीधे निवेश को पोर्टफोलियो विनियोग कहते हैं। इस तरह के विदेशी निवेश का मुख्य फायदा यह है कि विदेशी निवेशक सिर्फ पैसे ही नहीं लाते, बल्कि साथ में तकनीकी ज्ञान और आधुनिक मशीनें भी लाते हैं, जिससे भारतीय उद्योगों को मदद मिलती है। हालांकि, इसका एक नुकसान यह भी है कि लाभ का बड़ा हिस्सा विदेशी निवेशक को चला जाता है।
In simple words: पोर्टफोलियो विनियोग का मतलब है जब विदेशी लोग भारतीय कंपनियों के शेयर और डिबेंचर खरीदते हैं। इससे पैसा और नई तकनीक आती है, लेकिन मुनाफे का बड़ा हिस्सा विदेशी निवेशकों को मिलता है।

🎯 Exam Tip: पोर्टफोलियो विनियोग विदेशी पूंजी जुटाने का एक तरीका है, जो देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. व्यापारिक साख एवं बैंक साख को व्यावसायिक इकाइयों के अल्पावधि वित्त के स्रोत के रूप में विस्तार से समझाइये।
Answer:
**व्यापारिक साख:**
व्यापारिक साख का मतलब है जब विक्रेता क्रेता को वस्तुएँ और सेवाएँ उधार में बेचता है। व्यावसायिक जगत में उधार माल देने की सुविधा उन व्यापारियों को मिलती है जिनका पिछला व्यवहार अच्छा रहा हो और जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो। साख की मात्रा और अवधि विक्रेता की आर्थिक स्थिति, क्रेता की साख, खरीदी गई मात्रा और बाजार में प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करती है।
**गुण:**
* यह पैसों का एक आसान और लगातार मिलने वाला स्रोत है।
* व्यापारी की साख अच्छी होने पर यह तुरंत मिल जाती है।
* इससे संगठन की बिक्री बढ़ती है।
* बिक्री के अवसरों को पूरा करने के लिए स्टॉक बढ़ाया जा सकता है।
* इसके उपयोग से व्यवसाय की संपत्तियों पर कोई बोझ नहीं आता है।
**सीमाएँ:**
* इससे ज्यादा व्यापार हो सकता है, जो जोखिम भरा होता है।
* इससे सीमित मात्रा में ही धन जुटाया जा सकता है।
* यह एक महंगा स्रोत भी हो सकता है।
**बैंक साख:**
बैंक भी व्यापारियों को कम समय के लिए वित्तीय सुविधाएँ देते हैं। ये सुविधाएँ दो तरह की होती हैं:
(a) प्रत्यक्ष साख – इसमें बैंक सीधे व्यापारियों को ऋण देता है। ऋण की मात्रा व्यापारी की वित्तीय स्थिति और साख पर निर्भर करती है। यह व्यापारियों के लिए पैसा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
(b) नकद साख – इसमें व्यापारी अपनी संपत्तियों को गिरवी रखकर एक तय सीमा तक उधार ले सकता है। बैंक साख पर ब्याज दरें बदलती रहती हैं, क्योंकि ये रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति से प्रभावित होती हैं।
**गुण:**
* बैंक समय पर पैसे दिलाने में मदद करते हैं।
* बैंक व्यवसाय की जानकारी गोपनीय रखते हैं।
* बैंकों से ऋण लेना अपेक्षाकृत आसान होता है।
* यह वित्त प्रबंधन का एक लचीला स्रोत है, जिसमें खर्च की रकम को घटाया-बढ़ाया या समय से पहले चुकाया जा सकता है।
In simple words: व्यापारिक साख तब मिलती है जब दुकानदार ग्राहक को सामान उधार देता है, यह आसान और लगातार मिलने वाला पैसा है, लेकिन इसमें जोखिम भी होता है। बैंक साख वह है जब बैंक कंपनियों को थोड़े समय के लिए पैसे देता है, जैसे सीधे कर्ज या नकदी पर कर्ज। यह पैसा मिलने में मदद करता है और जानकारी गुप्त रखता है।

🎯 Exam Tip: अल्पावधि वित्त के स्रोत व्यवसाय की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं और इनका उपयोग सही योजना के साथ करना चाहिए।

 

Question 2. आधुनिकीकरण एवं नवीनीकरण के लिये वित्तीयन के लिये बड़ी औद्योगिक इकाई किन स्रोतों से पूँजी जुटा सकती है? सविस्तार वर्णन कीजिये।
Answer: बड़ी औद्योगिक इकाइयाँ अपने आधुनिकीकरण और नवीनीकरण के लिए कई स्रोतों से पूंजी जुटा सकती हैं:
1. **अंश निर्गमन द्वारा:** कंपनी अंश जारी करके लंबी अवधि के लिए पैसा जुटा सकती है। यह दीर्घकालीन वित्त का सबसे अच्छा तरीका है। निवेशकों की सुविधा के लिए दो तरह के अंश जारी किए जा सकते हैं:
(a) **समता अंश:** ये कंपनी के मालिक कहलाते हैं और कंपनी के निर्माण से पहले इनकी जरूरत होती है। यह लंबी अवधि की पूंजी का एक मुख्य स्रोत है।
(b) **पूर्वाधिकार अंश:** इन्हें लाभांश और पूंजी वापसी में समता अंशों से पहले प्राथमिकता मिलती है।
2. **ऋणपत्रों का निर्गमन:** कंपनी ऋणपत्र जारी करके भी अपनी पूंजी की जरूरतें पूरी कर सकती है। जो लोग ऋणपत्र खरीदते हैं, उन्हें निश्चित दर पर नियमित रूप से ब्याज मिलता है।
3. **सार्वजनिक निक्षेप:** कंपनियाँ जनता से अलग-अलग समय के लिए निश्चित ब्याज दर पर जमा स्वीकार कर सकती हैं। इन जमाओं के लिए किसी संपत्ति को गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती है। यह भी वित्तीय संसाधन जुटाने का एक अच्छा तरीका है, लेकिन इसके लिए कंपनी की साख अच्छी होनी चाहिए।
4. **लाभों का पुनर्विनियोजन:** अच्छी कंपनियाँ अपना सारा लाभ शेयरधारकों में नहीं बांटतीं। वे लाभ का कुछ हिस्सा भविष्य की योजनाओं के लिए बचाकर रखती हैं। इसे संचित आय या लाभों का पुनर्विनियोजन कहते हैं। यह कंपनी के विस्तार कार्यक्रमों के लिए एक सस्ता और अच्छा वित्त स्रोत है।
5. **व्यापारिक बैंकों से ऋण:** व्यापारिक बैंक भी कंपनी के वित्त प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कंपनियों को अलग-अलग उद्देश्यों और समय के लिए ऋण देते हैं। ऐसे ऋण से कंपनी के प्रबंधन की स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ता है।
6. **संस्थागत वित्त:** आजादी के बाद, सरकार ने उद्योगों की मध्यम और लंबी अवधि की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई खास संस्थाएँ बनाई हैं, जैसे भारतीय औद्योगिक वित्त निगम और भारतीय औद्योगिक विकास बैंक।
In simple words: बड़ी कंपनियाँ अपनी मशीनों को नया करने या बदलाव लाने के लिए कई तरीकों से पैसा जुटा सकती हैं। वे शेयर बेचकर, ऋणपत्र जारी करके, लोगों से जमा लेकर, अपने बचे हुए मुनाफे का उपयोग करके, बैंकों से कर्ज लेकर, या सरकारी वित्तीय संस्थाओं से मदद लेकर पैसा प्राप्त करती हैं।

🎯 Exam Tip: आधुनिकीकरण और नवीनीकरण के लिए पूंजी जुटाने में कंपनी को अपने वित्तीय उद्देश्यों और जोखिम क्षमता के अनुसार सही स्रोत चुनने चाहिए।

 

Question. दीर्घकालीन वित्तीय स्रोतों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
Answer: दीर्घकालीन वित्तीय स्रोत पूंजी के ऐसे स्रोत हैं जो व्यवसाय की पांच साल से अधिक की जरूरतों को पूरा करते हैं। ये स्रोत निम्नलिखित प्रकार के हैं:
(1) **अंशों का निर्गमन:** कंपनियां दो प्रकार के अंश जारी करके पूंजी जुटा सकती हैं:
1. **समता अंश:** ये कंपनी के वास्तविक मालिक होते हैं और कंपनी के गठन से पहले इनकी जरूरत होती है। यह लंबी अवधि की पूंजी का मुख्य स्रोत है।
2. **पूर्वाधिकार अंश:** इन्हें लाभांश और पूंजी वापसी में समता अंशों से पहले प्राथमिकता मिलती है।
(2) **ऋणपत्रों का निर्गमन:** ऋणपत्र लंबी अवधि के वित्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ये एक निश्चित राशि के ऋण की स्वीकृति होते हैं, जिसमें कंपनी भविष्य में भुगतान का वादा करती है। ऋणपत्रधारकों को निश्चित अंतराल पर ब्याज मिलता है। ऋणपत्र कई प्रकार के होते हैं:
1. शोधनीय और अशोधनीय ऋणपत्र
2. परिवर्तनीय और अपरिवर्तनीय ऋणपत्र
3. सुरक्षित और असुरक्षित ऋणपत्र
4. पंजीकृत और वाहक ऋणपत्र
5. शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्र
(3) **संस्थागत ऋण:** देश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई वित्तीय संस्थाएं स्थापित की हैं। ये औद्योगिक संस्थाओं को लंबी अवधि का वित्त प्रदान करती हैं और नए व्यावसायिक उपक्रमों की स्थापना, विस्तार और आधुनिकीकरण में मदद करती हैं। कुछ प्रमुख संस्थाएं हैं:
1. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम
2. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक
3. भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम
4. भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक
5. भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक
6. राज्य वित्त निगम
7. राज्य औद्योगिक विकास निगम
8. भारतीय जीवन बीमा निगम
(4) **संचित आय या लाभ:** कंपनियां आमतौर पर अपनी सारी आय शेयरधारकों में लाभांश के रूप में नहीं बांटतीं। वे शुद्ध आय का एक हिस्सा व्यवसाय में भविष्य के लिए बचाकर रखती हैं। इसे संचित आय या स्व-वित्तीयकरण कहते हैं। संचित आय संगठन की पूंजी का एक स्थायी स्रोत है, जिसे प्राप्त करने के लिए कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता है।
(5) **पट्टाधि वित्त (लीज फाइनेंसिंग):** यह एक अनुबंध है जिसमें संपत्ति का मालिक अपनी संपत्ति को एक निश्चित समय के लिए किराए पर दूसरे पक्ष को देता है। संपत्ति का मालिक पट्टाकार कहलाता है और उपयोग करने वाला पट्टाधारी। यह आधुनिकीकरण और विविधीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है।
(6) **अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय स्रोत:** लंबी अवधि की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में विदेशी स्रोत भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विदेशी स्रोत निम्न प्रकार के हैं:
1. **बाह्य ऋण:** इसमें वाणिज्यिक ऋण और सेवा ऋण शामिल हैं, जो लंबी अवधि की परिपक्वता और रियायती ब्याज दरों पर मिलते हैं।
2. **विदेशी निवेश:** इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश शामिल है, जहां विदेशी भारतीय कंपनियों के अंशों और ऋणपत्रों में भागीदार होते हैं। विदेशी निवेशक तकनीकी विशेषज्ञता और आधुनिक मशीनें भी लाते हैं।
3. **अप्रवासी भारतीय:** विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी भारत में लंबी अवधि के वित्त के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जैसे अप्रवासी जमा।
In simple words: लंबी अवधि के वित्तीय स्रोतों में वे सभी तरीके आते हैं जिनसे 5 साल से ज्यादा के लिए पैसा मिलता है। इनमें शेयर बेचना, ऋणपत्र जारी करना, सरकारी संस्थाओं से कर्ज लेना, कंपनी के मुनाफे को बचाकर रखना, किराए पर संपत्ति लेकर उसका उपयोग करना और विदेशों से पैसा लेना शामिल है।

🎯 Exam Tip: दीर्घकालीन वित्तीय स्रोत कंपनी की स्थिरता और भविष्य की विकास योजनाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. प्रत्येक व्यवसाय में पूँजी/वित्त की आवश्यकता होती है –
(अ) स्थायी सम्पत्ति क्रय के लिए
(ब) दैनिक व्यय के भुगतान के लिए
(स) व्यवसाय के विकास के लिए
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (द) उपर्युक्त सभी
In simple words: हर व्यवसाय को पैसा चाहिए होता है, ताकि वह स्थायी चीजें खरीद सके, रोज के खर्चे चला सके और अपना व्यवसाय बढ़ा सके।

🎯 Exam Tip: व्यवसाय में पूंजी की आवश्यकता विभिन्न उद्देश्यों के लिए होती है, जो उसके संचालन और विकास के लिए आवश्यक हैं।

 

Question 2. अवधि के आधार पर वित्त/धन का स्रोत नहीं है –
(अ) अल्पकालीन वित्त
(ब) स्वामित्व कोष
(स) मध्यकालीन वित्त
(द) दीर्घकालीन वित्त
Answer: (ब) स्वामित्व कोष
In simple words: समय के हिसाब से पैसों के स्रोतों में अल्पकालीन, मध्यकालीन और दीर्घकालीन वित्त आते हैं, लेकिन स्वामित्व कोष एक प्रकार का वित्त है, न कि अवधि का आधार।

🎯 Exam Tip: अवधि के आधार पर वित्त का वर्गीकरण उसकी वापसी की समय-सीमा पर निर्भर करता है, जबकि स्वामित्व कोष पूंजी के स्रोत को दर्शाता है।

 

Question 3. व्यावसायिक वित्त का वह स्रोत जिसकी अवधि एक वर्ष या इससे कम होती है, वह है –
(अ) अल्पकालीन वित्त
(ब) मध्यकालीन वित्त
(स) दीर्घकालीन वित्त
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (अ) अल्पकालीन वित्त
In simple words: जिस पैसे की जरूरत एक साल या उससे कम समय के लिए होती है, उसे अल्पकालीन वित्त कहते हैं।

🎯 Exam Tip: अल्पकालीन वित्त का उपयोग आमतौर पर रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाता है।

 

Question 4. स्वामित्व कोष – जो उद्यम के स्वामियों द्वारा दिया जाता है ये स्वामी हो सकते हैं –
(अ) एकल व्यापारी
(ब) साझेदारी
(स) कम्पनी
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (द) उपर्युक्त सभी
In simple words: स्वामित्व कोष वह पैसा होता है जो व्यवसाय के मालिक लगाते हैं, और ये मालिक एकल व्यापारी, साझेदार या कंपनी हो सकते हैं।

🎯 Exam Tip: स्वामित्व कोष व्यवसाय की अपनी पूंजी होती है और विभिन्न व्यावसायिक स्वरूपों में अलग-अलग तरीकों से जुटाई जाती है।

 

Question 5. अल्पकालीन वित्त का स्रोत नहीं है –
(अ) व्यापारिक साख
(ब) बैंक साख
(स) अंशों का निर्गमन
Answer: (स) अंशों का निर्गमन
In simple words: अंश जारी करना लंबी अवधि के लिए पैसा जुटाने का एक तरीका है, न कि छोटी अवधि के लिए। व्यापारिक साख और बैंक साख छोटी अवधि के स्रोत हैं।

🎯 Exam Tip: अंशों का निर्गमन पूंजी का दीर्घकालीन स्रोत होता है, जिसका उपयोग स्थायी संपत्तियों और विस्तार के लिए किया जाता है।

 

Question 6. वाणिज्यिक बैंकों द्वारा व्यापारिक फर्मों को अल्पकालीन वित्त प्रदान करने को कहते हैं –
(अ) बैंक साख
(ब) नकद साख
(स) व्यापारिक साख
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (अ) बैंक साख
In simple words: जब बैंक व्यापारिक कंपनियों को कम समय के लिए पैसा देते हैं, तो उसे बैंक साख कहते हैं।

🎯 Exam Tip: बैंक साख में बैंक अधिविकर्ष और नकद साख जैसी सुविधाएँ शामिल होती हैं, जो व्यवसायों की अल्पकालीन जरूरतों को पूरा करती हैं।

 

Question 7. असंगठित क्षेत्रों से अल्पकालीन वित्त के स्रोत है –
(अ) सेठ - साहूकार
(ब) स्वदेशी बैंकर्स
(स) मित्र - परिजन
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (द) उपर्युक्त सभी
In simple words: असंगठित क्षेत्रों से कम समय के लिए पैसे लेने के स्रोतों में सेठ-साहूकार, अपने देश के बैंकर और दोस्त-रिश्तेदार सभी शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: असंगठित क्षेत्र के स्रोत अक्सर औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर होते हैं और उनमें ब्याज दरें अधिक हो सकती हैं।

 

Question 8. दीर्घकालीन वित्त का स्रोत नहीं है –
(अ) संस्थागत ऋण
(ब) संचित कोष
(स) वाणिज्यिक पत्र
(द) विदेशी निवेश
Answer: (स) वाणिज्यिक पत्र
In simple words: वाणिज्यिक पत्र कम समय के लिए पैसे जुटाने का तरीका है, जबकि संस्थागत ऋण, संचित कोष और विदेशी निवेश लंबे समय के लिए होते हैं।

🎯 Exam Tip: वाणिज्यिक पत्र एक अल्पकालीन असुरक्षित प्रतिज्ञा पत्र होता है जिसकी अवधि आमतौर पर 90 से 364 दिन होती है।

 

Question 9. ऐसे पूर्वाधिकार अंश जिनके भुगतान के लिये परिपक्वता की तिथि निश्चित होती है, कहलाते हैं –
(अ) शोधनीय पूर्वाधिकार
(ब) अशोधनीय पूर्वाधिकार
(स) संचयी पूर्वाधिकार
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (अ) शोधनीय पूर्वाधिकार
In simple words: जिन पूर्वाधिकार अंशों के पैसे लौटाने की एक तय तारीख होती है, उन्हें शोधनीय पूर्वाधिकार अंश कहते हैं।

🎯 Exam Tip: शोधनीय पूर्वाधिकार अंशों को एक निश्चित अवधि के बाद कंपनी द्वारा वापस खरीद लिया जाता है, जिससे उनकी देयता समाप्त हो जाती है।

 

Question 10. ऋणपत्रधारक होता है –
(अ) कम्पनी का ग्राहक
(ब) कम्पनी का लेनदार
(स) कम्पनी का स्वामी
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ब) कम्पनी का लेनदार
In simple words: ऋणपत्र खरीदने वाले व्यक्ति कंपनी को पैसे उधार देते हैं, इसलिए वे कंपनी के लेनदार कहलाते हैं।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्रधारक कंपनी के मालिक नहीं होते, बल्कि उन्हें अपने निवेश पर निश्चित ब्याज मिलता है।

 

Question 11. ऐसे ऋणपत्र जिनकी धन वापसी एक निश्चित तिथि को होती है, कहलाते हैं –
(अ) शोधनीय ऋणपत्र
(ब) अशोधनीय ऋणपत्र
(स) पंजीकृत ऋणपत्र
(द) वाहक ऋणपत्र
Answer: (अ) शोधनीय ऋणपत्र
In simple words: वे ऋणपत्र जिनके पैसे लौटाने की एक निश्चित तारीख तय होती है, उन्हें शोधनीय ऋणपत्र कहते हैं।

🎯 Exam Tip: शोधनीय ऋणपत्रों में निवेश करने वाले निवेशकों को एक तय समय पर अपनी पूंजी वापस मिल जाती है।

 

Question 12. बन्धक ऋणपत्र कहा जाता है –
(अ) असुरक्षित ऋणपत्र को
(ब) सुरक्षित ऋणपत्र को
(स) पंजीकृत ऋणपत्र को
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ब) सुरक्षित ऋणपत्र को
In simple words: जिन ऋणपत्रों के बदले कंपनी अपनी कोई संपत्ति गिरवी रखती है, उन्हें सुरक्षित या बंधक ऋणपत्र कहते हैं।

🎯 Exam Tip: सुरक्षित ऋणपत्र निवेशकों के लिए कम जोखिम वाले होते हैं क्योंकि कंपनी की संपत्ति गिरवी रखी होती है।

 

Question 13. वित्तीय संस्थाओं के कार्य हैं –
(अ) औद्योगिक संस्थाओं को वित्त प्रदान करना
(ब) उपक्रमों की स्थापना में मदद करना
(स) पिछड़े क्षेत्रों के विकास में सहायता करना
Answer:
वित्तीय संस्थाओं के मुख्य कार्य हैं:
(अ) औद्योगिक संस्थाओं को वित्त प्रदान करना,
(ब) नए उपक्रमों (कंपनियों) को स्थापित करने में मदद करना,
(स) पिछड़े क्षेत्रों के विकास में सहायता करना।
In simple words: वित्तीय संस्थाएँ उद्योगों को पैसा देती हैं, नए व्यापार शुरू करने में मदद करती हैं और पिछड़े इलाकों के विकास में भी सहायता करती हैं।

🎯 Exam Tip: वित्तीय संस्थाएँ देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, विशेषकर औद्योगिक और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने में।

 

Question 14. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1956 में
(ब) सन् 1973 में
(स) सन् 1948 में
(द) सन् 1983 में
Answer: (स) सन् 1948 में
In simple words: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम की स्थापना साल 1948 में की गई थी।

🎯 Exam Tip: यह भारत में स्थापित होने वाली पहली विकास वित्तीय संस्थाओं में से एक थी, जिसका उद्देश्य उद्योगों को लंबी अवधि का वित्त प्रदान करना था।

 

Question 15. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम का नाम भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड कर दिया गया –
(अ) जून 1993 में
(ब) जून 1973 में
(स) जून 1948 में
(द) जून 1992 में
Answer: (अ) जून 1993 में
In simple words: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम का नाम बदलकर भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड जून 1993 में किया गया था।

🎯 Exam Tip: यह नाम परिवर्तन कंपनी के स्वरूप और कानूनी पहचान में बदलाव को दर्शाता है, जो समय-समय पर होता रहता है।

 

Question 16. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम कितने वर्ष तक की अवधि तक ऋण देता है?
(अ) 5 वर्ष
(ब) 10 वर्ष
(स) 20 वर्ष
(द) 25 वर्ष
Answer: (द) 25 वर्ष
In simple words: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम अधिकतम 25 साल की अवधि तक के लिए कर्ज देता है।

🎯 Exam Tip: यह निगम बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए लंबी अवधि के वित्त की व्यवस्था करता है।

 

Question 17. भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम ICICI की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1956 में
(ब) सन् 1982 में
(स) सन् 1955 में
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (स) सन् 1955 में
In simple words: भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम, जिसे आईसीआईसीआई (ICICI) भी कहते हैं, की स्थापना 1955 में हुई थी।

🎯 Exam Tip: ICICI भारत के प्रमुख वित्तीय संस्थानों में से एक है, जिसने देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

Question 18. 3 मई, 2002 को ICICI का विलय हुआ –
(अ) भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग बैंक लिमिटेड में
(ब) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक लिमिटेड में
(स) भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बैंक में
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (अ) भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग बैंक लिमिटेड में
In simple words: 3 मई, 2002 को ICICI का विलय भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग बैंक लिमिटेड में हो गया था।

🎯 Exam Tip: यह विलय भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने ICICI को एक यूनिवर्सल बैंक के रूप में मजबूत किया।

 

Question 19. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1964 में
(ब) सन् 1956 में
(स) सन् 1997 में
(द) सन् 1973 में
Answer: (अ) सन् 1964 में
In simple words: भारतीय औद्योगिक विकास बैंक की शुरुआत 1964 में हुई थी।

🎯 Exam Tip: यह बैंक भारत में औद्योगिक वित्त को बढ़ावा देने और अन्य वित्तीय संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए स्थापित किया गया था।

 

Question 20. वह वित्तीय संस्थान जिसकी स्थापना जर्जर या बीमार ईकाइयों के पुनर्वास के लिए प्राथमिक एजेन्सी के रूप में की गई थी -
(अ) भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक
(ब) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक
(स) राज्य वित्त निगम
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (अ) भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक
In simple words: भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक को उन उद्योगों को फिर से ठीक करने के लिए बनाया गया था जो कमजोर या बीमार पड़ गए थे।

🎯 Exam Tip: यह बैंक बीमार औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने और उनकी वित्तीय समस्याओं को हल करने में मदद करता है।

 

Question 21. भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक का पुनर्गठन कर भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बैंक नाम दिया गया था –
(अ) सन् 1997 में
(ब) सन् 1985 में
(स) सन् 2004 में
Answer: भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक का पुनर्गठन करके इसे भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बैंक नाम 1997 में दिया गया था।
In simple words: भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक का नाम बदलकर भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बैंक 1997 में किया गया।

🎯 Exam Tip: पुनर्गठन का उद्देश्य बीमार औद्योगिक इकाइयों के पुनर्वास की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाना था।

 

Question 22. भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1973 में
(ब) सन् 1964 में
(स) सन् 1990 में
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (स) सन् 1990 में
In simple words: भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक की स्थापना साल 1990 में की गई थी, जो छोटे उद्योगों को सहारा देता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि SIDBI (Small Industries Development Bank of India) 1990 में स्थापित हुआ था, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के विकास को बढ़ावा देना है।

 

Question 23. राज्य वित्त निगम वित्तीय सहायता प्रदान करता है –
(अ) एकल व्यापार को
(ब) साझेदारी व्यवसाय को
(स) कम्पनी को
(द) उपरोक्त तीनों को
Answer: (द) उपरोक्त तीनों को
In simple words: राज्य वित्त निगम अकेले काम करने वाले, पार्टनरशिप वाले और कंपनियों-इन सभी तरह के व्यवसायों को पैसा देता है।

🎯 Exam Tip: वित्तीय निगम अक्सर छोटे और मध्यम उद्योगों को सहायता देते हैं, जिसमें विभिन्न कानूनी ढाँचों वाली कंपनियाँ शामिल होती हैं।

 

Question 24. भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था -
(अ) जीवन बीमा व्यवसाय
(ब) धन का निवेश
(स) ऋण प्रदान करना
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (अ) जीवन बीमा व्यवसाय
In simple words: भारतीय जीवन बीमा निगम का मुख्य काम लोगों को जीवन बीमा बेचना और इस व्यापार को आगे बढ़ाना था।

🎯 Exam Tip: LIC का प्राथमिक लक्ष्य जीवन बीमा प्रदान करना और उससे संबंधित गतिविधियों को संचालित करना है, अन्य विकल्प सहायक कार्य हो सकते हैं।

 

Question 25. भारतीय यूनिट ट्रस्ट की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1982 में
(ब) सन् 1985 में
(स) सन् 1964 में
(द) सन् 1990 में
Answer: (स) सन् 1964 में
In simple words: भारतीय यूनिट ट्रस्ट की शुरुआत साल 1964 में हुई थी ताकि लोग छोटी बचत करके भी निवेश कर सकें।

🎯 Exam Tip: भारतीय यूनिट ट्रस्ट (UTI) की स्थापना का वर्ष 1964 है, यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है।

 

Question 27. भारतीय यूनिट ट्रस्ट की स्थापना कितने करोड़ की पूँजी से की गई?
(अ) 5 करोड़
(ब) 10 करोड़
(स) 15 करोड़
(द) 20 करोड़
Answer: (अ) 5 करोड़
In simple words: भारतीय यूनिट ट्रस्ट को शुरू करने के लिए 5 करोड़ रुपये की शुरुआती पूँजी लगाई गई थी।

🎯 Exam Tip: भारतीय यूनिट ट्रस्ट जैसी संस्थाओं की प्रारंभिक पूँजी राशि अक्सर परीक्षा में पूछी जाती है।

 

Question 28. विदेशी वित्त व्यवस्था के क्षेत्र में शीर्ष संस्था मानी जाती है –
(अ) भारतीय यूनिट ट्रस्ट
(ब) भारतीय निर्यात – आयात बैंक
(स) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ब) भारतीय निर्यात – आयात बैंक
In simple words: विदेशी पैसों के लेन-देन में भारतीय निर्यात – आयात बैंक को सबसे बड़ी संस्था माना जाता है।

🎯 Exam Tip: EXIM बैंक का मुख्य कार्य निर्यात और आयात के लिए वित्त और सुविधाएँ प्रदान करना है, जिससे यह विदेशी व्यापार में प्रमुख है।

 

Question 29. भारतीय निर्यात – आयात बैंक की स्थापना हुई थी –
(अ) सन् 1956 में
(ब) सन् 1973 में
(स) सन् 1982 में
(द) इनमें से कोई नहीं
Answer: (स) सन् 1982 में
In simple words: भारतीय निर्यात – आयात बैंक की शुरुआत साल 1982 में हुई थी।

🎯 Exam Tip: EXIM बैंक की स्थापना का वर्ष 1982 है, जो विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।

 

Question 30. अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय स्रोत है –
(अ) अन्तर्राष्ट्रीय कोष
(ब) एशियन विकास बैंक
(स) विश्व बैंक
(द) उपर्युक्त सभी
Answer: (द) उपर्युक्त सभी
In simple words: अंतर्राष्ट्रीय कोष, एशियन विकास बैंक और विश्व बैंक सभी अंतर्राष्ट्रीय पैसे के स्रोत हैं जो देशों को मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय स्रोतों में आमतौर पर वैश्विक और क्षेत्रीय वित्तीय संस्थान दोनों शामिल होते हैं जो विभिन्न देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. व्यावसायिक वित्त किसे कहते है?
Answer: व्यावसायिक वित्त वह आवश्यक धन है जो किसी व्यवसाय के लक्ष्यों को पूरा करने और उसे चलाने के लिए चाहिए होता है। इसमें इस पैसे को जुटाने के सभी तरीके शामिल होते हैं।
In simple words: व्यवसाय चलाने और उसके काम पूरे करने के लिए जो पैसा चाहिए होता है, उसे व्यावसायिक वित्त कहते हैं।

🎯 Exam Tip: व्यावसायिक वित्त की परिभाषा में 'आवश्यक धन' और 'धन प्राप्त करने के तरीके' दोनों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. वित्तीय स्रोतों के वर्गीकरण के विभिन्न आधार कौन – कौन से है?
Answer: वित्तीय स्रोतों को वर्गीकृत करने के मुख्य आधार ये हैं:
• अवधि के आधार पर (जैसे अल्पकालीन, मध्यकालीन, दीर्घकालीन)
• स्वामित्व के आधार पर (जैसे स्वामी कोष, ऋण कोष)
• स्रोत के आधार पर (जैसे आंतरिक स्रोत, बाह्य स्रोत)
In simple words: पैसे के स्रोतों को बांटने के लिए हम देखते हैं कि पैसा कितने समय के लिए है, किसका पैसा है और वह कहाँ से आया है।

🎯 Exam Tip: वित्तीय स्रोतों के वर्गीकरण के तीनों मुख्य आधारों - अवधि, स्वामित्व और स्रोत - को याद रखना और उनका संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. स्वामित्व के आधार पर वित्त स्रोतों के प्रकार लिखिए।
Answer: स्वामित्व के आधार पर वित्तीय स्रोतों के दो मुख्य प्रकार हैं:
• स्वामित्व कोष (जो मालिकों का अपना पैसा होता है)
• ऋणात्मक कोष (जो उधार लिया गया पैसा होता है)
In simple words: पैसों के स्रोत को मालिकाना हक के हिसाब से दो तरह से बांटा जा सकता है - एक जो मालिक का अपना पैसा हो, और दूसरा जो उधार लिया गया हो।

🎯 Exam Tip: स्वामित्व कोष और ऋण कोष के बीच का अंतर स्पष्ट करें, क्योंकि यह वित्तीय संरचना का एक मूल सिद्धांत है।

 

Question 5. वित्त के बाहय स्रोतों से क्या आशय है?
Answer: बाहरी स्रोत वे होते हैं जहाँ से संगठन को पैसा बाहर से मिलता है। इन पैसों को जुटाने के लिए अक्सर अपनी कुछ संपत्तियों को गिरवी रखना पड़ता है। उदाहरण के लिए, वित्तीय संस्थाओं या वाणिज्यिक बैंकों से लोन लेना।
In simple words: बाहर से पैसा लेना, जैसे बैंक से लोन, जहाँ अक्सर कुछ गिरवी रखना पड़ता है, उसे बाहरी वित्तीय स्रोत कहते हैं।

🎯 Exam Tip: बाह्य स्रोतों में धन प्राप्त करने के लिए अक्सर सुरक्षा या गिरवी रखने की आवश्यकता होती है, जो इसे आंतरिक स्रोतों से अलग करता है।

 

Question 6. व्यापारिक साख से आप क्या समझते है?
Answer: व्यापारिक साख का मतलब है जब एक व्यापारी दूसरे व्यापारी को सामान या सेवाएँ उधार पर बेचता है। इसमें तुरंत पैसे देने के बजाय बाद में भुगतान किया जाता है।
In simple words: व्यापारिक साख का मतलब है जब दुकानदार एक-दूसरे को सामान उधार पर देते हैं।

🎯 Exam Tip: व्यापारिक साख 'खरीदने और बेचने' के बीच की एक सुविधा है, जहाँ भुगतान तत्काल नहीं होता है।

 

Question 7. बैंक साख क्या है?
Answer: वाणिज्यिक बैंक जब व्यावसायिक फर्मों को थोड़े समय के लिए पैसा देते हैं, तो उसे बैंक साख कहते हैं। यह कंपनियों को काम चलाने के लिए जरूरी पैसे उपलब्ध कराता है।
In simple words: बैंक जब कंपनियों को कम समय के लिए पैसा देते हैं, तो उसे बैंक साख कहते हैं।

🎯 Exam Tip: बैंक साख अल्पकालीन वित्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और अक्सर 'वर्किंग कैपिटल' की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

 

Question 8. बैंक अधिविकर्ष की सुविधा किस प्रकार के खाताधारक को प्रदान की जाती है?
Answer: बैंक अधिविकर्ष (ओवरड्राफ्ट) की सुविधा केवल चालू खाताधारकों को दी जाती है। यह उन्हें उनके खाते में जमा राशि से अधिक पैसे निकालने की अनुमति देता है।
In simple words: बैंक ओवरड्राफ्ट की सुविधा सिर्फ उन्हीं को मिलती है जिनका करेंट अकाउंट होता है।

🎯 Exam Tip: अधिविकर्ष सुविधा चालू खाताधारकों के लिए है, न कि बचत खाताधारकों के लिए, यह अंतर याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. ग्राहकों से अग्रिम से आपका क्या आशय है?
Answer: कभी-कभी एक व्यापारी अपने ग्राहकों से उनके सामान के ऑर्डर की कुल कीमत के बराबर कुछ पैसा पहले ही मांग लेता है, इसे ग्राहकों से अग्रिम कहते हैं।
In simple words: जब कोई दुकानदार ग्राहक से सामान बनाने या ऑर्डर के लिए पहले ही कुछ पैसा ले लेता है, तो उसे एडवांस कहते हैं।

🎯 Exam Tip: अग्रिम भुगतान अक्सर तब माँगा जाता है जब ऑर्डर बड़ा हो या विक्रेता ग्राहक की साख को लेकर थोड़ा अनिश्चित हो।

 

Question 10. अंसगठित क्षेत्रों से अल्पकालीन स्रोतों के दो साधन बताइये।
Answer:

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में, आपको असंगठित क्षेत्र से जुड़े किन्हीं दो सामान्य ऋण स्रोतों का उल्लेख करना होगा, जैसे साहूकार या रिश्तेदार।

 

Question 11. सार्वजनिक जमायें किस प्रकार की वित्तीय आवश्यकताओं के लिए उपयोगी मानी जाती है?
Answer: सार्वजनिक जमाएँ मध्यम और कम समय की वित्तीय जरूरतों के लिए उपयोगी मानी जाती हैं। ये कंपनियाँ जनता से सीधा पैसा इकट्ठा करती हैं।
In simple words: लोगों से जमा किया गया पैसा थोड़े और मझोले समय के लिए काम आता है।

🎯 Exam Tip: सार्वजनिक जमाएँ दीर्घकालीन आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं क्योंकि उनकी परिपक्वता अवधि सीमित होती है।

 

Question 12. नकद साख एवं बैंक अधिविकर्ष में एक अन्तर बताइये।
Answer: नकद साख में, बैंक ऋण की राशि के लिए एक अलग खाता खोलता है। जबकि बैंक अधिविकर्ष में, चालू खाताधारक को अलग से कोई नया खाता खोलने की ज़रूरत नहीं होती, वह अपने मौजूदा खाते से ही अधिक पैसे निकाल सकता है।
In simple words: कैश क्रेडिट में नया लोन अकाउंट खुलता है, जबकि ओवरड्राफ्ट में पुराने अकाउंट से ही ज्यादा पैसा निकाला जा सकता है।

🎯 Exam Tip: नकद साख और बैंक अधिविकर्ष दोनों अल्पकालीन वित्त के स्रोत हैं, लेकिन उनके संचालन और खाता खोलने की प्रक्रिया में अंतर होता है।

 

Question 13. किन्हीं दो दीर्घकालीन वित्तीय स्रोतों के नाम बताइये।
Answer: दीर्घकालीन वित्तीय स्रोतों के दो उदाहरण हैं:
• अंशों का निर्गमन (शेयर जारी करना)
• ऋणपत्रों का निर्गमन (डिबेंचर जारी करना)
In simple words: लंबे समय के लिए पैसा जुटाने के दो तरीके हैं- शेयर बेचना और डिबेंचर बेचना।

🎯 Exam Tip: दीर्घकालीन स्रोत वे होते हैं जो पाँच वर्ष से अधिक की अवधि के लिए वित्त प्रदान करते हैं।

 

Question 14. अंश पूँजी क्या है?
Answer: अंश पूँजी वह पैसा है जो कोई कंपनी शेयर जारी करके लोगों से जुटाती है। यह कंपनी की कुल पूँजी का हिस्सा होता है।
In simple words: शेयर बेचकर जो पैसा कंपनी इकट्ठा करती है, उसे शेयर पूँजी कहते हैं।

🎯 Exam Tip: अंश पूँजी कंपनी के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करती है और यह कंपनी की दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

 

Question 15. अंश कितने प्रकार के होते हैं?
Answer: आमतौर पर अंश दो प्रकार के होते हैं:
• समता अंश (इक्विटी शेयर)
• पूर्वाधिकार अंश (प्रेफरेंस शेयर)
In simple words: शेयर दो तरह के होते हैं - इक्विटी शेयर और प्रेफरेंस शेयर।

🎯 Exam Tip: इन दोनों प्रकार के शेयरों के बीच के मुख्य अंतरों को समझें, जैसे लाभांश और मतदान के अधिकार।

 

Question 17. समता अंशों के दो दोष बताइये।
Answer: समता अंशों के दो मुख्य दोष ये हैं:
• समता अंशधारकों को बहुत ज्यादा जोखिम उठानी पड़ती है, क्योंकि उन्हें कंपनी के मुनाफे में सबसे आखिर में हिस्सा मिलता है।
• समता अंशों पर बहुत अधिक सट्टेबाजी होती है, जिससे उनके दाम में तेजी से उतार-चढ़ाव आ सकता है।
In simple words: इक्विटी शेयर खरीदने वालों को ज्यादा खतरा उठाना पड़ता है, और इन शेयरों पर बहुत सट्टा लगता है।

🎯 Exam Tip: समता अंशों में उच्च जोखिम और सट्टेबाजी की प्रवृत्ति इसके प्रमुख दोष हैं, क्योंकि इनका प्रतिफल अनिश्चित होता है।

 

Question 18. परिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश किसे कहते हैं?
Answer: परिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश वे होते हैं जिन्हें एक खास समय के बाद इक्विटी शेयर में बदला जा सकता है। यह शेयरधारकों को भविष्य में कंपनी के विकास में हिस्सा लेने का मौका देते हैं।
In simple words: ऐसे प्रेफरेंस शेयर जिन्हें कुछ समय बाद इक्विटी शेयर में बदला जा सके, उन्हें परिवर्तनीय प्रेफरेंस शेयर कहते हैं।

🎯 Exam Tip: परिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश निवेशकों को सुरक्षा (निश्चित लाभांश) और विकास (इक्विटी में बदलने का अवसर) दोनों प्रदान करते हैं।

 

Question 19. ऋणपत्र से क्या आशय है?
Answer: ऋणपत्र उधार पूँजी का एक बहुत आम तरीका है। इन्हें कर्जदारी की प्रतिभूति भी कहते हैं। कंपनी जब ऋणपत्र जारी करती है, तो वह लंबे समय के लिए कर्ज लेती है, जिसका भुगतान भविष्य में करना होता है।
In simple words: ऋणपत्र एक तरह का कर्ज है जो कंपनी लंबे समय के लिए लोगों से लेती है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्र एक ऋण साधन है, जिसमें कंपनी ब्याज का भुगतान करने और निश्चित अवधि पर मूलधन लौटाने का वादा करती है।

 

Question 20. ऋणपत्र के दो गुणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: ऋणपत्र के दो मुख्य गुण ये हैं:
• यह कम जोखिम और स्थिर कमाई के लिए निवेशकों की पहली पसंद होते हैं, क्योंकि इन पर तय ब्याज मिलता है।
• ऋणपत्र जारी करना कंपनी के लिए शेयर जारी करने के मुकाबले सस्ता होता है।
In simple words: डिबेंचर में जोखिम कम होता है और उन पर तय कमाई मिलती है, साथ ही इन्हें जारी करना सस्ता पड़ता है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्र निवेशकों के लिए आय की स्थिरता प्रदान करते हैं और कंपनी के लिए कम लागत वाले वित्तपोषण का एक अच्छा विकल्प हैं।

 

Question 21. स्थाई ऋण किस प्रकार के ऋणपत्रों को कहा जाता है?
Answer: अशोधनीय ऋणपत्रों को स्थाई ऋण कहा जाता है। ये ऋणपत्र ऐसे होते हैं जिनका भुगतान कंपनी के जीवनकाल में नहीं किया जाता, बल्कि केवल कंपनी के बंद होने पर ही वापस किया जाता है।
In simple words: जो डिबेंचर कंपनी के बंद होने पर ही वापस किए जाते हैं, उन्हें स्थाई ऋण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: अशोधनीय ऋणपत्र वे होते हैं जिनका भुगतान कंपनी के परिसमापन पर ही होता है, इसलिए इन्हें 'स्थाई' ऋण कहते हैं।

 

Question 23. शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्र किसे कहते हैं?
Answer: शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्र वे होते हैं जिन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता है। निवेशक की कमाई ऋणपत्र के अंकित मूल्य और खरीद मूल्य के अंतर से होती है।
In simple words: जिन डिबेंचर पर कोई ब्याज नहीं मिलता, उन्हें जीरो कूपन डिबेंचर कहते हैं; निवेशक को फायदा खरीद और वापसी मूल्य के अंतर से होता है।

🎯 Exam Tip: शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्रों में निवेशक को ब्याज नहीं मिलता, बल्कि उन्हें अंकित मूल्य से कम पर जारी किया जाता है और अंकित मूल्य पर ही भुनाया जाता है।

 

Question 24. संस्थागत वित्त क्या है?
Answer: संस्थागत वित्त का मतलब है वित्तीय संस्थाओं से पैसा उधार लेना। ये संस्थाएँ, जो सरकार द्वारा स्थापित की जाती हैं, व्यावसायिक संस्थाओं को लंबे समय के लिए पैसा देती हैं।
In simple words: जब कंपनियां सरकारी वित्तीय संस्थाओं से पैसा उधार लेती हैं, तो उसे संस्थागत वित्त कहते हैं।

🎯 Exam Tip: संस्थागत वित्त दीर्घकालीन आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण है और यह अक्सर सरकारी समर्थन वाली संस्थाओं द्वारा प्रदान किया जाता है।

 

Question 25. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम की स्थापना किस वर्ष की गयी थी?
Answer: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI) की स्थापना सन् 1948 में की गई थी। यह भारत में स्थापित पहली विकास वित्तीय संस्था थी।
In simple words: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम साल 1948 में बना था।

🎯 Exam Tip: IFCI की स्थापना का वर्ष 1948 है, जो स्वतंत्रता के बाद भारत के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक प्रारंभिक पहल थी।

 

Question 26. भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक की स्थापना क्यों की गई?
Answer: भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक की स्थापना खराब या बीमार इकाइयों को फिर से ठीक करने के लिए एक मुख्य एजेंसी के रूप में की गई थी। इसे भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक भी कहा जाता है।
In simple words: भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक को इसलिए बनाया गया ताकि वह बीमार या बंद पड़ी फैक्टरियों को फिर से चलाने में मदद कर सके।

🎯 Exam Tip: इस बैंक का मुख्य उद्देश्य बीमार औद्योगिक इकाइयों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण करना है, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 27. भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना कब की गई थी?
Answer: भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की स्थापना सन् 1956 में की गई थी। यह भारत में जीवन बीमा के राष्ट्रीयकरण के बाद अस्तित्व में आया।
In simple words: भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना साल 1956 में हुई थी।

🎯 Exam Tip: LIC भारत में बीमा क्षेत्र की एक प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है, जिसका स्थापना वर्ष 1956 है।

 

Question 28. भारतीय यूनिट ट्रस्ट की पूँजी किन वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रदान की गयी है?
Answer:

🎯 Exam Tip: भारतीय यूनिट ट्रस्ट (UTI) की प्रारंभिक पूँजी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और अन्य प्रमुख बैंकों द्वारा प्रदान की गई थी।

 

Question 30. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश से क्या तात्पर्य है?
Answer: विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का मतलब है जब विदेशी लोग भारतीय कंपनियों के शेयर या डिबेंचर में सीधे पैसा लगाते हैं। इसे पोर्टफोलियो निवेश भी कहते हैं, जहाँ निवेशक सीधे उत्पादन और प्रबंधन में शामिल नहीं होते हैं।
In simple words: जब विदेशी लोग भारतीय कंपनियों के शेयर या कर्ज में सीधे पैसा लगाते हैं, तो उसे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश कहते हैं।

🎯 Exam Tip: विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FPI) में प्रत्यक्ष स्वामित्व या नियंत्रण के बजाय वित्तीय निवेश पर जोर दिया जाता है।

 

Question 31. भारत सरकार ने विदेशी निवेश को 34 उद्योगों में उनकी समता पूँजी में कितने प्रतिशत की भागीदारी के लिये स्वीकृति प्रदान की है?
Answer: भारत सरकार ने 34 उद्योगों में विदेशी निवेश को उनकी इक्विटी पूँजी में 51% तक की भागीदारी के लिए मंजूरी दी है। यह नीति विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए लाई गई थी।
In simple words: भारत सरकार ने 34 उद्योगों में विदेशी कंपनियों को 51% तक इक्विटी में निवेश करने की इजाजत दी है।

🎯 Exam Tip: विदेशी निवेश की प्रतिशत सीमाएँ अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग होती हैं, यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय है।

 

Question 32. अप्रवासी भारतीय किसे कहते है?
Answer: अप्रवासी भारतीय वे लोग हैं जो भारतीय मूल के हैं लेकिन विदेशों में रहते हैं। ये लोग भारत में निवेश करके देश के विकास में योगदान देते हैं।
In simple words: जो लोग भारतीय मूल के हैं पर दूसरे देशों में रहते हैं, उन्हें अप्रवासी भारतीय कहते हैं।

🎯 Exam Tip: अप्रवासी भारतीय (NRI) को अक्सर उनकी आर्थिक और सामाजिक पहचान के आधार पर परिभाषित किया जाता है, जिसमें उनकी विदेशी निवास स्थिति महत्वपूर्ण होती है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 लघु उत्तरीय प्रश्न (SA – I)

 

Question 1. व्यवसाय वित्त किसे कहते है? व्यवसाय के लिये कोषों की आवश्यकता क्यों होती है? समझाइये।
Answer: व्यवसाय वित्त का आशय:
व्यवसाय की स्थापना और उसके संचालन के लिए ज़रूरी पैसे को व्यावसायिक वित्त कहते हैं। यह किसी भी व्यापार की रीढ़ होता है।
व्यवसाय के लिए कोषों की आवश्यकता:
किसी भी व्यवसाय को इन मुख्य कामों के लिए पैसे की ज़रूरत होती है –
1. एक व्यवसाय शुरू करने के लिए, स्थायी संपत्तियाँ खरीदने और रोज़मर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए पैसे चाहिए होते हैं।
2. व्यवसाय के विस्तार या आधुनिकीकरण के लिए भी बड़े पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है।
In simple words: व्यवसाय वित्त व्यापार चलाने के लिए ज़रूरी पैसा है। यह इसलिए चाहिए होता है ताकि नई चीजें खरीदी जा सकें, रोज़ के खर्चे पूरे हों और व्यापार बढ़ सके।

🎯 Exam Tip: व्यावसायिक वित्त की परिभाषा के साथ-साथ, धन की आवश्यकता के मुख्य कारणों (जैसे स्थापना, संचालन, विस्तार) का उल्लेख करना सुनिश्चित करें।

 

Question 2. कोष जुटाने के आन्तरिक एवं बाह्य स्रोतों में क्या अन्तर है? समझाइये।
Answer: कोष जुटाने के आंतरिक और बाह्य स्रोतों में अंतर निम्नलिखित है:

अंतर का आधारआंतरिक स्रोतबाह्य स्रोत
निर्माणआंतरिक स्रोतों से पैसा व्यवसाय के अंदर से ही आता है, जैसे मुनाफे को फिर से लगाना या अतिरिक्त सामान बेचना।बाहरी स्रोतों से पैसा संगठन के बाहर से आता है। इसे जुटाने के लिए कभी-कभी अपनी संपत्तियों को गिरवी रखना पड़ता है, जैसे सप्लायर, कर्जदाता या निवेशक।
वित्त व्यवस्थाइसकी व्यवस्था व्यवसाय का मालिक खुद करता है।इसकी व्यवस्था मालिक की इच्छा पर बाहर से होती है।
सीमितताआंतरिक स्रोतों से व्यवसाय की छोटी और कम समय की वित्तीय ज़रूरतें पूरी होती हैं।बाहरी स्रोत व्यवसाय की बड़ी और लंबे समय की वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करते हैं।

In simple words: आंतरिक स्रोत कंपनी के अंदर से पैसा जुटाते हैं, जैसे बचा हुआ लाभ, जबकि बाहरी स्रोत बाहर से पैसा लेते हैं, जैसे बैंक से लोन या शेयर बेचना।

🎯 Exam Tip: आंतरिक और बाह्य स्रोतों के बीच मुख्य अंतर उनकी उत्पत्ति (अंदर बनाम बाहर), नियंत्रण, और उनकी क्षमता (छोटी बनाम बड़ी ज़रूरतों) में निहित है।

 

Question 3. बैंक साख किसे कहते हैं? इसके विभिन्न प्रकार बताइये।
Answer: बैंक साख का अर्थ है जब वाणिज्यिक बैंक व्यावसायिक फर्मों को थोड़े समय के लिए पैसा देते हैं। इसमें एक तय समझौते के अनुसार बैंक द्वारा ग्राहक के खाते में एक राशि जमा कर दी जाती है जिसका उपयोग व्यापारी अपनी ज़रूरत के हिसाब से करता रहता है।
बैंक साख के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं:
• ऋण एवं अग्रिम: सीधे ऋण और अग्रिम भुगतान।
• नकद साख: नकद क्रेडिट सुविधा।
• बैंक अधिविकर्ष: ओवरड्राफ्ट सुविधा।
• प्राप्य विपत्रों को बट्टे पर भुगतान: बिलों को भुनाना।
In simple words: बैंक साख वह पैसा है जो बैंक कंपनियों को कम समय के लिए देता है। इसमें लोन, कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट और बिल भुनाना शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: बैंक साख के प्रकारों में ऋण और अग्रिम, नकद साख, बैंक अधिविकर्ष और प्राप्य विपत्रों को बट्टे पर भुगतान शामिल हैं, जो अल्पकालीन वित्त के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

 

Question 4. नकंद साख क्या है?
Answer: नकद साख व्यावसायिक बैंकों द्वारा ऋण देने का एक मुख्य तरीका है। इसमें बैंक किसी संपत्ति को गिरवी रखने के बदले में अपने ग्राहकों को एक तय सीमा तक पैसा निकालने की अनुमति देता है। यह एक चालू खाता होता है जिसमें ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार पैसा निकाल और जमा कर सकता है।
In simple words: कैश क्रेडिट में बैंक आपकी संपत्ति गिरवी रखकर आपको एक तय लिमिट तक पैसे निकालने की सुविधा देता है, जिसे आप अपनी ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: नकद साख एक अल्पकालीन वित्तपोषण विधि है जहाँ ऋणदाता द्वारा निर्धारित सीमा तक धन निकाला जा सकता है, और ब्याज केवल निकाली गई राशि पर लगता है।

 

Question 6. ग्राहकों से अग्रिम से आप क्या समझते है?
Answer: ग्राहकों से अग्रिम प्राप्त करना अल्पकालीन वित्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें कभी-कभी व्यापारी अपने ग्राहकों से उनके ऑर्डर किए गए सामान की कीमत के बराबर अग्रिम राशि की माँग करता है। यह माँग तब की जाती है जब सामान का ऑर्डर बड़ा हो, या ऑर्डर किया गया सामान बहुत महंगा हो, या ग्राहक पर कम विश्वास हो, या वह नया ग्राहक हो।
In simple words: ग्राहकों से एडवांस लेना एक छोटा लोन होता है, जब व्यापारी बड़े या महंगे ऑर्डर के लिए, या नए ग्राहक से, कुल कीमत का कुछ हिस्सा पहले ही मांगता है।

🎯 Exam Tip: अग्रिम राशि अक्सर उन स्थितियों में मांगी जाती है जहाँ आपूर्ति की जाने वाली वस्तुओं का मूल्य अधिक होता है या ग्राहक की साख स्थापित नहीं होती है।

 

Question 7. अल्पकालीन वित्त स्रोतों में असंगठित क्षेत्रों को समझाइये।
Answer: असंगठित क्षेत्र में अल्पकालीन वित्त के स्रोत सेठ-साहूकार, स्वदेशी बैंकर और मित्र-परिजन जैसे लोग आते हैं। इस क्षेत्र में व्यक्तियों को उनकी निजी ज़मानत या चल-अचल संपत्तियों को गिरवी रखकर ऋण दिया जाता है। असंगठित क्षेत्रों से मिले ऋण पर ब्याज दर अक्सर बहुत ज्यादा होती है।
In simple words: अनौपचारिक क्षेत्र में, लोग सेठ, साहूकार या दोस्तों से थोड़े समय के लिए पैसे उधार लेते हैं, और इसके बदले में ब्याज बहुत ज्यादा होता है।

🎯 Exam Tip: असंगठित क्षेत्र के स्रोत अक्सर अनौपचारिक होते हैं, उनमें नियामक निगरानी की कमी होती है, और वे आमतौर पर उच्च ब्याज दरें वसूलते हैं।

 

Question 8. सार्वजनिक जमा से आप क्या समझते हैं?
Answer: जब कोई वित्तीय संस्थान अपनी छोटी और मध्यम अवधि की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जनता से पैसा जमा करवाता है, तो उसे सार्वजनिक जमा कहते हैं। इन जमाओं के बदले ब्याज का भुगतान किया जाता है। इससे जमाकर्ताओं को बैंक से कम ब्याज पर ऋण मिल जाता है और जमा कराने वालों को बैंक ब्याज से अधिक ब्याज मिलता है। व्यावसायिक संस्थान ऐसी जमा प्राप्ति के प्रमाण के रूप में जमा रसीद देते हैं।
In simple words: कंपनियां अपनी छोटी और मध्यम ज़रूरतों के लिए लोगों से पैसा जमा करवाती हैं, जिस पर ब्याज मिलता है, इसे सार्वजनिक जमा कहते हैं।

🎯 Exam Tip: सार्वजनिक जमाएँ सीधे जनता से धन जुटाने का एक तरीका है, जो अक्सर बैंकों की तुलना में उच्च ब्याज दरें प्रदान करती हैं लेकिन इनमें जोखिम भी हो सकता है।

 

Question 9. वाणिज्यिक पत्र क्या है? समझाइये।
Answer: वाणिज्यिक पत्र एक अच्छी साख वाली फर्म द्वारा जारी किया जाता है और इसका नियमन भारतीय रिज़र्व बैंक के दायरे में आता है। यह एक असुरक्षित, थोड़े समय के लिए जारी किया जाने वाला प्रतिज्ञा पत्र होता है जो धन जुटाने के लिए उपयोग किया जाता है।
In simple words: कमर्शियल पेपर एक भरोसेमंद कंपनी द्वारा जारी किया गया छोटा लोन है, जिस पर RBI निगरानी रखता है।

🎯 Exam Tip: वाणिज्यिक पत्र एक असुरक्षित ऋण साधन है, जिसका उपयोग बड़े निगमों द्वारा अल्पकालिक वित्तपोषण के लिए किया जाता है।

 

Question 10. छोटे एवं बड़े व्यवसाय संगठनों तथा संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों के दीर्घकालीन वित्तीय स्रोत कौन – कौन से होते हैं?
Answer: छोटे व्यावसायिक संगठनों में लंबे समय के लिए पैसा अक्सर उनके मालिकों द्वारा लगाया जाता है। बड़े व्यावसायिक संगठनों और संयुक्त पूँजी वाली कंपनियों के लिए, सामान्यतः निम्नलिखित स्रोतों का उपयोग किया जाता है:
1. अंशों का निर्गमन।
2. ऋणपत्रों का निर्गमन।
3. संस्थागत ऋण।
4. संचित कोष।
5. पट्टे पर वित्तीयन।
6. विदेशी निवेश।
In simple words: छोटे व्यवसाय के लिए मालिक खुद पैसा लगाते हैं। बड़े व्यवसाय शेयर, डिबेंचर, लोन, जमा पूंजी, लीज फाइनेंस और विदेशी निवेश जैसे तरीकों से लंबा पैसा जुटाते हैं।

🎯 Exam Tip: दीर्घकालीन वित्त के स्रोतों में आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के विकल्प शामिल होते हैं, जिनमें अंश, ऋणपत्र और संस्थागत ऋण प्रमुख हैं।

 

Question 11. समता अंश किसे कहते हैं?
Answer: समता अंश वे शेयर होते हैं जिनके धारकों को लाभांश के भुगतान या पूँजी की वापसी में कोई प्राथमिकता नहीं मिलती है। समता अंशधारकों को लाभांश का भुगतान पूर्वाधिकार अंशधारकों को भुगतान करने के बाद बचे हुए लाभ में से मिलता है। इन अंशधारकों के लिए लाभांश की कोई निश्चित दर नहीं होती है; यह उपलब्ध लाभ पर निर्भर करती है। समता अंशधारक कंपनी के मालिक माने जाते हैं।
In simple words: इक्विटी शेयर वो होते हैं जिन्हें लाभांश या पैसा वापस पाने में कोई खास अधिकार नहीं मिलता। इन्हें सबसे बाद में बचा हुआ लाभ मिलता है और ये कंपनी के असली मालिक होते हैं।

🎯 Exam Tip: समता अंशधारकों को कंपनी का वास्तविक स्वामी माना जाता है, जिनके पास मतदान का अधिकार होता है लेकिन लाभांश और पूँजी वापसी में कोई वरीयता नहीं मिलती है।

 

Question 12. पूर्वाधिकार अंश क्या है? इसके कितने प्रकार हो सकते हैं?
Answer: पूर्वाधिकार अंश वे शेयर होते हैं जिनके धारकों को कंपनी के लाभ में से अन्य अंशधारकों की तुलना में एक निश्चित दर से लाभांश सबसे पहले पाने का अधिकार होता है। साथ ही, कंपनी बंद होने पर इन अंशधारकों को अपनी पूँजी सबसे पहले वापस लेने का अधिकार भी होता है।
पूर्वाधिकार अंशों के मुख्य प्रकार ये हो सकते हैं:
1. परिवर्तनीय और अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश।
2. संचयी तथा असंचयी पूर्वाधिकार अंश।
3. भागीदार व गैर-भागीदार पूर्वाधिकार अंश।
4. शोधनीय एवं अशोधनीय पूर्वाधिकार अंश।
इसके अतिरिक्त, पूर्वाधिकार अंशधारकों को ये अधिकार भी होते हैं:
1. कंपनी के शुद्ध लाभ में से इक्विटी शेयरधारकों को लाभांश घोषित करने से पहले एक निश्चित दर से लाभांश प्राप्त करना उनका पहला अधिकार है।
2. कंपनी के बंद होने पर, कंपनी के कर्जदारों के दावों का निपटारा होने के बाद पूँजी वापसी में पूर्वाधिकार अंशधारकों को इक्विटी शेयरधारकों की तुलना में पहले पैसा मिलता है।
In simple words: प्रेफरेंस शेयर वो होते हैं जिन्हें लाभांश और पूंजी वापस पाने में सबसे पहले अधिकार मिलता है। इनके कई प्रकार होते हैं जैसे बदलने वाले, जमा होने वाले या वापस मिलने वाले शेयर।

🎯 Exam Tip: पूर्वाधिकार अंशधारकों को लाभांश और पूँजी वापसी में प्राथमिकता मिलती है, और उनके विभिन्न प्रकारों की विशेषताओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 14. शोधनीय एवं अशोधनीय अंश क्या है?
Answer: शोधनीय पूर्वाधिकार अंश वे शेयर होते हैं जिनकी वापसी के लिए एक तय तारीख होती है, यानी एक निश्चित समय के बाद कंपनी इन शेयरों का पैसा वापस कर देती है। जबकि, अशोधनीय पूर्वाधिकार अंश वे होते हैं जिनका पैसा कंपनी के बंद होने के समय ही वापस किया जाता है, इनकी कोई तय वापसी तारीख नहीं होती है।
In simple words: जो प्रेफरेंस शेयर एक तय समय पर वापस हो जाते हैं, वे शोधनीय शेयर हैं। जो प्रेफरेंस शेयर तभी वापस होते हैं जब कंपनी बंद हो जाए, वे अशोधनीय शेयर हैं।

🎯 Exam Tip: शोधनीय अंशों की एक निश्चित परिपक्वता अवधि होती है, जबकि अशोधनीय अंशों का भुगतान केवल कंपनी के परिसमापन पर होता है।

 

Question 15. परिवर्तनीय एवं अपरिवर्तनीय ऋणपत्रों को समझाइये हैं।
Answer: परिवर्तनीय ऋणपत्र वे होते हैं जिनके धारकों को एक निश्चित समय के बाद अपने ऋणपत्रों को कंपनी के शेयर में बदलने का विकल्प मिलता है। वहीं, अपरिवर्तनीय ऋणपत्र वे होते हैं जिनके धारकों को ऐसा कोई विकल्प नहीं मिलता है; ये ऋणपत्र अपनी पूरी अवधि तक ऋणपत्र ही रहते हैं।
In simple words: बदलने वाले डिबेंचर को शेयर में बदला जा सकता है, जबकि नहीं बदलने वाले डिबेंचर हमेशा डिबेंचर ही रहते हैं।

🎯 Exam Tip: परिवर्तनीय ऋणपत्रों में इक्विटी में बदलने का विकल्प होता है, जो निवेशकों को लाभ और विकास दोनों का अवसर देता है।

 

Question 16. शून्य प्रतिशत व्याज ऋणपत्र किसे कहते हैं?
Answer: शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्र वे होते हैं जिन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता है। इनमें निवेशक की कमाई ऋणपत्र के अंकित मूल्य और खरीद मूल्य के अंतर से होती है। ये ऋणपत्र अंकित मूल्य से कम पर जारी किए जाते हैं और अंकित मूल्य पर ही भुनाए जाते हैं। हाल के वर्षों में कई प्रतिष्ठित कंपनियों द्वारा इनका चलन बढ़ा है।
In simple words: जिन डिबेंचर पर ब्याज नहीं मिलता, उन्हें शून्य ब्याज डिबेंचर कहते हैं। इनमें निवेशक को फायदा खरीदने और बेचने की कीमत के फर्क से होता है।

🎯 Exam Tip: शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्रों को 'जीरो कूपन बॉन्ड' भी कहते हैं, जहाँ निवेशक का प्रतिफल छूट पर खरीद और अंकित मूल्य पर मोचन से आता है।

 

Question 17. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम की स्थापना करने के क्या उद्देश्य थे?
Answer: भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI) की स्थापना सन् 1948 में हुई थी। इसके मुख्य उद्देश्य ये थे:
1. बड़े औद्योगिक उपक्रमों को मध्यम और दीर्घकालीन वित्त प्रदान करना।
2. नए औद्योगिक उपक्रमों की स्थापना और उनके कार्यों के विस्तार और विविधीकरण में वित्तीय सहायता देना।
3. पहले से स्थापित औद्योगिक उपक्रमों के संयंत्रों के नवीनीकरण और आधुनिकीकरण में मदद करना।
In simple words: IFCI की स्थापना 1948 में बड़े उद्योगों को लंबे समय का पैसा देने, नए उद्योगों को सहारा देने और पुराने उद्योगों को आधुनिक बनाने के लिए हुई थी।

🎯 Exam Tip: IFCI के उद्देश्यों में बड़े उद्योगों के लिए दीर्घकालीन वित्तपोषण और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।

 

Question 19. भारतीय निर्यात – आयात बैंक के मुख्य कार्य बताइये।
Answer: भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM Bank) के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
1. वस्तु और सेवाओं के निर्यात के लिए वित्त प्रदान करना।
2. मध्यम और दीर्घकालीन आवश्यकताओं के लिए साख की व्यवस्था करना।
3. विदेशों में संयुक्त उपक्रम के व्यवसाय की इक्विटी में योगदान के लिए भारतीय व्यवसायियों को ऋण देना।
4. निर्यात साख से जुड़े वाणिज्यिक बैंकों को फिर से वित्त देना।
5. निर्यात-आयात व्यवसाय में शामिल व्यक्तियों/संस्थाओं को सलाह देना।
In simple words: भारतीय निर्यात-आयात बैंक का काम एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के लिए पैसा देना, लोन देना, सलाह देना और दूसरे बैंकों को भी मदद करना है।

🎯 Exam Tip: EXIM बैंक का ध्यान विशेष रूप से भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय और सलाहकार सेवाएँ प्रदान करने पर है।

 

Question 20. संचित आय या लाभ से आप क्या समझते है? इसके गुण – दोषों का वर्णन कीजिए।
Answer: संचित आय या लाभ:
कंपनियाँ अपनी पूरी कमाई हुई आय को शेयरधारकों में लाभांश के रूप में नहीं बांटती हैं। जो लाभ बचाकर रखा जाता है, उसे संचित आय या अवितरित लाभ या लाभ का पुनर्विनियोजन कहते हैं। संचित आय की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे लाभ की मात्रा और लाभांश नीति। यह व्यावसायिक वित्त का एक स्थायी स्रोत है और इस पर कोई ब्याज या लाभांश नहीं देना पड़ता है।
संचित आय के गुण:
संचित आय के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:
1. लागतरहित साधन: संचित आय प्राप्त करने में कोई खर्च नहीं होता है।
2. पूँजी का स्थायी साधन: यह कंपनी की पूँजी का स्थायी हिस्सा होता है और इसे वापस नहीं करना पड़ता है।
In simple words: बची हुई कमाई को संचित आय कहते हैं। इसके फायदे हैं कि यह बिना खर्च के मिल जाती है और लंबे समय तक कंपनी के पास रहती है।

🎯 Exam Tip: संचित आय एक आंतरिक वित्तपोषण स्रोत है जो लागत-मुक्त होता है और कंपनी को बाहरी निर्भरता के बिना धन का एक स्थायी स्रोत प्रदान करता है।

 

Question 21. दीर्घकालीन वित्त प्राप्ति में अप्रवासी भारतीयों के योगदान पर संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिए।
Answer: भारतीय मूल के लोग जो विदेशों में रहते हैं, उन्हें अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) कहा जाता है। विदेशी मुद्रा अप्रवासी खातों और अप्रवासी (बाह्य) मुद्रा खातों के माध्यम से वे भारत के वित्त क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विदेशी पूँजी में अप्रवासी जमा राशि का हिस्सा 30% से अधिक हो गया है और यह लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार ने उन्हें शेयर और डिबेंचर बेचने और धन वापस लेने के लिए भी छूट दे रखी है।
In simple words: विदेश में रहने वाले भारतीय अपने पैसे भारत में भेजकर या निवेश करके देश के विकास में मदद करते हैं। सरकार ने उन्हें निवेश करने में कई छूट भी दी हैं।

🎯 Exam Tip: एनआरआई भारत में विदेशी मुद्रा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, और उनके निवेश से देश की आर्थिक वृद्धि में मदद मिलती है। उनके लिए विशेष निवेश योजनाएँ उपलब्ध हैं।

 

Question 2. समता अंशों से क्या आशय है? इसके गुण – दोषों का वर्णन कीजिए।
Answer: समता अंश पूँजी से आशय:
समता अंश पूँजी का अर्थ है मालिक की पूँजी। समता अंशों में पैसा लगाने वाले शेयरधारक कंपनी के मालिक कहलाते हैं। उन्हें अपने शेयरों की संख्या के आधार पर वोट देने का अधिकार होता है। यह कंपनी की लंबी अवधि की पूँजी का मुख्य स्रोत है। समता अंशों के मालिकों को असली मालिक कहा जाता है क्योंकि उन्हें कंपनी की आय और संपत्तियों में हिस्सा सभी अन्य दावों का भुगतान होने के बाद ही मिलता है। समता अंश पूँजी के मालिकों को कंपनी के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार होता है।
समता अंशों के गुण:
समता अंशों के मुख्य लाभ या गुण निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी पूँजी का साधन: समता अंशधारक कंपनी को स्थायी कोष देते हैं। इन पर पैसा वापस करने या किसी निश्चित दर से लाभांश देने की कंपनी पर कोई बाध्यता नहीं होती है।
2. उच्च साख स्तर: समता अंश पूँजी के आधार पर ही कंपनी की साख तय होती है। कंपनी के पूँजी ढांचे में समता अंश पूँजी का हिस्सा उसकी साख योग्यता बताता है।
3. कंपनी पर भार नहीं: समता अंशधारकों को लाभांश का भुगतान करना ज़रूरी नहीं होता है। इस कारण इसका कंपनी पर कोई बोझ नहीं पड़ता है।
4. जोखिम उठाने वाले निवेशकों के लिए उपयुक्त: जो निवेशक ज़्यादा जोखिम उठा सकते हैं और ज़्यादा कमाई चाहते हैं, उनके लिए समता अंशों में निवेश करना अच्छा रहता है।
5. विशाल कोष: समता अंशों के माध्यम से बड़ी मात्रा में पूँजी जुटाई जा सकती है और ज़रूरत पड़ने पर उधार लेने के लिए कंपनी की संपत्तियों को गिरवी रखा जा सकता है।
6. प्रजातांत्रिक नियंत्रण: समता अंशों पर वोट देने का अधिकार होने के कारण कंपनी के प्रबंधन पर लोकतांत्रिक नियंत्रण रहता है।
समता अंश पूँजी के दोष:
समता अंशों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं:

🎯 Exam Tip: समता अंशों की परिभाषा में उनके स्वामित्व, मतदान के अधिकार और लाभांश/पूँजी वापसी में अवशिष्ट दावे का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। गुणों और दोषों को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 3. पूर्वाधिकार अंश पूँजी के गुण व सीमाओं का वर्णन कीजिए।

🎯 Exam Tip: पूर्वाधिकार अंशों के गुण और सीमाएँ दोनों को ध्यान में रखें, जिसमें लाभांश में प्राथमिकता, मतदान के अधिकार की कमी और निश्चित आय की अपेक्षाएँ शामिल हैं।

 

Question 4. ऋणपत्र क्या है? इसके गुण एवं सीमाओं को समझाइये।
Answer: ऋणपत्र उधार पूँजी का एक सामान्य साधन है। इन्हें लेनदारी प्रतिभूति भी कहते हैं। कम्पनी द्वारा जारी किए गए ऋणपत्र लम्बे समय के ऋण की स्वीकृति होते हैं। ऋणपत्रधारकों को एक निश्चित ब्याज तय समय पर मिलता है।
गुण:

  • निवेशकों को कम जोखिम: इनसे निवेशकों को कम जोखिम पर स्थिर आय मिलती है।
  • लाभ में भागीदारी नहीं: ऋणपत्रधारी कम्पनी के लाभ में हिस्सेदार नहीं होते हैं।
  • आय स्थिर: आय स्थिर होने पर इनका निर्गमन अच्छा माना जाता है।
  • नियंत्रण प्रभावित नहीं: इनके निर्गमन से समता अंशधारियों का कम्पनी पर नियंत्रण प्रभावित नहीं होता है।
  • वित्तीयन में कम खर्च: इनके द्वारा वित्त जुटाना कम खर्चीला होता है।
  • ज्यादा निवेशकों को आकर्षित करना: ऋणपत्रों पर ब्याज की दर तय होती है। कम्पनी को लाभ हो या नहीं, ब्याज मिलता ही है। इस तय आय के कारण निवेशक इनमें बहुत पैसा लगाते हैं।
  • निवेशक जोखिम कम: ऋणपत्रों पर तय ब्याज मिलता है, जबकि अंशों पर लाभ का मिलना और उसकी दर तय नहीं होती। इसलिए ऋणपत्र कम जोखिम वाले अच्छे निवेश विकल्प हैं।
  • अंशधारकों पर प्रभाव नहीं: ऋणपत्रधारी लाभ में हिस्सा नहीं लेते और उन्हें तय ब्याज मिलता है, इसलिए अंशधारकों को कोई नुकसान नहीं होता है। इसी तरह, ये पुराने ऋणपत्रधारकों को भी प्रभावित नहीं करते हैं।

सीमाएँ:
  • स्थायी भार: ये कम्पनी की आय पर एक स्थायी भार होते हैं, क्योंकि ब्याज का भुगतान हमेशा करना पड़ता है, चाहे कम्पनी को लाभ हो या नहीं।
  • समय पर भुगतान: शोध्य ऋणपत्रों का भुगतान तय समय पर करना पड़ता है, भले ही कम्पनी को वित्तीय दिक्कतें क्यों न हों।
  • ऋण लेने की क्षमता सीमित: कम्पनी की ऋण लेने की क्षमता सीमित हो जाती है। ऋणपत्र जारी करने के बाद आगे और ऋण लेने की क्षमता कम हो जाती है।
  • विश्वसनीयता की कमी: जिन कम्पनियों में ऋणपत्र पूँजी का बड़ा हिस्सा होता है, उनकी बाजार में साख कम हो जाती है और वित्तीय संस्थाएँ ऐसे कम्पनियों को ऋण देने में हिचकिचाती हैं।
  • सम्पत्तियों पर प्रभार: अक्सर ऋणपत्र कम्पनी की सम्पत्तियों के बदले जारी होते हैं। मंदी के समय नुकसान होने पर यदि कम्पनी ब्याज नहीं चुका पाती, तो ऋणपत्रधारी कम्पनी की सम्पत्तियों पर दावा कर सकते हैं।
  • मताधिकार नहीं: ऋणपत्रधारी हमेशा समता अंशधारियों पर निर्भर रहते हैं क्योंकि उन्हें कम्पनी के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार नहीं मिलता।

In simple words: ऋणपत्र लम्बे समय के लिए उधार लेने का एक तरीका है, जिस पर कम्पनी निवेशकों को तय ब्याज देती है। इसके फायदे हैं कि इसमें जोखिम कम होता है और कम्पनी का नियंत्रण नहीं बदलता, लेकिन नुकसान यह है कि ब्याज हमेशा देना पड़ता है, जिससे कम्पनी पर स्थायी बोझ बना रहता है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्रों के फायदे और नुकसान को याद करते समय, हमेशा कम्पनी के दृष्टिकोण (स्थायी बोझ, कोई नियंत्रण हानि नहीं) और निवेशक के दृष्टिकोण (निश्चित आय, कम जोखिम) दोनों को ध्यान में रखें।

 

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. वाणिज्यिक पत्र किसे कहते हैं? इसके लाभ एवं सीमाएँ क्या हैं?
Answer:वाणिज्यिक पत्र का अर्थ:
वाणिज्यिक पत्र एक फर्म द्वारा जारी किया गया अल्पकालीन, गैर-जमानती (बिना गारंटी वाला) प्रतिज्ञा पत्र होता है। यह 90 के दशक से शुरू हुआ था और इसकी भुगतान अवधि 90 दिन से लेकर 364 दिन तक हो सकती है। इसे एक फर्म दूसरी फर्मों, बीमा कम्पनियों, पेंशन कोष और बैंकों को जारी करती है। यह बिना किसी सुरक्षा के होता है, इसलिए इसे अच्छी साख वाली फर्मों द्वारा ही जारी किया जा सकता है। इसका नियमन भारतीय रिजर्व बैंक करता है।
वाणिज्यिक पत्रों के लाभ:

  • असुरक्षित: वाणिज्यिक प्रपत्र बिना किसी जमानत के होते हैं, इसलिए कम्पनी को अपनी कोई सम्पत्ति गिरवी नहीं रखनी पड़ती।
  • तरलता: ये खुले तौर पर व्यापार करने योग्य दस्तावेज होते हैं, इसलिए इन्हें आसानी से नकद में बदला जा सकता है।
  • कम लागत: ऋणों की तुलना में इन्हें जारी करने की लागत बहुत कम होती है।
  • परिपक्वता अवधि में लचीलापन: इसकी परिपक्वता अवधि को कम्पनी की जरूरतों के अनुसार बदला जा सकता है, जिससे यह कोषों का एक नियमित और लगातार स्रोत बना रहता है।
  • अतिरिक्त कोष पर अच्छा प्रतिफल: कम्पनियाँ अपने अतिरिक्त धन को वाणिज्यिक प्रपत्रों में लगाकर अच्छा लाभ कमा सकती हैं।
  • ज्यादा कोष जुटाना: अन्य स्रोतों की तुलना में इनसे अधिक धन जुटाया जा सकता है।

वाणिज्यिक पत्रों की सीमाओं का उल्लेख यहाँ उपलब्ध नहीं है।
In simple words: वाणिज्यिक पत्र एक कंपनी द्वारा जारी किया गया एक छोटा समय का उधार का कागज है जिस पर कोई गारंटी नहीं होती। यह कंपनी को सस्ता और आसान पैसा देता है, लेकिन इसकी अपनी कुछ कमियां भी हैं।

🎯 Exam Tip: वाणिज्यिक पत्र की परिभाषा को उसकी तीन मुख्य विशेषताओं (अल्पकालीन, गैर-जमानती, प्रतिज्ञा पत्र) के साथ याद रखें और ध्यान दें कि इसके फायदे मुख्य रूप से लागत और तरलता से जुड़े हैं।

 

Question 2. समता अंश पूँजी से क्या आशय है? समता अंशों के गुण एवं दोष बताइए।
Answer:समता अंश पूँजी का अर्थ:
समता अंश पूँजी वह पूँजी होती है जो कम्पनी के मालिक लगाते हैं। समता अंशधारक कम्पनी के असली मालिक होते हैं। उन्हें अपने अंशों की संख्या के आधार पर वोट देने का अधिकार होता है। यह कम्पनी के लिए लम्बे समय की पूँजी का मुख्य स्रोत है। समता अंशधारकों को कम्पनी के लाभ और सम्पत्तियों में हिस्सा बाकी सभी दावों के भुगतान के बाद मिलता है। उन्हें कम्पनी के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार भी होता है।
समता अंशों के गुण (लाभ):

  • स्थायी पूँजी: समता अंशधारक कम्पनी को स्थायी पूँजी देते हैं। इस पूँजी को वापस करने या इस पर निश्चित दर से लाभांश देने की कम्पनी पर कोई बाध्यता नहीं होती।
  • उच्च साख: समता अंश पूँजी के कारण ही कम्पनी की बाजार में अच्छी साख बनती है। कम्पनी के पूँजी ढाँचे में समता अंश पूँजी का होना कम्पनी की ऋण लेने की क्षमता को बढ़ाता है।
  • कम्पनी पर कोई भार नहीं: समता अंशधारकों को लाभांश का भुगतान करना अनिवार्य नहीं होता, इसलिए इससे कम्पनी पर कोई बोझ नहीं पड़ता।
  • जोखिम लेने वालों के लिए अच्छा: जो निवेशक ज्यादा जोखिम उठाना चाहते हैं और अधिक आय कमाना चाहते हैं, उनके लिए समता अंशों में निवेश करना बेहतर होता है।
  • बड़ी मात्रा में कोष: समता अंशों के जरिए बड़ी मात्रा में पूँजी जुटाई जा सकती है। जरूरत पड़ने पर कम्पनी अपनी सम्पत्तियों को गिरवी रखकर उधार भी ले सकती है।
  • प्रजातांत्रिक नियंत्रण: समता अंशधारकों को वोट देने का अधिकार होता है, इसलिए कम्पनी के प्रबंधन पर उनका प्रजातांत्रिक नियंत्रण रहता है।

समता अंशों के दोष (कमियाँ):
  • लोच का अभाव: यदि कम्पनी के पास ज्यादा पूँजी हो जाए, तो भी समता अंशों से प्राप्त पूँजी को कम नहीं किया जा सकता, जिससे वित्तीय लोच की कमी आती है।
  • कानूनी औपचारिकताएँ: समता अंशों को जारी करने से पहले कई कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी करनी पड़ती हैं, जिससे इसमें देरी होती है।
  • हर स्थिति में उपयुक्त नहीं: आम तौर पर समता अंशों के माध्यम से पूँजी जुटाना बाजार में तेजी के समय आसान होता है। मंदी के दौर में निवेशक समता अंशों में निवेश करने में कम रुचि दिखाते हैं।

In simple words: समता अंश पूँजी कम्पनी के मालिकों द्वारा लगाई गई पूँजी होती है, जहाँ मालिक कम्पनी के लाभ और प्रबंधन में हिस्सा लेते हैं। इसके फायदे हैं कि यह कम्पनी के लिए स्थायी पूँजी है और इससे साख बढ़ती है, लेकिन इसमें लोच की कमी होती है और इसे जारी करने में समय लगता है।

🎯 Exam Tip: समता अंशों को कम्पनी की "वास्तविक पूँजी" और अंशधारकों को "वास्तविक मालिक" के रूप में याद रखें, क्योंकि इससे आपको उनके गुणों और दोषों को समझने में मदद मिलेगी।

 

Question 3. पूर्वाधिकार अंशों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Answer:पूर्वाधिकार अंश विभिन्न प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • संचयी पूर्वाधिकार अंश: इन अंशों पर अगर किसी साल लाभांश नहीं मिलता, तो वह जमा होता रहता है और जब कम्पनी को लाभ होता है, तो पहले जमा हुआ लाभांश भी दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कम्पनी को 2010-11 में लाभ नहीं हुआ और 2011-12 में लाभ हुआ, तो 2011-12 में दोनों सालों का लाभांश एक साथ चुकाया जाएगा।
  • असंचयी पूर्वाधिकार अंश: इन अंशों पर लाभांश तभी मिलता है जब कम्पनी को लाभ हो। यदि लाभ नहीं होता है, तो लाभांश नहीं मिलता और वह जमा भी नहीं होता है।
  • भागयुक्त पूर्वाधिकार अंश: इन अंशों को तय लाभांश के साथ-साथ कम्पनी के अतिरिक्त लाभ में भी हिस्सा मिलता है। यह हिस्सा समता अंशों को लाभांश देने के बाद बचा हुआ लाभ होता है। यह लाभ या सम्पत्ति या दोनों में हो सकता है।
  • अभागयुक्त पूर्वाधिकार अंश: इन अंशों को केवल तय दर से लाभांश मिलता है। इन्हें कम्पनी के समापन के समय या अतिरिक्त सम्पत्ति में कोई और हिस्सा नहीं मिलता।
  • शोधनीय पूर्वाधिकार अंश: ये वे अंश होते हैं जिनका भुगतान (शोधन) एक निश्चित अवधि के बाद कर दिया जाता है। इनका शोधन जारी करने की शर्तों के अनुसार सूचना देने के बाद होता है, और यह केवल पूर्ण भुगतान किए गए अंशों का ही होता है। शोधन वितरण योग्य लाभों या नए अंशों को जारी करके प्राप्त राशि से किया जा सकता है। शोधन पर प्रीमियम का भुगतान केवल लाभों से किया जा सकता है।
  • अशोधनीय पूर्वाधिकार अंश: इन अंशों का भुगतान कम्पनी के जीवनकाल में नहीं होता है। इनका भुगतान केवल कम्पनी के बंद होने के समय ही किया जाता है।

In simple words: पूर्वाधिकार अंश कई तरह के होते हैं, जैसे कुछ पर लाभांश जमा होता रहता है, कुछ अतिरिक्त लाभ में हिस्सा लेते हैं, कुछ तय समय पर वापस कर दिए जाते हैं, और कुछ कम्पनी के बंद होने पर ही वापस मिलते हैं।

🎯 Exam Tip: पूर्वाधिकार अंशों के प्रकारों को याद करते समय, प्रत्येक प्रकार की मुख्य विशेषता (जैसे 'संचयी' मतलब 'जमा होने वाला' लाभांश) को ध्यान में रखें ताकि आप उन्हें आसानी से पहचान सकें।

 

Question 4. ऋणपत्र क्या होते हैं? इनके गुण-दोष बताइए।
Answer:ऋणपत्र का अर्थ:
ऋणपत्र लम्बे समय के लिए धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इन्हें कम्पनी के लेनदारी प्रतिभूति भी कहा जाता है। कम्पनी द्वारा जारी किए गए ऋणपत्र एक निश्चित राशि के ऋण की स्वीकृति होते हैं, जिसका भुगतान कम्पनी भविष्य में करने का वादा करती है। ऋणपत्रधारक कम्पनी के लेनदार होते हैं।
ऋणपत्रों के गुण (लाभ):

  • कम लागत: यह पूँजी जुटाने का एक सस्ता तरीका है, क्योंकि समता अंशों और पूर्वाधिकार अंशों की तुलना में इनकी लागत कम होती है।
  • कम्पनी के नियंत्रण में कोई बदलाव नहीं: ऋणपत्रधारकों को वोट देने का अधिकार नहीं होता, इसलिए कम्पनी के प्रबंधन में कोई हस्तक्षेप नहीं होता और समता अंशधारकों का नियंत्रण वैसा ही बना रहता है।
  • ब्याज पर कर लाभ: ऋणपत्रधारकों को भुगतान किए जाने वाले ब्याज की राशि कम्पनी के लाभ-हानि खाते में व्यय के रूप में दिखाई जाती है। इससे कम्पनी की आय पर लगने वाला आयकर कम हो जाता है।
  • अधिक निवेशकों को आकर्षित करना: ऋणपत्रों पर ब्याज की दर तय होती है। कम्पनी को लाभ हो या नहीं, उस दर से ब्याज का भुगतान ऋणपत्रधारकों को मिलता ही है। इस निश्चित आय के कारण निवेशक बड़ी मात्रा में पैसा लगाने के लिए आकर्षित होते हैं।
  • निवेशकों के लिए कम जोखिम: ऋणपत्रों पर एक निश्चित दर से ब्याज मिलता है, जबकि अंशों पर लाभ अनिश्चित होता है। इसलिए ऋणपत्र कम जोखिम वाले और निश्चित आय के अच्छे निवेश विकल्प होते हैं।
  • अंशधारकों पर कोई प्रभाव नहीं: ऋणपत्रधारी लाभ में हिस्सा नहीं लेते और उन्हें निश्चित ब्याज मिलता है, इसलिए अंशधारकों को इनके कारण कोई नुकसान नहीं होता है। इसी तरह, ये पुराने ऋणपत्रधारकों को भी प्रभावित नहीं करते हैं।

ऋणपत्रों के दोष (कमियाँ):
  • स्थायी भार: ऋणपत्रों पर निश्चित दर से ब्याज चुकाना अनिवार्य होता है, चाहे कम्पनी को लाभ हो या नहीं। कभी-कभी तो कम्पनी को ब्याज चुकाने के लिए उधार भी लेना पड़ता है।
  • विश्वसनीयता की कमी: जिन कम्पनियों में ऋणपत्र पूँजी का बड़ा हिस्सा होता है, उनकी बाजार में साख कम हो जाती है और वित्तीय संस्थाएँ ऐसे कम्पनियों को उधार देने में हिचकिचाती हैं।
  • सम्पत्तियों पर प्रभार: अक्सर ऋणपत्र कम्पनी की सम्पत्तियों के बदले जारी होते हैं। मंदी के दौरान नुकसान होने पर यदि कम्पनी ब्याज का भुगतान नहीं कर पाती, तो ऋणपत्रधारी कम्पनी की सम्पत्तियों पर दावा कर सकते हैं।
  • मताधिकार नहीं: ऋणपत्रधारी हमेशा समता अंशधारियों पर निर्भर रहते हैं क्योंकि उन्हें कम्पनी के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार नहीं मिलता। उनके सभी निर्णय समता अंशधारियों द्वारा ही लिए जाते हैं।

In simple words: ऋणपत्र कम्पनी के लिए लम्बे समय का उधार होता है, जिस पर निश्चित ब्याज मिलता है। इसके फायदे हैं कि यह सस्ता है, नियंत्रण नहीं बदलता और ब्याज पर कर छूट मिलती है। लेकिन, कम्पनी पर ब्याज चुकाने का स्थायी बोझ होता है, साख कम हो सकती है और सम्पत्तियों पर भार पड़ सकता है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्रों के फायदे और नुकसान को याद करते समय, 'निश्चित आय' (निवेशक के लिए लाभ) और 'स्थायी बोझ' (कम्पनी के लिए दोष) के मुख्य बिन्दुओं पर ध्यान दें।

 

Question 5. ऋणपत्रों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Answer:ऋणपत्र कई प्रकार के होते हैं:

  • शोधनीय ऋणपत्र: ये वे ऋणपत्र होते हैं जिनका भुगतान कम्पनी एक तय अवधि के बाद कर देती है। ज़्यादातर कम्पनियाँ इसी प्रकार के ऋणपत्र जारी करती हैं।
  • अशोधनीय ऋणपत्र: इन ऋणपत्रों की वापसी की कोई निश्चित तारीख नहीं होती। ऋणपत्रधारक धन वापसी की मांग तब तक नहीं कर सकते जब तक कम्पनी ब्याज के भुगतान में कोई चूक न करे, या कम्पनी का समापन न हो जाए।
  • परिवर्तनशील ऋणपत्र: कम्पनी ऐसे ऋणपत्रधारकों को यह विकल्प देती है कि वे अपने ऋणपत्रों को एक निश्चित अवधि के बाद समता अंशों में बदल सकते हैं।
  • सुरक्षित ऋणपत्र: ये वे ऋणपत्र होते हैं जिनके बदले कम्पनी अपनी सम्पत्ति गिरवी रखती है। इन्हें 'बन्धक ऋणपत्र' भी कहते हैं।
  • असुरक्षित ऋणपत्र: ये कम्पनी की सम्पत्तियों की जमानत के बिना जारी किए जाते हैं।
  • पंजीकृत ऋणपत्र: इन ऋणपत्रों का नाम कम्पनी के ऋणपत्र रजिस्टर में दर्ज होता है। इन्हें केवल एक नियमित हस्तान्तरण विलेख द्वारा ही किसी और को बेचा जा सकता है।
  • वाहक ऋणपत्र: ये वे ऋणपत्र होते हैं जिन्हें सिर्फ सुपुर्दगी (हाथ से देने) द्वारा ही बेचा जा सकता है। इनके वैध हस्तान्तरण के लिए कम्पनी के कार्यालय में पंजीकरण की कोई ज़रूरत नहीं होती।
  • शून्य प्रतिशत ब्याज ऋणपत्र: ये ऐसे ऋणपत्र होते हैं जिन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता। इनमें ऋणपत्र के अंकित मूल्य और खरीदने के मूल्य के बीच का अंतर ही निवेशक की आय होता है। इन्हें अंकित मूल्य से कम पर जारी किया जाता है और अंकित मूल्य पर ही वापस लिया जाता है। हाल ही के वर्षों में प्रतिष्ठित कम्पनियों द्वारा इनका चलन बढ़ा है।

In simple words: ऋणपत्र कई तरह के होते हैं, जैसे कुछ तय समय पर वापस होते हैं, कुछ बदल सकते हैं, कुछ सुरक्षित होते हैं, और कुछ बिना ब्याज के भी होते हैं, जहाँ असली फायदा खरीदने और बेचने के मूल्य के अंतर में होता है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्रों के प्रकारों को याद करते समय, उनकी मुख्य विशेषता जैसे 'शोधनीय' का मतलब 'वापस किया जा सकने वाला' और 'परिवर्तनशील' का मतलब 'बदला जा सकने वाला' पर ध्यान दें।

 

Question 6. डिबेन्चरों (ऋणपत्र) के निर्गमन में समता अंशों के क्या लाभ है?
Answer:समता अंशों की तुलना में ऋणपत्र जारी करने के कई फायदे हैं:

  • कम लागत: ऋणपत्रों के माध्यम से पूँजी जुटाने की लागत समता अंशों की तुलना में कम होती है। यह वित्त जुटाने का एक सस्ता साधन है।
  • प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं: ऋणपत्रधारकों को वोट देने का अधिकार नहीं होता, इसलिए वे कम्पनी के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इससे समता अंशधारकों का कम्पनी पर नियंत्रण बना रहता है।
  • निवेशकों के लिए आकर्षक: निवेशक ऋणपत्रों में पैसा लगाने के लिए अधिक इच्छुक होते हैं, खासकर वे जो अपने निवेश पर निश्चित और गारंटीशुदा प्रतिफल चाहते हैं। इससे कम्पनी को ऋणपत्रों के माध्यम से आसानी से वित्त मिल जाता है। यह कम्पनी के लिए भी एक सस्ता और सरल साधन है।
  • ब्याज कर-मुक्त व्यय: ऋणपत्रों पर दिया गया ब्याज एक स्वीकृत व्यय होता है। कम्पनी इसे लाभ-हानि खाते में व्यय के रूप में दिखा सकती है। इससे कम्पनी की आय पर लगने वाला आयकर कम हो जाता है।
  • ब्याज की कम दर: ऋणपत्रों पर ब्याज की दर आमतौर पर कम होती है। इससे कम्पनी जुटाई गई पूँजी को व्यवसाय में लगाकर अधिक लाभ कमा सकती है, जिसका लाभ समता अंशधारकों को लाभांश के रूप में मिलता है।
  • निवेशकों का जोखिम कम: ऋणपत्रों पर एक निश्चित दर से ब्याज मिलता है, जबकि समता अंशों पर लाभ की दर और मिलने की गारंटी नहीं होती। इसलिए ऋणपत्र कम जोखिम वाले और निश्चित आय के लिए अच्छे निवेश विकल्प हैं।
  • अंशधारकों पर कोई प्रभाव नहीं: ऋणपत्रधारी कम्पनी के लाभ में हिस्सा नहीं लेते और उन्हें निश्चित ब्याज मिलता है, इसलिए अंशधारकों को इनके कारण कोई नुकसान नहीं होता। इसी तरह, ये पुराने ऋणपत्रधारकों को भी प्रभावित नहीं करते।

In simple words: कम्पनी के लिए ऋणपत्र जारी करना समता अंश जारी करने से बेहतर हो सकता है क्योंकि यह सस्ता होता है, कम्पनी के प्रबंधन पर असर नहीं डालता, ब्याज पर टैक्स छूट मिलती है, और यह निश्चित आय चाहने वाले निवेशकों को आकर्षित करता है।

🎯 Exam Tip: ऋणपत्रों के फायदे बताते समय, ध्यान रखें कि यह कम्पनी के लिए 'कम लागत' और 'नियंत्रण बनाए रखने' में मदद करता है, जबकि निवेशकों को 'निश्चित आय' और 'कम जोखिम' देता है।

 

Question 7. सार्वजनिक जमा के गुण - दोषों का वर्णन कीजिए।
Answer:सार्वजनिक जमा के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं:

  • सरल प्रक्रिया: सार्वजनिक जमाएँ स्वीकार करने की प्रक्रिया बहुत सरल है। जनता से जमाएँ लेने के लिए न तो पूँजी नियंत्रक की अनुमति की ज़रूरत होती है और न ही इन्हें किसी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कराना पड़ता है। यह ऋणपत्रों और अंशों के निर्गमन की लंबी और जटिल प्रक्रिया से कहीं ज्यादा सरल है।
  • कम लागत: सार्वजनिक जमाओं को स्वीकार करने में बहुत कम लागत आती है, क्योंकि इसमें प्रॉस्पेक्टस छापने या ब्रोकर नियुक्त करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे इन कामों पर होने वाला खर्च बच जाता है।
  • कोई प्रतिभूति नहीं: इनके लिए किसी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि सार्वजनिक जमाएँ अक्सर असुरक्षित होती हैं।
  • कर लाभ: सार्वजनिक जमाओं पर चुकाया गया ब्याज कम्पनी की आय में से व्यय के रूप में घटा दिया जाता है। इससे कम्पनी का आयकर दायित्व कम हो जाता है।
  • लोचपूर्ण: यदि कम्पनी को धन की आवश्यकता न हो, तो सार्वजनिक जमाओं का भुगतान समय से पहले किया जा सकता है, जिससे ब्याज के बोझ से बचा जा सकता है। इससे कम्पनी के वित्तीय ढांचे में लचीलापन आता है।
  • आकस्मिक हानि में सहायक: यदि संगठन को कभी अचानक हानि होती है, तो संचित कोषों के कारण उसे संभालना आसान हो जाता है।

सार्वजनिक जमा के दोष इस प्रकार हैं:
  • सीमित मात्रा: सार्वजनिक जमाओं के माध्यम से बड़ी मात्रा में धन जुटाना आसान नहीं है। किसी भी कानून के तहत, सार्वजनिक जमाएँ अंश पूँजी और स्वतंत्र संचयों के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकतीं।
  • अनिश्चित और अविश्वसनीय साधन: यह वित्त का एक अनिश्चित और अविश्वसनीय साधन है क्योंकि जमाकर्ता कभी भी अपनी जमा राशि वापस मांग सकते हैं। साथ ही, बाजार में मंदी के समय जमाएँ मिलना मुश्किल हो जाता है।
  • अल्पावधि वित्त के लिए उपयुक्त: कोई भी कम्पनी लम्बे समय के वित्त के लिए सार्वजनिक जमाओं पर निर्भर नहीं रह सकती, क्योंकि इनकी परिपक्वता अवधि ज़्यादा लंबी नहीं होती।
  • नए उपक्रमों के लिए अनुपयुक्त: नई कम्पनियों में कोई व्यक्ति इन जमाओं में पैसा लगाना नहीं चाहता है। सार्वजनिक जमाएँ प्राप्त करने के लिए कम्पनी की साख बहुत अच्छी होनी चाहिए।
  • पूँजी बाजार के विकास में बाधक: सार्वजनिक जमाओं से स्वस्थ पूँजी बाजार का विकास रुक जाता है। इससे औद्योगिक प्रतिभूतियों की कमी हो जाती है।
  • रूढ़िवादी निवेशकों के लिए उपयुक्त: जो निवेशक ज्यादा जोखिम उठाते हैं, वे अंशों में पैसा लगाना बेहतर समझते हैं। सार्वजनिक जमाओं में उनकी ज्यादा रुचि नहीं होती है। सार्वजनिक जमाओं में तो केवल रूढ़िवादी निवेशक ही पैसा लगाते हैं।

In simple words: सार्वजनिक जमाएँ कम्पनी के लिए पैसा जुटाने का एक आसान और सस्ता तरीका है जिस पर टैक्स का फायदा भी मिलता है। लेकिन यह पैसे का भरोसेमंद स्रोत नहीं है और इसे बहुत ज़्यादा मात्रा में नहीं जुटाया जा सकता, खासकर नई कंपनियों के लिए।

🎯 Exam Tip: सार्वजनिक जमाओं के गुण और दोषों को याद करते समय, उनकी 'सरलता' और 'कम लागत' (गुण) को 'सीमित मात्रा' और 'अनिश्चितता' (दोष) के साथ जोड़कर देखें।

 

Question 8. व्यापारिक संगठनों को दीर्घकालीन वित्त प्रदान कराने वाले वित्तीय संस्थानों का वर्णन कीजिए।
Answer:व्यापारिक संगठनों को लम्बे समय का वित्त देने के लिए केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने कुछ विशेष संस्थाएँ स्थापित की हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण संस्थाएँ इस प्रकार हैं:

  • भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम (ICICI): इस निगम का मुख्य काम कम्पनियों को 15 साल की अवधि के लिए उनके अंश और ऋणपत्रों में निवेश करके लम्बे समय के ऋण देना था। एकल स्वामित्व और साझेदारी फर्मे भी इससे ऋण ले सकती थीं। यह संस्थान कम्पनियों को अन्य स्रोतों से प्राप्त ऋण की गारंटी भी देता था। इसकी स्थापना 1955 में हुई थी और 3 मई, 2002 को ICICI का विलय भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग बैंक लिमिटेड में हो गया।
  • भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI): यह बैंक लघु उद्योगों को वित्त देने वाली सबसे बड़ी संस्था है। इसकी स्थापना 1990 में लघु उद्योगों के विकास, वित्त व्यवस्था और प्रवर्तन के लिए एक प्रमुख वित्तीय संस्थान के रूप में की गई थी। यह बैंक लघु उद्योगों के विनिमय पत्रों को फिर से वित्त प्रदान करता है, उन्हें फिर से भुनाता है और उनके लिए कई सहायक सेवाएँ भी देता है। यह साझेदारी और कम्पनियों को लम्बे समय का वित्त देता है। राजस्थान वित्त निगम की स्थापना भी इसी आधार पर की गई है।
  • राज्य औद्योगिक विकास निगम (SIDCs): राज्य औद्योगिक विकास निगमों की स्थापना का उद्देश्य मध्यम और बड़े उद्योगों को बढ़ावा देना, उनका विकास करना और उन्हें फिर से खड़ा करना है। ये निगम केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही प्रोत्साहन योजनाओं को लागू करने में भी मदद करते हैं। इनकी स्थापना 1960 से 1970 के शुरुआती वर्षों में विभिन्न राज्यों में की गई थी।
  • भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC): इस निगम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जीवन बीमा व्यवसाय करना है। लेकिन इसके साथ ही यह निगम राष्ट्रीय ज़रूरतों और उद्देश्यों के अनुसार विभिन्न सरकारी उपक्रमों में भी पैसा लगाता है। यह निगम मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों, कम्पनियों के अंशों, ऋणपत्रों और बॉन्ड में निवेश करता है। इसकी स्थापना 1956 में हुई थी।
  • भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM Bank): आयात-निर्यात बैंक विदेशी वित्त व्यवस्था के लिए एक प्रमुख संस्था मानी जाती है। इस बैंक के मुख्य कार्य वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात के लिए वित्त देना, विदेशों में संयुक्त उपक्रमों के लिए भारतीय व्यवसायियों को अंश पूँजी में योगदान हेतु ऋण देना, निर्यात साख से संबंधित व्यापारिक बैंकों को फिर से वित्त देना आदि हैं। यह बैंक आयात-निर्यात के संबंध में सलाह भी देता है। इस बैंक की स्थापना जनवरी, 1982 में हुई थी।

In simple words: भारत में बड़ी कंपनियों और छोटे उद्योगों को लंबे समय के लिए पैसा देने के लिए कई सरकारी संस्थाएँ हैं, जैसे ICICI, SIDBI, LIC और EXIM बैंक, जो अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: वित्तीय संस्थानों का वर्णन करते समय, प्रत्येक संस्थान का पूरा नाम, स्थापना वर्ष और उसके मुख्य उद्देश्य या कार्य को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 9. संचित आय या लाभ से आप क्या समझते है? इसके गुण - दोषों का वर्णन कीजिए।
Answer:संचित आय या लाभ का अर्थ:
कम्पनियों द्वारा कमाए गए पूरे लाभ को अंशधारकों में लाभांश के रूप में नहीं बांटा जाता। कम्पनी द्वारा बचाकर रखे गए इस लाभ को संचित आय, अवितरित लाभ या लाभ का पुनर्विनियोजन कहते हैं। संचित आय की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे लाभ की मात्रा और लाभांश नीति। यह व्यवसाय के लिए स्थायी वित्त का स्रोत है और इस पर कोई ब्याज या लाभांश नहीं देना पड़ता।
संचित आय के गुण (लाभ):

  • लागत रहित साधन: संचित आय प्राप्त करने में किसी भी प्रकार का कोई खर्च नहीं होता। यह कम्पनी के लिए एक लागत रहित साधन है।
  • पूँजी का स्थायी साधन: यह कम्पनी की पूँजी का स्थायी साधन है। इसे वापस नहीं करना पड़ता। यह अन्य साधनों की तुलना में अधिक भरोसेमंद साधन है।
  • कोई सुरक्षा नहीं: संचित कोषों से ऋणपत्रों की तरह कम्पनी पर कोई भार या गिरवी नहीं पड़ती।
  • आकस्मिक हानि में सहायक: यदि संगठन को कभी अचानक हानि होती है, तो संचित कोषों के कारण उसे संभालना आसान हो जाता है।

संचित आय के दोष (कमियाँ):
  • अंशधारकों में असंतोष: जब अर्जित लाभ का बड़ा हिस्सा संचित आय के रूप में रोका जाता है, तो अंशधारकों को मिलने वाले लाभांश में कमी आती है, जिससे उनमें असंतोष पैदा होता है।
  • पूँजी का अनिश्चित स्रोत: यह कभी भी पूँजी का निश्चित स्रोत नहीं हो सकता, क्योंकि कम्पनी का लाभ अनिश्चित होता है।
  • प्रयोग में लापरवाही: यह आय बिना किसी लागत के आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इस कारण कम्पनी के प्रबंधक इसके प्रयोग में ज़्यादा सावधानी नहीं बरतते।
  • अति-पूँजीकरण: लाभों का ज़्यादा संचित कोषों में हस्तांतरण कभी-कभी अति-पूँजीकरण की स्थिति पैदा कर देता है। इससे कम्पनी की लाभ कमाने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।

In simple words: संचित आय वह पैसा है जो कंपनी अपने मुनाफे में से बचाकर रखती है ताकि उसे दोबारा व्यापार में लगाया जा सके। यह एक सस्ता और स्थायी तरीका है, लेकिन इससे शेयरधारक नाराज़ हो सकते हैं और कभी-कभी कंपनी इसे लापरवाही से इस्तेमाल कर सकती है।

🎯 Exam Tip: संचित आय को याद करते समय, इसके 'लागत रहित' और 'स्थायी' गुणों पर ध्यान दें, साथ ही 'अंशधारक असंतोष' और 'अनिश्चितता' जैसे दोषों को भी ध्यान में रखें।

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