RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 41 पर्यावरणीय प्रदूषण

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RBSE Class 11 Biology Chapter 41 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. महानगरों में वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है
(अ) घरेलू ईंधन
(ब) पेड़-पौधे
(स) बढ़ती आबादी
(द) मोटर वाहन
Answer: (द) मोटर वाहन
In simple words: शहरों में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ है, क्योंकि गाड़ियों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है।

🎯 Exam Tip: जब भी बड़े शहरों में प्रदूषण के कारण की बात हो, तो वाहनों से निकलने वाले धुएँ को एक मुख्य कारक के रूप में याद रखें।

 

Question 2. ध्वनि प्रदूषण मापा जाता है
(अ) Kg में
(ब) dB में
Answer: (ब) dB में
In simple words: ध्वनि प्रदूषण को मापने के लिए डेसीबल (dB) नाम की इकाई का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे हमें पता चलता है कि आवाज़ कितनी तेज़ है।

🎯 Exam Tip: ध्वनि की तीव्रता को मापने की इकाई हमेशा 'डेसीबल' (dB) होती है।

 

Question 4. कौनसे प्रदूषक से अम्लीय वर्षा होती है?
(अ) पेस्टीसाइड
(ब) SO2 or NO2
(स) कार्बन कण
(द) डस्ट कण
Answer: (ब) SO2 or NO2
In simple words: अम्लीय वर्षा मुख्य रूप से सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) गैसों के कारण होती है, जो बारिश के पानी में मिलकर अम्ल बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: अम्लीय वर्षा के लिए जिम्मेदार मुख्य गैसें सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हैं; इन्हें याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 41 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. विश्व पर्यावरण दिवस कब होता है?
Answer: हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
In simple words: हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं।

🎯 Exam Tip: पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण दिनों की तारीखें याद रखें, जैसे विश्व पर्यावरण दिवस की तिथि 5 जून है।

 

Question 2. ओजोन छिद्र से सर्वाधिक प्रभावित देश कौनसा है?
Answer: ओजोन छिद्र से सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्र अंटार्कटिका है। इसके आसपास के देश जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चिली, अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका भी प्रभावित होते हैं।
In simple words: ओजोन परत में छेद होने से सबसे ज़्यादा असर अंटार्कटिका पर पड़ता है।

🎯 Exam Tip: ओजोन छिद्र के भौगोलिक प्रभाव को याद रखें, विशेषकर अंटार्कटिका और आसपास के देशों पर।

 

Question 3. इटाई इटाई रोग का मुख्य लक्षण क्या है?
Answer: इटाई इटाई रोग का मुख्य लक्षण हड्डियों का दर्द और बीमारी है, जिसे अक्सर "आउच-आउच" कहा जाता है। इस रोग से शरीर की हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।
In simple words: इटाई इटाई रोग में हड्डियों में बहुत दर्द होता है।

🎯 Exam Tip: इटाई-इटाई रोग के मुख्य लक्षण और इसके कारण (जैसे कैडमियम) को याद रखें।

 

Question 5. स्मोग (Smog) क्या है?
Answer: स्मोग एक प्रकार की धुंध होती है, जो धुएं (smoke) और कोहरे (fog) के मिलने से बनती है। यह अक्सर प्रदूषण वाले इलाकों में दिखाई देती है।
In simple words: स्मोग धुएं और कोहरे के मिलने से बनने वाली एक प्रकार की धुंध है।

🎯 Exam Tip: स्मोग की परिभाषा (धुआं + कोहरा) और इसके घटकों को याद रखें।

 

Question 6. ताजमहल को किस प्रदूषक से डर है?
Answer: ताजमहल को सल्फर डाइऑक्साइड (\( \text{SO}_2 \)) से खतरा है, जो मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाले धुएं में अधिक मात्रा में होती है। यह \( \text{SO}_2 \) वर्षा के पानी या नमी से मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल (\( \text{H}_2\text{SO}_4 \)) बनाता है, जिससे ताजमहल के संगमरमर के पत्थरों को नुकसान पहुँचता है।
In simple words: ताजमहल को सल्फर डाइऑक्साइड गैस से खतरा है, जो अम्लीय वर्षा के कारण उसके पत्थरों को खराब कर रही है।

🎯 Exam Tip: ताजमहल को क्षति पहुँचाने वाले प्रदूषक और अम्लीय वर्षा की प्रक्रिया को समझें।

 

Question 7. किस स्तर से ऊपर की ध्वनि को प्रदूषण मानते हैं?
Answer: वायुमंडल में 80 dB (डेसीबल) से अधिक की ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण माना जाता है। इस स्तर से ऊपर की ध्वनि मनुष्यों और अन्य जीवों के लिए हानिकारक होती है।
In simple words: 80 डेसीबल से ज़्यादा की आवाज़ ध्वनि प्रदूषण कहलाती है।

🎯 Exam Tip: ध्वनि प्रदूषण की मानक सीमा (80 dB) को याद रखें।

 

Question 8. मिनीमाटा (Minamata) रोग से शरीर का कौनसा तंत्र प्रभावित होता है?
Answer: मिनीमाटा रोग पारे से प्रदूषित पानी के कारण होता है और यह मुख्य रूप से तंत्रिका तंत्र (nervous system) को प्रभावित करता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के पैर, होंठ और जीभ सुन्न हो जाते हैं, और लकवा भी हो सकता है।
In simple words: मिनीमाटा रोग में शरीर का तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है, जिससे सुन्नता और लकवा हो सकता है।

🎯 Exam Tip: मिनीमाटा रोग के कारण (पारा प्रदूषण) और प्रभावित अंग (तंत्रिका तंत्र) को याद रखें।

 

Question 9. अपघटनीय प्रदूषक कौन से होते हैं?
Answer: अपघटनीय प्रदूषक वे होते हैं जो प्राकृतिक रूप से या सूक्ष्मजीवों द्वारा आसानी से टूट जाते हैं। इनमें घरेलू कचरा, वाहित मलमूत्र, अन्न, फल और सब्जियों के टुकड़े, खराब कपड़े और लकड़ी शामिल हैं।
In simple words: वे प्रदूषक जो प्राकृतिक रूप से सड़ जाते हैं, जैसे घर का कचरा और पौधों के अवशेष, अपघटनीय प्रदूषक कहलाते हैं।

🎯 Exam Tip: अपघटनीय प्रदूषकों के कुछ उदाहरणों को याद रखें, जो पर्यावरण में आसानी से घुल-मिल जाते हैं।

 

Question 10. मुख्य प्रदूषकों (जल, वायु, ध्वनि) के सिर्फ रासायनिक नाम लिखिए।
Answer: मुख्य प्रदूषकों के रासायनिक नाम हैं: कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, ऐरोसोल, प्रकाश-रासायनिक धूम्र, कोहरा, क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC), ओजोन, परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN), डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरोइथेन (DDT), बॉरडेक्स मिक्सचर, 2,4-D और 2,4,5-T.
In simple words: कुछ मुख्य प्रदूषक कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, CFC, ओजोन और DDT जैसे रसायन हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से संबंधित प्रमुख रासायनिक प्रदूषकों के नामों की सूची को याद रखें।

 

Question 11. क्या नाभिकीय प्रदूषण कई वर्षों तक रह सकता है, यदि हां तो क्यों?
Answer: हाँ, नाभिकीय प्रदूषण कई वर्षों तक रह सकता है क्योंकि नाभिकीय पदार्थों की अर्ध-आयु (half-life) बहुत लंबी होती है। इसका मतलब है कि ये पदार्थ लंबे समय तक अपनी रेडियोधर्मिता बनाए रखते हैं और पर्यावरण में हानिकारक बने रहते हैं।
In simple words: हाँ, नाभिकीय प्रदूषण कई सालों तक रहता है क्योंकि इन पदार्थों का असर बहुत देर तक खत्म नहीं होता है।

🎯 Exam Tip: नाभिकीय प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभाव का कारण उसकी लंबी अर्ध-आयु है, इस बिंदु पर ध्यान दें।

 

Question 12. क्या प्राकृतिक स्रोत से भी नाभिकीय प्रदूषण हो सकता है ?
Answer: हाँ, प्राकृतिक स्रोतों से भी नाभिकीय प्रदूषण हो सकता है। जब इन स्रोतों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है या उनमें नाभिकीय विखंडन होता है, तो प्रदूषण होता है। अल्फा, बीटा और गामा विकिरण भी हानिकारक प्रभाव डालते हैं। हालांकि, प्राकृतिक स्रोतों से होने वाला प्रदूषण आमतौर पर मानव निर्मित स्रोतों की तुलना में कम होता है।
In simple words: प्राकृतिक चीजों से भी नाभिकीय प्रदूषण हो सकता है, खासकर जब उनका इस्तेमाल ईंधन के लिए होता है, लेकिन यह कम होता है।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक बनाम मानव निर्मित नाभिकीय प्रदूषण के अंतर को समझें और याद रखें कि प्राकृतिक स्रोत भी प्रदूषण का कारण बन सकते हैं।

 

Question 13. नाभिकीय प्रदूषण को रोकने का एक मुख्य उपाय लिखिये।
Answer: नाभिकीय प्रदूषण को रोकने के लिए परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाना, परमाणु दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय अपनाना और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना बहुत ज़रूरी है। यह पर्यावरण में रेडियोधर्मी तत्वों के फैलाव को कम करने में मदद करता है।
In simple words: परमाणु विस्फोटों को रोकना, सुरक्षा बढ़ाना और पेड़ लगाना नाभिकीय प्रदूषण रोकने के मुख्य तरीके हैं।

🎯 Exam Tip: नाभिकीय प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तीन मुख्य उपायों (विस्फोटों पर रोक, सुरक्षा उपाय, वृक्षारोपण) को याद रखें।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 41 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मृदा प्रदूषण को परिभाषित कीजिए।
Answer: मृदा की ऊपरी परत में मौजूद भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ऐसा कोई भी बदलाव, जिसका मानव और अन्य जीवों पर बुरा असर पड़े, उसे मृदा प्रदूषण कहते हैं। यह मिट्टी की उर्वरता को कम करता है और उसमें हानिकारक पदार्थ जमा कर देता है।
In simple words: जब मिट्टी के गुणों में बदलाव आता है और वह खराब हो जाती है, जिससे जीवों को नुकसान होता है, तो उसे मृदा प्रदूषण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: मृदा प्रदूषण की परिभाषा देते समय मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में बदलाव पर ज़ोर दें।

 

Question 2. वायु प्रदूषण करने वाले मुख्य कारक कौन-कौन से हैं?
Answer: वायु प्रदूषण के मुख्य कारक इस प्रकार हैं:

  • गैसें: घरों और कारखानों में ईंधन जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कार्बन डाइऑक्साइड (\( \text{CO}_2 \)), हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड (NO), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (\( \text{NO}_2 \)) और हाइड्रोजन सल्फाइड (\( \text{H}_2\text{S} \)) जैसी गैसें निकलती हैं। ये गैसें हवा में मिलकर शरीर और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं।
  • अन्य रसायन: कुछ अन्य रसायन जो गैसीय नहीं होते, जैसे कोयला, तेल शोधक कारखानों, स्टील प्लांट, मोटर वाहन, उर्वरक कारखानों और बिजली घरों से निकलने वाले रासायनिक कण भी वायु को प्रदूषित करते हैं।


In simple words: हवा में प्रदूषण गैसों (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड) और कुछ खास रसायनों (जो कारखानों और गाड़ियों से निकलते हैं) के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: वायु प्रदूषण के मुख्य कारकों को गैसों और अन्य रसायनों की श्रेणियों में विभाजित करके याद करें, और प्रत्येक श्रेणी के कुछ उदाहरण दें।

 

Question 3. जल प्रदूषण के मुख्य कारक कौन-कौन से हैं?
Answer: जल प्रदूषण के मुख्य कारक इस प्रकार हैं:

  • मल जल और घरेलू कचरा: शहरों की बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण घरों का कचरा और गंदा पानी सीधे नदियों, झीलों और जलाशयों में छोड़ दिया जाता है, जिससे पानी में ऑक्सीजन कम हो जाती है और जलीय जीवों की मौत हो जाती है।
  • औद्योगिक कचरा: उद्योगों से निकलने वाले प्लास्टिक, रबर, कागज, साबुन और रसायन जैसे अपशिष्ट पानी में हानिकारक धातुओं की मात्रा बढ़ा देते हैं। कैडमियम और पारे की अधिक मात्रा से विभिन्न रोग होते हैं।
  • कीटनाशक: फसलों को कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। ये कीटनाशक मिट्टी में मिलकर बारिश के पानी के साथ जलाशयों में पहुँच जाते हैं, और इनकी थोड़ी सी मात्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।
  • रासायनिक उर्वरक: रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग भी फसलों में हो रहा है। इन खादों में मौजूद रसायन प्राणियों पर बुरा असर डालते हैं।
  • तापीय प्रदूषण: उद्योगों द्वारा गर्म पानी को समुद्रों में छोड़ने, परमाणु विस्फोटों और अन्य कारणों से समुद्री जल का तापमान बढ़ जाता है, जिससे समुद्री जीवों, मछलियों और शैवालों को नुकसान पहुँचता है।
  • तेल प्रदूषण: महासागरों में बड़े टैंकरों से खनिज तेल के रिसाव से पानी की सतह पर तेल की मोटी परत बन जाती है, जिससे समुद्री जीवों का दम घुटने से मौत हो जाती है।

In simple words: जल प्रदूषण के मुख्य कारण घर का गंदा पानी, कारखानों का कचरा, खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक और खाद, गर्म पानी और तेल का रिसाव हैं।

🎯 Exam Tip: जल प्रदूषण के मुख्य कारकों को उनकी प्रकृति के अनुसार वर्गीकृत करें (घरेलू, औद्योगिक, कृषि, तापीय, तेल) और प्रत्येक का एक संक्षिप्त विवरण दें।

 

Question 4. ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारक लिखिये।
Answer: ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारक इस प्रकार हैं:

  • कारखानों का शोर: मशीनों के अत्यधिक उपयोग से कारखानों में बहुत ज़्यादा शोर होता है।
  • विमानों का शोर: हवाई जहाज और जेट विमानों से निकलने वाली तेज़ आवाज़ें बहुत अधिक ध्वनि प्रदूषण करती हैं।
  • मोटर वाहनों का शोर: सड़कों पर चलने वाले वाहनों की बढ़ती संख्या से लगातार शोर होता रहता है।
  • लाउडस्पीकर और जेनरेटर का शोर: धार्मिक आयोजनों, शादी-विवाह, राजनीतिक सभाओं और बिजली आपूर्ति के लिए उपयोग होने वाले जेनरेटर भी ध्वनि प्रदूषण का कारण बनते हैं।

In simple words: कारखानों की मशीनें, हवाई जहाज, गाड़ियाँ और लाउडस्पीकर/जेनरेटर से निकलने वाली तेज़ आवाज़ें ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।

🎯 Exam Tip: ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों को याद रखें, जो हमारी दिनचर्या में आम हैं जैसे वाहन और औद्योगिक गतिविधियाँ।

 

Question 6. ध्वनि प्रदूषण से होने वाले मुख्य दुष्प्रभाव क्या हैं?
Answer: ध्वनि प्रदूषण के मुख्य दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं:

  • श्रवण शक्ति में कमी: अत्यधिक शोर के कारण सुनने की क्षमता कम हो सकती है, यहाँ तक कि व्यक्ति बहरा भी हो सकता है।
  • चिड़चिड़ापन: शोरगुल भरे माहौल में रहने से व्यक्ति के स्वभाव में चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ जाता है।
  • पेट की समस्याएँ: छोटी आंत में गैस्ट्रिक अल्सर हो सकता है और भूख कम लग सकती है।
  • गर्भपात: गर्भ में पल रहे शिशु पर अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ सकता है, जिससे गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है।
  • कार्यकुशलता में कमी: शोर के कारण व्यक्ति की काम करने की क्षमता कम हो जाती है।
  • नींद की समस्याएँ: ठीक से नींद न आना और रक्तचाप (blood pressure) बढ़ना भी इसके दुष्प्रभाव हैं।

In simple words: ज़्यादा शोर से सुनने में दिक्कत, गुस्सा, पेट की बीमारियाँ, नींद की कमी और काम पर असर पड़ता है।

🎯 Exam Tip: ध्वनि प्रदूषण के शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के दुष्प्रभावों को याद रखें।

 

Question 7. वायु प्रदूषण को किस प्रकार रोका जा सकता है?
Answer: वायु प्रदूषण को रोकने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं:

  • पुराने और खराब वाहनों के उपयोग पर रोक लगानी चाहिए, क्योंकि वे ज़्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।
  • वाहनों में उत्प्रेरक कन्वर्टर (catalytic converters) का उपयोग करना चाहिए, जिससे निकलने वाले धुएं की मात्रा कम हो।
  • वाहनों में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) जैसे पर्यावरण-अनुकूल ईंधन का उपयोग बढ़ाना चाहिए।
  • सड़कों पर दो-स्ट्रोक इंजन वाले वाहनों की जगह चार-स्ट्रोक इंजन वाले वाहन चलाने चाहिए, क्योंकि वे कम प्रदूषण करते हैं।
  • शहरों में जेनरेटर के उपयोग को नियंत्रित करना चाहिए।
  • परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  • कारखानों को कम प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकों का उपयोग करने के लिए बाध्य करना चाहिए और घरों में गैस चूल्हों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
  • वायु में मौजूद कणिकीय प्रदूषकों को इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (electrostatic precipitator) की मदद से प्रभावी ढंग से अलग करना चाहिए।

In simple words: पुराने वाहन न चलाएँ, कम प्रदूषण वाले ईंधन (जैसे CNG) का उपयोग करें, कारखानों से निकलने वाले धुएँ को साफ करें और पेड़ों को ज़्यादा लगाएँ।

🎯 Exam Tip: वायु प्रदूषण के नियंत्रण के उपायों को विभिन्न क्षेत्रों (वाहन, उद्योग, घरेलू) के अनुसार वर्गीकृत करके याद करें।

 

Question 8. जल प्रदूषण के मुख्य दुष्प्रभाव कौन से हैं?
Answer: जल प्रदूषकों के मुख्य दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं:

  • पानी में ऑक्सीजन (\( \text{O}_2 \)) की कमी से पेड़-पौधों और जानवरों की मौत हो जाती है।
  • गंदे पानी से टाइफाइड, पेचिश, पीलिया और मलेरिया जैसे रोग हो सकते हैं।
  • मानव मल-मूत्र से दूषित मिट्टी के संपर्क में आने पर हुकवर्म (Hookworm) का संक्रमण हो सकता है।
  • प्रदूषित पानी में नहाने से त्वचा रोग और वील रोग (Weil's disease), सिस्टोसोम का रोग हो सकता है।
  • DDT और BHC से संक्रमित पानी पीने से गर्भवती महिलाओं का गर्भपात हो सकता है और गर्भस्थ शिशु में विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। ये अविघटनीय प्रदूषक खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके हर अगले स्तर पर अपनी मात्रा बढ़ाते हैं, जिसे जैवआवर्धन (Bio magnification) कहते हैं।
  • औद्योगिक कचरे से प्रदूषित पानी के कारण लीवर, किडनी और मस्तिष्क से संबंधित रोग हो सकते हैं।
  • पारे या मरकरी से मिनीमाटा (Minamata) जैसी महामारियाँ हो सकती हैं, जिसके कारण जापान और स्वीडन में कई मौतें हुई थीं। यह अत्यधिक मरकरी-दूषित मछलियों के सेवन से हुआ था। इससे लोगों में देखने में दिक्कत, कम रोशनी, पैरों, होंठों और जीभ में सुन्नता, लकवा और मिर्गी जैसे रोग हुए थे।
  • सीसा (Lead) युक्त पानी से मांसपेशियों और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) के रोग होते हैं।
  • फ्लोराइड युक्त पानी से हड्डियों और दांतों के रोग होते हैं। पैर घुटने से बाहर की ओर मुड़ जाते हैं, जिसे नोक नी सिंड्रोम (Knock Knee syndrome) कहते हैं।
  • कैडमियम युक्त पानी से हड्डियों का रोग "आउच-आउच" (Itai-Itai) हो जाता है।
  • देश में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय जन स्वास्थ्य इंजीनियरी अनुसंधान संस्थान (CEFERI) कार्यरत है।

In simple words: गंदे पानी से बीमारियाँ फैलती हैं, जलीय जीव मरते हैं, DDT जैसे रसायन शरीर में जमा होते हैं और पारा, सीसा, फ्लोराइड, कैडमियम जैसे तत्वों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: जल प्रदूषण के दुष्प्रभावों को विभिन्न बीमारियों और शारीरिक प्रणालियों पर उनके प्रभाव के साथ याद करें, जैसे जैवआवर्धन और प्रमुख विषाक्त पदार्थों के नाम।

 

Question 9. प्रदूषण का नियंत्रण क्यों आवश्यक है?
Answer: प्रदूषण का नियंत्रण बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम सभी स्वच्छ वातावरण पसंद करते हैं। सभी जीवित प्राणियों को साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, जो केवल तभी संभव है जब वायुमंडल साफ हो। प्रकृति के सभी जीव वायुमंडल, स्थलमंडल और [आगे की जानकारी अधूरी है, लेकिन मूल भावना यह है कि स्वच्छ पर्यावरण जीवन के लिए अनिवार्य है]।
In simple words: हमें प्रदूषण को रोकना चाहिए ताकि हमारा पर्यावरण साफ रहे और सभी जीव-जंतु स्वस्थ जीवन जी सकें।

🎯 Exam Tip: प्रदूषण नियंत्रण की आवश्यकता को जीवन के अस्तित्व और पर्यावरण संतुलन से जोड़कर समझाएँ।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 41 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. वायु प्रदूषण की परिभाषा, कारक एवं निवारण विस्तार से लिखिए।
Answer:
वायु प्रदूषण (Air pollution)-
वायु प्रदूषण का अर्थ है वायु में हानिकारक पदार्थों और कारकों की उपस्थिति से है, जिससे प्राणियों, पौधों और मनुष्यों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह मुख्य रूप से वातावरण में जहरीली गैसों के फैलने से होता है, जिससे वायु की गुणवत्ता खराब होती है।

(अ) वायु प्रदूषण के स्रोत (Sources of air pollution)-
वायु प्रदूषण के कुछ मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं:

  • मोटर वाहनों के द्वारा (Vehicular sources): मोटर वाहनों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। पेट्रोल और डीजल ईंधन के जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कार्बन डाइऑक्साइड (\( \text{CO}_2 \)), हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन और सल्फर के विभिन्न यौगिक जैसे प्रदूषक निकलते हैं। डीजल से निकलने वाला धुआं काला होता है और इसमें बारीक कार्बन के कण होते हैं, जो श्वसन और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
  • ईंधन के जलने से (Fuel combustion): घरों और कारखानों में ईंधन जलने से \( \text{CO} \), \( \text{SO}_2 \), \( \text{CO}_2 \) जैसी कई हानिकारक गैसें निकलती हैं। तेल शोधक कारखाने और ताप बिजली घरों से लगातार धुआं निकलता रहता है, जिसमें \( \text{SO}_2 \), \( \text{CO}_2 \), \( \text{H}_2\text{S} \) जैसी गैसें होती हैं। रसायन आधारित कारखानों से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCL), क्लोरीन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, तांबा, सीसा, आर्सेनिक, जिंक जैसे घातक वाष्प निकलते हैं।
  • परमाणु परीक्षणों द्वारा (Nuclear tests): अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, रूस जैसे कई देशों द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाते रहे हैं। इन परीक्षणों से वायुमंडल में रेडियोधर्मी कणों की मात्रा बढ़ जाती है। ये कण सजीवों पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं और जीन विकृति के कारण विशेष प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। 1979 में थ्री माइल आइलैंड और 1986 में चेरनोबिल परमाणु संयंत्र दुर्घटनाएँ इसके उदाहरण हैं।
  • बिजली के जेनरेटरों द्वारा (Power Generators): शहरीकरण और उद्योगों के कारण बिजली की खपत बढ़ रही है, और मांग के मुकाबले उत्पादन कम है। इसलिए, शहरों में घरेलू जेनरेटरों का उपयोग बढ़ गया है, जिससे ध्वनि और वायु प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं। जेनरेटरों से निकलने वाला धुआं सांस लेने में परेशानी और चिड़चिड़ापन पैदा करता है।

 

(ब) वायु प्रदूषण के मुख्य कारक (Main factors of air Pollution)-
अधिक जनसंख्या वाले और औद्योगिक शहरों में वायु प्रदूषण ज़्यादा पाया जाता है। वायु प्रदूषक दो प्रकार के होते हैं:

  • गैसीय प्रदूषक (Gaseous pollutants): ये वे प्रदूषक हैं जो सामान्य तापमान और दबाव पर गैसीय अवस्था में रहते हैं, जैसे \( \text{CO} \), \( \text{CO}_2 \), \( \text{SO}_2 \), क्लोरीन और हाइड्रोकार्बन।
  • कणिकीय प्रदूषक (Particulate pollutants): ये वायु में मिले हुए ठोस या तरल कण होते हैं, जैसे धुआँ (smoke), धूम्र (fumes), ऐरोसोल (aerosol)।

इन प्रदूषकों का मुख्य स्रोत वाहन, लकड़ी, कोयला और कारखानों से निकलने वाला धुआं है। घरों और कारखानों में ईंधन जलने से \( \text{CO} \), \( \text{CO}_2 \), हाइड्रोकार्बन, \( \text{NO} \), \( \text{NO}_2 \), \( \text{H}_2\text{S} \) आदि गैसें निकलती हैं जो वायु को प्रदूषित करती हैं।
कुछ रसायन जो गैसीय नहीं होते, जैसे आर्सेनिक, बेंजीन, क्लोरीन, कैडमियम, फ्लोराइड, फॉर्मेल्डिहाइड, हाइड्रोजन फ्लोराइड, मैंगनीज, निकल और लेड भी वायु प्रदूषण के मुख्य कारक हैं।

  • वाहनों में उपयोग होने वाले पेट्रोल में टेट्रामिथाइल लेड और टेट्राईथाइल लेड होता है जो कणिकीय प्रदूषकों के रूप में हवा में मिल जाते हैं।
  • हाइड्रोकार्बन के अधूरे जलने से 3,4 बेंजीपाइरीन बनता है, जो फेफड़ों के कैंसर का कारण है।
  • ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करने वाले मुख्य प्रदूषक \( \text{CO}_2 \), \( \text{CH}_4 \), क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), नाइट्रस ऑक्साइड (\( \text{N}_2\text{O} \)) आदि हैं।
  • पेट्रोकेमिकल उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों में \( \text{CO} \), \( \text{CO}_2 \), \( \text{NH}_3 \) और गैसोलीन होते हैं।
  • जब वायु में कणिकीय प्रदूषक (suspended) निलंबित होते हैं, तब वे ऐरोसोल बनाते हैं। जेट विमानों और रेफ्रिजरेटरों से निकलने वाला फ्लोरोकार्बन यौगिक हानिकारक होता है।

 

(स) वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Harmful effects of air pollution)-
वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव निम्न प्रकार से हैं:

  • कार्बन मोनोऑक्साइड: इस गैस से सांस लेने में कठिनाई, कमजोरी और चक्कर आते हैं। यह हीमोग्लोबिन में मिलकर ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम कर देती है, जिससे अंत में श्वासवरोध (asphyxiation) से मृत्यु हो सकती है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड: वायुमंडल में इसकी अधिक मात्रा पृथ्वी के तापमान को बढ़ाती है, जिसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। यह सूर्य की किरणों को पृथ्वी पर पहुँचने देती है लेकिन अधिक मात्रा में ऊष्मा को वापस जाने से रोकती है।
  • फ्लोराइड: इसकी अधिक मात्रा से ऊतक क्षय (necrosis) होता है, जिससे फ्लोरोसिस रोग होता है, जिसके लक्षण अतिसार, वजन में कमी और कुबड़ापन हैं।
  • सल्फर डाइऑक्साइड (\( \text{SO}_2 \)) और सल्फर ट्राइऑक्साइड (\( \text{SO}_3 \)): कोयले और अन्य ईंधन में मौजूद सल्फर के ऑक्सीकरण से ये गैसें बनती हैं। ये वायुमंडल के जल से मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल (\( \text{H}_2\text{SO}_4 \)) बनाते हैं, जो अम्लीय वर्षा (Acid rain) के रूप में पृथ्वी पर गिरता है।
  • सल्फ्यूरिक अम्ल का प्रभाव: सल्फ्यूरिक अम्ल इमारतों के पत्थरों, रंग-रोगन और लोहे की सामग्री को खराब करता है। मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाला धुआं ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुँचा रहा है।
  • \( \text{SO}_2 \) का सीधा दुष्प्रभाव जीवित कोशिकाओं के झिल्ली तंत्र पर पड़ता है। जौ, गेहूं, कपास और सेब जैसे पौधे \( \text{SO}_2 \) प्रदूषक के प्रति संवेदनशील होते हैं। लाइकेन और मॉस \( \text{SO}_2 \) प्रदूषक के सूचक हैं।
  • ओजोन (\( \text{O}_3 \)) की अधिकता: \( \text{O}_3 \) की अधिकता से मोतियाबिंद, खांसी, आंखों में जलन, त्वचा कैंसर और DNA के टुकड़े हो सकते हैं। पौधों में श्वसन और वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ जाती है।
  • पराबैंगनी किरणें: ओजोन परत पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर पहुँचने से रोकती है। लेकिन एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और विमानों से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) ओजोन परत को पतला कर रहे हैं, जिससे ओजोन छिद्र बनते हैं। इन छिद्रों से पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँचकर तापमान बढ़ा रही हैं।
  • इथाईलीन: इथाईलीन के प्रभाव से पत्तियां और कलियां समय से पहले गिर जाती हैं।
  • नाइट्रोजन ऑक्साइड: प्रदूषकों में नाइट्रोजन ऑक्साइड का मुख्य प्रभाव आंखों और नाक पर होता है।
  • धूम्र कोहरा (Smog): नाइट्रोजन ऑक्साइड और हाइड्रोकार्बनिक यौगिक पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से ओजोन (\( \text{O}_3 \)) और कार्बनिक कण परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण करते हैं, जिसे प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरा (Photo mechanical smog) कहते हैं। PAN की अधिकता से त्वचा, आंखों में जलन, नाक और गले में संक्रमण होता है, और पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
  • PAN और \( \text{O}_3 \) की अधिकता से फेफड़ों में पानी जमा हो सकता है, फेफड़ों का कैंसर, पल्मोनरी एम्फिसीमा, श्वसन रोग और ब्रोंकियल अस्थमा हो सकता है।
  • पॉलिन्यूक्लियर ऐरोमेटिक हाइड्रोकार्बन (PAH) मानव में कैंसर उत्पन्न करते हैं।
  • PAN प्रकाश संश्लेषण की हिल अभिक्रिया में पानी के प्रकाश अपघटन को रोकता है और फोटो सिस्टम II का संदमन करता है।

(द) वायु प्रदूषण का नियंत्रण (Control of air pollution)-
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं:

  • पुराने और खराब वाहनों पर रोक लगानी चाहिए, क्योंकि वे ज़्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।
  • वाहनों में उत्प्रेरक कन्वर्टर (catalytic converters) का उपयोग करना चाहिए, जिससे निकलने वाले धुएं की मात्रा कम हो सके।
  • वाहनों में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) का ईंधन के रूप में उपयोग करना चाहिए। दिल्ली में इसके उपयोग से वायु प्रदूषण में कमी देखी गई है। रेलवे और बसों को बिजली ऊर्जा से चलाने का प्रयास करना चाहिए।
  • सड़कों पर दो-स्ट्रोक इंजन के स्थान पर चार-स्ट्रोक इंजन वाले वाहन चलाने चाहिए, क्योंकि वे कम प्रदूषण करते हैं।
  • शहरों में जेनरेटरों के उपयोग की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
  • नाभिकीय परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  • कारखानों को कम प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकों का उपयोग करने के लिए बाध्य करना चाहिए और घरों में गैस चूल्हों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
  • वायु में मौजूद कणिकीय प्रदूषकों को इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (electronic precipitator) की सहायता से प्रभावी ढंग से अलग किया जा सकता है।


In simple words: वायु प्रदूषण को रोकने के लिए वाहनों से निकलने वाले धुएँ को नियंत्रित करना, प्रदूषण कम करने वाले ईंधन का इस्तेमाल करना, परमाणु परीक्षणों को रोकना और कारखानों से निकलने वाले धुएँ को साफ करना बहुत ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: वायु प्रदूषण के विभिन्न पहलुओं (परिभाषा, स्रोत, कारक, दुष्प्रभाव, नियंत्रण) को एक समग्र उत्तर में व्यवस्थित करें, और प्रत्येक बिंदु को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 3. मृदा प्रदूषण के मुख्य कारक, दुष्प्रभाव तथा नियंत्रण को समझाइए।
Answer:
मृदा प्रदूषण तथा इसके स्रोत (Soil pollution and its Sources)-

  • मृदा प्रदूषण अक्सर वायु और जल प्रदूषण से ही होता है। सभी प्रकार के अपशिष्ट या प्रदूषित पानी मिट्टी को भी प्रदूषित करते हैं।
  • अम्लीय वर्षा का पानी, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवारनाशी और फफूंदनाशक जैसे सभी रसायन पानी के साथ बहकर मिट्टी में मिल जाते हैं।
  • घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ, कचरा और बेकार सामग्री, खानों से निकलने वाले विभिन्न पदार्थ जैसे जस्ता, सीसा, कैडमियम, तांबा और आर्सेनिक मिट्टी को प्रदूषित करते हैं।

In simple words: मृदा प्रदूषण तब होता है जब हवा या पानी में घुले प्रदूषक, जैसे रसायन, कचरा और खनिजों से निकलने वाले पदार्थ, मिट्टी में मिल जाते हैं।

🎯 Exam Tip: मृदा प्रदूषण के कारकों को स्रोतों (जैसे औद्योगिक, कृषि, घरेलू) के आधार पर सूचीबद्ध करें और प्रत्येक के उदाहरण दें।

 

(अ) मृदा प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Effects of soil pollution)
Answer: मिट्टी के प्रदूषण से कई बीमारियाँ फैलती हैं, जैसे मक्खी और कॉकरोच खाने-पीने की चीज़ों को गंदा कर देते हैं, जिससे डायरिया, पेचिस, हैजा, पीलिया और मियादी बुखार हो सकता है। गंदे पानी का इस्तेमाल करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। धूल उड़ने और उसे साँस से लेने पर एलर्जी, दमा, आंत्रशोथ, गठिया और त्वचा से जुड़ी बीमारियाँ हो सकती हैं।
In simple words: गंदी मिट्टी से डायरिया, हैजा और बुखार जैसी बीमारियाँ होती हैं। यह मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को भी कम करती है।

🎯 Exam Tip: मिट्टी प्रदूषण से होने वाले रोगों और प्रभावों को याद रखें, जैसे पाचन संबंधी बीमारियाँ और उपजाऊपन में कमी।

 

(ब) मृदा प्रदूषण को नियंत्रण (Control of soil pollution)
Answer: मिट्टी के प्रदूषण को रोकने के लिए कचरे का ठीक से निपटान करना ज़रूरी है। उद्योगों को लाइसेंस से पहले कचरा निपटान का प्रमाण पत्र लेना चाहिए। साफ शौचालय बनाने चाहिए। खेती में कीटनाशक की जगह जैविक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में साफ-सफाई के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहिए।
In simple words: मिट्टी प्रदूषण रोकने के लिए कचरा ठीक से डालें, जैविक खेती करें और लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करें।

🎯 Exam Tip: प्रदूषण नियंत्रण के उपायों में जैविक खेती और जन जागरूकता जैसे मुख्य बिंदुओं को शामिल करें।

 

Question 4. ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारक, दुष्प्रभाव तथा नियंत्रण का विस्तार से समझाइंए।
Answer:
**ध्वनि या शोर प्रदूषण (Sound or noise pollution):**
तेज़ या बेवजह आवाज़ को शोर या ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। शोर को डेसीबल (\(dB\)) में मापते हैं, जिसकी इकाई ग्रेहम बेल ने दी थी। इसे ध्वनि मीटर से मापा जाता है। ध्वनि की तेज़ी को हर्ट्ज़ (\(Hz\)) में मापते हैं। इंसान 20 से 20,000 हर्ट्ज़ तक की आवाज़ सुन सकता है। इंसानी कान 0 से 180 \(dB\) तक की ध्वनि को महसूस कर सकते हैं। 80 \(dB\) से ज़्यादा शोर से बेचैनी होती है और 100 \(dB\) से ज़्यादा शोर बहुत तकलीफ़ देता है। रोज़मर्रा की आवाज़ों का स्तर इस प्रकार होता है:
* सिर्फ सुनाई देने लायक: 15 \(dB\) से कम
* शांत: 30 \(dB\)
* आम बातचीत: 60 \(dB\)
* सड़क पर गाड़ियों का शोर: 60-80 \(dB\)
* चिल्लाना: 90 \(dB\)
* कारखानों में मशीनों का शोर: 110 \(dB\)
* बहुत तेज़ शोर (DJ आदि): 130 \(dB\)
**ध्वनि प्रदूषण के स्रोत (Sources of noise pollution):**
ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं:
* **कारखानों का शोर:** मशीनों के बढ़ने से कारखानों में बहुत ज़्यादा शोर होता है, जो सेहत के लिए अच्छा नहीं है। 120 \(dB\) से ज़्यादा शोर से आस-पास रहने वाले लोगों की सुनने की शक्ति कम हो सकती है या जा सकती है।
* **हवाई जहाज़ों का शोर:** हवाई जहाज़ 150 \(dB\) से ज़्यादा शोर करते हैं। हवाई अड्डों के पास की इमारतों में दरारें आ जाती हैं और लोगों को सुनने में दिक़्क़त और चिड़चिड़ापन होता है।
* **गाड़ियों का शोर:** सड़कों पर लगातार बढ़ती गाड़ियों से भी शोर बढ़ता है। दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में यह एक बड़ी समस्या है।
* **लाउडस्पीकर और जेनरेटर का शोर:** शहरों में शादी, धार्मिक कार्यक्रमों और राजनीतिक रैलियों में लाउडस्पीकर और जेनरेटर का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है, जिससे लंबे समय तक शोर प्रदूषण होता है। बिजली की कमी के कारण जेनरेटरों का उपयोग भी शोर बढ़ाता है।
**शोर प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Effects of noise pollution):**
ध्वनि प्रदूषण के बुरे असर इस प्रकार हैं:
* 80 \(dB\) से ज़्यादा की आवाज़ प्रदूषण मानी जाती है।
* 100 \(dB\) से ज़्यादा शोर होने पर बेचैनी और ध्यान भटकता है। 120 \(dB\) से ज़्यादा शोर से सिर दर्द होता है। जब सुपरसोनिक जेट तेज़ उड़ते हैं, तो पीछे ध्वनि तरंगें छोड़ते हैं, जिसे 'ध्वनि धूम' कहते हैं।
* ध्वनि धूम जब ज़मीन से टकराता है, तो इमारतों में कंपन होता है, खिड़कियाँ हिलती हैं और इमारतें कमज़ोर हो जाती हैं। इससे गर्भपात भी हो सकता है।
* अचानक बहुत तेज़ आवाज़ सेहत के लिए ख़तरनाक होती है। इससे सुनने की शक्ति जा सकती है या इंसान बेहोश हो सकता है। ज़्यादा शोर दिमाग़ को अशांत करता है और काम करने की क्षमता कम हो जाती है।
* भीड़-भाड़ वाले शहरों और औद्योगिक इलाकों में ज़्यादा शोर में रहने वाले लोगों को कम उम्र में ही कम सुनाई देने लगता है। उन्हें मानसिक तनाव, तेज़ दिल की धड़कन, हाई ब्लड प्रेशर, लिवर और दिमाग़ की बीमारियाँ हो सकती हैं।
* ज़्यादा शोर के कारण आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और माँसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं, त्वचा पीली पड़ जाती है।
* शोर से चिंता, बेचैनी और गुस्सा बढ़ता है, जिससे स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। सुनने की क्षमता घट जाती है, सिर दर्द होता है और नींद नहीं आती।
* लगातार शोर से दिल की बीमारियाँ, हाई ब्लड प्रेशर और अल्सर हो जाते हैं। भूख कम लगती है और छोटी आँत में गैस्ट्रिक अल्सर हो सकते हैं। एड्रेनालाईन हार्मोन ज़्यादा निकलने से तनाव, थकान और तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर होता है।
**शोर प्रदूषण का निवारण या नियंत्रण (Control of noise pollution):**
ध्वनि प्रदूषण को रोकने के उपाय इस प्रकार हैं:
* उद्योगों और हवाई अड्डों को शहरों से दूर बनाना चाहिए।
* ज़्यादा पेड़ लगाने से ध्वनि प्रदूषण कम होता है।
* लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कम आवाज़ में और तय समय के लिए ही करना चाहिए या उस पर पाबंदी लगानी चाहिए।
* लोगों को शोर प्रदूषण के बुरे प्रभावों के बारे में जागरूक करना चाहिए।
In simple words: तेज़ और बेवजह आवाज़ को शोर कहते हैं। इसे डेसीबल (\(dB\)) में मापते हैं। कारखानों, हवाई जहाज़ों, गाड़ियों और लाउडस्पीकर से शोर होता है। शोर से सुनने में कमी, तनाव, चिड़चिड़ापन और बीमारियाँ होती हैं। इसे रोकने के लिए उद्योगों को दूर रखें, पेड़ लगाएँ और लोगों को जागरूक करें।

🎯 Exam Tip: ध्वनि प्रदूषण के कारकों, प्रभावों और नियंत्रण उपायों को स्पष्ट रूप से लिखें। \(dB\) माप और प्रमुख स्वास्थ्य प्रभावों का उल्लेख करें।

 

Question 5. सभी प्रकार के प्रदूषणों को नियंत्रित करने का एकीकृत समाधान क्या हो सकता है, विस्तार से समझाइये।
Answer:
**वायु प्रदूषण (Air pollution):**
वायु प्रदूषण तब होता है जब हवा में नुकसानदायक चीज़ें या गैसें मिल जाती हैं, जो जीव-जंतुओं, पौधों और इंसानों के लिए ख़तरनाक होती हैं। यह ख़ासकर तब होता है जब हवा में ज़हरीली गैसें फैल जाती हैं।
**(अ) वायु प्रदूषण के स्रोत एवं प्रकार (Sources and types of air pollution):**
वायु प्रदूषण के कई कारण हैं:
(i) **गाड़ियों से प्रदूषण:** आज-कल गाड़ियों की संख्या बहुत बढ़ रही है। गाड़ियों में पेट्रोल या डीज़ल जलने से एक ही तरह के प्रदूषक निकलते हैं, पर उनकी मात्रा अलग-अलग होती है। डीज़ल के जलने से काला धुआँ निकलता है, जिसमें छोटे-छोटे कार्बन के कण (\(µ\) के आकार) होते हैं। यह धुआँ आँखों में जलन और परेशानी पैदा करता है। डीज़ल से निकलने वाले धुएँ में कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)), कार्बन डाईऑक्साइड (\(CO_2\)), हाइड्रोकार्बन और गंधक के कई यौगिक होते हैं, जो हवा को गंदा करके इंसानों की सेहत को ख़राब करते हैं।
(ii) **ईंधन के जलने से प्रदूषण:** घरों और कारखानों में ईंधन (जैसे कोयला) जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)), सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)), कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) जैसी कई ख़तरनाक गैसें निकलती हैं। ये गैसें हवा में मिलकर नुक़सान पहुँचाती हैं। तेल शोधक कारखानों और थर्मल पावर प्लांट से लगातार धुआँ निकलता रहता है, जिसमें सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)), कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) और हाइड्रोजन सल्फाइड (\(H_2S\)) जैसी गैसें होती हैं, जो सेहत के लिए बहुत ख़राब हैं। रासायनिक कारखानों से निकलने वाली भाप में हाइड्रोक्लोरिक एसिड (\(HCL\)), क्लोरीन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, तांबा, सीसा, आर्सेनिक और जिंक जैसे ज़हरीले तत्व होते हैं, जो इंसान और जानवरों को नुक़सान पहुँचाते हैं।
(iii) **परमाणु परीक्षणों से प्रदूषण:** अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, रूस जैसे कई देशों ने समय-समय पर परमाणु परीक्षण किए हैं। इन परीक्षणों से हवा में रेडियोएक्टिव कणों की मात्रा बढ़ जाती है। ये कण जीवित चीज़ों के लिए और उनके जीन्स के लिए बहुत ख़तरनाक होते हैं। इससे जीन्स में बदलाव आकर कई तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं। 1979 में अमेरिका में थ्री माइल आइलैंड नाभिकीय संयंत्र का रिसाव और 1986 में USSR में चेरनोबिल नाभिकीय संयंत्र का पिघलना, परमाणु दुर्घटनाओं के उदाहरण हैं, जिनसे वायु प्रदूषण का ख़तरा बहुत बढ़ गया था।
**(ब) वायु प्रदूषण के मुख्य कारक (Main factors of air Pollution):**
(i) **गैसीय प्रदूषक:** ये वे प्रदूषक हैं जो सामान्य तापमान और दबाव पर गैस के रूप में हवा में मौजूद होते हैं, जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)), कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)), सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)), क्लोरीन और हाइड्रोकार्बन।
(ii) **कणिकीय प्रदूषक:** ये हवा में घुले हुए छोटे ठोस या तरल कण होते हैं, जैसे धुआँ, ऐरोसोल और अन्य छोटे कण।
इन प्रदूषकों का मुख्य स्रोत गाड़ियाँ, लकड़ी, कोयला और कारखानों से निकलने वाला धुआँ है। घरों और कारखानों में ईंधन जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)), कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)), हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड (\(NO\)), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (\(NO_2\)) और हाइड्रोजन सल्फाइड (\(H_2S\)) जैसी गैसें निकलती हैं, जो हवा को गंदा करती हैं और नुक़सान पहुँचाती हैं।
कुछ रसायन गैस के रूप में नहीं होते, लेकिन कई उद्योगों से निकलने वाले रसायन जैसे कैडमियम, फ्लोराइड, फॉर्मेल्डिहाइड, हाइड्रोजन फ्लोराइड, मैंगनीज़, निकल और लेड भी वायु प्रदूषण के बड़े कारण हैं।
* गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल में टेट्रामिथाइल लेड और टेट्राईथाइल लेड होते हैं, जो छोटे-छोटे कणों के रूप में हवा में मिल जाते हैं।
* हाइड्रोकार्बन के पूरी तरह न जलने से 3,4-बेंज़ोपायरीन जैसा ख़तरनाक प्रदूषक बनता है, जो फेफड़ों के कैंसर का कारण है।
* कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)), मीथेन (\(CH_4\)), क्लोरोफ्लोरोकार्बन (\(CFCs\)) और नाइट्रस ऑक्साइड (\(N_2O\)) जैसी गैसें ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाती हैं।
* पेट्रोलियम उद्योगों से कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)), कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)), अमोनिया (\(NH_3\)) और गैसोलीन जैसे प्रदूषक निकलते हैं।
* कुहरा (\(fog\)), धूम्र कोहरा (\(smoke + fog = smog\)), कज्जल (काजल) और कुहासा (ओस) भी वायु प्रदूषक हैं जो हवा में फैलते हैं।
* धूल, धुआँ और धूम्र जैसे कणिकीय प्रदूषक भाप के ठंडा होने से बनते हैं। धुंध (\(smog\)) भी धुआँ और कोहरे के मिलने से बनती है। एरोसोल भी इसी का एक प्रकार है।
* जब हवा में ये छोटे कण घुले होते हैं, तो वे एरोसोल बनाते हैं। जेट विमानों और रेफ्रिजरेटर से निकलने वाले एरोसोल, जो फ्लोरोकार्बन होते हैं, सेहत के लिए बहुत नुक़सानदायक होते हैं।
**(स) वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Harmful effects of air pollution):**
वायु प्रदूषण के बुरे असर नीचे दिए गए हैं:
* हवा में कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) की ज़्यादा मात्रा पृथ्वी से वापस जाने वाली गर्मी को रोकती है, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है। इसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (\(NO_2\)), सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)) और क्लोरोफ्लोरोकार्बन (\(CFC\)) भी ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
* बहुत ज़्यादा फ्लोराइड से शरीर के ऊतक (tissues) ख़राब हो जाते हैं। इससे फ्लोरोसिस रोग होता है, जिसमें दस्त, वज़न कम होना और शरीर में टेढ़ापन आ जाता है।
* कोयले और दूसरे ईंधनों में मौजूद सल्फर के जलने से सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)) और सल्फर ट्राइऑक्साइड (\(SO_3\)) बनती हैं। ये गैसें हवा में पानी से मिलकर सल्फ्यूरिक एसिड (\(H_2SO_4\)) बनाती हैं और बारिश के साथ ज़मीन पर गिरती हैं, जिसे अम्ल वर्षा (\(Acid\ rain\)) कहते हैं।
* सल्फ्यूरिक एसिड इमारतों के पत्थरों, रंग-रोगन और लोहे की चीज़ों को गला देता है। मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकलने वाला धुआँ आगरा के ताजमहल के संगमरमर के पत्थरों को नुक़सान पहुँचा रहा है।
* सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)) सीधे जीवित कोशिकाओं के झिल्ली तंत्र पर बुरा असर डालती है। जौ, गेहूँ, कपास और सेब जैसे पौधे \(SO_2\) प्रदूषक के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं।
* लाइकेन और मॉस (काई) सल्फर डाइऑक्साइड (\(SO_2\)) प्रदूषण के अच्छे सूचक हैं, क्योंकि \(SO_2\) का उन पर तुरंत असर होता है।
* ओजोन (\(O_3\)) की ज़्यादा मात्रा से मोतियाबिंद, खांसी, आँखों में जलन, त्वचा कैंसर और \(DNA\) को नुक़सान होता है।
* पौधों में साँस लेने और पानी छोड़ने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है।
* ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। लेकिन एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और हवाई जहाज़ों से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (\(CFC\)) जैसे प्रदूषकों के कारण ओजोन परत पतली होती जा रही है। इस पतली परत को ओजोन छिद्र कहते हैं। इन जगहों से पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँचकर तापमान बढ़ा रही हैं।
* इथाइलीन के कारण पौधों की पत्तियाँ और कलियाँ समय से पहले गिर जाती हैं।
* नाइट्रोजन के ऑक्साइड आँखों और नाक पर बुरा असर डालते हैं।
* धुंध (\(smog\)) में नाइट्रोजन के ऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन यौगिक पराबैंगनी किरणों के असर से ओजोन (\(O_3\)) और परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (\(PAN\)) बनाते हैं। इसे प्रकाश-रासायनिक धुंध कहते हैं। \(PAN\) की ज़्यादा मात्रा से त्वचा, आँखों में जलन, नाक और गले में संक्रमण होता है, और पौधों का बढ़ना रुक जाता है।
नाइट्रोजन ऑक्साइड + हाइड्रोकार्बन
पराबैंगनी किरणें सूर्य प्रकाश
\( \implies \) \(PAN + O_3\)
* \(PAN\) और ओजोन (\(O_3\)) की ज़्यादा मात्रा से फेफड़ों में पानी जमा हो जाता है, फेफड़ों का कैंसर, फेफड़ों का फूलना (पल्मोनरी एम्फीसेमा), साँस की बीमारियाँ और दमा (ब्रोंकियल अस्थमा) हो जाता है।
* वातावरण में पाए जाने वाले पॉली न्यूक्लियर एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (\(PAH\)) इंसानों में कैंसर का कारण बनते हैं।
* \(PAN\) की वजह से प्रकाश संश्लेषण की हिल अभिक्रिया में पानी का टूटना रुक जाता है और प्रकाश तंत्र \(II\) पर भी असर पड़ता है।
**(द) वायु प्रदूषण का नियंत्रण (Control of air pollution):**
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं:
* पुराने और खराब वाहनों को सड़कों से हटा देना चाहिए, क्योंकि वे ज़्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।
* गाड़ियों में कैटेलिटिक कन्वर्टर (प्रतिलोमी उत्प्रेरक) का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि निकलने वाले धुएँ की मात्रा कम हो सके।
* गाड़ियों में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (\(CNG\)) का उपयोग ईंधन के रूप में करना चाहिए। दिल्ली में \(CNG\) के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण में काफ़ी कमी आई है। रेल और बस जैसे दूसरे वाहनों को भी बिजली से चलाने की कोशिश करनी चाहिए।
* सड़कों पर दो-स्ट्रोक इंजन वाली गाड़ियों की जगह चार-स्ट्रोक इंजन वाली गाड़ियाँ चलानी चाहिए, क्योंकि वे कम प्रदूषण फैलाती हैं।
* शहरों में जेनरेटरों का उपयोग बंद कर देना चाहिए।
* परमाणु परीक्षणों पर पाबंदी लगानी चाहिए।
* कारखानों को कम प्रदूषण फैलाने के लिए मजबूर करना चाहिए और घरों में गैस चूल्हों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए।
* हवा में मौजूद छोटे कणिकीय प्रदूषकों को इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (स्थिर वैद्युत अवक्षेपित्र) की मदद से प्रभावी ढंग से अलग किया जा सकता है।
**जल प्रदूषण (Water pollution):**
साफ पानी ही जीवन का आधार है। जीवित चीज़ों का ज़्यादातर हिस्सा पानी ही होता है। कई कारणों से पानी में बेकार के अकार्बनिक, कार्बनिक और जैविक तत्व मिल जाते हैं, जिससे पानी प्रदूषित हो जाता है। आज पूरी दुनिया में पीने के पानी की कमी बढ़ती जा रही है। पीने का पानी शारीरिक रूप से साफ, ठंडा, शुद्ध, बिना गंध और स्वाद वाला होना चाहिए, जिसका \(pH\) मान 7-8.5 के बीच हो और उसमें अशुद्धियों की मात्रा तय मानकों के अंदर हो।
**(अ) जल प्रदूषण के स्रोत एवं प्रकार (Sources and types of water pollution):**
ज़्यादातर गाँव, कस्बे, शहर और औद्योगिक इलाके पानी के स्रोतों के पास बसे होते हैं, क्योंकि पानी जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है। बढ़ती आबादी और उद्योगों से निकलने वाला कचरा लगातार पानी में मिलकर उसे प्रदूषित कर रहा है। पानी के मुख्य दो स्रोत हैं - ज़मीन के नीचे का पानी और सतह पर मौजूद पानी (जैसे तालाब, झील, नदी और समुद्र)। पानी में कई तरह की चीज़ें आसानी से घुल जाती हैं। इसलिए, जब कोई भी बाहरी चीज़ पानी में मिल जाती है या घुल जाती है, तो पानी के भौतिक और रासायनिक गुणों में बदलाव आ जाता है। इस तरह का प्रदूषित पानी सेहत के लिए नुक़सानदायक होता है। जल प्रदूषक के मुख्य स्रोत ये हैं:
(i) घरेलू डिटर्जेंट (\(Household\ detergents\)),
(ii) सीवेज और अन्य कचरा (\(Sewage\ and\ other\ wastes\)),
(iii) औद्योगिक कचरा (\(Industrial\ wastes\)),
(iv) कृषि कचरा और रासायनिक खादें (\(Agriculture\ wastes\ and\ chemical\ fertilizers\)), और
(v) रेडियोधर्मी कचरा (\(Radioactive\ wastes\))।
(i) **घरेलू डिटर्जेंट:** घरों में कपड़े और बर्तन धोने के लिए अलग-अलग तरह के साबुन, सर्फ और विम जैसे डिटर्जेंट इस्तेमाल होते हैं। ये डिटर्जेंट घरों से निकलकर नालियों के रास्ते तालाबों और नदियों में जमा हो जाते हैं, जिससे प्रदूषण फैलता है।
* इन डिटर्जेंट में नाइट्रेट, फॉस्फेट, अमोनिया के यौगिक और अल्काइल बेंजीन सल्फोनेट (\(ABS\)) जैसे रसायन पानी में इकट्ठे हो जाते हैं।
* पानी में ज़्यादा अकार्बनिक फॉस्फोरस और नाइट्रोजन होने से शैवाल (\(algae\)) बहुत ज़्यादा बढ़ने लगते हैं, जिसे 'जल प्रस्फुटन' (\(water\ bloom\)) कहते हैं।
* शैवालों के मरने के बाद, उन्हें तोड़ने के लिए ज़्यादा ऑक्सीजन (\(O_2\)) की ज़रूरत होती है, जिससे पानी में ऑक्सीजन (\(O_2\)) की कमी होने लगती है और पानी में रहने वाले जीव मरने लगते हैं।
* इस लगातार प्रक्रिया से जलाशय में पानी कम होता जाता है, लेकिन कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती रहती है। इसे 'सुपोषण' (\(eutrophication\)) कहते हैं।
(ii) **सीवेज (वाहित मल):**
* जनसंख्या बढ़ने के कारण शहरों से निकलने वाला मल-मूत्र, कूड़ा-करकट और बेकार की चीज़ें बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी में मिला दी जाती हैं, जिससे पानी प्रदूषित होता है।
* सीवेज में कार्बनिक पदार्थ ज़्यादा होते हैं और इसमें अकार्बनिक फॉस्फोरस, अमोनिया, निलंबित ठोस, फिनोल, भारी धातुएँ, सायनाइड और तेल भी पाए जाते हैं।
* ज़्यादा सीवेज होने से उसे तोड़ने वाले सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ जाती है, और उनकी साँस लेने की प्रक्रिया में पानी में घुली ऑक्सीजन ख़त्म होने लगती है। लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) की मात्रा बढ़ जाती है।
* ऑक्सीजन (\(O_2\)) की कमी के कारण पानी में रहने वाले जीव-जंतु और पौधे मर जाते हैं, जलाशय में बदबू आने लगती है और संक्रामक बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है।
* पानी के प्रदूषण को मापने के लिए बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (\(BOD\)) की जाँच की जाती है। प्रदूषित पानी में \(BOD\) बढ़ जाता है। \(BOD\) प्रदूषकों की मात्रा के साथ बढ़ता है, क्योंकि जीवाणुओं को कचरा तोड़ने के लिए ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है। पीने के साफ पानी में \(BOD\) 1\(ppm\) से कम होना चाहिए।
* डेफनिया और ट्राउट जैसी मछलियाँ जल प्रदूषण के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं, यानी प्रदूषित पानी में वे जल्दी प्रभावित होती हैं।
(iii) **औद्योगिक कचरा:**
* अलग-अलग तरह के उद्योग, जैसे उर्वरक, पेट्रोकेमिकल, तेल शोधन, कागज़, रेशे, रबर, दवा और प्लास्टिक कारखानों से निकलने वाला कचरा पानी में छोड़ दिया जाता है, जिससे जलाशय प्रदूषित होते हैं।
* इन कचरे में धूल, कोयला, एसिड, क्षार, सायनाइड, फिनोल, जिंक, पारा, कॉपर, फेरस (लोहा), नमक, तेल, कागज़, रबर और गर्म पानी जैसे पदार्थ होते हैं।
* क्लोरीन और कास्टिक सोडा बनाने वाले उद्योगों से पानी में पारा (मर्करी) मिलता है। यह पारा पानी के जीवों और फिर खाद्य श्रृंखला के ज़रिए इंसानों तक पहुँच जाता है, जिससे तंत्रिका तंत्र ख़राब होता है और सेहत के लिए जानलेवा बन सकता है।
* मोटर बोट और स्टीमर के एग्ज़ॉस्ट से पारा और सीसा निकलता है, जो पानी में मिलकर बहुत ज़हरीला मिथाइल पारा बनाता है।
(iv) **कृषि कचरा और रासायनिक खादें:**
आजकल फ़सलों को नुक़सान पहुँचाने वाले कीड़ों को मारने के लिए शाकनाशी (\(herbicides\)), खरपतवारनाशी (\(weedicides\)), कीटनाशी (\(insecticides\)), पीड़कनाशी (\(pesticides\)) और जीवनाशी (\(biocides\)) जैसे रसायनों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है। इसके साथ ही, फ़सल की पैदावार बढ़ाने के लिए यूरिया, फॉस्फेट और पोटाश जैसे रासायनिक खादों का भी इस्तेमाल होता है। ये सभी रसायन प्रदूषण की समस्या पैदा कर रहे हैं।
* कीटनाशक और पीड़कनाशक के रूप में इस्तेमाल होने वाले रसायन तीन तरह के होते हैं:
(क) आर्सेनिक जैसे अकार्बनिक नमक,
(ख) \(DDT\), ऑर्गनोक्लोरिन, ऑर्गनोफॉस्फेट और
(ग) हार्मोन और जैविक नियंत्रण वाले जैव रसायन।
* इनमें से \(DDT\) (डाइक्लोरो डाइफेनाइल ट्राइक्लोरोइथेन) और पॉलीक्लोरीनेटेड डाइफेनिल सबसे ज़्यादा ख़तरनाक प्रदूषक हैं।
* ये रसायन खाद्य श्रृंखला के ज़रिए लगातार इंसानों तक पहुँचते रहते हैं।
* \(DDT\) और दूसरे क्लोरीन वाले हाइड्रोकार्बन पीड़कनाशक ऐसे यौगिक हैं जो टूटते नहीं हैं। ये पौधों और जानवरों में जमा होते रहते हैं और खाद्य श्रृंखला से इंसानों तक पहुँच जाते हैं। इस प्रक्रिया को 'जैविक आवर्धन' (\(biological\ magnification\)) कहते हैं।
* \(DDT\) जैसे कीटनाशक पौधों में बदलाव कर देते हैं और उनकी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं।
* 2,4-\(D\) और 2,4,5-\(T\) जैसे खरपतवारनाशी पौधों की कोशिकाओं में ज़्यादा विभाजन करके ट्यूमर (गाँठ) बनाते हैं।
**(ब) जल प्रदूषकों के दुष्प्रभाव (Harmful effects of water pollutants):**
जल प्रदूषकों के बुरे प्रभाव इस प्रकार हैं:
* पानी में ऑक्सीजन (\(O_2\)) की कमी से पेड़-पौधे और जीव-जंतु मर जाते हैं।
* गंदे पानी से टाइफाइड, पेचिश, पीलिया और मलेरिया जैसी बीमारियाँ होती हैं।
* इंसानों के मल-मूत्र से दूषित मिट्टी के संपर्क में आने से हुकवर्म (\(Hookworm\)) का संक्रमण हो सकता है।
* प्रदूषित पानी से नहाने पर कई तरह के त्वचा रोग, वाइल्स रोग (\(Weil's\ disease\)) और सिस्टोसोम जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं।
* \(DDT\) और \(BHC\) मिले पानी को पीने से गर्भवती महिलाओं का गर्भपात हो सकता है और गर्भ में पल रहे बच्चे में कोई कमी आ सकती है। ये ऐसे प्रदूषक हैं जो टूटते नहीं, एक बार खाद्य श्रृंखला में आने के बाद इनकी मात्रा हर अगले स्तर पर बढ़ती जाती है। इस प्रक्रिया को 'जैविक आवर्धन' (\(Bio\ magnification\)) कहते हैं।
* औद्योगिक कचरे से प्रदूषित पानी के कारण लिवर, गुर्दे और दिमाग से जुड़ी बीमारियाँ हो सकती हैं।
* केडमियम मिले पानी से 'आउच-आउच' (इटाई-इटाई) नाम की हड्डियों की बीमारी होती है।
* सीसा (लेड) मिले पानी से मांसपेशियों, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (\(CNS\)) और सिंड्रोम से जुड़ी बीमारियाँ होती हैं।
* फ्लोराइड मिले पानी से हड्डियाँ और दाँत ख़राब होते हैं। इसमें पैर घुटने से बाहर की ओर मुड़ जाते हैं, जिसे 'नॉक-नी सिंड्रोम' कहते हैं।
* देश में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए 'केंद्रीय जन स्वास्थ्य इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान' (\(CEFERI\)) काम कर रहा है।
**मृदा प्रदूषण तथा इसके स्रोत (Soil pollution and its Sources):**
* मिट्टी का प्रदूषण वायु और जल प्रदूषण से ही होता है। हर तरह का कचरा या प्रदूषित पानी मिट्टी को गंदा करता है।
* अम्ल वर्षा का पानी, खाद, कीटनाशक, खरपतवारनाशी, कवकनाशी और पीड़कनाशी जैसे सभी रसायन पानी के साथ बहकर मिट्टी में मिल जाते हैं।
* सभी घरेलू और औद्योगिक कचरा, बेकार की चीज़ें, खानों से निकलने वाले ज़स्ता, सीसा, कैडमियम, तांबा और आर्सेनिक जैसे विभिन्न पदार्थ मिट्टी को प्रदूषित करते हैं।
**(अ) मृदा प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Effects of soil pollution):**
* घरेलू मक्खी, कॉकरोच आदि से खाद्य सामग्री गंदी होकर डायरिया, पेचिस, हैजा, पीलिया, मियादी बुखार हो जाता है।
* मल-जल के उपयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
* धूल उड़ने और उसे ग्रहण करने से एलर्जी (\(Allergy\)), दमा (\(Asthma\)), आंत्रशोथ (\(Enteritis\)), संधिशोथ (\(Arthritis\)), टीबी (\(TB\)) तथा त्वचा संबंधी रोग हो जाते हैं।
**(ब) मृदा प्रदूषण को नियंत्रण (Control of soil pollution):**
* कचरे का ठीक से निपटान करना चाहिए।
* उद्योगों को लाइसेंस देने से पहले कचरा निपटान का प्रमाण पत्र लेना चाहिए।
* स्वच्छ शौचालय बनाने चाहिए।
* खेती में कीटनाशक रसायनों की जगह जैविक नियंत्रण को बढ़ावा देना चाहिए।
* स्कूलों व कॉलेजों में स्वच्छ पर्यावरण के विषय में जागरूकता फैलानी चाहिए।
**नाभिकीय प्रदूषण या रेडियोधर्मी कचरा (Nuclear pollution or Radiation wastes):**
नाभिकीय प्रदूषण तब होता है जब रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में मिल जाते हैं। परमाणु रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे को जलाशयों और नदियों में छोड़ दिया जाता है, जिससे विकिरण पानी और हवा को प्रदूषित करते हैं और खाद्य श्रृंखला में सभी जीवों को नुक़सान पहुँचाते हैं। यूरेनियम और प्लूटोनियम परमाणु भट्टियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होते हैं। अमेरिका, जर्मनी और रूस जैसे देशों ने परमाणु परीक्षण किए हैं, जैसे 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए गए थे। परमाणु ऊर्जा चिकित्सा और बिजली बनाने में भी उपयोग होती है, लेकिन परमाणु संयंत्रों से दुर्घटनाओं का ख़तरा हमेशा बना रहता है।
**(अ) नाभिकीय प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Harmful effects of nuclear pollution):**
* अल्फा, बीटा और गामा विकिरण कोशिकाओं पर बुरा असर डालते हैं, जिससे शारीरिक और आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारियाँ हो सकती हैं।
* विकिरण से त्वचा, आँखें (मोतियाबिंद), लिवर, थायरॉयड और प्लीहा (\(spleen\)) को नुक़सान होता है, और कई तरह के कैंसर भी हो सकते हैं।
* सीज़ियम, स्ट्रॉन्शियम और आयोडीन थायरॉयड जैसे तत्व शरीर की माँसपेशियों और हड्डियों में जमा होते जाते हैं, जिससे कैंसर, जन्मजात शारीरिक दोष और जीन में बदलाव हो सकते हैं।
* भारत में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, ट्रॉम्बे, नाभिकीय प्रदूषण को कम करने, रिएक्टरों में सावधानी बरतने और आस-पास के जीवों में रेडियोधर्मिता पर नज़र रखने का काम करता है।
**(ब) नाभिकीय कचरे का निपटान (Disposal of nuclear Wastes):**
नाभिकीय कचरे का निपटान एक बड़ी समस्या है, लेकिन इसके विकिरण के असर को कम करने के लिए ये उपाय किए जा सकते हैं:
* परमाणु विस्फोटों पर पाबंदी लगानी चाहिए, और इसके लिए सभी देशों को एक साथ काम करना होगा। परमाणु बिजली संयंत्रों में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा के ज़रूरी उपाय करने चाहिए।
* रेडियोएक्टिव पदार्थों का रिसाव एक तय सीमा में ही होना चाहिए, और आपातकाल में लोगों को उस जगह से तुरंत हटा देना चाहिए।
* परमाणु बिजली संयंत्र आबादी वाले इलाक़ों से दूर होने चाहिए और उनके आस-पास ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए।
* अगर नाभिकीय कचरे का निपटान करना भी पड़े, तो ऐसे तरीक़े अपनाने चाहिए जिससे पर्यावरण प्रदूषित न हो।
In simple words: सभी तरह के प्रदूषण, जैसे वायु, जल, मृदा, ध्वनि और नाभिकीय प्रदूषण, पर्यावरण और जीवित चीज़ों के लिए हानिकारक हैं। इन्हें रोकने के लिए सही कचरा प्रबंधन, कम प्रदूषण फैलाने वाले वाहन, रासायनिक खादों की जगह जैविक खेती, उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण, परमाणु परीक्षणों पर रोक और लोगों में जागरूकता लाना ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: एक एकीकृत समाधान के रूप में, प्रत्येक प्रकार के प्रदूषण (वायु, जल, मृदा, ध्वनि, नाभिकीय) के लिए परिभाषा, स्रोत, दुष्प्रभाव और नियंत्रण उपायों को स्पष्ट रूप से समझाएँ। मुख्य शब्दावली और उदाहरणों का उपयोग करें।

 

Question 6. नाभिकीय प्रदूषण की परिभाषा, कारक तथा निवारण विस्तार से लिखिए।
Answer:
**नाभिकीय प्रदूषण या रेडियोधर्मी कचरा (Nuclear pollution or Radiation wastes):**
नाभिकीय प्रदूषण तब होता है जब रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में मिल जाते हैं। परमाणु रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे को जलाशयों और नदियों में छोड़ दिया जाता है, जिससे विकिरण पानी और हवा को प्रदूषित करते हैं और खाद्य श्रृंखला में सभी जीवों को नुक़सान पहुँचाते हैं। यूरेनियम और प्लूटोनियम परमाणु भट्टियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होते हैं। अमेरिका, जर्मनी और रूस जैसे देशों ने परमाणु परीक्षण किए हैं, जैसे 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए गए थे। परमाणु ऊर्जा चिकित्सा और बिजली बनाने में भी उपयोग होती है, लेकिन परमाणु संयंत्रों से दुर्घटनाओं का ख़तरा हमेशा बना रहता है।
**(अ) नाभिकीय प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Harmful effects of nuclear pollution):**
* अल्फा, बीटा और गामा विकिरण कोशिकाओं पर बुरा असर डालते हैं, जिससे शारीरिक और आनुवंशिक बीमारियाँ हो सकती हैं।
* विकिरण से त्वचा, आँखें (मोतियाबिंद), लिवर, थायरॉयड और प्लीहा (\(spleen\)) को नुक़सान होता है, और कई तरह के कैंसर भी हो सकते हैं।
* सीज़ियम, स्ट्रॉन्शियम और आयोडीन जैसे तत्व शरीर की माँसपेशियों और हड्डियों में जमा होते जाते हैं, जिससे कैंसर, जन्मजात शारीरिक दोष और जीन में बदलाव हो सकते हैं।
* भारत में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, ट्रॉम्बे, नाभिकीय प्रदूषण को कम करने, रिएक्टरों में सावधानी बरतने और आस-पास के जीवों में रेडियोधर्मिता पर नज़र रखने का काम करता है।
**(ब) नाभिकीय कचरे का निपटान (Disposal of nuclear Wastes):**
नाभिकीय कचरे का निपटान एक बड़ी समस्या है, लेकिन इसके विकिरण के असर को कम करने के लिए ये उपाय किए जा सकते हैं:
* परमाणु विस्फोटों पर पाबंदी लगानी चाहिए, और इसके लिए सभी देशों को एक साथ काम करना होगा। परमाणु बिजली संयंत्रों में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा के ज़रूरी उपाय करने चाहिए।
* रेडियोएक्टिव पदार्थों का रिसाव एक तय सीमा में ही होना चाहिए, और आपातकाल में लोगों को उस जगह से तुरंत हटा देना चाहिए।
* परमाणु बिजली संयंत्र आबादी वाले इलाक़ों से दूर होने चाहिए और उनके आस-पास ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए।
* अगर नाभिकीय कचरे का निपटान करना भी पड़े, तो ऐसे तरीक़े अपनाने चाहिए जिससे पर्यावरण प्रदूषित न हो।
In simple words: रेडियोएक्टिव पदार्थ जब हवा या पानी में फैलते हैं, तो उसे नाभिकीय प्रदूषण कहते हैं। परमाणु रिएक्टर और परीक्षण इसके मुख्य कारण हैं, जो जीवों और पर्यावरण के लिए बहुत ख़तरनाक हैं। इससे कैंसर और जन्मजात दोष हो सकते हैं। इसे रोकने के लिए परमाणु विस्फोटों पर रोक, संयंत्रों में सुरक्षा और कचरे का सही निपटान ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: नाभिकीय प्रदूषण की परिभाषा, स्रोतों (कारक), दुष्प्रभावों और नियंत्रण (निवारण) के उपायों को स्पष्ट रूप से बिंदुवार समझाएँ। विकिरण के स्वास्थ्य प्रभावों पर विशेष ध्यान दें।

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