RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें

Get the most accurate RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें here. Updated for the 2026-27 academic session, these solutions are based on the latest RBSE textbooks for Class 11 Biology. Our expert-created answers for Class 11 Biology are available for free download in PDF format.

Detailed Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें RBSE Solutions for Class 11 Biology

For Class 11 students, solving RBSE textbook questions is the most effective way to build a strong conceptual foundation. Our Class 11 Biology solutions follow a detailed, step-by-step approach to ensure you understand the logic behind every answer. Practicing these Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें solutions will improve your exam performance.

Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. सर्वप्रथम जीवाणु की खोज की थी -
(अ) कोच
(ब) पाश्चर
(स) ल्यूवेनहॉक
(द) जेनर ने
Answer: (स) ल्यूवेनहॉक
In simple words: जीवाणु की खोज करने वाले पहले व्यक्ति ल्यूवेनहॉक थे.

🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नामों और उनके योगदानों को हमेशा सही ढंग से याद करें, खासकर जब वे किसी खोज या वर्गीकरण से जुड़े हों.

 

Question 2. म्यूकोपेप्टाइड लक्षण है –
(अ) जीवाणु
(ब) नीलहरित शैवाल
Answer: (अ) जीवाणु
In simple words: म्यूकोपेप्टाइड जीवाणुओं में पाया जाता है, यह उनकी कोशिका भित्ति का हिस्सा होता है.

🎯 Exam Tip: जीवाणु की कोशिका भित्ति की संरचना में म्यूकोपेप्टाइड की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण पहचान विशेषता है.

 

Question 4. पादप जोकर कहा जाता है –
(अ) वाइरस
(ब) बेक्टिरिया
(स) कवके
(द) माइकोप्लाज्मा
Answer: (द) माइकोप्लाज्मा
In simple words: माइकोप्लाज्मा को पादप जगत का जोकर कहते हैं क्योंकि इनकी आकृति लगातार बदलती रहती है.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा का "जोकर" उपनाम उसकी कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति और परिणामस्वरूप अनियमित आकार के कारण है, जो इसे पौधों के रोगों में अक्सर शामिल करता है.

 

Question 5. माइकोप्लाज्मा की वृद्धि के लिए आवश्यक है -
(अ) वसा
(ब) स्टेरोल
(स) प्रोटीन
(द) कार्बोहाइड्रेट
Answer: (ब) स्टेरोल
In simple words: माइकोप्लाज्मा को बढ़ने के लिए स्टेरोल की जरूरत होती है.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को याद रखें, जैसे कि स्टेरोल, जो कोशिका झिल्ली के लिए महत्वपूर्ण है.

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. जीवाणु विज्ञान का जनक किसे कहा जाता है ?
Answer: एन्टोनी वान ल्यूवेनहॉक (Antony Von Leeuwenhoek) को जीवाणु विज्ञान का जनक कहते हैं.
In simple words: एन्टोनी वान ल्यूवेनहॉक को जीवाणु विज्ञान का जनक कहा जाता है.

🎯 Exam Tip: विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोजों और उनके वैज्ञानिकों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 2. शिम्बी (Leguminous) की मूल ग्रन्थियों में कौनसा जीवाणु पाया जाता है ?
Answer: राइ जोबियम लेग्यूमिनो सेर म (Rhizobium leguminosarum) जीवाणु शिम्बी की मूल ग्रन्थियों में पाया जाता है.
In simple words: शिम्बी पौधों की जड़ो में राइज़ोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक जीवाणु पाया जाता है, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है.

🎯 Exam Tip: शिम्बी पौधों और राइज़ोबियम के बीच सहजीवी संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएँ और नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया पर ध्यान दें.

 

Question 3. ग्राम पोजिटिव जीवाणु क्या है ?
Answer: वे जीवाणु जो ग्राम अभिरंजन (क्रिस्टल वायोलेट) को सोखते हैं और बाद में ऐल्कोहॉल से धोने पर भी बैंगनी रंग नहीं छोड़ते, उन्हें ग्राम पॉजिटिव जीवाणु कहते हैं. इनकी कोशिका भित्ति में पेप्टाइडोग्लाइकन की मोटी परत होती है.
In simple words: ग्राम पॉजिटिव जीवाणु वे होते हैं जो बैंगनी रंग का क्रिस्टल वायलेट स्टेन पकड़ कर रखते हैं, भले ही उन्हें अल्कोहल से धोया जाए.

🎯 Exam Tip: ग्राम-पॉजिटिव जीवाणुओं की पहचान के लिए उनके रंग प्रतिधारण (stain retention) और कोशिका भित्ति की संरचना पर जोर दें.

 

Question 4. ग्राम निगेटिव जीवाणु क्या है ?
Answer: वे जीवाणु जो ग्राम अभिरंजन (क्रिस्टल वायोलेट) से अभिरंजित कर देने तथा बाद में ऐल्कोहॉल से धोने पर अभिरंजन (बैंगनी रंग) छोड़ देते हैं, उन्हें ग्राम निगेटिव जीवाणु कहते हैं.
In simple words: ग्राम नेगेटिव जीवाणु वे होते हैं जो क्रिस्टल वायलेट रंग को सोखते हैं, लेकिन अल्कोहल से धोने पर वह रंग छोड़ देते हैं.

🎯 Exam Tip: ग्राम-नेगेटिव जीवाणुओं की पहचान के लिए उनके रंग छोड़ने (decolorization) और पतली पेप्टाइडोग्लाइकन परत पर ध्यान दें.

 

Question 5. PPLO का पूरा नाम लिखिये।
Answer: Pleuropneumonia like organism.
In simple words: PPLO का पूरा नाम प्ल्यूरोनिमोनिया लाइक ऑर्गेनिज़्म है.

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण जैविक संक्षिप्त रूपों (abbreviations) और उनके पूरे नामों को याद रखना परीक्षा के लिए उपयोगी है.

 

Question 6. माइकोप्लाज्मा को बहुआकृतिक क्यों कहते हैं?
Answer: माइकोप्लाज्मा में कोशिका भित्ति का अभाव होने के कारण इनकी आकृति अनिश्चित होती है. इस कारण इनकी आकृति कई रूपों में बदलती रहती है. अतः ये बहुआकृतिक या बहुरूपी जीव होते हैं.
In simple words: माइकोप्लाज्मा की कोशिका भित्ति नहीं होती, इसलिए उनका आकार बदलता रहता है. इस वजह से उन्हें बहुआकृतिक कहते हैं.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा की बहुआकृतिक प्रकृति का मुख्य कारण कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति है, जिससे वे विभिन्न आकार ले सकते हैं.

 

Question 7. माइकोप्लाज्मा जनित दो पादप रोगों के नाम बताइये।
Answer:
• बैंगन का लघुपर्णी रोग (Little leaf disease of brinjal)
• गन्ने का धारिया रोग (Stripe disease of sugarcane)
In simple words: माइकोप्लाज्मा से बैंगन में लघुपर्णी रोग और गन्ने में धारिया रोग होते हैं.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा से होने वाले पौधों और मनुष्यों के प्रमुख रोगों के उदाहरण याद रखें.

 

Question 8. माइकोप्लाज्मा जनित दो मानव रोग बताइये।
Answer:
• श्वसन नाल संक्र मण (Respiratory tract infection)
• जननांग शोथ रोग (Inflammation of reproductive organs)
In simple words: माइकोप्लाज्मा श्वसन नली के संक्रमण और जननांगों में सूजन जैसे रोग पैदा कर सकता है.

🎯 Exam Tip: मानव में माइकोप्लाज्मा संक्रमण के विशिष्ट लक्षणों और प्रभावित अंगों को याद रखें.

 

Question 9. कवकों का वर्गीकरण किसने दिया है ?
Answer: ऐलेक्सोपोलस ने दिया है.
In simple words: कवकों का वर्गीकरण ऐलेक्सोपोलस ने किया था.

🎯 Exam Tip: विभिन्न जीवों के वर्गीकरण से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है.

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. जीवाणुओं का वितरण बताइये।
Answer: जीवाणु हर जगह पाए जाते हैं, यानी वे सर्वव्यापी हैं. ये मिट्टी, हवा, पानी, भोजन और जानवरों में, यहाँ तक कि इंसानों की आँतों में भी मिलते हैं, जहाँ ई. कोलाई जैसे जीवाणु रहते हैं. जीवाणु बहुत ठंडे तापमान (-190°C) से लेकर बहुत गर्म तापमान (78°C) तक जीवित रह सकते हैं. कुछ जीवाणु बर्फ और उबलते पानी में भी जीवित रहते हैं. ये हवा में हज़ारों फीट ऊपर और ज़मीन के नीचे लगभग 16 फीट की गहराई तक भी मिलते हैं. जीवाणु शुद्ध वर्षा जल, आसुत जल, कुएँ के गहरे पानी और ज्वालामुखी की राख में नहीं पाए जाते हैं. इनकी सबसे अधिक संख्या मल पदार्थों, फल, दूध और सब्जियों में होती है.
In simple words: जीवाणु हर जगह पाए जाते हैं, जैसे मिट्टी, पानी, हवा, भोजन और जानवरों में, यहाँ तक कि इंसानों की आँतों में भी. ये बहुत ठंडे से बहुत गर्म तापमान तक जीवित रह सकते हैं. कुछ जीवाणु बर्फ और उबलते पानी में भी मिलते हैं. ये मल, फल, दूध और सब्जियों में अधिक होते हैं, लेकिन शुद्ध वर्षा जल या ज्वालामुखी की राख में नहीं मिलते हैं.

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं के वितरण का वर्णन करते समय, उनकी सर्वव्यापकता और विभिन्न चरम वातावरणों में जीवित रहने की क्षमता पर जोर दें.

 

Question 2. संपुटिका क्या है ? इसके कार्य समझाइये।
Answer: प्रत्येक जीवाणु एक कोशिका भित्ति से ढका होता है, जो कीटों के बाहरी कंकाल के समान होती है. ज़्यादातर जीवाणुओं में कोशिका भित्ति के बाहर एक जैली जैसी अतिरिक्त परत होती है जिसे स्लाइम स्तर कहते हैं. कुछ जीवाणुओं में यह परत बहुत मोटी होती है, जिसे कैप्सूल (संपुटिका) कहा जाता है. इस स्लाइम स्तर में जटिल कार्बोहाइड्रेट्स, अमीनो अम्ल और गोंद पाए जाते हैं. जीवाणु की कोशिका भित्ति म्यूरेमिक अम्ल और डाइएमीनोपमेलिक अम्ल जैसे विशेष रासायनिक पदार्थों से बनी होती है.
कार्य (Function):
• कैप्सूल जीवाणु को सूखने से बचाता है.
• यह जीवाणुओं की रोग पैदा करने की क्षमता को बढ़ाता है.
• यह जीवाणु को कोशिका भक्षण (Phagocytosis) से बचाता है, यानी इसे दूसरे जीव आसानी से खा नहीं पाते.
In simple words: संपुटिका जीवाणु की कोशिका भित्ति के बाहर एक मोटी, जैली जैसी परत होती है. यह जीवाणु को सूखने से बचाती है और उसे अधिक खतरनाक बनाती है, जिससे दूसरे जीव उसे आसानी से खा नहीं पाते.

🎯 Exam Tip: संपुटिका की परिभाषा देते समय उसकी रासायनिक संरचना और जीवाणु के लिए उसके तीन प्रमुख सुरक्षात्मक कार्यों को स्पष्ट रूप से समझाएँ.

 

Question 3. ग्राम नेगेटिव व ग्राम पोजिटिव में अन्तर बताइये।
Answer: ग्राम नेगेटिव व ग्राम पोजिटिव जीवाणुओं में मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:

ग्राम +ve जीवाणु (Gram-positive bacteria)ग्राम -ve जीवाणु (Gram-negative bacteria)
1. कोशिका भित्ति एकस्तरीय, अधिक समांग (homogeneous) तथा दृढ़ होती है।1. कोशिका भित्ति बहुस्तरीय, कम समांगी व कम दृढ़ होती है।
5. पेनिसिलिन के प्रति संवेदनशील होते हैं।5. पेनिसिलिन के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
6. RNA तथा DNA का अनुपात 8 : 1 होता है।6. 1 : 1 होता है।
7. स्ट्रेप्टोमाइसिन कम प्रभावी होता है।7. स्ट्रेप्टोमाइसिन का निरोधी (inhibitory) प्रभाव होता है।
8. इनमें बहिः अविष (exotoxin) बनते हैं।8. इनमें अन्तराविष (endotoxin) बनते हैं।
9. ग्राम अभिरंजन पर बैंगनी रंग धारण करते हैं।9. बैंगनी रंग छोड़ देते हैं।

In simple words: ग्राम पॉजिटिव जीवाणुओं की कोशिका भित्ति मोटी और एक परत वाली होती है और वे ग्राम स्टेन को नहीं छोड़ते, जबकि ग्राम नेगेटिव जीवाणुओं की कोशिका भित्ति पतली और दोहरी परत वाली होती है और वे ग्राम स्टेन को अल्कोहल से धोने पर छोड़ देते हैं.

🎯 Exam Tip: ग्राम-पॉजिटिव और ग्राम-नेगेटिव जीवाणुओं के बीच के अंतर को उनकी कोशिका भित्ति की संरचना, पेनिसिलिन के प्रति संवेदनशीलता और ग्राम अभिरंजन के परिणाम के आधार पर स्पष्ट करें.

 

Question 4. जीवाणु कोशिका का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:
कैप्सूल (माइक्रोकैप्सूल) कोशिका भित्ति कोशिका कला कोशिका द्रव्य तथा राइबोसोम न्यूकिल्योइड मीजोसोम श्लेष्मी आवरण कशाभिकी पाइलाई क्रोमेटोफोर कणिकाएं जीवाणु कोशिका की परासंरचना
In simple words: यह चित्र एक जीवाणु कोशिका की बनावट दिखाता है, जिसमें बाहर से अंदर की ओर कैप्सूल, कोशिका भित्ति, कोशिका कला और अंदर न्यूक्लियोइड, राइबोसोम जैसे हिस्से होते हैं.

🎯 Exam Tip: जीवाणु कोशिका के चित्र को बनाते समय सभी महत्वपूर्ण भागों को सही ढंग से नामांकित करें और प्रत्येक भाग के कार्य को याद रखें.

 

Question 6. माइकोप्लाज्मा का संचरण किस प्रकार होता है ?
Answer: माइकोप्लाज्मा का संचरण कई तरीकों से होता है:
• माइकोप्लाज्मा से होने वाले पौधों के रोग एक खास तरह के कीट, जैसे लीफ हॉपर, द्वारा फैलते हैं.
• जब पौधों को रोपा जाता है या कलम बाँधी जाती है (grafting), तो इस तरीके से भी माइकोप्लाज्मा एक पौधे से दूसरे पौधे में जा सकता है.
• अमरबेल (cuscuta) जैसे परजीवी पौधे भी इस रोग को एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलाने में मदद करते हैं.
In simple words: माइकोप्लाज्मा से होने वाले पौधों के रोग कीट जैसे लीफ हॉपर द्वारा फैलते हैं. यह पौधों को रोपने या कलम बाँधने से भी फैल सकता है. अमरबेल जैसे परजीवी पौधे भी इसे एक पौधे से दूसरे तक फैलाते हैं.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा के संचरण के विभिन्न माध्यमों को स्पष्ट रूप से बताएँ, खासकर कीटों और पौधों के माध्यम से होने वाले फैलाव को.

 

Question 7. माइकोप्लाज्मा के सामान्य लक्षण लिखिये।
Answer: माइकोप्लाज्मा के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
• ये गोलाभ या अण्डाकार समूह बनाते हैं और मिट्टी, वाहित मल (sewage), सड़े-गले पदार्थों, प्राणियों और पौधों में पाए जाते हैं.
• ये बहुआकृतिक या बहुरूपी (pleomorphic) जीव हैं, जो गोलाभ (spheroid), तन्तुल (filamentous), ताराकार (stellate) या अनियमित पिण्ड के रूप में पाए जाते हैं. इसी कारण माइकोप्लाज्मा को जीव जगत के जोकर की उपमा दी गई है. इनकी आकृति संवर्धन माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करती है. माइकोप्लाज्मा गैलिसेप्टिकम (M. gallisepticum) की कोशिका की आकृति कोका-कोला बोतल (Coca-Cola bottle) जैसी होती है.
• इन्हें कोशिका के अतिरिक्त स्वतंत्र माध्यम (Cell free media) यानी अजैविक संवर्धन माध्यम में उगाया जा सकता है. यदि संवर्धित माइकोप्लाज्मा को अचानक जल से तनु (dilute) कर दिया जाए, तो इनकी कोशिकाएँ फूलकर फट जाती हैं.
• माइकोप्लाज्मा परजीवी (parasitic) या मृतोपजीवी (saprophytic) होते हैं.
• इन्हें जीवाणु फिल्टर (bacterial filter) से छानना असम्भव है, क्योंकि इनका आकार 100 से 500nm तक होता है.
• इनमें कोशिका भित्ति (cell wall) का अभाव होता है और इनकी बाहरी परत त्रिस्तरीय (triple layered) लिपोप्रोटीन की बनी होती है.
• ये ग्राम अभिरंजन (gram stain) के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते हैं, इसलिए माइकोप्लाज्मा ग्राम-नेगेटिव होते हैं.
• माइकोप्लाज्मा में दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल (लगभग DNA = 4% तथा RNA = 8%) उपस्थित होते हैं.
• कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में 70S प्रकार के राइबोसोम मिलते हैं.
• इनकी वृद्धि के लिए स्टीरोल की आवश्यकता होती है. इनमें लिपिड कॉलेस्टेरॉल के रूप में रहते हैं.
• ये एन्जाइम के प्रति संवेदनशील नहीं होते और पेनिसिलिन, वेंकोमाइसिन, सिफेलोरीडीन जैसे प्रतिजैविकों (antibiotics) का कोई प्रभाव नहीं होता है. हालांकि, टेट्रासाइक्लिन और क्लोरेम्फेनिकोल जैसे प्रतिजैविक इन पर प्रभावी होते हैं और मुख्य रूप से उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित करते हैं.
In simple words: माइकोप्लाज्मा हर जगह मिलते हैं और उनका आकार हमेशा बदलता रहता है, इसलिए उन्हें "जोकर" कहते हैं. इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती, ये बहुत छोटे होते हैं, और इन्हें बढ़ने के लिए स्टेरोल की जरूरत होती है. ये ग्राम स्टेन से रंग नहीं पकड़ते और कुछ खास एंटीबायोटिक उन पर असर नहीं करते.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा के लक्षणों का वर्णन करते समय उनकी कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति, बहुआकृतिक प्रकृति, आकार और ग्राम अभिरंजन प्रतिक्रिया को प्रमुखता दें.

 

Question 8. माइकोप्लाज्मा में जनन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
Answer: प्रजनन (Reproduction): मोरोविट्ज और टॉरटिलोरी (Morowitz & Tourtebtte, 1962) के अनुसार, माइकोप्लाज्मा में लैंगिक और अलैंगिक जनन क्रियाएँ नहीं होती हैं. इसके बजाय, इनमें प्रजनन विखण्डन (fragmentation), मुकुलन (budding), द्विविभाजन (binary fission) और तरुण प्राथमिक संरचनाओं (young elementary bodies) द्वारा होता है. जनन क्रिया में प्राथमिक संरचनाएँ अधिक महत्वपूर्ण होती हैं.
जनन क्रिया के दौरान, सबसे पहले माइकोप्लाज्मा कोशिका से छोटी गोलाकार संरचनाएँ बनती हैं, जिन्हें प्राथमिक संरचनाएँ (Primary bodies) कहते हैं. जैसे-जैसे इनका आकार बढ़ता जाता है, उन्हें वृद्धि के अनुसार द्वितीयक और तृतीयक संरचनाएँ कहा जाता है. जब यह संरचना परिपक्व होकर माइकोप्लाज्मा कोशिका से टूटकर अलग होती है, तो उसे चतुर्थ संरचना कहते हैं और यही संरचना माइकोप्लाज्मा की कोशिका में विकसित हो जाती है.
प्राथमिक काय छोटी कोशिका मध्यवर्ती कोशिका बड़ी कोशिका द्विभाजन माइकोप्लाज्मा में जनन
In simple words: माइकोप्लाज्मा में प्रजनन विखण्डन, मुकुलन और द्विविभाजन से होता है, जिसमें छोटी संरचनाएँ बनती हैं जो बढ़कर नई कोशिकाएँ बनाती हैं.

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा में अलैंगिक जनन की विभिन्न विधियों और प्राथमिक संरचनाओं के विकास क्रम को विस्तार से समझाएँ.

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. जीवाणुओं के वर्गीकरण का संक्षिप्त विवरण दीजिये।
Answer: बरजे (Berge's) ने जीवाणुओं का वर्गीकरण उनकी बनावट (आकारिकी), कार्यप्रणाली (कार्यिकी लक्षण), बढ़ने के तरीके (वृद्धि लक्षण), रासायनिक गुण (जैव-रासायनिक विशेषताएँ), पोषण की विधि (पोषण विशिष्टता) और आनुवंशिक गुणों के आधार पर किया. उन्होंने जीवाणुओं को फाइलम प्रोटोफाइटा में रखा और इसके दो वर्ग बनाए:
वर्ग 1: शाइजोफाइसी (Schizophycce): इस वर्ग में नील हरित शैवालों को शामिल किया गया है.
वर्ग 2: शाइजोमाइसिटीज (Schizomycetes):
• इसमें छड़ाकार जीवाणु होते हैं, जिनमें ध्रुवीय कशाभिक (polar flagella) होते हैं और ये ग्राम-नेगेटिव होते हैं. इनमें जनन विखण्डन द्वारा होता है और इसमें 7 कुल (families) शामिल हैं.
• गण II क्ले माइ डोबेक्टिरियेल्स (Chlamydobacteriales): ये पानी में रहने वाले जीवाणु हैं, जिनकी बाहरी त्वचा बालों जैसी संरचनाओं से ढकी होती है. इसमें 3 कुल हैं.
• गण III हाइपोमाइक्रोबियेल्स (Hypomicrobiales): इन जीवाणुओं की आकृति गोल से नाशपाती जैसी होती है. ये ग्राम-नेगेटिव होते हैं और पानी या कीचड़ में पाए जाते हैं. इनमें जनन मुकुलन (budding) द्वारा होता है और इसमें दो कुल शामिल हैं.
• गण IV यूबैक्टीरियेल्स (Eubacteriales): इसमें छड़ाकार या गोल, गतिशील या अचल (non-motile) या परिपक्ष्माभि जीवाणु शामिल हैं. इनमें जनन विखण्डन द्वारा होता है और इसमें 13 कुल हैं.
• गण V एक्टिनोमाइसिटेल्स (Actinomycetales): इस गण के सदस्य तन्तुवत और शाखित होते हैं. इनमें जनन बीजाणुओं तथा ओइडिया बीजाणु द्वारा होता है और इसमें 4 कुल हैं.
• गण VI केरियोफेनेलीस (Caryophanales): इस गण के जीवाणुओं में तन्तु जैसी बड़ी और खंडित कोशिकाएँ या बहुकेंद्रकी कोशिकाएँ होती हैं, जो नली जैसी या पटयुक्त होती हैं. इनमें जनन गोनिडिया द्वारा होता है और इसमें तीन कुल हैं.
• गण VII बेगियाटोयेल्स (Beggiatoales): इन जीवाणुओं में एकल कोशिकाएँ या सामूहिक तन्तुप्रारूपी संरचनाएँ होती हैं. ये अशूक (atrichous) होते हैं, यानी इनमें कशाभिक नहीं होते और इनमें जनन विखण्डन द्वारा होता है. इसमें चार कुल हैं.
• गण VIII मिक्सोबेक्टीरियेल्स (Myxobacteriales): ये म्यूसिलेजयुक्त, पतले, लचीले, छड़ के आकार के और रेंगने वाले जीवाणु होते हैं. ये मिट्टी और गोबर में मिलते हैं और इनमें जनन विखण्डन द्वारा होता है. इसमें 4 कुल हैं.
• गण IX स्पाइरोकीटेल्स (Spirochaetales): इनकी कोशिकाएँ पतली, लचीली और सर्पिलाकार होती हैं. ये सर्पिल गति करते हैं और अशूक होते हैं. इनमें जनन विखण्डन द्वारा होता है और इसमें 2 कुल हैं.
• गण माइकोप्लाज्मेटेल्स (Mycoplasmatales): इस गण की कोशिकाएँ भंगुर (fragile), सूक्ष्म, छनने योग्य, बहुरूपी (pleomorphic), अचल (non-motile) और ग्राम-नेगेटिव होती हैं. इसमें एक कुल है.
In simple words: बरजे ने जीवाणुओं को उनकी बनावट, कार्यप्रणाली, वृद्धि और आनुवंशिक गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया. उन्होंने उन्हें प्रोटोफाइटा में रखकर दो मुख्य वर्गों (शाइजोफाइसी और शाइजोमाइसिटीज) में बाँटा, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु शामिल हैं जैसे छड़ाकार, गोलाकार, तन्तुमय और सर्पिलाकार जीवाणु.

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं के वर्गीकरण का वर्णन करते समय बरजे के वर्गीकरण के प्रमुख आधारों और प्रत्येक वर्ग या गण की मुख्य विशेषताओं को याद रखना चाहिए.

 

Question 2. जीवाणुओं की संरचना एवं पोषण विधियों पर लेख लिखिये।
Answer: जीवाणुओं की संरचना (Bacteria Cell Structure) :
जीवाणु बहुत छोटे होते हैं, इसलिए उन्हें देखने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी और खास रंगों (अभिरंजन विधियों) का उपयोग किया जाता है. अध्ययन के अनुसार, जीवाणु एक प्रोकैरियोटिक संरचना वाले होते हैं. पौधों की कोशिकाओं की तरह जीवाणु कोशिका में भी कोशिका भित्ति, प्लाज्मा झिल्ली और जीवद्रव्य होता है. इनके अलावा कुछ और संरचनाएँ भी पाई जाती हैं, जैसे अवपंक पर्त.
कोशिका भित्ति: जीवाणु की कोशिका भित्ति डाइएमीनोपिमेलिक अम्ल से बनी होती है, जिसे पेप्टिडोग्लाइकेन (Peptidoglycan) भी कहते हैं. ज्यादातर जीवाणुओं में कोशिका भित्ति के बाहर एक जैली जैसी चिपचिपी परत होती है, जिसे स्लाइम पर्त (slime layer) कहते हैं. इस परत में जटिल कार्बोहाइड्रेट्स, अमीनो अम्ल और गोंद पाए जाते हैं. कुछ जीवाणुओं में यह परत बहुत मोटी होती है, जिसे सम्पुटिका या कैप्सूल (Capsule) कहते हैं.
कैप्सूल (माइक्रोकैप्सूल) कोशिका भित्ति कोशिका कला कोशिका द्रव्य तथा राइबोसोम न्यूकिल्योइड मीजोसोम श्लेष्मी आवरण कशाभिकी पाइलाई क्रोमेटोफोर कणिकाएं जीवाणु कोशिका की परासंरचना
अवपंक पर्त की मदद से जीवाणु अलग-अलग सतहों से चिपक जाते हैं. यह जीवाणु को मुश्किल हालातों में पोषण देता है और उसे अस्थायी रूप से सूखने से बचाता है.
(ब) जीवद्रव्य (Protoplasm): कोशिका का जीवद्रव्य कोशिका झिल्ली से ढका होता है. जीवाणु कोशिका का जीवद्रव्य एक समान होता है और इसमें जीवद्रव्य का प्रवाह नहीं होता. जीवद्रव्य में वसा के कण और ग्लाइकोजन के कण बिखरे होते हैं. रसधानियाँ नहीं होतीं, और 70S प्रकार के राइबोसोम अकेले या समूह में जीवद्रव्य में बिखरे होते हैं. कुछ जीवाणुओं में एक खास तरह का हरा रंग (पर्णहरित) पाया जाता है, जिसे जीवाण्विक पर्णहरित (Bacterio Chlorophyll) कहते हैं.
इन जीवाणुओं में इसी से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है. यह पर्णहरित पटलिकाओं (lamellae thylakoids) में पाया जाता है, जिन्हें वर्णकी लवक (Chromatophores) कहते हैं. जीवाणु कोशिका झिल्ली कभी-कभी अंदर की ओर मुड़ी हुई होती है, जिससे अन्तर्वलन (infoldings) बनते हैं. इन संरचनाओं को मध्यकाय या मीजोसोम्स (Mesosomes) कहते हैं. माना जाता है कि मीजोसोम्स में पाए जाने वाले एन्जाइम श्वसन से जुड़े होते हैं.
(स) कशाभिकायें (Flagella): कुछ बैक्टीरिया हिलते-डुलते हैं, जो कशाभिकों की मौजूदगी के कारण होता है. कशाभिकाओं के फैलाव के आधार पर बैक्टीरिया कई प्रकार के होते हैं:
• अकशाभी (Atrichous): ये बैक्टीरिया कशाभिकों के बिना अचल होते हैं, जैसे पास्चुरेला, माइक्रोकोकस आदि.
• एककशाभी (Monotrichous): जब कोशिका के एक सिरे पर केवल एक कशाभिका होती है, जैसे स्यूडोमोनास, थायोबैसिलस, विब्रिओ आदि.
• गुच्छकशाभी (Lophotrichous): जब कोशिका के एक सिरे पर कशाभिकाओं का एक गुच्छा पाया जाता है, जैसे थायोस्पाइरिलम.
• उभयकशाभी (Amphitrichous): जब कोशिका के दोनों सिरों पर कशाभिकाओं का एक-एक गुच्छा पाया जाता है, जैसे नाइट्रेसोमोनास (Nitrosomonas), स्पाइरिलम आदि.
अकशाभी एककशाभी गुच्छकशाभी उभयकशाभी परिपक्ष्माभी जीवाणु में कशाभिका
• परिपक्ष्माभी (Peritrichous): जब कोशिका के सभी स्थानों पर कशाभिकाएँ बिखरी हुई होती हैं, जैसे इशरिकिआ, बेसीलस, टाइफस आदि.
प्रत्येक कशाभिका लगभग 120Å मोटी (thick) और 4 से 5µ लम्बी होती है. बैक्टीरिया की कशाभिकाएँ फ्लेजेलिन (flagellin) नाम के प्रोटीन की छोटी इकाइयों से बने एक तन्तु (fibril) की बनी होती हैं. (यूकैरियोटिक कशाभिकाओं में 9+2 संरचना होती है, जबकि जीवाणुओं में नहीं होती). तन्तु, इकाइयों की एक खोखली धुरी के चारों ओर कुंडलित श्रृंखला में पाए जाते हैं. कशाभिकाएँ बैक्टीरिया को गति करने में मदद करती हैं.
कशाभिकाओं के अलावा, गतिशील और अचल दोनों बैक्टीरिया की कोशिका में कई छोटे और कम लम्बे रोम (pilli) भी पाए जाते हैं. इन्हें रोम या पाइलाई या फिम्ब्री कहते हैं. ये मुख्य रूप से ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया में पाए जाते हैं. रोम या फिम्ब्री, संयुग्मन में मदद करते हैं.
पोषण विधियों (Modes of Nutrition):
जीवाणु मुख्य रूप से दो प्रकार से पोषण प्राप्त करते हैं: (अ) स्वपोषी जीवाणु और (ब) परपोषी या विषमपोषी जीवाणु.
(अ) स्वपोषी जीवाणु (Autotrophic bacteria): इस प्रकार का पोषण जीवाणुओं में कम होता है. फिर भी, कई जीवाणु रासायनिक क्रियाओं से ऊर्जा लेकर अपना भोजन बनाते हैं. कुछ जीवाणु तो उच्चवर्गीय पौधों की तरह प्रकाश संश्लेषण करते हैं. इसलिए इन्हें प्रकाश संश्लेषी जीवाणु कहते हैं. स्वपोषी जीवाणु भी दो प्रकार के होते हैं:
(क) प्रकाश संश्लेषी जीवाणु (Photosynthetic bacteria): इन जीवाणुओं में जीवाणु क्लोरोफिल (bacterial chlorophyll) होता है. कुछ जीवाणुओं में इसके अलावा बैक्टीरियोविरिडन (Bacterioviridin) या क्लोरोबियम क्लोरोफिल भी होता है. इस क्लोरोफिल में भी उच्च श्रेणी के पौधों में पाए जाने वाले क्लोरोफिल की तरह मैग्नीशियम पाया जाता है. ये रंगद्रव्य लवकों की जगह क्रोमेटोफोर्स (Chromatophores) में होते हैं. प्रकाश संश्लेषी जीवाणु हरे पौधों की तरह कार्बन डाइऑक्साइड और H2O से कार्बोहाइड्रेट्स नहीं बनाते हैं. इन जीवाणुओं में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया ज्यादातर गंधक यौगिकों की उपस्थिति में होती है. यहाँ हाइड्रोजन (H2) का स्रोत H2O की जगह हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) होता है और प्रकाश संश्लेषण के सहउत्पाद में ऑक्सीजन की जगह गंधक उत्पन्न होता है.
\( \text{CO}_2 + 2\text{H}_2\text{S} \xrightarrow{\text{प्रकाश}} (\text{CH}_2\text{O})_n + 2\text{S} + \text{H}_2\text{O} + \text{ऊर्जा} \)
उदाहरण: क्रोमेटियम (Chromatium), क्लोरोबियम (Chlorobium) तथा क्लोरोबेक्टिरियम (Chlorobacterium) आदि प्रकाश संश्लेषी जीवाणु हैं.
(ख) रसायन संश्लेषी जीवाणु (Chemosynthetic bacteria): इन जीवाणुओं में पर्णहरित नहीं होता है, इसलिए वे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग नहीं कर पाते. ये जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बोहाइड्रेट्स में बदलने के लिए विभिन्न रासायनिक क्रियाओं से ऊर्जा का उपयोग करते हैं. ऊर्जा पाने के लिए कुछ पदार्थों का ऑक्सीकरण किया जाता है. जीवाणु गंधक व उसके यौगिक, अमोनिया, नाइट्राइट्स, लोहा, हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन आदि का ऑक्सीकरण करते हैं. जिस पदार्थ पर ये जीवाणु क्रिया करते हैं, उसी आधार पर इन्हें नाम दिया जाता है, जैसे गंधक जीवाणु, लौह जीवाणु आदि.
1. गंधक जीवाणु (Sulphur bacteria): गंधक जीवाणु जैसे थायोबेसिलस (Thiobacillus), बेगियाटोआ (Beggiatoa) और थायोथ्रिक्स (Thiothrix) आदि गंधक या गंधक यौगिकों का ऑक्सीकरण करके उनसे ऊर्जा प्राप्त करते हैं.
\( 2\text{H}_2\text{S} + \text{O}_2 \rightarrow 2\text{S} + 2\text{H}_2\text{O} + 122.2 \text{ K.cal.} \)
\( 2\text{S} + 2\text{H}_2\text{O} + 3\text{O}_2 \rightarrow 2\text{H}_2\text{SO}_4 + 248.4 \text{ K.cal.} \)
3. हाइड्रोजन जीवाणु (Hydrogen bacteria): ये जीवाणु हाइड्रोजन गैस को जल में बदलते हैं और इस ऊर्जा का उपयोग रासायनिक संश्लेषण में करते हैं. उदाहरण: बेसिलस पेन्टोट्रोफस (Bacillus pantotrophus) व हाइड्रोमोनास (Hydromonas) आदि.
\( 2\text{H}_2 + \text{O}_2 \rightarrow 2\text{H}_2\text{O} + 137 \text{ K.cal.} \)
4. नाइट्रीकारी जीवाणु (Nitrifying bacteria): ये जीवाणु नाइट्रोजन यौगिकों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और दो प्रकार के होते हैं:
• अमोनिया को नाइट्रेट्स में ऑक्सीकृत करने वाले, जैसे नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas), नाइट्रोबेक्टर (Nitrobacter) तथा नाइट्रोकोकस (Nitrococcus) आदि.
• ये जीवाणु नाइट्राइट्स को नाइट्रेट्स में बदल देते हैं, जैसे नाइट्रोबेक्टर (Nitrobacter) तथा बैक्टोडर्मा (Bactodermma) आदि.
\( 2\text{NH}_3 + 3\text{O}_2 \rightarrow 2\text{HNO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} + 158 \text{ K.cal.} \)
\( 2\text{HNO}_2 + \text{O}_2 \rightarrow 2\text{HNO}_3 + 38 \text{ K.cal.} \)
5. इनके अलावा कुछ जीवाणु रसायन कार्बनपोषी (Chemo organotrophs) होते हैं जो कार्बन व इसके यौगिकों का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में करते हैं. ये निम्न प्रकार के हैं:
• मीथेन जीवाणु (Methane bacteria): ये जीवाणु मीथेन (CH4) गैस को CO2 व H2O में ऑक्सीकृत कर देते हैं, जैसे मीथेनोकोकस (Methanococcus), लेक्टोबेसिलस (Lactobacillus) व एसीटोबेक्टर (Acetobactor) आदि.
\( \text{CH}_4 + 2\text{O}_2 \rightarrow \text{CO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} + \text{ऊर्जा} \)
• कार्बन जीवाणु (Carbon bacteria): ये जीवाणु CO को ऑक्सीकृत करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं, जैसे-बेसिलस ओलीगोकार्बोफिलस (Bacillus oligocarbophilus).
\( 2\text{CO} + \text{O}_2 \rightarrow 2\text{CO}_2 + \text{ऊर्जा} \)
(ब) परपोषी जीवाणु (Heterotrophic bacteria): ज़्यादातर जीवाणु परपोषी होते हैं, क्योंकि इनमें रंगद्रव्य नहीं होते. ऐसे जीवाणु जटिल कार्बनिक यौगिकों को एन्जाइम की मदद से घुलनशील बनाकर सोख लेते हैं. ये तीन प्रकार के होते हैं –
In simple words: जीवाणु बहुत छोटे प्रोकैरियोटिक जीव होते हैं जिनकी कोशिका में भित्ति, झिल्ली और जीवद्रव्य होता है. इनमें कशाभिकाएँ भी हो सकती हैं. पोषण के लिए, ये या तो प्रकाश या रसायन से अपना भोजन खुद बनाते हैं (स्वपोषी), या दूसरे जीवों या मृत पदार्थों से भोजन लेते हैं (परपोषी).

🎯 Exam Tip: जीवाणु की संरचना के मुख्य अंगों और उनके कार्यों को स्पष्ट करें, और पोषण की विभिन्न विधियों (स्वपोषी, रसायन संश्लेषी, परपोषी) को उदाहरणों और रासायनिक समीकरणों के साथ समझाएँ.

 

Question 3. जीवाणुओं में अलैंगिक जनन समझाइये।
Answer: जीवाणुओं में अलैंगिक जनन मुख्य रूप से अन्तःबीजाणुओं (endospores) के द्वारा होता है। हालाँकि, कुछ जीवाणुओं में कोनिडिया, चलबीजाणु और पुटी (cyst) से भी प्रजनन होता है।
1. अन्तःबीजाणुओं द्वारा (By endospores): ये बीजाणु तब बनते हैं जब परिस्थितियाँ कठिन होती हैं। ये क्लॉस्ट्रिडियम और बेसिलस जैसे जीवाणुओं में मिलते हैं। कोशिका का अंदरूनी तरल हिस्सा सिकुड़कर गोल हो जाता है और एक झिल्ली से ढक जाता है। इस झिल्ली के बाहर एक परत होती है जिसे वल्कुट कहते हैं। वल्कुट में कुछ खास रसायन होते हैं जो अन्तःबीजाणु को बहुत कम या बहुत ज़्यादा तापमान से बचाते हैं। इसी वजह से अन्तःबीजाणु भौतिक और रासायनिक बदलावों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। यह जीवाणु को मुश्किल हालातों में जिंदा रहने में मदद करता है। टाइफाइड और एन्ट्रेक्स जैसी बीमारियों के जीवाणुओं में ही अन्तःबीजाणु बनते हैं। अन्तःबीजाणु के कोशिकाद्रव्य में डीएनए (DNA) और राइबोसोम होते हैं।
DNA कणिकायें रिक्तिका क्रोड (Core) DNA अंत: बीजाणु बाह्य चोल अंतः बीजाणु भित्ति बाह्य चोल परत अंतः बीजाणु भीतरी भित्ति आनुवंशिक पदार्थ भित्ति वल्कुट क्रोड भित्ति (Core wall) क्रोड झिल्ली A B अन्तःबीजाणु (Endospore) : A. अन्तःबीजाणु युक्त जीवाणु कोशिका तथा B. अन्तःबीजाणु को अनुप्रस्थ व्यवस्था में दर्शाते हुएएक जीवाणु की कोशिका से एक ही अन्तःबीजाणु बनता है और यह प्रतिकूल परिस्थितियों तक सोया रहता है। जब स्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो बीज चोल फटकर जीवद्रव्य बाहर आता है और एक नया जीवाणु बनता है। एक जीवाणु कोशिका से एक ही अन्तःबीजाणु बनता है, इसलिए इसे प्रजनन नहीं कहा जा सकता। यह जीवाणु का मुश्किल समय में खुद को बचाने का एक तरीका है।
2. कोनिडिया के द्वारा (By conidia): स्ट्रेप्टोमाइसीज (Streptomyces) जैसे तंतु वाले जीवाणुओं में कोनिडिया एक श्रृंखला में एक के बाद एक जुड़े रहते हैं। हर कोनिडिया एक नया जीवाणु बनाता है।
कोनिडिया कोनिडिया की श्रृंखला कोनिडिया द्वारा अलैंगिक जनन3. चलबीजाणुओं के द्वारा (By Zoospore): कभी-कभी जीवाणु कोशिका से छोटे, हिलने वाले बीजाणु बनते हैं, जिनसे नए जीवाणु पैदा होते हैं। जैसे राइजोबियम में ऐसा होता है।
4. पुटी (Cyst): ऐजोटोबैक्टर जैसे जीवाणु मोटी दीवारों वाले बीजाणु बनाते हैं, जिन्हें पुटी कहते हैं। इनकी दीवारें बहुत मोटी होती हैं।
In simple words: जीवाणु अलग-अलग तरीकों से अलैंगिक प्रजनन करते हैं, जैसे कि कठिन परिस्थितियों में अन्तःबीजाणु बनाकर, श्रृंखला में कोनिडिया बनाकर, या हिलने वाले चलबीजाणु और मोटी दीवार वाली पुटी बनाकर। ये सभी तरीके नए जीवाणु बनाने में मदद करते हैं या मुश्किल समय में जीवाणु को बचाते हैं।

🎯 Exam Tip: अलैंगिक प्रजनन के विभिन्न तरीकों और उनके उदाहरणों को याद रखें, खासकर उन तरीकों को जिनसे जीवाणु कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं।

 

Question 5. माइकोप्लाज्मा की संरचना एवं जनन का वर्णन कीजिए।
Answer: माइकोप्लाज्मा की संरचना (Structure of Mycoplasma):
माइकोप्लाज्मा प्रोकैरियोटिक और एककोशिकीय जीव हैं। इनकी कोशिका में कोशिका भित्ति (cell wall) नहीं होती है। इनकी बाहरी परत लाइपोप्रोटीन से बनी होती है, जो तीन परतों वाली एक पतली झिल्ली होती है। इस झिल्ली में लिपिड (वसा) और कोलेस्ट्रॉल होते हैं। क्योंकि इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती, इसलिए एंजाइम और पेनिसिलिन जैसी दवाएं इन पर असर नहीं करतीं।
प्लाज्मा झिल्ली के अंदर कोशिका का तरल पदार्थ (कोशिका द्रव्य) होता है। इसमें झिल्ली वाले कोशिकांग, केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका नहीं होते हैं। कभी-कभी इसमें छोटी रिक्तिकाएँ और 70S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं। कोशिका द्रव्य में खुला, गोल, दोहरी कुंडली वाला डीएनए (DNA) होता है। इसमें 70S राइबोसोम, एक कुंडली वाला आरएनए (RNA), वसा, घुलनशील प्रोटीन और एंजाइम जैसे दूसरे पदार्थ भी होते हैं।
लाइपोप्रोटीन कला या झिल्ली DNA घुलनशील RNA घुलनशील प्रोटीन उपापचयी पदार्थ राइबोसोम माइकोप्लाज्मा कोशिका की संरचनाप्रजनन (Reproduction):
मोरोविट्ज और टॉरटिलोरी (1962) के अनुसार, माइकोप्लाज्मा में लैंगिक और अलैंगिक प्रजनन नहीं होता है। इसके बजाय, यह विखंडन (टुकड़ों में बटना), मुकुलन (कलियाँ बनना), द्विविभाजन (दो भागों में बटना) और छोटी शुरुआती संरचनाओं (प्राथमिक संरचनाओं) से बढ़ता है। प्रजनन प्रक्रिया में ये प्राथमिक संरचनाएँ बहुत खास होती हैं। सबसे पहले, माइकोप्लाज्मा कोशिका से छोटे गोल आकार की संरचनाएँ बनती हैं, जिन्हें प्राथमिक संरचनाएँ कहते हैं। जैसे-जैसे ये बढ़ती हैं, इन्हें द्वितीयक और तृतीयक संरचनाएँ कहा जाता है। जब यह पूरी तरह से विकसित हो जाती है और कोशिका से अलग होती है, तो उसे चतुर्थ संरचना कहते हैं, और यही संरचना माइकोप्लाज्मा कोशिका में विकसित होती है।
प्राथमिक काय छोटी कोशिका मध्यवर्ती कोशिका बड़ी कोशिका द्विभाजन माइकोप्लाज्मा में जनन1. रोग संचरण (Disease transmission):
माइकोप्लाज्मा से होने वाले पौधों के रोग एक खास कीट (लीफ हॉपर) से फैलते हैं। यह पौधा लगाने या कलम बांधने (ग्राफ्टिंग) से भी फैल सकता है। अमरबेल जैसे परजीवी पौधे के ज़रिए भी यह रोग एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुँचता है।
In simple words: माइकोप्लाज्मा बहुत छोटे, बिना कोशिका भित्ति वाले जीव हैं जिनकी बाहरी परत त्रिस्तरीय होती है। इनके अंदर डीएनए, आरएनए और राइबोसोम होते हैं लेकिन केंद्रक झिल्ली या कोशिकांग नहीं होते। ये विखंडन, मुकुलन और द्विविभाजन जैसे सरल तरीकों से प्रजनन करते हैं, और पौधों में कीटों, ग्राफ्टिंग या परजीवी पौधों से रोग फैलाते हैं।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा की अद्वितीय विशेषताओं, जैसे कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति और विभिन्न प्रजनन विधियों पर ध्यान दें। रोग संचरण के तरीकों को भी याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. माइकोप्लाज्मा की प्रकृति एवं लक्षणों का वर्णन कीजिए।
Answer: माइकोप्लाज्मा के सामान्य लक्षण (General characters of Mycoplasma):
• माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे जीव होते हैं।
• ये एककोशिकीय, अचल (हिलते नहीं), प्रोकैरियोटिक होते हैं और तले हुए अंडे (fried egg) जैसी कॉलोनी बनाते हैं।
• ये गोल या अंडाकार समूह बनाते हैं और मिट्टी, गंदे पानी, सड़े हुए पदार्थों, जानवरों और पौधों में पाए जाते हैं। ये कई आकार (बहुआकृतिक या बहुरूपी) के होते हैं, जैसे गोल, धागे जैसे या तारे के आकार के।
• इसीलिए माइकोप्लाज्मा को 'जीव जगत का जोकर' भी कहा जाता है। इनका आकार उस माध्यम पर निर्भर करता है जिसमें इन्हें उगाया जाता है। माइकोप्लाज्मा जैलीसेप्टीकम की कोशिका कोका-कोला बोतल जैसी होती है।
• इन्हें कोशिका के अतिरिक्त स्वतंत्र माध्यम में भी उगाया जा सकता है। अगर इन्हें अचानक पतले पानी में डाल दें तो इनकी कोशिकाएँ फूलकर फट जाती हैं।
• माइकोप्लाज्मा परजीवी (दूसरे जीवों पर जीते हैं) या मृतोपजीवी (सड़े हुए पदार्थों पर जीते हैं) होते हैं।
• इन्हें जीवाणु फिल्टर से छानना मुश्किल होता है क्योंकि इनका आकार 100 से 500mm तक होता है।
• इनमें कोशिका भित्ति (cell wall) नहीं होती और इनकी बाहरी परत तीन परतों वाली लिपोप्रोटीन झिल्ली से बनी होती है।
• माइकोप्लाज्मा में डीएनए (लगभग 4%) और आरएनए (लगभग 8%) दोनों मौजूद होते हैं।
• इनकी वृद्धि के लिए स्टीरोल की ज़रूरत होती है।
• ये पेनिसिलिन, वेनकोमाइसीन, सिफेलोरीडीन जैसे कुछ एंटीबायोटिक दवाओं से प्रभावित नहीं होते, लेकिन टेट्रासाइक्लीन और क्लोरेम्फनिकोल जैसी दवाओं से प्रभावित होते हैं। ये दवाएं उनकी मेटाबॉलिक क्रियाओं को रोकती हैं।
माइकोप्लाज्मा शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय दोनों इलाकों में पाए जाते हैं, लेकिन उष्ण क्षेत्रों की फसलों (जैसे कपास, धान, आलू, मक्का) में ज़्यादा रोग फैलाते हैं। जापानी वैज्ञानिक डोय (1967) ने बताया कि ये रोगी पौधों में भी मिलते हैं। माइकोप्लाज्मा से संक्रमित पौधों में ये फ्लोयम (भोजन ले जाने वाले ऊतक) की चालनी नलिकाओं और मृदूतक में पाए जाते हैं। डोय ने यह भी बताया कि फ्लोयम का उच्च दबाव और क्षारीय पीएच मान माइकोप्लाज्मा के बढ़ने के लिए अच्छे होते हैं। ये कीटों, जानवरों और मनुष्यों की लार ग्रंथियों में भी रहते हैं, साथ ही फूलों की मकर ग्रंथियों और पुराने क्लोरोप्लास्ट में भी पाए जाते हैं।
A B E माइकोप्लाज्मा कोशिकाओं की विभिन्न आकृति व आमाप की कॉलोनीवर्गीकरण (Classification):
वर्ग (Class): मोलीक्यूट्स (Mollicutes)
गण (Order): माइकोप्लाज्मेटेलीज (Mycoplasmatales)
कुल (Family): माइकोप्लाज्मेटेसी (Mycoplasmatacae)
वंश (Genus): माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma)
In simple words: माइकोप्लाज्मा छोटे, बिना कोशिका दीवार वाले जीव हैं जो प्रोकैरियोटिक होते हैं और अलग-अलग आकार ले सकते हैं, इसलिए इन्हें 'जोकर' कहते हैं। इनमें डीएनए, आरएनए और राइबोसोम होते हैं, और ये कुछ एंटीबायोटिक दवाओं से अप्रभावित रहते हैं। ये पौधों, जानवरों और मनुष्यों में रोग पैदा कर सकते हैं और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा के मुख्य लक्षणों, जैसे कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति, बहुआकृतिक स्वभाव और एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिक्रिया को ध्यान में रखें। उनका वर्गीकरण और रोगजनक भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. ऐलेक्सोपॉलस द्वारा प्रस्तावित कवकों के वर्गीकरण की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
Answer: कवकों का वर्गीकरण (Classification of Fungi):
कई वैज्ञानिकों ने कवकों को अलग-अलग तरीकों से बांटा है। यहाँ हम ऐलेक्सोपॉलस (1962, 1968) के वर्गीकरण को समझेंगे। ऐलेक्सोपॉलस ने सभी कवकों को 'माइकोटा' नाम के एक बड़े समूह में रखा। फिर, उन्होंने कोशिका भित्ति (कोशिका दीवार) की उपस्थिति के आधार पर माइकोटा को दो छोटे समूहों में बांटा: मिक्सोमाइकोटिना तथा यूमाइकोटिना।
ये उप-डिवीजन आगे और छोटे समूहों में बंटे हैं:
(अ) उप-डिवीजन मिक्सोमाइकोटिना: इनमें पौधों जैसा शरीर होता है जो नंगे जीवद्रव्य के रूप में होता है, जिसे प्लाज्मोडियम कहते हैं।
1. संवर्ग-मिक्सोमाइसिटिज: इनका शुरुआती रूप एक बड़े, कई केंद्रक वाले नंगे जीवद्रव्य जैसा होता है। ये छोटे, कई केंद्रक वाले और दीवार वाले बीजाणुओं से पैदा होते हैं। जैसे फाइसेरम।
(ब) उप-डिवीजन-यूमाइकोटिना: इनमें शुरुआती रूप एक कोशिका वाला या कई कोशिका वाला फफूंद का जाल जैसा होता है। इनकी कोशिका दीवार साफ दिखती है। फफूंद के धागे में दीवार हो सकती है या नहीं भी, और इसमें एक, दो या कई केंद्रक हो सकते हैं। इनमें लैंगिक और अलैंगिक दोनों तरह से प्रजनन होता है। यूमाइकोटिना को निम्नलिखित आठ वर्गों तथा एक कृत्रिम वर्ग में बांटा गया है:
संवर्ग 1. काइट्रिडियोमाइसिटिज: इनका पौधों जैसा शरीर एक कोशिका वाला, पूर्ण या धागे जैसा होता है। बीजाणु चल होते हैं। जैसे सिनकाइट्रियम।
संवर्ग 2. हाइपोकाइट्रिडियोमाइसिटिज: इसमें वे कवक आते हैं जो पानी में रहते हैं। इनके चल बीजाणु हिलने-डुलने वाले होते हैं, जिनमें एक कशाभिका (पूँछ) सामने की ओर होती है। जैसे राइजिडियोमाइसिज।
संवर्ग 3. ऊमाइसिटिज: इसमें वे कवक आते हैं जो परजीवी या मृतोपजीवी होते हैं। इनका कवक जाल बिना दीवार वाला होता है और इसमें कई केंद्रक होते हैं। चल बीजाणुओं में दो कशाभिकाएँ होती हैं, एक आगे और एक पीछे। जैसे एल्बूगो।
संवर्ग 4. प्लाज्मोडियोफोरोमाइसिटिज: इस वर्ग के कवक परजीवी होते हैं। इनमें कोशिका दीवार नहीं होती है। इनका कई केंद्रक वाला शरीर या हिस्सा मेज़बान ऊतक में रहता है। चल बीजाणुओं में दो अलग-अलग और चाबुक जैसी कशाभिकाएँ होती हैं। जैसे प्लाज्मोडियोफोरा।
संवर्ग 5. जाइगोमाइसिटिज: इसमें ज्यादातर मृतोपजीवी या परजीवी कवक होते हैं। इनका कवक जाल कई केंद्रक वाला होता है, बीजाणु हिलते नहीं हैं, और लैंगिक प्रजनन एक जैसे युग्मकों से होता है। जैसे म्यूकर।
संवर्ग 6. ट्राइकोमाइसिटिज: इनका शरीर साधारण या शाखाओं वाला और कई केंद्रक वाला होता है। ये आर्थ्रोपोडा समूह के जीवों की आँतों या त्वचा पर परजीवी के रूप में बढ़ते हैं। जैसे न्यूरोस्पोरा।
संवर्ग 8. बेसिडियोमाइसिटिज: इनके फफूंद के धागों में दीवारें होती हैं और उनमें एक या दो केंद्रक होते हैं। लैंगिक प्रजनन में बेसिडियम बनता है, जिससे अर्धसूत्री विभाजन के बाद बाहर की ओर बेसिडियो बीजाणु बनते हैं। इस वर्ग के सदस्य ज्यादातर मृतोपजीवी या परजीवी होते हैं, और कभी-कभी सहजीवी भी होते हैं। जैसे पक्सीनिया, एगेरिकस।
कृत्रिम संवर्ग या फार्म क्लास: ड्यूटेरोमाइसिटिज: इसमें ज्यादातर मृतोपजीवी या परजीवी सदस्य होते हैं। इनके फफूंद के धागों में दीवारें होती हैं। इनमें सिर्फ अलैंगिक बीजाणुओं से प्रजनन होता है, लैंगिक प्रजनन नहीं होता। जैसे आल्टर्नेरिया।
In simple words: ऐलेक्सोपॉलस ने कवकों को 'माइकोटा' समूह में बांटा, फिर कोशिका भित्ति के आधार पर मिक्सोमाइकोटिना और यूमाइकोटिना में विभाजित किया। इन उप-डिवीजन में विभिन्न वर्ग हैं, जैसे काइट्रिडियोमाइसिटिज (चल बीजाणु), ऊमाइसिटिज (दो कशाभिकाएँ), जाइगोमाइसिटिज (अचल बीजाणु), बेसिडियोमाइसिटिज (बहिर्जात बीजाणु) और ड्यूटेरोमाइसिटिज (केवल अलैंगिक जनन)।

🎯 Exam Tip: ऐलेक्सोपॉलस के कवक वर्गीकरण की मुख्य डिवीजनों (मिक्सोमाइकोटिना, यूमाइकोटिना) और उनके संवर्गों के नाम व प्रमुख लक्षण याद रखें। प्रत्येक संवर्ग का एक-दो उदाहरण भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. कवकों के लाभदायक व हानिकारक प्रभावों का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
Answer: कवकों के लाभदायक और हानिकारक दोनों प्रभाव होते हैं:
(अ) कवकों के लाभदायक प्रभाव (Useful effects of fungi):
1. भोजन के रूप में: यीस्ट का उपयोग मनुष्य और जानवरों के लिए पौष्टिक भोजन के तौर पर होता है। कई मशरूम, जैसे खंभी, गुच्छी और कंद, प्रोटीन, नमक और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं, इसलिए इन्हें खाया जाता है। उदाहरण के लिए, मॉर्केला एस्क्यूलेंटा, एगेरिकस बाइस्पोरा और ए. केम्पेस्ट्रिस।
2. औद्योगिक उपयोग: कई फफूंदों का उपयोग शराब, एंजाइम और कार्बनिक अम्ल बनाने के लिए होता है। जैसे, साइट्रोमाइसेस फेफेरियानस से साइट्रिक अम्ल, पेनिसिलियम ऑक्सैलिकम से ऑक्सैलिक अम्ल और एस्परजिलस ओराइजी से लैक्टिक अम्ल मिलते हैं।
3. दवा बनाने में उपयोग: कवकों से कई एंटीबायोटिक दवाएं मिलती हैं। जैसे, पेनिसिलियम नोटेटम से पेनिसिलिन, एमरीसिलॉप्सिस पुनेन्सिस से एंटीअमीबिन और पेनिसिलियम फ्यूनीकुलोसम से हेलेन मिलती है। इसके अलावा, क्लेवीसेप्स परपुरिया जैसे कवकों से अर्गोटामिन और अर्गोटॉक्सिन जैसे एल्केलॉइड मिलते हैं, जो गंभीर बीमारियों में काम आते हैं। म्यूकर ग्रसियो साइनस और राइजोपस स्टोलोनिफर से स्टेरॉइड मिलते हैं, जिनका उपयोग गठिया और एलर्जी के इलाज में होता है।
(ब) कवकों के हानिकारक प्रभाव (Harmful effects of fungi):
1. पादप रोग (Plant diseases): फफूंद पौधों में कई तरह की बीमारियाँ पैदा करती है, जिससे फसल कम होती है। कुछ मुख्य पौधों के रोग निम्न प्रकार से हैं:

कवक (Fungi)पादप रोग (Plant Diseases)
1. ऐल्बूगो केन्डिडा (Albugo candida)1. कुसीफैरी कुल के सदस्यों में श्वेत किट्ट (White rust) रोग
2. स्क्लेरोस्पोरा ग्रेमीनिकोला (Sclerospora graminicola)2. बाजरे का हरित वाली रोग (Green – year disease)
3. पक्सीनिया ग्रेमिनिस (Puccinia graminis)3. गेहूँ का काला किट्ट रोग (Black rust disease)
4. अस्टिलैगो (Ustilago)4. निरावृत्त व आवृत्त कण्ड रोग (Loose and covered smut disease)
5. सर्कोस्पोरा पनिटा (Cercospora personata)5. मूंगफली का टिक्का रोग (Tikka disease of ground nut)
6. कोलीटोट्राइकम फल्केटम (Colletotrichum fulcatum)6. गन्ने का लाल सड़न रोग (Red rot of sugar cane)
2. पशुओं में कवक रोग (Fungal disease of animals): कुछ फफूंद पशुओं के शरीर में परजीवी बनकर कई बीमारियाँ पैदा करती हैं। जैसे, टाइनिया रुब्रम से एथलीट फुट, ट्राइकोफॉइटान से दाद और एस्परजिलस फ्यूमिगेट्स से फेफड़ों का संक्रमण होता है। त्वचा और श्वास नली का संक्रमण 'कैंडिडियोसिस' कैंडिडा एल्बीकेन्स से होता है।
3. खाद्य पदार्थों का खराब होना (Spoilage of foodstuffs): म्यूकर, राइजोपस, एस्परजिलस, पेनिसिलिन और यीस्ट जैसे कई फफूंद खाने की चीजों को खराब करते हैं। म्यूकर और राइजोपस की कुछ किस्में डबलरोटी और अचार पर उगती देखी जा सकती हैं। म्यूकर, ओइडियम, लैक्टिस, पेनिसिलिन और क्लेडोस्पोरियम जैसे फफूंद डेयरी उत्पादों को भी खराब करते हैं। कुछ फफूंद इमारती लकड़ी, कागज और चमड़े की वस्तुओं को भी नुकसान पहुँचाते हैं। एमेनिटा फफूंद मतिभ्रम पैदा करने वाली होती है।
In simple words: कवक हमारे लिए भोजन, दवाएं और औद्योगिक उत्पाद बनाने में उपयोगी होते हैं, जैसे यीस्ट और पेनिसिलिन। लेकिन वे फसलों, पशुओं और मनुष्यों में रोग भी फैलाते हैं, जैसे पौधों में किट्ट रोग, पशुओं में दाद और भोजन को खराब कर देते हैं।

🎯 Exam Tip: कवकों के लाभदायक और हानिकारक दोनों प्रभावों को उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से औद्योगिक और औषधीय उपयोगों के साथ-साथ पौधों और पशुओं में होने वाले प्रमुख रोगों पर ध्यान दें।

 

Question 17. लाइकेन किसे कहते हैं ?
Answer: लाइकेन (Lichens): शैवाल और फफूंद मिलकर लाइकेन बनाते हैं। ये दोनों एक-दूसरे की मदद करके साथ रहते हैं, जिसे सहजीवन (symbiosis) कहते हैं। फफूंद आसपास से पानी और खनिज लेकर शैवाल को देती है, और शैवाल सूर्य के प्रकाश में खाना बनाकर फफूंद को देता है। यह सहजीवन का एक अच्छा उदाहरण है।
लाइकेन का ज़्यादातर शरीर फफूंद से बना होता है, जिसे माइकोबायोन्ट कहते हैं। ये फफूंद एस्कोमाइसिटीज या बेसिडियोमाइसिटीज समूह के होते हैं। कवक के जाल के बीच मिक्सोफाइसी या क्लोरोफाइसी समूह का शैवाल होता है, जिसे फाइकोबायोन्ट कहते हैं।
लाइकेन किसी जगह पर अपनी निचली सतह से राइजीन (जड़ों जैसी संरचना) की मदद से चिपके रहते हैं। राइजीन पतले, शाखित या बिना शाखाओं वाले फफूंद के धागे होते हैं। लाइकेन का शरीर ऊपर और नीचे दो हिस्सों में बंटा होता है। ऊपरी सतह गहरे भूरे या हल्के भूरे रंग की होती है, जबकि निचली सतह काले रंग की होती है। लाइकेन की अंदरूनी बनावट जटिल होती है। इसमें ऊपर की परत (वल्कुट), शैवाल वाला हिस्सा, बीच का गूदा (मज्जा क्षेत्र) और नीचे की परत होती है।
लाइकेन में कायिक जनन (शरीर के टुकड़ों से) और सोरिडिया या इसिडिया जैसी खास संरचनाओं से होता है। लाइकेन में लैंगिक प्रजनन पूरी तरह से फफूंद पर निर्भर करता है। अगर फफूंद एस्कोमाइसिटीज समूह का है, तो लैंगिक प्रजनन एस्को बीजाणुओं से होता है। ये बीजाणु एस्काई में बनते हैं, जो फलनपिंडों में होते हैं और इन्हें एपोथिसियम कहते हैं। नर और मादा जननांगों को स्पोरोगोनियम और कार्पोगोनियम कहते हैं।
लाइकेन के प्रकार (Types of Lichens):
बाहरी बनावट के आधार पर लाइकेन को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
1. पर्पटीमय लाइकेन (Crustose lichen): ये लाइकेन चपटे और कठोर होते हैं, जिनका रंग भूरा, लाल, धूसर, पीला या काला होता है। इनकी निचली सतह किसी जगह पर पपड़ी की तरह मजबूती से चिपकी रहती है। कुछ लाइकेन पेड़ों की छाल में पूरी तरह या आंशिक रूप से धंसे होते हैं। इनमें फलनपिंड इनकी ऊपरी सतह पर पाए जाते हैं। उदाहरण: ग्रैफिस, लोकेनोरा, लेसीडिया, राइजोकार्पोन और हीमोटोमा।
2. पर्णिल लाइकेन (Foliose lichen): ये चपटे, फैले हुए और पत्तों जैसे मुड़े हुए होते हैं। पर्पटीमय लाइकेन की तरह इनकी पूरी निचली सतह किसी आधार से चिपकी नहीं होती है। इनकी निचली सतह से जड़ों जैसे धागे (राइजीन) निकलते हैं। ये राइजीन की मदद से आधार पर चिपके रहते हैं। उदाहरण: पारमेलिया और गायरोफोरा।
3. फलयुक्त अथवा क्षुपिल लाइकेन (Fruticose lichen): इनका थैलस अच्छी तरह से विकसित, झाड़ी जैसा और शाखाओं वाला होता है। ये ऊपर की ओर बढ़ते हैं या पेड़ों के तनों से नीचे लटके रहते हैं। इस तरह के लाइकेन एक चिपचिपी डिस्क की मदद से आधार पर चिपकते हैं। उदाहरण: क्लैडोनिया और यूसनिया।
फलनकाय A अधोस्तर B पालित थैलस अधोस्तर शाखित थैलस एपोथीसिया लाइकेन : A. पर्पटीमय लाइकेन B. पर्णिल लाइकेन C. क्षुपिल लाइकेनलाइकेन का आर्थिक महत्व (Economic importance of Lichaera):
1. शैल अनुक्रमण में: चट्टानों पर नए पौधों के उगने की प्रक्रिया में कई पर्पटीमय लाइकेन सबसे पहले आते हैं। ये पौधों के बढ़ने की शुरुआत करते हैं। जैसे लेसीडिया और राइजोकार्पोन।
2. वायु प्रदूषण के सूचक: लाइकेन वायु प्रदूषण को दिखाते हैं। ये सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) गैस को सहन नहीं कर पाते, और अगर हवा में SO₂ ज़्यादा हो तो ये मर जाते हैं।
3. भोजन और चारे के रूप में: पुराने समय से ही लाइकेन का उपयोग भोजन के लिए होता आ रहा है। उत्तरी ध्रुव के टुंड्रा और पूर्वी साइबेरिया में लाइकेन जानवरों के चारे का मुख्य हिस्सा हैं। लीकेनोरा, पारमेलिया और एंबिलिकेरिया जैसे लाइकेन दुनिया के कई हिस्सों में भोजन के रूप में उपयोग होते हैं। दक्षिण भारत में पारमेलिया की जातियों को 'शिलापुष्प' कहते हैं और खाया जाता है। लाइकेन में लाइकेनिन नामक कार्बोहाइड्रेट होता है। इसमें असली स्टार्च और सेलुलोज नहीं होता। यीस्ट के आविष्कार से पहले, मिस्र के लोग बेकिंग में एवर्निया का इस्तेमाल करते थे। जापान में एंडोकॉर्पोन को सब्जी के रूप में खाया जाता है। एस्पिसिलिया कैलकेरिया, लीकेनोरा और सैक्सीकोला जैसे लाइकेन कई कीटों, जैसे घोंघे, इल्लियों और दीमक के लिए भोजन होते हैं। लाइकेन को पानी में भिगोने से उनमें मौजूद कड़वे पदार्थ निकल जाते हैं तथा अकाल की परिस्थितियों में इनका उपयोग चारे के रूप में किया जाता है। लोबेरिया, एवर्निया और रैमालाइना पोषक तत्व के रूप में जानवरों के लिए उपयोगी हैं।
4. औषधीय उपयोग: बिच्छू के विष के उपचार में लाइकेन बहुत उपयोगी होता है। क्लैडोनिया, सिटेरिया और पर्टसेरिया की किस्में टाइफाइड बुखार और काली खांसी में उपयोग होती हैं। असनिया की कई किस्में खून बहना रोकने में काम आती हैं। कई आयुर्वेदिक दवाओं में लाइकेन एक मुख्य घटक है।
5. अभिरंजक के रूप में: कई लाइकेन से रंग बनते हैं। पुराने समय से ही इनका उपयोग लाल, नीला और बैंगनी रंग बनाने में होता रहा है। रॉसेला से नीला रंग 'ऑरसीन' मिलता है, जो शुद्ध आर्चिल है। इसका उपयोग ऊतकों की जाँच में दाग लगाने के लिए होता है। दक्षिण भारत में इसे नारियल की जटा को रंगने में भी इस्तेमाल करते हैं। रोसेला टिंक्टोरिया लाइकेन से लिटमस घोल बनता है, जिससे लिटमस पेपर बनाया जाता है।
6. चमड़ा उद्योग में: सीटेरिया आइसलैंडिका और लोबेरिया का उपयोग चमड़े को मुलायम करने के लिए होता है। इनके शरीर में लीकेनोरिक अम्ल और एरिथ्रन जैसे पदार्थ होते हैं। अमोनिया के साथ क्रिया करने पर इनसे ऑरसीन और कार्बनिक अम्ल मिलते हैं।
7. किण्वन और आसवन: रूस, साइबेरिया जैसे कई देशों में क्लेडोनिया का उपयोग शराब बनाने में होता है।
हानिकारक प्रभाव: गर्मियों में कुछ लाइकेन सूखकर आग पकड़ सकते हैं, जिससे जंगल में आग लग सकती है। कुछ लाइकेन ज़हरीले भी होते हैं, जिन्हें खाने से पशु मर सकते हैं। नमी वाले इलाकों में कई लाइकेन घरों की खिड़कियों, दरवाजों, सीमेंट की दीवारों और संगमरमर के फर्श पर उग जाते हैं। इनसे निकलने वाले अम्ल इन चीजों को नुकसान पहुँचाते हैं।
In simple words: लाइकेन शैवाल और फफूंद का एक साथ रहना (सहजीवन) है, जिसमें फफूंद पानी देती है और शैवाल भोजन बनाता है। ये वायु प्रदूषण के सूचक हैं, भोजन और चारे के रूप में उपयोग होते हैं, और दवाएँ व रंग बनाने में भी काम आते हैं। हालांकि, कुछ लाइकेन जंगलों में आग लगा सकते हैं या जहरीले हो सकते हैं।

🎯 Exam Tip: लाइकेन के सहजीवी संबंध, उनके विभिन्न प्रकार (क्रस्टोज, फोलियोस, फ्रूटिकोस) और उनके आर्थिक महत्व को याद रखें। वायु प्रदूषण सूचक के रूप में उनकी भूमिका को विशेष रूप से उल्लेख करें।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. जीवाणु में श्वसन क्रिया का स्थान है –
(अ) एपीसोम
(ब) राइबोसोम
(स) माइक्रोसोम
(द) मीसोसोम
Answer: (द) मीसोसोम
In simple words: जीवाणु में सांस लेने का काम मीसोसोम नामक जगह पर होता है, जो कोशिका झिल्ली का ही एक हिस्सा होता है।

🎯 Exam Tip: प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में श्वसन स्थल के रूप में मीसोसोम की भूमिका को याद रखें, क्योंकि उनमें माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होते।

 

Question 3. अति प्राचीनतम जीवाणु है -
(अ) आर्किबैक्टिरिया
(ब) यूबैक्टिरिया
(स) सायनोबैक्टिरिया
(द) माइकोप्लाज्मा
Answer: (अ) आर्किबैक्टिरिया
In simple words: आर्किबैक्टिरिया सबसे पुराने प्रकार के जीवाणु हैं जो बहुत कठिन वातावरण में भी रह सकते हैं।

🎯 Exam Tip: आर्किबैक्टिरिया की अनूठी विशेषताओं, जैसे उनके चरम वातावरण में रहने की क्षमता, को पहचानें।

 

Question 4. माइकोप्लाज्मा में जनन की प्रमुख विधियाँ हैं –
(अ) अलैंगिकृ
(ब) लैंगिक
(स) जाइगोस्पोर
(द) द्विखण्डन तथा मुकलन
Answer: (द) द्विखण्डन तथा मुकलन
In simple words: माइकोप्लाज्मा मुख्य रूप से दो भागों में बंटकर (द्विखण्डन) या छोटी कलियाँ बनाकर (मुकलन) नए जीव पैदा करता है।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा में प्रजनन के प्रमुख अलैंगिक तरीकों (द्विखण्डन और मुकुलन) को याद रखें, क्योंकि उनमें लैंगिक प्रजनन नहीं होता।

 

Question 5. माइकोप्लाज्मा का अप्राकृतिक संवर्धन करने में किसकी अनिवार्यता होती है ?
(अ) पेनिसिलीन
(ब) मेनीटॉल
(स) स्टीरोल्स
(द) स्टार्च
Answer: (स) स्टीरोल्स
In simple words: माइकोप्लाज्मा को प्रयोगशाला में उगाने के लिए स्टीरोल्स की ज़रूरत होती है, क्योंकि ये उनकी बाहरी झिल्ली के लिए ज़रूरी होते हैं।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा की वृद्धि के लिए स्टीरोल्स की आवश्यकता पर ध्यान दें, यह उनकी कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण लक्षण है।

 

Question 6. जीवाणु के किस आनुवंशिक पुनर्योजन से विषाणु सम्बन्धित हैं -
(अ) ट्रान्सफारमेशन
(ब) ट्रान्सडक्सन
(स) कन्जुगेशन
(द) उपयुक्त में से कोई नहीं है
Answer: (ब) ट्रान्सडक्सन
In simple words: ट्रान्सडक्सन वह तरीका है जिसमें विषाणु (वायरस) जीवाणु के एक हिस्से को एक जीवाणु से दूसरे जीवाणु में ले जाते हैं, जिससे जीवाणुओं में नए गुण आते हैं।

🎯 Exam Tip: आनुवंशिक पुनर्संयोजन के विभिन्न तरीकों (ट्रांसफॉर्मेशन, ट्रांसडक्शन, कॉन्जुगेशन) को समझें और विशेष रूप से ट्रांसडक्शन में विषाणुओं की भूमिका को याद रखें।

 

Question 7. वलय रूप में DNA पाया जाता है –
(अ) जीवाणु में
(ब) कवक में
Answer: (अ) जीवाणु में
In simple words: जीवाणुओं में डीएनए (DNA) एक गोल, वलय जैसी संरचना में होता है, जो मनुष्यों या जानवरों के डीएनए से अलग होता है।

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं की प्रोकैरियोटिक प्रकृति को पहचानें, जिसमें उनके डीएनए का वलय रूप में होना एक प्रमुख विशेषता है, जो यूकैरियोटिक जीवों से भिन्न है।

 

Question 9. स्लाइम मोल्ड कवक किस वर्ग के अन्दर रखे गये हैं ?
(अ) मिक्सोफाइसी
(ब) मिक्सोमाइसिटीज
(स) ऐक्टिनोमाइसिटीज
(द) बैसिडियोमाइसिटीज
Answer: (ब) मिक्सोमाइसिटीज
In simple words: स्लाइम मोल्ड नामक कवक को मिक्सोमाइसिटीज वर्ग में रखा जाता है।

🎯 Exam Tip: कवकों के विभिन्न वर्गों और उनके उदाहरणों को याद रखना वर्गीकरण संबंधी प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. स्ट्रेप्टोमाइसिस ग्रीसस से कौनसा एन्टीबायोटिक बनता है –
(अ) स्ट्रेप्टोमाइसिन
(ब) टेरामाइसिन
(स) टेट्रासाइक्लिन
(द) पालीमिक्सिन
Answer: (अ) स्ट्रेप्टोमाइसिन
In simple words: स्ट्रेप्टोमाइसिस ग्रीसस नामक जीव से स्ट्रेप्टोमाइसिन नामक एक दवाई बनाई जाती है जो बैक्टीरिया को मारती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जीवाणुओं से बनने वाले एंटीबायोटिक्स और उनके उपयोगों को याद रखें।

 

Question 11. भूमि की उर्वर शक्ति किसकी उपस्थिति से बनती है ?
(अ) हरे शैवाल
(ब) भूरे शैवाल
(स) लाल शैवाल
(द) नीलहरित शैवाल
Answer: (द) नीलहरित शैवाल
In simple words: नीलहरित शैवाल, जिन्हें सायनोबैक्टीरिया भी कहते हैं, मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: नीलहरित शैवाल के जैविक महत्व को समझें, विशेषकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण में उनकी भूमिका।

 

Question 12. कौन से शैवाल प्रोटिस्टा में नहीं रखे जाते हैं –
(अ) लाल शैवाल
(ब) भूरे शैवाल
(स) हरे शैवाल
(द) नीले हरे शैवाल
Answer: (द) नीले हरे शैवाल
In simple words: नीले हरे शैवाल को प्रोटिस्टा जगत में नहीं बल्कि मोनेरा जगत में शामिल किया जाता है क्योंकि वे प्रोकैरियोटिक जीव होते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोटिस्टा जगत के जीवों की मुख्य विशेषताओं को जानें और उन्हें अन्य जगतों के जीवों से अलग करने वाले बिंदुओं को समझें।

 

Question 2. लैंगिक पुनर्योजन किस सूक्ष्मजीवी में होता है ?
Answer: जीवाणुओं में लैंगिक पुनर्योजन होता है।
In simple words: बैक्टीरिया जैसे छोटे जीवों में भी नए जीव बनाने के लिए दो जीवों का मिलना होता है।

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं में पुनर्योजन के विभिन्न तरीकों, जैसे संयुग्मन, रूपांतरण और पारक्रमण को जानें।

 

Question 3. लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों में उपस्थित ग्रन्थिकाओं में सहजीवन करने वाले जीवाणु का नाम बताइये।
Answer: लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ की गांठों में राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक जीवाणु सहजीवी रूप से रहते हैं।
In simple words: राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नाम का बैक्टीरिया दाल वाले पौधों की जड़ों में रहता है और पौधों की मदद करता है।

🎯 Exam Tip: राइजोबियम जीवाणु की नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भूमिका और सहजीवन संबंध को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 4. साइट्रस केंकर रोग किस जीवाणु द्वारा होता है ?
Answer: साइट्रस केंकर रोग जैन्थोमोनास सिट्राई नामक जीवाणु के कारण होता है।
In simple words: नींबू और संतरे जैसे खट्टे फलों में जैन्थोमोनास सिट्राई नामक बैक्टीरिया से साइट्रस केंकर नाम की बीमारी होती है।

🎯 Exam Tip: पौधों में होने वाले जीवाणु रोगों के नाम और उनके कारक जीवाणुओं को याद रखें।

 

Question 5. आर्किजीवाणुओं की कोशिका भित्ति में किसका अभाव होता है ?
Answer: आर्किजीवाणुओं की कोशिका भित्ति में म्यूरामिक अम्ल और पेप्टाइडोग्लाइकेन का अभाव होता है।
In simple words: आर्किजीवाणुओं की बाहरी दीवार में म्यूरामिक अम्ल और पेप्टाइडोग्लाइकेन नहीं होते हैं।

🎯 Exam Tip: आर्किजीवाणुओं और अन्य जीवाणुओं की कोशिका भित्ति की संरचना में अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. भूमि उद्धार में मोनेरा जगत के किस पादप का मुख्य योगदान होता है ?
Answer: भूमि उद्धार में जीवाणु तथा नीलहरित शैवाल जैसे मोनेरा जगत के पादपों का मुख्य योगदान होता है।
In simple words: मिट्टी को बेहतर बनाने में बैक्टीरिया और नीले-हरे शैवाल बहुत काम आते हैं।

🎯 Exam Tip: मोनेरा जगत के जीवों की पर्यावरण में भूमिका को उदाहरण सहित स्पष्ट करें।

 

Question 7. उन जीवाणुओं के नाम बताओ जिनमें अन्त:बीजाणु बनते हैं।
Answer: क्लॉस्ट्रीडियम और बैसिलस नामक जीवाणुओं में अन्त:बीजाणु बनते हैं।
In simple words: क्लॉस्ट्रीडियम और बैसिलस बैक्टीरिया मुश्किल समय में अपने अंदर एक खास तरह का बीजाणु बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: अंतःबीजाणु बनाने वाले जीवाणुओं के नामों को याद रखें और अंतःबीजाणु के महत्व को समझें।

 

Question 8. पाश्चर ने कौन सा सिद्धान्त तथा किस विधि को विकसित किया ?
Answer: इस्चेरिया कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु का अध्ययन पाश्चर ने किया।
In simple words: पाश्चर ने ई. कोलाई नामक जीवाणु पर शोध किया।

🎯 Exam Tip: लुई पाश्चर के योगदानों में पाश्चरीकरण और रोग के रोगाणु सिद्धांत को याद रखें।

 

Question 10. PPLO का विस्तार क्या है ?
Answer: PPLO का पूरा नाम प्ल्यूरोनिमोनिया लाइक आरगेनिज्म (Pleuropneumonia like organism) है।
In simple words: PPLO एक प्रकार का बहुत छोटा जीव है, जिसका पूरा नाम प्ल्यूरोनिमोनिया जैसा जीव है।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण संक्षिप्त रूपों के पूरे नाम याद रखें।

 

Question 11. प्रकाश संश्लेषी प्रोटिस्टा में किसे रखा गया है ?
Answer: प्रकाश संश्लेषी प्रोटिस्टा में शैवालों को रखा गया है।
In simple words: जिन प्रोटिस्टा में प्रकाश संश्लेषण होता है, उन्हें शैवाल कहते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोटिस्टा जगत के जीवों को उनके पोषण के तरीके के आधार पर वर्गीकृत करना सीखें।

 

Question 12. वर्ग प्रोटिस्टा की रचना किसने की थी ?
Answer: वर्ग प्रोटिस्टा की रचना ई.एच. हैकल ने की थी।
In simple words: प्रोटिस्टा नाम का जीव जगत ई.एच. हैकल नाम के वैज्ञानिक ने बनाया था।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण खोजकर्ताओं और उनके योगदानों को याद रखें।

 

Question 13. प्रोटिस्टा में मुख्यतः जनन किस विधि से होता है ?
Answer: प्रोटिस्टा में प्रमुख रूप से अलैंगिक जनन होता है, जो द्विविभाजन के द्वारा होता है।
In simple words: प्रोटिस्टा जीव ज्यादातर एक से दो में बँटकर नए जीव बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोटिस्टा में विभिन्न प्रकार के प्रजनन तरीकों को जानें, जैसे द्विविभाजन और बहुविभाजन।

 

Question 14. लाइकेन किसके संकेतक होते हैं ?
Answer: लाइकेन सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) प्रदूषण के संकेतक होते हैं।
In simple words: लाइकेन हमें बताते हैं कि हवा में सल्फर डाइऑक्साइड गैस कितनी है, जिससे प्रदूषण का पता चलता है।

🎯 Exam Tip: लाइकेन को वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण जैविक संकेतक माना जाता है, इस तथ्य को याद रखें।

 

Question 15. खाने योग्य कवकों के उदाहरण बताइये।
Answer: खाने योग्य कवकों के उदाहरण मॉर्केला एस्क्यूलेंटा, ऐगेरिकस बाईस्पोरा और ऐ. केम्पेस्ट्रिस हैं।
In simple words: कुछ मशरूम जैसे मॉर्केला एस्क्यूलेंटा और ऐगेरिकस बाईस्पोरा खाने के लिए अच्छे होते हैं।

🎯 Exam Tip: खाने योग्य कवकों और जहरीले कवकों के बीच अंतर को समझना और उनके उदाहरणों को जानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 17. लाइकेन किसे कहते हैं ?
Answer: लाइकेन शैवाल तथा कवक के परस्पर सहजीवी संबंध से बने होते हैं। इसमें दोनों जीव एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए जीवित रहते हैं। इस प्रकार के जीवन को सहजीवन कहते हैं।
In simple words: लाइकेन एक ऐसा जीव है जो शैवाल और कवक के साथ मिलकर बनता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: लाइकेन के सहजीवी संबंध और उसके घटकों (शैवाल और कवक) को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. आर्किजीवाणु किस प्रकार के आवास में पाये जाते हैं ?
Answer: आर्किजीवाणु ऐसे मुश्किल आवासों में पाए जाते हैं जहाँ कोई और जीव जिंदा नहीं रह सकता। ये गंदे पानी, जानवरों के पेट (रुमन), बहुत नमकीन पानी, बहुत गर्म तापमान (80°C) और बहुत अम्लीय वातावरण (pH2) में मिलते हैं। ये हिमालयी क्षेत्रों में गर्म गंधक वाले झरनों में 100°C तापमान पर भी जीवित रह सकते हैं।
In simple words: आर्किजीवाणु बहुत कठिन जगहों पर रहते हैं जहाँ बहुत गर्मी, ठंड, या नमक होता है।

🎯 Exam Tip: आर्किजीवाणुओं को उनके अत्यधिक विषम आवासों और उन परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए याद रखें।

 

Question 2. हेलोफिल्स के लक्षण लिखिए।
Answer: हेलोफिल्स वे आर्किजीवाणु हैं जो बहुत अधिक खारे पानी में पाए जाते हैं। ये सौर ऊर्जा पर निर्भर करते हैं और इसे सीधे ATP अणुओं में बदल देते हैं, बजाय कार्बोहाइड्रेट्स बनाने के। उदाहरण के लिए, हैलोबैक्टिरियम।
In simple words: हेलोफिल्स ऐसे बैक्टीरिया हैं जो बहुत नमकीन पानी में रहते हैं और सूरज की रोशनी से सीधे ऊर्जा बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: हेलोफिल्स की परिभाषा और उनकी ऊर्जा प्राप्त करने की अनूठी विधि को याद रखें।

 

Question 3. निम्न को कारण सहित समझाइए -
(i) अस्पतालों में उबले हुए उपकरणों का प्रयोग आवश्यक हैं ?
(ii) लेग्यूमिनोसी कुल के पौधे जिस खेत में उगाये जाते हैं। उसकी उर्वरता बनी रहती है।
(iii) ताजा तथा बिना उबला हुआ दूध खट्टा होने की सम्भावना अधिक होती है।
(v) सड़ी-गली चीजों का सड़ते समय तापमान अधिक होता है।
Answer:
(i) अस्पतालों में उपकरणों को उबालना इसलिए जरूरी है क्योंकि उबालने से सभी जीवाणु और अन्य सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। इससे संक्रमण फैलने का खतरा नहीं रहता है।
(ii) लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों में विशेष गांठें होती हैं। इन गांठों में राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक जीवाणु रहते हैं जो हवा की नाइट्रोजन को मिट्टी में मिलाते हैं। इससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है।
(iii) ताजा और बिना उबला हुआ दूध जल्दी खट्टा हो जाता है क्योंकि दूध में बैक्टीरिया होते हैं। ये बैक्टीरिया दूध में मौजूद चीनी को खट्टे पदार्थों में बदल देते हैं, जिससे दूध खट्टा हो जाता है।
(v) सड़ी-गली चीजों के सड़ते समय तापमान बढ़ जाता है क्योंकि मृतोपजीवी जीवाणु कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हैं। इस क्रिया में रासायनिक ऊर्जा निकलती है, जिससे गर्मी पैदा होती है।
In simple words: उपकरणों को उबालने से कीटाणु मर जाते हैं। दाल वाले पौधे मिट्टी को नाइट्रोजन देते हैं। दूध में बैक्टीरिया उसे खट्टा करते हैं। सड़ी चीजें सड़ते समय गर्म हो जाती हैं क्योंकि जीवाणु उन्हें तोड़ते हैं।

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं और उनके दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझें।

 

Question 4. अन्तः बीजाणु की संरचना तथा लक्षण बताइए।
Answer:
1. अन्तःबीजाणुओं द्वारा (By endospores): ये बीजाणु तब बनते हैं जब परिस्थितियाँ बहुत खराब होती हैं। क्लॉस्ट्रिडियम और बैसिलस जैसे जीवाणुओं में ये पाए जाते हैं। कोशिका का अंदरूनी हिस्सा सिकुड़कर गोल हो जाता है और एक झिल्ली से ढक जाता है। इस झिल्ली के बाहर वल्कुट (cortex) होता है, जिसमें कैल्सियम डाइपीकोलिनिक अम्ल और पेप्टाइडोग्लाइकन होते हैं। वल्कुट के बाहर एक मोटी परत होती है जिसे बीजाणु चोल (spore coat) कहते हैं। इस चोल की बाहरी दीवार पतली और मुलायम होती है, जिसे बाह्य चोल (exosporium) कहते हैं।
वल्कुट में मौजूद रसायन अंतःबीजाणु को गर्मी और रसायन जैसी चीजों से बचाते हैं। इसी वजह से अंतःबीजाणुओं पर -269°C जैसे बहुत कम तापमान या 150-170°C जैसे बहुत अधिक तापमान का कोई असर नहीं होता। यह अच्छी बात है कि परजीवी जीवाणुओं में (जैसे टिटेनस और एंथ्रेक्स के अलावा) अन्य बीमारियों के जीवाणुओं में अंतःबीजाणु नहीं बनते, नहीं तो बीमारियों को रोकना बहुत मुश्किल हो जाता। अंतःबीजाणु के अंदर DNA और राइबोसोम होते हैं।
2. कोनिडिया के द्वारा (By conidia): स्ट्रेप्टोमाइसीज जैसे रेशेदार जीवाणुओं में कोनिडिया एक कतार में बनते हैं। प्रत्येक कोनिडिया अंकुरित होकर एक नया जीवाणु बनाता है।
3. चलबीजाणुओं के द्वारा (By ZOOspore): कभी-कभी जीवाणु कोशिका से चल बीजाणु बनते हैं, जिनसे नए बीजाणु पैदा होते हैं, जैसे-राइजोबियम।
4. पुटी (Cyst): एजोटोबैक्टर में मोटी दीवार वाले बीजाणु बनते हैं, जिन्हें पुटी कहते हैं। इनकी दीवार मोटी होने के कारण इन्हें पुटी कहा जाता है।
In simple words: अंतःबीजाणु बैक्टीरिया को मुश्किल समय में बचाते हैं। ये बहुत मजबूत होते हैं और गर्मी या ठंड से खराब नहीं होते। कोनिडिया और चलबीजाणु भी प्रजनन के तरीके हैं। एजोटोबैक्टर में पुटी जैसी मोटी दीवार वाले बीजाणु होते हैं।

🎯 Exam Tip: अंतःबीजाणु की विस्तृत संरचना और विभिन्न प्रकार के अलैंगिक जनन (कोनिडिया, चलबीजाणु, पुटी) को समझना आवश्यक है।

 

Question 5. मल व्यवस्था में जीवाणुओं का क्या योगदान है ?
Answer: जीवाणु कृत्रिम जलाशयों में जमा हुए मलमूत्र और अन्य गंदे पदार्थों को ऑक्सीकृत करके साफ करने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जिसे शैवाल इस्तेमाल करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यह ऑक्सीजन मलमूत्र के ऑक्सीकरण के लिए उपयोगी होती है।
In simple words: बैक्टीरिया गंदे पानी को साफ करने में मदद करते हैं। वे कचरे को तोड़कर ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं, जिससे पानी साफ होता है।

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं की अपशिष्ट जल उपचार और पर्यावरण सफाई में भूमिका को विस्तार से जानें।

 

Question 6. चावल की खेती में खाद की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती है?
Answer: चावल की खेती में खाद की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि नील हरे शैवाल, जैसे नॉस्टॉक, एनेबीना और टोलीपोथ्रिक्स, हवा की नाइट्रोजन को मिट्टी में मिला सकते हैं। ये शैवाल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाते हैं। इसलिए, चावल की खेती में इनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है और खाद की जरूरत कम हो जाती है।
In simple words: चावल के खेतों में खाद कम लगती है क्योंकि नीले-हरे शैवाल हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवों और उनकी कृषि में भूमिका को समझें।

 

Question 8. ग्राम अभिरंजन पर टिप्पणी लिखिये।
Answer: ग्राम अभिरंजन एक तरीका है जिसे डेनमार्क के वैज्ञानिक क्रिश्चियन ग्राम ने 1884 में खोजा था। इसका उपयोग जीवाणुओं को दो समूहों में बांटने के लिए किया जाता है: ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव। इस विधि में जीवाणुओं को पहले क्रिस्टल वायलेट के घोल में रंगा जाता है, फिर आयोडीन और पोटेशियम आयोडाइड के पानी में फिर से रंगा जाता है। इससे जीवाणु बैंगनी हो जाते हैं। इसके बाद, उन्हें 90% इथाइल अल्कोहल से धोया जाता है। यदि धोने के बाद भी जीवाणु बैंगनी रंग के रहते हैं, तो उन्हें ग्राम पॉजिटिव जीवाणु कहते हैं (जैसे माइक्रोकोकस, स्ट्रेप्टोकोकस)। यदि बैंगनी रंग धुल जाता है और वे रंगहीन हो जाते हैं, तो उन्हें ग्राम नेगेटिव जीवाणु कहते हैं (जैसे राइजोबियम, सूडोमोनॉस)।
In simple words: ग्राम अभिरंजन एक तरीका है जिससे जीवाणुओं को रंगकर दो तरह के बैक्टीरिया- ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव- में बांटा जाता है।

🎯 Exam Tip: ग्राम अभिरंजन प्रक्रिया के चरण, इस्तेमाल होने वाले रसायन और ग्राम पॉजिटिव व ग्राम नेगेटिव जीवाणुओं के उदाहरण याद रखें।

 

Question 9. माइकोलाज्मा की प्रकृति पर संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिए।
Answer: माइकोप्लाज्मा बहुत छोटे, एककोशिकीय और अचल जीव होते हैं जिन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती, जिससे इनकी आकृति बदलती रहती है। इसी कारण इन्हें 'पादप जगत का जोकर' कहते हैं। ये मृतजीवी या परजीवी दोनों तरह के हो सकते हैं और इन्हें बिना कोशिका भित्ति वाले माध्यम में उगाया जा सकता है। इनकी कॉलोनी तले हुए अंडे जैसी दिखती है। इन्हें बढ़ने के लिए स्टीरोल की जरूरत होती है। ये पेनिसिलिन से तो नहीं मरते, लेकिन टेट्रासाइक्लिन और क्लोरेम्फेनीकोल जैसी दवाइयों से मर जाते हैं। ये तापमान और pH के प्रति संवेदनशील होते हैं और जीवाणु फिल्टर से आसानी से निकल जाते हैं। इन्हें जीवाणुओं और विषाणुओं के बीच की एक कड़ी माना जाता है।
In simple words: माइकोप्लाज्मा बहुत छोटे जीव हैं जिनकी कोई बाहरी दीवार नहीं होती, इसलिए वे अपना आकार बदलते रहते हैं। ये परजीवी होते हैं और इन्हें 'पादप जगत का जोकर' कहते हैं।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा की अद्वितीय विशेषताओं, जैसे कोशिका भित्ति का अभाव और उनका आकार बदलने की क्षमता, को याद रखें।

 

Question 10. माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न पाँच पादप रोग बताइए।
Answer: माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न एक पादप रोग पपीते का गुच्छित चूड़ रोग (Bunchy top of papaya) है।
In simple words: माइकोप्लाज्मा से पपीते में गुच्छित चूड़ रोग नाम की बीमारी होती है।

🎯 Exam Tip: माइकोप्लाज्मा द्वारा होने वाले पौधों के रोगों के नाम और उनके लक्षणों को जानें।

 

Question 11. मोनेरा जगत की विशेषताओं पर संक्षिप्त विवरण लिखिए।
Answer: व्हिटैकर ने मोनेरा जगत में सभी प्रोकैरियोटिक जीवों को शामिल किया, जैसे आर्किजीवाणु, यूबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया और माइकोप्लाज्मा। इनकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
• ये आमतौर पर एककोशिकीय जीव होते हैं जिनमें स्पष्ट केंद्रक और केंद्रक झिल्ली नहीं होती। इसलिए आनुवंशिक सामग्री कोशिकाद्रव्य में बिखरी रहती है, जिसे केन्दाभ या आद्य केंद्रक कहते हैं।
• इनकी कोशिका भित्ति मजबूत होती है और पेप्टिडोग्लाइकन से बनी होती है, लेकिन आर्किजीवाणुओं में यह प्रोटीनयुक्त होती है।
• आनुवंशिक सामग्री नग्न, वृत्ताकार DNA होती है और केंद्रक झिल्ली से ढकी नहीं होती।
• कोशिकाद्रव्य में केवल राइबोसोम और सरल प्रकाश संश्लेषी वर्णक क्रोमेटेफोर के रूप में होते हैं।
• राइबोसोम 70S प्रकार के होते हैं। इनमें हरितलवक, माइटोकॉन्ड्रिया, अंतःप्रद्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, सेंट्रोसोम आदि कोशिकांग नहीं होते हैं।
• श्वसन एंजाइम कोशिका झिल्ली के अंतर्वलन मध्यकाय (Mesosome) पर पाए जाते हैं।
• पोषण के हिसाब से ये रसायन संश्लेषी, प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी या परपोषी होते हैं।
• इनमें असली लैंगिक जनन नहीं होता, लेकिन आनुवंशिक पदार्थों का आदान-प्रदान (संयुग्मन) लैंगिक जनन के विकल्प के रूप में होता है। अलैंगिक प्रजनन विखण्डन या मुकुलन द्वारा होता है।
• कोशिका विभाजन असूत्री विभाजन (Amitosis) द्वारा होता है।
In simple words: मोनेरा जगत में बहुत छोटे जीव होते हैं जिनकी कोशिकाओं में सही केंद्रक नहीं होता। उनकी बाहरी दीवारें मजबूत होती हैं और वे अलग-अलग तरीकों से खाते हैं।

🎯 Exam Tip: मोनेरा जगत के सभी लक्षणों को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक की संक्षिप्त व्याख्या दें।

 

Question 12. नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: नील-हरित शैवाल में पाए जाने वाले हेटेरोसिस्ट नामक विशेष कोशिकाएं नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं। राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम जैसे जीवाणु भी लेग्यूम पौधों की जड़ की गांठों में रहकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं। नाइट्रोजन चक्र में सड़ने वाले और नाइट्रीकारी जीवाणुओं का भी योगदान होता है। पहले प्रकार के जीवाणु मृत प्रोटीन पदार्थों को अमीन अम्लों में बदलते हैं, जिन्हें दूसरे प्रकार के बेसिलस वल्गेरिस जीवाणु अमोनिया यौगिकों में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को अमोनीकरण कहते हैं। तीसरे प्रकार के जीवाणु अमोनिया यौगिकों को दो चरणों में नाइट्रेट में बदल देते हैं:
नाइट्रोजन स्थिरीकरण में रासायनिक अभिक्रियाएँ:
\( NH + 2O_2 \) नाइट्रोसोमोनास \( NO_2 + 2H_2O \)
\( 2NO_5 + O_2 \) नाइट्रोबैक्टर \( 2NO_3 \)
In simple words: नाइट्रोजन स्थिरीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कुछ जीव हवा की नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी रूपों में बदलते हैं, जैसे नाइट्रेट।

🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन स्थिरीकरण में शामिल विभिन्न सूक्ष्मजीवों (जैसे राइजोबियम, नील-हरित शैवाल) और उनके द्वारा की जाने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं को याद रखें।

 

Question 14. प्रोटिस्टा वर्ग के सामान्य लक्षण लिखिए।
Answer: प्रोटिस्टा वर्ग के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं:
• इसके अंतर्गत सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव रखे गए हैं।
• आमतौर पर इस जगत के सदस्य जलीय वातावरण में पाए जाते हैं।
• इनकी कोशिकाओं में स्पष्ट रूप से विकसित केंद्रक होता है, जो केंद्रक झिल्ली से ढका होता है। कोशिका के कोशिकाद्रव्य में दोहरी या एकल झिल्ली से घिरे सभी कोशिकांग मौजूद होते हैं।
• कुछ प्रोटिस्टा में कशाभ (flagella) और पक्ष्माभ (cilia) भी पाए जाते हैं।
• इनमें अलैंगिक और लैंगिक दोनों प्रकार के जनन पाए जाते हैं।
"प्रोटिस्टा" शब्द का अर्थ "सबसे पहला" है। अधिकांश प्रोटिस्ट जलीय, एककोशिकीय और यूकैरियोटिक होते हैं। इनकी कोशिकाओं में एक सुव्यवस्थित केंद्रक और अन्य झिल्लीदार कोशिकांग होते हैं। कुछ प्रोटिस्ट प्रकाश-संश्लेषी होते हैं, जबकि कुछ परभक्षी या परजीवी और कुछ मृतोपजीवी होते हैं। कुछ प्रोटिस्टा में कशाभ और पक्ष्माभ भी पाए जाते हैं। कशाभिकाओं की बनावट में सूक्ष्मनलिकाएं 9+2 क्रम में व्यवस्थित होती हैं। इनमें द्विखण्डन (binary fission) या बहुविखण्डन (multiple fission) द्वारा अलैंगिक प्रजनन होता है। लैंगिक प्रजनन युग्मक संलयन (syngamy) यानी दो केंद्रकों के मिलने से होता है। प्रोटिस्टा के अंतर्गत क्राइसोफाइट, डायनोफ्लैजिलेट, युग्लीनॉइड, आदि शामिल हैं।
In simple words: प्रोटिस्टा छोटे, एक-कोशिकीय जीव हैं जो ज्यादातर पानी में रहते हैं। इनमें एक असली केंद्रक होता है और ये अलग-अलग तरीकों से खाना बनाते या खाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोटिस्टा जगत के जीवों की मुख्य विशेषताओं को याद रखें और उन्हें अन्य जीवों से अलग करने वाले बिंदुओं को समझें।

 

Question 16. कवकों के चार विशिष्ट लक्षण लिखिए।
Answer: कवकों के दो विशिष्ट लक्षण इस प्रकार हैं:
• ये पर्णहरित रहित होते हैं, इनमें केंद्रक होता है, और ये बीजाणुओं से प्रजनन करते हैं।
• इनका पोषण मृतोपजीवी (मृत पदार्थों पर जीवित), परजीवी (दूसरे जीवों पर जीवित) या सहजीवी (दूसरे जीवों के साथ मिलकर) प्रकार का होता है।
In simple words: कवक ऐसे जीव हैं जिनमें हरा रंग नहीं होता, उनके अंदर केंद्रक होता है, और वे मरे हुए या दूसरे जीवों से खाना लेते हैं।

🎯 Exam Tip: कवकों के मुख्य लक्षणों को याद रखें जो उन्हें पौधों और जानवरों से अलग करते हैं।

 

Question 17. स्लाइम मोल्ड की संरचना का वर्णन कीजिए।
Answer: स्लाइम मोल्ड (अवपंक कवक) मृतपोषी प्रोटिस्टा होते हैं। ये जमीन या पानी में पाए जाने वाले जीव हैं जो सड़ी हुई पत्तियों या शाखाओं पर, या ह्यूमस युक्त मिट्टी पर परजीवी या मृतोपजीवी के रूप में रहते हैं। इनकी संरचना एक चिपचिपा, नग्न प्रोटोप्लाज्म का पिंड होती है, जिसे प्लाज्मोडियम कहते हैं। इस प्रोटोप्लाज्म में कई नाभिक (nuclei) और रसधानियाँ (vacuoles) होती हैं। अधिकतर स्लाइम मोल्ड में पीले रंग के प्लाज्मोडियम होते हैं। अच्छी परिस्थितियों में ये प्लाज्मोडियम समूह बनाते हैं जो कई फीट तक लंबे हो सकते हैं। खराब परिस्थितियों में ये टूटकर सिरों पर बीजाणु युक्त फलनकाय बनाते हैं। इन बीजाणुओं का फैलाव हवा के द्वारा होता है। उदाहरण के लिए, डिक्टियोस्टीलियम।
In simple words: स्लाइम मोल्ड ऐसे जीव हैं जिनकी शरीर एक चिपचिपे द्रव्य जैसा होता है। वे मरे हुए या सड़े हुए पत्तों पर रहते हैं और बुरे समय में बीजाणु बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: स्लाइम मोल्ड की संरचना, पोषण विधि और उनके जीवन चक्र की विशेषताओं पर ध्यान दें।

RBSE Class 11 Biology Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. आकार के आधार पर जीवाणुओं के सचित्र प्रकार . बताइये।
Answer: जीवाणुओं के प्रकार को उनके आकार के आधार पर समझा जा सकता है। जीवाणु निम्नलिखित आकारों के होते हैं:
(अ) आमाप (Size): जीवाणु बहुत छोटे होते हैं। आमतौर पर जीवाणु कोशिका का व्यास 0.2–1.5µm और लंबाई 2–10µm होती है। सबसे छोटा जीवाणु यूबैक्टीरियम (eubacterium) और डायालिस्टर न्यूमोसिन्टिस (Dialister pneumosintes) है, जबकि सबसे बड़ा जीवाणु बेगियोटोआ मिराबिलिस (Beggiatoa mirabilis) है, जिसका व्यास 16 से 45µm और लंबाई 80µm या इससे अधिक होती है।
(ब) आकार (Shape):
(क) गोलाणु या कोकस जीवाणु (Spherical or Coccus bacteria): इस प्रकार के जीवाणु गोलाकार या अंडाकार होते हैं। ये आमतौर पर सबसे छोटे होते हैं और इनमें कशाभिकाएँ नहीं होतीं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:
• माइक्रोकोकाई (Micrococci): इस प्रकार के जीवाणु सरल और अकेले होते हैं, जैसे माइक्रोकोस एगीलिस (Micrococcus agilis) और मा. आरियस (M. aureus)।
• स्ट्रेप्टोकोकस लेक्टिस (Streptococcus lactis)।
• स्टेफाइलोकोकाई (Staphylococci): गोलाणुओं की कोशिकाएँ झुंड या अंगूर के गुच्छे के समान रचना बनाती हैं, उदाहरण-स्टेफाइलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus)।
• सारसिनि (Sarcinae): इसमें 8 से 64 गोलाणु कोशिकाएँ घनाकार (cuboid) के रूप में व्यवस्थित होती हैं, उदाहरण-सारसिनि ल्यूटिया (Sarcinae lutea)।
(ख) बेसिलस या छड़ाकार जीवाणु (Bacillus or Rod shaped bacteria): इन जीवाणुओं की आकृति छड़ या दण्डाणु के समान होती है। इनके सिरे गोल, चपटे या नुकीले हो सकते हैं। ये कशाभिकायुक्त (flagellated) या अकशाभिकीय (non-flagellated) होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:
1. एकल दण्डाणु या मोनोबेसिलस (Monobacillus): एक छड़ाकार जीवाणु कोशिका जो एकल रूप में पाई जाती है, उदाहरण-बेसिलस (Bacillus)।
2. डिप्लोबेसिलस (Diplobacillus): जब दण्डाणु दो के समूह या जोड़े में मिलते हैं, उदाहरण-डिप्लोबेसिलस निमोनी (Diplobacillus pneumoniae)।
3. स्टेप्टोबेसिलस (Streptobacillus): जब बेसिलस जीवाणु श्रृंखला (chain) में पाए जाते हैं, उदाहरण-बेसिलस ट्यूबरकुलोसिस (Bacillus tuberculosis)।
(ग) सर्पिलाकृत या कुंडलित जीवाणु (Spiral or helical bacteria): इन जीवाणुओं की आकृति सर्पिल या कुंडलित होती है, इन्हें स्पाइरिलम (spirillum) भी कहते हैं। ये आमतौर पर एकल कोशिकीय स्वतंत्र इकाइयों के रूप में पाए जाते हैं। ये कशाभिकायुक्त होते हैं। उदाहरण-स्पाइरिलम माइनस (Spirillum minus), स्पा. वोलूटेन्स (S.volutans)।
(घ) विब्रियो या कोमा (Vibrio or Coma): ये जीवाणु कोमा या छोटी घुमावदार आकृति के होते हैं, इनके सिरे पर कशाभिका उपस्थित होती है, उदाहरण-विब्रियो कोलेरी (Vibrio cholerae)।
(च) तन्तुमय (Filamentous): ये जीवाणु मूलतः बेसिलस प्रकार के होते हैं, जो लंबी श्रृंखला के रूप में बढ़ते हैं और नलिकाकार आवरण से ढके होते हैं। ये जीवाणु आवरण में ही विभाजित होते हैं, उदाहरण-लेप्टोथ्रिक्स (Leptothrix), क्लेडोथ्रिक्स (Cladothrix) एवं बेगियाटोआ (Beggiatoa) आदि। इस प्रकार के जीवाणु आमतौर पर लौहयुक्त जल में पाए जाते हैं।
(छ) बहुरूपी जीवाणु (Pleomorphic): कुछ जीवाणु बदलते हुए वातावरण के अनुसार अपनी आकृति और आमाप को परिवर्तित करते हैं, अतः इन अस्थाई परिवर्तनों के फलस्वरूप ये जीवाणु एक से अधिक प्रारूपों में पाए जाते हैं, उदाहरण-एसिटोबेक्टर (Acetobacter)।
In simple words: जीवाणु कई आकारों के होते हैं जैसे गोल (कोकस), छड़ी जैसे (बेसिलस), सर्पिल (स्पाइरिलम), कोमा जैसे (विब्रियो), तंतु जैसे (फिलामेंटस) और बदलते आकार वाले (बहुरूपी)।

🎯 Exam Tip: जीवाणुओं के विभिन्न आकार और उनके उदाहरणों को याद रखें। प्रत्येक आकार के जीवाणु की मुख्य विशेषताओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. जीवाणुओं के आर्थिक महत्त्व पर लेख लिखिए।
Answer: जीवाणु आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन वे विनाशकारी भी हो सकते हैं। ये प्रकृति में कार्बन और नाइट्रोजन चक्र को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ये प्राणियों और पौधों में गंभीर बीमारियाँ पैदा करते हैं। सिरका, तंबाकू, डेयरी उत्पाद, चमड़ा आदि सहित कई उद्योगों में जीवाणु महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जीवाणु हमारे दैनिक जीवन की क्रियाओं में इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके बिना जीवन असंभव प्रतीत होता है। आर्थिक महत्व के कारण इनके हानिकारक और लाभदायक दोनों प्रभावों का उल्लेख नीचे किया गया है:

(अ) जीवाणुओं की हानिकारक गतिविधियाँ (Harmful activities of Bacteria):
1. रोगजनक क्रियाएँ (Pathogenic activities):
जीवाणुओं की कई परजीवी प्रजातियाँ जीवों में रोग पैदा करती हैं। पौधों के कुछ प्रमुख जीवाणु जनित रोग निम्नलिखित हैं:

जीवाणुपादप रोग
1. स्यूडोमोनास सोलेनेसिएरम1. आलू, खीरा व बैंगन में म्लानि (Wilt)
2. इर्विनिया ऐराइडी2. मूली, टमाटर, गोभी में गलन (Rots)
3. इर्विनिया एमाइलोविरा3. सेब, नाशपाती में अंगमारी (Blights)
4. ऐग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसियन्स4. सेब व चुकन्दर में क्राउनगॉल (Crown gall)
5. जैन्थोमोनास सिट्राई5. नींबू में सिट्स केन्कर

जीवाणु आसानी से शरीर के एक अंग से दूसरे अंग तक फैल जाते हैं। रोगजनक जीवाणु मनुष्यों के लगभग सभी तंत्रों को संक्रमित करते हैं। मनुष्यों के कुछ प्रमुख जीवाणु जनित रोग निम्नलिखित हैं:

रोग (Disease)रोगाणु (Pathogen)
1. प्लेग (Plague)1. पास्चुरेला पेस्ट्रिस (Pasteurella pestris)
2. तपेदिक (Tuberculosis)2. माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस (Mycobacterium tuberculosis)
3. टाइफाइड (Typhoid)3. सैल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhi)
4. जठरान्त्र शोध (Gastro enteritis)4. एसरिकिआ कोली (Escherichia coli)
5. हैजा (Cholera)5. विर्बियो (Vibrio cholerae)
6. पेचिश (Dysentery)6. शाइजिला डाइसेन्ट्री (Shiegella dysentey)
7. निमोनिया (Pneumonia)7. स्ट्रेप्टोकोकस निमोनीई (Streptoccus pneumoniae)
8. डिप्थीरिया (Diptheria)8. को न बैक्टीरियम डिप्थीरी (Corynebacterium diptheriae)
9. वात् ज्वर (Rheumatic fever)9. स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococus)
10. अतिसार (Dirrhoea)10. बैसीलस कोली (Bacillus coli)
11. कोढ़ (Leprosy)11. माइ को बैक्टीरियम ले प्री (Mycobacterium leprae)
12. पीलिया (Jaundice)12. लेप्टोस्पाइरा इक्टीरो-हीमोराहीजी (Leptospira ictero haemorrhaigea)

जीवाणु द्वारा स्रावित बहिःअविष (exotoxin) के कारण जीभ का फूलना, द्वि-दृष्टि (double vision) तथा श्वसन अंगघात (respiratory paralysis) इस रोग के मुख्य लक्षण हैं।

3. जल प्रदूषण (Water pollution):
कई रोगजनक जीवाणुओं का विकास केवल जल में होता है, जिससे जल पीने योग्य (potable) नहीं रहता है। सैल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhii), शाइजिला डाइसेन्ट्री (Shiegella dysentery) तथा विब्रियो कोलेरी (Vibrio cholerae) प्रमुख जल प्रदूषक जीवाणु हैं।

4. विनाइट्रीकरण (Denitrification):
बैसीलस डीनाइट्रीफिकेन्स (Bacillus dcnitrificans), थायो बैसीलस डीनाइट्रीफिकेन्स (Thiobacillus denitrificans) आदि कुछ जीवाणु मिट्टी में मौजूद नाइट्रेट को विनाइट्रीकृत करके नाइट्राइट, अमोनिया और अंततः स्वतंत्र नाइट्रोजन में बदल देते हैं। चूंकि पौधे नाइट्रोजन को अधिकतर नाइट्रेट के रूप में ग्रहण करते हैं, इसलिए विनाइट्रीकारक जीवाणु मिट्टी की उर्वरता (soil fertility) को कम करते हैं।
In simple words: जीवाणु पौधों और जानवरों में बीमारियाँ फैला सकते हैं, जल को प्रदूषित कर सकते हैं, और मिट्टी की उर्वरता को कम करके फसलों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

🎯 Exam Tip: जब जीवाणुओं के आर्थिक महत्व पर प्रश्न आए, तो लाभदायक और हानिकारक दोनों प्रभावों को उदाहरण सहित समझाएं।

 

Question 4. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिये –
(अ) क्राइसोफाइटा
(ब) यूग्लीनॉइड
(स) अवपंक कवक
Answer:
(अ) क्राइसोफाइटा:
इसके अंतर्गत डायटम (Diatom) तथा सुनहरे शैवाल (Desmid) आते हैं। ये साफ पानी और खारे पानी (समुद्री) दोनों वातावरणों में पाए जाते हैं। ये बहुत छोटे होते हैं और जलधारा के साथ निष्क्रिय रूप से बहते हैं। डायटम में कोशिका भित्ति साबुनदानी की तरह दो अतिछादित कवच बनाती है। इन भित्तियों में सिलिका होती है, जो इन्हें कठोर बनाती है और नष्ट नहीं होती। मृत डायटम जहाँ पाए जाते हैं, वहाँ कोशिका भित्ति के अवशेष बड़ी संख्या में छूट जाते हैं। कई सालों में जमा हुए इन अवशेषों को 'डाइएटमी मृदा' (Diatomaceous soil) कहते हैं। यह मृदा कणमयी होती है, इसलिए इसका उपयोग पॉलिश करने, तेलों तथा सिरप के निस्पंदन (filtration) में होता है। विस्फोटक पदार्थों के निर्माण में नाइट्रोग्लिसरीन को अवशोषित करने के लिए भी इसका उपयोग होता है। इनमें अग्नि-प्रतिरोधी गुण होता है, इस कारण इनका उपयोग उच्चतापीय भट्टियों को बनाने में किया जाता है। ये अम्ल प्रतिरोधी भी होते हैं, इसलिए इनका उपयोग अम्लों के संग्रह और संवहन के लिए किया जाता है। ये रन्ध्रीय (porous) होते हैं, इस कारण इनका उपयोग छन्नकों (filters) के रूप में किया जाता है। चीनी शुद्धिकरण में भी इनका उपयोग छन्नकों के रूप में किया जाता है। डायटम समुद्र के मुख्य उत्पादक (producer) होते हैं। खुरदुरे और कठोर कण समान होने के कारण इनका उपयोग पॉलिश, तेलों, सिरप आदि को साफ करने के लिए उनके निस्पंदन में होता है। उदाहरण के लिए नेवीकुला (Navicula) व पिन्नुलेरिया (Pinnularia) हैं।

(ब) यूग्लीनॉइड (Euglenoid):
ये एककोशिकीय, कशाभिक प्रोटिस्ट होते हैं जो अधिकतर साफ पानी और स्थिर जल में पाए जाते हैं। इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है और पूरा शरीर एक प्रत्यास्थ (elastic) प्रोटीनयुक्त पदार्थ झिल्ली द्वारा घिरा होता है, जिसे पेलिकल (pellicle) कहते हैं। कोशिका के अग्र भाग पर एक अन्तर्वलन (invagination) होता है, जिसमें दो कशाभ (flagella) होते हैं। कशाभिकाओं में एक छोटा और दूसरा लम्बा होता है। यूग्लीना कशाभिका की सहायता से तेजी से गति करता है। कशाभिका के आधार के पास एक प्रकाश-संवेदी दृक बिंदु (photosensitive eye spot) होता है जो यूग्लीना को प्रकाश की तीव्रता की ओर बढ़ने में मदद करता है। एक संकुचनधानी (contractilevacuole) कोशिका में जल की मात्रा को नियंत्रित करती है। क्लोरोप्लास्ट में \( \text{Chl.a} \) व \( \text{b} \) तथा जैन्थोफिल होता है। भोजन पैरामाइलोन स्टार्च के रूप में संचित होता है। इन जीवधारियों में जन्तुओं और पौधों, दोनों के लक्षण प्रदर्शित होते हैं। प्रकाश की उपस्थिति में ये प्रकाश-संश्लेषण करते हैं, लेकिन अंधेरे में इनके क्लोरोप्लास्ट लुप्त हो जाते हैं तथा सूक्ष्म जीवों का शिकार कर परपोषी की भाँति व्यवहार करते हैं। अलैंगिक प्रजनन लम्बवत् द्विविखण्डन (longitudinal binary fission) द्वारा होता है तथा लैंगिक प्रजनन के विषय में अब तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। उदाहरणः यूग्लीना।

(स) अवपंक कवक (Slime mould fungus):
अवपंक कवक मृतपोषी प्रोटिस्टा हैं। ये स्थलीय या जलीय जीव हैं जो आमतौर पर सड़ी पत्तियों या शाखाओं या ह्यूमस युक्त भूमि पर परजीवी या मृतोपजीवी की तरह पाए जाते हैं। इनकी संरचना श्लेष्मीय नग्न प्रोटोप्लाज्म का पिंड होती है। प्रोटोप्लाज्म में कई नाभिक (nuclei) और रसधानियाँ (vacuoles) होती हैं। इसको प्लाज्मोडियम (plasmodium) कहते हैं। अधिकतर स्लाइम मोल्ड में पीले वर्णक वाले प्लाज्मोडियम होते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ये समूह (प्लाज्मोडियम) बनाते हैं, जो कई फीट तक की लम्बाई का हो सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ये बिखरकर सिरों पर बीजाणु युक्त फलनकाय बनाते हैं। इन बीजाणुओं का परिक्षेपण वायु के द्वारा होता है। उदाहरण: डिक्टियोस्टीलियम।
In simple words: क्राइसोफाइटा, यूग्लीनॉइड और अवपंक कवक अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्मजीव हैं। क्राइसोफाइटा (जैसे डायटम) कठोर भित्तियों वाले होते हैं और फिल्टर के रूप में उपयोग होते हैं। यूग्लीनॉइड प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं और तैरते हैं। अवपंक कवक (स्लाइम मोल्ड) सड़ी हुई चीज़ों पर बढ़ते हैं और बीजाणु बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: टिप्पणी वाले प्रश्नों में, प्रत्येक भाग को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और उसके प्रमुख लक्षणों, आवास, पोषण विधि और महत्व को संक्षेप में बताएं।

Free study material for Biology

RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें

Students can now access the RBSE Solutions for Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें prepared by teachers on our website. These solutions cover all questions in exercise in your Class 11 Biology textbook. Each answer is updated based on the current academic session as per the latest RBSE syllabus.

Detailed Explanations for Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें

Our expert teachers have provided step-by-step explanations for all the difficult questions in the Class 11 Biology chapter. Along with the final answers, we have also explained the concept behind it to help you build stronger understanding of each topic. This will be really helpful for Class 11 students who want to understand both theoretical and practical questions. By studying these RBSE Questions and Answers your basic concepts will improve a lot.

Benefits of using Biology Class 11 Solved Papers

Using our Biology solutions regularly students will be able to improve their logical thinking and problem-solving speed. These Class 11 solutions are a guide for self-study and homework assistance. Along with the chapter-wise solutions, you should also refer to our Revision Notes and Sample Papers for Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें to get a complete preparation experience.

FAQs

Where can I find the latest RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें for the 2026-27 session?

The complete and updated RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 11 Biology are as per latest RBSE curriculum.

Are the Biology RBSE solutions for Class 11 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Biology concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 11 RBSE solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using RBSE language because RBSE marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 11 Biology. You can access RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Biology RBSE solutions for Class 11 as a PDF?

Yes, you can download the entire RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 4 जगत् मोनेरा, प्रोटिस्टा तथा कवकें in printable PDF format for offline study on any device.