Official RBSE Solutions for Class 11 Biology: Chapter 39 पर्यावरणीय कारक
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Chapter-wise Solutions for Biology: Chapter 39 पर्यावरणीय कारक
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RBSE Class 11 Biology Chapter 39 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. निम्नलिखित में से कौनसा कारक प्रथमतः किसी स्थान की वनस्पति को निर्धारित करता है?
(अ) जलवायवीय
(ब) स्थलाकृतिक
(स) जैविक
(द) मृदीय
Answer: (अ) जलवायवीय
In simple words: किसी भी जगह की पेड़-पौधों की ज़िंदगी को सबसे पहले उस जगह का मौसम और जलवायु तय करते हैं।
🎯 Exam Tip: जब भी किसी स्थान की वनस्पति के प्राथमिक निर्धारक कारकों पर प्रश्न आए, तो जलवायु संबंधी कारकों पर सबसे पहले विचार करें क्योंकि उनका प्रभाव सबसे अधिक होता है।
Question 2. पादप वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त है
(अ) बलुई मृदा
(ब) दोमट मृदा
Answer: (ब) दोमट मृदा
In simple words: पौधों को अच्छे से बढ़ने के लिए दोमट मिट्टी सबसे बढ़िया होती है।
🎯 Exam Tip: पौधों की वृद्धि के लिए मृदा के प्रकार का चयन करते समय, दोमट मृदा को प्राथमिकता दें क्योंकि इसमें जल धारण क्षमता और वातन का संतुलन सबसे अच्छा होता है।
Question 4. मूलगोप सामान्यतः अनुपस्थित होती है
(अ) शैलोभिद्
(ब) मरुभिद्
(स) जलोभिद्
(द) समोभिद्
Answer: (स) जलोभिद्
In simple words: जलोभिद् पौधों में जड़ के शीर्ष पर टोपी जैसी संरचना (मूलगोप) नहीं होती है, क्योंकि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि जलोभिद् पौधों में मूलगोप की अनुपस्थिति उनके पानी में रहने वाले अनुकूलन का एक प्रमुख उदाहरण है।
Question 5. गर्मी के मौसम में अनेक जलोभिद् तालाब से लुप्त हो जाते हैं, क्योंकि
(अ) प्रकाश की मात्रा अधिक होती है।
(ब) पौधे छायादार स्थानों की तरफ पहुंच जाते हैं।
(स) जल वाष्पीकृत हो जाता है, जिससे पौधे मर जाते हैं।
(द) उच्च तापमान के कारण जल में \( \text{CO}_2 \) की मात्रा कम हो जाती है, जिससे पौधों में पर्याप्त प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है।
Answer: (द) उच्च तापमान के कारण जल में \( \text{CO}_2 \) की मात्रा कम हो जाती है, जिससे पौधों में पर्याप्त प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है।
In simple words: गर्मी में पानी का तापमान बढ़ने से उसमें ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड कम हो जाती है, जिससे जलीय पौधे ठीक से भोजन नहीं बना पाते और मर जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जलोभिद् पौधों के लुप्त होने के कारणों में \( \text{CO}_2 \) की कमी एक महत्वपूर्ण कारक है, जो उच्च तापमान से जुड़ी होती है और प्रकाश संश्लेषण को बाधित करती है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 39 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्रकाश संश्लेषी सक्रिय विकिरण (PAR) किसे कहते हैं?
Answer: सूर्य से निकलने वाली रोशनी का वह हिस्सा जो 390 नैनोमीटर (nm) से 760 नैनोमीटर तक होता है, उसे दृश्य प्रकाश कहते हैं। पौधों में प्रकाश संश्लेषण के लिए यही प्रकाश इस्तेमाल होता है, इसलिए इसे प्रकाश संश्लेषी सक्रिय विकिरण (Photo-synthetically active radiation = PAR) कहा जाता है।
In simple words: PAR वह सूर्य का प्रकाश है जिसे पौधे अपना भोजन बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, यह 390nm से 760nm के बीच होता है।
🎯 Exam Tip: प्रकाश संश्लेषी सक्रिय विकिरण (PAR) की परिभाषा और उसकी तरंगदैर्ध्य सीमा (390-760nm) को हमेशा याद रखें, क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण का मूल आधार है।
Question 3. किन्हीं तीन कीट भक्षी पादपों के वानस्पतिक नाम लिखिए।
Answer: तीन कीटभक्षी पौधे जिनके वैज्ञानिक नाम हैं: नेपेन्थस (Nephenthus), ड्रॉसेरा (Drosera) और यूट्रीकुलेरिया (Utricularia)। ये पौधे कीड़ों को पकड़कर अपना भोजन बनाते हैं।
In simple words: नेपेन्थस, ड्रॉसेरा और यूट्रीकुलेरिया तीन ऐसे पौधे हैं जो कीड़े-मकोड़े खाते हैं।
🎯 Exam Tip: कीटभक्षी पौधों के उदाहरण याद रखें और उनके वैज्ञानिक नाम भी सही से लिखें।
Question 4. किन्हीं चार पादपों के वानस्पतिक नाम लिखिए, जिनमें मूल कोटरिकाएं पाई जाती हैं।
Answer: जिन चार पौधों में जड़ की टोपी (मूल कोटरिकाएं) पाई जाती है, उनके वैज्ञानिक नाम हैं: लेम्ना (Lemna), वोल्फिया (Wolffia), पिस्टिया (Pistia) और स्पाइरोडेला (Spirodel)।
In simple words: लेम्ना, वोल्फिया, पिस्टिया और स्पाइरोडेला ऐसे पौधे हैं जिनकी जड़ों में खास तरह की मूल कोटरिकाएं होती हैं।
🎯 Exam Tip: उन पौधों के नाम याद करें जिनमें मूल कोटरिकाएं पाई जाती हैं, यह उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Question 5. फ्रियटोफाइट (Phreatophytes) किसे कहते हैं?
Answer: फ्रियटोफाइट ऐसे पौधे होते हैं जिनकी जड़ें ज़मीन में बहुत गहराई तक जाती हैं। ये पौधे सीधे ज़मीन के अंदर के पानी (भौम जलस्तर) से पानी खींचते हैं, खास तौर पर सूखे इलाकों में।
In simple words: फ्रियटोफाइट वे पौधे हैं जिनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं और वे ज़मीन के नीचे के पानी का इस्तेमाल करते हैं।
🎯 Exam Tip: फ्रियटोफाइट पौधों की विशेषता उनकी गहरी जड़ प्रणाली और भौम जलस्तर से पानी प्राप्त करने की क्षमता है।
Question 6. मृदुपर्णी पादप किसे कहते हैं? इनमें सरसता का कारण बताइये ।
Answer: जिन मरुद्भिद पौधों के पत्तों और तनों में पानी जमा रहता है, उन्हें मृदुपर्णी पादप कहते हैं। इनमें पानी जमा करने के लिए खास तरह की पतली दीवारों वाली कोशिकाएं बन जाती हैं। इसी वजह से ये पौधे मोटे और रसीले लगते हैं, जैसे नागफनी (Opuntia) और ग्वारपाठा (Aloe)।
In simple words: मृदुपर्णी पौधे वे होते हैं जो अपने अंदर पानी जमा करके रखते हैं, जिससे वे मोटे और रसीले दिखते हैं।
🎯 Exam Tip: मृदुपर्णी पौधों की पहचान उनके मांसल (रसीले) भागों और जल संचय करने की क्षमता से होती है, जो उन्हें शुष्क वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 39 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. जलवायु तथा मौसम में भेद कीजिये।
Answer:
**जलवायु (Climate):** यह किसी जगह के मौसम के कारकों जैसे रोशनी, गर्मी, बारिश, हवा, नमी आदि का पूरे साल का औसत होता है। जलवायु लंबे समय तक चलती है, जैसे कई सालों तक की ऋतुओं और बारिश के आधार पर तय होती है।
**मौसम (Weather):** यह किसी एक जगह पर थोड़े समय के लिए, जैसे कुछ हफ़्तों या दिनों के लिए, इन्हीं मौसम कारकों का माप होता है। मौसम में हर दिन या हर हफ़्ते बदलाव आ सकते हैं।
In simple words: जलवायु एक जगह का लंबे समय का औसत मौसम है, जबकि मौसम थोड़े समय के लिए वहां का हाल है।
🎯 Exam Tip: जलवायु और मौसम के बीच का मुख्य अंतर उनकी अवधि में होता है - जलवायु दीर्घकालिक होती है जबकि मौसम अल्पकालिक।
आतपोद्भिद (Heliophytes) और अतपोद्भिद (Sciophytes) के बीच अंतर
| आतपोद्भिद (Heliophytes) | अतपोद्भिद (Sciophytes) |
|---|---|
| 1. जड़ें अच्छे से विकसित होती हैं, संख्या में ज़्यादा होती हैं और पूरी तरह से फैली होती हैं। | जड़ें छोटी होती हैं, संख्या में कम होती हैं और कम फैली होती हैं। |
| 2. तना मज़बूत होता है और जाइलम पूरी तरह से विकसित होता है। | तना पतला और कमज़ोर होता है, जाइलम भी कम विकसित होता है। |
| 3. पत्तियां छोटी, हल्के हरे रंग की और मोटी होती हैं। | पत्तियां बड़ी, गहरे हरे रंग की और पतली होती हैं। |
| 4. स्टोमेटा (पर्णरंध्रों) की संख्या ज़्यादा होती है। निचली सतह पर स्टोमेटा ऊपरी सतह से ज़्यादा होते हैं। | स्टोमेटा की संख्या थोड़ी कम होती है और दोनों सतहों पर बराबर रूप से फैले होते हैं। |
| 5. पर्णमध्योतक (Mesophyll tissue) में खंभ ऊतक (Palisade tissue) ज़्यादा विकसित होते हैं और कोशिकाओं के बीच की जगह (अन्तराकोशिकीय अवकाश) बहुत छोटी होती है। | पर्णमध्योतक में स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) ज़्यादा विकसित होते हैं और कोशिकाओं के बीच की जगह (अन्तराकोशिकीय अवकाश) ज़्यादा होती है। |
| 6. यांत्रिक ऊतक (Mechanical tissues) पूरी तरह से विकसित होते हैं। | यांत्रिक ऊतक कम विकसित होते हैं या नहीं होते हैं। |
| 7. फूल और फल पैदा करने की क्षमता ज़्यादा होती है। | फूल और फल पैदा करने की क्षमता बहुत कम होती है। |
| 8. खनिज लवणों की मात्रा ज़्यादा होती है। इसी वजह से कोशिकाओं में पानी का दबाव (परासरण दाब) भी ज़्यादा होता है। | खनिज लवणों की मात्रा कम होती है। इसलिए कोशिकाओं में पानी का दबाव (परासरण दाब) भी कम होता है। |
🎯 Exam Tip: आतपोद्भिद और अतपोद्भिद पौधों की तुलना करते समय, उनकी जड़ों, तनों, पत्तियों, पर्णरंध्रों और ऊतकों की संरचना में अंतर को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
Question 3. ह्यूमस के प्रकार और निर्माण को समझाइये।
Answer:
**ह्यूमस क्या है:** ह्यूमस मिट्टी में मौजूद मरे हुए पौधों और जानवरों के सड़े हुए हिस्से होते हैं। यह मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। यह पौधों और जानवरों के बचे हुए भागों और उनके मल के सड़ने से बनता है। केंचुए ह्यूमस बनाने में बहुत मदद करते हैं। मिट्टी के छोटे-छोटे जीव जैसे बैक्टीरिया और फंगस मरे हुए कार्बनिक पदार्थों को सड़ाते हैं।
**ह्यूमस निर्माण की प्रक्रिया:** ह्यूमस बनने की इस प्रक्रिया को ह्यूमीफिकेशन (Humification) कहते हैं। जब ह्यूमस के खनिज लवण बदल जाते हैं, तो उसे खनिजीकरण (Mineralization) कहा जाता है।
**ह्यूमस के प्रकार:** ह्यूमस दो तरह का होता है।
In simple words: ह्यूमस सड़े हुए पौधे-जानवरों के बचे हुए हिस्से हैं जो मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। यह छोटे जीवों द्वारा बनता है और दो तरह का होता है।
🎯 Exam Tip: ह्यूमस के निर्माण की प्रक्रिया (ह्यूमीफिकेशन और खनिजीकरण) और मिट्टी की उर्वरकता में इसके महत्व को स्पष्ट करें।
Question 4. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिये
(i) वसन्तीकरण
(ii) दीप्तिकालिकता।
Answer:
(i) **वसन्तीकरण (Vernalization):** कुछ पौधों में फूल आने के लिए कम तापमान की ज़रूरत होती है। बीज को कम तापमान देकर जल्दी फूल खिलाने की प्रक्रिया को वसन्तीकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया के लिए ऑक्सीजन ज़रूरी है। वसन्तीकरण के दौरान वर्नेलिन नाम का एक पदार्थ बनता है, जो बाद में फ्लोरीजन या जिबरेलिन में बदल जाता है। यही पदार्थ पौधों में समय से पहले फूल लाने में मदद करता है।
(ii) **दीप्तिकालिकता (Photoperiodism):** पौधों में फूल आने और फल बनने पर हर दिन मिलने वाले प्रकाश की अवधि का असर पड़ता है, इसे दीप्तिकालिकता कहते हैं। दिन में प्रकाश की अवधि के असर के हिसाब से फूल वाले पौधों को तीन भागों में बांटा गया है:
• दीर्घ-प्रकाशीय (लंबे समय तक रोशनी चाहने वाले) पौधे
• अल्प-प्रकाशीय (कम समय तक रोशनी चाहने वाले) पौधे
• प्रकाश या दिवस निरपेक्ष (जिन्हें रोशनी की अवधि से फर्क नहीं पड़ता) पौधे
तापमान भी दीप्तिकालिकता को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है।
In simple words: वसन्तीकरण का मतलब है, कम तापमान से पौधों में जल्दी फूल लाना। दीप्तिकालिकता का मतलब है, पौधों पर प्रकाश की अवधि का असर, जिससे फूल आते हैं।
🎯 Exam Tip: वसन्तीकरण और दीप्तिकालिकता दोनों ही पौधों में फूल आने की महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाएं हैं, इनके मुख्य कारक और प्रभाव याद रखें।
RBSE Class 11 Biology Chapter 39 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. पौधों को प्रभावित करने वाले जलवायवीय कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
Answer: पौधों पर कई जलवायवीय कारकों का सीधा असर पड़ता है, जो उनकी बढ़त और फैलाव को तय करते हैं। इन कारकों का अध्ययन जलवायु विज्ञान (Climatology) कहलाता है। मुख्य जलवायवीय कारक इस प्रकार हैं:
1. प्रकाश
2. तापमान
3. वायु
4. जल
5. वायुमण्डलीय आर्द्रता
6. वायुमण्डलीय गैसें (यानी हवा से जुड़े कारक)
**2. तापमान (Temperature):**
गर्मी का मुख्य स्रोत सूर्य की रोशनी है। पृथ्वी के अंदर की गर्मी (जैसे ज्वालामुखी) और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों की श्वसन क्रियाएं भी गर्मी पैदा करती हैं। पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर तापमान अलग होता है, जो वहां की वनस्पति को तय करता है। आमतौर पर जीव 0°C से 50°C के बीच की गर्मी में अपनी जैविक क्रियाएं करते हैं। 40°C पर जीवद्रव्य की गतिविधियां कम हो जाती हैं, और 70°C-80°C पर यह मर जाता है। जमने वाले तापमान से कम पर पानी जम जाता है। पौधों और जीवों को बढ़ने के लिए एक खास तापमान सीमा चाहिए होती है। इस सीमा से बाहर जीवन मुश्किल हो जाता है। तापमान की तीन सीमाएं होती हैं:
• **अनुकूलतम तापक्रम (Optimum temperature):** यह वह तापमान है जिस पर पौधों की बढ़ने की क्रियाएं सबसे तेज़ी से होती हैं।
• **न्यूनतम तापक्रम (Minimum temperature):** यह वह सबसे कम तापमान है जिस पर पौधे की जैविक क्रियाएं चलती रहती हैं। इससे कम होने पर क्रियाएं रुक जाती हैं।
• **उच्चतम तापक्रम (Maximum temperature):** यह वह सबसे ज़्यादा तापमान है जिसे पौधे झेल सकते हैं। इससे ज़्यादा तापमान बढ़ने पर जैविक क्रियाएं रुक जाती हैं।
**3. पवन (Wind):**
हवा और उसकी गति पौधों पर सीधे और परोक्ष दोनों तरह से असर डालती है। पृथ्वी पर दबाव में अंतर के कारण हवा चलती है। हवा हमेशा ज़्यादा दबाव से कम दबाव की तरफ चलती है।
• धीमी और तेज़ हवाएं सूक्ष्मजीवों, परागकणों और बीजों को फैलाने में मदद करती हैं, जो पौधों के प्रजनन के लिए ज़रूरी है।
• हवा से परागण (Pollination) होने को वायु-परागण (Anemophilous) कहते हैं।
• तेज़ हवा से पौधे जड़ से उखड़ सकते हैं और शाखाएं टूट सकती हैं।
• तेज़ हवा से पौधों में वाष्पोत्सर्जन बढ़ जाता है, जिससे पत्तियां मुरझा सकती हैं। लगातार सूखी हवा से पत्तियां फिर से सामान्य नहीं हो पातीं। इसी कारण रेगिस्तान के पौधों की पत्तियां छोटी, रोमिल या कांटों वाली होती हैं।
• हवा का असर पौधों की बनावट (Anatomy) पर भी पड़ता है। तेज़ हवा वाले इलाकों में पौधों के तनों में यांत्रिक ऊतक ज़्यादा विकसित होते हैं, जो उन्हें तेज़ हवा में टूटने से बचाते हैं। कुछ पेड़ों में तो तेज़ हवा के कारण घनी, लाल दारु (Xylem) विकसित हो जाती है जिसे संपीडक दारु (Compression Wood) कहते हैं।
• तेज़ हवा से मैदानी इलाकों में फसलें ज़मीन पर गिर जाती हैं, जिसे पतन (Lodging) कहते हैं, जैसे गेहूं, मक्का, चावल, जौ।
• पहाड़ों की ऊंची चोटियों और समुद्र तटों के पास हवाएं अक्सर एक ही दिशा में चलती हैं। ऐसे में पौधों की शाखाएं और बाकी हिस्से केवल हवा की दिशा में ही बढ़ते हैं, जिससे उनकी बाहरी आकृति बिगड़ जाती है।
• बहुत ऊंचाई वाले स्थानों पर तेज़ हवाएं लगातार चलती रहती हैं, जिससे पौधों की ऊपरी कलियां विकसित नहीं हो पातीं। इस वजह से पौधे छोटे और शाखित (फैले हुए) हो जाते हैं।
• तेज़ हवा वाले स्थानों पर पौधों की पत्तियां छोटी, रोमिल (बालों वाली), मोमयुक्त और संयुक्त पिच्छाकार (पंख जैसी) और ज़्यादा काष्ठीय (लकड़ी जैसी) होती हैं।
• तेज़ हवा अपने साथ मिट्टी उड़ा ले जाती है। मरुस्थलों में अक्सर गर्मियों में धूल भरी आंधियों और तूफानों से मिट्टी का कटाव (Soil erosion) होता है।
**4. वर्षण (Precipitation):**
बारिश सबसे ज़रूरी जलवायवीय कारकों में से एक है। यह सभी जैविक क्रियाओं को प्रभावित करती है और मिट्टी के पानी का मुख्य स्रोत है। मिट्टी में मौजूद पोषक तत्व पानी में घुलने पर ही पौधों को मिलते हैं। बारिश पौधों की बनावट और कामकाज दोनों पर असर डालती है। बारिश, पौधों की संरचना और उनके समुदायों के फैलाव पर अन्य कारकों के साथ मिलकर असर डालती है।
ज़मीन की सतह और हवा के बीच पानी का आना-जाना जलीय चक्र (Hydrologic cycle) कहलाता है।
बारिश फुहारों, पानी की मोटी बूंदों, बर्फबारी, ओस, ओले, पाला और हिमवृष्टि के रूप में होती है। मिट्टी के पानी का मुख्य स्रोत बारिश ही है। यह हवा में नमी की मात्रा को प्रभावित करती है। कुल बारिश का 45% नदियों में बह जाता है, 20% ज़मीन में रिस जाता है और 35% वाष्पित हो जाता है। वनस्पति के तीन मुख्य रूप हैं - वन, घासस्थल और मरुस्थल।
वर्षा की मात्रा और वनस्पति के प्रकार के बीच संबंध को नीचे दी गई तालिका में दर्शाया गया है:
| वर्षा की मात्रा (प्रति वर्ष) | वनस्पति का प्रकार |
|---|---|
| 125.0 सेमी से अधिक | वर्षा वन (Rain forest) |
**5. वायुमण्डलीय आर्द्रता (Atmospheric humidity):**
हवा में मौजूद अदृश्य पानी की भाप को वायुमंडलीय आर्द्रता कहते हैं। हवा में पानी की असली मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं, जबकि इसे अक्सर आपेक्षिक आर्द्रता से दर्शाया जाता है। आपेक्षिक आर्द्रता यह बताती है कि किसी खास तापमान पर हवा में कितनी नमी है और उसे पूरी तरह संतृप्त होने के लिए कितनी और नमी चाहिए। इसे मापने के लिए नम और शुष्क बल्ब तापमापी का इस्तेमाल होता है। जब हवा में नमी पूरी हो जाती है, तो पौधों के ऊपरी हिस्सों से पानी भाप बनकर उड़ना (वाष्पोत्सर्जन) कम हो जाता है। हवा के पूरी तरह संतृप्त होने पर पानी जमने लगता है, जैसे बर्फ के रूप में गिरता है।
नमी वाले इलाकों में अधिपादप (जो दूसरे पौधों पर उगते हैं) ज़्यादा मिलते हैं। ऑर्किड, लाइकेन और मॉस जैसे अधिपादप सीधे हवा से नमी सोख लेते हैं। वाष्पोत्सर्जन की दर पर भी हवा की नमी का असर पड़ता है। ज़्यादा नमी और तापमान कई तरह के जीवाणु और कवक से होने वाली बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
**6. वायुमण्डलीय गैसें (Atmospheric gases):**
पृथ्वी की सतह से लगभग 300 किलोमीटर ऊपर तक गैसों की एक परत है, जिसे वायुमंडल कहते हैं। ऊंचाई के साथ हवा में गैसों का घनत्व और दबाव कम होता जाता है। वायुमंडल की मुख्य गैसें नाइट्रोजन (78.08%), ऑक्सीजन (20.94%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.32%) और जलवाष्प (0.10%) हैं। कम मात्रा में आर्गन, नियॉन, हीलियम, क्रिप्टन, ज़ीनॉन, हाइड्रोजन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन जैसी गैसें भी पाई जाती हैं। इसके अलावा, हवा में धूल के कण, धुआं, सूक्ष्मजीव, परागकण, कवक बीजाणु और कई प्रदूषित गैसें (जैसे \( \text{SO}_2 \), \( \text{NH}_3 \), \( \text{CO} \), \( \text{H}_2\text{S} \) आदि) भी मौजूद होती हैं।
In simple words: पौधों को रोशनी, गर्मी, हवा, पानी, हवा की नमी और हवा में मौजूद गैसें प्रभावित करती हैं। ये सब मिलकर पौधों की बढ़त और कहां वे उगते हैं, यह तय करते हैं।
🎯 Exam Tip: पौधों पर जलवायवीय कारकों के प्रभावों का वर्णन करते समय, प्रत्येक कारक के जैविक महत्व और उसके विशिष्ट प्रभावों को उदाहरणों के साथ समझाएं।
Question 2. मृदीय कारक पौधों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
Answer:
मिट्टी (मृदा) पौधों के जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 'मृदा' शब्द लैटिन भाषा के 'सोलम' से आया है, जिसका मतलब है वह ज़मीन जिसमें पौधे उगते हैं। मिट्टी के अध्ययन को पीडोलॉजी या इडेफोलॉजी कहते हैं। रूसी वैज्ञानिक दोक्याचेव ने मृदा विज्ञान की नींव रखी थी। मिट्टी को पृथ्वी की वह सतह कह सकते हैं जहाँ पौधे उगते हैं और अपनी जड़ें फैलाकर पोषक तत्व और पानी लेते हैं।
मिट्टी मुख्य रूप से दो प्रक्रियाओं से बनती है:
(अ) **अपक्षय (Weathering):**
चट्टानों का छोटे-छोटे खनिज कणों में टूटना अपक्षय कहलाता है। यह तीन तरह से होता है:
• **भौतिक अपक्षय (Physical weathering):** तेज़ हवा, पानी के घर्षण, तापमान के बदलाव और बर्फ़ जमने जैसी ताकतों से बड़ी चट्टानें छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं।
• **रासायनिक अपक्षय (Chemical weathering):** पानी से होने वाली रासायनिक क्रियाओं, जैसे जल अपघटन, जलयोजन, ऑक्सीकरण-अपचयन, कार्बनीकरण और किटीकरण से चट्टानें बारीक कणों में बदल जाती हैं।
• **जैविक अपक्षय (Biological weathering):** लाइकेन, केंचुए और अन्य जीव भी चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाने में मदद करते हैं।
(ब) **मृदाजनन (Pedogenesis):**
मिट्टी बनने की पूरी प्रक्रिया को मृदा परिवर्धन या मृदा परिपक्वन भी कहते हैं। जब चट्टानों के टूटने से बने खनिज कण और जीवों के सड़े हुए हिस्से (ह्यूमस) मिल जाते हैं, तो मिट्टी बनती है। इन प्रक्रियाओं के लगातार चलने से मिट्टी की परतें बनती जाती हैं और धीरे-धीरे पौधे उगने लगते हैं। इस तरह समय के साथ मिट्टी की पूरी संरचना (soil profile) बन जाती है।
मिट्टी के निर्माण और खनिजों के स्रोत के आधार पर मिट्टी दो प्रकार की होती है:
1. **अवशिष्ट मृदा (Residual soil):** जब चट्टानों के टूटने से मिट्टी के कण बनते हैं और वे उसी जगह पर रहते हैं, तो उसे अवशिष्ट मिट्टी कहते हैं।
2. **वाहित मृदा (Transported soil):** जब मिट्टी के कण किसी कारण से अपनी जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं, तो उसे वाहित मिट्टी कहते हैं। जैसे: हवा से लाई गई मिट्टी (इओलियन मृदा), गुरुत्वाकर्षण से लाई गई मिट्टी (कोल्युवियल मृदा), पानी से लाई गई मिट्टी (एल्युवियल मृदा) और ग्लेशियरों के पिघलने से लाई गई मिट्टी (ग्लेसियल मृदा)।
मिट्टी की परतें या प्रोफाइल (Soil Profile) कहलाती हैं। मिट्टी में ये परतें होती हैं:
(अ) **'अ' संस्तरण (A Horizon):** यह मिट्टी की सबसे ऊपर की परत है, जिसे शीर्ष मृदा (top soil) भी कहते हैं। इसमें बालू और ह्यूमस होते हैं। पौधों की जड़ें ज़्यादातर इसी परत में रहती हैं। इसका रंग गहरा भूरा होता है क्योंकि इसमें ह्यूमस ज़्यादा होता है।
(ब) **'ब' संस्तरण ('B' Horizon):** यह शीर्ष मृदा के नीचे वाली परत है, जिसे उपमृदा (sub-soil) कहते हैं। इसका रंग हल्का भूरा होता है और इसमें चिकनी मिट्टी होती है। बारिश का पानी इसमें इकट्ठा होता रहता है। इसमें ह्यूमस और हवा की मात्रा कम होती है और जीव भी नहीं मिलते। यह पानी केशिका क्रिया से वापस ऊपर भी आ सकता है।
(स) **'स' संस्तरण ('C' Horizon):** यह 'ब' परत के नीचे होती है। इसमें अधूरी टूटी हुई चट्टानें होती हैं और ह्यूमस या सूक्ष्मजीव नहीं होते। इसके नीचे पूरी तरह से बिना टूटी हुई चट्टानें होती हैं।
(द) वायु – कुल आयतन का 25%
मिट्टी के भौतिक और रासायनिक गुण, साथ ही उसके कणों का आकार, पौधों की वृद्धि और विकास को बहुत प्रभावित करते हैं।
**(iv) खनिज संघटक तथा मृदा गठन (Mineral components and soil texture):**
मिट्टी की बनावट उसके खनिज कणों पर निर्भर करती है। ये कण अलग-अलग आकार के होते हैं। खनिज कणों के आकार के आधार पर मिट्टी को कई प्रकारों में बांटा गया है, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय मृदा विज्ञान संस्था ने सुझाया है:
| मृदा के प्रकार | कणों का व्यास (Diameter) |
|---|---|
| (i) बजरी (Gravel) | 5.000 मिमी. से अधिक |
| (ii) बारीक बजरी (Fine sand) | 2.000 मिमी. से 5.000 मिमी. तक |
| (iii) मोटी बालू (Coarse sand) | 0.200 मिमी. से 2.000 मिमी. तक |
| (iv) बारीक बालू (Fine sand) | 0.020 मिमी. से 0.200 मिमी. तक |
| (v) गाद (Silt) | 0.002 मिमी. से 0.020 मिमी. तक |
| (vi) चिकनी मिट्टी (Clay) | 0.002 मिमी. से कम |
शैल कणों के अनुपात के आधार पर मिट्टी छह प्रकार की होती है:
• **बलुई मृदा (Sandy soil):** इसमें बालू के कण ज़्यादा होते हैं। इसमें हवा अच्छी होती है, लेकिन पोषक तत्व और पानी रोक पाने की क्षमता कम होती है।
• **चिकनी या मृण्मय मृदा (Clay soil):** इसमें मुख्य रूप से चिकनी मिट्टी होती है। यह पानी को सबसे ज़्यादा रोक सकती है, लेकिन इसमें हवा कम होती है। यह पौधों की वृद्धि के लिए बहुत अच्छी नहीं मानी जाती।
• **दोमट मृदा (Loam soil):** इसमें बालू, गाद और चिकनी मिट्टी बराबर मात्रा में होती हैं। इसकी पानी रोकने की क्षमता और हवा का संचार दोनों ही अच्छे होते हैं। इसलिए यह मिट्टी पौधों के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
मिट्टी में पौधों और जानवरों के मरे हुए हिस्सों के सड़ने के बाद कार्बनिक पदार्थ बनते हैं। यह सड़ने का काम मुख्य रूप से बैक्टीरिया और कवक जैसे जीव करते हैं। सड़ने की प्रक्रिया में लीटर, डफ और ह्यूमस की अवस्थाएं आती हैं।
ज़मीन पर सूखे हुए पौधों के हिस्सों की परत जो अभी सड़ी नहीं है, उसे लीटर कहते हैं। लीटर के नीचे जो पौधे के हिस्से थोड़े सड़ चुके होते हैं, लेकिन पहचाने जा सकते हैं, उसे डफ कहते हैं। डफ के नीचे जो परत पूरी तरह सड़ चुकी होती है और पौधों का मूल रूप पहचानना मुश्किल होता है, उसे ह्यूमस कहते हैं।
ह्यूमस एक काला या भूरा, हल्का और बारीक कार्बनिक पदार्थ है। ज़्यादा सड़ने पर ह्यूमस से खनिज लवण निकलते हैं। पौधों और जानवरों के मरे हुए हिस्सों से ह्यूमस बनने को ह्यूमीफिकेशन कहते हैं, और ह्यूमस के खनिज लवणों में बदलने को खनिजीकरण कहते हैं।
ह्यूमस का निर्माण वहां की वनस्पति और जलवायु पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक मूलर के अनुसार, ह्यूमस दो तरह का होता है:
• **मोर ह्यूमस (Mor humus):** यह उन जगहों पर होता है जहाँ बारिश के पानी से मिट्टी से क्षारीय पदार्थ बह जाते हैं, जिससे मिट्टी की ऊपरी परतें अम्लीय हो जाती हैं। इससे सड़ने वाले जीव धीरे काम करते हैं। इसे कच्चा ह्यूमस भी कहते हैं।
• **मल्ल ह्यूमस (Mull humus):** इस मिट्टी का रंग भूरा या काला होता है। इसमें सड़ने वाले जीव और केंचुए ज़्यादा होते हैं, जिससे मरे हुए पौधों के हिस्से जल्दी सड़ जाते हैं। यह मिट्टी ढीली और हवादार होती है और ह्यूमस पूरी तरह से विकसित होता है।
**(vi) मृदा जल (Soil water):**
मिट्टी में पानी का मुख्य स्रोत बारिश है। बारिश का कुछ पानी बहकर नदियों, झीलों और समुद्रों में चला जाता है, जिसे वाह जल (run off) कहते हैं और यह पौधों को नहीं मिलता। बाकी पानी मिट्टी में रिसकर (percolate) अलग-अलग रूपों में मिलता है।
(अ) **आर्द्रताग्राही जल (Hygroscopic water):** यह पानी मिट्टी के कणों के चारों ओर एक पतली परत के रूप में चिपका रहता है, क्योंकि यह कणों से ससंजन (cohesion) और आसंजन (adhesion) बलों से जुड़ा होता है। पौधे इस पानी का उपयोग नहीं कर पाते।
(ब) **केशिका जल (Capillary water):** यह पानी मिट्टी के कणों के बीच की छोटी जगहों में केशिका बल के कारण फंसा रहता है। पौधों के लिए यही पानी सबसे महत्वपूर्ण होता है और वे इसे सोखते हैं।
मिट्टी के कणों में रासायनिक यौगिक जैसे लोहा, एल्युमिनियम और सिलिका के पानी वाले ऑक्साइड भी होते हैं। पौधे इस पानी का उपयोग नहीं कर पाते हैं।
मिट्टी से गुरुत्वाकर्षण जल के निकल जाने के बाद जो पानी बचा रहता है, उसे क्षेत्र क्षमता (field capacity) कहते हैं। इसमें केशिका जल, आर्द्रता जल, रासायनिक रूप से बंधा जल और जलवाष्प शामिल होते हैं।
क्षेत्र क्षमता \( = \) केशिका जल \( + \) आर्द्रता जल \( + \) रासायनिक संयुक्त जल \( + \) जलवाष्प
आर्द्रता जल और केशिका जल के कुल योग को मिट्टी की जल धारण क्षमता कहते हैं। जब पौधों में पहली बार स्थायी म्लानि (permanent wilting) आती है, उस समय मिट्टी में मौजूद नमी की प्रतिशतता को म्लानि गुणांक कहते हैं।
पौधों को मिलने वाले पानी को प्राप्य जल (Available water) और जो नहीं मिल पाता, उसे अप्राप्य जल (Unavailable water) कहते हैं। मृदा वैज्ञानिकों ने कुल पानी को होलार्ड (Holard), पौधों को मिलने वाले पानी को चिसार्ड (Chesard) और नहीं मिलने वाले पानी को इकार्ड (Echard) कहा है। इस संबंध को ऐसे दिखाया जा सकता है:
होलार्ड \( = \) चिसार्ड \( + \) इकार्ड
चिसार्ड \( = \) होलार्ड \( - \) इकार्ड
इकार्ड \( = \) होलार्ड \( - \) चिसार्ड
In simple words: मिट्टी की बनावट, पानी, हवा और उसमें मौजूद तत्व पौधों की ग्रोथ पर सीधा असर डालते हैं। यह पौधों को ज़रूरी पोषक तत्व और सहारा देते हैं।
🎯 Exam Tip: मृदीय कारकों का वर्णन करते समय, मिट्टी के प्रकार, बनावट, जल धारण क्षमता और उसमें मौजूद वायु व खनिजों के प्रभाव को स्पष्ट करें। चित्र का उपयोग उदाहरण के रूप में करें।
Question 3. सजीवों में पायी जाने वाली धनात्मक तथा ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाओं पर एक निबन्ध लिखिए।
Answer: सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ और उनके आपसी प्रभाव जैविक कारक कहलाते हैं। ओडम ने सभी जैविक संबंधों को दो मुख्य भागों में बांटा है: धनात्मक और ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएँ।
(i) धनात्मक अन्योन्यक्रियाएँ (Positive interactions)
इन क्रियाओं में एक या दोनों जीवों को लाभ मिलता है। ये तीन प्रकार की होती हैं:
(अ) सहोपकारिता (Mutualism)
इसमें दोनों जातियों को लाभ होता है और दोनों का साथ रहना जीवन के लिए बहुत जरूरी होता है। उदाहरण के लिए:
* शैक (Lichen) - यह कवक और शैवाल का सहजीवन है, जहाँ दोनों एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
* सहजीवी नाइट्रोजन स्थिर कारक (Symbiotic Nitrogen Fixers) - कुछ बैक्टीरिया पौधों की जड़ों में रहकर हवा की नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोग योग्य बनाते हैं, जिससे पौधों को फायदा होता है।
* कवकमूल साहचर्य (Mycorrhizal Association) - कुछ उच्च श्रेणी के पौधों की जड़ों और कवक के बीच यह संबंध होता है। कवक पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है। उदाहरण: पाइनस, ओक, हिकरी, बीच।
(ब) प्राक् सहयोगिता (Protocooperation)
इसमें भी दोनों जातियों को लाभ मिलता है, लेकिन उनका हमेशा साथ रहना ज़रूरी नहीं है। उदाहरण:
* समुद्री एनिमोन और हर्मिट केंकड़ा - समुद्री एनिमोन केंकड़े के कवच पर चिपककर भोजन ढूँढने में मदद करता है, और एनिमोन अपनी डंक मारने वाली कोशिकाओं से केंकड़े को दुश्मनों से बचाता है।
(स) सहभोजिता (Commensalism)
इस संबंध में एक जाति को लाभ होता है, जबकि दूसरी को न तो लाभ होता है और न ही हानि। उदाहरण:
* अधिपादप (Epiphytes) - ये ऐसे पौधे होते हैं जो दूसरे पौधों पर उगते हैं, जैसे आर्किड। ये अपनी वेलामेन जड़ों से हवा से नमी लेते हैं और खुद का भोजन बनाते हैं। इन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।
* हरित शैवाल बेसीक्लेडिया (Green Algae Basicladia) - यह मीठे पानी के कछुओं के कवच पर उगता है।
* कंठलताएं (Lianas) - ये लकड़ी के तने वाले आरोही पौधे हैं जो जमीन से उगकर दूसरे पेड़ों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं ताकि उन्हें सूरज की रोशनी मिल सके। उदाहरण: टीनोस्पोरा, बिग्नोनिया, बोगेनविलिया।
(ii) ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएं (Negative interactions)
इस सहजीवन में एक या दोनों जीवों को नुकसान पहुँचता है। इन्हें विरोध (Antagonism) भी कहते हैं और ये तीन प्रकार की होती हैं:
(अ) शोषण (Exploitation)
इसमें एक जीव दूसरे जीव को भोजन, रहने की जगह या आश्रय के लिए सीधे या परोक्ष रूप से इस्तेमाल करके नुकसान पहुँचाता है। भोजन के लिए शोषण दो प्रकार का होता है:
(क) परजीविता (Parasitism)
इसमें एक जीव (परजीवी) दूसरे जीव (परपोषी) पर भोजन के लिए निर्भर रहता है। परजीवी परपोषी से विशेष चूषकांगों (haustoria) की मदद से भोजन चूसते हैं। परजीवी दो तरह के होते हैं:
* पूर्ण स्तम्भ परजीवी - जैसे कसाईथा, जो नीम और बोसविलिया पर पाई जाती है।
* आंशिक स्तम्भ परजीवी - जैसे लोरेन्थस और विस्कस, जो पाइनस पर पाई जाती है।
* अन्तःपरजीवी (Endoparasites) - ये परजीवी परपोषी की कोशिकाओं के अंदर रहते हैं, जैसे वायरस, बैक्टीरिया, माइकोप्लाज्मा।
(ख) परभक्षिता (Predation)
इसमें कुछ जीव दूसरे जीवों को भोजन के रूप में खाते हैं। परभक्षी आमतौर पर मांसाहारी या शाकाहारी होते हैं। उदाहरण:
* कवक डेक्टिलेला और जुफेगस - ये कीड़े और गोलकृमि खाते हैं।
* कीटभक्षी पादप - जैसे नेपेन्थीज, ड्रॉसेरा, यूट्रीकुलेरिया, डायोनिया। ये पौधे नाइट्रोजन की कमी वाली या पानी भरी मिट्टी में उगते हैं और अपने खास अंगों से कीड़ों को फँसाकर खाते हैं।
(ब) प्रतिजीविता (Antibiosis)
इसमें एक जीव कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ बनाता है जो दूसरे जीव की वृद्धि को रोक देते हैं या उन्हें मार देते हैं। इसे प्रतिजीविता कहते हैं।
* एलीलोपैथी (Allelopathy) - कुछ पौधों की जड़ों से ऐसे रसायन निकलते हैं जो दूसरी जाति के पौधों के बीजों को उगने से रोकते हैं। उदाहरण: एरिस्टिडा घास से निकलने वाले फिनोल नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया और शैवाल की वृद्धि को रोकते हैं। पार्थिनियम (गाजर घास), लैण्टाना और यूकेलिप्टस भी ऐसे गुण दिखाते हैं।
पारस्परिक क्रियाओं को समझने के लिए, हम उन्हें लाभकारी (+), हानिकारक (-) या उदासीन (0) चिह्नों से दर्शा सकते हैं। नीचे दी गई सारणी में संभावित संबंधों को दिखाया गया है:
| जाति अ | जाति ब | पारिस्परिक क्रिया का नाम |
|---|---|---|
| + | + | सहोपकारिता (Mutualism) |
| - | - | स्पर्धा (Competition) |
| + | - | परभक्षण (Predation) |
| + | - | परजीविता (Parasitism) |
| + | 0 | सहभोजिता (Commensalism) |
| - | 0 | अंतरजातीय परजीविता (Amensalism) |
सहोपकारिता में दोनों जातियों को लाभ होता है, जबकि स्पर्धा में दोनों को हानि होती है। परजीविता और परभक्षण में केवल एक जाति को लाभ होता है (परजीवी या परभक्षी को), और दूसरी जाति (परपोषी या शिकार) को नुकसान होता है। सहभोजिता में एक जाति को लाभ होता है और दूसरी पर कोई असर नहीं पड़ता। अंतरजातीय परजीविता में एक जाति को हानि होती है, जबकि दूसरी अप्रभावित रहती है। परभक्षण, परजीविता और सहभोजिता में जीव एक-दूसरे के पास रहते हैं।
In simple words: जीव एक-दूसरे के साथ अच्छे या बुरे तरीके से रहते हैं। अच्छे संबंधों में दोनों को या किसी एक को फायदा होता है, जबकि बुरे संबंधों में एक या दोनों को नुकसान होता है।
🎯 Exam Tip: जब भी आप जैविक अन्योन्यक्रियाओं के बारे में लिखें, तो प्रत्येक प्रकार को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और समझने में आसान उदाहरण दें। सारणी बनाना आपके उत्तर को अधिक व्यवस्थित दिखाता है।
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