Official RBSE Solutions for Class 11 Biology: Chapter 37 मेंढक
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Chapter-wise Solutions for Biology: Chapter 37 मेंढक
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RBSE Class 11 Biology Chapter 37 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. मेंढक किस वर्ग का प्राणि है
(a) मेमैलिया
(b) एम्फीबिया
(c) रैप्टिलिया
(d) पिसीज
Answer: (b) एम्फीबिया
In simple words: मेंढक एम्फीबिया वर्ग का जीव है, जिसका अर्थ है कि यह जल और स्थल दोनों जगह रह सकता है। इस वर्ग के प्राणियों में अनुकूलन की यह क्षमता पाई जाती है।
🎯 Exam Tip: जीवों का वर्गीकरण करते समय उनके आवास, शरीर संरचना और जीवन चक्र पर ध्यान दें।
Question 2. मेंढक है
(a) मांसाहारी
(b) शाकाहारी
Answer: (a) मांसाहारी
In simple words: मेंढक एक मांसाहारी जीव है, जो छोटे कीड़े-मकोड़े और अन्य छोटे जीवों को खाकर अपना पेट भरता है। यह अपनी लंबी जीभ का इस्तेमाल शिकार पकड़ने के लिए करता है।
🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला में मेंढक एक महत्वपूर्ण मांसाहारी उपभोक्ता है, जो कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करता है।
Question 3.
(a) द्विकोष्ठीय
(b) चार कोष्ठीय
(c) त्रिकोष्ठीय
(d) एककोष्ठीय
Answer: (c) त्रिकोष्ठीय
In simple words: मेंढक का हृदय तीन कक्षों का बना होता है, जिसमें दो आलिंद और एक निलय होता है। यह संरचना रक्त के आंशिक मिश्रण की अनुमति देती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न जीवों के हृदय की कोष्ठिकाओं की संख्या याद रखें, जैसे मछली में दो, मेंढक में तीन, और पक्षियों व स्तनधारियों में चार।
Question 4. मेंढक में श्वसन होता है
(a) त्वचा द्वारा
(b) मुखगुहा द्वारा
(c) फुफ्फुस द्वारा
(d) उपरोक्त सभी के द्वारा
Answer: (d) उपरोक्त सभी के द्वारा
In simple words: मेंढक अपनी आवश्यकतानुसार त्वचा, मुखगुहा और फेफड़ों तीनों के माध्यम से सांस ले सकता है। यह उसे विभिन्न वातावरणों में जीवित रहने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: मेंढक में श्वसन के बहुविध तरीके उसकी उभयचर प्रकृति के कारण विकसित हुए हैं, जो उसे पानी और जमीन दोनों पर जीवित रहने में सहायता करते हैं।
Question 5. मेंढक में निषेचन होता है
(a) आन्तरिक
(b) बाह्य
(c) कभी बाह्य कभी आन्तरिक
(d) न बाह्य न आन्तरिक
Answer: (b) बाह्य
In simple words: मेंढक में अंडे और शुक्राणु शरीर के बाहर, आमतौर पर पानी में मिलते हैं, जिसे बाह्य निषेचन कहते हैं। यह प्रक्रिया जलीय वातावरण में अधिक सामान्य है।
🎯 Exam Tip: बाह्य निषेचन आमतौर पर जलीय जीवों में देखा जाता है, जबकि स्थलीय जीवों में आंतरिक निषेचन होता है।
Question 6. मेंढक के डिंभक (लार्वा) का नाम है
(a) टेडपाल
(b) निम्फ
(c) टोरनेरिया
(d) बाईपिन्नेरिया
Answer: (a) टेडपाल
In simple words: मेंढक के लार्वा को टेडपोल कहते हैं, जो एक मछली जैसा दिखता है और पानी में रहता है। यह बाद में वयस्क मेंढक में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: लार्वा अवस्था का नाम और उसके प्रमुख लक्षण याद रखना जीव विज्ञान के महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
Question 7. उत्सर्जी पदार्थ की प्रकृति के आधार पर मेंढक होता है
(a) यूरिकोटेलिक
(b) अमोनोटेलिक
(c) यूरियोटेलिक
(d) उपरोक्त सभी
Answer: (c) यूरियोटेलिक
In simple words: मेंढक यूरियोटेलिक होता है, जिसका मतलब है कि वह यूरिया को अपने मुख्य उत्सर्जी पदार्थ के रूप में बाहर निकालता है। यह जल की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: उत्सर्जी पदार्थ का प्रकार जीव के जल संरक्षण और पर्यावरणीय अनुकूलन को दर्शाता है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 37 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. भारतीय मेंढक को सामान्य रूप से किस नाम से जाना जाता है ?
Answer: भारतीय मेंढक को सामान्य रूप से राना टिग्रीना (Rana Tigrina) के नाम से जाना जाता है। इस वैज्ञानिक नाम का उपयोग जीव विज्ञान में विशेष पहचान के लिए किया जाता है।
In simple words: भारतीय मेंढक को 'राना टिग्रीना' कहते हैं।
🎯 Exam Tip: जीवों के सामान्य और वैज्ञानिक दोनों नामों को याद रखें, क्योंकि वैज्ञानिक नाम वैश्विक स्तर पर मान्य होते हैं।
Question 2. मेंढक का वैज्ञानिक नाम बताइये।
Answer: मेंढक का वैज्ञानिक नाम राना टिग्रीना है। यह नाम इसकी प्रजाति को अन्य मेंढक प्रजातियों से अलग करता है।
In simple words: मेंढक का वैज्ञानिक नाम राना टिग्रीना है।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नामकरण प्रणाली (द्विपद नामकरण) कैरोलस लिनिअस द्वारा दी गई थी और यह जीव विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण है।
Question 3. भारतीय मेंढक (राना टिग्रीना) का आवास स्थान बताइये।
Answer: गड्ढे और तालाब भारतीय मेंढक का मुख्य आवास स्थान हैं। वे पानी के पास नम स्थानों पर रहना पसंद करते हैं ताकि उनकी त्वचा सूखी न हो।
In simple words: भारतीय मेंढक गड्ढों और तालाबों में रहते हैं।
🎯 Exam Tip: किसी भी जीव के आवास स्थान का वर्णन करते समय जल और नमी की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दें, खासकर उभयचरों के लिए।
Question 4. मेंढक को भोजन क्या है ?
Answer: मेंढक एक मांसाहारी प्राणी है। इसका भोजन मुख्य रूप से कीड़े, मकोड़े और मोलस्का संघ के प्राणी होते हैं। ये छोटे शिकारियों के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: मेंढक कीड़े, मकोड़े और छोटे मोलस्का जैसे जीवों को खाता है क्योंकि यह मांसाहारी है।
🎯 Exam Tip: खाद्य श्रृंखला में मेंढक का स्थान और उसके द्वारा खाए जाने वाले जीवों के प्रकार को समझना पारिस्थितिकी के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 6. मेंढक में परिसंचरण तंत्र किस प्रकार की होता है ?
Answer: मेंढक में परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार (closed type) का होता है। इसका मतलब है कि रक्त हमेशा वाहिनियों के अंदर बहता है और कभी भी सीधे शरीर के अंगों के संपर्क में नहीं आता।
In simple words: मेंढक में रक्त वाहिनियों के अंदर ही बहता है, इसे बंद परिसंचरण तंत्र कहते हैं।
🎯 Exam Tip: बंद परिसंचरण तंत्र अधिक कुशल होता है क्योंकि यह रक्तचाप और प्रवाह को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने की अनुमति देता है।
Question 7. मेंढक में वृक्क किस प्रकार के होते हैं ?
Answer: मेंढक में वृक्क मीसोनेफ्रॉस (mesonephros) प्रकार के होते हैं। यह वृक्क विकास की एक मध्यवर्ती अवस्था है जो मछली और कुछ अन्य उभयचरों में पाई जाती है।
In simple words: मेंढक के गुर्दे मीसोनेफ्रॉस प्रकार के होते हैं।
🎯 Exam Tip: वृक्कों के विभिन्न प्रकारों (प्रोनेफ्रॉस, मीसोनेफ्रॉस, मेटानफ्रॉस) को याद रखें और वे किस जीव समूह में पाए जाते हैं।
Question 8. मेंढक में परिवर्धन कहाँ पर होता है ?
Answer: मेंढक में परिवर्धन शरीर से बाहर जल में होता है। अंडे पानी में दिए जाते हैं और लार्वा अवस्था भी जल में ही पूरी होती है।
In simple words: मेंढक का विकास शरीर के बाहर पानी में होता है।
🎯 Exam Tip: बाह्य परिवर्धन वाले जीवों को अपने विकास के लिए जलीय वातावरण की आवश्यकता होती है।
Question 9. मेंढक के लार्वा का नाम बताइये।।
Answer: मेंढक के लार्वा का नाम टेडपोल (Tadpole) है। टेडपोल में मछली जैसी पूंछ और गलफड़े होते हैं, जो वयस्क मेंढक में नहीं होते।
In simple words: मेंढक के बच्चे को टेडपोल कहते हैं।
🎯 Exam Tip: टेडपोल अवस्था में गलफड़े और पूंछ का होना उसके जलीय जीवन के अनुकूलन को दर्शाता है।
Question 10. मेंढक में युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) किस संरचना द्वारा बाहर निकलते हैं।
Answer: मेंढक में युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) अवस्कर (cloaca) द्वारा बाहर निकलते हैं। अवस्कर एक सामान्य छिद्र है जो उत्सर्जन, प्रजनन और पाचन तंत्र के लिए उपयोग होता है।
In simple words: मेंढक में शुक्राणु और अंडाणु अवस्कर नाम की एक ही जगह से बाहर आते हैं।
🎯 Exam Tip: अवस्कर की संरचना कई निम्न कशेरुकी जीवों में पाई जाती है, जो प्रजनन और उत्सर्जन के लिए एक साझा मार्ग प्रदान करता है।
Question 11. मेंढक टर्र-टर्र की ध्वनि कैसे उत्पन्न करता है ?
Answer: मेंढक टर्र-टर्र की ध्वनि वाक कोश (Vocal cord) से उत्पन्न करता है। नर मेंढक विशेष रूप से प्रजनन के समय मादाओं को आकर्षित करने के लिए इन ध्वनियों का उपयोग करते हैं।
In simple words: मेंढक अपनी आवाज 'टर्र-टर्र' वाक कोश से निकालता है।
🎯 Exam Tip: ध्वनि उत्पन्न करने का यह तंत्र नर मेंढकों में अधिक विकसित होता है और प्रजनन व्यवहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Question 13. मेंढक में नेत्र (Eyes) कैसे होते हैं ?.
Answer: मेंढक के नेत्र बड़े, उभरे हुए और गोल होते हैं। ये नेत्र उसे चारों ओर देखने में मदद करते हैं, जो शिकार को खोजने और शिकारियों से बचने के लिए उपयोगी है।
In simple words: मेंढक की आंखें बड़ी, बाहर निकली हुई और गोल होती हैं।
🎯 Exam Tip: मेंढक के उभरे हुए नेत्र उसे पानी से बाहर रहते हुए भी आसपास का व्यापक दृश्य देखने में सक्षम बनाते हैं।
Question 14. मेंढक में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ क्या होता है ?
Answer: मेंढक में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ यूरिया (Urea) होता है। यूरिया अमोनिया की तुलना में कम जहरीला होता है और इसके उत्सर्जन के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है।
In simple words: मेंढक यूरिया को मुख्य उत्सर्जी पदार्थ के रूप में निकालता है।
🎯 Exam Tip: यूरिया का उत्सर्जन जलीय से स्थलीय जीवन की ओर अनुकूलन का एक संकेत है, क्योंकि अमोनिया का उत्सर्जन अधिक पानी की मांग करता है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 37 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. मेंढक के आवास एवं स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
Answer: मेंढक अलवणीय जल में पाया जाने वाला जन्तु है, जैसे तालाब, पोखर और झील में। यह नदी के किनारों पर उन गड्ढों में भी पाया जाता है, जहाँ पानी रुका रहता है। यह अलवण-जलीय जलाशयों के आसपास नम भूमि में भी रहते हैं ताकि अपनी त्वचा को गीली रख सकें। इस प्रकार, यह एक उभयचरी (Amphibious) प्राणी है और यह असमतापी (coldblooded) होता है। इसका मतलब है कि मेंढक का शरीर का तापमान बाहर के वातावरण के अनुसार बदलता है।
In simple words: मेंढक साफ पानी में, जैसे तालाबों और झीलों में रहता है। यह जमीन और पानी दोनों जगह रह सकता है और इसका शरीर का तापमान बाहर के मौसम के हिसाब से बदलता है।
🎯 Exam Tip: उभयचरों के लिए नम वातावरण आवश्यक है, क्योंकि वे अपनी त्वचा के माध्यम से श्वसन करते हैं और पानी में प्रजनन करते हैं।
Question 2. मेंढक के बाह्य संरचना का वर्णन कीजिए।
Answer: मेंढक की बाह्य संरचना (Morphology) में इसकी मुलायम, नम और लसलसी त्वचा प्रमुख है।
- आकार एवं परिमाप (Shape & Size): मेंढक की आकृति त्रिशंकु के समान होती है। इसका अगला भाग थोड़ा नुकीला और पिछला भाग थोड़ा गोलाकार होता है। राना टिग्रीना की लंबाई 12-18 सेमी और चौड़ाई लगभग 5-8 सेमी होती है।
- रंग (Colour): मेंढक का रंग हरा होता है और सिर पर बेतरतीब धारियाँ और धब्बे होते हैं। निचली सतह पूरी तरह से पीली होती है। नर मेंढक का रंग थोड़ा गहरा और शरीर पतला होता है।
मेंढक का शरीर दो भागों - सिर (Head) और धड़ (Trunk) में बंटा होता है। इसमें गर्दन का अभाव होता है। सिर के आगे के हिस्से पर मुख होता है और मुख के ऊपर एक जोड़ी नासाछिद्र होते हैं। सिर के पिछले चौड़े भाग के दोनों ओर दो बड़े-बड़े गोलाकार नेत्र होते हैं। नेत्र पर एक पारदर्शी झिल्ली होती है जिसे निमेषक पटल कहते हैं। आँखों के थोड़ा पीछे सिर के दोनों ओर कर्ण पटह (tympanic membrane) होते हैं। यह त्वचा की नम प्रकृति उसे पानी को अवशोषित करने में भी मदद करती है।
In simple words: मेंढक की त्वचा चिकनी और गीली होती है। इसका शरीर सिर और धड़ में बंटा होता है, जिसमें गर्दन नहीं होती। इसकी आंखें बड़ी और बाहर निकली होती हैं, और यह हरी-पीली रंग का होता है।
🎯 Exam Tip: मेंढक की त्वचा की नमी और रंग उसे शिकारियों से छिपने में मदद करते हैं (छद्मावरण)।
Question 3. मेंढक में शीत निष्क्रियता पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: मेंढक एक असमतापी जन्तु है, जिसका मतलब है कि इसके शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार घटता-बढ़ता है। शीत ऋतु में जब वातावरण का तापमान बहुत कम हो जाता है, तो मेंढक भूमि में 30-60 सेमी. की गहराई में चला जाता है। इस समय उसकी सभी शारीरिक क्रियाएँ धीमी हो जाती हैं। वह भोजन नहीं करता है और नम त्वचा द्वारा सांस लेता है। इसी अवस्था को शीत निष्क्रियता (Hibernation) कहते हैं। शीतकाल के अंत में और बसंत के शुरुआत में तापमान बढ़ने पर वह फिर से सक्रिय हो जाता है। यह एक महत्वपूर्ण अनुकूलन है जो उसे अत्यधिक ठंड से बचाता है।
In simple words: जब बहुत ठंड पड़ती है, तो मेंढक मिट्टी में गहरा घुस जाता है और अपनी सारी हलचल कम कर देता है। इसे शीत निष्क्रियता कहते हैं। इस दौरान यह त्वचा से सांस लेता है।
🎯 Exam Tip: शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता (aestivation) दोनों ही मेंढक के तापमान नियंत्रण और प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों से बचने के तरीके हैं।
Question 4. मेंढक की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: मेंढक की आहारनाल का नामांकित चित्र नीचे दिया गया है:
मेंढक की आहारनाल एक पूर्ण पाचक मार्ग है जो मुखगुहा से शुरू होकर अवस्कर द्वार पर समाप्त होता है। यह भोजन के पाचन और अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
In simple words: मेंढक का पाचन तंत्र मुंह से शुरू होकर अवस्कर द्वार पर खत्म होता है, जिसमें भोजन को पचाने और ऊर्जा निकालने के लिए कई अंग होते हैं।
🎯 Exam Tip: आरेख बनाते समय, सभी अंगों को साफ और स्पष्ट रूप से नामांकित करना सुनिश्चित करें, और उनके सापेक्षिक स्थान को सही ढंग से दर्शाएं।
Question 6. मेंढक में पानी के अन्दर व पानी के बाहर किस प्रकार का श्वसन होता है ?
Answer: मेंढक में पानी के अंदर और बाहर दोनों जगह श्वसन के विभिन्न तरीके होते हैं:
- त्वचीय श्वसन (Integumentary respiration): मेंढक में मुख्य रूप से त्वचा द्वारा श्वसन होता है। इसकी त्वचा में रक्त वाहिनियों की संख्या अधिक होती है और इसमें श्लेष्मा ग्रंथियाँ होती हैं जो त्वचा को नम बनाए रखती हैं। इससे ऑक्सीजन त्वचा से विसरित होकर रक्त में पहुँच जाती है। यह विधि जल में, स्थल पर, तथा शीत व ग्रीष्म निष्क्रियता के दौरान गैसों का आदान-प्रदान करती है। यह त्वचा को नम रखने के लिए लगातार पानी में रहने की आवश्यकता को भी दर्शाता है।
- मुखगुहीय श्वसन (Buccal respiration): मेंढक मुखगुहा द्वारा भी श्वसन करता है। जब यह जमीन पर होता है, तो वायु मुखगुहिका में प्रवेश करती है और बाहर आती रहती है। मुखगुहा में रक्तवाहिनियाँ अधिक संख्या में होती हैं जो ऑक्सीजन का अवशोषण करती हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालती हैं।
- फुफ्फुसीय श्वसन (Pulmonary respiration): फेफड़ों द्वारा श्वसन को फुफ्फुसीय श्वसन कहते हैं। फुफ्फुस अंडाकार, गुलाबी रंग की थैलेनुमा संरचनाएँ होती हैं जो शरीर गुहा के ऊपरी वक्षीय भाग में पाई जाती हैं। मेंढक में फेफड़ों द्वारा श्वसन के साथ-साथ मुखगुहीय और त्वचीय श्वसन भी होता है, क्योंकि केवल फुफ्फुसीय श्वसन से श्वसन क्रिया पूरी नहीं हो पाती है। फेफड़े मेंढक के स्थलीय जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: मेंढक पानी में त्वचा से और जमीन पर त्वचा, मुंह के अंदर और फेफड़ों से सांस लेता है। त्वचा को हमेशा नम रहना पड़ता है ताकि वह सांस ले सके।
🎯 Exam Tip: मेंढक की श्वसन की बहुमुखी प्रकृति उसके अनुकूलन का उदाहरण है, जो उसे पानी और जमीन दोनों पर जीवित रहने में मदद करती है।
Question 7. मेंढक के हृदय के बाह्यदृश्य का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: मेंढक के हृदय के बाह्यदृश्य का नामांकित चित्र नीचे दिया गया है:
मेंढक का हृदय एक त्रिकोष्ठीय संरचना है जिसमें दो आलिंद और एक निलय होते हैं। यह एक बंद परिसंचरण तंत्र का हिस्सा है।
In simple words: मेंढक का हृदय तीन हिस्सों का होता है- दो ऊपर (आलिंद) और एक नीचे (निलय)। यह खून को पूरे शरीर में पहुंचाता है।
🎯 Exam Tip: मेंढक के हृदय में आलिंदों और निलय के बीच का विभाजन आंशिक रूप से होता है, जिससे शुद्ध और अशुद्ध रक्त का कुछ मिश्रण होता है।
Question 9. मेंढक के मस्तिष्क का वर्णन कीजिए।
Answer: मेंढक का मस्तिष्क हड्डियों से बने एक बक्से के समान संरचना में स्थित होता है, जिसे कपाल (cranium) कहते हैं। मेंढक का मस्तिष्क तीन मुख्य भागों में विभाजित होता है:
- अग्र मस्तिष्क (Fore Brain): इस भाग में घ्राण पालियाँ (olfactory lobes), एक जोड़ी प्रमस्तिष्क गोलार्ध (cerebral hemispheres) और डायनसेफेलॉन (diencephalon) शामिल हैं। यह गंध, दृष्टि और समन्वय के लिए महत्वपूर्ण है।
- मध्य मस्तिष्क (Mid Brain): यह दो दृक पालियों (optic lobes) से बना होता है, जिन्हें कॉर्पोरा बाइजेमिना (Corpora Bigemina) कहते हैं। ये मुख्य रूप से दृष्टि संबंधी कार्यों को नियंत्रित करती हैं।
- पश्च मस्तिष्क (Hind Brain): यह मेड्यूला ऑबलोंगेटा (medulla oblongata) और अनुमस्तिष्क (cerebellum) से बना होता है। मेड्यूला ऑबलोंगेटा का पिछला भाग मेरुरज्जु (spinal cord) की केंद्रीय नाल में खुलता है। यह संतुलन और अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
प्रत्येक भाग में विशिष्ट कार्य होते हैं, जो मेंढक के व्यवहार और जीवन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
In simple words: मेंढक का दिमाग एक हड्डी के बक्से में होता है और इसके तीन मुख्य हिस्से होते हैं: आगे का दिमाग (गंध और सोचने के लिए), बीच का दिमाग (देखने के लिए) और पीछे का दिमाग (संतुलन और शरीर की गतिविधियों के लिए)।
🎯 Exam Tip: मस्तिष्क के प्रत्येक भाग के कार्य और उनकी शारीरिक स्थिति को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर तुलनात्मक शरीर रचना विज्ञान में।
Question 10. मेंढक में कौन-कौन से संवेदांग पाये जाते हैं ?
Answer: मेंढक में पाँच प्रकार के संवेदांग पाए जाते हैं:
- स्पर्श-संवेदी अंग (Tango receptors): ये अधिचर्म (epidermis) के नीचे बड़ी संख्या में होते हैं। ये रसायन, ताप, नमी, प्रकाश और दर्द जैसी स्पर्श संबंधी संवेदनाओं को महसूस करते हैं। ये मेंढक को अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
- स्वाद-संवेदी अंग (Gustoreceptors): ये अंग स्वाद से संबंधित होते हैं। ये जिह्वा में और मुख गुहिका के ऊपर भी पाए जाते हैं। ये मेंढक को भोजन का स्वाद पहचानने में मदद करते हैं।
- गंध-संवेदी अंग (Olfactoreceptors): ये नासिका क्षेत्र में स्थित होते हैं और गंध को महसूस करते हैं। यह मेंढक को भोजन खोजने और शिकारियों से बचने में सहायता करता है।
- नेत्र (Eyes): मेंढक में एक जोड़ी गोलाकार नेत्र गड्ढों में स्थित होते हैं। ये साधारण नेत्र होते हैं जो देखने का ज्ञान कराते हैं। नेत्रों पर निमेषक पटल होता है जो पानी के अंदर सुरक्षा प्रदान करता है।
- कर्ण पटह (Tympanic membrane): ये आँखों के थोड़ा पीछे दो गोलाकार पर्दे होते हैं। ये प्राणी को ध्वनि का ज्ञान कराते हैं और सुनने में मदद करते हैं।
In simple words: मेंढक में पांच तरह के संवेदांग होते हैं: छूने के लिए त्वचा, स्वाद के लिए जीभ, सूंघने के लिए नाक, देखने के लिए आंखें, और सुनने के लिए कान।
🎯 Exam Tip: संवेदांगों के प्रकार और उनके कार्यों को जीव के अनुकूलन के संदर्भ में समझना चाहिए, क्योंकि वे जीव को अपने पर्यावरण के साथ बातचीत करने में मदद करते हैं।
Question 12. मेंढक में पाई जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं उनसे निकलने वाले हार्मोन्स के नाम लिखिए।
Answer: मेंढक में पाई जाने वाली अंतःस्रावी ग्रंथियां और उनसे निकलने वाले हार्मोन्स निम्नलिखित हैं:
| ग्रन्थि का नाम | नाम हार्मोन |
|---|---|
| अग्न्याशयी द्वीप | इन्सुलिन व ग्लूकोगॉन |
| अधिवृक्क ग्रन्थि | एड्रीनेलिन हार्मोन |
| वृषण | टेस्टोस्टेरोन |
| अण्डाशय | ऐस्ट्रोजन |
मेंढक में ये ग्रंथियां शरीर के विभिन्न कार्यों, जैसे चयापचय, वृद्धि और प्रजनन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
In simple words: मेंढक में कुछ ग्रंथियां होती हैं जो हार्मोन बनाती हैं। अग्न्याशय से इंसुलिन, अधिवृक्क ग्रंथि से एड्रेनालाईन, वृषण से टेस्टोस्टेरोन और अंडाशय से एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन निकलते हैं।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके द्वारा स्रावित हार्मोनों के नाम और उनके प्रमुख कार्यों को याद रखना जीव विज्ञान के लिए आवश्यक है।
Question 13. मेंढक के नर जनन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: मेंढक के नर जनन तंत्र का नामांकित चित्र नीचे दिया गया है:
नर जनन तंत्र में वृषण, शुक्रवाहिनी, मूत्र जनन वाहिनी, शुक्राशय और अवस्कर द्वार जैसे अंग शामिल होते हैं। यह शुक्राणुओं के उत्पादन और उनके निष्कासन के लिए जिम्मेदार है।
In simple words: मेंढक का नर जनन तंत्र शुक्राणु बनाने और उन्हें बाहर निकालने में मदद करता है। इसमें वृषण (जो शुक्राणु बनाते हैं), शुक्राशय और अवस्कर जैसे अंग होते हैं।
🎯 Exam Tip: नर जनन तंत्र के प्रत्येक भाग का कार्य और संरचना को समझें, विशेषकर वृषण की भूमिका और जनन-मूत्रवाहिनी की कार्यप्रणाली।
Question 14. मेंढक के मादा जनन तंत्र को नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: मेंढक के मादा जनन तंत्र का नामांकित चित्र नीचे दिया गया है:
मादा जनन तंत्र में अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय और अवस्कर जैसे अंग शामिल होते हैं। यह अंडे के उत्पादन और निषेचन के लिए आवश्यक है।
In simple words: मेंढक का मादा जनन तंत्र अंडे बनाने और उन्हें बाहर निकालने में मदद करता है। इसमें अंडाशय (जो अंडे बनाते हैं), अंडवाहिनी और अवस्कर जैसे अंग होते हैं।
🎯 Exam Tip: मादा जनन तंत्र के प्रत्येक भाग की भूमिका, विशेषकर अंडाशय और अंडवाहिनी का कार्य, और बाह्य निषेचन की प्रक्रिया को समझें।
Question 15. मेंढक की पाचन क्रिया में HCI क्या कार्य करता है ?
Answer: मेंढक की पाचन क्रिया में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) के कई महत्वपूर्ण कार्य हैं:
- भोजन काफी समय तक आमाशय में पड़ा रहता है, इसलिए यह संभव हो सकता है कि वह सड़ जाए, परंतु इस अम्ल के कारण वह सड़ नहीं पाता है। HCl भोजन को खराब होने से बचाता है।
- यह अम्लीय माध्यम प्रदान करता है, जो पाचक एंजाइमों को काम करने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाता है।
- HCl कठोर ऊतकों को घोलने में सहायता करता है, जिससे भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में मदद मिलती है।
- यह भोजन को रोगाणु रहित (sterilize) करता है, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है।
- निष्क्रिय पेप्सिनोजन (proenzyme) को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है, जो प्रोटीन के पाचन की शुरुआत करता है।
- जठरनिर्गमी रोधनी (pyloric sphincter) को नियंत्रित करता है, जिससे भोजन आमाशय से छोटी आंत में धीरे-धीरे जाता है।
- कैल्शियम और लौह के अवशोषण में सहायता करता है, जो शरीर के लिए आवश्यक खनिज हैं।
In simple words: मेंढक के पेट में HCl भोजन को सड़ने से रोकता है, उसे छोटा करने में मदद करता है, कीटाणुओं को मारता है, और कुछ पचाने वाले रसायनों को सक्रिय करता है।
🎯 Exam Tip: HCl की भूमिका केवल पाचन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा और पोषक तत्वों के अवशोषण में भी सहायक है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 37 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. मेंढक की बाह्य संरचना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: मेंढक की बाह्य संरचना को उसकी मॉर्फोलॉजी कहा जाता है, जो उसके आवास और जीवनशैली के अनुकूल है। इसकी त्वचा मुलायम, नम और लसलसी होती है, जो श्वसन और पानी के अवशोषण में सहायक होती है। मेंढक का शरीर दो मुख्य भागों में बंटा होता है: सिर (Head) और धड़ (Trunk)। इसमें गर्दन और पूंछ का अभाव होता है, जिससे इसका शरीर धारा रेखित होता है और जलीय जीवन के लिए उपयुक्त बनता है।
(1) सिर (Head): मेंढक का सिर त्रिभुजाकार और चपटा होता है। इसका अगला भाग संकरा और पिछला भाग चौड़ा होता है। सिर पर निम्नलिखित संरचनाएँ पाई जाती हैं:
- मुख द्वार: सिर के नुकीले भाग को प्रोथ (snout) कहते हैं। प्रोथ के नीचे मुख द्वार होता है, जो दो जबड़ों से घिरा रहता है - ऊपरी जबड़ा और नीचे वाला जबड़ा।
- बाह्य नासा छिद्र: प्रोथ के आगे के ऊपरी भाग पर एक जोड़ी छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें बाह्य नासा छिद्र कहते हैं। ये श्वसन क्रिया में मदद करते हैं।
- नेत्र: सिर के सबसे ऊपरी भाग में एक जोड़ी बड़े, उभरे हुए नेत्र होते हैं। प्रत्येक नेत्र चारों ओर घूम सकता है। नेत्र पर दो पलकें होती हैं - ऊपरी पलक और निचली पलक। ऊपरी पलक हिलती नहीं है, जबकि निचली पलक हिल सकती है। निचली पलक का ऊपरी भाग एक पारदर्शी झिल्ली का रूप ले लेता है, जिसे निमेषक पटल कहते हैं। यह पटल पानी के अंदर आँखों की सुरक्षा करता है और चश्मे का काम करता है।
- कर्ण पटह (Tympanic membrane): आँखों के पीछे दो गोलाकार पर्दे होते हैं, जिन्हें कर्ण पटह कहते हैं। इनसे प्राणी को ध्वनि का ज्ञान होता है।
नर मेंढकों के सिर के निचले भाग पर एक जोड़ी हल्के लाल रंग की झुर्रीदार थैलियाँ होती हैं, जिन्हें वाक कोश (vocal sac) कहते हैं। इन्हीं को फुलाकर नर मेंढक ध्वनि उत्पन्न करता है।
(2) धड़ (Trunk): धड़ पर दो जोड़ी टाँगें पाई जाती हैं - अग्र पाद (fore limb) और पश्च पाद (hind limb)।
- अग्र पाद (Fore limb): प्रत्येक अग्र पाद के तीन भाग होते हैं: ऊपरी बाहु (upper arm), अग्र बाहु (fore arm) और हस्त (hand)। अग्र पाद में चार अंगुलियाँ होती हैं, लेकिन अंगूठा नहीं होता। अग्र पाद अपेक्षाकृत छोटे होते हैं।
- पश्च पाद (Hind limb): प्रत्येक पश्च पाद के भी तीन भाग होते हैं: ऊरु (thigh), जंघा (shank) और पाद (foot)। पश्च पाद में पाँच अंगुलियाँ होती हैं और इनके बीच त्वचा की एक झिल्ली फैली रहती है, जिसे पाद जाल (web) कहते हैं। पश्च पाद तैरने में चप्पू का काम करता है और फुदकने में स्प्रिंग की तरह गति उत्पन्न करता है।
मेंढक में लैंगिक द्विरूपता देखी जा सकती है। नर मेंढक में "टर्र-टर्र" की ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाक कोश होते हैं और अग्र पाद की पहली अंगुली में मैथुन अंग (copulatory pad) पाए जाते हैं। ये अंग मादा मेंढक में नहीं होते। वाक कोश से उत्पन्न ध्वनि नर मेंढक को मादा मेंढक को मैथुन के लिए आकर्षित करती है, और मैथुन अंग मादा को मजबूती से पकड़ने में मदद करते हैं।
मेंढक की बाह्य संरचना उसके वातावरण के साथ तालमेल बिठाने और उसके कार्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
In simple words: मेंढक का शरीर सिर और धड़ में बंटा होता है। इसकी त्वचा नम और चिकनी होती है, जो सांस लेने में मदद करती है। इसकी आंखें बड़ी होती हैं और इसके पास आगे व पीछे के पैर होते हैं, जो तैरने और कूदने के लिए होते हैं।
🎯 Exam Tip: मेंढक की बाह्य संरचना का वर्णन करते समय उसके शरीर के प्रत्येक भाग (सिर, धड़, नेत्र, पाद, त्वचा) की विशिष्टताओं और कार्यों को विस्तार से लिखें।
Question 2. मेंढक के पाचन की क्रियाविधि (Physiology) का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: मेंढक एक मांसाहारी (Carnivorous) प्राणी है, जो विभिन्न प्रकार के कीड़े, मकोड़े, घोंघे और कीड़े आदि खाता है। यह अपनी लंबी, चिपचिपी जीभ से शिकार को पकड़ता है। मेंढक भोजन को बिना चबाए ही निगल जाता है। इस प्रकार मुख-ग्रसनी गुहिका में कोई पाचन क्रिया नहीं होती। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि मुख-ग्रसनी गुहिका में म्यूकस के साथ पेप्सिन एंजाइम भी बनता है, परंतु इसकी भोजन पर कोई क्रिया नहीं होती जब तक कि यह आमाशय में नहीं पहुँच जाता।
आमाशय में पाचन: आमाशय की दीवारें बार-बार सिकुड़ने से लहरें उठने लगती हैं, जिनके कारण भोजन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगता है। इस क्रिया को क्रमाकुंचन (peristalsis) कहते हैं। इन्हीं क्रमाकुंचक लहरों की सहायता से भोजन में पाचक द्रव आसानी से मिल जाते हैं।
भोजन के आमाशय में आने पर जठर ग्रंथियां (gastric glands) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl, 14%) और पेप्सिन स्रावित करने लगती हैं। HCl के महत्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं:
- जीवाणुओं को नष्ट करता है।
- जीवित भोज्य कोशिकाओं को नष्ट करता है।
- भोजन को सड़ने से रोकता है।
- यह भोजन से चूने का अंश निकाल देता है।
- लोहे के अवशोषण में मदद करता है।
- भोजन की हड्डियों तथा कठोर आवरणों को घोलने में मदद करता है।
- निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
- एंजाइम की क्रिया के लिए अनुकूलतम (optimum) माध्यम प्रदान करता है।
पेप्सिन प्रोटीन को पेप्टोन (peptone) और प्रोटियोस (proteose) में बदल देता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि पेप्सिन आहारनाल की दीवारों को क्यों नहीं पचाता जो कि स्वयं भी प्रोटीन की ही बनी होती हैं? इसके दो कारण हैं:
- पेप्सिन प्रारंभ में निष्क्रिय अवस्था में स्रावित होता है।
- आहारनाल की भीतरी स्तर श्लेष्मा (mucous) से ढकी रहती है, जिसके कारण पाचक रस इस स्तर को पार करके श्लेष्मिका कला (mucous membrane) तक नहीं पहुँच पाता। श्लेष्मा से ढका खाना अधिक समय तक एक स्थान पर रुकता नहीं है, आगे बढ़ता जाता है।
छोटी आंत में पाचन: आमाशय में क्रमाकुंचन की क्रिया द्वारा भोजन को लुगदी के रूप में बदल दिया जाता है जिसे काइम (Chyme) कहते हैं। काइम बनते ही जठर-निर्गम कपाट (pyloric valve) बार-बार खुलने लगता है। इसके फलस्वरूप काइम धीरे-धीरे ग्रहणी (duodenum) में प्रवेश करता है। ग्रहणी में जाने के बाद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल श्लेष्मिका में शोषित होकर दो प्रकार के हार्मोन को उत्सर्जित करता है। अम्ल के मिलते ही सिक्रिटीन (secretin) तथा कोलीसिस्टोकाइनिन (cholecystokinin) हार्मोन सक्रिय होकर रक्त परिसंचरण द्वारा यकृत एवं अग्न्याशय में पहुँचते हैं। सिक्रिटीन हार्मोन के फलस्वरूप अग्न्याशय में संकुचन शुरू होता है और इसका पाचक रस अग्न्याशय वाहिनियों में होता हुआ ग्रहणी में आता है। कोलीसिस्टोकाइनिन हार्मोन पित्ताशय को उत्तेजित करता है, जिसके कारण पित्त, पित्त-वाहिनियों द्वारा ग्रहणी में जाता है।
एंजाइमों द्वारा पाचन: छोटी आंत में कई एंजाइम भोजन को पचाते हैं:
- एमिलेस (amylase): यह मंड या स्टार्च (starch) और बहुशर्कराइड (polysaccharide) को शर्करा में बदल देता है।
- लाइपेस (lipase): यह पायस या इमल्शन (emulsion) के रूप में बनी हुई वसा को ग्लिसरॉल (glycerol) तथा वसा अम्लों (fatty acids) में बदल देता है। लाइपेस की क्रिया से पहले वसा को पानी के साथ मिलाकर अपघटित किया जाता है, जिसे पायसीकरण (emulsification) कहते हैं। वसा को पायस या इमल्शन में बदलने में पित्त सहायता करता है। क्रमाकुंचन से यह क्रिया और तेज हो जाती है। पित्त में मुख्यतः पित्त-लवण (bile salts) व जल होता है, जो वसा के पायसीकरण में सहायता करते हैं। पायसीकरण के बाद लाइपेस की क्रिया तेज हो जाती है।
- छोटी आंत में पहुँचने से पूर्व काफी भोजन पच जाता है। आंत्र की श्लेष्मिका से आंत्रीय रस निकलते हैं, जिनमें एंटरोकाइनेज (enterokinase), इरेप्सिन (erepsin) और एमिलेस (amylase) पाए जाते हैं। ट्रिप्सिन, एमाइलेप्सिन और लाइपेस भी, जो मुख्य अग्न्याशयी (pancreatic) एंजाइम हैं, आंत्र में क्रियाशील रहते हैं। इरेप्सिन में कई एंजाइम होते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से पेप्टीडेस (peptidase) कहते हैं। ये प्रोटीन के अणुओं पर क्रियाशील नहीं होते, परंतु पेप्टोन व प्रोटियोस का एमीनो अम्लों में जल-अपघटन (hydrolysis) कर देते हैं।
अवशोषण व बहिक्षेपण (Absorption and Egestion): ग्लूकोज, एमीनो अम्ल, ग्लिसरॉल व वसीय अम्लों का अवशोषण (absorption) छोटी आंत्र की श्लेष्मिका द्वारा प्रारंभ हो जाता है। आंत्र की अवशोषण-क्षमता को बढ़ाने के लिए उसकी आंतरिक सतह पर दीर्घरोम (villi) और सूक्ष्मरोम (microvilli) पाए जाते हैं। पचे हुए पदार्थों को आंत्र की कोशिकाओं एवं रुधिर कोशिकाओं में प्रवेश पाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः इस क्रिया को सक्रिय अवशोषण (active absorption) कहते हैं। रुधिर कोशिकाओं से यह पदार्थ यकृत वाहिनिका शिरा द्वारा यकृत में पहुँच जाते हैं। अपचित पदार्थ बड़ी आंत्र और अवस्कर में होते हुए अवस्कर-द्वार (cloacal aperture) द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं। मेंढक में यह क्रिया एक विशेष प्रकार से होती है। मेंढक अपनी विष्ठा या मल (faeces) को एक झिल्लीनुमा थैले में बंद करके शरीर से बाहर फेंकता है। यह झिल्ली मल के चारों ओर अवस्कर में ही बनती है। कभी-कभी मल ऐंठदार रूप में भी बाहर फेंका जाता है।
In simple words: मेंढक पहले शिकार को पूरा निगल जाता है। फिर पेट में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भोजन को पचाना शुरू करता है, उसे नरम बनाता है और कीटाणुओं को मारता है। फिर भोजन छोटी आंत में जाता है, जहाँ एमिलेस, लाइपेस जैसे रस भोजन को और छोटे हिस्सों में तोड़ते हैं। पचे हुए भोजन को छोटी आंत सोख लेती है, और बचा हुआ कचरा अवस्कर द्वार से बाहर निकल जाता है।
🎯 Exam Tip: पाचन क्रियाविधि का वर्णन करते समय प्रत्येक अंग में होने वाली रासायनिक और यांत्रिक प्रक्रियाओं को क्रमबद्ध तरीके से समझाएं, और इसमें शामिल एंजाइमों की भूमिका को स्पष्ट करें।
Question 1. मेंढक में जनन तंत्र एवं भ्रूणीय परिवर्धन का वर्णन कीजिए।
Answer: कशेरुकी जन्तुओं में उत्सर्जन तंत्र और जनन तंत्र एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, इसलिए इन्हें जनन-मूत्र तंत्र (urinogenital system) कहा जाता है। सभी कशेरुकी जन्तु एकलिंगी होते हैं, और मेंढक भी एकलिंगी प्राणी है, जिसका अर्थ है कि नर और मादा अलग-अलग होते हैं। मेंढक में दो प्रकार के प्रजनन तंत्र होते हैं।
1. नर जनन तंत्र (Male reproductive system)
मेंढक का नर जनन तंत्र वृषण, शुक्र वाहिनिकाओं, मूत्र जनन वाहिनी, शुक्राशय, अवस्कर और अवस्कर द्वार से मिलकर बनता है।
वृषण (Testis): प्रत्येक वृक्क के निचले भाग में, सामने की तरफ, पीले रंग का एक छोटा अंडाकार वृषण होता है। यह वृषण उदर गुहा की पीछे की दीवार और वृक्क से एक पतली झिल्ली, जिसे वृषणधार/मीसोर्कियम (mesorchium) कहते हैं, से जुड़ा होता है। मीसोर्कियम वास्तव में पेरिटोनियम की दोहरी परत होती है। प्रत्येक वृषण में 10 से 14 पतली शुक्रवाहिकाएँ होती हैं, जो मीसोर्कियम से होते हुए वृक्क के अंदर, भीतरी किनारे पर स्थित बिडर्स नलिका में खुलती हैं।
वृषण की संरचना: वृषण में कई सूक्ष्म कुंडलित नलिकाएँ होती हैं जिन्हें शुक्रजनक नलिकाएँ (seminiferous tubules) कहते हैं। प्रत्येक शुक्रजनक नलिका की दीवार के बाहर एक पतली झिल्ली (membrana propria) होती है और अंदर की ओर जनन उपकला (germinal epithelium) पाई जाती है। जनन उपकला की कोशिकाएँ शुक्रजनन (spermatogenesis) की प्रक्रिया द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण करती हैं। शुक्रजनक नलिकाओं के बीच-बीच में संयोजी ऊतक में रक्त केशिकाएँ, तंत्रिका तंतु और अंतराली कोशिकाएँ (interstitial cells) होती हैं। अंतराली कोशिकाएँ नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन उत्पन्न करती हैं, जिसके कारण नर मेंढक में द्वितीयक लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं।
शुक्रजनक नलिकाएँ एक सिरे पर बंद होती हैं और दूसरे सिरे पर पतले व विभाजित होकर एक महीन जाल, जिसे वृषण जाल (retetestis) कहते हैं, बनाती हैं। शुक्रवाहिकाएँ इसी जाल से निकलती हैं। शुक्राणु शुक्रजनक नलिकाओं से वृषण जाल में आते हैं और फिर वृषण जाल से शुक्रवाहिका में पहुँचते हैं। यहाँ से वे वृक्क में स्थित बिडर्स नलिका में जाते हैं। बिडर्स नलिका से कई अनुप्रस्थ संग्रह नलिकाएँ निकलकर एक अनुदैर्ध्य संग्रह नलिका (longitudinal collecting tubule) में खुलती हैं, जो स्वयं मूत्र वाहिनी में खुलती है। नर मेंढक में मूत्र वाहिनी द्वारा मूत्र और शुक्राणु दोनों ही बाहर निकलते हैं। इस प्रकार मूत्रवाहिनी शुक्रवाहिनी (vasdeference) का भी कार्य करती है, इसलिए इसे जनन-मूत्रवाहिनी (urinogenital duct) कहते हैं।
2. मादा जननांग (Female reproductive system)
मादा जननांग अण्डाशय (ovary), अण्डवाहिनियों (oviducts), अवस्कर और अवस्कर द्वार (cloacal aperture) से मिलकर बनते हैं।
प्रत्येक वृक्क के निचले भाग में, सामने की तरफ, पीले रंग का एक अण्डाशय स्थित होता है। वृषण की तरह, अण्डाशय भी उदर की पीछे की दीवार और वृक्क से पेरीटोनियम की दोहरी झिल्ली, जिसे अण्डाशयधर (mesovarium) कहते हैं, से जुड़ा होता है। अण्डाशय अनियमित आकार के आठ पिण्डों में बंटी एक छोटी संरचना है, जो प्रजनन के मौसम में परिपक्व व बहुत सारे अण्डों से भरी होने के कारण फूलकर देहगुहा के अधिकांश भाग को घेर लेती है। इस समय यह सफेद-काले रंग की दिखाई देती है।
अण्डाशय का प्रत्येक पिण्ड छोटे-छोटे कई पिण्डकों में बंटा होता है। प्रत्येक पिण्डक में एक गुहा होती है, जो दो परतों वाली मोटी भित्ति से घिरी होती है। भित्ति का बाहरी स्तर संयोजी ऊतक और भीतरी स्तर जनन उपकला (germinal epithelium) का बना होता है। जनन उपकला की कोशिकाएँ विभाजित होकर छोटे-छोटे गुच्छक या पुटिकाएँ (follicles) बनाती हैं। पुटिका की एक कोशिका अन्य कोशिकाओं से बड़ी हो जाती है। यही कोशिका परिवर्तित होकर अण्डाणु बनाती है। पुटिका की शेष कोशिकाएँ बड़ी कोशिका के चारों ओर इकट्ठी होकर पुटिका स्तर (follicular layer) बनाती हैं। पुटिका स्तर की कोशिकाएँ (follicular cells) अण्डाणु का पोषण करती हैं। धीरे-धीरे केंद्र स्थित कोशिका में पोषक पदार्थ पीतक (yolk) के रूप में जमा होने से कोशिका का आकार बढ़ता जाता है, और अण्ड कोशिका को आकार बढ़ने के साथ-साथ पुटिका कोशिकाएँ छोटी होती जाती हैं। अंत में यह पीतक झिल्ली (vitelline membrane) का रूप धारण कर लेती हैं। अण्डाणु जब अण्डाशय से बाहर आता है तो इसी झिल्ली में बंद रहता है।
मादा मेंढक के पेट में, पार्श्व सतह पर, देहगुहा की पूरी लंबाई में एक जोड़ी लंबी, पतली और कुंडलित नलिकाएँ फैली होती हैं जिन्हें अण्डवाहिनी कहते हैं। अण्डवाहिनियों का अण्डाशय से कोई संरचनात्मक संबंध नहीं होता। प्रत्येक नली का अगला सिरा ग्रसिका के पास, फुफ्फुस के आधार पर, पीछे की सतह पर स्थित होता है। यह सिरा फूलकर एक चौड़ी कीपनुमा आकृति बनाता है। कीप के किनारे पर रोमिल संरचनाएँ होती हैं। इस कीप को अण्डाशयी कीप (ovidutal funnel) कहते हैं और इसमें स्थित छिद्र को आस्य (ostium) कहते हैं। अण्डवाहिनी का पिछला सिरा अवस्कर में खुलने से पहले कुछ फूलकर डिम्बकोष (ओवीसेक, ovisac) बनाता है। कुछ जन्तु विशेषज्ञ इसे गर्भाशय की संज्ञा देते हैं, लेकिन यह वास्तव में गर्भाशय नहीं है। गर्भाशय अण्डवाहिनी के उस भाग को कहते हैं जहाँ भ्रूण का परिवर्तन होता है। चूंकि मेंढक में भ्रूण का परिवर्तन शरीर के बाहर होता है और अण्डे इस भाग से बाहर निकलने से पहले कुछ समय के लिए संचित रहते हैं, इसलिए इस अंग को गर्भाशय कहना उचित नहीं है। डिम्बकोष एक पेपिला पर स्थित एक संकीर्ण छिद्र द्वारा अवस्कर में खुलता है। एक परिपक्व मादा एक बार में 2500 से 3000 तक अण्डे दे सकती है। अनिषेचित अण्ड गोलाकार 1.75 मिमी व्यास का होता है। इसमें बाह्य निषेचन (external fertilization) होता है और परिवर्तन अपरोक्ष होता है, जिसमें टेडपोल लार्वा (Tadpole Larva) बनता है। यह पूरा जनन और विकास चक्र मेंढक की प्रजाति को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: मेंढक में नर और मादा दोनों के जनन अंग अलग होते हैं। नर में वृषण शुक्राणु बनाते हैं जो कई नलिकाओं से होते हुए बाहर निकलते हैं। मादा में अण्डाशय अण्डे बनाते हैं जो अण्डवाहिनियों से गुजरते हैं। अण्डे शरीर के बाहर पानी में निषेचित होते हैं और टेडपोल लार्वा से मेंढक बनते हैं।
🎯 Exam Tip: नर और मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंगों के नाम और उनके कार्यों को याद रखें, साथ ही निषेचन और परिवर्धन के प्रकार को भी स्पष्ट करें।
Question 2. मेंढक के परिसंचरण तंत्र का वर्णन कीजिए एवं हृदय की क्रियाविधि समझाइए।
Answer: मेंढक का परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का होता है, क्योंकि इसमें रक्त बंद रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होता है। मेंढक में एकल परिसंचरण पाया जाता है, जिसका अर्थ है कि हृदय में ऑक्सीजन युक्त (शुद्ध) और ऑक्सीजन रहित (अशुद्ध) दोनों प्रकार का रक्त प्रवेश करता है और निलय (ventricle) में मिश्रित हो जाता है। परिसंचरण तंत्र में हृदय, रक्त वाहिनियाँ और रक्त शामिल होते हैं।
हृदय (Heart): मेंढक का हृदय एक पतली, पारदर्शी दोहरी झिल्ली से घिरा होता है जिसे पेरिकार्डियम (pericardium) कहते हैं। यह एक तीन-कक्षीय संरचना है जिसमें दो ऊपरी आलिंद (auricles) और एक निचला निलय (ventricle) होता है। मेंढक के हृदय से दो अतिरिक्त कक्ष जुड़े होते हैं: शिराकोटर (sinus venosus) और धमनी शंकु (truncus arteriosus)। हृदय का यह विशेष निर्माण उभयचरों को जलीय और स्थलीय वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है। शिराकोटर एक तिकोन कक्ष है जो हृदय की पिछली सतह पर होता है और तीन मुख्य महाशिराओं (दो अग्र महाशिरा और एक पश्च महाशिरा) से अशुद्ध रक्त इकट्ठा करके दाहिने आलिंद में पहुँचता है। दाहिने आलिंद में इसकी ओपनिंग पर साइनो-ऑरिकुलर वाल्व होता है। हृदय की निचली सतह से जुड़ा एक अतिरिक्त कक्ष जिसे धमनी शंकु कहते हैं, निलय से रक्त इकट्ठा करके पूरे शरीर में वितरित करता है। धमनी शंकु का अधिक पेशीय फूला हुआ आधार भाग पाइलेजियम (pylangium) या कोनस आर्टेरियोसस (conus arteriosus) कहलाता है, जबकि इसका कम पेशीय ऊपरी संकरा भाग सायनेजियम (synangium) या बल्बिस आर्टेरियोसस (bulbus arteriosus) कहलाता है। पाइलेजियम भाग में एक सर्पिल वाल्व होता है जो इसे दाहिने और बाएँ कक्षों में विभाजित करता है, जिन्हें क्रमशः केवम एओर्टिकम (cavum aorticum) और केवम पल्मोक्युटेनियम (cavum pulmocutaneum) कहते हैं। धमनियों और शिराओं का एक निश्चित जाल होता है जिसे धमनी और शिरा तंत्र कहते हैं।
रुधिर (Blood): रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है। यह प्लाज्मा (तरल) और रक्त कणिकाओं (कोशिकाओं) से मिलकर बना होता है। प्लाज्मा (तरल) में तीन प्रकार की रक्त कणिकाएँ होती हैं: लाल रक्त कणिकाएँ (RBCs), श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs) और थ्रोम्बोसाइट्स या स्पिंडल कोशिकाएँ। RBCs में केंद्रक होता है, ये अंडाकार और द्वि-उत्तल होती हैं और इनमें हीमोग्लोबिन (श्वसन रंजक) होता है। WBCs अमीबा जैसी आकृति की होती हैं और इनका कार्य सुरक्षात्मक होता है। थ्रोम्बोसाइट्स स्पिंडल आकृति की होती हैं और रक्त स्कंदन (clotting) में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
लसीका तंत्र (Lymphatic System): लसीका तंत्र निम्न से मिलकर बनता है:
(अ) लसीका
(ब) लसीका नलिकाएँ
(स) लसीका ग्रंथियाँ।
लसीका तंत्र और रुधिर परिसंचरण तंत्र आपस में जुड़े रहते हैं, जो शरीर के तरल संतुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं।
In simple words: मेंढक का रक्त परिसंचरण बंद होता है और हृदय में शुद्ध व अशुद्ध रक्त मिल जाता है। हृदय तीन कक्षों वाला होता है। रक्त में लाल और सफेद रक्त कोशिकाएँ तथा प्लेटलेट्स होते हैं। लसीका तंत्र शरीर के तरल को बनाए रखने में मदद करता है और रक्त परिसंचरण से जुड़ा होता है।
🎯 Exam Tip: मेंढक के हृदय की संरचना (तीन कक्ष), रक्त के प्रकार, और परिसंचरण तंत्र के मुख्य भागों का सही वर्णन करना महत्वपूर्ण है। लसीका तंत्र की भूमिका को भी संक्षेप में समझाएँ।
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